Posted in मोदी केयर - Modi Care - મોદી કેર

अल्पेश गज्जर सर


*🎊💥अल्पेश सर की सूरत मीटिंग से कुछ स्वर्णिम बिंदु-*
◆पैसे बचा बचाकर कोई अमीर नही बनता, पैसे कमाकर अमीर बना जाता है।
◆ये बिजनेस प्लांनिंग और स्ट्रेटीजीति से नही चलता, आपके माइंडसेट से चलता है। कुछ चीजें चेंज करना जरूरी है।
◆आप बीज कहीं लगाएंगे और फल कहीं और से मिलने लगते है। मेरे अधिकतर हाईएस्ट अर्नर लीडर मैने नही जोड़े। उनको वे छोड़ गए, जिनको मैने जोड़ा था। काम करते रहिए। सब हो जाएगा।
◆बिजनेस कम तक नही होता जब टीम नीचे जाती है। तब कम होता है, जब आपकी सोच नीचे जाती है।
◆कोरोना के बाद सबसे बड़ा नुकसान हुआ कि लोग आलसी हो गए। लोगों की काम करने की आदत नही रही। हम लोगों का तो कुछ नही कर सकते पर खुद की जिंदगी के लिए अपने आप को तो ईमानदारी से फील्ड में धक्का मार सकते है न।
◆बड़े लिडर्स की जिम्मेदारी है कि टीम में जाए और ट्रेनिंग्स, मीटिंग्स, सेमीनार ले लेलेकर टीम को सपोर्ट करें। बिजनेस अपने आप ऊपर आने लग जाएगा।

*_धन्यवाद आदरणीय अल्पेश सर….. हम भाग्यशाली नही सौभाग्यशाली है कि हमें आप मेंटर के रूप में मिले है🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻😊😊_*

Posted in संस्कृत साहित्य

बच्चों के नाम गलत न रखें।

हिन्दूओं के एक बहुत बड़े वर्ग को न जाने हो क्या गया है?
उत्तर भारतीय हिन्दू समाज पथभ्रष्ट एवं दिग्भ्रमित हो गया है.
एक सज्जन ने अपने बच्चों से परिचय कराया, बताया पोती का नाम अवीरा है, बड़ा ही यूनिक नाम रखा है। पूछने पर कि इसका अर्थ क्या है, बोले कि बहादुर, ब्रेव कॉन्फिडेंशियल। सुनते ही दिमाग चकरा गया। फिर बोले कृपा करके बताएं आपको कैसा लगा? मैंने कहा बन्धु अवीरा तो बहुत हीअशोभनीय नाम है। नहीं रखना चाहिए. उनको बताया कि
1. जिस स्त्री के पुत्र और पति न हों. पुत्र और पतिरहित (स्त्री)
2. स्वतंत्र (स्त्री) उसका नाम होता है अवीरा.
नास्ति वीरः पुत्त्रादिर्यस्याः सा अवीरा

उन्होंने बच्ची के नाम का अर्थ सुना तो बेचारे मायूस हो गए, बोले महाराज क्या करें अब तो स्कूल में भी यही नाम हैं बर्थ सर्टिफिकेट में भी यही नाम है। क्या करें?

आजकल लोग नया करने की ट्रेंड में कुछ भी अनर्गल करने लग गए हैं जैसे कि लड़की हो तो मियारा, शियारा, कियारा, नयारा, मायरा तो अल्मायरा … लड़का हो तो वियान, कियान, गियान, केयांश …और तो और इन शब्दों के अर्थ पूछो तो दे गूगल … दे याहू … और उत्तर आएगा “इट मीन्स रे ऑफ लाइट” “इट मीन्स गॉड्स फेवरेट” “इट मीन्स ब्ला ब्ला”

नाम को यूनीक रखने के फैशन के दौर में एक सज्जन ने अपनी गुड़िया का नाम रखा “श्लेष्मा”. स्वभाविक था कि नाम सुनकर मैं सदमें जैसी अवस्था में था. सदमे से बाहर आने के लिए मन में विचार किया कि हो सकता है इन्होंने कुछ और बोला हो या इनको इस शब्द का अर्थ पता नहीं होगा तो मैं पूछ बैठा “अच्छा? श्लेष्मा! इसका अर्थ क्या होता है? तो महानुभाव नें बड़े ही कॉन्फिडेंस के साथ उत्तर दिया “श्लेष्मा” का अर्थ होता है “जिस पर मां की कृपा हो” मैं सर पकड़ कर 10 मिनट मौन बैठा रहा ! मेरे भाव देख कर उनको यह लग चुका था कि कुछ तो गड़बड़ कह दिया है तो पूछ बैठे. क्या हुआ have I said anything weird? मैंने कहा बन्धु तुंरत प्रभाव से बच्ची का नाम बदलो क्योंकि श्लेष्मा का अर्थ होता है “नाक का mucus” उसके बाद जो होना था सो हुआ.

