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‘ હાથી ’ નામથી થયેલી રમૂજના એક કિસ્સો જાણી છે. આપણે ત્યાં નાગરોમાં માંકડ, હાથી, મચ્છર, આદિ અટકો તા હોય છે જ. પરન્તુ ‘ હાથી ’ જેવા નામેા પણ હોય છે. હાથીશંકર, હાથીભાઈ, વગેરે.

એક સમયની વાત છે. એ સમયે સ્વ. ઢેબર સૌરાષ્ટ્રના મુખ્ય મંત્રી પદે હતા. તેમણે રાજકોટથી ભાવનગર તાર કર્યો-‘હાથીને તરત મોકલી આપો.’

ભાવનગરના મહારાજા સાહેબને તાર મળતાં તેમણે હુકમ છેડયો– હાથીને માકલી આપેા.’

અનુચરોએ આ હુકમનું તરત જ પાલન કર્યું. તેમણે એક હાથીને માકલ્યા. રાજકોટ જવા હાથી રવાના થઈ ગયો. ૪૦ માઇલ જતાં માલમ પડયું કે હાથી પશુ નહિ પણ વ્યક્તિનું નામ છે. આ ભૂલને પછી સુધારી લેવામાં આવી.

શ્રી ઢેબરે હાથી કે જે એમના સચિવ હતા તેમને જ બાલાવ્યા હતા.

અરવિંદ શાસ્ત્રી

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એક સિધ્ધ મહાત્મા નદીમાં સ્નાન કરી રહ્યા હતા. વહેણમાં એક ઉંદરડી તણાતી આવી. સંતે તેને બહાર કાઢી. દયાભાવનાથી પોતાની ઝૂંપડીમાં લઈ ગયા. ત્યાં તે ધીરે ધીરે મોટી થવા લાગી.

ઉંદરડી આ સિધ્ધ મહાત્માની સિધ્ધિયો અને કાર્યો જોતી રહી–એક દિવસ તેના મનમાં પણ કંઈક વરદાન–સિધ્ધિ પામવાની ઈચ્છા જાગૃત થઈ. એક દિવસ મોકો જોઈ તેણે સંતને કહ્યું- હું હવે મોટી થઈ ચૂકી છું–આથી કોઈ મોટા માણસ સાથે મારો વિવાહ કરાવી આપો.’’

આ મહાત્માએ તેને બારીમાંથી ડોકાતા સૂરજને બતાવીને કહ્યું-આની સાથે તારા વિવાહ કરાવી આપું ?’’–ઉંદરડી બોલી-આ તો આગનો ગોળો છે–મને તો ઠંડા સ્વભાવનો પતિ જોઇએ.’’ સંતે વાદળને બતાવી કહ્યું-એ ઠંડો પણ છે અને સૂરજથી મોટો પણ-એ આવે તો સૂરજ ઢંકાઈ જાય.’’ ઉંદરડીને આ પ્રસ્તાવ પણ ગમ્યો નહીં. તેણી તેનાથી પણ મોટો પતિ ઈચ્છતી હતી.

સંતે પવનને વાદળથી પણ મોટો બતાવ્યો. જે આસાનીથી વાદળને પણ વિખેરી શકે અને તેનાથી મોટો પર્વતને ગણ્યો જે પવનને પણ રોકી શકે. જયારે ઉદરડીએ આ બંનેનો પણ ઇન્કાર કર્યો તો સંતે આવેશમાં આવી કહ્યું- ઉંદરો પર્વતથી પણ મોટો છે. તે દર બનાવીને પર્વતોને ખોખલા કરીને નીચે પાડી–ચૂરેચૂરા કરી શકે છે.


ઉદરડી ખુશ થઈ ગઈ. એક મોટા ઉદર સાથે તેનું લગ્ન થઈ ગયું. હાજર રહેલાંઓને સંતે કહ્યું-સુખ અને મોટાઈની શોધ લોકો પોતાના સ્તર અને દૃષ્ટિકોણને અનુરૂપ જ કરે છે.’’



