Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

गर्मी की छुट्टी में कही कोई *समर कैंप* नहीं होते थे,‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬


गर्मी की छुट्टी में कही कोई समर कैंप नहीं होते थे,‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬
पुरानी चादर से छत के कोने पर ही टेंट बना लेते थे ,
क्या ज़माना था जब ऊंगली से लकीर खींच बंटवारा हो जाता था,
लोटा पानी खेल कर ही घर परिवार की परिभाषा सीख लेते थे।
मामा , मासी , बुआ, चाचा के बच्चे सब सगे भाई लगते थे, कज़िन क्या बला होती है कुछ पता नही था।
घर छोटा ही सही पर प्यार से गुजारा हो जाता था.

कंचे, गोटियों, इमली के चियो से खजाने भरे जाते थे,
कान की गर्मी से वज़ीर , चोर पकड़ लाते थे,
सांप सीढ़ी गिरना और संभलना सिखलाता था,
कैरम घर की रानी की अहमियत बतलाता था,
घर छोटा ही सही पर प्यार से गुजारा हो जाता था.

पुरानी पोलिश की डिब्बी तराजू बन जाती थी ,
नीम की निंबोली आम बनकर बिकती थी ,
बिना किसी ज़द्दोज़हद के नाप तोल सीख लेते थे ,
साथ साथ छोटों को भी हिसाब -किताब सिखा देते थे ,
माचिस की डिब्बी से सोफा सेट बनाया जाता था ,
पुराने बल्ब में मनीप्लान्ट भी सजाया जाता था ,
घर छोटा ही सही पर प्यार से गुजारा हो जाता था.

कापी के खाली पन्नों से रफ बुक बनाई जाती थी,
बची हुई कतरन से गुडिया सजाई जाती थी ,
रात में दादी-नानी से भूत की कहानी सुनते थे , फिर
डर भगाने के लिये हनुमान चालीसा पढते थे,
स्लो मोशन सीन करने की कोशिश करते थे ,
सरकस के जोकर की भी नकल उतारते थे ,
सीक्रेट कोड ताली और सीटी से बनाया जाता था ,
घर छोटा ही सही पर प्यार से गुजारा हो जाता था.

कोयल की आवाज निकाल कर उसे चिढ़ाते थे,
घोंसले में अंडे देखने पेड पर चढ जाते थे ,
गरमी की छुट्टी में हम बड़ा मजा करते थे ,
बिना होलिडे होमवर्क के भी काफी कुछ सीख लेते थे ,
शाम को साथ बैठ कर हमलोग देखा जाता था ,
घर छोटा ही सही पर प्यार से गुजारा हो जाता था……

जैसा भी था मेरा – तेरा बचपन बहुत हसीन था।

यादे कल की , बीते पल की.🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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Photo from Harshad Ashodiya


सोचो गुलाम भारत मे सबसे बड़ा नेता कोन था

Posted in संस्कृत साहित्य

🙏🏽जय श्री कृष्ण

हम लोग हवेली में या मंदिर में दर्शन करने जाते हैं,। दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पैड़ी पर या चोकी पर थोड़ी देर बैठते हैं। इस परंपरा का कारण क्या है ?

अभी तो हमलोग वहां बैठकर अपने घर की, व्यापार की, राजनीति की चर्चा करते हैं। परंतु यह परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई है।

वास्तव में वहां मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर के और एक श्लोक बोलना चाहिए ।यह श्लोक हम भूल गए हैं। इस श्लोक को सुने और याद करें ।और आने वाली पीढ़ी को भी इसे बता कर जाएं।

श्लोक इस प्रकार है

अनायासेन मरणम ,बिना दैन्येन जीवनम ।
देहान्ते तव सानिध्यम ,देहिमे परमेश्वरम।।
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

जब हम मंदिर में दर्शन करने जाएं तो खुली आंखों से ठाकुर जी का दर्शन करें । कुछ लोग वहां नेत्र बंद करके खड़े रहते हैं ।आंखें बंद क्यों करना ।हम तो दर्शन करने आए हैं ।ठाकुर जी के स्वरूप का ,श्री चरणों, का मुखारविंद का ,श्रंगार का संपूर्ण आनंद लें । आंखों में भर लें इस स्वरूप को । दर्शन करें और दर्शन करने के बाद जब बाहर आकर बैठें तब नेत्र बंद करके ,जो दर्शन किए हैं,उस स्वरूप का ध्यान करें!मंदिर में नैत्र बन्द नही करना, बाहर आने के बाद पैड़ी पर बैठकर जब ठाकुर जी का ध्यान करें तब नेत्र बंद करें, और अगर ठाकुर जी का स्वरूप ध्यान में नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और दुबारा श्री ठाकुर जी
के दर्शन करे🙏🏽

