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जाति प्रथा की सच्चाई – 1

वेदो की और लौटें  जड़ो से जुड़े's photo.

जाति प्रथा की सच्चाई – 1

[कृपया ध्यान दें – यह लेख मुख्य: रूप से उस विचारधारा के लोगो पर पर केन्द्रित हैजो जन्मआधारित जातिगत भेदभाव का पक्ष लेते हैं. इसीलिए सभी लोगों से प्रार्थनाहै कि हमारी समीक्षा को केवल इस घृणास्पद प्रथा और ऐसी घृणास्पद प्रथा के सरंक्षक, पोषक और समर्थकों के सन्दर्भ में देखा जाए न कि किसी व्यक्ति, समाज और जाति के सन्दर्भ में. अग्निवीर हर किस्म के जातिवाद को आतंकवाद का सबसे ख़राब और घृणित रूप मानता है और ऐसी घृणास्पद प्रथा के सरंक्षक, पोषक और समर्थकों को दस्यु. बाकी हम सब लोग, चाहे वो इंसान के द्वारा स्वार्थवश बनाई गयी तथाकथित छोटी जाति या ऊंची जाति का हो, एक परिवार, एक जाति, एक नस्ल के ही हैं. हम अपने पाठकों से निवेदन करते हैं कि वो ये न समझेंकि इस लेख को वैदिक विचारधारा “वसुधैव कुटुम्बकम” के विपरीत किसीव्यक्ति या वर्ग विशेष के लिए लिखा गया है. ]

जाति प्रथा से जुड़े हुए कुछ ऐसे तथ्य जिनके बारे में हमें पता होना चाहिए और जिनके बारे में हम सोचें:

ब्राह्मण कौन है ?

जाति प्रथा के बारे में सबसे हँसी की बात ये है कि जन्म आधारित जातिप्रथा अस्पष्ट और निराधार कथाओं पर आधारित हैं. आज ऐसा कोई भी तरीका मौजूद नहीं जिससे इस बात का पता चल सके कि आज के तथाकथित ब्राह्मणों के पूर्वज भी वास्तविक ब्राह्मण ही थे. विभिन्न गोत्र और ऋषि नाम को जोड़ने के बाद भी आज कोई भी तरीका मौजूद नहीं है जिससे कि उनके दावे की परख की जा सके.

जैसे हम पहले भी काफी उदाहरण दे चुके हैं की वैदिक समय / प्राचीन भारत में एक वर्ण का आदमी अपना वर्ण बदल सकता था.

अगर हम ये कहें कि आज का ब्राह्मण [जाति / जन्म आधारित ] शूद्र से भी ख़राब है क्योंकि ब्राह्मण 1000 साल पहले चंडाल के घर में पैदा हुआ था, हमारे इस दावे को नकारने का साहस कोई भला कैसे कर सकता है ? अगर आप ये कहें कि ये ब्राह्मण परिवार भरद्वाज गोत्र का है तो हम इस दावे की परख के लिए उसके DNA टेस्ट की मांग करेंगे. और किसी DNA टेस्ट के अभाव में तथाकथित ऊँची जाति का दावा करना कुछ और नहीं मानसिक दिवालियापन और खोखला दावा ही है.

क्षत्रिय कौन है ?

ऐसा माना जाता है कि परशुराम ने जमीन से कई बार सभी क्षत्रियों का सफाया कर डाला था. स्वाभाविक तौर पर इसीलिए आज के क्षत्रिय और कुछ भी हों पर जन्म के क्षत्रिय नहीं हो सकते!

