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चार आश्रम

संभवत: प्राचीन काल में चार आश्रम की व्यवस्था का मनोवाज्ञानिक आधार रहा होगा |

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प्राचीन काल में, मानव जीवन की व्यवस्था को चार भागो में, विभक्त किया था , व्रह्म्चार्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और सन्यास,  जब शिशु जन्म लेता है, कुछ वर्ष तक तो उसका प्रयास अपने शरीर को संभालना होता है, और उसके बाद उसमें अपने आसपास की वस्तुओं को जानने कि जिज्ञासा होती है, और १३,१४ वर्ष की अवस्था तक पहुँचते, पहुंचते वोह अपने आस पास की जानकारी ले चुका होता है और  शरीर में शक्ति का संचार हो चुका होता है, और यह अवस्था ऐसी होती है, वोह अपने आस पास के वातावरण से तो परिचित हो ही जाता है,और वोह अपनी सोच के अनुसार प्रयोग करना चाहता है, यही वोह अवस्था होती हैं, जिसमें उसके शरीर और मस्तिष्क में परिवर्तन होने लगता हैं, इस अवस्था में होने वाले शारीरिक परिवर्तन होने के साथ, उसके मस्तिष्क में भी हार्मोनल परिवर्तन होने लगते है, aderdinal gland से निकलने वाले हारमोन,और शारीरिक परिवर्तन के कारण उसके मस्तिस्क में ऐसे प्रश्न उठने लगते हैं, जो वोह संकोच वश अपने माँ,बाप से पूछ नहीं सकता और अगर माँ बाप से पूछ भी लिया तो माँ बाप उसको संकोचवश ठीक से उत्तर दे नहीं पाते, यह अवस्था १३ वर्ष से लेकर १९ वर्ष की अवस्था तक रहती है,और इसको टीनएज और मुश्किल एज कहा जाता है, इस एज में लड़के,लड़की के कदम बहकने की बहुत सम्भावना रहती है, लड़के और लड़की में आकर्षण होने लगता है, जिसको यह लोग प्यार की संज्ञा दे देते हैं |
संभवत: इसी लिए किशोरों के लिए व्रह्म्चार्य आश्रम की व्यवस्था की गयी थी, १३,१४ वर्ष की आयु में,इन किशोरों को गुरु के पास भेजा जाता था,शक्ति तो इन लोगों में भरपूर होती थी, मस्तिष्क भी उन बातों को जानने का इछुक होता था, जिसका इन किशोरों और इनके माँ वाप के बीच में ठीक से संवाद नहीं हो सकता था, उस समय के गुरु हर प्रकार की विद्या से सपन्न होते थे,और यह गुरुजन किशोरों की शारीरिक और मानसिक शक्ति को सही दिशा देते थे |
उस समय की किशोरियों के लिए इस प्रकार कि व्यवस्था क्यों नहीं थी यह समझ नहीं आता ,और इन किशोरियों के लिए गुरु क्यों नहीं थे, प्राचीन ग्रंथो में पुरुष गुरु और किशोर शिष्य का वर्णन तो मिलता है, परन्तु किशोरियों के लिए नहीं,संभवत: पुरुष प्रधान देश होने के कारण |
किशोर गुरुओं से २५ वर्ष की अवस्था तक रहते थे, अनेकों प्रकार कि विद्याओं में और अपने मस्तिष्क में उठने वाले पर्श्नों के उत्तर अपने गुरुओं से प्राप्त कर चुके होते थे , और इन विद्याओं में पारंगत, और अपने मस्तिष्क में उठने वाले पर्श्नों का उत्तर प्राप्त कर के पूर्ण रूप से गृहस्त आश्रम में प्रवेश के लिए उपयुक्त हो जाते थे ,और उस समय की स्वयंबर प्रथा के लिए तय्यारहो जाते थे , और अपने बल  और बुद्धि कौशल पर वधु के गले में वरमाला डाल पाते थे , उसके बाद प्रारंभ हो जाता था गृहस्थ आश्रम में प्रवेश, इस गृहस्थ आश्रम को तब से आज तक  से सब से बड़ी तपस्या कहा जाता है , संतानुत्पत्ति करना,संतान को सही दिशा देना, उनका लालन पालन करना, माँ को रातों की नींद का त्याग करना, स्वयं का गीले बिस्तर पर सोना और संतान को सूखे बिस्तर पर सुलाना,पिता के लिए अपनी पत्नी और संतान के लिए जीविका कमाना, कभी संतान वीमार हुई तो जीविका कमाना तो है ही और संतान के उपचार का प्रबंध करना ना जाने माँ बाप को कितने पापड़ बेलने पड़ते थे,आज का परिवेश बादल गया है, आज के समय में तो स्त्री पुरुष एक  दूसरे के साथ कंधे से कन्धा मिला  कर आजीविका कमा रहें हैं, यह गृहस्थ आश्रम २५ से ५० वर्ष की आयु तक रहता था, फिर आता था वानप्रस्थ आश्रम, संतान अब तक गृहस्थ  आश्रम में प्रवेश कर  चुकी होती थी |
अब इस गृहस्थ आश्रम में प्रवेश की हुई संतान को केवल कभी,कभी परामर्श की आवयश्कता पड़ती थी, हस्तकशेप करना उस समय भी नहीं पसंद होता होगा,जैसे आज भी नहीं पसंद है, आज तो एक पीडी के अंतर को genration gap कहा जाता है, और यह वानप्रस्थ ऐसा होता था, वानप्रस्थ में प्रवेश करने वाले लोग अपनी गृहस्थ में प्रवेश करने वाली संतान से अलग रहते थे,बस सम्बन्ध बनाये रहते थे |
५० से ७५ वर्ष की आयु तक तो वानप्रस्थ आश्रम रहता था,और इसके बाद प्रारंभ हो जाता था सन्यास जो कि ७५ वर्ष की आयु से १०० वर्ष की आयु तक बताया जाता है, हो सकता उस समय कि सम आयु १०० वर्ष तक होती होगी, यह समय वोह होता था,जब सुब कुछ त्याग कर प्रभु भक्ति में लगने का परामर्श दिया जाता है, उतरोतर आयु में शक्ति तो रहती नहीं,और कब देहावसान हो जाये इसके बारे में कुछ ज्ञात नहीं होता, संभवत: इसीलिए सन्यास आश्रम के लिए उपरोक्त समय बताया होगा |
यह सब हुए मनोवाज्ञानिक कारण, अगले लेख में लिखूंगा मनोचिक्त्सक और मानसिक चिकत्सक में अंतर |
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वर्णाश्रम

