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1950 के दशक में हावर्ड यूनिवर्सिटी के विख्यात साइंटिस्ट कर्ट रिचट्टर ने चूहों पर एक अजीबोगरीब शोध किया था।

कर्ड ने एक जार को पानी से भर दिया और उसमें एक जीवित चूहे को डाल दिया।

पानी से भरे जार में गिरते ही चूहा हड़बड़ाने लगा औऱ
जार से बाहर निकलने के लिए लगातार ज़ोर लगाने लगा।

चंद मिनट फड़फड़ाने के पश्चात चूहे ने जार से बाहर निकलने का अपना प्रयास छोड़ दिया और वह उस जार में डूबकर मर गया।

कर्ट ने फ़िर अपने शोध में थोड़ा सा बदलाव किया।

उन्होंने एक दूसरे चूहे को पानी से भरे जार में पुनः डाला। चूहा जार से बाहर आने के लिये ज़ोर लगाने लगा।

जिस समय चूहे ने ज़ोर लगाना बन्द कर दिया और वह डूबने को था……ठीक उसी समय कर्ड ने उस चूहे को मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया।

कर्ड ने चूहे को उसी क्षण जार से बाहर निकाल लिया जब वह डूबने की कगार पर था।

चूहे को बाहर निकाल कर कर्ट ने उसे सहलाया ……कुछ समय तक उसे जार से दूर रखा और फिर एकदम से उसे पुनः जार में फेंक दिया।

पानी से भरे जार में दोबारा फेंके गये चूहे ने फिर जार से बाहर निकलने की अपनी जद्दोजेहद शुरू कर दी।

लेकिन पानी में पुनः फेंके जाने के पश्चात उस चूहे में कुछ ऐसे बदलाव देखने को मिले जिन्हें देख कर स्वयं कर्ट भी बहुत हैरान रह गये।

कर्ट सोच रहे थे कि चूहा बमुश्किल 15 – 20 मिनट तक संघर्ष करेगा और फिर उसकी शारीरिक क्षमता जवाब दे देगी और वह जार में डूब जायेगा।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

चूहा जार में तैरता रहा। अपनी जीवन बचाने के लिये लगातार सँघर्ष करता रहा।

60 घँटे …….

जी हाँ …..60 घँटे तक चूहा पानी के जार में अपने जीवन को बचाने के लिये सँघर्ष करता रहा।

कर्ट यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये।
जो चूहा महज़ 15 मिनट में परिस्थितियों के समक्ष हथियार डाल चुका था ……..वही चूहा 60 घंटों तक कठिन परिस्थितियों से जूझ रहा था और हार मानने को तैयार नहीं था।

कर्ट ने अपने इस शोध को एक नाम दिया और वह नाम था…….” The HOPE Experiment”…..!

Hope……..यानि आशा।

कर्ट ने शोध का निष्कर्ष बताते हुये कहा कि जब चूहे को पहली बार जार में फेंका गया …..तो वह डूबने की कगार पर पहुंच गया …..उसी समय उसे मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया गया। उसे नवजीवन प्रदान किया गया।

उस समय चूहे के मन मस्तिष्क में “आशा” का संचार हो गया। उसे महसूस हुआ कि एक हाथ है जो विकटतम परिस्थिति से उसे निकाल सकता है।

जब पुनः उसे जार में फेंका गया तो चूहा 60 घँटे तक सँघर्ष करता रहा…….
वजह था वह हाथ…वजह थी वह आशा …वजह थी वह उम्मीद!!!
इसलिए हमेशा……..

उम्मीद बनाये रखिये, सँघर्षरत रहिये, सांसे टूटने मत दीजिये, मन को हारने मत दीजिये

इसी उम्मीद के साथ आप सभी को महा शिवरात्रि की बहुत बहुत बधाई । मेरी तरफ़ से प्रार्थना है कि भोले शंकर की कृपा आप व आप के परिवार पर हमेशा बनी रहे।,

🪷🪷प्रेषक: डॉ दर्शन बांगिया🪷🪷

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अनंत की तलाश


एक बहुत मशहुर चित्रकार था । उसकी बनाई पेन्टींग तुरन्त बिक जाती। बहुत लोग उसके पेन्टींग के दीवाने थे और उसके बनाई पेन्टींग का मुँहमाँगा दाम देने के लिये तैयार रहते थे। चित्रकार भी पेन्टींग के प्रति इतना समर्पित था कि अभी तक शादी नही किया था।

   ढलती उम्र मे चित्रकार एकबार सोचने लगा कि मेरी बनाई चित्रकारी को लोग इतना पसंद करते हैं, मुझे खुश करने के लिए मुँहमाँगा दाम देते है लेकिन जिसने मेरा सृजन किया, जिसने इस खूबसूरत सृष्टि का सृजन किया है, उस सृष्टिकर्ता को खुश करने के लिए मै आजतक कुछ नही किया।उनकी कलाकृतियोँ (संसार) को तो मै दिल खोलकर निहारा भी नही। प्रकृति के सुन्दर रुपों को अपने कलाकृतियोँ में चित्रित किया, लेकिन उसके मधुर सुरम्य धीमी आवाज को सुना ही नही। यह सोचते सोचते उसकी तुलिका रुक गयी।

उसने निश्चय किया कि अब वो भगवान के बनाये रचना को निहारेगा और भगवान को खुश करने के लिए कुछ करेगा। उसे अपने काम से विरक्ति होने लगा।

    एकदिन चित्रकार घर द्वार छोड़कर अनन्त की खोज में निकल पडा। चलते चलते शाम ढलने लगी थी। एक पेंड़ के नीचे बैठकर रात्रि विश्राम  के लिए सोचने लगा। आसपास कोई घर नजर नही आ रहा था।

