Posted in हास्यमेव जयते

एक आदमी ने एक चिड़ियाघर की स्थापना की, जिसका प्रवेश शुल्क 300 कर दिया लेकिन कोई भी वहाँ नहीं गया।
उन्होंने इसे घटाकर 200 कर दिया लेकिन फिर भी कोई नहीं आया।
फिर उन्होंने फीस घटाकर 50 कर दी, लेकिन फिर भी लोग नहीं आए।
अंत में, उन्होंने इसे मुफ़्त प्रवेश कर दिया और जल्द ही, चिड़ियाघर लोगों से भर गया।

फिर उसने चुपचाप चिड़ियाघर के गेट को बंद कर दिया, शेरों को आज़ाद कर दिया और बाहर निकलने का शुल्क 500 कर दिया डर के मारे सभी ने भुगतान कर दिया!

शिक्षा – मुफ्त कुछ नही होता, न गैस, न स्वास्थ्य, न बिजली, न राशन…
सिर्फ टोपी इधर से उधर होती है।

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Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

William Jones (1783)को जितना पढ़ रहा हूं उतना आश्चर्य हो रहा है।

इस धूर्त के विरोध में गूगल पर बहुत कम लिखा दिखाई दिया अधिकांश उसके पक्ष में SIR जैसे शब्दों को बड़े आदर से लिया गया है। जिसमें भारतीय अधिक है।

जैसे पहले मुस्लिमों में जो जितने हिन्दुओं को मारता था उसकी मजार उतनी बड़ी बनाई जाती थी। उसको सम्मान देने के लिए गाजी का पद दिया जाता था। उसी तरह ईसाईयत में जो जितना बड़ा षड्यंत्र करता ता उसको सम्मानित किया जाता था। इस चर्च में अंदर मूर्ति को देखने का शुल्क 20$ है जो एक बड़ी रकम है।

जोन्स की आदम कद की एक तस्वीर चर्च के बाहर लगी है। हाथ में पुस्तक में मनु लिखा हुआ है। शायद अंग्रेज जानते थे कि जो कार्य जोन्स मनुस्मृति में कर के आया है वह बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए ही उसको इतना सम्मान दिया गया होगा।

William Jones, Bharat 1783 (एक धूर्त) एशियाटिक सोसायटी का चेयरमैन, जिसने सबसे पहले मनुस्मृति को संस्कृत से अंग्रेजी में अनुवाद कराया और मनुस्मृति में प्रक्षेपण कराए।

आचार्य चाणक्य की नीतिशास्त्र का भी अंग्रेजी में अनुवाद कराया और कौटिल्य के नाम को विवादों में घसीटा। कौटिल्य का नाम को छद्म बनाने का श्रेय भी इस धूर्त को जाता है।

यूनिवर्सिटी कॉलेज, ऑक्सफोर्ड के चैपल में, अठारहवीं शताब्दी के ब्रिटिश ओरिएंटलिस्ट सर विलियम जोन्स का एक स्मारक है। इस मार्बल फ्रिज्ज़ से पता चलता है कि सर विलियम एक कुर्सी पर बैठकर डेस्क पर कुछ लिख रहे थे, जबकि उनके सामने बैठे तीन भारतीय पारंपरिक विद्वान या तो किसी पाठ की व्याख्या कर रहे हैं या किसी समस्या पर विचार कर रहे हैं।

यह शिलालेख को “जस्टिनियन ऑफ इंडिया” के नाम से विख्यात किया गया। एक जज जो भारत में संस्कृतज्ञों के चरणों में बैठ कर संस्कृत सीखने का दावा करता है उसका भाव विद्वानों के लिए क्या था यह चित्र बखूबी दिखा रहा है। क्यों ना इसका अर्थ लगाया जाए कि जो विद्वान जोन्स का सहयोग कर रहे थे वे बिकाऊ थे, आगामी पीढ़ियों के लिए अभिशाप थे ?

