Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ફિલ્મ ‘બોર્ડર’માં અક્ષય ખન્નાએ જે યુવાન અને જોશીલા ઓફિસરનું પાત્ર ભજવ્યું હતું, તે વાસ્તવિક જીવનમાં સેકન્ડ લેફ્ટનન્ટ ધરમવીર ભાન (Second Lieutenant Dharam Veer Bhan) હતા.

ફિલ્મ અને તેમના વાસ્તવિક જીવન વચ્ચે આકાશ-પાતાળનો તફાવત છે. તેમના વિશેની સાચી હકીકતો નીચે મુજબ છે:

૧. લોંગેવાલાનું યુદ્ધ અને તેમની ભૂમિકા
* ઉંમર અને રેન્ક: ૧૯૭૧માં જ્યારે યુદ્ધ થયું ત્યારે તેઓ ૨૩ પંજાબ રેજિમેન્ટમાં નવા જ જોડાયેલા યુવાન ‘સેકન્ડ લેફ્ટનન્ટ’ હતા.
* પ્રથમ જાણકારી: ૪ ડિસેમ્બરની રાત્રે જ્યારે પાકિસ્તાની સેના બોર્ડર પાર કરીને આવી રહી હતી, ત્યારે બોર્ડર પિલર નં. ૬૩૮ પાસે પેટ્રોલીંગ કરતી વખતે સૌથી પહેલા પાકિસ્તાની ટેન્કોનો અવાજ ધરમવીર ભાને જ સાંભળ્યો હતો.
* તેમણે તરત જ મેજર કુલદીપ સિંહ ચાંદપુરીને રેડિયો પર આ મહત્વના સમાચાર આપ્યા હતા, જેના કારણે ભારતીય સેના તૈયાર થઈ શકી.

૨. શું તેઓ શહીદ થયા હતા? (ફિલ્મ vs હકીકત)
આ સૌથી ચોંકાવનારી વાત છે:
* ફિલ્મમાં: અક્ષય ખન્નાને બંકરમાં આગ લાગવાથી અને ગોળીઓ વાગવાથી કરુણ રીતે શહીદ થતા બતાવ્યા છે. આ દ્રશ્ય જોઈને આખું થિયેટર રડી પડ્યું હતું.
* હકીકતમાં: અસલી ધરમવીર ભાન તે રાત્રે બહાદુરીથી લડ્યા હતા, દુશ્મનોનો સામનો કર્યો હતો અને યુદ્ધ પૂરું થયા પછી તેઓ એકદમ સુરક્ષિત (જીવિત) હતા. તેમને યુદ્ધમાં એક પણ ગોળી વાગી નહોતી.

૩. યુદ્ધ પછીનું જીવન
* યુદ્ધ બાદ તેઓ ભારતીય સેનામાં ચાલુ રહ્યા હતા.
* તેઓ સેનામાં પ્રમોશન મેળવીને કર્નલ (Colonel) ના ઉચ્ચ હોદ્દા સુધી પહોંચ્યા હતા.
* ૧૯૯૨માં તેઓ સન્માનપૂર્વક સેનામાંથી નિવૃત્ત થયા હતા.

૪. ફિલ્મ પર તેમનું રિએક્શન
જ્યારે બોર્ડર ફિલ્મ રિલીઝ થઈ અને તેમાં તેમને મરતા બતાવ્યા, ત્યારે તેમના સગા-સંબંધીઓ ગભરાઈ ગયા હતા. એક ઇન્ટરવ્યુમાં કર્નલ ધરમવીર ભાને હસીને કહ્યું હતું કે:
> “ફિલ્મ જોયા પછી ઘણા લોકોએ મને શ્રદ્ધાંજલિ આપવાનું શરૂ કરી દીધું હતું! મારે લોકોને કહેવું પડ્યું હતું કે હું જીવતો છું.”
>
જે.પી. દત્તા (ડિરેક્ટર) એ ફિલ્મમાં ડ્રામા અને ઇમોશન ઉમેરવા માટે તેમના પાત્રને શહીદ થતું બતાવ્યું હતું.

૫. અત્યારે ક્યાં છે?
નિવૃત્તિ પછી તેઓ ગુડગાંવ (હરિયાણા) માં સ્થાયી થયા હતા અને શાંતિપૂર્ણ નિવૃત્ત જીવન ગાળી રહ્યા છે (જોકે તેઓ હવે ખૂબ વૃદ્ધ છે).

ટૂંકમાં, અક્ષય ખન્નાનું પાત્ર એકદમ સાચું હતું, પણ તેમનું મૃત્યુ એ માત્ર ‘ફિલ્મી કહાની’ હતી. અસલી હીરો વિજયી બનીને પાછા ફર્યા હતા.
#Fb #army #longewala #bsf #post

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

साल 1657 में शिवाजी महाराज ने अफजल खान को मारा था। इसके ठीक 100 साल बाद 1758 में पेशवा रघुनाथ राव ने पेशवा नानासाहब को चिट्ठी लिखी थी…. “हमने लाहौर, मुल्तान, कश्मीर, और दूसरे सूबों को अटक की तरफ मिला लिया है. हमारे साम्राज्य में. जो नहीं आ पाए हैं, वो जल्द ही हमारी मातहती में होंगे. अहमद खान अब्दाली का बेटा तैमूर सुलतान और जहां खान हमारी सेनाओं द्वारा खदेड़े और लूटे जा चुके हैं. दोनों ही कुछ टूटे-फूटे दल-बल के साथ पेशावर पहुंचे हैं. हमने कांधार पर अपना राज घोषित करने का निर्णय ले लिया है”

