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एक बार की बात है किसी गाँव में एक पंडित जी रहते थे।


एक बार की बात है किसी गाँव में एक पंडित जी रहते
थे।
वैसे तो पंडित जी को वेदों और शास्त्रों का बहुत
ज्ञान था, लेकिन वह बहुत ग़रीब थे।
ना ही रहने के लिए अच्छा घर था और ना ही अच्छे
भोजन के लिए पैसे।
एक छोटी सी झोपड़ी थी, उसी में रहते थे और
भिक्षा माँगकर जो मिल जाता उसी से अपना
जीवन यापन करते थे।
एक बार वह पास के किसी गाँव में भिक्षा माँगने गये,
उस समय उनके कपड़े बहुत गंदे थे और काफ़ी जगह से फट
भी गये थे।
जब उन्होने एक घर का दरवाजा खटखटाया तो सामने
से एक व्यक्ति बाहर आया, उसने जब पंडित को फटे
चिथड़े कपड़ों में देखा तो उसका मन घ्रृणा से भर गया
और उसने पंडित को धक्के मारकर घर से निकाल
दिया।
बोलाः- “पता नहीं कहाँ से गंदा पागल चला आया
है।”
पंडित जी दुखी मन से वापस चले आये, जब अपने घर
वापस लौट रहे थे तो किसी अमीर आदमी की नज़र
पंडित के फटे कपड़ों पर पड़ी तो उसने दया दिखाई और
पंडित जी को भोजन और पहनने के लिए नये कपड़े दे
दिए।
अगले दिन पंडित जी फिर से उसी गाँव में उसी
व्यक्ति के पास भिक्षा माँगने गये।
व्यक्ति ने नये कपड़ों में पंडित जी को देखा और हाथ
जोड़कर पंडित जी को अंदर बुलाया और बड़े आदर के
साथ थाली में बहुत सारे व्यंजन खाने को दिए।
पंडित जी ने एक भी टुकड़ा अपने मुँह में नहीं डाला
और सारा खाना धीरे धीरे अपने कपड़ों पर डालने लगे
और बोलेः-“ले खा और खा।”
व्यक्ति ये सब बड़े आश्चर्य से देख रहा था, आख़िर उसने
पूछ ही लिया किः- “पंडित जी आप यह क्या कर रहे
हैं.?
सारा खाना अपने कपड़ों पर क्यूँ डाल रहे हैं.?”
पंडित जी ने बहुत शानदार उत्तर दियाः- “क्यूंकी
तुमने ये खाना मुझे नहीं बल्कि इन कपड़ों को दिया है।
इसीलिए मैं ये खाना इन कपड़ों को ही खिला रहा
हूँ, कल जब में गंदे कपड़ों में तुम्हारे घर आया तो तुमने
धक्के मारकर घर से निकाल दिया और आज तुमने मुझे
साफ और नये कपड़ों में देखकर अच्छा खाना पेश
किया।
असल में तुमने ये खाना मुझे नहीं, इन कपड़ों को ही
दिया है।”
वह व्यक्ति यह सुनकर बहुत दुखी हुआ।
मित्रों…..
किसी व्यक्ति की महानता उसके चरित्र और ज्ञान
पर निर्भर करती हैं, पहनावे पर नहीं।
अच्छे कपड़े और गहने पहनने से इंसान महान नहीं बनता
उसके लिए अच्छे कर्मों की ज़रूरत होती है……..।

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​एक चूहा एक व्यापारी के घर में बिल बना कर रहता था.​


​एक चूहा एक व्यापारी के घर में बिल बना कर रहता था.​

​एक दिन चूहे ने देखा कि उस व्यापारी ने और उसकी पत्नी एक थैले से कुछ निकाल रहे हैं. चूहे ने सोचा कि शायद कुछ खाने का सामान है.​

​उत्सुकतावश देखने पर उसने पाया कि वो एक चूहेदानी थी. ख़तरा​

​भाँपने पर उस ने पिछवाड़े में जा कर कबूतर को यह बात बताई कि घर में चूहेदानी आ गयी है.​

