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इतिहास के प्रकांड पंडित डॉ. रघुबीर प्राय: फ्रांस जाया करते थे। वे सदा फ्रांस के राजवंश के एक परिवार के यहाँ ठहरा करते थे।

उस परिवार में एक ग्यारह साल की सुंदर लड़की भी थी। वह भी डॉ. रघुबीर की खूब सेवा करती थी। अंकल-अंकल बोला करती थी।

एक बार डॉ. रघुबीर को भारत से एक लिफाफा प्राप्त हुआ। बच्ची को उत्सुकता हुई। देखें तो भारत की भाषा की लिपि कैसी है। उसने कहा अंकल लिफाफा खोलकर पत्र दिखाएँ। डॉ. रघुबीर ने टालना चाहा। पर बच्ची जिद पर अड़ गई।

डॉ. रघुबीर को पत्र दिखाना पड़ा। पत्र देखते ही बच्ची का मुँह लटक गया अरे यह तो अँगरेजी में लिखा हुआ है।

आपके देश की कोई भाषा नहीं है?

डॉ. रघुबीर से कुछ कहते नहीं बना। बच्ची उदास होकर चली गई। माँ को सारी बात बताई। दोपहर में हमेशा की तरह सबने साथ साथ खाना तो खाया, पर पहले दिनों की तरह उत्साह चहक महक नहीं थी।

गृहस्वामिनी बोली डॉ. रघुबीर, आगे से आप किसी और जगह रहा करें। जिसकी कोई अपनी भाषा नहीं होती, उसे हम फ्रेंच, बर्बर कहते हैं। ऐसे लोगों से कोई संबंध नहीं रखते।

गृहस्वामिनी ने उन्हें आगे बताया “मेरी माता लोरेन प्रदेश के ड्यूक की कन्या थी। प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व वह फ्रेंच भाषी प्रदेश जर्मनी के अधीन था। जर्मन सम्राट ने वहाँ फ्रेंच के माध्यम से शिक्षण बंद करके जर्मन भाषा थोप दी थी।

फलत: प्रदेश का सारा कामकाज एकमात्र जर्मन भाषा में होता था, फ्रेंच के लिए वहाँ कोई स्थान न था।

स्वभावत: विद्यालय में भी शिक्षा का माध्यम जर्मन भाषा ही थी। मेरी माँ उस समय ग्यारह वर्ष की थी और सर्वश्रेष्ठ कान्वेंट विद्यालय में पढ़ती थी।
एक बार जर्मन साम्राज्ञी कैथराइन लोरेन का दौरा करती हुई उस विद्यालय का निरीक्षण करने आ पहुँची। मेरी माता अपूर्व सुंदरी होने के साथ साथ अत्यंत कुशाग्र बुद्धि भी थीं। सब ‍बच्चियाँ नए कपड़ों में सजधज कर आई थीं। उन्हें पंक्तिबद्ध खड़ा किया गया था।

बच्चियों के व्यायाम, खेल आदि प्रदर्शन के बाद साम्राज्ञी ने पूछा कि क्या कोई बच्ची जर्मन राष्ट्रगान सुना सकती है?

मेरी माँ को छोड़ वह किसी को याद न था। मेरी माँ ने उसे ऐसे शुद्ध जर्मन उच्चारण के साथ इतने सुंदर ढंग से सुना पाते।

साम्राज्ञी ने बच्ची से कुछ इनाम माँगने को कहा। बच्ची चुप रही। बार बार आग्रह करने पर वह बोली ‘महारानी जी, क्या जो कुछ में माँगू वह आप देंगी?’

साम्राज्ञी ने उत्तेजित होकर कहा ‘बच्ची! मैं साम्राज्ञी हूँ। मेरा वचन कभी झूठा नहीं होता। तुम जो चाहो माँगो। इस पर मेरी माता ने कहा ‘महारानी जी, यदि आप सचमुच वचन पर दृढ़ हैं तो मेरी केवल एक ही प्रार्थना है कि अब आगे से इस प्रदेश में सारा काम एकमात्र फ्रेंच में हो, जर्मन में नहीं।’

इस सर्वथा अप्रत्याशित माँग को सुनकर साम्राज्ञी पहले तो आश्चर्यकित रह गई, किंतु फिर क्रोध से लाल हो उठीं। वे बोलीं ‘लड़की’ नेपोलियन की सेनाओं ने भी जर्मनी पर कभी ऐसा कठोर प्रहार नहीं किया था, जैसा आज तूने शक्तिशाली जर्मनी साम्राज्य पर किया है।

साम्राज्ञी होने के कारण मेरा वचन झूठा नहीं हो सकता, पर तुम जैसी छोटी सी लड़की ने इतनी बड़ी महारानी को आज पराजय दी है, वह मैं कभी नहीं भूल सकती।

जर्मनी ने जो अपने बाहुबल से जीता था, उसे तूने अपनी वाणी मात्र से लौटा लिया।

मैं भलीभाँति जानती हूँ कि अब आगे लारेन प्रदेश अधिक दिनों तक जर्मनों के अधीन न रह सकेगा।

यह कहकर महारानी अतीव उदास होकर वहाँ से चली गई। गृहस्वामिनी ने कहा ‘डॉ. रघुबीर, इस घटना से आप समझ सकते हैं कि मैं किस माँ की बेटी हूँ।

हम फ्रेंच लोग संसार में सबसे अधिक गौरव अपनी भाषा को देते हैं। क्योंकि हमारे लिए राष्ट्र प्रेम और भाषा प्रेम में कोई अंतर नहीं…।’

हमें अपनी भाषा मिल गई। तो आगे चलकर हमें जर्मनों से स्वतंत्रता भी प्राप्त हो गई। आप समझ रहे हैं ना !

