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सप्तश्लोकी गीता

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।

य: प्रयाति त्यजन्देह स याति परमां गतिम्।।1।।

 

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।

रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा:।।2।।

 

सर्वत:पाणिपादं तत्सर्वतोSक्षिशिरोमुखम् ।

सर्वत:श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।।3।।

 

कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्य: ।

सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं  तमस: परस्तान्।।4।।

 

ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।

छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।5।।

 

सर्वस्य चहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।6।।

 

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां   नमस्कुरु ।

मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण:।।7।।

 

इति श्रीमद्भागवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे

श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सप्तश्लोकी गीता सम्पूर्ण ।

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सप्तश्लोकी गीता — astroprabha

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। य: प्रयाति त्यजन्देह स याति परमां गतिम्।।1।। स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा:।।2।। सर्वत:पाणिपादं तत्सर्वतोSक्षिशिरोमुखम् । सर्वत:श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।।3।। कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्य: । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमस: परस्तान्।।4।। ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।5।। सर्वस्य चहं […]

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श्रीकृष्ण में 64 ऐसे दिव्य गुण

श्रीकृष्ण में 64 ऐसे दिव्य गुण

परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

 

रुदती भिक्षणं – कभी रोने लगते है, उदगायन्ति – कभी गाने लगते है, नर्त्यतीं च – नाचने लगते है, मद भक्ति युक्तो भुवनं पुनाति – मेरी भक्ति युक्त ऐसे लोग भुवनो को पावन करते है उनको छुकर जो हवांए जाती है वो भी लोगो को सुख शांति और अहंकार रहित आत्मरस से  पवित्र करने वाली होती है | लेकिन जो अहंकारी है जिनकी मटेरिअल लाइफ है, जो रॉक और पोप म्यूजिक पर झूमते है भूत के जैसे, ऐसे लोग ऐसे भक्तो की हंसी उड़ाते है | धनभागी है दुनिया के कृष्ण भक्त जो श्रीकृष्ण के लिए हँसते है, नाचते है ,रोते है, गाते है श्रीकृष्ण के लिए, भगवान के लिए, शिव के लिए, गुरु के लिए | रॉक और पोप म्यूजिक से धूमते है सेक्सुअल केंद्र उतेजित हो जाता है और आदमी हवस का, विकारो का, सेक्स का शिकार बन जाते है लेकिन जो भगवान की भक्ति में, गुरु के सत्संग में हँसते, रोते, गाते गुनगुनाते है वो तो त्रिभुवन को पावन करते है उद्धव |
तो यहाँ ब्रम्हवैवर्त पुराण में धर्मराजा सावित्री देवीजी को कहते है जो भक्तो के नाचने, गाने, अलग-अलग चेष्टाओ करने को देखकर जो हंसी उड़ाते है जो उनकी माखोल उड़ाते है उनको १०० वर्ष तक अश्रु नरक में  वास करना पड़ता है और अश्रु पान करना पड़ता है | इसिलिए भक्त की चेष्टाओ को देखकर कभी भी खिल्ली नही उड़ानी चाहिए कभी भी वयंग्य नही करना चाहिए|
श्रीकृष्ण में 64 ऐसे दिव्य गुण है की वे आप के अन्दर छुपे हुए है उन्हें जगाने पर आप कृष्णमय हो जाओगे | आप का आत्मा भी वही कृष्ण का आत्मा ही है क्योंकि आत्मा एक है परब्रम्हपरमात्मा एक है | भक्तो के ह्रदय में बीज रूप से छुपा है, संतो के ह्रदय में पोधे के रूप में या वृक्ष के रूप में विकसित हुआ है और वही श्रीकृष्ण के ह्रदय में वही ब्रम्ह विकसित हुआ है |
श्रीकृष्ण के 64 गुण सुनकर आप भी कुछ गुण विकसित कर सकते ही है | तो भगवान कृष्ण कैसे थे सुन्दर अंग वाले थे आप भी आसन, प्राणायाम और श्वास रोककर बहार जप करे आपका शरीरिक शरीर सुढोल रहेगा आप सुन्दर अंग वाले बनेगे |
भगवान श्रीकृष्ण में दूसरा गुण था शुभ लक्षणों से युक्त थे आप भी शुभ चिंतन करो | मै बीमार हूँ, यह ऐसा है,  वो वैसा है अपने चहरे को भद्दा मत करो, किसी की भी निन्दा न करो, निन्दा करने से अपना चहेरा भद्दा होता है, मन भद्दा होता है, श्रीकृष्ण निन्दा नही करते थे इर्ष्या नही करते थे, सदा बंसी बजाते रहते, प्रसन्नता बिखेरते रहते ऐसे ही आप भी सदा प्रसन्नता बिखेरते रहो| निन्दा किसी की हम किसी से भूल कर भी ना करे|
श्रीकृष्ण में तीसरा गुण था अतिशय रुचिकर थे उनको देख कर लोग भाग-भाग कर जाते श्रीकृष्ण आये श्रीकृष्ण आये, जैसे लीलाशाह बापू को देख कर भक्त दोड़-दोड़ कर दर्शन करने जाते, अपने भक्त दोड़-दोड़ कर आते है ऐसे ही श्रीकृष्ण में आकर्षणी शक्ति थी भक्त उनको देख-देख कर आनन्दित होते थे |
