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*ऋग्वेद में _आर्य_ शब्द*


*ऋग्वेद में _आर्य_ शब्द*

नीरज आर्य जन्धेडी

वेदों में अनेक बार आर्य शब्द आया है। आर्य एक गुणवाचक शब्द है, जिसका अर्थ “श्रेष्ठ” होता है।

इस देश का प्राचीनतम नाम आर्यावर्त्त होने से सम्पूर्ण भारतवासी मोटे तौर पर आर्य हैं।

*ऋग्वेद में 37 बार आर्य शब्द आया है. मण्डल, सूक्त, मन्त्र निम्नलिखित हैं:*

*1.51.8* वि जा॑नी॒ह्यार्या॒न्ये च॒ दस्य॑वो ब॒र्हिष्म॑ते रन्धया॒ शास॑दव्र॒तान् । शाकी॑ भव॒ यज॑मानस्य चोदि॒ता विश्वेत्ता ते॑ सध॒मादे॑षु चाकन ॥

*1.59.2* मू॒र्धा दि॒वो नाभि॑र॒ग्निः पृ॑थि॒व्या अथा॑भवदर॒ती रोद॑स्योः । तं त्वा॑ दे॒वासो॑ऽजनयन्त दे॒वं वैश्वा॑नर॒ ज्योति॒रिदार्या॑य ॥

*1.103.3* स जा॒तूभ॑र्मा श्र॒द्दधा॑न॒ ओज॒: पुरो॑ विभि॒न्दन्न॑चर॒द्वि दासी॑: । वि॒द्वान्व॑ज्रि॒न्दस्य॑वे हे॒तिम॒स्यार्यं॒ सहो॑ वर्धया द्यु॒म्नमि॑न्द्र ॥

*1.117.21* यवं॒ वृके॑णाश्विना॒ वप॒न्तेषं॑ दु॒हन्ता॒ मनु॑षाय दस्रा । अ॒भि दस्युं॒ बकु॑रेणा॒ धम॑न्तो॒रु ज्योति॑श्चक्रथु॒रार्या॑य ॥

*1.130.8* इन्द्र॑: स॒मत्सु॒ यज॑मान॒मार्यं॒ प्राव॒द्विश्वे॑षु श॒तमू॑तिरा॒जिषु॒ स्व॑र्मीळ्हेष्वा॒जिषु॑ । मन॑वे॒ शास॑दव्र॒तान्त्वचं॑ कृ॒ष्णाम॑रन्धयत् । दक्ष॒न्न विश्वं॑ ततृषा॒णमो॑षति॒ न्य॑र्शसा॒नमो॑षति ॥

*1.156.5* आ यो वि॒वाय॑ स॒चथा॑य॒ दैव्य॒ इन्द्रा॑य॒ विष्णु॑: सु॒कृते॑ सु॒कृत्त॑रः । वे॒धा अ॑जिन्वत्त्रिषध॒स्थ आर्य॑मृ॒तस्य॑ भा॒गे यज॑मान॒माभ॑जत् ॥

*2.11.18* धि॒ष्वा शव॑: शूर॒ येन॑ वृ॒त्रम॒वाभि॑न॒द्दानु॑मौर्णवा॒भम् । अपा॑वृणो॒र्ज्योति॒रार्या॑य॒ नि स॑व्य॒तः सा॑दि॒ दस्यु॑रिन्द्र ॥

*2.11.19* सने॑म॒ ये त॑ ऊ॒तिभि॒स्तर॑न्तो॒ विश्वा॒: स्पृध॒ आर्ये॑ण॒ दस्यू॑न् । अ॒स्मभ्यं॒ तत्त्वा॒ष्ट्रं वि॒श्वरू॑प॒मर॑न्धयः सा॒ख्यस्य॑ त्रि॒ताय॑ ॥

*4.26.2* अ॒हं भूमि॑मददा॒मार्या॑या॒हं वृ॒ष्टिं दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य । अ॒हम॒पो अ॑नयं वावशा॒ना मम॑ दे॒वासो॒ अनु॒ केत॑मायन् ॥

*4.30.18* उ॒त त्या स॒द्य आर्या॑ स॒रयो॑रिन्द्र पा॒रत॑: । अर्णा॑चि॒त्रर॑थावधीः ॥

*5.34.6* वि॒त्वक्ष॑ण॒: समृ॑तौ चक्रमास॒जोऽसु॑न्वतो॒ विषु॑णः सुन्व॒तो वृ॒धः । इन्द्रो॒ विश्व॑स्य दमि॒ता वि॒भीष॑णो यथाव॒शं न॑यति॒ दास॒मार्य॑: ॥

*6.18.3* त्वं ह॒ नु त्यद॑दमायो॒ दस्यूँ॒रेक॑: कृ॒ष्टीर॑वनो॒रार्या॑य । अस्ति॑ स्वि॒न्नु वी॒र्यं१॒॑ तत्त॑ इन्द्र॒ न स्वि॑दस्ति॒ तदृ॑तु॒था वि वो॑चः ॥

*6.22.10* आ सं॒यत॑मिन्द्र णः स्व॒स्तिं श॑त्रु॒तूर्या॑य बृह॒तीममृ॑ध्राम् । यया॒ दासा॒न्यार्या॑णि वृ॒त्रा करो॑ वज्रिन्त्सु॒तुका॒ नाहु॑षाणि ॥

*6.25.2* आभि॒: स्पृधो॑ मिथ॒तीररि॑षण्यन्न॒मित्र॑स्य व्यथया म॒न्युमि॑न्द्र । आभि॒र्विश्वा॑ अभि॒युजो॒ विषू॑ची॒रार्या॑य॒ विशोऽव॑ तारी॒र्दासी॑: ॥

