मैंने सुना है कि पुराने प्राचीन चीन में एक नियम था। अब भी उस नियम की कोई लकीर कहीं-कहीं चलती है। कन्फ्यूसियस के जमाने में वह नियम पैदा हुआ।
उन्नीस सौ दस में एक अमरीकन यात्री चीन गया। वह जैसे ही स्टेशन पर उतरा और स्टेशन के बाहर गया, वहां देखा, कि दो आदमियों में बड़ी घमासान लड़ाई चल रही है। मगर लड़ाई सिर्फ शब्दों की है। और कोई दो सौ आदमियों की भीड़ खड़े हो कर देख रही है। और निरीक्षण ऐसे हो रहा है, जैसे कोई बड़ा खेल हो रहा हो। वह भी खड़ा हो गया। जल्दी ही तूफान इतने करीब आया जा रहा है कि जल्दी ही उपद्रव होगा। और बात वे इतने गुस्से में कर रहे हैं, चीख रहे हैं, चिल्ला रहे हैं, और एक दूसरे पर बिलकुल झपट रहे हैं, लेकिन वह बड़ा हैरान हुआ कि मारपीट शुरू क्यों नहीं होती? इतनी भूमिका क्यों चल रही है? तो उसने एक चीनी को पूछा कि मैं समझ नहीं पा रहा। बड़ी देर हो गई, आखिर कभी की मारपीट हो गई होती हमारे मुल्क में, यह इतनी देर क्यों लग रही है?
उस चीनी ने कहा, ‘यहां नियम है। नियम यह है, कि जो पहले हमला करे वह हार गया। बस, फिर मामला खतम! जैसे ही इन दो में से किसी ने हमला किया, भीड़ हट जायेगी। मामला खतम ही हो गया है। जो पहले क्रोधित हुआ, वह उथला साबित हुआ। तो ये दोनों एक दूसरे को उकसा रहे हैं, कि किसी तरह दूसरा टेम्पटेशन में आ जाये, उत्तेजित हो जाये और हमला कर दे। बस, मामला खतम हो गया। जो बच गया हमला करने से, वह जीत गया।’
कन्फ्यूसियस ने इसकी आधारशिला रखी थी, कि क्रोध करने का अर्थ है आदमी हार ही चुका। अब उसे और हराने की जरूरत नहीं है। असल में हारा हुआ आदमी ही क्रोध करता है।
तुम जितने गहरे हो उतना ही क्रोध मुश्किल है। और तुम जितने गहरे हो उतनी ही हार असंभव है। गहराई विजय है, उथलाई हार है।
ओशो 🌸, दीया तले अंधेरा, ( झेन कथा)