100 साल के संघर्ष में #अटक_से_कटक तक भगवा फहरा दिया गया था। कंधार के लिये लड़़ने की तैयारी चल रही थी।

लेकिन फिर आई 1761 की #मकर_संक्रांति…

जहां एक तरफ देश की सारी सेक्युलर ताकतें थीं, तो

दूसरी तरफ मराठे, जिनका अहंकार ठिकाने लगाने के लिए बाकी का सारा देश दिल थाम कर प्रतीक्षा कर रहा था।

पहले दोनों सेनाओं की तोपें आपस में लड़ीं, फिर बंदूकें चलीं, फिर तलवार और भाले निकले, फिर खंजर, चाकू और तीर चले, फिर पत्थर और ईंटें चलीं और अंत में मुक्के और घूसे बजे…

(पानीपत के युद्ध के बाद अब्दाली द्वारा पेशवा नाना साहब को लिखे गए पत्र से जिसमें वो अब्दाली कुल मिलाकर ये कह रहा है कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैं वापस जा रहा हूं)

और कोई देश होता तो शायद त्योहार मनाना अगर बंद नहीं भी करता तो कम से कम हर साल मकर संक्रांति पर 10 मिनट का शोक जरूर मनाता। शोक भी नहीं मनाता तो कम से कम स्मरण तो करता ही कि कैसे साल 1761 की मकर संक्रांति में पानीपत के मैदान में युद्ध के बाद 7 घंटे तक निहत्थे हारे हुए हिन्दुओं को नरसंहार चला था।

मगर हमारे सामने ये सब छोटी बातें हैं। हमें इनसे कोई फर्क नहीं पड़ता। इतिहास के लगभग हर दशक में हमारा कोई ना कोई नरसंहार लिखा हुआ है, हमारी खोपड़ियों की पिरामिड बने हुए हैं। धर्म के आधार पर हिंसा करके हमारी मातृभूमि का विभाजन हो चुका है लेकिन हमें इस बात की ज्यादा चिंता रहती है कि हिटलर ने यहुदी कैसे मारे थे। वो यहूदी जिन्होंने इज़रायल बनने के बाद ढूंढ-ढूंढकर नाजी अफसर मारे, जिन्होंने अपने मरे हुए लोगों की याद में पूरी दुनिया में स्मारक बनाए और पूरी दुनिया को उनके साथ हुई ज्यादतियां बताईं।

हमारे रक्त रंजित इतिहास का एक भी स्मारक नहीं है, हमें जरूरत भी नहीं है क्योंकि हमें पता भी नहीं और हमें जानना भी नहीं है।

पानीपत में युद्ध के बाद जो घंटों मारकाट मची हम उसे ऐसे भूले हैं जैसे वो कभी हुआ ही नहीं, हम अपने ही देश का इतिहास ऐसे पढ़ते हैं जैसे ये किसी और दुनिया की बात हो रही है….

सोमनाथ मंदिर के साथ सोमनाथ मैमोरियल भी होना चाहिए ताकि लोगों को पता चले की गजनी से लेकर औरंगजेब तक ने सोमनाथ के साथ क्या-क्या किया।

रामजन्मभूमि मंदिर, काशी विश्वनाथ और कृष्णजन्मभूमि सबके साथ में उनका इतिहास भी दिखाना चाहिए

लेकिन 1761 के बाद फिर पश्चिम से भारत में कोई गजनी से लेकर अब्दाली तक हमला करने की हिम्मत नहीं कर पाया।

इसके बाद 1920 में अफगानिस्तान के सुल्तान को गांधी जी ने भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया लेकिन वो योजना विफल रही और 1947 में मेज पर पूरा पश्चिमी भारत जिहादियों के सामने हम हार गये।

जो हमने 1761 के कथित हार के बाद नहीं खोया

वो हमने 1947 की आजादी में खो दिया

लेकिन कहानी यहां भी खत्म नहीं हुई।

1925 में शुरू हुआ संघ अपनी पहली शताब्दी से पहले ही आज देश की नीति तय करने वाल संगठन बन चुका है। एक स्वयंसेवक देश का प्रधानमंत्री है।

अगर संकल्प करके कोई चले तो 100 साल में पूरे देश का राजनीतिक मानचित्र बदल सकता है। हमने ये काम दो बार करके दिखाया है।

लेकिन मकर संक्रांति का दिन ये सीख देता है कि भविष्य के पानीपत के लिये तैयार रहना है ताकि फिर संघर्ष को शुरू से शुरू न करना पड़े।

क्योंकि अब ये देश और 100 साल इंतजार नहीं कर सकता।

शत शत नमन…

हर हर महादेव

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तो जब भी राजस्थान टूरिज़्म की बात आती है, सबसे पहला कौन सा गीत या संगीत आपको याद आता है? मुझे मालूम है 90 फ़ीसदी लोग कहेंगे, केसरिया बालमा…पधारो म्हारे देस..! लेकिन, क्या आपको पता है कि ये लोकगीत मशहूर लोकगायिका अल्लाह जिलाई बाई ने पहली बार किसके लिए गाया था?