     उसी समय उधर से गुजर रही एक नन्ही सी प्यारी सी बच्ची की नजर चित्रकार पर पडी। बच्ची चित्रकार से बोली कि आप कौन हैं,आप को कहाँ जाना है,रात होने को हैं, चलिएन हमारे घर ,आपको अपने बाबा से मिलवाती हुँ । बच्चे वैसे भी भगवान का रुप होते है, बच्चे सभी को प्यारे लगते है। बच्ची के बालहठ और  प्यार पुर्वक आग्रह  से चित्रकार की दुविधा समाप्त हो गयी। वह बच्ची के साथ उसके घर चल दिया।

   अतिथि देवो भव के भाव से उस घर के बुजुर्ग ने चित्रकार का स्वागत खुशी मन से किया। उसने चित्रकार को आदरपूर्वक खाना खिलाने के बाद रात्रि विश्राम की व्यवस्था कर दी।

   चित्रकार ने महसूस किया कि परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। जीवनमें पहलीबार उसे पराये भी अपने लगने लगे थे। चित्रकार उस बच्ची और बुजुर्ग के प्यार और सम्मान से भावविभोर हो गया, बरबस उनके आँखो से आँसू निकल पडे़। चित्रकार ने बुजुर्ग से कलर पेन्ट तथा ब्रश मँगा कर उसके घर के सामने जो लकडी का बाड़ (फेंसिंग) लगा था उसको पेन्ट कर दिया। इसके बाद उनलोगो से विदा लेकर    चित्रकार वहाँ से चला गयाा।
    इधर जब चर्चा हुई कि चित्रकार घर छोड़कर कही चले गये है । चित्रकार के प्रसंसक उनकी खोज करते करते बुजुर्ग के घर पहुँचे। हुलिया सुनकर बुजुर्ग ने बताया कि वे मेरे यहाँ रात्रि विश्राम के बाद मेरे बाड़े (फेंसिंग) को पेन्ट करके कहीं चले गये।

    चित्रकार के प्रसंसको ने जब उसके द्वारा पेन्ट किये बाड़ को देखा तो उनके खुशी का ठिकाना नही रहा। चित्रकार बाड़ के सभी खम्भों पर अपना हस्ताक्षर कर दिये था। वो बाड देखते ही देखते लाखों रुपयों मे बिक गये।यह चित्रकार द्वारा बच्ची को दिया गया तुच्छ उपहार था।

  उधर चित्रकार, अपने सृजनहार ओर उसके अनन्त की तलाश मे अनन्त की तरफ चलते जा रहा था।

🪷🪷प्रेषक: डॉ दर्शन बांगिया🪷🪷

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अपने अपने फर्ज


अरे पापा आप अभी तक तैयार नहीं हुए। बैग कहां है? आपका। चलिए मैं पैक करती हूं। नरेंद्र बाबू ने एक उदास नजर निशि पर डाली निशि बेटा मैं कहीं नहीं जाऊंगा। ये घर तेरी मां की यादों से भरा हुआ है। निशि की ‌आंखे भर आई पापा मां को गये छह महीने हो गए हैं आपकी तबियत भी ठीक नहीं है ऐसे में मैं आपको अकेले नहीं छोड़ सकती।आप मेरे घर चल रहे हैं मेरे साथ। बेटा मैं तेरे घर कैसे रह सकता हूं? बेटी के घर का तो लोग पानी तक नहीं पीते हैं। फिर वहां तेरे सास ससुर भी  हैं ।उन्हें मेरा वहां रहना कैसे अच्छा लग सकता है।आखिर हूं तो मैं एक बाहरी आदमी। पापा वो लोग ऐसे नहीं हैं वो मेरे साथ कितने अच्छे हैं।निशि नरेंद्र बाबू का हाथ अपने हाथ में लेकर बैठ गई। पिछली बार आपको शुगर का अटैक आया था कितनी मुश्किल से ठीक… कहते हुए उसकी आंखों में आंसू आ गए। पापा मैं आपकी इकलौती बेटी हूं।आपकी सारी जिम्मेदारी अब मेरी है। बस मैं और कुछ नहीं सुनुंगी। नरेंद्र बाबू सोच में डूब गए नवीन (दामाद) जी ने तो एक बार भी नहीं कहा। हां ये जरूर कहा था कि पापा हम आते रहेंगे आपसे मिलने। निशि तूने दामाद जी को पूछा। अरे पापा उनकी और मेरी राय अलग थोडे़ ही है। निशि नरेंद्र जी को लेकर अपने घर आ गई। उसके सास-ससुर समधी को देख कर चौंक गए।नवीन ने भी पैर छुए और कहा अच्छा किया पापा जो आप कुछ दिन के लिए यहां आ ग‌ए। नरेंद्र बाबू रहने तो लगे पर उन्हें लग‌ रहा‌ था कि शायद दामाद और उनके माता-पिता उनके यहां आने से खुश नहीं हैं। एक दिन नरेंद्र बाबू लॉन में घूम रहे थे कि अचानक उन्हें नवीन की आवाज सुनाई दी। निशि पापा यहां पर कब तक रहेंगे।  ऐसा क्यों पूछ रहे हैं आप। वहां पर उनका है ही कौन‌ और उनकी तबीयत भी ठीक नहीं है। अरे तुम समझ नहीं रही हो हमें तो अपने घर में ही अजीब सा महसूस होने लगा है। हमें किसे? अच्छा मम्मी-पापा जी ने कहा आपसे।अब तुम जो भी समझो। अरे वहां पर उनकी अच्छी व्यवस्था कर सकती हो। नरेंद्र बाबू और नहीं सुन सके कांपते हुए कदमों से वापस आ ग‌ए। अगले दिन जाने की तैयारी करने लगे। निशि बोली पापा ऐसे कैसे जायेंगे आप। नरेंद्र बाबू उसे ‌डांटने लगे निशि मेरी फिजूल में चिंता मत करो अपने पति और सास ससुर का ध्यान रखो बेटा मैं अपना ख्याल खुद रख सकता हूं। निशि बेटा बहुत दिन हो गए अब जाना चाहिेए मैं नवीन से बात करती हूं। अभी आपकी तबियत ठीक नहीं है।  जब आप ठीक हो जाएंगे तो मैं आपको खुद छोड़ आऊंगी। नहीं निशि देखो मैं तुमसे नाराज हो जाऊंगा। निशि नाश्ता बनाने लगी। सोच रही थी कि पापा को किसी ने कुछ तो कहा है। नाश्ता करने के बाद उसने कहा आज पापा जा रहे हैं।वह अपने सास, ससुर और नवीन का चेहरा देख रही थी कि उनके चेहरे पर चमक आ गई थी। तभी उसने कहा कि मैंने एक फैसला किया है कि पापा इतनी बड़ी कोठी में अकेले कैसे रहेंगे। सोच रही हूं कि गरीब बच्चों के लिए उसमें एक छोटा-सा स्कूल खोल दिया जाय। पापा और मैं मिल कर एक ट्रस्ट बनाएंगे ताकि पापा के बाद भी स्कूल चलता रहे। और  पापा आपकी वो जमीन पडी़ है उसे बेच देते हैं दो करोड़ की वैल्यू है उसकी उसे ट्रस्ट के फंड में जमा कर देंगे उसके  इंट्रेस्ट से उन गरीब बच्चों की  फीस में मदद करेंगे जो कुछ करना चाहते हैं उसमें योगदान देंगे। बाकी आपकी पेंशन और फंड आपके लिए बहुत है। पापा मैं आज से ही इस पर काम शुरू करती हूं। नरेंद्र बाबू हतप्रभ हो कर उसे देख रहे थे। नवीन की आंखों के सामने तो अंधेरा छा गया उसके मम्मी पापा का मुंह खुला रह गया। मन ही मन हिसाब करने लगा पांच करोड़ की कोठी दो करोड़ की जमीन और फंड इतना बड़ा नुकसान। जब‌ वह नरेंद्र बाबू को छोड़कर लौटी तो नवीन उसका इंतजार कर रहा था। ये सब क्या बकवास कर रही थी तुम।निशि मुसकरायी और बोली ये बकवास नहीं सच है। ऐसा मैं इसलिए करूंगी कि किसी को भी मेरे पिता की मौत का इंतजार न रहे।  पापा ने मेरी शादी पर ऐसी कौन सी चीज है जो नहीं दी । नवीन गुस्से से बोला ये तो उनका फर्ज था।फर्ज सिर्फ लड़की के बाप का होता है। क्योंकि उसने लड़की पैदा करने की गलती की है।  मैं अपने पापा की इकलौती बेटी हूं। तो क्या मेरा फर्ज नहीं था उनकी देखभाल करने का वो भी ऐसे वक्त में जब उनकी तबीयत ठीक नहीं है। और उन्हें सहारे की जरूरत है। माफी चाहती हूं कि उनके कुछ दिन यहां रहने से सबको तकलीफ हुई। मैंने कभी तुम्हें तुम्हारे फर्ज निभाने से नहीं रोका। अपने सास ससुर की सेवा में भी  कोई कमी नहीं रखी। तुम मुझे मेरे पिता के प्रति मेरा फर्ज निभाने से  नहीं रोक सकते। उसकी आवाज में दृढ़ता थी।नवीन सर झुका कर ओर खामोश हो कर उसे देख रहा था।

