Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

. #युधिष्ठिर का घमण्ड

बात उस समय की है जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था और पांडवों को कौरवों पर विजय प्राप्त हो चुका था। युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो चुका था और युधिष्ठिर ने अपने राज्य के विस्तार और गरिमा को बढ़ाने हेतु अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया। और उसके जरिये धर्म कर्म दान पुण्य भी बहुत ही खुलकर किया। जीतने भी राज्य के निवासी थे, ब्राह्मण, ऋषि मुनियों इत्यादि के लिए भोज का आयोजन किया। सभी जनों को भोज के जरिये तृप्त किया किसी को भी किसी प्रकार के दान इत्यादि से कमी नहीं रहने दी। सम्पूर्ण आयोजन मे किसी भी प्रकार की कमी नहीं देखी जा सकती थी।
सम्पूर्ण आयोजन को देखकर युधिष्ठिर के मन मे अभिमान का भाव आ गया। और मन मे कई विचार आने लगे। उन्हें लगा उन्होंने ऐसे आयोजन का आह्वान किया जिससे हर कोई तृप्त है। उनके जैसा आयोजन कोई भी नहीं कर सकता है। युधिष्ठिर के इन विचारों का एहसास श्री कृष्ण को हो गया और उन्होंने युधिष्ठिर के अभिमान का नाश करने हेतु एक लीला की।

जब सभी लोग भोज करके जाने लगे। तो भण्डार मण्डप में एक नेवला आया। नेवला बहुत ही अजीब था उसका आधा शरीर सोने का था और आधा शरीर सामान्य था। वो पूरे भण्डार क्षेत्र मे घूम घूम कर सभी पत्तलों से एक-एक दाने चुन रहा था। और फिर दूसरे पत्तल की ओर बढ़ जाता है। इस पर सभी को आश्चर्य हुआ कि आखिर नेवला कर क्या रहा है। युधिष्ठिर ने जिज्ञासा वश स्वयं श्री कृष्ण से पूछा कि केशव ये नेवला आखिर कर क्या रहा है। इस पर श्री कृष्ण ने कहा, ‘धर्मराज! तुम स्वयं ही उस नेवले से क्यों नहीं पूछ लेते हो।’
अपनी जिज्ञासा की पूर्ति हेतु युधिष्ठिर ने उस नेवले से पूछ लिया कि वो आखिर क्या कर रहा है। तो उस नेवले ने जवाब दिया कि, ‘हे युधिष्ठिर! मैं उस अन्न को ढूंढ रहा हूँ जिससे मेरा आधा शरीर जो कि सोने का नहीं है वो भी सोने का हो जाये। इस पर युधिष्ठिर और बाकी भाइयों ने पूछा कि आप विस्तार से बताओ ऐसा कौन सा अन्न है जिससे आपका शरीर सोने का हो जाएगा। इस पर नेवले ने कहा कि एक समय की बात है मेरा पूरा शरीर तब सामान्य था लेकिन मैंने ऐसा शुभ अन्न का भोग किया जिससे मेरा आधा शरीर सोने का हो गया। इसका प्रसंग इस प्रकार से है–
एक समय की बात है। एक ग्राम मे एक दरिद्र ब्राह्मण रहता था। उसके साथ उसकी पत्नी उसका पुत्र और पुत्रवधू रहती थी। ब्राह्मण बहुत ही धर्मात्मा व्यक्ति था। अपने द्वार से कभी भी किसी भिक्षुक अथवा अतिथि को बिना सत्कार किए नहीं जाने देता था।

एक बार की बात है उसके राज्य मे बहुत बड़ा अकाल पड़ा और सभी लोगो को दो जून का अन्न भी नसीब नहीं हो रहा था। ब्राह्मण का परिवार भी करीब 6 दिन से एक अन्न का दाना नहीं खाया हुआ था। किसी तरह उन्होंने कुछ भोजन की व्यवस्था की और जैसे ही खाने के लिए बैठे उनके द्वार पर एक भिक्षुक आ गया। उसने उनसे कहा कि तुम तो किसी भी भिक्षुक को अपने द्वार से खाली नहीं भेजते हो। मैं कई दिनों से भूखा हूँ बहुत आशा के साथ तुम्हारे द्वार पर आया हूँ। मुझे भोजन दो।
उस ब्राह्मण ने निःसंकोच अपने हिस्से का भोजन उस भूखे भिक्षुक को दे दिया। उसे खाने के बाद भी वो भिक्षुक तृप्त नहीं हुआ। और उसने और भोजन की मांग की इस पर उस ब्राह्मण की पत्नी ने भी अपना भोजन उस आगंतुक को दे दिया। इसे खाने पर भी उसे तृप्ति नहीं हुई और उसने और भोजन की मांग की। तब ब्राह्मण के बेटे और उसकी पत्नी ने भी एक-एक कर अपना भोजन उस आगंतुक को दे दिया। इस प्रकार से सभी सदस्यों ने अपना पेट न भरकर अपने हिस्से का भोजन उस भूखे भिक्षुक को दे दिया।

भोजन समाप्त करने के बाद उस भूखे भिक्षुक ने अपना असली स्वरूप दिखाया वो स्वयं धर्मराज थे। जो उस ब्राह्मण की धर्मात्मा होने की परीक्षा लेने आए थे। धर्मराज ने कहा–हे ब्राह्मण श्रेष्ठ आप के सत्कार से मैं प्रसन्न हुआ और आपके इस सेवा भाव से मुझे इतनी प्रसन्नता हुई कि मैं आप को ब्रह्मलोक का निवास वरदान स्वरूप प्रदान करता हूँ। उनके अंतर्ध्यान होने के बाद मैंने उनके पत्तल के बचे भोजन को जैसे ही ग्रहण किया मेरा आधा शरीर सोने का हो गया। यहाँ आपके यज्ञ के बारे में सुनकर मै यहाँ इसी उद्देश्य से आया था कि ये भोज भी ऐसा धर्म भोज होगा जिसके खाने से मेरा बचा शरीर भी सोने का हो जाएगा लेकिन मैं गलत था। यहाँ का भोजन ग्रहण करने से मेरे शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। और इतना कहकर नेवला गायब हो गया।