​कबूतर ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि मुझे क्या?​
​मुझे कौनसा उस में फँसना है?​

​निराश चूहा ये बात मुर्गे को बताने गया.​

​मुर्गे ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा… जा भाई..ये मेरी समस्या नहीं है.​

​हताश चूहे ने बाड़े में जा कर बकरे को ये बात बताई… और बकरा हँसते हँसते लोटपोट होने लगा।​

​उसी रात चूहेदानी में खटाक की आवाज़ हुई जिस में एक ज़हरीला साँप फँस गया था.​

​अँधेरे में उसकी पूँछ को चूहा समझ कर उस व्यापारी की पत्नी ने उसे निकाला और साँप ने उसे डंस लिया.​

​तबीयत बिगड़ने पर उस व्यक्ति ने वैद्य को बुलवाया. वैद्य ने उसे कबूतर का सूप पिलाने की सलाह दी.​

​कबूतर अब पतीले में उबल रहा था ।​

​खबर सुनकर उस व्यापारी के कई रिश्तेदार मिलने आ पहुँचे जिनके भोजन प्रबंध हेतु अगले दिन मुर्गे को काटा गया.​

​कुछ दिनों बाद उस व्यापारी की पत्नी सही हो गयी…​
​तो खुशी में उस व्यक्ति ने कुछ अपने शुभचिंतकों के लिए एक दावत रखी तो बकरे को काटा गया..​

​चूहा दूर जा चुका था…बहुत दूर ……….​

शयदा ये कहानी मात्र लगे आपको लेकिन ये वो कड़वा सत्य है जो हम सभी पीना नही चाहते।

​अगली बार कोई आप को अपनी समस्या बातये और आप को लगे कि ये मेरी समस्या नहीं है तो रुकिए और दुबारा सोचिये….​

