Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

Mamta Yas

वास्को दी गामा: एक खोजी नाविक अथवा एक ईसाई समुद्री डाकू

हमारे देश में पढ़ाई जाने वाली किसी भी इतिहास पुस्तक को उठाकर देखिये। वास्को दी गामा को भारत की खोज करने का श्रेय देते हुए इतिहासकार उसके गुणगान करते दिखेंगे। उस काल में जब यूरोप से भारत के मध्य व्यापार केवल अरब के माध्यम से होता था। उस पर अरबवासियों का प्रभुत्व था। भारतीय मसालों और रेशम आदि की यूरोप में विशेष मांग थी। पुर्तगालवासी वास्को दी गामा समुद्र के रास्ते अफ्रीका महाद्वीप का चक्कर लगाते हुए भारत के कप्पाड तट पर 14, मई, 1498 कालीकट, केरल पहुँचा। केरल का यह प्रदेश समुद्री व्यापार का प्रमुख केंद्र था। स्थानीय निवासी समुद्र तट पर एकत्र होकर गामा के जहाज को देखने आये क्योंकि गामा के जहाज की रचना अरबी जहाजों से अलग थी।

केरल के उस प्रदेश में शाही जमोरियन राजपरिवार के राजा समुद्रीन का राज्य था। राजा अपने बड़े से शाही राजमहल में रहता था। गामा अपने साथियों के साथ राजा के दर्शन करने गया। रास्ते में एक हिन्दू मंदिर को चर्च समझ कर गामा और उसके साथी पूजा करने चले गए। वहां स्थित देवीमूर्ति को उन्होंने मरियम की मूर्ति समझा और पुजारियों के मुख से श्री कृष्ण के नाम को सुनकर उसे क्राइस्ट का अपभ्रंश समझा। गामा ने यह सोचा कि लम्बे समय तक यूरोप से दूर रहने के कारण यहाँ के ईसाईयों ने कुछ स्थानीय रीति रिवाज अपना लिए है। इसलिए ये लोग यूरोप के ईसाईयों से कुछ भिन्न मान्यताओं वाले है। गामा की सोच उसके ईसाईयत के प्रति पूर्वाग्रह से हमें परिचित करवाती है।
राजमहल में गामा का भव्य स्वागत हुआ। उसे 3000 सशस्त्र नायर सैनिकों की टुकड़ी ने अभिवादन दिया। गामा को तब तक विदेशी राजा के राजदूत के रूप में सम्मान मिल रहा था। सलामी के पश्चात गामा को राजा के समक्ष पेश किया गया। जमोरियन राजा हरे रंग के सिंहासन पर विराजमान था। उनके गले में रतन जड़ित हीरे का हार एवं अन्य जवाहरात थे। जो उनकी प्रतिष्ठा को प्रदर्शित करते थे। गामा द्वारा लाये गए उपहार अत्यंत तुच्छ थे। राजा उनसे प्रसन्न नहीं हुआ। फिर भी उसने सोने, हीरे आदि के बदले मसालों के व्यापार की अनुमति दे दी। स्थानीय अरबी व्यापारी राजा के इस अनुमति देने के विरोध में थे। क्योंकि उनका इससे व्यापार पर एकाधिकार समाप्त हो जाता। गामा अपने जहाज़ से वापिस लौट गया। उसकी इस यात्रा में उसके अनेक समुद्री साथी काल के ग्रास बन गए। उसका पुर्तगाल वापिस पहुंचने पर भव्य स्वागत हुआ। उसने यूरोप और भारत के मध्य समुद्री रास्ते की खोज जो कर ली थी। आधुनिक लेखक उसे भारत की खोज करने वाला लिखते है। भारत तो पहले से ही समृद्ध व्यापारी देश के रूप में संसार भर में प्रसिद्ध था। इसलिए यह कथन यूरोपियन लेखक की पक्षपाती मानसिकता को प्रदर्शित करता है।