इस सारे कथानक के उपरांत युधिष्ठिर को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने केशव से कहा–हे प्रभु! मुझमें अहंकार का भाव विद्यमान हो गया था। और मेरे अहंकार का नाश करने हेतु ही आपने मुझे ये लीला दिखाई। कृपा करके मुझे क्षमा करें। मै भूल गया था कि कोई भी यज्ञ, पूजन, भोज इत्यादि तब तक धर्म अनुसार नहीं माना जाएगा जब तक उसमें सत्य, श्रद्धा इत्यादि का भाव न हो। और अहंकार इत्यादि के उत्पन्न होने से कोई भी विशाल भोज या आयोजन किसी काम का नहीं है। मुझे अपने गलती का एहसास हो गया है।
० ० ०

“जय जय श्री राधे”

सैफाली अग्रवाल

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हिंगलाज माता मंदिर


#हिंगलाज मातामंदिर ,पाकिस्तान
इसे पाकिस्तान में कहते हैं ‘नानी पीर’,,,,,

माता सती के 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ पाकिस्तान के कब्जे वाले बलूचिस्तान में स्थित है। इस शक्तिपीठ की देखरेख मुस्लिम करते हैं और वे इसे चमत्कारिक स्थान मानते हैं। इस मंदिर का नाम है माता हिंगलाज का मंदिर। हिंगोल नदी और चंद्रकूप पहाड़ पर स्थित है माता का ये मंदिर। सुरम्य पहाड़ियों की तलहटी में स्थित यह गुफा मंदिर इतना विशालकाय क्षेत्र है कि आप इसे देखते ही रह जाएंगे। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि यह मंदिर 2000 वर्ष पूर्व भी यहीं विद्यमान था।

मां हिंगलाज मंदिर में हिंगलाज शक्तिपीठ की प्रतिरूप देवी की प्राचीन दर्शनीय प्रतिमा विराजमान हैं। माता हिंगलाज की ख्याति सिर्फ कराची और पाकिस्तान ही नहीं अपितु पूरे भारत में है। नवरात्रि के दौरान तो यहां पूरे नौ दिनों तक शक्ति की उपासना का विशेष आयोजन होता है। सिंध-कराची के लाखों सिंधी हिन्दू श्रद्धालु यहां माता के दर्शन को आते हैं। भारत से भी प्रतिवर्ष एक दल यहां दर्शन के लिए जाता है।

इस मंदिर पर गहरी आस्था रखने वाले लोगों का कहना है कि हिन्दू चाहे चारों धाम की यात्रा क्यों ना कर ले, काशी के पानी में स्नान क्यों ना कर ले, अयोध्या के मंदिर में पूजा-पाठ क्यों ना कर लें, लेकिन अगर वह हिंगलाज देवी के दर्शन नहीं करता तो यह सब व्यर्थ हो जाता है। वे स्त्रियां जो इस स्थान का दर्शन कर लेती हैं उन्हें हाजियानी कहते हैं। उन्हें हर धार्मिक स्थान पर सम्मान के साथ देखा जाता है।

एक बार यहां माता ने प्रकट होकर वरदान दिया कि जो भक्त मेरा चुल चलेगा उसकी हर मनोकामना पुरी होगी। चुल एक प्रकार का अंगारों का बाड़ा होता है जिसे मंदिर के बहार 10 फिट लंबा बनाया जाता है और उसे धधकते हुए अंगारों से भरा जाता है जिस पर मन्नतधारी चल कर मंदिर में पहुचते हैं और ये माता का चमत्कार ही है की मन्नतधारी को जरा सी पीड़ा नहीं होती है और ना ही शरीर को किसी प्रकार का नुकसान होता है, लेकीन आपकी मन्नत जरूर पुरी होती है। हालांकि आजकल यह परंपरा नहीं रही।

#पौराणिक तथ्य : पौराणिक कथानुसार जब भगवान शंकर माता सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर लेकर तांडव नृत्य करने लगे, तो ब्रह्माण्ड को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के मृत शरीर को 51 भागों में काट दिया। मान्यतानुसार हिंगलाज ही वह जगह है जहां माता का सिर गिरा था। इस मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता व्याप्त है। कहा जाता है कि हर रात इस स्थान पर सभी शक्तियां एकत्रित होकर रास रचाती हैं और दिन निकलते हिंगलाज माता के भीतर समा जाती हैं।

कई महान लोगों ने टेका है यहां माथा : जनश्रुति है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम भी यात्रा के लिए इस सिद्ध पीठ पर आए थे। हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदग्रि ने यहां घोर तप किया था। उनके नाम पर आसाराम नामक स्थान अब भी यहां मौजूद है। कहा जाता है कि इस प्रसिद्ध मंदिर में माता की पूजा करने को गुरु गोरखनाथ, गुरु नानक देव, दादा मखान जैसे महान आध्यात्मिक संत आ चुके हैं।

ऐसा है मंदिर का स्वरूप : यहां का मंदिर गुफा मंदिर है। ऊंची पहाड़ी पर बनी एक गुफा में माता का विग्रह रूप विराजमान है। पहाड़ की गुफा में माता हिंगलाज देवी का मंदिर है जिसका कोई दरवाजा नहीं। मंदिर की परिक्रमा यात्री गुफा के एक रास्ते से दाखिल होकर दूसरी ओर निकल जाते हैं। मंदिर के साथ ही गुरु गोरखनाथ का चश्मा है। मान्यता है कि माता हिंगलाज देवी यहां सुबह स्नान करने आती हैं।

यहां माता सती कोटटरी रूप में जबकि भगवान भोलेनाथ भीमलोचन भैरव रूप में प्रतिष्ठित हैं। माता हिंगलाज मंदिर परिसर में श्रीगणेश, कालिका माता की प्रतिमा के अलावा ब्रह्मकुंड और तीरकुंड आदि प्रसिद्ध तीर्थ हैं। इस आदि शक्ति की पूजा हिंदुओं द्वारा तो की ही जाती है इन्हें मुसलमान भी काफी सम्मान देते हैं।