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आज से 2400 साल पहले भारतीय स्वतंत्रता के पहले महानायक क्षत्रिय राजा पुरु (पोरस)जिन्होंने विदेशी यूनानी आक्रमणकारी अलेक्जेंडर उर्फ सिकन्दर जिसने पूरी दुनिया के राष्ट्रों ईरान सहित पूरे अरब को जीत लिया था, उसे तलवार की धार से भारत की भूमि पर हराया था।

ग्रीक के इतिहासकारों ने अपने राजा अलेक्ज़ेंडर उर्फ सिकन्दर को जीता हुआ प्रस्तुत किया पर अगर अलेक्जेंडर ने भारतीय राजा पुरु को हराया था तो फिर अलेक्जेंडर की सेना पुरु से लड़ने के बाद भारत की भूमि से भाग क्यों खड़ी हुई?पुरु से लड़ने के बाद अलेक्जेंडर की सेना में भगदड़ क्यों मच गया था?अलेक्जेंडर उर्फ सिकन्दर को घायलावस्था में अपने वतन ग्रीक (यूनान) लौटना पड़ा।रास्ते में उसकी मौत हो गई।

सच्चाई यह है कि अलेक्जेंडर उर्फ सिकन्दर ने अपने जीवन की भीख पुरु से मांगा लेकिन ग्रीक के इतिहासकारों ने अपने अलेक्जेंडर को जीतता हुआ पेश कर दिया।

हम भारत के लोग प्राचीनकाल से इस मामले में कमज़ोर साबित हुए है।हॉलीवुड फिल्म अलेक्जेंडर (2008) में भी अलेक्जेंडर उर्फ सिकन्दर को भारतीय क्षत्रिय राजा पुरु से लड़ते हुए घोड़ा से गिरते हुए दिखाया गया।उस फिल्म में पुरु को अलेक्ज़ेंडर पर भारी दिखलाया गया है।अमेरिकन मानते है कि सिकन्दर को क्षत्रिय राजा पुरु ने हरा दिया था,पर हम भारतीय 2400 साल से पुरु को सिकन्दर द्वारा हारे हुए योद्धा के रूप में मानते आए है।यही भारत का दुर्भाग्य रहा है।

मार्क्सवादी,कॉम्युनिस्ट इतिहासकारों ने भारतीय राजाओं को हारने वाले के रूप में प्रस्तुत किया ताकि भारत और भारतीय राजाओं को कमज़ोर और अप्रासंगिक कहा जा सके।धन्यवाद हो अमेरिकन हॉलीवुड रिसर्चरों का जिन्होंने पुरु को जीतते हुए दिखाकर सच बोल दिया।

जो लोग बोलते है कि क्षत्रिय अधिकतर जंग हार जाते थे उनको पुरु से बप्पा रावल का इतिहास पढ़ना चाहिए जिन्होंने हज़ारों वर्षो तक दुनिया के हर राजाओं को हराया। जिन्होंने अलेक्जेंडर से अरब के आक्रांताओं तक को अरब तक खदेड़ा।पृथ्वी राज चौहान भी मोहम्मद गोरी से 1192 में रात्रि के समय हथियार न उठाने के कारण गोरी द्वारा छल के कारण हार गए।

आज पुरु को उनके 2409वीं जयंती पर उनके चरणों में भावभीनी श्रद्धांजलि!
कोटि कोटि नमन!

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मैं आपको दिखा रहा हूं इतिहास के अंधेरों में गुम हुई एक शौर्य गाथा की जीती जागती इमारत।

मेरे इंगित पर जो यह इमारत खड़ी है इसे अकबर के मकबरे के रूप में जाना जाता है।

जबकि इसकी पहचान होनी चाहिए राजाराम जाट के शौर्य के प्रतीक के रूप में।

जी हां
एक ऐसा इतिहास, जो इतिहास की अंधेरी गलियों में कहीं गुम हो गया।

जिसे अकबर का मकबरा प्रचारित किया जा रहा है, उस कब्र में कोई शरीर है ही नहीं।

राजाराम जाट ने आगरा पर हमला करके, अकबर की कब्र खोदकर उसकी हड्डियों में आग लगा दी थी और राख को जमना में फेंक दिया था।

क्या आप इसे ऐसी घटना मानते हैं जिसे इतिहास में प्रमुखता नहीं दी जानी चाहिए ?
क्या आप इसे इतिहास की ऐसी घटना मानते हैं जिस पर हिंदुओं को गर्व नहीं करना चाहिए ?

