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✳️ एक बहुत ही सुंदर दृष्टांत… ✳️

एक बार की बात है वीणा बजाते हुए नारद मुनि भगवान श्रीराम के द्वार पर पहुँचे।

नारायण नारायण !!

नारदजी ने देखा कि द्वार पर हनुमान जी पहरा दे रहे है।

हनुमान जी ने पूछा: नारद मुनि ! कहाँ जा रहे हो?

नारदजी बोले: मैं प्रभु से मिलने आया हूँ। नारदजी ने हनुमानजी से पूछा प्रभु इस समय क्या कर रहे है?

हनुमानजी बोले: पता नहीं पर कुछ बही खाते का काम कर रहे है, प्रभु बही खाते में कुछ लिख रहे है।

नारदजी: अच्छा?? क्या लिखा पढ़ी कर रहे है?

हनुमानजी बोले: मुझे पता नहीं मुनिवर आप खुद ही देख आना।

नारद मुनि गए प्रभु के पास और देखा कि प्रभु कुछ लिख रहे है।

नारद जी बोले: प्रभु आप बही खाते का काम कर रहे है?
ये काम तो किसी मुनीम को दे दीजिए।

प्रभु बोले: नहीं नारद, मेरा काम मुझे ही करना पड़ता है। ये काम मैं किसी और को नही सौंप सकता।

नारद जी: अच्छा प्रभु ऐसा क्या काम है? ऐसा आप इस बही खाते में क्या लिख रहे हो?

प्रभु बोले: तुम क्या करोगे देखकर, जाने दो।

नारद जी बोले: नही प्रभु बताईये ऐसा आप इस बही खाते में क्या लिखते हैं?

प्रभु बोले: नारद इस बही खाते में उन भक्तों के नाम है जो मुझे हर पल भजते हैं। मैं उनकी नित्य हाजिरी लगाता हूँ।

नारद जी: अच्छा प्रभु जरा बताईये तो मेरा नाम कहाँ पर है? नारदमुनि ने बही खाते को खोल कर देखा तो उनका नाम सबसे ऊपर था। नारद जी को गर्व हो गया कि देखो मुझे मेरे प्रभु सबसे ज्यादा भक्त मानते है। पर नारद जी ने देखा कि हनुमान जी का नाम उस बही खाते में कहीं नही है? नारद जी सोचने लगे कि हनुमान जी तो प्रभु श्रीराम जी के खास भक्त है फिर उनका नाम, इस बही खाते में क्यों नही है? क्या प्रभु उनको भूल गए है?

नारद मुनि आये हनुमान जी के पास बोले: हनुमान ! प्रभु के बही खाते में उन सब भक्तों के नाम हैं जो नित्य प्रभु को भजते हैं पर आप का नाम उस में कहीं नहीं है?

हनुमानजी ने कहा कि: मुनिवर,! होगा, आप ने शायद ठीक से नहीं देखा होगा?

नारदजी बोले: नहीं नहीं मैंने ध्यान से देखा पर आप का नाम कहीं नही था।

हनुमानजी ने कहा: अच्छा कोई बात नहीं। शायद प्रभु ने मुझे इस लायक नही समझा होगा जो मेरा नाम उस बही खाते में लिखा जाये। पर नारद जी प्रभु एक अन्य दैनंदिनी भी रखते है उसमें भी वे नित्य कुछ लिखते हैं।

नारदजी बोले:अच्छा?

हनुमानजी ने कहा: हाँ!

नारदमुनि फिर गये प्रभु श्रीराम के पास और बोले प्रभु ! सुना है कि आप अपनी अलग से दैनंदिनी भी रखते है! उसमें आप क्या लिखते हैं?

प्रभु श्रीराम बोले: हाँ! पर वो तुम्हारे काम की नहीं है।

नारदजी: ”प्रभु ! बताईये ना, मैं देखना चाहता हूँ कि आप उसमें क्या लिखते हैं?

