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भारतीय नस्ल के गोवंश को समाप्त करने के लिए हुई थी “श्वेत क्रांति”

 

 

भारत में अंग्रेजों  के विरुद्ध 1857 का विद्रोह हो चुका था | हिंदुस्तान के कुछ गद्दार राजाओं का समर्थन मिलने की वजह से अंग्रेजों ने इस स्वतंत्रता संग्राम को पूरी तरह कुचल दिया था | राष्ट्र के लिए अंग्रेजो के विरुद्ध हथियार उठाने वालों को चुन-चुन कर अंग्रेजों द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर उल्टा लटका कर जिंदा आग में जला कर भून दिया गया था और कुछ लोगों को सरेआम पेड़ों पर लटका कर फांसी दे दी गई थी | शहीदों की लाशें तब तक लटकती रहीं जब तक उनमें बदबू नहीं आने लगी और उन्हें चील कौए नोंच-नोंच कर नहीं खाने लगे | लोग इन लाशों को कोई उतार न ले इसलिए पुलिस के हिंदुस्तानी सिपाही इन लाशो की हिफाजत में बन्दूक लेकर तैनात थे | 
ब्रिटेन के संसद से भारतीयों को दण्डित व नियंत्रित करने के लिए “भारतीय दंड संहिता 1860”  लागू हो गई थी | साथ ही भारतीयों के हथियार रखने के अधिकार को समाप्त करने के लिए “आर्म्स एक्ट 1878” भी लागू कर दिया गया था | विद्रोह को इस बुरी तरह से कुचला गया था ताकि अब अंग्रेजों के लूट के विरुद्ध आवाज उठाने वाला कोई भी व्यक्ति न बच सके | इसमें बहुत से निर्दोष हिंदुस्तानियों को भी तोप के मुहाने पर बांधकर उड़ा दिया गया था |

 

भारत से लूटी गई संपदा से ब्रिटेन के अंदर बड़ी-बड़ी एलोपैथी दवाओं के निर्माण के लिये प्रयोगशालाएं स्थापित की जाने लगी थी | जिनमें एलोपैथी दवाइयों का निर्माण शुरू हो गया था और इन दवाओं की खपत के लिए भारत के अंदर ब्रिटिश सत्ताधारियों द्वारा तरह-तरह के वायरस छोड़े कर चेचक, प्लीज, हैजा, जैसे गंभीर रोग हिंदुस्तान में फैला कर बड़ी संख्या में हिन्दुस्तानियों की हत्या की जाने लगी थी | किंतु ब्रिटिश डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने देखा के हिंदुस्तान के अंदर यह वायरस उतने प्रभावशाली नहीं थे, जितने अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों में थे | परिणामत: एलोपैथी दवाइयों की खपत अन्य ब्रिटिश उपनिवेश के मुकाबले भारत में काफी कम थी | अब इन वायरसों के भारत में कम प्रभावी होने का कारण ढूंढा जाने लगा |

 

निष्कर्ष यह निकला के भारत के अंदर  भारतीय ऋषियों द्वारा तैयार किया गया जो भारतीय नस्ल का गोवंश था, वह एक विशेष तरह का दूध देता है | जिसके अंदर प्राकृतिक रूप से सुपाच्य स्वर्ण होता है | यही सुपाच्य स्वर्ण भारतीयों के अंदर “रोग प्रतिरोधक क्षमता” विकसित करता है क्योंकि भारतीय ऋषियों द्वारा विकसित किये गये गोवंश की पीठ पर एक विशेष तरह की “सूर्यकेतु नाड़ी” होती है जो सूर्य से ऊर्जा लेकर सुपाच्य स्वर्ण अपने अंदर विकसित करती है | यही सुपाच्य स्वर्ण भारतीयों को रोगी होने से बचाती है | जिसका निरंतर प्रयोग करने के कारण हिंदुस्तानियों के शरीर में एक ऐसी अद्भुत रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई है, जिसके ऊपर ब्रिटिश प्रयोगशालाओं में तैयार किया गया कोई भी घातक से घातक वायरस असर नहीं करता | 
अब एलोपैथी दवाइयों का उत्पादन और व्यवसाय करने वालों के आगे यह समस्या थी कि वह इन भारतीय नस्ल के गौवंशों को कैसे समाप्त करें | इसके लिए अनेक भारतीय  डॉक्टर और वैज्ञानिकों को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश की जाने लगी तथा भारतीय गोवंश की कमियाँ बतलाई जाने लगी | किंतु आस्था और संस्कार के कारण भारतीय डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के प्रयास के बाद भी भारतीय नस्ल के गोवंशों के विरुद्ध ब्रिटिश एलोपैथी व्यवसाइयों का यह षड्यंत्र सफल नहीं हुआ | 

 

अतः कालांतर में भारतीय नस्ल के गोवंश को समाप्त करने के लिए दूसरा रास्ता अपनाया गया | वह था “श्वेत क्रांति” इस श्वेत क्रांति में यह तय किया गया कि यदि भारत के अंदर भारतीय नस्ल के गोवंश को समाप्त करके फ्रीजियन या जर्सी नस्ल के गोवंश को पालने की आदत भारतीयों में  अधिक दूध प्राप्त करने का लालच देकर पैदा कर दी जाए | तो भारतीय स्वयं ही भारतीय नस्ल का गोवंश छोड़कर फ्रीजियन और जर्सी नस्ल के गोवंश का पालन शुरू कर देंगे | 
इसके लिये भारतीय नस्ल के  “बैल व सांड़” को अनुपयोगी पशु बतला कर खत्म करने के लिए पूरे देश भर में पशु कत्लखानों की स्थापना की जाने लगी | जिसमें भारतीय नस्ल के “बैल व सांड़” खुलेआम लाइसेंस देकर कत्ल किए जाने लगे | जिस कारण से भारतीय नस्ल की गायों को प्रजनन हेतु “बैल व सांड़” मिलने बंद हो गए | अतः मजबूरीवश फ्रीजियन और जर्सी नस्ल के गोवंश से भारतीय नस्ल के गायों का प्रजनन करवाया जाने लगा | इस कार्य के लिए भारत वर्ष में सन् 1937 में पैलेस डेयरी फार्म मैसूर में पहला  “कृतिम गर्भाधान विभाग” का निर्माण किया गया | आज भी का पशुपालन विभाग के अधीन “कृतिम गर्भाधान विभाग” द्वारा फ्रीजियन और जर्सी नस्ल के गोवंश के वीर्य को संग्रह करके भारतीय नस्ल की गायों में प्रजनन हेतु प्रयोग किया जाता है |

 

 और इसके अलावा बैंकों के माध्यम से फ्रीजियन और जर्सी नस्ल की गाय व भैंसों को खरीदने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में किसानों और दुग्ध व्यवसायियों को कर्ज दिया जाने लगा | धन के लालच में लाखों की संख्या में भारतीय किसानों और दुग्ध व्यवसायियों होने फ्रीजियन और जर्सी नस्ल की गाय तथा भैंसों को पालना शुरू कर दिया कालांतर में यह  प्रचार किया जाने लगा कि भारतीय नस्ल का गोवंश कम दूध देता है | अतः आर्थिक दृष्टिकोण से यह उपयोगी नहीं है |
 

यह सारे प्रयास “श्वेत क्रांति” योजना के तहत किये गये | इस तरह “श्वेत क्रांति” के नाम पर भारत में अमृत तुल्य दूध देने वाली भारतीय नस्ल के गोवंश को योजनाबद्ध तरीके से समाप्त कर दिया गया और उसके स्थान पर फ्रीजियन और जर्सी नस्ल का गोवंश एवं भैसों का प्रयोग किया जाने लगा |

 

 

अगर भारत को पुनः स्वस्थ करना है तो “योगा” के नाम पर शारीरिक व्यायाम करने से भारत स्वस्थ नहीं होगा बल्कि भारत के अंदर पुनः भारतीय ऋषि द्वारा विकसित “भारतीय नस्ल का गोवंश” ही  दूध के लिए फ्रीजियन और जर्सी नस्ल का गोवंश या भैंस के स्थान पर स्थापित करना होगा |

 

योगेश कुमार मिश्र 

9451252162

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जगन्नाथ के कुछ वैदिक नाम- Arun Upadhyay

