Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

कानपुर में पुष्पा की बारात आयीl
पुष्पा के बाबू सब बारातियों के भव्य स्वागत की गजब तैयारी किये थे .
..
कुल सत्तर बारातियों के लिये सत्तर किस्म के व्यंजन तो केवल जनवासे मे परोसे गये

साथ मे खालिस दूध की काफी और मेवे अलग से बारह तरह की शुद्ध देसी घी की मिठाइयाँ

और स्पेशल मूँग का हलवा भी ..

बारातियों के ठहरने के लिये बड़े-बड़े हॉल नूमा कमरों में सत्तर मुलायम बिस्तर लगवाये गये

हर बिस्तर के सिरहाने एक एक टेबल फैन और हर दो बिस्तर के बीच एक फर्राटेदार पाँच फुटा कूलर ..

.नहाने के लिये खुशबूदार साबुन
..
.साथ मे झक सफेद रूई जैसी कोमल एक एक तौलिया सबको ..

.सफाई इतनी की जो लोग सबके सामने आईना देखने मे संकोच कर रहे थे

वो आयें बायें करके चोरी चोरी फर्श पर ही खुद को निहार रहे थे …

.रात भर खाने पीने का फुल इंतजाम
और
सुबह कलेवा मे हर बाराती को एक एक चाँदी का सिक्का और पाँच सौ एक रुपया नगद भी दिया गया !!!!!!

इस इंतजाम पे बारातियो की प्रतिक्रिया देखिये🙄🙄🙄🙄🙄🙄🙄

1-समधी जी इत्ती घोर बेइज्जती करीन है हम लोगन का बुलाय के की पूछौ मत ..l
2-जइसे हम लोग कबहु देसी घी और मेवा न खाय होये l
3- खिलाय खिलाय पेट खराब कर दिहिन l
4-का हम लोग कबहूं खुशबू वाला साबुन नाहि लगाये हैं l
5-इत्ते मुलायम बिस्तरा पर लेटाय दिहिन की सार पिठे झुराय लागि l
6-जब पंखा लगाय दिये रहें तौ कूलरवा लगाय की का जुरुरत रही …रतिया भर खटर पटर से कनवा पक गवा l
7-खनवा उबलत उबलत परोस दिहिन हमार तो मुहे जल गवा
8-इत्ती मुलायम तौलिया से तो छोट लड़कन का बदन पुछावा जात है हम लोगन की खातिर तो तनी गरु तौलिया होये चाही l
9-अरे आपन पैसवा दिखाय रहेन हैं हम लोगन का l
10-अब चाँदी वांदी का को पूछत है देय का रहा है तो एक्को सफारी सूट दय देते l

मोरल ऑफ द स्टोरी इज

मोदी जी,
आप कितना भी अच्छा करने की कोशिश कीजिये कुछ लोगो को कमी निकालने की आदत होती ही है …हिन्दुस्तान में हर आदमी
को यही पता है कि हर चीज
यदि फ्री मिले तो ही अच्छे दिन मानता है मोदी जी भी कया करें आप ही बताये।😊