हिंगलाज मंदिर में दाखिल होने के लिए पत्थर की सीढिय़ां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर में सबसे पहले श्री गणेश के दर्शन होते हैं जो सिद्धि देते हैं। सामने की ओर माता हिंगलाज देवी की प्रतिमा है जो साक्षात माता वैष्णो देवी का रूप हैं।

मुसलमानों के लिए ‘नानी पीर’ है माता : जब पाकिस्तान का जन्म नहीं हुआ था और भारत की पश्चिमी सीमा अफगानिस्तान और ईरान थी, उस समय हिंगलाज तीर्थ हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थ तो था ही, बलूचिस्तान के मुसलमान भी हिंगला देवी की पूजा करते थे, उन्हें ‘नानी’ कहकर मुसलमान भी लाल कपड़ा, अगरबत्ती, मोमबत्ती, इत्र-फलुल और सिरनी चढ़ाते थे।

हिंगलाज शक्तिपीठ हिन्दुओं और मुसलमानों का संयुक्त महातीर्थ था। हिन्दुओं के लिए यह स्थान एक शक्तिपीठ है और मुसलमानों के लिए यह ‘नानी पीर’ का स्थान है।

प्रमुख रूप से यह मंदिर चारण वंश के लोगों की कुल देवी मानी जाती है। यह क्षे‍त्र भारत का हिस्सा ही था तब यहां लाखों हिन्दू एकजुट होकर आराधना करते थे।

कई बार मंदिर को तोड़ना का हुआ प्रयास : मुस्लिम काल में इस मंदिर पर मुस्लिम आक्रांतानों ने कई हमले किए लेकिन स्थानीय हिन्दू अरौ मुसलमानों ने इस मंदिर को बचाया। कहते हैं कि जब यह हिस्सा भारत के हाथों से जाता रहा तब कुछ आतंकवादियों ने इस मंदिर को क्षती पहुंचाने का प्रयास किया था लेकिन वे सभी के सभी हवा में लटके गए थे।

कैसे जाएं माता हिंगलाज के मंदिर दर्शन को

इस सिद्ध पीठ की यात्रा के लिए दो मार्ग हैं- एक पहाड़ी तथा दूसरा मरुस्थली। यात्री जत्था कराची से चल कर लसबेल पहुंचता है और फिर लयारी। कराची से छह-सात मील चलकर “हाव” नदी पड़ती है। यहीं से हिंगलाज की यात्रा शुरू होती है।

यहीं शपथ ग्रहण की क्रिया सम्पन्न होती है, यहीं पर लौटने तक की अवधि तक के लिए संन्यास ग्रहण किया जाता है। यहीं पर छड़ी का पूजन होता है और यहीं पर रात में विश्राम करके प्रात:काल हिंगलाज माता की जय बोलकर मरुतीर्थ की यात्रा प्रारंभ की जाती है।
रास्ते में कई बरसाती नाले तथा कुएं भी मिलते हैं। इसके आगे रेत की एक शुष्क बरसाती नदी है। इस इलाके की सबसे बड़ी नदी हिंगोल है जिसके निकट चंद्रकूप पहाड़ हैं। चंद्रकूप तथा हिंगोल नदी के मध्य लगभग 15 मील का फासला है। हिंगोल में यात्री अपने सिर के बाल कटवा कर पूजा करते हैं तथा यज्ञोपवीत पहनते हैं। उसके बाद गीत गाकर अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति करते हैं।

मंदिर की यात्रा के लिए यहां से पैदल चलना पड़ता है क्योंकि इससे आगे कोई सड़क नहीं है इसलिए ट्रक या जीप पर ही यात्रा की जा सकती है। हिंगोल नदी के किनारे से यात्री माता हिंगलाज देवी का गुणगान करते हुए चलते हैं। इससे आगे आसापुरा नामक स्थान आता है। यहां यात्री विश्राम करते हैं।

यात्रा के वस्त्र उतार कर स्नान करके साफ कपड़े पहन कर पुराने कपड़े गरीबों तथा जरूरतमंदों के हवाले कर देते हैं। इससे थोड़ा आगे काली माता का मंदिर है।

इस मंदिर में आराधना करने के बाद यात्री हिंगलाज देवी के लिए रवाना होते हैं। यात्री चढ़ाई करके पहाड़ पर जाते हैं जहां मीठे पानी के तीन कुएं हैं। इन कुंओं का पवित्र जल मन को शुद्ध करके पापों से मुक्ति दिलाता है। बस इसके पास ही माता का मंदिर है।

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करवा चौथ की कहानी


करवा चौथ की कहानी

#परम्परागत कथा (रानी #वीरवती की कहानी)

बहुत समय
पहले वीरवती नाम की एक सुन्दर लड़की थी। वो अपने सात भाईयों की इकलौती बहन थी।
उसकी शादी एक राजा से हो गई। शादी के बाद पहले करवा चौथ के मौके पर वो अपने
मायके आ गई। उसने भी करवा चौथ का व्रत रखा लेकिन पहला करवा चौथ होने की वजह से
वो भूख और प्यास बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। वह बेताबी से चांद के उगने का
इन्तजार करने लगी। उसके सातों
भाई उसकी ये हालत देखकर परेशान हो गये। वे अपनी बहन से बहुत ज्यादा प्यार करते
थे। उन्होंने वीरवती का व्रत समाप्त करने की योजना बनाई और पीपल के पत्तों के
पीछे से आईने में नकली चांद की छाया दिखा दी। वीरवती ने इसे असली चांद समझ
लिया और अपना व्रत समाप्त कर खाना खा लिया। रानी ने जैसे ही खाना खाया वैसे ही
समाचार मिला कि उसके पति की तबियत बहुत खराब हो गई है।

