
सूर्य मंदिर


जब यूनानी आक्रमणकारी सेल्यूकस सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य से हार गया और उसकी सेना बंदी बना ली गयी तब उसने अपनी अतिसुंदर पुत्री हेलेन के विवाह का प्रस्ताव सम्राट चन्द्रगुप्त के पास भेजा।
हेलेन, सेल्यूकस की सबसे छोटी अतिसुंदर पुत्री थी। उसके विवाह का प्रस्ताव मिलने पर आचार्य चाणक्य ने सम्राट चन्द्रगुप्त से उसका विवाह कराया था।
पर उन्होंने विवाह से पहले हेलेन और चन्द्रगुप्त से कुछ शर्ते रखीं थीं, जिस पर ही उन दोनों का विवाह हुआ था।
पहली शर्त यह थी कि उन दोनों के संसर्ग से उत्पन्न संतान उनके राज्य की उत्तराधिकारी नहीं होगी! और कारण बताया कि हेलेन एक विदेशी महिला है, भारत के पूर्वजों से उसका कोई नाता नहीं है। भारतीय संस्कृति से हेलेन पूर्णतः अनभिज्ञ है।
दूसरा कारण बताया की हेलेन विदेशी शत्रुओं की बेटी है। उसकी निष्ठा कभी भी भारत के साथ नहीं हो सकती।
तीसरा कारण बताया की हेलेन का बेटा विदेशी माँ का पुत्र होने के नाते उसके प्रभाव से कभी मुक्त नहीं हो पायेगा और भारतीय माटी, भारतीय लोगों के प्रति कभी भी पूर्ण निष्ठावान नहीं हो पायेगा।
एक और शर्त आचार्य चाणक्य ने हेलेन के सामने रखी थी, कि वह कभी भी चन्द्रगुप्त के राज्यकार्य में हस्तक्षेप नहीं करेगी और राजनीति और प्रशासनिक अधिकार से पूर्णतया विरत रहेगी।
परन्तु गृहस्थ जीवन में हेलेन का पूर्ण अधिकार होगा।
विचार कीजिए … भारत ही नहीं विश्वभर में आचार्य चाणक्य जैसा कूटनीतिज्ञ और महान नीतिकार राजनीतिज्ञ आज तक कोई दूसरा नहीं हुआ।
किन्तु दुर्भाग्य देखिए! आज देश को वर्तमान में एक ऐसी ही महिला का पुत्र प्राप्त हुआ है, जो कभी भी भारत और भारतीय नागरिकों के हितों की चिन्ता नहीं करता, विदेशों में जाकर सदैव भारत एवं भारतीयों के विरुद्ध निरन्तर विषवमन करता रहता है। यह सब आपके सामने है, मेरा सङ्केत सम्भवतः आप समझ ही गये होंगे …
जय श्री राम।
— ज्योतिर्विद पं॰ मनीष तिवारी
अमरनाथ की खोज किसी मुस्लिम ने नहीं की
पैगंबर मोहम्मद का जब जन्म भी नहीं हुआ था, तब से ही अमरनाथ गुफा में हो रही है पूजा-अर्चना। इसलिए इस झूठ को नकारिए कि अमरनाथ गुफा की खोज एक मुसलिम ने की।
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यहाँ प्रस्तुत है अमरनाथ का सच्चा इतिहास। कृपया अपने बच्चों को ये अवश्य बताइये।
बाबा बर्फानी के दर्शन के साथ ही अमरनाथ यात्रा शुरू हो जाती है।
इसके बारे में सेक्युलरिज्म के झंडबदारों ने गलत इतिहास गढ़ा है कि इस गुफा को १८५० में एक मुसलिम बूटा मलिक ने खोजा था।
पिछले साल तो पत्रकारिता का गोयनका अवार्ड घोषित करने वाले इंडियन एक्सप्रेस ने एक लेख लिखकर इस झूठ को जोर-शोर से प्रचारित किया था।
