Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

बिल्कुल। यहाँ वह पूरी और अद्भुत कहानी है जिसकी झलक आपने देखी:

यह कहानी है एडिथ (एवा) और लीया ग्रॉस नाम की एक हंगेरियन माँ और उसकी पाँच साल की बेटी की, और उन्हें बचाने वाले अमेरिकी सैनिकों की।

पृष्ठभूमि: अँधेरा छा रहा था

एडिथ और उसकी छोटी बेटी लीया हंगरी के एक यहूदी परिवार से ताल्लुक रखती थीं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, जब नाज़ी जर्मनी ने हंगरी पर कब्ज़ा किया, तो उन्हें भी हज़ारों अन्य यहूदियों के साथ घर से निकालकर ऑशविट्ज़-बिरकेनौ एकाग्र शिविर (Concentration Camp) भेज दिया गया। किसी तरह, वे दोनों ऑशविट्ज़ में हुई भीषण तबाही से बच गईं। हालाँकि, उनका संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ था।

वह भयानक ट्रेन यात्रा

अप्रैल 1945 में, जब मित्र देशों की सेनाएँ तेज़ी से आगे बढ़ रही थीं, नाज़ियों ने ऑशविट्ज़ और अन्य शिविरों के कैदियों को खदेड़कर (“डेथ मार्च”) दूसरे शिविरों में ले जाना शुरू कर दिया, ताकि उन्हें मुक्ति सेना के हाथ न लगने दिया जाए। एडिथ और लीया को भी एक बंद मालगाड़ी में ठूसकर एक अन्य शिविर की तरफ ले जाया जा रहा था। इस ट्रेन में लगभग 2500 कैदी थे।

यह यात्रा नरक से कम नहीं थी:

· कई दिनों तक वे उस दम घोंटू, बदबूदार और ठंडे डिब्बे में फँसी रहीं।
· न खाना था, न पानी, न शौचालय की कोई व्यवस्था।
· लोग भूख-प्यास, बीमारी और हताशा से मर रहे थे।
· एडिथ ने लीया को जिंदा रखने के लिए अपनी राशि का अधिकांश हिस्सा उसे दिया। वे दोनों डर, भूख और थकान से एक-दूसरे से चिपकी हुई थीं। हर पल यही लगता था कि शायद अब वे ज़िंदा नहीं बचेंगी।

मुक्ति का वह चमत्कारिक दिन

13 अप्रैल, 1945 का दिन था। जर्मनी के फ़ारलाउ (Farsleben) गाँव के पास वह ट्रेन रुक गई। नाज़ी गार्ड्स डरकर भाग गए। तभी, अमेरिकी सेना की 30वीं इन्फैंट्री डिवीजन की एक टोली, जिसे “ओल्ड हिकोरी” (Old Hickory) के नाम से जाना जाता था, वहाँ पहुँची। ये सैनिक आगे बढ़ रहे थे और उन्हें अचानक ही यह ट्रेन मिल गई।

जब उन्होंने ट्रेन के भारी दरवाजे खोले, तो एक दर्दनाक और हृदयविदारक दृश्य उनके सामने था। डिब्बों से मौत और बीमारी की बदबू आ रही थी। कंकाल सदृश्य लोग, जो अंधेरे में कई दिनों से जी रहे थे, अचानक रोशनी से चौंधिया गए। उनकी आँखों में डर और उम्मीद की एक झलक थी।

सैनिक हैरान और द्रवित हो गए। वे पानी, खाना और मदद लेकर आए। उन्होंने धीरे-धीरे कैदियों को बाहर निकालना शुरू किया। लीया इतनी कमज़ोर हो चुकी थी कि खड़े भी नहीं हो सकती थी। तभी एक अमेरिकी सैनिक, सार्जेंट कैरल वॉ (Sgt. Carrol Walsh), आगे बढ़े और उन्होंने नाज़ुक सी लीया को अपनी मजबूत बाँहों में उठा लिया। यह एक छोटा सा, लेकिन बहुत बड़ा मानवीय कार्य था। एडिथ डगमगाती हुई बाहर आई, उसकी आँखों में आँसू थे और होंठों पर ऐसी कृतज्ञता थी जो बिना किसी भाषा के भी समझी जा सकती थी।

गाँव बना स्वर्ग

अगले कुछ दिनों में, पास का गाँव फ़ारलाउ ही एक विशाल अस्थायी अस्पताल बन गया। अमेरिकी सैनिकों ने स्थानीय जर्मन नागरिकों की मदद से (कुछ ने मदद करने से इनकार भी किया, लेकिन कुछ ने की) बीमारों की देखभाल की, भूखों को खाना खिलाया और उन लोगों को इंसानियत और उम्मीद लौटाई, जिनकी ज़िंदगी क्रूरता की अँधेरी कैद में खो गई थी। उस दिन कैदियों को सिर्फ़ आज़ादी ही नहीं, बल्कि एक शांत चमत्कार मिला था।

मिलन की अद्भुत कहानी

यहाँ कहानी खत्म नहीं होती। दशकों बाद, लीया (अब लीया वेबर) ने अपने जीवन का उद्देश्य उन सैनिकों को ढूँढना और धन्यवाद देना बना लिया, जिन्होंने उसे और उसकी माँ को बचाया था।

उसने लंबी खोजबीन की और आखिरकार सार्जेंट कैरल वॉ और उस दिन मौजूद दूसरे सैनिक, लो टैनर (Lt. Frank W. Towers) को ढूँढ निकाला। 2000 के दशक में उनकी मुलाकात हुई। यह मिलन अविश्वसनीय रूप से भावुक कर देने वाला था। लीया ने कैरल वॉ से कहा, “आपने मुझे अपनी बाहों में उठाया था। आप मेरे हीरो हैं।” इस मित्रता ने दोनों परिवारों को जीवनभर के लिए जोड़ दिया।

निष्कर्ष

यह कहानी साबित करती है कि:

· वीरता हमेशा युद्ध जीतने में नहीं, बल्कि दया दिखाने में होती है।
· मानवता सबसे बड़ा धर्म है।
· एक छोटी सी दया की घटना किसी के जीवन पर ऐसी अमिट छाप छोड़ सकती है, जो पीढ़ियों तक याद रखी जाए।

एडिथ और लीया ग्रॉस, और उन्हें बचाने वाले सैनिकों की यह कहानी इतिहास के सबसे अंधेरे दौर में उम्मीद और मानवता की जीत का एक चमकदार उदाहरण बन गई है।

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