वर्णाश्रम क्या हैं—

Aryabhushan Arya
तत्रा वर्णविषयो मन्त्रो ‘ब्राह्मणोस्य मुखमासीद्’ इत्युक्तस्तदर्थश्च । तस्यायं शेष:—
वर्णो वृणोते: ।।१।। निरू ॰२ । खं३ ।।
ब्रह्म हि ब्राह्मण: । क्षत्रं हीन्ं: क्षत्रं राजन्य: ।।२।। श कां ५ । अ १ । ब्रा १ ।।
बाहू वै मित्रावरुणौ पुरुषो गर्त: वीर्य वा एतद्राजन्यस्य यद्धाहू
वीर्य वा एतदपाद्य रस: ।। शत कां ५ । अ ४ । ब्रा ३ ।।
इषवो वै दिद्यव: ।।ल।। शत॰ कां ५। अ ४। ब्रा ४।।
भाषार्थ—अब वर्णाश्रमविषय लिखा जाता है । इस में यह विशेष जानना चाहिए कि प्रथम
मनुष्य जाति सब की एक है, सो भी वेदों से सिद्ध है, इस विषय का प्रमाण सृष्टिविषय में लिख
दिया है। तथा ‘ब्राह्मणोण्स्य मुखमासीत्’ यह मन्त्र सृष्टिविषय में लिख चुके हैं, वर्णों के प्रतिपादन
करने वाले वेदमन्त्रों की जो व्याख्या ब्राह्मण और निरुक्तादि ग्रन्थों में लिखी है, वह कुछ यहां भी
लिखते हैं—
मनुष्य जाति के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये वर्ण कहाते हैं । वेदरीति से इन के दो भेद
हैं—एक आर्य और दूसरा दस्यु । इस विषय में यह प्रमाण है कि ‘विजानीह्य्यन्ये च दस्यवो॰’
अर्थात् इस मन्त्र से परमेश्वर उपदेश करता है, कि हे जीव ! तू आर्य अर्थात् श्रेष्ठ दस्यु अर्थात्
दुष्टस्वभावयुक्त डाकू आदि नामों से प्रसिद्ध मनुष्यों के ये दो भेद जान ले । तथा ‘उत शूद्रे उत आर्ये’
इस मन्त्र से भी आर्य ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और अनार्य अर्थात् अनाड़ी जो कि शूद्र कहाते हैं, ये दो
भेद जाने गये हैं । तथा ‘असुर्या नाम ते लोका॰’ इस मन्त्र से भी देव और असुर अर्थात् विद्वान् और
मूर्ख ये दो ही भेद जाने जाते हैं । और इन्हीं दोनों के विरोध् को देवासुर संग्राम कहते हैं । ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार भेद गुण कर्मो से किये गये हैं ।
(वर्णो॰) इन का नाम वर्ण इसलिए है कि जैसे जिस के गुण कर्म हों, वैसा ही उस को
अधिकार देना चाहिए । (ब्रह्म हि ब्रा॰) ब्रह्म अर्थात् उत्तम कर्म करने से उत्तम विद्वान् ब्राह्मण वर्ण होता
है । (क्षत्रं हि॰) परम ऐश्वर्य (बाहू॰) बल वीर्य के होने से मनुष्य क्षत्रिय वर्ण होता है, जैसा कि
राजधर्म में लिख आये हैं ।।१-३।।
अत्रा ब्रह्मचर्याश्रमे प्रमाणम्—
आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भ मन्त: ।
तं रात्रीस्तिवत्त उदरे विभर्त्ति तं जातं द्रष्टुमभिसंयन्ति देव: ।।१।।
इयं समित्पृथिवी द्यौर्व्दीतीयोतान्तरिक्षं समिध पृणाति ।
ब्रह्मचारी समिधा मेखालया श्रमेण लोकांस्तपसा पिपर्त्ति ।।२।।
पूर्वों जातो ब्रह्मणो ब्रह्मचारी धंर्म वसानस्तपस दतिष्ठत ।
तस्माज्जा्ते ब्रह्मणं ब्रह्म ज्येष्ठं देवश्च सर्वे अमृतेन साकम ।।३।।
अथर्व॰ का॰ ११ ।अनु॰ ३ । व॰५ । मं॰ ३ । ४ । ५ ।
भाषार्थ—अब आगे चार आश्रमों का वर्णन किया जाता है । ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और
संन्यास ये चार आश्रम कहाते हैं । इन में से पांच वा आठ वर्ष की उमर से अड़तालीस वर्ष पर्यन्त
प्रथम ब्रह्मचर्याश्रम का समय है । इसके विभाग पितृयज्ञ में कहेंगे । वह सुशिक्षा और सत्यविद्यादि
गुण ग्रहण करने के लिये होता है ।
दूसरा गृहाश्रम जो कि उत्तम गुणों के प्रचार और श्रेष्ठ पदार्थों
की उन्नति से सन्तानों की उत्पत्ति और उन को सुशिक्षित करने के लिए किया जाता है ।
तीसरा वानप्रस्थ जिस से ब्रह्मविद्यादि साक्षात् साधन करने के लिए एकान्त में परमेश्वर का सेवन किया जाता
है ।
चौथा संन्यास जो कि परमेश्वर अर्थात् मोक्षसुख की प्राप्ति और सत्योपदेश से सब संसार के
उपकार के अर्थ किया जाता है ।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पदार्थो की प्राप्ति के लिए इन चार आश्रमों का सेवन करना
सब मनुष्यों को उचित है । इनमें से प्रथम ब्रह्मचर्याश्रम जो कि सब आश्रमों का मूल है, उस के
ठीक-ठीक सुधरने से सब आश्रम सुगम और बिगड़ने से नष्ट हो जाते हैं । इस आश्रम के विषय में
वेदों के अनेक प्रमाण हैं, उन में से कुछ यहां भी लिखते हैं—
(आचार्य उ॰) अर्थात् जो गर्भ में बस के माता और पिता के सम्बन्ध् से मनुष्य का जन्म होता
है, वह प्रथम जन्म कहाता है । और दूसरा यह है कि जिस में आचार्य पिता और विद्या माता होती
है, इस दूसरे जन्म के न होने से मनुष्य को मनुष्यपन नहीं प्राप्त होता । इसलिये उस को प्राप्त होना
मनुष्यों को अवश्य चाहिए । जब आठवें वर्ष पाठशाला में जाकर आचार्य अर्थात् विद्या पढ़ानेवाले
के समीप रहते हैं, तभी से उन का नाम ब्रह्मचारी व ब्रह्मचारिणी हो जाता है । क्योंकि वे ब्रह्म वेद
और परमेश्वर के विचार में तत्पर होते हैं । उन को आचार्य तीन रात्रिपर्यन्त गर्भ में रखता है । अर्थात्
र्इश्वर की उपासना, धर्म, परस्पर विद्या के पढ़ने और विचारने की युक्ति आदि जो मुख्य-मुख्य बातें
हैं, वे सब तीन दिन में उन को सिखार्इ जाती हैं । तीन दिन के उपरान्त उन को देखने के लिये
अध्यापक अर्थात् विद्वान् लोग आते हैं ।।१।।
(इयं समित्॰) फिर उस दिन होम करके उन को प्रतिज्ञा कराते हैं, कि जो ब्रह्मचारी पृथिवी,
सूर्य और अन्तरिक्ष इन तीनों प्रकार की विद्याओं को पालन और पूर्ण करने की इच्छा करता है, सो
इन समिधओं से पुरुषार्थ करके सब लोकों को धर्मानुष्ठान से पूर्ण आनन्दित कर देता है ।।२।।
(पूर्वो जातो ब्र॰) जो ब्रह्मचारी पूर्व पढ़ के ब्राह्मण होता है, वह धर्मानुष्ठान से अत्यन्त पुरुषार्थी होकर
सब मनुष्यों का कल्याण करता है (ब्रह्म ज्येष्ठं॰) फिर उस पूर्ण विद्वान् ब्राह्मण को, जो कि अमृत अर्थात्
परमेश्वर की पूर्ण भक्ति और धर्मानुष्ठान से युक्त होता है, देखने के लिए सब विद्वान् आते हैं ।।३।।

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‘वैदिक आश्रम व्यवस्था श्रेष्ठतम सामाजिक व्यवस्था’ -मनमोहन कुमार आर्य

