किसी राज्य में एक राजा था…
एक बार वो अपने राज्य को भ्रमण को निकला.
थोड़ी दूर रथ पर चलने के उपरांत उसे महसूस हुआ कि… रथ से भ्रमण के दौरान वो अपने राज्य की जनता से ठीक ढंग से जुड़ नहीं पाता है.
इसीलिए, उसने रथ से उतर कर पैदल चलने का निश्चय किया.
अब पुराने जमाने में तो अभी की तरह तारकोल की पिच सड़कें होती नहीं थी…
तो, हर तरफ कच्ची सड़कें थी और कच्ची सड़कों पर कंकड़-पत्थर होना आम बात है.
इसीलिए… महलों में रहने वाले राजा ने जब कच्ची सड़क और पगडंडी पर चलना शुरू किया तो सड़क पर कंकड़-पत्थर उसे चुभने लगे तथा आधे दिन के भ्रमण में ही… उसके पैर लहूलुहान हो गए.
किसी तरह राजा ने अपना वो भ्रमण पूरा किया…
और, राजमहल में लौटते ही उसने आदेश पारित कर दिया कि….
राज्य के सड़कों पर बहुत कंकड़-पत्थर हैं… जिससे हमारे नागरिकों को सड़क पर चलने में कठिनाई होती है…
क्योंकि, मेरी ही तरह उनके पैर भी लहूलुहान हो जाते होंगे..!
इसीलिए…. नागरिकों के इस समस्या के निपटारे हेतु… राज्य की सारी सड़कों पर चमड़े बिछा दिए जाएं..
ताकि, सड़कों पर आवागमन आसान हो सके.
राजा का ऐसा आदेश सुनते ही पूरी मंत्रिपरिषद भौंचक्की रह गई क्योंकि राज्य बहुत बड़ा था और उसके हर रास्ते को चमड़े से मढ़ देना असंभव के हद तक कठिन था.
और, अगर किसी तरह इस असंभव को संभव बना भी दिया जाता तो राज्य का पूरा राजकोष इसी में खाली हो जाता..
तथा, राज्य में पशुधन की भी कमी हो जाती.
परंतु… राजा अपनी जिद पर अड़ा था क्योंकि वो सड़कों पर मौजूद कंकड़-पत्थर के कारण हो रहे अपनी प्रजा हो होने वाले दुख से मन ही मन काफी दुखी था.
काफी असमंजस की स्थिति थी..
क्योंकि, इधर राजा किसी भी कीमत पर प्रजा को इस दुख से उबारने के लिए प्रतिबद्ध था..
उधर, मंत्रीगण किसी भी कीमत पर राजकोष और राज्य के पशुधन को बचाना चाहते थे..
अन्यथा, राज में भुखमरी की स्थिति आ सकती थी.
अंततः… इस समस्या के निवारण हेतु एक वृद्ध मंत्री को बुलाया गया.
वृद्ध मंत्री काफी चतुर एवं अनुभवी था.
वो राज्यसभा में आया और उसने सारी बातें ध्यान से सुनी.
तत्पश्चात… उसने सलाह दिया कि… कंकड़ और पत्थर तो वास्तव में ही बहुत हैं और वो सड़क पर चलने वाले लोगों को चुभते भी हैं…
अर्थात, वो कष्टकारी भी हैं.
लेकिन, इसका समाधान सड़कों को चमड़े से मढ़ देना नहीं है…
बल्कि, हम ऐसा करते हैं कि…. चूँकि, कंकड़ पत्थर… चुभते तो पैर में ही हैं.
इसीलिए, हम सड़कों को चमड़े से मढ़ने की जगह अपनी पैरों को ही चमड़े से मढ़ लेते हैं…
अर्थात, नागरिकों को जूते-चप्पल उपलब्ध करवा देते हैं.
इससे हमारे राजकोष पर ज्यादा बोझ भी नहीं पड़ेगा और इस समस्या का स्थायी समाधान भी हो जाएगा.
ये विचार सबको जमा और एक बड़ी समस्या का समाधान हो गया.
कहने का मतलब है कि… कभी कभी समस्याएं काफी बड़ी लगती है लेकिन अगर दिमाग दौड़ा कर युक्ति लगाई जाए तो उस समस्या का समाधान काफी आसान होता है.
