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BHAGWAD GITA


BHAGWAD GITA

in one sentence

per chapter…

 

 

Chapter 1

 

Wrong thinking is the only problem in life

 

Chapter 2

 

Right knowledge is the ultimate solution to all our problems

 

Chapter 3

 

Selflessness is the only way to progress & prosperity

 

Chapter 4

 

Every act can be an act of prayer

 

Chapter 5

 

Renounce the ego of individuality & rejoice in the bliss of infinity

 

Chapter 6

 

Connect to the Higher consciousness daily

 

Chapter 7

 

Live what you learn

 

Chapter 8

 

Never give up on yourself

 

Chapter 9

 

Value your blessings

 

Chapter 10

 

See divinity all around

 

Chapter 11

 

Have enough surrender to see the Truth as it is

 

Chapter 12

 

Absorb your mind in the Higher

 

Chapter 13

 

Detach from Maya & attach to Divine

 

Chapter 14

 

Live a lifestyle that matches your vision

 

Chapter 15

 

Give priority to Divinity

 

Chapter 16

 

Being good is a reward in itself

 

Chapter 17

 

Choosing the right over the pleasant is a sign of power

 

Chapter 18

 

Let Go, Lets move to union with God.

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मजारों पर जाकर माथा रगड़ने वाले सनातनी ध्यान दें.


मजारों पर जाकर माथा रगड़ने वाले सनातनी ध्यान दें.
‘यान्ति देवव्रता देवान् पितृन्यान्ति पितृव्रताः भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपिमाम्”
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भूत प्रेत, मूर्दा (खुला या दफ़नाया हुआ अर्थात् कब्र) को सकामभाव से पूजने वाले स्वयं मरने के बाद भूत-प्रेत ही बनते हैं.
इस लिए मजारों पर कब्रों पर जाकर माथा रगड़ने से पहले यह सोच लें.

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उद्धव-गीता


*”उद्धव-गीता”*
उद्धव बचपन से ही सारथी के रूप में श्रीकृष्ण की सेवा में रहे, किन्तु उन्होंने श्री कृष्ण से कभी न तो कोई इच्छा जताई और न ही कोई वरदान माँगा।

जब कृष्ण अपने *अवतार काल* को पूर्ण कर *गौलोक* जाने को तत्पर हुए, तब उन्होंने उद्धव को अपने पास बुलाया और कहा-

“प्रिय उद्धव मेरे इस ‘अवतार काल’ में अनेक लोगों ने मुझसे वरदान प्राप्त किए, किन्तु तुमने कभी कुछ नहीं माँगा! अब कुछ माँगो, मैं तुम्हें देना चाहता हूँ।

तुम्हारा भला करके, मुझे भी संतुष्टि होगी।

उद्धव ने इसके बाद भी स्वयं के लिए कुछ नहीं माँगा। वे तो केवल उन शंकाओं का समाधान चाहते थे जो उनके मन में कृष्ण की शिक्षाओं, और उनके कृतित्व को, देखकर उठ रही थीं।

उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा-

“भगवन महाभारत के घटनाक्रम में अनेक बातें मैं नहीं समझ पाया!

आपके ‘उपदेश’ अलग रहे, जबकि ‘व्यक्तिगत जीवन’ कुछ अलग तरह का दिखता रहा!

क्या आप मुझे इसका कारण समझाकर मेरी ज्ञान पिपासा को शांत करेंगे?”
श्री कृष्ण बोले-

“उद्धव मैंने कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन से जो कुछ कहा, वह *”भगवद्गीता”* थी।

आज जो कुछ तुम जानना चाहते हो और उसका मैं जो तुम्हें उत्तर दूँगा, वह *”उद्धव-गीता”* के रूप में जानी जाएगी।

इसी कारण मैंने तुम्हें यह अवसर दिया है।

तुम बेझिझक पूछो।

उद्धव ने पूछना शुरू किया-
“हे कृष्ण, सबसे पहले मुझे यह बताओ कि सच्चा मित्र कौन होता है?”