हमे हमारे उन सब पूर्वजों के इतिहास से दूर रखा गया जिन्होने वास्तव में इतिहास बनाया।
और पढ़ाया गया अकबर महान था।

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यह बताया गया कि….
एक मूवी थियेटर ने एक लघु फिल्म प्रदर्शित की जो कमरे की छत के स्नैपशॉट से शुरू हुई। कोई विवरण नहीं, कोई रंग नहीं. बस एक सफेद छत.

लगभग 6 मिनट तक वही दृश्य प्रदर्शित होता रहा जब फिल्म देखने वाले निराश होने लगे। कुछ ने शिकायत की, कि फिल्म से उनका समय बर्बाद हो रहा है और कुछ ने फिल्म छोड़नी शुरू कर दी।

अचानक, कैमरे का लेंस धीरे-धीरे हिलना शुरू हो गया जब तक कि वह नीचे फर्श की ओर नहीं पहुंच गया। एक छोटा बच्चा जो अपाहिज लग रहा था, रीढ़ की हड्डी टूटने से पीड़ित होकर बिस्तर पर लेटा हुआ था।

इसके बाद कैमरा निम्नलिखित शब्दों के साथ वापस छत की ओर चला जाता है:

“हमने आपको इस बच्चे की दैनिक गतिविधि के केवल 8 मिनट दिखाए, उस दृश्य के केवल 8 मिनट दिखाए जो यह विकलांग बच्चा अपने जीवन के सभी घंटों में देखता है, और आपने शिकायत की और 6 मिनट के लिए भी धैर्य नहीं रखा, आप इसे सहन नहीं कर सके इस पर नजर रखें..”

कभी-कभी हमें खुद को दूसरों की जगह रखकर यह समझने की ज़रूरत होती है कि हमें जो आशीर्वाद दिया गया है उसकी महत्ता क्या है और हमें ऐसे आशीर्वाद देने के लिए शुक्रिया अदा करना चाहिए जिन्हें हम हल्के में लेते हैं।

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किसी राज्य में एक राजा था…
एक बार वो अपने राज्य को भ्रमण को निकला.

थोड़ी दूर रथ पर चलने के उपरांत उसे महसूस हुआ कि… रथ से भ्रमण के दौरान वो अपने राज्य की जनता से ठीक ढंग से जुड़ नहीं पाता है.

इसीलिए, उसने रथ से उतर कर पैदल चलने का निश्चय किया.

अब पुराने जमाने में तो अभी की तरह तारकोल की पिच सड़कें होती नहीं थी…

तो, हर तरफ कच्ची सड़कें थी और कच्ची सड़कों पर कंकड़-पत्थर होना आम बात है.

इसीलिए… महलों में रहने वाले राजा ने जब कच्ची सड़क और पगडंडी पर चलना शुरू किया तो सड़क पर कंकड़-पत्थर उसे चुभने लगे तथा आधे दिन के भ्रमण में ही… उसके पैर लहूलुहान हो गए.

किसी तरह राजा ने अपना वो भ्रमण पूरा किया…
और, राजमहल में लौटते ही उसने आदेश पारित कर दिया कि….

राज्य के सड़कों पर बहुत कंकड़-पत्थर हैं… जिससे हमारे नागरिकों को सड़क पर चलने में कठिनाई होती है…
क्योंकि, मेरी ही तरह उनके पैर भी लहूलुहान हो जाते होंगे..!

इसीलिए…. नागरिकों के इस समस्या के निपटारे हेतु… राज्य की सारी सड़कों पर चमड़े बिछा दिए जाएं..
ताकि, सड़कों पर आवागमन आसान हो सके.

राजा का ऐसा आदेश सुनते ही पूरी मंत्रिपरिषद भौंचक्की रह गई क्योंकि राज्य बहुत बड़ा था और उसके हर रास्ते को चमड़े से मढ़ देना असंभव के हद तक कठिन था.

और, अगर किसी तरह इस असंभव को संभव बना भी दिया जाता तो राज्य का पूरा राजकोष इसी में खाली हो जाता..
तथा, राज्य में पशुधन की भी कमी हो जाती.