जगन्नाथ के कुछ वैदिक नाम-
अंग्रेजी परम्परा में अंग्रेजी माध्यम से संस्कृत पढ़े लोग कहते हैं कि वेद में जगन्नाथ का नाम या वर्णन नहीं है। स्वयं भगवान् ने कहा है कि पूरा वेद उन्हीं का वर्णन है, अतः ब्रह्म के सभी नाम जगन्नाथ के ही वाचक हैं-
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृत् वेदविदेव चाहम् (गीता १५/१५)
यहां भागवत पुराण के आधार पर उनके कुछ वैदिक नामों की चर्चा की जा रही है। कृष्ण द्वैपायन व्यास ने वेदों का संकलन करने के बाद उनका अर्थ स्पष्ट करने के लिये भागवत पुराण लिखा था (देवीभागवत पुराण, अध्याय १)। अतः १७३० में ब्रह्म सूत्र के गोविन्द भाष्य के आरम्भ में भागवत के आधार पर भाष्य करने का कारण स्पष्ट किया-उक्तं च गारुड़े-
अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां, भारतार्थ विनिर्णयः। गायत्रीभाष्यरूपोऽसौ वेदार्थ परिबृंहणः॥
वेद समझने का यह सूत्र नष्ट करने के लिये ५० वर्ष बाद विलियम जोन्स तथा एरिक पार्जिटर ने गरुड़ पुराण के मुद्रित भाग से यह श्लोक हटा दिया। अंग्रेजों का काम आगे बढ़ाने के लिये दयानन्द ने वेद व्याख्या का काम भागवत खण्डनम् से आरम्भ किया। भागवत पुराण में कृष्ण अवतार वर्णन के आरम्भ में ही जगन्नाथ के कई नाम दिये हैं-
तत्र गत्वा जगन्नाथं वासुदेवं वृषाकपि। पुरुषं पुरुषसूक्तेन उपतस्थे समाहिताः॥ (भागवत पुराण १०/१/२०)
जब पृथ्वी पर असुरों का अत्याचार बढ़ गया तो पृथ्वी गो रूप धारण कर देवों के साथ ब्रह्मा के पास गयी। ब्रह्मा सभी को ले कर विष्णु भगवान् या जगन्नाथ के पास पहुंचे जिनको वासुदेव और वृषाकपि भी कहते हैं। वे पुरुष हैं, अतः उपस्थित देवों ने पुरुष सूक्त से उनकी उपासना की।
१. गो रूप पृथ्वी-वेदों में ३ पृथ्वी तथा उनके ३ आकाश का वर्णन है जिनको ३ माता-पिता कहा गया है।
तिस्रो मातॄस्त्रीन् पितॄन् बिभ्रदेक ऊर्ध्वतस्थौ नेमवग्लापयन्ति ।
मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वमिदं वाचमविश्वमिन्वाम् ॥ (ऋग्वेद १/१६४/१०)
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋग्वेद २/२७/८)
इनकी व्याख्या विष्णु पुराण में है। सूर्य-चन्द्र से प्रकाशित भाग को पृथ्वी कहते हैं तथा सभी पृथ्वी में नदी, पर्वत समुद्र द्वीपों के वैसे ही नाम हैं जैसे पृथ्वी पर हैं। प्रथम पृथ्वी हमारा ग्रह है जो सूर्य चन्द्र दोनों से प्रकाशित है। इसमें ७ द्वीप, ७ समुद्र, वर्ष-पर्वत (वर्षा क्षेत्र, देश का विभाजन करने वाले), कुल पर्वत (जनपदों की सीमा) आदि हैं। दूसरी पृथ्वी सौर मण्डल है जो सूर्य से प्रकाशित है। इसमें पृथ्वी के चारों तरफ ग्रह गति से बने वलयाकार भागों को द्वीप नाम दिये गये हैं, जो पृथ्वी ग्रह के द्वीपों के नाम हैं। इनके बीच के ७ समुद्रों के भी पृथ्वी जैसे ही नाम हैं। यूरेनस तक ५० करोड़ योजन के चक्राकार क्षेत्र को पृथ्वी का लोक (प्रकाशित) भाग कहा है। उससे बाहर १०० करोड़ योजन व्यास तक अलोक (अन्धकार भाग) है। यह नेपचून तक के ग्रह हैं। लोक-अलोक भाग की सीमा को लोकालोक पर्वत कहा गया है जबकि यह शून्य क्षेत्र है। पृथ्वी पर उत्तर तथा दक्षिण अमेरिका में उत्तर सीमा से दक्षिण सीमा तक फैले राकी-एण्डीज पर्वतों को लोकालोक पर्वत कहा गया है। इसका केन्द्र भाग उज्जैन से प्रायः १८० अंश पूर्व है जिसे वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धा काण्ड (४०/५४, ६४) में पूर्व दिशा की सीमा कहा गया है।
तीसरी पृथ्वी सूर्य प्रकाश की अन्तिम सीमा या सूर्य रूपी विष्णु का परम पद है जो सूर्यों का समूह है। इस सीमा पर सूर्य विन्दु-मात्र दीखता है, उसके बाद वह नहीं दीखता। इसके भी घूमते हुए चक्र को आकाश-गङ्गा कहते हैं जैसे भारत की एक मुख्य नदी का नाम है।
रवि चन्द्रमसोर्यावन्मयूखैरवभास्यते । स समुद्र सरिच्छैला पृथिवी तावती स्मृता ॥
यावत्प्रमाणा पृथिवी विस्तार परिमण्डलात् ।
नभस्तावत्प्रमाणं वै व्यास मण्डलतो द्विज ॥ (विष्णु पुराण २/७/३-४)
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। (ऋक् १/२२/२०)
सूर्य सिद्धान्त (१२)-ख-व्योम-खत्रय-ख-सागर-षट्क-नाग-व्योमा-ष्ट-शून्य-यम-रूप-नगा-ष्ट-चन्द्राः।
ब्रह्माण्ड संपुटपरिभ्रमणं समन्तादभ्यन्तरा दिनकरस्य करप्रसाराः॥९०॥
पृथ्वी जन्म देने के लिये माता है, पालन करने के लिये गो-माता है। ग्रह रूप में पृथ्वी पर ७ द्वीप और ७ सागर हैं। गो रूप में इस पर ४ सागर हैं जिनसे हमारे पालन के लिये सभी प्रकार के पदार्थ मिलते हैं। इनको आजकल की भाषा में स्थलमण्डल, जल-मण्डल, वायु मण्डल तथा वनस्पति मण्डल कहते हैं। इनको गो रूप में राजा पृथु ने दुहा था।
पयोधरी भूतचतुः समुद्रां जुगोप गोरूप धरामिवोर्वीम्। (रघुवंश २/३)
यस्य द्यौरुर्वी पृथिवी च मही यस्याद उर्वऽन्तरिक्षम्। यस्यासौ सूरो विततो महित्वा कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा समुद्रे यस्य रसामिदाहुः। इमाश्च प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
(ऋक् १०/१२१/५-६, अथर्व ४/२/५, ७)
अथैष गोसवः स्वाराजो यज्ञः। (ताण्ड्य महाब्राह्मण १९/१३/१)
इमे वै लोका गौः यद् हि किं अ गच्छति इमान् तत् लोकान् गच्छति। (शतपथ ब्राह्मण ६/१/२/३४)
इमे लोका गौः। (शतपथ ब्राह्मण ६/५/२/१७)
धेनुरिव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्येभ्यः सर्वान् कामान् दुहे माता धेनुर्मातेव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्यान् बिभर्त्ति। (शतपथ ब्राह्मण २/२/१/२१)
वायुपुराणम्/ उत्तरार्धम् /अध्यायः१-तत उत्सारयामास शिला-जालानि सर्वशः।
धनुष्कोट्या ततो वैन्यस्तेन शैला विवर्द्धिताः।।१.१६७।।
मन्वन्तरेष्वतीतेषु विषमासीद् वसुन्धरा। स्वभावेना-भवं-स्तस्याः समानि विषमाणि च।।१.१६८।।
आहारः फलमूलं तु प्रजानाम-भवत् किल। वैन्यात् प्रभृति लोके ऽस्मिन् सर्वस्यैतस्य सम्भवः।।१.१७२।।
शैलैश्च स्तूयते दुग्धा पुनर्देवी वसुन्धरा। तत्रौषधी र्मूर्त्तिमती रत्नानि विविधानि च।।१.१८६।।
विष्णु पुराण-प्रथमांशः /अध्यायः१३-तत उत्सारयामास शैलां शत सहस्त्रशः।
धनुःकोट्या तदा वैन्यस्ततः शैला विवर्ज्जिताः।।८१।।
स कल्पयित्वा वत्सं तु मनुं स्वायम्भुवं प्रभुः। स्वे पाणौ पृथिवीनाथो दुदोह पृथिवीं पृथुः।।८६।।
२. जगन्नाथ और विष्णु-विष्णु को प्रायः जगन्नाथ तथा शिव को विश्वनाथ कहते हैं। साहित्य में जगत् तथा विश्व दोनों के एक ही अर्थ हैं पर वेद विज्ञान में इनके अलग अर्थ हैं। विश्व वह रचना है जो एक सीमा के भीतर प्रायः पूर्ण है तथा हृदय केन्द्र से संचालित है। इसका संचालक चेतन तत्त्व जगत् है जो अव्यक्त या अदृश्य है।
जगदव्यक्तमूर्तिना (गीता ९/४) जगज्जीवनं जीवनाधारभूतं (नारद परिव्राजक उपनिषद् ४/५०)
वालाग्रमात्रं हृदयस्य मध्ये विश्वं देवं जातरूपं वरेण्यं (अथर्वशिर उपनिषद् ५)
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्व पाशैः ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ५/१३)
सूर्य जीवन का आधार रूप में विष्णु का रूप है। यह आकर्षण द्वारा पृथ्वी को अपनी कक्षा में धारण किये हुए है। यह विष्णु रूप है। उससे जो किरण तथा तेज निकलता है, वह इन्द्र है। किरणों द्वारा यह जीवन का पालन करता है वह जाग्रत रूप या जगन्नाथ है। दुर्गा सप्तशती, अध्याय १ में जबतक जगन्नाथ सोये हुए थे, उनको विष्णु कहा गया है। जैसे ही योगनिद्रा उनके सरीर से निकली उनको जगन्नाथ कहा गया है। यह काली चरित्र है अतः जगन्नाथ को दक्षिणा-काली भी कहते हैं। दक्षिणा का अर्थ है देने वाला, काम या दान दक्षिण हाथ से ही होता है। जीवन देने वाला दक्षिणा-काली, ज्ञान देने वाला दक्षिणामूर्ति शिव।
दुर्गा सप्तशती, अध्याय, १-
विष्णुकर्णमलोद्भूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ। स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः॥६८॥
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥७१॥
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च॥८४॥
विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ॥९०॥
जाग्रत होने के बाद-उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तत्या मुक्तो जनार्दनः॥९१॥
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु॥८६॥
३. वासुदेव-सूर्य सिद्धान्त में पाञ्चरात्र, सांख्य, पुराण तथा वेद समन्वित सृष्टि क्रम है। हिरण्यगर्भ से पहले वासुदेव हुए। उसके बाद क्रम से संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध हुए। यह भागवत पुराण में भगवान कृष्ण, उनके भाई, पुत्र तथा पौत्र के भी नाम हैं। पर इस वर्णन से लगता है कि सृष्टि का आधार प्रथम उत्पन्न आकाश ही वासुदेव रूप है। वास = रहने का स्थान। संकर्षण = परस्पर आकर्षण। आकर्षण के केन्द्र के रूप में स्वयं वासुदेव ही कृष्ण हैं। पर सम् उपसर्ग का अर्थ है सभी पिण्डों के आकर्षण का योग। परस्पर आकर्षण द्वारा ही ब्रह्माण्ड, ग्रह, नक्षत्र आदि रूपों में पदार्थ एक सीमा के भीतर गठित हुआ। प्रद्युम्न = प्रकाशित या तेज का स्रोत। यह स्पष्ट रूप से सूर्य को कहा गया है जो तेज के कारण संसार की आत्मा है और त्रयी रूप में ऋक् (पिण्ड), यजु (जीवन), साम (तेज) तथा आधार (अथर्व) है। उसके बाद विविध सृष्टि अनिरुद्ध है जो अनन्त प्रकार की है। इसका विभाजन १२ प्रकार के आदित्यों से हुआ।सूर्य सिद्धान्त, अध्याय १२-