कृष्ण ने कहा- “सच्चा मित्र वह है जो जरूरत पड़ने पर मित्र की बिना माँगे, मदद करे।”

उद्धव-

“कृष्ण, आप पांडवों के आत्मीय प्रिय मित्र थे। आपाद बांधव के रूप में उन्होंने सदा आप पर पूरा भरोसा किया।

कृष्ण, आप महान ज्ञानी हैं। आप भूत, वर्तमान व भविष्य के ज्ञाता हैं।

किन्तु आपने सच्चे मित्र की जो परिभाषा दी है, क्या आपको नहीं लगता कि आपने उस परिभाषा के अनुसार कार्य नहीं किया?

आपने धर्मराज युधिष्ठिर को द्यूत (जुआ) खेलने से रोका क्यों नहीं?

चलो ठीक है कि आपने उन्हें नहीं रोका, लेकिन आपने भाग्य को भी धर्मराज के पक्ष में भी नहीं मोड़ा!

आप चाहते तो युधिष्ठिर जीत सकते थे!

आप कम से कम उन्हें धन, राज्य और यहाँ तक कि खुद को हारने के बाद तो रोक सकते थे!

उसके बाद जब उन्होंने अपने भाईयों को दाँव पर लगाना शुरू किया, तब तो आप सभाकक्ष में पहुँच सकते थे! आपने वह भी नहीं किया? उसके बाद जब दुर्योधन ने पांडवों को सदैव अच्छी किस्मत वाला बताते हुए द्रौपदी को दाँव पर लगाने को प्रेरित किया, और जीतने पर हारा हुआ सब कुछ वापस कर देने का लालच दिया, कम से कम तब तो आप हस्तक्षेप कर ही सकते थे!

अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा आप पांसे धर्मराज के अनुकूल कर सकते थे!

इसके स्थान पर आपने तब हस्तक्षेप किया, जब द्रौपदी लगभग अपना शील खो रही थी, तब आपने उसे वस्त्र देकर द्रौपदी के शील को बचाने का दावा किया!

लेकिन आप यह यह दावा भी कैसे कर सकते हैं?

उसे एक आदमी घसीटकर हॉल में लाता है, और इतने सारे लोगों के सामने निर्वस्त्र करने के लिए छोड़ देता है!

एक महिला का शील क्या बचा? आपने क्या बचाया?

अगर आपने संकट के समय में अपनों की मदद नहीं की तो आपको आपाद-बांधव कैसे कहा जा सकता है?

बताईए, आपने संकट के समय में मदद नहीं की तो क्या फायदा?

क्या यही धर्म है?”

इन प्रश्नों को पूछते-पूछते उद्धव का गला रुँध गया और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

ये अकेले उद्धव के प्रश्न नहीं हैं। महाभारत पढ़ते समय हर एक के मनोमस्तिष्क में ये सवाल उठते हैं!

उद्धव ने हम लोगों की ओर से ही श्रीकृष्ण से उक्त प्रश्न किए।

भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले-

“प्रिय उद्धव, यह सृष्टि का नियम है कि विवेकवान ही जीतता है।

उस समय दुर्योधन के पास विवेक था, धर्मराज के पास नहीं।

यही कारण रहा कि धर्मराज पराजित हुए।”
उद्धव को हैरान परेशान देखकर कृष्ण आगे बोले- “दुर्योधन के पास जुआ खेलने के लिए पैसाऔर धन तो बहुत था, लेकिन उसे पासों का खेल खेलना नहीं आता था, इसलिए उसने अपने मामा शकुनि का द्यूतक्रीड़ा के लिए उपयोग किया। यही विवेक है। धर्मराज भी इसी प्रकार सोच सकते थे और अपने चचेरे भाई से पेशकश कर सकते थे कि उनकी तरफ से मैं खेलूँगा।

जरा विचार करो कि अगर शकुनी और मैं खेलते तो कौन जीतता?

पाँसे के अंक उसके अनुसार आते या मेरे अनुसार?

चलो इस बात को जाने दो। उन्होंने मुझे खेल में शामिल नहीं किया, इस बात के लिए उन्हें माफ़ किया जा सकता है। लेकिन उन्होंने विवेक-शून्यता से एक और बड़ी गलती की!

और वह यह-

उन्होंने मुझसे प्रार्थना की कि मैं तब तक सभा-कक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए!

