Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जब हम छोटे थे तब माँ रोज रात में सोते समय एक कहानी सुनाती थी
उन्हीं कहानियों में एक कहानी थी..किसी राजा के  शयन कक्ष में एक चिड़िया ने घोंसला बना लिया

एक दिन चिड़िया को कहीं से एक कौड़ी मिल गई…अब जब राजा सोने आये चिड़िया बोलने लगती…राजा से अधिक धन मेरे पास है
कुछ दिनों तक इग्नोर करते करते एक दिन राजा ने अपने सेवकों से कहा कि देखो तो जरा…ऐसा क्या है इसके घोंसले में कि रोज सुनाती है
सेवकों ने देखा तो पता चला कि एक कौड़ी है…सेवक उठा लाए
शाम में चिड़िया आई तो उसका कौड़ी गायब था…राजा जब सोने आये तब चिड़िया ने बोलना शुरू किया राजा ने डर कर कौड़ी चुरा लिया

एक दो दिन यही चलता रहा तो चिढ़ कर राजा ने कहा कि चिड़िया की कौड़ी उसके घोंसले में रख दो
कौड़ी रख दी गई
अब चिड़िया ने कहना शुरू किया राजा मुझसे डर गए कौड़ी लौटाए

अंत में क्रोध में आ कर राजा ने घोंसला ही फिंकवा दिया

और हां, वो राजा भाजपा का नहीं था 😃😃

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5 फरवरी / रोचक-प्रसंग
बूढ़ा-बिया का उत्साह

1947 में अंग्रेजों के जाने के बाद भी उनकी छोड़ी गयी कई समस्याएं बनी रहीं। पूर्वोत्तर भारत भी ऐसी ही एक समस्या से जूझ रहा था। अंग्रेजों ने ठंडा मौसम और उपजाऊ खाली धरती देखकर वहां चाय के बाग लगाये। ये बाग मीलों दूर तक फैले होते थे। उनमें काम के लिए वे बंगाल, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना आदि से हजारों वनवासी पुरुष और स्त्रियों को पकड़कर ले आये। इन्हें बिना छुट्टी बंधुआ मजदूर जैसे काम करना पड़ता था। इन्हें नशीली चाय दी जाती थी, जिससे ये सदा बीमार बने रहें।

अंग्रेजों ने बागों के बीच बसाये इनके गांवों में चर्च तो बनाये, पर मंदिर और स्कूल नहीं। स्कूलों के अभाव में बच्चे पढ़ नहीं पाते थे। मंदिर न होने से जन्म, विवाह या मृत्यु के क्रियाकर्म कहां हों, ये बड़ी समस्या थी। अंग्रेज उन्हें चर्च में बुलाते थे। कुछ लोग बहकावे में आकर वहां जाने लगे और ईसाई बन गये; पर अधिकांश वनवासी धर्म पर दृढ़ थे। धीरे-धीरे पुरुष और स्त्रियां बिना विवाह के ही साथ रहने लगे। सब जानते थे कि ये पति-पत्नी हैं; पर विधिवत विवाह न होने से महिलाएं सिंदूर या मंगलसूत्र का प्रयोग नहीं करती थीं।

कई पीढि़यां ऐसे ही बीतने से और भी कई समस्याएं पैदा हो गयीं। बच्चे अपने पिता का नाम नहीं लिखते थे। लगभग 60 लाख की जनसंख्या वाले इस वर्ग की सरकारों ने भी उपेक्षा ही की। ये लोग मुख्यतः विश्वनाथ चाराली,  कोकराझार, उदालगुडी, शोणितपुर, नौगांव, नार्थ लखीमपुर, गोलाघाट, जोरहाट, शिवसागर, डिब्रूगढ़ और तिनसुखिया जिलों में रहते हैं। इनके गांव बंगलादेश की सीमा पर हैं; उधर से गोली भी चलती रहती है। गो तस्करी और घुसपैठ की जानकारी ये ही पुलिस और सेना को देते हैं। मुख्यतः मंुडा, ओरांव, खारिया, सन्थाल आदि जनजातियों के ये वीर सीमा और धर्म के रक्षक हैं।