चोथा श्रीकृष्ण का दिव्या गुण था तेजोमय थे, पांचवा बलवान थे और छठा नित्य तत्व मे रमण करते थे, शरीर तो अवतार लिया, विलय हो जायेगा पर मै ज्यों का त्यों हूँ ऐसे ही तुम्हारा शरीर भी बना है विलय हो जायेगा, तुम ज्यों के त्यों हो ऐसे नित्य तत्व मै रहने की अपनी दृढ़ता करो तो श्रीकृष्ण का सवभाव आपके ह्रदय में प्रकट होने लग जायेगा | सातवाँ गुण था श्रीकृष्ण प्रियभाषी थे कटु नही बोलते, आप भी मधुमय बोलने में सफल हो सकते हो, रोज सुबह उठो कि आज मै अपनी जिव्हा पर मधुर, मधुमय अवतार का स्मरण करके मधु वाणी बोलूँगा |
आठवीं बात श्रीकृष्ण में थी सत्यवादी थे, शोर्यमय थे नवमी बात, और दशवीं बात थी भाषाओ के जानकार थे मनुष्य की भाषा तो जानते थे पशुओ की भाषा भी जानते थे |
परम पंडित थे ग्यारहवाँ तत्व, श्रीकृष्ण बुद्धिमान थे, बच्चों को और आप को भी बुद्धिमान बनना हो तो भूमध्य में ओंकार या गुरुदेव का ध्यान करे , श्वासों-श्वास में ओंकार की गिनती करे तो बुद्धिमान बनने में आसानी होगी |
तेहरवाँ गुण था प्रतिभाशाली थे, चोहदवाँ गुण था कला पारंगत थे, पंद्रहवाँ गुण था श्रीकृष्ण का सुविकसित चतुर थे, आजकल जो झूट कपट करके, दुसरे को ठग कर पैसे इक्ठ्ठे करता है उसको चतुर मानते है तो मुर्ख है, वो उसी पैसे से दारू पियेगा, सट्टा करेगा, चिंतित होगा और मरने के बाद प्रेत बनेगा | श्रीकृष्ण ऐसे चतुर थे कि बिना वस्तु के, बिना व्यक्ति के प्रसन्न रह सकते है और अपनी मीठी नजर से लोगो को आनंदित करते थे | सुख में दुःख में सम रहते थे यह सच्ची चतुरता है |
सोहलवाँ गुण था श्री कृष्ण दक्ष रहते थे पक्षपात नहीं करते थे जो भी हुआ उसको देखते है समता में रहते है, श्रीकृष्ण की सोने की द्वारका डूब रही है और बंसी बज रही है कि इसी का नाम तो दुनिया है बनता है बिगड़ता है बदलता है | साधुओ की मजाक उड़ाने से साधुओ ने श्राप दे दिया कृष्ण के बेटे पोतो को, की गोप को गोपी बनाकर, गर्भवती गोपी को कौनसा क्या बच्चा होगा, मुसल बंधा है पेट पर, वही मुसल तुम्हारा विनाश करेगा मूर्खो, तुम्हारे बाप और दादा श्रीकृष्ण तो संतो का चरण धोते है और तुम संतो की मजाक उड़ाते हो, धिक्कार है तुम पर | अब श्रीकृष्ण चाहते तो संतो को बुलाकर श्राप वापस कराते या दूसरा कुछ कराते, नही श्रीकृष्ण दक्ष थे, गलती किया है तो दंड मिली है श्रीकृष्ण पक्षपात नही करते, इतने तटस्थ है |
सत्रवाँ गुण था श्रीकृष्ण का कृतज्ञ थे कोई थोडा भी उनके प्रति करता है तो उनका उपकार याद रखते थे आप भी दुसरे का हेल्प लो तो भूलना नही, यह आप कर सकते है जो श्रीकृष्ण के गुण विकसित थे वो आप विकसित कर सकते है |
अठारवाँ गुण था व्रतधारी थे जैसे पूनम का व्रत किया तो पहुंचना है, दस माला का जप करने का व्रत, जिसके जीवन में व्रत नही है उसके जीवन में दृढता भी नही है और सच्चाई भी नही है और सत्य को प्राप्त करने की योग्यता भी नही रहती | उनीसवाँ गुण था देश काल परिस्थिति को जानते थे, बीसवाँ गुण था श्रीकृष्ण शास्त्र में पारंगत थे, सत्संग के द्वारा शास्त्रों का ज्ञान मिलता है शास्त्रों का अध्यन स्मृति करने से शास्त्रों में पारंगत होते है |
२१वाँ महागुण था श्री कृष्ण भीतर और बाहर से प्रवित्र रहते, सुबह स्नान आदि करते, संध्या करते है. श्रीकृष्ण की ऐसी सुन्दर पवित्रता थी की नींद में से उठते ही मै शुद्ध-बुद्ध चैतन्य परम पवित्र आत्मा हूँ ऐसा चिन्तन करते थे, तुम कर सकते हो,
२२वाँ गुण था आत्मसंयमी थे जंहा देखना है देखा नजर हटायी तो हटायी,ग्वाल और गोपियों का प्रेम था तब था जब मथुरा आये तो फिर मुड़कर देखा नही |
२३वीं श्रीकृष्ण की महानता थी स्थिर बुद्धि थे और २४वीं श्रीकृष्ण की सहज सहनशीलता थी शिशुपाल ने एक गाली नही, दो दी, १०, २०,२५ श्रीकृष्ण उद्धिग्न नही हुए, ६० और ७० गालिया दी लेकिन श्रीकृष्ण सहनशीलता में, फिर आखिरी में सुदर्शन छोड़ा और उसकी सदगति कर डाली | जो गालियाँ देता है उसकी सदगति करना कितनी सहनशीलता है, जो जहर पिलाती है पुतना उसकी सदगति करना कितनी सहनशीलता है, हम कितने भाग्यशाली है की हमारा ऐसा गोड है |
२५वाँ श्रीकृष्णजी का गुण था क्षमाशील थे, २६वीं थी श्रीकृष्ण गंभीर थे, हंसने के समय हँसना और रहस्य समझने में श्रीकृष्ण बड़े गंभीर थे कहाँ कौन सी बात बताना और किस बात से किस का हित होना यह बात श्रीकृष्ण जानते थे | यह गंभीरता श्रीकृष्ण में थी आप भी यह गंभीरता ला सकते है |
२७वाँ गुण था श्रीकृष्ण में धैर्यवान थे आपत्ति काल में आप धैर्यवान रहे, आपति काल में आप धर्म निष्ठ रहे, श्रीकृष्ण का यह सदगुण आप विकसित कर सकते है | २८वाँ गुण था समदृष्टी थे, २९वाँ गुण था श्रीकृष्ण उदार आत्मा थे, दान पुण्य करने में संकोच नही करते थे, क्षमा करने में संकोच नही करते थे किसी को मदद करने में देर नही करते थे |