प्रभु मुस्कुराये और बोले मुनिवर मैं इनमें उन भक्तों के नाम लिखता हूँ जिन को मैं नित्य भजता हूँ।

नारदजी ने डायरी खोल कर देखा तो उसमें सबसे ऊपर हनुमान जी का नाम था। ये देख कर नारदजी का अभिमान टूट गया।

कहने का तात्पर्य यह है कि जो भगवान को सिर्फ जीव्हा से भजते है उनको प्रभु अपना भक्त मानते हैं और जो ह्रदय से भजते है उन भक्तों के वे स्वयं भक्त हो जाते हैं। ऐसे भक्तों को प्रभु अपनी हृदय रूपी विशेष सूची में रखते हैं।

श्री राम लक्ष्मण जानकी जय बोलो हनुमान की…

हे नाथ!हे मेरे नाथ!!आप बहुत ही कृपालु हैं!!!🙏

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पण्डित जी के जूते ।

यह क़िस्सा कल का है।
पण्डित जी के जूतों पर ध्यान गया । अभिषेक के लिए वो आये थे… जूते बाहर उतरे हुए थे…. जब हम अपने घर पहुँचे …. फल फ़ूल मिठाइयाँ लिये दिए ।
वैसे तो लोग अब घरों में रूटीन पूजा पाठ के लिये ब्राह्मणों को बुलाते ही नहीं । या यूँ कहें कि कौन करे वक़्त बर्बाद पूजा पाठ में । नया ज़माना है भाई … इक्कीसवीं सदी । बहरहाल … पारिवारिक परम्पराओं के आदर के तहत … हम लोग तय तिथियों पर कुछ न कुछ करते रहते हैं … व्यक्तिगत कारणों से…. लिहाज़ा कल अभिषेक होना था।

ख़ैर…. मुद्दे पर आते हैं।
आपने देखा जूते की फ़ोटो को ? जूते के तले में बड़े बड़े छेद हैं । उनकी मैली धोती और लगभग कबाड़ हो चुकी सायकिल को जाने दें …. फिर भी।
और यह उन पण्डित जी का हाल है जो काशी के प्रतिष्ठित संस्कृत विश्वविद्यालय से शिक्षा ले कर कोई चालीस साल पहले वापस अपने शहर लखनऊ इसलिए लौटे कि यहाँ पण्डिताई अच्छी चलेगी।
कभी सोचिये कि ब्राह्मण का घर कैसे चलेगा ? राजे रजवाड़े रहे नहीं जो मन्दिर बनवाते थे और ब्राह्मणों के जीविकोपार्जन का समुचित प्रबन्ध करते थे । लोग बाग अब दान दक्षिणा भी तभी देते हैं जब बिना दिये काम न चले। फिर….

अब तो पण्डित जी सिर्फ़ ब्याह और मुण्डन में ही यदा कदा याद किये जाते हैं । और समाज में आज ब्याह शादियों में जितना शराब … सजावट … और दिखावे पर खर्च करते हैं लोग …उसका एक प्रतिशत भी ब्राह्मण को नहीं देते ।
और तो और … दुल्हन के दरवाज़े पर नाचते हुए वो आत्ममुग्ध दुल्हे के धुत्त दोस्त और रिश्तेदार चाहे घण्टों बिता दें , पर विधि विधान से विवाह संस्कार के समय लोग टोक देते हैं … कि पण्डित जी ज़रा जल्दी निबटाओ ।
इस बीच ये टीका टिप्पणी भी चलती रहती है कि पण्डित को हज़ार .. पाँच सौ और पकड़ा दो तो समय बर्बाद होने से बचेगा।
ब्राह्मण बेचारा इस हास परिहास को उपहास बनता देख कर भी चुप बैठा अपना काम करता रहता है । भई …. यजमान से कुछ दक्षिणा की आस जो है ।
यही है सनातन धर्म की असलियत । शर्म आती है।
निवेदन है … कुछ कीजिए … कुछ दीजिए ।
यह वो लोग हैं जो भीख नहीं माँग सकते ।
वर्ना विपन्नता इनको इनकी पण्डिताई से विमुख कर देगी और कुछ वर्षों में ब्याह शादी के फेरे भी DJ की धुन पर ले रहे होंगे …. आने वाली पीढ़ी के लोग ।