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भगवान की मदद✍️


किसी गांव में दो मित्र रोहन और संदीप रहते थे। रोहन बहुत ज्यादा धार्मिक धार्मिक प्रवृत्ति का था। और वो मानता था कि भगवान उसका हर काम कर देंगे। दूसरी ओर संदीप बहुत ज्यादा मेहनत करता था।

एक बार दोनों ने मिलकर कुछ जमीन खरीदी जिस पर दोनों ने मिलकर फसल उगाने की सोची।

अब संदीप तो दिनभर खेत में मेहनत करता लेकिन रोहन कुछ काम नहीं करता, वो केवल मंदिर में जाकर भगवान से अच्छी फसल के लिए प्रार्थना करता।

इसी तरह समय बीतता गया और खेत की फसल पककर तैयार हो गई।

इसे दोनों ने बाजार में ले जाकर बेच दिया जिससे उनको अच्छा खासा पैसा मिला। घर आकर संदीप ने रोहन से कहा, “देखो दोस्त खेत में मैंने ज्यादा मेहनत की है इसलिए इस धन का ज्यादा हिस्सा मुझे मिलना चाहिए।”

संदीप की बात सुनकर रोहन बोला, “नहीं-नहीं इस धन का ज्यादा हिस्सा मुझे मिलना चाहिए। क्योंकि मैंने ही अच्छी फसल के लिए भगवान से प्रार्थना की थी। तभी हमको अच्छी फसल हुई है। मेरी प्रार्थना के बिना यह संभव नहीं होता।”

इसी बात को लेकर दोनों गांव के मुखिया के पास चले गए।

मुखिया ने उन दोनों की बात सुनकर कुछ सोचा और दोनों को एक एक बोरा चावल का दिया, जिनमें कंकड़ मिले हुए थे। और कहा कि तुम दोनों को इनमें से चावल और कंकड़ अलग-अलग करके लाना है। तभी मैं निर्णय करूंगा कि फसल के धन का ज्यादा हिस्सा किसको मिलना चाहिए।

दोनों दोस्त चावल की बोरी लेकर अपने अपने घर चले गए। संदीप ने तो रात भर जागकर चावल और कंकड़ को अलग कर दिया।
रोहन अपनी आदत के अनुसार चावल की बोरी को मंदिर में लेकर गया और भगवान से इसे साफ करने में मदद मांगी। भगवान से इसे साफ करने की प्रार्थना करके आराम से सो गया।

अगले दिन सुबह संदीप चावल और कंकड़ को अलग-अलग करके उसे मुखिया के पास लेकर चला गया।