यही हालात है उत्तर भारतीय हिन्दूओं के एक बहुत बड़े वर्ग का। न जाने हो क्या गया है उत्तर भारतीय हिन्दू समाज को ? फैशन के दौर में फैंसी कपड़े पहनते पहनते अर्थहीन, अनर्थकारी, बेढंगे शब्द समुच्चयों का प्रयोग हिन्दू समाज अपने कुलदीपकों के नामकरण हेतु करने लगा है

अशास्त्रीय नाम न केवल सुनने में विचित्र लगता है, बालकों के व्यक्तित्व पर भी अपना विचित्र प्रभाव डालकर व्यक्तित्व को लुंज पुंज करता है – जो इसके तात्कालिक कुप्रभाव हैं.

भाषा की संकरता इसका दूरस्थ कुप्रभाव है.

नाम रखने का अधिकार दादा-दादी, भुआ, तथा गुरुओं का होता है. यह कर्म उनके लिए ही छोड़ देना हितकर है.
आप जब दादा दादी बनेंगे तब यह कर्तव्य ठीक प्रकार से निभा पाएँ उसके लिए आप अपनी मातृभाषा पर कितनी पकड़ रखते हैं अथवा उसपर पकड़ बनाने के लिए क्या कर रहे हैं, विचार करें. अन्यथा आने वाली पीढ़ियों में आपके परिवार में भी कोई “श्लेष्मा” हो सकती है,कोई भी अवीरा हो सकती है।

शास्त्रों में लिखा है व्यक्ति का जैसा नाम है समाज में उसी प्रकार उसका सम्मान और उसका यश कीर्ति बढ़ती है.
नामाखिलस्य व्यवहारहेतु: शुभावहं कर्मसु भाग्यहेतु:।
नाम्नैव कीर्तिं लभते मनुष्य-स्तत: प्रशस्तं खलु नामकर्म।
{वीरमित्रोदय-संस्कार प्रकाश}

स्मृति संग्रह में बताया गया है कि व्यवहार की सिद्धि आयु एवं ओज की वृद्धि के लिए श्रेष्ठ नाम होना चाहिए.
आयुर्वर्चो sभिवृद्धिश्च सिद्धिर्व्यवहृतेस्तथा ।
नामकर्मफलं त्वेतत् समुद्दिष्टं मनीषिभि:।।

नाम कैसा हो–
नाम की संरचना कैसी हो इस विषय में ग्रह्यसूत्रों एवं स्मृतियों में विस्तार से प्रकाश डाला गया है पारस्करगृह्यसूत्र 1/7/23 में बताया गया है-
द्व्यक्षरं चतुरक्षरं वा घोषवदाद्यंतरस्थं।
दीर्घाभिनिष्ठानं कृतं कुर्यान्न तद्धितम्।।
अयुजाक्षरमाकारान्तम् स्त्रियै तद्धितम् ।।
इसका तात्पर्य यह है कि बालक का नाम दो या चारअक्षरयुक्त, पहला अक्षर घोष वर्ण युक्त, वर्ग का तीसरा चौथा पांचवा वर्ण, मध्य में अंतस्थ वर्ण, य र ल व आदिऔर नाम का अंतिम वर्ण दीर्घ एवं कृदन्त हो तद्धितान्त न हो।
जैसे देव शर्मा ,सूरज वर्मा ,कन्या का नाम विषमवर्णी तीन या पांच अक्षर युक्त, दीर्घ आकारांत एवं तद्धितान्त होना चाहिए यथा श्रीदेवी आदि।

नोट — शास्त्रों में तीन प्रकार के नाम रखने को कहा गया है, एक नक्षत्र आधारित, दूसरा, प्रसिद्ध नाम (जो पब्लिक हो), तीसरा गुप्त नाम, जो केवल खास लोगों को पता हो । देवी अथवा नदी के नाम पर बालिका का नाम नहीं रखना चाहिए, ऐसा शास्त्रों का कथन है क्योंकि ये मां समान हैं और कोई भी मनुष्य, विवाह के बाद, इनका नाम भी लेता है और रमण भी करता है, ऐसा करने से ऐसी स्त्रियों के वैवाहिक जीवन कष्टमय होते हैं ।

