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આજની પોઝિટિવ સ્ટોરી

સલમાનને સજા કરાવવામાં મહત્વની ભૂમિકા ભજવનાર બિસ્નોઇ સમાજનો પ્રકૃતિ પ્રેમ જાણશો તો દંગ થઇ જશો..

આલેખનઃ રમેશ તન્ના

સલમાનખાનને કોટડીની કેદ સુધી પહોંચાડવામાં બિસ્નોઇ સમુદાયનું મોટું પ્રદાન છે. આ સમાજના લોકોએ આપેલી સાક્ષીએ કેસને અસર કરી હતી. કાળિયાર હરણનો શિકાર કરનારો સલમાન જેલમાં જશે પણ ‘હમ સાથ સાથ હૈં’ વાળા તેના સાથીદારો સૈફ અલી ખાન, તબ્બુ, નીલમ અને સોનાલી બેંદ્રે નિર્દોષ છુટી ગયા તેનું આ સમાજને દુઃખ છે. સરકારે તેમની સામે ઉપલી કોર્ટેમાં જવું જોઇએ તેવું તેઓ માને છે.


રાજસ્થાનના પશ્ચિમી થાર રણ વિસ્તારમાં રહેતા બિસ્નોઇ સમુદાયના લોકો પ્રકૃતિપ્રેમી છે અને પશુઓને તો ભગવાન જ માને છે. બિસ્નોઇ શબ્દ વીસ અને નવ(હિન્દીમાં નોઇ) મળીને બનેલો શબ્દ છે. એ લોકો વીસ વત્તા નવ ઓગણત્રીસ નિયમોનું પાલન કરે છે.
આ નિયમોમાંઃ પરોપકારી પશુઓનું રક્ષણ કરવું, માંસાહાર નહીં કરવાનો, તમ્બાકુ નહીં ખાવાની, ભાંગ-શરાબ નહીં, ચોરી નહીં કરવાની, જૂઠ્ઠું નહીં બોલવાનું, રસોઇ જાતે બનાવવાની વગેરેનો સમાવેશ થાય છે.
બિસ્નોઇ સમાજના લોકો પશુઓની હત્યા કોઇ પણ સંજોગોમાં થવા દેતા નથી. બિકાનેરના તાલવાના મહંતને દિના નામની વ્યક્તિ પર શંકા જતાં તેની પાસેથી તેમણે ઘેટું લઇ લીધું હતું તો 2001માં બાબુ નામની વ્યક્તિએ એક મરઘી મારી તો તેને સમુદાયમાંથી બહાર કાઢી દીધી હતી. આ નિર્ણય બિસ્નોઇ પંચાયતે કર્યો હતો.
સમાજની કોઇ વ્યક્તિ લીલા(જીવંત) ઝાડની ડાળી કાપી ના શકે. સમાજના જે ભાઇ-બહેનોએ ખિજડા કે અન્ય વૃક્ષો કાપ્યાં હતાં તેમણે આત્મસમર્પણ કરવું પડ્યું હતું. 1909માં કસાઇઓને એવો આદેશ અપાયો હતો કે તેઓ બકરો લઇને ગામમાંથી પસાર ના થાય.

વૃક્ષો માટે 363 બિસ્નોઇ શહીદ થયા હતાઃ


વાત 1730ની છે. જોધપુરના તત્કાલીન મહારાજા અભયસિંહને લાકડાંની જરૂર પડી. ખેજડલી ગામમાં ગીચ વૃક્ષો હતાં. દિવાન અને સૈનિકો ત્યાં વૃક્ષો કાપવા ગયા. 84 ગામના બિસ્નોઇઓની મહાપંચાયત મળી. એવો નિર્ણય કરાયો કે જ્યાં સુધી આપણામાં પ્રાણ છે ત્યાં સુધી લડીશું અને વૃક્ષો બચાવીશું. મા અમૃતાદેવી બિસ્નોઇના નેતૃત્વમાં આ સમુદાયના લોકો વૃક્ષોને ચોંટી ગયા. 60 ગામનો, 64 ગોત્રોના, 217 પરિવારના, 294 પુરુષો અને 69 મહિલાઓ સહિત 363 વ્યક્તિઓ વૃક્ષ બચાવવા શહીજ થયાં હતાં.
આ ઘટનાના 250 વર્ષ પછી 1978માં શહીદોની સ્મૃતિમાં મેળો ભરાયો. ભારતમાં હજારો-લાખો મેળા ભરાય છે, પણ પર્યાવરણ મેળો તો આ એક માત્ર છે. મેળામાં પર્યાવરણને લાગતી અનેક પ્રવૃતિ યોજાય છે. પ્રકૃતિ અને પશુઓ માટે શહીદ થનારી આ સમુદાય સામે હરણનો શિકાર પડદા પરનો હીરો સલમાન કેવો મોટો વિલન લાગે નહીં ?
જે સમુદાય વૃક્ષ માટે પ્રાણ આપી દે એ સમુદાય શિકારીને સજા કરાવવા પોતાનાથી થાય તે બધું જ કરે.
બિસ્નોઇ સમાજનો આ પર્યાવરણ પ્રેમ પ્રેરક બને તેવો છે.

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बिस्तरों पर अब सलवटें नहीं पड़ती
ना ही इधर उधर छितराए हुए कपड़े हैं
रिमोट के लिए भी अब झगड़ा नहीं होता
ना ही खाने की नई नई फ़रमायशें हैं
मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं ।

सुबह अख़बार के लिए भी नहीं होती मारा मारी
घर बहुत बड़ा और सुंदर दिखता है
पर हर कमरा बेजान सा लगता है
अब तो वक़्त काटे भी नहीं कटता
बचपन की यादें कुछ फ़ोटो में सिमट गयी हैं
मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं ।

अब मेरे गले से कोई नहीं लटकता
ना ही घोड़ा बनने की ज़िद होती है
खाना खिलाने को अब चिड़िया नहीं उड़ती
खाना खिलाने के बाद की तसल्ली भी अब नहीं मिलती
ना ही रोज की बहसों और तर्कों का संसार है
ना अब झगड़ों को निपटाने का मजा है
ना ही बात बेबात गालों पर मिलता दुलार है
बजट की खींच तान भी अब नहीं है
मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं

पलक झपकते ही जीवन का स्वर्ण काल निकल गया
पता ही नहीं चला
इतना ख़ूबसूरत अहसास कब पिघल गया
तोतली सी आवाज़ में हर पल उत्साह था
पल में हँसना पल में रो देना
बेसाख़्ता गालों पर उमड़ता प्यार था
कंधे पर थपकी और गोद में सो जाना
सीने पर लिटाकर वो लोरी सुनाना
बार बार उठ कर रज़ाई को उड़ाना
अब तो बिस्तर बहुत बड़ा हो गया है
मेरे बच्चों का प्यारा बचपन कहीं खो गया है

अब तो रोज सुबह शाम मेरी सेहत पूँछते हैं
मुझे अब आराम की हिदायत देते हैं
पहले हम उनके झगड़े निपटाते थे
आज वे हमें समझाते हैं
लगता है अब शायद हम बच्चे हो गए हैं
मेरे बच्चे अब बहुत बड़े हो गए
-अनजान

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“`
अमेरिका को English में America
ही बोलते.

जापान को भी English में Japan बोलते

भूटान को भी English में Bhutan ही बोलते

श्रीलंका को भी English में
Sri Lanka ही बोलते.

बांग्लादेश को भी English में Bangladesh ही बोलते

नेपाल को भी English में Nepal ही बोलते.

इतना ही नहीं अपने पडोसी मुल्क पाकिस्तान को भी
English में Pakistan ही बोलते.

फिर सिर्फ भारत को ही English में India क्यों बोलते ?

तो

Oxford Dictionary के अनुसार

India यह शब्द कैसे आया यह ९९% लोगो को भी पता तक नहीं होगा…
*
I – Independent

N- Nation

D- Declared

I – In

A- August

इसीलिए इंडिया (India)

दोस्तों

इस पोस्ट को कृपया इतना शेयर करो की, ज्यादा से ज्यादा भारतीयों को यह पता चल सके…“`

👌👍👏👏👏👏👏👏👏

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मित्रो रामचरितमानस के सुंदरकांड में माता सीता और हनुमानजी का ज्ञानवर्धक एवम भक्तिपूर्ण संवाद!!!!

