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साई बाबा


Anju Chaudhary
१ : साई बाबा सारा जीवन मस्जिद मे रहे

एक भी रात उन्होने किसी हिंदू मंदिर मे नही गुज़ारी
२ : अल्लाह मालिक सदा उनके ज़ुबान पर था वो सदा अल्लाह मालिक पुकारते रहते
३ : रोहीला मुसलमान आठों प्रहार अपनी कर्कश आवाज़ मे क़ुरान शरीफ की कल्मे पढ़ता और अल्लाह ओ अकबर के नारे लगाता परेशान होकर जब गाँव वालो ने बाबा से उसकी शिकायत की तो बाबा ने गाँव वालों को भगा दिया .( अध्याय ३ पेज ५ )
४ : तरुण फ़क़ीर को उतरते देख म्हलसापति ने उन्हे सर्व प्रथम ” आओ साई ” कहकर पुकारा .(अध्याय५ पेज २ )
नोट : मौला साई मुस्लिम फ़क़ीर थे और फ़क़िरो को अरबी और उर्दू मे साई नाम से पुकारा जाता है .साई शब्द मूल रूप से हिन्दी नही है
५ : मौला साई हमेशा कफनी पहनते थे .(अध्याय ५ पेज ६ )
नोट : कफनी एक प्रकार का पहनावा है जो मुस्लिम फ़क़ीर पहनते हैं
६ : मौला साई सुन्नत(ख़तना) कराने के पक्ष मे थे . (अध्याय ७ पेज १ )
७ : फ़क़िरो के संग बाबा माँस और मछली का सेवन भी कर लेते थे .(अध्यया ७ पेज २)
८ : बाबा ने कहा “” मैं मस्जिद मे एक बकरा हलाल करने वाला हूँ हाज़ी सिधिक से पूछो की उसे क्या रुचिकर होगा बकरे का माँस ,नाध या अंडकोष ” (अध्याय ११ पेज ४ )
नोट : हिंदू संत कभी स्वपन मे भी बकरा हलाल नही कर सकता .न ही ऐसे वीभत्स भोजन खा सकता है
९ : एक बार मस्जिद मे एक बकरा बलि चढाने लाया गया तब साई बाबा ने काका साहेब से कहा “” मैं स्वयं ही बलि चढाने का कार्य करूँगा “(अध्याय २३ पेज ६)
नोट : हिंदू संत कभी ऐसा जघ्न्य कृत्य नही कर सकते .
१०: बाबा के पास जो भी दक्षिणा एकत्रित होती उसमे से रोज पचास रुपये वो पीर मोहम्म्द को देते. जब वो लौटते तो बाबा भी सौ कदम तक उनके साथ जाते .(अध्याय २३ पेज ५ )
नोट : मौला साई इतना सम्मान कभी किसी हिंदू संत को नही देते थे .रोज पचास रुपये वो उस समय देते थे जब बीस रुपया तोला सोना मिलता था .मौला साई के जीवन काल में उनके पास इतना दान आता था आयकर विभाग की जाँच भी हुई थी
११ : एक बार बाबा के भक्त मेघा ने उन्हे गंगा जल से स्नान कराने की सोचा तो बाबा ने कहा मुझे इस झंझट से दूर ही रहने दो .मैं तो एक फ़क़ीर हूँ मुझे गंगाजल से क्या प्रायोजन .(अध्याय २८ पेज ७ )
नोट : किसी हिंदू के लिए गंगा स्नान जीवन भर का सपना होता है .गंगा जल का दर्शन भी हिंदुओं मे अति पवित्र माना जाता है
१२ : कभी बाबा मीठे चावल बनाते और कभी माँस मिश्रित चावल (पुलाव )बनाते थे (अध्याय ३८ पेज २)
नोट : माँस मिश्रित चावल अर्थात मटन बिरयानी सिर्फ़ मुस्लिम फ़क़ीर ही खा सकता हैं कोई हिंदू संत उसे देखना भी पसंद नही करेगा .
१३ : एक एकादशी को बाबा ने दादा केलकर को कुछ रुपये देकर कुछ माँस खरीद कर लाने को कहा (अध्याय३८ पेज३ )
नोट : एकादशी हिंदुओं का सबसे पवित्र उपवास का दिन होता है कई घरो मे इस दिन चावल तक नही पकता .
१४ : जब भोजन तैयार हो जाता तो बाबा मस्जिद से बर्तन मंगाकर मौलवीसे फातिहा पढ़ने को कहते थे(अध्याय ३८ पेज ३)
नोट : फातिहा मुस्लिम धर्म का संस्कार है
१५ : एक बार बाबा ने दादा केलकर को माँस मिश्रित पुलाव चख कर देखने को कहा .केलकर ने मुँहदेखी कह दिया कि अच्छा है .तब बाबा ने केलकर की बाँह
पकड़ी और बलपूर्वक बर्तन मे डालकर बोले थोड़ा सा इसमे से निकालो अपना कट्टरपन छोड़कर चख कर देखो (अध्याय ३८ पेज४ )
नोट : मौला साई ने परीक्षा लेने के नाम पर जीव हत्या कर एक ब्राहमण का धर्म भ्रष्ट कर दिया किंतु कभी अपने किसी मुस्लिम भक्त की ऐसी कठोर परीक्षा नही ली।

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क्या है धूर्त साई बाबा का सच??


शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
9602109997शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
9602109997

क्या है धूर्त साई बाबा का सच??

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने साई बाबा को मुसलमान फकीर कहा है। विवादित पोस्टर से कई लोगों की भावनाएं आहत हुई तो कई सवाल भी खड़ी हुए हैं। साई बाबा के बारे में बहुत भ्रम फैला है। वे हिन्दू थे या मुसलमान? क्या वे कबीर, नामदेव, पांडुरंग आदि के अवतार थे??

आचार्य चतुरसेन का उपन्यास ‘सोमनाथ’ में उन्होंने लिखा है कि मुगल और अंग्रेजों के शासनकाल में ऐसा अकसर होता था कि जासूसी या हिन्दू क्षेत्र की रेकी करने के लिए सूफी संतों के वेश में फकीरों की टोली को भेजा जाता था।जो गांव या शहर के बाहर डेरा डाल देती थी। इनका काम था सीमा पर डेरा डाल कर वहां के लोगों और राजाओं की ताकत का अंदाजा लगाना और प्रजा में विद्रोह भड़काना।

किसने कहा सबसे पहले साई
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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‘साई शब्द फारसी का है जिसका अर्थ होता है “भिखारी”(संत)। उस काल में आमतौर पर भारत के पाकिस्तानी हिस्से में मुस्लिम संन्यासियों के लिए इस शब्द का प्रयोग होता था। शिर्डी में साई सबसे पहले जिस मंदिर के बाहर आकर रुके थे उसके पुजारी ने उन्हें साई कहकर ही संबोधित किया था। मंदिर के पुजारी को वे मुस्लिम फकीर ही नजर आए।तभी तो उन्होंने उन्हें साई कहकर पुकारा।
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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साई ने यह कभी नहीं कहा कि ‘सबका मालिक एक’। साई सच्चरित्र के अध्याय 4, 5, 7 में इस बात का उल्लेख है कि वे जीवन भर सिर्फ अल्लाह मालिक है’यही बोलता रहा । कुछ लोगों ने उनको हिन्दू संत बनाने के लिए यह झूठ प्रचारित किया कि वे ‘सबका मालिक एक है’ भी बोलता था।यदि वे एकता की बात करते थे, तो कभी यह क्यों नहीं कहा कि ‘राम मालिक है’ या ‘भगवान मालिक है।’

कोई हिन्दू संत सिर पर कफन जैसा नहीं बांधता।ऐसा सिर्फ मुस्लिम फकीर व भिखारी ही बांधता है। जो पहनावा साई का था, वह एक मुस्लिम फकीर (भिखारी) का ही हो सकता है। हिन्दू धर्म में सिर पर सफेद कफन जैसा बांधना वर्जित है या तो जटा रखी जाती है या किसी भी प्रकार से सिर पर बाल नहीं होते।

साई बाबा मस्जिद में क्यों रहे
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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साई बाबा ने रहने के लिए मस्जिद का ही चयन क्यों किया? वहां और भी स्थान थे, लेकिन वे जिंदगीभर मस्जिद में ही रहे। मस्जिद के अलावा भी तो शिर्डी में कई और स्थान थे, जहां वे रह सकते थे। मस्जिद ही क्यों? भले ही मंदिर में न रहते, तो नीम के वृक्ष के नीचे एक कुटिया ही बना लेते। उनके भक्त तो इसमें उनकी मदद कर ही देते।

साईं सच्चरित्र के अनुसार, साईं बाबा पूजा-पाठ, ध्यान, प्राणायाम और योग के बारे में लोगों से कहते थे कि इसे करने की कोई जरूरत नहीं है। उनके इस प्रवचन से पता चलता है कि वह हिन्दू धर्म विरोधी था।धूर्त साई का मिशन था- लोगों में एकेश्वरवाद के प्रति विश्वास पैदा करना। उन्हें कर्मकांड, ज्योतिष आदि से दूर रखना।

मस्जिद से बर्तन मंगवाकर वे मौलवी से फातिहा पढ़ने के लिए कहते थे। इसके बाद ही भोजन की शुरुआत होती थी। उन्होंने कभी भी मस्जिद में गीता पाठ नहीं करवाया या भोजन कराने के पूर्व ‘श्रीगणेश करो’ ऐसा भी नहीं कहा। यदि वह हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करते था तो फिर दोनों ही धर्मों का सम्मान करना चाहिए था।

क्या अफगानिस्तान के था साई

साई को सभी यवन मानते थे। वह हिन्दुस्तान का नहीं, अफगानिस्तान का था ।इसीलिए लोग उन्हें यवन का मुसलमान कहते थे। उनकी कद-काठी और डील-डौल यवनी ही था। साई सच्चरित्र के अनुसार, एक बार साई ने इसका जिक्र भी किया था। जो भी लोग उनसे मिलने जाते थे उन्हें मुस्लिम फकीर ही मानते थे। लेकिन उनके सिर पर लगे चंदन को देखकर लोग भ्रमित हो जाते थे।
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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बाबा कोई धूनी नहीं रमाते थे जैसा कि नाथ पंथ के लोग करते हैं। ठंड से बचने के लिए बाबा एक स्थान पर लड़की इकट्ठी करके आग जलाते थे। उनके इस आग जलाने को लोगों ने धूनी रमाना समझा। चूंकि बाबा के पास जाने वाले लोग चाहते थे कि बाबा हमें कुछ न कुछ दे तो वे धूनी की राख को ही लोगों को प्रसाद के रूप में दे देते थे। यदि प्रसाद देना ही होता था तो वे अपने भक्तों को मांस मिला हुआ नमकीन चावल देते थे।

🖊 आजकल साई बाबा को पुस्तकों और लेखों के माध्यम से ब्राह्मण कुल में जन्म लेने की कहानी को प्रचारित किया जा रहा है। क्या कोई ब्राह्मण मस्जिद में रहना पसंद करेगा ???