हम प्रार्थना करते हैं।
प्रार्थना का विशेष अर्थ है ।
प्र अर्थात विशिष्ट, श्रेष्ठ!
अर्थना अर्थात निवेदन।
ठाकुर जी से प्रार्थना करें!
और प्रार्थना क्या करनी है|

उपरोक्त श्लोक बोलना है।

श्लोक का अर्थ है

“अनायासेना मरणम” अर्थात बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो, बीमार होकर बिस्तर पर पड़े पड़े ,कष्ट उठाकर मृत्यु नहीं चाहिए ।चलते चलते ही श्री जी शरण हो जाएं।

” बिना दैन्येन जीवनम “ अर्थात परवशता का जीवन न हो। किसी के सहारे न रहना पड़े ,।जैसे लकवा हो जाता है ,और दूसरे व्यक्ति पर आश्रित हो जाता है ।वैसे परवश, बेबस न हों। ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख मांगे जीवन बसर हो सके।

” देहान्ते तव सानिध्यम “ अर्थात जब मृत्यु हो तब ठाकुर जी सन्मुख खड़े हो। जब प्राण तन से निकले , आप सामने खड़े हों। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर जी उनके सम्मुख जाकर खड़े हो गए । उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले।

यह प्रार्थना करें । गाड़ी ,लाड़ी ,लड़का, लड़की पति, पत्नी ,घर ,धन यह मांगना नहीं ।यह तो ठाकुर जी आपकी पात्रता के हिसाब से खुद आपको दे देते हैं ।
तो दर्शन करने के बाद बाहर बैठकर यह प्रार्थना अवश्य पढ़ें ।

🙏🏽जय श्री कृष्ण

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कैसे गांधी जी ने एक श्लोक और एक भजन को बदला देखें‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬

भारत में महाभारत का एक श्लोक अधूरा पढाया जाता है क्यों ??
शायद गांधी जी की वजह से।
“अहिंसा परमो धर्मः”
जबकि पूर्ण श्लोक इस तरह से है:-

“अहिंसा परमो धर्मः,धर्महिंसा तदैव च l

अर्थात – अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है
और धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना उस से भी श्रेष्ठ है..🕉

#गांधी #जी ने सिर्फ इस ☝☝#श्लोक को ही नही बल्कि उसके अलावा भी उन्होंने एक प्रशिद्ध भजन को बदल दिया

-‘रघुपति राघव राजा राम’ इस प्रसिद्ध-भजन का नाम है.
.”राम-धुन” .
जो कि बेहद लोकप्रिय भजन था.. गाँधी ने बड़ी चालाकी से इसमें परिवर्तन करते हुए
अल्लाह
शब्द जोड़ दिया..
आप भी नीचे देख लीजिए..
असली भजन और गाँधी द्वारा बेहद चालाकी से किया गया परिवर्तन..
गाँधी का भजन
रघुपति राघव राजाराम,
पतित पावन सीताराम
सीताराम सीताराम,
भज प्यारे तू सीताराम
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम,
सब को सन्मति दे भगवान…

** असली राम धुन भजन **
रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम
सुंदर विग्रह मेघश्याम
गंगा तुलसी शालग्राम
भद्रगिरीश्वर सीताराम
भगत-जनप्रिय सीताराम
जानकीरमणा सीताराम
जयजय राघव सीताराम
और बड़े-बड़े पंडित तथा वक्ता भी सब जगह गाते हैं यहां तक कि मंदिरो में भी उन्हें रोके कौन?
-अब सवाल ये उठता है कि गाँधी जी को ये अधिकार किसने दिया की,.. हमारे ‘श्रीराम को सुमिरन’ करने के भजन में ही अल्लाह को घुसा दे..
(अल्लाह का हमसे क्या संबंध?)
-इस भजन को जिन्होंने बनाया था उनका नाम था लक्ष्मणाचार्य
ये भजन
“श्री नमः रामनायनम”
नामक हिन्दू-ग्रन्थ से लिया गयाहै
परन्तु
मोहनदास-गाँधी ने इसमें किसकी आज्ञा से मिलावट की,
क्या उसने ‘लक्ष्मणाचार्यजी’ से अनुमति ली!
कोई भी हमारे धर्मग्रंथोंऔर पूजा पद्धिति भजनों में मिलावट करने का अधिकार रखता है?