पुर्तगाल ने अगली समुद्री यात्रा की तैयारी आरम्भ कर दी। इस बार लड़ाकू तोपों से सुसज्जित 13 जहाजों और 1200 सिपाहियों का बड़ा भारत के लिए निकला। कुछ महीनों की यात्रा के पश्चात यह बेड़ा केरल पहुंचा। कालीकट आते ही पुर्तगालियों ने राजा के समक्ष एक नाजायज़ शर्त रख दी कि राजा केवल पुर्तगालियों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध रखेंगे। अरबों के साथ किसी भी प्रकार का व्यापार नहीं करेंगे। राजा ने इस शर्त को मानने से इंकार कर दिया। झुंझला कर पुर्तगालियों ने खाड़ी में खड़े एक अरबी जहाज को बंधक बना लिया। अरबी व्यापारियों ने भी पुर्तगालियों की शहर में रुकी टुकड़ी पर हमला बोल दिया। पुर्तगालियों ने बल प्रयोग करते हुए दस अरबी जहाजों को बंधक बना कर उनमें आग लगा दी। इन जहाजों पर काम करने वाले नाविक जिन्दा जल कर मर गए। पुर्तगालियों यहाँ तक नहीं रुके। उन्होंने कालीकट पर अपनी समुद्री तोपों से बमबारी आरम्भ कर दी। यह बमबारी दो दिनों तक चलती रही। कालीकट के राजा को अपना महल छोड़ना पड़ा। यह उनके लिया अत्यंत अपमानजनक था। पुर्तगाली अपने जहाजों को मसालों से भरकर वापिस लौट गए। यह उनका हिन्द महासागर में अपना वर्चस्व स्थापित करने का पहला अभियान था।
गामा को एक अत्याचारी एवं लालची समुद्री लुटेरे के रूप में अपनी पहचान स्थापित करनी थी। इसलिए वह एक बार फिर से आया। इस बार अगले तीन दिनों तक पुर्तगाली अपने जहाजों से कालीकट पर बमबारी करते रहे। खाड़ी में खड़े सभी जहाजों और उनके 800 नाविकों को पुर्तगाली सेना ने बंधक बना लिया। उन बंधकों की पहले जहाजों पर परेड करवाई गई। फिर उनके नाक-कान, बाहें काटकर उन्हें तड़पा तड़पा कर मारा गया। अंत में उनके क्षत-विक्षत शरीरों को नौकाओं में डालकर तट पर भेज दिया गया। ज़मोरियन राजा ने एक ब्राह्मण संदेशवाहक को उसके दो बेटों और भतीजे के साथ सन्धि के लिए भेजा गया। गामा ने उस संदेशवाहक के अंग भंग कर, अपमानित कर उसे राजा के पास वापिस भेज दिया। और उसके बेटों और भतीजे को फांसी से लटका दिया। पुर्तगालियों का यह अत्याचार केवल कालीकट तक नहीं रुका। वे पश्चिमी घाट के अनेक समुद्री व्यापार केंद्रों पर अपना कहर बरपाते हुए गोवा तक चले गए। गोवा में उन्होंने अपना शासन स्थापित किया। यहाँ उनके अत्याचार की एक अलग दास्तान फ्रांसिस ज़ेवियर नामक एक ईसाई पादरी ने लिखी।
पुर्तगालियों का यह अत्याचार केवल लालच के लिए नहीं था। इसका एक कारण उनका अपने आपको श्रेष्ठ सिद्ध करना भी था। इस मानसिकता के पीछे उनका ईसाई और भारतीयों का गैर ईसाई होना भी एक कारण था। इतिहासकार कुछ भी लिखे मगर सत्य यह है कि वास्को दी गामा एक नाविक के भेष में दुर्दांत, अत्याचारी, ईसाई लुटेरा था। खेद है वास्को डी गामा के विषय में स्पष्ट जानकारी होते हुए भी हमारे देश के साम्यवादी इतिहासकार उसका गुणगान कर उसे महान बनाने पर तुले हुए है। इतिहास का यह विकृति करण हमें संभवतः विश्व के किसी अन्य देश में नहीं मिलेगा।