क्यों डराया था गांव वालों को
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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साई के समय दो बार अकाल पड़ा। लेकिन साई उस वक्त अपने भक्तों के लिए कुछ नहीं कर पाया। एक बार प्लेग फैला तो उन्होंने गांव के सभी लोगों को गांव से बाहर जाने के लिए मना किया।क्योंकि कोई जाकर वापस आएगा तो वह भी इस गांव में प्लेग फैला देता।तब उसने लोगों में डर भर दिया कि जो भी मेरे द्वारा खींची गई लकीर के बाहर जाएगा, वह मर जाएगा। इस डर के कारण भोली-भाली जनता गांव से बाहर नहीं गई और लोगों ने इसे चमत्कार के रूप में प्रचारित किया कि साई ने गांव की प्लेग से रक्षा की। प्लेग उनके गांव में नहीं आ सका। साई के पास कई ऐसे लोग आते जाते थे, जो उन्हें बाहर की दुनिया का हालचाल बता देते थे।

साई का जन्म 1830 में हुआ।परन्तु इसने आजादी की लड़ाई में भारतीयों की मदद करना जरूरी नहीं समझा।क्योंकि वह भारतीय नहीं था।वह अंग्रेजों के जासूस था । *अफगानिस्तानी पंडारियों के समाज से थाऔर उन्हीं के साथ उनके पिता भारत आए थे। उनके पिता का नाम बहरुद्दीन था और उनका नाम चांद मियां।

साई के विरोधी साई चरित में उल्लेखित घटना का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि 1936 में हरि विनायक साठे (एक साई भक्त) ने अपने साक्षात्कार में नरसिम्हा स्वामी को बोला था कि बाबा किसी भी हिन्दू देवी-देवता या स्वयं की पूजा मस्जिद में नहीं करने देते थे, न ही मस्जिद में किसी देवता के चित्र वगैरह लगाने देते।

क्यों बोलता था अल्लाह मालिक
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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साई सच्चरित्र साईं भक्तों और शिर्डी साई संस्थान द्वारा बताई गई साई के बारे में सबसे उचित पुस्तक है। पुस्तक के पेज नंबर 17, 28, 29, 40, 58, 78, 120, 150, 174 और 183 पर साईं ने ‘अल्लाह मालिक’ बोला’ऐसा लिखा है। पूरी पुस्तक में साई ने एक बार भी किसी हिन्दू देवी-देवता का नाम नहीं बोला और न ही कहीं ‘सबका मालिक एक’ बोला। साई भक्त बताएं कि जो बात साई ने अपने मुंह से कभी कही ही नहीं, उसे साई के नाम पर क्यों प्रचारित किया जा रहा है?

साई को राम से जोड़ने की साजिश 12 अगस्त 1997 को गुलशन कुमार की हत्या के ठीक 6 महीने बाद 1998 में साईं नाम के एक नए भगवान का अवतरण हुआ। इसके कुछ समय बाद 28 मई 1999 में ‘बीवी नंबर 1’ फिल्म आई जिसमें साईं के साथ पहली बार राम को जोड़कर ‘ॐ साईं राम’ गाना बनाया था।

बाबा बाजार से खाद्य सामग्री में आटा, दाल, चावल, मिर्च, मसाला, मटन आदि सब मंगाते थे और इसके लिए वे किसी पर निर्भर नहीं रहे थे। भिक्षा मांगना तो उनका ढोंग था। बाबा के पास घोड़ा भी था। शिर्डी के अमीर हिन्दुओं ने उनके लिए सभी तरह की सुविधाएं जुटा दी थीं। उनके कहने पर ही कृष्णा माई गरीबों को भोजन करवाती थीं। मस्जिद में साफ-सफाई करती थीं और सभी तरह की देख-रेख का कार्य करती थीं।

मेघा से क्या कहा साईं ने

साई मेघा की ओर देखकर कहने लगे, ‘तुम तो एक उच्च कुलीन ब्राह्मण हो और मैं बस निम्न जाति का यवन (मुसलमान)।इसलिए तुम्हारी जाति भ्रष्ट हो जाएगी। इसलिए तुम यहां से बाहर निकलो। -साई सच्चरित्र।-(अध्याय 28)
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एक एकादशी को उन्होंने पैसे देकर केलकर को मांस खरीदने लाने को कहा। -साईं सच्चरित्र (अध्याय 38)

बाबा ने एक ब्राह्मण को बलपूर्वक बिरयानी चखने को कहा। -साईं सच्चरित्र (अध्याय 38)

साई सच्चरित्र अनुसार साई बाबा गुस्से में आता था और गालियां भी बकता था।ज्यादा क्रोधित होने पर वह अपने भक्तों को पीट भी देता था । बाबा कभी पत्‍थर मारता और कभी गालियां देता। -पढ़ें 6, 10, 23 और 41 साईं सच्चरित्र अध्याय।

बाबा ने स्वयं कभी उपवास नहीं किया और न ही उन्होंने किसी को करने दिया। साई सच्चरित्र (अध्याय 32)

‘मुझे इस झंझट से दूर ही रहने दो। मैं तो एक फकीर हूं, मुझे गंगाजल से क्या प्रयोजन?- साई सच्चरित्र (अध्याय 28)
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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और क्या कह रहे हैं साई विरोधी

साई विरोधी कहते हैं कि साई अफगानिस्तान का एक पिंडारी लुटेरा था। इसके लिए वे एक कहानी बताते हैं कि औरंगजेब की मौत के बाद मुगल साम्राज्य खत्म-सा हो गया था। केवल दिल्ली उनके अधीन थी। मराठों के वीर सपूतों ने एक तरह से हिन्दू साम्राज्य की नींव रख ही दी थी।ऐसे समय में मराठाओं को बदनाम करके उनके इलाकों में लूटपाट करने का काम यह पिंडारी करते थे। जब अंग्रेज आए तो उन्होंने पिंडारियों को मार-मारकर खत्म करना शुरू किया। इस खात्मे के अभियान के चलते कई पिंडारी अंग्रेजों के जासूस बन गए थे।

क्या है झांसी की रानी का संबंध
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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साई के विरोधी कहते हैं कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की सेना में 500 पिंडारी अफगान पठान सैनिक थे। उनमें से कुछ सैनिकों को अंग्रेजों ने रिश्वत देकर मिला लिया था। उन्होंने ही झांसी की रानी के किले के राज अंग्रेजों को बताए थे। युद्ध के मैदान से रानी जिस रास्ते पर घोड़े के साथ निकल पड़ीं, उसका रास्ता इन्हीं पिंडारी पठानों ने अंग्रेजों को बताया। अंत में पीछा करने वाले अंग्रेजों के साथ 5 पिंडारी पठान भी थे। उसमें से एक शिर्डी के कथित धूर्त साई बाबा का पिता था ।जिसे बाद में झांसी छोड़कर महाराष्ट्र में छिपना पड़ा था। उसका नाम था *बहरुद्दीन। उसी पिंडारी पठान भगोड़े सैनिक का बेटा यह शिर्डी का साई है, जो वेश्या से पैदा हुआ और और जिसका नाम चांद मियां था।

क्या हुआ था 1857 में
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1857 के दौरान हिन्दुस्तान में हिन्दू और मुसलमानों के बीच अंग्रेजों ने फूट डालने की नीति के तहत कार्य करना शुरू कर दिया था। इस क्रांति के असफल होने का कारण यही था कि कुछ हिन्दू और मुसलमान अंग्रेजों की चाल में आकर उनके लिए काम करते थे। बंगाल में भी हिन्दू-मुस्लिम संतों के बीच फूट डालने के कार्य को अंजाम दिया गया। इस दौर में कट्टर मुसलमान और पाकिस्तान का सपना देखने वाले मुसलमान अंग्रेजों के साथ थे।

क्या कह रह हैं साईं के पिता के बारे में

साईं का पिता जो एक पिंडारी ही था।उनका मुख्य काम था अफगानिस्तान से भारत के राज्यों में लूटपाट करना। एक बार लूटपाट करते-करते वे महाराष्ट्र के अहमदनगर पहुंचा।जहां वह एक वेश्या के घर में रुक गया। फिर वह उसी के पास रहने लगा । कुछ समय बाद उस वेश्या से उन्हें एक लड़का और एक लड़की पैदा हुए । लड़के का नाम उन्होंने चांद मियां रखा। लड़के को लेकर वह अफगानिस्तान चले गए। लड़की को वेश्या के पास ही छोड़ गया। अफगानिस्तान उस काल में इस्लामिक ट्रेनिंग सेंटर था। जहां लूटपाट, जिहाद और धर्मांतरण करने के तरीके सिखाए जाते थे।

कौन था चांद मियाँ

उस समय अंग्रेज पिंडारियों की जबरदस्त धरपकड़ कर रहे थे। इसलिए बहरुद्दीन भेस बदलकर लूटपाट करता और उसने अपने संदेशवाहक के लिए अपने बेटे चांद मियां ( साई ) को भी ट्रेंड कर दिया था। चांद मियाँ चादर फैलाकर भीख मांगता था। चांद मियाँ चादर पर यहां के हाल लिख देता था और उसे नीचे से सिलकर अफगानिस्तान भेज देता था। इससे जिहादियों को मराठाओं और अंग्रेजों की गतिविधि के बारे में पता चल जाता था।

