Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

3 सितम्बर 1857 का ही दिन था जब…बिठूर में एक पेड़ से बंधी 13 वर्ष की लड़की को, ब्रिटिश सेना ने जिंदा ही आग के हवाले किया, धूँ धूँ कर जलती वो लड़की, उफ़ तक न बोली और जिंदा लाश की तरह जलती हुई, राख में तब्दील हो गई।

ये लड़की थी नाना साहब पेशवा की दत्तक पुत्री मैना कुमारी जिसे 160 वर्ष पूर्व, आज ही के दिन, आउटरम नामक ब्रिटिश अधिकारी ने जिंदा जला दिया था।

जिसने 1857 क्रांति के दौरान, अपने पिता के साथ जाने से इसलिए मना कर दिया, की कही उसकी सुरक्षा के चलते, उसके पिता को देश सेवा में कोई समस्या न आये।और बिठूर के महल में रहना उचित समझा।

नाना साहब पर ब्रिटिश सरकार इनाम घोषित कर चुकी थी और जैसे ही उन्हें पता चला नाना साहब महल से बाहर है, ब्रिटिश सरकार ने महल घेर लिया, जहाँ उन्हें कुछ सैनिको के साथ बस मैना कुमारी ही मिली।

मैना कुमारी, ब्रटिश सैनिको को देख कर महल के गुप्त स्थानों में जा छुपी, ये देख ब्रिटिश अफसर आउटरम ने महल को तोप से उड़ने का आदेश दिया।। और ऐसा कर वो वहां से चला गया पर अपने कुछ सिपाहियों को वही छोड़ गया।‌रात को मैना को जब लगा की सब लोग जा चुके है, और वो बहार निकली तो 2 सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और फिर आउटरम के सामने पेश किया।

आउटरम ने पहले मैना को एक पेड़ से बंधा, फिर मैना से नाना साहब के बारे में और क्रांति की गुप्त जानकारी जाननी चाही पर उसने मुंह नही खोला।

यहाँ तक की आउटरम ने मैना कुमारी को जिंदा जलने की धमकी भी दी, पर उसने कहा की वो एक क्रांतिकारी की बेटी है, मृत्यु से नही डरती। ये देख आउटरम तिलमिला गया और उसने मैना कुमारी को जिंदा जलने का आदेश दे दिया। इस पर भी मैना कुमारी, बिना प्रतिरोध के आग में जल गई, ताकि क्रांति की मशाल कभी न बुझे।

बिना खड्ग बिना ढाल वाली गैंग या धूर्त वामपंथी लेखक चाहे जो लिखे पर हमारी स्वतंत्रता इन जैसे असँख्य क्रांतिवीर और वीरांगनाओं के बलिदानों का ही प्रतिफल है और इनकी गाथाएँ आगे की पीढ़ी तक पहुँचनी चाहिए, इन्हें हर कृतज्ञ भारतीय का नमन पहुँचना चाहिये !

शत शत नमन है इस महान बाल वीरांगना को !

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🌹 पद्मा एकादशी : 17 सितंबर 2021
🎥https://youtu.be/x0yOImm4ZfQ

🌹 युधिष्ठिर ने पूछा : केशव ! कृपया यह बताइये कि भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है, उसके देवता कौन हैं और कैसी विधि है?

🌹 भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! इस विषय में मैं तुम्हें आश्चर्यजनक कथा सुनाता हूँ, जिसे ब्रह्माजी ने महात्मा नारद से कहा था ।

🌹 नारदजी ने पूछा : चतुर्मुख ! आपको नमस्कार है ! मैं भगवान विष्णु की आराधना के लिए आपके मुख से यह सुनना चाहता हूँ कि भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में कौन सी एकादशी होती है?

🌹 ब्रह्माजी ने कहा : मुनिश्रेष्ठ ! तुमने बहुत उत्तम बात पूछी है । क्यों न हो, वैष्णव जो ठहरे ! भादों के शुक्लपक्ष की एकादशी ‘पधा’ के नाम से विख्यात है । उस दिन भगवान ह्रषीकेश की पूजा होती है । यह उत्तम व्रत अवश्य करने योग्य है । सूर्यवंश में मान्धाता नामक एक चक्रवर्ती, सत्यप्रतिज्ञ और प्रतापी राजर्षि हो गये हैं । वे अपने औरस पुत्रों की भाँति धर्मपूर्वक प्रजा का पालन किया करते थे । उनके राज्य में अकाल नहीं पड़ता था, मानसिक चिन्ताएँ नहीं सताती थीं और व्याधियों का प्रकोप भी नहीं होता था । उनकी प्रजा निर्भय तथा धन धान्य से समृद्ध थी । महाराज के कोष में केवल न्यायोपार्जित धन का ही संग्रह था । उनके राज्य में समस्त वर्णों और आश्रमों के लोग अपने अपने धर्म में लगे रहते थे । मान्धाता के राज्य की भूमि कामधेनु के समान फल देनेवाली थी । उनके राज्यकाल में प्रजा को बहुत सुख प्राप्त होता था ।

🌹 एक समय किसी कर्म का फलभोग प्राप्त होने पर राजा के राज्य में तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई । इससे उनकी प्रजा भूख से पीड़ित हो नष्ट होने लगी । तब सम्पूर्ण प्रजा ने महाराज के पास आकर इस प्रकार कहा :

🌹 प्रजा बोली: नृपश्रेष्ठ ! आपको प्रजा की बात सुननी चाहिए । पुराणों में मनीषी पुरुषों ने जल को ‘नार’ कहा है । वह ‘नार’ ही भगवान का ‘अयन’ (निवास स्थान) है, इसलिए वे ‘नारायण’ कहलाते हैं । नारायणस्वरुप भगवान विष्णु सर्वत्र व्यापकरुप में विराजमान हैं । वे ही मेघस्वरुप होकर वर्षा करते हैं, वर्षा से अन्न पैदा होता है और अन्न से प्रजा जीवन धारण करती है । नृपश्रेष्ठ ! इस समय अन्न के बिना प्रजा का नाश हो रहा है, अत: ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे हमारे योगक्षेम का निर्वाह हो ।