*6.33.3* त्वं ताँ इ॑न्द्रो॒भयाँ॑ अ॒मित्रा॒न्दासा॑ वृ॒त्राण्यार्या॑ च शूर । वधी॒र्वने॑व॒ सुधि॑तेभि॒रत्कै॒रा पृ॒त्सु द॑र्षि नृ॒णां नृ॑तम ॥

*6.60.6* ह॒तो वृ॒त्राण्यार्या॑ ह॒तो दासा॑नि॒ सत्प॑ती । ह॒तो विश्वा॒ अप॒ द्विष॑: ॥

*7.5.6* त्वे अ॑सु॒र्यं१॒॑ वस॑वो॒ न्यृ॑ण्व॒न्क्रतुं॒ हि ते॑ मित्रमहो जु॒षन्त॑ । त्वं दस्यूँ॒रोक॑सो अग्न आज उ॒रु ज्योति॑र्ज॒नय॒न्नार्या॑य ॥

*7.18.7* आ प॒क्थासो॑ भला॒नसो॑ भन॒न्तालि॑नासो विषा॒णिन॑: शि॒वास॑: । आ योऽन॑यत्सध॒मा आर्य॑स्य ग॒व्या तृत्सु॑भ्यो अजगन्यु॒धा नॄन् ॥

*7.33.7* त्रय॑: कृण्वन्ति॒ भुव॑नेषु॒ रेत॑स्ति॒स्रः प्र॒जा आर्या॒ ज्योति॑रग्राः । त्रयो॑ घ॒र्मास॑ उ॒षसं॑ सचन्ते॒ सर्वाँ॒ इत्ताँ अनु॑ विदु॒र्वसि॑ष्ठाः ॥

*7.83.1* यु॒वां न॑रा॒ पश्य॑मानास॒ आप्यं॑ प्रा॒चा ग॒व्यन्त॑: पृथु॒पर्श॑वो ययुः । दासा॑ च वृ॒त्रा ह॒तमार्या॑णि च सु॒दास॑मिन्द्रावरु॒णाव॑सावतम् ॥

*8.16.6* तमिच्च्यौ॒त्नैरार्य॑न्ति॒ तं कृ॒तेभि॑श्चर्ष॒णय॑: । ए॒ष इन्द्रो॑ वरिव॒स्कृत् ॥

*8.24.27* य ऋक्षा॒दंह॑सो मु॒चद्यो वार्या॑त्स॒प्त सिन्धु॑षु । वध॑र्दा॒सस्य॑ तुविनृम्ण नीनमः ॥

*8.51.9* यस्या॒यं विश्व॒ आर्यो॒ दास॑: शेवधि॒पा अ॒रिः । ति॒रश्चि॑द॒र्ये रुश॑मे॒ परी॑रवि॒ तुभ्येत्सो अ॑ज्यते र॒यिः ॥

*8.103.1* अद॑र्शि गातु॒वित्त॑मो॒ यस्मि॑न्व्र॒तान्या॑द॒धुः । उपो॒ षु जा॒तमार्य॑स्य॒ वर्ध॑नम॒ग्निं न॑क्षन्त नो॒ गिर॑: ॥

*9.63.5* इन्द्रं॒ वर्ध॑न्तो अ॒प्तुर॑: कृ॒ण्वन्तो॒ विश्व॒मार्य॑म् । अ॒प॒घ्नन्तो॒ अरा॑व्णः ॥

*9.63.14* ए॒ते धामा॒न्यार्या॑ शु॒क्रा ऋ॒तस्य॒ धार॑या । वाजं॒ गोम॑न्तमक्षरन् ॥

*10.11.4* अध॒ त्यं द्र॒प्सं वि॒भ्वं॑ विचक्ष॒णं विराभ॑रदिषि॒तः श्ये॒नो अ॑ध्व॒रे । यदी॒ विशो॑ वृ॒णते॑ द॒स्ममार्या॑ अ॒ग्निं होता॑र॒मध॒ धीर॑जायत ॥

*10.38.3* यो नो॒ दास॒ आर्यो॑ वा पुरुष्टु॒तादे॑व इन्द्र यु॒धये॒ चिके॑तति । अ॒स्माभि॑ष्टे सु॒षहा॑: सन्तु॒ शत्र॑व॒स्त्वया॑ व॒यं तान्व॑नुयाम संग॒मे ॥

*10.43.4* वयो॒ न वृ॒क्षं सु॑पला॒शमास॑द॒न्त्सोमा॑स॒ इन्द्रं॑ म॒न्दिन॑श्चमू॒षद॑: । प्रैषा॒मनी॑कं॒ शव॑सा॒ दवि॑द्युतद्वि॒दत्स्व१॒॑र्मन॑वे॒ ज्योति॒रार्य॑म् ॥

*10.48.3* मह्यं॒ त्वष्टा॒ वज्र॑मतक्षदाय॒सं मयि॑ दे॒वासो॑ऽवृज॒न्नपि॒ क्रतु॑म् । ममानी॑कं॒ सूर्य॑स्येव दु॒ष्टरं॒ मामार्य॑न्ति कृ॒तेन॒ कर्त्वे॑न च ॥

*10.49.3* अ॒हमत्कं॑ क॒वये॑ शिश्नथं॒ हथै॑र॒हं कुत्स॑मावमा॒भिरू॒तिभि॑: । अ॒हं शुष्ण॑स्य॒ श्नथि॑ता॒ वध॑र्यमं॒ न यो र॒र आर्यं॒ नाम॒ दस्य॑वे ॥

*10.65.11* ब्रह्म॒ गामश्वं॑ ज॒नय॑न्त॒ ओष॑धी॒र्वन॒स्पती॑न्पृथि॒वीं पर्व॑ताँ अ॒पः । सूर्यं॑ दि॒वि रो॒हय॑न्तः सु॒दान॑व॒ आर्या॑ व्र॒ता वि॑सृ॒जन्तो॒ अधि॒ क्षमि॑ ॥