हम आप लोगों से निवेदन करेंगे कि, गाँधी के इस मिलावट वाले भजन को तुरंत हटाएं और असली-भजन को गाएँ

आप इस मूव रामधुन भजन का अपमान बिलकुल भी न करें,
पोस्ट शेयर जरूर करें ताकि लोग जागरूक हो सकें। धन्यवाद

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एक आदमी की कार पार्किंग से चोरी हो गयी। दो दिन बाद देखा तो कार वापस उसी जगह पार्किंग में ही खड़ी थी।

अंदर एक लिफाफा था उसमे एक माफीनामा था…

“माँ की तबियत अचानक बिगड़ जाने से रातों रात बड़े अस्पताल लेकर जाना आवश्यक था।

लेकिन इतनी रात में और छुट्टियों के सीजन में गाडी मिली नहीं इसी वजह से आपकी गाड़ी को उपयोग में लेना पड़ा।

आपको तकलीफ देने के लिये खेद है….गाडी में जितना पेट्रोल था उतना ही है। उसका लाक भी ठीक करा दिया है |

आपको गाड़ी की मदद के एवज में कल रात “बाहुबली 2” सिनेमा की 5 टिकेट्स आपके परिवार के लिए कार में रखें हैं।

मुझे बड़े दिल के साथ माफ़ करिये ये विनती है आपसे..!!

चिट्ठी में स्टोरी ओरिजिनल लगने से और गाड़ी जैसी की तैसी वापस सही सलामत मिलने से परिवार शांत हो गया और दूसरे दिन “बाहुबली 2” देखने चला गया 4परिजन और एक मित्र; आखिर 6 लाख की गाड़ी वापस जो मिल गयी थी |

फिल्म देखकर रात को वापस लौटा तो घर का दरवाजा टूटा हुआ था। अंदर जाकर देखा तो सब कीमती सामान गायब था।
करीब 25-30 लाख की चोरी हो गयी थी |

बाहर टेबल पर एक लिफाफा था, जिसमे लिखा था,

“अब पता चला कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा..??”

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जम्मू-कश्मीर और लद्दाख होंगे देश के दो सबसे बड़े केंद्र शासित प्रदेश..

जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के केंद्र सरकार के प्रस्ताव के लागू होने पर क्षेत्रफल के लिहाज से जम्मू-कश्मीर के बाद लद्दाख देश का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र शासित प्रदेश होगा। जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के कई प्रावधानों को केंद्र सरकार द्वारा निष्प्रभावी घोषित किए जाने के साथ ही जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने संबंधी विधेयक को राज्यसभा में मंजूरी मिल गई। केंद्र शासित प्रदेश बनने के साथ ही अब जम्मू-कश्मीर में विधानसभा सीटों की संख्या भी बढ़कर 107 से 114 हो जाएगी।

लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश घोषित करने की मांग काफी समय से चल रही थी। केंद्र शासित प्रदेशों की फेहरिस्त में दो नए राज्य जुड़ने का मार्ग प्रशस्त होने के बाद अब केंद्र शासित प्रदेशों की संख्या 9 हो जाएगी। इनमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के अलावा दिल्ली, पुदुचेरी, दमन और दीव, दादर एवं नगर हवेली, चंडीगढ़, लक्षद्वीप और निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं।

मौजूदा समय में सिर्फ दिल्ली और पुदुचेरी में विधानसभा हैं, लेकिन अब जम्मू-कश्मीर भी विधानसभा वाला तीसरा केंद्र शासित प्रदेश हो जाएगा। विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों में केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में राज्यपाल की जगह उपराज्यपाल होते हैं। वहीं, केंद्र शासित प्रदेशों से संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के लिए सदस्य भी चुने जाते हैं। वह बात अलग है कि इनकी संख्या हर राज्य में अलग-अलग होती है। सांसदों की संख्या के लिहाज से दिल्ली नबंर एक पर है। संसद में दिल्ली का प्रतिनिधित्व 7 लोकसभा और 3 राज्यसभा सदस्य करते हैं।

संजय द्विवेदी

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कश्मीर के रक्षक ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह जामवाल