🌹 राजा ने कहा : आप लोगों का कथन सत्य है, क्योंकि अन्न को ब्रह्म कहा गया है । अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं और अन्न से ही जगत जीवन धारण करता है । लोक में बहुधा ऐसा सुना जाता है तथा पुराण में भी बहुत विस्तार के साथ ऐसा वर्णन है कि राजाओं के अत्याचार से प्रजा को पीड़ा होती है, किन्तु जब मैं बुद्धि से विचार करता हूँ तो मुझे अपना किया हुआ कोई अपराध नहीं दिखायी देता । फिर भी मैं प्रजा का हित करने के लिए पूर्ण प्रयत्न करुँगा ।

🌹 ऐसा निश्चय करके राजा मान्धाता इने गिने व्यक्तियों को साथ ले, विधाता को प्रणाम करके सघन वन की ओर चल दिये । वहाँ जाकर मुख्य मुख्य मुनियों और तपस्वियों के आश्रमों पर घूमते फिरे । एक दिन उन्हें ब्रह्मपुत्र अंगिरा ॠषि के दर्शन हुए । उन पर दृष्टि पड़ते ही राजा हर्ष में भरकर अपने वाहन से उतर पड़े और इन्द्रियों को वश में रखते हुए दोनों हाथ जोड़कर उन्होंने मुनि के चरणों में प्रणाम किया । मुनि ने भी ‘स्वस्ति’ कहकर राजा का अभिनन्दन किया और उनके राज्य के सातों अंगों की कुशलता पूछी । राजा ने अपनी कुशलता बताकर मुनि के स्वास्थय का समाचार पूछा । मुनि ने राजा को आसन और अर्ध्य दिया । उन्हें ग्रहण करके जब वे मुनि के समीप बैठे तो मुनि ने राजा से आगमन का कारण पूछा ।

🌹 राजा ने कहा : भगवन् ! मैं धर्मानुकूल प्रणाली से पृथ्वी का पालन कर रहा था । फिर भी मेरे राज्य में वर्षा का अभाव हो गया । इसका क्या कारण है इस बात को मैं नहीं जानता ।

🌹 ॠषि बोले : राजन् ! सब युगों में उत्तम यह सत्ययुग है । इसमें सब लोग परमात्मा के चिन्तन में लगे रहते हैं तथा इस समय धर्म अपने चारों चरणों से युक्त होता है । इस युग में केवल ब्राह्मण ही तपस्वी होते हैं, दूसरे लोग नहीं । किन्तु महाराज ! तुम्हारे राज्य में एक शूद्र तपस्या करता है, इसी कारण मेघ पानी नहीं बरसाते । तुम इसके प्रतिकार का यत्न करो, जिससे यह अनावृष्टि का दोष शांत हो जाय ।

🌹 राजा ने कहा : मुनिवर ! एक तो वह तपस्या में लगा है और दूसरे, वह निरपराध है । अत: मैं उसका अनिष्ट नहीं करुँगा । आप उक्त दोष को शांत करनेवाले किसी धर्म का उपदेश कीजिये ।

🌹 ॠषि बोले : राजन् ! यदि ऐसी बात है तो एकादशी का व्रत करो । भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में जो ‘पधा’ नाम से विख्यात एकादशी होती है, उसके व्रत के प्रभाव से निश्चय ही उत्तम वृष्टि होगी । नरेश ! तुम अपनी प्रजा और परिजनों के साथ इसका व्रत करो ।

🌹 ॠषि के ये वचन सुनकर राजा अपने घर लौट आये । उन्होंने चारों वर्णों की समस्त प्रजा के साथ भादों के शुक्लपक्ष की ‘पधा एकादशी’ का व्रत किया । इस प्रकार व्रत करने पर मेघ पानी बरसाने लगे । पृथ्वी जल से आप्लावित हो गयी और हरी भरी खेती से सुशोभित होने लगी । उस व्रत के प्रभाव से सब लोग सुखी हो गये ।

🌹 भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : राजन् ! इस कारण इस उत्तम व्रत का अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए । ‘पधा एकादशी’ के दिन जल से भरे हुए घड़े को वस्त्र से ढकँकर दही और चावल के साथ ब्राह्मण को दान देना चाहिए, साथ ही छाता और जूता भी देना चाहिए । दान करते समय निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करना चाहिए :

*नमो नमस्ते गोविन्द *बुधश्रवणसंज्ञक ॥*
अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव ।
भुक्तिमुक्तिप्रदश्चैव लोकानां सुखदायकः ॥

‘बुधवार और श्रवण नक्षत्र के योग से युक्त द्वादशी के दिन बुद्धश्रवण नाम धारण करनेवाले भगवान गोविन्द ! आपको नमस्कार है… नमस्कार है ! मेरी पापराशि का नाश करके आप मुझे सब प्रकार के सुख प्रदान करें । आप पुण्यात्माजनों को भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले तथा सुखदायक हैं |’

राजन् ! इसके पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है ।


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🔥रिश्तों की महक🔥

“बहू!.तुमसे एक बात कहनी थी।”

“जी मम्मी जी!”

अभी-अभी दफ्तर से लौटकर झटपट फ्रेश होकर रसोई में पहुंच सभी के लिए चाय बना रही सौम्या ने चूल्हे की आंच थोड़ी कम कर दी।

“आज पड़ोस में रहने वाली मिसेज शर्मा हमारे घर आई थी।” धीमी आंच पर खौलते चाय को संभालती सौम्या ने हुंकार भरी..

“जी मम्मी जी!”

“उनके बेटे की शादी पिछले वर्ष हुई थी और तुम्हारी तरह उनकी बहू भी घर के सारे काम अच्छे से संभालती है।”

चाय का स्वाद बढ़ाने के लिए अपनी सास की मनपसंद इलायची कूटकर चाय ने मिलाती सौम्या मुस्कुराई कुछ बोली नहीं। लेकिन प्रभा जी ने अपनी बात आगे बढ़ाई..