रानी तुरंत अपने राजा के पास भागी। रास्ते में उसे भगवान शंकर पार्वती देवी के
साथ मिले। पार्वती देवी ने रानी को बताया कि उसके पति की मृत्यु हो गई है
क्योंकि उसने नकली चांद देखकर अपना व्रत तोड़ दिया था। रानी ने तुरंत क्षमा
मांगी। पार्वती देवी ने कहा, ”तुम्हारा पति फिर से जिन्दा हो जायेगा लेकिन
इसके लिये तुम्हें करवा चौथ का व्रत कठोरता से संपन्न करना होगा। तभी तुम्हारा
पति फिर से जीवित होगा।” उसके बाद रानी वीरवती ने करवा चौथ का व्रत पूरी विधि
से संपन्न किया और अपने पति को दुबारा प्राप्त किया।

इस पर्व से संबंधित अनेक कथाएं प्रसिध्द हैं जिनमें सत्यवान और सावित्री की
कहानी भी बहुत प्रसिध्द है।…………..शास्त्रों के मुताबिक इस व्रत के
समान सौभाग्यदायक व्रत कोई दूसरा नहीं है। व्रत का ये विधान बेहद प्राचीन है।
कहा जाता है कि पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने भी करवाचौथ का उपवास किया था। इस
व्रत के देवता चंद्रमा माने गए हैं। इसके पीछे भी एक कहानी है। कहा जाता है कि
जब अर्जुन तप करने नीलगिरी पर्वत पर चले गए थे तो द्रौपदी परेशान हो गई। तब
कृष्ण ने द्रौपदी को करवाचौथ का व्रत रखने और चांद कि पूजा करने कि सलाह दी थी।

सैफाली अग्रवाल

Posted in ૧૦૦૦ પ્રેરણાત્મક વાર્તાઓ

જંગલમાં એક તોફાની વાંદરાની સાથે એક ભેંસ રહેતી હતી. દરરોજ, વાંદરો તેની પૂંછડી ખેંચીને, તેના માથા પર ઠુંડીયા ફેંકીને અથવા ઝાડ પરથી તેની પીઠ પર કૂદીને ભેંસને હેરાન કરતો હતો. ભેંસ વાંદરાની મસ્તીથી કંટાળી ગઈ હતી, પરંતુ તેમ છતાં તેણે ધીરજથી કામ કર્યું. જંગલના અન્ય પ્રાણીઓએ આ જોયું અને વિચાર્યું કે ભેંસ શા માટે વાંદરાને આટલો બધો સહન કરે છે. હાથી ભેંસ પાસે ગયો અને પૂછ્યું, “તું વાંદરાને તેના દુષ્કૃત્યો માટે પાઠ કેમ નથી ભણાવતી?” ભેંસે હાથી તરફ સ્મિત કર્યું અને જવાબ આપ્યો, “મને કેવી રીતે ધીરજ રાખવી તે શીખવવા બદલ હું વાંદરાની આભારી છું. હું ધારું ટો વાંદરાને પાઠ ભણાવી સકું છુ, મારા પણ જંગલમાં ગણા બધા મિત્રો છે.

ઝાડની ટોચ પર બેઠેલા વાંદરાએ આ સાંભળ્યું અને શરમ અનુભવી. વાંદરો તરત જ ભેંસ પાસે આવ્યો અને કહ્યું, “માફ કરશો, મારા પ્રિય મિત્ર, મેં તમને જે તકલીફ આપી તે માટે.” ભેંસ વાંદરાને જોઈને હસી પડી અને તેઓ સારા મિત્રો બની ગયા.

વાંદરાને ખબર પડી ગઈ કે જો પાણી માથા પરથી જશે તો મારી ખેર નથી કારણ આ ભેસ ના મિત્રો તેની માટે કશું પણ કરી છુટવા તૈય્યાર છે.

ખુમારી એ નહિ કે તમે બીજાને એના ગુનાહ માટે છોડી દો, ખુમારી એટલે તમારી પાસે તાકાત છે પણ બીજાને તેની બાલીશતા માટે અણ દેખ્યું કરો છો.

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दमन से मुक्‍ति

मैंने सुना है, एक गांव में एक बहुत क्रोधी आदमी रहता था। वह इतना क्रोधी था कि एक बार उसने अपनी पत्नी को धक्का देकर कुएं में गिरा दिया था। जब उसकी पत्नी मर गयी और उसकी लाश कुएं से निकाली गयी तो वह क्रोधी आदमी जैसे नींद से जग गया। उसे लगा कि उसने जिंदगी में सिवाय क्रोध के और कुछ भी नहीं किया। उसे बहुत पश्‍चाताप हुआ।

उस गांव में एक मुनि आये हुए थे। वह उनके दर्शन को गया और उनके चरणों में सिर रखकर बहुत रोया। उसने कहा, ‘‘मैं इस क्रोध से कैसे छुटकारा पाऊं? क्या रास्ता है? मैं कैसे इस क्रोध से बचूं?’

मुनि ने कहा, ‘‘तुम संन्यासी हो जाओ। छोड़ दो वह क्रोध, जिसे कल तक तुम पकड़े थे।

लेकिन मजा यह है कि जिसे छोड़ो, वह तुम्हे और भी मजबूती से पकड़ लेता है। लेकिन यह थोड़ी गहरी बात है, एकदम से समझ में नहीं आती।

वह आदमी एकदम से संन्यासी हो गया। उसने अपने वस्त्र फेंक दिये और नंगा हो गया। उसने कहा, ‘मुझे दिक्षा दें, मैं शिष्य हुआ।”

मुनि बहुत हैरान हुए। बहुत लोग उन्होंने देखे थे, पर ऐसा संकल्पवान आदमी नहीं देखा था, जो इतनी शीघ्रता से संन्यासी हो जाये। उन्होंने कहा, ‘‘तू तो अदभुत है तेरा संकल्प महान है। तू इतना तीव्रता से संन्यासी होने को तैयार हो गया है, सब छोड़कर?