*10.69.6* सम॒ज्र्या॑ पर्व॒त्या॒३॒॑ वसू॑नि॒ दासा॑ वृ॒त्राण्यार्या॑ जिगेथ । शूर॑ इव धृ॒ष्णुश्च्यव॑नो॒ जना॑नां॒ त्वम॑ग्ने पृतना॒यूँर॒भि ष्या॑: ॥

*10.83.1* यस्ते॑ म॒न्योऽवि॑धद्वज्र सायक॒ सह॒ ओज॑: पुष्यति॒ विश्व॑मानु॒षक् । सा॒ह्याम॒ दास॒मार्यं॒ त्वया॑ यु॒जा सह॑स्कृतेन॒ सह॑सा॒ सह॑स्वता ॥

*10.86.19* अ॒यमे॑मि वि॒चाक॑शद्विचि॒न्वन्दास॒मार्य॑म् । पिबा॑मि पाक॒सुत्व॑नो॒ऽभि धीर॑मचाकशं॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥

*10.102.3* अ॒न्तर्य॑च्छ॒ जिघां॑सतो॒ वज्र॑मिन्द्राभि॒दास॑तः । दास॑स्य वा मघव॒न्नार्य॑स्य वा सनु॒तर्य॑वया व॒धम् ॥

*10.138.3* वि सूर्यो॒ मध्ये॑ अमुच॒द्रथं॑ दि॒वो वि॒दद्दा॒साय॑ प्रति॒मान॒मार्य॑: । दृ॒ळ्हानि॒ पिप्रो॒रसु॑रस्य मा॒यिन॒ इन्द्रो॒ व्या॑स्यच्चकृ॒वाँ ऋ॒जिश्व॑ना ॥