साभार

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नाखून

“पारू से तेज आवाज में बाते क्यों कर रही हो ?”राजन कमरे में प्रवेश करते हुए पत्नी सुधा से बोला।

“दो दिन से डायरी में लिखा आ रहा है कि इसके नाखून बढ़ रहे है.. मैं काटने के लिए कह रही हूँ पर यह सुने तब ना.. ।”सुधा धीमे स्वर में बोली।

“प्यार से नही कह सकती क्या ,छह साल की बच्ची ही तो है .. सौतेली माँ जो ठहरी ,ऐसे ही डांट कर बात करोगी तुम तो।” राजन ने कर्कश स्वर में बोला ।

सुधा को बोलेने का अवसर दिए बिना राजन दूसरे कमरे में चला गया।

‘सौतेली ‘शब्द सुधा के मन मस्तिष्क में एक चक्रवात ले आता था। सोचने लगी ..रात दिन यही सुनने को मिलता है मंजू ऐसी थी ..मंजू वैसी थी .. हर बात में तुलना।

“मंजू के खोल में दुबके इंसान जरा बाहर निकल कर देख.. मैं भी इंसान हूँ..मंजू को गये ढाई साल हो गए और मैं दो साल से इस घर मे हूँ..अगर मंजू से इतना प्यार था तो छह महीने बाद ही दूसरी शादी क्यों कर ली?” सुधा खुद से ही बातें करने लगी।

लेकिन क्या करे? तलाक शुदा थी ना…

राजन को क्या पता कि उसका पूर्व पति रमेश अपनी एक कलीग को उसकी सौत बनाने पर तुला था…
अब राजन भी मंजू को सुधा की सौत बनाने में कोई कसर नही रख रहा है।

घर मे क्लेश न हो इस वजह से सुधा चुप हो जाती थी पर आज मन को समझा न पाई.. आँखो में आये अश्रुओं के सैलाब को काबू में करके राजन के पास जाकर बोली"सगी हूँ या सौतेली, स्कूल वाले नही जानते.. मैंने ही पारो का अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवाया.. पी .टी .एम . में भी मैं ही जाती हूँ.. आपको तो अपने काम से ही फुरसत नही है ..और सुनो मैं मंजू नही सुधा हूँ मुझे अपनी तुलना किसी से करवाना पसंद नही है .."

“चार महीने का मुन्नू आप ही का बेटा है ..रोता रहेगा ,मजाल है गोदी में ले कर बहला लो।”

हालांकि सुधा को इस समय ऐसा लग रहा था कि सांस बस ऊपर ही ऊपर चल रही है फिर भी अपने को संभाल कर फिर बोली।

” माँजी ,रीता भाभी और सुमन दीदी ने तो आज तक मेरे लिए कुछ गलत नही बोला।पड़ोस की सुमेधा भाभी तो कहती है ‘तुमने इस घर को संवार दिया..नही तो इस घर का पानी पीने में भी घिन आती थी’ “

“पारू से अगर इतना प्यार है तो कल से उसका टिफिन,कपड़े धोना और होम वर्क सब आप के जिम्मे .. ।”

सुधा को लगा अभी कुछ और रह गया है। पारू की डायरी उठा कर बोली

“पारू की डायरी में लिख देती हूं कि मैं प्रतिमा की सौतेली माँ हूँ ..इसकी पढ़ाई के बारे में कोई भी बात मेरे फोन पर न करे इसके पापा के फोन पर करे..अब तक तो मैने पारू के साथ कोई सौतेलापन नही दिखाया पर अब जरूर दिखाऊंगी।”