,“थोड़ी कम पढ़ी लिखी है इसलिए तुम्हारी तरह ऑफिस नहीं जाती लेकिन उसके माथे से पल्लू कभी नहीं हटता।”

अपनी सास के मन की बात समझने की कोशिश करती सौम्या ने काफी देर उबल चुके चाय का स्वाद कड़वा होने से पहले ही चूल्हे की आंच बुझा दी लेकिन सौम्या की सास प्रभा जी ने अपनी बात पूरी की..

“लोग ऐसी-वैसी बातें करें मुझे पसंद नहीं!. इसलिए तुम कल से सूट-सलवार या ट्राउजर नहीं!.साड़ी पहनकर अपने ऑफिस जाया करना।”

सास की बातों पर सर हिलाकर हांमी भरती सौम्या ने छन्नी रख प्याली में चाय छानकर अपनी सास को थमा दिया और घर के अन्य सदस्यों को चाय देने रसोई से बाहर चली गई।

सास-बहू के बीच हुए बातों की चर्चा बिना किसी से किए अगले दिन दफ्तर जाने के लिए सौम्या एक सुंदर सी साड़ी में तैयार हुई।

हमेशा सूट-सलवार या ट्राउजर पहनकर ऑफिस जाने वाली सौम्या को साड़ी में देख उसका पति मुस्कुराया लेकिन उसके ससुर तनिक हैरान हुए।

रोज की तरह सौम्या ने अपने पति के साथ दफ्तर के लिए निकलने से पहले सास-ससुर के पांव छुए और रोज की तरह प्रभा जी और उनके पति ने हाथ हिलाकर खुशी-खुशी बेटे बहू को दफ्तर के लिए विदा किया।

“आज सौम्या के ऑफिस में कोई फंक्शन है क्या?” वहीं बरामदे में रखी कुर्सी पर बैठते हुए सौम्या के ससुर ने आखिर अपनी पत्नी से पूछ ही लिया।

“ऐसा कुछ तो उसने मुझे नहीं बताया।”

“असल में आज सौम्या साड़ी पहनकर ऑफिस के लिए निकली इसलिए मैंने तुमसे पूछा।”

“अब से रोज साड़ी पहनकर ऑफिस जाने के लिए मैंने ही उसे कहा है।”

नई-नवेली बहू पर अपने सास होने का धौंस जमाने की कोशिश करती पत्नी की ओर देख सौम्या के ससुर मुस्कुराए लेकिन आज प्रभा जी अपने पति पर भी तनिक नाराज हुई।

“और तुम!.बहू को हमेशा उसके नाम से क्यों पुकारते हो?”

“अरे! तो क्या कह कर पुकारूं?”सौम्या के ससुर हैरान हुए।

“बहू कहा करो!”

प्रभा जी ने सलाह दी।

“क्यों?”

“अच्छा लगता है।”

प्रभा जी की बात सुन सौम्या के ससुर मुस्कुराए..

“जैसी तुम्हारी मर्जी!. लेकिन आज मैंने एक बात गौर किया।”

“क्या?”

“बहू ने रोज की तरह ऑफिस के लिए निकलने से पहले तुम्हारे पांव छुएं लेकिन रोज की तरह आज तुम्हारे गले नहीं लगी।”

“अगर सास को मांँ की तरह समझती तो जरूर गले लगती।”

पति की बात सुन कर प्रभा जी तनिक चिढ़ गई लेकिन पत्नी के चेहरे के भाव पढ़ते सौम्या के ससुर जी अपने मन की बात कहने से नहीं चूके..

“मुझे लगता है कि,.अगर तुम बहू को बेटी की तरह समझती तब भी वह जरूर तुम्हारे गले लगती!”

पति की बात सुनकर प्रभाजी गहरी सोच में पड़ गई।

शाम को दफ्तर से घर लौटी सौम्या ने महसूस किया कि घर के भीतर सौंधी खुशबू फैली थी। उसकी सास रसोई में कुछ पका रही थी।

सौम्या ने घड़ी पर नजर डाली। उसे ऑफिस से आने में बिल्कुल देर नहीं हुई थी वह रोज की तरह वक्त पर घर पहुंची थी। खैर सौम्या झटपट फ्रेश होकर रसोई में पहुंची।

रसोई में उसकी सास चूल्हे पर एक ओर पकौड़े तल रही थी और दूसरी ओर चाय चढ़ी हुई थी। सौम्या ने आगे बढ़कर सास के हाथ से कलछी ले ली..

“मम्मी जी!.मैं तो बस आ ही गई थी,.आपने खामखा इतनी मेहनत कर दी।”

“बहू!.तुम रोज दुगनी मेहनत करती हो मैंने तो आज बस यूंँही मन बहलाने के लिए…”

प्रभाजी मुस्कुराई लेकिन सौम्या बीच में ही बोल पड़ी..

“मेरे रहते आपको यह सब करने की क्या जरूरत?”

“जरूरत है बहू!”

“क्यों मांँजी?”

“एक समझदार बहू अपनी सास को मांँ समझती है लेकिन एक सास को भी समझदारी के साथ अपनी बहू को बेटी मानने का अभ्यास करना चाहिए।” प्रभाजी भावुक हो उठी।

सौम्या ने आगे बढ़कर अपनी सास को गले लगा लिया.. “मैंने तो हमेशा ही आपको अपनी मांँ समझा है!”