1947 में अंग्रेज तो चले गये; पर ईसाई मिशनरी नहीं गये। जब संघ, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, विश्व हिन्दू परिषद, विवेकानंद केन्द्र आदि हिन्दू संस्थाएं वहां पहुंचीं, तो उनका ध्यान इस पर गया। अतः ऐसे बुजुर्गों के सामूहिक विवाह (बूढ़ा-बिया) की योजना बनी। इसमें देश के कई धर्माचार्य और समाजसेवी भी जुड़ गये। पहला कार्यक्रम 2009 में हुआ, जिसमें 12 जोड़ों के विवाह कराये गये। हर जोड़े को वस्त्र, मंगलसूत्र, शृंगार सामग्री, कंबल, चटाई, बर्तन, चंदन का पौधा तथा देव प्रतिमाएं दी गयीं।

पूरे समाज में इसका व्यापक स्वागत हुआ। अतः पांच फरवरी, 2015 को एक विशाल विवाह समारोह का आयोजन हुआ। इसमें 467 जोड़े शामिल हुए। बरसों से साथ रहते हुए वे अघोषित रूप से थे तो पति-पत्नी ही; पर आज अग्नि और समाज के सम्मुख फेरे लेकर विधिवित विवाहित हो गये। अब हर साल ये कार्यक्रम हो रहे हैं। इसके चलते लगभग सात हजार ऐसे विवाह सम्पन्न हो चुके हैं। इससे पूरे समाज में उत्साह का संचार हुआ है। सिंदूर और मंगलसूत्र पहने महिलाओं के चेहरे पर अब विशेष चमक दिखायी देती है।

इन कार्यक्रमों में तीन पीढ़ी के विवाह एक साथ होते हैं। एक ही मंडप में दादा, बेटे और पोते का विवाह होते देखना सचमुच दुर्लभ दृश्य होता है। विवाह की वेदी पर बैठी कई महिलाओं की गोद में दूध पीते बच्चे होते हैं। दादा की शादी में पोते और पोते की शादी में दादा-दादी नाचते हुए आते हैं। असम की परम्परा के अनुसार सात दिन तक चलने वाली हल्दी, टीका, कन्यादान तथा विदाई आदि वैवाहिक रस्में पूरे विधि विधान से की जाती हैं।

इस बूढ़ा-बिया योजना के अन्तर्गत हिन्दू संस्थाएं तथा संत विवाह से पहले और बाद में भी उनके बीच लगातार जा रहे हैं। इससे वहां शराब के बदले बचत को प्रोत्साहन मिल रहा है। सैकड़ों स्कूल और छात्रावास खोले गये हैं। इससे हिन्दुत्व का प्रसार हो रहा है और मिशनरियों के पांव उखड़ रहे हैं।

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एक घने वन प्रदेश में एक एक गधा निवास करता था..
समय बीतने के साथ उसने वनवासियों के बीच यह प्रचार करना शुरू कर दिया कि,
“इस जंगल का शासक अब योग्य नहीं रहा। उसमें नेतृत्व का साहस नहीं है।

यदि कोई बड़ा संकट आ गया, तो वह किसी की रक्षा नहीं कर पाएगा।
इसलिए बेहतर होगा कि तुम सब मुझे अपना अगुवा मान लो।”
उसकी बातें सुनकर अधिकतर जीव मुस्कुरा दिए, कुछ ठहाके भी लगाने लगे।

अपनी बातों को वजन देने के लिए गधा सुरक्षित दूरी से शेर के विषय में अपशब्द कहने लगा।
कभी उसके साहस पर प्रश्न उठाता,
कभी उसकी नीतियों पर लांछन लगाता,
तो कभी उसे कायर सिद्ध करने का प्रयास करता।