रोहन भी बोरी को मंदिर से उठाकर वापस मुखिया के घर ले आया। रोहन को पूरा भरोसा था कि भगवान ने उसका काम कर दिया होगा।

अब मुखिया ने दोनों से पूछा कि बताओ तुमने कितने चावल साफ किए। इस पर संदीप ने तो जितने थे उतने बता दिए।

रोहन ने भी पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने बोरी खोली, लेकिन उसकी बोरी में वैसे के वैसे चावल में कंकर पत्थर मिले हुए थे। बिल्कुल साफ नहीं किये।

अब मुखिया सारी बात समझ चुका था कि रोहन बिल्कुल मेहनत नहीं करता है। इसीलिए अनाज के धन में भी कम हिस्सा मिलना चाहिए।

गांव के मुखिया ने रोहन को समझाया कि भगवान भी तभी तुम्हारी मदद करता है जब तुम कड़ी मेहनत करते हो। हर काम में तुम भगवान के भरोसे बैठे रहोगे और मेहनत नहीं करोगे तो इस दुनिया में पीछे रह जाओगे।

रोहन को मुखिया की बात समझ में आ चुकी थी वह भी संदीप के साथ साथ जमकर मेहनत करने लग गया।

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बहादुर लड़की👩‍🦰👩‍🦰

बिहार के पटना जिले के पालीगंज गांव में एक बहुत ही प्यारी सी कन्या का जन्म हुआ। कन्या अत्यंत सुंदर थी , उसके माता-पिता अथवा रिश्तेदारों ने जन्म पर खुशियां मनाई , घर में उत्सव जैसा माहौल था। लेकिन कुछ रिश्तेदारों ने कन्या के जन्म की बात सुनी तो आलोचना करने लग गए कन्या का नामकरण उसके रूप व सौंदर्य के आधार पर ‘ विदुषी ‘रखा गया।

विदुषी बहुत ही सुंदर और चंचल स्वभाव की जो भी उसे देखता उससे आकर्षित हुए नहीं रह पाता , उसे गोद में लेकर प्यार करने लग जाता। उसके माता-पिता उसे बहुत स्नेह करते थे , अथवा उसे कलेजे से लगाए रखते थे। विदुषी अपने गांव – घर में किलकारियां मारती हुई खेलती – कूदती अथवा वात्सल्य रस लुटाती , तोतली बोली में अनेकों – अनेक गीत गुनगुनाती पलती – बढ़ती रही।

समय के साथ वह बड़ी होने लगी। उसके माता-पिता ने गांव के विद्यालय में ही दाखिला करवा दिया। वह पढ़ने लिखने में अव्वल थी। जो उसे कक्षा में और बच्चों से अलग करता था। वह जब केवल 8 वर्ष की हुई तभी उसके पिता जी का स्वर्गवास हो गया। फिर वह मानसिक रूप से परेशान रहने लगी , किंतु फिर भी वह पढ़ – लिख कर आगे बढ़ती रही उसे बचपन से ही क्रिकेट , फुटबॉल , व बॉलीबॉल आदि अनेक खेल खेलने का शौक था।

वह अभ्यास करती थी उसमे लगन था जिसके कारण वह एक राष्ट्रीय खिलाड़ी भी बन गई। विदुषी एक साधारण परिवार में जन्मी थी। धन के अभाव से उसने हार नहीं मानी , उसने कॉलेज से लॉ / वकालत  की परीक्षा भी पास कर ली । विदुषी की जिंदगी में एक मोड़ ऐसा आया कि जब वह एक परीक्षा देने के लिए ट्रेन से जा रही थी। रास्ते में असामाजिक तत्वों ने ट्रेन पर हमला कर दिया। विदुषी ने जब इसका पुरजोर विरोध किया तो , डाकुओं ने उसे ट्रेन से नीचे धकेल दिया। ‘इस कृत्य से उसका एक पैर ट्रेन की चपेट में आकर कट गया।

इसके बावजूद विदुषी ने हिम्मत नहीं हारी और निरंतर आगे बढ़ती रही। विदुषी अपने भाग्य के भरोसे न रहकर पूरे जीवन में मेहनत करती रही। उसके नेक इरादे ने एक दिन एवरेस्ट की चोटी भी लांघ दी अपने देश भारत का झंडा एवरेस्ट की चोटी पर गर्व से लहराता हुआ। विदुषी और उसके जज्बे को सलाम कर रहा था।

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जो चाहिए उससे ज्यादा मिलेगा वक़्त आने दो 🌿 एक बच्चा अपनी मां के साथ दुकान पर शॉपिंग करने गया। दुकानदार ने उसकी मासूमियत देखकर उसके सामने टॉफ़ी का एक डिब्बा खोलकर कहा  “ये लो बेटा टॉफियां ले लो..?” लेकिन उस बच्चे ने टॉफियां लेने से मना कर दिया।दुकानदार को लगा की बच्चा टॉफियां लेने से डर रहा है तो वो खुद अपने हाथ से टॉफियां निकाल कर उस बच्चे को देने लगा। इस बार बच्चे ने जल्दी से वो टॉफियां लेली और अपनी जेब में डाल लीं।वापस आते हुए उसकी मां ने पूछा, “जब अंकल तुम्हारे सामने डिब्बा खोल कर टॉफियां दे रहे थे तब तुमने नहीं लीं और जब उन्होंने अपने हाथों से दीं तो ले लीं, ऐसा क्यों?” तब उस बच्चे ने बहुत खूबसूरत जवाब दिया, “मां मेरे हाथ छोटे-छोटे हैं। अगर मैं टॉफियां लेता तो 2-3 टॉफियां ही आतीं जबकि अंकल के हाथ बड़े हैं इसलिए मुझे बहुत सारी टॉफियां मिल गईं।” सीख:-इस Life में जब भगवान हमें कुछ देते है तो वह अपनी मर्जी से देते है और वह हमारी सोच से परे होता है, हमें हमेशा उनकी मर्जी में खुश रहना चाहिए। क्या पता वह किसी दिन हमें पूरा समुद्र देना चाहते हो और हम हाथ में चम्मच लेकर खड़े हों। इसलिए अपने कर्मों और उपरवाले पर हमेशा भरोसा रखें। सही वक़्त आने पर वो आपको भी वो सब कुछ देगे जिसके लायक आप होंगे। अपनी जिंदगी में किसी चीज़ के खो जाने या ना मिल पाने का गम कभी ना करें क्यूंकि हमे ऊपर वाला वही देता है जो हमारे लिए सही होता है।