जबकि इतिहास में दर्ज है कि जब इसलाम इस धरती पर मौजूद भी नहीं था, यानी इसलाम पैगंबर मोहम्मद पर कुरान उतरना तो छोडि़ए, उनका जन्म भी नहीं हुआ था, तब से अमरनाथ की गुफा में सनातन संस्कृति के अनुयायी बाबा बर्फानी की पूजा-अर्चना कर रहे हैं।
कश्मीर के इतिहास पर कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ और नीलमत पुराण से सबसे अधिक प्रकाश पड़ता है।
श्रीनगर से १४१ किलोमीटर दूर ३८८८ मीटर की उंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा को तो भारतीय पुरातत्व विभाग ही पाँच हजार वर्ष प्राचीन मानता है।
यानी महाभारत काल से इस गुफा की मौजूदगी खुद भारतीय एजेंसियं मानती हैं।
लेकिन यह भारत का सेक्यूलरिज्म है, जो तथ्यों और इतिहास से नहीं, मार्क्सवादी-नेहरूवादियों के ‘धारणा’ से चलता है।
यही प्रयास व ‘धारणा’ अभी तक चली आ रही है।
🙏🏼🙏🏼🌺🌺🙏🏼 “राजतरंगिणी” में अमरनाथ
अमरनाथ की गुफा प्राकृतिक है न कि मानव निर्मित। इसलिए पांच हजार वर्ष की पुरातत्व विभाग की यह गणना भी कम ही पड़ती है, क्योंकि हिमालय के पहाड़ लाखों वर्ष पुराने माने जाते हैं।
यानी यह प्राकृतिक गुफा लाखों वर्ष से है। कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ में इसका उल्लेख है कि कश्मीर के राजा सामदीमत शैव थे और वह पहलगाम के वनों में स्थित बर्फ के शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने जाते थे।
ज्ञात हो कि बर्फ का शिवलिंग अमरनाथ को छोड़कर और कहीं नहीं है। यानी वामपंथी, जिस १८५० में अमरनाथ गुफा को खोजे जाने का कुतर्क गढ़ते हैं, इससे कई शताब्दी पूर्व कश्मीर के राजा खुद बाबा बर्फानी की पूजा कर रहे थे।
🙏🏼🙏🏼🌺🌺🌺🙏🏼🙏🏼 नीलमत पुराण और बृंगेश संहिता में अमरनाथ
नीलमत पुराण, बृंगेश संहिता में भी अमरनाथ तीर्थ का बारंबार उल्लेख मिलता है।
बृंगेश संहिता में लिखा है कि अमरनाथ की गुफा की ओर जाते समय अनंतनया (अनंतनाग), माच भवन (मट्टन), गणेशबल (गणेशपुर), मामलेश्वर (मामल), चंदनवाड़ी, सुशरामनगर (शेषनाग), पंचतरंगिरी (पंचतरणी) और अमरावती में यात्री धार्मिक अनुष्ठान करते थे।
वहीं छठी में लिखे गये नीलमत पुराण में अमरनाथ यात्रा का स्पष्ट उल्लेख है।
नीलमत पुराण में कश्मीर के इतिहास, भूगोल, लोककथाओं, धार्मिक अनुष्ठानों की विस्तृत रूप में जानकारी उपलब्ध है।
नीलमत पुराण में अमरेश्वरा के बारे में दिए गये वर्णन से पता चलता है कि छठी शताब्दी में लोग अमरनाथ यात्रा किया करते थे।
नीलमत पुराण में तब अमरनाथ यात्रा का जिक्र है जब इस्लामी पैगंबर मोहम्मद का जन्म भी नहीं हुआ था।
तो फिर किस तरह से बूटा मलिक नामक एक मुसलमान गड़रिया अमरनाथ गुफा की खोज कर कर सकता है?
ब्रिटिशर्स, मार्क्सवादी और नेहरूवादी इतिहासकार का पूरा जोर इस बात को साबित करने में है कि कश्मीर में मुसलमान हिंदुओं से पुराने वाशिंदे हैं।
इसलिए अमरनाथ की यात्रा को कुछ सौ साल पहले शुरु हुआ बताकर वहां मुसलिम अलगाववाद की एक तरह से स्थापना का प्रयास किया गया है!