वह खुलेआम शेर को चुनौती देने लगा—
“अगर तुममें जरा भी दम है, तो सामने आओ और मुझसे टकराकर दिखाओ।”
परंतु वनराज शेर ने उसकी ओर दृष्टि तक नहीं डाली।
वह शांतचित्त होकर अपने कर्तव्यों में संलग्न रहा,
मानो उस शोर-शराबे का अस्तित्व ही न हो।

अंततः थककर गधा लौट गया और जंगल में घोषणा करने लगा—
“देख लिया तुम सबने! मैंने उसे खुली चुनौती दी,
उस पर आरोप लगाए, उसे ललकारा…
पर वह कुछ भी न कर सका।
अब तुम स्वयं समझ लो कि वह कितना निर्बल है।”

कुछ छोटे जीव—जैसे बकरी, खरगोश आदि—
जो गधे से उपकृत थे,
क्योंकि वह उन्हें हरी घास के सुरक्षित मैदानों का पता बताता था,
वे उसके कथनों का समर्थन करने लगे।
धीरे-धीरे वे उसकी बातों को आगे बढ़ाने लगे।

जब यह शोर थमा,
तो शेर के विश्वस्त मंत्री, हाथी ने निवेदन किया—
“महाराज, वह गधा आपको अपमानित करता रहा,
आपको उकसाता रहा,
फिर भी आपने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
आप चाहते तो एक झटके में उसे समाप्त कर सकते थे।

या मुझे संकेत भर दे देते,
तो जंगल में आपकी प्रभुता और भी सुदृढ़ हो जाती।”
शेर ने मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया—
“गजराज, इसके पीछे तीन ठोस कारण हैं।

पहला कारण यह कि
यदि मैं या तुम उस तुच्छ प्राणी से उलझते,
तो यही कहा जाता कि हमारा शासक असहिष्णु है।
लोग पूछते—
क्या कोई विवेकशील राजा गधे जैसे प्राणी से युद्ध करता है?
दूसरा कारण यह कि
यदि संघर्ष में उसकी मृत्यु हो जाती,
तो उसके परिवारजन और समर्थक
उसे बलिदानी घोषित कर देते।

वे करुणा बटोरकर
वनवासियों को हमारे विरुद्ध भड़काते।
तीसरा और सबसे गंभीर कारण यह कि
यदि उसे ‘शहीद’ का लाभ मिलता दिखता,
तो अनेक अन्य प्राणी भी
उसी राह पर चलने को उत्सुक हो जाते—
संघर्ष नहीं, बल्कि लाभ पाने के लिए।”

शेर ने शांत स्वर में आगे कहा—
“मैं किसी गधे या उसके अनुयायियों की वजह से राजा नहीं हूं।
मेरा स्थान मेरे कार्य और सामर्थ्य से तय होता है।”
तभी उसने संस्कृत वाक्य उच्चारित किया—
न अभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।

विक्रमार्जित सत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
अर्थ —
जंगल में सिंह का राज्याभिषेक नहीं होता।
उसका पराक्रम ही उसे स्वाभाविक रूप से राजा बनाता है।

टिप्पणी —
इस कथा से अगर आपको राजनैतिक संकेत निकालना है तो उसके लिए आप पाठक पूर्णतः स्वतंत्र हैं।

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💐 समय रहते अपना पुल बना लें 💐

एक निर्धन लेकिन जागरूक विद्वान, यूँ ही चलते-चलते एक पड़ोसी राज्य में जा पहुँचा।
वह राज्य अजीब नियमों से चलता था—बिलकुल जीवन की तरह।

संयोग से उस दिन वहाँ हस्तिपटबंधन समारोह था।
एक विशाल हाथी नगर की गलियों से गुजरता, और जिसकी गर्दन में वह माला डाल देता—
वही व्यक्ति पाँच वर्षों के लिए राजा बन जाता।

विद्वान भीड़ में खड़ा देख रहा था—न चाह, न महत्वाकांक्षा।
और तभी…
हाथी रुका, झुका,
और माला उसी के गले में डाल दी।