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कठिनाइयों से ना घबराएं


बहुत समय पहले की बात है एक शिल्पकार एक मूर्ति बनाने के लिए किसी जंगल में पत्थर ढूंढने के लिए गया। वहां उसे मूर्ति बनाने के लिए एक बहुत अच्छा पत्थर मिल गया।

वो पत्थर लेके वापस घर आते वक्त रास्ते में से एक ओर पत्थर साथ उठा लाया। घर आकर उसने अच्छे वाले पत्थर को मूर्ति बनाने के लिए हथौड़ी और छेनी से उस पत्थर पर कारीगरी करने लगा।

जब शिल्पकार की छेनी और हथौड़ी से पत्थर को चोट लगने लगी तो पत्थर ने दर्द से कराहते हुए शिल्पकार से बोला, “अरे भाई मेरे से यह दर्द सहा नहीं जाता, ऐसे तो मैं बिखर जाऊंगा। तुम किसी और पत्थर की मूर्ति बना दो ना प्लीज़।”

उस पत्थर की बात सुनकर शिल्पकार को दया आ गई। उसने उस पत्थर को छोड़कर दूसरे पत्थर की गढ़ाई करनी शुरू कर दी। दूसरे पत्थर ने कुछ भी नहीं बोला। शिल्पकार ने थोड़े ही समय में एक प्यारी सी भगवान की मूर्ति बना दी।

पास के गांव के लोग तैयार मूर्ति को लेने के लिए आए। मूर्ति को लेकर निकलने वाले थे लेकिन उन्हें ख्याल आया कि नारियल फोड़ने के लिए भी एक पत्थर की जरूरत होगी तो वहां पर रखा पहले वाला पत्थर भी उन्होंने अपने साथ ले लिया।

मूर्ति को ले जाकर उन्होंने मंदिर में सजा दिया और पहले वाले पत्थर को भी सामने रख दिया।

मंदिर में जब भी कोई व्यक्ति दर्शन करने आते तो मूर्ति पर फूल माला चढ़ाते, दूध से नहलाते और उसकी पूजा करते। और सामने वाले पत्थर पर नारियल फोड़ते हैं।

अब पहले वाले पत्थर को हर रोज दर्द सहना पड़ता था।

उसने मूर्ति वाले पत्थर से कहा,”तुम्हारे तो मजे है। रोज फूल माला से सजते हों, रोज तुम्हारी पूजा होती हैं। मेरी तो साला किस्मत ही खराब हैं। रोज लोग नारियल फोड़ते हैं और मेरे को दर्द सहना पड़ता है।”

पहले वाले पत्थर की बात सुनकर मूर्ति बने पत्थर ने कहा,”देख दोस्त अगर उस दिन तूने शिल्पकार के हाथ का दर्द सहा होता तो आज तुम्हें यह दिन नहीं देखना पड़ता और तुम मेरी जगह पर होते। लेकिन तुमने तो थोड़े से समय के दर्द को ना सहकर आसान वाले रास्ते को चुना। अब तुम उसका नतीजा भुगत रहे हो।

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बाधा या अवसर-हिंदी कहानी⛺️

बहुत समय पहले कि बात हैं, एक बार एक राजा ने अपनी प्रजा की परीक्षा लेने की सोची।

उसने एक बड़ा सा पत्थर रास्ते में रख दिया। और खुद कही दूसरी जगह चुप गया और देखने लगा कि कोई इस पत्थर को हटाता हैं या नहीं।

बहुत सारे लोग रास्ते से गुजरे लेकिन किसीने उस पत्थर को नहीं हटाया। कई लोगो ने तो राजा को गालिया दी और कहा कि राजा सड़क को साफ़ रखने के लिए कुछ भी नहीं करता हैं।

राजा के करीबी भी उस रास्ते से गुजरे लेकिन उन्होंने भी पत्थर को नहीं हटाया।

तभी एक किसान उधर से निकला। उसके पास बहुत भारी सामान भी था। लेकिन उसने अपने सामान को साइड में रखा और उस भारी पत्थर को धक्का मारने में लग गया। कुछ देर तक कोशिश करने के बाद आख़िरकार उसने पत्थर को साइड में कर दिया।

वापिस जब वो अपना सामान उठाने गया तो देखा कि जहा से पत्थर हटाया था वहा एक छोटा सा बेग पड़ा था। उसने बेग उठाया और खोला।

उसने देखा कि बेग में बहुत सारे सोने के सिक्के और राजा का एक सन्देश लिखा हुआ था।

सन्देश में लिखा हुआ था कि यह बेग उस व्यक्ति के लिए जिसने पत्थर को हटाया हैं।

दोस्तों हमारे रास्ते में भी बहुत सारी बाधाएं आती हैं। हमे भी शिकायत करना छोड़ कर बाधाओं को हटाकर अपने जीवन को बेहतर बनाना चाहिए।

जरुरी नहीं कि कोई देख रहा हो तभी अच्छे काम करे। जब भी मौका मिले उदार भावना से सेवा करे, आपको इतनी ख़ुशी मिलेगी कि आप सोच भी नहीं सकते।

Posted in नहेरु परिवार - Nehru Family

पिताजी के पिताजी के लिए संज्ञा है, दादाजी दादाजी के पिताजी के लिए भी संज्ञा है परदादाजी,
माता के पिताजी के लिए संज्ञा है नानाजी, नानाजी के पिताजी के लिए भी संज्ञा है परनानाजी,