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यम यमी संवाद पर एक नजर


यम यमी संवाद पर एक नजर

ऋग्वेद के दशवे मंडल के दशवे सूक्त १०|१० में यम
यमी शब्द आये हैं | जिसके मुर्ख मनुष्य अनर्गल
व्याख्या करते हैं | उसके अनुसार यम
तथा यमी विवस्वान् के पुत्र-पुत्री हैं
और वे एकांत में होते हैं, वहा यमी यम से
सहवास कि इच्छा प्रकट करती हैं |
यमी अनेक तर्क देती किन्तु यम उसके
प्रस्ताव को निषेध कर देता |
तो यमी कहती मेरे साथ तो तु ना कहे
रहा पर किसी अन्य तेरे साथ ऐसे
लिपटेगी जैसे वृक्ष से बेल, इत्यादि |
इस प्रकार के अर्थ दिखा के वेद निंदक नास्तिक वेद को व
आर्यो के प्रति दुष्प्रचार करते हैं | आर्यो का जीवन
सदैव मर्यादित रहा हैं, क्यों के वे वेद में वर्णित ईश्वर
कि आज्ञा का सदैव पालन करते रहे हैं | यहाँ तो यह
मिथ्या प्रचार किया जा रहा अल्पबुद्धि अनार्यों द्वारा के वेद पिता-
पुत्री, भाई-बहन के अवैध संबंधो कि शिक्षा देते
और वैदिक काल में इसका पालन होता रहा है |
वेदों के भाष्य के लिए वेदांगों का पालन करना होता हैं, निरुक्त ६
वेदांगों में से एक हैं | निघंटु के भाष्य निरुक्त में यस्कराचार्य
क्या कहते हैं यह देखना अति आवश्यक होता हैं व्याकरण
के नियमों के पालन के साथ-२ ही | व्याकरण
भी ६ वेदांगों में से एक हैं |* राथ यम-
यमी को भाई बहन मानते और
मनावजाती का आदि युगल किन्तु मोक्ष मुलर (प्रचलित
नाम मैक्स मुलर) तक ने इसका खंडन किया क्यों के उन्हें
भी वेद में इसका प्रमाण नहीं मिल पाया |
हिब्रू विचार में आदम और ईव मानव जाती में के
आदि माता-पिता माने जाते हैं | ये विचार ईसाईयों और मुसलमानों में
यथावत मान्य हैं | उनकी सर्वमान्य मान्यता के
अनुसार दुनिया भाई बहन के जोड़े से हि शुरू हुई | अल्लाह
(या जो भी वे नाम या चरित्र मानते हैं) उसने
दुनिया को प्रारंभ करने के लिए भाई को बहन पर चढ़ाया और
वो सही भी माना जाता और फिर उसने
आगे सगे भाई-बहनो का निषेध
किया वहा वो सही हैं | ये वे मतांध लोग हैं
जो अपने मत में प्रचलित हर मान्यता को सत्य मानते हैं और
दूसरे में अमान्य असत्य बात को सत्य सिद्ध करने पर लगे रहते
हैं | ये लोग वेदों के अनर्गल अर्थो का प्रचार करने में लगे
रहते हैं |
स्कन्द स्वामी निरुक्त भाष्य में यम
यमी कि २ प्रकार व्याख्या करते हैं |
१.नित्यपक्षे तु यम आदित्यो यम्यपि रात्रिः |५|२|
२.यदा नैरुक्तपक्षे
मध्यमस्थाना यमी तदा मध्यमस्थानों यमो वायुवैघुतो वा वर्षाकाले
व्यतीते तामाह | प्रागस्माद् वर्षकाले अष्टौ मासान्-
अन्यमुषू त्वमित्यादी | |११|५
आपने आदित्य को यम
तथा रात्री को यमी माना हैं
अथवा माध्यमिक
मेघवाणी यमी तथा माध्यमस्थानीय
वायु या वैधुताग्नी यम हैं | शतपथ ब्राहमण में
अग्नि तथा पृथ्वी को यम-यमी कहा हैं
|
सत्यव्रत राजेश अपनी पुस्तक “यम-
यमी सूक्त कि अध्यात्मिक व्याख्या” कि भूमिका में
स्पष्ट लिखते हैं के यम-यमी का परस्पर सम्बन्ध
पति-पत्नी हो सकता हैं भाई बहन
कदापि नहीं क्यों के यम पद “पुंयोगदाख्यायाम्” सूत्र
से स्त्रीवाचक डिष~ प्रत्यय पति-
पत्नी भाव में ही लगेगा | सिद्धांत
कौमुदी कि बाल्मानोरमा टिका में “पुंयोग” पद
कि व्याख्या करते हुए लिखा हैं –
“अकुर्वतीमपि भर्तकृतान्** वधबंधादीन्
यथा लभते एवं तच्छब्दमपि, इति भाष्यस्वारस्येन जायापत्यात्मकस्
यैव पुंयोगस्य विवाक्षित्वात् |”
यहा टिकाकर ने भी महाभाष्य के आधार पर
पति पत्नी भाव में डिष~ प्रत्यय माना हैं | और
स्वयं सायणाचार्य ने ताण्डय्-महाब्राहमण के भाष्य में
यमी यमस्य पत्नी, लिखा हैं ,
अतः जहा पत्नी भाव विवक्षित
नहीं होगा वहा – “अजाघतष्टाप्” से टाप् प्रत्यय
लगकर यमा पद बनेगा और अर्थ होगा यम कि बहन | जैसे गोप
कि पत्नी गोपी तथा बहन
गोपा कहलाएगी.,अतः यम-यमी पति-
पत्नी हो सकते हैं, भाई बहन
कदापि नहीं | सत्यव्रत राजेश जी ने
अपनी पुस्तक में यम को पुरुष-
जीवात्मा तथा यमी को प्रकृति मान कर
इस सूक्त कि व्याख्या कि हैं |
स्वामी ब्रह्मुनी तथा चंद्रमणि पालिरात्न
ने निरुक्तभाष्य ने यम-यमी को पति-
पत्नी ही माना हैं | सत्यार्थ प्रकाश में
महर्षि दयानंद कि भी यही मान्यता हैं
|
डा० रामनाथ वेदालंकार के अनुसार – आध्यात्मिक के यम-
यमी प्राण तथा तनु (काया) होने असंभव हैं |
जो तेजस् रूप विवस्वान् तथा पृथ्वी एवं आपः रूप
सरण्यु से उत्पन्न होते हैं | ये दोनों शरीरस्थ
आत्मा के सहायक एवं पोषक होते हैं | मनुष्य कि तनु
या पार्थिव चेतना ये चाहती हैं कि प्राण मुझ से
विवाह कर ले तथा मेरे ही पोषण में तत्पर रहे |
यदि ऐसा हो जाए तो मनुष्य कि सारी आतंरिक
प्रगति अवरुद्ध हो जाये तथा वह पशुता प्रधान
ही रह जाये | मनुष्य का लक्ष्य हैं पार्थिक
चेतना से ऊपर उठकर आत्मलोक तक पहुचना हैं |
श्री शिव शंकर काव्यतीर्थ ने यम-
यमी को सूर्य के पुत्र-पुत्री दिन रात
माना हैं तथा कहा हैं कि जैसे रात और दिन
इकठ्ठा नहीं हो सकते ऐसे ही भाई-
बहन का परस्पर विवाह भी निषिद्ध हैं |
पुरुष तथा प्रकृति का आलंकारिक वर्णन मानने पर,
प्रकृति जीव को हर प्रकार से
अपनी ओर अकार्षित करना चाहती हैं,
किन्तु जीव कि सार्थकता प्रकृति के प्रलोभन में न
फसकर पद्मपत्र कि भाति संयमित जीवन बिताने में हैं
|
इन तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में वेद और लोक व्यहवार –विरुद्ध भाई
बहिन के सहवास सम्बन्धी अर्थ को करना युक्त
नहीं हैं | इसी सूक्त में
कहा हैं-“पापमाहुर्यः सवसारं निगच्छात्” बहिन भाई का अनुचित
सम्बन्ध पाप हैं | इसे पाप बताने वा वेद स्वयं इसके
विपरीत बात
कि शिक्षा कभी नहीं देता हैं |
सन्दर्भ ग्रन्थ – आर्य विद्वान वेद रत्न सत्यव्रत राजेश के
व्याख्यानों के संकलन “वेदों में इतिहास नहीं” नामक
पुस्तिका से व्याकरण प्रमाण सभारित |

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वेद चार है फिर वेद त्रयी क्यु बोला जाता है?


वेद चार है फिर वेद त्रयी क्यु बोला जाता है?