(चित्र में वास्को दी गामा को ज़मोरियन राजा से प्रथम बार मिलते हुए दिखाया गया है)

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माँ कामाख्या मंदिर

तिलिस्म की धरती… जादू टोने की जननी… मायावी चेहरे… जहां समय चक्र के साथ पानी का रंग लाल हो जाता है… पहाड़ का रंग नीला। विनाशकारी वेग से डराने वाली लोहित नदी का प्रचंड स्वरूप भी ब्रह्मपुत्र में समाहित होकर शांत पड़ जाता है… नदियों के बीच इकलौते नद, ब्रह्मपुत्र का विस्तार यहां पहुंचकर अबूझ अनंत जैसा दिखता है।…

जनश्रुतियां तो कहती हैं कि यहां की सिद्धियों में इंसान को जानवर में बदल देने की शक्ति है… कुछ के लिए ये भय है और बहुतों के लिए यहां की तांत्रिक सिद्धियों के प्रभावी होने की आश्वस्ति।
इसलिए तो देवी की देदीप्यमान अनुभूति के साथ श्रद्धालुओं की सैकड़ों पीढ़ियां गुजर गई। आस्था के कई कालखंड अतीत का हिस्सा बन गए। मगर विराट आस्था की नगरी कामरूप कामाख्या, तांत्रिक विद्या की सर्वोच्च सत्ता के रूप में आज भी प्रतिष्ठित है।

राजा दक्ष की बेटी सती ने पिता की मर्जी के खिलाफ़ शिव जी से शादी की थी। राजा दक्ष ने जब अपने यहां यज्ञ किया तो उसने शिव और सती को न्यौता नहीं दिया। इसके बावजूद सती अपने मायके गई जहां पिता दक्ष ने शिवजी के बारे में अपमानजनक शब्द कहे। उनका उपहास उड़ाया। जिससे आहत सती ने यज्ञ कुंड में कूदकर जान दे दी।

अग्निकुंड में कूदने से पहले सती के नेत्र लाल हो गए… उनकी भौंहें तन गई… मुखमंडल प्रलय के सूर्य की तरह तेजोद्दीप्त हो उठा… असीम पीड़ा से तिलमिलाते हुए सती ने कहा…

`ओह!… मैं इन शब्दों को कैसे सुन पा रही हूं… मुझे धिक्कार है। मेरे पिता दक्ष ने मेरे महादेव का अपमान किया… देवताओं तुम्हें धिक्कार है… तुम भी कैलाशपति के लिए ऐसे अपमानजनक शब्दों को कैसे सुन रहे हो जो मंगल के प्रतीक हैं… जो क्षण मात्र में संपूर्ण सृष्टि को भस्म कर सकते हैं। वे मेरे स्वामी हैं। पृथ्वी सुनो… आकाश सुनो… देवताओं तुम भी सुनो!… मैं अब एक क्षण जीवित नहीं रहना चाहती… मैं अग्नि प्रवेश लेती हूं।’

सती की अग्नि समाधि से शिव ने प्रचंड रूप धारण कर लिया… देवी सती के जले हुए शरीर को लेकर कैलाशपति उन्मत की भांति सभी दिशाओं को थर्राने लगे… प्राणी से लेकर देवता तक त्राहिमाम मांगने लगे… भयानक संकट देखकर भगवान विष्णु, अपने चक्र से सती के अंगों को काटकर गिराने लगे… जब सती के सारे अंग कटकर गिर गए तब भगवान शंकर संयत हुए।

सती की अग्नि कुंड में समा जाने के बाद, भगवान शंकर समाधि में चले गए… इसी बीच तारकासुर के उत्पात से सृष्टि कांप उठी… उसका वध करने के लिए देवताओं ने भगवान शंकर की समाधि तोड़ने का यत्न किया…। देवताओं ने कामदेव को समाधि भंग करने के लिए भेजा लेकिन समाधि टूटने से क्रोधित महादेव ने कामदेव को भस्म कर दिया।