🙏🏼🙏🏼🌺🌺🌺🌺🙏🏼🙏🏼 इतिहास में अमरनाथ गुफा का उल्लेख
अमित कुमार सिंह द्वारा लिखित ‘अमरनाथ यात्रा’ नामक पुस्तक के अनुसार, पुराण में अमरगंगा का भी उल्लेख है, जो सिंधु नदी की एक सहायक नदी थी।
अमरनाथ गुफा जाने के लिए इस नदी के पास से गुजरना पड़ता था। ऐसी मान्यता थी कि बाबा बर्फानी के दर्शन से पहले इस नदी की मिट्टी शरीर पर लगाने से सारे पाप धुल जाते हैं। शिव भक्त इस मिट्टी को अपने शरीर पर लगाते थे।
पुराण में वर्णित है कि अमरनाथ गुफा की उंचाई २५० फीट और चौड़ाई ५० फीट थी। इसी गुफा में बर्फ से बना एक विशाल शिवलिंग था, जिसे बाहर से ही देखा जा सकता था।
बर्नियर ट्रेवल्स में भी बर्नियर ने इस शिवलिंग का वर्णन किया है। विंसेट-ए-स्मिथ ने बर्नियर की पुस्तक के दूसरे संस्करण का संपादन करते हुए लिखा है कि अमरनाथ की गुफा आश्चर्यजनक है, जहां छत से पानी बूंद-बूंद टपकता रहता है और जमकर बर्फ के खंड का रूप ले लेता है।
हिन्दू इसी को शिव प्रतिमा के रूप में पूजते हैं। ‘राजतरंगिणी’ तृतीय खंड की पृष्ठ संख्या-४०९ के अनुसार डॉ. स्टेन का कहना है कि अमरनाथ गुफा में ७-८ फीट चौड़ा और २ फीट लंबा शिवलिंग है।
कल्हण की राजतरंगिणी द्वितीय के अनुसार ३४ ईसा पूर्व से १७वी ईस्वी तक सामदीमत वहाँ के शासक रहे। उनके बाबा बर्फानी के भक्त होने का भी उल्लेख है।
यही नहीं, जिस बूटा मलिक को १८५० में अमरनाथ गुफा का खोजकर्ता साबित किया जाता है, उससे करीब ४०० साल पूर्व कश्मीर में बादशाह जैनुलबुद्दीन का शासन १४२०-७० था।
उसने भी अमरनाथ की यात्रा की थी। इतिहासकार जोनराज ने इसका उल्लेख किया है।
१६ वीं शताब्दी में मुगल बादशाह अकबर के समय के इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी पुस्तक ‘आईने-अकबरी’ में में अमरनाथ का जिक्र एक पवित्र हिंदू तीर्थस्थल के रूप में किया है।
‘आईने-अकबरी’ में लिखा है- गुफा में बर्फ का एक बुलबुला बनता है। यह थोड़ा-थोड़ा करके १५ दिन तक रोजाना बढ़ता है और यह दो गज से अधिक उंचा हो जाता है।
चंद्रमा के घटने के साथ-साथ वह भी घटना शुरू हो जाता है और जब चांद लुप्त हो जाता है तो शिवलिंग भी विलुप्त हो जाता है।
वास्तव में कश्मीर घाटी पर विदेशी इस्लामी आक्रांता के हमले के बाद हिंदुओं को कश्मीर छोड़कर भागना पड़ा।
इसके कारण १४ वीं शताब्दी के मध्य से करीब ३०० साल तक यह यात्रा बाधित रही
यह यात्रा फिर से १८७२ में आरंभ हुई। इसी अवसर का लाभ उठाकर कुछ इतिहासकारों ने बूटा मलिक को १८५० में अमरनाथ गुफा का खोजकर्ता साबित कर दिया और इसे लगभग मान्यता के रूप में स्थापित कर दिया।
जनश्रुति भी लिख दी गई जिसमें बूटा मलिक को लेकर एक कहानी बुन दी गई कि उसे एक साधु मिला।
साधु ने बूटा को कोयले से भरा एक थैला दिया। घर पहुंच कर बूटा ने जब थैला खोला तो उसमें उसने चमकता हुआ हीरा पाया। वह वह खुश होकर धन्यवाद देने जब उस साधु के पास पहुंचा तो वहां साधु नहीं था बल्कि सामने अमरनाथ की गुफा थी।
आज भी अमरनाथ में जो चढ़ावा चढ़ाया जाता है उसका एक भाग बूटा मलिक के परिवार को दिया जाता है।
चढ़ावा देना तो अनुचित है ही, झूठ के बल पर इसे दशक-दर-दशक स्थापित करने के प्रयास भी असहनीय हैं।
पर मुसलमान उसमें बहुत हद तक सफल हो चुके हैं। आज भी किसी हिन्दू से पूछिए, वह नीलमत पुराण का नाम नहीं बताएगा।
लेकिन एक मुस्लिम गडरिए ने अमरनाथ गुफा की खोज की, तुरंत इस असत्य इतिहास पर बात करने लगेगा। यही असत्य विमर्श दुःखदायी है।
पर अंग्रेज-मार्क्सवादी-नेहरूवादी इतिहासकार अभी तक तो इसमें सफल ही रहे हैं।
हर हर महादेव

कानपुर का मंदिर एकदम सटीक भविष्यवाणी करता आया है. यही कारण है कि इसे मौसम मंदिर भी कहा जाता है. कानपुर के घाटमपुर स्थित 4000 साल पुराने जगन्नाथ मंदिर की जहां मौसम की भविष्यवाणी होती है. यहां पर मौसम वैज्ञानिक नहीं बल्कि मंदिर से जुड़े लोग भविष्यवाणी करते हैं कि इस साल कैसी और कितनी बारिश होगी? श्रद्धालुओं के अनुसार इस मंदिर के गुंबद से निकली पानी की बूंदे तय करती है कि कानपुर और आसपास मौसम और मानसून का प्रभाव कैसा रहने वाला है.