ईश्वर का स्वभाव जीवों के सुख वा फलोभोग के लिए सृष्टि की रचना, पालन व प्रलय करना है। सृष्टि की रचना आदि का यह क्रम प्रवाह से अनादि है अर्थात् न तो कभी इसका आरम्भ हुआ और न कभी अन्त होगा, अर्थात् यह हमेशा चलता रहेगा। अपने इस स्वभाव के अनुसार ही ईश्वर ने वर्तमान समग्र सृष्टि को रच कर मनुष्यों सहित सभी प्राणियों को भी रचा और माता-पिता व आचार्य की भांति उनको अपना जीवन सुख पूर्वक व्यतीत करने और जीवन के चार पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करने के लिए चार वेदों का ज्ञान भी दिया। इन बातों को समझने के लिए हमें ईश्वर के  सत्य व यथार्थ स्वरुप का ज्ञान होना आवश्यक है अन्यथा यह प्रक्रिया समझ में नहीं आ सकती। ईश्वर की सत्ता सत्य है और यह सत्ता चेतन है। चेतन सत्ता, ज्ञान व गुणों से युक्त किसी क्रियाशील सत्ता को, जो सोच समझ कर व उचित-अनुचित का ध्यान रखकर कर्म वा क्रिया को करती है, कहते हैं। ईश्वर का प्रत्येक कार्य भी सत्य व न्याय पर आधारित होता है। ईश्वर के गुणकर्मस्वभाव को जानना और उसके अनुसार ही अपना जीवन बनाना अर्थात् ईश्वर के गुणों के अनुरुप ही कर्म, व्यवहार व आचरण करने को धर्म, मानव धर्म व वैदिक धर्म कहते हैं। इसके अलावा जितने भी मत, सम्प्रदाय, पन्थ, सेक्ट, रिलीजन आदि हैं वह पूर्ण व शुद्ध धर्म नहीं हैं यद्यपि उनमें किसी में कम व किसी में कुछ अधिक धर्म का भाग होता है परन्तु उनमें धर्म की पूर्णता नहीं है। ईश्वर सत्य व चेतन स्वरूप होने के साथ आनन्दस्वरूप भी है। वह अनादि काल से अब तक सदा-सर्वदा आनन्द की ही स्थिति में रहा है और भविष्य में अनन्त काल तक आनन्दपूर्वक ही रहेगा। इसका कारण उसका निष्काम कर्मों को करना है जिससे वह फल के बन्धन, सुख व दुःख, में नहीं आता। मनुष्य को निद्रा, सुषुप्ति, ध्यान व समाधि की अवस्थाओं में जो आनन्द प्राप्त होता है, वह ईश्वर के सान्निध्य के कारण ही होता है। जिस मात्रा में हमारी आत्मा का, मल, विक्षेप व आवरण की स्थिति के अनुसार, ईश्वर से सान्निध्य व सम्पर्क बनता है, उतनी ही मात्रा में हमें आनन्द की अनुभूति होती है। समाधि में यह सम्पर्क सर्वाधिक होने से सर्वाधिक आनन्द की उपलब्धि होती है। ईश्वर के अन्य गुण, कर्म व स्वभावों में उसका सर्वज्ञ, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वांधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र, सृष्टिकर्ता, जीवों को जन्म देना, कर्मों के सुख–दुःखरुपी फल देना, आयु निर्धारित करना, सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय करना आदि भी कर्म वा कार्य हैं। ईश्वर के इन गुणों पर चिन्तन-मनन करने सहित वेद व सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों को पढ़कर ईश्वर से अधिकाधिक परिचित हुआ जा सकता है।   ईश्वर सर्वगुणसम्पन्न होने के कारण सृष्टि के आरम्भ से अन्त तक एक आदर्श माता-पिता व आचार्य का कर्तव्य पूरा करता है और सभी प्राणियों की रक्षा के साथ मनुष्यों की बुद्धि की क्षमता के अनुसार अपना जीवन सुचारु व सुव्यवस्थित रुप से चलाने के लिए ज्ञान जिसे वेद कहते हैं, देता है। महर्षि दयानन्द ने सम्पूर्ण वैदिक व अवैदिक साहित्य का अध्ययन करने के बाद सन् 1875 में घोषणा की थी कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेदों का पढ़ना व पढ़ाना तथा सुनना व सुनाना सभी आर्यों अर्थात् श्रेष्ठ गुणों से युक्त एवं जन्म, जाति, मत व धर्म के पूर्वाग्रहों से रहित सभी मनुष्यों का परम कर्तव्य वा धर्म है। अतः वेदों में मनुष्येां के लिए श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करने के लिए आदर्श सामाजिक, राजनैतिक, शिक्षा व्यवस्था आदि का विस्तृत व पूर्ण ज्ञान है जिसको वैदिक व्याकरण एवं ऋषि-मुनियों के ग्रन्थों के जानकार मनुष्य समाधि अवस्था को प्राप्त होकर न केवल उसे पूर्णतया समझते हैं अपितु अन्य लोगों के हितार्थ वेदों के भिन्न-भिन्न विषयों की सरल भाषा व शब्दों में व्याख्या कर उसे प्रचारित करते हैं। यतः वेदों में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रमों का भी ज्ञान सम्मिलित है जिसका विस्तार ब्राह्मण एवं मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में किया गया है। शतपथ ब्राह्मण काण्ड 14 में ‘ब्रह्मचर्याश्रमं समाप्य गृही भवेत् गृही भूत्वा वनी भवेद्वनी भूत्वा प्रर्वजेत्।।’ में स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्यों को उचित है कि ब्रह्मचर्याश्रम को समाप्त करके गृहस्थ बने, गृहस्थी के बाद वानप्रस्थी और वानप्रस्थी के बाद संन्यासी होवें अर्थात् अनुक्रम से चार आश्रमों का विधान है। आज भारत व विश्व के प्रायः सभी देशों में इस सामाजिक व्यवस्था का कुछ विकृत रूप देखा जाता है। आईये, वैदिक आश्रम व्यवस्था के अनुसार चारों आश्रमों पर एक दृष्टि डाल लें।   ब्रह्मचर्याश्रम-आयु का प्रथम व सबसे बड़ा भाग ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य काल शिक्षा, शरीरोन्नति और दीक्षा–प्राप्ति के लिए नियत है। शिक्षा जिसको अन्य भाषाओं में ‘‘तालीम” और “Education” कहते हैं, आत्मिक शक्तियों के विकास करने को कहते हैं। दीक्षा (तरबियत) = (Ins-truction) बाहर से ज्ञान प्राप्त करके भीतर एकत्र करने का नाम है। मनुष्य का शरीर तीन प्रकार के परमाणुओं से बना है (1) सत्य, (2) रजस् और (3) तमस्। इनमें से तम अन्धकार (Ignorance) को कहते हैं। मनुष्य श्रारीर में जब तमस् परमाणु बढ़ जाते हैं, तब अन्तःकरण पर अन्धकार का आवरण आ जाता है, जिससे मानसिक शक्तियों का विकास नहीं होता, किन्तु उसी अन्धकार के आवरण (परदे) से अन्धकार की ही किरणें निकलकर उसे मूर्ख बनाया करती हैं। ‘‘रजस्” अनियमित कर्तव्य (indisciplined activity) कहते हैं। नियमित कर्तव्य को धर्म और अनियमित कर्तव्य को अधर्म कहते हैं। जब ‘‘रज” के परमाणु मनुष्य में बढ़ जाते हैं तब यह भी आचरण रूप होकर आत्मिक शक्तियों के विकास में बाधक होते हैं। और बाहर विषय-भोग की कामना में प्रकट हुआ करतें हैं। “सत्व” प्रकाश को कहते हैं। जब सत्व के परमाणु मनुष्य में बढ़ते हैं तब अन्तःकरण में प्रकाश की मात्रा बढ़ती है, जिससे सुगमता से आत्मिक शक्तियों का विकास होता है। इसलिए शिक्षा–प्राप्ति के लिए मनुष्य का यह कर्तव्य हुआ कि तम को दूर, रज को नियमित और सत्य की वृद्धि करे। इस कर्तव्य की पूर्ति के लिए शक्ति (Energy) अपेक्षित होती है, यह शक्ति ब्रह्मचर्य से प्राप्त होती है। इसलिए शिक्षा के लिए ब्रह्मचर्य अनिवार्य है। ब्रह्मचर्य से शक्ति किस प्रकार प्राप्त होती है? इसका उत्तर यह है कि मनुष्य शरीर में जब भोजन कई कार्यों, क्रियाओं वा परिवर्तनों के बाद रेत (Albumen) में परिणत होता है और सुरक्षित रहता है तब उसमें क्रमशः अग्नि, विद्युत् व ओज गुण आते हैं। अन्त में वह वीर्य के रूप में हो जाता है। यही वीर्य मनुष्य के शरीर की शक्ति का केन्द्र है। इससे सम्पूर्ण शारीरिक और आत्मिक शक्ति उत्पन्न हुआ करती है। इसी वीर्योत्पत्ति और उसके सुरक्षित रखने की कार्यप्रणाली का नाम ब्रह्चर्य है। इस प्रकार मनुष्य को अपने जीवन के पहले भाग में जिसकी न्यून से न्यून अवधि 25 वर्ष है, ब्रह्मचर्यपूर्वक शिक्षा और दीक्षा प्राप्त करनी चाहिए, सभी विद्याओं, ज्ञान व विज्ञान व इनके क्रियान्वित ज्ञान का अनुभव प्राप्त करना चाहिये, यही ब्रह्मचर्य का कर्तव्य विधान है।    गृहस्थाश्रम-सांसारिक और पारलौकिक सुख-प्राप्ति के लिए विवाह करके अपने सामर्थ्य के अनुसार परोपकार करना और नियत काल में विधि के अनुसार ईश्वर-उपासना एवं गृह के कर्तव्यों को करके सत्य धर्म में ही अपना तन-मन-धन लगाना तथा धर्मानुसार सन्तानों की उत्पत्ति, उनका पालन करना व उन्हें योग्यतम बनाना, इन मुख्य कार्यों को करने को ही गृहाश्रम कहा जाता है। यही गृहस्थाश्रम है तथा यही इसके उद्देश्य व कर्तव्य हैं। इस आश्रम में रहते हुए स्त्री व पुरुषों को नियमपूर्वक सन्तानोत्पत्ति सहित जीविका भी उपलब्ध करनी चाहिए और सन्तान को अपने से अच्छा बनाने का यत्न करना चाहिए। गृहस्थाश्रम में रहते हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, तपस्वी शूद्र अपने अपने कर्मों को करते हुए परिवार, समाज व देश को उन्नत व सशक्त बनाते हैं। गृहस्थाश्रम की अवधि सन्तानों का विवाह होने व उनकी सन्तान भी हो जाने तक है। इसके बाद जीवनोन्नति के लिए अगले आश्रम वानप्रस्थ में प्रवेश करना होता है।   वानप्रस्थाश्रम-गृहस्थाश्रम में रहने से जो विकार मनुष्य में उत्पन्न हो जाते हैं उनको दूर करके अपने को ब्रह्मचर्याश्रम वालों की भांति स्वच्छ बना लेना, इस आश्रम का मुख्योद्देश्य है। यही आश्रम संन्यासाश्रम में जाने की तैयारी का काम किया करता है। वानप्रस्थ आश्रम नाम से यह विदित होता है कि इस आश्रम में प्रवेश व निवास के लिए स्वगृह व परिवार से दूर वन में जाना है। आजकल वन में जाना व रहना कठिन व सम्भव कोटि में नहीं है। महर्षि दयानन्द ने तो युवावस्था से सीधे ही संन्यास ले लिया था और वह सारा जीवन देश का भ्रमण करते रहे। इसका कारण यह था कि उन्हें ज्ञान की पिपासा थी और इसकी पूर्ति वन आदि किसी एक स्थान पर रहकर पूरी नहीं की जा सकती थी। अतः वानप्रस्थ आश्रम ऐसे स्थान पर करना है जहां इस आश्रम के अन्य लोग हों और उन्हें ईश्वर के ध्यान व समाधि का क्रियात्मक प्रशिक्षण वेद के मर्मज्ञ विद्वानों व अपने सहाध्यायियों से भली प्रकार से मिल सके। वानप्रस्थ आश्रम में वेदों के मर्मज्ञ विद्वान व प्रातः सायं यज्ञ की व्यवस्था भी होनी चाहिये जिनकी संगति व अनुष्ठान करके वानप्रस्थी संन्यास के सर्वथा योग्य बन सकें। इसी क्रम में हरिद्वार-ज्वालापुर में स्थित ‘‘आर्य वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम” की चर्चा कर लेना भी उचित होगा। यह आश्रम सम्प्रति नगर के बीच में स्थित है। यहां सैकड़ों वानप्रस्थी व संन्यासी रहते हैं और अच्छे साधकों से भी यह स्थान परिपूर्ण है। यदि यहां रहकर वानप्रस्थ किया जाये, तो हमारी दृष्टि में वह भी उद्देश्य को पूरा करने में सहायक व फलितार्थ हो सकता है।   संन्यासाश्रम–मनुष्य को वानप्रस्थ से अन्तिम संन्यासाश्रम में आकर मुक्ति के साधनों को काम में लाते हुए जगत् के सुधार का भी यत्न करना पड़ता है। महर्षि दयानन्द ने लिखा है कि संन्यास आश्रम में प्रविष्ट मनुष्य मोहादि आवरण व पक्षपात छोड़ कर तथा विरक्त होकर सब पृथिवी में परोपकार्थ विचरण करे। यहां विचरण करने से तात्पर्य अविद्यान्धकार, अज्ञान व मिथ्या मान्यताओं का प्रतिकार व प्रतिवाद कर वेद व आर्ष-ज्ञान का प्रचार करे तथा असत्य मत व मान्यताओं का खण्डन भी करें जिससे समाज व देश के सभी मनुष्य असत्य व अज्ञान से पृथक होकर सत्य मान्यताओं व सिद्धान्तों को धारण कर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के मार्ग पर चलते हुए लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। महर्षि दयानन्द वैदिक मान्यताओं के अनुरुप आदर्श संन्यासी थे। उन्होंने अपने संन्यासी जीवन में ईश्वरोपासना करते हुए ज्ञान का अर्जन किया और समाज के कल्यार्थ वा सुधारार्थ असत्य व अज्ञान का खण्डन करते हुए सत्य पर आधारित वैदिक मान्यताओं का मण्डन व प्रचार किया। इसका अनुकरण करना ही संन्यास का सच्चा स्वरुप व उदाहरण माना जा सकता है।   वैदिक धर्म में चार आश्रमों व चार वर्णो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र का विधान मनुष्य की पूर्ण व अधिकतम शारीरिक, सामाजिक, बौद्धिक व आत्मिक उन्नति को ध्यान में रखकर किया गया है। वैदिक विधानों से पूर्ण यह आश्रम व्यवस्था ही संसार की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था है जिसमें सभी मनुष्यों की सांसारिक व पारलौकिक दोनों ही उन्नति होती है। यह लक्ष्य अन्य किसी जीवन पद्धति से प्राप्त नहीं किया जा सकता। अतः इस व्यवस्था व इसके अनुरुप जीवन व्यतीत करने से मनुष्य अपने उद्देश्य व लक्ष्य प्राप्ति के निकट पहुंच कर उसे प्राप्त करने में समर्थ होता है। आईये ! वैदिक वर्ण-आश्रम व्यवस्था को स्वयं अपनायें व उसका प्रचार कर इसे सर्वत्र स्थापित करने का प्रयास करें।    –मनमोहन कुमार आर्य पताः 196 चुक्खूवाला-2 देहरादून-248001 फोनः09412985121