हमारे शास्त्रों में वर्ण अनुसार नाम की व्यवस्था की गई है ब्राह्मण का नाम मंगल सूचक, आनंद सूचक, तथा शर्मा युक्त होना चाहिए. क्षत्रिय का नाम बल रक्षा और शासन क्षमता का सूचक, तथा वर्मा युक्त होना चाहिए, वैश्य का नाम धन ऐश्वर्य सूचक, पुष्टि युक्त तथा गुप्त युक्त होना चाहिए, अन्य का नाम सेवा आदि गुणों से युक्त, एवं दासान्त होना चाहिए।

पारस्कर गृहसूत्र में लिखा है –
शर्म ब्राह्मणस्य वर्म क्षत्रियस्य गुप्तेति वैश्यस्य

शास्त्रीय नाम की हमारे सनातन धर्म में बहुत उपयोगिता है मनुष्य का जैसा नाम होता है वैसे ही गुण उसमें विद्यमान होते हैं. बालकों का नाम लेकर पुकारने से उनके मन पर उस नाम का बहुत असर पड़ता है और प्रायः उसी के अनुरूप चलने का प्रयास भी होने लगता है इसीलिए नाम में यदि उदात्त भावना होती है तो बालकों में यश एवं भाग्य का अवश्य ही उदय संभव है।

हमारे सनातन धर्म में अधिकांश लोग अपने पुत्र पुत्रियों का नाम भगवान के नाम पर रखना शुभ समझते हैं ताकि इसी बहाने प्रभु नाम का उच्चारण भगवान के नाम का उच्चारण हो जाए।
भायं कुभायं अनख आलसहूं।
नाम जपत मंगल दिसि दसहूं॥

विडंबना यह है की आज पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण में नाम रखने का संस्कार मूल रूप से प्रायः समाप्त होता जा रहा है. इससे बचें शास्त्रोक्त नाम रखें इसी में भलाई है, इसी में कल्याण है।

अशोकभाई हिंडौचा

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक दिन बीरबल ने अकबर से कहा, ‘मनुष्य एक दूसरे के मन की बात बिना कहे भी जान लेते हैं।’ इसकी पुष्टि करने के लिए दोनों भेष बदल कर चल दिए। उनकी नजर एक लकड़हारे पर पड़ी जो एक हरा भरा पेड़ काट रहा था। बीरबल ने पूछा, ‘हुजूर, इसके बारे में आपका क्या विचार है?’
अकबर-‘यह दुष्ट तो हरे पेड़ को काट रहा है। सोचता हूं, इसे कोड़े लगाऊं!’ दोनों उसके पास पहुंच गए तो बीरबल ने पूछा,’भाई, यह क्या कर रहे हो?’ वह गुस्से में बोला-‘देखते नहीं पेड़ काट रहा हूं। यही मेरा रोजगार है।’ बीरबल-‘क्या तुम जानते हो कि बादशाह की मौत हो गई है?’ लकड़हारा, ‘चलो अच्छा हुआ! बेकसूरों को सताता था।’ अकबर हैरान था कि वह ऐसा क्यों सोचता है?
थोड़ा और आगे बढ़ने पर बीरबल ने पहाड़ी पर बकरियां चराती एक बुढ़िया की ओर इशारा कर अकबर से पूछा- ‘आपका इसके बारे में क्या ख्याल है शहंशाह?’ अकबर ने कहा,’इस पर श्रद्धा होती है। इस उम्र में भी बकरी चराकर परिवार का पालन कर रही है।’ बुढ़िया के पास पहुंचकर बीरबल ने पूछा, ‘तुम बकरियां क्यों चराती हो?’ बुढ़िया ने दोनों की ओर देखा और बताया-‘परिवार पालने और बच्चों के दूध के लिए।’ अकबर ने कहा- ‘बड़ा अच्छा भाव है।’ बीरबल बुढ़िया से बोला,’क्या तुम्हें मालूम है कि बादशाह नहीं रहे?’ यह सुनकर बुढ़िया रोने लगी- ‘ओ मेरे बादशाह, हमें किसके सहारे अकेला छोड़ गए।’
बीरबल ने अकबर से कहा,’देखा हुजूर, लकड़हारे और बुढ़िया के प्रति आपके मन में जैसे भाव थे, वह आपके चेहरे पर झलकते हुए उन दोनों के मन में बिन कहे ही पहुंच गए। इसलिए उनका जवाब भी उनके हिसाब से ही मिला।

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મોદી કેર


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Posted in मोदी केयर - Modi Care - મોદી કેર

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Posted in स्मरण शक्ति - Memory power

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*ચાલો શરૂ* …

મંગો મંગુ પાસે મગ માગે તો મંગુ મંગાને મેંદો આપે, મંગો મંગુ પાસે મેગી માગે તો મંગુ મંગાને મેંગો આપે અને મંગો મંગુ પાસે મેંગો માગે તો મંગુ મગ આપે. આમ મંગો મંગુ પાસે મગમેંગોમેગી માગે તો મંગુ મંગાને મગમેગી આપી મેંગો પોતા પાસે રાખે કારણ મંગો મંગી પાસે મેગી માંગે તો મંગુ મગ આપે પણ મંગો મંગુ પાસે મેંગો માંગે તો મંગુ મેંગો નહી મગ આપે.