“लेकिन बहू मैंने तो दूसरों की बातों में आकर तुम्हें सिर्फ बहू समझने की भूल की है।”

प्रभा जी ने अपनी गलती मान मांँ बनकर अपनी बहू के माथे पर हाथ रखा और रसोई में सास-बहू के रिश्तो में आए बदलाव से पूरा घर महक उठा।

🚩पंकज पाराशर🚩

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐निःस्वार्थ सेवा💐💐

दो तीन दिन पहले की बात है। अपनी 8 वर्षीय पुत्री को स्कूल से घर वापस लाने तीन बजे स्कूल के गेट पर पहुंच गया था। तीन बजकर दस मिनट से जूनियर के.जी. के छात्र बाहर आना शुरू करते हैं जबकि सीनियर छात्र तीन बजे से। गेट पर अभिभावकों की भीड़ लगी थी। एकाएक तेज बारिश शुरु हो गई। सभी ने अपनी छतरी तान ली। मेरे बगल में एक सज्जन बिना छतरी के खड़े थे। मैंने शिष्टाचार वश उन्हें अपनी छतरी में ले लिया।

गाडी़ से जल्दी जल्दी में आ गया, छतरी नहीं ला सका !! उन्होंने कहा।

“कोई बात नहीं, ऐसा हो जाता है।”

जब उनका बेटा रेन कोट पहने निकला तो मैंने उन्हें छाता से गाड़ी तक पहुंचा दिया। उन्होंने मुझे गौर से देखा और धन्यवाद कहकर चले गए।

कल रात में नौ बजे पाटिल साहब का बेटा आया।
अंकल गाड़ी की जरूरत थी। रूबी(उस की छ:माह की बेटी) की तवियत बहुत खराब है।उसे डाक्टर के पास ले जाना है।

चलो चलते हैं।

अंधेरी बरसाती रात में जब डाक्टर के यहां हम लोग पहुंचे तो दरवान गेट बंद कर रहा था। कम्पाऊंडर ने बताया कि डॉ. साहब लास्ट पेशेंट देख रहे हैं, अब उठने ही वाले है। अब सोमवार का नम्बर लगेगा।

मैं कम्पाउंडर से आज ही दिखाने का आग्रह कर ही रहा था कि डाक्टर साहब चैम्बर से घर जाने के लिए बाहर आए। मुझे देखा तो ठिठक गए फिर बोले – अरे आप आए हैं सर !! क्या बात है ?

कहना नहीं होगा कि डाक्टर साहब वही सज्जन थे जिन्हें स्कूल में मैंने छतरी से गाड़ी तक पहुंचाया था।
डाक्टर साहब ने बच्ची से मेरा रिश्ता पूछा।
मेरे मित्र पाटिल साहब की बेटी है। हम लोग एक ही सोसायटी में रहते हैं।

उन्होंने बच्ची को देखा, कागज पर दवा लिखी और कम्पाउन्डर को हिदायत दी – यह इंजेक्शन बच्ची को तुरंत लगा दो और दो तीन दिन की दवा अपने पास से दे दो।

मैंने एतराज किया तो बोले –
अब कहां इस बरसाती रात में आप दवा खोजते फिरेंगे सर !! कुछ तो अपना रंग मुझ पर भी चढ़ने दीजिए।

बहुत कहने पर भी डॉ. साहब ने ना फीस ली ना दवा का दाम और अपने कम्पाउंडर से बोले –
सर !! हमारे मित्र हैं, जब भी आयें तो आने देना।”

गाड़ी तक पहुंचाने आये और कहा – सर आप जैसे निस्वार्थ समाजसेवी क्या इसी दुनिया में रहते हैं ?

मनुष्य द्वारा समाज व देश में समय-समय पर अनेक प्रकार की सेवाएं की जाती हैं लेकिन उनमें यदि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप कहीं स्वार्थ छुपा हुआ है तो वह सेवा, सेवा नहीं कहलाती । धर्मग्रन्थों के अनुसार अपने तन-मन-धन का अभिमान त्याग कर निष्काम व निस्वार्थ भाव से की गई सेवा ही फलदायी साबित होती है। निस्वार्थ भाव की सेवा ही प्रभु भक्ति का उत्कृष्ट नमूना है। जो सेवा स्वार्थ भाव से की जाए तो स्वार्थपूर्ती होते ही उस सेवा का फल भी समाप्त हो जाता है। निस्वार्थ सेवा करते रहिए शायद आप का रंग औरों पर भी चढ़ जाये,जिसे भी आवश्यकता हो निःस्वार्थ सेवा भाव से उसकी मदद करें। आपको एक विशिष्ट शांति प्राप्त होगी।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐निर्दोष को सजा💐💐

बहुत समय पहले हरिशंकर नाम का एक राजा था। उसके तीन पुत्र थे और अपने उन तीनों पुत्रों में से वह किसी एक पुत्र को राजगद्दी सौंपना चाहता था। पर किसे? राजा ने एक तरकीब निकाली और उसने तीनो पुत्रों को बुलाकर कहा – अगर तुम्हारे सामने कोई अपराधी खड़ा हो तो तुम उसे क्या सजा दोगे?
पहले राजकुमार ने कहा कि अपराधी को मौत की सजा दी जाए तो दूसरे ने कहा कि अपराधी को काल कोठरी में बंद कर दिया जाये। अब तीसरे राजकुमार की बारी थी। उसने कहा कि पिताजी सबसे पहले यह देख लिया जाये कि उसने गलती की भी है या नहीं।

इसके बाद उस राजकुमार ने एक कहानी सुनाई – किसी राज्य में राजा हुआ करता था, उसके पास एक सुन्दर सा तोता था| वह तोता बड़ा बुद्धिमान था, उसकी मीठी वाणी और बुद्धिमत्ता की वजह से राजा उससे बहुत खुश रहता था। एक दिन की बात है कि तोते ने राजा से कहा कि मैं अपने माता-पिता के पास जाना चाहता हूँ। वह जाने के लिए राजा से विनती करने लगा।

तब राजा ने उससे कहा कि ठीक है पर तुम्हें पांच दिनों में वापस आना होगा। वह तोता जंगल की ओर उड़ चला, अपने माता- पिता से जंगल में मिला और खूब खुश हुआ। ठीक पांच दिनों बाद जब वह वापस राजा के पास जा रहा था तब उसने एक सुन्दर सा उपहार राजा के लिए ले जाने का सोचा।