मुगलों से गया था छिपाया
इतिहास की किताबों में बाबर से लेकर औरंगजेब तक अयोध्या, मथुरा और वाराणसी के मंदिरों के विध्वंस की जो सच्चाई लिखी गई हैं वो बताती हैं कि मुगल बादशाह किस तरह क्रूर होने के साथ हिंदुओं से नफरत करते थे. मुगलों ने अपनी फौज के जरिए कैसे मंदिरों को लूटा, तोड़ा और तहस-नहस किया ये बात तो सब जानते हैं. लेकिन मौसम की भविष्यवाणी करने वाले इस मंदिर को मुगलों से छिपा लिया गया था, ताकि उसे बचाया जा सके. कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर एक जगह है बेहटा बुजुर्ग. जहां पर बना ये अति प्राचीन जगन्नाथजी का मंदिर सदियों से मौसम की भविष्यवाणी करता आया है.
कैसे होती है मंदिर से मौसम की भविष्यवाणी?
मानसून के 10 से 15 दिन पहले मंदिर के गुंबद से पानी की बूंदे ज्यादा होने का मतलब होता है की बारिश शानदार होगी. यदि मंदिर का गुंबद सूखा रहता है, तो इसका मतलब बारिश नहीं होगी. बूंदों की संख्या कम होने का अर्थ होता है, कि बारिश बहुत कम होगी. सिर्फ कानपुर ही नहीं बल्कि आसपास के कई गांव के लोग जगन्नाथ मंदिर में बारिश से पहले निकलने वाली बूंदों का इंतजार करते हैं. भगवान से कामना करते हैं की अच्छी बारिश के संकेत मिले.
‘मंदिर का रहस्य विज्ञान की समझ से परे’
मंदिर से मिलने वाले संकेत ऐसे रहते हैं जो आज तक कभी भी गलत साबित नही हुए हैं. भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) के संरक्षित स्मारकों में शामिल ये मंदिर देश भर के वैज्ञानिकों के लिए रहस्य का विषय बना हुआ है. मंदिर के पुजारी बताते हैं कि अगर भगवान की छतरी यानी मंदिर का गुम्बद सूखा है तो बारिश का टोटा होगा. लेकिन अगर बूंदों की संख्या ज्यादा दिख रही है तो ये साफ हो जाएगा कि इस साल बारिश अच्छी होने वाली है. कई बार यहां पर वैज्ञानिक रिसर्च के लिए आ चुके हैं.
वो बड़े इत्मीनान से गुरु के सामने खड़ा था। गुरु अपनी पारखी नजर से उसका परीक्षण कर रहे थे। नौ दस साल का छोकरा। बच्चा ही समझो। उसे बाया हाथ नहीं था। किसी बैल से लड़ाई में टूट गया था।
“तुझे क्या चाहिए मुझसे?” गुरु ने उस बच्चे से पूछा।
उस बच्चे ने गला साफ किया। हिम्मत जुटाई और कहा, ” मुझे आप से कुश्ती सीखनी है।
एक हाथ नहीं और कुश्ती लड़नी है ? अजीब बात है।
” क्यू ?”
“स्कूल में बाकी लड़के सताते है मुझे और मेरी बहन को। टुंडा कहते है मुझे। हर किसी की दया की नजर ने मेरा जीना हराम कर दिया है गुरुजी। मुझे अपनी हिम्मत पे जीना है। किसी की दया नहीं चाहिए। मुझे खुद की और मेरे परिवार की रक्षा करती आनी चाहिए।”
“ठीक बात। पर अब मै बूढ़ा हो चुका हूं और किसी को नहीं सिखाता। तुझे किसने भेजा मेरे पास?”
“कई शिक्षकों के पास गया मै। कोई भी मुझे सिखाने तैयार नहीं। एक बड़े शिक्षक ने आपका नाम बताया। तुझे वो ही सीखा सकते है क्यों की उनके पास वक्त ही वक्त है और कोई सीखने वाला भी नहीं है ऐसा बोले वो मुझे।”
वो गुरूर से भरा जवाब किसने दिया होगा ये उस्ताद समझ गए। ऐसे अहंकारी लोगो की वजह से ही खल प्रवृत्ति के लोग इस खेल में आ गए ये बात उस्ताद जानते थे।
“ठीक है। कल सुबह पौ फटने से पहले अखाड़े में पहुंच जा। मुझ से सीखना आसान नहीं है ये पहले है बोल देता हूं। कुश्ती ये एक जानलेवा खेल है। इसका इस्तेमाल अपनी रक्षा के लिए करना। मै जो सिखाऊ उसपर पूरा भरोसा रखना। और इस खेल का नशा चढ़ जाता है आदमी को। तो सिर ठंडा रखना। समझा?”
