जब हम चंद्रशेखर आजाद का नाम लेते हैं, तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है… लेकिन उसी वीर सपूत को जन्म देने वाली मां की कहानी सुनेंगे, तो शायद आंखें नम हुए बिना नहीं रह पाएंगी।
जिस बेटे ने अपनी मातृभूमि के लिए हंसते-हंसते प्राण न्योछावर कर दिए, उसकी मां को इस समाज ने क्या दिया…? सम्मान नहीं… बल्कि तिरस्कार, अपमान और भूख।
आजाद की शहादत के महीनों बाद उनकी मां को यह तक पता नहीं था कि उनका लाल अब इस दुनिया में नहीं रहा। वह रोज दरवाजे की ओर टकटकी लगाए बैठतीं—शायद आज मेरा बेटा लौट आए… शायद आज उसकी एक झलक मिल जाए… लेकिन हर शाम उम्मीद की लौ बुझ जाती।
गांव वालों का व्यवहार तो और भी निर्दयी था। जिनके लिए उनका बेटा जान दे गया, उन्हीं लोगों ने उस मां से मुंह मोड़ लिया। उसे “डकैत की मां” कहकर पुकारा जाने लगा… जैसे उसका बेटा कोई अपराधी था, कोई गुनहगार था…! समाज ने उसे अकेला छोड़ दिया, जैसे उसका अस्तित्व ही बोझ बन गया हो।
वह मां, जिसने अपने बेटे को देश के लिए समर्पित किया था, आज अपने ही गांव में अपमान की आग में जल रही थी। कोई सहारा नहीं… कोई अपनापन नहीं… बस ताने, तिरस्कार और बेबसी।
पेट की आग जब असहनीय हो जाती, तो वह जंगलों में जाती… सूखी टहनियां काटती… लकड़ियों का गट्ठर सिर पर उठाकर लाती… और उन्हें बेचकर दो वक्त की रोटी जुटाने की कोशिश करती। एक-एक कदम उसके लिए संघर्ष था… शरीर बूढ़ा हो चुका था, लेकिन मजबूरी उससे भी बड़ी थी।
कभी ज्वार, कभी बाजरे का आटा… उसे पानी में घोलकर पी लेती… क्योंकि उसमें इतना दम नहीं बचा था कि चूल्हा जला सके, अनाज पकाए… वह मां, जिसने एक शेर को जन्म दिया था, खुद भूख से लड़ते-लड़ते कमजोर पड़ रही थी।
सबसे ज्यादा पीड़ा देने वाली बात यह है कि यह सब उस समय हो रहा था, जब देश आजाद हो चुका था… आजादी के दो साल बाद तक भी उस मां की हालत नहीं बदली। जिस आजादी के लिए उसके बेटे ने अपना खून बहाया, उसी आजाद देश में वह मां भूखी सो रही थी।
तभी सदाशिव राव मलकापुरकर जैसे एक सच्चे साथी की नजर उस पीड़ा पर पड़ी। वह आजाद के करीबी थे, और जब उन्होंने यह हाल देखा, तो उनका दिल भीतर से टूट गया।
उन्होंने गांव वालों से पूछा—“क्यों…? यह मां भूखी क्यों है…?”
और जवाब मिला—“यह एक डकैत की मां है… इसका बहिष्कार किया गया है…”
यह सुनकर मानो इंसानियत ही शर्म से झुक गई हो।
सदाशिव राव से यह सब देखा नहीं गया। उन्होंने उस टूटी हुई मां का हाथ थामा… उसे सम्मान दिया… और अपने साथ झांसी ले आए। उन्होंने न केवल उसे आश्रय दिया, बल्कि मां का दर्जा देकर उसकी सेवा की… जैसे कोई बेटा अपनी जननी की करता है।
लेकिन वक्त ने उस मां को बहुत थका दिया था… वर्षों का दुख, अपमान और संघर्ष उसके शरीर को भीतर तक तोड़ चुका था।
मार्च 1951… वह मां चुपचाप इस दुनिया से विदा हो गई… बिना किसी शिकायत के… बिना किसी शोर के… जैसे उसने जिंदगी भर सब कुछ सहा था, वैसे ही अंतिम सांस भी ले ली।
सदाशिव राव ने खुद अपने हाथों से उनका अंतिम संस्कार किया… पूरे सम्मान के साथ… जैसे वह उनकी अपनी मां हों। झांसी के बड़ागांव गेट के पास उनकी स्मृति में एक स्थान बना, लेकिन क्या वह उस बलिदान का सम्मान है…? क्या यह उस मां के दर्द का मोल है…?
सोचिए… जिस मां ने एक अमर क्रांतिकारी को जन्म दिया, वह अपने अंतिम दिनों में भूख, अपमान और अकेलेपन से लड़ती रही…
यह कहानी सिर्फ इतिहास नहीं है… यह एक सवाल है…
क्या हम सच में अपने नायकों का सम्मान करते हैं…?
या फिर वक्त के साथ उन्हें और उनके परिवारों को भूल जाते हैं…?
जब भी आप आजाद का नाम लें… तो एक पल के लिए उस मां को भी याद करिए…
जिसने अपने बेटे को देश को सौंप दिया…
और बदले में उसे मिला—अकेलापन, अपमान और अधूरी रोटी…!
