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मीठी थपकी मीठी झपकी ——प्राचीन कथा

एक चोर था। वह नगर से चोरी करके सरपट भागा जंगल की ओर। वहाँ हरी – हरी पत्तियों से लदा -फदा नीम का पेड़ खड़ा था। उसे देख चोर बड़ा खुश हुआ-आह! इसकी छाया में बड़े सुख से मीठी नींद लूँगा। भागते -भागते मैं तो थक गया हूँ।
पेड़ के नीचे बैठकर उसने बेफिक्र होकर चोरी के माल की एक गठरी बनाई और उसे सिरहाने लगाकर ठंडी -ठंडी हवा के झोंकों में आराम से सो गया ।
उसे देखकर नीम की तो सांसें रुक गईं।
सोचने लगा –अगर यह पकड़ा गया तो अपने किए की सजा इसे जरूर मिलेगी और खूँटे से लटका दिया जाएगा। पर मैं तो मुफ्त में मारा जाऊंगा। खूंटा तो मेरे शरीर से ही तैयार होगा। उफ! पहले तो बेदर्दी से तेज धार वाले चाकू से मेरी खाल छीली जाएगी । फिर मोटी डाली को खर–खर काट पतली नोक वाला खूंटा तैयार होगा। वही खूँटा मेरे मजबूत तने में हथौड़ी से ठोक-ठोककर अंदर घुसा दिया जाएगा । दर्द से मैं बुरी तरह बिलबिला उठूँगा । हो सकता है चोट खाते –खाते टूटकर जमीन पर ही जा पड़ूँ। इस आई मुसीबत से कैसे अपनी जान छुड़ाऊं?
बहुत देर तक अटकलबाजी लगाता रहा ,अंत में उसे एक तरकीब सूझ ही गई। उसने ज़ोर -ज़ोर से हिलकर अपनी पत्तियाँ चोर पर गिरानी शुरू कर दीं ताकि वह परेशान होकर उठ बैठे। जैसे ही उसने आँखें मीड़ते हुए करवट बदली पेड़ चिल्लाया –
-अरे चोट्टे , बहुत सो लिया। अब उठ जा। अगर राजा के आदमी तुझे ढूंढते यहाँ आ गए तो पकड़ कर ले जाएंगे और फिर तो वो मार पड़ेगी वो मार पड़ेगी कि नानी याद आ जाएगी। बच्चू जेल की हवा खानी पड़ेगी सो अलग। इससे तो अच्छा है तू जल्दी से यहाँ से भाग।
अपना भेद खुलता देख चोर के तो होश उड़ गए और सिर पर पैर रख शुरू हो गई उसकी भागमभाग। जैसे ही चोर आंखों से ओझल हुआ, नीम ने चैन की सांस ली। इस बार चोर की बजाय पेड़ होशियारी से आई बला टालकर ठंडी हवा की थपकी में मीठी झपकी लेने लगा।

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