लेकिन उन्हें भी पता नहीं कि यह भी क्रोध का ही दूसरा रूप है। वह आदमी, जो कि अपनी पत्नी को क्रोध में आकर एक क्षण में कुएं में धक्का दे सकता है, वह क्रोध में आकर एक क्षण में नंगा भी खड़ा हो सकता है, संन्यासी भी हो सकता है, इन दोनों बातों में विरोध नहीं है। यह एक ही क्रोध के दो रूप हैं।

तो वे मुनि बहुत प्रभावित हुए उससे। उन्होंने उसे दीक्षा दे दी और उसका नाम रख दिया-मुनि शांतिनाथ। अब वह मुनि शांतिनाथ हो गया। और भी शिष्य थे मुनि के, लेकिन उस शांतिनाथ का मुकाबला करना बहुत मुश्किल था, क्योंकि उतने क्रोध में उनमें से कोई भी नहीं था। दूसरे शिष्य दिन में अगर एक बार भोजन करते तो शांतिनाथ दो दिन भोजन ही नहीं करते थे। क्रोधी आदमी कुछ भी कर सकता है!

दूसरे अगर सीधे रास्ते से चलते, तो मुनि शांतिनाथ कांटों से भरे रास्ते पर चलते! दूसरे शिष्‍य अगर छाया में बैठते, तो मुनि शांतिनाथ धूप में ही खड़े रहते! थोड़े ही दिनों में मुनि शांतिनाथ का शरीर सुख गया, कृश हो गया, काला पड़ गया, पैर में घाव पड़ गये। लेकिन चारो और उनकी कीर्ति फैलनी शुरू हो गयी, कि मुनि शान्तिनाथ महान तपस्वी हैं।

वह क्रोध ही था, जो अब स्वयं पर लौट आया था। जो क्रोध, अब तक दूसरों पर प्रगट होता रहा था, अब वह उतना ही खुद पर ही प्रगट हो रहा था।

अब उसने दूसरों को सताना बन्द कर दिया, अब वह अपने को ही सता रहा था। और पहली बार एक नयी घटना घटी थी कि दूसरों को सताने पर लोग उसका अपमान करते थे, पर अब खुद को सताने से लोग उसका सम्मान करने लगे थे। अब लोग उसे महातपस्वी कहने लगे थे!

मुनि की कीर्ति सब ओर फैलती गयी। जितनी उसकी कीर्ति फैलती गयी, वह अपने को उतना ही सताने लगा, अपने साथ दुष्टता करने लगा। जितनी उसने स्वयं से दुष्टता की, उतना ही उसका सम्मान बढ़ता चला गया। दो-चार वर्षों में गुरु से ज्यादा उसकी प्रतिष्ठा हो गयी।

फिर वह देश की राजधानी में आया। मुनियों को राजधानी में जाना बहुत जरूरी होता है। अगर आप मुनियों को देखना चाहते हो, तो हिमालय पर जाने की कोई जरूरत नहीं है, देश की राजधानी में चले जाइए। वहां सब मुनि, सब संन्यासी अड्डा जमाये हुए मिल जायेंगे।

वे मुनि भी राजधानी की तरफ चले। राजधानी में पुराना एक मित्र रहता था। उसे खबर मिली तो वह बहुत हैरान हुआ कि जो आदमी इतना क्रोधी था, वह शांतिनाथ हो गया! जाऊं, दर्शन कर आऊं।

वह मित्र दर्शन करने आया। मुनि अपने तख्त पर सवार थे। उन्होंने मित्र को देख लिया, पहचान भी गये। लेकिन जो लोग तख्त पर सवार हो जाते हैं, वे कभी किसी को आसानी से नहीं पहचानते; क्योंकि पुराने दिनों के साथी को पहचानना ठीक भी नहीं होता। वह भी कभी वैसे ही रहे हैं, इसका पता चल जाता है।

आदमी ऊपर चढ़ता ही इसलिए है कि जो पीछे छूट जाये, उनको पहचाने न। जब बहुत से लोग उसको पहचानने लगते हैं, तो वह सबको पहचानना बंद कर देता है। पद के शिखर पर चढ़ने का रस ही यही है कि उसे सब पहचानें, लेकिन वह किसी को नहीं पहचाने।

मित्र पास सरक आया और उसने पूछा कि ‘‘मुनि जी क्या मैं पूछ सकता हूं- आपका नाम क्या है?” मुनि जी को क्रोध आ गया। ‘‘क्या अखबार नहीं पढ़ते? रेडियो नहीं सुनते? मेरा नाम पूछते हो? मेरा नाम जग-जाहिर है, मेरा नाम मुनि शांतिनाथ है।”

उनके बताने के ढंग से मित्र समझ गया कि कोई बदलाहट नहीं हुई है। आदमी तो वही का वही है, सिर्फ नंगा खड़ा हो गया है।

दो मिनट दूसरी बात चलती रही। मित्र ने फिर पूछा, ‘‘महाराज, मैं भूल गया-आपका नाम क्या है?” मुनि की आंखों से तो आग बरसने लगी। उन्होंने कहा- ‘‘मूढ! नासमझ! इतनी जल्दी भूल गया। अभी मैंने तुझसे कहा था, मेरा नाम मुनि शांतिनाथ है।”

दो मिनट तक फिर दूसरी बातें चलती रहीं। फिर उसने पूछा कि ‘‘महाराज, मैं भूल गया, आपका नाम क्या है?” मुनि ने डंडा उठा लिया और कहा, ‘‘चुप नासमझ! तुझे मेरा नाम समझ में नहीं आता? मेरा नाम है मुनि शांतिनाथ।”

उस मित्र ने कहा, अब सब समझ गया हूं। सिर्फ वही समझ में नहीं आया, जो मैं पूछता हूं। अच्छा नमस्कार! आप वही के वही है, कोई फर्क नहीं पड़ा।