मित्रो हनुमानजी माता सीता की खोज के लिए लंका जाते हैं। विभीषण के कहे अनुसार हनुमानजी अशोकवाटिका में पहुचकर क्या करते हैं, आगे पढ़ें,,,

  • कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
    जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥

हनुमान्‌जी ने हदय में विचार कर सीताजी के सामने अँगूठी डाल दी, मानो अशोक ने अंगारा दे दिया। यह समझकर सीताजी ने हर्षित होकर उठकर उसे हाथ में ले लिया॥ तब उन्होंने राम-नाम से अंकित अत्यंत सुंदर एवं मनोहर अँगूठी देखी। अँगूठी को पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषाद से हृदय में अकुला उठीं॥

वे सोचने लगीं- श्री रघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है? और माया से ऐसी (माया के उपादान से सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनाई नहीं जा सकती। सीताजी मन में अनेक प्रकार के विचार कर रही थीं। इसी समय हनुमान्‌जी मधुर वचन बोले-॥

  • रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
    लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥

वे श्री रामचंद्रजी के गुणों का वर्णन करने लगे, (जिनके) सुनते ही सीताजी का दुःख भाग गया। वे कान और मन लगाकर उन्हें सुनने लगीं। हनुमान्‌जी ने आदि से लेकर अब तक की सारी कथा कह सुनाई॥ सीताजी बोलीं-) जिसने कानों के लिए अमृत रूप यह सुंदर कथा कही, वह हे भाई! प्रकट क्यों नहीं होता? तब हनुमान्‌जी पास चले गए। उन्हें देखकर सीताजी फिरकर (मुख फेरकर) बैठ गईं? उनके मन में आश्चर्य हुआ॥

  • राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥
    यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥

हनुमान्‌जी ने कहा- हे माता जानकी मैं श्री रामजी का दूत हूँ। करुणानिधान की सच्ची शपथ करता हूँ, हे माता! यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ। श्री रामजी ने मुझे आपके लिए यह सहिदानी (निशानी या पहिचान) दी है॥सीताजी ने पूछा- नर और वानर का संग कहो कैसे हुआ? तब हनुमानजी ने जैसे संग हुआ था, वह सब कथा कही॥

  • कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास
    जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥

हनुमान्‌जी के प्रेमयक्त वचन सुनकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न हो गया, उन्होंने जान लिया कि यह मन, वचन और कर्म से कृपासागर श्री रघुनाथजी का दास है॥ भगवान का जन (सेवक) जानकर अत्यंत गाढ़ी प्रीति हो गई। नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया और शरीर अत्यंत पुलकित हो गया (सीताजी ने कहा-) हे तात हनुमान्‌! विरहसागर में डूबती हुई मुझको तुम जहाज हुए॥

मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित खर के शत्रु सुखधाम प्रभु का कुशल-मंगल कहो। श्री रघुनाथजी तो कोमल हृदय और कृपालु हैं। फिर हे हनुमान्‌! उन्होंने किस कारण यह निष्ठुरता धारण कर ली है?॥ सेवक को सुख देना उनकी स्वाभाविक बान है। वे श्री रघुनाथजी क्या कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात! क्या कभी उनके कोमल साँवले अंगों को देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे?॥

मुँह से वचन नहीं निकलता, नेत्रों में (विरह के आँसुओं का) जल भर आया। (बड़े दुःख से वे बोलीं-) हा नाथ! आपने मुझे बिलकुल ही भुला दिया! सीताजी को विरह से परम व्याकुल देखकर हनुमान्‌जी कोमल और विनीत वचन बोले-॥ हे माता! सुंदर कृपा के धाम प्रभु भाई लक्ष्मणजी के सहित (शरीर से) कुशल हैं, परंतु आपके दुःख से दुःखी हैं। हे माता! मन में ग्लानि न मानिए (मन छोटा करके दुःख न कीजिए)। श्री रामचंद्रजी के हृदय में आपसे दूना प्रेम है॥

  • रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
    अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥

हे माता! अब धीरज धरकर श्री रघुनाथजी का संदेश सुनिए। ऐसा कहकर हनुमान्‌जी प्रेम से गद्गद हो गए। उनके नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया॥ हनुमान्‌जी बोले- श्री रामचंद्रजी ने कहा है कि हे सीते! तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गए हैं। वृक्षों के नए-नए कोमल पत्ते मानो अग्नि के समान, रात्रि कालरात्रि के समान, चंद्रमा सूर्य के समान॥और कमलों के वन भालों के वन के समान हो गए हैं। मेघ मानो खौलता हुआ तेल बरसाते हैं। जो हित करने वाले थे, वे ही अब पीड़ा देने लगे हैं। त्रिविध (शीतल, मंद, सुगंध) वायु साँप के श्वास के समान (जहरीली और गरम) हो गई है॥

मन का दुःख कह डालने से भी कुछ घट जाता है। पर कहूँ किससे? यह दुःख कोई जानता नहीं। हे प्रिये! मेरे और तेरे प्रेम का तत्त्व (रहस्य) एक मेरा मन ही जानता है॥ और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है। बस, मेरे प्रेम का सार इतने में ही समझ ले। प्रभु का संदेश सुनते ही जानकीजी प्रेम में मग्न हो गईं। उन्हें शरीर की सुध न रही॥हनुमान्‌जी ने कहा- हे माता! हृदय में धैर्य धारण करो और सेवकों को सुख देने वाले श्री रामजी का स्मरण करो। श्री रघुनाथजी की प्रभुता को हृदय में लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़ दो॥

राक्षसों के समूह पतंगों के समान और श्री रघुनाथजी के बाण अग्नि के समान हैं। हे माता! हृदय में धैर्य धारण करो और राक्षसों को जला ही समझो॥ श्री रामचंद्रजी ने यदि खबर पाई होती तो वे बिलंब न करते। हे जानकीजी! रामबाण रूपी सूर्य के उदय होने पर राक्षसों की सेना रूपी अंधकार कहाँ रह सकता है?॥

  • अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयुस नहिं राम
    दोहाई॥
    कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥

हे माता! मैं आपको अभी यहाँ से लिवा जाऊँ, पर श्री रामचंद्रजी की शपथ है, मुझे प्रभु (उन) की आज्ञा नहीं है। (अतः) हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्री रामचंद्रजी वानरों सहित यहाँ आएँगे॥ और राक्षसों को मारकर आपको ले जाएँगे। नारद आदि (ऋषि-मुनि) तीनों लोकों में उनका यश गाएँगे। (सीताजी ने कहा-) हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्हें-नन्हें से) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान, योद्धा हैं॥

  • मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥
    कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥

अतः मेरे हृदय में बड़ा भारी संदेह होता है (कि तुम जैसे बंदर राक्षसों को कैसे जीतेंगे!)। यह सुनकर हनुमान्‌जी ने अपना शरीर प्रकट किया। सोने के पर्वत (सुमेरु) के आकार का (अत्यंत विशाल) शरीर था, जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करने वाला, अत्यंत बलवान्‌ और वीर था॥ तब उसे देखकर सीताजी के मन में विश्वास हुआ। हनुमान्‌जी ने फिर छोटा रूप धारण कर लिया॥

  • सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
    प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥

भावार्थ:-हे माता! सुनो, वानरों में बहुत बल-बुद्धि नहीं होती, परंतु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है। (अत्यंत निर्बल भी महान्‌ बलवान्‌ को मार सकता है)॥

भक्ति, प्रताप, तेज और बल से सनी हुई हनुमान्‌जी की वाणी सुनकर सीताजी के मन में संतोष हुआ। उन्होंने श्री रामजी के प्रिय जानकर हनुमान्‌जी को आशीर्वाद दिया कि हे तात! तुम बल और शील के निधान होओ॥

*अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥

भावार्थ:-हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणों के खजाने होओ। श्री रघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें। ‘प्रभु कृपा करें’ ऐसा कानों से सुनते ही हनुमान्‌जी पूर्ण प्रेम में मग्न हो गए॥

हनुमान्‌जी ने बार-बार सीताजी के चरणों में सिर नवाया और फिर हाथ जोड़कर कहा- हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया। आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है॥

हे माता! सुनो, सुंदर फल वाले वृक्षों को देखकर मुझे बड़ी ही भूख लग आई है। (सीताजी ने कहा-) हे बेटा! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते हैं॥ हनुमान्‌जी ने कहा- हे माता! यदि आप मन में सुख मानें प्रसन्न होकर आज्ञा दें तो मुझे उनका भय तो बिलकुल नहीं है॥

संजय गुप्ता

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श्रीमद् आद्य शंकराचार्यविरचितम्
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गुर्वाष्टकम्
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बहुत ही ज्ञान वर्धक है एक बार जरूर अवलोकन करें ।

शरीरं सुरुपं तथा वा कलत्रं
यशश्चारू चित्रं धनं मेरुतुल्यम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।1।।

यदि शरीर रुपवान हो, पत्नी भी रूपसी हो और सत्कीर्ति चारों दिशाओं में विस्तरित हो, मेरु पर्वत के तुल्य अपार धन हो, किंतु गुरु के श्रीचरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इन सारी उपलब्धियों से क्या लाभ ।

कलत्रं धनं पुत्रपौत्रादि सर्वं
गृहं बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।2।।

सुन्दरी पत्नी, धन, पुत्र-पौत्र, घर एवं स्वजन आदि प्रारब्ध से सर्व सुलभ हो किंतु गुरु के श्रीचरणों में मन की आसक्ति न हो तो इस प्रारब्ध-सुख से क्या लाभ?

षडंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या
कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।3।।

वेद एवं षटवेदांगादि शास्त्र जिन्हें कंठस्थ हों, जिनमें सुन्दर काव्य-निर्माण की प्रतिभा हो, किंतु उसका मन यदि गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो इन सदगुणों से क्या लाभ?

विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः
सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।4।।

जिन्हें विदेशों में समादर मिलता हो, अपने देश में जिनका नित्य जय-जयकार से स्वागत किया जाता हो और जो सदाचार-पालन में भी अनन्य स्थान रखता हो, यदि उसका भी मन गुरु के श्रीचरणों के प्रति अनासक्त हो तो इन सदगुणों से क्या लाभ?

क्षमामण्डले भूपभूपालवृन्दैः
सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।5।।

जिन महानुभाव के चरणकमल पृथ्वीमण्डल के राजा-महाराजाओं से नित्य पूजित रहा करते हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्री चरणों में आसक्त न हो तो इसे सदभाग्य से क्या लाभ?

यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापात्
जगद्वस्तु सर्वं करे सत्प्रसादात्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।6।।

दानवृत्ति के प्रताप से जिनकी कीर्ति दिगदिगान्तरों में व्याप्त हो, अति उदार गुरु की सहज कृपादृष्टि से जिन्हें संसार के सारे सुख-ऐश्वर्य हस्तगत हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणों में आसक्तिभाव न रखता हो तो इन सारे ऐश्वर्यों से क्या लाभ?

न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ
न कान्तासुखे नैव वित्तेषु चित्तम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।7।।

जिनका मन भोग, योग, अश्व, राज्य, धनोपभोग और स्त्रीसुख से कभी विचलित न हुआ हो, फिर भी गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न बन पाया हो तो इस मन की अटलता से क्या लाभ?

अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये
न देहे मनो वर्तते मे त्वनर्घ्ये।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।8।।

जिनका मन वन या अपने विशाल भवन में, अपने कार्य या शरीर में तथा अमूल्य भंडार में आसक्त न हो, पर गुरु के श्रीचरणों में भी यदि वह मन आसक्त न हो पाये तो उसकी सारी अनासक्तियों का क्या लाभ?

अनर्घ्याणि रत्नादि मुक्तानि सम्यक्
समालिंगिता कामिनी यामिनीषु।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।9।।

अमूल्य मणि-मुक्तादि रत्न उपलब्ध हो, रात्रि में समलिंगिता विलासिनी पत्नी भी प्राप्त हो, फिर भी मन गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न बन पाये तो इन सारे ऐश्वर्य-भोगादि सुखों से क्या लाभ?

गुरोरष्टकं यः पठेत्पुण्यदेही
यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही।
लभेत् वांछितार्थ पदं ब्रह्मसंज्ञं
गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम्।।10।।

जो यती, राजा, ब्रह्मचारी एवं गृहस्थ इस गुरु-अष्टक का पठन-पाठन करता है और जिसका मन गुरु के वचन में आसक्त है, वह पुण्यशाली शरीरधारी अपने इच्छितार्थ एवं ब्रह्मपद इन दोनों को सम्प्राप्त कर लेता है यह निश्चित है।

“ॐ श्री गुरू चरण कमलेभ्यो नम”
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देव शर्मा

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नात्युच्चशिखरो मेरुर्नातिनीचं रसातलम् ।
व्यवसायद्वितीयानां नात्यपारो महोदधि: ।।
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भावार्थ – जो मनुष्य लक्ष्यसिद्ध, आलस्य विहीन एवम् परम् पुरुषार्थी होता है (अपने स्वयं के प्रयत्नों पर निर्भर होता है), उसके लिए पर्वत की चोटी उंची नही, पॄथ्वी का तल नीचा नही और महासागर अनुल्लंघ्य नही, अर्थात् उसके लिये कुछ भी असम्भव नही है।
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नवसंवत्सर विक्रम सवंत 2075 चैत्र नवरात्र….वर्ष प्रतिपदा…19 मार्च 2018 !!
राष्ट्रीय पंचांग की पहचान कालमान एवं तिथिगणना किसी भी देश की ऐतिहासिकता की आधारशिला होती है। किंतु जिस तरह से हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओँ को विदेशी भाषा अंग्रेजी का वर्चस्व धूमिल रहा है, कमोवेश यही हश्र हमारे राष्ट्रीय पंचांग, मसलन कैलेण्डर का है। किसी पंचांग की कालगणना का आधार कोई न कोई प्रचलित संवत होता है।

हमारे राष्ट्रीय पंचांग का आधार शक संवत है। शक संवत को राष्ट्रीय संवत मानना नहीं चाहिए था, क्योंकि शक परदेशी थे और हमारे देश में हमलावर के रूप में आए थे। हालांकि यह अलग बात है कि शक भारत में बसने के बाद भारतीय संस्कृति में ऐसे रच बस गए कि उनकी मूल पहचान लुप्त हो गई। बावजूद शक संवत को राष्ट्रीय संवत की मान्यता नहीं देनी चाहिए थी, क्योंकि इसके लागू होने बाद भी हम इस संवत के अनुसार न तो कोई राष्ट्रीय पर्व व जयंतिया मानते है और न ही लोक परंपरा के पर्व। तय है इस संवत का हमारे दैनंदिन जीवन में कोई महत्व नहीं रह गया है। इसके वनिस्वत हमारे संपूर्ण राष्ट्र के लोक व्यवहार में विक्रम संवत के आधार पर तैयार किए जाने वाले पंचांग प्रचलन में हैं। इस पंचांग की विलक्षणता है कि यह ईसा संवत से तैयार ग्रेगियन कैलेंडर से भी 57 साल पहले वर्चस्व में आ गया था, जबकि शक संवत की शुरुआत ईसाई संवत के 78 साल बाद हुई थी। मसलन हमने कालगणना में गुलाम मानसिकता का परिचय देते हुए पिछड़ेपन को स्वीकारा।

प्राचीन भारत और मघ्य अमेरिका दो ही ऐसे देश थे, जहां आधुनिक सैकेण्ड से सूक्ष्मतर और प्रकाश वर्ष जैसे उत्कृष्ट कालमान प्रचलन में थे। अमेरिका में मय सभ्यता का वर्चस्व था। मय संस्कृति में शुक्र ग्रह के आधार पर कालगणना की जाती थी। विष्वकर्मा मय, दानवों के गुरू शुक्राचार्य का पौत्र और शिल्पकार त्वश्टा का पुत्र था। मय के वंशजों ने अनेक देषों में अपनी सभ्यता को विस्तार दिया। इस सभ्यता की दो प्रमुख विषेशताएं थी, स्थापत्य कला और दूसरी सूक्ष्म ज्योतिष व खगोलीय गणना में निपुणता। रावण की लंका का निर्माण इन्हीं मय दानवों ने किया था। मयों का गुरू भारत था। प्राचीन समय में युग, मनवन्तर, कल्प जैसे महत्तम और कालांश लघुतम समय मापक विधियां प्रचलन में थीं। समय नापने के कालांश को निम्न नाम दिए गए है, निमेश यानी 1 तुट 2 तुट यानी लव, 2 लव यानी निमेश, 5निमेश यानी एक काश्ठा, 30काश्ठा यानी कला 40 कला यानी नाडि़का, 2 नाडि़या यानी मुहुर्त यानी, अहोरत्र, 15 अहोरत्र यानी। पक्ष, 7 अहोरत्र यानी। सप्ताह, 2 सप्ताह यानी। पक्ष, 2 पक्ष यानी। मास, 12 मास यानी। ईसा से 1000 से 500 साल पहले ही भारतीय ऋषियों ने अपनी आष्चर्यजनक ज्ञानशक्ति द्वारा आकाश मण्डल के उन समस्त तत्वों का ज्ञान हासिल कर लिया था, जो कालगणना के लिए जरूरी थे, इसलिए वेद, उपनिषद् आयुर्वेद, ज्योतिष और बा्रहण संहिताओं में मास, क्रृतु, अयन, वर्ष , युग, ग्रह, ग्रहण, ग्रहकक्षा, नक्षत्र, विशव और दिन-रात का मान तथा उसकी वृद्धि हानी संबंधी विवरण पर्यात मात्रा में उपलब्ध है। हरेक तीसरे वर्ष चन्द्र और सौर वर्ष का तालमेल बिठाने के लिए एक अधिकमास जोड़ा गया हैं। इसे मलमास या पुरुषोत्तम भी कहा जाता है। ऋग्वेद की ऋचा संख्या 1,164,48 में एक पूरे वर्ष का विवरण इस प्रकार उल्लेखित है- ऋग्वेद में वर्ष को 12 चंद्र मासों में द्वादश प्रधयष्चक्रमेंक त्रीणि नम्यानी क उ तष्चिकेत। तस्मिन्त्सांक त्रिषता न षंकोवोडर्पिता शश्टिर्न चलाचलास। पूर्णमासी और अमावस्याओं के नाम और उनके फल बताए गए हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में 5 प्रकार की ऋतुओं का वर्णन है। तैत्तिरीय बा्रह्मण में ऋतृओं को पक्षी के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया गया है इसी तरह प्रश्न व्याकरण में 12 महिनों की तरह 12 तस्य ते वसन्त षिर ग्रिश्मों दक्षिण पक्ष वर्ष षरत पक्ष। हेमान्तो मघ्यम। अर्थात वर्ष का सिर वसंत है। दाहिना पंख ग्रीष्म, बायां पंख शरद । पूंछ वर्षा और हेमन्त को मघ्य भाग कहा गया है।