वह राजा के लिए अमृत फल ले जाना चाहता था। जब वह अमृत फल के लिए पर्वत पर पहुंचा तब तक रात हो चुकी थी। उसने फल को तोड़ा और रात वहीँ गुजारने का सोचा। वह सो रहा था कि तभी एक सांप आया और उस फल को खाना शुरू कर दिया। सांप के जहर से वह फल भी विषाक्त हो चुका था।

जब सुबह हुई तब तोता उड़कर राजा के पास पहुँच गया और कहा – राजन मैं आपके लिए अमृत फल लेकर आया हूँ। इस फल को खाने के बाद आप हमेशा के लिए जवान और अमर हो जायेंगे। तभी मंत्री ने कहा कि महाराज पहले देख लीजिए कि फल सही भी है कि नहीं ? राजा ने बात मान ली और फल में से एक टुकड़ा कुत्ते को खिलाया।

कुत्ता तड़प -तड़प कर मर गया। राजा बहुत क्रोधित हुआ और अपनी तलवार से तोते का सिर धड़ से अलग कर दिया। राजा ने वह फल बाहर फेंक दिया| कुछ समय बाद उसी जगह पर एक पेड़ उगा| राजा ने सख्त हिदायत दी कि कोई भी इस पेड़ का फल ना खाएं क्यूंकि राजा को लगता था कि यह अमृत फल विषाक्त होते हैं और तोते ने यही फल खिलाकर उसे मारने की कोशिश की थी।

एक दिन एक बूढ़ा आदमी उस पेड़ के नीचे विश्राम कर रहा था। उसने एक फल खाया और वह जवान हो गया क्यूंकि उस वृक्ष पर उगे हुए फल विषाक्त नहीं थे। जब इस बात का पता राजा को चला तो उसे बहुत ही पछतावा हुआ उसे अपनी करनी पर लज़्ज़ा हुई।

तीसरे राजकुमार के मुख से यह कहानी सुनकर राजा बहुत ही खुश हुआ और तीसरे राजकुमार को सही उत्तराधिकारी समझते हुए उसे ही अपने राज्य का राजा चुना।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि किसी भी अपराधी को सजा देने से पहले यह देख लेना चाहिए कि उसकी गलती है भी या नहीं, कहीं भूलवश आप किसी निर्दोष को तो सजा देने नहीं जा रहे हैं। निरपराध को कतई सजा नहीं मिलनी चाहिए।

🌷 प्रेषक अभिजीत चौधरी🌷

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“वाणी पर नियंत्रण रखें”-
एक बार एक बूढ़े आदमी ने अफवाह फैलाई कि उसके पड़ोस में रहने वाला
नौजवान चोर है l
यह बात दूर – दूर तक फैल गई आस – पास के लोग उस नौजवान से बचने लगे l नौजवान परेशान हो गया कोई उस पर विश्वास ही नहीं करता था l
तभी गाँव में चोरी की एक वारदात हुई और शक उस नौजवान पर गया उसे गिरफ्तार कर लिया गया l
लेकिन कुछ दिनों के बाद सबूत के अभाव में वह निर्दोष साबित हो गया l
निर्दोष साबित होने के बाद वह नौजवान चुप नहीं बैठा उसने बूढ़े आदमी पर गलत आरोप लगाने के लिए मुकदमा दायर कर दिया पंचायत में बूढ़े आदमी ने अपने बचाव में सरपंच से कहा l
‘मैंने जो कुछ कहा था, वह एक टिप्पणी से अधिक कुछ नहीं था किसी को नुकसान पहुंचाना मेरा मकसद नहीं था l
सरपंच ने बूढ़े आदमी से कहा, ‘आप एक कागज के टुकड़े पर वो सब बातें लिखें,
जो आपने उस नौजवान के बारे में कहीं थीं, और जाते समय उस कागज के
टुकड़े – टुकड़े करके घर के रस्ते पर फ़ेंक दें कल फैसला सुनने के लिए आ जाएँ
बूढ़े व्यक्ति ने वैसा ही किया l
अगले दिन सरपंच ने बूढ़े आदमी से कहा कि फैसला सुनने से पहले आप
बाहर जाएँ और उन कागज के टुकड़ों को,
जो आपने कल बाहर फ़ेंक दिए थे,
इकट्ठा कर ले आएं l
बूढ़े आदमी ने कहा मैं ऐसा नहीं कर सकता उन टुकड़ों को तो हवा कहीं से कहीं उड़ा कर ले गई होगी अब वे नहीं मिल सकेंगें मैं
कहाँ – कहाँ उन्हें खोजने के लिए जाऊंगा ?
सरपंच ने कहा ‘ठीक इसी तरह, एक सरल –
सी टिप्पणी भी किसी का मान – सम्मान उस सीमा तक नष्ट कर सकती है,
जिसे वह व्यक्ति किसी भी दशा में दोबारा प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो सकता l
इसलिए यदि किसी के बारे में कुछ अच्छा नहीं कह सकते, तो चुप रहें l
वाणी पर हमारा नियंत्रण होना चाहिए, ताकि हम शब्दों के दास न बनें l’