ये जानने से पहले, चलिए अल्लाह जिलाई बाई को जान लेते हैं। उनको राजस्थान की माड कोकिला कहते हैं। आज ही के दिन कोई सवा सौ साल पहले जन्मी अल्लाह जिलाई बाई को संगीत विरासत में मिला। उनसे पहली पीढ़ी की महिलाएं अपने समय की जानकार लोकगायिकाएं थी। सुर, ताल और संगीत, उनकी ज़ुबान पर भी बचपन से ही चढ़ गए।

जिस उम्र में बच्चे अ, आ, इ, ई सीखकर शब्द और वाक्य बनाना सीख रहे होते हैं, उस उम्र में अल्लाह जिलाई बाई ने संगीत की विधिवत् शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी। उनके पहले संगीत गुरु उस्ताद हुसैन बख्श ख़ान रहे। बाद में बताते हैं कि उन्होंने अच्छन महाराज से भी शिक्षा हासिल कर ली थी।

मात्र 10 साल की थीं, अल्लाह जिलाई बाई जब उन्होंने पहली बार बीकानेर के महाराज गंगा सिंह के दरबार में साल 1912 में अपनी पहली प्रस्तुति दी। और, महाराज ये जानकर भौचक्के रह गए कि 10 साल की ये छोरी खयाल, ठुमरी, दादरा में भी उतनी ही सिद्ध थी, जितनी कि अपनी पुश्तैनी माड गायकी में।

आगे बढ़ने से पहले ये भी स्पष्ट करते चलते हैं कि मांड सही शब्द है या माड? मैंने जब दूरदर्शन के लिए लोकगायकों का पहला रियलिटी शो ‘फोकस्टार्स माटी के लाल’ क्रिएट किया, तब मैंने भारत के लोकगायन पर वृहद शोध किया। तब पता चला कि माड गायकी को कैसे जानबूझकर हाशिये पर जाने दिए गया, इसे कभी लिपिबद्ध भी नहीं होने दिया गया। ये संपूर्ण राग है।

माड संस्कृत का शब्द है। और, कालांतर में ये अपभ्रंश होकर मांड लोकगीत हो गया। सामेरी माड, शुद्ध माड, सूभ माड, आशा माड, प्रमुख चार प्रकार हैं माड राग के। मूल रूप में ये लोकगायन शैली नहीं है, ये आरोह अवरोह से संपूर्ण राग है और इसे बिलावल थाट व खमाज थाट में गाया जाता है।

अब लौटते हैं, अल्लाह जिलाई बाई की बीकानेर के महाराज गंगा सिंह के दरबार में पहली प्रस्तुति की तरफ। महाराज का दिल खुश हो गया। और, ये उन दिनों की बात है जब राजे-महाराजे किसी फ़नकार पर ख़ुश हो जाए तो उसकी ज़िंदगी संवर जाती थी। बीकानेर महाराज ने ऐलान किया कि अब से उनके दरबार में कोई महिला अगर एकल गायन प्रस्तुत करेगी तो वह होंगी सिर्फ़, अल्लाह जिलाई बाई!

वो चापलूसों का दौर नहीं था। वो कलाकारों की कला को पहचानने वालों का दौर था। अल्लाह जिलाई बाई ने एक दिन दरबार में अपने महाराज के लिए गाया…

गुण ग्राहक नृप गंग सो,
और दूजे नहीं है कोय
जस छायो है जगत में,
घर-घर आनंद होय
हूं तो राज रे
चरणा री दासी
म्हारा राज
गढ़ बीकाणे रा माराजा,
आवो नी…
पधारो म्हारे देश।

महाराज को अपनी ड्यौढ़ी नांघने का न्यौता देती अल्लाह जिलाई बाई ने अपना संगीत महाराज पर न्यौछावर किया और महाराज ने उनकी गायकी को इतना बुलंद कर दिया कि उनके समय के तमाम लोक गायक और गायिकाएं अल्लाह जिलाई बाई से रश्क करने लगे।

नाम मिला, माड कोकिला का और इस माड कोकिला की शोहरत देश में ही नहीं, दुनिया  फैलने लगी। 1 फरवरी 1902 को नबी बख़्श के घर पहली बार चहकी इस कोयल को राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने 1982 में पद्मश्री से सम्मानित किया। ये पुरस्कार प्राप्त करने वाली वह राजस्थान की पहली लोकगायिका बनीं।

संगीत नाटक अकादमी को भी उनके गायन में एक अलग रंग, एक अलग ढंग दिखा तो संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी अल्लाह जिलाई बाई को मिला। इन दो अहम पुरस्कारो के अलावा उन्हें ढेरों अन्य पुरस्कार भी प्राप्त हुए। भारत सरकार ने उनके सम्मान में उनके निधन के कई बरसों बाद एक डाक टिकट भी जारी किया।

कम लोगों को ही पता होगा कि जब ब्रिटिश वाइसरॉय बीकानेर पहुंचे तो महाराजा बीकानेर ने अल्लाह जिलाई बाई को ही उनके स्वागत में राजस्थान के रंग पेश करने के लिए चुना था।

और, अरसे बाद जब दुनिया के 20 देशों के लोकगायकों को लंदन के रॉयल अलबर्ट हॉल में प्रस्तुति के लिए चुना गया तो वहां बिना माइक के गाने वाली पहली महिला गायिका बनीं, अल्लाह जिलाई बाई। और, उनकी आवाज़ इतनी बुलंद के पूरे हॉल में बैठे हर श्रोता ने गायन संपन्न होने पर खड़े होकर तालियों से उनका अभिवादन किया।