​समाज का एक अंग, एक तबका, एक नागरिक खतरे में है तो पूरा देश खतरे में है…​

​अपने-अपने दायरे से बाहर निकलिये.​

​स्वयंम तक सीमित मत रहिये. .​
​समाजिक बनिये…​

​और राष्ट्र धर्म के लिए एक बनें..​

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बंदरों_की_ज़िद्द


#बंदरोंकीज़िद्द

एक बार कुछ वैज्ञानिकों ने एक बड़ा ही मजेदार प्रयोग किया..
उन्होंने 5 बंदरों को एक बड़े से पिंजरे में बंद कर दिया और बीचों -बीच एक सीढ़ी लगा दी जिसके ऊपर केले लटक रहे थे..
जैसा की अनुमान था, एक बन्दर की नज़र केलों पर पड़ी वो उन्हें खाने के लिए दौड़ा..
पर जैसे ही उसने कुछ सीढ़ियां चढ़ीं उस पर ठण्डे पानी की तेज धार डाल दी गयी और उसे उतर कर भागना पड़ा..
पर वैज्ञानिक यहीं नहीं रुके,उन्होंने एक बन्दर के किये गए की सजा बाकी बंदरों को भी दे डाली और सभी को ठन्डे पानी से भिगो दिया..
बेचारे बन्दर हक्के-बक्के एक कोने में दुबक कर बैठ गए..
पर वे कब तक बैठे रहते,कुछ समय बाद एक दूसरे बन्दर को केले खाने का मन किया..
और वो उछलता कूदता सीढ़ी की तरफ दौड़ा..
अभी उसने चढ़ना शुरू ही किया था कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया..
और इस बार भी इस बन्दर के गुस्ताखी की सज़ा बाकी बंदरों को भी दी गयी..
एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए…
थोड़ी देर बाद जब तीसरा बन्दर केलों के लिए लपका तो एक अजीब वाक्य हुआ..
बाकी के बन्दर उस पर टूट पड़े और उसे केले खाने से रोक दिया,
ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े..
अब प्रयोगकारों ने एक और मजेदार चीज़ की..
अंदर बंद बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया..
नया बन्दर वहां के नियम क्या जाने..
वो तुरंत ही केलों की तरफ लपका..
पर बाकी बंदरों ने झट से उसकी पिटाई कर दी..
उसे समझ नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर ख़ुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे..
ख़ैर उसे भी समझ आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं..
इसके बाद प्रयोगकारों ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया अंदर कर दिया..
इस बार भी वही हुआ नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने में शामिल था..
जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था!
प्रयोग के अंत में सभी पुराने बन्दर बाहर जा चुके थे और नए बन्दर अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था..
पर उनका स्वभाव भी पुराने बंदरों की तरह ही था..
वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते..
हमारे समाज में भी ये स्वभाव देखा जा सकता है..
जब भी कोई नया काम शुरू करने की कोशिश करता है,
चाहे वो पढ़ाई , खेल , एंटरटेनमेंट, व्यापार, राजनीति, समाजसेवा या किसी और क्षेत्र से सम्बंधित हो, उसके आस पास के लोग उसे ऐसा करने से रोकते हैं..
उसे असफलता का डर दिखाया जाता है..
और मजेदार बात ये है कि उसे रोकने वाले अधिकतर वो होते हैं जिन्होंने ख़ुद उस क्षेत्र में कभी हाथ भी नहीं आज़माया होता..
इसलिए यदि आप भी कुछ नया करने की सोच रहे हैं और आपको भी समाज या आस पास के लोगों के नकारात्मक विचारों को झेलना पड़ रहा है तो कान बंद कर लीजिये ..
और अपनी अंतरात्मा ,अपनी सामर्थ्य और अपने विश्वास को सुनिए..
आपको जो करना है आप वही करें।

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खाना खाते-खाते पिताजी को अचानक हिचकी आने लगी थी। हिच-हिच-हिच।