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐किसान और बैल💐💐

एक दिन एक किसान का बैल कुएँ में गिर गया।
वह बैल घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा और किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिऐ और क्या नहीं।
अंततः उसने निर्णय लिया कि चूंकि बैल काफी बूढा हो चूका था अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था और इसलिए उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिऐ।।
किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी।
जैसे ही बैल कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है वह और ज़ोर-ज़ोर से चीख़ चीख़ कर रोने लगा और फिर ,अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया।
सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे तभी किसान ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गया..
अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह बैल एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था।
जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे -वैसे वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को गिरा देता और एक सीढी ऊपर चढ़ आता जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह बैल कुएँ के किनारे पर पहुंच गया और फिर कूदकर बाहर भाग गया ।
ध्यान रखे आपके जीवन में भी बहुत तरह से मिट्टी फेंकी जायेगी बहुत तरह की गंदगी आप पर गिरेगी जैसे कि ,
आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में ही आपकी आलोचना करेगा
कोई आपकी सफलता से ईर्ष्या के कारण आपको बेकार में ही भला बुरा कहेगा
कोई आपसे आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो आपके आदर्शों के विरुद्ध होंगे…
ऐसे में आपको हतोत्साहित हो कर कुएँ में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हर तरह की गंदगी को गिरा देना है और उससे सीख ले कर उसे सीढ़ी बनाकर बिना अपने आदर्शों का त्याग किये अपने कदमों को आगे बढ़ाते जाना है।
सकारात्मक रहे.. सकारात्मक जिए!
इस संसार में….
सबसे बड़ी सम्पत्ति “बुद्धि “
सबसे अच्छा हथियार “धैर्य”
सबसे अच्छी सुरक्षा “विश्वास”
सबसे बढ़िया दवा “हँसी” है
और आश्चर्य की बात कि “ये सब निशुल्क हैं “
सोच बदलो जिंदगी बदल जायेगी…

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐कर भला तो हो भला💐💐

एक प्रसिद्ध राजा हुआ करते थे जिनका नाम रामधन था। अपने नाम की ही तरह प्रजा सेवा ही उनका धर्म था।

उनकी प्रजा भी उन्हें राजा राम की तरह सम्मान देती थी। राजा रामधन सभी की निष्काम भाव से सहायता करते थे फिर चाहे वो उनके राज्य की प्रजा हो या अन्य किसी और राज्य की।

उनकी ख्याति सर्वत्र फैल गई थी, उनके दानी स्वभाव और व्यवहार के गुणगान उनके शत्रु राजा तक करते थे।

उन राजाओं में एक राजा था भीम सिंह, जिसे राजा रामधन की इस ख्याति से ईर्ष्या हुआ करती थी।

उस ईर्ष्या के कारण भीम सिंह ने राजा रामधन को हराने की एक रणनीति बनाई और कुछ समय बाद रामधन के राज्य पर आक्रमण कर दिया।

भीम सिंह ने छल से युद्ध जीत लिया और रामधन को अपनी जान बचाने के लिए जंगल में जाकर छुपना पड़ा। इतना होने पर भी रामधन की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई।

हर जगह प्रजा उन्हीं की चर्चा करती रहती थी। जिससे भीम सिंह परेशान हो गया और उसने राजा रामधन को मृत्युदंड देने का फैसला किया।

उसने ऐलान किया कि जो राजा रामधन को पकड़कर लायेगा, वे उसे दस हज़ार सोने के दिनार देगा।

दूसरी ओर राजा रामधन जंगलों में ही भटकते रहे। तब उन्हें एक राहगीर मिला और उसने कहा; भाई! तुम इस प्रान्त के लग रहे हो, क्या मुझे राजा रामधन के राज्य का रास्ता बता सकते हो ?

राजा रामधन ने पूछा: तुम्हें क्या काम है राजा से ?

तब राहगीर ने कहा, मेरा बेटा बहुत बीमार है, उसके इलाज़ में मेरा सारा धन चला गया। सुना है राजा रामधन सभी की मदद करते हैं, सोचा उन्हीं के पास जाकर याचना करूँ।

यह सुनकर राजा रामधन राहगीर को अपने साथ लेकर भीम सिंह के पास पहुँचा। उन्हें देख दरबार में सभी अचंभित थे।

राजा रामधन ने कहा– हे राजन ! आपने मुझे खोजने वाले को दस हजार दिनार देने का वादा किया था। मेरे इस मित्र ने मुझे आपके सामने पेश किया है, अतः इसे वो दिनार दे दें।

यह सुनकर राजा भीम सिंह को अहसास हुआ कि राजा रामधन सच में कितने महान और दानी हैं। उसने अपनी गलती को स्वीकार किया।

साथ ही राजा रामधन को उनका राज्य लौटा दिया और सदा उनके दिखाये रास्ते पर चलने का फैसला किया।

दोस्तों इसी को कहते हैं “कर भला तो हो भला।”

कहाँ एक तरफ भीम सिंह राजा रामधन को मारना चाहता था और कहाँ राजा रामधन की करनी देख वो लज्जित हुआ और उन्हें उनका राज्य लौटा दिया और स्वयं को उनके जैसा बनाने में जुट गया।

महान लोग सही कहते हैं “कर भला तो हो भला।” रामधन की करनी का ही फल था जो वो हारने के बाद भी जीत गया।

उसने जिस तरह सभी की मदद की उसकी मदद अंत में उसी के काम आई।

शिक्षा:-
मनुष्य को अपने कर्मों का ख्याल करना चाहिये। अगर आप अच्छा करोगे तो अच्छा ही मिलेगा। माना कि शुरू शुरू में कष्ट होता है लेकिन अंत सदैव अच्छा होता है..!!

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐सास और बहू💐💐

अरे मधु … वट सावित्री के व्रत के दिन भी तूने मेंहदी नहीं लगाई… पहले तो हमेशा लगाती थी…. और वो तेरी शादी वाली लाल चुनरी भी नहीं पहनी आज ….।,,

” वो आंटी जी…. बस जल्दी जल्दी में भूल गई । ,,

कहकर मधु नजरें चुराकर आगे जाकर अपनी पूजा करने लगी । दर असल उसे काम काम में याद ही नहीं रहा कि मेंहदी लगानी है, लेकिन रह रहकर उसका ध्यान भी मंदिर में आई बाकी औरतों के हाथों पर जा रहा था । सबके हाथों में रची मेंहदी देखकर आज उसे अपनी सासु माँ की बहुत याद आ रही थी….। कैसे हर त्यौहार के पहले दिन ही वो बोलने लगती थीं , ” बहु…. मेंहदी जरूर लगा लेना । त्यौहार पर खाली हाथ! अच्छे नहीं लगते …. ।,,