जहां तक नज़रें जाती है, हर तरफ ब्रह्मपुत्र ही ब्रह्मपुत्र है… ब्रह्मपुत्र की धाराओं से घिरा ये स्थान अत्यंत मनोरम है… कामाख्या आने वालों का ये वैसे भी पसंदीदा जगह है… लेकिन कौमारी तीर्थ पर आए श्रद्धालुओं के लिए भी ये जगह ख़ास है… यहां बने शिव मंदिर का इतना महत्व है कि उमानंद के दर्शन के बिना कामाख्या के दर्शन का फल नहीं मिलता है।

ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मपुत्र नदी के बीच बने इसी द्वीप पर समाधि में लीन भोले शंकर ने अपना तीसरा नेत्र खोला था… समाधि भंग होने से क्रोधित भगवान शंकर ने कामदेव को यहीं भस्म कर दिया था… इसलिए इस स्थान को भस्माचल भी कहा जाता है… कामदेव की पत्नी रति की प्रार्थना पर कैलाशपति ने कामदेव को पुनर्जीवन तो दे दिया लेकिन रूप और कांति नहीं आई।

हे महादेव! हे कैलाशपति! आपने मेरे स्वामी कामदेव को जीवन तो दे दिया लेकिन उनकी कांति… कामदेव का उनका रूप नहीं रहा… हे महादेव कृपा करो… तुम दयालु हो… मेरे स्वामी का तेज प्रदान करो।

रति की प्रार्थना को महादेव ने स्वीकार कर लिया लेकिन उन्होंने देवी सती का मंदिर बनवाने की शर्त रखी… कामदेव ने मंदिर का निर्माण करवाया और कामदेव को रूप सौंदर्य मिला… इसलिए इस स्थान का नाम, कामरूप कामाख्या के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।

जिन इक्यावन स्थानों पर सती के अंग गिरे थे, वे स्थान ही आज शक्ति के पीठ माने जाते हैं… कामरूप कामाख्या में देवी का योनि भाग गिरा था जो देवी का जगत जननी स्वरूप है। नीलांचल पर्वत पर बने इस मंदिर को ऊपर से देखने पर ये शिवलिंग के आकार का दिखता है… 51 शक्तिपीठों में इसे सर्वोच्च माना जाता है।… इसे कौमारी तीर्थ भी कहते हैं… इस शक्तिपीठ को असीम ऊर्जा और अथाह शक्ति का स्रोत माना गया है… इसलिए तंत्र साधना के लिए इसे ही सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है…

मान्यता है कि जून के महीने में देवी रजस्वला होती हैं… इस दौरान यहां हर साल अम्बूवाची योग पर्व मनाया जाता है, जो कुंभ की तरह विशाल होता है… इस दौरान माता कामाख्या मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। साधक और तांत्रिक इस आयोजन के दौरान विभिन्न कर्मकांडों के जरिए दिव्य अलौकिक शक्तियों का अर्जन करते हैं।

सूर्य, चंद्रमा, तारे। प्रकृति का ये प्रत्यक्ष दर्शन, क्या मानव के जीवन पर निर्णायक प्रभाव डालता है?… ग्रह नक्षत्रों का मानव जीवन पर सीधा असर पड़ता है?… इसका अध्ययन ही ज्योतिष कहलाता है। भारत के प्राग ज्योतिषपुर यानी पूर्व के ज्योतिष केंद्र से बेहतर जगह भला कौन हो सकती है?