*********                    ।। मदनमोहन छाबड़ा की फेसबुक से साभार

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संस्कृत वाक्य

मेरे मित्र ने पुस्तक पढ़ी I मम मित्रं पुस्तकं अपठत् I
वे लोग घर पर क्या करेंगे I ते गृहे किम करिष्यन्ति I
यह गाय का दूध पीता है I सः गोदुग्धम पिवति I
हम लोग विद्यालय जाते है I वयं विद्यालयं गच्छाम: I
तुम शीघ्र घर जाओ I त्वं शीघ्रं गृहम् गच्छ I
हमें मित्रों की सहायता करनी चाहिये I वयं मित्राणां सहायतां कुर्याम I
विवेक आज घर जायेगा I विवेकः अद्य गृहं गमिष्यामि I
सदाचार से विश्वास बढता है I सदाचारेण विश्वासं वर्धते I
वह क्यों लज्जित होता है ? सः किमर्थम् लज्जते ?
हम दोनों ने आज चलचित्र देखा I आवां अद्य चलचित्रम् अपश्याव I
हम दोनों कक्षा में अपना पाठ पढ़ेंगे | आवां कक्षायाम्‌ स्व पाठम पठिष्याव: I
वह घर गई I सा गृहम्‌ अगच्छ्त्‌ I
सन्तोष उत्तम सुख है I संतोषः उत्तमं सुख: अस्ति I
पेड़ से पत्ते गिरते है I वृक्षात्‌ पत्राणि पतन्ति I
मै वाराणसी जाऊंगा I अहं वाराणासीं गमिष्यामि I
मुझे घर जाना चाहिये I अहं गृहं गच्छेयम्‌ I
यह राम की किताब है I इदं रामस्य पुस्तकम्‌ अस्ति I
हम सब पढ़ते हैं I वयं पठामः I
सभी छात्र पत्र लिखेंगे I सर्वे छात्राः पत्रं लिखिष्यन्ति I
मै विद्यालय जाऊंगा I अहं विद्यालयं गमिष्यामि I
प्रयाग में गंगा -यमुना का संगम है | प्रयागे गंगायमुनयो: संगम: अस्ति |
हम सब भारत के नागरिक हैं | वयं भारतस्य नागरिका: सन्ति |
वाराणसी गंगा के पावन तट पर स्थित है | वाराणसी गंगाया: पावनतटे स्थित: अस्ति |
वह गया | स: आगच्छ्त् |
वह किसका घोड़ा है ? स: कस्य अश्व: अस्ति ?
तुम पुस्तक पढ़ो | त्वं पुस्तकं पठ |
हम सब भारत के नागरिक हैं | वयं भारतस्य नागरिका: सन्ति |
देशभक्त निर्भीक होते हैं | देशभक्ता: निर्भीका: भवन्ति |
सिकन्दर कौन था ? अलक्षेन्द्र: क: आसीत् ?
राम स्वभाव से दयालु हैं | राम: स्वभावेन दयालु: अस्ति |
वृक्ष से फल गिरते हैं | वृक्षात् फलानि पतन्ति |
शिष्य ने गुरु से प्रश्न किया | शिष्य: गुरुं प्रश्नम् अपृच्छ्त् |
मैं प्रतिदिन स्नान करता हूँ | अहं प्रतिदिनम् स्नानं कुर्यामि |
मैं कल दिल्ली जाऊँगा | अहं श्व: दिल्लीनगरं गमिष्यामि |
प्रयाग में गंगा-यमुना का संगम है | प्रयागे गंगायमुनयो: संगम: अस्ति |
वाराणसी की पत्थर की मूर्तियाँ प्रसिद्ध हैं | वाराणस्या: प्रस्तरमूर्त्तय: प्रसिद्धा: |
अगणित पर्यटक दूर देशो से वाराणसी आते हैं | अगणिता: पर्यटका: सुदूरेभ्य: देशेभ्य: वाराणसी नगरिम् आगच्छन्ति |
यह नगरी विविध कलाओ के लिए प्रसिद्ध हैं | इयं नगरी विविधानां कलानां कृते प्रसिद्धा अस्ति |
वे यहा नि:शुल्क विद्या ग्रहण करते हैं | ते अत्र नि:शुल्कं विद्यां गृह्णन्ति |
वाराणसी में मरना मंगलमय होता है | वाराणस्यां मरणं मंगलमयं भवति |
सूर्य उदित होगा और कमल खिलेंगे | सूर्य: उदेष्यति कमलानि च हसिष्यन्ति |
रात बीतेगी और सवेरा होगा | रात्रि: गमिष्यति, भविष्यति सुप्रभातम् |
कुँआ सोचता है कि हैं अत्यन्त नीच हूँ | कूप: चिन्तयति नितरां नीचोsस्मीति |
भिक्षुक प्रत्येक व्यक्ति के सामने दीन वचन मत कहो | भिक्षुक! प्रत्येकं प्रति दिन वच: न वद्तु |
हंस नीर- क्षीर विवेक में प्रख्यात हैं | हंस: नीर-क्षीर विवेक प्रसिद्ध अस्ति |
सत्य से आत्मशक्ति बढ़ती है | सत्येन आत्मशक्ति: वर्धते |
अपवित्रता से दरिद्रता बढ़ती है | अशौचेन दारिद्रयं वर्धते|
अभ्यास से निपुणता बढ़ती है| अभ्यासेन निपुणता वर्धते |
उदारता से अधिकतर बढ़ते है | औदार्येण प्रभुत्वं वर्धते |
उपेक्षा से शत्रुता बढ़ती है | उपेक्षया शत्रुता वर्धते|
मानव जीवन को संस्कारित करना ही संस्कृति है | मानव जीवनस्य संस्करणाम् एव संस्कृति: अस्ति
भारतीय संस्कृति सर्वश्रेष्ठ है | भारतीया: संस्कृति: सर्वश्रेष्ठ: अस्ति |
सभी निरोग रहें और कल्याण प्राप्त करें | सर्वे संतु निरामया: सर्वे भद्राणि पश्यंतु च |
काम करके ही फल मिलता है | कर्म कृत्वा एव फलं प्राप्यति |
हमारे पूर्वज धन्य थे | अस्माकं पूर्वजा: धन्या: आसन्|
हम सब एक ही संस्कृति के उपासक हैं| वयं सर्वेsपि एकस्या: संस्कृते: समुपासका: सन्ति |
जन्म भूमि स्वर्ग से भी बड़ी है | जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी|
विदेश में धन मित्र होता है| विदेशेषु धनं मित्रं भवति |
विद्या सब धनों में प्रधान है | विद्या सर्व धनं प्रधानम् |
मनुष्य को निर्लोभी होना चाहिये | मनुष्य: लोभहीन: भवेत्|
आज मेरे विद्यालय मे उत्सव होगा| अद्य मम् विद्यालये उत्सव: भविष्यति |
ताजमहल यमुना किनारे पर स्थित है | ताजमहल: यमुना तटे स्थित: अस्ति |
हमे नित्य भ्रमण करना चाहिये | वयं नित्यं भ्रमेम |
गाय का दूध गुणकारी होता है | धेनो: दुग्धं गुणकारी भवति |
जंगल मे मोर नाच रहे हैं | वने मयूरा: नृत्यन्ति |
किसी के साथ बुरा कार्य मत करो | केनापि सह दुष्कृतं मा कुरु|
सच और मीठा बोलो | सत्यं मधुरं च वद |
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संस्कृत वाकय