वासुदेव: परं ब्रह्म तन्मूर्तिः पुरुष: पर:। अव्यक्तो निर्गुण: शान्तः पञ्चविंशात् परोऽव्यय:।।१२।।
प्रकृतयन्तर्गतो देवो बहिरन्तश्च सर्वग:। सङ्कर्षणोऽयं: सृष्ट्वादौ तासु वीर्यमवासृजत् ।१३।।
तदण्डमभवद् हैमं सर्वत्र तमसावृतम्। तत्रानिरुद्धः प्रथमं व्यक्तीभूतः सनातनः॥१४॥
हिरण्यगर्भो भगवानेषछन्दसि पठ्यते। आदित्यो ह्यादिभूतत्वात् प्रसूत्या सूर्य उच्यते॥१५॥
परं ज्योतिस्तमः पारेसूरोऽयं सवितेति च। पर्येति भुवनान्येव भावयन् भूतभावनः॥१६॥
प्रकाशात्मा तमोहन्ता महानित्येष विश्रुतः। ऋचोऽस्य मण्डलं सामान्युग्रामूर्तिर्यजूंषि च॥१७॥
त्रयीमयोऽयं भगवान् कालात्मा कालकृद् विभुः। सर्वात्मा सर्वगः सूक्ष्मः सर्वमस्मिन् प्रतिष्ठितम्॥१८॥
रथे विश्वमये चक्रं कृत्वा संवत्सरात्मकम्। छन्दांस्यश्वाः सप्तयुक्ताः पर्य्यटत्येष सर्वदा॥१९॥
त्रिपादममृतं गुह्यं पादोऽयं प्रकटोऽभवत्। सोऽहङ्कारं जगत् सृष्ट्यै ब्रह्माणमसृजद् विभुः॥२०॥
तस्मै वेदान् वरान् दत्वा सर्वलोक पितामहम्। प्रतिष्ठाप्याण्डमध्ये तु स्वयं पर्येति भावयन्॥२१।
अथ सृष्ट्यां मनश्चक्रे ब्रह्माऽहङ्कारमूर्तिभृत्। मनसश्चन्द्रमा जज्ञे चक्षुषस्तेजसां निधिः॥२२॥
मनसः खं ततो वायुरग्निरापो धरा क्रमात्। गुणैक वृद्धया पञ्चैव महाभूतानि जज्ञिरे॥२३॥
अग्नीषोमौ भानुचन्द्रौ ततस्त्वङ्गारकादयः। तेजो भूरवाम्बुवातेभ्यः क्रमशः पञ्च जज्ञिरे॥२४॥
पुनर्द्वादशधाऽऽत्मानं विभजे राशिसंज्ञितम्। नक्षत्र रूपिणं भूयः सप्तविंशात्मकं वशी॥२५॥
४. वृषाकपि-संसार में हर सृष्टि पहले जैसी ही हुई है क्योंकि सृष्टि के नियम वही रहते हैं। ब्रह्मा ने भी इस कल्प में सृष्टि करने के लिये सोचा कि इससे पहले कैसे सृष्टि हुई थी। तब उन्होंने पुराणों का स्मरण किया जिससे पता चला कि पिछले कल्प में कैसे सृष्टि हुई थी। तब उनको ४ वेदों का स्मरण हुआ और उसके द्वारा सृष्टि की। वेद में भी यही कहा है कि पहले जैसी सृष्टि हुई।
प्रथमं सर्वशास्त्राणां पुराणं ब्रह्मणा स्मृतम् । अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः ॥
(वायु पुराण १/६१, मत्स्य पुराण ५३/३)
सूर्या चन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत् । (ऋग्वेद १०/१९०/३)
सृष्टि कैसे होती है? विभिन्न स्तरों पर फैला पदार्थ जल भण्डार जैसा समुद्र है। उससे बना पिण्ड भूमि है। बीच का निर्माण मेघ या वराह है जो मिश्रण है। मेघ जल-वायु का मिश्रण, वराह जल-स्थल का प्राणी है। स्वयम्भू मण्डल में रस रूप समुद्र था। उसमें तरंग होने से सलिल या सरिर हुआ। अस्पष्ट सीमा के भीतर मेघ जैसा पदार्थ हुआ। थोड़ा और संगठित होने पर वे अलग अलग पिण्ड बनकर निकले जैसे मेघ से जलविन्दु निकलते हैं। जल विन्दुओं जैसे पिण्ड (ब्रह्माण्ड) को द्रप्सः कहा है, उनका निकलना या गिरना स्कन्द है। इसी प्रकार हर ब्रह्माण्ड का निर्माण पदार्थ आण्ड था, उससे तारा रूप बहुत से विन्दु निकले। हर तारा मण्डल में भी ग्रह रूपी विन्दु बने। स्वयम्भू का मेघ या वराह अर्यमा, ब्रह्माण्ड का वरुण तथा सौरमण्डल का मित्र है। इनके समुद्र क्रमशः सरिर्, अम्भ (अप् + शब्द), मर हैं।
पहले जैसी सृष्टि करने वाला कपि है। अतः मनुष्य का अनुकरण करने वले पशु को भी कपि कहते हैं। मेघ से जल विन्दु समान वर्षा करनेवाला वृषा है। दोनों प्रकार से सृष्टि करने वाला वृषा कपि वासुदेव का ही रूप है।
तद् यत् कम्पाय-मानो रेतो वर्षति तस्माद् वृषाकपिः, तद् वृषाकपेः वृषा कपित्वम्। … आदित्यो वै वृषाकपिः। (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर ६/१२) यद्वै तत्सुकृतं रसो वै सः । रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। (तैत्तिरीय उपनिषद् २/७) समुद्राय त्वा वाताय स्वाहा, सरिराय त्वा वाताय स्वाहा । (वा॰ यजुर्वेद ३८/७)
अयं वै सरिरो योऽयं वायुः पवत एतस्माद्वै सरिरात् सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि सहेरते (शतपथ ब्राह्मण १४/२/२/३)
वातस्य जूतिं वरुणस्य नाभिमश्वं जज्ञानं सरिरस्य मध्ये। (वा॰ यजुर्वेद १३/४२) आपो ह वाऽ इदमग्रे महत्सलिलमेवासीत् (जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण १/५६/१)
वेदिर्वै सलिलम् (शतपथ ब्राह्मण ३/६/२/५) तद्यदब्रवीत् (ब्रह्म) आभिर्वा अहमिदं सर्वमाप्स्यामि यदिदं किंचेति तस्मादापोऽभवंस्तदपामप्त्वमाप्नोति वै स सर्वान् कामान् यान् कामयते । (गोपथ ब्राह्मण पूर्व १/२) स इमाँल्लोकनसृजत । अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः । (ऐतरेय उपनिषद् १/१/२) तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋग्वेद २/२७/८)
असौ वा आदित्यो द्रप्सः (शतपथ ब्राह्मण ७/४/१/२०)
स्तोको वै द्रप्सः। (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर २/१२)
स (प्रजापतिः) वै वराहो रूपं कृत्वा उपन्यमज्जत्। (तैत्तिरीय ब्राह्मण १/१/३/६)
एष द्रप्सो वृषभो विश्वरूप इन्द्राय वृष्णे समकारि सोमः॥ (ऋक् ६/४१/३)
अव सिन्धुं वरुणो द्यौरिव स्थाद् द्रप्सो न श्वेतो मृगस्तुविष्मान्। (ऋक् ६/८७/६)
द्रप्सश्चस्कन्द प्रथमाँ अनु द्यूनिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः (ऋक् १०/१७/११)
यस्ते द्रप्सः स्कन्दति यस्ते अंशुर्बाहुच्युतो धिषणाया उपस्थात्। (ऋक् १०/१७/१२)
५. पुरुष-पुरुष सूक्त में इसके सभी रूप वर्णित हैं अतः उसी सूक्त से उनकी उपासना हुई। पुरुष सूक्त के कुछ रूपों के क्रम हैं-(१) पूरुष = ४ पाद का मूल स्वरूप, (२) सहस्रशीर्ष-उससे १००० प्रकार के सृष्टि विकल्प या धारा, (३) सहस्राक्ष =हर स्थान अक्ष या केन्द्र मान सकते हैं, (३) सहस्रपाद-३ स्तरों की अनन्त पृथ्वी, (४) विराट् पुरुष-दृश्य जगत् जिसमें ४ पाद में १ पाद से ही सृष्टि हुई। १ अव्यक्त से ९ प्रकार के व्यक्त हुए जिनके ९ प्रकार के कालमान सूर्य सिद्धान्त (१५/१) में दिये हैं। अतः विराट् छन्द के हर पाद में ९ अक्षर हैं। (५) अधिपूरुष (६) देव, साध्य, ऋषि आदि, (६) ७ लोक का षोडषी पुरुष, (७) सर्वहुत यज्ञ का पशु पुरुष, (८) आरण्य और ग्राम्य पशु, (९) यज्ञ पुरुष (१०) अन्तर्यामी आदि।
पुरुष की सभी परिभाषा मधुसूदन ओझा जी ने श्लोकों में दी हैं-
पुरु व्यवस्यन् पुरुधा स्यति स्वतस्ततः स उक्तः पुरुषश्च पूरुषः।
पुरा स रुष्यत्यथ पूर्षुरुच्यते स पूरुषो वा पुरुषस्तदुच्यते। धी प्राणभूतस्य पुरे स्थितस्य सर्वस्य सर्वानपि पाप्मनः खे।
यत्सर्वतोऽस्मादपि पूर्व औषत् स पूरुषस्तेन मतोऽयमात्मा॥ स व्यक्तभूते वसति प्रभूते शरीरभूते पुरुषस्ततोऽसौ।
पुरे निवासाद्दहरादिके वा वसत्यतं ब्रह्मपुरे ततोऽपि॥ (ब्रह्म सिद्धान्त ११/१७२-१७४)
त्रिदण्डी स्वामी की पुरुष सूक्त व्याख्या में पद्म पुराण की परिभाषा उद्धृत है जो अभी उपलब्ध पुराण में नहीं मिलती-
पुं संज्ञे तु शरीरेऽस्मिन् शयनात् पुरुषो हरिः। शकारस्य षकारोऽयं व्यत्ययेन प्रयुज्यते॥
यद्वा पुरे शरीरेऽस्मिन्नास्ते स पुरुषो हरिः। यदि वा पुरवासीति पुरुषः प्रोच्यते हरिः॥
यदि वा पूर्वमेवासमिहेति पुरुषं विदुः। यदि वा बहुदानाद्वै विष्णुः पुरुष उच्यते॥
पूर्णत्वात् पुरुषो विष्णुः पुराणत्वाच्च शार्ङ्गिणः। पुराणभजनाच्चापि विष्णुः पुरुष ईर्यते॥
यद्वा पुरुष शब्दोऽयं रूढ्या वक्ति जनार्दनम्।
पुरुष (विश्व या व्यक्ति या वस्तु) के ४ रूप कहे गये हैं-बाहरी स्थूल रूप क्षर है जो दीखता है पर सदा क्षरण होता रहता है। इसका कूटस्थ परिचय प्रायः स्थायी है पर वह दीखता नहीं है-यह अक्षर पुरुष है। सामान्यतः क्षर-अक्षर दो ही विभाग किये जाते हैं। अक्षर का ही जो रूप कभी नष्ट नहीं होता वह अव्यय है। इसे निर्माण क्रम या वृक्ष भी कहा गया है। यह क्षर तथा अक्षर दोनों से श्रेष्ठ होने के कारण पुरुषोत्तम कहा गया है। पुरुषोत्तम रूप में प्रथित होने के कारण १ का विशेषण प्रथम होता है। जगन्नाथ का पुरुषोत्तम रूप राम है जो प्रथित है। अतः धान आदि तौलने के लिये प्रथम के बदले राम कहते हैं। कृष्ण मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं थे, उन्होंने जन्म से ही ऐसे चमत्कार आरम्भ दिखाये जो मनुष्य के लिये अकल्पनीय है।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१६॥
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥१७॥
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः। अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१८॥ (गीता, अध्याय १५)
अजोऽपि अन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। (गीता ४/६)