#AllahJilaiBai #Bikaner #MaharajaGangaSingh  #KesariaBalam #BioscopeWithPankajShukla

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फोटो – एआई से निर्मित

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एक बार श्री महादेव जी पार्वती जी के साथ भ्रमण करते हुए मृत्यु लोक में अमरावती नगर में आए, वहां के राजा ने एक शिव जी का मंदिर बनवाया था।

शंकर जी पार्वती जी के साथ वहीं ठहर गए, एक दिन पार्वती जी शिवजी से बोली “नाथ आइए आज चौसर खेलें“, खेल प्रारंभ हुआ उसी समय पुजारी पूजा करने को आए, पार्वती जी ने पूछा “पुजारी जी बताइए जीत किसकी होगी।”

पुजारी जी ने बिना सोचे-समझे कहा कि भगवान भोलेनाथ ही जीतेंगे। किन्तु अंत में जीत पार्वती जी की हुई, पार्वती जी ने मिथ्या भाषण के कारण पुजारी जी को कोढ़ी होने का श्राप दे दिया। पुजारी जी कोढ़ी हो गए। कुछ दिन बाद देवलोक की अप्सराएं पूजन के लिए आयी और पुजारी जी को देखकर उनके कोढ़ी होने का कारण पूछा, पुजारी जी ने सब बातें बतला दी।

अप्सराएं बोली पुजारी जी आप सोलह सोमवार का व्रत करो महादेव जी आपका कष्ट दूर करेंगे। पुजारी जी ने उत्सुकता से व्रत की विधि पूछी, अप्सराओं ने पुजारी को सोलह सोमवार व्रत की विधि बताते हुए कहा कि:

“सोमवार के दिन सूर्योदय से पहले उठना, फिर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर लेना। इसके उपरांत आधा सेर गेहूं के आटे का चूरमा बनाकर उसके तीन भाग कर लेना। फिर भगवान शिव की प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक जलाकर गुड़, नैवेद्य, फूल, बेलपत्र, चंदन, अक्षत, जनेऊ का जोड़ा लेकर विधि विधान प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करना। पूजा के बाद गेहूं के आटे से बनाए गए चूरमे के तीन भाग में से एक भाग भगवान शिव को अर्पित करना और एक आप ग्रहण करना। बाकी भाग को भगवान का प्रसाद मानकर सभी में बांट देना। इस विधि से सोलह सोमवार व्रत कर सतरहवें सोमवार को पांच सेर गेहूं की बाटी का चूरमा बनाकर भोग लगाकर बाटदें, फिर सर्वकुटुम्ब प्रसाद ग्रहण करें, ऐसा करने से शिवजी आपके सारे कष्ट दूर करेंगे।”

यह कहकर अप्सराएं स्वर्गलोक को चली गईं। पुजारी जी यथा विधि व्रत कर रोग मुक्त हुए और पूजन करने लगे। कुछ दिन बाद शिव- पार्वती जी पुनः आए। पुजारी जी को कुशल देखकर पार्वती जी ने उनके रोगमुक्त होने का कारण पूछा। पुजारी जी के कथन अनुसार पार्वती जी ने व्रत किया फलस्वरूप कार्तिकेय जी पार्वती माता के आज्ञाकारी हुए, कार्तिकेय जी ने भी माता पार्वती से पूछा कि क्या कारण है जिससे मेरा मन आपके चरणों में लगा, पार्वती जी ने वही व्रत बतलाया, कार्तिकेय जी ने भी व्रत किया, फलस्वरूप उनका बिछड़ा हुआ मित्र मिला, उसने भी कारण पूछा और बताने पर विवाह की इच्छा से यथा विधि व्रत किया।

वह विदेश गया वहां राजा की कन्या का स्वयंवर हो रहा था। राजा का प्रण था कि हथिनी जिसको माला पहनाएगी उसी के साथ पुत्री का विवाह होगा। वह ब्राह्मण भी स्वयंवर को देखने की इच्छा से एक और जा बैठा हथिनी ने माला इसी ब्राह्मण कुमार को पहना दी, धूमधाम से विवाह हुआ। तत्पश्चात दोनों सुख से रहने लगे, एक दिन राजकन्या ने पूछा कि आपने कौन सा पुण्य किया जिससे राजकुमारों को छोड़ हथिनी ने आपको चुना। ब्राह्मण ने सोलह सोमवार का व्रत सह विधि बताया। राजकन्या ने पुत्र प्राप्ति के लिए व्रत किया और सर्वगुण संपन्न पुत्र प्राप्त किया।

बड़े होने पर पुत्र ने पूछा “माताजी किस पुण्य से आपको मेरी प्राप्ति हुई” राजकन्या ने सब विधि सोलह सोमवार का व्रत बताया, पुत्र राज्य की कामना से व्रत करने लगा। उसी समय दूसरे राज्य के राजा के दूतों ने आकर उसे अपनी राजकुमारी के लिए चुना। आनंद से विवाह संपन्न हुआ, राजा के दिवंगत होने पर ब्राह्मण कुमार को राजगद्दी मिली। वह इस व्रत को करता रहा। एक दिन अपनी पत्नी को पूजा सामग्री शिवालय में ले जाने को कहा परंतु उसने दासियों द्वारा भिजवा दी। जब राजा ने पूजन समाप्त किया तो आकाशवाणी हुई “इस पत्नी को निकाल दे नहीं तो तेरा सत्यानाश कर देगी” प्रभु की आज्ञा मान उसने रानी को निकाल दिया।