परंतु… राजा अपनी जिद पर अड़ा था क्योंकि वो सड़कों पर मौजूद कंकड़-पत्थर के कारण हो रहे अपनी प्रजा हो होने वाले दुख से मन ही मन काफी दुखी था.

काफी असमंजस की स्थिति थी..

क्योंकि, इधर राजा किसी भी कीमत पर प्रजा को इस दुख से उबारने के लिए प्रतिबद्ध था..
उधर, मंत्रीगण किसी भी कीमत पर राजकोष और राज्य के पशुधन को बचाना चाहते थे..
अन्यथा, राज में भुखमरी की स्थिति आ सकती थी.

अंततः… इस समस्या के निवारण हेतु एक वृद्ध मंत्री को बुलाया गया.

वृद्ध मंत्री काफी चतुर एवं अनुभवी था.

वो राज्यसभा में आया और उसने सारी बातें ध्यान से सुनी.

तत्पश्चात… उसने सलाह दिया कि… कंकड़ और पत्थर तो वास्तव में ही बहुत हैं और वो सड़क पर चलने वाले लोगों को चुभते भी हैं…
अर्थात, वो कष्टकारी भी हैं.

लेकिन, इसका समाधान सड़कों को चमड़े से मढ़ देना नहीं है…
बल्कि, हम ऐसा करते हैं कि…. चूँकि, कंकड़ पत्थर… चुभते तो पैर में ही हैं.

इसीलिए, हम सड़कों को चमड़े से मढ़ने की जगह अपनी पैरों को ही चमड़े से मढ़ लेते हैं…
अर्थात, नागरिकों को जूते-चप्पल उपलब्ध करवा देते हैं.

इससे हमारे राजकोष पर ज्यादा बोझ भी नहीं पड़ेगा और इस समस्या का स्थायी समाधान भी हो जाएगा.

ये विचार सबको जमा और एक बड़ी समस्या का समाधान हो गया.

कहने का मतलब है कि… कभी कभी समस्याएं काफी बड़ी लगती है लेकिन अगर दिमाग दौड़ा कर युक्ति लगाई जाए तो उस समस्या का समाधान काफी आसान होता है.

अभी वर्तमान समय में भी हिनूओं की यही समस्या है कि…. देश के हर शहर, गली मोहल्ले में कटेशर रूपी कंकड़ पत्थर भरे पड़े हैं…

और, वो बार बार चुभते हैं…
जिस कारण हिनू जनता बहुत परेशान है वो राज्य के राजा से चाहती है कि…. वो राज्य के सभी सड़कों को कंकड़ पत्थर से मुक्त कर चमड़े से मढ़ दे ताकि फिर परेशानी न हो.

जबकि…. राज्य के सभी शहर को चमड़े से मढ़ देने की जगह इसका सबसे आसान उपाय है अपने लिए जूते-चप्पल की व्यवस्था कर लेना.

जूते-चप्पल की व्यवस्था हेतु हम अपने धार्मिक आयोजनों का सहारा ले सकते हैं.

और, मैं ये कोई नई व्यवस्था नहीं बता रहा हूँ बल्कि ऐसा पहले भी ऐसा हो चुका है.

आज गणेश महोत्सव महाराष्ट्र का सबसे बड़ा त्योहार है.
लेकिन, ये त्योहार हमेशा से महाराष्ट्र के घर घर तक लोकप्रिय नहीं था.

बल्कि, बालगंगाधर तिलक ने इसे लोकप्रिय बनाया था ताकि इस पूजा के बहाने लोग एक जगह एकत्रित हों और सामाजिक चर्चा हो.

जिससे, अंग्रेजों के विरुद्ध लामबंद हुआ जा सके…!

और , उनकी ये युक्ति काम कर गई.

सिर्फ… बालगंगाधर तिलक ने ही नहीं….
बल्कि , नवरात्र में होने वाले डांडिया, गरबा आदि का भी कॉन्सेप्ट हमलोग जानते ही हैं कि ये शुरू कैसे हुआ होगा.

और, ये बताने की आवश्यकता नहीं है कि नवरात्र में हमलोग माँ भगवती की पूजा करते हैं तथा दुर्गापूजा का ये त्योहार पूरे भारत में हर्षोउल्लास से मनाया जाता है.