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ये दुर्भाग्य है की ncert बुक में ये सब पढाया जाता है आप चाहे तो देख सकते है ।

ये दुर्भाग्य है की ncert बुक में ये सब पढाया जाता है आप चाहे तो देख सकते है । आखिर हमारा इतिहास क्यों छुपाया जाता है मुल्लो को बढ़ा चढ़ा के क्यों दिखाया जाता है। आज कल यह पढ़ाया जा रहा है बच्चो को ………………

यह पढ़ाया जा रहा है बच्चों को…..!!!!

1. वैदिक काल में विशिष्ट अतिथियों के लिए गोमांस का परोसा जाना सम्मान सूचक माना जाता था। (कक्षा 6-प्राचीन भारत, पृष्ठ 35, लेखिका-रोमिला थापर)

2.महमूद गजनवी ने मूर्तियों को तोड़ा और इससे वह धार्मिक नेता बन गया।
(कक्षा 7-मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 28)

3.1857 का स्वतंत्रता संग्राम एक सैनिक विद्रोह था।
(कक्षा 8-सामाजिक विज्ञान भाग-1,

4.महावीर 12 वर्षों तक जहां-तहां भटकते रहे। 12 वर्ष की लम्बी यात्रा के दौरान उन्होंने एक बार भी अपने वस्त्र नहीं बदले। 42 वर्ष की आयु में उन्होंने वस्त्र का एकदम त्याग कर दिया।
(कक्षा 11, प्राचीन भारत, पृष्ठ 101, लेखक-रामशरण शर्मा)

5.तीर्थंकर, जो अधिकतर मध्य गंगा के मैदान में उत्पन्न हुए और जिन्होंने बिहार में निर्वाण प्राप्त किया, की मिथक कथा जैन सम्प्रदाय की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए गढ़ ली गई।
(कक्षा 11-प्राचीन भारत, पृष्ठ 101, लेखक-रामशरण शर्मा)

6.जाटों ने, गरीब हो या धनी, जागीरदार हो या किसान, हिन्दू हो या मुसलमान, सबको लूटा। (कक्षा 12 – आधुनिक भारत, पृष्ठ 18-19, विपिन चन्द्र)

7.रणजीत सिंह अपने सिंहासन से उतरकर मुसलमान फकीरों के पैरों की धूल अपनी लम्बी सफेद दाढ़ी से झाड़ता था। (कक्षा 12 -पृष्ठ 20, विपिन चन्द्र)

8.आर्य समाज ने हिन्दुओं, मुसलमानों, पारसियों, सिखों और ईसाइयों के बीच पनप रही राष्ट्रीय एकता को भंग करने का प्रयास किया। (कक्षा 12-आधुनिक भारत, पृष्ठ 183, लेखक-विपिन चन्द्र)

9.तिलक, अरविन्द घोष, विपिनचन्द्र पाल और लाला लाजपतराय जैसे नेता
उग्रवादी तथा आतंकवादी थे
(कक्षा 12-आधुनिक भारत-विपिन चन्द्र, पृष्ठ 208)

10.400 वर्ष ईसा पूर्व अयोध्या का कोई अस्तित्व नहीं था।
महाभारत और रामायण कल्पित महाकाव्य हैं।
(कक्षा 11, पृष्ठ 107, मध्यकालीन इतिहास, आर.एस. शर्मा)

11.वीर पृथ्वीराज चौहान मैदान छोड़कर भाग गया और गद्दार जयचन्द गोरी के खिलाफ
युद्धभूमि में लड़ते हुए मारा गया।
(कक्षा 11, मध्यकालीन भारत, प्रो. सतीश चन्द्र)

12.औरंगजेब जिन्दा पीर थे।
(मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 316, लेखक-प्रो. सतीश चन्द्र)

13.राम और कृष्ण का कोई अस्तित्व ही नहीं था। वे केवल काल्पनिक कहानियां हैं।
(मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 245, रोमिला थापर)

(ऐसी और भी बहुत सी आपत्तिजनक बाते आपको एन.सी.आर.टी. की किताबों में पढ़ने को मिल जायेंगी)

इन किताबों में जो छापा जा रहा हैं उनमें रोमिला थापर जैसी लेखको ने मुसलमानों द्वारा धर्म के नाम पर काफ़िर हिन्दुओं के ऊपर किये गये भयानक अत्याचारों को गायब कर दिया है.

नकली धर्मनिरपेक्षतावादी नेताओं की शह पर झूठा इतिहास लिखकर एक समुदाय की हिंसक मानसिकता पर जानबूझकर पर्दा ड़ाला जा रहा है. इन भयानक अत्याचारों को सदियों से चली आ रही गंगा जमुनी संस्कृति, अनेकता में एकता और धार्मिक सहिष्णुता बताकर नौजवान पीढ़ी को धोखा दिया जा रहा है.