किसे कहते थे यवनी

यह साई अफगानिस्तान का एक पिंडारी था।जिसे लोग यवनी कहकर पुकारते थे। यह पहले हिन्दुओं के गांव में फकीरों के भेष में रहकर चोरी-चकारी करने के लिए कुख्यात था। यह हरे रंग की चादर फैलाकर भीख मांगता था और उसे काबुल भेज देता था। किसी पीर की मजार पर चढ़ाने के लिए उसी चादर के भीतर वह मराठा फौज और हिन्दू धनवानों के बारे में सूचनाएं अन्य पिंडारियों को भेजता था।ताकि वे सेंधमारी कर सकें। इसकी चादर एक बार एक अंग्रेज ने पकड़ ली थी और उस पर लिखी गुप्त सुचनाओं को जान लिया था।

क्या चांद मियाँ उर्फ साई जेल से छूटा था

1857 की क्रांति का समय अंग्रेजों के लिए विकट समय था। ऐसे में चांद मियां अंग्रेजों के हत्थे चढ़ गया। अहमदनगर में पहली बार साई की फोटो ली गई थी। अपराधियों की पहले भी फोटो ली जाती थी। यही चांद मियां 8 साल बाद जेल से छुटकर कुछ दिन बाद एक बारात के माध्यम से शिर्डी पंहुचा और वहां के सुलेमानी लोगों से मिला। जिनका असली काम था गैर-मुसलमानों के बीच रहकर चुपचाप इस्लाम को बढ़ाना। इस मुलाकात के बाद साई पुन: बारातियों के साथ चले गए। कुछ दिन बाद चांद मियां शिर्डी पधारा और यही उसने अल-तकिया का ज्ञान लिया। मस्जिद को जान-बूझकर एक हिन्दू नाम दिया गया और उसके वहां ठहराने का पूरा प्रबंध सुलेमानी मुसलमानों ने किया।

किसने किया प्रचारित
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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एक षड्यंत्र के तहत चांद मियां को चमत्कारिक फकीर के रूप में प्रचारित किया गया और गांव की भोली-भाली हिन्दू जनता उसके झांसे में आने लगी। चांद मियां कई तरह के जादू-टोने और जड़ी-बूटियों का जानकार था।इसलिए धीरे-धीरे गांव में लोग उसको मानने लगे। बाद में मंडलियों द्वारा उसके चमत्कारों का मुंबई में भी प्रचार-प्रसार किया गया।जिसके चलते धनवान लोग भी उसके संपर्क में आने लगे।

क्या पाठ पढ़ाया

चांद मियाँ उर्फ साई ने हिन्दू-मुस्लिम एकता की बातें करके मराठाओं को उनके ही असली दुश्मनों से एकता निभाने का पाठ पढ़ाया। यह मराठाओं की शक्ति को कमजोर करने का षड्यंत्र था। सिर्फ साई ही नहीं, ऐसे कई ढोंगी संत उस काल में यही कार्य पूरे महाराष्ट्र में कर रहे थे। मराठाओं की शक्ति से सभी भयभीत हो गए थे।तब उन्होंने ‘छल’ का उपयोग शुरू कर दिया था।
🖊 धन्य हो धूर्त साई उर्फ चाँद मियाँ के अंधे भक्तो।

शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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साई


​सभी साई भक्तों से सवाल ?

1. क्या साई ने भगवान श्री राम की तरह राक्षसों का नाश किया ?

2. क्या साई ने भगवान श्री कृष्ण की तरह इस संसार को गीता का ज्ञान दिया ?

3. क्या साई ने भगवान शिव की तरह विषपान कर इस विश्व की रक्षा की ?

4. क्या साई ने किसी ग्रन्थ या महाकाव्य की रचना की ?

5. क्या साई ने श्रवण कुमार की तरह अपने माता पिता की सेवा की ?

6. क्या साई चैतन्य महाप्रभु की तरह हिन्दुओ के किसी भगवान के भक्त था ?

7. क्या साई ने गुरु गोविंद सिंह जी की तरह मुसलमानों से लोहा ले हिन्दू धर्म की रक्षा की?

8. क्या साई ने छत्रपति शिवाजी महाराज की तरह मुसलमानों से लोहा ले हिन्दू धर्म की रक्षा की?

9. क्या साई ने महाराणा प्रताप की तरह मुस्लिम आक्रांताओ से लोहा लेकर मातृभूमि की रक्षा की?

10. क्या साई ने शहीद भगतसिंह , चन्द्रशेखर आजादसुखदेव , राजगुरु आदि क्रांतिकारियों की तरह आजादी की लड़ाई मे अपना योगदान दिया ?

11. गायत्री मंत्र भी साईं के नाम पर और राम के नाम के आगे भी साई लगाते हैं जब तुम्हारे साई अकेले कल्याण करने में समर्थ हैं तो उसे “” भगवान राम “” की जरूरत क्यों है ?

12. वेद मंत्रों में साई को स्थापित किए जाने के लिए क्यों हेर-फेर किया जा रहा ह ?

13. साई के नाम पर हिन्दू धर्म को भ्रमित और विकृत क्यों किया जा रहा है ?

14. एक जिहादी साई को शिव और विष्णु की तरह हिन्दू देवताओं के रूप में चित्रित किया जाना क्या हिन्दू धर्म का अपमान नहीं है ?

15. इससे हम करोड़ों हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हैं, उस पर साई भक्त क्या कहनाचाहेंगे ?

16. क्या साई……. भगवान राम से भी बड़े हो गएहैं ?

17. उन्हें ब्रह्मांड नायक क्यों बनाया गया… क्या उन्होंने ब्रह्मांड की रचना की है ?

18. क्या वे राजाधिराज थे ?

19. वे परब्रह्म थे ?

20. वे सच्चिदानंद थे……..?????????

21. क्या आप ऐसा लिख सकते हो कि ‘साई अल्लाह’ थे ,

अगर नहीं तो….. तो फिर उन्हें ‘परब्रह्म’ लिखने का अधिकार आपको किसने दिया ?

22. मंदिरों में साई की मूर्ति क्यों लगाई जा रही है ?

23. हिन्दू धर्म के देवी – देवताओं की मूर्तियां छोटी होती जा रही हैं और साई की मूर्ति बड़ी ?

24. हिन्दू मंदिरों में जान-बूझकर जो साई बाबा की मूर्ति स्थापित की जा रही है क्या वह उचित है ?

25. साई का चित्र पहले शिव के साथ जोड़कर दिखाया जाता था , आजकल राम और हनुमान के साथ जोड़कर दिखाया जाता है… क्या यह षड्यंत्र या मनमानी हरकत नहीं है ?

26. साई के नाम पर मनमाने मंदिर, आरती, चालीसा औरतमाम तरह के कर्म कांड निर्मित कर लिए गए हैं , क्या यह उचित है…..???????????

27. क्या साई बाबा की तुलना राम – कृष्ण से करना सनातन धर्म का अपमान नहीं है ?

28. पहले साई को दत्तात्रेय का अवतार बतायागया , फिर विरोध होने पर कबीर का , फिर नामदेव , पांडुरंग , अक्कलकोट का महाराज ?

29. अंत में शिव का अवतार इसलिए घोषित किया गया ,क्योंकि शिवजी को भी चित्रों में चिलम पीते हुए दर्शाया गया है ?

30. उसके बाद तो साई ……. सभी देवी-देवताओं के अवतार होने लगे क्यों ?

31. अब उन्हें रामावतार बताया जा रहा है क्यों ?

32. क्या ” सबका मालिक एक ” सूत्र चाँद साई ने दिया था ?

33. क्या ” श्रद्धा और सबुरी ” सूत्र चाँद साई ने दिया था ?

34. क्या चाँद साई के नाम के आगे ॐ लगाना उचित है?

35. क्या वो संसार का स्वामी है ?

36. उसे मोहम्मद का अवतार क्यों नही बताया जाता! जबकि उसे हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में प्रदर्शित किया जाता है ?

37. उसे अल्लाह का अवतार क्यों नही बतायाजाता ?

38. चाँद साई को जीजस का अवतार क्यों नही बताया जाता ?

क्या इसका कोई ठोस जवाब है कि……… उन्हें भगवानबनाने के लिए हिन्दुओं के अवतारों का ही सहारा क्यों लिया जा रहा है …??????????

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साई भक्तों को ….अगर इन सवालों के जबाब नहीं मिले तो…..वे खुद ही सोच लें कि……….. वे किस लायक हैं 

धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो

जय श्री राम

हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति की भावनाओ को आहत पहुँचाना नहीं है अगर हमारी इस पोस्ट से किसी की भावनाये आहत हुई हो तो हम माफ़ी चाहते हैं
पर आखिरी बात ये सच्चाई है और हम इससे बच नहीं सकते?

-डाक्टर वैद्य पंडित विनय कुमार उपाध्याय

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साई भक्त


साई भक्त अक्सर यह दावा करते है की साई बाबा भगवान है और उनकी भक्ति करने से सभी मुरादें पूरी होती है पर मुझे तो लगता है की साई बाबा तो खुद ही विकलांग है वो किसी की क्या मुराद पूरी करेंगे क्योंकि वो तो खुद ही ऊँ और राम की बैशाखी पर चलते है विश्वास ना हो तो देख लीजिये जहां भी साई का नाम लिखा मिलेगा वो इस प्रकार लिखा मिलता है

” ऊँ साई राम ”

अब बात करते है साई बाबा द्वारा सभी भक्तों की मुरादें पूरी करने की ।

अगर कोई आदमी किसी का कत्ल कर दे या रेप कर दे और साई बाबा के मंदिर मे चला जाये तो क्या बाबा उसको सज़ा से बचा लेंगे ?

अगर हाँ !

तो फिर तो साई से बड़ा कोई अपराधी नही क्योंकि अपराधी की मदद करने वाला भी अपराधी ही होता है और अगर बाबा के मंदिर मे जाने के बाद भी उसे सज़ा हो जाती है तो फिर बाबा के पूजा का , उनके मंदिर मे जाने का क्या फायदा ?

वैदिक धर्म तो यह कहता है की हर प्राणी को उसके द्वारा किये गये शुभ और अशुभ कर्मो का फल अवश्य भोगना पड़ता है और चूंकि परमात्मा न्यायकारी है इसलिये इस कर्म फल के भोग मे परमात्मा भी कोई दखल नही देता ।

अब प्रश्न यह उठता है की साई का गोरख धंधा कैसे फल फूल रहा है ?