रानी भाग्य को कोसते हुए नगर में एक बुढ़िया के पास आयी, उसका हाल देखकर बुढ़िया ने उसके सिर पर सूत की पोटली रख बाजार भेजा। रास्ते में आंधी आई पोटली उड़ गई, बुढ़िया ने उसे फटकार कर भगा दिया। वहां से तेली के यहां पहुंची तो सब बर्तन चटक गए, तेली ने भी निकाल दिया। पानी पीने नदी पहुंची तो नदी सूख गई। सरोवर पहुंची तो हाथ का स्पर्श होते ही जल में कीड़े पड़ गए। उसी जल को पीकर आराम करने के लिए जिस पेड़ के नीचे जाती वह सूख जाता।

वन और सरोवर की यह दशा देखकर ग्वाल उसे मंदिर के गोसाई के पास लेकर गए, उसे देखकर गोसाई जी समझ गए कि यह कुलीन अबला विपत्ति की मारी हुई है। धैर्य बंधाते हुए बोले “बेटी तू मेरे यहां रह किसी बात की चिंता मत कर”, रानी आश्रम में रहने लगी परंतु जिस वस्तु पर इसका हाथ लगे उसी में कीड़े पड़ जाए, दुखी हो गुसाई जी ने पूछा बेटी किस देव के अपराध से तेरी यह दशा हुई। पुजारी की बात सुनकर रानी ने सारी घटना बता दी।। गोसाई जी बोले “बेटी तुम सोलह सोमवार व्रत करो”, रानी ने सविधि व्रत पूरा किया। व्रत के प्रभाव से राजा को रानी की याद आई और दूतो को उसकी खोज करने भेजा।

आश्रम में रानी को देखकर दूतों ने राजा को रानी का पता बताया राजा ने जाकर गोसाई जी से कहा महाराज यह मेरी पत्नी है, शिवजी के रुष्ट होने से मैंने इस का परित्याग किया था। शिव जी की कृपा से मैं इसे लेने आया हूं कृपया इसे जाने की आज्ञा दें, गोसाई जी ने आज्ञा दे दी। राजा रानी नगर में आए, नगर वासियों ने नगर सजाया, बाजे बजने लगे, मंगलाचार हुआ।

तत्पश्चात शिव जी की कृपा से प्रतिवर्ष सोलह सोमवार का व्रत कर वह रानी के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। इसी प्रकार जो मनुष्य भक्ति सहित और विधि पूर्वक सोलह सोमवार व्रत को करता है और कथा सुनता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और अंत में वह शिवलोक को प्राप्त होता है।

Posted in हिन्दू पतन

आज से फिर 20 साल पीछे चलते हैं 2005, और आज बात योगी आदित्यनाथ और मुख्तार की नही होगी ,,आज बात होगी , पूर्वांचल के एक कद्दावर नेता स्वर्गीय श्री कृष्णानंद राय की और गोरखनाथ के उस महंत की जिसे आज कल लोग अजय सिंह विष्ट साबित करने पर तुले हुए हैं 👇

अब भले ही समूचे यूपी में कानून का बोलबाला है, लेकिन एक वक्त था, जब केवल माफियाओं की तूती बोलती थी. आलम यह था कि कोई भी पुलिस अधिकारी किसी भी जगह पर लंबे समय तक टिक नहीं पाता था और जब बात पूर्वांचल की हो तो माफियाओं की फेहरिस्त लंबी है, जिसमें सबसे अधिक चर्चा रही मुख्तार अंसारी की, जो अब इस दुनिया में नहीं है. पूर्वांचल में अगर सबसे अधिक गैंगवार हुई तो वो केवल वर्चस्व के लिए. ऐसी ही एक वर्चस्व की लड़ाई यूपी के गाजीपुर जिले में हुई थी, जिसमें भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन विधायक कृष्णानंद राय की हत्या हो गई थी. कृष्णानंद राय की हत्या ने पूरे उत्तर प्रदेश को हिलाकर रख दिया था. क्योंकि इस हत्याकांड में 100-200 नहीं बल्कि 500 राउंड से अधिक फायरिंग हुई थी. इस हत्याकांड को चोटी कांड भी कहा जाता है.

मुख्तार अंसारी के घर को फाटक बोलते हैं. फाटक में ये सब मुन्ना बजरंगी, अताउर रहमान, जीवा, मुन्ना बजरंगी, गोरा राय, अंगद राय और हनुमान पांडे, जितना गैंग था, सब इकट्ठा हो गया था. ये सब मुख्तार के यहां हथियार लेकर पहुंच गए.