मुन्नू जग कर रोने लगा ..राजन मुन्नू को गोद मे लेकर झुलाने लगा ..पारू को सुधा के सामने खड़ा कर दिया।

सुधा को लगा सिर्फ पारू के नाखून ही नही कट रहे.. मंजू और सौतेली माँ नाम के नाखून भी कट रहे जो बढ़े हुए नाखून की तरह हर दिन उसे चुभते थे।

दीप्ति सिंह (स्वरचित व अप्रकाशित)

२१ – ६ – २०२०

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एक दर्जी महोदय थे। कैंची से कपड़ा काटते और फिर कटे हुए कपड़े को सुई-धागा से सिलते। कपड़ा काटने के बाद कैंची को पैर से दबा देते और फिर जब सिलाई पूरी कर लेते तो सुई को सर पर पहनी टोपी में अटका देते।

उनका बेटा बड़ा हो रहा था। तो अब दर्जी महोदय ने उसे भी काम सिखाना शुरू किया। दर्जी महोदय का बेटवा रोज़ अपने पप्पा को यह करते देखता और सोचता कि पप्पा अब सठिया रहे।

अन्त में जब रहा न गया बेटवा को, तो वह अपने पप्पा से पूछ ही बैठिस कि ऐ पप्पा, ई आप काउंची रोज़-रोज़ कपड़ा काट के कैंचिया को पैर से दबा लेते हैं और कपड़ा सिल कर सुई को सर पर रखे टोपी में खोंस देते हैं..??

दर्जी महोदय अपने नज़दीक की नज़र के चश्मे को थोड़ा नीचे कर और भौंहे ऊपर कर ग़ौर से पहले अपने बेटवा को देखें और फिर सट से मुंह में भरे पान के रस को तेज़ी से घुमाकर दीवाल के कोने में मारे पिचकारी स्टाइल में और फिर आराम से बेटवा को देखते हुए बोले –

“देख बिटवा, जो काटने का काम करे उसे हमेशा पैरों के नीचे रखना चाहिए और जो जोड़ने का काम करे, उसे हमेशा कपार पर रखना चाहिए। कैंचिया कपड़े को काटती है तो उसे पैर के नीचे रखता हूँ और सुईवा कपड़े को जोड़ती है तो उसे कपार पर रखे टोपी में खोंस कर रखता हूँ..!!”

कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जो आपको बांटते हैं जैसे जातिगत भेदभाव या क्षेत्रीयता, उन्हें पैरों से दबा कर रखिये। कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जो आपको जोड़ते हैं, जैसे राष्ट्रवाद। उन्हें सर पर उठा कर रखिये।

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इसे गोबर का कीड़ा कहते हैं,
ये कीड़ा सुबह उठकर गोबर की तलाश में निकलता है और दिनभर जहाँ से गोबर मिले उसका गोला बनाता रहता है!

शाम होने तक अच्छा ख़ासा गोबर का गोला बना लेता है।
फिर इस गोबर के गोले को धक्का मारते हुए अपने बिल तक ले जाता है, बिल पर पहुँचकर उसे अहसास होता है कि गोला तो बड़ा बना लिया लेकिन बिल का छेद तो छोटा है, बहुत कोशिश के बावजूद वो गोला बिल में नहीं जा सकता।

हम सब भी गोबर के कीड़े की तरह ही हो गए हैं।
सारी ज़िन्दगी चोरी, मक्कारी, चालाकी, दूसरो को बेबकूफ बनाकर धन जमा करने में लगे रहते हैं,
जब आखिरी वक़्त आता है तब पता चलता है के ये सब तो साथ जा ही नहीं सकता!!