खाना खाते-खाते पिताजी को अचानक हिचकी आने लगी थी। हिच-हिच-हिच।
घबरा कर मां फौरन रसोई की ओर दौड़ी, पानी लाने। पर दादी जरा भी नहीं घबराई थीं। उन्होंने पिताजी की पीठ थपथपाई और कहने लगी कि कोई तुम्हें याद कर रहा है।
पिताजी की हिचकी रुक चुकी थी।
दादी के हिसाब से हिचकी आने का मतलब था किसी का याद करना। पिताजी को हिचकी आई, मां पानी के लिए दौड़ी, दादी ने पीठ सहला कर कह दिया कि कोई याद कर रहा है। गज़ब की समझ थी। मैं बिना कुछ कहे सब देख रहा था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि हिच-हिच-हिच का संबंध किसी के याद करने से कैसे हो सकता है।
दोपहर में खाना खाते हुए पिताजी को हिचकी आई थी। शाम होते-होते पता नहीं कैसे बुआ घर चली आई। न कोई चिट्ठी, न कोई तार। बस बुआ पिताजी से मिलने चली आई थीं।
बुआ के आते ही पूरे घर में रौनक छा गई थी।
बुआ ने घर आते ही कहा था कि सुबह से गौरी की याद आ रही थी।
हमारे घर के बाहर पिताजी के नाम की जो नेम प्लेट लगी थी, उस पर पिताजी का नाम सुशील कुमार लिखा था, लेकिन बुआ उन्हें गौरी बुलाती थीं।
मुझे तब नहीं पता था, लेकिन अब लगता है कि पिताजी का नाम गौरी वैसे ही रहा होगा, जैसे संजय सिन्हा का संजू।
खैर, उस शाम बुआ ने मुझे ढेर सारी कहानियां सुनाई थीं। पेड़ पर बैठे कौवे की कहानी। बेगिया-बेगिया बोलने वाले मैना की कहानी।
बुआ का घऱ आना मतलब पूरे घर का खिल उठना। मां बुआ को देखते ही चहक उठती थी। अहा! दीदी आ गई।
दादी की तो खुशी का ठिकाना नहीं रहता। और पिताजी! वो तो बुआ के सामने छोटे से संजू बन जाते।
बुआ पिताजी के सिर में सरसों का तेल लगातीं। उन्हें ईख का रस पिलातीं। बेसन के लड्डू खिलातीं।
भाई-बहन में इतना प्यार था, शायद इसीलिए बुआ अपने आने का संदेश अपने आने से पहले पिताजी की हिचकी में समा कर भेज दिया करती थीं।
बात सिर्फ हिचकी की नहीं थी।
अगर घर के सामने मैना ने बेगिया- बेगिया की रट लगाई, तो दादी को पता चल जाता था कि आज किसी की चिट्ठी आएगी। इसी तरह अगर सामने वाले पेड़ पर कौवे ने दो-चार बार कांव-कांव कर दिया तो दादी समझ जाती थीं कि आज कोई मेहमान आने वाला है।
ये दादी का संसार था। तब ग्राहम बेल का फोन हमारे घर नहीं लगा था, लेकिन दादी के लिए हिचकी का मतलब, याद करने वाले की मिस्ड कॉल।
इसी तरह चिट्ठी या तार लेकर डाकिया आता, उससे पहले कोई मैना घर के सामने आकर दादी को बता दिया करती थी कि आज कोई संदेश आने वाला है। दादी ने काले कौवे को पोसा भी नहीं था, लेकिन वो भी मेहमान के आने की सूचना बहुत पहले दे दिया करता था।
दादी का संचार तंत्र अनुभव के एक्सचेंज से संचालित होता था। दादी जब थीं, मोबाइल फोन का अविष्कार भी नहीं हुआ था। पर दादी को तब भी मिस्ड कॉल की भाषा पता थी।
जो सुनेगा, वही हैरान होगा, पर सच यही है कि दादी के अनुभव के एक्सचेंज से आया संदेश कभी गलत नहीं साबित हुआ। बात सिर्फ मैना, कौवा और हिचकी की नहीं। दादी ने बादलों की ओर देख कर अगर कह दिया कि आज बारिश होगी, तो कुछ ही घंटों में बादल पता नहीं कहां से उमड़-घुमड़ कर घर के आंगन में बरस जाते थे।
दादी ने कह दिया कि आज चिट्ठी आएगी तो डाकिया एक चिट्ठी घर के भीतर फेंक ही जाता। और तो और, दादी की आंखें भी फड़क कर ढेर सारे संदेश पहुंचा जाया करती थीं।
अब आप ये मत सोचिएगा कि मैं आज दादी की कहानी सुनाने बैठ गया हूं। आज तो मैं बस इतना बताना चाहता हूं कि उस दिन दादी ने पिताजी की पीठ पर थपथपाते हुए कहा था कि कोई याद कर रहा है, तो शाम को बुआ ने आकर दादी के कहे को सच साबित कर दिया था। दादी के मुताबिक जिस वक्त बुआ ने पिताजी को याद किया होगा, उसी वक्त पिताजी को हिचकी आई होगी। याद और हिचकी मतलब रिश्ते का मिस्ड कॉल।
जब दादी थीं, तब घर के आंगन में कौए भी थे, मैना भी थी।
पर दिल्ली में कहां मैना और कहां कौवा? अब तो यहां संचार के नए साधन आ गए हैं। कौवा और मैना को कौन पूछता है। आंखों के फड़कने की भाषा भी हमने नहीं सीखी। पर हिचकी है जो अभी भी कभी-कभी आ जाती है।
कल हिचकी आई तो मैंने पत्नी से कहा कि कोई मुझे याद कर रहा है। पत्नी हंसने लगी, “हिचकी का मतलब किसी का याद करना कैसे हुआ?”
“ये तो मुझे नहीं पता, लेकिन दादी कहती थीं। दादी के अनुभव के विद्यालय में एक हिचकी से कई संदेश निकलते थे। उन्हीं में से एक था याद करना।”
“हिचकी न हुई, दादी के रिश्तों की मिस्ड कॉल हो गई।”
“हां, यही समझ लो। पर कुछ तो कनेक्शन है ही हिचकी और याद करने में।”
“कुछ नहीं है, मेरे भोले संजय। खाने की पाइप में हवा चली जाती है तो हिचकी आने लगती है।”
मैं चुप था। दादी का टेलीफोन एक्सचेंज इतना आधुनिक था कि मुझे रत्ती भर संदेह नहीं था अपनी हिचकी और किसी की याद पर। मेरी पत्नी दादी के साथ थोड़े न रही है, जो उसे हिचकी का मतलब पता हो।
खाना खा कर मैं कमरे में ही थोड़ा टहल रहा था कि पत्नी को मेरी बहन का फोन आ गया। “भाभी, भैया कैसा है? उसका फोन नहीं लग रहा। कल सुबह आऊंगी ऱाखी बांधने।”
पत्नी मेरे पास आई और कहने लगी, “तुम्हारा फोन बंद है क्या?”
मैंने फोन चेक किया। मैं फोन को चार्ज करना भूल गया था। बहन ने उधर से कॉल किया होगा, फोन नहीं मिला तो उसने हिचकी के रूप में मिस्ड कॉल दे दिया था।
पत्नी मेरी और देख रही थी। मैं दादी के टेलीफोन एक्सचेंज की तकनीक को मन ही मन प्रणाम कर रहा था।
Sanjay Sinha