मुख्तार तो बैठा था जेल में और ये हुआ कि भाई कैसे मारा जाए कृष्णानंद राय को, तो डीआईजी साहब को बताया गया. डीआईजी साहब भी हाथ खड़ा कर दिए. फिर डीजी साहब को बताया गया. एक आईजी रैंक का अफसर को कहा गया कि जा कर के ऊपर बता दीजिए. उन्होंने उन्हीं के परिवार के बड़े नेता, उनको बता दिया. वो अफसर कहता है कि उन्होंने एक कान से सुना और दूसरे कान से निकाल दिया. दिन था 28 नवंबर का साल 2005, कृष्णानंद राय जाते हैं, क्रिकेट मैच का उद्घाटन करने. आते हैं तो रास्ते में 500 गोलियां चलती हैं, एके-47 और अन्य बंदूकों से.’
कृष्णानंद राय को 67 गोली लगी,. 6-7 लोग मारे गए और साहब वो घटना होती है. मुख्तार अंसारी इतना खुश हुआ. उसने फैजाबाद जेल में बंद अपने जो भी विधायक रहा है, उसको फोन करता है, वो सर्विलांस पर था. भोजपुरी में मुख्तार बोलता है कि अरे मुन्नवा ने मार दिया. ओकर चोटईया काट लिया. वो चुटिया रखते थे. तब मुन्ना बजरंगी ने उनकी चोटी काट ली और वो चीज एसटीएफ के उसमें रिकॉर्ड हो गया और वही एक चीज थी, जिसमें मुख्तार अंसारी को कभी जमानत नहीं मिली. और दुखद ये रहा कि दिनदहाड़े गोली चलती है, उसमें कई गवाह सड़क पर मरा मिला. कोई सांसद प्रतिनिधियों के घर में मरे मिले और ये हाल रहा कि कृष्णानंद राय तक के भतीजों ने गवाही नहीं दी.’

और इस कांड में शामिल सभी मुख्तार अंसारी के शूटर जीवा जिसे लखनऊ में पेशी के दौरान ऊपर भेज दिया गया, राकेश पाण्डेय उर्फ हनुमान पाण्डेय जिसका इनकाउंटर हो गया, रहमान जिसे 72 हूरों के पास पंहुचा दिया गया,मुन्ना बजरंगी जिसे जेल में ही टपका दिया गया और मुख्तार जिसे वहां भेजा गया जहां से कोई वापस नही आता,,
एक बात और उस समय पूर्वांचल में बहुत बड़े बड़े ब्राह्मण , ठाकुर और अन्य जातियों के बाहुबली थे लेकिन कोई नही आया,, 👇
उस समय सिर्फ योगी आदित्यनाथ, उर्फ गोरखनाथ के महंत उर्फ आप के द्वारा घोषित किए गए जातिवादी अजय सिंह विष्ट ही आए थे….

Posted in હાસ્ય કવિતા

–      *-ફિલ્મી ફજેતો-*
હિંદી ફિલ્મોમાં હીરો-હીરોઈનનાં સાહસો હોય અજબ,
નવાઈ પામી તમે બોલી ઊઠો કે ભાઈ, આ તો ગજબ!

હિંદી હીરો દસને પછાડે, હીરોઇન પણ નહી કમ,
“ટ,વિસ્ટ” જાણે, “ફાઇટિ’ગ” આવડે, રહે સદા અણનમ !

હિંદી હીરો બત્રીસલક્ષણો, હનુમાનછાપ મારે છલાંગ,
ભજનો પણ ગાય ને  ગાય વળી પ્રેમનાં ગીતો ઉટપટાંગ !

હાથમાં ઘોડાની લગામ પકડે, પકડી જાણે પણ તલવાર.
વાયોલિન—મૅન્ડોલિન પણ વગાડે, વગાડે વળી તંબુરો કરતાર !

જયૂડો, કરાટે કુસ્તીના એને સઘળા આવડે જો દાવ,
આવા હીરો  કે  કે કન્યાનાં દિલ પર લગાવે ધાવ !

ખૂનખાર લડાઈ લડે તો પણ એને લેશમાત્ર ઇજા ન થાય.
પીપમાં ગબડે કે ઉપરથી ખટારો પસાર થઇ જાય !

દરિયાનું તોફાન હોય કે પૂર-આગ–અકસ્માત હોય,
છેલ્લી ઘડીએ “ચમત્કાર” થાય કે “ગેબી મદદ” મળે કોઇ !

હિંદી કૉમોડિયન પણ શૂરવીર, “ઢીશમ–ઢીશમ” કરતો જાય,
કોમિક કરતાંકરતાં લડે ને રોતો-હસતો ગીત-સંગીત ગાય !

“સ્વપ્નસુંદરી” જેવી હીરૉઇન પર ઘણાં દિલ ન્યોચ્છાવર થાય,
ઓળઘોળ થઇ જાય તેની ઉપર, સ્વપ્નાં તેનાં જ દેખાય !

હિંદી ફિલ્મનો “ધી એન્ડ” આવતાં સૌ સારાં વાનાં થાય,
ને કંટાળેલ પ્રેક્ષક બહાર નીકળી એસ્પ્રોની ટીકડી ખાય !

કહો “વ્યાસજી”, તો જ ફિલ્મ જોવાની આવે તમને લ્હેર !
હિંદી ફિલ્મોને માણવા મૂકીને આવવું મગજને ઘેર,

(ભાવનગર) —વી. જે. વ્યાસ (રંગતરંગ  મે —1979)

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

कुरुक्षेत्र का वो ‘अंतिम सच’ जिसने दुर्योधन को अंदर से तोड़ दिया!