“जी उस्ताद। समझ गया। आपकी हर बात का पालन करूंगा। मुझे आपका चेला बना लीजिए।” मन की मुराद पूरी हो जाने के आंसू उस बच्चे की आंखो में छलक गए। उसने गुरु के पांव छू कर आशीष लिया।
” अपने एक ही चेले को सिखाना उस्ताद ने शुरू किया। मिट्टी रोंदी, मुगदुल से धूल झटकायी और इस एक हाथ के बच्चे को कैसे विद्या देनी है इसका सोचते सोचते उस्ताद की आंख लग गई।
एक ही दांव उस्ताद ने उसे सिखाया और रोज़ उसकी ही तालीम बच्चे से करवाते रहे। छह महीने तक रोज बस एक ही दाव। एक दिन चेले ने उस्ताद के जन्मदिन पर पांव दबाते हुए हौले से बात को छेड़ा।
“गुरुजी, छह महीने बीत गए, इस दांव की बारीकियां अच्छे से समझ गया हूं और कुछ नए दांव पेंच भी सिखाइए ना। “
उस्ताद वहा से उठ के चल दिए। बच्चा परेशान हो गया कि गुरु को उसने नाराज़ कर दिया।
फिर उस्ताद के बात पर भरोसा कर के वो सीखते रहा। उसने कभी नहीं पूछा कि और कुछ सीखना है।
गांव में कुश्ती की प्रतियोगिता आयोजित की गई। बड़े बड़े इनाम थे उसमे। हरेक अखाड़े के चुने हुए पहलवान प्रतियोगिता में शिरकत करने आए। उस्ताद ने चेले को बुलाया। “कल सुबह बैल जोत के रख गाड़ी को। पास के गांव जाना है। सुबह कुश्ती लड़नी है तुझे।”
पहली दो कुश्ती इस बिना हाथ के बच्चे ने यूं जीत लिए। जिस घोड़े के आखरी आने की उम्मीद हो और वो रेस जीत जाए तो रंग उतरता है वैसा सारे विरोधी उस्तादों का मुंह उतर गया। देखने वाले अचरज में पड़ गए। बिना हाथ का बच्चा कुश्ती में जीत ही कैसे सकता है? कौन सिखाया इसे?”
अब तीसरे कुश्ती में सामने वाला खिलाड़ी नौसिखुआ नहीं था। पुराना जांबाज़। पर अपने साफ सुथरे हथकंडों से और दांव का सही तोड़ देने से ये कुश्ती भी बच्चा जीत गया।
अब इस बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ गया। पूरा मैदान भी अब उसके साथ हो गया था। मै भी जीत सकता हूं ये भावना उसे मजबूत बना रही थी।
देखते ही देखते वो अंतिम बाज़ी तक पहुंच गया।
जिस अखाड़े वाले ने उस बच्चे को इस बूढ़े उस्ताद के पास भेजा था, उस अहंकारी पहलवान का चेला ही इस बच्चे का आखरी कुश्ती में प्रतिस्पर्धी था।
ये पहलवान सरीखे उम्र का होने के बावजूद शक्ति और अनुभव से इस बच्चे से श्रेष्ठ था। कई मैदान मार लिए थे उसने। इस बच्चे को वो मिनटों में चित कर देगा ये स्पष्ट था। पंचों ने राय मशवरा किया।
” ये कुश्ती लेना सही नहीं होगा। कुश्ती बराबरी वालो में होती है। ये कुश्ती मानवता और समानता के अनुसार रद्द किया जाता है। इनाम दोनों में बराबरी से बांटा जाएगा।” पंचों ने अपना मंतव्य प्रकट किया।
“मै इस कल के छोकरे से कई ज्यादा अनुभवी हूं और ताकतवर भी। मै ही ये कुश्ती जीतूंगा ये बात सोलह आने सच है। तो इस कुश्ती का विजेता मुझे बनाया जाए।” वंहा प्रतिस्पर्धी अहंकार में बोला।
“मै नया हूं और बड़े भैया से अनुभव में छोटा भी। मेरे उस्ताद ने मुझे ईमानदारी से खेलना सिखाया है। बिना खेले जीत जाना मेरे उस्ताद की तौहीन है। मुझे खेल कर मेरे हक का जो है उसे दीजिए। मुझे ये भीख नहीं चाहिये।” उस बांके जवान की स्वाभिमान भरी बात सुन कर जनता ने तालियों की बौछार कर दी।
ऐसी बाते सुनने को अच्छी पर नुकसान देय होती। पंच हतोत्साहित हो गए। कुछ कम ज्यादा ही गया तो? पहले ही एक हाथ खो चुका है अपना और कुछ नुकसान ना हो जाए? मूर्ख कही का!