चित्राचल पहाड़ी के नवग्रह मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। इसे ज्योतिषी विज्ञान का केंद्र माना जाता है। पूर्व मुखी मंदिर में पहुचने के लिए पूर्व से पश्चिम के लिए सीढ़ियां बनाई गई हैं… प्रवेश द्वार के दाहिनी तरफ राहु और बाईं तरफ केतु की प्रतिमा है… मंदिर की पहली दहलीज पर गणेश, शिव पार्वती और श्रीकृष्ण की प्रतिमा है… तीन दीपक जलाकर सबसे पहले इन तीन प्रतिमाओं की पूजा होती है।

दूसरी दहलीज के बाद एक अंधेरी गुफा दिखती है… यहां दिखने वाले गोलाकार मंदिर के धरातल पर नौ शिवलिंग बने हुए हैं… हर शिवलिंग की जललहरी का मुख विभिन्न दिशाओं की तरफ है… एक मुख्य शिवलिंग बीच में बना हुआ है… यहां पूजा या दर्शन के बाद बाहर जाते समय पीछे घूमकर देखना वर्जित है।

कहते हैं कि ऐसा करने से पूजा का फल नहीं मिलता… यहां आने वाले भक्तों को प्रसाद के रूप में सभी ग्रहों से संबंधित अनाज को पानी में भिगोकर दिया जाता है।

शुक्रेश्वर मंदिर:- सती की शक्ति और शिव की साधना की इस धरती की अपनी ही माया है… कहते हैं कि देवताओं से लेकर दैत्यों तक ने इस आदिशक्ति को स्वीकारा। दैत्यों के गुरू कहे जाने वाले शुक्राचार्य भी हस्तीगिरि पर शिव की आराधना करते थे।
हाथी असम की पहचान हैं… काजीरंगा इसी पहचान को पुख्ता करता है… गुवाहाटी में हस्तीगिरि पर्वत का आकार भी हाथी की पीठ जैसा है… दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य मंदिर के शिवलिंग की दूर दूर तक मान्यता है…

भारत के विशाल शिवलिंगों में इसे गिना जाता है… शुक्रेश्वर घाट दाह संस्कार के लिए भी जाना जाता है… और यहां से सूर्यास्त के अद्भुत नज़ारे के लिए भी। जो शायद श्मशान के देवता शिव के साथ जीवन की संध्या का प्रतीक है।

Posted in रामायण - Ramayan

याद होगा स्वामी प्रसाद मौर्य ने अधम शब्द पर बहुत तंज करके बोला था की रामायण नारी और दलित जाति की विरोधी है :- 👇

अधम ते अधम #अधम_अति_नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥

भावार्थ:- जो अधम से भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यंत अधम हैं, और उनमें भी हे पापनाशन! मैं मंदबुद्धि हूँ।

यह वाक्य शबरी मां स्वमं के लिए श्रीराम से कहती है की वह अधम (धर्महीन) पतित महिला है। स्वाभाविक रूप से हम किसी सिद्ध पुरुष के सामने इतने बौने हो जाते है की स्वमं को अति क्षुद्र समझने लगते हैं।

#स्पष्टीकरण …

श्रीरामचंद्र जी जवाब नही बताया बस एक लाइक पकड़ कर चिल्लाने लगा मौर्य

जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥

भगवान श्रीराम जी जवाब में कहते है:-

#जाति, #पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता- इन सबके होने पर भी #भक्ति_से_रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल (शोभाहीन) दिखाई पड़ता है।

अर्थात भगवान राम भक्ति की महिमा का बखान करते कहते है की यदि किसी के पास दंभ हो तो भक्ति नही की जा सकती।

पुनः भेज रहा हूं…. राजनीति में लोग कितने अधम हो सकते है इसका यह उदाहरण है।
प्रणाम

फेसबुक ने इस समय ब्लॉक किया हुआ था इसलिए ट्विटर पर पोस्ट की थी

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

“देव जब सोते हैं”