तो, जब हम माँ दुर्गा की प्रतिमा को देखते हैं तो हर प्रतिमा में वो महिषासुर का वध करते हुए दिखाई जाती है..

तथा, उनके एक हाथ में… त्रिशूल, दूसरे में भाला, तीसरे में तलवार, चौथे में खड़ग आदि रहता है.

तो, क्यों न…. नवरात्र में हर हिनू परिवार के लिए एक तलवार, भाला, खड़ग अथवा त्रिशूल खरीदना अनिवार्य कर दिया जाए…
(अनिवार्य लंबाई दो से तीन फीट रखी जाए)

और, सामान्य रूप से समझा दिया जाए कि…..
चूँकि… त्रिशूल, भाला, खड़ग और तलवार आदि अस्त्र माँ दुर्गा धारण करती हैं.

इसीलिए, दुर्गा पूजा में माँ दुर्गा के अस्त्रों को खरीदने से माँ दुर्गा प्रसन्न होती हैं.

(जिस तरह धनतेरस में झाड़ू एवं कोई बर्तन खरीदना अनिवार्य माना जाता है)

इस तरह… हम अपने त्योहार को एक सामाजिक क्रांति का रूप दे सकते हैं क्योंकि इससे हर हिनू परिवार के पास हर साल एक तलवार, भाला, खड़ग, त्रिशूल आदि जमा होते जाएंगे.

और, जब घर में अस्त्र होंगे और वे हर साल खरीदे जाएंगे तो स्वाभाविक तौर पर लोग उसे थोड़ा बहुत चलाना भी सीख ही जाएँगे.

इससे जरूरत के समय वे बिना किसी वाह्य सहायता के भी अपनी मदद खुद कर पाएँगे.

अर्थात…. शहर अथवा सड़क पर चाहे जितने भी कंकड़ पत्थर क्यों न मौजूद हों…
अगर पैरों में जूते चप्पल मौजूद रहेंगे तो फिर उसके चुभने के चांस बहुत कम हो जायेंगे.

आखिर, परंपराओं की शुरुआत ऐसे ही तो होती है.

कि, किसी वैज्ञानिक सोच के साथ उसे शुरू किया गया जो कालांतर में एक परंपरा और मान्यता बन गई.

जय महाकाल…!!!

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વૃધ્ધાશ્રમના નામ સરનામાવાળા પરબીડિયામાં આવેલી ટપાલને એણે ખોલ્યા વગર જ ડસ્ટબીનમાં નાખી દીધી,ફાડીને ચૂરેચૂરા કરીને…. “આ દસ્તાવેજમાં તમારા પિતાજીની સહી તો અવશ્ય જોઈશે જ…” વકીલે ભાર પૂર્વક અનિમેષને કહ્યું..”નહીં તો તમારે જમીન વેચાણ પેટે લીધેલી ટોકન રકમ પરત કરવી પડશે” અનિમેષ ચિંતામાં પડ્યો. પિતાજીની વારંવાર આવતી ટપાલ તો એ વાંચતો જ ક્યાં હતો? કે એમને જવાબ આપવાનો પ્રશ્ર્ન ઉભો થાય? મોબાઈલ તો એ વખતે જન્મ્યા જ ન હતા… . જમીનના ટોકન પેટે લીધેલી રકમ તો , નવી ગાડી પેટે ચૂકવાઈ ગઈ હતી…અને નવી ગાડી લઈ અનિમેષ અને એની પત્ની ઈશાકા તો પંદર દિવસથી ટૂર પર નીકળી ગયા હતા “હવે તો, જમીન વેચાણ રાખનારને દસ્તાવેજ કરી જ આપવો પડે…કેમ કે એ દસ્તાવેજ માટે ઉતાવળ કરતો હતો…”વકીલે અનિમેષને તાકીદ કરી. પિતાજીને , વૃધ્ધાશ્રમમાં જઈ ,રૂબરૂ વાત કરી, એમને મનાવી લેવાની ,મનમાં પેરવી ગોઠવી અનિમેષ ઘેર આવ્યો ઘેર આવી એણે વૃધ્ધાશ્રમના લેન્ડ લાઈન પર ફોન કર્યો અને પિતાજી સાથે વાત કરાવવાની વિનંતી પણ….. સામે છેડેથી જબાબ હતો, “હા, અનિમેષભાઈ તમારા પિતાજીના અવસાનના સમાચાર આપવા અમે વારંવાર ફોન કર્યા…પણ નો રીપ્લાય આવતો હતો છેવટે સંસ્થાના કવરમાં આપને અમે જાણ કરી હતી. અનિમેષથી “હાશ” બોલાઈ ગયું ને ફોન કટ કરી વકીલને ફોન કર્યો..”હા વકીલ સાહેબ, પિતાજી હયાત નથી રહ્યા…હવે?” “તો સીધીલીટીના તમે વારસ…કામ સરળ” વકીલે એ અંગે કાર્યવાહી કરવાની હૈયાધારણા આપી.. “ચાલો, જે થયું તે સારા માટે..તારા બાપા જીવતા હોત તો કદાચ સહી ના પણ કરી હોત….”ઈશાકા મંદમંદ હસતાં બોલી.. એટલામાં ટપાલી રજીસ્ટર એ.ડી .ટપાલ આપવા આંગણામાં આવીને ઉભો હતો આ ટપાલ એણે વાંચી….ચૂરેચૂરા કરતા પહેલાં ટપાલ વૃધ્ધાશ્રમના વકીલની હતી…અનિમેષના પિતાજીએ એમની હયાતી ન હોય ત્યારે પોતાના નામની તમામ મિલકતો આ વૃધ્ધાશ્રમને દાન કરી દીધાની….. અનિમેષ અને ઈશાકાના સ્વપ્નોના ચૂરેચૂરા… ચંદ્રકાન્ત જે સોની મોડાસા