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चार आश्रम

गृहस्थ के बिना संन्यास नहीं होता और संन्यास न हो, तो गृहस्थ का महत्व नहीं रहता उसमें शुद्घि और पवित्रता नहीं रहती। गृह-वास एवं गृह-त्याग, दोनों का अपना-अपना महत्व है। ब्राह्मण परम्परा में चार प्रकार के आश्रम माने गए हैं। इन चार आश्रमों में ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम आते हैं। इस प्रकार जीवन को चार भागों में बांट दिया गया है। पच्चीस वर्ष तक मनुष्य को विद्यार्थी जीवन, आगामी पच्चीस वर्ष तक गृहस्थ जीवन, तत्पश्र्चात पच्चीस वर्ष तक वानप्रस्थ जीवन और अंत में पच्चीस वर्ष तक ही संन्यास जीवन ग्रहण कर लेना चाहिए। यही ब्राह्मण परम्परा की मान्यता रही है।

इन चार आश्रमों में सबसे बड़ा है गृहस्थ जीवन। महाभारत में इसका बहुत समर्थन किया गया है। प्रश्न प्रस्तुत हुआ- गृहस्थ आश्रम सबसे बड़ा कैसे? इस प्रश्न के संदर्भ में कहा गया कि ब्रह्मचर्य आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम, संन्यास आश्रम- इन तीनों को धारण कौन करता है? इनका भरण-पोषण कौन करता है? ज्ञान और अन्न, दोनों दृष्टियों से ये तीनों आश्रम गृहस्थाश्रम पर अवलम्बित हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम के व्यक्तियों को गृहस्थ पंडित पढ़ाते हैं, अध्यापक पढ़ाते है। उनके अन्न की व्यवस्था भी गृहस्थ ही करते हैं। वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की व्यवस्था का उत्तरदायित्व भी गृहस्थ वहन करता है। मनुस्मृति का प्रसिद्घ श्लोक है-

यस्मात् त्रयोप्याश्रमिणो, ज्ञानेनान्नेन चान्वहम्।

गृहस्थेनैव धार्यन्ते, तस्माज्ज्येष्ठा श्रमो गृही।।

ज्ञान और अन्न के द्वारा तीनों आश्रमों को गृहस्थ ही धारण करता है, इसलिए वह ज्येष्ठाश्रम है, सबसे बड़ा आश्रम है। गृहस्थ ही तीनों आश्रमों की व्यवस्था वहन करता है, इसीलिए यह ब्राह्मण परंपरा के अनुरूप बनाए गए चारों आश्रमों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना गया है।

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चार आश्रम

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भारतीय संस्कृति ने जीवन के हर क्षेत्र में गम्भीरता से विचार किया जाये ।। सम्पूर्ण जीवन को सौ वर्षों का मान कर २५- २५ वर्षों के चार भाग बना दिये हैं ।। प्रथम पच्चीस वर्ष शरीर, मन, बुद्धि के विकास के लिए रखे गये हैं ।। इस आश्रम का नाम ब्रह्मचर्य है ।। इन वर्षों में युवक या युवती को संयमित जीवन बिताकर आने वाले सांसारिक जीवन के उपयुक्त शक्ति- संचय करना पड़ता था । वह मूलतः एक विद्यार्थी ही होता था, जिसका कार्य प्रधान रूप से शारीरिक, मानसिक और नैतिक शक्तियाँ प्राप्त करना था ।। यह ठीक भी है, जब तक हर प्रकार की शक्तियाँ एकत्रित कर मनुष्य सुसंगठित न बने, जब तक उसकी बुद्धि और मन शरीर इत्यादि की शक्तियों का पूरा- पूरा विकास न हो, वह पूरी तरह चरित्रवान्, संयमी दृढ़ निश्चयी न बने, तब तक उसे सांसारिक जीवन में प्रविष्ठ नहीं होना चाहिए ।।

दूसरा आश्रम गृहस्थ है २५ से ५० वर्ष की आयु गृहस्थ आश्रम के लिए है ।। पति- पत्नी धार्मिक जीवन व्यतीत करते हुए पूरी जिम्मेदारी से अपने नागरिक कर्तव्यों को पालन करते थे ।। परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी को पूरा करते थे ।। अपने व्यवसाय में दिलचस्पी लेकर आनंदमय जीवन व्यतीत करते थे ।। धर्माचरण द्वारा गृहस्थ जीवन के सुख प्राप्त करते थे धर्म, अर्थ, काम मोक्ष, आदि चारों का सुख भोग करने का विधान है ।।

उम्र ढलने पर सांसारिक कार्यों से हटना चाहिए ।। लेकिन इस पृथकता से समय लगता है ।। धीरे- धीरे भौतिक जीवन की आवश्यकताएँ कमी करनी होती है ।। अतः ५० से ७५ वर्ष तक की आयु से गृहस्थ भार से मुक्त होकर जन- सेवा का विधान है ।। इसे वानप्रस्थ कहा गया है ।। गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों से मुक्ति पाना मनुष्य का मानसिक स्थिति के लिए परम उपयोगी है ।। पारमार्थिक जीवन के लिए पर्याप्त समय निकल आता है ।। वानप्रस्थ का अर्थ यह भी है कि घर पर रहते हुए ही मनुष्य ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करे, संयम का अभ्यास करे, बच्चों को विद्या पढ़ायें, फिर धीरे- धीरे अपनी जिम्मेदारी अपने बच्चों पर डालकर बाहर निकल जाये ।। पूर्ण परिपक्व व्यक्ति ही घर से बाहर संन्यासी के रूप में निकल कर जनता के हित के लिए सार्वजनिक कार्य कर सकता था ।। चिकित्सा, धर्म- प्रचार और पथ- प्रदर्शन का कार्य इन योग्यतम संन्यासियों के हाथ में ही रहता था ।। समाज उन्नति की दिशा में आगे बढ़ता था ।। आज जैसे कम उम्र के अनुभव विहीन दिखावटी धर्म प्रचारक उन दिनों नहीं थे ।। वे पैसा- कौड़ी भी न लेते थे और काम पूरे मन से करते थे ।। आज इतना व्यय करने पर भी वह लाभ नहीं होता ।। संन्यास की पहिचान भी ज्ञान ही है ।।

यह आश्रम- व्यवस्था भारतीय मनोवैज्ञानिकों की तीव्र बुद्धि कौशल की सूचक है ।। व्यवसायिक दक्षता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य पूरे परिश्रम और लगन से २५ वर्ष तक तप जाने से मनुष्य आगे आने वाले जीवन के लिए मजबूत बन जाता था ।। जिम्मेदारियों, अच्छाइयों, बुराइयों को समझ जाता था ।। आश्रम- परिवर्तन तात्पर्य उसके मन में धीरे- धीरे आने वाला मानसिक परिवर्तन भी था ।। धीरे- धीरे मानसिक परिपक्वता आती थी और अगला आश्रम आसान बनता जाता था ।। चुनाव और सोचने के लिए भी पर्याप्त अवकाश प्राप्त हो जाता हाथ ऐसा भी था कि सीधे ब्रह्मचर्य से कुछ उपकारी व्यक्ति वानप्रस्थ हो जाते थे ।। और संन्यास ले लेते थे ।। तात्पर्य यह कि एक आदर्श मार्ग-दर्शन का रूप हमारे इन वर्णाश्रमों में रखा गया था ।। आज इस व्यवस्था में गड़बड़ी आ गई है ।। इस कारण तपे हुए अनुभवी वृद्ध कार्यकर्त्ता समाज को नहीं मिल रहे हैं ।। उपदेशकों और प्रचारकों में अर्थ मोह या प्रसिद्धि का मोह बना हुआ है ।।

यह आश्रमों की परम्परा जब तक हमारे देश में जीवित रही तब तक यश, श्री और सौभाग्य में यह राष्ट्र सर्व शिरोमणि बना रहा ।। श्रेय और प्रेय का इतना सुन्दर सामंजस्य किसी अन्य जाति या धर्म में मिलना कठिन है ।। हमारी कल्पना है कि मनुष्य आनंद में जन्म लेता है ।। आनंद से जीवित रहता और अन्त में आनंद में ही विलीन हो जाता है ।। मनुष्य का लक्ष्य भी यही है ।। इन आवश्यकता की पूर्ति आश्रम व्यवस्था में ही सन्निहित है ।। समाज की सुदृढ़ रचना और मनुष्य के जीवन ध्येय की पूर्ति के लिये आश्रम- व्यवस्था का पुनर्जागरण आवश्यक है ।।

(भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व पृ.सं.४.२८- २९)

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आश्रम

आश्रम

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आश्रम (मानव अवस्थाएँ)जिन संस्थाओं के ऊपर हिन्दू समाज का संगठन हुआ है, वे हैं – वर्ण और आश्रम। वर्ण का आधार मनुष्य की प्रकृति अथवा उसकी मूल प्रवृत्तियाँ हैं, जिसके अनुसार वह जीवन में अपने प्रयत्नों और कर्तव्यों का चुनाव करता है। आश्रम का आधार संस्कृति अथवा व्यक्तिजत जीवन का संस्कार करना है। मनुष्य जन्मना अनगढ़ और असंस्कृत होता है; क्रमश: संस्कार से वह प्रबुद्ध और सुसंस्कृत बन जाता है।

सम्पूर्ण मानवजीवन मोटे तौर पर चार विकासक्रमों में बाँटा जा सकता है-

  1. बाल्य और किशोरावस्था
  2. यौवन
  3. प्रौढ़ावस्था और
  4. वृद्धावस्था

चार आश्रम

मानव के चार विकासक्रमों के अनुरूप ही चार आश्रमों की कल्पना की गई थी, जो निम्न प्रकार हैं-