३०वाँ गुण था श्रीकृष्ण धार्मिक थे सामर्थ्य है तो मनमाना नही करते, शास्त्र मर्यादा के अनुसार, श्रीकृष्ण समर्थ है चतुर्भुजी हो जाते है, दो भुजी हो जाते है, आकाश में खड़े हो जाते है आद्रश्य हो जाते है फिर भी धर्म की मर्यादा नही भूलते है | मेरा आर्डर है तू युद्ध कर, नही उपनिषिदो में ऐसा लिखा है धर्म ऐसा बोलता है अध्यातम किं उच्चते, आदिदेविकं च किं, आदिभोतिकं चं किं, अध्यातम क्या है? आधिभोतिक क्या है? तू जनता नही है अर्जुन |
श्रीकृष्ण को उपनिषदों का ज्ञान देना पड़ा अर्जुन को, अपनी तरफ से आर्डर नही करते,धार्मिक थे, धर्म का उपदेश दिया वो गीता बन गई |
३१वाँ सदगुण था श्रीकृष्ण शूरवीर थे और ३२वाँ था करुणा और ३३वाँ गुण आप ला सकते हो अमानी थे
लोग हमको मान दे, थैंक्स दे, आप दुसरो को मान दे वो मान दे ना दे वो रिस्पेक्ट दे ना दे आप रिस्पेक्ट दो, ३४वाँ श्रीकृष्ण के अन्दर गुण था विनीत थे और ३५वाँ गुण था श्रीकृष्ण उदारआत्मा थे, ३६वाँ गुण था लज्जावान थे नक्कटे नहीं थे गुरु के आगे संकोच से बेठते थे | ३७वाँ गुण था शरणागत रक्षक थे, ३८वाँ गुण था श्रीकृष्ण सुखी रहते थे, दुसरो को हैप्पी कर देते थे, ३९वाँ गुण था श्रीकृष्ण हितेषी थे किसी से कोई मतलब नहीं, उनका हित चाहे कंस हो, चाहे पूतना हो, चाहे शूर्पनखा हो, रामजी और कृष्णजी हित ही हित चाहते है |  आप भी दुसरो का हित चाहोगे तो, कृष्ण तत्व तो आप का आत्मा है आप कृष्ण से अलग नहीं है, श्री कृष्ण के आत्मा से आपका आत्मा अलग नही है, आप उन गुणों को विकसित करो तो साक्षात कृष्ण अवतार हो जाओगे, ४०वाँ श्रीकृष्ण का गुण था प्रेम वशीभूत थे निर्दोष प्रेम को बड़ा महत्व देते थे |
४२वाँ गुण था मंगलमय थे परम प्रतापी थे, ४३वाँ गुण था यशश्वी थे आप भी यह गुण विकसित कर सकते होगे तो यशश्वी हो जाओगे | बापू के लिए अपयश करने वाले बेचारे मीडिया वाले और 62 करोड़ रूपये धर्मान्तर करने वालो ने खर्च किया लेकिन बापू का अपयश करने में विफल हो गये, यश और बढ़ गया, गांधीजी का अपयश करने में अंग्रेजो ने खूब जोर मारा लेकिन गाँधीजी का यश बड़ा, गाँधीजी ने कृष्ण के गुण विकसित किये, रामजी ने गुण विकसित किये तो तुम भी विकसित कर सकते हो | कर सकते हो ना ??
श्रीकृष्ण की यशश्वी सदगुण के साथ लोकप्रियता भी बहुत थी और भक्तवत्सलता भी बहुत थी,
४६वाँ  गुण था श्रीकृष्ण चित्तचोर थे, किसी के आँखों में दाल दी की जोगी रे हम तो लुट गये तेरे प्यार में |
और ४७वाँ सदगुण था आराध्य थे, ४८वाँ श्री कृष्ण का गुण था ऐश्वर्य युक्त थे, ऐश्वर्य युक्त और वैराग्य युक्त, दोनों विरोधी है जिसमे वैराग्य होता है तो फक्कड़ होता है ऐश्वर्य होता है तो भोगी होता है श्री कृष्ण ऐश्वर्यवान भी है और वैराग्यवान भी है, द्वारिका डूब रही है वैराग्य है दुःख नहीं है | ५०वाँ श्री कृष्ण का गुण था की ईश्वर के जो ऐश्वर्य के गुण थे उनमे थे और ५१वाँ गुण था श्रीकृष्ण एक स्वरूप थे, एक स्वरूव सभी का है और श्रीकृष्ण उसी में टिके रहते थे, ५२वाँ गुण था सर्वज्ञ थे और ५३वाँ गुण था नित्य नूतन और ५४वाँ गुण था श्रीकृष्ण सचिदानन्द थे अपने को सत मानते थे सदा है शरीर के बाद भी, अपने को चेतन मानते थे की बुद्धि में मेरा प्रकाश है, अपने को आन्नदित मानते, तो आप भी वास्तव में सचिदानन्द हो, मै, आप और श्रीकृष्ण सभी सचिदानंद है लेकिन श्री कृष्ण जानते थे और आपको जानने के लिए कमर कसनी है |
५५वाँ श्री कृष्ण का गुण था सिद्धियों के द्वारा सेवित थे, ५६वाँ गुण था शक्ति से युक्त थे और ५७वाँ गुण था विग्र ब्रह्माण्ड प्रकट कर सकते थे, ५८वाँ था अवतारों के स्तोत्र थे जंहा से अवतार प्रकट होते है उसी आत्मा मै टिकने वाले स्तोत्र थे | ५९वाँ गुण था मुक्तिदाता थे, चिंता से मुक्ति, भय से मुक्ति, रोग से मुक्ति, शोक से मुक्ति, अहंकार से मुक्ति और जन्म मरण से भी मुक्ति देने में भी श्री कृष्ण दाता थे जो ब्रम्हज्ञानी गुरुओ का शिष्य होते है और भक्त होता है तो साधक ने थोड़ी अधुरी-अधुरी साधना की होती है आखिर में फिर गुरु उनको मुक्त आत्मा बना देते थे | अपना वीटो पॉवर, अपने संकल्प से.. तो इस प्रकार का गुरुतत्व भी श्रीकृष्ण में मुक्ति दाता का सदगुण भी था | ६०वाँ श्रीकृष्ण का गुण था आकर्षित करने वाले थे और आप भी ॐ आनंद, ॐ माधुर्य,  ॐ शांति, करके अंतर आत्मा में तृप्त रहोगे तो तुम भी इम्प्रेसिवे हो जाओगे, तुम बनो इम्प्रेसिवे, तुम्हारे बाप का क्या जाता है, जैसे बापु चिंतन करते, श्रीकृष्ण चिंतन करते थे वैसा करो बस |
६१वाँ गुण था चमत्कारी थे, ६२वाँ गुण था भक्तो से विभूषित थे जो श्रीकृष्ण की शरण आ जाते है अथवा कृष्ण को देख लेते थे वो उनके भक्त बन जाते है |
६३वाँ उनकी मुरली, और वादय तो मारने पीटने से बजते थे, ढोल है नगाड़ा है मारने पीटने से बजते है पर बंसी तो श्रीकृष्ण अपने प्राण फूंकते थे और मीठी निगाहे डालते थे तो श्री कृष्ण की मुरली चित्त हरने वाली थी |