यदि वेद चार है तो वेदत्रयी क्यो कहा जाता है?
चारो वेदो मे तीन प्रकार के मंत्र है| इसीको प्रकट करने के लिये पूर्व मीमासा मे कहा गया है:-
तेपां ऋग् यत्रार्थ वशेन पाद व्यवस्था|
गीतिषु सामाख्या शेषे यजु शब्द|(पूर्वमीमांसा २/१/३५-३७)
जिनमे अर्थवश पाद व्यवस्था है वे ऋग् कहे जाते है| जो मंत्र गायन किये जाते है वे साम ओर बाकि मंत्र यजु शब्द के अंतर्गत होते है| ये तीन प्रकार के मंत्र चारो वेद मे फैले हुए है| यही बात सर्वानुक्रमणीवृत्ति की भूमिका मे ” षड्गुरुशिष्य” ने कही है-
” विनियोक्तव्यरूपश्च त्रिविध: सम्प्रदर्श्यते|
ऋग् यजु: सामरूपेण मन्त्रोवेदचतुष्टये||”
अर्थात् यज्ञो मे तीन प्रकार के रूप वाले मंत्र विनियुक्त हुआ करते है|
चारो वेदो से ऋग्,यजु,साम रूप से है|
तीन प्रकार के मंत्रो के होने,  अथवा वेदो मे ज्ञान,कर्म ओर उपासना तीन प्रकार के कर्तव्यो के वर्णन करने से वेदत्रयी कहे जाते है|
अर्थववेद मे एक जगह कहा गया है-
“विद्याश्चवा त्र्प्रविद्याश्च यज्ञ्चान्यदुपदेश्यम्|
शरीरे ब्रह्म प्राविशद्दच: सामाथो यजु||” अर्थववेद ११-८-२३||
अर्थात् विद्या ओर ज्ञान +कर्म ओर जो कुछ अन्य उपदेश करने योग्य है तथा ब्रह्म (अर्थववेद) ,ऋक्, साम ओर यजु परमेश्वर के शरीर मे प्रविष्ट हुये|
व्हिटनी ने भी ब्रह्म को अर्थववेद ही कहा है| अर्थववेद की तरह ऋग्वेद मे भी चारो वेद के नाम है-
“सो अड्रिरोभिरड्रिरस्तमोभृदवृषा वृषभिः सखिभिः सखा सन|
ऋग्मिभिर्ऋग्मीगातुभिर्ज्येष्टो मरूत्वान्नो भवत्विन्द्रे ऊती”||ऋग्वेद १/१००/४||
अर्थात् जो अर्थर्वोगिरः मंत्रो से उत्तम रीति से युक्त है, जो सुख की वर्षा के साधनो से सुख सीचने वाला है, जो मित्रो के साथ मित्र है,जो
ऋग्वेदी के साथ ऋग्वेदी है जो साम से ज्येष्ठ होता है, वह महान इन्द्र (ईश्वर) हमारी रक्षा करे|
इस मंत्र मे अर्थववेद का स्पष्ट रीति से नाम लिया गया है जब ऋग्वेद स्वंय अर्थववेद के वेदत्व को स्वीकार करता है तो फिर अर्थववेद को नया बतलाकर वेद की सीमा से दूर करना मुर्खतामात्र है|

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वेदों में प्रातः भ्रमण(Morning walk in Vedas)


वेदों में प्रातः भ्रमण(Morning walk in Vedas)

स्योनाद् योनेरधि बुध्यमानौ हसामुदौ महसा मोदमानौ ।
सुगू सुपुत्रौ सुगृहौ तराथो जीवावुषसो
विभाती: ॥ AV 14.2.43
सुखप्रद शय्या से उठते हुए, आनंद चित्त से प्रेम
मय हर्ष  मनाते हुए, सुंदर आचरण से
युक्त, श्रेष्ठ पुत्रादि संतान,  उत्तम गौ, सुख
सामग्री से युक्त घर में निवास करते हुए
सुंदर प्रकाश युक्त प्रभात वेला का दीर्घायु
के लिए सेवन करो.
प्रात: भ्रमण के लाभ
नवं वसान: सुरभि: सुवासा उदागां जीव
उषसो विभाती:  ।
आण्डात्
पतत्रीवामुक्षि विश्वस्मादेनसस्परि ॥
AV14.2.44
स्वच्छ नये जैसे आवास और परिधान कपड़े आदि के साथ
स्वच्छ वायु में सांस लेने वाला मैं आलस्य
जैसी बुरी आदतों से छुट
कर, विशेष रूप से सुंदर लगने वाली  प्रात:
उषा काल में उठ कर अपने घर से निकल कर घूमने चल
पड़ता हूं जैसे एक पक्षी अपने अण्डे में
से निकल कर चल पड़ता है.
प्रात: भ्रमण के लाभ
शुम्भनी द्यावा पृथिवी अ
न्तिसुम्ने महिव्रते ।
आप: सप्त
सुस्रुवुदेवीस्ता नो मुञ्चन्त्वंहस: ॥
AV14.2.45
सुंदर प्रकृति ने मनुष्य को सुख देने का एक महाव्रत
ले रखा है. उन जनों को जो जीवन में
प्राकृतिक वातावरण के समीप रहते हैं
सुख देने के लिए मानव शरीर में प्रवाहित
होने वाले सात दैवीय जल तत्व हमारे
दु:ख रूपि रोगों से छुड़ाते हैं .
Elements of Nature have avowed to
make life comfortable and healthy for
the species. Particularly the seven fluids
that move around the human anatomy
are specifically helped by Nature.
Modern science confirms that presence
of naturally created ‘Schumann’
electromagnetic field and negative ions
generated by Nature play very
significant roles in maintaining  good
physical and mental health of human
beings.
(प्रात: कालीन उषा प्रकृति के सेवन
द्वारा सुख देने वाले वे मानव शरीर के सात
जल तत्व अथर्व वेद के निम्न मंत्र में बताए गए हैं .
( को आस्मिन्नापो व्यदधाद् विषूवृत: सिन्धुसृत्याय जाता:।
तीव्रा अरुणा लोहिनीस्ताम्रधूम्रा
ऊर्ध्वा अवांची: पुरुषे तिरश्ची:
॥ AV 10.2.11
(भावार्थ) परमेश्वर ने मनुष्य में रस रक्तादि के रूप में
(सप्तसिंधुओं) सात भिन्न भिन्न
जलों को मानवशरीर में स्थापित किया है. वे
अलग अलग प्रवाहित होते हैं . अतिशय रूप से –
अलग अलग नदियों की तरह बहने के
लिए उन का निर्माण गहरे लाल रंग के, ताम्बे के रंग
के, धुएं के रंग इत्यादि के ये जल (रक्तादि)
शरीर में ऊपर नीचे और तिरछे
सब ओर आते जाते हैं.
ये सात जल तत्व आधुनिक शरीर शास्त्र के
अनुसार निम्न बताए जाते हैं.
1.  मस्तिष्क सुषुम्णा में प्रवाहित होने वाला रस
(Cerebra –Spinal Fluid)
2.  मुख लाला (Saliva)
3.  पेट के पाचन रस (Digestive juices)
4.  क्लोम ग्रन्थि रस जो पाचन में सहायक होते
हैं (Pancreatic juices)
5.  पित्त रस ( liver Bile)
6.  रक्त (Blood)
7.  (Lymph )
ये सात रस मिल कर सप्त आप:= सप्त प्राण: – 5
ज्ञानेन्द्रियों, 1 मन और 1 बुद्धि का संचालन करते
हैं.)
भ्रमण में पारस्परिक नमस्कार
सूर्यायै देवेभ्यो मित्राय वरुणाय च ।
ये भूतस्य प्रचेतसस्तेभ्य इदमकरं नम: ॥
AV14.2.46
सूर्य इत्यादि प्राकृतिक देवताओं को,  सब मिलने वाले
मित्रों जनों को जो सम्पूर्ण भौतिक जगत को प्रस्तुत
करते हैं हमारा नमन है. ( भारतीय
संस्कृति में प्रात: काल भ्रमण में जितने लोग मिलते हैं
उन सब को यथायोग्य नमन करने
की परम्परा इसी वेद मंत्र पर
आधारित है)