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દીકરાને ઉદાહરણ સાથે વાત શીખવાડી


રજા હતી તો બધાં ઘરે હતાં. બપોરે જમીને આરામમાં હતા એવામાં લાઈટ ગઈ. પંખા બંધ થયા. બફારો હતો તો બારી બારણાં ખોલ્યા. મારા દિકરાની ઉંઘ ઉડી. પંખા અને એસી માં ટેવાયેલ પેઢી ગરમીમાં અકળાઈ. કહ્યું, પપ્પા ચાલો લાઈટ ન આવે ત્યાં સુધી વાહન લઈને આંટો મારીએ એટલે ગરમી ન થાય.

મેં કહ્યું, પવન ખાવા પેટ્રોલ ન બળાય, ગરમી સહન કરતા શીખ. એને ગમ્યું નહી પણ બીજો કોઈ રસ્તો ન હતો તો આંટાફેરા કરતા સમય કાઢ્યો. બે કલાક થયા ત્યાં લાઈટ આવી. નિરાંત થઈ.

મેં કહ્યું, ચાલ સાયકલિંગ માં જઈએ. તેમાં તેની ના ન હોય. અમે બંને નીકળી પડયા સાયકલિંગ કરવા. બહાર બફારો અને તડકો હતો. અવધ વાળા રોડ પર પહોંચ્યા એવામાં મારી નજર એક હાથલારી પર પડી.

બાંધકામ સાઈટ પર વપરાતી આ હાથલારી રેતી, કપચી, ઈંટ વગેરે સામાનની હેરફેર માટે ઉપયોગમાં લેવાય પણ આમાં તો બે બાળકોને ઘસઘસાટ ઉંઘતા જોયા. મારા દિકરાને આ દ્રશ્ય બતાવ્યું અને કહ્યું ચાલ આની સાથે થોડી વાતો કરીએ.

હાથલારી બાજુમાં ધીમે ધીમે સાયકલ ચલાવી અને વાતો ચાલુ કરી. બાંધકામ સાઈટ પર કામ કરતો એમપી નો યુવાન તેના બાળકોને ઝુંપડા સુધી મુકવા જઈ રહ્યો હતો. સાઈટ પર ટોપલા તરીકે કામ કરતો. ૩૦૦ રૂપિયા રોજ. એમપીમાં વર્ષે ત્રીસ પાંત્રીસ હજાર પણ મળવા મુશ્કેલ હતા તો જુવાન અહીં ખુશ હતો. માથે તડકો વાતાવરણમાં બફારો અને હાથલારીમાં બીજો સામાન પણ પડ્યો હતો છતાં બંને બાળકો ગાઢ નિદ્રામાં સુતા હતા.