कल्पना कीजिए उस मंज़र को…

18 दिनों के भीषण रक्तपात के बाद कुरुक्षेत्र का मैदान अब युद्धभूमि नहीं, शमशान बन चुका था। जहाँ कल तक शंखनाद और तलवारों की खनखनाहट थी, आज वहां केवल मृत्यु का सन्नाटा गूंज रहा था।
टूटे हुए रथ, हाथियों के शव और रक्त से सनी मिट्टी के बीच, कुरु वंश का अभिमानी युवराज दुर्योधन अपनी टूटी जंघाओं के साथ पड़ा था।

उसकी सांसें उखड़ रही थीं, लेकिन आँखों में पराजय की आग और ह्रदय में ‘छल’ का आक्रोश अब भी धधक रहा था।
तभी वहां श्री कृष्ण का आगमन हुआ।

दुर्योधन ने कृष्ण को देखते ही अपना सारा विष उगल दिया— “तुमने छल से मुझे हराया है कृष्ण! यदि धर्म युद्ध होता, तो पांडव कभी नहीं जीतते!”

त्रिलोकीनाथ कृष्ण मंद-मंद मुस्कुराए। उनकी मुस्कान में व्यंग्य नहीं, करुणा और सत्य था। उन्होंने कहा:

“दुर्योधन! तुम पांडवों के ‘छल’ को देख रहे हो, लेकिन अपने ‘चयन’ की भूल को नहीं। तुम्हारी हार भीम की गदा से नहीं, तुम्हारे एक गलत निर्णय से हुई है।”

वो एक निर्णय, जो इतिहास बदल सकता था

कृष्ण ने उस राज से पर्दा उठाया, जिसने मरते हुए दुर्योधन की रूह को कंपा दिया।

कृष्ण बोले: “तुम्हारी सेना में एक योद्धा ऐसा था, जो साक्षात ‘काल’ था। जिसे यदि तुम सही समय पर कमान सौंपते, तो यह युद्ध 18 दिन नहीं… केवल एक प्रहर में समाप्त हो जाता। लेकिन तुमने ‘हीरे’ को छोड़कर ‘कंकड़’ पर दांव लगाया।”

वह योद्धा कोई और नहीं— गुरु द्रोण पुत्र अश्वत्थामा थे।

अश्वत्थामा, जिसे दुर्योधन ने कभी ‘समझा’ ही नहीं

दुर्योधन अपनी मित्रता और भावनाओं में इतना अंधा था कि उसने कर्ण पर तो भरोसा किया, लेकिन अश्वत्थामा (जो शिव के अंशावतार थे) को अनदेखा कर दिया।

आरंभ (दिन 1-10) तुमने भीष्म को सेनापति बनाया, जो पांडवों से प्रेम करते थे। वे उन्हें मारना ही नहीं चाहते थे।

मध्य (दिन 11-15) तुमने द्रोणाचार्य को चुना, जो शिष्य-मोह में बंधे थे।

पंद्रहवें दिन के बाद जब द्रोण गिरे, तब तुम्हें अश्वत्थामा को चुनना चाहिए था। उसका क्रोध पिता की मृत्यु के कारण चरम पर था। वह ‘रुद्र’ बन चुका था।

किन्तु, तुमने क्या किया? तुमने भावुकता में आकर कर्ण को चुना। कर्ण वीर थे, दानवीर थे, लेकिन वे मरणशील थे। जबकि अश्वत्थामा अमर थे।

कृष्ण ने अश्वत्थामा की शक्तियों का जो वर्णन किया, वह सुनकर दुर्योधन सन्न रह गया

अश्वत्थामा में भगवान शिव का क्रोध और शक्ति समाहित थी।
जहाँ कृपाचार्य 60,000 योद्धाओं से लड़ सकते थे, अश्वत्थामा अकेले 72,000 महारथियों को धूल चटाने की क्षमता रखते थे।

उन्हें ज्ञान केवल द्रोण से नहीं, बल्कि परशुराम, व्यास और दुर्वासा जैसे ऋषियों से मिला था।
अर्जुन के पास भी जिसका काट नहीं था, वह अस्त्र अश्वत्थामा के पास था।

कृष्ण ने कहा: “दुर्योधन! यदि 16वें दिन सेनापति अश्वत्थामा होते, तो पांडव तो क्या, तीनों लोकों की शक्तियां भी उसे रोक नहीं पातीं।”

दुर्योधन को कृष्ण की बातों का प्रमाण उसी रात मिल गया। जब वह मृत्युशैया पर अंतिम सांसे ले रहा था, उसने अश्वत्थामा को अपना अंतिम सेनापति घोषित किया।

और फिर… अश्वत्थामा ने तांडव किया।

अकेले अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर में घुसकर वह कर दिखाया जो 11 अक्षौहिणी सेना 18 दिनों में न कर सकी

धृष्टद्युम्न का वध।

शिखंडी और पांचों उपपांडवों का संहार।

पांडवों की शेष बची पूरी सेना को एक ही रात में गाजर-मूली की तरह काट दिया।

सुबह जब दुर्योधन को यह समाचार मिला, तो उसकी आँखों से आंसू बह निकले। यह आंसू खुशी के नहीं, गहरे पछतावे के थे।

उसके अंतिम शब्द मौन चीत्कार बन गए।

“हाय! जिस शक्ति को मैं अंत में ढूंढ पाया, यदि उसे पहले पहचान लेता… तो आज कुरुक्षेत्र का विजेता मैं होता!”