अजीर्णे भोजनं विषम्
अपाचन हुआ हो तब भोजन विष समान है ।

कुभोज्येन दिनं नष्टम् ।
बुरे भोजन से पूरा दिन बिगडता है ।

मनः शीघ्रतरं वातात् ।
मन वायु से भी अधिक गतिशील है ।

न मातुः परदैवतम् ।
माँ से बढकर कोई देव नहीं है ।

गुरुणामेव सर्वेषां माता गुरुतरा स्मृता ।
सब गुरु में माता को सर्वश्रेष्ठ गुरु माना गया है ।

वस्त्रेण किं स्यादिति नैव वाच्यम् ।
वस्त्रं सभायामुपकारहेतुः ॥
अच्छे या बुरे वस्त्र से क्या फ़र्क पडता है एसा न बोलो, क्योंकि सभा में तो वस्त्र बहुत उपयोगी बनता है !

वृध्दा न ते ये न वदन्ति धर्मम् ।
जो धर्म की बात नहीं करते वे वृद्ध नहीं हैं ।

अन्तो नास्ति पिपासयाः ।
तृष्णा का अन्त नहीं है ।

मृजया रक्ष्यते रूपम् ।
स्वच्छता से रूप की रक्षा होती है ।

भिन्नरूचिर्हि लोकः ।
मानव अलग अलग रूचि के होते हैं ।

तृणाल्लघुतरं तूलं तूलादपि च याचकः ।
तिन्के से रुई हलका है, और याचक रुई से भी हलका है ।

मौनं सर्वार्थसाधनम् ।
मौन यह सर्व कार्य का साधक है ।

सर्वस्य लोचनं शास्त्रम् ।
शास्त्र सबकी आँख है ।

षटकर्णो भिद्यते मन्त्रः ।
मंत्र षटकर्णी हो तो उसका नाश होता है ।

बालादपि सुभाषितम् ग्राह्यम्।
बालक के पाससे भी अच्छी बात (सुभाषित) ग्रहण करनी चाहिए ।

साक्षरा विपरीताश्र्चेत् राक्षसा एव केवलम् ।
साक्षर अगर विपरीत बने तो राक्षस बनता है ।
कुलं शीलेन रक्ष्यते ।
शील से कुल की रक्षा होती है
शीलं भूषयते कुलम् ।
शील कुल को विभूषित करता है ।
अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ।
अप्रिय हितकर वचन बोलनेवाला और सुननेवाला दुर्लभ है ।

उत्तिष्ठत जाग्रत
प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया
दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥ कठ उपनिषद् 1.3.14 ॥

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संस्कृत

संस्कृत

भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतम् संस्कृतिस्तथा । ( भारत की प्रतिष्ठा दो चीजों में निहित है , संस्कृति और संस्कृत । )

इसकी पुरातनता जो भी हो , संस्कृत भाषा एक आश्चर्यजनक संरचना वाली भाषा है । यह ग्रीक से अधिक परिपूर्ण है और लैटिन से अधिक शब्दबहुल है तथा दोनों से अधिक सूक्ष्मता पूर्वक दोषरहित की हुई है । — सर विलियम जोन्स