वो व्यक्ति जिसके कारण आज कश्मीर भारत का हिस्सा है।

—उड़ी सेक्टर में लड़ी गई उस जंग के सेनापति जिसे भारत का थर्मोपल्ली(300 फ़िल्म वाला) कहा जाता है जहां लियोनिडास ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह जामवाल थे जिनके नेतृत्व में 150 डोगरा राजपूत सैनिकों ने 10 हजार पाकिस्तानी कबाइली और सैनिकों को 4 दिन तक रोके रखा।—

22 अक्टूबर 1947 को महाराज हरिसिंह ने जब मुजफ्फराबाद पर पाक सेना के कब्जे और उनके मुस्लिम सैनिकों की बगावत की खबर सुनी तो उन्होंने खुद दुश्मन से मोर्चा लेने का फैसला करते हुए सैन्य वर्दी पहनकर ब्रिगेडियर राजेंद्रसिंह को बुलाया। सिंह ने महाराजा को मोर्चे से दूर रहने के लिए मनाते हुए खुद दुश्मन का आगे जाकर मुकाबला करने का निर्णय लिया।
महाराजा हरि सिंह ने ब्रिगेडियर को आखरी जवान और आखरी गोली तक आक्रमणकारियों का मुकाबला करने का आदेश दिया।

राजेंद्रसिंह महाराजा के साथ बैठक के बाद जब बादामी बाग पहुंचे तो वहां 150 के करीब ही सिपाही थे। इन डेढ़ सौ सिपाहियों को लेकर ब्रिगेडियर उड़ी के लिए निकले। उनके पास हथियारों, साजो सामान और रसद की कमी थी क्योंकि पाकिस्तान ने कश्मीर जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए थे, उनके पास पेट्रोल भी नही था इसलिए वो प्राइवेट गाड़ियों से निकले। वहीं दुश्मन उस समय के अत्याधुनिक हथियारों से लैस और दस हजार से ज्यादा की संख्या में था।

पहले गढ़ी और बाद में उड़ी में पाकिस्तानियो से खूनी झड़प हुई जिसमे कम संख्या के बावजूद ब्रिगेडियर सिंह के नेतृत्व में डोगरों ने आक्रमणकारियों को भारी नुकसान पहुँचाया। उसके बाद उड़ी में मोर्चाबंदी की और उड़ी नाले के ऊपर पुल को उड़ा दिया। यहां दो दिन तक दुश्मन हमले करता रहा लेकिन आगे नही बढ़ पाया। इस दौरान डोगरा फौज के भी अनेको सैनिक खेत रहे। ब्रिगेडियर सिंह ने हेडक्वार्टर से सहायता भेजने को कहा। उस समय 70 के करीब सैनिक ही और उपलब्ध थे जो महाराजा हरी सिंह कैप्टेन ज्वाला सिंह के नेतृत्व में यह कहकर भेजे कि किसी भी कीमत पर दुश्मन को उड़ी में रोका जाए। ब्रिगेडियर सिंह ने हालात देखकर अब माहुरा में मोर्चाबंदी करने का फैसला लिया। सुबह होते ही फिर दुश्मन ने हमला बोल दिया लेकिन जवाब ऐसा मिला कि पाकिस्तानियो को फिर से पीछे हटना पड़ा।

छोटी सी टुकड़ी से पार ना पाते देख आक्रमणकारियों ने झेलम किनारे आगे बढ़ पैदल पुलों से घुसने की कोशिश की। ब्रिगेडियर को इसका आभास हो गया और उन्होंने एक टुकड़ी भेजकर सभी पुलों को नष्ट करवा दिया लेकिन तब तक बड़ी संख्या में हमलावर अंदर आ गए थे। ब्रिगेडियर ने रामपुर में मोर्चाबंदी करने का फैसला किया। रात भर जवानों ने खंदक खोदी और तड़के ही दुश्मनों के हमले का सामना करना पड़ा। पूरे दिन गोलाबारी हुई लेकिन दुश्मन एक इंच भी आगे नही बढ़ पाया।

दुश्मन की एक टुकड़ी ने पीछे से आकर सड़क पर अवरोधक तैयार कर दिए, ताकि महाराजा के सिपाहियों को वहां से निकलने का मौका नहीं मिले।

ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह को दुश्मन की योजना का पता चल गया और उन्होंने 27 अक्टूबर की सुबह एक बजे अपने सिपाहियों को पीछे हटने और सेरी पुल पर डट जाने को कहा। पहला अवरोधक तो उन्होंने आसानी से हटा लिया, लेकिन बोनियार मंदिर के पास दुश्मन की फायरिंग की चपेट में आकर राज्य के सिपाहियों के वाहनों का काफिला थम गया। आगे के तीनो वाहनों के चालक शहीद हो गए। ब्रिगेडियर सिंह अपने वाहन चालक के शहीद होने पर खुद ही वाहन लेकर आगे निकल गए। सेरी के पुल पर दुश्मन के हमले का जवाब देते हुए वो जख्मी हो गए। उनकी दाई टांग बुरी तरह जख्मी थी।

उन्होंने उसी समय जवानों को बारामूला में मोर्चा बनाकर दुश्मनों को रोकने के लिए कहा। जब उन्हें जवानों ने उठाने का प्रयास किया तो उन्होंने जाने से मना किया और कहा की उन्हें रिवाल्वर देकर पुलिया की आड़ में लिटा दिया जाए, वो यहीं से दुश्मनों का मुकाबला करेंगे क्योंकि उन्होंने महाराज हरि सिंह को वचन दिया है कि दुश्मन उनकी लाश पर से ही उड़ी से आगे बढ़ेगा। उसके बाद उन्हें किसी ने नही देखा और 27 अक्टूबर की दोपहर को सेरी के पुल पर दुश्मनों का अकेले मुकाबला करते हुए वो वीरगति को प्राप्त हुए।

26 अक्टूबर 1947 की शाम को जम्मू कश्मीर के भारत में विलय को लेकर समझौता हो चुका था और 27 अक्टूबर को जब राजेंद्रसिंह शहीद हुए तो उस समय कर्नल रंजीत राय भारतीय फौज का नेतृत्व करते हुए श्रीनगर एयरपोर्ट पर पहुंच चुके थे।

दुनिया में ऐसी वीरता का उदाहरण शायद ही कहीं और मिले जहां इतनी छोटी सैनिकों की टुकड़ी जिसके पास संसाधनों की जबरदस्त कमी थी ने अपने से सौ गुना विशाल और साधन सम्पन्न दुश्मन को 4 दिन तक रोके रखा। सभी सैन्य विशेषज्ञ यह मानते हैं कि अगर ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह ने अपनी इस छोटी सी टुकड़ी को लेकर आखरी दम तक लड़ने के इरादे और सूझबूझ के साथ हमलावरों को रोका नही होता तो पाकिस्तानी हमलावर 23 तारीख को ही श्रीनगर पहुँच जाते और फिर ना तो कभी भारतीय सेना वहां पहुँचती और ना आज कश्मीर भारत का हिस्सा होता।

(हालांकि भारतीय सेना 27 से पहले पहुँच जाति लेकिन नेहरू के भेजे हुए दूत वीपी मेनन ने instrument ऑफ accesion को sign करवाने में देरी करवाई, वो महाराज हरी सिंह पर नेहरू के चहेते शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री बनाने और उन्हें अन्य कई अधिकार देने के लिए दबाव डाल रहे थे जबकि सरदार पटेल ने कहा था कि महाराज अगर समझौता पे दस्तखत करने को तैयार हैं तो कोई और शर्त ना लादी जाए। वीपी मेनन के इस रवैय्ये से परेशान होकर महाराज ने अपने सेवको से कह दिया कि अगर कल तक समझौता नही होता है तो मुझे सोते हुए गोली मार दी जाए। अगले दिन 26 को समझौता हुआ और 27 को भारतीय फौज कश्मीर पहुँची।)

लेकिन ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह और अन्य डोगरा सैनिकों के इस बलिदान को वो सम्मान नही मिला जो उन्हें मिलना चाहिए था। डेढ़ साल बाद उन्हें भारत का पहला महावीर चक्र मिला लेकिन भारतीय राजनीतिक वर्ग ने उनके बलिदान को बिलकुल दरकिनार कर दिया जिस कारण भारत में बहुत कम लोग उनके बारे में जानते हैं। जिस व्यक्ति के बलिदान के कारण कश्मीर आज भारत का हिस्सा है उसे तो भारत रत्न मिलना चाहिए था लेकिन उनके नाम कश्मीर में एक कॉलेज तक नही है। आज जब सब जगह कश्मीर की बात हो रही है, लोग नेताओ की जयजयकार कर रहे हैं, ऐसे में भी ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह जामवाल का कहीं कोई जिक्र नही है।

इसलिए हमारी जिम्मेदारी बनती है कि ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह जामवाल और उन डोगरा राजपूतो के बलिदान के बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगो को पता चले, इसलिए इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।