हार्दिक कुमार

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मजदूर_Parkinson

रसोई में एक स्लैब डलवाने की जरूरत पड़ गई तो किसी मिस्त्री की सेवाएं लेने बाज़ार गया, जहाँ सुबह के वक्त आते-जाते मैंने अक्सर मजदूरों को खड़े देखा था। वहाँ पहुँचा तो एक अधेड़ थैला लिए खड़ा था।
“आज कोई मिस्त्री नहीं है यहाँ?” मैंने निराश होते हुए यूँ ही पूछ लिया।
“आप थोड़ी देर पहले आते तो कई मिस्त्री थे; एक ठेकेदार सभी को काम पर ले गया”।
“तो आप क्यों नहीं गए?”
“अब मेरे हाथ काँपते हैं। सारा काम कर लेता हूँ, मगर ठेकेदार समझते हैं बूढ़ा काम कम करेगा। आज तो कई दिन हो गए, कोई काम नहीं मिला मुझे”।
“रसोई में एक स्लैब डलवाना है, आप कर लोगे?”
“हां जी, बिल्कुल कर लूँगा”।
फिर मुझे कुछ सोचते हुए देख कर बोला—
“ले चलो, आप मजदूरी कम दे देना, जी!” कहते हुए वह तो झिझका मगर उसकी मज़बूरी झाँकने से न झिझकी।
—Dr💦Ashokalra
Meerut

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पुरानी गलियाँ


शुक्ला जी आज उन पुरानी गलियों की तरफ मुड़ गए जिन पर उनके कदम गाहे-बगाहे ही पड़ते थे। आज भी वह इधर का रुख नहीं करते अगर बेटे की बातों ने उनकी आँखों पर पड़ा हुआ दिखावटी शान-शौकत का पर्दा न हटा दिया होता।

बेटे सौरभ ने आई.आई.टी. से बी.टेक. पास किया था। तमाम जगहों से नौकरी के ऑफर आए थे। उन्होनें सौरभ को एक अमरीकी कम्पनी, जो उसे एक करोड़ का सालाना तनख्वाह ऑफर कर रही थी, को जॉइन करने कहा।

“नहीं पापा, मैं अपने देश में ही काम करना चाहता हूँ।”
“इतने अच्छे पैसे भारत के किसी कम्पनी में नहीं मिलेगा। सालों एड़ियाँ रगड़ोगे तो भी इसका पाँचवा हिस्सा भी नहीं कमा पाओगे।”
“मेहनत करूँगा तो यहाँ भी सफल होऊँगा, पापा।”
“पर तुम यह विदेश वाली कम्पनी क्यों नहीं जॉइन करना चाहते?”
“आपसे और माँ से दूर नहीं होना चाहता। नहीं चाहता कि पैसा इतना अहम हो जाए कि मैं अपनों को भूल जाऊँ। मैं अभी भी माँ की गोद में सिर रख कर सोना चाहता हूँ। जब भी कोई तकलीफ होती है, माँ का दुलार टॉनिक का काम करता है। रोज़ सुबह आपके साथ बैठ चाय पर चर्चा करना चाहता हूँ। माँ से छुप कर हम दोनों जो चाट पार्टी करते हैं उसका लुत्फ़ भी सारी उम्र लेना चाहता हूँ। अपने उन्हीं दोस्तों के साथ बूढ़ा होना चाहता हूँ जिनके साथ जवानी के सपने देखे हैं। नहीं पापा, कागज़ के चंद टुकड़ों के लिए मैं सुख का यह अथाह सागर छोड़ कर नहीं जा सकता।”

उसके आगे कुछ बोल नहीं पाए शुक्ला जी। बात तो बिल्कुल खरी कही थी उसने पर उन्हें कुछ चुभन सी महसूस हुई। वह कहाँ सोच पाए ऐसा? उन्होंने तो एक ही शहर में रहकर भी अच्छे रहन सहन व झूठी सामाजिक पद-प्रतिष्ठा के लालच में अलग गृहस्थी बसा ली थी। उसके बाद माँ-बाप से उनका रिश्ता कुछ खास नहीं रहा। हाँ, पत्नी अवश्य उनसे बातचीत करती रहती है, जाकर मिल भी आती है। वे स्वयं तो अक्सर होली दीवाली भी नहीं जाते!