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वेदो ओर महाभारत मे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया का उल्लेख (photosynthesis explaned in ved and mahabharat)


वेदो ओर महाभारत मे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया का उल्लेख (photosynthesis explaned in ved and mahabharat)

मित्रो नमस्ते,,,
इस बार आप के लिए वेदो ओर महाभारत मे वर्णित प्रकाश संश्लेषण की क्रिया का वर्णन ले कर आया हु। …

प्रकाश संश्लेषण-

सजीव कोशिकाओं के द्वारा प्रकाशीय उर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करने की क्रिया को प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिन्थेसिस) कहते है।
इस क्रिया मे पादप की पत्तिया सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में वायु से कार्बनडाइऑक्साइड तथा भूमि सेजल लेकर जटिल कार्बनिक खाद्य पदार्थों जैसे कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण करते हैं तथा आक्सीजन गैस(O2) बाहर निकालते हैं।  ……
हमारे धर्म ग्रंथो मे इस क्रिया का उल्लेख है …….

वेदो मे प्रकाश संश्लेषण-

वेदो मे प्रकाश संश्लेषण क्रिया का उल्लेख नीचे दिए गए इस चित्र मे देखे-
 ॠग्वेद के 10 मं के 97 सुक्त के 5 वे मंत्र मे पत्तियो द्वारा सूर्य के प्रकाश को ग्रहण कर प्रकाश संश्लेषण की क्रिया का स्पष्ट उल्लेख है।
महाभारत मे भी प्रकाश संश्लेषण की क्रिया का उल्लेख है महाभारत मे ये ज्ञान मर्हिषी शोनक जी ने इसी मंत्र के विश्लेषण ओर अपनी योग बल के आधार पर युधिष्टर को दिया था…जो महाभारत मे इस प्रकार मिलता है;

महाभारत मे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया का उल्लेख- शौनकेनैवम उक्तस तु कुन्तीपुत्रॊ युधिष्ठिरः

पुरॊहितम उपागम्य भरातृमध्ये ऽबरवीद इदम [1]———————————————
परस्थितं मानुयान्तीमे बराह्मणा वेदपारगाः
न चास्मि पालने शक्तॊ बहुदुःखसमन्वितः [2]———————————————
परित्यक्तुं न शक्नॊमि दानशक्तिश च नास्ति मे
कथम अत्र मया कार्यं भगवांस तद बरवीतु मे [3]
———————————————
मुहूर्तम इव स धयात्वा धर्मेणान्विष्य तां गतिम
युधिष्ठिरम उवाचेदं धौम्यॊ धर्मभृतां वरः [4]
———————————————
पुरा सृष्टनि भूतानि पीड्यन्ते कषुधया भृशम
ततॊ ऽनुकम्पया तेषां सविता सवपिता इव [5]
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गत्वॊत्तरायणं तेजॊ रसान उद्धृत्य रश्मिभिः
दक्षिणायनम आवृत्तॊ महीं निविशते रविः [6]
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कषेत्रभूते ततस तस्मिन्न ओषधीर ओषधी पतिः
दिवस तेजः समुद्धृत्य जनयाम आस वारिणा [7]
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निषिक्तश चन्द्र तेजॊभिः सूयते भूगतॊ रविः
ओषध्यः षड्रसा मेध्यास तदेवान्धस् पराणिनां भुवि [8]
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एवं भानुमयं हय अन्नं भूतानां पराणधारणम
पितैष सर्वभूतानां तस्मात तं शरणं वरज [9]
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राजानॊ हि महात्मानॊ यॊनिकर्म विशॊधिताः
उद्धरन्ति परजाः सर्वास तप आस्थाय पुष्कलम [10] [महाभारत वन पर्व ३. भाष्य]
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अर्थ – शौनक ऋषि के समक्ष अपने भाइयों के सामने कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने कहा –

हे! ऋषिवर, ब्रह्मा जी की बांते जो वेदों में लिखी गयी है, उनका अनुपालन करते हुए, मैं वन की ओर गमन कर रहा हूँ, मै अपने अनुचरो का समर्थन व उनका पालन करने में असमर्थ हूँ, उन्हें जीविका प्रदान करने की शक्ति मेरे पास नहीं है, अतः हे! मुनिश्रेष्ठ बताइए अब मुझे क्या करना चाहिए?