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समान_अवसर


समान_अवसर

एक बार एक अध्यापक कक्षा में सभी छात्रों को समझा रहे थे कि इंसान का भाग्य स्वयं इंसान के हाथ में होता है आप जैसे विचार रखोगे या जैसे कर्म करोगे आप वैसे ही बन जाओगे। ये जो प्रकृति है ये सभी को समान अवसर देती हैं लेकिन ये आप पर निर्भर है की आप अपने अवसर को कैसे इस्तेमाल करते हैं।
उदाहरण के लिए अध्यापक ने तीन कटोरे लिए और एक में आलू, दूसरे में अंडा और तीसरे में चाय की पत्ती डाल दी। अब तीनों कटोरों में पानी डालकर उनको गैस पर उबलने के लिए रख दिया। छात्र ये सब आश्चर्यपूर्वक देख रहे थे लेकिन उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। बीस मिनट बाद जब तीनों बर्तन में उबाल आने लगा तो अध्यापक ने सभी कटोरों को नीचे उतरा और आलू, अंडा और चाय को बाहर निकाला। अब सभी छात्रों से तीनों को गौर से देखने के लिए कहा गया। लेकिन कोई भी छात्र माजरे को समझ नहीं पा रहा था।
अंत में गुरु जी ने एक बच्चे से तीनों(आलू, अंडा और चाय) को स्पर्श करने के लिए बोला। जब छात्र ने आलू को हाथ लगाया तो पाया कि जो आलू पहले काफ़ी कठोर था लेकिन पानी में उबलने के बाद काफ़ी मुलायम हो गया है। अब अंडे को उठाया तो देखा जो अंडा पहले बहुत नाज़ुक था अब कठोर हो गया है। अब चाय के कप को उठाया तो देखा चाय की पत्ती ने गर्म पानी के साथ मिलकर अपना रूप बदल लिया था और अब वह चाय बन चुकी थी।
गुरु जी ने समझाया, हमने तीन अलग अलग चीज़ों को समान विपत्ति से गुज़रा अर्थात तीनों को समान रूप से पानी में उबाला लेकिन बाहर आने पर तीनों चीज़ें एक जैसी नहीं मिली। आलू जो कठोर था वो मुलायम हो गया, अंडा पहले से कठोर हो गया और चाय की पत्ती ने भी अपना रूप बदल लिया उसी तरह यही बात इंसानों पर भी लागू होती है। एक इंसान विपत्ति में अपना धैर्य खो देता है और वहीं दूसरा बुद्धिमान इंसान विपत्ति का सामना करते हुए अपने लक्ष्य को साकार करता है।