सास की इस बात पर मधु को बहुत खीझ भी आती थी। वो बुदबुदाती रहती ” घर के काम करूँ या मेंहदी लगाकर बैठ जाऊँ??? ,,

सासु माँ भी शायद उसके मन की बात समझ जाती थी और कहतीं,
” अरे बहु.. आजकल तो रेडिमेड मेंहदी की कीप आती हैं.. आधे घंटे में ही रच भी जाती हैं। हमारे टाइम में तो खुद ही मेंहदी घोल कर कीप बनानी पड़ती थी । ऊपर से कम से कम तीन चार घंटे तक उसे सुखाना भी पड़ता था ।
…. चाय वाय तो में भी बना दूंगी तूं जा मेंहदी लगा ले। ,,

उनके बार बार टोकने पर मधु मेंहदी लगा लेती थी । जब सुबह अपने गोरे हाथों में रची हुई मेंहदी देखती तो खुश भी हो जाती थी । मौहल्ले की सारी औरतें जब उसकी मेंहदी की तारिफ़ करती थीं तो उसे अपनी सासु माँ पर बहुत प्यार आता था…।

मंदिर से घर वापस आकर मधु चुपचाप बैठ गई। थोड़ी देर में मधु का बेटा आरव भागते हुए आया और बोला, ” मम्मी मम्मी… कुछ खाने को दो ना । ,,

” बेटा वहाँ बिस्किट रखे हैं अभी वो खा लो। ,,

” मुझे नहीं खाने बिस्किट..। पहले तो आप मठरी और लड्डू बनाती थीं लेकिन दादी के जाने के बाद क्यों नहीं बनातीं । ,, आरव ने मुंह फुलाते हुए कहा।

मधु चुप थी….. कहती भी क्या?? सच में सास के जाने के बाद उसने मठरी और लड्डू नहीं बनाए थे । सासु माँ तो पीछे पड़ी रहती थीं, ” बहु घर में बनाई हुई चीजें अच्छी रहती हैं और साथ साथ बरकत भी करती हैं । घर में अचानक से कोई मेहमान आ जाए तो भी चाय के साथ नाश्ते के लिए बाहर नहीं भागना पड़ता। ,,

मधु को उस वक्त उनकी बातें अच्छी नहीं लगती थीं । वो कहती , ” आजकल सब कुछ रेडिमेड भी तो आता है… ये सब बनाने के चक्कर में सारा दिन निकल जाता है । ,,

लेकिन सासु माँ नहीं मानती और खुद ही मठरी बनाने लग जातीं । फिर मधु को ना चाहते हुए भी ये सब बनवाना पड़ता था ।

ये सब बातें याद करते करते मधु अनमनी हो रही थी । घर के काम करते करते दोपहर हो गई थी । अचानक से उसका सर घूमने लगा तब उसे याद आया कि उसने सुबह से पानी भी नहीं पीया है ।

जब उसकी सास थीं तो व्रत वाले दिन सुबह से ही पीछे पड़ जाती थीं ।
कहतीं ” पहले थोड़ा जूस निकाल कर पी ले फिर घर के काम कर लेना । नहीं तो गर्मी में चक्कर आने लगेगा। ,,

आज ये सब बातें मधु को अंदर ही अंदर कचोट रही थीं । उसे हमेशा अपनी सास का टोकना अच्छा नहीं लगता था। लेकिन अब उसे टोकने वाला कोई नहीं था । फिर भी वो खुश नहीं थी।

कहीं बाहर जाने से पहले भी उसे अब दस बार सोचना पड़ता है। घर के सारे काम करके जाओ फिर आते ही फिर से काम में जुट जाओ। यहाँ तक की घर की चिंता भी लगी रहती है कि कहीं कुछ खुला तो नहीं छोड़ आई । कहीं कपड़े छत पर तो नहीं रह गए ।

सब की नजरों में तो वो आज आजाद थी लेकिन वो कितना बंध गई है ये बात उसके अलावा कोई नहीं जानता था… ।

दोस्तों, हमारे बड़ो का साथ हमारे सर पर छत्रछाया सा होता है जो हमेशा हमारे लिए कवच की तरह काम करता है … लेकिन उनकी अहमियत को हम नजर अंदाज करते रहते हैं । जब वो हमसे दूर हो जाते हैं तब उनकी कमी का एहसास हमें पल पल होता रहता है…. ।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

आज के जोधपुरवासियो को इनकी जानकारी भी नहीं है…..

कैसे मेजर जनरल सगत सिंह राठौड़ की ज़िद्द ने भारत को चीन के विरुद्ध सबसे अप्रत्याशित सैन्य जीत दिलाई….

सैनिक पराक्रम राष्ट्रप्रेम का प्रतिबिंब होता है और सेना राष्ट्र शक्ति का एकमात्र स्रोत। वनस्पति और रश्मिरथी भी जहां पहुंचने को मना करते है, राष्ट्र लक्ष्य हेतु ये नरसिंह वहां खड़े होते हैं। अगर इन्हें वर्दी में अवतरित ईश्वर की संज्ञा दी जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज हम आपको एक ऐसे ही राष्ट्र वीर की वास्तविक कहानी सुनाने जा रहे हैं।

नाथू ला जैसा दुर्गम क्षेत्र। चीन जैसी महाशक्ति। 1962 की हार से टूटा मनोबल। सैन्य संसाधन की कमी। चीन के मुकाबले संख्या बल में घोर अनुपातिक कमी। इन सारे परिस्थितिजन्य चक्रव्युह से घिरे होने के बावजूद भी, मजाल कि एक जवान भी पीछे हटा हो।

लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह को भारत का सबसे निर्भिक जनरल माना जाता है। जनरल सगत एकमात्र सैन्य अधिकारी है जिन्होंने तीन युद्ध में जीत हासिल की। उनके नेतृत्व में गोवा को पुतर्गाल से मुक्त कराया गया। वहीं वर्ष 1967 में उनके ही नेतृत्व में चीनी सेना पर जबरदस्त हमला किया गया।