मसलन तैत्तिरिय ब्राह्मण काल में वर्ष और ऋतुओं की पहचान और उनके समय का निर्धारण प्रचलन में आ गया था। ऋतुओं की स्थिति सूर्य की गति पर आधारित थी। एक वर्ष में सौर मास की शुरुआत ,चंद्रमास के प्रारंभ से ही होता था। प्रथम वर्ष के सौर मास का आरंभ शुक्ल पक्ष की द्वादशी की तिथी के और आगे आने वाले तीसरे वर्ष में सौर मास का आरंभ कृष्ण पक्ष की अष्टमी से होता था। तैत्तिरीय ब्राह्मण में सूर्य के छह माह उत्तरायाण एवं छह माह दक्षिणायन में रहने की स्थिति का भी उल्लेख है। दरअसल जम्बू द्वीप के बीच में सुमेरू पर्वत है। सूर्य और चन्द्रमा समेत सभी ज्योतिष मण्डल इस पर्वत की परिक्रमा करते हे। सूर्य जब जम्बूद्वीप के अंतिम आभ्यातंर मार्ग से बाहर की और निकलता हुआ लवण समुद्र्र की ओर जाता है, तब इस काल को दक्षिणायन और जब सूर्य लवण समुद्र्र के अंतिम मार्ग से भ्रमण करता हुआ जम्बूद्वीप की और कूच करता है, तो इस कालखण्ड को उत्तरायण कहते है। ऋग्वेद में युग का कालखण्ड 5 वर्ष माना गया है। इस पांच साला युग के पहले वर्ष को संवत्सर, दूसरे को परिवत्सर, तीसरे को इदावत्सर, चैथे को अनुवत्सर और पांचवें वर्ष को इद्रवत्सर कहा गया है। इन सब उल्लेखों से प्रमाणित होता है कि ऋग्वैदिक काल से ही चंद्रमास और सौर वर्ष के आधार पर की गई कालगणना प्रचलन में आने लगी थी, जिसे जन सामान्य ने स्वीकार किया। चन्द्रकला की वृद्धि और उसके क्षय के निष्कर्षों को समय नापने का आधार माना गया। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के आधार पर उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने विक्रम संवत की विधिवत शुरुआत की। इस दैंनंदिन तिथी गणना को पंचांग कहा गया। किंतु जब स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अपना राष्ट्रीय संवत अपनाने की बात आई तो राष्ट्र भाषा की तरह सांमती मानसिकता के लोगों ने विक्रम संवत को राष्ट्रीय संवत की मान्यता देने में विवाद पैदा कर दिए। कहा गया कि भारतीय काल गणना उलझाऊ है। इसमें तिथियों और मासों का परिमाप घटता-बढ़ता है, इसलिए यह अवैज्ञानिक है। जबकि राष्ट्रीय न होते हुए भी सरकारी प्रचलन में जो ग्रेगेरियन कैलेंडर है, उसमें भी तिथियों का मान घटता-बढ़ता है। मास 30 और 31 दिन के होते है। इसके आलावा फरवरी माह कभी 28 तो कभी 29 दिन का होता है। तिथियों में संतुलन बिठाने के इस उपाय को लीपईयर यानी अधिवर्ष कहा जाता है। ऋग्वेद से लेकर विक्रम संवत तक की सभी भारतीय कालगणनाओं में इसे अधिकमास ही कहा गया है।

ग्रेगेरियन केलैंण्डर की रेखाकिंत कि जाने वाली महत्वपूर्ण विसंगति यह है कि दुनिया भर की कालगणनाओं में वर्ष का प्रारंभ वसंत के बीच या उसके आसपास होता है, जो फागुन और चैत्र मास की शुरुआत होती है। इसी समय नई फसल पक कर तैयार होती है, जो एक ऋतुचक्र की शुरुआत होने का संकेत है। इसलिए हिंदी मास या विक्रम संवत में चैत्र और वैशाख महीनों को मधुमास कहा गया है। इसी दौरान चैत्र शुक्ल प्रतिपदा यानी गुड़ी पड़वा से नया संवत्सर प्रारंभ होता है। जबकि ग्रेगेरियन में नए साल की शुरुआत पौश मास अर्थात जनवरी से होती है, जो किसी भी उल्लेखनीय परिर्वतन का प्रतीक नहीं है। इसलिए वह ऋग्वैदिक काल से ही जनसामान्य में प्रचलन में थी। बावजूद हमने शक संवत को राष्ट्रीय संवत के रूप में स्वीकारा, जो शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है। क्योंकि शक विदेशी होने के साथ आक्रांता थे। चंद्र्रगुप्त द्व्रितिय ने शकों को उज्जैन में परास्त कर विक्रम संवत की उपयोगिता ऋतुओं से जुड़ी थी, उनका उत्तरी एवं मघ्य भारत में समूल नाश कर दिया और विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। यह ऐतिहासिक घटना ईसा सन् से 57 साल पहले धटी और विक्रमादित्य ने विक्रम संवत की शुरुआत की। जबकि इन्हीं शकों की एक लड़ाकू टुकड़ी को कुशाण शासक कनिष्क ने मगध और पाटलीपुत्र में ईसा सन् के 78 साल बाद परास्त किया और शक संवत की शुरुआत की। विक्रमादित्य को इतिहास के पन्नों में षकारी भी कहा गया है, अर्थात शकों का नाश करने वाला शत्रु। शत्रुता तभी होती है जब किसी राष्ट्र की संप्रभुता और संस्कृति को क्षति पहुंचाने का कोई विदेशी काम करता है। इस सब के बावजूद राष्ट्रीयता के बहाने हमें ईसा संवत को त्यागना पड़ा तो विक्रम संवत की बजाए शक संवत को स्वीकार लिया। मसलन पंचांग यानी कैलेंडर की दुनिया में 57 साल आगे रहने की बजाय हमने 78 साल पीछे रहना उचित माना। अपनी गरिमा को पीछे धकेलना हमारी मानसिक गुलामी की विचित्र विडंबना है।

………….✍🏻हिन्दू समूह 🔱🚩

विकास खुराना

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દૂર્દશા..

માર્ચ માસથી શહેરોના હોર્ડિંગ્સ ઉપર
“ખાનગી શાળા”ની જાહેરાતોની વસંત ખીલશે.

”હનીમૂન” અને “હનુમાન” શબ્દ વચ્ચેનો ભેદ ન પારખી શકનારા સંચાલકો
જાહેરખબરો માટે નાણાં કોથળી છૂટી મૂકી દેશે.

પ્રોફેશનલ્સ કેમેરામેન્સ પાસે સ્ટુડિયોમાં બાળકોને ગોઠવી ‘નાઈસ નાઈસ ઈમેજીસ’ બનાવી છટકાં ગોઠવશે.

જાહેરાતમાં બધું જ લખશે, સિવાય કે
“ફીની વિગત”.

મગજને લીલુંછમ કરી,
હ્રદયને ઉજ્જડ બનાવી દેતી કેટલીક સ્કૂલો છે !

વેદના તો જુઓ,
બાળકની છાતીએ આઈકાર્ડ લટકે છે પણ તેની પોતાની
“ઓળખ” ગુમાવી ચૂક્યો છે.
તે સ્ટુડન્ટ નથી રહ્યો,
રનર બની ગયો છે, રનર.
“લીટલ યુસેન બોલ્ટ” ઓફ એજ્યુકેશન સિસ્ટમ્સ.