भीड़ ने जयघोष किया।
जो स्वयं राजा बनना नहीं चाहता था, वही राजा बना दिया गया।

राजपुरोहित ने राजतिलक करते हुए एक वाक्य कहा, जो सुनने में नियम था—
पर वास्तव में सत्य था:

“यह राज्य केवल पाँच वर्षों का है।
समय पूरा होते ही आपको मगरमच्छों और घड़ियालों से भरी नदी में छोड़ दिया जाएगा।
यदि बच सके, तो उस पार के गाँव में पहुँच जाना।
लौटने का कोई मार्ग नहीं होगा।”

विद्वान भीतर तक काँप गया।
लेकिन फिर मुस्कुराया—
“पाँच वर्ष… बहुत समय है। कोई उपाय अवश्य निकलेगा।”

उसने राज्य किया—
पर राज्य से चिपका नहीं।
सत्ता में रहा—पर सत्ता ने उसे नहीं पकड़ा।

दिन में वह राजकाज करता,
रात में वह अपने भीतर उतरता।

लोगों ने देखा—यह राजा अलग है।
यह आदेश नहीं देता, यह उपस्थिति देता है।
यह बोलता कम है, पर मौन में बहुत कुछ घटता है।

और किसी को पता भी नहीं चला
कि इन पाँच वर्षों में राजा ने
नदी के किनारे एक सेतु बनवाया—

पत्थरों का नहीं,
लोहे का नहीं—

जागरण का।

ध्यान का।
स्मृति का।
साक्षी-भाव का।

पाँचवाँ वर्ष पूरा हुआ।
नियम के अनुसार राजा को फिर हाथी पर बैठाया गया।
नगर रो रहा था—
पहली बार किसी राजा के जाने पर।

नदी के तट पर पहुँचकर
राजा ने हाथी से उतरते हुए कहा—

“मैंने इस राज्य का सम्मान किया।
अब मुझे आज्ञा दें।”

जैसे ही उसने नदी की ओर कदम बढ़ाए,
लोगों की आँखें ऊपर उठ गईं—

और वे रोते-रोते नाचने लगे।

क्योंकि वहाँ
नदी के इस पार से उस पार तक
एक पुल था।

राजा बिना रुके,
शांत,
मुस्कुराता हुआ
उस पार के गाँव की ओर चला जा रहा था।

न मगरमच्छ…
न भय…
न संघर्ष।

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फतेहपुर बावन इमली


फतेहपुर बावन इमली का एक ऐसा इतिहास, जिसे सुन कर रूह कांप जायगी
#भारत की वो एकलौती ऐसी घटना जब , अंग्रेज़ों ने एक साथ 52 क्रांतिकारियों को इमली के पेड़ पर लटका दिया था, पर इतिहास की इतनी बड़ी घटना को आज तक गुमनामी के अंधेरों में ढके रखा।

उत्तरप्रदेश के फतेहपुर जिले में स्थित बावनी इमली एक प्रसिद्ध इमली का पेड़ है, जो भारत में एक शहीद स्मारक भी है। इसी इमली के पेड़ पर 28 अप्रैल 1858 को गौतम क्षत्रिय, जोधा सिंह अटैया और उनके इक्यावन साथी फांसी पर झूले थे। यह स्मारक उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के बिन्दकी उपखण्ड में खजुआ कस्बे के निकट बिन्दकी तहसील मुख्यालय से तीन किलोमीटर पश्चिम में मुगल रोड पर स्थित है।