अगर हम राजपूतों की वंशावली देखें ये सभी इन तीन वंशों से सम्बन्ध रखने का दावा करते हैं – 1. सूर्यवंशी जो कि सूर्य / सूरज से निकले, 2. चंद्रवंशी जो कि चंद्रमा / चाँद से निकले, और 3. अग्निकुल जो कि अग्नि से निकले. बहुत ही सीधी सी बात है कि इनमे में से कोई भी सूर्य / सूरज या चंद्रमा / चाँद से जमीन पर नहीं आया. अग्निकुल विचार की उत्पत्ति भी अभी अभी ही की है. किवदंतियों / कहानियों के हिसाब से अग्निकुल की उत्पत्ति / जन्म आग से उस समय हुआ जब परशुराम ने सभी क्षत्रियों / राजपूतों का जमीन से सफाया कर दिया था. बहुत से राजपूत वंशों में आज भी ऐसा शक / भ्रम है कि उनकी उत्पत्ति / जन्म; सूर्यवंशी, चंद्रवंशी, अग्निकुल इन वंशो में से किस वंश से हुई है.

स्वाभाविक तौर से इन दंतकथाओं का जिक्र / वर्णन किसी भी प्राचीन वैदिक पुस्तक / ग्रन्थ में नही मिलता. जिसका सीधा सीधा मतलब ये हुआ कि जिन लोगों ने शौर्य / सेना का पेशा अपनाया वो लोग ही समय समय पर राजपूत के नाम से जाने गए.

ऊँची जाति के लोग चंडाल हो सकते हैं

अगर तथाकथित ऊँची जाति के लोग ये दावा कर सकते हैं कि दूसरे आदमी तथाकथित छोटी जाति के हैं तो हम भी ये दावा कर सकते हैं कि ये तथाकथित छोटी जाति के लोग ही असली ब्रह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं. और ये ऊँची जाति के लोग असल में चांडालों की औलादें हैं जिन्होंने शताब्दियों पहले सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया था और सारा इतिहास मिटा / बदल दिया था. आज के उपलब्ध इतिहास को अगर हम इन कुछ तथाकथित ऊँची जाति के लोगों की उत्पत्ति / जन्म की चमत्कारी कहानियों के सन्दर्भ में देखें तो हमारे दावे की और भी पुष्टि हो जाती है.

अबअगर किसी जन्मगत ब्राह्मणवादी को हमारी ऊपर लिखी बातों से बेईज्ज़ती महसूस होती है तो उसका भीकिसी आदमी को तथाकथित छोटी जाति का कहना अगर ज्यादा नहीं तोकम बेईज्ज़ती की बात नहीं है.

हम लोगों में से म्लेच्छकौन है ?

इतिहास से साफ़ साफ़ पता लगता है कि यूनानी, हूण, शक, मंगोल आदि इनके सत्ता पर काबिज़ होने के समय में भारतीय समाज में सम्मिलित होते रहे हैं. इनमे से कुछों ने तो लम्बे समय तक भारत के कुछ हिस्सों पर राज भी किया है और इसीलिए आज ये बता पाना बहुत मुश्किल है कि हममे से कौन यूनानी, हूण, शक, मंगोल आदि आदि हैं! ये सारी बातें वैदिक विचारधारा – एक मानवता – एक जाति से पूरी तरह से मेल खाती है लेकिन जन्म आधारित जातिप्रथा को पूरी तरह से उखाड़ देती हैं क्योंकि उन लोगो के लिए म्लेच्छ इन तथाकथित 4 जातियों से भी निम्न हैं.

जाति निर्धारण के तरीके की खोज में

आप ये बात तो भूल ही जाओ कि क्या वेदों ने जातिप्रथा को सहारा दिया है या फिर नकारा है ? ये सारी बातें दूसरे दर्जे की हैं. जैसा कि हम सब देख चुके हैं कि असल में “वेद” तो जन्म आधारित जातिप्रथा और लिंग भेद के ख्याल के ही खिलाफ हैं. सारी बातों से भी ज्यादा जरूरी बात ये है कि हमारे में से किसी के पास भी ऐसा कोई तरीका नहीं है कि हम सिर्फ वंशावली के आधार पर ये निश्चित कर सकें कि वेदों कि उत्पत्ति के समय से हममे से कौन ऊँची जाति का है और कौन नीची जाति का. अगर हम लोगों के स्वयं घोषित और खोखले दावों की बातों को छोड़ दें तो किसी भी व्यक्ति के जाति के दावों को विचारणीय रूप से देखने का कोई भी कारण हमारे पास नहीं है.