सभ्यता के इतिहास में , पुनर्जागरण के बाद , अट्ठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में संस्कृत साहित्य की खोज से बढकर कोई विश्वव्यापी महत्व की दूसरी घटना नहीं घटी है । –आर्थर अन्थोनी मैक्डोनेल्

कम्प्यूटर को प्रोग्राम करने के लिये संस्कृत सबसे सुविधाजनक भाषा है । — फोर्ब्स पत्रिका ( जुलाई , १९८७ )

यह लेख इस बात को प्रतिपादित करता है कि एक प्राकृतिक भाषा ( संस्कृत ) एक कृत्रिम भाषा के रूप में भी कार्य कर सकती है , और कृत्रिम बुद्धि के क्षेत्र में किया गया अधिकाश काम हजारों वर्ष पुराने पहिये ( संस्कृत ) को खोजने जैसा ही रहा है । — रिक् ब्रिग्स , नासा वैज्ञानिक ( १९८५ में )

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श्रीराम और रामायण की ऐतिहासिकता

ऐतिहासिक तथ्य
श्रीराम और रामायण की ऐतिहासिकता

अंग्रेजों द्वारा भारतवर्ष पर राज्य स्थापित करने से पूर्व भारत पर कुषाण, यूनानी, क्षत्रप, हूण और मुसलमानों ने आक्रमण भी किये और राज्य भी स्थापित किये। किन्तु भारत की प्राचीन संस्कृति, सभ्यता और लिखित ऐतिहासिक को नकारने अथवा इसे दूषित करने की कुचेष्टा किसी ने भी नहीं की। इनके समय में भी भारतीय जनता में अपने पूर्वजों तथा अपनी संस्कृति के प्रति पूर्ण आस्था बनी रही।
इस सत्यता को भारत के जनमानस से दूर करने के लिये अंग्रेजों ने कूटनीति का आश्रय लेकर भारतीय संस्कृति, सभ्यता और ऐतिहासिक तथ्यों को जंगली, अनपढ़ लोगों द्वारा कल्पित की गई बताना आरम्भ करके इसी प्रकार के ग्रन्थ लिखकर उन्हें पाठ्यक्रम में लगाकर कोमलमति छात्रों में उनकी अपनी ही संस्कृति, सभ्यता और इतिहास के प्रति घृणा का भाव भरने का सफल प्रयास किया।
इसी प्रयास का कुपरिणाम है कि महात्मा गान्धी, जवाहरलाल नेहरू जैसे व्यक्ति राम और रामायण की ऐतिहासिकता का निषेध करने में संकोच अनुभव नहीं करते। ब्रह्माकुमारियों के साप्ताहिक सत्संगों में भी श्रीराम के अस्तित्व को नकारकर रामायण को उपन्यास बताया जाता है। इसी भांति पाश्चात्य शिक्षा पद्धति से पठित समुदाय भी रामायण और महाभारत को काल्पनिक मानता है। एक असत्य का प्रचार लम्बे समय तक योजनाबद्ध तरीके से जब किया जाता है तो भावी पीढ़ियॉं उसे ही सत्य मानने लग जाती हैं। दुर्भाग्य से प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति के प्रति अंग्रेजों ने यही खेल खेला और वे अपने कार्य में पर्याप्त सफल भी हुए।
एक विचित्र बात देखिये प्राचीन! भारतीयों द्वारा लिखा इतिहास तो काल्पनिक कथा तथा अंग्रेजों द्वारा लिखा गया भारत विरोधी साहित्य सच्चा माना जाये। यह कितनी चालाकी और धूर्ततापूर्ण विडम्बना है! इनके ग्रन्थ काल्पनिक और झूठे नहीं माने जायें, इनकी बातों का क्या प्रमाण है? भारतीय इतिहास की सत्यता हेतु ये पुरातात्विक प्रमाण मांगते हैं तो इनकी बातों के पुरातात्त्विक प्रमाण कहॉं हैं कि रामायण- महाभारत नहीं हुए? क्या भूमि में दबे ऐसे प्रमाण मिले हैं जिन पर यह लिखा हो कि आर्य भारत में बाहर से आये, राम और कृष्ण नहीं हुए इत्यादि? यदि इनका लिखा झूठा साहित्य प्रमाण हो सकता है तो प्राचीन ऋषियों द्वारा लिखा गया सत्य साहित्य प्रमाण क्यों नहीं माना जाये? उसमें क्या आपत्ति है ?
ऐतिहासिक प्रमाण अनेक प्रकार के होते हैं, लिखित इतिहास, परम्परा, जनश्रुति, वंश परम्परा तथा पुरातत्त्वीय प्रमाण। लिखित इतिहास शब्द-प्रमाण के अन्तर्गत आते हैं। जनश्रुतियों से अनुमान-प्रमाण सिद्ध होता है तथा पुरातत्त्वीय-प्रमाण से इन्हें पुष्टि मिलती है। यह आवश्यक नहीं है कि सभी प्रमाण भूमि में दबे हुए ही हों। प्राकृतिक वस्तु की सीमा होती है, वह समय पाकर नष्ट होती रहती है, उसे कितने समय तक रखा जा सकता है? प्रकृति से बनी वस्तु की नश्वरता अवश्यम्भावी है। इसीलिए उसकी प्रामाणिकता को दीर्घकाल तक सुरक्षित करने के लिए लिखित रूप का सहारा लिया जाता है।
भारत के प्राचीन ऐतिहासिक खण्डहरों को यदि पूर्णरूप से खोदा जाये तो उनमें रामायण, महाभारत आदि की ऐतिहासिकता के पुरातात्त्विक प्रमाण भी मिल सकते हैं।