अपनी योगशक्तियों द्वारा संपूर्ण वस्तुस्तिथि का पता लगाकर गुणी पुरुषो में श्रैष्ठ धौम्य, युधिष्ठिर के सन्मुख होकर बोले –

“हे कुन्तीपुत्र! तू अपने अनुजों की जीविका की चिंता मत कर, तेरा कर्तव्य एक पिता का है, अति प्राचीन काल से ही सूर्यदेव अपने मृत्युलोकवासी बालकों की जीविका चलाते अर्थात उन्हें भोजन देते चले आ रहें हैं! जब वे भूंख से पीड़ित होते है, तब सूर्यदेव उन पर करुणा बरसाते हैं, वे अपनी किरणों का दान पौधों को देते हैं, उनकी किरणें जल को आकर्षित करती हैं, उनका तेज (गर्मी) समस्त पृथ्वी के पेड़-पौधों में प्रसारित (फैलता) होता है, तथा पौधे भी उनके इस वरदान (प्रकाश) का उपयोग करते है, तथा मरुत (हवा या कह सकते है CO2) एवं इरा (जल) की शिष्टि (सहायता) से देवान्धस् (पवित्र भोजन) का निर्माण करते हैं! जिससे वे इस लोक (संसार/मनुष्य) के जठरज्वलन (भूख) को शांत करते हैं!

सूर्यदेव इसीलिए सभी प्राणियों के पिता हैं! युधिष्ठिर, तू नहीं! समस्त प्राणी उन्ही के चरणों में शरण लेते हैं! सारे उच्च कुल में जन्मे राजा, तपस्या की अग्नि में तपकर ही बाहर निकलते हैं, उन्हें जीवन में वेदना होती ही है, अतः तू शोक ना कर, जिस प्रकार सूर्यदेव संसार की जीविका चलाते हैं, उसी प्रकार तेरे अनुजों के कर्म उनकी जीविका चलाएंगे! हे गुणी! तू कर्म में आस्था रख!

यहा पोधो के द्वारा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया मे सुर्य के प्रकाश ओर कार्बनडाई ओक्साईड,जल द्वारा भोजन निर्माण का स्पष्ट उल्लेख है।
इस लेख को लिखने मे मैने इस ब्लोग की सहायता भी ली है –
http://www.vijaychouksey.blogspot.in/2014/02/photosynthesis-explained-in-mahabharata.html इस ब्लोग पर अवश्य क्लिक करे इस पर आप भारद्वाज मुनिकृत विमानशास्त्र भी पढ सकते है।
विशेष धन्यवाद रजनीश बंसल जी
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सर्वश्रेष्ट कौन ?(उपनिषद कथा )


सर्वश्रेष्ट कौन ?(उपनिषद कथा )

एक बार प्राण और इन्द्रियों में झगड़ा हुआ |कि सबसे श्रेष्ट कौन है इसलिए समस्त इन्द्रिय और प्राण प्रजापति के पास गये |
और इन्द्रियों में वाणी ,नेत्र ,श्रोत ,इत्याद्दी ने यह दावा किया की हम सबसे श्रेष्ट है |प्राण ने भी ऐसा ही कहा ,तो झगड़े का निपटारा करने के लिए प्रजापति ने उत्तर दिया ….
“यस्मिन व उत्कान्ते शरीर पापिष्ठतरमिव दृश्यते स व: श्रेष्ट इति|| छान्दोग्य ५/१/७ ||
अर्थात तुमे से जिसके निकल जाने पर शरीर बहुत बुरा से दिखे वो सबसे श्रेष्ट है |
इस फैसले को सुनते ही शरीर से वाणी निकल गयी ,शरीर गूंगे की तरह जीवित रहा | नेत्र चले गये शरीर अंधे की तरह जीवित रहा ,श्रोत चले गये शरीर बहरे की भांति स्थिर रहा ,,मन चला गया शरीर मूढ़ ,शिशुवत स्थिर रहा ,परन्तु जब प्राण जाने लगे तो सारा शरीर मृतवत होने लगा | तब सारी इन्द्रियों ने एक स्वर में प्राण से कहा :-
” भगवन्नेधि ,त्व न: श्रेष्ठोसि , मोत्कमीरिति|| छान्दोग्य५/१/१२ ||
भगवान ! तुम ही हमारे स्वामी ,तुम ही हमसे श्रेष्ट हो ,बाहर मत निकलो |”
अत: स्पष्ट है कि प्राण के ही आश्रय पर सारी इन्द्रिय ,मन है | उसी के अधीन है ,,,यदि हमे अपनी इन्द्रियों और मन पर नियंत्रण करना है तो प्राण का अनुष्टान प्राणायाम करना चाहिए |
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पारसी मत का मूल वैदिक धर्म(vedas are the root of parsiseem)


पारसी मत का मूल वैदिक धर्म(vedas are the root of parsiseem)

वेद ही सब मतो व सम्प्रदाय का मूल है,ईश्वर द्वारा मनुष्य को अपने कर्मो का ज्ञान व शिक्षा देने के लिए आदि काल मे ही परमैश्वर द्वारा वेदो की उत्पत्ति की गयी,लैकिन लोगो के वेद मार्ग से भटक जाने के कारण हिंदु,जेन,सिख,इसाई,बुध्द,पारसी,मुस्लिम,यहुदी,आदि मतो का उद्गम हो गया। मानव उत्पत्ति के वैदिक सिध्दांतानुसार मनुष्यो की उत्पत्ति सर्वप्रथम त्रिविष्ट प्रदेश(तिब्बत) से हुई (सत्यार्थ प्रकाश अष्ट्म समुल्लास) लेकिन धीरे धीरे लोग भारत से अन्य देशो मे बसने लगे जो लोग वेदो से दूर हो गए वो मलेच्छ कहलाए जैसा कि मनुस्मृति के निम्न श्लोक से स्पष्ट होता है ”
शनकैस्तु  क्रियालोपादिमा: क्षत्रियजातय:।
वृषलत्वं गता लोके ब्रह्माणादर्शनेन्॥10:43॥  –
निश्चय करके यह क्षत्रिय जातिया अपने कर्मो के त्याग से ओर यज्ञ ,अध्यापन,तथा संस्कारादि के निमित्त ब्राह्मणो के न मिलने के कारण शुद्रत्व को प्राप्त हो गयी।
” पौण्ड्र्काश्र्चौड्रद्रविडा: काम्बोजा यवना: शका:।
पारदा: पहल्वाश्र्चीना: किरात: दरदा: खशा:॥10:44॥
पौण्ड्रक,द्रविड, काम्बोज,यवन, चीनी, किरात,दरद,यह जातिया शुद्रव को प्राप्त हो गयी ओर कितने ही मलेच्छ हो गए जिनका विद्वानो से संपर्क नही रहा।  अत: यहा हम कह सकते है कि भारत से ही आर्यो की शाखा अन्य देशो मे फ़ैली ओर वेदो से दूर रहने के कारण नए नए मतो का निर्माण करने लगे। इनमे ईरानियो द्वारा “पारसियो” मत का उद्गम हुआ।पारसी मत की पवित्र पुस्तक जैद अवेस्ता मे कई बाते वेदो से ज्यों की त्यों ली गयी है। यहा मै कुछ उदाहरण द्वारा वेदो ओर पारसी मत की कुछ शिक्षाओ पर समान्ता के बारे मे लिखुगा-   1 वैदिक ॠषियो का पारसी मत ग्रंथ मे नाम-
पारसियो की पुस्तक अवेस्ता के यास्ना मे 43 वे अध्याय मे आया है ” अंड्गिरा नाम का एक महर्षि हुवा जिसने संसार उत्पत्ति के आरंभ मे अर्थववेद का ज्ञान प्राप्त किया।
 एक अन्य पारसी ग्रंथ शातीर मे व्यास जी का उल्लेख है-“