મોટી દીકરી બે વર્ષની નામ લક્ષ્મી અને નાનો દીકરો ૧૦ મહિનાનો નામ રવિરાજ. એકાદ કિલોમીટર તેની સાથે સાયકલ ચલાવી. મારા દિકરાને નવાઈ લાગતી હતી કે આવી લોઢા-પતરાની હાથલારીમાં, તડકામાં, બફારામાં અને આવા ઉબડખાબડ રોડ પર બાળકો કેમ સૂઈ રહ્યા હશે? તેની ઉંઘ કેમ ઉડતી નથી? તે સમજવાની કોશિશ કરતો હતો.

ત્યાં થોડે આગળ રોડ પર ડેઝર્ટડેન્ કેક શોપ દેખાઈ. ત્યાંથી બે પેસ્ટ્રીઝ લીધી. પપ્પાના હાથમાં આપી કહ્યું, બાળકો ઉઠે ત્યારે ખવડાવજો. આ પ્રસંગે એક વાતનો આનંદ હતો કે બપોરે લાઈટ ગઈ ત્યારે વ્યાકુળ થતા દિકરાને મારે જે વાત સમજાવવી હતી તે વાત તેને ઉદાહરણ સાથે સમજાઈ ગઈ. પરમીશનથી આ ફોટો લીધો અને સાયકલ આગળ હંકારી મૂકી. મજા આવી;!

મિતેશભાઈ સોલંકી – રાજકોટ.

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એક વિશાળ ઝાડ હતું. આ ઝાડ પર એકે મોટો મધપૂડો હતો. બાજુમાં જ ચકલીનો માળો પણ હતો. એકવાર આ ઝાડ નીચે કેટલાંક માનવીઓ આવ્યા અને તેમણે આ વિશાળ ઝાડ પર મોટો મધપૂડો જોયો.

માનવીઓને આ મધપૂડો જોઇ લાલચ જાગી એટલે મધમાખીઓને ઉડાવી બધુ મધ ચોરી કરી દીધું અને ત્યાંથી જતા રહ્યાં. આ જોઇ ચકલીને ખૂબ દૂઃખ થયું. પણ તેને નવાઈ એ લાગી કે મધપૂડો તોડ્યાની બીજી જ સેકન્ડે મધમાખીઓ પાછી તેમના કામમાં લાગી ગઈ અને મધ ભેગુ કરવા લાગી…

આ જોઇ ચકલીએ એક મધમાખીને પૂછ્યું કે તમે ખૂબ મહેનત કરીને મધ બનાવો છો અને આ માનવીઓ તમને મારીને તમારું મધ ચોરી કરી જાય છે! તમને દુઃખ નથી થતું?

ચકલીની આ વાત સાંભળી મધમાખીએ સુંદર જવાબ આપ્યો…

મધમાખીએ કહ્યું કે માનવી મારું મધ ચોરી કરી શકે છે પણ મધ બનાવવાની મારી કલા ચોરી કરી શકતો નથી. બોધ એ છે કે, આ દુનિયામાં કોઇ પણ તમારો સામન, મિલકત, વસ્તું ચોરી કરી શકે છે, તમારાથી તે છીનવી શકે છે પણ તમારું હુન્નર કોઇ ચોરી કરી શકતું નથી. માટે હુન્નર પર ધ્યાન આપો, બાકી બધું ગૌણ છે…!!

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મોટો મૂર્ખ કોણ


એક ગામ હતું ગામના પાદરે બે ભાઈઓ ચાલ્યા જતા હતા ત્યાં સામે તેમને એક બીજો વટેમાર્ગુ મળ્યો આ જોઈ તે વટેમાર્ગુઅે બંને ભાઇઓને રામ રામ કહ્યા અને પોતાના માર્ગે આગળ ચાલ્યો.

હવે બંને ભાઈઓ વિચારમાં પડી ગયા કે આ વટેમાર્ગુઅેુ રામરામ કહ્યું કોને??

એક ભાઈ કહે કે ‘રામ રામ’ મને કહ્યુ ,જ્યારે બીજો ભાઈ કહે કે ‘રામ રામ’ મને કહ્યું . આમ, બન્ને ભાઈઓ વાદ વિવાદ કરવા લાગ્યા.