दादीजी के पिताजी एवं दादीजी के पिताजी के पिताजी के लिए, भारतीय विशेष कर हिंदू समाज में कोई संज्ञा नहीं है,

तो जब राहुल गांधी कहते हैं कि मेरी दादी, तब समझ में आता है इंदिरा जी, जब कहते हैं मेरे दादाजी तब भी समझ में आता है फिरोज गांधी, पर जब वह कहते हैं कि मेरे परदादा जी, तब वह इस बात को कहना चाहते हैं, नेहरू जी के लिए लेकिन वास्तव में उनके परदादा जी नेहरू जी नहीं बल्कि फिरोज गांधी के पिताजी होते हैं,
इस छोटी सी बात को कांग्रेसी थिंकटैंक का कोई सदस्य, राहुल गांधी को क्यों नहीं समझता?

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

*TRUE STORY*

મુંબઇથી અમદાવાદ આવતી ‘શતાબ્દી એકસપ્રેસ’ એની પૂરી રવાની ઉપર દોડી રહી હતી. પ્રવાસીઓ રાત્રિ-ભોજનની પ્રતીક્ષામાં આમતેમ જોઇ રહ્યા હતા. એમાં એક અધીરા પ્રવાસીએ સામેની બર્થ ઉપર બેઠેલા એક જાજરમાન વૃદ્ધને પૂછ્યું, ‘કાકા, કેટલા વાગ્યા?’

‘બીજી વાર જો સમય પૂછીશ તો તારા બાર વગાડી દઇશ! કાંડા ઉપર ઘડિયાળ બાંધવાની ટેવ પાડતાં તારા પિતાશ્રીનું શું જાય છે?’

કાકાએ અપેક્ષા બહારનો ઉત્તર આપ્યો. પૂછનાર રાતો-પીળો થઇ ગયો. પણ કાકાની ઉમર, એમના કમિંતી વસ્ત્રો અને રૂઆબદાર વ્યકિતત્વ જોઇને એ અંજાઇ ગયો. એણે જિંદગીમાં ક્યારેય કોઇને સમય જ પૂછવાની બાધા લઇ લીધી.

થોડી વાર પછી સામે બેઠેલા બીજા પ્રવાસી એ પૂછ્યું, ‘કાકા, કયાં જાવ છો? સુરત, વડોદરા કે અમદાવાદ?’

‘જહન્નમમાં! સાથે આવવું છે? ટિકિટના પૈસા હું કાઢીશ.’ કાકાએ તોપના ગોળા જેવો જવાબ આપ્યો.

બીજી વિકેટ પડી ગઇ. ત્યાં વળી ત્રીજાને વાચા ફૂટી, ‘કાકા, તબિયત તો સારી છે ને?’

‘તું ડોકટર છે?’ કાકાનો શોર્ટ પીચ બોલ જેવો શોર્ટ ક્વેશ્ચન. પેલાનાં ડાંડિયા ગૂલ. કમ્પાર્ટમેન્ટમાં સન્નાટો! કાકાના નામનો આતંક છવાઇ ગયો.

બધાં એકબીજાની સામે જોઇને ઇશારા કરી રહ્યા: આવું કેમ? કોઇ માણસ વિના કારણે આટલો કડવો બની શકે ખરો? એ પણ આ ઉમરે? સત્તોતેર કરતાંયે વધુ ઉમરનો લાગતો પુરુષ તો લાગણી ભૂખ્યો બની જાય. એને બદલે આ માણસ કાકો મટીને કરવત કેમ બની ગયો?!!’ ટ્રેન દોડતી રહી. બીજા પ્રવાસીઓ આપસમાં વાતો કરતાં રહ્યા.આખરે પેલા કાકા પણ એમાં જોડાયા. *જીવતો માણસ છેવટે કયાં લગી જડ બનીને બેસી રહી શકે? જેના મૂળ હજી સૂકાયા નથી અને ધરતીમાંથી જીવનરસ ખેંચી રહ્યા છે એવું વૃક્ષ ભલે ને ગમે તેટલું શુષ્ક, ખખડધજ અને પર્ણવિહિન બની જાય પણ આખરે એ ભીતરની ભીનાશને કયાં સુધી છુપાવી શકે? ધીમે-ધીમે એ વૃદ્ધે પોતાની જીવન-મંજૂષાનું ઢાંકણું ઉઘાડી નાખ્યું.*

અનિરુદ્ધભાઇની ઉમર અત્યારે છોંતેર વર્ષની. પણ એક સમયે તે પચીસના હતા. ખૂબ જ સોહામણા હતા. ખંડેર જો આવું આકર્ષક હોય તો ઇમારત કેવી હશે? તેજસ્વી કારકિર્દી અને તીવ્ર બુદ્ધિમતા. સરકારી ઇન્ટરવ્યૂમાં પ્રથમ ધડાકે જ કલાસ વન કક્ષાની નોકરીમાં પસંદ થઇ ગયા. પત્નીનું નામ મંદાકિની.

એ પણ એટલી જ ખૂબસૂરત. લીલાં ઝાડને વળગેલી નમણી વેલ જેવી. ‘કાકા, તમે વાત કરો છો એ સાંભળીનેય અમને તો ઇર્ષા થઇ આવે છે.’ બાજુમાં બેઠેલી એક કોલેજિયન યુવતીએ ટહુકો પુરાવ્યો.

‘ઇર્ષા તો એ વખતે અમને જાણતાં તમામને થઇ આવતી હતી. મુંબઇના એ જમાનાના ‘એલીટ’ સમાજમાં અમારી જોડી ‘અનુ-મંદા’ના નામથી પ્રખ્યાત બની ચૂકી હતી. હું ખૂબ સારું કમાતો હતો અને મારી મંદા બહુ યોગ્ય રીતે નાણાં બચાવી જાણતી હતી. એની કરકસરનો જ એ પ્રતાપ કે પંદર વર્ષના સંસાર પછી અમે વાલકેશ્વર વિસ્તારમાં અમારી માલિકીનો એક સ્વતંત્ર બંગલો ખરીદી શક્યા.’