15 કી.મી.નું અપડાઉન કરીને થાકી જતાં વડીલો
બાળકને ઘરથી 20 કી.મી. દૂરની શાળામાં ભણવા મોકલે છે !

[મને મિત્રો પૂછતા કે..
પોતાનો રાચરચિલા વાળો ફ્લેટ છોડી, ચિલોડા ભાડે રહેવા ગયા ?, જવાબ : મારી પૌત્રી અડાલજની સ્કુલમાં ભણે છે, તે માટે.]

ઓલા પાંડવોને મૂર્છીત કરી દેનાર યક્ષને કહો કે
‘આને પૃથ્વી પરનું સૌથી મોટું આશ્ચર્ય કહેવાય !’

વળી, પેલા જાહેરાતના બોર્ડ પર પણ ક્યાં લખે છે કે
‘દફતરનું વજન કેટલાં કિલો હશે’ ??

ગુજરાતનો એક સર્વે કહે છે કે,
શહેરમાં છેલ્લાં ૧૦ વર્ષમાં
પ્રતિ બાળક ભણાવવાના ખર્ચમાં ૧૫૦% નો વધારો થયો છે.

દેશના મધ્યમ વર્ગમાં

“નસબંધી” કરતાં “શિક્ષણખર્ચ”નાં કારણે
વસ્તી વધારાનો દર ઘટ્યો છે !!!

ગુજરાતની કહેવાતી ઈન્ટરનેશનલ શાળામાં
‘રિબોક’ના ‘શૂઝ’ ‘કમ્પલસરી’ છે.
કિંમત માત્ર 3500 રૂ. (આપણી સરકારી શાળાઓમાં દાતાશ્રીએ બાળકોને ચંપલો આપ્યાના ન્યૂઝ ન્યુઝપેપર્સમાં આવે છે !)

નાસ્તામાં રોજ શું લાવવું તેનું ‘મેન્યુુ’ શાળા નક્કી કરે છે.
અઠવાડિયાના અમુક દિવસ માટે
જુદાં-જુદાં રંગ/ડીઝાઈનના યુનિફોર્મ નક્કી કર્યા છે.

વિદ્યાર્થીઓની પરીક્ષા લઈને જ એડમિશન આપવામાં આવે છે.
(‘ઈન શોર્ટ’ એટલું જ કે “આર્થિક રીતે નબળા” અને
“માનસિક રીતે નબળા” માટે આ શાળાઓ નથી.)

ખાનગી શાળામાં ભણતા બાળકોની માતાશ્રીઓ બાળકને મળતા હોમવર્કના “પ્રમાણમાપને આધારે”

“આજે રસોઈમાં ફલાણી વસ્તુ જ બનશે” એમ જાહેર કરે છે.
લેશન વધારે હોય તો
“એક ડીશ બટાકાપૌંઆ” અને લેશન ઓછું હોય તો
“દાળ-ભાત, શાક, રોટલી અનલિમિટેડ” મળે છે !!

આખા ઘરના સંચાલનનું કેંદ્રબિંદુ સ્કૂલ બની ગઈ છે.

એ દિવસ પણ દૂર નથી કે
પ્રાથમિક શિક્ષણની ફી ભરવા માટે
વાલીઓએ પ્રો.ફંડ ઉપાડવા પડશે.
હાલ માત્ર ઉચ્ચ શિક્ષણ માટે લોન આપતી બેંકો
પ્રાથમિક શિક્ષણ માટેની ફી ભરવાય લોનો આપશે.

પેલી જાહેરાતોમાં પાછું લખશે કે
અમારે ફલાણી-ઢીંકણી બેંક સાથે ટાઈ-અપ છે,
લોન પેપર ઉપલબ્ધ છે.
બાળકના દફતર પર લખેલું જોવા મળશે
“ ‘ફલાણી’બેંકના સહયોગથી”..

બીજી એક ખોડ છે, તેઓની શિક્ષણ પધ્ધતિ.
એક “છત્રપતિ શિવાજી” નો પાઠ હોય અને બીજો “અમેરિકા ખંડ” નામનો પાઠ હોય.
જે પાઠમાંથી પરીક્ષામાં વધારે ગુણનું પૂછાવાનું હોય તેના આધારે જે-તે પાઠને મહત્ત્વ આપવામાં આવે છે.
“છત્રપતિ શિવાજી”ના કોઈ ગુણ બાળકમાં ન આવે તો ચાલશે,
વાર્ષિક પરીક્ષામાં ગુણ આવવા જોઈએ. 😩😭

ચાલો,
છેલ્લે છેલ્લે
‘ઈન્ટરનેશનલ લેવલ’એ આપણી શિક્ષણની ગરીબાઈ પણ જોઈ લઈએ.

પાંચ-છ આંકડામાં ફી લઈને ઉચ્ચ ક્વોલિટીના શિક્ષણની વાતો કરનાર
ભારતની એક પણ સ્કૂલ આંતરરાષ્ટ્રીય કક્ષાએ પ્રથમ 500માં પણ નથી.

માત્ર 13/14 વર્ષની કાચી ઉંમરે આત્મહત્યા કરતા બાળકો
સમાજને દેખાય છે ?
આ આત્મહત્યા પાછળની તેની વેદના સમજાય છે ?

મારી વાત સાથે કોઈ સંમત થાય કે ન થાય એ અલગ વાત છે પણ હું
“પ્રામાણિક અભણ મજૂર” અને
“અપ્રામાણિક સાક્ષર અધિકારી”
માંથી પ્રથમ વિકલ્પને પસંદ કરીશ.

જો નજરમાં દમ હશે તો થાંભલા અને પેન્સિલ વચ્ચેનો આ તફાવત સમજાઈ જશે.

આ કોઈ નકારાત્મકતા નથી.

ઘણી સારી શાળાઓ છે જ.

આ તો એવી શાળાઓની વાત હતી જે
સરસ્વતી માતાની છબી ઓથે “વ્યાપાર” કરે છે !!!

[તેના શિક્ષકોની લાયકાત તથા ચૂકવતા પગારની તો હજુ વાત બાકી છે .. !!]

🙏🙏🙏

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वामन अवतार और राजाबलि के दान की कथा। कथा विस्तार से है मेरा निवेदन है कि कथा पूरी पढ़े। इस महादानी की कथा पढ़ने के बाद आपकी आँखे नम हो जायेगी।

विष्णु ने अदिति व कश्यप के यहाँ बौने शिशु के रूप में जन्म धारण करके दशावतारों में से पांचवाँ वामनावतार लिया।

वामन ने उपनयन के बाद वैदिक विद्याएँ समाप्त कर लीं और इन्द्र के छोटे भाई तथा अदिति के प्यारे पुत्र के रूप में पलने लगे।

उस समय बलि चक्रवर्ती नर्मदा नदी के तट पर शुक्राचार्य के नेतृत्व में विश्वजित यज्ञ प्रारंभ करके अपार दान दे रहा था।

वामन ने जनेऊ, हिरण का चर्म व कमण्डलु धारण किया, छाता हाथ में लेकर खड़ाऊँ पहन लिया और मूर्तिभूत ब्रह्म तेज के साथ बलि चक्रवर्ती के पास चल पड़े। छोटे-छोटे डग भरनेवाले वामन को देख यज्ञशाला में एकत्रित सभी लोग प्रसन्न हो उठे। वामन ने बलि चक्रवर्ती के समीप जाकर जय-जयकार किया।

वामन को देखते ही बलि के मन में अपूर्व आनंद हुआ। उसने पूछा- ‘‘अरे मुन्ने ! तुम तो अभी शिशु के अवतार में ही हो, तुम कौन हो? एक नये ब्रह्मचारी के रूप में कहाँ चल पड़े?

‘‘मैं तुम से ही मिलने आया हूँ। मैं अपना परिचय क्या दूँ? सब लोग मेरे ही हैं, फिर भी इस वक्त मैं अकेला हूँ। वैसे मैं संपदा रखता हूँ, पर इस समय एक याचक हूँ। तुम्हारे दादा, परदादा महान वीर थे। तुम्हारे शौर्य और पराक्रम दिगंत तक व्याप्त हैं।

वामन ने कहा। इस पर बलि चक्रवर्ती हँसते हुए बोला- ‘‘आप की बातें तो कुछ विचित्र मालूम होती हैं। आप शौर्य और पराक्रम की चर्चा कर रहे हैं। युद्ध करने की प्रेरणा तो नहीं देंगे न? क्योंकि इस वक्त मैं यज्ञ की दीक्षा लेकर बैठा हूँ।

इस पर वामन बोले-‘‘वाह, आपने कैसी बात कही? महान बल-पराक्रमी बने आप के सामने बौना बने हुए मेरी गिनती ही क्या है? आपका यश सुनकर याचना करने आया हूँ।

‘‘अच्छी बात है, मांग लीजिए, आप जो भी मांगे, वही देने का वचन देता हूँ। बलि चक्रवर्ती ने कहा।

इस पर शुक्राचार्य ने बलि को बुलाकर समझाया, ‘‘ये वामन साक्षात् विष्णु हैं, तुम्हें धोखा देकर तुम्हारा सर्वस्व लूटने के लिए आये हुए हैं! तुम उन्हें किसी प्रकार का दान मत दो।

बलि चक्रवर्ती ने कहा, ‘‘विष्णु जैसे महान व्यक्ति मेरे सामने याचक बनकर हाथ फैलाते हैं, तो मेरे हाथों द्वारा कोई दान देना मेरे लिए भाग्य की ही बात मानी जाएगी, यह मेरी अद्भुत विजय का परिचायक भी होगा। इसके अतिरिक्त वचन देकर उस से विमुख हो जाना भी उचित नहीं है। मेरा वचन झूठा साबित होगा न?