यह स्मारक स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा किये गये बलिदानों का प्रतीक है। 28 अप्रैल 1858 को ब्रिटिश सेना द्वारा बावन स्वतंत्रता सेनानियों को एक इमली के पेड़ पर फाँसी दी गयी थी। ये इमली का पेड़ अभी भी मौजूद है। लोगों का विश्वास है कि उस नरसंहार के बाद उस पेड़ का विकास बन्द हो गया है।
10 मई, 1857 को जब बैरकपुर छावनी में आजादी का शंखनाद किया गया, तो 10 जून,1857 को फतेहपुर में क्रान्तिवीरों ने भी इस दिशा में कदम बढ़ा दिया जिनका नेतृत्व कर रहे थे जोधासिंह अटैया। फतेहपुर के डिप्टी कलेक्टर हिकमत उल्ला खाँ भी इनके सहयोगी थे। इन वीरों ने सबसे पहले फतेहपुर कचहरी एवं कोषागार को अपने कब्जे में ले लिया। जोधासिंह अटैया के मन में स्वतन्त्रता की आग बहुत समय से लगी थी। उनका सम्बन्ध तात्या टोपे से बना हुआ था। मातृभूमि को मुक्त कराने के लिए इन दोनों ने मिलकर अंग्रेजों से पांडु नदी के तट पर टक्कर ली। आमने-सामने के संग्राम के बाद अंग्रेजी सेना मैदान छोड़कर भाग गयी ! इन वीरों ने कानपुर में अपना झंडा गाड़ दिया।

जोधासिंह के मन की ज्वाला इतने पर भी शान्त नहीं हुई। उन्होंने 27 अक्तूबर, 1857 को महमूदपुर गाँव में एक अंग्रेज दरोगा और सिपाही को उस समय जलाकर मार दिया, जब वे एक घर में ठहरे हुए थे। सात दिसम्बर, 1857 को इन्होंने गंगापार रानीपुर पुलिस चैकी पर हमला कर अंग्रेजों के एक पिट्ठू का वध कर दिया। जोधासिंह ने अवध एवं बुन्देलखंड के क्रान्तिकारियों को संगठित कर फतेहपुर पर भी कब्जा कर लिया।


आवागमन की सुविधा को देखते हुए क्रान्तिकारियों ने खजुहा को अपना केन्द्र बनाया। किसी देशद्रोही मुखबिर की सूचना पर प्रयाग से कानपुर जा रहे कर्नल पावेल ने इस स्थान पर एकत्रित क्रान्ति सेना पर हमला कर दिया। कर्नल पावेल उनके इस गढ़ को तोड़ना चाहता था, परन्तु जोधासिंह की योजना अचूक थी। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध प्रणाली का सहारा लिया, जिससे कर्नल पावेल मारा गया। अब अंग्रेजों ने कर्नल नील के नेतृत्व में सेना की नयी खेप भेज दी। इससे क्रान्तिकारियों को भारी हानि उठानी पड़ी। लेकिन इसके बाद भी जोधासिंह का मनोबल कम नहीं हुआ। उन्होंने नये सिरे से सेना के संगठन, शस्त्र संग्रह और धन एकत्रीकरण की योजना बनायी। इसके लिए उन्होंने छद्म वेष में प्रवास प्रारम्भ कर दिया, पर देश का यह दुर्भाग्य रहा कि वीरों के साथ-साथ यहाँ देशद्रोही भी पनपते रहे हैं। जब जोधासिंह अटैया अरगल नरेश से संघर्ष हेतु विचार-विमर्श कर खजुहा लौट रहे थे, तो किसी मुखबिर की सूचना पर ग्राम घोरहा के पास अंग्रेजों की घुड़सवार सेना ने उन्हें घेर लिया। थोड़ी देर के संघर्ष के बाद ही जोधासिंह अपने 51 क्रान्तिकारी साथियों के साथ बन्दी बना लिये गये।

28 अप्रैल, 1858 को मुगल रोड पर स्थित इमली के पेड़ पर उन्हें अपने 51 साथियों के साथ फाँसी दे दी गयी। लेकिन अंग्रेजो की बर्बरता यहीं नहीं रुकी । अंग्रेजों ने सभी जगह मुनादी करा दिया कि जो कोई भी शव को पेड़ से उतारेगा उसे भी उस पेड़ से लटका दिया जाएगा । जिसके बाद कितने दिनों तक शव पेड़ों से लटकते रहे और चील गिद्ध खाते रहे । अंततः महाराजा भवानी सिंह अपने साथियों के साथ 4 जून को जाकर शवों को पेड़ से नीचे उतारा और अंतिम संस्कार किया गया । बिन्दकी और खजुहा के बीच स्थित वह इमली का पेड़ (बावनी इमली) आज शहीद स्मारक के रूप में स्मरण किया  जाता है
✍🏻 नवयुवक मंडल मेवाड