इसलिए अगर वेदजन्म आधारित जातिप्रथा को उचित मानते तो वेदों में हमें किसी व्यक्ति की जाति निर्धारण करने का भरोसेमंद तरीका भी मिलना चाहिए था. ऐसे किसी भरोसेमंद तरीके की गैरहाजिरी में जन्म आधारित जातिप्रथा के दावे औंधे मुंह गिर पड़ते हैं.

इसी वज़ह से ज्यादा से ज्यादा कोई भी आदमी सिर्फ ये बहस कर सकता है कि हो सकता है की वेदों की उत्पत्ति के समय पर जातिप्रथा प्रसांगिक रही हो, पर आज की तारीख में जातिप्रथा का कोई भी मतलब नहीं रह जाता.

हालाँकि हमारा विचार ये है कि, जो कि सिर्फ वैदिक विचारधारा और तर्क पर आधारित है, जातिप्रथा कभी भी प्रसांगिक रही ही नहीं और जातिप्रथा वैदिक विचारधारा को बिगाड़ कर दिखाया जाना वाला रूप है. और ये विकृति हमारे समाज को सबसे महंगी विकृति साबित हुई जिसने कि हमसे हमारा सारा का सारा गर्व, शक्ति और भविष्य छीन लिया है.

नाम में क्या रखा है ?

कृपया ये बात भी ध्यान में रखें की गोत्र प्रयोग करने की प्रथा सिर्फ कुछ ही शताब्दियों पुरानी है. आपको किसी भी प्राचीन साहित्य में ‘राम सूर्यवंशी’ और ‘कृष्ण यादव’ जैसे शब्द नहीं मिलेंगे. आज के समय में भी एक बहुत बड़ी गिनती के लोगों ने अपने गाँव, पेशा और शहर के ऊपर अपना गोत्र रख लिया है. दक्षिण भारत के लोग मूलत: अपने पिता के नाम के साथ अपने गाँव आदि का नाम प्रयोग करते हैं. आज की तारीख में शायद ही ऐसे कोई गोत्र हैं जो वेदों की उत्पत्ति के समय से चले आ रहे हों.

प्राचीन समाज गोत्र के प्रयोग को हमेशा ही हतोत्साहितकिया करता था. उस समय लोगों की इज्ज़त सिर्फ उनके गुण, कर्म और स्वाभाव को देखकर की जाती थी न कि उनकी जन्म लेने की मोहर पर. ना तो लोगों को किसी जाति प्रमाण पत्र की जरूरत थी और ना ही लोगों का दूर दराज़ की जगहों पर जाने में मनाही थी जैसा कि हिन्दुओं के दुर्भाग्य के दिनों में हुआ करता था. इसीलिए किसी की जाति की पुष्टि करने के लिए किसी के पास कोई भी तरीका ही नहीं था . किसी आदमी की प्रतिभा / गुण ही उसकी एकमात्र जाति हुआ करती थी. हाँ ये भी सच है कि कुछ स्वार्थी लोगों की वज़ह से समय के साथ साथ विकृतियाँ आती चली गयीं. और आज हम देखते हैं कि राजनीति और बॉलीवुड भी जातिगत हो चुके हैं. और इसमें कोई भी शक की गुंजाईश नहीं है कि स्वार्थी लोगों की वज़ह से ही दुष्टता से भरी इस जातिप्रथा को मजबूती मिली. इन सबके बावजूद जातिप्रथा की नींव और पुष्टि हमेशा से ही पूर्णरूप से गलत रही है.