६४वाँ गुण था जिनके तुल्य कोई रूपवान नहीं था ऐसे रूप के धनी थे, प्रपन्न होना, प्रपन्न होना माने उनकी शरण होने, पांव पकड़ लेना |
कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवाय, वासुदेवा, प्रीतिदेवा, प्यारे देवा, मेरे देवा |
वो अंतरात्मा तुम्हारा कृष्ण है भगवान परे नहीं पराये नहीं है | इश्वरो सर्व भूतानां हर्दयशे अर्जुन तिष्ठति, जहाँ से 64 गुण खुले है वो तुम्हारा अंतरात्मा अभी तुम में है ॐ शांति ॐ आनंद…
श्रीकृष्ण का एक नाम गुरु भी है | भगवान विष्णु हजार नामो में एक नाम गुरु भी है | सहनशक्ति तो कैसी तुकाराम बोलते है कि हे कृष्ण, हे पांडुरंग मई तुमको गाली देने वाला हूँ कान खोल कर सुन लो, अगर इधर गये हुए हो, नाचने गये हो तो आ जाओ, कृष्ण की मूर्ति को देखकर बोलते है कंही बाहर गये हो तो आ जाओ मूर्ति में और खाली धमकी नहीं दी, गाली दे डाली, माझा पांडुरंगा तुम्ही भारवाही बैल हो बैल, श्री कृष्ण हंसने लगे हे माझा विट्ठाला मै तुमको गाली देने वाला हूँ ह्रदय में तो प्यार था मै गाली सुनाउंगा, तुम बैल हो भार ढोने वाले | पहले के ज़माने में यह टेक्टर ट्रोलिया नहीं थी गधो पर और बैल पर luggage लेकर जाते थे | तो भगवान को बोला तुम बैल हो और कृष्ण आनंदित हो रहे है | वास्तव में आत्मा कृष्ण तो सब में है और दिखता तो गधा है एकनाथ ने देखा कि मै तो रामेश्वर भगवान को जल चढाने जाता हूँ, यह गधे के रूप मै भगवान रामेश्वर यहाँ प्यास से मर रहे है हे रामेश्वराय लो पियो, राजस्थान के प्यासे गधे के मुँह में पानी डाला, दिखता तो गधा है लेकिन शिवतत्व का ज्ञान, आनंद आ गया |
नामदेव को दिखता तो कुत्ता है, इंडिया में कैसे कैसे लोग हो गये, ड़ोग में से भगवान प्रकट कर देते है, डोंकी में से भगवान प्रकट कर देते है अरे पत्थर कि मूर्ति में से भगवान प्रकट कर देते है गुरु में से भगवान प्रकट करना तो बहुत सरल है, very easy ,very easy.
अखंडानन्द जी के गुरु, अखंडानन्द जी उनकी सेवा में थे | गुरूजी बोलते थे आज हमारे गुरूजी फोटो, चित्र में से निकल कर आये, आज गुरूजी प्रसन्न थे, आज गुरूजी नाराज थे, फोट तो वही का वही और तुम भी experience कर सकते हो, जब गधे में से भगवान प्रकट हो सकता है पत्थर में से, शालीग्राम में से भगवान प्रकट हो सकते है तो भगवान की मूर्ति से भगवान प्रकट हो सकता है, भगवान की मूर्ति तो आर्टिस्ट ने बनायीं, शिल्पियों ने बनायीं पर गुरु का फोटो तो सीधा है काल्पनिक नहीं है ज्यूँ का त्यूं लिया हुआ है |
ध्यान मुलं गुरु मूर्ति पूजा मुलं गुरु पदम |
एकलव्य ने मिटटी की मूर्ति में से ज्ञान प्रकट करके अर्जुन को पीछे कर दिया |
भगवान की भक्ति, गुरु का ज्ञान का बोझा उठा उठा कर लोगो तक पहुँचाने वाले बैल, शिवजी को उठाते है नंदी, पूजे जाते है शिवजी का पूजन बाद में होता है पहले नंदी का होता है | ऐसे गुरु को तो थैंक्स बाद में करते है पर गुरु भक्तो को लोग थैंक्स करते है |
यह सत्संग वास्तव में सत्य में विश्रांति दिला देगा | खाली सत्संग को बार बार सुनते जाये, कैसेट को भरते जाये और ध्यान में डूबते जाए, एक एक गुण अपने आत्मसात करते जाए, तो कृष्ण दूर नहीं, दुर्लभ नहीं, परे नहीं, पराये नहीं |
एक खतरा है कृष्ण की आकृति देखने का अथवा गुरु की आकृति देखने का आग्रह मत रखो, गुरूजी दिखे कृष्ण जी दिखे तो दिखे, ना दिखे तो भी गुरु और कृष्ण एक चैतन्य सत्ता है जो तुम्हारा आत्मा है इसिलिये आप दिखे तो भी ठीक है गुरूजी या कृष्णजी ध्यान में, नहीं दीखते तो भी उनके गुणों के द्वारा, आप का गुरुतत्व, कृष्णतत्व इसमे, एक ही है |
ऐसा दिव्य ज्ञान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दे डाला तो तुम्हारा को थोड़ी संकोच कर रहे है हम |
नहीं जानते है तो जीव है और जान गये तो वही ब्रम्ह है | तरंग अपने को पानी नहीं जानता है तो तरंग है और पानी जान लिया तो समुन्द्र है, बुलबुला अपने को पानी नहीं जानता तो छोटा सा, शुद्र है | बहुत बहुत छोटा है बहुत बहुत बहुत, अणु है लेकिन जान ले अपने को पानी तो बहुत बड़ा है बहुत बहुत बड़ा है | जीव अपने को नहीं जानता है तो बहुत छोटा है, बहुत छोटा, जीरो से जीरो, जीरो से जीरो दिखता भी नही, मरता है तो दिखता भी नही इतना छोटा पर अपने को ब्रम्ह जान ले तो बड़ा है सब वही रूप है बहुत बड़ा है |
नारायण हरि, बस, हैप्पी जन्माष्टमी हरी ॐ हरी ॐ…
इ लव यू नही यू लव मी… हम भगवान को क्या प्रेम करेगे, भगवान हमको प्रेम कर रहे है, गोड़ लव अस, गुरु लव अस… हरी ॐ हरी ॐ…
मुझे तो लगता है की मै कृष्ण से अलग नही हो सकता और श्रीकृष्ण मेरे से अलग नही हो सकते, उनकी ताकत नही की मेरे से अलग जाएँ और मेरी ताकत नही उनसे अलग हो जाऊ, समझ गये.. हैप्पी जन्माष्टमी |