અનુભાઇની વાત સાંભળીને કમ્પાર્ટમેન્ટમાં બેઠેલા પ્રવાસીઓમાંથી અડધા તો પોતાની આંગળીઓના વેઢા ગણવા માંડ્યા: આ બંગલો આજે કેટલી કમિંતનો થતો હશે? મુંબઇના સાધારણ વિસ્તારના સામાન્ય ફલેટની કમિંત પણ અત્યારે એકથી દોઢ કરોડ જેટલી થઇ જતી હોય તો વાલકેશ્વર જેવા સુખી, સંસ્કારી અને વૈભવી વિસ્તારમાં સ્વતંત્ર બંગલો એટલે શું કહેવાય?!

*મને ત્રણ જ શોખ હતા*, એક સારું ભોજન જમવાનો અને બીજો સારા કપડાં પહેરવાનો.’ અનુભાઇ બે શોખ આગળ અટકી ગયા. કમ્પાર્ટમેન્ટ કાન ઊચા કરીને સાંભળી રહ્યો હતો. છેવટે એક યુવતીની ધીરજ ખૂટી.એ પૂછી બેઠી, ‘અને ત્રીજો શોખ?’

”તારી કાકીને પ્રેમ કરવાનો!’

અનુભાઇએ એવી રોમેન્ટિક અદામાં આ વાકય ઉચ્ચાર્યું કે એ પોતે જ છોંતેરમાંથી છવ્વીસના થઇ ગયા. પેલી યુવતી વગર પરણ્યે મંદાકિની બની ગઇ. અનુભાઇ અને મંદાબહેનનાં આ ગાઢ પ્રેમના આંબા ઉપર ત્રણ-ત્રણ વરસના અંતરે ત્રણ કેરીઓ બેઠી. એક પછી એક ત્રણ દીકરીઓ જન્મી. ‘કાકા, ત્રણ-ત્રણ દીકરીઓ શા માટે પેદા થવા દીધી? દીકરાની લાલચમાં?’

એક સ્ત્રીએ ટોણો મારતી હોય એમ પૂછ્યું. ‘ના, અમારે મન દીકરો કે દીકરી વચ્ચે કોઇ ભેદભાવ ન હતો અને એ વખતે ‘બે બસ’નો જમાનો પણ ક્યાં હતો? અમે લગ્નની પહેલી રાતથી જ નક્કી કર્યું હતું કે અમારાં ત્રણ બાળકો હશે. એક મંદાને રમવા માટે, બીજું મારે રમવા માટે, અને ત્રીજું એ બેઉને રમવા માટે.’
અનુભાઇની આ ‘ત્રણ’ વાળી થિયરી ડબ્બામાં બધાંને મોજ કરાવી રહી હતી. એવી જ મોજ અનુભાઇને જીવનમાં આવી રહી હતી. ત્રણેય દીકરીઓને એમણે લાડકોડથી ઉછેરી. ખૂબ સારું ભણાવી. સુખી ઘર અને સારો વર શોધીને એક પછી એક ત્રણેયને પરણાવી દીધી.

‘બધું બરાબર ચાલી રહ્યું હતું. જિંદગીની ટ્રેન પૂરપાટવેગે દોડી રહી હતી. ત્યાં જ એને બેવડો અકસ્માત નડી ગયો.’ અનુભાઇના બોલવામાં કંપન ભળી ગયું, ‘હું અઠ્ઠાવન વરસનો થયો ત્યારે વિચાર્યું હતું કે હવે ઘરે બેસીને શાંતિથી મંદાની સાથે નિવૃત્તિભરી જિંદગી માણીશ. પણ અચાનક એ જ વરસે સાવ ટૂંકી માંદગીમાં મારી પત્નીનું અવસાન થયું.
મારી ટ્રેન પાટા પરથી ખડી પડી. હવે મને ભાન થયું કે પત્ની ગઇ તે પહેલો અકસ્માત અને નિવૃત્તિકાળ એ બીજી દુઘર્ટના.’ પ્રેમભૂખ્યો પુરુષ ક્ષણોનું ગણિત ગણતો થઇ ગયો.

ઘડિયાળના કાંટાનો મોહતાજ બની ગયો. મંદાને પ્રેમ કરવો એ એનો શોખ હતો, આદત હતી, વ્યસન હતું. એમાં હાથની સ્વાદિષ્ટ વાનગીઓ જમવી એ બીજી પ્રિય આદત હતી. પત્ની ગઇ એની સાથે જ અનુભાઇના હૃદયમાંથી જીવનરસ ઊડી ગયો.
‘અઠ્ઠાવનમા વરસે તમે વિધુર થયા. અત્યારે તમે છોંતેરના છો. એનો અર્થ એ થયો કે છેલ્લા અઢાર-અઢાર વરસથી તમે આવી રસ વગરની જિંદગી ઢસરડી રહ્યા છો. શું આ જ કારણ છે તમારી જીભ ઉપર આવી ગયેલી કડવાશનું?’ આ પ્રશ્ન પૂછનાર પ્રવાસી એ જ હતો જેણે સફરની શરૂઆતમાં જ અનુકાકાના મોંઢેથી એના પિતાશ્રી સમાણી ગાળ ખાધી હતી.