अगर कोई भी ये दावा करता है कि शर्मा ब्राहमणों के द्वारा प्रयोग किया जाने वाला गोत्र है, तो यह विवादास्पत है क्योंकि महाभारत और रामायण के काल में लोग इसका अनिवार्य रूप से प्रयोग करते थे, इस बात का कोई प्रमाण नहीं. तो हम ज्यादा से ज्यादा ये मान सकते हैं कि हम किसी को भी शर्मा ब्राह्मण सिर्फ इसीलिए मानते हैं क्योंकि वो लोग शर्मा ब्राह्मण गोत्र का प्रयोग करते हैं. ये भी हो सकता है कि उसके दादा और पड़दादा ने भी शर्मा ब्राह्मण गोत्र का प्रयोग किया हो. लेकिन अगर एक चंडाल भी शर्मा ब्राह्मण गोत्र का प्रयोग करने लगता है और उसकी औलादें भी ऐसा ही करती हैं तो फिर आप ये कैसे बता सकते हो कि वो आदमी चंडाल है या फिर ब्राह्मण? आपको सिर्फ और सिर्फ हमारे दावों पर ही भरोसा करना पड़ेगा. कोई भी तथाकथित जातिगत ब्राह्मण यह बात नहीं करता कि वो असल में एक चंडाल के वंश से भी हो सकता है, क्योंकि सिर्फ ब्राहमणहोने से उसे इतने विशेष अधिकार और खास फायदे मिले हुए हैं.

मध्य युग के बाहरी हमले

पश्चिम और मध्य एशिया के उन्मादी कबीलों के द्वारा हजार साल के हमलों से शहरों के शहरों ने बलात्कार का मंज़र देखा. भारत के इस सबसे काले और अन्धकार भरे काल में स्त्रियाँ ही हमेशा से हमलों का मुख्य निशाना रही हैं. जब भी कासिम, तैमूर, ग़ज़नी और गौरी जैसे लुटेरों ने हमला किया तो इन्होने ये सुनिश्चित किया कि एक भी घर ऐसा ना हो की जिसकी स्त्रियों का उसके सिपाहियों ने बलात्कार ना किया हो. खुद दिल्ली को ही कई बार लूटा और बर्बाद किया गया. उत्तर और पश्चमी भारत का मध्य एशिया से आने वाला रास्ता इस अत्याचार को सदियों से झेलता रहा है. भगवान् करे कि ऐसे बुरे दिन किसी भी समाज को ना देखने पड़ें. लेकिन हमारे पूर्वजों ने तो इसके साक्षात् दर्शन किये हैं. अब आप ही बताइए कि ऐसे पीड़ित व्यक्तियों के बच्चों को तथाकथित जातिप्रथा के हिसाब से “जाति से बहिष्कृत” लोगों के सिवाय और क्या नाम दे सकते हैं ? लेकिन तसल्ली कि बात ये है कि ऐसी कोई बात नहीं है.

हमारे ऋषियों को ये पता था कि विषम हालातों में स्त्रियाँ ही ज्यादा असुरक्षित होती हैं. इसीलिए उन्होंने “मनु स्मृति” में कहा कि ” एक स्त्री चाहे कितनी भी पतित हो, अगर उसका पति उत्कृष्ट है तो वो भी उत्कृष्ट बन सकती है. लेकिन पति को हमेशा ही ये सुनिश्चित करना चाहिए कि वो पतित ना हो.

ये ही वो आदेश था जिसने पुरुषों को स्त्रियों की गरिमा की रक्षा करने के लिए प्रेरित किया और भगवन ना करे, अगर फिर से कुछ ऐसा होता है तो पुरुष फिर से ऐसी स्त्री को अपना लेंगे और अपने एक नए जीवन की शुरुआत करेंगे. विधवाएं दुबारा से शादी करेंगी और बलात्कार की शिकार पीड़ित स्त्रियों का घर बस पायेगा. अगर ऐसा ना हुआ होता तो हमलावरों के कुछ हमलों के बाद से हम “जाति से बहिष्कृत” लोगों का समाज बन चुके होते.