क्योंकि वे अपने दुर्भाग्य से खेल मुझसे छुपकर खेलना चाहते थे।

वे नहीं चाहते थे, मुझे मालूम पड़े कि वे जुआ खेल रहे हैं!

इस प्रकार उन्होंने मुझे अपनी प्रार्थना से बाँध दिया! मुझे सभा-कक्ष में आने की अनुमति नहीं थी!

इसके बाद भी मैं कक्ष के बाहर इंतज़ार कर रहा था कि कब कोई मुझे बुलाता है! भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे भूल गए! बस अपने भाग्य और दुर्योधन को कोसते रहे!

अपने भाई के आदेश पर जब दुस्साशन द्रौपदी को बाल पकड़कर घसीटता हुआ सभा-कक्ष में लाया, द्रौपदी अपनी सामर्थ्य के अनुसार जूझती रही!

तब भी उसने मुझे नहीं पुकारा!

उसकी बुद्धि तब जागृत हुई, जब दुस्साशन ने उसे निर्वस्त्र करना प्रारंभ किया!

जब उसने स्वयं पर निर्भरता छोड़कर-

*’हरि, हरि, अभयम कृष्णा, अभयम’*-

की गुहार लगाई, तब मुझे उसके शील की रक्षा का अवसर मिला।

जैसे ही मुझे पुकारा गया, मैं अविलम्ब पहुँच गया।

अब इस स्थिति में मेरी गलती बताओ?”

उद्धव बोले-

“कान्हा आपका स्पष्टीकरण प्रभावशाली अवश्य है, किन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई!

क्या मैं एक और प्रश्न पूछ सकता हूँ?”

कृष्ण की अनुमति से उद्धव ने पूछा-

“इसका अर्थ यह हुआ कि आप तभी आओगे, जब आपको बुलाया जाएगा? क्या संकट से घिरे अपने भक्त की मदद करने आप स्वतः नहीं आओगे?”

कृष्ण मुस्कुराए-

“उद्धव इस सृष्टि में हरेक का जीवन उसके स्वयं के कर्मफल के आधार पर संचालित होता है।

न तो मैं इसे चलाता हूँ, और न ही इसमें कोई हस्तक्षेप करता हूँ।

मैं केवल एक ‘साक्षी’ हूँ।

मैं सदैव तुम्हारे नजदीक रहकर जो हो रहा है उसे देखता हूँ।

यही ईश्वर का धर्म है।”
“वाह-वाह, बहुत अच्छा कृष्ण!

तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप हमारे नजदीक खड़े रहकर हमारे सभी दुष्कर्मों का निरीक्षण करते रहेंगे?

हम पाप पर पाप करते रहेंगे, और आप हमें साक्षी बनकर देखते रहेंगे?

आप क्या चाहते हैं कि हम भूल करते रहें? पाप की गठरी बाँधते रहें और उसका फल भुगतते रहें?”

उलाहना देते हुए उद्धव ने पूछा!
तब कृष्ण बोले-

“उद्धव, तुम शब्दों के गहरे अर्थ को समझो।

जब तुम समझकर अनुभव कर लोगे कि मैं तुम्हारे नजदीक साक्षी के रूप में हर पल हूँ, तो क्या तुम कुछ भी गलत या बुरा कर सकोगे?

तुम निश्चित रूप से कुछ भी बुरा नहीं कर सकोगे।

जब तुम यह भूल जाते हो और यह समझने लगते हो कि मुझसे छुपकर कुछ भी कर सकते हो, तब ही तुम मुसीबत में फँसते हो! धर्मराज का अज्ञान यह था कि उसने माना कि वह मेरी जानकारी के बिना जुआ खेल सकता है!