Posted in खान्ग्रेस

धीरेंद्र ब्रह्मचारी और इंदिरा गांधी का एक लंबा अटूट रिश्ता था।

धीरेंद्र ब्रह्मचारी के नाम इमरजेंसी में यूँ तो अनेक कारनामे दर्ज है किंतु दो मुख्य है।

पहला – स्वामी ने प्राइवेट हवाई जहाज़ अमेरिका से नगद डॉलर दे ख़रीदा और भारत बिना ड्यूटी दिये लाये- वो भी उस ज़माने में जब अमेरिकी जूते और घड़ियों पर अंधाधुंध ड्यूटी लगती थी।

दूसरा – स्वामी ने दिल्ली और जम्मू कई आश्रम सरकारी ज़मीन पर बनाये, जम्मू वाला आश्रम रक्षा मंत्रालय के आपत्ति करने के बाद भी बना था। पचास एकड़ का बना ये आश्रम आधुनिक सुविधाओं से लैस था और इस में एक प्राइवेट हवाई पट्टी भी थी।

* जब इमरजेंसी के बाद मोरार जी देसाई की सरकार बनी तो स्वामी का ये सफ़ेद और नीला वाला जहाज़ ज़ब्त हुआ दो लेकिन इंदिरा सरकार की वापसी पर ये हवाई जहाज़ स्वामी को वापस दे दिया गया।

* शाह कमीशन ने स्वामी से बहुत जाँच पड़ताल की। उनके हवाई जहाज़ के लॉग देखे तो पाया- दो सौ से ऊपर उड़ानों में से सवा सौ उड़ान केवल संजय और राजीव के नाम थी। बीस उड़ान राय बरेली और अमेठी तक थी।

* चीफ कंट्रोलर ऑफ़ इंपोर्ट के आधिकारिक बयान के मुताबिक़ इस जहाज़ मर्सिडीज़ कार तक इंपोर्ट की गईं, बिना ड्यूटी के…

* अंतिम चरणों में इनकी इंदिरा से कुछ अनबन हुई और अजीब इत्तिफ़ाक़ है की जल्द ही स्वामी की मृत्यु भी संजय गांधी और राजेश पायलट की तरह हवाई दुर्घटना में हुई।

Posted in हिन्दू पतन

मोमिनों ने वैदिक रीति से शव को जलाने के बजाय में दफ़नाने को क्यों अच्छा बताया है क्योंकि इनको लैंड जिहाद जो करना है, शोध किया तो पता चला कि दिल्ली प्रान्त में 82 % हिन्दू रहते हैं और उनके शव दाह के लिए यहाँ केवल 56 शमशान घाट हैं जबकि 13 % मुस्लिमों के लिए 562 कब्रिस्तान हैं….!!

यदि इसी अनुपात में यदि हिन्दू शवों को दफ़नाने लग जाएँ तो 3500 अतिरिक्त कब्रिस्तानों की आवश्यकता पड़ेगी इसका कारण यह है कि एक कब्र में शव को कंकाल सहित पूरी तरह नष्ट होने में कई वर्षों का समय लग सकता है जबकि एक चिता में शव को भस्म होने में कुछ घण्टे का समय लगता है और अगला शव उसी जगह कुछ ही देर बाद जलाया जा सकता है…!!

अतः कई वर्षों की अवधि में जहाँ एक कब्र में केवल एक शव को दफनाया जा सकता है जबकि उतनी ही अवधि में एक ही जगह में हजारों शवों को जलाया जा सकता है और जलाया भी जा रहा है…!!

आप देख सकते हैं कि मुर्दों ने दिल्ली की बहुत सारी कीमती जमीन पर कब्ज़ा कर रखा है यदि उन सभी शवों को निकाल कर शमशान घाटों में जला दिया जाए और 562 कब्रिस्तानों की जगह पर स्कूल, कोलेज, अस्पताल और घर बना दिए जाएँ तो सभी नागरिकों का जबरदस्त फायदा होगा….!!