उन्हें अंधकार में रखा जा रहा है. भविष्य में इसका परिणाम बहुत खतरनाक होगा क्योकि नयी पीढ़ी ऐसे मुसलमानों की मानसिकता न जानने के कारण उनसे असावधान रहेगी और खतरे में पड़ जायेगी.

सोचने का विषय है कि आखिर किसके दबाव में सत्य को छिपाया अथवा तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है…??

विकास खुराना

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અષાઢી બીજ

👉👉 *ઉત્સવ વિશેષ*

-અષાઢી બીજે જગતના નાથ જગન્નાથની કર્ણાવતી નગરચર્યા (અમદાવાદ શહેર) ની 140 વર્ષની ઈતિહાસયાત્રા નો અનોખો ઇતિહાસ

-દર વર્ષની જેમ આ ‌વખતે પણ જગન્નાથની ભવ્યાતિભવ્ય રથયાત્રા નીકળશે અષાઢ ને કારણે વધુ લોકો જોડાશે. (દિલિપદાસજી મહારાજ, જગન્નાથ મંદિરના મહંત )
-આઝાદીના સમય પહેલા જ્યારે ભગવાન જગન્નાથની રથયાત્રા નીકળે ત્યારે શહેરીજનો તિરંગો ફરકાવતા હતા.
-બળદગાડાથી શરૂ થયેલી રથયાત્રા હાઇટેક બની, પ્રારંભથી જ ખલાસ કોમના ભાઈઓ રથ ખેંચતા આવ્યા

1876માં મહામંડળેશ્વર નૃસિંહદાસજીએ સ્વપ્નમાં સ્વયં ભગવાને આપેલા આદેશને માથે ચડાવીને રથયાત્રાનો પ્રારંભ કરાવ્યો હતો એ પછી દર વર્ષે અષાઢી બીજે અમદાવાદમાં જગન્નાથ ભગવાનની રથયાત્રા યોજાતી રહી છે, આટલા વર્ષો પછી આજેય રથયાત્રામાં ભક્તિ અને શ્રદ્ધાનું ઘોડાપૂર યથાવત રહ્યું છે. દરેક ધર્મના લોકો ભક્તિભાવપૂર્વક અને રંગેચંગે ભગવાનને આવકારતા રહ્યા છે. વર્ષમાં માત્ર આ એક દિવસે ભક્તોને દર્શન આપવા માટે ભગવાન સામે ચાલીને આવે છે. 139 વર્ષથી ચાલી આવતી આ પરપંરાના અતિતનીઝાંખી કરાવતો આ વિશેષ અહેવાલ…

અમદાવાદ : લગભગ ચારસો વર્ષ પહેલાં રામાનંદી સંત શ્રી હનુમાનજીદાસજીએ આજના જગન્નાથજીના મંદિરમાં પોતાની ગાદીની સ્થાપના કરી હતી. એમના પછી ગાદીએ આવેલા સારંગદાસજીએ જગન્નાથજી, બળદેવજી અને દેવી સુભદ્રાજીની મૂર્તિઓ મંગાવીને સ્થાપના કરાવી ત્યારથી જ આ મંદિર ‘જગન્નાથજીની મંદિર’ તરીકે જગપ્રસિદ્ધ થયું. એમના પછી બાલમુકુંદદાસજી આવ્યા અને તે પછી
નરસિંહદાસજી આવ્યા.નરસિંહદાસજીને સ્વપ્નમાં ભગવાન જગન્નાથજી આવ્યા અને તેમણે રથયાત્રા શરૂ કરી. લોકવાયકાઓ અનુસાર ભરૂચમાં રહેતા ખલાસ કોમના ભક્તોએ પણ રથયાત્રાની પોતાની જવાબદારી સ્વીકારી લીધી. તેમણે તાબડતોબ નરિયેળના ઝાડમાંથી ત્રણે ભગવાનના રથ તૈયાર કરીને અમદાવાદ પહોંચાડી દીધા.

આમ 1876થી શરૂ થયેલી રથયાત્રામાં પરંપરા મુજબ રથ ખેંચવાનું કાર્ય ખલાસ કોમના ભાઇઓ સાચી શ્રદ્ધાથી દર વર્ષે કરે છે. 140 વર્ષ પહેલા શરૂ થયેલી રથયાત્રામાંઉત્તરોત્તર મોટી થતી ગઇ. શરૂઆતમાં માત્ર સાધુ-સંતો જ રથયાત્રામાં ભાગ લેતા હતા અને તેમનું રસોડું સરસપુરના રણછોડજી મંદિરમાં રાખવામાં આવતું, ભક્તજનોની ભીડ વધતા સરસપુરમાં ઠેર ઠેર રસોડાંઓ ઊભાં કરવામાં આવ્યાં. દર વર્ષે મામેરું પણ અહીંયા જ કરાય છે નરસિંહદાસજી મહારાજે પ્રથમવાર કાઢેલી રથયાત્રા વખતે ભગવાનને બળદગાડામાં બિરાજમાન કરવામાં આવ્યા હતાં. ત્યારથી લઇને આજ સુધીમાં રથયાત્રા ઐતિહાસીકથી મોર્ડન બની ગઇ છે.

માત્ર રથયાત્રા જ નહી પણ જે રથમાં ભગવાનબિરાજીને નગરચર્યાએ નીકળે છે તેણે પણ હવે નવા રૂપરંગ હાંસલ કરી લીધા છે. રથ નવા રૂપ રંગ ધારણ કર્યા છે સાથોસાથ તેમાં મોર્ડન પૈડા અને સ્ટીંયરીંગ પણ લગાડવામાં આવે છે. શરૂઆતની યાત્રામાં ગણ્યાગાંઠ્યા પોલિસ કર્મીઓ હતા હવે રથયાત્રામાં શ્રદ્ધાળુઓ કરતા પોલીસ વધારે હોય તેવી લોકોમાં ચર્ચા હોય છે. સહજતાથી ભગવાનની સમીપ જતો ભક્ત હવે રથની નજીક જતા પણ બીતો થઇ ગયો છે.

ગાડાથી ટ્રક સુધી: અત્યારની રથયાત્રા હાઇટેક બની ગઈ છે જ્યારે 1952નીરથયાત્રાની આ તસવીર રસપ્રદ છે, એ વખતે બળદો દ્વારા યાત્રાના વાહનો ખેંચવામાં આવતા હતા.
રથયાત્રામાં સાહસિક કરતબો કરતા પહેલવાનો આકર્ષણનું કેન્દ્ર હોય છે.

2005માં રથયાત્રા દરમિયાન ક્રાઇમ બ્રાંચના જાંબાઝ અધિકારીઓએ ચાલુ યાત્રાએ સફળ ઓપરેશન કરીને અતિ સંવેદનશીલ એવા શાહપુર વિસ્તારના શાહપુર અડ્ડા પાસેથી ઘાતક હથીયારોનો જંગી જથ્થો પકડી પાડતા મોટી ઘાત ટાળી શકાઈ હતી.
અત્યાર સુધી સૌથી વધુ 12 વખત પહિંદ વિધિ કરવાનો નરેન્દ્ર મોદીનોે વિક્રમ

ભગવાન જગનાથની જ્યારે નગર ચર્યા માટે નીકળે ત્યારે રાજા તેમનો રસ્તો સાફ કરવા માટે આવે છે તેવી લોકવાયકા અને પરંપરા પુરીમાં ચાલે છે. આથી અમદાવાદની રથયાત્રામાં પણ આ પહિંદ વિધિ યોજવામાં આવે છે. જેમાં રાજ્યના મુખ્યમંત્રી સોનાની સાવરણી લઇને ભગવાનનો રસ્તો સાફ કરે છે. સૌથી વધુ વખત પહિંદ વિધિ કરવાનો રેકોર્ડ હાલમાં દેશના વડાપ્રધાન બનેલા નરેન્દ્ર મોદીનો છે. તેમણે સતત 12 વર્ષ સુધી જગન્નાથમંદિરની રથયાત્રાની પહિંદ વિધિ કરી હતી.
-જગન્નાથની રથયાત્રાની પ્રાચીન પરંપરા કોમી એખલાસનું પ્રતીક છે. લાખો શ્રદ્ધાળુઓ જગન્નાથના દર્શન કરીને ધન્યતા અનુભવે છે. તેમના આશીર્વાદ મેળવીને પોતાની જાતને પાવન માને છે. (નરેન્દ્ર મોદી પહિંદવિધિ દરમિયાન)

અત્યાર સુધીના મહંત
1850થી 1959 નરસિંહદાસજી મહારાજ
1959થી 1971 સેવા દાસજી મહારાજ
1971થી 1994 રામહર્ષદાસજી મહારાજ
1994થી-2010 રામેશ્વરદાસજી મહારાજ
2010થી દિલીપદાસજી મહારાજ

ફેક્ટ ફાઇલ

રથયાત્રાના શરૂઆતના વર્ષોમાં માત્ર સાધુસંતો જ ભાગ લેતા હતા જ્યારે હવે માત્ર અમદાવાદના જ નહીં પણ દેશભરના શ્રદ્ધાળુઓ ઉમટે છે.

જગન્નાથ મંદિરના પ્રથમ મહંત અને રથયાત્રાના પ્રેરક નરસિંહદાસજી મહારાજ જગનનાથ ભગવાનના સૌથી મોટા ભક્ત હતા. તેઓ વર્ષો સુધી ગુજરાતથીઓરિસ્સામાં આવેલા જગન્નાથ મંદિરે ઉઘાડા પગે ચાલતા જતા હતા. આ ભક્તિથી જગન્નાથ પ્રસન્ન થયા હતા અને તેમને સ્વપ્નમાં આવીને યાત્રા શરૂ કરવાની પ્રેરણા આપી હતી.