दमन से कभी कोई फर्क नहीं आता, लेकिन दमन से चीजें स्वप्‍न बन जाती हैं। और स्वप्‍न बन जाना बहुत खतरनाक है क्योंकि बदली हुई शक्ल में उनको पहचानना भी मुश्किल हो जाता है। आदमी के भीतर सेक्स है, काम-वासना है, उसे पहचानना सरल है; लेकिन अगर आदमी ब्रह्मचर्य साधने की जबर्दस्ती कोशिश में लग जाये, तो उस ब्रह्मचर्य के पीछे भी सेक्यूअलिटी/ कामुकता होगी। लेकिन, उसको पहचानना बहुत मुश्किल हो जायेगा, क्योंकि वह अब वस्त्र बदल कर आ जायेगी।

ब्रह्मचर्य तो चित्त के परिवर्तन से उपलब्ध होता है, जो जीवन के अनुभव से उपलब्ध होता है।

-ओशो साहित्य
*संकलन-रामजी*🙏🌹🌹

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દીકરી! તારા જેવી ભગવાને મને એક દીકરી આપી હોત તો…
ઉનાળાના કાળઝાળ તડકામાં એક બહારવટિયો રાતે લૂંટવાના ગામની તપાસમાં નીકળ્યો છે. રસ્તામાં તરસ લાગી. ગળું સુકાવા માંડ્યું. એક બાઈને કૂવાને કાંઠે બેડું ઉપાડતી જોઈ પૂછ્યું, ‘બેટા! દીકરી! મને પાણી પાઈશ?’
બાઈ બોલી, ‘અરે બાપુ! પાણી શું ઘરે હાલો. મારા હાથનો રોટલો ખવરાવું.’ પાણી પાયું. તાણ્ય કરીને ઘરે લઈ ગઈ. ફુલીને મોભારે અડે એવા રોટલાને માથે કોપટી ફોડીને માખણનો લોંદો મૂકીને બહારવટિયાને જમાડ્યો.
બહારવટિયો ખૂંખાર ખરો, પરંતુ ‘બાપ’ અને ‘દીકરી’ આ બે શબ્દોએ તેને ઓગાળી નાખ્યો. તેનાથી રે’વાણું નઈ અને બોલાઈ ગયું, ‘દીકરી, આજ રાતે હું મારા ભેરુને લઈને આ ગામ લૂંટવા આવવાનો છું. તેં મને ‘બાપ’ કીધો. હવે તું મારી ‘દીકરી’ છો. તારા ઘરની બારે ગોખલે બે દીવા મૂકજે. તારું ઘર કોઈ નઈ લૂંટે.
રાતે ગામના ચોકમાં હાકલ પડી. બંદૂકના ભડાકા થયા. ભેરુ ગામમાં લૂંટ કરવા ઊપડ્યા. પરંતુ જ્યાં જ્યાં જાય ત્યાં ઘરે ઘરે બે દીવા તેમના જોવામાં આવ્યા. મુંજાયેલા ભેરુઓએ આવીને બહારવટિયાને વાત કરી.બહારવટિયો દીકરીના ઘરે ગયો અને કહ્યું, ‘દીકરી! મેં તો તને તારા ઘરની બાર બે દીવા મૂકવાનું કીધું’તું. તેં આ શું કર્યું?’દીકરી બોલી, ‘બાપુ! દીકરીનું સાસરું બાપથી લુટાય?’‘દીકરીનું સાસરું’ આટલું સાંભળતા તો એ ખૂંખાર બહારવટિયો ભાંગી પડ્યો. બંદૂક ઢીંચણ માથે પછાડીને ભાંગી નાખી અને ચોધાર આંસુડે રોવા માંડ્યો. એટલું જ તેનાથી બોલાણું, ‘દીકરી! તારા જેવી ભગવાને મને એક દીકરી આપી હોત તો આ પાપના પોટલાં મારા હાથે નો બાંધત.’આટલું કહી તે ખૂંખાર બહારવટિયો તે ગામ છોડીને હાલી નીકળ્યો અને ત્યાર પછી તે કોઈને તે દેખાણો નથી.
-મનુભાઈ ગઢવી…

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

लघुकथा
ऐसी दीवानगी देखी नहीं कहीं
कमलेश राणा

हमारी एक पड़ोसन थी,, बहुत अच्छी कढ़ाई करती थी,, डिज़ाइनें भी जाने कहाँ से लाती थी,, बड़ी सुंदर सुंदर,,

यह उन दिनों की बात है जब मोबाइल नहीं हुआ करते थे,, आजकल तो जो चाहो, अलादीन के जिन की तरह पल में हाजिर हो जाता है,, उसमें भी इतनी वैरायटी होती है कि घर बैठे आप अच्छे से अच्छा डिज़ाइन पसंद करके बना सकते हैं,,

हाँ तो उस समय हम 9th में थे,, किसी काम से गये पड़ोस में,, उनका मेटी का टेबल क्लॉथ देखकर तो आँखें चिपक गई उससे,, इतना खूबसूरत कि बता नहीं सकते,, कॉर्नर बेल बनी हुई थी, रंग बिरंगे फूलों वाली,,

पर उनकी बेटी गज़ब की घमंडी थी,, वो अपने डिज़ाइन किसी को नहीं देती थी और हमारा तो यह हाल कि सपने में भी वही नज़र आये,, बड़ा जुनून था उन दिनों कढ़ाई का,,

मम्मी को बताया तो उन्होंने भी जाकर देखा,, बड़ा पसंद आया पर न सुनना उनको भी अच्छा नहीं लगता,, करें तो क्या करें,,पगलाये जा रहे थे उसे पाने के लिए,, सोचा कोई जुगाड़ लगाते हैं, शायद सफल हो जाये,,

हमने एक कॉपी खरीदी,, ग्राफ बनाने वाली,, उसके चार पेज़ फाड़कर चिपका लिये,, यानि बेल पूरी छप जाये, इतनी व्यवस्था कर ली,, फिर गये उनके यहाँ,,

आंटी ये टेबल क्लॉथ बड़ा सुंदर लग रहा है आपका,, मैंने मम्मी को बताया था तो उन्होंने कहा,, मुझे भी देखना है,, आप दे दो,,