राम मन्दिर पर अस्पताल और स्कूल खोलने वाले कीड़े ज़बाब दे…!!

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एक कहानी है। किसी सर्कस में एक बूढ़ा कलाकार है, जो लकड़ी के तख्ते के सामने अपनी पत्नी को खड़ा कर उस पर छुरे फेंकता है। हर बार छुरा पत्नी के कंठ, कंधे, बांह या पांव को बिलकुल छूता हुआ लकड़ी में धंस जाता है। आधा इंच इधर-उधर कि उसके प्राण गये। इस खेल को दिखाते-दिखाते उसे तीस साल हो गये। वह अपनी पत्नी से ऊब गया है और उसके दुष्ट और झगड़ालू स्वभाव के कारण उसके प्रति उसके मन में बहुत घृणा इकट्ठी हो गई है। एक दिन उसके व्यवहार से उसका मन इतना विषाक्त है कि वह उसकी हत्या के लिए निशाना लगाकर छुरा मारता है। उसने निशाना साध लिया है- ठीक हृदय और एक ही बार में सब समाप्त हो जाएगा- फिर, वह पूरी ताकत से छुरा फेंकता है। क्रोध और आवेश में उसकी आंखें बंद हो जाती हैं। वह बंद आंखों में ही देखता है कि छुरा छाती में छिद गया है और खून के फव्वारे फूट पड़े हैं। उसकी पत्नी एक आह भर कर गिर पड़ी है। वह डरते-डरते आंखें खोलता है। पर, पाता है कि पत्नी तो अछूती खड़ी मुस्करा रही है। छुरा सदा कि भांति बदन को छूता हुआ निकल गया है। वह शेष छुरे भी ऐसे ही फेंकता है- क्रोध में, प्रतिशोध में, हत्या के लिये- लेकिन हर बार छुरे सदा कि भांति ही तख्ते में छिद जाते हैं। वह अपने हाथों की ओर देखता है- असफलता में उसकी आंखों में आंसू आ जाते हैं और वह सोचता है कि इन हाथों को क्या हो गया? उसे पता नहीं कि वे इतने अभ्यस्त हो गये हैं कि अपनी ही कला के सामने पराजित हैं!
हम भी ऐसे ही अभ्यस्त हो जाते हैं- असत के लिये, अशुभ के लिये तब चाहकर भी शुभ और सुंदर का जन्म मुश्किल हो जाता है- अपने ही हाथों से हम स्वयं को रोज जकड़ते जाते हैं। और, जितनी हमारी जकड़न होती है, उतना ही सत्य दूर हो जाता है।
हमारे प्रत्येक भाव, विचार और कर्म हमें निर्मित करते हैं। उन सबका समग्र जोड़ ही हमारा होना है। इसलिए, जिसे सत्य के शिखर को छूना है, उसे ध्यान देना होगा कि वह अपने साथ ऐसे पत्थर तो नहीं बांध रहा है, जो कि जीवन को ऊपर नहीं, नीचे ले जाते हैं।

ओशो
‘पथ के प्रदीप’

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शान्ति के दूतों के लिए उनका धर्म कितना अहम है बॉलीवुड के इन दो किस्सों से आप भी समझ जाएंगे.

1) वहीदा रहमान और गुरु दत्त एक दूसरे से प्यार करते थे। सभी को लगता था कि उनकी शादी होगी। लेकिन वहीदा रहमान, जो एक कट्टर कोंकणी-मालाबार मुस्लिम थीं, ने गुरु दत्त के सामने एक शर्त रखी। उन्होंने कहा कि वह हिंदू धर्म नहीं अपनाएंगी; अगर गुरु दत्त उनसे सच्चा प्यार करते हैं, तो उन्हें इस्लाम स्वीकार करना होगा। गुरु दत्त ने उनकी शर्त मानने से इनकार कर दिया और एक दिन उन्होंने नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या कर ली। बाद में, वहीदा ने एक पंजाबी अभिनेता और व्यवसायी कमलजीत से शादी कर ली। लेकिन उन्होंने कमलजीत को बेंगलुरु की एक मस्जिद में इस्लाम धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया। वहीदा के दोनों बच्चे, सोहेल रहमान और कश्वी रहमान, भी मुस्लिम हैं।