‘‘आत्मरक्षा के वास्ते किया जाने वाला कर्म असत्य नहीं कहलाता, पर अनुचित धर्म भी आत्महत्या के सदृश्य ही माना जाएगा न? शुक्राचार्य ने कहा।

‘‘चाहे जो हो, वे चाहे मेरे साथ कुछ भी करें, या मैं हार भी जाऊँ; फिर भी वह मेरी पराजय नहीं मानी जाएगी। यह धर्मवीरता ही होगी! वैसे शिवि चक्रवर्ती आदि जैसे दान करके यश पाने की कामना भी मेरे अन्दर नहीं है, परन्तु वचन देकर इसके बाद उससे मुकर कर कायर कहलाना मैं नहीं चाहता। बलि चक्रवर्ती ने कहा।

इस पर शुक्रचार्य क्रोध में आ गये और शाप देने के स्वर में बोले, ‘‘तुम्हारे गुरु के नाते मैं ने तुम्हारे हित केलिए जो बातें कहीं, उन्हें तुम धिक्कार रहे हो। याद रखो, तुम अपने राज्य तथा सर्वस्व से हाथ धो बैठोगे!

बलि चक्रवर्ती ने विनयपूर्वक कहा, ‘‘गुरु देव, आप नाहक अपयश के शिकार हो गए। मैं सब प्रकार के सुख-दुखों को समान रूप से स्वीकार करते हुए दान देने के लिए तैयार हो गया हूँ, पर आप का यह शाप विष्णु के लिए वरदान ही साबित हुआ, क्योंकि गुरु के वचन का धिक्कार करने के उपलक्ष्य में प्राप्त शाप को विष्णु केवल अमल करने वाले हैं; पर अन्यायपूर्वक उन्होंने बलि के साथ दगा किया है, इस अपयश से वे दूर हो गये। मैं आपके शाप को स्वीकार करता हूँ।

शुक्राचार्य का चेहरा सफेद हो उठा। उन्होंने लज्जा के मारे सर झुका लिया। वे निरुत्तर हो गये।

इस के बाद बलि वामन के पास जाने लगे, तब शुक्राचार्य ने कहा, ‘‘हे दानव राज, ‘‘यह विनाश केवल तुम्हारे लिए ही नहीं, बल्कि समस्त दानव वंश का है और हम सब के लिए अपमान की बात है। शुक्राचार्य ने चेतावनी दी।

‘‘यही नहीं, बल्कि एक दानव ने न्यायपूर्ण शासन किया है। धर्म का पालन किया है और विष्णु को भिक्षा दी है, इस प्रकार समस्त दानव वंश के लिए यश का भी तो कारण बन सकता है? बलि यों कह कर वामन के पास पहुँचे।

इसके बाद बलि चक्रवर्ती की पत्नी विंध्यावली स्वर्ण कलश में जल ले आई, स्वर्ण थाल में वामन के चरण धोये। उस जल को बलि ने अपने सर पर छिड़क लिया, तब बोले- ‘‘हे वामन रूपधारी, आप जैसे महान व्यक्ति का मेरे पास दान के लिए पहुँचना मेरे पूर्व जन्म के पुण्यों का फल है। आप जो कुछ चाहते हैं, मांग लीजिए। रत्न, स्वर्ण, महल, सुंदरियाँ, शस्य क्षेत्र, साम्राज्य – सर्वस्व यहाँ तक कि मेरा शरीर भी आप के वास्ते प्रस्तुत है ।

‘‘महाबलि, तुमने जो कुछ देना चाहा, उन को लेकर मैं क्या करूँगा? मैं तो हिरण का चर्म बिछाये ब्रह्म निष्ठा करना चाहता हूँ। इस वास्ते मेरे लिए तीन कदम की जगह पर्याप्त है। ये तीन क़दम तुम्हारे दिगंतों तक फैले साम्राज्य में अत्यंत अल्प मात्र हैं, फिर भी मेरे लिए यह तीनों लोकों के बराबर है। वामन ने कहा।

‘‘वे तीन क़दम ही ले लो। यों कह कर बलि ने अपने जल कलश के जल लुढ़काकर दान करना चाहा, पर उस में से जल न निकला। शुक्राचार्य ने सूक्ष्म रूप में जल कलश की सूंड में छिपे रहकर जल को गिरने से रोक रखा था।

इस पर वामन ने दाभ का तिनका निकाल कर जल कलश की सूंड में घुसेड़ दिया। शुक्राचार्य अपनी एक आँख खोकर काना बन गया। इस पर वह हट गया, तब जलधारा बलि चक्रवर्ती के हाथों से निकल कर वामन की अंजुलि में गिर गई। दान-विधि के समाप्त होते ही बलि चक्रवर्ती ने कहा, ‘‘अब आप द्वारा अपने चरणों से माप कर तीन क़दम जमीन प्राप्त करना ही शेष रह गया है।

वामन ने झट इधर-उधर घूम कर विर्श्वरूप धारण किया, लंबे, चौड़े एवं ऊँचाई के साथ नीचे, मध्य व ऊपर – माने जाने वाले तीनों लोकों पर व्याप्त हो गये। एक डग से उन्होंने सारी पृथ्वी को माप लिया, त्रिविक्रम विष्णु के चरण की छाया में सारे भूतल पर पल भर केलिए गहन अंधकार छा गया।

इसके बाद आकाश को माप लिया, उस वक्त सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र मण्डल आदि उनके चरण से चिपके हुए रेणुओं की भांति दिखाई दिये। तब ब्रह्मा ने अपने कमण्डलु के जल से विष्णु के चरणों का अभिषेक किया। विष्णु के चरण से फिसलने वाला जल आकाश गंगा का रूप धर कर स्वर्ग में मंदाकिनी के रूप में प्रवाहित हुआ।

वामनरूपी त्रिविक्रम ने बलि से पूछा-‘‘हे बलि चक्रवर्ती, बताओ, मैं तीसरा कदम कहाँ रखूँ?

‘‘हे त्रिविक्रम, लीजिए यह मेरा सिर! इसपर अपना चरण रखिये। यों कह कर बलि चक्रवर्ती ने अपना सर झुका लिया!

इस पर विष्णु ने अपने विश्वरूप को वापस ले लिया, फिर से वामन बनकर बलि के सर पर चरण रख कर बोले, ‘‘बलि, पृथ्वी तथा आकाश को पूर्ण रूप से मापनेवाला यह मेरा चरण तुम्हारे सर को पूर्ण रूप से माप नहीं पा रहा है!

उस समय प्रह्लाद ने वहाँ पर प्रवेश कर कहा, ‘‘भगवन, मेरा पोता आपका शत्रु नहीं है, उस पर अनुग्रह कीजिये!