अगर उसने यह समझ लिया होता कि मैं प्रत्येक के साथ हर समय साक्षी रूप में उपस्थित हूँ तो क्या खेल का रूप कुछ और नहीं होता?”
भक्ति से अभिभूत उद्धव मंत्रमुग्ध हो गये और बोले-

प्रभु कितना गहरा दर्शन है। कितना महान सत्य। ‘प्रार्थना’ और ‘पूजा-पाठ’ से, ईश्वर को अपनी मदद के लिए बुलाना तो महज हमारी ‘पर-भावना’ है।  मग़र जैसे ही हम यह विश्वास करना शुरू करते हैं कि ‘ईश्वर’ के बिना पत्ता भी नहीं हिलता! तब हमें साक्षी के रूप में उनकी उपस्थिति महसूस होने लगती है।

गड़बड़ तब होती है, जब हम इसे भूलकर दुनियादारी में डूब जाते हैं।

सम्पूर्ण श्रीमद् भागवद् गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इसी जीवन-दर्शन का ज्ञान दिया है।

सारथी का अर्थ है- मार्गदर्शक।

अर्जुन के लिए सारथी बने श्रीकृष्ण वस्तुतः उसके मार्गदर्शक थे।

वह स्वयं की सामर्थ्य से युद्ध नहीं कर पा रहा था, लेकिन जैसे ही अर्जुन को परम साक्षी के रूप में भगवान कृष्ण का एहसास हुआ, वह ईश्वर की चेतना में विलय हो गया!

यह अनुभूति थी, शुद्ध, पवित्र, प्रेममय, आनंदित सुप्रीम चेतना की!

तत-त्वम-असि!

अर्थात…

वह तुम ही हो।।

🙏🔔🙏

Please please इसे ज़रूर पढ़ें।। धर्म की मानसिकता से अलग करके पढें।। जिंदगी की बहुत बड़ी सीख है इसमें।।

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*जय श्री कृष्ण*

*”उद्धव-गीता”*
उद्धव बचपन से ही सारथी के रूप में श्रीकृष्ण की सेवा में रहे, किन्तु उन्होंने श्री कृष्ण से कभी न तो कोई इच्छा जताई और न ही कोई वरदान माँगा।

जब कृष्ण अपने अवतार काल को पूर्ण कर गौलोक जाने को तत्पर हुए, तब उन्होंने उद्धव को अपने पास बुलाया और कहा-

*”प्रिय उद्धव मेरे इस ‘अवतार काल’ में अनेक लोगों ने मुझसे वरदान प्राप्त किए, किन्तु तुमने कभी कुछ नहीं माँगा! अब कुछ माँगो, मैं तुम्हें देना चाहता हूँ।*

तुम्हारा भला करके, मुझे भी संतुष्टि होगी।

*उद्धव ने इसके बाद भी स्वयं के लिए कुछ नहीं माँगा। वे तो केवल उन शंकाओं का समाधान चाहते थे जो उनके मन में कृष्ण की शिक्षाओं, और उनके कृतित्व को, देखकर उठ रही थीं।*

उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा-

“भगवन महाभारत के घटनाक्रम में अनेक बातें मैं नहीं समझ पाया!

आपके ‘उपदेश’ अलग रहे, जबकि ‘व्यक्तिगत जीवन’ कुछ अलग तरह का दिखता रहा!

क्या आप मुझे इसका कारण समझाकर मेरी ज्ञान पिपासा को शांत करेंगे?”
*श्री कृष्ण बोले-*

*“उद्धव मैंने कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन से जो कुछ कहा, वह “भगवद्गीता” थी।*

*आज जो कुछ तुम जानना चाहते हो और उसका मैं जो तुम्हें उत्तर दूँगा, वह “उद्धव-गीता” के रूप में जानी जाएगी।*

इसी कारण मैंने तुम्हें यह अवसर दिया है।

तुम बेझिझक पूछो।

उद्धव ने पूछना शुरू किया- 
*”हे कृष्ण, सबसे पहले मुझे यह बताओ कि सच्चा मित्र कौन होता है?”*

कृष्ण ने कहा- “सच्चा मित्र वह है जो जरूरत पड़ने पर मित्र की बिना माँगे, मदद करे।”

*उद्धव-* 

*”कृष्ण, आप पांडवों के आत्मीय प्रिय मित्र थे। आजाद बांधव के रूप में उन्होंने सदा आप पर पूरा भरोसा किया।*

*कृष्ण, आप महान ज्ञानी हैं। आप भूत, वर्तमान व भविष्य के ज्ञाता हैं।*

*किन्तु आपने सच्चे मित्र की जो परिभाषा दी है, क्या आपको नहीं लगता कि आपने उस परिभाषा के अनुसार कार्य नहीं किया?*

*आपने धर्मराज युधिष्ठिर को द्यूत (जुआ) खेलने से रोका क्यों नहीं?*

चलो ठीक है कि आपने उन्हें नहीं रोका, लेकिन आपने भाग्य को भी धर्मराज के पक्ष में भी नहीं मोड़ा!