संजय गुप्ता

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सकारात्मक सोच❤

एक राजा था जिसकी केवल एक टाँग और एक आँख थी।उस राज्य में सभी लोग खुशहाल थे क्यूंकि राजा बहुत बुद्धिमान और प्रतापी था।एक बार राजा के विचार आया कि क्यों खुद की एक तस्वीर बनवायी जाये।फिर क्या था, देश विदेशों से चित्रकारों को बुलवाया गया और एक से एक बड़े चित्रकार राजा के दरबार में आये।राजा ने उन सभी से हाथ जोड़ कर आग्रह किया कि वो उसकी एक बहुत सुन्दर तस्वीर बनायें जो राजमहल में लगायी जाएगी।
सारे चित्रकार सोचने लगे कि राजा तो पहले से ही विकलांग है, फिर उसकी तस्वीर को बहुत सुन्दर कैसे बनाया जा सकता है ?ये तो संभव ही नहीं है और अगर तस्वीर सुन्दर नहीं बनी तो राजा गुस्सा होकर दंड देगा।यही सोचकर सारे चित्रकारों ने राजा की तस्वीर बनाने से मना कर दिया।
तभी पीछे से एक चित्रकार ने अपना हाथ खड़ा किया और बोला कि मैं आपकी बहुत सुन्दर तस्वीर बनाऊँगा जो आपको जरूर पसंद आएगी।फिर चित्रकार जल्दी से राजा की आज्ञा लेकर तस्वीर बनाने में जुट गया।काफी देर बाद उसने एक तस्वीर तैयार की जिसे देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और सारे चित्रकारों ने अपने दातों तले उंगली दबा ली।
उस चित्रकार ने एक ऐसी तस्वीर बनायीं जिसमें राजा एक टाँग पूरी तरह से दिखाई दे ऐसे घोड़े पर बैठा है,और एक आँख रानी साहिबा के लटक रहे झुल्फो से ढकी हुई है!राजा ये देखकर बहुत प्रसन्न हुआ कि उस चित्रकार ने राजा की कमजोरियों को छिपाकर कितनी चतुराई से एक सुन्दर तस्वीर बनाई है।राजा ने उसे खूब इनाम एवं धन दौलत दी।
तो क्यों ना हम भी।दूसरों की कमियों को छुपाएँ,उन्हें नजरअंदाज करें और अच्छाइयों पर ध्यान दें।आजकल देखा जाता है कि लोग एक दूसरे की कमियाँ बहुत जल्दी ढूंढ लेते हैं चाहें हममें खुद में कितनी भी बुराइयाँ हों लेकिन हम हमेशा दूसरों की बुराइयों पर ही ध्यान देते हैं कि अमुक आदमी ऐसा है, वो वैसा है।
हमें नकारात्मक परिस्थितियों में भी सकारात्मक सोचना
चाहिए और हमारी सकारात्मक सोच हमारी हर समस्यों को हल करती है 🙏

संजय गुप्ता

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एक महिला की बीच सड़क पर कार खराब हुई और शाम ढलने को आई थी,वो महिला खुद से जितना प्रयत्न कर सकती थी अपने मोटर को सही करने की उसने किए पर वो नहीं ठीक हुई,दुर एक पति पत्नी साईकल पर आते परिलक्षित हुए जो शायद बाजार से लौट रहें थे क्योंकि साईकल की हैंडल पर एक सामान से भरे थैले लटके हुए थे!

वे पत्नी पति जब उस खराब मोटर के पास पहुँचे और उस महीला को हैरान परेशान देखा तो पति ने अपनी साईकल खड़ी कर दी और मोटर के नजदीक जाकर उस महिला से कहा,,दीदी मैं देखु क्या,? वो महिला तो पहले ठोडे आश्चर्य में पड गयी की एक साईकल वाला मोटर सही करने को बोल रहा हैं पर फिर उन्होंने कहा,,रहने दो तुमसे नहीं होगे,,पर उस आदमी ने फिर कहा की दीदी रात होने को हैं और आपको शहर जाना हैं और ये मोटर चालु नही हुई तो आप क्या करोगे इस सुनसान जगह पर तो मुझे देखने दीजिए!

उस आदमी की पत्नी जो गर्भवती थी दुर खड़ी होकर ये सब देख रही थी,उस आदमी ने मोटर की बोनट में कुछ आवश्यक छेड़छाड़ की और महिला को कार स्टार्ट करने को बोला,,महिला के सेल्फ मारते ही कार भनभना कर चालु हो गयी ढेर सारे काले धुएँ के साथ!

दीदी इसके कार्बुरेटर को शहर जाकर दिखा लेना जरा सा कचरे आ गये है,अच्छा दीदी आप जाओ आपको पहले ही बहोत देर हो चुकी है और शहर के अभी और 30 किलोमीटर की दुरी पर हैं,मोटर वाली महिला भौचक्का होकर उस लड़के को देख रही थी और अपने पर्स से पांच सौ रूपये निकाल कर उस लड़के के हाथ पर रखा पर उस लड़के ने अपने कंधे पर टंगे गमछे में हाथ पोछते हुए कहा की दीदी इसके कैसे पैसे,?कुछ भी तो नही किया मैने,;नही दीदी मैं ये पैसे नही ले सकता,,थैक्यु दीदी,,!