लड़ाई शुरू हुई।
और सभी उपस्थित अचंभित रह गए। सफाई से किए हुए वार और मौके की तलाश में बच्चे ने फेंका हुआ दांव उस बलाढ्य प्रतिस्पर्धी को झेलते नहीं बना। वो मैदान के बाहर औंधे मुंह पड़ा था। कम से कम परिश्रम में उस नौसिखुए स्पर्धक ने उस पुराने महारथी को धूल चटा दी थी।
अखाड़े में पहुंच कर चेले ने अपना मेडल निकाल के उस्ताद के पैरो में रख दिया। अपना सिर उस्ताद के पैरो की धूल माथे लगा कर मिट्टी से सना लिया।
“उस्ताद, एक बात पूछनी थी। “
“पूछ।”
“मुझे सिर्फ एक ही दांव आता है। फिर भी मै कैसे जीता?”
“तू दो दांव सीख चुका था। इस लिए जीत गया।”
“कौनसे दो दांव उस्ताद?”
पहली बात, तू ये दांव इतनी अच्छी तरह से सीख चुका था के उसमे गलती होने की गुंजाइश ही नहीं थी। तुझे नींद में भी लड़ाता तब भी तू इस दांव में गलती नहीं करता। तुझे ये दांव आता है ये बात तेरा प्रतिद्वंदी जान चुका था, पर तुझे सिर्फ यही दांव आता है ये बात थोड़ी उसे मालूम थी?”
“और दूसरी बात क्या थी उस्ताद? “
“दूसरी बात ज्यादा महत्व रखती है। हरेक दांव का एक प्रतीदांव होता है! ऐसा कोई दाव नहीं है जिसका तोड़ ना हो। वैसे ही इस दांव का भी एक तोड़ था।”
“तो क्या मेरे प्रतिस्पर्धी को वो दांव मालूम नहीं होगा?”
” वो उसे मालूम था। पर वो कुछ नहीं कर सका। जानते हो क्यू?… क्यूंकि उस तोड़ में दांव देने वाले का बाया हाथ पकड़ना पड़ता है!”
अब आपके समझ में आया होगा कि एक बिना हाथ का साधारण सा लड़का विजेता कैसे बना?
जिस बात को हम अपनी कमजोरी समझते है, उसी को जो हमारी शक्ति बना कर जीना सिखाता है, विजयी बनाता है, वो ही सच्चा उस्ताद है।
अंदर से हम कहीं ना कहीं कमजोर होते है, दिव्यांग होते है। उस कमजोरी को मात दे कर जीने की कला सिखाने वाला गुरु हमे चाहिए।
Indraprastha Recent Findings:
इंद्रप्रस्थ की महत्वपूर्ण खोज:
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भारतवर्ष अपनी विशाल संपदा को लिए दिल्ली में सो रही है। दुर्भाग्य से इस महान देश के साथ विश्वासघात की गई । दिल्ली को मुगलों के साथ जोड़ने में अधिक रुचि दिखाई गई। मुगल और इस्लाम के जन्म के अनेक हजार वर्ष पूर्व दिल्ली में महाभारत काल की धमक रही है । इंद्रप्रस्थ में कुंती जी का मंदिर रो-रो कर अपनी प्राचीन अस्तित्व बता रही है । यह इंद्रप्रस्थ, वर्तमान यमुना नदी के किनारे स्थित पुरानी दिल्ली से लेकर वर्तमान पांडवानी किला ( पुरानी किला ) तक फैली थी। इसी बीच इंद्रप्रस्थ किला ( पुरानी किला ) स्थित मस्जिद के नीचे स्थल से त्रिमुख विष्णु-वराह देवता की भव्य प्रतिमा मिली है । विष्णु-वराह का यह स्वरूप हड़प्पा काल के वराह स्वरूप से जोड़ देती है । इस वराह विष्णु प्रतिमा के साथ वज्रासन में एकतरफ हनुमानजी और दूसरी तरफ गणेश जी उपस्थित हैं। मस्तक पर हड़प्पा की तरह ओंकार चिन्ह विद्यमान है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को अपने कार्य में गुणात्मक सुधार लानी होगी । इसी खोज में “पेंटेड ग्रे वेयर” काल की अत्यंत प्राचीन सामग्री इस विष्णु प्रतिमा के पास से मिली है । डा. बी बी लाल ने स्वीकार किया है की महाभारत काल के चीजों को छद्म रूप में कांग्रेस शासन काल में “पेंटेड ग्रे वेयर” कही गई है। वे महाभारत का समय कहने से अपने सेवा काल में बचते रहे । अपने अंतिम दिनों में उन्होंने स्थिति साफ की और “पेंटेड ग्रे वेयर” को महाभारत काल से जोड़ दिया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के कार्य करने की क्षमता में आज भी गुणात्मक सुधार नहीं हुई है । आर्य आक्रमण अवधारणा को सत्य मानते हुए डा.