  1. ब्रह्मचर्य- इसका पालनकर्ता ब्रह्मचारी अपने गुरु, शिक्षक के प्रति समर्पित और आज्ञाकारी होता है।
  2. गार्हस्थ्य- इसका पालनकर्ता गृहस्थ अपने परिवार का पालन करता है और ईश्वर तथा पितरों के प्रति कर्तव्यों का पालन करते हुए पुरोहितों को अवलंब प्रदान करता है।
  3. वानप्रस्थ- इसका पालनकर्ता भौतिक वस्तुओं का मोह त्यागकर तप और योगमय वानप्रस्थ जीवन जीता है।
  4. सन्न्यास- इसका पालनकर्ता सन्न्यासी सभी वस्तुओं का त्याग करके देशाटन और भिक्षा ग्रहण करता है तथा केवल शाश्वत का मनन करता है।

शास्त्रीय पद्धति में मोक्ष (सांसारिक लगावों से स्व की मुक्ति) की गहन खोज जीवन के अन्तिम दो चरणों से गुज़र रहे व्यक्तियों के लिए सुरक्षित है। लेकिन वस्तुत: कई सन्न्यासी कभी विवाह नहीं करते तथा बहुत कम गृहस्थ ही अन्तिम दो आश्रमों में प्रवेश करते हैं।

नाम और क्रम में अन्तर

आश्रमों के नाम और क्रम में कहीं-कहीं अन्तर पाया जाता है। आपस्तम्ब धर्मसूत्र[1] के अनुसार गार्हस्थ्य, आचार्यकुल (ब्रह्मचर्य), मौन और वानप्रस्थ चार आश्रम थे। गौतम धर्मसूत्र[2] में ब्रह्मचारी, गृहस्थ, भिक्षु और वैखानस चार आश्रमों के नाम हैं। वसिष्ठधर्मसूत्र [3] ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और परिव्राजक का उल्लेख करता है।

आश्रम सम्बन्ध

आश्रमों का सम्बन्ध विकास कर्म के साथ-साथ जीवन के मौलिक उद्देश्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से भी था-ब्रह्मचर्य का सम्बन्ध मुख्यत: धर्म अर्थात् संयम-नियम से, गार्हस्थ्य का सम्बन्ध अर्थ-काम से, वानप्रस्थ का सम्बन्ध उपराम और मोक्ष की तैयारी से और सन्न्यास का सम्बन्ध मोक्ष से था। इस प्रकार उद्देश्यों अथवा पुरुषार्थों के साथ आश्रम का अभिन्न सम्बन्ध है।

आश्रम शब्द का चुनाव

जीवन की इस प्रक्रिया के लिए आश्रम शब्द का चुनाव बहुत ही उपयुक्त था। यह शब्द श्रम् धातु से बना है, जिसका अर्थ है श्रम करना अथवा पौरुष दिखलाना (अमरकोष, भानुजी दीक्षित)। सामान्यत: इसके तीन अर्थ प्रचलित हैं-

  1. वह स्थिति अथवा स्थान जिसमें श्रम किया जाता है
  2. स्वयं श्रम अथवा तपस्या और
  3. विश्रामस्थान

आश्रम (संस्था)

वास्तव में आश्रम जीवन की वे अवस्थाएँ हैं, जिनमें मनुष्य श्रम, साधना और तपस्या करता है और एक अवस्था की उपलब्धियों को प्राप्त कर लेता है तथा इनसे विश्राम लेकर जीवन के आगामी पड़ाव की ओर प्रस्थान करता है।

आश्रम का अर्थ

आश्रम व्यवस्था ने ईसा के बाद पहली शताब्दी में एक धर्मशास्त्रीय ढाँचे की रचना की। यह ऊँची जाति के पुरुषों के लिए आदर्श थी, जिसे वस्तुत: व्यक्तिगत या सामाजिक रूप से कभी-कभी ही प्राप्त किया जा सकता था। दूसरे अर्थ में आश्रम शब्द का तात्पर्य शरणस्थल है, विशेषकर शहरी जीवन से दूर, जहाँ आध्यात्मिक व योग साधना की जाती है। अक्सर ये आश्रम एक केन्द्रीय शिक्षक या गुरु की उपस्थिति से सम्बद्ध होते हैं, जो आश्रम के अन्य निवासियों की आराधना या श्रद्धा का केन्द्र होता है। गुरु औपचारिक रूप से संगठित क्रम या आध्यात्मिक समुदाय से सम्बन्धित हो भी सकता है और नहीं भी।

विभिन्न मत

मनु के अनुसार मनुष्य का जीवन सौ वर्ष का होना चाहिए (शतायुर्वे पुरुष:) अतएव चार आश्रमों का विभाजन 25-25 वर्ष का होना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में चार अवस्थाएँ स्वाभाविक रूप से होती हैं और मनुष्य को चारों आश्रमों के कर्तव्यों का यथावत् पालन करना चाहिए। परन्तु कुछ ऐसे सम्प्रदाय प्राचीन काल में थे और आज भी हैं, जो नियमत: इनका पालन करना आवश्यक नहीं समझते। इनके मत को बाध कहा गया है। कुछ सम्प्रदाय आश्रमों के पालन में विकल्प मानते हैं अर्थात् उनके अनुसार आश्रम के क्रम अथवा संख्या में हेरफेर हो सकता है। परन्तु संतुलित विचारधारा आश्रमों के समुच्चय में करती आई हैं। इसके अनुसार चारों आश्रमों का पालन क्रम से होना चाहिए। जीवन के प्रथम चतुर्थांश में ब्रह्मचर्य, द्वितीय चतुर्थांश में गार्हस्थ्य, तृतीय चतुर्थांश में वानप्रस्थ और अन्तिम चतुर्थांश में सन्न्यास का पालन करना चाहिए। इसके अभाव में सामाजिक जीवन का संतुलन भंग होकर मिथ्याचार अथवा भ्रष्टाचार की वृद्धि होती है।

आश्रम कर्तव्य

विभिन्न आश्रमों के कर्तव्यों का विस्तृत वर्णन आश्रमधर्म के रूप से स्मृतियों में पाया जाता है। संक्षेप में मनुस्मृति से आश्रमों के कर्तव्य नीचे दिए जा रहे हैं-

  1. ब्रह्मचर्य आश्रम में गुरुकुल में निवास करते हुए विद्यार्जन और व्रत का पालन करना चाहिए [4]
  2. दूसरे आश्रम गार्हस्थ्य में विवाह करके घर बसाना चाहिए; सन्तान उत्पत्ति द्वारा पितृऋण, यज्ञ द्वारा देवऋण और नित्य स्वाध्याय द्वारा ऋषिऋण चुकाना चाहिए [5]
  3. वानप्रस्थ आश्रम में सांसारिक कार्यों से उदासीन होकर तप, स्वाध्याय, यज्ञ, दान आदि के द्वारा वन में जीवन बिताना चाहिए [6]
  4. वानप्रस्थ समाप्त करके सन्न्यास आश्रम में प्रवेश करना होता है। इसमें सांसारिक सम्बन्धों का पूर्णत: त्याग और परिव्रजन (अनागारिक होकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहना) विहित है [7]

बोध प्रदाता

वर्ण और आश्रम मनुष्य के सम्पूर्ण कर्तव्यों का समाहार करते हैं। परन्तु जहाँ वर्ण मनुष्य के सामाजिक कर्तव्यों का विधान करता है, वहाँ आश्रम व्यक्तिगत कर्तव्यों का। आश्रम व्यक्तिगत जीवन की विभिन्न विकास सरणियों का निदेशन करता है और मनुष्य को इस बात का बोध कराता है कि उसके जीवन का उद्देश्य क्या है। उसको प्राप्त करने के लिए उसको जीवन का किस प्रकार संघठन करना चाहिए। वास्तव में जीवन की यह अनुपम और उच्चतम कल्पना और योजना है। अन्य देशों के इतिहास में इस प्रकार की जीवन-योजना नहीं पाई जाती है। प्रसिद्ध विद्वान डॉयसन ने इसके सम्बन्ध में लिखा है-

हम यह नहीं कह सकते कि मनुस्मृति तथा अन्य स्मृतियों में वर्णित जीवन की यह योजना कहाँ तक व्यावहारिक जीवन में कार्यान्वित हुई थी। परन्तु हम यह स्वीकार करने में स्वतंत्र हैं कि हमारे मत में मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में ऐसी कोई विचारधारा नहीं है, जो इस विचार की महत्ता की समता कर सके।

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आश्रम-व्यवस्था

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ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास ये चार आश्रम कहलाते हैं। श्रम से जीवन को सफल बनाने के कारण आश्रम कहा जाता है।
१) ब्रह्मचर्य-आश्रम (सुशिक्षा और सत्यविद्यादि गुणों को ग्रहण करने के लिए)
२) गृहस्थ-आश्रम (उत्तम गुणों के आचरण और श्रेष्ठ पदार्थों की उन्नति से सन्तानों की उत्पत्ति और सुशिक्षा)
३) वानप्रस्थ-आश्रम (ब्रह्म-उपासना, एकान्त-सेवन, विद्याफल विचार आदि कार्यों के लिए)
४) संन्यास-आश्रम (परब्रह्म, मोक्ष, परमानन्द को प्राप्त होने के लिए)
धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष इन चार पदार्थों की प्राप्ति के लिए इन चार आश्रमों का सेवन करना सब मनुष्यों को उचित है। इनमें से प्रथम ब्रह्मचर्याश्रम जो की सब आश्रमों का मूल है, उसके ठीक-ठीक सुधरने से सब आश्रम सुगम होते और बिगडने से सब आश्रम नष्ट हो जाते हैं।

ब्रह्मचर्य-आश्रम:
आचार्य सुश्रुत के अनुसार, २५ वर्ष आयु के पुरुष के समतुल्य १६ वर्षीया कन्या होती है। इस आयु में दोनों का शारीरिक और मानसिक विकास समतुल्य होता है। – (सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान १.३५.१३)