पीछे से उस लड़के की पत्नी ने आवाज लगाई,,ओ कलुआ घर नही चलने क्या,?अब तो मोटर भी चालु हो गये और देख अंधेरे भी कितने घने होने को आए,लड़के ने मोटर वाली महिला को अच्छा दीदी अब हम जाएंगे ऐसा कहकर वहाँ से चला गया और सभी लोग अपने अपने रास्ते पर अपने गंतव्य की और बढ़ गये!

चुकि ये लड़का(कलुआ) शहर के किसी मोटर फैक्टरी में मैकेनिक के काम करता था पर मोटर कंपनी में काम नहीं होने की वजह से इसकी नौकरी जाती रहीं और ये अपने गाँव पर आ गया था,,कुछ दिनों के बाद एक रात उस लड़के की पत्नी को पेट में भयानक प्रसव पीड़ा हुई और आनन फानन में लड़के और उसके गाँव वाले ने कलुआ की पत्नी को नजदीक के शहर के अस्पताल में दाखिले करवाएँ!

कलुआ के पत्नी को आॅपरेशन की जरूरत थी और कलुआ के पास पर्याप्त पैसे भी नही थे पर क्या करें कलुआ,,?उसने ऑपरेशन के लिए नर्स को हाँ कह दिया और बाकी पैसे की जुगाड मे वापस अपने गाँव को आया और इधर उस अस्पताल की बड़ी लेडी डाॅक्टरनी ने कलुआ के पत्नी के सफल ऑपरेशन किए और कलुआ एक खुबसुरत सी बिटिया के बाप बन गया,जच्चा बच्चा दोनों स्वस्थ थे!

कलुआ को गाँव में पैसे जुगाड नही हो पाएँ फिर अगले दिन कलुआ अस्पताल को गया और पुछताछ काऊंटर पर अपने पत्नी के ऑपरेशन और तमाम दवाइयों के खर्च के बारे में जानना चाहा,,नर्स ने कलुआ के जमा कराए पैसे को घटा कर और दस हजार देने को बोला,कलुआ सोच मे पड़ गया की अब इतने पैसे किधर से लाऊँ तभी पीछे से किसी ने कलुआ के कंधे पर हाथ रखें और कहा,,आपको अब कोई पैसे नही जमा कराने होंगे और आप अपनी पत्नी के साथ घर भी जा सकते हो!

कलूआ ने जब आश्चर्यचकित होकर पीछे मुड कर देखा तो ये कोई और नही ये तो वही मोटर वाली दीदी थी जो कलुआ को देखकर मुस्कुरा रही थी,कलुआ ने पुछा की आप मेरे पैसे क्यो दोगी दीदी,,तो उन हेड लेडी डाॅक्टरनी जिसे कलुआ दीदी कहता था उन्होंने कहा,,तुमने उस दिन मदद की मेरी और तुमको वो काम आते थे(मोटर रेपयरिंग) बस आज मैने भी वहीं किए जो तुमने उस दिन किए और ये काम (ऑपरेशन/चिकित्सा) मेरे काम है जो मुझे आते हैं!

दोस्तों आपको पोस्ट पसंद आए तो रिशेयर जरूर करना और हमारी जितने सामर्थ्य हो हम उतने ही में लोगों की मदद जरूर करें,हमारे किसी को किए मदद हमें ही वापस मिलेंगे बस किसी और रूप में,धन्यवाद सबके🙏