वो बोलीं,, ठीक है पर तुरंत ही वापस कर जाना,,

बस आंटी गई और आई,, घर जाकर फटाफट उस डिज़ाइन की आउटलाइंस ट्रेस की,, फूलों के कलर लिखे और दे आई,, आंटी खुश कि जल्दी ही ले आई,,

क्यों कि डिज़ाइन बनाने में कम से कम पूरा दिन लग जाता,, अब वो क्या जाने कि हम कितने छुपे रुस्तम निकले 😂

दूसरे दिन सुबह मेटी मंगा कर अगली सुबह तक तो बना डाला,, सारी रात सोये नहीं,, ऐसी थी हमारी दीवानगी और समर्पण कढ़ाई के लिए

कुछ दिनों बाद आंटी आईं हमारे घर तो टेबल क्लॉथ देखकर चौँक गई,, अरे ये डिज़ाइन तुम्हारे पास कहाँ से आ गई,,वो सोच भी नहीं सकती थी कि कोई इतनी जल्दी कॉपी कर सकता है,,

हमने भी कह दिया मेरठ से,, उनका भ्रम बने रहने देना चाहते थे हम,, मन तो कर रहा था कि कह दें,, आपका ही है आंटी,, पर कह भी देते तो यकीन नहीं होता उन्हें,, इसलिए सोचा राज़ को राज़ ही रहने दें,, इसी में भलाई है😂

कमलेश राणा
ग्वालियर

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लघुकथा
ऐसी दीवानगी देखी नहीं कहीं
कमलेश राणा

हमारी एक पड़ोसन थी,, बहुत अच्छी कढ़ाई करती थी,, डिज़ाइनें भी जाने कहाँ से लाती थी,, बड़ी सुंदर सुंदर,,

यह उन दिनों की बात है जब मोबाइल नहीं हुआ करते थे,, आजकल तो जो चाहो, अलादीन के जिन की तरह पल में हाजिर हो जाता है,, उसमें भी इतनी वैरायटी होती है कि घर बैठे आप अच्छे से अच्छा डिज़ाइन पसंद करके बना सकते हैं,,

हाँ तो उस समय हम 9th में थे,, किसी काम से गये पड़ोस में,, उनका मेटी का टेबल क्लॉथ देखकर तो आँखें चिपक गई उससे,, इतना खूबसूरत कि बता नहीं सकते,, कॉर्नर बेल बनी हुई थी, रंग बिरंगे फूलों वाली,,

पर उनकी बेटी गज़ब की घमंडी थी,, वो अपने डिज़ाइन किसी को नहीं देती थी और हमारा तो यह हाल कि सपने में भी वही नज़र आये,, बड़ा जुनून था उन दिनों कढ़ाई का,,

मम्मी को बताया तो उन्होंने भी जाकर देखा,, बड़ा पसंद आया पर न सुनना उनको भी अच्छा नहीं लगता,, करें तो क्या करें,,पगलाये जा रहे थे उसे पाने के लिए,, सोचा कोई जुगाड़ लगाते हैं, शायद सफल हो जाये,,

हमने एक कॉपी खरीदी,, ग्राफ बनाने वाली,, उसके चार पेज़ फाड़कर चिपका लिये,, यानि बेल पूरी छप जाये, इतनी व्यवस्था कर ली,, फिर गये उनके यहाँ,,

आंटी ये टेबल क्लॉथ बड़ा सुंदर लग रहा है आपका,, मैंने मम्मी को बताया था तो उन्होंने कहा,, मुझे भी देखना है,, आप दे दो,,

वो बोलीं,, ठीक है पर तुरंत ही वापस कर जाना,,

बस आंटी गई और आई,, घर जाकर फटाफट उस डिज़ाइन की आउटलाइंस ट्रेस की,, फूलों के कलर लिखे और दे आई,, आंटी खुश कि जल्दी ही ले आई,,

क्यों कि डिज़ाइन बनाने में कम से कम पूरा दिन लग जाता,, अब वो क्या जाने कि हम कितने छुपे रुस्तम निकले 😂

दूसरे दिन सुबह मेटी मंगा कर अगली सुबह तक तो बना डाला,, सारी रात सोये नहीं,, ऐसी थी हमारी दीवानगी और समर्पण कढ़ाई के लिए

कुछ दिनों बाद आंटी आईं हमारे घर तो टेबल क्लॉथ देखकर चौँक गई,, अरे ये डिज़ाइन तुम्हारे पास कहाँ से आ गई,,वो सोच भी नहीं सकती थी कि कोई इतनी जल्दी कॉपी कर सकता है,,

हमने भी कह दिया मेरठ से,, उनका भ्रम बने रहने देना चाहते थे हम,, मन तो कर रहा था कि कह दें,, आपका ही है आंटी,, पर कह भी देते तो यकीन नहीं होता उन्हें,, इसलिए सोचा राज़ को राज़ ही रहने दें,, इसी में भलाई है😂

कमलेश राणा
ग्वालियर

Posted in ૧૦૦૦ પ્રેરણાત્મક વાર્તાઓ

1990ની અદભૂત સત્ય ઘટના- નરેન્દ ભાઈ મોદી


1990ની અદભૂત સત્ય ઘટના

ઊંચા સંસ્કાર માટે બાળકોને અચૂક વંચાવો-સંભળાવો.