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#कर्ण ने कृष्ण से पूछा – मेरा जन्म होते ही मेरी माँ ने मुझे त्यग दिया। क्या अवैध संतान होना मेरा दोष था ?

#कर्ण ने कृष्ण से पूछा – मेरा जन्म होते ही मेरी माँ ने मुझे त्यग दिया। क्या अवैध संतान होना मेरा दोष था ?
द्रोणाचार्य ने मुझे सिखाया नहीं क्योंकि मैं क्षत्रिय पुत्र नहीं था।
परशुराम जी ने मुझे सिखाया तो सही परंतु श्राप दे दिया कि जिस वक्त मुझे उस विद्या की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, मुझे उसका विस्मरण होगा।- क्योंकि उनके अनुसार मैं क्षत्रिय ही था ।
केवल संयोगवश एक गाय को मेरा बाण लगा और उसके स्वामी ने मुझे श्राप दिया जबकि मेरा कोई दोष नहीं था ।
द्रौपदी स्वयंवर में मेरा अपमान किया गया ।
माता कुंती ने मुझे आखिर में मेरा जन्म रहस्य बताया भी तो अपने अन्य बेटों को बचाने के लिए।
जो भी मुझे प्राप्त हुआ है, दुर्योधन के दातृत्व से ही हुआ है ।
तो, अगर मैं उसकी तरफ से लड़ूँ तो मैं गलत कहाँ हूँ ?