“संसाधन होना ही काफी नहीं है, सही समय पर सही व्यक्ति की पहचान करना ही असली नेतृत्व है।”

अक्सर हम भावनाओं या पूर्वाग्रहों में पड़कर अपने सबसे काबिल ‘योद्धाओं’ को नजरअंदाज कर देते हैं, और जब तक हमें उनकी कीमत समझ आती है… तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

महाभारत के ‘शल्य पर्व’ और ‘सौप्तिक पर्व’ के प्रसंगों पर आधारित।।

🙏🏻 हरे कृष्णा ❤️

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એક ધનવાન માણસે  દરિયામાં એકલા ફરવા માટે તેણે બોટ વસાવી હતી.
રજાના દિવસે તે પોતાની બોટમાં દરિયો ખુંદવા નીકળ્યો. મધદરિયે પહોંચ્યો ત્યાં દરિયામાં તોફાન આવ્યું. બોટ ડૂબવા લાગી. બોટ બચવાની કોઇ શકયતા ન લાગી, ત્યારે એણે લાઇફ જેકેટ પહેરીને દરિયામાં પડતું મૂકયું.
બોટ… ડૂબી ગઇ. તોફાન પણ શાંત થઇ ગયું. તરતો તરતો એ માણસ એક ટાપુ પર પહોંચી ગયો. ટાપુ ઉપર કોઇ જ ન હતું. ટાપુના ફરતે ચારે તરફ ઘૂઘવતા દરિયા સિવાય કંઇ જ નજરે પડતું ન હતું. એ માણસે વિચાર્યું કે મેં તો મારી આખી જિંદગીમાં કોઇનું કંઇ બૂરું કર્યું નથી તો પછી મારી હાલત આવી શા માટે થઇ?
પોતાના મને જ તેણે જવાબ આપ્યો કે ‘જે ઇશ્વરે તોફાની દરિયાથી તેને બચાવ્યો છે એ જ ઇશ્વર કંઇક રસ્તો કાઢી આપશે’.
દિવસો પસાર થવા લાગ્યા. ટાપુ પર ઉગેલા ઝાડ-પાન ખાઇને એ માણસ દિવસો પસાર કરતો હતો.
થોડા દિવસમાં તેની હાલત બાવા જેવી થઇ ગઇ. ધીમે ધીમે તેની શ્રદ્ધા તૂટવા લાગી.
ઇશ્વરના અસ્તિત્વ સામે પણ તેને સવાલો થવા લાગ્યા.
ભગવાન જેવું કંઇ છે જ નહીં, બાકી મારી હાલત આવી ન થાય.
ટાપુ ઉપર કેટલાં દિવસો કાઢવાના છે એ તેને સમજાતું ન હતું. તેને થયું કે લાવ નાનકડું ઝૂંપડું બનાવી લઉં. ઝાડની ડાળી અને પાંદડાની મદદથી તેણે ઝૂંપડું બનાવ્યું. એને થયું કે, હાશ, આજની રાત આ ઝૂંપડામાં સૂવા મળશે. મારે ખુલ્લામાં સૂવું નહીં પડે.
રાત પડી ત્યાં વાતાવરણ બદલાયું, અચાનક વીજળીનાં કડાકા-ભડાકા થવા લાગ્યા. ઝૂંપડીમાં સૂવા જાય એ પહેલાં જ ઝૂંપડી ઉપર વીજળી પડી, અને આખી ઝૂંપડી ભડભડ સળગવા લાગી.
સળગતી ઝૂંપડી જોઇ ભાંગી પડયો.
ઈશ્વરને મનોમન ભાંડવા લાગ્યો. તું ઈશ્વર નથી, રાક્ષસ છો, તને દયા જેવું કંઇ નથી. તું અત્યંત ક્રૂર છો. હતાશ થઇને માથે હાથ દઇ રડતો રડતો એ માણસ બેઠો હતો.
અચાનક જ એક બોટ ટાપુના કિનારે આવી. બોટમાંથી ઉતરીને બે માણસો તેની પાસે આવ્યા અને કહ્યું, “અમે તમને બચાવવા આવ્યા છીએ. તમારું સળગતું ઝૂંપડું જોઇને અમને થયું કે આ અવાવરું ટાપુ પર કોઇ ફસાયું છે. તમે ઝૂંપડું સળગાવ્યું ન હોત તો અમને ખબર જ ન પડત કે અહીં કોઇ છે !”
એ માણસની આંખમાંથી દડદડ આંસુ વહેવા લાગ્યા.
ઈશ્વરની માફી માંગી અને કહ્યું કે મને કયા ખબર હતી કે તેં તો મને બચાવવા માટે મારું ઝૂંપડું સળગાવ્યું હતું!!
કંઇક ખરાબ બને ત્યારે માણસ નાસીપાસ થઇ જાય છે. હેલન કેલરે એક સરસ વાત કરી છે કે, જયારે ઈશ્વર સુખનું એક બારણું બંધ કરી દે ત્યારે સાથોસાથ સુખના બીજા બારણાંઓ ખોલી દે છે પણ આપણે મોટાભાગે બંધ થઇ ગયેલાં સુખના બારણાં તરફ જ જોઇને બેસી રહીએ છીએ. બીજી તરફ નજર જ નાખતા હોતા નથી. સમય અવળચંડો છે. ઘણી વખત બધું જ આપણી મુઠ્ઠીમાં હોય એવું લાગે છે, અને ઘણી વખત સાવ ખાલી હાથમાં આપણી રેખાઓ પણ આપણને પારકી લાગે છે..

🙏🏻🙏🏻 *બહુ જ જલ્દી બધું સારું થશે તેવી શ્રધ્ધા અને ધીરજ સાથે રહેજો. ઇશ્વર કઇંક સારો રસ્તો બતાવશે*🙏🏻🙏🏻