निश्चित तौर से, उसके बाद वाले काल में स्त्री गरिमा और धर्म के नाम पर विधवा और बलात्कार की शिकार स्त्रियों के पास सिर्फ मौत, यातना और वेश्यावृति का ही रास्ता बचा. इस बेवकूफी ने हमें पहले से भी ज्यादा नपुंसक बना दिया.

कुछ जन्म आधारित तथाकथित ऊँची-जातियों के ठेकेदार इस बात को उचित ठहरा सकते हैं कि बलात्कार की शिकार स्त्रियाँ ही “जाति से बहिष्कृत” हो जाती हैं. अगर ऐसा है तो हम सिर्फ इतना ही कहेंगे कि ये विकृति की हद्द है.

बाकी अगले भाग में

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बुध्द ओर वैदिक वर्णव्यवस्था

बुध्द ओर वैदिक वर्णव्यवस्था

मित्रो, विधाता ने जीवोँ के कल्याण के लिए
सृष्टि को बनाया है। जीवोँ के कल्याणार्थ सब भोग पदार्थ
दिये गए हैँ। परमात्मा ने अपना नित्य अनादि ज्ञान(वेद)
भी सृष्टि के आदि मेँ दिया है। जैसे सृष्टि के अन्य-अन्य
नियम(Laws) अनादि व नित्य(Eternal) हैँ। इसी प्रकार
से परमात्मा का वेदज्ञान भी अनादि व सार्वभौमिक है।
जीव कर्म करने मेँ स्वतन्त्र है। यह बात मनोविज्ञान
को भी मान्य है। यही वैदिक सिद्धान्त है।
मानव इस कारण से अपने स्वार्थ, हठ, दुराग्रह व अज्ञानवश
परमात्मा के नियम तोड़ देता है। संसार मेँ कभी एक वैदिक
धर्म सबको मान्य था। इस बात के प्रमाण बाईबल व कुरान मेँ
भी मिलते हैँ। फिर ऐसा समय
भी आया कि वेद विरूद्ध मत फैलने लगे। भारत मेँ
ही वेदोँ के नाम पर पशु हिँसा होने लगे। जन्म
की जाति-पाति, अस्पृश्यता के कारण गुण कर्म का महत्व
घटता गया। स्त्रियोँ का भी तिरस्कार होने लगा।
स्वार्थी लोगोँ ने जो केवल नाममात्र के ब्राह्मण थे,
भारतवर्ष मेँ प्रचलित वैदिक कर्मणा वर्णव्यवस्था के स्थान पर
जन्मना जाति व्यवस्था को खड़ा कर दिया। ऐसी वेला मेँ
महात्मा बुद्ध इन सबके विरूद्ध अभियान छेड़ा। बुद्ध करूणामूर्ति थे।
उनकी वाणी मेँ बल था। उन्होनेँ जन्म
की जाति पाँति, आडम्बरोँ व अन्धविश्वासोँ के विरूद्ध आवाज
उठाई। उनकी वाणी मेँ सत्य था और आत्मा मेँ
सत्य कहने का साहस। उन्होनेँ मुख्य रूप से जो पाँच यम है
उनका ही उपदेश किया। जो कुछ
भी कहा उसमेँ अधिकांश वैदिक शिक्षायेँ
ही मिलती हैँ।
महात्मा बुद्ध ने कोई ग्रन्थ नही रचा। उनके मुख्य-2
उपदेशोँ को संग्रहीत करके धम्मपद पुस्तक का संकलन
किया गया। इसमे छोटे-छोटे 26 अध्याय हैँ। इनमेँ कुल 423 उपदेश
हैँ। महात्मा बुद्ध के इन उपदेशोँ को हम एक आर्य सुधारक
की वाणी कह सकते हैँ। इस पुस्तक मेँ
मानव-कल्याण की और विश्व-शान्ति का उपदेश
देनेवाली एक भी तो ऐसी बात