कृष्ण ने उत्तर दिया:

कर्ण, मेरा जन्म कारागार में हुआ ।
जन्म से पहले ही मृत्यु मेरी प्रतीक्षा में घात लगाए बैठा था।
जिस रात मेरा जन्म हुआ, उसी रात मातापिता से दूर किया गया ।
तुम्हारा बचपन खड्ग, रथ, घोड़े, धनुष्य और बाण के बीच उनकी ध्वनि सुनते बीता । मुझे ग्वाले की गौशाला मिली, गोबर मिला और खड़ा होकर चल भी पाया उसके पहले ही कई प्राणघातक हमले झेलने पड़े ।

कोई सेना नहीं, कोई शिक्षा नहीं। लोगों से ताने ही मिले कि उनकी समस्याओं का कारण मैं हूँ। तुम्हारे गुरु जब तुम्हारे शौर्य की तारीफ कर रहे थे, मुझे उस उम्र में कोई शिक्षा भी नहीं मिली थी। जब मैं सोलह वर्षों का हुआ तब कहीं जाकर ऋषि सांदीपन के गुरुकुल पहुंचा ।

तुम अपनी पसंद की कन्या से विवाह कर सके ।
जिस कन्या से मैंने प्रेम किया वो मुझे नहीं मिली और उनसे विवाह करने पड़े जिन्हें मेरी चाहत थी या जिनको मैंने राक्षसों से बचाया था ।
मेरे पूरे समाज को यमुना के किनारे से हटाकर एक दूर समुद्र के किनारे बसाना पड़ा, उन्हें जरासंध से बचाने के लिए । रण से पलायन के कारण मुझे भीरु भी कहा गया ।

कल अगर दुर्योधन युद्ध जीतता है तो तुम्हें बहुत श्रेय मिलेगा ।

धर्मराज अगर जीतता है तो मुझे क्या मिलेगा ?
मुझे केवल युद्ध और युद्ध से निर्माण हुई समस्याओं के लिए दोष दिया जाएगा।
एक बात का स्मरण रहे कर्ण –
हर किसी को जिंदगी चुनौतियाँ देती है, जिंदगी किसी के भी साथ न्याय नहीं करती। दुर्योधन ने अन्याय का सामना किया है तो युधिष्ठिर ने भी अन्याय भुगता है ।

लेकिन सत्य धर्म क्या है यह तुम जानते हो ।

कोई बात नहीं अगर कितना ही अपमान हो, जो हमारा अधिकार है वो हमें ना मिल पाये…महत्व इस बात का है कि तुम उस समय उस संकट का सामना कैसे करते हो ।

रोना धोना बंद करो कर्ण, जिंदगी न्याय नहीं करती इसका मतलब यह नहीं होता कि तुम्हें अधर्म के पथ पर चलने की अनुमति है ।।

यह पोस्ट उन लोगो के लिए जो कहते है “हमारे साथ सदियों से अन्याय हुआ है”

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मुझे मेरे सवालों के जवाब चर्च में नहीं बल्कि हिन्दू धर्म की गीता और उपनिषद से मिले : स्टार हघ जैकमैन

मुझे मेरे सवालों के जवाब चर्च में नहीं बल्कि हिन्दू धर्म की गीता और उपनिषद से मिले : स्टार हघ जैकमैन

मशहूर एक्शन मूवी सीरीज x-मैन फेम हॉलीवुड स्टार ह्यू जैकमैन इन दिनों हिन्दू धर्म को पूरी तरह फॉलो कर रहे हैं। वे ईसाई होने के बावजूद चर्च या बाइबिल की बजाय हिन्दू धर्म ग्रन्थ भगवद्गीता व् उपनिषद में शांति का मार्ग खोज रहे हैं।

खबर अनुसार सनातन धर्म से प्रभावित ह्यू जैकमैन का यहाँ तक कहना है कि – ” मुझे मेरे सवालों के जवाब चर्च नहीं गीता, उपनिषदों में मिले। “