‘ના, કેરી ગમે તેટલી કહેlવાય, તોયે કડવી તો ન જ થાય! હું મધ જેવો મીઠો માણસ હતો. પોણા ભાગની જિંદગી સુધીમાં ન તો ક્યારેય ઝેર ચાખ્યું હતું, ન કાઢ્યું હતું. મંદાનાં મૃત્યુ પછી પણ દસ-બાર વરસ તો મેં ખેંચી કાઢયા. પૈસાની ખોટ ન હતી.. શરીર ખડતલ હતું. આખો દિવસ સાહિત્ય, સંગીત અને મિત્રોની સોબતમાં પસાર થઇ જતો હતો અને ગમે ત્યારે ગમે તે હોટલમાં જમી લેતો હતો. પણ છેલ્લાં બે-ત્રણ વરસથી શરીર લથડવા માંડ્યું, આંતરડા નબળા પડતાં ચાલ્યા, મિત્રો પણ એક પછી એક બિછડે સભી બારી બારીની જેમ મને એકલો છોડીને રવાના થયા. ત્યારથી મારી કમબખ્તીની શરૂઆત થઇ.’

અચાનક અહીં સુધીની વાત સાંભળ્યા પછી કો’કને યાદ આવ્યું, ‘તમારી દીકરીઓ શું કરે છે? એમાંથી કોઇ તમારી મદદે ન આવી?’

‘કેવી રીતે આવે? પરણીને સાસરે ગયેલી દીકરીઓ પોતાનો સંસાર સંભાળે કે બાપને સાચવવા દોડી આવે? *સૌથી મોટી અને સૌથી નાની દીકરીઓ તો લોકલાજે પણ મને મદદ કરવા માટે ન આવી* વચેટ દીકરી આવીને કરગરી પડી- ‘પપ્પા, તમે મારી સાથે ચાલો. હું તમને પ્રેમથી સાચવીશ.’ મેં બંગલાને તાળું માર્યું. મંદા મરતાં પહેલાં ત્રણ કિલોગ્રામ જેટલું સોનું બચાવતી ગઇ હતી. દીકરીઓને લગ્ન વખતે આપેલા દાગીના તો અલગ. મેં ત્રણ સરખા ભાગ પાડીને એક-એક કિલો સોનું ત્રણેય દીકરીઓને વહેંચી દીધું અને વચલીની સાથે ચાલ્યો ગયો.’ અનુભાઇની જિંદગી હવે ડામરની લીસ્સી સડક ઉપરથી ઉબડખાબડ રસ્તા પર ફંટાઇ રહી હતી.

એકાદ મહિનો તો સારી રીતે પસાર થઇ ગયો, પણ એક દિવસ એ જમાઇને દીકરી સાથે આવો સવાલ પૂછતાં સાંભળી ગયા, તારો બાપ હજુ કયાં સુધી જીવવાનો છે? એ ઝટ મરે તો વાલકેશ્વરનો બંગલો અને લાખો રૂપિયાની ફિકસ ડિપોઝિટ તો આપણા હાથમાં આવે!

*એ જ દિવસે અનુભાઇ દીકરીનું ઘર છોડીને પોતાના બંગલામાં પાછા આવી ગયા.* એક નોકર રાખી લીધો, મકાનની સાફ-સફાઇ માટે. એક બાઇ રાખી લીધી, રસોઇપાણી માટે. બાઇ પાંસઠ વર્ષની, દુખિયારી વિધવા હતી. સવારથી જ એ બંગલામાં આવી જતી. બંને સમદુખિયા જીવ સાથે બેસીને ચા પીતાં. પછી અનુભાઇ લાઇબ્રેરીમાં ઊપડી જતાં. બપોરે પાછા આવીને બંને જણાં ભોજન લેતાં. સાંજની રસોઇ જમાડીને પણ પેલી વૃદ્ધા એનાં ઘરે ચાલી જતી.

‘આ રીતે પણ મારી જિંદગીના અંતિમ વરસો પસાર થઇ ગયા હોત, પણ મારા જમાઇઓને પેટમાં તેલ રેડાયું. એક દિવસ એ ત્રણેય જાલિમો ભેગા થઇને મારા બંગલે આવ્યા, મારી સાથે ઝગડવા લાગ્યા – *તમને શરમ નથી આવતી આ ઉમરે ઘરમાં રખાતને ઘાલતાં? અરે, લાવવી જ હતી તો કોઇ જુવાન બાઇને લાવવી હતી ને! આ ડોશીમાં તમે શું જોઇ ગયા?’*

બસ, મારું દિલ તૂટી ગયું. પેલી બાઇને મેં રવાના કરી દીધી. *બંગલાનું તાળું મારી દીધું. વીલ તૈયાર કરાવી લીધું. હવે આખો દિવસ ને પૂરી રાત દેશભરમાં ભટકતો રહું છું. મારા ઘરે ટપાલ વાંચવા પૂરતોયે જતો નથી. હું ખુદ હવે ટપાલ બની ગયો છું. સરનામા વગરની ટપાલ. બસ, ટ્રેનમાં જમી લઉ છું. ટ્રેનમાં ઊઘી લઉ છું. ક્યારેક આવી જ કોઇક ટ્રેનમાં મરી પણ જઇશ. હું કડવો નહોતો, પણ જિંદગીના અનુભવોને મને કડવો બનાવી મૂક્યો છે.*

ટ્રેન દોડતી હતી, પણ પ્રવાસીઓના મન ક્ષુબ્ધ હતા. આખરે એક યુવાને મૌન તોડયું, ‘કાકા, માફ કરશો. એક નાજુક સવાલ પૂછું છું. તમારા વીલમાં તમે શું લખ્યું છે?’

‘મારી પાસે હજુ પણ વીસેક કરોડની સ્થાવર અને રોકડ સંપત્તિ છે. એમાંથી ફૂટી કોડીયે મારી દીકરીઓને નહીં મળે. મારો દેહ જ્યારે પડે, જ્યાં પડે, ત્યારે જે ભલો ઇન્સાન મને અગ્નિદાહ આપવાનું પુણ્યકાર્ય દાખવશે એ જ મારી તમામ સંપત્તિનો વારસદાર બનશે.’

કાકાની વાત સાંભળીને ડબ્બામાં સન્નાટો પ્રસરી ગયો. ‘
(સત્ય ઘટના)

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