परमेश्वर सभी को समान अवसर और विपत्ति प्रदान करते हैं लेकिन ये पूरी तरह आप पर निर्भर है की आप कैसा बनाना चाहते हैं और किस तरह आप अपने जीवन को ढालते हैं।

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विद्वता_और_मानवता


विद्वताऔरमानवता

एक बहुत बड़ा मंदिर था। उसमें हजारों यात्री दर्शन करने आते थे। सहसा मंदिर का प्रबंधक प्रधान पुजारी मर गया। मंदिर के महंत को दूसरे पुजारी की आवश्यकता हुई और उन्होंने घोषणा करा दी कि जो कल सवेरे पहले पहर आकर यहां पूजा संबंधी जांच में ठीक सिद्ध होगा, उसे पुजारी रखा जाएगा।

बहुत से विद्वान सवेरे पहुंचने के लिए चल पड़े। मंदिर पहाड़ी पर था। एक ही रास्ता था। उस पर भी कांटे और कंकड़-पत्थर थे। विद्वानों की भीड़ चली जा रही थी मंदिर की ओर। किसी प्रकार कांटे और कंकड़ों से बचते हुए लोग जा रहे थे।

सब विद्वान पहुंच गए। महंत ने सबको आदरपूर्वक बैठाया। सबको भगवान का प्रसाद मिला। सबसे अलग-अलग कुछ प्रश्र और मंत्र पूछे गए। अंत में परीक्षा पूरी हो गई। जब दोपहर हो गई और सब लोग उठने लगे तो एक नौजवान वहां आया। उसके कपड़े फटे थे। वह पसीने से भीग गया था और बहुत गरीब जान पड़ता था।

महंत ने कहा- ‘‘तुम बहुत देर से आए।’’

वह बोला- ‘‘मैं जानता हूं। मैं केवल भगवान का दर्शन करके लौट जाऊंगा।’’

महंत उसकी दशा देखकर दयालु हो रहे थे। बोले- ‘‘तुम जल्दी क्यों नहीं आए?’’

उसने उत्तर दिया- ‘‘घर से बहुत जल्दी चला था। मंदिर के मार्ग में बहुत कांटे थे और पत्थर भी थे। बेचारे यात्रियों को उनसे कष्ट होता। उन्हें हटाने में देर हो गई।’’

महंत ने पूछा- ‘‘अच्छा, तुम्हें पूजा करना आता है?’’

उसने कहा- ‘‘भगवान को स्नान कराके चंदन-फूल चढ़ा देना, धूप-दीप जला देना तथा भोग सामने रखकर पर्दा गिरा देना और शंख बजाना तो जानता हूं।’’

महंत ने पूछा- ‘‘और मंत्र?’’

वह उदास होकर बोला- ‘‘भगवान से नहाने-खाने को कहने के लिए मंत्र भी होते हैं, यह मैं नहीं जानता।’’

अन्य सब विद्वान हंसने लगे कि यह मूर्ख भी पुजारी बनने आया है। महंत ने एक क्षण सोचा और कहा- ‘‘पुजारी तो तुम बन गए। अब मंत्र सीख लेना, मैं सिखा दूंगा। मुझसे भगवान ने स्वप्न में कहा है कि मुझे मनुष्य चाहिए।’’

‘‘हम लोग मनुष्य नहीं हैं?’’ दूसरे आमंत्रितों ने पूछा।

वे लोग महंत पर नाराज हो रहे थे। इतने पढ़े-लिखे विद्वानों के रहते महंत एक ऐसे आदमी को पुजारी बना दे जो मंत्र भी न जानता हो, यह विद्वानों को अपमान की बात जान पड़ती थी।