“अकनु बिरमने व्यास्नाम अज हिंद आयद  !                                दाना कि  अल्क    चुना  नेरस्त  !!

अर्थात  :- “व्यास नाम का एक ब्राह्मन हिन्दुस्तान से आया . वह बड़ा ही  चतुर  था और उसके सामान अन्य कोई बुद्धिमान नहीं हो सकता  ! ”    पारसियो मे अग्नि को पूज्य देव माना गया है ओर वैदिक ॠति के अनुसार दीपक जलाना,होम करना ये सब परम्परा वेदो से पारसियो ने रखी है।

 इनकी प्रार्थ्नात की स्वर ध्वनि वैदिक पंडितो द्वारा गाए जाने वाले साम गान से मिलती जुलती है।
 पारसियो के ग्रंथ  जिन्दावस्था है यहा जिंद का अर्थ छंद होता है जैसे सावित्री छंद या छंदोग्यपनिषद आदि|
 पारसियो द्वारा वैदिक वर्ण व्यवस्था का पालन करना-
पारसी भी सनातन की तरह चतुर्थ वर्ण व्यवस्था को मानते है-
1) हरिस्तरना (विद्वान)-ब्राह्मण
2) नूरिस्तरन(योधा)-क्षत्रिए
3) सोसिस्तरन(व्यापारी)-वैश्य
 4) रोजिस्वरन(सेवक)-शुद्र
संस्कृत ओर पारसी भाषाओ मे समानता-
यहा निम्न पारसी शब्द व संस्कृत शब्द दे रहा हु जिससे सिध्द हो जाएगा की पारसी भाषा संस्कृत का अपभ्रंश है-
 कुछ शब्द जो कि ज्यों के त्यों संस्कृत मे से लिए है बस इनमे लिपि का अंतर है-
 पारसी ग्रंथ मे वेद- अवेस्ता जैद मे वेद का उल्लेख-
1) वए2देना (यस्न 35/7) -वेदेन
अर्थ= वेद के द्वारा
 2) वए2दा (उशनवैति 45/4/1-2)- वेद
 अर्थ= वेद
वएदा मनो (गाथा1/1/11) -वेदमना
अर्थ= वेद मे मन रखने वाला
अवेस्ता जैद ओर वेद मंत्र मे समानता:- वेद से अवेस्ता जैद मे कुछ मंत्र लिए गए है जिनमे कुछ लिपि ओर शब्दावली का ही अंतर है, सबसे पहले अवेस्ता का मंथ्र ओर फ़िर वेद का मंत्र व अर्थ-                                        1) अह्मा यासा नमडंहा उस्तानजस्तो रफ़ैब्रह्मा(गाथा 1/1/1)
मर्त्तेदुवस्येSग्नि मी लीत्…………………उत्तानह्स्तो नमसा विवासेत ॥ ॠग्वेद 6/16/46॥
=है मनुष्यो | जिस तरह योगी ईश्वर की उपासना करता है उसी तरह आप लोग भी करे।
   2) पहरिजसाई मन्द्रा उस्तानजस्तो नम्रैदहा(गाथा 13/4/8)
 …उत्तानहस्तो नम्सोपसघ्………अग्ने॥ ॠग्वेद 3/14/5॥
 =विद्वान लोग विद्या ,शुभ गुणो को फ़ैलाने वाला हो।
 3) अमैरताइती दत्तवाइश्चा मश्क-याइश्चा ( गाथा 3/14/5)
-देवेभ्यो……अमृतत्व मानुषेभ्य ॥ ॠग्वेद 4/54/2॥
 =है मनु्ष्यो ,जो परमात्मा सत्य ,आचरण, मे प्रेरणा करता है ओर मुक्ति सुख देकर सबको आंदित करते है।  4) मिथ्र अहर यजमैदे।(मिहिरयश्त 135/145/1-2)
-यजामहे……।मित्रावरुण्॥ॠग्वेद 1/153/1॥
जैसे यजमान अग्निहोत्र ,अनुष्ठानो से सभी को सुखी करते है वैसे समस्त विद्वान अनुष्ठान करे।        उपरोक्त प्रमाणो से सिध्द होता है कि वेद ही सभी मतो का मूल स्रोत है,किसी भी मत के ग्रंथ मे से कोई बात मानवता की है तो वो वेद से ली गई है बाकि की बाते उस मत के व्यक्तियो द्वारा गडी गई है।
om jai maa bharti