ब्रह्मचर्य ३ प्रकार का होता है:
१) कनिष्ठ – जिस प्रकार २४ अक्षरों का गायत्री छन्द होता है, उसी प्रकार २४ वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य धारण करने वाले पुरुष को वसु ब्रह्मचारी कहते हैं। कन्याओं का १६ वर्ष पर्यन्त। जो इतने समय तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदादि विद्या और सुशिक्षा का ग्रहण करे, तो उसके शरीर में प्राण बलवान् होकर सब शुभगुणों के वास कराने वाले होते हैं।
२) मध्यम – जिस प्रकार ४४ अक्षरों का त्रिष्टुप छन्द होता है, उसी प्रकार ४४ वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य धारण करने वाले पुरुष को रूद्र ब्रह्मचारी कहते हैं। कन्याओं का २२ वर्ष पर्यन्त। जो इतने समय तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदाभ्यास करता है, उसके प्राण, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण और आत्मा बलयुक्त होके सब दुष्टों को रुलाने वाले और श्रेष्ठों का पालन करने वाले होते हैं।
३) उत्तम – जिस प्रकार ४८ अक्षरों का जगती छन्द होता है, उसी प्रकार ४८ वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य धारण करने वाले पुरुष को आदित्य ब्रह्मचारी कहते हैं। कन्याओं का २४ वर्ष पर्यन्त। जो इतने समय तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदाभ्यास करता है, उसके प्राण, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण अनुकूल होकर आत्मा सकल विद्याओं से युक्त हो जाता है।
२४ वर्ष आयु की समाप्ति से पूर्व पुरुष को और १६ वर्ष आयु से पूर्व कन्या को विवाह नहीं करना चाहिए। ४८ वर्ष आयु के पश्चात् पुरुष को और २४ वर्ष की आयु के पश्चात् कन्या को ब्रह्मचर्य नहीं रखना चाहिए। किन्तु यह नियम विवाह करने वाले पुरुष और कन्याओं का है, और जो विवाह करना ही न चाहें वे मरणपर्यन्त ब्रह्मचारी रह सकते हों, तो भले ही रहे, परन्तु यह सामर्थ्य पूर्ण विद्या वाले जितेन्द्रिय और निर्दोष योगी स्त्री-पुरुषों का है।

ब्रह्मचर्य-आश्रम के वेदों में अनेक प्रमाण हैं, उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:
आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः। तं रात्रीस्त्रिस्र उदरे बिभर्त्ति तं जातं द्रष्टुमभिसंयन्ति देवा: ।।३।।
इयं समित्पृथिवी द्यौरद्वितियोतान्तरिक्षम् समिधा पृणाति। ब्रह्मचारी समिधा मेखलया श्रमेण लोकांस्तपसा पिपर्त्ति।।४।।
पूर्वो जातो ब्रह्मणो ब्रह्मचारी घर्मं वसानस्तपसोदतिष्ठत्। तस्माज्जातं ब्राह्मणं ब्रह्म ज्येष्ठं देवाश्च सर्वे अमृतेन साकम् ।।५।।
– अथर्ववेद काण्ड-११, अनुवाक-३, वर्ग-५, मन्त्र-३,४,५
अर्थात् जो गर्भ में बसके माता और पिता के सम्बन्ध से मनुष्य का जन्म होता है, वह प्रथम जन्म कहाता है। और दूसरा वह की जिसमें आचार्य पिता और विद्या माता होती है, इस दूसरे जन्म के न होने से मनुष्य को मनुष्यपन प्राप्त नहीं होता। इसीलिए उसको प्राप्त होना मनुष्यों को अवश्य चाहिए। जब आठवें वर्ष गुरुकुल में जाकर आचार्य के समीप रहते हैं, तभी से उनका नाम ब्रह्मचारी व ब्रह्मचारिणी हो जाता है। क्योंकि वे ब्रह्म (वेद और परमात्मा) के विचार में तत्पर रहते हैं। उनको आचार्य तीन रात्रि पर्यन्त गर्भ में रखता है, अर्थात् ईश्वर की उपासना, धर्म, परस्पर विद्या के पढने और विचारने की युक्ति आदि जो मुख्य-मुख्य बातें हैं, वे सब तीन दिन में उनको सिखाई जाती हैं। तीन दिन के उपरान्त उनको देखने के लिए अध्यापक अर्थात् विद्वान् लोग आते हैं।।३।।
फिर उस दिन होम करके उनको प्रतिज्ञा कराते हैं, की जो ब्रह्मचारी पृथिवी, सूर्य और अन्तरिक्ष इन तीनों प्रकार की विद्याओं को पालन और पूर्ण करने की इच्छा करता है, सो इन समिधाओं से पुरुषार्थ करके सब लोकों को धर्मानुष्ठान से पूर्ण आनन्दित कर देता है।।४।।
जो ब्रह्मचारी पूर्व वेदानुकूल आचरण करके ब्राह्मण होता है, वह धर्मानुष्ठान से अत्यन्त पुरुषार्थी होकर सब मनुष्यों का कल्याण करता है, फिर उस पूर्ण विद्वान् ब्राह्मण को, जो की अमृत अर्थात् परमेश्वर की पूर्ण भक्ति और धर्मानुष्ठान से युक्त होता है, उसे देखने के लिए सब विद्वान आते हैं।।५।।

ब्रह्मचार्येति समिधा समिद्धः कार्ष्णम् वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रु:।
स सद्य एति पूर्वस्मादुत्तरम् समुद्रं लोकान्त्संगृभ्य मुहुराचरिक्रत् ।।६।।
ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्मापो लोकं प्रजापतिम् परमेष्ठिनं विराजम्।
गर्भो भूत्वामृतस्य योनाविन्द्रो ह भूत्वाऽसुरांस्ततर्ह ।।७।।
ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति । आचार्यो ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते ।।१७।।
ब्रह्मचर्येण कन्या३ युवानं विन्दते पतिम् । अनड्वान् ब्रह्मचर्येणाश्वो घासं जिगीषति ।।१८।।
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत । इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्व१राभरत् ।।१९।।
– अथर्ववेद काण्ड- ११, अनुवाक- ३ मन्त्र- ६, ७, १७, १८, १९

जो ब्रह्मचारी होता है, वही ज्ञान से प्रकाशित तप और बडे-बडे केश-श्मश्रुओं से युक्त दीक्षा को प्राप्त होके विद्या को प्राप्त होता है । तथा जो की शीघ्र ही विद्या को ग्रहण करके पूर्व समुद्र जो ब्रह्मचर्याश्रम का अनुष्ठान है, उसके पार उतरकर उत्तर-समुद्रस्वरुप गृहाश्रम को प्राप्त होता है, और अच्छी प्रकार विद्या का संग्रह करके विचारपूर्वक अपने उपदेश का सौभाग्य बढाता है।।६।।

वह ब्रह्मचारी वेद-विद्या को यथार्थ जानकर प्राण-विद्या, लोक-विद्या तथा प्रजापति परमेश्वर जो की सबसे बडा और सबका प्रकाशक है, उसका जानना, इन विद्याओं में गर्भरूप और इन्द्र अर्थात् ऐश्वर्यरूप होके असुर अर्थात् मूर्खों की अविद्या का छेदन कर देता है।।७।।

पूर्ण ब्रह्मचर्य से विद्या पढके और सत्यधर्म के अनुष्ठान से राजा राज्य करने को और आचार्य विद्या पढ़ाने को समर्थ होता है। आचार्य उसको कहते हैं, जो की असत्याचार छुडाकर, सत्याचार का और अनर्थों को छुडाके, अर्थों का ग्रहण कराके, ज्ञान को बढा देता है।।१७।।

जब वह कन्या ब्रह्मचर्याश्रम से पूर्ण विद्या पढ चुके, तब अपनी युवावस्था में, पूर्ण जवान पुरुष को अपना पति करे। इसी प्रकार, पुरुष भी सुशील धर्मात्मा स्त्री के साथ प्रसन्नता से विवाह करके, दोनों परस्पर सुख-दुःख में सहायकारी हों। क्योंकि अनड्वान् अर्थात् पशु भी जो पूरी जवानी पर्यन्त ब्रह्मचर्य अर्थात् सुनियम में रखा जाए तो अत्यन्त बलवान होके निर्बल जीवों को जीत लेता है।।१८।।

ब्रह्मचर्य और धर्मानुष्ठान से ही विद्वान् लोग जन्म-मरण को जीतकर मोक्षसुख को प्राप्त हो जाते हैं। जैसे इन्द्र अर्थात् सूर्य, परमेश्वर के नियम में स्थित होके, सब लोकों का प्रकाश करने वाला हुआ है, वैसे ही मनुष्य का आत्मा ब्रह्मचर्य से प्रकाशित होके सबको प्रकाशित कर देता है।।१९।।

बिना ब्रह्मचर्य के किसी को भी यथायोग्य विद्या की प्राप्ति नहीं होती। ब्रह्मचर्याश्रम ही सभी आश्रमों का मूल है। ब्रह्मचर्य के अनुष्ठान से ही गृहाश्रम आदि तीनों आश्रमों में सुख होता है, अन्यथा मूल के अभाव में शाखा कैसे होगी?
किन्तु यदि मूल रूपी ब्रह्मचर्य दृढ है, तभी वृक्षरूपी मनुष्य-जीवन शाखा, फल, छाया आदि सुखों से युक्त होता है।

गृहस्थ-आश्रम:- आश्रम-व्यवस्था में गृहस्थाश्रम का क्रमानुसार दूसरा स्थान है। गृहस्थाश्रम में पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए और अपने सन्तान के लिए त्याग करते हैं। गृहस्थाश्रम तपश्चर्या का आश्रम है। इसमें सम्बन्धों की स्थापना होती है।
वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वापि यथाक्रमम्। अविलुप्त ब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रमाविशेत् ।। मनुस्मृति अध्याय-३, श्लोक-२
जब यथावत् ब्रह्मचर्य आचार्यानुकूल वर्त्तकर, धर्म से चारों, तीन वा दो, अथवा एक वेद को सांगोपांग पढके जिसका ब्रह्मचर्य खण्डित न हुआ हो, वह पुरुष वा स्त्री गृहाश्रम में प्रवेश करे।