बिना किसी वजह के उन्हें आया देख माँ बाप दोनों ही चौंक गए। खाना खाने बैठे ही थे वे।
“आज इधर कैसे आए बेटा? सब ठीक है ना? बहु बच्चे?”
“हाँ माँ। सब ठीक है। मैं ही भटक गया था। पर अब लौट आया हूँ। मेरी भी थाली लगा दो माँ!””

स्वरचित
प्रीति आनंद

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दायाँ हाथ


“ऐसा है मम्मी मैं घर छोड़कर चला जाऊंगा या कुछ खा पीके मर जाऊंगा अगर मुझे बाईक नही दिलायी पापा ने तो ,सुगंधा की शादी के लिए तो पैसे जाने कहाँ से आगये और अपने लड़के के लिए फटेहाली का रोना ,मैं सब समझता हूँ आज पापा से बात करके रहूंगा आप बीच में इमोशनल गेम मत खेलना “
17 वर्षीय अंकुर ने अपनी माँ से कहा ,माँ बोली
“बेटा पापा से कुछ मत कहना वो परेशान है खुद उन्होने कहां कहां से पैसे लेकर सुगंधा की शादी की है ,लोन है कितना अपने लिए एक शर्ट तक तो ली नही उन्होनें , वह सब हमारे लिए करते है,लेकिन कभी शिकन नहीं आने दी चेहरे पर अपने ,दुख पी जाते है ताकि हम लोग परेशान न हो “
अंकुर ने बीच में रोका और कहा
“मम्मी फिर आपका मेलोडरामा शुरू हो गया अबकी बार आपके जाल में नही फंसने बाला आज पापा से बात करके ही रहूंगा,मेरे सारे दोस्त बाईक से काॅलज और ट्यूशन जाते है चिढ़ाते है साईकल देखकर”
इतनी देर में पापा आफिस से आगये माजरा देखकर बोले
“अरे हमारे राजकुमार कैसे परेशान हैं उनकी खिदमत में कोई परेशानी तो नही”
इतना सुनते ही अंकुर ने सारी बात मम्मी के मना करते करते एक सांस में बता दी ।
और कहा
“पापा अब आप बताओ बेटा प्यारा या पैसे”
पापा मुस्कुराते हुए बोले
“अरे बस इतनी सी बात तीन महीने बाद तेरा रिजल्ट है ना बस समझ तू नई बाईक से कोलेज जायेगा।”
इतना कहकर वो अपने कमरे में चले गये।
तीन महीने बाद रिजल्ट आया अंकुर को बाईक घर के बाहर मिली उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा उसने तुरंत पापा को थैंकू बोलने के लिए आफिस फोन किया , बहुत लंबी रिंग जाने के बाद पापा के दोस्त ने फोन उठाया और बताया की उसके पापा हस्पताल में एडमिट है ,अंकुर के पैरो के नीचे से जमीन खिसक गयी मम्मी को लेकर तुरंत हस्पताल गया।
वहाँ डाक्टर से मालूम पड़ा मेजर अटैक आया है ,ICU से झांक कर वो पापा को देख ही रहा था कि उसके कंधे पर किसी का हाथ पड़ा वो संतोष अंकल थे पापा के गहरे मित्र उन्होंने कहा
“बेटा बाईक मिल गयी नई “
अंकुर बोला आपको कैसे पता
उन्होंने कहा
“बेटा अटैक से पहले पापा ने डीलर को सारा पैमेंट करके घर पहुंचा दी थी तुम्हें सरप्राइज देने ,तुम्हें कुछ बताना था तुमने नोटिस किया कि तुम्हारे पापा तीन महीनों से लेट घर आ रहे थे “
अंकुर बोला
” हाँ नया प्रोजेक्ट था पापा का इसलिए बताया था पापा ने”
अंकल हँसते हुए बोले
“बेटा कोई नया प्रोजेक्ट नही था तुम्हारी बाईक ही उनके लिए प्रोजेक्ट थी ,आफिस के बाद बच्चों को ट्यूशन देते थे 4-4 बैच लगाकर ताकी पैसे इकठ्ठे हो सके तुम्हारी बाईक के लिए ,हमेशा कहते तुम्हारे पापा मेरा बेटा मेरा दायाँ हाथ है “
और आगे बोल पाते अंकल अंकुर शर्म से जमीन में गड़ा जा रहा था रोते रोते और बोलता जा रहा था
“साॅरी पापा साॅरी मेरी बजह से आप इतना परेशान हुए “
इतने में डाक्टर सहाब आये और कहा अब होश आ गया खतरे से बाहर हैं ।
मिल सकते हो “
अंकुर दौड़ता हुआ अंदर गया और पापा के पास सिर रखकर
“साॅरी पापा”
बोलने लगा ।
पापा ने सर पर हाथ रख कर कहा
“बाईक कैसी लगी बेटा”
“पापा मुझे सिर्फ आप चाहिए बाईक नहीं”
2-3 साल बाद फादर्स डे पर
पापा आफिस जाने के लिए निकले तो लाल चमचमाती आल्टो कार घर पर खड़ी थी उसमें अंकुर था बोला
“पापा आपका जन्मदिन तो नही पता है फादर्स डे ही आपका बर्थ डे है यह मेरी कमाई की कार आपके लिए गिफ्ट, मैं फ्रीलांसर हूं दूसरों के लिए कोडिंग करता हूं,यूट्यूब पर क्लासेज भी लेता हूँ ,साथ साथ अपनी स्टडी भी करता हूँ,आखिर आपका दायाँ हाथ जो हूँ”
पापा की आंखो में आंसू आ गये पहली बार अंकुर ने पापा को इमोशनल देखा और कहा “पापा आप इमोशनल अच्छे नही लगते कठोर ही वयूटीफुल लगते हो “
पापा हंस दिये उधर बाप बेटे की बातें सुनकर मम्मी आंसू पोंछती हुई किचिन में हलुआ बनाने को चल दी। आखिर दायें हाथ ने दायित्व जो संभाल लिया था।
-अनुज सारस्वत की कलम से
(स्वरचित)