😏 🤪 😏 🤪 😏

બોલીને રેકોર્ડીગ કરો, સાંભળો મજા પડશે
વઘુ આનંદ માટે બીજાને મોકલાવો.😊😊😊

Posted in खान्ग्रेस

इंदिरा का कमीनापन:
1981 में यूपी के पडरौना में इंदिरा गांधी की रैली थी
हेलीपेड से रैली स्थल तक ambassador कार में इंदिरा गांधी रवाना हुई लेकिन एंबेस्डर कार से उतरते समय उसके स्टील के मजबूत हैंडल में उनका शॉल फंस गया और उनका शॉल फट गया।
उनके पीए आर के धवन ने तुरंत ही दूसरा शॉल मैडम को दिया लेकिन इंदिरा गांधी ने आर के धवन से शॉल लेने से इंकार कर दिया और कहा कि मैं इस फटी हुई शॉल में ही रैली को संबोधित करूंगी ।
फिर वो मंच पर पहुंची भाषण दिया और जान-बूझकर अपना फटा हुआ शॉल पब्लिक के सामने की ओर रखा फिर भाषण के बीच में उन्होंने बोला यह जेपी, राजनारायण , चौधरी चरण सिंह, मुरारजी देसाई जैसे लोग कलफ लगा हुआ कुर्ता पहनते हैं और मुझे देखिए यह फटी हुई शॉल ही है मेरे पास और आपका प्यार और स्नेह ।
पब्लिक जैसे पागल हो गई तालियों की तड़तड़ाहट से पूरा मैदान गूंज उठा .. फिर इंदिरा गांधी अंबेस्डर कार में बैठकर हेलीपैड पर गई फिर हेलीकॉप्टर से गोरखपुर गई फिर गोरखपुर से प्लेन से दिल्ली रवाना हो गई।
कसम से यह पूरा खानदान नौटंकीबाजो का है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी इनकी नौटंकी चलती रहती है न जाने कब हम भारतीय इस नीच खानदान की सच्चाई समझेंगे और इन्हें भारत से मार भगाएंगे।
🇮🇳🇮🇳🇮🇳सुभाष चंद्र गोहल

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मुंबई के एक मामूली रेस्तरां में एक आदमी ने भरपेट भोजन किया

और जब वेटर ने बिल पेश किया

तो वह सीधे मैनेजर के पास गया

और इमानदारी से स्वीकार किया कि

उसके पास पैसे नहीं थे।

उसने कहा कि उसने पिछले दो दिनों से नहीं खाया था और बहुत भूख लगी थी इसलिए ऐसा करने के लिए

मजबूर हो गया था।

मैनेजर ने उसकी कहानी को धैर्य से सुना।आदमी ने वादा किया था कि जिस दिन उसे एक काम मिलेगा,वह बिल का निपटारा कर देगा।

मैनेजर मुस्कुराया और

उससे कहा “ठीक है”।

और वो आदमी चला गया।

वेटर ने मैनेजर से सवाल किया-

“साब आपने उसे जाने क्यों दिया?”

मैनेजर ने जवाब दिया-

“जाओ और अपना काम करो।”

कुछ महीनों बाद वही आदमी रेस्तरां में आया और अपने

लंबित बिल को निपटा दिया।

आदमी ने प्रबंधक को धन्यवाद दिया और उसे बताया कि उसे अभिनय का प्रस्ताव मिला है।

प्रबंधक ने खुशी से उसे एक कप चाय की पेशकश की और दोनों के बीच

एक दोस्ती का फूल पनप उठा ।

अभिनेता जल्द ही एक जाना माना चेहरा बन गया और एक समय में

कई फिल्में की।

बाद में उनके पास एक बंगला और एक शौफर-चालित कार थी।

टाइम बदल गया था,

लेकिन हर बार जब वह उस क्षेत्र से गुजरते,तो मैनेजर के साथ

एक कप चाय के लिए रेस्तरां में

ज़रूर रुकते,

जिसने वर्षों पहले उनके प्रति

अविश्वसनीय सहानुभूति दिखाई थी।

कई बार विश्वास ‘चमत्कार’ करता है। अगर मैनेजर उस दिन भूखे आदमी को पीटता और अपमानित करता,