बी बी लाल ने जो समय महाभारत ( १२०० ईसवी पूर्व ) का अनुमान में रखा था, वही समय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने भी जल्दबाजी में रख दिया । यह विभ्रमित एजेंसी महाभारत का समय जानती ही नहीं तथा मस्तिष्क का प्रयोग करने में सर्वदा बचती रही है । अच्छा हो ये मात्र खुदाई करें और डेटिंग के लिए एक्सपर्ट की सेवा ली जाय तथा वैज्ञानिक तरीके अपनाएं जाएं। अनुमान का प्रयोग पुरातत्व विज्ञान में कम से कम न करें। द्वारका के डूबने की कार्बन डेटिंग जब ३१०० ईसवी पूर्व मिल रही है तब अनुमान के आधार पर इंद्रप्रस्थ के महाभारत काल को १२०० ईसवी पूर्व में रखना कहां तक न्यायोचित है ? यह दिमाग का दिवालियापन नहीं तो और क्या है ! अनुमान का ही प्रयोग रोमिला थापर , आर एस शर्मा , इरफान हबीब ने किया था ना ! जरा कल्पना कीजिए इन लोगों ने भारतवर्ष की क्या दुर्दशा कर दी ! अनुमान आधारित इनकी मार इतनी जबरदस्त है की भारतीय प्रजा अभी तक अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी नहीं कर पाई है !
#JPNadda #BhartiyaJantaParty #PMOIndia #GKishanReddy #MinistryOfCulture #DrJitendraSingh

#नाम_का_पंगा 🤣😂😂😂😁😁😁
जैसलमेर से बीकानेर बस रुट पर….
बीच में एक बड़ा सा गाँव है जिसका नाम है नाचने
वहाँ से बस आती है तो लोग कहते है कि
नाचने वाली बस आ गयी..😎
कंडक्टर भी बस रुकते ही चिल्लाता..
नाचने वाली सवारियाँ उतर जाएं बस आगे जाएगी..😎
इमरजेंसी में रॉ का एक नौजवान अधिकारी जैसलमेर आया
रात बहुत हो चुकी थी,
वह सीधा थाने पहुँचा और ड्यूटी पर तैनात सिपाही से पूछा –
थानेदार साहब कहाँ हैं ?
सिपाही ने जवाब दिया थानेदार साहब नाचने गये हैं..😎
अफसर का माथा ठनका उसने पूछा डिप्टी साहब कहाँ हैं..?
सिपाही ने विनम्रता से जवाब दिया-
हुकुम 🙏🏻 डिप्टीसाहब भी नाचने गये हैं..😎
अफसर को लगा सिपाही अफीम की पिन्नक में है, उसने एसपी के निवास पर फोन📞 किया।
एस.पी. साहब हैं ?
जवाब मिला नाचने गये हैं..!!
लेकिन नाचने कहाँ गए हैं, ये तो बताइए ?
बताया न नाचने गए हैं, सुबह तक आ जायेंगे।
कलेक्टर के घर फोन लगाया वहाँ भी यही जवाब मिला, साहब तो नाचने गये हैं..
अफसर का दिमाग खराब हो गया, ये हो क्या रहा है इस सीमावर्ती जिले में और वो भी इमरजेंसी में।
पास खड़ा मुंशी ध्यान से सुन रहा था तो वो बोला – हुकुम बात ऐसी है कि दिल्ली से आज कोई मिनिस्टर साहब नाचने आये हैं।
इसलिये सब अफसर लोग भी नाचने गये हैं..!!
इतिहास में हमें यह पढाया गया कि, G.T.Road का निर्माण शेरशाह सूरी ने करावाया था!
परन्तु सच्चाई तो यह है कि, यह मार्ग जो, टेकनाफ (बांग्लादेश) से काबुल तक जाती है, जिसकी लंबाई 2, 400 किलोमीटर है, मौर्यकाल से ही अस्तित्व में है, जिसे उस समय “उत्तरापथ” के नाम से जाना जाता था।
यदि शेरशाह अपने 5 साल के शासनकाल में लगातार केवल इस सड़क का ही निर्माण कराता, तब भी इतनी लम्बी सड़क का निर्माण नहीं करा सकता था।
तो क्या ये वामपंथी इतिहासकारों के दिमाग की सनक, उपज है!