बलि चक्रवर्ती की पत्नी विंध्यावली ने कहा, ‘‘वामनवर, मेरे पति का किसी भी प्रकार से अहित न हो। ऐसा अनुग्रह कीजिये ।

‘‘बहन, आप के पति केलिए हानि पहुँचाना किसी के लिए भी संभव नहीं है। इसलिए तो मैं ने याचक बनकर उन से दान लिया है। इनका धार्मिक बल ही कुछ ऐसा है।

यों समझाकर वामन प्रह्लाद की ओर मुड़कर बोले, ‘‘जानते हो, बलि मेरे लिए कितने प्रिय व्यक्ति हैं? यह कहते वामन विष्णु की संपूर्ण कलाओं के साथ शोभित हो लंबे वेत्र दण्ड समेत दिखाई दिये।

‘‘हे बलि चक्रवर्ती, तुम्हारी समता करनेवाला आज तक कोई न हुआ और न होगा। आदर्शपूर्ण शासन करनेवाले चक्रवर्तियों में तुम्हारा ही नाम प्रथम होगा! मैं तुम्हें सुतल में भेज रहा हूँ। पाताल लोकों के अधिपति बन कर शांति एवं सुख के साथ चिरंजीवी बनकर रहोगे।

तुम्हारी पत्नी तथा तुम्हारा दादा प्रह्लाद भी तुम्हारे साथ होंगे। मैं तुम्हारे सुतल द्वार का इसी प्रकार दण्डपाणि बनकर तुम्हारा रक्षक रहूँगा। यों कह कर वामनावतार विष्णु अंतर्धान हो गये।

Sanjay Gupta

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सम्राट जिनका इतिहस में नहीं होता जिक्र
राजा इंद्र- माना जाता है कि इंद्र किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं, बल्कि यह एक पद का नाम है। हम जिस इन्द्र की बात कर रहे हैं वह अदिति पुत्र और शचि के पति देवराज हैं। उनसे पहले पांच इन्द्र और हो चुके हैं। इन इन्द्र को सुरेश, सुरेन्द्र, देवेन्द्र, देवेश, शचीपति, वासव, सुरपति, शक्र, पुरंदर भी कहा जाता है। क्रमश: 14 इन्द्र हो चुके हैं:- यज्न, विपस्चित, शीबि, विधु, मनोजव, पुरंदर, बाली, अद्भुत, शांति, विश, रितुधाम, देवास्पति और सुचि।

उपरोक्त में से शचिपति इन्द्र पुरंदर के पूर्व पांच इन्द्र हो चुके हैं। ऋग्वेद के चौथे मंडल के 18वें सूक्त से इन्द्र के जन्म और जीवन का पता चलता है। उनकी माता का नाम अदिति था। इन्द्र का विवाह असुरराज पुलोमा की पुत्री शचि के साथ हुआ था। इन्द्र की पत्नी बनने के बाद उन्हें इन्द्राणी कहा जाने लगा। इन्द्राणी के पुत्रों के नाम भी वेदों में मिलते हैं। उनमें से ही दो वसुक्त तथा वृषा ऋषि हुए जिन्होंने वैदिक मंत्रों की रचना की।

महाबली :- असुरों के राजा बलि या बाली की चर्चा पुराणों में बहुत होती है। इंद्र के बाद भारतीय और हिन्दू इतिहास में राजा बलि की कहानी सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। कश्यप ऋषि की पत्नी दिति के दो प्रमुख पुत्र हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष थे। हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद। प्रह्लाद के कुल में विरोचन के पुत्र राजा बलि का जन्म हुआ।

राजा बलि का राज्य संपूर्ण दक्षिण भारत में था। उन्होंने महाबलीपुरम को अपनी राजधानी बनाया था। आज भी केरल में ओणम का पर्व राजा बलि की याद में ही मनाया जाता है। राजा बली को केरल में ‘मावेली’ कहा जाता है। यह संस्कृत शब्द ‘महाबली’ का तद्भव रूप है। इसे कालांतर में ‘बलि’ लिखा गया जिसकी वर्तनी सही नहीं जान पड़ती।

उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध पौराणिक पात्र वृत्र (प्रथम मेघ) के वंशज हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद था। प्रह्लाद के पुत्र विरोचन का पुत्र महाबली था। इंद्र और बलि का युद्ध कई बार हुआ। बलि या महाबली ने समुद्र मंथन के दौराद देवताओं का साथ दिया था। उन्होंने ही भगवान वामन को तीन पग धरती दान में दे दी थी।

राजा स्वायंभुव मनु :
स्वायंभुव मनु को आदि भी कहा जाता है। इन्हें धरती का पहला मानव कहा गया है। जब हम पृथ्वी का पहला मानव कहते हैं तो इसका यह मतलब है कि हमें उस काल में पृथ्वी के विभाजन को समझना होगा। संपूर्ण धरती के एक हिस्से को पृथ्वी कहा जाता था, बाकि में पाताल लोक, स्वर्ग लोक, देवलोक आदि जैसे हिस्से थे। उस काल में मानव जैसे दिखने वाले सभी मानवों को मानव नहीं कहा जाता था। उस काल में वानर, किन्नर, देव, दैत्य, दानव, राक्षस आदि मानव प्राजातियां थी। यह प्राचीनकाल के विभाजन थे। इस पर शोध किए जाने की आवश्यकता है।

हिंदू धर्म में स्वायंभुव मनु के ही कुल में आगे चलकर स्वायंभुव सहित क्रमश: 7 मनु हुए और 7 होना बाकी है। महाभारत में 8 मनुओं का उल्लेख मिलता है। श्वेतवराह कल्प में 14 मनुओं का उल्लेख है। स्वायंभुव मनु एवं शतरूपा के कुल पांच सन्तानें थीं जिनमें से दो पुत्र प्रियव्रत एवं उत्तानपाद तथा तीन कन्याएं आकूति, देवहूति और प्रसूति थे। स्वायंभुव मनु के दो पुत्र- प्रियव्रत और उत्तानपाद। उत्तानपाद की सुनीति और सुरुचि नामक दो पत्नी थीं। राजा उत्तानपाद के सुनीति से ध्रुव तथा सुरुचि से उत्तम नामक पुत्र उत्पन्न हुए। स्वायंभुव मनु के दूसरे पुत्र प्रियव्रत ने विश्वकर्मा की पुत्री बहिर्ष्मती से विवाह किया था जिनसे आग्नीध्र, यज्ञबाहु, मेधातिथि आदि दस पुत्र उत्पन्न हुए। प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से उत्तम तामस और रैवत- ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए जो अपने नामवाले मनवंतरों के अधिपति हुए।

महाराज प्रियव्रत के दस पुत्रों में से कवि, महावीर तथा सवन ये तीन नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे और उन्होंने संन्यास धर्म ग्रहण किया था। राजा प्रियव्रत के ज्येष्ठ पुत्र आग्नीध्र जम्बूद्वीप के अधिपति हुए। अग्नीघ्र के नौ पुत्र जम्बूद्वीप के नौ खण्डों के स्वामी माने गए हैं, जिनके नाम उन्हीं के नामों के अनुसार इलावृत वर्ष, भद्राश्व वर्ष, केतुमाल वर्ष, कुरु वर्ष, हिरण्यमय वर्ष, रम्यक वर्ष, हरि वर्ष, किंपुरुष वर्ष और हिमालय से लेकर समुद्र के भूभाग को नाभि खंड कहते हैं। नाभि और कुरु ये दोनों वर्ष धनुष की आकृति वाले बताए गए हैं। नाभि के पुत्र ऋषभ हुए और ऋषभ से ‘भरत’ का जन्म हुआ। भरत के नाम पर ही बाद में इस नाभि खंड को भारतवर्ष कहा जाने लगा।

वैवस्वत मनु
वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध। वैवस्वत मनु के काल में ही जलप्रलय हुआ था और मत्स्य अवतार ने उन्हें इस प्रलय से बचाया था। कई माह तक वैवस्वत मनु (इन्हें श्रद्धादेव भी कहा जाता है) द्वारा नाव में ही गुजारने के बाद उनकी नाव गोरी-शंकर के शिखर से होते हुए नीचे उतरी। जहां उतरी वह भूमि त्रिविष्टप (तिब्बत) थी। वहीं से बाद में उनके कुल के लोग दुनियभर में फैल गए। महाभारत के महाप्रस्थानिक पर्व में स्वर्गारोहण में स्पष्ट किया गया है कि तिब्बत हिमालय के उस राज्य को पुकारा जाता था जिसमें नंदनकानन नामक देवराज इंद्र का देश था।

चक्रवर्ती ययाति
ययाति के 5 पुत्रों से अखंड भारत की जातियां बनीं। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार पुरुवस को ऐल भी कहा जाता था। पुरुवस का विवाह उर्वशी से हुआ जिससे उसको आयु, वनायु, शतायु, दृढ़ायु, घीमंत और अमावसु नामक पुत्र प्राप्त हुए। अमावसु एवं वसु विशेष थे। अमावसु ने कान्यकुब्ज नामक नगर की नींव डाली और वहां का राजा बना। आयु का विवाह स्वरभानु की पुत्री प्रभा से हुआ जिनसे उसके 5 पुत्र हुए- नहुष, क्षत्रवृत (वृदशर्मा), राजभ (गय), रजि, अनेना। प्रथम नहुष का विवाह विरजा से हुआ जिससे अनेक पुत्र हुए जिसमें ययाति, संयाति, अयाति, अयति और ध्रुव प्रमुख थे। इन पुत्रों में यति और ययाति प्रीय थे।

ययाति की 2 पत्नियां देवयानी और शर्मिष्ठा थीं। देवयानी गुरु शुक्राचार्य की पुत्री थी, तो शर्मिष्ठा दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री थीं। पहली पत्नी देवयानी के यदु और तुर्वसु नामक 2 पुत्र हुए और दूसरी शर्मिष्ठा से द्रुहु, पुरु तथा अनु हुए। ययाति की कुछ बेटियां भी थीं जिनमें से एक का नाम माधवी था। माधवी की कथा बहुत ही व्यथापूर्ण है।