રથનો મનોરથ | નરસિંહદાસજી મહારાજે શહેરીજનોના દર્શનાર્થે અમદાવાદમાં રથયાત્રાનો પ્રારંભ કરાવ્યો હતો,અને આજે દાયકાઓ પછી પણ આ પરંપરા આજ સુધી યથાવત રહી છે. દર વર્ષે દર્શનાર્થીઓની સંખ્યામાં સતત વધારો થતો રહ્યો છે.
કાલી રોટી સફેદ દાલ: 1958ની રથયાત્રા દરમ્યાન દેશભરમાંથી ઉમટેલા સાધુસંતોનો ભંડારો.

1964 અવિરત યાત્રા: આજે જ્વલ્લેજ જોવા મળતી
સરહદના ગાંધી રથયાત્રાની મુલાકાતે
1969માં ખાન અબ્દુલ ગફાર ખાને રથયાત્રાની મુલાકાત લીધી હતી અને સાધુગણને મળ્યા હતા.

મંદિરના પ્રિય હાથી સરજુ પ્રસાદની સમાધિ આસ્થાનું કેન્દ્
જગન્નાથ મંદિરના હાથીઓની સાથે મંદિરમાં બીજા અખાડાઓના મહંતો પણ પોતાના હાથીઓ મંદિરની સેવામાં આપે છે. તેવો જ એક હાથી સરજુ પ્રસાદ હતો. સરજુ પ્રસાદ મંદિરના તમામ સંતો-મહંતો અને લોકોનો માનીતો હતો. રથયાત્રામાં સૌથી આગળ તે ભાગ લેતો અને તેણે સૌથી વધારે વખત રથયાત્રામાં ભાગ પણ લીધો હતો. હાથી સરજુ પ્રસાદનું જ્યારે અવસાન થયુ ત્યારે આખા મંદિરમાં શોકની લાગણી વ્યાપી ગઇ હતી. આથી તે સમયના લોકોએ આ હાથીની સમાધિ બનાવવાનું નક્કી કર્યુ. તે સમયેરસપ્તઋષિ સ્મશાન રોડ પરની કેલિકોમીલની પાછળ આવેલી ખુલ્લી જગ્યામાં તેની સમાધિ બનાવવામાં આવી. ત્યારથી આ સમાધિ લોકોની આસ્થાનું કેન્દ્ર બન્યું છે.

મોટીસંખ્યામાં લોકો આ “સરજુ પ્રસાદ”ની સમાધિના દર્શન કરવા જાય છે. આ સમાધિની ઉપર ભગવાન ગણેશજીની પ્રતિમાનું સ્થાપન કરવામાં આવ્યું છે. તેની આસપાસ રહેતા મુસ્લિમ સમાજના લોકો પણ તેમા આસ્થા રાખે છે. 140 વર્ષ પહેલા 1876માં અમદાવાદમાં રથયાત્રાનો પ્રારંભ થયો. મહામંડળેશ્વર નૃસિંહદાસજીએ આ પવિત્રરથયાત્રાની શરૂઆત કરી હતી. જે પ્રથા આજે પણ અવિરત ચાલી રહી છે. જગન્નાથજીનું મંદિરથી નિકળતી રથયાત્રામાં અમદાવાદના જ નહીં પણ ચારે કોરના લોકો શ્રદ્ધા-ભક્તિ સાથે ઉમટી પડે છે.

1996 ખલાસીઓનું સમર્પણ | દરિયાપાર હોય કે દેશદેશાવર, ખલાસીઓ અચૂકપણે जड़ અષાઢી બીજે ભગવાનના રથને ગંતવ્ય સ્થાને પહોંચાડવા હાજર થઈ જાય છે.
સંકલંકર્તા યોગેશ પારેખ

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रूद्राक्षाचे प्रकार

रूद्राक्षाचे प्रकार

एक मुखी रूद्राक्ष:
अतिदुर्मिळ व मूल्यवान असा गोल व काजूच्या आकारासारखा असतो. हा रूद्राक्ष साक्षात भगवान शिव स्वरूप आहे. त्यापासून भक्ती आणि मुक्ती दोघांची प्राप्ती होते.

दोन मुखी रूद्राक्ष:
हा शिवपार्वतीचे रूप मानले जाते. अर्थात अर्धनारीनटेश्वर रूप. हा वैभव देणारा आहे.

त्रिमुखी रूद्राक्ष:
हा ब्रम्ह,विष्णू, महेश स्वरूप त्रिमुर्ती रूप आहे. हा रूद्राक्ष भूत, भविष्य आणि वर्तमान या गोष्टीचे ज्ञान प्राप्त करून देतो.

चारमुखी रूद्राक्ष:
हा ब्रम्हदेवाचे स्वरूप मानला गेलेला आहे. धर्म, अर्थ, काम मोक्ष, प्राप्त होते.

पाचमुखी रूद्राक्ष:
हा भगवान शंकराचे पंचानन रूपाचे स्वरूप आहे. हा रूद्राक्ष कामना पूर्ण व मोक्ष प्राप्ती देतो.

सहामुखी रूद्राक्ष:
या रूद्राक्षाला भगवान शंकराचे पूज्य कार्तिक स्वामीचे स्वरूप मानले गेले आहे. हा रूद्राक्ष धारण केल्यानंतर सुप्त शक्ती जागृत होते.

सातमुखी रूद्राक्ष:
या रूद्राक्षाला धारण केल्यावर आरोग्य, यश, किर्ती, प्रतिष्ठा प्राप्त होते. संसारात वैभव व समृद्धी मिळते.

अष्ठमुखी रूद्राक्ष:
कोर्ट कचेरी विजयी होण्यासाठी विघ्न, बाधा मुक्ती देतो.

नऊमुखी रूद्राक्ष:
हा रूद्राक्ष देवी मातेचे स्वरूप मानला जातो. पापापासून मुक्ती आणि देवीमातेची कृपा होते.

दहामुखी रूद्राक्ष:
भगवान विष्णूंचे दहा अवतार दहामुखी रूद्राक्षात वास करतात.

अकरामुखी रूद्राक्ष:
हा सुख समृद्धीची वृद्धी करतो. सर्वांना प्राप्त करण्यासाठी व किर्ती मिळविण्यासाठी धारण करतात.

बारामुखी रूद्राक्ष:
हा भगवान सुर्यनारायणाचा खुप आवडीचा आहे. अग्निमय दारिद्रता, मनुष्य हत्या, चोरीचे पाप नाहीसे होतात.

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श्रीमद्भगवद्गीता के ३८ अनमोल वचन

*श्रीमद्भगवद्गीता के ३८ अनमोल वचन !* 🙏🏼

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🌸📖🌸

*भगवान श्रीकृष्ण के अनमोल विचार….☝🏼🌸*

*श्रीमद्भगवद्गीता* एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमे जीवन का पूरा सार दिया हुआ है. मनुष्य के जन्म लेने से मृत्यु के बाद के चक्र को *श्रीमद्भगवद्गीता* में विस्तार से बताया गया है. मनुष्य के सांसारिक माया – मोह से निकलकर मोक्ष की प्राप्ति का सूत्र गीता में मौजूद है.

महाभारत के युद्ध में *श्री कृष्ण* ने अर्जुन के द्वारा पूरे संसार को ऐसा ज्ञान दिया जिसे अपनाकर कोई व्यक्ति इस संसार में परम सुख और शांति से अपना जीवन व्यतीत कर सकता है.

*०१*: हमेशा आसक्ति से ही कामना का जन्म होता है.

*०२*: जो व्यक्ति संदेह करता है उसे कही भी ख़ुशी नहीं मिलती.

*०३*: जो मन को रोक नहीं पाते उनके लिए उनका मन दुश्मन के समान है.

*०४*: वासना, गुस्सा और लालच नरक जाने के तीन द्वार है.

*०५*: इस जीवन में कुछ भी व्यर्थ नहीं होता है.

*०६*: मन बहुत ही चंचल होता है और इसे नियंत्रित करना कठिन है. परन्तु अभ्यास से इसे वश में किया जा सकता है.

*०७*: सम्मानित व्यक्ति के लिए अपमान मृत्यु से भी बदतर होती है.

*०८*: व्यक्ति जो चाहे वह बन सकता है अगर वह उस इच्छा पर पूरे विश्वास के साथ कर्म करे.

*०९*: जो वास्तविक नहीं है उससे कभी भी मत डरो.

*१०*: हर व्यक्ति का विश्वास उसके स्वभाव के अनुसार होता है.

*११*: जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु भी निश्चित है. इसलिए जो होना ही है उस पर शोक मत करो.

*१२*: जो कर्म प्राकृतिक नहीं है वह हमेशा आपको तनाव देता है.

*१३*: तुम मुझमे समर्पित हो जाओ मैं तुम्हे सभी पापो से मुक्त कर दूंगा.

*१४*: किसी भी काम को नहीं करने से अच्छा है कि कोई काम कर लिया जाए.

*१५*: जो मुझसे प्रेम करते है और मुझसे जुड़े हुए है. मैं उन्हें हमेशा ज्ञान देता हूँ.

*१६*: बुद्धिमान व्यक्ति ईश्वर के सिवा और किसी पर निर्भर नहीं रहता.