संजय गुप्ता

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#देनेवालाकौन?
आज हमने भंडारे में भोजन करवाया। आज हमने ये बांटा, आज हमने वो दान किया। हम अक्सर ऐसा कहते और मानते हैं। इसी से सम्बंधित एक अविस्मरणीय कथा है
एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियां काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था।
एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से मुलाकात हो जाए, मेरी एक फरियाद उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूछना।
कुछ दिनों बाद उसे वह साधु फिर मिला। लकड़हारे ने उसे अपनी फरियाद की याद दिलाई तो साधु ने कहा कि- “प्रभु ने बताया हैं कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष हैं और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं। इसलिए प्रभु उसे थोड़ा अनाज ही देते हैं ताकि वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके।” समय बीता। साधु उस लकड़हारे को फिर मिला तो लकड़हारे ने कहा – “ऋषिवर…!! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो तो मेरी यह फरियाद उन तक पहुँचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूं।”
अगले दिन साधु ने कुछ ऐसा किया कि लकड़हारे के घर ढ़ेर सारा अनाज पहुँच गया। लकड़हारे ने समझा कि प्रभु ने उसकी फरियाद कबूल कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दिया हैं।
उसने बिना कल की चिंता किए, सारे अनाज का भोजन बनाकर फकीरों और भूखों को खिला दिया और खुद भी भरपेट खाया।
लेकिन अगली सुबह उठने पर उसने देखा कि उतना ही अनाज उसके घर फिर पहुंच गया हैं। उसने फिर गरीबों को खिला दिया। फिर उसका भंडार भर गया।
यह सिलसिला रोज-रोज चल पड़ा और लकड़हारा लकड़ियां काटने की जगह गरीबों को खाना खिलाने में व्यस्त रहने लगा।
कुछ दिन बाद वह साधु फिर लकड़हारे को मिला तो लकड़हारे ने कहा- “ऋषिवर ! आप तो कहते थे कि मेरे जीवन में सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, लेकिन अब तो हर दिन मेरे घर पाँच बोरी अनाज आ जाता हैं।”
साधु ने समझाया, “तुमने अपने जीवन की परवाह ना करते हुए अपने हिस्से का अनाज गरीब व भूखों को खिला दिया। इसीलिए प्रभु अब उन गरीबों के हिस्से का अनाज तुम्हें दे रहे हैं।”
कथासार- किसी को भी कुछ भी देने की शक्ति हम में है ही नहीं, हम देते वक्त ये सोचते हैं, की जिसको कुछ दिया तो ये मैंने दिया! दान, वस्तु, ज्ञान, यहाँ तक की अपने बच्चों को भी कुछ देते दिलाते हैं, तो कहते हैं मैंने दिलाया ।
वास्तविकता ये है कि वो उनका अपना है आप को सिर्फ परमात्मा ने निमित्त मात्र बनाया हैं। ताकी उन तक उनकी जरूरते पहुचाने के लिये। तो निमित्त होने का घमंड कैसा ??

दान किए से जाए दुःख, दूर होएं सब पाप।।
नाथ आकर द्वार पे, दूर करें संताप।।

संजय गुप्ता

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रोहिगया मुसलमानों को भारत में बसने का निमंत्रण देने वाले हिंदुओं के लिए

आप एक प्रयोग कीजिये, एक भगौने में पानी डालिये और उसमे एक मेढक छोड़ दीजिये। फिर उस भगौने को आग में गर्म कीजिये।

जैसे जैसे पानी गर्म होने लगेगा, मेढक पानी की गर्मी के हिसाब से अपने शरीर को तापमान के अनकूल सन्तुलित करने लगेगा।

मेढक बढ़ते हुए पानी के तापमान के अनकूल अपने को ढालता चला जाता है और फिर एक स्थिति ऐसी आती है की जब पानी उबलने की कगार पर पहुंच जाता है। इस अवस्था में मेढक के शरीर की सहनशक्ति जवाब देने लगती है और उसका शरीर इस तापमान को अनकूल बनाने में असमर्थ हो जाता है।
अब मेढक के पास उछल कर, भगौने से बाहर जाने के अलावा कोई चारा नही बचा होता है और वह उछल कर, खौलते पानी से बाहर निकले का निर्णय करता है।

मेढक उछलने की कोशिश करता है लेकिन उछल नही पाता है। उसके शरीर में अब इतनी ऊर्जा नही बची है की वह छलांग लगा सके क्योंकि उसकी सारी ऊर्जा तो पानी के बढ़ते हुए तापमान को अपने अनुकूल बनाने में ही खर्च हो चुकी है।

कुछ देर हाथ पाँव चलाने के बाद, मेढक पानी मर पर मरणासन्न पलट जाता है और फिर अंत में मर जाता है।

यह मेढक आखिर मरा क्यों?