आप चाहते तो युधिष्ठिर जीत सकते थे!

आप कम से कम उन्हें धन, राज्य और यहाँ तक कि खुद को हारने के बाद तो रोक सकते थे!

उसके बाद जब उन्होंने अपने भाईयों को दाँव पर लगाना शुरू किया, तब तो आप सभाकक्ष में पहुँच सकते थे! आपने वह भी नहीं किया? उसके बाद जब दुर्योधन ने पांडवों को सदैव अच्छी किस्मत वाला बताते हुए द्रौपदी को दाँव पर लगाने को प्रेरित किया, और जीतने पर हारा हुआ सब कुछ वापस कर देने का लालच दिया, कम से कम तब तो आप हस्तक्षेप कर ही सकते थे!

   अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा आप पांसे धर्मराज के अनुकूल कर सकते थे!

*इसके स्थान पर आपने तब हस्तक्षेप किया, जब द्रौपदी लगभग अपना शील खो रही थी, तब आपने उसे वस्त्र देकर द्रौपदी के शील को बचाने का दावा किया!*

   *लेकिन आप यह यह दावा भी कैसे कर सकते हैं?*

उसे एक आदमी घसीटकर हॉल में लाता है, और इतने सारे लोगों के सामने निर्वस्त्र करने के लिए छोड़ देता है!

एक महिला का शील क्या बचा? आपने क्या बचाया?

*अगर आपने संकट के समय में अपनों की मदद नहीं की तो आपको आपाद-बांधव कैसे कहा जा सकता है?*

बताईए, आपने संकट के समय में मदद नहीं की तो क्या फायदा?

क्या यही धर्म है?”

इन प्रश्नों को पूछते-पूछते उद्धव का गला रुँध गया और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

*ये अकेले उद्धव के प्रश्न नहीं हैं।* *महाभारत पढ़ते समय हर एक के मनोमस्तिष्क में ये सवाल उठते हैं!*

*उद्धव ने हम लोगों की ओर से ही श्रीकृष्ण से उक्त प्रश्न किए।*

  भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले-

*”प्रिय उद्धव, यह सृष्टि का नियम है कि विवेकवान ही जीतता है।*

*उस समय दुर्योधन के पास विवेक था, धर्मराज के पास नहीं।*

*यही कारण रहा कि धर्मराज पराजित हुए।”*
उद्धव को हैरान परेशान देखकर *कृष्ण आगे बोले- “दुर्योधन के पास जुआ खेलने के लिए पैसाऔर धन तो बहुत था, लेकिन उसे पासों का खेल खेलना नहीं आता था, इसलिए उसने अपने मामा शकुनि का द्यूतक्रीड़ा के लिए उपयोग किया। यही विवेक है। धर्मराज भी इसी प्रकार सोच सकते थे और अपने चचेरे भाई से पेशकश कर सकते थे कि उनकी तरफ से मैं खेलूँगा।*

*जरा विचार करो कि अगर शकुनी और मैं खेलते तो कौन जीतता?*

*पाँसे के अंक उसके अनुसार आते या मेरे अनुसार?*

चलो इस बात को जाने दो। *उन्होंने मुझे खेल में शामिल नहीं किया, इस बात के लिए उन्हें माफ़ किया जा सकता है।* *लेकिन उन्होंने विवेक-शून्यता से एक और बड़ी गलती की!*

*और वह यह-*

*उन्होंने मुझसे प्रार्थना की कि मैं तब तक सभा-कक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए!*

*क्योंकि वे अपने दुर्भाग्य से खेल मुझसे छुपकर खेलना चाहते थे।*

*वे नहीं चाहते थे, मुझे मालूम पड़े कि वे जुआ खेल रहे हैं!*

इस प्रकार उन्होंने मुझे अपनी प्रार्थना से बाँध दिया! मुझे सभा-कक्ष में आने की अनुमति नहीं थी!