वेदों में गृहस्थाश्रम का प्रमाण:
युवा॑ सु॒वासा॒: परि॑वीत॒ आगा॒त्स उ॒ श्रेया॑न्भवति॒ जाय॑मानः । तं धीरा॑सः क॒वय॒ उन्न॑यन्ति स्वा॒ध्यो॒३॒॑ मन॑सा देव॒यन्त॑: ॥
—ऋ॰ 3.8.4॥
जो पुरुष (परिवीतः) सब ओर से यज्ञोपवीत, ब्रह्मचर्य सेवन से उत्तम शिक्षा और विद्या से युक्त (सुवासाः) सुन्दर वस्त्र धारण किया हुआ ब्रह्मचर्ययुक्त (युवा) पूर्ण ज्वान होके विद्याग्रहण कर गृहाश्रम में (आगात्) आता है ( स उ) वही दूसरे विद्याजन्म में (जायमानः) प्रसिद्ध होकर (श्रेयान्) अतिशय शोभायुक्त मङ्गलकारी (भवति) होता है (स्वाध्यः) अच्छे प्रकार ध्यानयुक्त (मनसा) विज्ञान से (देवयन्तः) विद्यावृद्धि की कामनायुक्त (धीरासः) धैर्ययुक्त (कवयः) विद्वान् लोग (तम्) उसी पुरुष को (उन्नयन्ति) उन्नतिशील करके प्रतिष्ठित करते हैं और जो ब्रह्मचर्यधारण, विद्या, उत्तम शिक्षा का ग्रहण किये विना अथवा बाल्यावस्था में विवाह करते हैं वे स्त्री पुरुष नष्ट भ्रष्ट होकर विद्वानों में प्रतिष्ठा को प्राप्त नहीं होते॥
आ धे॒नवो॑ धुनयन्ता॒मशि॑श्वीः सब॒र्दुघा॑: शश॒या अप्र॑दुग्धाः । नव्या॑नव्या युव॒तयो॒ भव॑न्तीर्म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म् ॥
—ऋ॰ मं॰ 3। सू॰ 55। मं॰ 16॥
जो (अप्रदुग्धाः) किसी से दुही न हो उन (धेनवः) गौओं के समान (अशिश्वीः) बाल्यावस्था से रहित (सबर्दुघाः) सब प्रकार के उत्तम व्यवहारों का पूर्ण करनेहारी (शशयाः) कुमारावस्था को उल्लंघन करने हारी (नव्यानव्याः) नवीन-नवीन शिक्षा और अवस्था से पूर्ण (भवन्तीः) वर्त्तमान (युवतयः) पूर्ण युवावस्थास्थ स्त्रियां (देवानाम्) ब्रह्मचर्य, सुनियमों से पूर्ण विद्वानों के (एकम्) अद्वितीय (महत्) बड़े (असुरत्वम्) प्रज्ञा शास्त्रशिक्षायुक्त प्रज्ञा में रमण के भावार्थ को प्राप्त होती हुई तरुण पतियों को प्राप्त होके (आधुनयन्ताम्) गर्भ धारण करे कभी भूल के भी बाल्यावस्था में पुरुष का मन से भी ध्यान न करें क्योंकि यही कर्म इस लोक और परलोक के सुख का साधन है। बाल्यावस्था में विवाह से जितना पुरुष का नाश उस से अधिक स्त्री का नाश होता है॥

सुमंगली प्रतरणी गृहाणाम् सुशेवा पत्ये श्वशुराय शम्भू: । स्योना श्वश्रवै प्र गृहान् विशेमान्।। – अथर्ववेद १४.२.२६
अर्थात् अच्छे मंगलाचरण करने तथा दोष और शोकादि से पृथक रहने वाली, गृहकार्यों में चतुर और तत्पर रहकर, उत्तम सुखयुक्त होके पति, श्वसुर और सासु के लिए, सुखकर्त्री और स्वयं प्रसन्न हुई इस घर में सुखपूर्वक प्रवेश कर।
गृहस्थाश्रम में प्रवेश:
(सुश्रुतसंहिता, शारीरस्थान १०-४६, ४८) में लिखा है:-
“सोलह वर्ष से कम आयु वाली स्त्री में पच्चीस वर्ष से न्युन आयु वाला पुरुष जो गर्भ का स्थापन करे तो वह कुक्षिस्थ हुआ गर्भ विपत्ति को प्राप्त होता है, अर्थात् पूर्णकाल तक गर्भाशय में रहकर उत्पन्न नहीं होता, अथवा उत्पन्न हो तो फिर चिरकाल तक नहीं जीता। यदि जिये तो दुर्बलेन्द्रिय होता है।”
अतः विवाह बाल्यावस्था में नहीं होना चाहिए, युवावस्था में विवाह ठीक रहता है।

स संधार्य: प्रयत्नेन स्वर्गमक्षयमिच्छता। सुखं चेहेच्छता नित्यं योऽधार्यो दुर्बलेन्द्रियै: ।। – (मनु० ३/७९)
अर्थ- जो मोक्ष और संसार के सुख की इच्छा करता है, वह गृहस्थाश्रम को धारण करे। वह गृहस्थ निर्बल इन्द्रियवालों के द्वारा धारण करने के योग्य नहीं है।
काममामरणात्तिष्ठेद् गृहे कन्यर्तुमत्यपि। न चैवेनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ।। – (मनु० ९/८९)
अर्थ- कन्या रजस्वला होने पर भी चाहे मृत्युपर्यन्त घर में अविवाहित बैठी रहे, परन्तु पिता कभी उसे गुणहीन युवक के साथ विवाहित न करे।
उपर्युक्त दोनों श्लोकों के अनुसार, विवाह से पहले युवक और युवती का स्वस्थ और सबलेन्द्रिय होना आवश्यक है। इसके साथ-साथ आजीविका के साधन से सम्पन्न होने के साथ ही दोनों का सदाचारी होना भी अत्यन्त आवश्यक है।
यथानदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् । तथैवाश्रमिण: सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ।। – (मनु० ३/६६)
यथावायुं समाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्वजन्तव:। तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्व आश्रमा: ।। – (मनु० ३/७७)
यस्मात्त्रयोऽप्याश्रमिणो दानेनान्नेन चान्वहम्। गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही ।। – (मनु० ३/७८)
अर्थात् जैसे नदी और बड़े-बड़े नद तब तक भ्रमते ही रहते हैं जब तक समुद्र को प्राप्त नहीं होते, वैसे गृहस्थ ही के आश्रय से सब आश्रम स्थिर रहते हैं।। जैसे वायु के आश्रय से सब जीवों का जीवन सिद्ध होता है,वैसे ही गृहस्थ के आश्रय से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और क संन्यास आश्रमों का निर्वाह होता है। अर्थात् जिस प्रकार वायु के बिना प्राणियों का जीवन चल ही नहीं सकता,वैसे ही गृहस्थाश्रम के बिना उक्त तीनों आश्रम टिक ही नहीं सकते॥ जिस से ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी तीन आश्रमों को दान और अन्नादि देके प्रतिदिन गृहस्थ ही धारण करता है इससे गृहस्थ ज्येष्ठाश्रम है, अर्थात् सब व्यवहारों में धुरन्धर कहाता है॥
इसलिये जितना कुछ व्यवहार संसार में है उस का आधार गृहाश्रम है। जो यह गृहाश्रम न होता तो सन्तानोत्पत्ति के न होने से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम कहां से हो सकते? जो कोई गृहाश्रम की निन्दा करता है वही निन्दनीय है और जो प्रशंसा करता है वही प्रशंसनीय है। परन्तु तभी गृहाश्रम में सुख होता है जब स्त्री पुरुष दोनों परस्पर प्रसन्न, विद्वान्, पुरुषार्थी और सब प्रकार के व्यवहारों के ज्ञाता हों। इसलिये गृहाश्रम के सुख का मुख्य कारण ब्रह्मचर्य और पूर्वोक्त स्वयंवर विवाह है।

वानप्रस्थ आश्रम:- वानप्रस्थ का समय ५० वर्ष की आयु के उपरान्त है। यह विज्ञान बढाने और तपश्चर्या करने के लिए है। जब केश श्वेत होने लगे और पुत्र को भी सन्तान हो जाए तब अपनी स्त्री, पुत्र, भाई-बन्धु, पुत्रवधू आदि को सब गृहाश्रम की शिक्षा करके वन की ओर यात्रा की तैयारी करें। यदि स्त्री चले तो साथ ले जावें, नहीं तो ज्येष्ठ पुत्र को सौंप जावे की इसकी सेवा यथावत् किया करना, और अपनी पत्नी को शिक्षा कर जावें की, तू सदा पुत्र आदि को धर्ममार्ग में चलने के लिए और अधर्म से हटाने के लिए शिक्षा करती रहना। सब इष्ट-मित्रों से मिल, पुत्रादिकों पर सब घर का दायित्व धरकर वानप्रस्थ आश्रम में जीवन का तृतीय भाग व्यतीत करना चाहिए।
आ नयैतमा रभस्व सुकृतां लोकमपि गच्छतु प्रजानन्। तीर्त्वा तमांसि बहुधा महान्त्यजो नाकमा क्रमतां तृतीयम्।।
– अथर्ववेद काण्ड-९, सूक्त-५, मन्त्र-१
अर्थात् हे गृहस्थ! प्रकर्षता से जानता हुआ तू इस वानप्रस्थ आश्रम का आरम्भ कर। अपने मन को गृहाश्रम से इधर की ओर ला। पुण्यात्माओं के देखने योग्य वानप्रस्थाश्रम को भी प्राप्त हो। बहुत प्रकार के बडे-बडे अज्ञान दुःख आदि संसार के मोहों को तर के अर्थात् पृथक होकर, अपने आत्मा को अजर-अमर जान। तीसरे दुःखरहित वानप्रस्थ-आश्रम को रीति पूर्वक आरूढ होवो।
मनुस्मृति अध्याय-६ के अनुसार,
जंगल में वेदादि शास्त्रों को पढने-पढाने में नित्य-युक्त मन और इन्द्रियों को जीतकर यदि स्वस्त्री भी समीप हो, तथापि उससे सेवा के सिवाय विषय सेवन अर्थात् भोग-विलास कभी ना करें। सबसे मित्रभाव, सावधान, नित्य देनेवाला, और किसी से कुछ भी न लेवें। सब प्राणी पर अनुकम्पा रखने वाला होवे। जो जंगल में पढाने और योगाभ्यास करनेवाले तपस्वी धर्मात्मा विद्वान् लोग रहते हों, जो की गृहस्थ वा वानप्रस्थ वनवासी हों, उनके घरों में से भिक्षा ग्रहण करें। और इस प्रकार वन में वसता हुआ इन और अन्य दीक्षाओं का सेवन करें, और आत्मा तथा परमात्मा के ज्ञान के लिए नाना प्रकार के उपनिषद् अर्थात् ज्ञान और उपासना विधायक श्रुतियों के अर्थों का विचार किया करें, इसी प्रकार, जब तक संन्यास करने की इच्छा न हो, तब तक वानप्रस्थ ही रहें।
वानप्रस्थ आश्रम की न्यूनतम अवधि १२ वर्ष और अधिकतम २५ वर्ष है। – (संस्कार-विधि)
इस प्रकार, वानप्रस्थ आश्रम में अग्निहोत्र की सामग्री सहित जंगल में जाकर, एकान्त में निवासकर योगाभ्यास, शास्त्रों का विचार, महात्माओं का संग करके, स्वात्मा और परमात्मा को साक्षात् करने में प्रयत्नशील होना चाहिए।