इसके बाद वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में अपने वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों को दरकिनार कर जनरल सगत ढाका पर जा चढ़े। इसकी बदौलत पाकिस्तानी सेना को हथियार डालने पर मजबूर होना पड़ा। हालांकि, इन्हें हमेशा ही उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। यही कारण है कि उन्हें कभी किसी तरह का वीरता सम्मान नहीं मिला। अब भारतीय सेना उनकी जन्म शताब्दी मनाने जा रही है। इस अवसर पर जोधपुर में उनकी प्रतिमा का अनावरण किया जाएगा।

जनरल सगत चीन सीमा पर नाथु ला में तैनात थे। नाथुला में भारत व चीन के सैनिकों के बीच हमेशा टकराव रहती थी। रोजाना की झड़प बंद करने के लिए जनरल सगत के आदेश पर नाथु ला सेक्टर में 11 सितम्बर 1967 को तारबंदी लगाना शुरू कर दिया।

चीनी सेना बगैर किसी चेतावनी के जोरदार फायरिंग करने लगी। तब भारतीय सैनिक खुले में खड़े थे, ऐसे में बड़ी संख्या में सैनिक हताहत हो गए। इसके बाद जनरल सगत ने नीचे से तोपों को ऊपर मंगाया। उस समय तोप से गोलाबारी करने का आदेश सिर्फ प्रधानमंत्री ही दे सकता था। दिल्ली से कोई आदेश मिलता नहीं देख जनरल सगत ने तोपों के मुंह खोलने का आदेश दे दिया।

देखते ही देखते भारतीय जवानों ने चीन के तीन सौ सैनिक मार गिराए। इसके बाद चीनी सेना पीछे हट गई। इसे लेकर काफी हंगामा मचा, लेकिन चीनी सेना पर इस जीत ने भारतीय सैनिकों के मन में वर्ष 1962 से समाए भय को बाहर निकाल दिया। अब भारतीय सेना यह जान चुकी थी कि चीनी सेना को पराजित किया जा सकता है। इसके बाद जनरल सगत का वहां से तबादला कर दिया गया।

गोवा को पुर्तगाल के कब्जे से मुक्त कराने के लिए भारतीय सेना के तीनों अंग थल, वायु और नौ सेना ने मिलकर संयुक्त ऑपरेशन चलाया। उनकी जीवनी में मेजर जनरल वीके सिंह के अनुसार गोवा मुक्ति के लिए दिसम्बर 1961 में भारतीय सेना के ऑपरेशन विजय में 50 पैरा को सहयोगी की भूमिका में चुना गया, लेकिन उन्होंने इससे कहीं आगे बढ़ इतनी तेजी से गोवा को मुक्त कराया कि सभी दंग रह गए।

18 दिसम्बर को 50 पैरा को गोवा में उतारा गया। 19 दिसम्बर को उनकी बटालियन गोवा के निकट पहुंच गई। पणजी के बाहर पूरी रात डेरा जमा रखने के बाद उनके जवानों ने तैरकर नदी को पार कर शहर में प्रवेश किया। इसके बाद उन्होंने ही पुर्तगालियों को आत्मसमर्पण करने को मजबूर किया। पुर्तगाल के सैनिकों सहित 3306 लोगों ने आत्मसमर्पण किया। इसके साथ ही गोवा पर 451 साल से चला रहा पुर्तगाल का शासन समाप्त हुआ और वह भारत का हिस्सा बन गया।

जनरल सगत वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान अगरतला सेक्टर की तरफ से हमला बोला था और अपनी सेना को लेकर आगे बढ़ते रहे। जनरल अरोड़ा ने उन्हें मेघना नदी पार नहीं करने का आदेश दिया, लेकिन हेलिकॉप्टरों की मदद से चार किलोमीटर चौड़ी मेघना नदी को पार कर उन्होंने पूरी ब्रिगेड उतार दी और आगे बढ़ गए। जनरल सगत सिंह ने अपने मित्र जो कि बाद में एयर वाइस मार्शल बने चंदन सिंह राठौड़ की मदद से इस असंभव लगने वाले काम को अंजाम दिया। तब देश के रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम और पीएम इंदिरा गांधी हैरत में पड़ गए थे कि भारतीय सेना इतनी जल्दी ढाका कैसे पहुंच गई।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सेना के ढाका में प्रवेश करने की प्लानिंग सेना और सरकार के स्तर पर बनी ही नहीं थी, जबकि सगत सिंह ने उसे अंजाम भी दे दिया। जनरल सगत के नेतृत्व में भारतीय सेना ने ढाका को घेर लिया और जनरल नियाजी को आत्मसमर्पण का संदेश भेजा। इसके बाद 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों का आत्मसमर्पण और बांग्लादेश का उदय अपने आप में इतिहास बन गया। हालांकि, इसमें भी जनरल सगत को कोई श्रेय नहीं मिलाl

अद्भुत, अविश्वसनीय, अकल्पनीय, अतुलनीय!!! सगत के साहस का स्वरुप इतना वृहद् और विशाल है कि विशेषण की परिधि से बाहर हो जायेl पुर्तगाल, चीन और पाकिस्तान को परास्त करनेवाला एकमात्र योद्धाl

सगत सिंह ने सेना के मन से चीनियों का भय निकालाl कहते है जीत सुनिश्चित हो तो ‘कायर’ भी लड़ते है लेकिन जब हार प्रत्यक्ष रूप से सामने खड़ा हो जो उस समय भी चक्रव्यूह भेदन करे असली अभिमन्यु वही हैl

सगत सिंह को तो हार के भय से नाथुला में लड़ने की आज्ञा भी नहीं दी गयी, लेकिन भारत माता की आन और मान-सम्मान के लिए इस शेर नें सिर्फ विजय के विकल्प को ही चुनाl