इस विषय में स्वामी ओमानन्द जी सरस्वती (आचार्य भगवानदेव गुरुकुल झज्जर) ने पर्याप्त अन्वेषण् किया और रामायण, महाभारत से सम्बन्धित अनेक मृन्मूर्तियॉं (टैराकोटा) प्राप्त कीं। सिरसा, हाठ, नचारखेड़ा (हिसार), जीन्द, सन्ध्याय (यमुनानगर), कौशाम्बी (इलाहाबाद), अहिच्छत्रा (बरेली), कटिंघरा (एटा) और भादरा (श्रीगंगानगर) से ऐसे अनेक पुरातत्वीय प्रमाण प्राप्त हुए हैं जिनसे सिद्ध होता है कि श्रीराम, सीता, सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवन्त, बाली और रामायण ऐतिहासिक हैं। इनका प्रमाण गुरुकुल झज्जर के पुरातत्व संग्रहालय में देखा जा सकता है। इन मृन्मूर्तियों पर गुप्तकाल से पूर्व की लिपि में वाल्मीकीय रामायण के श्लोक भी लिखे हुए हैं। ये श्लोक आज भी रामायण में मिलते हैं।
उपर्युक्त स्थानों से प्राप्त मृन्मूर्तियों में निम्नलिखित दृश्य अंकित हैं-
1. राम, सीता, लक्ष्मण का पंटवटी गमन, 2. त्रिशिरा राक्षस द्वारा खर-दूषण से विचार-विमर्श और राम द्वारा चौदह राक्षसों के वध का वर्णन, 4. रावण द्वारा सीता हरण, 5. सुग्रीव आदि द्वारा सीता को आभूषण फैंकती को देखना, 6. सुग्रीव द्वारा श्रीराम का स्वागत, 7. सुग्रीव बाली-युद्ध, 8. श्रीराम द्वारा बाली का वध, 9. हनुमान द्वारा अशोक-वाटिका (प्रमदावन) को नष्ट किया जाना, 10. त्रिशिरा राक्षस का वध, 11. रावण पुत्र इन्द्रजित का युद्ध में जाना आदि।
इस प्रकार के 42 दृश्य संगृहित हैं।
जो व्यक्ति राम के अस्तित्व का निषेध करते हैं, उन्हें विचारना चाहिए कि श्रीराम, सीता, हनुमान आदि से सम्बंधित सैंकड़ों ग्रन्थों की रचना हुई है। इनमें संस्कृत साहित्य, बौद्ध साहित्य, जैन साहित्य, हिन्दी साहित्य, गुजराती, तमिल, मलयालम, कन्नड़, तेलुगु, असमिया, बंगला, उर्दू, अरबी, फारसी आदि में रामकथा और रामायण की रचनायें हुई हैं।
यूनान के कवि होमर का प्राचीन इलियड काव्य और रामायण एक ही है। बाली, सुमात्रा, इण्डोनेशिया के पुराने मन्दिरों में रामायण कथा के दृश्य अंकित हैं।
अकबर ने अपनी एक स्वर्णमुद्रा पर राम-सीता को चित्रित किया था। धार और रतलाम राज्य की मुद्राओं पर हनुमान अंकित हैं। कुषाण सम्राट कनिष्क ने अपनी मुद्रा पर वादु=वायु देवता हनुमान को स्थान दिया था। सन्तों द्वारा प्रचलित पीपल की मुद्रा पर राम आदि चारों भाई, सीता और हनुमान चित्रित हैं।
श्रीरामचन्द्र का काल- भारतीय प्राचीन परम्परा के अनुसार श्रीराम चौबीसवें त्रेता और द्वापर की सन्धिकाल में हुए हैं-
त्रेतायुगे चतुर्विशे रावणः तपसः क्षयात्‌।
राम दाशरथिं प्राप्य सगणः क्षयमेयिवान्‌।।
(वायुपुराण 70.48)
महाभारत में भी लिखा है….
सन्धौ तु समनुप्राप्ते त्रेतायां द्वापरस्य च।
रामो दाशरथि…. (शान्तिपर्व 343.16)
यदि राम को इस 28वें त्रेता युग की समाप्ति पर भी मानें तो इस कलियुग से पूर्व 864000 वर्ष का द्वापर युग बीत गया और इस कलियुग के 5110 वर्ष बीत चुके हैं। इस प्रकार श्रीराम आज से 869110 वर्ष पूर्व विद्यमान थे। यदि चौबीसवें त्रेतायुग की समाप्ति पर राम की स्थिति मानें तो अब अट्‌ठाईसवें कलियुग तक 18149110 वर्ष राम को व्यतीत हो गये।
432000 वर्ष का कलियुग
864000 वर्ष का द्वापरयुग
1296000 वर्ष का त्रेतायुग
1728000 वर्ष का सतयुग
इस प्रकार 4320000 वर्ष (तेतालीस लाख बीस हजार वर्ष) 1 चतुर्युगी में होते हैं।
वैवस्वत मनु की चौबीसवीं चतुर्युगी के अन्त में राम हुए। चौबीसवीं चतुर्युगी का द्वापरयुग, कलियुग, 25वीं, 26वीं, 27वीं चतुर्युगी पूरी, वर्तमान अट्‌ठाईसवीं चतुर्युगी के सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और इस कलियुग के आज तक बीते हुए 5110 वर्ष इन सबका जोड़ 18149110 (एक करोड़ इक्यासी लाख एक सौ दस वर्ष) होता है। दूसरे पक्ष में इतने वर्ष पूर्व राम की विद्यमानता थी।
इतने सुदीर्घ काल में प्रकृति से बने भवन तथा मुद्रा आदि का अस्तित्व नहीं रह सकता। इसलिए यह दुराग्रह करना कि श्रीराम और अयोध्या से सम्बन्धित कोई वस्तु नहीं मिली, इसलिए राम नहीं हुए यह कहना हास्यापद हैा। आज से 5000 वर्ष बाद जनता को कोई यह कहे कि महात्मा गान्धी और जवाहरलाल नेहरू नहीं हुए, ये सब काल्पनिक हैं, तो आपके पास क्या उत्तर होगा? इसलिए किसी वस्तु की सिद्धि हेतु पुरातत्व के साथ लिखित साहित्य का भी महत्व कम नहीं अपितु अधिक ही होता है।
अतः हमें विदेशी शिक्षा से प्रभावित होकर अपने पूर्वजों को अस्तित्व को नकारकर कृतघ्नता का पात्र नहीं बनना चाहिये। विदेशी जंगली लोगों को प्राचीन भारत का गौरव सहन नहीं हुआ। इसीलिए वे इसे काल्पनिक कहें तो क्या आश्चर्य है?