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☀️’छोटी सी कहानी दिल को छू गयी’☀️


एक इलाके में एक भले आदमी का देहांत हो गया लोग अर्थी ले जाने को तैयार हुये और जब उठाकर श्मशान ले जाने लगे तो एक आदमी आगे आया और अर्थी का एक पाऊं पकड़ लिया। और बोला के मरने वाले से मेरे 15 लाख लेने है, पहले मुझे पैसे दो फिर उसको जाने दूंगा।

अब तमाम लोग खड़े तमाशा देख रहे है, बेटों ने कहा के मरने वाले ने हमें तो कोई ऐसी बात नही की के वह कर्जदार है, इसलिए हम नही दे सकतें मृतक के भाइयों ने कहा के जब बेटे जिम्मेदार नही तो हम क्यों दें।

अब सारे खड़े है और उसने अर्थी पकड़ी हुई है, जब काफ़ी देर गुज़र गई तो बात घर की औरतों तक भी पहुंच गई। मरने वाले कि एकलौती बेटी ने जब बात सुनी तो फौरन अपना सारा ज़ेवर उतारा और अपनी सारी नक़द रकम जमा करके उस आदमी के लिए भिजवा दी और कहा के भगवान के लिए ये रकम और ज़ेवर बेच के उसकी रकम रखो और मेरे पिताजी की अंतिम यात्रा को ना रोको।