*इसके बाद भी मैं कक्ष के बाहर इंतज़ार कर रहा था कि कब कोई मुझे बुलाता है! भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे भूल गए! बस अपने भाग्य और दुर्योधन को कोसते रहे!* 

*अपने भाई के आदेश पर जब दुस्साशन द्रौपदी को बाल पकड़कर घसीटता हुआ सभा-कक्ष में लाया, द्रौपदी अपनी सामर्थ्य के अनुसार जूझती रही!*

*तब भी उसने मुझे नहीं पुकारा!*
*उसकी बुद्धि तब जागृत हुई, जब दुस्साशन ने उसे निर्वस्त्र करना प्रारंभ किया!*

*जब उसने स्वयं पर निर्भरता छोड़कर-*

 *’हरि, हरि, अभयम कृष्णा, अभयम’-*

*की गुहार लगाई, तब मुझे उसके शील की रक्षा का अवसर मिला।*

*जैसे ही मुझे पुकारा गया, मैं अविलम्ब पहुँच गया।*

*अब इस स्थिति में मेरी गलती बताओ?”*

उद्धव बोले-

*”कान्हा आपका स्पष्टीकरण प्रभावशाली अवश्य है, किन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई!* 

क्या मैं एक और प्रश्न पूछ सकता हूँ?”

कृष्ण की अनुमति से उद्धव ने पूछा-

*”इसका अर्थ यह हुआ कि आप तभी आओगे, जब आपको बुलाया जाएगा? क्या संकट से घिरे अपने भक्त की मदद करने आप स्वतः नहीं आओगे?”*

कृष्ण मुस्कुराए-

*”उद्धव इस सृष्टि में हरेक का जीवन उसके स्वयं के कर्मफल के आधार पर संचालित होता है।*

*न तो मैं इसे चलाता हूँ, और न ही इसमें कोई हस्तक्षेप करता हूँ।*

*मैं केवल एक ‘साक्षी’ हूँ।*

*मैं सदैव तुम्हारे नजदीक रहकर जो हो रहा है उसे देखता हूँ।*

*यही ईश्वर का धर्म है।”*
“वाह-वाह, बहुत अच्छा कृष्ण!

*तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप हमारे नजदीक खड़े रहकर हमारे सभी दुष्कर्मों का निरीक्षण करते रहेंगे?* 

*हम पाप पर पाप करते रहेंगे, और आप हमें साक्षी बनकर देखते रहेंगे?*

*आप क्या चाहते हैं कि हम भूल करते रहें? पाप की गठरी बाँधते रहें और उसका फल भुगतते रहें?”*

उलाहना देते हुए उद्धव ने पूछा!
तब कृष्ण बोले-

*”उद्धव, तुम शब्दों के गहरे अर्थ को समझो।*

*जब तुम समझकर अनुभव कर लोगे कि मैं तुम्हारे नजदीक साक्षी के रूप में हर पल हूँ, तो क्या तुम कुछ भी गलत या बुरा कर सकोगे?*

*तुम निश्चित रूप से कुछ भी बुरा नहीं कर सकोगे।*

*जब तुम यह भूल जाते हो और यह समझने लगते हो कि मुझसे छुपकर कुछ भी कर सकते हो, तब ही तुम मुसीबत में फँसते हो! धर्मराज का अज्ञान यह था कि उसने माना कि वह मेरी जानकारी के बिना जुआ खेल सकता है!*
*अगर उसने यह समझ लिया होता कि मैं प्रत्येक के साथ हर समय साक्षी रूप में उपस्थित हूँ तो क्या खेल का रूप कुछ और नहीं होता?”*
 भक्ति से अभिभूत उद्धव मंत्रमुग्ध हो गये और बोले- 