भारत में एक वर्ग ऐसा भी है जो रावण के अस्तित्व को स्वीकार करके उसकी पूजा करता है। यही वर्ग राम और राम द्वारा निर्मित सेतु का निषेध करता है। उनसे पूछना चाहिये कि जब रावण हुआ है और राम नहीं तो रावण ने तथा उसके भाई, पुत्र और अन्य राक्षसों ने युद्ध किससे किया और उनकी मृत्यु किसके द्वारा हुई?
भारतीय इतिहास में राम द्वारा निर्मित सेतु का उल्लेख मिलता है। अब इसे उपग्रह द्वारा भी सिद्ध कर दिया तो इस ऐतिहासिक तथ्य को न मानकर उसे तोड़ने का प्रयत्न करना इतिहास को नष्ट करने जैसा कुकृत्य है। जिस पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का यह उत्तरदायित्व है कि प्राचीन स्मारकों और ऐतिहासिक स्थलों की सुरक्षा की जाये। जब वही राम, रामसेतु और रामायण की ऐतिहासिकता का निषेध करे तो इस सेतु की सुरक्षा के लिए वे यत्न करेंगे ऐसा सोचना स्वयं को भुलावे में रखना है। ऐसे अनाधिकारी व्यक्ति को पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का निदेशक बनाना भारत के लिए अपमान की बात है।
इसलिये भारतीय जनता को ऐसे लोगों के वक्तव्यों से सावधान रहना चाहिये जो भारतीय इतिहास और संस्कृति को नकारकर हमें हीनभावना से ग्रस्त देखना चाहते हैं।
1. मुद्रांकित पञ्जिका में लिखा…..
(त्रेतायुगे) तत्र राजानः सूर्यवंशीयबाहुक-सागर-अंशुमत्‌-असमंजस-दिलीप-भागीरथ-अज-दशरथ-रामचन्द्र-कुशी-लवा ऐते चक्रवर्तिनः। ये 11 राजा चक्रवर्ति हुए हैं। (शब्दकल्पद्रुम काण्ड 2, प्रकाशक कालिकाता राजधानी, शकसंवत्‌ 1809)
2. साधुसम्प्रदाय द्वारा चलाई गई धार्मिक मुद्रा पर लेख….
रामलछमनजानकजवल हनमनक
आज से लगभग दो सौ वर्ष पूर्व की यह मुद्रा है।
मुद्रा के मुखभाग पर राम-सीता राजछत्र के नीचे सिंहासनासीन तथा पृष्ठभाग पर राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सीता और हनुमान के चित्र हैं।
3. जब रघुगण राजा थे, तब रावण भी यहॉं के आधीन था। जब रामचन्द्र के समय में विरुद्ध हो गया, तो उसको रामचन्द्र ने दण्ड देकर राज्य से नष्ट कर उसके भाई विभीषण को राज्य दिया।
4. आकाश मार्ग से विमान में बैठकर अयोध्या जाते हुए राम ने कहा… हे सीते! और यह देख! यह सेतु हमने बांधकर लंका में आके उस रावण को मार तुझ को ले आये। (सत्यार्थप्रकाश, 11वां समुल्लास)
5. …….रघु पीछे राजा राम हुए। इनका रावण से युद्ध हुआ। इनका इतिहास रामायण में वर्णन किया है। (उपदेशमंजरी पूना-प्रवचन, पूना में 1975 में स्वामी दयानन्द द्वारा दिया उपदेश)
6. भूगर्भीय आन्तरिक उथल-पुथल, जलस्तर के ऊपर आ जाने और लाखों वर्ष पुराने अवशेषों का प्राकृतिक रूप से शनैः शनैः क्षरण होने से पुरातात्त्विक प्रमाण नहीं मिल पाते। उनके अभाव में साहित्य ही एकमात्र प्रमाण रह जाता है। आप्त ऋषियों द्वारा कथित शब्द प्रमाण और ऐतिह्य प्रमाण इसीलिये मान्य होता है कि वे कपोलकल्पित बातें नहीं कहते, किन्तु ऐतिहासिक सत्यता का ही लेखन करते हैं।
7. रामायण-महाभारत से अतिरिक्त महाकवि कालिदास, भास, भट्टि, प्रवरसेन, क्षेमेन्द्र, भवभूति, राजशेखर, कुमारदास, विश्वनाथ, सोमदेव, विमलसूरि, हेमचन्द्र, हरिषेण, नारद, लोमश, माधवदेव, तुलसीदास, सूरदास, चन्दवरदाई, मैथिलीशरण गुप्त, केशवदास, गुरु गोविन्दसिंह, समर्थ रामदास आदि चार सौ से अधिक कवियों ने संस्कृत, पाली, हिन्दी आदि अनेक भाषाओं में राम और रामायण के पात्रों से सम्बद्ध काव्यों की रचना की है।
8. विदेशों में रामायण…..
तिब्बती रामायण, पूर्वी तुर्किस्तान की खोतानी रामायण, इण्डोनेशिया की ककबिन रामायण, बाली द्वीप का रामायण सम्बन्धी वायांग वोंग नाटक, जावा का सेरतराम, सेरी राम, रामकेलिंग, हिकायत सेरी राम, पातानी रामकथा, इण्डोचाइना की रामकीर्ति, ख्मेर रामायण, श्यामदेश की रामकियेन (रामकीर्ति), वर्मा के यूं तो की रामयागन। प्राचीन रोम के नोनस की कृति डायोनीशिया और वाल्मीकि रामायण के कथानक में अद्‌भुत समानता है।
9. कम्बोडिया के अंगकोवाट मन्दिर की भित्तिकाओं पर रामायण और महाभारत के दृश्य अंकित हैं। भारत में होने वाली रामलीला भांति इण्डोनेशिया के मुस्लिम कलाकार अत्यन्त भावपूर्ण ढंग से रामलीला का मञ्चन करते हैं।
10. मध्य जावा के नवमशती में निर्मित परमबनन (परमब्रह्म) नामक विशाल शिवमन्दिर की भित्तिकाओं पर चारों ओर प्रस्तरशिलाओं पर रामायण की चित्रावली अंकित है।
इतने विस्तृत प्रमाणों की विद्यमानता में भी लोग यह कहें कि राम का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, वह केवल आस्था का विषय है तो इससे बढ़कर अज्ञानता और क्या हो सकती है?