जिन्ना इसी मार्ग को पाकिस्तान में मिलाना चाहता था, और गाँधी करीब-करीब तैयार भी थे!
– Harish Ray

ચંદ્રકાન્ત બક્ષી
૫૦ થી ૬૦ વર્ષ પછીની જીંદગી ની વાસ્તવિકતા…
પત્નિની પતિને સુધારવાની જીદ ચરમસીમાએ હોય છે.
તેમાંય જો બાળકો મોટા થઈ ગયા હોય, પતિ પત્નિ એકલાં રહેતા હોય તો ભોગ મર્યા…
આ કોઈ એકલાનો પ્રશ્ન નથી…
સમગ્ર સમાજને લાગુ પડે છે…
સવાર પડે ને…
ઉઠો મારે ચાદર ખંખેરવી છે, વહેલા ઉઠવાનું રાખો.
બ્રશ કરતી વખતે સિંન્કનો નળ ધીમો રાખો, નીચે ટાઈલ્સ પર છાંટા ઉડે છે.
ટોયલેટમાંથી નીકળીને પગ લુછણીંયા પર પગ લુંછો. તમે આખા ઘરમાં રામદેવ પીરના ઘોડા જેવા પગલાં પાડો ને સાફ મારે કરવા પડે.
પોતું કરેલું છે, ગેલેરીમાં ના જતા વરસાદના છાંટા પડેલા છે, પાછા પગ ભીના લઈને રૂમમાં આવસો.
દાઢી કરીને બ્રસ ધોઈને ડબ્બામાં મુકો.
નાહવા જાવ એટલે ચડ્ડીબંડ્ડી ડોલમાં નાખજો.
નીકળીને રુમાલ બહાર તાર પર સુકવો.
માથામાં નાંખવાના તેલની બોટલ બંધ કરીને મુકતાં કીડીઓ ચટકે છે.
હજાર વાર કહ્યું આ ભુરો મોટો કાંસકો નહી લેવાનો એ ગુંચ કાઢવા માટે છે.
ધરે હો ત્યારે આ જાડી ટીશર્ટ ના પહેરતા હોય તો.
આ ચાની મલાઈ રકાબીની ધારે ન ચોંટાડતા હોય તો.
ફોન પર વાત કરતાં કરતાં ગેલેરીમાં શું કામ જતા રહો છો, ગામને સંભળાવવાનું છે.
મોબાઈલ જ મંતરવાનો હોય તો ટીવી શું કામ ચાલુ કરો છો.
છેલ્લી વાર કહું છું, ચલો જમવા,
પંખો બંન્ધ કરીને આવજો.
તોડેલી રોટલી પતે પછી જ બીજી તોડતા હોવતો.
જો ફરી પાછું, કેટલી વાર કહ્યું, લેંઘાએ હાથના લુંછો.
કાગળીયું ડસ્ટબીનમાં નાંખો, હાચું કહીયે તો મિસ્ટર બીન જેવું મો કેમ થઈ જાય છે.
જમ્યા પછી તરત આડા ના પડો.
સીંગ ચણાના ફોતરા તરત કચરાપેટી માં નાખો, આખા ઘરમાં ઉડે છે.
દીવાલે ટેકો દઈ ન બેસો તેલના અને ડાઈના ડાઘ પડે છે.
સવારે તો પેપર દોઢ કલાક વાંચેલું, હવે એ ઓનલાઈન થોડું છે તે બદલાઈ જાય.
પેપર વાળીને ટીપોઈ પર મુકતા હોતો.
હજી તો અડધો જ દિવસ પત્યો છે, અને આટલાં બધાં સુચનો !
આ સતત રણકતો રેડીયો એટલે જીવન સંગીત !!!
પણ મિત્રો આ રેડીઓ ની મીઠાસ એટલી મધુર છે કે જો એ ચૂપ થઈ જાય ને તો જીવન થઁભી જ જાય…
નાની ઉંમરે આ બધા છણકા ભણકા પતિ પત્ની માં થી કોઈ ને ના ગમે અને ઝગડો જ કરાવે પણ રિટાયર્ડ થયાં પછી જો આવા છણકા ભણકા ના હોય અને શાંત જીવન જીવતા હોય તો રોબોટ જેવિ જિંદગી લાગે અને જીવન નો સાચો આનંદ વિસરાય જ જાય !!!
*🙏તમામ સીનીયર સીટીઝન દંપતી ને સમર્પિત🙏*
ચંદ્રકાન્ત બક્ષી