આસામથી બે છોકરીઓ રેલવેમાં ભરતી થવા ગુજરાતમાં આવવા ટ્રેનમાં બેસે છે. તેઓએ આગળ જતાં ટ્રેન બદલવાની હતી. તેઓએ સ્ટેશને ઉતરીને જલદી જલદી પોતાની ટ્રેન સોધીને રીઝર્વેશન ચાર્ટ જોયો, તો તેમની ટિકિટ કનફોમ ન હતી. બંને ગભરાઈ ઞઇ. હળબળીમાં ટ્રેનમાં તો ચડી ગઈ. ગાડી ફુલ હતી. જેમ તેમ એક જગ્યા મળી. સામે બે યુવાન પુરુષ બેઠા હતા, તેઓ આ છોકરીઓની હળબળી ગભરાટ જોઇ રહ્યા હતા. એક તો આગળની ટ્રેનમાં છોકરાઓ સામે મોટી રકઝક થઈ હતી. અને આ અજાણ્યા વિસ્તારમાં આવી રીતે યુવાન છોકરાઓનું નિરીક્ષણ કરતા જોઇને બન્ને છોકરીઓ વધારે ગભરાઈ ગઈ. ગાડીમાં કયાંય જગ્યા ન હતી તેથી બીજે ક્યાંય જઇ શકાય તેમ ન હતું. તેવામાં ટી. ટી. એ આવીને જણાવ્યું કે આ સીટનું રીઝર્વેશન છે તેથી ખાલી કરો. હવે શું કરવું ? પરંતુ હવે બને છે એવું કે, આગળનું સ્ટેશન આવે છે ત્યારે આ બંને યુવાનો ઊભા થઈને હળવેથી ચાલ્યા જાય છે. ખાલી થયેલ સીટમાં બંને છોકરીઓ ગોઠવાઈ જાય છે. ટ્રેન સ્ટેશનથી ઊપડી જાય છે, પછી પહેલા યુવાનો પાછા આવે છે. છોકરીઓ બંને સીટમાં સુતાં સુતાં ગભરાટમાં ને ગભરાટમાં ચુપચાપ જોવે છે. બંને યુવાનો કાંઇ પણ બોલ્યા વગર ત્યાં નીચે સુઇ જાય છે. છોકરીઓને ફારમાં ને ફારમાં ઊંઘ આવી જાય છે. સવારે ચા વાળાના અવાજ સાંભળીને ઊંઘ ઊડી જાય છે. ત્યારે છોકરીઓને બધી વાત સમજાય જાય અને ધન્યવાદ માને છે. બંને યુવાનોમાંથી એક યુવાન બોલે છે બહેનો આગળ કોઈ જરૃરિયાત પડે તો કહેજો. છોકરીઓએ પોતાની બુક કાઢીને આપી તેમાં નામ તથા સરનામું લખી આપવા કયું. બન્ને યુવકોએ બુકમાં નામ- સરનામા લખ્યાં અને ચાલ્યા ઞયા. બુકમાં બન્ને યુવકોના નામ હતાં એક નરેન્દ્ર મોદી અને બીજા શંકરસિંહ વાઘેલા.

પહેલી છોકરીઓમાંથી એક હાલમાં

General Manager of the centre for railway information system Indian railway New Delhi માં નોકરી કરે છે.

આ લેખ The Hindu અંગ્રેજી પેપર પેજ નં 1 ઉપર The train journey and two names to remember ના નામથી તા. 1-6-2014 ના છપાયેલ છે.

આપણા બાળકોના ઉત્તમ સંસ્કાર માટે આ લેખ બાળકોને સાથે બેસીને રૃબરૃ વાંચો વંચાવો.

અને છેલ્લે……છેલ્લે………..

આપણે બધાએ 70 વષોમાં પહેલી વખત વડાપ્રધાની પસંદગીમાં કોઈ ભૂલ કરી.નથી.

Posted in ૧૦૦૦ પ્રેરણાત્મક વાર્તાઓ

પ્રકૃતિનો ન્યાય


પ્રકૃતિનો ન્યાય

शुभेन कर्मणा सौख्यं दुःखं पापेन कर्मणा।

कृतं फलति सर्वत्र नाकृतं भुज्यते क्वचित्।। अनु०6/10

સત્કર્મ કરવાથી સુખ મળે છે અને પાપકર્મ કરવાથી દુ:ખ મળે છે. તમારા દ્વારા કરવામાં આવેલ કાર્ય દરેક જગ્યાએ ફળ આપે છે. જે કર્મ કર્યા જ નથી તે કર્મોનું ફળ ક્યારેય ભોગવાતું નથી.

કચ્છના ભૂકંપ દરમિયાન બનેલી ઘટના…

પોલીસ રાહત કાર્ય કરી રહી હતી. પોલીસ બચી ગયેલા અને મૃતકોને ઘરનાં કાટમાળ માંથી બહાર કાઢવા પ્રયત્ન કરી રહી હતી.

એક ઘરના કાટમાળની બહાર એક વૃદ્ધ માણસ બેઠો હતો. ઘર તૂટી પડ્યું હતું. પોલીસ આવી, તેની વહુની લાશ કાટમાળમાંથી બહાર કાઢી. તેના શરીર પર બધે ઘરેણાં હતા.. પોલીસે કહ્યું, “આ ઘરેણાં કાઢી લો વડીલ, કામ આવશે!

આંસુ ભરેલી આંખોથી માણસે કહ્યું.. ‘લઈ લો.. બધું… તમારે જે કરવું હોય તે કરો.. પણ, મને આ દાગીના નથી જોઈતા..

પોલીસે લાખ સમજાવવાનો પ્રયાસ કર્યો.

વૃદ્ધે ફરી કહ્યું કે, મોરબીનો ડેમ તૂટી ગયો હતો ત્યારે કોઈ ન જોતા ચુપકેથી મૃતકના ગળામાંથી ચોરી કરી આ તમામ દાગીના હું મારા ઘરે લાવ્યો હતો અને મારા પુત્રવધૂને પહેરાવ્યા હતા.

આજે મારી વહુ એ જ દાગીના પહેરી રહી છે જે હું લૂંટ સાથે લાવ્યો હતો, “મારે કંઈ જોઈતું નથી, સાહેબ!” તે રડ્યો. તમે લઈ લો…….!

કરેલું ખરાબ કર્મ ફરી ફરી ને આપણી પાસે જ આવે છે તે જ કહેવાય કર્મ ની ગતિ.

कर्मणा प्राप्यते स्वर्गः सुखं दुःखं च भारत ।। स्त्री०3/11

હે ભારત! માણસ પોતાના કર્મોથી સ્વર્ગ, સુખ અને દુ:ખની પ્રાપ્તિ કરે છે.

Harshad30.wordpress.com

8369123935

હર્ષદ અશોડીયા ક.