महंत ने विद्वानों की ओर देखा और कहा- ‘‘अपने स्वार्थ की बात तो पशु भी जानते हैं। बहुत से पशु बहुत चतुर भी होते हैं लेकिन सचमुच मनुष्य तो वही है जो दूसरों को सुख पहुंचाने का ध्यान रखता है, जो दूसरों को सुख पहुंचाने के लिए अपने स्वार्थ और सुख को छोड़ सकता है।’’

विद्वानों के सिर नीचे झुक गए। उन लोगों को बड़ी लज्जा आई। वे धीरे-धीरे उठे और मंदिर में भगवान को और महंत जी को नमस्कार करके उस पर्वत से नीचे उतरने लगे।

दोस्तों!! सोचने की बात है कि हममें से कौन मनुष्य है?

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सन् 2004 के आस पास एक दूरस्थ रेगिस्तानी गाँव में पोस्टिंग थी।


Deepak Kumar Choudhary

सन् 2004 के आस पास एक दूरस्थ रेगिस्तानी गाँव में पोस्टिंग थी।
एक ताऊजी से बहुत स्नेह हो गया था।माता जी भी पूरा ध्यान रखती थी। गाँव में पानी का एकमात्र स्रोत आर्मी का ट्यूबवेल था।
जब वह चलता, गांव वाले फटाफट मटके घड़े आदि भर लेते।जब बन्द होता, तब उसके चलने की प्रतीक्षा करते।
काल क्रम से ताऊजी का स्वर्गवास हो गया।
माताजी बड़ी उद्विग्न और एकाकी महसूस करती। मुझे भी उनकी याद आती थी।
एक बार वे आवास आयींऔर बोली-“उनकी स्मृति में कुछ बनाना चाहती हूँ।कुल जमा 5000₹ है।तुम बताओ क्या बन सकता है?”
काफी सोच विचार के बाद तय हुआ कि ट्यूबवेल में जहाँ घड़े भरे जाते है वहाँ एक पानी का टैंक बनाया जाना चाहिए।
हिसाब लगाया…कारीगर, मजदूर, सीमेंट, पत्थर, बजरी…कम से कम 10हजार रूपये चाहिए।
वे उदास हो गईं।
जिन परिवारों में सुबह शाम के भोजन का ठिकाना नहीँ वहाँ बजट दुगुना हो जाए तो क्या स्थिति बनती है?
कहीँ और से व्यवस्था का सुझाव…उन्होंने दृढ़ता से नकार दिया।
अंत में उन्होंने निर्णय लिया कि टैंक का आकार कुछ छोटा कर दिया जाय और मजदूर की जगह वे स्वयं कार्य करेंगी।
दिसम्बर महीने की ठिठुरन में कुल पन्द्रह दिन में टैंक बनकर तैयार हुआ।
ट्यूबवेल जब चलता तो उसे भर दिया जाता।
पूरे गांव को बहुत बड़ी सुविधा मिल गई।
रामगढ़ से तनोट की दुरी 55किमी है।
33किमी पर यह एकमात्र जलस्रोत, अब तक हजारों लोगों की प्यास बुझा चुका है।
पास के विद्यालय के बच्चों को “एनी टाइम वाटर” उपलब्ध है।
एक तरफ जहाँ आजादी के50 वर्षों तक जलदाय विभाग, बहाने बनाता रहा…नहरों में हजारों गैलन पानी की चोरी होती रही…सरकारी पाइप लाइन से झरने फूटकर गटर में बहते रहे…वहीँ दूसरी ओर अपने ही गांव की धरती से निकले जल के लिए घण्टों गिड़गिड़ाने वाले इन मासूम ग्रामवासियों और हजारों तीर्थ यात्रियों की असुविधा की चिंता करने वाली 70वर्ष की वृद्ध माँ की बहुत याद आती है।
जब मै भारत माता लिखता हूँ तो वे माता आँखों के सामने आ जाती है।
जिसे दुनिया अनपढ़, गंवार मानती है…उनके द्वारा अपने पति को दी गई श्रद्धांजलि से और भला क्या याद आता होगा?
यही है मेरी #भारत_माता