तो शायद आज फिल्म उद्योग को

‘ओम प्रकाश ‘नाम का

एक प्रतिभाशाली और

नेचुरल अभिनेता नहीं मिलता।

एक सौ तीनवीं वर्षगांठ पर हम ओमप्रकाश जी को

याद करते हुए नमन करते हैं।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

એક ગામમાં એક બુદ્ધિશાળી વ્યક્તિ રહેતો હતો .સમય જતા તેનું મૃત્યુ થયું , તેણે મૃત્યુ પહેલાં એક વસિયતનામું બનાવી રાખેલું , ગામના સારા પ્રતિષ્ઠિત વડીલોને બોલાવવામાં આવ્યાં અને વસિયતનામું વાંચવામાં આવ્યું , વસીયતમાં લખ્યાં પ્રમાણે તેમની પાસે ઓગણીસ ઊંટ હતા , અને લખ્યું કે મારાં મરણ પછી ઓગણીસ ઊંટમાંથી અર્ધા મારાં દીકરાને મળે , તેનો ચોથો ભાગ મારી દીકરીને મળે , અને છેલ્લે પાંચમો ભાગ માર નોકરને મળે …..
વસીયત વાંચીને સૌ મુંજાઈ ગયાં ! ! કે ઓગણીસનાં ભાગ કેમ પાડવા ? ઓગણીસના અરધા કરીશું તો એક ઊંટ કાઢવો પડશે , અને એક ઊંટ મરી જશે અને તેનો ચોથો ભાગ સાડાચાર સાડાચાર પછી ? ? ?
આવનારા સૌ મુંજવણમાં પડી ગયાં , કોઈએ સુજાવ આપ્યો કે બાજુના ગામમાં એક બુદ્ધિશાળી વ્યક્તિ રહે છે .આપણે તેમને બોલાવીયે , ગામ લોકોએ બાજુના ગામથી બુદ્ધિશાળી વ્યક્તિને બોલાવ્યો , તે બુદ્ધિશાળી વ્યક્તિ પોતાના ઊંટ પર બેસીને આવ્યો , આવીને ગામ લોકોની સમસ્યા શાંતિથી સાંભળી , તેણે પોતાની બુદ્ધિ દોડાવી અને કહ્યું કે આ ઓગણીસ ઊંટમાં મારો એક ઊંટ જોડી દયો તો વિશ ઊંટ થશે , ગામ લોકોએ વિચાર કર્યો કે આતો મૂર્ખ લાગે છે , એક તો વસીયત કરવા વાળાએ અમને ગાંડા કર્યા એમાં આ બીજો ગાંડા કરવા માટે આવ્યો , અને કહે છે મારો ઊંટ પણ એમાં ઉમેરી દયો કેવો પાગલ છે .ગામ લોકોએ વિચાર કર્યો કે આમાં આપણું શું જાય છે ભલે ને એનો ઊંટ જાય …..
ઓગણીસમાંથી વિશ ઊંટ કર્યા .

૧૯ + ૧ = ૨૦ થયા ,
૨૦ ના અરધા દીકરાને આપ્યા ,
૨૦ નો ચોથો ભાગ ૫ દીકરીને આપ્યાં ,
૨૦ નો પાંચમો ભાગ ૪ નોકરને આપ્યાં …..
અને છેલ્લે એક પોતાનો ઊંટ બચ્યો તે બુદ્ધિશાળી લઈને ચાલતો થયો અને ગામ લોકો આંખો ફાડીને જોતાં રહ્યાં ….

llદ્રષ્ટાંતનો સારll

પાંચ જ્ઞાનઇન્દ્રિય ,
પાંચ કર્મઇન્દ્રિય ,
પાંચ પ્રાણ ,
ચાર અંતઃકરણ (મન બુદ્ધિ ચિત્ત અહંકાર )
કુલ ઓગણીસ થાય ….
એમ મનુષ્યનું આખું જીવન ઓગણીસના ભાગ પાડવા માંથી ઊંચું આવતું નથી , અને જીંદગીભર આ ગડમથલમાંથી નવરો પડતો નથી , પણ જ્યાં સુધી સ્વયંનો આત્મા રૂપી ઊંટ આ ઓગણીસની સાથે નહીં જોડે ત્યાં સુધી એટલે કે આધ્યાત્મિક બુદ્ધિ મત્તા ત્યાં સુધી સુખ , શાંતિ , સંતોષ અને આનંદની પ્રાપ્તિ કરી શકશે નહીં .

હસુભાઈ ઠક્કર