दरअसल साई मंदिर के पूजारियों द्वारा व्यापक प्रचार के द्वारा लोगों के दिमाग मे यह भरा जाता है की शिर्डी मे साई के मंदिर मे मन्नत मांगने से वो मन्नत पूरी हो जाती है ।

इस प्रचार के पीछे इन पुजारियों का अपना स्वार्थ
है ।

जिस मंदिर मे जाने के बाद भक्त की मन्नत पूरी हो जाती है ।

उसी मंदिर मे भक्त मोटा चढ़ावा अर्पित करता है अब अगर 100- 100 भक्त अपनी अपनी मन्नत ले कर जाते है तो कर्म फल के सिद्धांत के अनुसार उनमे से 50 भक्तों की मन्नत पूरी हो जायेगी ।

अब यह 50 भक्त मोटा माल अर्पित करेंगे और सारी दुनियाँ मे साई की महिमा का गुण गान करेंगे और जिन ५० भक्तों की मन्नत पूरी नही हुई है वो इसमे अपने भाग्य का दोष मान कर चुप हो कर बैठ
जायेंगे ।

जो मोटा माल मिला है उसका कुछ भाग वो इन भक्तों की कहानियों का व्यापक प्रचार करने मे खर्च करेंगे ताकि अधिक से अधिक नये भक्त अपने ग्राहक बने ।

अगर साई बाबा मे इतनी ही ताकत होती तो बाकी सारे मंदिर बंद हो जाते पर ऐसा है नही धंधा उनका भी जोर शोर से चल रहा है ।

अब जिसके प्रचार मे जितनी ताकत होगी उतने ही उसके पास भक्त ( ग्राहक) आयेंगे यही सत्य है ।

बाकी चाहे इसे कहो कुछ भी ।

जय श्री राम ,
धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो ।

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Shirdi Sai Baba


Shirdi Sai Baba – भारत के इतिहास का सबसे बड़ा पाखंड

सभी साई भक्तों से सवाल ?

1. क्या साई ने भगवान श्री राम की तरह राक्षसों का नाश किया ?

2. क्या साई ने भगवान श्री कृष्ण की तरह इस संसार को गीता का ज्ञान दिया ?

3. क्या साई ने भगवान शिव की तरह विषपान कर इस विश्व की रक्षा की ?

4. क्या साई ने किसी ग्रन्थ या महाकाव्य की रचना की ?

5. क्या साई ने श्रवण कुमार की तरह अपने माता पिता की सेवा की ?

6. क्या साई चैतन्य महाप्रभु की तरह हिन्दुओ के किसी भगवान के भक्त था ?

7. क्या साई ने गुरु गोविंद सिंह जी की तरह मुसलमानों से लोहा ले हिन्दू धर्म की रक्षा की ?

8. क्या साई ने छत्रपति शिवाजी महाराज की तरह मुसलमानों से लोहा ले हिन्दू धर्म की रक्षा की ?

9. क्या साई ने महाराणा प्रताप की तरह मुस्लिम आक्रांताओ से लोहा लेकर मातृभूमि की रक्षा की ?

10. क्या साई ने शहीद भगतसिंह , चन्द्रशेखर आजाद सुखदेव , राजगुरु आदि क्रांतिकारियों की तरह आजादी की लड़ाई मे अपना योगदान दिया ?

11. गायत्री मंत्र भी साईं के नाम पर और राम के नाम के आगे भी साई लगाते हैं जब तुम्हारे साई अकेले कल्याण करने में समर्थ हैं तो उसे “” भगवान राम “” की जरूरत क्यों है ?

12. वेद मंत्रों में साई को स्थापित किए जाने के लिए क्यों हेर-फेर किया जा रहा ह ?

13. साई के नाम पर हिन्दू धर्म को भ्रमित और विकृत क्यों किया जा रहा है ?

14. एक जिहादी साई को शिव और विष्णु की तरह हिन्दू देवताओं के रूप में चित्रित किया जाना क्या हिन्दू धर्म का अपमान नहीं है ?

15. इससे हम करोड़ों हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हैं, उस पर साई भक्त क्या कहना
चाहेंगे ?

16. क्या साई……. भगवान राम से भी बड़े हो गए
हैं ?

17. उन्हें ब्रह्मांड नायक क्यों बनाया गया… क्या उन्होंने ब्रह्मांड की रचना की है ?

18. क्या वे राजाधिराज थे ?

19. वे परब्रह्म थे ?

20. वे सच्चिदानंद थे……..?????????

21. क्या आप ऐसा लिख सकते हो कि ‘साई अल्लाह’ थे , अगर नहीं तो….. तो फिर उन्हें ‘परब्रह्म’ लिखने का अधिकार आपको किसने दिया ?

22. मंदिरों में साई की मूर्ति क्यों लगाई जा रही है ?

23. हिन्दू धर्म के देवी – देवताओं की मूर्तियां छोटी होती जा रही हैं और साई की मूर्ति बड़ी ?

24. हिन्दू मंदिरों में जान-बूझकर जो साई बाबा की मूर्ति स्थापित की जा रही है क्या वह उचित है ?

25. साई का चित्र पहले शिव के साथ जोड़कर दिखाया जाता था , आजकल राम और हनुमान के साथ जोड़कर दिखाया जाता है… क्या यह षड्यंत्र या मनमानी हरकत नहीं है ?

26. साई के नाम पर मनमाने मंदिर, आरती, चालीसा और तमाम तरह के कर्म कांड निर्मित कर लिए गए हैं , क्या यह उचित है…..???????????

27. क्या साई बाबा की तुलना राम – कृष्ण से करना सनातन धर्म का अपमान नहीं है ?

28. पहले साई को दत्तात्रेय का अवतार बताया
गया , फिर विरोध होने पर कबीर का , फिर नामदेव , पांडुरंग , अक्कलकोट का महाराज ?

29. अंत में शिव का अवतार इसलिए घोषित किया गया , क्योंकि शिवजी को भी ‍चित्रों में चिलम पीते हुए दर्शाया गया है ?

30. उसके बाद तो साई ……. सभी देवी-देवताओं के अवतार होने लगे क्यों ?

31. अब उन्हें रामावतार बताया जा रहा है क्यों ?

32. क्या ” सबका मालिक एक ” सूत्र चाँद साई ने दिया था ?

33. क्या ” श्रद्धा और सबुरी ” सूत्र चाँद साई ने दिया था ?

34. क्या चाँद साई के नाम के आगे ॐ लगाना उचित है ?

35. क्या वो संसार का स्वामी है ?

36. उसे मोहम्मद का अवतार क्यों नही बताया जाता ! जबकि उसे हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में प्रदर्शित किया जाता है ?

37. उसे अल्लाह का अवतार क्यों नही बताया
जाता ?

38. चाँद साई को जीजस का अवतार क्यों नही बताया जाता ?

क्या इसका कोई ठोस जवाब है कि……… उन्हें भगवान बनाने के लिए हिन्दुओं के अवतारों का ही सहारा क्यों लिया जा रहा
है …??????????

####### साई भक्तों को ….अगर इन सवालों के जबाब नहीं मिले तो…..

वे खुद ही सोच लें कि……….. वे किस लायक हैं ।

जय श्री राम
धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो ।

‪#‎FraudSai‬ , ‪#‎BhaktiJihad‬ ,
‪#‎ExposeShirdisai‬ .

‪#‎बहरूपिया_साई‬ , ‪#‎भक्ति_जिहाद‬ ,
‪#‎शिर्डी_साई_बेनकाब‬

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भाई – बहिन , ये सत्य है कि चाँदमिया उर्फ साई के 99 % प्रतिशत अन्धभक्तों को साई के जीवन के विषय कुछ भी जानकारी नहीं है ।


भाई – बहिन , ये सत्य है कि चाँदमिया उर्फ साई के 99 % प्रतिशत अन्धभक्तों को साई के जीवन के विषय कुछ भी जानकारी नहीं है ।
चाँदमियां उर्फ साई के सम्बन्ध में सबसें प्रामाणिक है ” साई सच्चरित्र ” ।
यह पुस्तक साई के भक्तों के लिए पवित्र ” कुरान ” के तुल्य है जिसे साई के शिष्य G.r Dabholkar ने साई सें अनुमति लेने के बाद लिखी थी ।
बाबा से अनुमति लेने के बाद वो 1910 से 1918 तक मस्जिद मे होने वाली प्रमुख घटनाओं को संकलित करते रहे और बाद में सर्व प्रथम ” साई सच्चरित्र ” मराठी मे लिखी गई
यही वो पुस्तक है जिसके आधार पर चाँदमियां उर्फ साई को महिमा – मण्डित किया जा रहा है ।
नीचे पुस्तक के उन अंशों को उल्लेखित किया जा रहा है जो प्रमाणित करते हैं कि चाँदमियां उर्फ साई एक कट्टर मुस्लिम था ।
इस लेख का मूल उद्देश्य उस ” सत्य ” को प्रकट करना है ।
[ 1 ] चाँदमियां उर्फ साई जीवन भर मस्जिद मे रहा ।
[ 2 ] चाँदमियां उर्फ साई कभी व्रत – उपवास नहीं रखता था और अपने भक्तों को भी नहीं रखने देता था ।
[ 3 ] चाँदमियां उर्फ साई की जुबान पर सदैव ” अल्लाह मालिक ” रहता था ।
[ 4 ] चाँदमियां उर्फ साई सदैव ” कुरान ” सुनता था जो उसे अब्दुल सुनाता था ।
[ 5 ] चाँदमिया उर्फ साई खाने से पूर्व ” अल फातिहा, ” जरूर पढता था ।
[ 6 ] चाँदमियां उर्फ साई ” गटर – बिरयानी ” खुद बनाता / खाता और अपने भक्तों को खिलाता था ।
[ 7 ] चाँदमियां उर्फ साई ने गंगाजल यह कह कर छूने से मना कर दिया कि वह यवन / मुस्लिम है उसे गंगाजल से क्या प्रयोजन ?
[ 8 ] चाँदमियां उर्फ साई का एक ब्राह्मण भक्त जब उसके पैर छूने लगा तो उसने टोकते हुए कहा कि मेरे पैर मत छूओ केयों कि तुम एक उच्च कुल के ब्राह्मण और मैं निम्न कुल का यवन / मुस्लिम हुँ ।
[ 9 ] चाँदमियां उर्फ साई के सत्य छायाचित्र में उसका परिधान एवं दाढी मुस्लिम फकीर रखते थे वैसी है ।
[ 10 ] चाँदमिया उर्फ साई ने अपने ब्राह्मण भक्त ” दादा केलकर ” को जबरदस्ती ” मटर बिरयानी ” खिलाई ।
[ 11 ] महाराष्ट्र के शिरडी – साई मन्दिर में गायी जाने वाली आरती मे :-
गोपीचंदा मंदा त्वाची उदरिले ,
मोमिन वंशी जन्मुनी लाका तारिले ।
उपरोक्त आरती में ” मोमिन ” अर्थात् मुस्लिम शब्द का स्पष्ट प्रयोग हुआ है ।
भाई – बहिनों हम ना तो चाँदमियां उर्फ साई के विरोधी हैं और ना ही किसी अन्य धर्म / सम्प्रदाय के विरोधी है ।
हमारा विरोध केवल इस बात को ले कर है कि चाँदमियां उर्फ साई को जानबूझ कर हिन्दू प्रमाणित करने का षङयन्त्र न किया जाये ।
पिछले 50 वर्षों में जैसा अधर्म शिर्डी ट्रस्ट ने किया है वो निन्दनीय है :-
[ 1 ] जो साई जीवन भर मस्जिद मे रहा उसे मन्दिर में बिठा दिया ।
[ 2 ] जो साई व्रत / उपवास का विरोधी था उसके नाम से साई व्रत कथा छप रही है ।
[ 3 ] जो साई सदैव अल्लाह मालिक बोलता था उसके साथ ॐ / राम जोङ दिया गया ।
[ 4 ] जो साई सदैव कुरान और अल फातिहा पढा करता था उसके नाम से मन्त्र बनाये जा रहे हैं ।
[ 5 ] जो साई मांसाहारी था उसे हिन्दू अवतार बनाया जा रहा है ।
[ 6 ] जिस साई ने गंगाजल छूने से मना कर दिया उसका गंगाजल से अभिषेक किया जा रहा है ।
भाई – बहिनों अब भी हिन्दू नहीं जागा तो हमारी भावी पीढी एक ऐसे व्यक्ति को भगवान बना लेगी जिसका सनातन धर्म से दूर – दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है और हमारी सन्तति मांसाहारी बन कर अल्लाह मालिक की माला जपने लगेगी ।
[ सम्पूर्ण जानकारी के लिए एक बार ” साई सच्चरित्र ” जरूर पढें ] जय श्री राम