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Mind Blowing Facts about Sanskrit

Mind Blowing Facts about Sanskrit 

• Sanskrit has the highest number of vocabularies than any other language in the world.
• 102 arab 78 crore 50 lakh words have been used till now in Sanskrit. If it will be used in computers & technology, then more these number of words will be used in next 100 years.
• Sanskrit has the power to say a sentence in a minimum number of words than any other language.
• America has a University dedicated to Sanskrit and the NASA too has a department in it to research on Sanskrit manuscripts.
• Sanskrit is the best computer friendly language.(Ref: Forbes Magazine July 1987).
• Sanskrit is a highly regularized language. In fact, NASA declared it to be the “only unambiguous spoken language on the planet” – and very suitable for computer comprehension.
• Sanskrit is an official language of the Indian state of Uttarakhand.
• There is a report by a NASA scientist that America is creating 6th and 7th generation super computers based on Sanskrit language. Project deadline is 2025 for 6th generation and 2034 for 7th generation computer. After this there will be a revolution all over the world to learn Sanskrit.
• The language is rich in most advanced science, contained in their books called Vedas, Upanishads, Shruti, Smriti, Puranas, Mahabharata, Ramayana etc. (Ref: Russian State University, NASA etc. NASA possesses 60,000 palm leaf manuscripts, which they are studying.)
• Learning of Sanskrit improves brain functioning. Students start getting better marks in other subjects like Mathematics, Science etc., which some people find difficult. It enhances the memory power. James Junior School, London, has made Sanskrit compulsory. Students of this school are among the toppers year after year. This has been followed by some schools in Ireland also.
• Research has shown that the phonetics of this language has roots in various energy points of the body and reading, speaking or reciting Sanskrit stimulates these points and raises the energy levels, whereby resistance against illnesses, relaxation to mind and reduction of stress are achieved.
• Sanskrit is the only language, which uses all the nerves of the tongue. By its pronunciation, energy points in the body are activated that causes the blood circulation to improve. This, coupled with the enhanced brain functioning and higher energy levels, ensures better health. Blood Pressure, diabetes, cholesterol etc. are controlled. (Ref: American Hindu University after constant study)
• There are reports that Russians, Germans and Americans are actively doing research on Hindu’s sacred books and are producing them back to the world in their name. Seventeen countries around the world have a University or two to study Sanskrit to gain technological advantages.
• Surprisingly, it is not just a language. Sanskrit is the primordial conduit between Human Thought and the Soul; Physics and Metaphysics; Subtle and Gross; Culture and Art; Nature and its Author; Created and the Creator.
• Sanskrit is the scholarly language of 3 major World religions – Hinduism, Buddhism (along with Pali) and Jainism (second to Prakrit).
• Today, there are a handful of Indian villages (in Rajasthan, Madhya Pradesh, Orissa, Karnataka and Uttar Pradesh) where Sanskrit is still spoken as the main language. For example in the village of Mathur in Karnataka, more than 90% of the population knows Sanskrit. Mathur/Mattur is a village 10 kms from Shimoga speaks Sanskrit on daily basis (day-to-day communication).
• Even a Sanskrit daily newspaper exists! Sudharma, published out of Mysore, has been running since 1970 and is now available online as an e-paper ( sudharma.epapertoday.com )!
• The best type of calendar being used is hindu calendar(as the new year starts with the geological change of the solar system) R ef: G erman  S tate  U niversity
• The UK is presently researching on a defence system based on Hindu’s shri chakra.
• Another interesting fact about Sanskrit language was that the process of introducing new words into the language continued for a long period until it was stopped by the great grammarian Panini who wrote an entire grammar for the language laying down rules for the derivation of each and every word in Sanskrit and disallowed the introducing of new words by giving a full list of Roots and Nouns. Even after Panini, some changes occur which were regularised by Vararuchi and finally by Patanjali. Any infringement of the rules as laid down by Patanjali was regarded as a grammatical error and hence the Sanskrit Language has remained in same without any change from the date of Patanjali (about 250 B.C.) up to this day.
• Sanskrit is the only language in the world that exists since millions of years. Millions of languages that emerged from Sanskrit are dead and millions will come but Sanskrit will remain eternal. It is truly language of Bhagwan.
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Mind Blowing Facts about Sanskrit