दोनों मूर्ति विषयक विमर्श होना ही चाहिए।

सर विलियम जोंस (28 सितम्बर 1746 – 27 अप्रैल 1794)), अंग्रेज प्राच्य विद्यापंडित और विधिशास्त्री तथा प्राचीन भारत संबंधी सांस्कृतिक अनुसंधानों का प्रारंभकर्ता।

लंदन में 28 सितंबर 1746 को जन्म। हैरो और आक्सफर्ड में शिक्षा प्राप्त की। शीघ्र ही उसने इब्रानी, फारसी, अरबी और चीनी भाषाओं का अभ्यास कर लिया। इनके अतिरिक्त जर्मन, इतावली, फ्रेंच, स्पेनी और पुर्तगाली भाषाओं पर भी उसका अच्छा अधिकार था। नादिरशाह के जीवनवृत का फारसी से फ्रेंच भाषा में उसका अनुवाद 1770 में प्रकाशित हुआ। 1771 में उसने फारसी व्याकरण पर एक पुस्तक लिखी। 1774 में “पोएसिअस असिपातिका कोमेंतेरिओरम लिबरीसेम्स” और 1783 में “मोअल्लकात” नामक सात अरबी कविताओं का अनुवाद किया। फिर उसने पूर्वी साहित्य, भाषाशास्त्र और दर्शन पर भी अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी और अनुवाद किए।

कानून में भी उसने अच्छी पुस्तकें लिखीं है। उसी “आन द ला ऑव बेलमेंट्स” (1781) विशेष प्रसिद्ध है। 1774 से उसने अपना जीवन कानून के क्षेत्र में लगाया और 1783 में बंगाल के उच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) में न्यायाधीश नियुक्त हुआ। उसी वर्ष उसे “सर” की उपाधि मिली।

भारत में उसने पूर्वी विषयों के अध्ययन में गंभीर रुचि प्रदर्शित की। उसने संस्कृत का अध्ययन किया और 1784 में “बंगाल एशियाटिक सोसाइटी” की स्थापना की जिससे भारत के इतिहास, पुरातत्व, विशेषकर साहित्य और विधिशास्त्र संबंधी अध्ययन की नींव पड़ी। यूरोप में उसी ने संस्कृत साहित्य की गरिमा सबसे पहले घोषित की। उसी के कालिदासीय अभिज्ञान शाकुंतलम के अनुवाद ने संस्कृत और भारत संबंधी यूरोपीयदृष्टि में क्रांति उत्पन्न कर दी। गेटे आदि महान कवि उस अनुवाद से बड़े प्रभावित हुए। कलकत्ते में ही 17 अप्रैल 1794 के इस तथाकथित महापंडित का निधन हुआ।

जब अंग्रेजो का बंगाल मे कब्जा हुआ और उनका प्रभाव क्षेत्र बनारस याने वाराणसी तक पहुंचा तब वहां ब्राह्मणो को लेके उसने ये सब कार्य किया।आधुनिक मनु स्मृत्ती की प्रतिष्ठा धूमधाम से की गई।वास्तविक स्मृत्ती भुला दी गई।और उस मनु स्मृत्ति को मान्यता दिल्वाने के लिये रामायण महाभारतआदी ग्रंथो मे आख्यान बणाए।ये बहुत सरल था क्योंकि छापा खाना केवल अन्ग्रेज के हाथ मे था और ब्राह्मण के हाथ मे हस्त लिखित पोथी।जिसको समझना उसके बस का नही रहा था क्योंकि गुरुकुल तो नष्ट कर दिया।
फ़िर तो वो पोथिया मिलनी भी दुर्लभ हो गई है।उस दौर मे छ्पी मनु स्मृत्तियां आर्काइव नामक साइट पर मिल जायेगि।जिसमे से एक स्मृत्ति की भुमिका मे पंडित ने स्वीकार किया है कि इस मे 600से भी ज्यादा क्षेपक है जब उस काल खण्ड मे ही कट्टरपंथी लोग खुद ही स्वीकार कर रहे है कि हम जिसको छपवा रहे है उसके पाठ मे मिलावट है तो सोचिये वास्तव मे कितनी मिलावट रही होगी।

जितना नुकसान अंग्रेज धूर्त ने किया है उसका अंदाजा लगाना कठिन है।

डॉ विजय मिश्र
जयपुर
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