Shirdi Sai Baba - भारत के इतिहास का सबसे बड़ा पाखंड's photo.
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चाँद मियाँ


Sanjay Dwivedy 5 hrs · चाँद मियाँ ( उर्फ़ साँईं बाबा ),ख्वाजा गरीब नवाज़, अमीर खुसरो, निजामुद्दीन औलिया, हाजी अली, मामा – भांजा की मज़ार, आदि – आदि की दरगाह पर जाकर मन्नत मांगने वाले सनातन धर्मी हिन्दू लोगों के लिए विशेष :- पूरे देश में स्थान स्थान पर बनी कब्रों, मजारों या दरगाहों पर हर वीरवार को जाकर शीश झुकाने व मन्नत करने वालों से कुछ प्रश्न :- १. क्या एक कब्र जिसमें मुर्दे की लाश मिट्टी में बदल चुकी है वो किसी की मनोकामना पूरी कर सकती हैं ? . २. ज्यादातर कब्र या मजार उन मुसलमानों की हैं जो हमारे पूर्वजो से लड़ते हुए मारे गए थे, उनकी कब्रों पर जाकर मन्नत मांगना क्या उन वीर पूर्वजों का अपमान नहीं हैं जिन्होंने अपने प्राण धर्म की रक्षा करते हुए बलि वेदी पर समर्पित कर दिये थे ? . ३. क्या हिन्दुओं के भगवान श्री राम जी, श्री कृष्ण अथवा देवी – देवता शक्तिहीन हो चुकें हैं जो मुसलमानों की कब्रों पर सर पटकने के लिए जाना आवश्यक है ? . ४. जब गीता में श्री कृष्ण जी महाराज ने कहाँ है कि कर्म करने से ही सफलता प्राप्त होती हैं तो मजारों में दुआ मांगने से क्या हासिल होगा ? यान्ति देवव्रता देवान् पितृन्यान्ति पितृव्रताः भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्तमद्याजिनोऽपिमाम अर्थात, श्रीमदभगवत गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भूत प्रेत, मुर्दा, पितृ (खुला या दफ़नाया हुआ अर्थात् कब्र,मजार अथवा समाधि) को सकामभाव से पूजने वाले स्वयं मरने के बाद भूत- प्रेत व पितृ की योनी में ही विचरण करते हैं व उसे ही प्राप्त करते हैं l . ५. भला किसी मुस्लिम देश में वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, हरी सिंह नलवा, बंदा बहादुर, गुरु गोबिंद सिंह, भगवन बुद्ध, महावीर स्वामी, स्वामी विवेकानंद आदि वीरों की स्मृति में कोई स्मारक आदि बनाकर उन्हें पूजा जाता हैं ? तो भला हमारे ही देश पर आक्रमण करने वालों की कब्र पर हम क्यों शीश झुकाते हैं ? . ६. क्या संसार में इससे बड़ी मूर्खता का प्रमाण आपको कहीं मिल सकता है ? . ७. हिन्दू कौन सी ऐसी अध्यात्मिक प्रगति मुसलमानों की कब्रों की पूजा कर प्राप्त कर रहे हैं जो वेदों-उपनिषदों-पुराणों-स्मृतियों आदि में कहीं नहीं कही गयीं हैं ? . ८. कब्र, मजार पूजा को हिन्दू मुस्लिम सेकुलरता की निशानी बताना हिन्दुओं को अँधेरे में रखना नहीं तो क्या हैं ? सेक्युलरता तो ये तब हो न, जब मुस्लिम भी वहाँ शीश झुकाएं । नोट – सूफी समाज इस्लाम की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं है, अर्थात वे उन्हें मुस्लिम नहीं मानते । . आशा है आप इस लेख को पढ़ कर आपकी बुद्धि में कुछ प्रकाश हुआ होगा अगर आप आर्य राजा श्री राम और श्री कृष्ण जी महाराज की संतान हैं तो तत्काल इस मुर्खता पूर्ण अंधविश्वास को छोड़ दें और अन्य हिन्दुओं को भी इस बारे में बता कर उनका अंधविश्वास दूर करें व आप अपने धर्म को जानिए l इस अज्ञानता के चक्र में से बाहर निकलिए l विशेष : – पृथ्वी राज चौहान की समाधि पर कंधार, अफगानिस्तान में अभी हाल ही तक भी जूते चप्पल मारे जाते थे । जब तक एक हिन्दू वीर ने बड़ी चतुराई से उनकी अस्थियां वहां से भारत भेज कर माँ गंगा को अर्पण नहीं कर दीं । परंतु आज भी वे लोग उस बिना अस्थियों वाली कब्र पर अपने जूते – चप्पल ही झाड़ कर मोहम्मद गौरी की मज़ार में जाते हैं । उचित लगे तो जनजागरण हेतू अपने मित्रों सहयोगियों से सांझा करें । Lik

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शिरडी साँई: वैदिक धर्म के लिए एक अभिशाप?


शिरडी साँई: वैदिक धर्म के लिए एक अभिशाप?

आजकल सर्वत्र साँई बाबा की धूम है, कहीँ साँई चौकी, साँई संध्या और साँई पालकी मेँ मुस्लिम कव्वाल साँई भक्तोँ के साथ साँई जागरण करने मेँ लगे हैँ। मन्दिरोँ मेँ साँई की मूर्ति सनातन काल के देवी देवताओँ के साथ सजी है। मुस्लिम तान्त्रिकोँ ने भी अपने काले इल्म का आधार साँई बाबा को बना रखा है व उनकी सक्रियता सर्वत्र देखी जा सकती है। इन सबके बीच साँई बाबा को कोई विष्णु का ,कोई शिव का तथा कोई दत्तात्रेय का अवतार बतलाता है।

परन्तु साँई बाबा कौन थे? उनका आचरण व व्यवहार कैसा था? इन सबके लिए हमेँ निर्भर होना पड़ता है “साँई सत्चरित्र” पर!

जी हाँ ,दोस्तोँ! कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीँ जो रामायण व महाभारत का नाम न जानता हो? ये दोनोँ महाग्रन्थ क्रमशः श्रीराम और कृष्ण के उज्ज्वल चरित्र को उत्कर्षित करते हैँ, उसी प्रकार साईँ के जीवनचरित्र की एकमात्र प्रामाणिक उपलब्ध पुस्तक है- “साँईँ सत्चरित्र”॥

इस पुस्तक के अध्ययन से साईँ के जिस पवित्र चरित्र का अनुदर्शन होता है,
क्या आप उसे जानते हैँ?

चाहे चीलम पीने की बात हो, चाहे स्त्रियोँ को अपशब्द कहने की?
चाहे माँसाहार की बात हो, या चाहे धर्मद्रोह, देशद्रोह व इस्लामी कट्टरपन की….

इन सबकी दौड़ मेँ शायद ही कोई साँई से आगे निकल पाये। यकीन नहीँ होता न?
तो आइये चलकर देखते हैँ…

इसके लिए शिरडी साँई के विषय मेँ व्याप्त भ्रान्तियोँ की क्रमबध्द समीक्षा करना चाहेँगे।…

[A] क्या साँईं ईश्वर या कोई अवतारी पुरूष है?

साईं बाबा का जीवन काल 1835 से 1918 तक था , उनके जीवन काल के मध्य हुई घटनाये जो मन में शंकाएं पैदा करती हैं की क्या वो सच में भगवान थे , क्या वो सच में लोगो का दुःख दूर कर सकते है?

प्रश्नः

{1}भारतभूमि पर जब-जब धर्म की हानि हुई है और अधर्म मेँ वृध्दि हुई है, तब-तब परमेश्वर साकाररूप मेँ अवतार ग्रहण करते हैँ और तबतक धरती नहीँ छोड़ते, जबतक सम्पूर्ण पृथ्वी अधर्महीन नहीँ हो जाती। लेकिन साईँ के जीवनकाल मेँ पूरा भारत गुलामी की बेड़ियोँ मे जकड़ा हुआ था, मात्र अंग्रेजोँ के अत्याचारोँ से मुक्ति न दिला सका तो साईँ अवतार कैसे?