सामान्य जन मानस का वैज्ञानिक उत्तर यही होगा की उबलते पानी ने मेढक की जान ले ली है लेकिन यह उत्तर गलत है।

सत्य यह है की मेढक की मृत्यु का कारण, उसके द्वारा उछल कर बाहर निकलने के निर्णय को लेने में हुयी देरी थी। वह अंत तक गर्म होते मौहोल में अपने को ढाल कर सुरक्षित महसूस कर रहा था। उसको यह एहसास ही नही हुआ था की गर्म होते हुए पानी के अनुकूल बनने के प्रयास ने, उसको एक आभासी सुरक्षा प्रदान की हुयी है। अंत में उसके पास कुछ ऐसा नही बचता की वह इस गर्म पानी का प्रतिकार कर सके और उसमे ही खत्म हो जाता है।
मुझे इस कहानी में जो दर्शन मिला है वह यह की यह कहानी मेढक की नही है, यह कहानी ‘हिन्दू’ की है।

यह कहानी, सेकुलर प्रजाति द्वारा हिन्दू को दिए गए आभासी सुरक्षा कवच की है।

यह कहानी, अपने सेकुलरी वातावरण में ढल कर, सकूँ की ज़िन्दगी में जीते रहने की, हिन्दू के छद्म विश्वास की है।

यह कहानी, अहिंसा, शांति और दुसरो की भावनाओ के लिहाज़ को प्राथिमकता देने में, उचित समय में निर्णय न लेने की है।

यह कहानी, सेकुलरो के बुद्धजीवी ज्ञान, ‘मेढक पानी के उबलने से मरा है’ को मनवाने की है।

यह कहानी, धर्म के आधार पर हुए बंटवारे के बाद, उद्वेलित समाज के अनकूल ढलने के विश्वास पर, वहां रुक गए हिन्दुओ के अस्तित्व के समाप्त होने की है।

यह कहानी, कश्मीरियत का अभिमान लिए कश्मीरी पंडितो की कश्मीर से खत्म होने की है।

यह कहानी, सेकुलरो द्वारा हिन्दू को मेढक बनाये रखने की है।

यह कहानी, आपके अस्तिव को आपके बौद्धिक अहंकार से ही खत्म करने की है।

लेकिन यह एक नई कहानी भी कहती, यह मेरे द्वारा मेढक बनने से इंकार की भी कहानी है! मेरी कहानी, आपकी भी हो सकती है यदि आप, आज यह निर्णय करे की अब इससे ज्यादा गर्म पानी हम बर्दाश्त करने को तैयार नही है।

मेरी कहानी, आपकी भी हो सकती है यदि आप, आज जातिवाद, क्षेत्रवाद, आरक्षण और ज्ञान के अहंकार को तज करके, मेढक से हिन्दू बनने को तैयार है।

आइये! थामिये, एक दूसरे का हाथ और उछाल मार कर और बाहर निकल आइये, इस मृत्युकारकप सेक्युलरि सडांध के वातावरण से और वसुंधरा को अपनी नाद से गुंजायमान कीजिये, “हम हिन्दू है! हम आर्य है! हम भारत है!