आज फिर एक सुन्दर प्रश्न आया । एक युवक प्रश्न कर रहा था , उसने सहज भाव से पूछा ।
शास्त्रीजी , क्या सच में संसार के स्वामी चार महीने के लिए सो जाते हैं ?
शास्ञी जी ने कहा , क्यों ? कोई शक है आपको ?
युवक ने कहा-नहीं । लेकिन यह भगवान विष्णु जगत के पालनहार हैं और अगर वो सो गये वह भी चार महीने के लिए फिर इस ब्रह्मांड के मामले कैसे चलेगें ?
शास्त्रीजी ने कहा – आपके प्रधानमंत्री एक हफ्ते के लिए विदेश जाते हैं तब देश को कौन चलाता है ? क्या देश का कारोबार ठप हो जाता है ? अगर किसी एक कंपनी का अध्यक्ष एक महीने के लिए कहीं घुमने चला जाए तो क्या कंपनी नहीं चलती ?
युवक ने कहा कि वो तो किसी को सत्ता सौंप कर जाते है ।

शास्त्री जी ने कहा कि इस दुनिया के मालिक भी सत्ता सौंप के जाते हैं ।
जगत के नाथ के सोते ही गुरु शक्ति जाग्रत हो जाती है । गुरु पूर्णिमा उत्सव आपको विश्वास दिलाता है कि आपका ध्यान रखने के लिए गुरू परम्परा बैठी है जाग्रत है ।
फिर श्रावण मास में भगवान महादेव आपका ध्यान रखने को तैयार हैं ।
श्रावण समाप्त होते ही विघ्नहर्ता गणेश की सवारी आ जाती है गणेशजी जब कैलाश जाते हैं तो आपके पितरों का उत्सव शुरु होता है तब तुम्हारे पिता तुम्हारा ध्यान रखते हैं ।
पितृ उत्सव समाप्त होते ही आद्य शक्ति माँ जगदम्बा शेर पर सवार होकर आती हैं और दिवाली पर सरस्वती ,लक्ष्मी और महाकाली तुम्हारा ख्याल रखती हैं । तुम तैयार हो जाते हो देव- दिवाली का उत्सव धूमधाम से मनाने के लिए क्योंकि जग का नाथ जाग गया है ।

इस चातुर्मास में गुरु परंपरा आपको लगातार जाग्रत रखती है ।
आप जाग्रत रहना भगवान आपकी देखभाल करने के लिए आपके हृदय-कमल में ही बैठे हैं ।

🙏हरि ॐ 🙏 राधे राधे 🙏

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

⚫ नरपिशाच बख्तियार खिलजी ⚫

तुर्की का सैन्य कमांडर बख्तियार खिलजी गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। सारे हकीम हार गए परंतु बीमारी का पता नहीं चल पाया। खिलजी दिनों दिन कमजोर पड़ता गया और उसने बिस्तर पकड़ लिया। उसे लगा कि अब उसके आखिरी दिन आ गए हैं।
एक दिन उससे मिलने आए एक बुज़ुर्ग ने सलाह दी कि दूर भारत के मगध साम्राज्य में अवस्थित नालंदा महाविद्यालय के एक ज्ञानी राहुल शीलभद्र को एक बार दिखा लें, वे आपको ठीक कर देंगे। खिलजी तैयार नहीं हुआ। उसने कहा कि मैं किसी काफ़िर के हाथ की दवा नहीं ले सकता हूँ, चाहे मर क्यों न जाऊं!!
मगर बीबी बच्चों की जिद के आगे झुक गया। राहुल शीलभद्र जी तुर्की आए। खिलजी ने उनसे कहा कि दूर से ही देखो मुझे छूना मत क्योंकि तुम काफिर हो और दवा मैं लूंगा नहीं। राहुल शीलभद्र जी ने उसका चेहरा देखा, शरीर का मुआयना किया, बलगम से भरे बर्तन को देखा, सांसों के उतार चढ़ाव का अध्ययन किया और बाहर चले गए।
फिर लौटे और पूछा कि कुरान पढ़ते हैं?
खिलजी ने कहा दिन रात पढ़ते हैं!
पन्ने कैसे पलटते हैं?
उंगलियों से जीभ को छूकर सफे पलटते हैं!!