{2}राष्ट्रधर्म कहता है कि राष्ट्रोत्थान व आपातकाल मेँ प्रत्येक व्यक्ति का ये कर्तव्य होना चाहिए कि वे राष्ट्र को पूर्णतया आतंकमुक्त करने के लिए सदैव प्रयासरत रहेँ, परन्तु गुलामी के समय साईँ किसी परतन्त्रता विरोधक आन्दोलन तो दूर, न जाने कहाँ छिप कर बैठा था,जबकि उसके अनुयायियोँ की संख्या की भी कमी नहीँ थी, तो क्या ये देश से गद्दारी के लक्षण नहीँ है?

{3}यदि साँईँ चमत्कारी था तो देश की गुलामी के समय कहाँ छुपकर बैठा था?

{4}भारत का सबसे बड़ा अकाल साईं बाबा के जीवन के दौरान पड़ा
>(a) 1866 में ओड़िसा के अकाल में लगभग ढाई लाख भूंख से मर गए
>(b) 1873 -74 में बिहार के अकाल में लगभग एक लाख लोग प्रभावित हुए ….भूख के कारण लोगो में इंसानियत ख़त्म हो गयी थी|
>(c ) 1875 -1902 में भारत का सबसे बड़ा अकाल पड़ा जिसमें लगभग 6 लाख लोग मरे गएँ|

साईं बाबा ने इन लाखो लोगो को अकाल से क्यूँ पीड़ित होने दिया यदि वो भगवान या चमत्कारी थे? क्यूँ इन लाखो लोगो को भूंख से तड़प -तड़प कर मरने दिया?

{5} साईं बाबा के जीवन काल के दौरान बड़े भूकंप आये जिनमें हजारो लोग मरे गए
(a) १८९७ जून शिलांग में
(b) १९०५ अप्रैल काँगड़ा में
(c) १९१८ जुलाई श्री मंगल असाम में

साईं बाबा भगवान होते हुए भी इन भूकम्पों को क्यूँ नहीं रोक पाए?…क्यूँ हजारो को असमय मारने दिया ?

[B]साँई माँसाहार का प्रयोग करता था व स्वयं जीवहत्या करता था?
प्रमाण:-
(1)मस्जिद मेँ एक बकरा बलि देने के लिए लाया गया। वह अत्यन्त दुर्बल और मरने वाला था। बाबा ने उनसे चाकू लाकर बकरा काटने को कहा।
-:अध्याय 23. पृष्ठ 161.

(2)तब बाबा ने काकासाहेब से कहा कि मैँ स्वयं ही बलि चढ़ाने का कार्य करूँगा।
-:अध्याय 23. पृष्ठ 162.

(3)फकीरोँ के साथ वो आमिष(मांस) और मछली का सेवन करते थे।
-:अध्याय 5. व 7.

(4)कभी वे मीठे चावल बनाते और कभी मांसमिश्रित चावल अर्थात् नमकीन पुलाव।
-:अध्याय 38. पृष्ठ 269.

(5)एक एकादशी के दिन उन्होँने दादा कलेकर को कुछ रूपये माँस खरीद लाने को दिये। दादा पूरे कर्मकाण्डी थे और प्रायः सभी नियमोँ का जीवन मेँ पालन किया करते थे।
-:अध्याय 32. पृष्ठः 270.

(6)ऐसे ही एक अवसर पर उन्होने दादा से कहा कि देखो तो नमकीन पुलाव कैसा पका है? दादा ने योँ ही मुँहदेखी कह दिया कि अच्छा है। तब बाबा कहने लगे कि तुमने न अपनी आँखोँ से ही देखा है और न ही जिह्वा से स्वाद लिया, फिर तुमने यह कैसे कह दिया कि उत्तम बना है? थोड़ा ढक्कन हटाकर तो देखो। बाबा ने दादा की बाँह पकड़ी और बलपूर्वक बर्तन मेँ डालकर बोले -”अपना कट्टरपन छोड़ो और थोड़ा चखकर देखो”।
-:अध्याय 38. पृष्ठ 270.

प्रश्न:-
{1}क्या साँई की नजर मेँ हलाली मेँ प्रयुक्त जीव ,जीव नहीँ कहे जाते?{2}क्या एक संत या महापुरूष द्वारा क्षणभंगुर जिह्वा के स्वाद के लिए बेजुबान नीरीह जीवोँ का मारा जाना उचित होगा?{3}सनातन धर्म के अनुसार जीवहत्या पाप है।
तो क्या साँई पापी नहीँ?{4}एक पापी जिसको स्वयं क्षणभंगुर जिह्वा के स्वाद की तृष्णा थी, क्या वो आपको मोक्ष का स्वाद चखा पायेगा?{5}तो क्या ऐसे नीचकर्म करने वाले को आप अपना आराध्य या ईश्वर कहना चाहेँगे?

[C] साँई हिन्दू है या मुस्लिम? व क्या हिन्दू- मुस्लिम एकता का प्रतीक है?

कई साँईभक्त अंधश्रध्दा मेँ डूबकर कहते हैँ कि साँई न तो हिन्दू थे और न ही मुस्लिम। इसके लिए अगर उनके जीवन चरित्र का प्रमाण देँ तो दुराग्रह वश उसके भक्त कुतर्कोँ की झड़ियाँ लगा देते हैँ।
ऐसे मेँ अगर साँई खुद को मुल्ला होना स्वीकार करे तो मुर्देभक्त क्या कहना चाहेँगे?
जी, हाँ!

प्रमाणः-
(1)शिरडी पहुँचने पर जब वह मस्जिद मेँ घुसा तो बाबा अत्यन्त क्रोधित हो गये और उसे उन्होने मस्जिद मेँ आने की मनाही कर दी। वे गर्जन कर कहने लगे कि इसे बाहर निकाल दो। फिर मेधा की ओर देखकर कहने लगे कि तुम तो एक उच्च कुलीन ब्राह्मण हो और मैँ निम्न जाति का यवन (मुसलमान)। तुम्हारी जाति भ्रष्ट हो जायेगी।
-:अध्याय 28. पृष्ठ 197.

(2)मुझे इस झंझट से दूर ही रहने दो। मैँ तो एक फकीर(मुस्लिम, हिन्दू साधू कहे जाते हैँ फकीर नहीँ) हूँ।मुझे गंगाजल से क्या प्रायोजन?
-:अध्याय 32. पृष्ठ 228.

(3)महाराष्ट्र मेँ शिरडी साँई मन्दिर मेँ गायी जाने वाली आरती का अंश-
“गोपीचंदा मंदा त्वांची उदरिले!
मोमीन वंशी जन्मुनी लोँका तारिले!”

उपरोक्त आरती मेँ “मोमीन” अर्थात् मुसलमान शब्द स्पष्ट आया है।

(4)मुस्लिम होने के कारण माँसाहार आदि का सेवन करना उनकी पहली पसन्द थी।

प्रश्नः
{1}साँई जिन्दगी भर एक मस्जिद मेँ रहा, क्या इससे भी वह मुस्लिम सिध्द नहीँ हुआ? यदि वह वास्तव मेँ हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक होता तो उसे मन्दिर मेँ रहने मेँ क्या बुराई थी?{2}सिर से पाँव तक इस्लामी वस्त्र, सिर को हमेशा मुस्लिम परिधान कफनी मेँ बाँधकर रखना व एक लम्बी दाढ़ी, यदि वो हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक होता तो उसे ऐसे ढ़ोँग करने की क्या आवश्यकता थी?
क्या ये मुस्लिम कट्टरता के लक्षण नहीँ हैँ?{3}वह जिन्दगी भर एक मस्जिद मेँ रहा, परन्तु उसकी जिद थी की मरणोपरान्त उसे एक मन्दिर मेँ दफना दिया जाये, क्या ये न्याय अथवा धर्म संगत है? “ध्यान रहे ताजमहल जैसी अनेक हिन्दू मन्दिरेँ व इमारते ऐसी ही कट्टरता की बली चढ़ चुकी हैँ।”{4}उसका अपना व्यक्तिगत जीवन कुरान व अल-फतीहा का पाठ करने मेँ व्यतीत हुआ, वेद व गीता नहीँ?, तो क्या वो अब भी हिन्दू मुस्लिम एकता का सूत्र होने का हक रखता है?{5}उसका सर्वप्रमुख कथन था “अल्लाह मालिक है।”परन्तु मृत्युपश्चात् उसके द्वितीय कथन “सबका मालिक एक है” को एक विशेष नीति के तहत सिक्के के जोर पर प्रसारित किया गया। यदि ऐसा होता तो उसने ईश्वर-अल्लाह के एक होने की बात क्योँ नहीँ की?

अन्य प्रमुख आक्षेप:

साईं एक टूटी हुयी मस्जिद में रहा करते थे और सर पर कफनी बंधा करते थे. सदा ” अल्लाह मालिक” एवं ” सबका मालिक एक” पुकारा करते थे ये दोनों ही शब्द मुस्लिम धर्म से संभंधित हैं.साईं का जीवन चरित्र उनके एक भक्त हेमापंदित ने लिखा है. वो लिखते हैं की

बाबा एक दिन गेहूं पीस रहे थे. ये बात सुनकर गाँव के लोग एकत्रित हो गए और चार औरतों ने उनके हाथ से चक्की ले ली और खुद गेहूं पिसना प्रारंभ कर दिया. पहले तो बाबा क्रोधित हुए फिर मुस्कुराने लगे. जब गेंहूँ पीस गए त्तो उन स्त्रियों ने सोचा की गेहूं का बाबा क्या करेंगे और उन्होंने उस पिसे हुए गेंहू को आपस में बाँट लिया. ये देखकर बाबा अत्यंत क्रोधित हो उठे और अप्सब्द कहने लगे -” स्त्रियों क्या तुम पागल हो गयी हो? तुम किसके बाप का मॉल हड़पकर ले जा रही हो? ” फिर उन्होंने कहा की आटे को ले जा कर गाँव की सीमा पर दाल दो. उन दिनों गाँव मिएँ हैजे का प्रकोप था और इस आटे को गाँव की सीमा पर डालते ही गाँव में हैजा ख़तम हो गया. (अध्याय १ साईं सत्चरित्र )

१. मान्यवर सोचने की बात है की ये कैसे भगवन हैं जो स्त्रियों को गालियाँ दिया करते हैं हमारी संस्कृति में तो स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है और कहागया है की यात्रा नार्यस्तु पुजनते रमन्ते तत्र देवता . आटा गाँव के चरों और डालने से कैसे हैजा दूर हो सकता है? फिर इन भगवान् ने केवल शिर्डी में ही फैली हुयी बीमारइ के बारे में ही क्यूँ सोचा ? क्या ये केवल शिर्डी के ही भगवन थे?