2) देव आनंद के साथ भी ऐसा ही हुआ। सायरा बानू मुस्लिम थीं। सायरा बानू और उनकी दादी दोनों ने देव आनंद पर इस्लाम धर्म अपनाने के लिए दबाव डाला। जब देव आनंद ने इनकार कर दिया, तो सायरा बानू की दादी ने देव आनंद द्वारा दी गई हीरे की अंगूठी उनकी उंगली से उतारकर समुद्र में फेंक दी। मैं ये नहीं कह रहा कि इनमें से कुछ भी गलत था।

मैं बस धर्मनिरपेक्ष लोगों से ये पूछना चाहता हूँ: अगर धर्म का कोई महत्व ही नहीं है, तो फिर धर्म क्यों बदलें? और अगर सभी धर्म एक जैसे हैं, तो किसी को अपना धर्म बदलने की जरूरत ही क्यों पड़ी?

#bollywood #GuruDutt #kerala #conversion

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बालशेम के पास एक स्त्री आई, वह बांझ थी ;उसे बच्चा चाहिए था। वह निरंतर बालशेम के पीछे पड़ी रही :
‘आप आशीर्वाद दें तो सब कुछ हो सकता है। मुझे आशीर्वाद दें, मैं माँ बनना चाहती हूं।’
आखिरकार तंग आकर – हां, सताने वाली स्त्री से बालशेम भी तंग आ जाते हैं – वे बोले, बेटा चाहिए या बेटी?
निश्चय ही बेटा।
बालशेम ने कहा, ‘फिर यह कहानी सुनो। मेरी माँ का भी बच्चा नहीं था और वह हमेशा गाँव के रबाई के पीछे पड़ी रहती। आखिर रबाई बोला,’ एक सुंदर टोपी ले आ। ‘
मेरी माँ ने सुंदर टोपी बनाई और रबाई के पास ले गई। वह टोपी इतनी सुन्दर बनी कि उसे बनाकर ही वह तृप्त हो गई। और उसने रबाई से कहा, ‘मुझे बदले में कुछ नहीं चाहिए। आपको इस टोपी में देखना ही बहुत अच्छा लग रहा है। आप मुझे धन्यवाद न दें, मैं ही आपको धन्यवाद दे रही हूं।’
‘और मेरी मां चली गई। उसके बाद वह गर्भवती हुई और मेरा जन्म हुआ,’ बालशेम ने कहानी पूरी की।
इस स्त्री ने कहा,’ बहुत खूब। अब कल मैं भी एक सुंदर टोपी ले आती हूं। ‘ दूसरे दिन वह टोपी लेकर आई, बालशेम ने उसे ले लिया और धन्यवाद तक न दिया। स्त्री प्रतीक्षा करती रही करती रही, फिर उसने पूछा,’ बच्चे के बारे में क्या? ‘
बालशेम ने कहा, ‘बच्चे के बारे में भूल जाओ। टोपी इतनी सुंदर है कि मैं आभारी हूं। मुझे धन्यवाद कहना चाहिए। वह कहानी याद है? उस स्त्री ने बदले में कुछ न मांगा इसलिए उसे बच्चा मिला – और वह भी मेरे जैसा बच्चा।’
‘लेकिन तुम कुछ लेने की चाहत से आई हो। इस छोटी सी टोपी के बदले में तू बालशेम जैसा बेटा चाहती है? ‘
कई  बातें ऐसी हैं जो केवल कहानियां द्वारा कही जा सकती हैं। बालशेम ने बुनियादी बात कह दी :’ मांगो मत, और मिल जाएगा। ‘
मांगो मत – यह मूल शर्त है।

ओशो