नहीँ जिसे नया कहा जा सके या जो वेद
आदि प्राचीन शास्त्रोँ मेँ न हो। न जाने
राजनीति से प्रेरित होकर कुछ लोग दिन रात यह दुष्प्रचार
क्योँ करते है कि महात्मा बुद्ध ने एक नया मत चलाया था।
आश्चर्य की बात तो यह है कि बुद्ध के उपदेशोँ मेँ
‘आर्य’ कौन है और ब्राह्मण कौन है- इस विषय के कई उपदेश
हैँ और समस्त उपदेश वेदोक्त हैँ। इस युग मेँ ऋषि दयानन्द ने
भी तो यही कुछ कहा। दोनो मेँ अन्तर है
तो केवल यह कि महात्मा बुद्ध के कथन
की वेदादि प्रमाणोँ से
पुष्टि नही की गई और ऋषि दयानन्द ने
बिना प्रमाण कुछा कहा ही नहीँ।
कर्मणा वर्ण विचार पर वेद का मन्तव्य– मित्रो, वेदोँ मेँ ब्राह्मण,
क्षत्रियादि शब्द यौगिक और गुणवाचक हैँ। जो ब्रह्मा अर्थात्
परमेश्वर और वेद को जानता और उनका प्रचार करता है, वह
ब्राह्मण है। क्षत व आपत्ति से समाज और देश
की रक्षा करने वाले क्षत्रिय, व्यापारादि के लिये एक देश
से दूसरे मेँ प्रवेश करने वाले वैश्य और उच्च ज्ञानरहित होने के
कारण सेवार्थ लगने वाले शूद्र हैँ। इस प्रकार समस्त वर्ण
व्यवस्था कर्मानुसार संचालित है न कि जन्मानुसार।
च गिरीणां, सग्ड़मे च नदिनाम्। धिया विप्रो अजायत।।(यजु॰
26/15)
वेद मन्त्र यही बतलाता है
कि पर्वतोँ की उपत्यकाओँ, नदियोँ के
संगमो इत्यादि रमरीण प्रदेशोँ मेँ रहकर विद्याध्ययन करने
और उत्तम बुद्धि तथा अति श्रेष्ठ कर्म से मनुष्य ब्राह्मण बन
जाते हैँ।
कर्मणा वर्ण व्यवस्था पर बुद्ध विचार– मित्रो, महात्मा बुद्ध ने
जन्मानुसार वर्ण मानने का खण्डन किया है किन्तु गुण-कर्मानुसार
ब्राह्मण आदि मानने का उन्होनेँ स्पष्ट प्रतिपादन किया है।
सुत्त निपात वसिठ्ठ सुत्त मेँ वर्णन है कि एक वसिठ्ठ और भारद्वाज
नामके दे ब्राह्मणोँ का वर्ण भेद के विषय मेँ विवाद हुआ। वसिठ्ठ
कर्मणा वर्ण के पक्ष मेँ था और भारद्वाज जन्मना। तब उन्होनेँ इस
पर महात्मा बुद्ध से व्यवस्था माँगी। महात्मा बुद्ध ने
जो कुछ कहा उसका सार मैँ लिखता हूं।
“जो व्यापार करता है वह
व्यापारी ही कहलायेगा और शिल्पकार हम
शिल्पी ही कहेँगे ब्राह्मण
नहीँ। अस्त्र-शस्त्रोँ से अपना निर्वाह
करनेवाला मनुष्य सैनिक कहा जायेगा ब्राह्मण नही।
अपने कर्म से कोई किसान है तो कोई शिल्पकार कोई
व्यापारी है तो कोई अनुचर। कर्म पर
ही जगत् स्थित है।” (समस्त प्रकरण देखेँ सुत्त
निपात श्लोक 596 से 610 तक) मित्रोँ, महात्मा बुद्ध ने श्लोक 650
मेँ जो कहा वो मैँ लिखता हूं।
“न जच्चा ब्राह्मणो होति, न जज्चा होति अब्राह्मणो।
कम्मना ब्राह्मणो होति, कम्मना होति अब्राह्मणोँ।। मुझे
नही लगता कि इसका अर्थ मैँ लिखू