२. साईं सत्चरित्र के लेखक ने इन्हें क्रिशन का अवतार बताया गया है और कहा गया है की पापियों का नाश करने के लिए उत्पन्न हुए थे परन्तु इन्हीं के समय में प्रथम विश्व युध्ध हुआ था और केवल यूरोप के ही ८० लाख सैनिक इस युध्द में मरे गए थे और जर्मनी के ७.५ लाख लोग भूख की वजह से मर गए थे. तब ये भगवन कहाँ थे. (अध्याय 4 साईं सत्चरित्र )

३. १९१८ में साईं बाबा की मृत्यु हो गयी. अत्यंत आश्चर्य की बात है की जो इश्वर अजन्मा है अविनाशी है वो भी मर गया. भारतवर्ष में जिस समय अंग्रेज कहर धा रहे थे. निर्दोषों को मारा जा रहा था अनेकों प्रकार की यातनाएं दी जा रहीं थी अनगिनत बुराइयाँ समाज में व्याप्त थी उस समय तथाकथित भगवन बिना कुछ किये ही अपने लोक को वापस चले गए. हो सकता है की बाबा की नजरों में भारत के स्वतंत्रता सेनानी अपराधी थे और ब्रिटिश समाज सुधारक !

४. साईं बाबा चिलम भी पीते थे. एक बार बाबा ने अपने चिमटे को जमीं में घुसाया और उसमें से अंगारा बहार निकल आया और फिर जमीं में जोरो से प्रहार किया तो पानी निकल आया और बाबा ने अंगारे से चिलम जलाई और पानी से कपडा गिला किया और चिलम पर लपेट लिया. (अध्याय 5 साईं सत्चरित्र ) बाबा नशा करके क्या सन्देश देना चाहते थे और जमीं में चिमटे से अंगारे निकलने का क्या प्रयोजन था क्या वो जादूगरी दिखाना कहते थे? इस प्रकार के किसी कार्य से मानव जीवन का उद्धार तो नहीं हो सकता हाँ ये पतन के साधन अवश्य हें .

५. शिर्डी में एक पहलवान था उससे बाबा का मतभेद हो गया और दोनों में कुश्ती हुयी और बाबा हार गए(अध्याय 5 साईं सत्चरित्र ) . वो भगवान् का रूप होते हुए भी अपनी ही कृति मनुष्य के हाथों पराजित हो गए?

६. बाबा को प्रकाश से बड़ा अनुराग था और वो तेल के दीपक जलाते थे और इस्सके लिए तेल की भिक्षा लेने के लिए जाते थे एक बार लोगों ने देने से मना कर दिया तो बाबा ने पानी से ही दीपक जला दिए.(अध्याय 5 साईं सत्चरित्र ) आज तेल के लिए युध्ध हो रहे हैं. तेल एक ऐसा पदार्थ है जो आने वाले समय में समाप्त हो जायेगा इस्सके भंडार सीमित हें और आवश्यकता ज्यादा. यदि बाबा के पास ऐसी शक्ति थी जो पानी को तेल में बदल देती थी तो उन्होंने इसको किसी को बताया क्यूँ नहीं?

७. गाँव में केवल दो कुएं थे जिनमें से एक प्राय सुख जाया करता था और दुसरे का पानी खरा था. बाबा ने फूल डाल कर खारे जल को मीठा बना दिया. लेकिन कुएं का जल कितने लोगों के लिए पर्याप्त हो सकता था इसलिए जल बहार से मंगवाया गया.(अध्याय 6 साईं सत्चरित्र) वर्ल्ड हेअथ ओर्गानैजासन के अनुसार विश्व की ४० प्रतिशत से अधिक लोगों को शुध्ध पानी पिने को नहीं मिल पाता. यदि भगवन पीने के पानी की समस्या कोई समाप्त करना चाहते थे तो पुरे संसार की समस्या को समाप्त करते लेकिन वो तो शिर्डी के लोगों की समस्या समाप्त नहीं कर सके उन्हें भी पानी बहार से मांगना पड़ा. और फिर खरे पानी को फूल डालकर कैसे मीठा बनाया जा सकता है?

8. फकीरों के साथ वो मांस और मच्छली का सेवन करते थे. कुत्ते भी उनके भोजन पत्र में मुंह डालकर स्वतंत्रता पूर्वक खाते थे.(अध्याय 7 साईं सत्चरित्र ) अपने स्वार्थ वश किसी प्राणी को मारकर खाना किसी इश्वर का तो काम नहीं हो सकता और कुत्तों के साथ खाना खाना किसी सभ्य मनुष्य की पहचान भी नहीं है.

अमुक चमत्कारों को बताकर जिस तरह उन्हें भगवान् की पदवी दी गयी है इस तरह के चमत्कार तो सड़कों पर जादूगर दिखाते हें . काश इन तथाकथित भगवान् ने इस तरह की जादूगरी दिखने की अपेक्षा कुछ सामाजिक उत्तथान और विश्व की उन्नति एवं समाज में पनप रहीं समस्याओं जैसे बाल विवाह सती प्रथा भुखमरी आतंकवाद भास्ताचार अआदी के लिए कुछ कार्य किया होता!

9.साँईँ के चमत्कारिता के पाखंड और झूठ का पता चलता है, उसके “साँईँ चालिसा” से।
दोस्तोँ आईये पहले चालिसा का अर्थ जानलेते है:-
“हिन्दी पद्य की ऐसी विधा जिसमेँ चौपाईयोँ की संख्या मात्र 40 हो, चालिसा कहलाती है।”
क्या आपने कभी गौर किया है?.?……
कि साँईँ चालिसा मेँ कितनी चौपाईयाँ हैँ?
यदि नहीँ, तो आज ही देखेँ….
जी हाँ, कुल 100 or 200.
तनिक विचारेँ क्या इतने चौपाईयोँ के होने पर भी उसे चालिसा कहा जा सकता है?
नहीँ न?…..
बिल्कुल सही समझा आप लोगोँ ने….
जब इन व्याकरणिक व आनुशासनिक नियमोँ से इतना से इतना खिलवाड़ है, तो साईँ केझूठे पाखंडवादी चमत्कारोँ की बात ही कुछ और है!
कितने शर्म की बात है कि आधुनिक विज्ञान के गुणोत्तर प्रगतिशिलता के बावजूद लोग साईँ जैसे महापाखंडियोँ के वशिभूत हो जा रहे हैँ॥

क्या इस भूमि की सनातनी संताने इतनी बुद्धिहीन हो गयी है कि जिसकी भी काल्पनिक महिमा के गपोड़े सुन ले उसी को भगवान और महान मानकर भेडॉ की तरह उसके पीछे चल देती है ?
इसमे हमारा नहीं आपका ही फायदा है …. श्रद्धा और अंधश्रद्धा में फर्क होता है, श्रद्धालु बनो …. भगवान को चुनो

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जो साई को पूजते है उनसे एक एक सवाल …..


जो साई को पूजते है उनसे एक एक सवाल …..

किस धर्मग्रंथ मे साई का नाम लिखा है ?????

राम के चरणों कि स्तुति गाने वाले ….कृष्ण की लीलाओ का रसास्वादन करने वाले ….शिव कि महिमाओ का वर्णन करके खुद को परम धन्य समझने वाले परम सौभाग्यशाली हिन्दुओ ने किस आधार पर …साई के नाम का घंटा बजाना चालू कर दिया ….

जवाब हो तो जरूर दीजिएगा………….

किस धर्मग्रंथ मे साई का नाम लिखा है ????????

अगर तुम लोगो को संतो को पूजना ही आधुनिक फैशन लग रहा है अथवा साई को पूजने के लिए ये तर्क है तो … ऋषियों को पूजो …..वशिष्ठ को पूजो …. अत्री मुनि को पूजो …. संदीपनी को पूजो …….दधीचि को पूजो ……..वाल्मीकि को पूजो …..

साई बाबा न इनसे बड़ा संत था न इनसे बड़ा सिध्द ……

अगर ये पुराने लगते है तो तुलसी दास को पूजो ………. उन्होेंने रामायण लिख दी…… उन्हे मंदिरो में स्थापित
नहीं किया ।

हां चार चमत्कार दिखाकर…. एक दो उपदेश देकर….” सबका मालिक एक ” का नारा देने वाले साई महाशय को किस आधार पर भगवान बनाकर मंदिरो में स्थापित करने का फतवा जारी कर दिया कुछ साई अंधभक्तो ने…..

अथवा साई एजेंटो ने अथवा साई दलालो ने अथवा साई के नाम पर धंधा करने वालो ने ….

भारत एक भक्ति प्रधान देश है यहां कि अंधी जनता को हर दस वर्ष में एक नया भगवान चाहिए ।

अरे मूढ़ो क्या तेतीस कोटि देवता तुम्हारे लिए कम पड गए है… या शिव जी , श्री हरि , श्री कृष्ण , श्री राम , माँ भवानी सब से मन ऊब गया है तुम्हारा… या बस चार चमत्कार देख लिए या किसी के मुँह से सुन भी लिए तो बस वही हो गया तुम्हारा मुक्ति दाता ।

अक्ल पर पत्थर पड गए है या पापों ने बुद्धि को इतना कुंठित कर दिया है कि इतना नहीं सोच पा रहे कि साई महाराज को किस आधार पर भगवान घोषित कर दिया….बिना सिर पैर के तर्को के आधार पर ही तुम किसी को भगवान मान लोगे ?