પછી બંનેએ વિચાર કર્યો કે આપણે પહેલા વટેમાર્ગુ ને જ પૂછી જોઈએ કે તેણે ‘રામરામ’ કોને કહ્યું? આથી તેઓ બન્ને તે વટેમાર્ગુ પાસે ગયા.

એક ભાઈએ પૂછ્યું, હે વટેમાર્ગુ ! તમે ‘રામરામ’ કોને કહ્યું? મને કહ્યું કે આ ભાઈને??

વટેમાર્ગુ વિચારમાં પડી ગયો અને વિચાર્યું કે આ બંને મુર્ખાઓ લાગે છે, એટલે એણે કહ્યું કે તમારા બંનેમાંથી જે પણ મૂર્ખ હશે એને હું રામરામ કહીશ. બંને ભાઈઓ એક સાથે બોલી ઉઠ્યા કે હું મૂર્ખ, હું મૂર્ખ …

વટેમાર્ગુ કહે કે બંને પોતપોતાની વાત માંડીને કહો કે તમે મુરખા કઈ રીતે છો એક ભાઈએ પોતાની વાત શરૂ કરી. એક વખત અમે ખેતરમાં તલનિ ખેતી કરેલી હતી. તલની લણણી બાદ તેને ભરવા માટે અમે કોથળા સિવતા હતા એ દરમિયાન સિવવાની સોય તલના ઢગલામાં ક્યાંક પડી ગઈ. અમે સોયને ખૂબ શોધી પણ મળી નહીં આથી અમે સોયને શોધવા માટે તલના પાકને સળગાવી નાંખ્યો છતાં પણ સોય ન મળી તે ન જ મળી. બોલો, હું મૂર્ખ ખરો કે નહીં? વટેમાર્ગુ કહે કે હા ભાઈ તું તો મોટો મૂર્ખ કહેવાય માટે તને રામ રામ..

હવે બીજા ભાઈએ પોતાની વાત શરૂ કરી બીજો ભાઈ કહે કે એક વખત મેં ગરમીમાં મુંડન કરાવવા વાળંદને ઘરે બોલાવ્યો મુંડન થઈ ગયા બાદ ને વાળંદને રૂપિયા આપ્યા પરંતુ તેની પાસે છૂટ્ટા ન હોવાથી તેણે મને બાકીના રૂપિયા પછી આપવા કહ્યું, પરંતુ હું માન્યો નહી. મેં મારી પત્ની અને દીકરાનું મુંડન પણ કરાવી લીધું. આ બનાવ પછી હું કામ તે જતો રહ્યો. પાછળથી બૈરી અને છોકરો ઘરની બહાર ન નીકળે. બેરીએ મોટો ઘૂમટો તાણી રાખ્યો. આથી આડોશી પાડોશીને થયું કે નક્કી કંઈક થયું છે આથી પાડોશીએ બૈરિના તથા મારા ઘરના સભ્યોને બાજુના ગામમાં જાણ કરી કે ભાઈ મૃત્યુ પામ્યા છે બૈરી અને દીકરાએ મુંડન કરાવ્યું છે તમે લોકો જલ્દી આવો.

હવે સગાવહાલા બધા જ ગામમાં રોતા કકળતા ઘરે આવ્યા. આ બધી રોકકળ થતી હતી ત્યાં હું ગામતરે થી પાછો આવી ગયો .મને જોઇને બધા ડરી ગયા કે ભાગો ભૂત આવ્યું છે.

ત્યારબાદ મેં બધાને શાંત પાડ્યા અને કહ્યું કે વાળંદ પાસે છુટ્ટા રૂપિયા ન હોવાથી બૈરી અને દીકરાનું પણ મુંડન કરાવ્યું છે હવે બોલો, હું મૂર્ખ કે નહીં ??
વટેમાર્ગુ અે બીજા ભાઇને પણ કહ્યું કે,”હા ભાઈ તું પણ મોટો મૂર્ખ, તને પણ રામ-રામ.તમને બંનેને રામરામ. આવજો. અને બધા પોત પોતાના રસ્તે આગળ ચાલ્યા.

  • મુનિરાબેન કચ્છી….✍️