एक अंग्रेजी अख़बार को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा – ” मुझे चर्च में ले जाया गया था और मेरे दिमाग में उठे प्रश्न मुझे परेशान करने लगे – तब मुझे कुछ ही जवाब मिले – मगर जैसे ही मैंने वैदिक विचारों, ग्रन्थों और तथ्यों को खोजा तो मुझे सब जवाब मिल गये और मैं पूरी तरह संतुष्ट हो पाया। ”

उन्होंने इस दौरान बताया कि वो हिन्दू आदि गुरु शन्कराचार्य व् महेश योगी से काफी प्रभावित हैं। वे बताते हैं कि जब से उन्होंने इन दोनों को पढना शुरू किया, उन्हें सनातन धर्म ग्रन्थों से लगाव होता चला गया।

इसके बाद उन्होंने भगवद्गीता और उपनिषद को पढना शुरू किया, जिनके लिए वो कहते हैं कि उन्हें इन दोनों में अपने जीवन के सभी प्रश्नों के जवाब मिल गये।

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“શ્રીમદ્ ભગવદ્ગીતા – એટલે શ્રી ભગવાને ગાયેલું ગીત.

  • “શ્રીમદ્ ભગવદ્ગીતા – એટલે શ્રી ભગવાને ગાયેલું ગીત.

  • http://www.sadhanaweekly.com/Encyc/2016/12/10/information-abour-Bhagavad-geta
  • – મહાભારતના કુલ ૧૮ (અઢાર) પર્વ છે, જેમાં છઠ્ઠું પર્વ ભીષ્મપર્વ છે. ભીષ્મપર્વના અધ્યાય નંબર ૨૫થી ૪૨ના કુલ ૮ અધ્યાય એટલે જ ગીતા.

  • – સૌપ્રથમ શ્રી વિષ્ણુ ભગવાન થયા. તેમની નાભિમાંથી બ્રહ્માજી પ્રગટ થયા. બ્રહ્માના માનસપુત્ર શ્રી વશિષ્ઠ ઋષિ થયા, તેમના શક્તિ, શક્તિના પારાશર, પારાશર અને મત્સ્યગંધાના મિલનથી થયા વેદવ્યાસ – જેમનું સાચું નામ શ્રીકૃષ્ણ બાદરાયણ (દ્વૈપાયન) વ્યાસ – જે ૧૮મા છેલ્લા વેદવ્યાસ હતા, તેમણે ગીતાને છંદબદ્ધ શ્ર્લોકોમાં ‚પાંતર કરી ગીતા લખી.

    – ગીતા માત્ર ૪ (ચાર) વ્યક્તિ વચ્ચેનો સંવાદ છે. ધૃતરાષ્ટ્ર, સંજય, અર્જુન અને શ્રીકૃષ્ણ ભગવાન. સંજય ધૃતરાષ્ટ્રના સારથિ હતા જે વિદ્વાન ગવલ્ગણ નામના સારથિના પુત્ર હતા. શ્રીકૃષ્ણ અર્જુનના સારથિ હતા. સંજયને વેદવ્યાસે દિવ્યદૃષ્ટિ આપી હતી તો વિરાટ‚પનાં દર્શન કરવા શ્રીકૃષ્ણ અર્જુનને દિવ્યદૃષ્ટિ આપે છે. બન્ને બાજુ સારથિ બન્ને બાજુ દિવ્યદૃષ્ટિ. કેવો યોગાનુયોગ.

  • –  ગીતામાં કુલ ૭૦૦ (સાતસો) શ્ર્લોક છે, જે પૈકી ૫૭૫ શ્ર્લોક શ્રીકૃષ્ણ ભગવાન બોલ્યા છે, ૮૫ શ્ર્લોક અર્જુન બોલ્યા છે, ૩૯ શ્ર્લોક : સંજય અને માત્ર ૧ (એક) શ્ર્લોક ધૃતરાષ્ટ્ર બોલ્યા છે.

  • –  ગીતાનો સમયકાળ આશરે ઈ.સ. પૂર્વે ૩૦૬૬ માનવામાં આવે છે.

  • – ગીતાના ૧૮ અધ્યાય છે, ૭૦૦ શ્ર્લોકો છે, ૯૪૧૧ શબ્દો છે, ૨૪૪૪૭ અક્ષરો છે. શ્રીકૃષ્ણ ઉવાચ : ૨૮ વખત, અર્જુન ઉવાચ : ૨૧ વખત, ધૃતરાષ્ટ્ર ઉવાચ ૦૧ એમ કુલ મળી ૫૯ વખત ઉવાચ આવે છે. સંજય ઉવાચ : ૯ વખત આવે છે.

  • – ગીતા યોગશાસ્ત્રવિદ્યા છે. ગીતામાં કુલ ૧૮ અધ્યાયના ૧૮ યોગ તો છે જ જે તેના શીર્ષકમાં આવે છે, જેમ કે ભક્તિયોગ, કર્મયોગ સાંખ્ય યોગ. આ ઉપરાંત અભ્યાસયોગ, ધ્યાનયોગ, બ્રહ્મયોગ જેવા કુલ ૩૦ (ત્રીસ) યોગો ગીતામાં છે.

  • – ઈ.સ. પૂર્વે ૩૧૦૨ વર્ષ પહેલાં શ્રીકૃષ્ણે ગીતા અર્જુનને કહી તે યુદ્ધ કરવા, યુદ્ધના મેદાનમાં કહી અને એ ઉપદેશ જ હિન્દુ ધર્મનો મહાન ધર્મગ્રંથ બની ગયો એ બાબત સમગ્ર વિશ્ર્વના બધા ધર્મગ્રંથોમાં માત્ર અને માત્ર એક જ કિસ્સો છે.