धम्मपद के ब्राह्मण वग्ग मेँ महात्मा बुद्ध ने जो उपदेश ब्राह्मण
विषयक दिये हैँ वे भी देखे-
“न जटाहि न गोत्तेहि, न जच्चा होति ब्राह्मणो। यम्हि सच्चं च
धम्मो च, सो सुची सो च ब्राह्मणो।। (धम्मपद ब्राह्मण
वग्ग 11)
अर्थात् न जटा से, न गोत्र से, न जन्म से ब्राह्मण होता है, जिसमेँ
सत्य और धर्म है वही शुचि है और
वही ब्राह्मण है। ऋषि दयानन्द और महात्मा बुद्ध–
महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेशोँ की पुष्टि मेँ
आश्चर्यजनक रूप से चाण्डाल पुत्र मातंग नामक व्यक्ति का उदाहरण
दिया है जो बाद कर्मानुसार ब्राह्मण हो गये थे। (देखेँ सुत्त निपात
हिन्दी अनुवाद पृ॰51) और अब देखिए ऋषि दयानन्द ने
भी अपने अमर ग्रन्थ “सत्यार्थ प्रकाश” मेँ एक प्रश्न
के उत्तर मेँ लिखा है कि “अन्य वर्णस्थ बहुत से लोग ब्राह्मण
हो गये हैँ जैसे जाबाल ऋषि अज्ञात कुल, विश्वामित्र क्षत्रिय वर्ण
से, और मांतग ऋषि चाण्डाल कुल से ब्राह्मण हो गये थे। अब
भी जो उत्तम विद्या स्वभाव वाला है
वही ब्राह्मण के योग्य और मूर्ख शूद्र के योग्य
होता है।(मातंग ऋषि महातपस्वी शबरी के
गुरू थे)
नोट- मित्रो, इस प्रकार हमने देखा कि महात्मा बुद्ध वैदिक
कर्मणा वर्णव्यवस्था के पोषक थे। उन्होनेँ केवल आडम्बरोँ का विरोध
किया था जो करना भी चाहिए था। इसलिए हम
श्री रमेशचन्द्रजी दत्त के परिणाम से
सर्वथा सहमत हैँ कि- “ऐतिहासिक दृष्टि से यह कथन अशुद्ध
है कि गौतम बुद्ध ने जान-बूझकर कोई नया मत चलाने का प्रयत्न
किया। उनका अन्त तक यही विश्वास
था कि ब्राह्मणोँ श्रमणोँ तथा अन्योँ मेँ प्रचलित धर्म
का प्राचीन और शुद्ध रूप मेँ प्रचार कर रहे है
जो पीछे से बिगड़ गया था।(Ancient india by R.C
Dutt Vol. II P.226)
स्वामी धर्मानन्द जी की पुस्तक
बोद्धमत और वैदिक धर्म से साभार।

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जाती व्यवस्था

जाती व्यवस्था समाज एक अभिन्न अंग है. भारत में जाती व्यवस्ता की जगह जाती भेद खड़ा किया है. चार ब्राम्हण, खत्रिय, वैश्य, और क्षुद्र आपको हर देस में देखने मिलेंगे. हर देस में इसकी अलग कोम है. हर देस में मिलिट्री मिलेगी जो खत्रिय है. हर देस में बिज़नस पीपल मिलेंगे जो वैश्य है. और क्षुद्र का अर्थ है सेवा कर्म करने वाला ..बहुत कम लोग जानते है डॉक्टर और इंजिनियर भी क्षुद्र वर्ग में आते है. ये चार वार्ण से ही समाज बनता है. नहीं तो आदिमानव की तरह लोग रहेंगे. भगवन कृष्ण ने भी चार वार्ण को खुद की विभूति बताया है. ये व्यवस्थ फिर से सरू करनी चाहिए.