मैं मरने से पहले सारा कर्ज़ अदा कर दूंगी। और बाकी रकम का जल्दी बंदोबस्त कर दूंगी। अब वह अर्थी पकड़ने वाला शख्स खड़ा हुआ और सारे लोगो से मुखातिब हो कर बोला: असल बात ये है मरने वाले से 15 लाख लेना नही बल्के उनके देना है और उनके किसी वारिस को में जानता नही था तो मैने ये खेल खेला , अब मुझे पता चल चुका है के उसकी वारिस एक बेटी है और उसका कोई बेटा या भाई नही है।

इसलिए…
मत मारो तुम कोख में इसको
इसे सुंदर जग में आने दो,
छोड़ो तुम अपनी सोच ये छोटी

एक माँ को ख़ुशी मनाने दो,
बेटी के आने पर अब तुम
घी के दिये जलाओ,

आज ये संदेशा पूरे जग में फैलाओ
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ।

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कभी नेनुआ टाटी पे चढ़ के रसोई के दो महीने का इंतज़ाम कर देता था, कभी खपरैल की छत पे चढ़ी लौकी महीना भर निकाल देती थी.. कभी बैसाख में दाल और भतुआ से बनाई सूखी कँहड़ोड़ी सावन भादो की सब्जी का खर्चा निकाल देती थी.. वो दिन थे जब सब्जी पे खर्चा पता तक नहीं चलता था.. देशी टमाटर और मूली जाड़े के सीजन में भौकाल के साथ आते थे लेकिन खिचड़ी आते आते ही उनकी इज्जत घर जमाई जैसी हो जाती थी.. तब जीडीपी का अंकगणितीय करिश्मा नहीं था, सब्जियाँ सर्वसुलभ और हर रसोई का हिस्सा थीं.. लोहे की कढ़ाई में किसी के घर रसेदार सब्जी चूरे, तो गाँव के डीह बाबा तक गमक जाती थी.. संझा को रेडियो पे चौपाल और आकाशवाणी के सुलझे हुए समाचारों से दिन रुखसत लेता था.. रातें बड़ी होती थीं.. दुआर पे कोई पुरनिया आल्हा छेड़ देता था तो मानों कोई सिनेमा चल गया हो.. किसान लोगो में लोन का फैशन नहीं था.. फिर बच्चे बड़े होने लगे.. बच्चियाँ भी बड़ी होने लगी.. बच्चे सरकारी नौकरी पाते ही अंग्रेजी सेंट लगाने लगे.. बच्चियों के पापा सरकारी दामाद में नारायण का रूप देखने लगे.. किसान क्रेडिट कार्ड सरकारी दामादों की डिमांड और ईगो का प्रसाद बन गया.. इसी बीच मूँछ बेरोजगारी का सबब बनी.. बीच में मूछमुंडे इंजीनियरों का दौर आया.. अब दीवाने किसान अपनी बेटियों के लिए खेत बेचने के लिए तैयार थे.. बेटी गाँव से रुखसत हुई.. पापा का कान पेरने वाला रेडियो साजन की टाटा स्काई वाली एलईडी के सामने फीका पड़ चुका था.. अब आँगन में नेनुआ का बिया छीटकर मड़ई पे उसकी लताएँ चढ़ाने वाली बिटिया पिया के ढाई बीएचके की बालकनी के गमले में क्रोटॉन लगाने लगी.. और सब्जियाँ मंहँगी हो गईं.

बहुत पुरानी यादें ताज़ा हो गई सच में उस समय सब्जी पर कुछ भी खर्च नहीं हो पाता जिसके पास नहीं होता उसका भी काम चल जाता था दही मट्ठा का भरमार था सबका काम चलता था मटर गन्ना गुड सबके लिए इफरात रहता था
सबसे बड़ी बात तो यह थी कि आपसी मनमुमुटाव रहते हुए भी अगाध प्रेम रहता था आज की छुद्र मानसिकता दूर दूर तक नहीं दिखाई देती थी हाय रे ऊँची शिक्षा कहाँ तक ले आई
आज हर आदमी एक दूसरे को शंका की निगाह से देख रहा है..!!