अभी वर्तमान समय में भी हिनूओं की यही समस्या है कि…. देश के हर शहर, गली मोहल्ले में कटेशर रूपी कंकड़ पत्थर भरे पड़े हैं…
और, वो बार बार चुभते हैं…
जिस कारण हिनू जनता बहुत परेशान है वो राज्य के राजा से चाहती है कि…. वो राज्य के सभी सड़कों को कंकड़ पत्थर से मुक्त कर चमड़े से मढ़ दे ताकि फिर परेशानी न हो.
जबकि…. राज्य के सभी शहर को चमड़े से मढ़ देने की जगह इसका सबसे आसान उपाय है अपने लिए जूते-चप्पल की व्यवस्था कर लेना.
जूते-चप्पल की व्यवस्था हेतु हम अपने धार्मिक आयोजनों का सहारा ले सकते हैं.
और, मैं ये कोई नई व्यवस्था नहीं बता रहा हूँ बल्कि ऐसा पहले भी ऐसा हो चुका है.
आज गणेश महोत्सव महाराष्ट्र का सबसे बड़ा त्योहार है.
लेकिन, ये त्योहार हमेशा से महाराष्ट्र के घर घर तक लोकप्रिय नहीं था.
बल्कि, बालगंगाधर तिलक ने इसे लोकप्रिय बनाया था ताकि इस पूजा के बहाने लोग एक जगह एकत्रित हों और सामाजिक चर्चा हो.
जिससे, अंग्रेजों के विरुद्ध लामबंद हुआ जा सके…!
और , उनकी ये युक्ति काम कर गई.
सिर्फ… बालगंगाधर तिलक ने ही नहीं….
बल्कि , नवरात्र में होने वाले डांडिया, गरबा आदि का भी कॉन्सेप्ट हमलोग जानते ही हैं कि ये शुरू कैसे हुआ होगा.
और, ये बताने की आवश्यकता नहीं है कि नवरात्र में हमलोग माँ भगवती की पूजा करते हैं तथा दुर्गापूजा का ये त्योहार पूरे भारत में हर्षोउल्लास से मनाया जाता है.
तो, जब हम माँ दुर्गा की प्रतिमा को देखते हैं तो हर प्रतिमा में वो महिषासुर का वध करते हुए दिखाई जाती है..
तथा, उनके एक हाथ में… त्रिशूल, दूसरे में भाला, तीसरे में तलवार, चौथे में खड़ग आदि रहता है.
तो, क्यों न…. नवरात्र में हर हिनू परिवार के लिए एक तलवार, भाला, खड़ग अथवा त्रिशूल खरीदना अनिवार्य कर दिया जाए…
(अनिवार्य लंबाई दो से तीन फीट रखी जाए)
और, सामान्य रूप से समझा दिया जाए कि…..
चूँकि… त्रिशूल, भाला, खड़ग और तलवार आदि अस्त्र माँ दुर्गा धारण करती हैं.
इसीलिए, दुर्गा पूजा में माँ दुर्गा के अस्त्रों को खरीदने से माँ दुर्गा प्रसन्न होती हैं.
(जिस तरह धनतेरस में झाड़ू एवं कोई बर्तन खरीदना अनिवार्य माना जाता है)
इस तरह… हम अपने त्योहार को एक सामाजिक क्रांति का रूप दे सकते हैं क्योंकि इससे हर हिनू परिवार के पास हर साल एक तलवार, भाला, खड़ग, त्रिशूल आदि जमा होते जाएंगे.
और, जब घर में अस्त्र होंगे और वे हर साल खरीदे जाएंगे तो स्वाभाविक तौर पर लोग उसे थोड़ा बहुत चलाना भी सीख ही जाएँगे.
इससे जरूरत के समय वे बिना किसी वाह्य सहायता के भी अपनी मदद खुद कर पाएँगे.
अर्थात…. शहर अथवा सड़क पर चाहे जितने भी कंकड़ पत्थर क्यों न मौजूद हों…
अगर पैरों में जूते चप्पल मौजूद रहेंगे तो फिर उसके चुभने के चांस बहुत कम हो जायेंगे.
आखिर, परंपराओं की शुरुआत ऐसे ही तो होती है.
कि, किसी वैज्ञानिक सोच के साथ उसे शुरू किया गया जो कालांतर में एक परंपरा और मान्यता बन गई.
जय महाकाल…!!!