*प्रभु कितना गहरा दर्शन है। कितना महान सत्य। ‘प्रार्थना’ और ‘पूजा-पाठ’ से, ईश्वर को अपनी मदद के लिए बुलाना तो महज हमारी ‘पर-भावना’ है।  मग़र जैसे ही हम यह विश्वास करना शुरू करते हैं कि ‘ईश्वर’ के बिना पत्ता भी नहीं हिलता! तब हमें साक्षी के रूप में उनकी उपस्थिति महसूस होने लगती है।* 

*गड़बड़ तब होती है, जब हम इसे भूलकर दुनियादारी में डूब जाते हैं।*

*सम्पूर्ण श्रीमद् भागवद् गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इसी जीवन-दर्शन का ज्ञान दिया है।*

*सारथी का अर्थ है- मार्गदर्शक।*

अर्जुन के लिए सारथी बने श्रीकृष्ण वस्तुतः उसके मार्गदर्शक थे।

*वह स्वयं की सामर्थ्य से युद्ध नहीं कर पा रहा था, लेकिन जैसे ही अर्जुन को परम साक्षी के रूप में भगवान कृष्ण का एहसास हुआ, वह ईश्वर की चेतना में विलय हो गया!*

*यह अनुभूति थी, शुद्ध, पवित्र, प्रेममय, आनंदित सुप्रीम चेतना की!*

*तत-त्वम-असि!*

अर्थात…

*वह तुम ही हो।।*

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श्रीमद्भगवद्गीता के ३८ अनमोल वचन


*श्रीमद्भगवद्गीता के ३८ अनमोल वचन !* 🙏🏼

https://www.facebook.com/Indori-Bhiya-198863710293892/
🌸📖🌸

*भगवान श्रीकृष्ण के अनमोल विचार….☝🏼🌸*

*श्रीमद्भगवद्गीता* एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमे जीवन का पूरा सार दिया हुआ है. मनुष्य के जन्म लेने से मृत्यु के बाद के चक्र को *श्रीमद्भगवद्गीता* में विस्तार से बताया गया है. मनुष्य के सांसारिक माया – मोह से निकलकर मोक्ष की प्राप्ति का सूत्र गीता में मौजूद है.

महाभारत के युद्ध में *श्री कृष्ण* ने अर्जुन के द्वारा पूरे संसार को ऐसा ज्ञान दिया जिसे अपनाकर कोई व्यक्ति इस संसार में परम सुख और शांति से अपना जीवन व्यतीत कर सकता है.

*०१*: हमेशा आसक्ति से ही कामना का जन्म होता है.

*०२*: जो व्यक्ति संदेह करता है उसे कही भी ख़ुशी नहीं मिलती.

*०३*: जो मन को रोक नहीं पाते उनके लिए उनका मन दुश्मन के समान है.

*०४*: वासना, गुस्सा और लालच नरक जाने के तीन द्वार है.

*०५*: इस जीवन में कुछ भी व्यर्थ नहीं होता है.

*०६*: मन बहुत ही चंचल होता है और इसे नियंत्रित करना कठिन है. परन्तु अभ्यास से इसे वश में किया जा सकता है.

*०७*: सम्मानित व्यक्ति के लिए अपमान मृत्यु से भी बदतर होती है.

*०८*: व्यक्ति जो चाहे वह बन सकता है अगर वह उस इच्छा पर पूरे विश्वास के साथ कर्म करे.

*०९*: जो वास्तविक नहीं है उससे कभी भी मत डरो.

*१०*: हर व्यक्ति का विश्वास उसके स्वभाव के अनुसार होता है.

*११*: जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु भी निश्चित है. इसलिए जो होना ही है उस पर शोक मत करो.

*१२*: जो कर्म प्राकृतिक नहीं है वह हमेशा आपको तनाव देता है.

*१३*: तुम मुझमे समर्पित हो जाओ मैं तुम्हे सभी पापो से मुक्त कर दूंगा.

*१४*: किसी भी काम को नहीं करने से अच्छा है कि कोई काम कर लिया जाए.

*१५*: जो मुझसे प्रेम करते है और मुझसे जुड़े हुए है. मैं उन्हें हमेशा ज्ञान देता हूँ.

*१६*: बुद्धिमान व्यक्ति ईश्वर के सिवा और किसी पर निर्भर नहीं रहता.