चक्रवर्ती ययाति

ययाति के प्रमुख 5 पुत्र थे- 1.पुरु, 2.यदु, 3.तुर्वस, 4.अनु और 5.द्रुहु। इन्हें वेदों में पंचनंद कहा गया है। 7,200 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9,200 वर्ष पूर्व ययाति के इन पांचों पुत्रों का संपूर्ण धरती पर राज था। पांचों पुत्रों ने अपने- अपने नाम से राजवंशों की स्थापना की। यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रुहु से भोज, अनु से मलेच्छ और पुरु से पौरव वंश की स्थापना हुए।

चक्रवर्ती भारत
महाराज प्रियव्रत के पुत्र अग्नीन्ध्र और उनके पुत्र नाभि थे। नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम ऋषभ था। इसी ऋषभ के पुत्र बाहुबली और भरत थे तथा इन्हीं भरत के नाम पर इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा। भरत एक प्रतापी राजा एवं महान भक्त थे। श्रीमद्भागवत के पञ्चम स्कंध एवं जैन ग्रंथों में उनके जीवन एवं अन्य जन्मों का वर्णन आता है। महाभारत के अनुसार भरत का साम्राज्य संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में व्याप्त था।

चक्रवर्ती भारत

राजा भरत को अपनी आयुधशाला में से एक दिव्य चक्र प्राप्त हुआ। चक्र रत्न मिलने के बाद उन्होंने अपना दिग्विजय अभियान शुरू किया। दिव्य चक्र आगे चलता था। उसके पीछे दंड चक्र, दंड के पीछे पदाति सेना, पदाति सेना के पीछे अश्व सेना, अश्व सेना के पीछे रथ सेना और हाथियों पर सवार सैनिक आदि चलते थे। जहां-जहां चक्र जाता था, वहां- वहां के राजा या अधिपति सम्राट भरत की अधीनता स्वीकार कर लेते थे।

चक्रवर्ती युधिष्ठिर
पांच पांडवों में युधिष्ठिर सबसे बड़े थे। महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद युधिष्ठिर राजसिंहसन पर बैठे थे और उन्होंने कई वर्षों तक राज किया। द्रौपदी के अलावा युधिष्ठिर की दूसरी पत्नी देविका थी। देविका से धौधेय नाम का पुत्र जन्मा। द्रौपदी से जन्मे युधिष्ठिर के पुत्र का नाम प्रतिविन्ध्य था।

चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य भी चक्रवर्ती सम्राट थे। विक्रमादित्य का नाम विक्रम सेन था। विक्रम वेताल और सिंहासन बत्तीसी की कहानियां महान सम्राट विक्रमादित्य से ही जुड़ी हुई है। विक्रम संवत अनुसार विक्रमादित्य आज से 2290 वर्ष पूर्व हुए थे। नाबोवाहन के पुत्र राजा गंधर्वसेन उनके पिता थे। उनके पिता को महेंद्रादित्य भी कहते थे। गंधर्वसेन के पुत्र विक्रमादित्य और भर्तृहरी थे। विक्रम की माता का नाम सौम्यदर्शना था जिन्हें वीरमती और मदनरेखा भी कहते थे। उनकी एक बहन थी जिसे मैनावती कहते थे। उनके भाई भर्तृहरि के अलाका शंख और अन्य भी थे।

विक्रमादित्य की पांच पत्नियां थी, मलयावती, मदनलेखा, पद्मिनी, चेल्ल और चिल्लमहादेवी। उनकी दो पुत्र विक्रमचरित और विनयपाल और दो पुत्रियां प्रियंगुमंजरी (विद्योत्तमा) और वसुंधरा थीं।

चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य

कलि काल के 3000 वर्ष बीत जाने पर 101 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य का जन्म हुआ। उन्होंने 100 वर्ष तक राज किया। -(गीता प्रेस, गोरखपुर भविष्यपुराण, पृष्ठ 245)। विक्रमादित्य भारत की प्राचीन नगरी उज्जयिनी के राजसिंहासन पर बैठे। विक्रमादित्य अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे जिनके दरबार में नवरत्न रहते थे। कहा जाता है कि विक्रमादित्य बड़े पराक्रमी थे और उन्होंने शकों को परास्त किया था।

सम्राट पुष्यमित्र शुंग
लगभग 185 ई.पू. को पुष्यमित्र शुंग का शासन रहा। यह मौर्य वंश को पराजित करने वाला तथा शुंग वंश का प्रवर्तक था। मौर्य वंश का नौवां सम्राट वृहद्रथ मगध की गद्दी पर बैठा। उसके शासन काल में अराजकता थी और विदेशियों ने आक्रमण शुरु कर दिया था। जब उत्तर भारत के मगथ में नौवां बौद्ध शासक वृहद्रथ राज कर रहा था, तब ग्रीक राजा मीनेंडर अपने सहयोगी डेमेट्रियस (दिमित्र) के साथ युद्ध करता हुआ सिंधु नदी के पास तक पहुंच चुका था। वृहद्रथ इस समस्या को लेकर गंभीर नहीं था।

इतिहासकारों अनुसार सेनापति पुष्यमित्र शुंग वृहद्रथ की हत्या कर खुद के हाथ में सत्ता ले ली थी। इस दौरान सीमा पर मीनेंडर ने आक्रमण कर दिया। फिर पुष्यमित्र ने अपनी सेना का गठन किया और भारत के मध्य तक चढ़ आए मीनेंडर पर आक्रमण कर दिया। भारतीय सैनिकों के सामने ग्रीक सैनिकों की एक न चली। अंतत: पुष्यपमित्र शुंग की सेना ने ग्रीक सेना का पीछा करते हुए उसे सिन्धु पार धकेल दिया।

कुछ बौद्ध ग्रंथों में लिखा है कि पुष्यमित्र ने बौद्धों को सताया था, लेकिन क्या यह पूरा सत्य है? नहीं, पुष्यमित्र एक कट्टर राष्ट्रभक्त जरूर था लेकिन वह भिक्षुओं का सम्मान करता था। कहते हैं कि सम्राट ने उन राष्ट्रद्रोही बौद्धों को सजा दी, जो उस समय ग्रीक शासकों का साथ दे रहे थे। मीनेंडर पंजाब पर राज्य करने वाले यवन राजाओं में सबसे उल्लेखनीय राजा था। उसने अपनी सीमा का स्वात घाटी से मथुरा तक विस्तार कर लिया था। अब वह पाटलीपुत्र पर भी आक्रमण करना चाहता था। इतिहासकारों अनुसार पुष्यमित्र का शासनकाल चुनौतियों से भरा हुआ था। उस समय भारत पर कई विदेशी आक्रांताओं ने आक्रमण किए, जिनका सामना पुष्यमित्र शुंग को करना पड़ा। पुष्यमित्र चारों तरफ से बौद्ध, शाक्यों आदि सम्राटों से घिरा हुआ था। फिर भी राजा बन जाने पर मगध साम्राज्य को बहुत बल मिला। पुराणों के अनुसार पुष्यमित्र ने 36 वर्ष (185-149 ई.पू.) तक राज्य किया।

मिहिरकुल
मिहिरकुल (515 – 540) : तोरमाण का पुत्र मिहिरगुल लगभग 515 ई. में गद्दी पर बैठा था। उसकी राजधानी पंजाब में ‘साकल’ अथवा ‘सियालकोट’ थी। कल्हण ने बारहवीं शताब्दी में राजतरंगिणी नामक ग्रन्थ में कश्मीर का इतिहास लिखा हैं। उन्होंने मिहिरकुल का एक शक्तिशाली विजेता के रूप में चित्रण किया हैं। वे कहते हैं कि मिहिरकुल काल का दूसरा नाम था। कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ने हिमालय से लेकर लंका तक के संपूर्ण क्षेत्र पर अपना शासन स्थापित कर दिया था। उसने कश्मीर में मिहिरपुर नामक नगर बसाया था। कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ने कश्मीर में श्रीनगर के पास मिहिरेशवर नामक भव्य शिव मंदिर बनवाया था।

मिहिकुल हूण एक कट्टर शैव था। उसने अपने शासनकाल में हजारों शिव मंदिर बनवाए। उसने संपूर्ण भारतवर्ष में अपने विजय अभियान चलाए और शक और शाक्यों के लिए आतंक का पर्याय बन गया था, वहीं विक्रमादित्य और अशोक के बाद मिहिरकुल ही ऐसा शासन था जिसके अधीन संपूर्ण अखंड भारत आ गया था।

संजय गुप्ता