शीलभद्र जी ने खिलजी को एक कुरान भेंट किया और कहा कि आज से आप इसे पढ़ें और राहुल शीलभद्र जी वापस भारत लौट आए।

उधर दूसरे दिन से ही खिलजी की तबीयत ठीक होने लगी और एक हफ्ते में वह भला चंगा हो गया। दरअसल राहुल शीलभद्र जी ने कुरान के पन्नों पर दवा लगा दी थी जिसे उंगलियों से जीभ तक पढ़ने के दौरान पहुंचाने का अनोखा तरीका अपनाया गया था।
खिलजी अचंभित था मगर उससे भी ज्यादा ईर्ष्या और जलन से मरा जा रहा था कि आखिर एक काफिर मुस्लिम से ज्यादा काबिल कैसे हो गया?

अगले ही साल 1193 में उसने सेना तैयार की और जा पहुंचा नालंदा महाविद्यालय मगध क्षेत्र। पूरी दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञान और विज्ञान का केंद्र। जहां 10000 छात्र और 1000 शिक्षक एक बड़े परिसर में रहते थे। जहां एक तीन मंजिला इमारत में विशालकाय पुस्तकालय था, जिसमें एक करोड़ पुस्तकें, पांडुलिपियां एवं ग्रंथ थे।

खिलजी जब वहां पहुंचा तो शिक्षक और छात्र उसके स्वागत में बाहर आए, क्योंकि उन्हें लगा कि वह कृतज्ञता व्यक्त करने आया है।

खिलजी ने उन्हें देखा और मुस्कुराया और तलवार से भिक्षु श्रेष्ठ की गर्दन काट दी (क्योंकि वह पूरी तैयारी के साथ आया था)। फिर हजारों छात्र और शिक्षक गाजर मूली की तरह काट डाले गए (क्योंकि कि वह सब अचानक हुए हमले से अनभिज्ञ थे)। खिलजी ने फिर ज्ञान विज्ञान के केंद्र पुस्तकालय में आग लगा दी। कहा जाता है कि पूरे तीन महीने तक पुस्तकें जलती रहीं।

खिलजी चिल्ला चिल्ला कर कह रहा था कि तुम काफिरों की हिम्मत कैसे हुई इतनी पुस्तकें पांडुलिपियां इकट्ठा करने की? बस एक कुरान रहेगा धरती पर बाकी सब को नष्ट कर दूंगा।

पूरे नालंदा को तहस नहस कर जब वह लौटा तो रास्ते में विक्रम शिला विश्वविद्यालय को भी जलाते हुए लौटा। मगध क्षेत्र के बाहर बंगाल में वह रूक गया और वहां खिलजी साम्राज्य की स्थापना की।

जब वह लद्दाख क्षेत्र होते हुए तिब्बत पर आक्रमण करने की योजना बना रहा था तभी एक रात उसके एक कमांडर ने उसकी निद्रा में हत्या कर दी। आज भी बंगाल के पश्चिमी दिनाजपुर में उसकी कब्र है जहां उसे दफनाया गया था।

और सबसे हैरत की बात है कि उसी दुर्दांत हत्यारे के नाम पर बिहार में बख्तियारपुर नामक जगह है जहां रेलवे जंक्शन भी है जहां से नालंदा की ट्रेन जाती है।

यह थी एक भारतीय बौद्ध भिक्षु शीलभद्र की शीलता, जिन्होंने तुर्की तक जाकर तथा दुत्कारे जाने के पश्चात भी एक शत्रु की प्राण रक्षा अपने चिकित्सकीय ज्ञान व बुद्धि कौशल से की।

बदले में क्या मिला ???
शांतिप्रिय समुदाय की एहसान फरामोशी ! प्राण, समाज व संस्कृति पर घात !!!

दुर्भाग्यवश तबसे अब तक कुछ नहीं बदला। हम आज भी उस क्रूर विदेशी आक्रांता के नाम पर बसाये गये शहर और स्टेशन का नाम तक नहीं बदल सके।।