  • – મહાભારતનાં પર્વ ૧૮ છે, ગીતાના અધ્યાય ૧૮ છે. સરવાળો ૯ થાય છે. ૯ એ પૂર્ણાંક છે. શ્રીમદ્ ભગવદ્ગીતાના કુલ અક્ષરો પણ ૯ થાય છે. ગીતામાં ભગવાન શ્રીકૃષ્ણનાં કુલ ૧૦૮ નામ છે, કુલ ૧૦૮ સુવાક્યો છે, ગીતાને સંસ્કૃતમાં શ્ર્લોકબદ્ધ કરનાર શ્રીકૃષ્ણ દ્વૈપાયન વ્યાસનું નામ પણ ૯ અક્ષરનું છે, ગીતામાં યોગ શબ્દ ૯૯ વખત આવે છે, ગીતામાં કુલ ૮૦૧ વિષયોનું વર્ણન છે, યોગ માટે ૫૪ શ્ર્લોકો છે, ગીતામાં ભગવાન પોતાની વિભૂતિઓનું વર્ણન કરે છે, જેમ કે વૃક્ષોમાં હું પીપળો છું, નદીઓમાં હું ગંગા છું – તો ગીતામાં આવી કુલ મળી ૨૩૪ વિભૂતિઓનું વર્ણન છે. ગીતામાં કુલ ૯૦ (નેવું) વ્યક્તિઓનાં નામોનો ઉલ્લેખ છે, જેમ કે : નારદ, પ્રહ્લાદ, ભૃગુ, રામ વગેરે. આ તમામનો સરવાળો ૯ થાય છે એટલું જ નહિ ગીતાનાં કુલ ૧૮ નામ છે જેનો સરવાળો પણ ૯ થાય છે. ૯નું અદ્ભુત સંકલન અહીં જોવા મળે છે.

  • –  ગીતાના ૭૦૦ શ્ર્લોકો પૈકી ૬૪૫ શ્ર્લોકો અનુષ્ટુપ છંદમાં છે. બાકીના ૫૫ શ્ર્લોકો ત્રિષ્ટુપ, બૃહતી, જગતી, ઇન્દ્રવજ્રા, ઉપેન્દ્રવજ્રા વગેરે અલગ અલગ છંદોમાં આવે છે.

  • –  એકલી ગુજરાતી ભાષામાં જ શ્રીમદ્ ભગવદ્ગીતા વિષે અલગ અલગ સમજૂતી આપતાં, ટીકા-ટીપ્પણી કરતાં ૨૫૦ પુસ્તકો હાલ ઉપલબ્ધ છે, જે દર્શાવે છે કે આ ગ્રંથ કેટલો મહાન છે, આવાં ખૂબ જ લોકપ્રિય પુસ્તકોના ઉદાહરણ ‚પ ૧૦ લેખકો અત્રે પ્રસ્તુત છે

    મહાત્મા ગાંધીજી – અનાસક્તિ યોગ

    વિનોબા ભાવે – ગીતા પ્રવચનો

    આઠવલેજી – ગીતામૃતમ્

    એસી ભક્તિ વેદાંત – ગીતા તેના મૂળ‚પે

    કિશોર મશ‚વાળા – ગીતામંથન

    ગુણવંત શાહ – શ્રીકૃષ્ણનું જીવનસંગીત

    શ્રી અરવિંદ – ગીતાનિબંધો

    રવિશંકર મહારાજ – ગીતાબોધવાણી

    કાકા કાલેલકર – ગીતાધર્મ

  • –  આખી ભગવદ્ગીતામાં ‘હિંદુ’ શબ્દ એક પણ વખત આવતો નથી – તે હિંદુ ધર્મનો ધર્મગ્રંથ હોવા છતાં પણ. એ જ સાબિત કરે છે કે ગીતા વૈશ્ર્વિક ધર્મગ્રંથ છે.

  • – શ્રીમદ્ ભગવદ્ગીતા – એ એવો એક ધર્મગ્રંથ છે જેનો અનુવાદ-ભાષાંતર વિશ્ર્વની તમામે તમામ ભાષાઓમાં થયું છે.

  • – ઋગ્વેદ, યજુર્વેદ, સામવેદ અને અથર્વવેદ – ચાર વેદો છે પણ ગીતાને પાંચનો વેદ કહેવાય છે.

  • – કોઈપણ ધર્મના સિદ્ધાંતોને વેદ-ઉપનિષદ-ભગવદ્ગીતા આ ત્રણનો આધાર લઈ શાસ્ત્રોક્ત રીતે સાબિત કરવામાં આવે છે તેને પ્રસ્થાનત્રયી કહે છે, જેમાં ગીતાનું સ્થાન મોખરે આવે છે. ધર્મની એકપણ ગૂંચવણ એવી નથી કે જેનો ઉકેલ ભગવદ્ગીતામાં ના હોય !!

  • – સમગ્ર વિશ્ર્વમાં શ્રીમદ્ ભગવદ્ગીતા – એ એકમાત્ર એવો ધર્મગ્રંથ છે જેની ભક્તો વિધિસર પૂજા કરે છે