*१७*: सभी कर्तव्यो को पूरा करके मेरी शरण में आ जाओ.

*१८*: ईश्वर सभी वस्तुओ में है और उन सभी के ऊपर भी.

*१९*: एक ज्ञानवान व्यक्ति कभी भी कामुक सुख में आनंद नहीं लेता.

*२०*: जो कोई भी किसी काम में निष्क्रियता और निष्क्रियता में काम देखता है वही एक बुद्धिमान व्यक्ति है.

*२१*: मैं इस धरती की सुगंध हूँ. मैं आग का ताप हूँ और मैं ही सभी प्राणियों का संयम हूँ.

*२२*: तुम उस चीज के लिए शोक करते हो जो शोक करने के लायक नहीं है. एक बुद्धिमान व्यक्ति न ही जीवित और न ही मृत व्यक्ति के लिए शोक करता है.

*२३*: मुझे कोई भी कर्म जकड़ता नहीं है क्योंकि मुझे कर्म के फल की कोई चिंता नहीं है.

*२४*: मैंने और तुमने कई जन्म लिए है लेकिन तुम्हे याद नहीं है.

*२५*: वह जो मेरी सृष्टि की गतिविधियों को जानता है वह अपना शरीर त्यागने के बाद कभी भी जन्म नहीं लेता है क्योंकि वह मुझमे समा जाता है.

*२६*: कर्म योग एक बहुत ही बड़ा रहस्य है.

*२७*: जिसने काम का त्याग कर दिया हो उसे कर्म कभी नहीं बांधता.

*२८*: बुद्धिमान व्यक्ति को समाज की भलाई के लिए बिना किसी स्वार्थ के कार्य करना चाहिए.

*२९*: जब व्यक्ति अपने कार्य में आनंद प्राप्त कर लेता है तब वह पूर्ण हो जाता है.

*३०*: मेरे लिए कोई भी अपना – पराया नहीं है. जो मेरी पूजा करता है मैं उसके साथ रहता हूँ.

*३१*: जो अपने कार्य में सफलता पाना चाहते है वे भगवान की पूजा करे.

*३२*: बुरे कर्म करने वाले नीच व्यक्ति मुझे पाने की कोशिश नहीं करते.

*३३*: जो व्यक्ति जिस भी देवता की पूजा करता है मैं उसी में उसका विश्वास बढ़ाने लगता हूँ.

*३४*: मैं भूत, वर्तमान और भविष्य के सभी प्राणियों को जानता हूँ लेकिन कोई भी मुझे नहीं जान पाता.

*३५*: वह सिर्फ मन है जो किसी का मित्र तो किसी का शत्रु होता है.

*३६*: मैं सभी जीव – जंतुओ के ह्रदय में निवास करता हूँ.

*३७*: चेतन व अचेतन ऐसा कुछ भी नहीं है जो मेरे बगैर इस अस्तित्व में रह सकता हो.

*३८*: इसमें कोई शक नहीं है कि जो भी व्यक्ति मुझे याद करते हुए मृत्यु को प्राप्त होता है वह मेरे धाम को प्राप्त होता है.

🌸 *ऊं नमो: भगवते वासुदेवाय* 🌸

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डॉ राजेंद्र प्रसाद

डॉ राजेंद्र प्रसाद जी के साथ नेहरू ने जो किया, उसको बेनकाब करता राज्यसभा सांसद आरके सिन्हा जी का लेख। पढिए और अतीत के सत्य का सामना कीजिए।.
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डा. राजेन्द्र प्रसाद की शख्सियत से पंडित नेहरु हमेशा अपने को असुरक्षित महसूस करते रहे। उन्होंने राजेन्द्र बाबू को नीचा दिखाने का कोई अवसर भी हाथ से जाने नहीं दिया। हद तो तब हो गई जब 12 वर्षो तक राष्ट्रपति रहने के बाद राजेन्द्र बाबू देश के राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद पटना जाकर रहने लगे तो नेहरु ने उनके लिए वहां पर एक सरकारी आवास तक की व्यवस्था नहीं की। उनकी सेहत का ध्यान नहीं रखा गया। दिल्ली से पटना पहुंचने पर राजेन्द्र बाबू बिहार विद्यापीठ, सदाकत आश्रम के एक सीलन भरे कमरे में रहने लगे।

उनकी तबीयत पहले से खराब रहती थी, पटना जाकर ज्यादा खराब रहने लगी। वे दमा के रोगी थे। सीलनभरे कमरे में रहने के बाद उनका दमा ज्यादा बढ़ गया। वहां उनसे मिलने के लिए श्री जयप्रकाश नारायण पहुंचे। वे उनकी हालत देखकर हिल गए। उस कमरे को देखकर जिसमें देश के पहले राष्ट्रपति और संविधान सभा के पहले अध्यक्ष डा.राजेन्द्र प्रसाद रहते थे, उनकी आंखें नम हो गईं। उन्होंने उसके बाद उस सीलन भरे कमरे को अपने मित्रों और सहयोगियों से कहकर कामचलाउ रहने लायक करवाया। लेकिन, उसी कमरे में रहते हुए राजेन्द्र बाबू की 28 फरवरी,1963 को मौत हो गई।

क्या आप मानेंगे कि उनकी अंत्येष्टि में पंडित नेहरु ने शिरकत करना तक भी उचित नहीं समझा। वे उस दिन जयपुर में एक अपनी ‘‘‘तुलादान’’ करवाने जैसे एक मामूली से कार्यक्रम में चले गए। यही नहीं, उन्होंने राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल डा.संपूर्णानंद को राजेन्द्र बाबू की अंत्येष्टि में शामिल होने से रोका। इस मार्मिक और सनसनीखेज तथ्य का खुलासा खुद डा.संपूर्णानंद ने किया है। संपूर्णानंद जी ने जब नेहरू को कहा कि वे पटना जाना चाहते हैं, राजेन्द्र बाबू की अंत्येष्टि में भाग लेने के लिए तो उन्होंने (नेहरु) संपूर्णानंद से कहा कि ये कैसे मुमकिन है कि देश का प्रधानमंत्री किसी राज्य में आए और उसका राज्यपाल वहां से गायब हो। इसके बाद डा. संपूर्णानंद ने अपना पटना जाने का कार्यक्रम रद्द किया। हालांकि, उनके मन में हमेशा यह मलाल रहा कि वे राजेन्द्र बाबू के अंतिम दर्शन नहीं कर सके। वे राजेन्द्र बाबू का बहुत सम्मान करते थे। डा0 सम्पूर्णानंद ने राजेन्द बाबू के सहयोगी प्रमोद पारिजात शास्त्री को लिखे गए पत्र में अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए लिखा था कि ‘‘घोर आश्चर्य हुआ कि बिहार के जो प्रमुख लोग दिल्ली में थे उनमें से भी कोई पटना नहीं गया। (किसके डर से?)

सबलोगों को इतना कौन सा आवशयक काम अचानक पड़ गया, यह समझ में नहीं आया। यह अच्छी बात नहीं हुई। यह बिलकुल ठीक है कि उनके जाने न जाने से उस महापुरुष भी बनता बिगड़ता नहीं। परन्तु, ये लोग तो निष्चय ही अपने कर्तव्य से च्युत हुए। कफ निकालने वाली मशीन वापस लाने की बात तो अखबारों में भी आ गई हैं मुख्यमंत्री की बात सुनकर आश्चर्य हुआ। यही नहीं, नेहरु ने राजेन्द्र बाबू के उतराधिकारी डा. एस. राधाकृष्णन को भी पटना न जाने की सलाह दे दी। लेकिन, डा0 राधाकृष्णन ने नेहरू के परामर्श को नहीं माना और वे राजेन्द्र बाबू के अंतिम संस्कार में भाग लेने पटना पहुंचे। इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि नेहरू किस कदर राजेन्द्र प्रसाद से दूरियां बनाकर रखते थे।

ये बात भी अब सबको मालूम है कि पटना में डा. राजेन्द्र बाबू को उत्तम क्या मामूली स्वास्थ्य सुविधाएं तक नहीं मिलीं। उनके साथ बेहद बेरुखी वाला व्यवहार होता रहा। मानो सबकुछ केन्द्र के निर्देश पर हो रहा हो। उन्हें कफ की खासी शिकायत रहती थी। उनकी कफ की शिकायत को दूर करने के लिए पटना मेडिकल कालेज में एक मशीन थी ही कफ निकालने वाली। उसे भी केन्द्र के निर्देश पर मुख्यमंत्री ने राजेन्द्र बाबू के कमरे से निकालकर वापस पटना मेडिकल काॅलेज भेज दिया गया। जिस दिन कफ निकालने की मशीन वापस मंगाई गई उसके दो दिन बाद ही राजेन्द बाबू खास्ते-खास्ते चल बसे। यानी राजेन्द्र बाबू को मारने का पूरा और पुख्ता इंतजाम किया गया था ।

दरअसल नेहरु अपने को राजेन्द्र प्रसाद के समक्ष बहुत बौना महसूस करते थे। उनमें इस कारण से बढ़ी हीन भावना पैदा हो गई थी। इसलिए वे उनसे छतीस का आंकड़ा रखते थे। वे डा.राजेन्द्र प्रसाद को किसी न किसी तरह से आदेश देने की मुद्रा में रहते थे जिसे राजेन्द्र बाबू मुस्कुराकर टाल दिया करते थे।

नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद से सोमनाथ मंदिर का 1951 में उदघाटन न करने का आग्रह किया था। उनका तर्क था कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के प्रमुख को मंदिर के उदघाटन से बचना चाहिए। हालांकि, नेहरू के आग्रह को न मानते हुए डा. राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर में शिव मूर्ति की स्थापना की थी।

डा. राजेन्द्र प्रसाद मानते थे कि ‘‘धर्मनिरपेक्षता का अर्थ अपने संस्कारों से दूर होना या धर्मविरोधी होना नहीं हो सकता।’’ सोमनाथ मंदिर के उदघाटन के वक्त डा. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है लेकिन नास्तिक राष्ट्र नहीं है। डा. राजेंद्र प्रसाद मानते थे कि उन्हें सभी धर्मों के प्रति बराबर और सार्वजनिक सम्मान प्रदर्शित करना चाहिए।

नेहरु एक तरफ तो डा. राजेन्द्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर में जाने से मना करते रहे लेकिन, दूसरी तरफ वे स्वयं 1956 के इलाहाबाद में हुए कुंभ मेले में डुबकी लगाने चले गए। बताते चलें कि नेहरु के वहां अचानक पहुँच जाने से कुंभ में अव्यवस्था फैली और भारी भगदड़ में करीब 800 लोग मारे गए।

हिन्दू कोड बिल पर भी नेहरु से अलग राय रखते थे डा. राजेन्द्र प्रसाद। जब पंडित जवाहर लाल नेहरू हिन्दुओं के पारिवारिक जीवन को व्यवस्थित करने के लिए हिंदू कोड बिल लाने की कोशिश में थे, तब डा.राजेंद्र प्रसाद इसका खुलकर विरोध कर रहे थे। डा. राजेंद्र प्रसाद का कहना था कि लोगों के जीवन और संस्कृति को प्रभावित करने वाले कानून न बनाये जायें।

दरअसल जवाहर लाल नेहरू चाहते ही नहीं थे कि डा. राजेंद्र प्रसाद देश के राष्ट्रपति बनें। उन्हें राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए उन्होंने ‘‘झूठ’’ तक का सहारा लिया था। नेहरु ने 10 सितंबर, 1949 को डा. राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर कहा कि उन्होंने (नेहरू) और सरदार पटेल ने फैसला किया है कि सी.राजगोपालाचारी को भारत का पहला राष्ट्रपति बनाना सबसे बेहतर होंगा।नेहरू ने जिस तरह से यह पत्र लिखा था, उससे डा.राजेंद्र प्रसाद को घोर कष्ट हुआ और उन्होंने पत्र की एक प्रति सरदार पटेल को भिजवाई। पटेल उस वक्त बम्बई ) में थे। कहते हैं कि सरदार पटेल उस पत्र को पढ़ कर सन्न थे, क्योंकि, उनकी इस बारे में नेहरू से कोई चर्चा नहीं हुई थी कि राजाजी (राजगोपालाचारी) या डा. राजेंद्र प्रसाद में से किसे राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए। न ही उन्होंने नेहरू के साथ मिलकर यह तय किया था कि राजाजी राष्ट्रपति पद के लिए उनकी पसंद के उम्मीदवार होंगे। यह बात उन्होंने राजेन्द्र बाबू को बताई। इसके बाद डा. राजेंद्र प्रसाद ने 11 सितंबर,1949 को नेहरू को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ‘‘पार्टी में उनकी (डा0 राजेन्द प्रसाद की) जो स्थिति रही है, उसे देखते हुए वे बेहतर व्यवहार के पात्र हैं। नेहरू को जब यह पत्र मिला तो उन्हें लगा कि उनका झूठ पकड़ा गया। अपनी फजीहत कराने के बदले उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करने का निर्णय लिया।

नेहरू यह भी नहीं चाहते थे कि हालात उनके नियंत्रण से बाहर हों और इसलिए ऐसा बताते हैं कि उन्होंने इस संबंध में रातभर जाग कर डा. राजेन्द्र प्रसाद को जवाब लिखा। डा. राजेन्द्र बाबू, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के विरोध के बावजूद दो कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति चुने गए थे। बेशक, नेहरू सी राजगोपालाचारी को देश का पहला राष्ट्रपति बनाना चाहते थे, लेकिन सरदार पटेल और कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ नेताओं की राय डा. राजेंद्र प्रसाद के हक में थी। आखिर नेहरू को कांग्रेस नेताओं सर्वानुमति की बात माननी ही पड़ी और राष्ट्रपति के तौर पर डा. राजेन्द्र प्रसाद को ही अपना समर्थन देना पड़ा।

जवाहर लाल नेहरू और डा. राजेंद्र प्रसाद में वैचारिक और व्यावहारिक मतभेद बराबर बने रहे थे। ये मतभेद शुरू से ही थे, लेकिन, 1950 से 1962 तक राजेन्द्र बाबू के राष्ट्रपति रहने के दौरान ज्यादा मुखर और सार्वजनिक हो गए। नेहरु पश्चिमी सभ्यता के कायल थे जबकि राजेंद्र प्रसाद भारतीय सभ्यता देष के एकता का मूल तत्व मानते थे। राजेन्द्र बाबू को देश के गांवों में जाना पसंद था, वहीं नेहरु लन्दन और पेरिस में चले जाते थे। पेरिस के घुले कपड़े तक पहनते थे। सरदार पटेल भी भारतीय सभ्यता के पूर्णतया पक्षधर थे। इसी कारण सरदार पटेल और डा. राजेंद्र प्रसाद में खासी घनिष्ठता थी। सोमनाथ मंदिर मुद्दे पर डा. राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल ने एक जुट होकर कहा की यह भारतीय अस्मिता का केंद्र है इसका निर्माण होना ही चाहिए।

अगर बात बिहार की करें तो वहां गांधीजी के बाद राजेन्द्र प्रसाद ही सबसे बड़े और लोकप्रिय नेता थे। गांधीजी के साथ ‘राजेन्द्र प्रसाद जिन्दाबाद’ के भी नारे लगाए जाते थे। लंबे समय तक देश के राष्ट्रपति रहने के बाद भी राजेन्द्र बाबू ने कभी भी अपने किसी परिवार के सदस्य को न पोषित किया और न लाभान्वित किया। हालांकि नेहरु इसके ठीक विपरीत थे। उन्होंने अपनी पुत्री इंदिरा गांधी और बहन विजयालक्ष्मी पंडित को सत्ता की रेवडि़यां खुलकर बांटीं। सारे दूर-दराज के रिष्तेदारों को राजदूत, गवर्नर, जज बनाया।

एक बार जब डा. राजेंद्र प्रसाद ने बनारस यात्रा के दौरान खुले आम काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारियों के पैर छू लिए तो नेहरू नाराज हो गए और सार्वजनिक रूप से इसके लिए विरोध जताया, और कहा की भारत के राष्ट्रपति को ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए। हालांकि डा. राजेन्द्र प्रसाद ने नेहरु की आपत्ति पर प्रतिक्रिया देना भी उचित नहीं समझा। राजेन्द्र प्रसाद नेहरू की तिब्बत नीति और हिन्दी-चीनी भाई-भाई की नीति से असहमत थे। नेहरु की चीन नीति के कारण भारत 1962 की जंग में करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। राजेन्द्र बाबू और नेहरु में राज्यभाषा हिन्दी को लेकर भी मतभेद था। मुख्यमंत्रियों की सभा (1961) को राष्ट्रपति ने लिखित सुझाव भेजा कि अगर भारत की सभी भाषाएं देवनागरी लिपि अपना लें, जैसे यूरोप की सभी भाषाएं रोमन लिपि में लिखी जाती हैं, तो भारत की राष्ट्रीयता मजबूत होगी। सभी मुख्यमंत्रियों ने इसे एकमत से स्वीकार कर लिया, किन्तु अंग्रेजी परस्त नेहरू की केंद्र सरकार ने इसे नहीं माना क्योंकि, इससे अंग्रेजी देश की भाषा नहीं बनी रहती जो नेहरू चाहते थे।

वास्तव में डा. राजेंद्र प्रसाद एक दूरदर्शी नेता थे वो भारतीय संस्कृति सभ्यता के समर्थक थे, राष्ट्रीय अस्मिता को बचाकर रखने वालो में से थे।जबकि नेहरु पश्चिमी सभ्यता के समर्थक और, भारतीयता के विरोधी थे। बहरहाल आप समझ गए होंगे कि नेहरु जी किस कद्र भयभीत रहते थे राजेन्द्र बाबू से।

अभी संविधान पर देशभर में चर्चायें हो रही हैं। डा0 राजेन्द्र प्रसाद ही संविधान सभा के अध्यक्ष थे और उन्होंने जिन 24 उप-समितियों का गठन किया था, उन्हीं में से एक ‘‘मसौदा कमेटी’’ के अध्यक्ष डा0 भीमराव अम्बेडकर थे। उनका काम 300 सदस्यीय संविधान सभा की चर्चाओं और उप-समितियों की अनुषंसाओं को संकलित कर एक मसौदा (ड्राफ्ट) तैयार करना था जिसे संविधान सभा के अध्यक्ष के नाते डा0 राजेन्द्र प्रसाद स्वीकृत करते थे। फिर वह ड्राफ्ट संविधान में शामिल होता था। संविधान निर्माण का कुछ श्रेय तो आखिरकार देशरत्न डा0 राजेन्द्र प्रसाद को भी मिलना ही चाहिए।