रवि रंजन

Posted in ज्योतिष - Astrology

नजर लगना एक सामान्य प्रक्रिया है। जब किसी को नजर
लगती है वह असहज हो जाता है जैसे
यदि किसी बच्चे को नजर लगती है वह रोने
लगता है, उसका बदन तपने लगता है, वह चिढ़चिढ़ा हो जाता आदि।
हमारे यहां नजर उतारने के कई तरीके प्रचलित हैं।
यहां हम आपको बता रहे हैं नजर उतारने के अचूक उपाय। इन
उपायों से कैसे ही बुरी नजर हो, उतर
जाती है।
उपाय
1 – नजर लगे व्यक्ति को लिटाकर फिटकरी का टुकड़ा सिर
से पांव तक सात बार उतारें। ध्यान रखें हर बार सिर से पांव तक ले
जाकर तलुवे छुआकर फिर सिर से घुमाना शुरु करें। इस
फिटकरी के टुकड़े को कण्डे की आग पर
डाल दें।
2- राई के कुछ दाने, नमक की सात डली और
सात साबुत डंठल वाली लाल सूखी मिर्च बाएं
हाथ की मुट्ठी में लेकर नजर लगे
व्यक्ति को लिटाकर सिर से पांव तक सात बार उतारा करें और जलते
हुए चूल्हे में झोंक दें। यह टोटका अनटोका करें। यह कार्य
मंगलवार व शनिवार के दिन करें तो बेहतर रहता है।
3- यदि बच्चे को नजर लगी हो और वह दूध
नहीं पी रहा हो तो थोड़ा दूध एक
कटोरी में लेकर बच्चे के ऊपर से सात बार उतार कर काले
कुत्ते को पिला दें। बच्चा दूध पीने लगेगा।
4- एक साफ रुमाल पर हनुमानजी के पांव का सिंदूर लगाएं
और इस रुमाल पर दस ग्राम काले तिल, दस ग्राम काले उड़द, एक
लोहे की कील, तीन साबूत लाल
मिर्च लेकर उसकी पोटली बना लें। जिस
व्यक्ति को नजर लगी हो उसके सिरहाने यह
पोटली रख दें। चौबीस घंटे के बाद यह
पोटली किसी नदी या बहते हुए
जल में बहा दें। यह बहुत
ही प्रभावशाली टोटका है।
5- एक रोटी बनाएं और इसे एक तरफ से
ही सेकें, दूसरी तरफ से
कच्ची छोड़ दें। इसके सेके हुए भाग पर तेल
या घी लगाकर नजर लगे व्यक्ति के ऊपर से सात बार
उतार कर किसी चौराहे पर रख आएं।

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक सेठ और सेठानी रोज सत्संग में जाते थे।

सेठ के घर एक पिंजरे में तोता पाला हुआ था।
तोता एक दिन पूछता है- सेठ जी! आप रोज कहाँ जाते हैं?

सेठ बोला- सत्संग में ज्ञान सुनने जाते हैं।

तोता कहता है- सेठ जी! संत-महात्मा से एक बात पूछना,
कि मैं आजाद कब होऊंगा?

सेठ सत्संग खत्म होने के बाद संत से पूछता है- महाराज! हमारे घर में जो तोता है,
उसने पूछा है कि वो आजाद कब होगा?

संत ऐसा सुनते ही बेहोश होकर गिर जाते हैं।

सेठ संत की हालत देख कर चुप-चाप वहाँ से निकल जाता है।

घर आते ही तोता सेठ से पूछता है- सेठ जी! संत ने क्या कहा?

सेठ कहता है- तेरी किस्मत ही खराब है,
जो तेरी आजादी का पूछते ही संत बेहोश हो गए।

तोता कहता है- कोई बात नही सेठ जी! मैं सब समझ गया।

दूसरे दिन जब सेठ सत्संग में जाने लगता है,
तब तोता पिंजरे में जानबूझकर बेहोश होकर गिर जाता है।

सेठ उसे मरा हुआ मानकर जैसे ही उसे पिंजरे से बाहर निकालता है,
तो वो उड़ जाता है।

सत्संग जाते ही संत सेठ से पूछते हैं- कल आप उस तोते के बारे में पूछ रहे थे ना,
अब वो कहाँ है?

सेठ कहता है- हाँ महाराज! आज सुबह-सुबह वो जानबूझकर बेहोश हो गया।
मैंने देखा कि वो मर गया है,
इसलिये मैंने उसे जैसे ही बाहर निकाला तो वो उड़ गया।

तब संत ने सेठ से कहा- देखो! तुम इतने समय से सत्संग सुनकर भी आज तक सांसारिक मोह-माया के पिंजरे में ही फंसे हुए हो,
और उस तोते को देखो! बिना सत्संग में आये मेरा एक इशारा समझकर आजाद हो गया।

हम सत्संग में तो जाते हैं और ज्ञान की बातें करते हैं या सुनते भी हैं,
पर हमारा मन हमेशा सांसारिक बातों में ही उलझा रहता है।
सत्संग में भी हम सिर्फ उन बातों को ही पसंद करते हैं,
जिसमें हमारा स्वार्थ सिद्ध होता है।
जबकि सत्संग जाकर हमें सत्य को स्वीकार कर,
सभी बातों को महत्व देना चाहिये।
और जिस असत्य, झूठ और अहंकार को हम धारण किये हुए हैं,
उसे साहस के साथ मन से उतारकर सत्य को स्वीकार करना चाहिए।

संजय गुप्ता