*१७*: सभी कर्तव्यो को पूरा करके मेरी शरण में आ जाओ.

*१८*: ईश्वर सभी वस्तुओ में है और उन सभी के ऊपर भी.

*१९*: एक ज्ञानवान व्यक्ति कभी भी कामुक सुख में आनंद नहीं लेता.

*२०*: जो कोई भी किसी काम में निष्क्रियता और निष्क्रियता में काम देखता है वही एक बुद्धिमान व्यक्ति है.

*२१*: मैं इस धरती की सुगंध हूँ. मैं आग का ताप हूँ और मैं ही सभी प्राणियों का संयम हूँ.

*२२*: तुम उस चीज के लिए शोक करते हो जो शोक करने के लायक नहीं है. एक बुद्धिमान व्यक्ति न ही जीवित और न ही मृत व्यक्ति के लिए शोक करता है.

*२३*: मुझे कोई भी कर्म जकड़ता नहीं है क्योंकि मुझे कर्म के फल की कोई चिंता नहीं है.

*२४*: मैंने और तुमने कई जन्म लिए है लेकिन तुम्हे याद नहीं है.

*२५*: वह जो मेरी सृष्टि की गतिविधियों को जानता है वह अपना शरीर त्यागने के बाद कभी भी जन्म नहीं लेता है क्योंकि वह मुझमे समा जाता है.

*२६*: कर्म योग एक बहुत ही बड़ा रहस्य है.

*२७*: जिसने काम का त्याग कर दिया हो उसे कर्म कभी नहीं बांधता.

*२८*: बुद्धिमान व्यक्ति को समाज की भलाई के लिए बिना किसी स्वार्थ के कार्य करना चाहिए.

*२९*: जब व्यक्ति अपने कार्य में आनंद प्राप्त कर लेता है तब वह पूर्ण हो जाता है.

*३०*: मेरे लिए कोई भी अपना – पराया नहीं है. जो मेरी पूजा करता है मैं उसके साथ रहता हूँ.

*३१*: जो अपने कार्य में सफलता पाना चाहते है वे भगवान की पूजा करे.

*३२*: बुरे कर्म करने वाले नीच व्यक्ति मुझे पाने की कोशिश नहीं करते.

*३३*: जो व्यक्ति जिस भी देवता की पूजा करता है मैं उसी में उसका विश्वास बढ़ाने लगता हूँ.

*३४*: मैं भूत, वर्तमान और भविष्य के सभी प्राणियों को जानता हूँ लेकिन कोई भी मुझे नहीं जान पाता.

*३५*: वह सिर्फ मन है जो किसी का मित्र तो किसी का शत्रु होता है.

*३६*: मैं सभी जीव – जंतुओ के ह्रदय में निवास करता हूँ.

*३७*: चेतन व अचेतन ऐसा कुछ भी नहीं है जो मेरे बगैर इस अस्तित्व में रह सकता हो.

*३८*: इसमें कोई शक नहीं है कि जो भी व्यक्ति मुझे याद करते हुए मृत्यु को प्राप्त होता है वह मेरे धाम को प्राप्त होता है.

🌸 *ऊं नमो: भगवते वासुदेवाय* 🌸

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सप्तश्लोकी गीता


ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।

य: प्रयाति त्यजन्देह स याति परमां गतिम्।।1।।

 

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।

रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा:।।2।।

 

सर्वत:पाणिपादं तत्सर्वतोSक्षिशिरोमुखम् ।

सर्वत:श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।।3।।

 

कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्य: ।

सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं  तमस: परस्तान्।।4।।

 

ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।

छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।5।।

 

सर्वस्य चहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।6।।

 

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां   नमस्कुरु ।

मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण:।।7।।

 

इति श्रीमद्भागवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे

श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सप्तश्लोकी गीता सम्पूर्ण ।

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सप्तश्लोकी गीता — astroprabha


ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। य: प्रयाति त्यजन्देह स याति परमां गतिम्।।1।। स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा:।।2।। सर्वत:पाणिपादं तत्सर्वतोSक्षिशिरोमुखम् । सर्वत:श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।।3।। कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्य: । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमस: परस्तान्।।4।। ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।5।। सर्वस्य चहं […]

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