संन्यास आश्रम:- जो मोहादि आवरण पक्षपात छोडकर, विरक्त होकर संसार में परोपकार्थ विचरण करना।
आयु का चौथा भाग अर्थात् ७० वर्ष के पश्चात् सब मोहादि संगों को छोडकर संन्यासी हो जावे।
– मनुस्मृति, संस्कार-विधि
संन्यास आश्रम में प्रवेश के ३ प्रकार:
१) ब्रह्मचर्य पूर्ण करके गृहस्थ, गृहस्थ होके वनस्थ, वनस्थ होके संन्यासी होवे अर्थात् अनुक्रम से आश्रमों का अनुष्ठान करते-करते, वृद्धावस्था में जो संन्यास लेना है, उसी को क्रम-संन्यास कहते हैं।
२) यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेद् वनाद् वा गृहाद् वा। – (ब्राह्मण-ग्रन्थ)
अर्थात् जिस दिन दृढ वैराग्य प्राप्त होवे उसी दिन, चाहे वानप्रस्थ का समय पूरा भी ना हुआ हो, अथवा वानप्रस्थ-आश्रम का अनुष्ठान न करके गृहाश्रम से ही संन्यास-आश्रम ग्रहण करें, क्योंकि संन्यास लेने में दृढ वैराग्य और यथार्थ ज्ञान का होना मुख्य कारण है।
३) ब्रह्मचर्या देव प्रव्रजेत् – (ब्राह्मण-ग्रन्थ) यदि पूर्ण अखण्डित ब्रह्मचर्य, सच्चा वैराग्य और पूर्ण ज्ञान-विज्ञान, को प्राप्त होकर विषयासक्ति की इच्छा आत्मा से यथावत् उठ जावे, पक्षपातरहित होकर सबके उपकार करने की इच्छा होवे, और जिसको दृढ निश्चय हो जावे की मैं मरण-पर्यन्त यथावत् संन्यास धर्म का निर्वाह कर सकूंगा, तो वह न गृहाश्रम करे, न वानप्रस्थ-आश्रम, किन्तु ब्रह्मचर्याश्रम को पूर्ण कर ही के संन्यासाश्रम को ग्रहण कर लेवे।

वेदों में संन्यास आश्रम के प्रमाण:
यद्दे॑वा॒ यत॑यो यथा॒ भुव॑ना॒न्यपि॑न्वत । अत्रा॑ समु॒द्र आ गू॒ळ्हमा सूर्य॑मजभर्तन ॥ – ऋग्वेद मण्डल-१०, सूक्त-७२, मन्त्र-७
हे पूर्ण विद्वान् संन्यासी लोगों! तुम जैसे इस आकाश में, गुप्त स्वयं प्रकाशस्वरुप सूर्यादि का प्रकाशक परमात्मा है, उसको चारों ओर से अपने आत्माओं में धारण करो, और आनन्दित होवो वैसे जो सब भुवनस्थ गृहस्थादि मनुष्य हैं, उनको सदा विद्या और उपदेश से संयुक्त किया करो, यही तुम्हारा परम धर्म है।
श॒र्य॒णाव॑ति॒ सोम॒मिन्द्र॑: पिबतु वृत्र॒हा । बलं॒ दधा॑न आ॒त्मनि॑ करि॒ष्यन्वी॒र्यं॑ म॒हदिन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥
आ प॑वस्व दिशां पत आर्जी॒कात्सो॑म मीढ्वः । ऋ॒त॒वा॒केन॑ स॒त्येन॑ श्र॒द्धया॒ तप॑सा सु॒त इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥
– ऋग्वेद मण्डल-९, सूक्त-११३, मन्त्र- १, २
(श॒र्य॒णाव॑ति॒ …) अर्थात् जैसे मेघ का नाश करने वाला सूर्य हिंसनीय पदार्थों से युक्त भूमितल में स्थित रस को पीता है, वैसे संन्यास लेने वाला पुरुष उत्तम मूल फलों के रस को पीवे और अपने आत्मा में, बडे सामर्थ्य को करूँगा, ऐसी इच्छा करता हुआ, दिव्य बल को धारण करता हुआ, परमैश्वर्य के लिए, हे चन्द्रमा के तुल्य सबको आनन्दित करने वाले पूर्ण विद्वान् तू संन्यास लेके सब पर सत्योपदेश की वृष्टि कर।।१।।
(आ प॑वस्व…) अर्थात् हे सोम्यगुणसम्पन्न ! सत्य से सबके अन्तःकरण को सींचने वाले, सब दिशाओं में स्थित मनुष्यों को सच्चा ज्ञान देकर पालन करने वाले, शम-दम आदि गुणयुक्त संन्यासिन् ! तू यथार्थ बोलने, सत्यभाषण करने से, सत्य के धारण में सच्ची प्रीति और प्राणायाम योगाभ्यास से, सरलता से, निष्पन्न होता हुआ, तू अपने शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि को पवित्र कर। परम-ऐश्वर्ययुक्त परमात्मा के लिए सब ओर से गमन कर ।।२।।

मनुस्मृति के अनुसार:
संन्यासी को चाहिए की शिर के बाल, दाढ़ी-मूँछ और नखों को समय-समय पर छेदन कराता रहे। कुसुम के रंगे हुए वस्त्रों, पात्र एवं दण्ड को धारण किया करे। संन्यासी को यज्ञोपवीत, शिखा का बन्धन नहीं रहता।
जो संन्यासी यथार्थ ज्ञान वा षटदर्शनों से युक्त है, वह दुष्ट कर्मों में बद्ध नहीं होता, और जो ज्ञान, विद्या, योगाभ्यास, सत्संग, धर्मानुष्ठान एवं षडदर्शनों से रहित विज्ञानहीन होकर संन्यास लेता है, वह संन्यास पदवी और मोक्ष को प्राप्त न होकर जन्म-मरण रूप संसार को प्राप्त होता है, और ऐसे मूर्ख अधर्मी को संन्यास का लेना व्यर्थ है, और धिक्कार देने योग्य है।
ऐसे तो मुख्यतः ब्राह्मण जो पूर्ण विद्वान् धार्मिक परोपकारप्रिय मनुष्य है, उसे ही संन्यास लेने का अधिकार है, क्योंकि बिना पूर्ण विद्या के धर्म, परमेश्वर की निष्ठा और वैराग्य के संन्यास ग्रहण करने में संसार का विशेष उपकार नहीं हो पाता। वैसे जो विद्वान्, वैराग्यवान, और परोपकारप्रिय द्विज (ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य) है, वह संन्यास ले सकता है।
जैसे शरीर में शिर की आवश्यकता है, वैसे ही आश्रमों में संन्यासाश्रम की आवश्यकता है। क्योंकि इसके बिना विद्या, धर्म कभी नहीं बढ सकता और दूसरे आश्रमों को विद्याग्रहण, गृहकृत्य और तपश्चार्यादी का सम्बन्ध होने से अवकाश बहुत कम मिलता है। पक्षपात छोडकर वर्त्तना दूसरे आश्रमों को दुष्कर है। जैसे संन्यासी सर्वतोमुक्त होकर जगत् का उपकार करता है, वैसा अन्य आश्रम नहीं कर सकता। क्योंकि संन्यासी को सत्यविद्या से पदार्थों के विज्ञान की उन्नति का जितना अवकाश मिलता है, उतना अन्य आश्रम को नहीं मिल सकता। परन्तु जो ब्रह्मचर्य आश्रम से संन्यासी होकर जगत् को सत्यशिक्षा करके जितनी उन्नति कर सकता है, उतनी गृहस्थ वा वानप्रस्थ आश्रम करके संन्यासाश्रमी नहीं कर सकता।

ये चारों आश्रम वेदों और युक्तियों से सिद्ध हैं, क्योंकि सब मनुष्यों को अपनी आयु का प्रथम भाग, विद्या पढने में, व्यतीत करना चाहिए, और पूर्णविद्या को पढकर उससे संसार की उन्नति करने के लिए गृहाश्रम भी अवश्य करें। तथा विद्या और संसार के उपकार के लिए एकान्त में बैठकर सब जगत् का अधिष्ठाता जो ईश्वर है, उसका ज्ञान अच्छी प्रकार करें, और मनुष्यों को सब व्यवहारों का उपदेश करें। फिर उनके सब सन्देहों का छेदन और सत्य बातों का निश्चय कराने के लिए संन्यास आश्रम भी अवश्य ग्रहण करें, क्योंकि इसके बिना सम्पूर्ण पक्षपात छूटना बहुत कठिन है।