 Mind Blowing Facts about Sanskrit 

• Sanskrit has the highest number of vocabularies than any other language in the world.
• 102 arab 78 crore 50 lakh words have been used till now in Sanskrit. If it will be used in computers & technology, then more these number of words will be used in next 100 years.
• Sanskrit has the power to say a sentence in a minimum number of words than any other language.
• America has a University dedicated to Sanskrit and the NASA too has a department in it to research on Sanskrit manuscripts.
• Sanskrit is the best computer friendly language.(Ref: Forbes Magazine July 1987).
• Sanskrit is a highly regularized language. In fact, NASA declared it to be the “only unambiguous spoken language on the planet” – and very suitable for computer comprehension.
• Sanskrit is an official language of the Indian state of Uttarakhand.
• There is a report by a NASA scientist that America is creating 6th and 7th generation super computers based on Sanskrit language. Project deadline is 2025 for 6th generation and 2034 for 7th generation computer. After this there will be a revolution all over the world to learn Sanskrit.
• The language is rich in most advanced science, contained in their books called Vedas, Upanishads, Shruti, Smriti, Puranas, Mahabharata, Ramayana etc. (Ref: Russian State University, NASA etc. NASA possesses 60,000 palm leaf manuscripts, which they are studying.)
• Learning of Sanskrit improves brain functioning. Students start getting better marks in other subjects like Mathematics, Science etc., which some people find difficult. It enhances the memory power. James Junior School, London, has made Sanskrit compulsory. Students of this school are among the toppers year after year. This has been followed by some schools in Ireland also.
• Research has shown that the phonetics of this language has roots in various energy points of the body and reading, speaking or reciting Sanskrit stimulates these points and raises the energy levels, whereby resistance against illnesses, relaxation to mind and reduction of stress are achieved.
• Sanskrit is the only language, which uses all the nerves of the tongue. By its pronunciation, energy points in the body are activated that causes the blood circulation to improve. This, coupled with the enhanced brain functioning and higher energy levels, ensures better health. Blood Pressure, diabetes, cholesterol etc. are controlled. (Ref: American Hindu University after constant study)
• There are reports that Russians, Germans and Americans are actively doing research on Hindu’s sacred books and are producing them back to the world in their name. Seventeen countries around the world have a University or two to study Sanskrit to gain technological advantages.
• Surprisingly, it is not just a language. Sanskrit is the primordial conduit between Human Thought and the Soul; Physics and Metaphysics; Subtle and Gross; Culture and Art; Nature and its Author; Created and the Creator.
• Sanskrit is the scholarly language of 3 major World religions – Hinduism, Buddhism (along with Pali) and Jainism (second to Prakrit).
• Today, there are a handful of Indian villages (in Rajasthan, Madhya Pradesh, Orissa, Karnataka and Uttar Pradesh) where Sanskrit is still spoken as the main language. For example in the village of Mathur in Karnataka, more than 90% of the population knows Sanskrit. Mathur/Mattur is a village 10 kms from Shimoga speaks Sanskrit on daily basis (day-to-day communication).
• Even a Sanskrit daily newspaper exists! Sudharma, published out of Mysore, has been running since 1970 and is now available online as an e-paper (sudharma.epapertoday.com )!
• The best type of calendar being used is hindu calendar(as the new year starts with the geological change of the solar system) R ef: G erman  S tate  U niversity
• The UK is presently researching on a defence system based on Hindu’s shri chakra.
• Another interesting fact about Sanskrit language was that the process of introducing new words into the language continued for a long period until it was stopped by the great grammarian Panini who wrote an entire grammar for the language laying down rules for the derivation of each and every word in Sanskrit and disallowed the introducing of new words by giving a full list of Roots and Nouns. Even after Panini, some changes occur which were regularised by Vararuchi and finally by Patanjali. Any infringement of the rules as laid down by Patanjali was regarded as a grammatical error and hence the Sanskrit Language has remained in same without any change from the date of Patanjali (about 250 B.C.) up to this day.
• Sanskrit is the only language in the world that exists since millions of years. Millions of languages that emerged from Sanskrit are dead and millions will come but Sanskrit will remain eternal. It is truly language of Bhagwan.
Mind Blowing Facts about Sanskrit