संत पुज्यनीय होते है उनके लिए मन में श्रद्धा होनी चाहिए पर ये जो तुम कर रहे हो वो तो आँख वाला होकर भी कुएं में गिर पड़ने कि तरह है ।

मेरी श्रद्धा सभी संतो पर है , पर संतो को ही एक मात्र परब्रह्म मानकर सर्वव्यापक परमेश्वर कि अवमानना नहीं कि जा सकती और अवतार अकारण नहीं होता स्वयं भगवान कहते है कि किसी उद्देश्य से होता है और साई महाराज का क्या उद्देश्य था सिर्फ ज्ञान देना…..एकता का संदेश देना …

बस….या फिर साई महाराज के ‘ लेटैस्ट वर्जन ‘ सत्य साई के अवतार लेने का उद्देश्य क्या था मुह से बॉल निकालकर दिखाना , उँगलियो से राख़ निकालकर दिखाना , जादू से हाथ से जंजीर पैदा कर देना …..ऐसी चीजे सड़को पर एक एक दो दो रुपया मांगते जादूगर दिखाया करते थे…….

कड़वा लगे पर सच यही है ….. कि भ्रांति युक्त बुद्धि से , सिर्फ सुनकर और सिर्फ सुनकर ही ” सबका मालिक एक ” चिल्लाते हुये शिरडी वाले साई बाबा आए है तेरे दर पर — गाते हुये शिर्डी कि परिक्रमा लगाकर खुद को भगवान का परम उपासक समझने वाले सिर्फ मूर्ख है सिर्फ मूर्ख है सिर्फ मूर्ख है ।

…… इतना बहुत है …….जिस साई के उपासक के पास इन सब बातो का पूर्णतः ठोस जवाब हो तो ही बात करे … वरना इतने पर भी इन बातो को दरकिनार कर अब भी पूजा कि अलमारी मे भगवान के बीच में रखे साई बाबा के सामने बैठकर … साई राम , साई राम चिल्लाना इससे बड़ा मूर्खता का उदाहरण मुझे तो ढूँढे नहीं मिलेगा……..

……… सोचिए……… और निस्कर्ष निकालिए ….. सच क्या है ….और इतने पर भी जो हिन्दू साई का लॉकेट अपने गले से न निकाले तो उसे खुद को हिन्दू कहने का हक तो है पर वो सनातन धर्मी कतई नहीं है ….क्यो कि सनातन धर्म मे साई था ही नहीं …….न है ।

अक्सर इन बातो को सुनकर भी कुछ धर्मप्रिय हिंदुत्ववादी हिन्दू साई का मोह नहीं छोड़ पाते इसलिए वो अंत मे एक तर्क देते है कि हे हे हे अजी हम तो साई को संत मानते है इसलिए मंदिरो में स्थापित करके उनकी पूजा करते है ।

तो क्या साई महाराज से पहले कोई ज्ञानी संत नहीं हुये थे … महर्षि वाल्मीकि जिन्होने कि अपनी त्रिकाल दर्शिता से राम की लीलाओ के अंत से पहले ही रामायण कि रचना पूर्ण कर दी थी क्या साई महाराज जी उनसे ज्यादा त्रिकालदर्शी थे या ब्रह्मऋषि वशिष्ठ से भी ज्यादा श्रेष्ठ थे , जो कि स्वयं श्री राम के कुलगुरु थे …. या विश्वामित्र से ज्यादा बड़े तपस्वी थे…. या वेद व्यास जी जिनके द्वारा अठारह पुराण , चारो वेद , महाभारत , श्रीमदभगवतगीता सहित अनेकों धर्मग्रंथो कि रचना कि थी उनसे बड़े ज्ञानी … या महर्षि दधीचि से ज्यादा बड़े त्यागी थे….चमत्कारों कि कहो तो साई महाराज से बड़े बड़े चमत्कार पहले भी ऋषि मुनियो ने प्रकट किए है ।

तुलसी दास जी ने भी किए थे , सूरदास जी ने भी…..तो ये बस ईश्वर भक्त थे , भगवान नहीं तो साई महाराज भगवान कैसे हो गए ?

……या बस कोई साधारण मनुष्य साई चरित नाम से कोई पुस्तक लिख दे उसी के आधार पर उन्हे भगवान मान लिया ?

अरे मुर्खाधिराजों ( सच है कृपया मुंह कड़वा मत होने देना ) … इन धर्मग्रंथो कि रचना क्यो कि गयी …. इसीलिए ताकि जब मनुष्य भटके तो इनसे धर्म की प्रेरणा ले सके ।

…किस धर्मग्रंथ में लिखा है कि साई महाराज नाम के कोई अवतार होंगे ?

…..लिखा हुआ तो बहुत दूर रामायण , महाभारत , श्रीमद्भगवत गीता , वेद , उपनिषद श्रुतिया पुराण इनमे साई महाराज का नाम तक नहीं है….

तो हिन्दू हो तो क्या धर्मग्रंथो को भी झूठा साबित करोगे ।

इनमे कलयुग में सिर्फ दो अवतार लिखे गए है एक हो चुका और दूसरा कलयुग के अंतिम चरण में होगा कल्कि अवतार…..

तो क्या वेद व्यास जी साई महाराज का जिक्र करना भूल गए होंगे ?

…..वेदव्यास जी ने ग्रंथो में और तुलसी दास जी ने रामायण में बहुत पहले ही कलयुग का चित्रण किया है जो कि बिलकुल सही है तो क्या उन्होने जान बूझकर साई महाराज के बारे में नहीं लिखा कि साई महाराज नाम के कोई अवतार होंगे ?

…… नहीं जिसको भी भक्ति का क्षय और अपना धर्म भ्रष्ट करना हो …..वही साई साई करे …..

जो हिन्दू है …..और भगवान को प्यार करता है ……साई बाबा के चक्कर में न पड़े…….

भगवान को छोडकर …… किसी और को भगवान के स्थान पर पूजना …..भगवान के साथ साथ भक्ति और धर्म का भी अपमान है ……

जय श्री राम
अपने परमसमर्थ , परम कृपालु , परम भक्तवत्सल…… परम दयालु श्री भगवान को छोडकर ……साई के दर पर जाकर दौलत की भीख मांगने वालो , साई से अपनी इच्छाओं की पूर्ति की आशा रखने वालो तुमसे बड़ा मूर्खता का उदाहरण कलियुग में और क्या होगा ?

"जो साई को पूजते है उनसे एक एक सवाल …..

किस धर्मग्रंथ मे साई का नाम लिखा है ?????

राम के चरणों कि स्तुति गाने वाले ….कृष्ण की लीलाओ का रसास्वादन करने वाले ….शिव कि महिमाओ का वर्णन करके खुद को परम धन्य समझने वाले परम सौभाग्यशाली हिन्दुओ ने किस आधार पर …साई के नाम का घंटा बजाना चालू कर दिया ....

जवाब हो तो जरूर दीजिएगा………….

किस धर्मग्रंथ मे साई का नाम लिखा है ???????? 

अगर तुम लोगो को संतो को पूजना ही आधुनिक फैशन लग रहा है अथवा साई को पूजने के लिए ये तर्क है तो … ऋषियों को पूजो …..वशिष्ठ को पूजो …. अत्री मुनि को पूजो …. संदीपनी को पूजो …….दधीचि को पूजो ……..वाल्मीकि को पूजो …..

साई बाबा न इनसे बड़ा संत था न इनसे बड़ा सिध्द …… 

अगर ये पुराने लगते है तो तुलसी दास को पूजो ………. उन्होेंने रामायण लिख दी…… उन्हे मंदिरो में स्थापित
नहीं किया ।

हां चार चमत्कार दिखाकर…. एक दो उपदेश देकर…." सबका मालिक एक " का नारा देने वाले साई महाशय को किस आधार पर भगवान बनाकर मंदिरो में स्थापित करने का फतवा जारी कर दिया कुछ साई अंधभक्तो ने…..

अथवा साई एजेंटो ने अथवा साई दलालो ने अथवा साई के नाम पर धंधा करने वालो ने ….

भारत एक भक्ति प्रधान देश है यहां कि अंधी जनता को हर दस वर्ष में एक नया भगवान चाहिए । 

अरे मूढ़ो क्या तेतीस कोटि देवता तुम्हारे लिए कम पड गए है… या शिव जी , श्री हरि , श्री कृष्ण , श्री राम , माँ भवानी सब से मन ऊब गया है तुम्हारा… या बस चार चमत्कार देख लिए या किसी के मुँह से सुन भी लिए तो बस वही हो गया तुम्हारा मुक्ति दाता । 

अक्ल पर पत्थर पड गए है या पापों ने बुद्धि को इतना कुंठित कर दिया है कि इतना नहीं सोच पा रहे कि साई महाराज को किस आधार पर भगवान घोषित कर दिया….बिना सिर पैर के तर्को के आधार पर ही तुम किसी को भगवान मान लोगे ?

संत पुज्यनीय होते है उनके लिए मन में श्रद्धा होनी चाहिए पर ये जो तुम कर रहे हो वो तो आँख वाला होकर भी कुएं में गिर पड़ने कि तरह है । 

मेरी श्रद्धा सभी संतो पर है , पर संतो को ही एक मात्र परब्रह्म मानकर सर्वव्यापक परमेश्वर कि अवमानना नहीं कि जा सकती और अवतार अकारण नहीं होता स्वयं भगवान कहते है कि किसी उद्देश्य से होता है और साई महाराज का क्या उद्देश्य था सिर्फ ज्ञान देना…..एकता का संदेश देना …

बस….या फिर साई महाराज के ‘ लेटैस्ट वर्जन ‘ सत्य साई के अवतार लेने का उद्देश्य क्या था मुह से बॉल निकालकर दिखाना , उँगलियो से राख़ निकालकर दिखाना , जादू से हाथ से जंजीर पैदा कर देना …..ऐसी चीजे सड़को पर एक एक दो दो रुपया मांगते जादूगर दिखाया करते थे…….

कड़वा लगे पर सच यही है ….. कि भ्रांति युक्त बुद्धि से , सिर्फ सुनकर और सिर्फ सुनकर ही " सबका मालिक एक " चिल्लाते हुये शिरडी वाले साई बाबा आए है तेरे दर पर — गाते हुये शिर्डी कि परिक्रमा लगाकर खुद को भगवान का परम उपासक समझने वाले सिर्फ मूर्ख है सिर्फ मूर्ख है सिर्फ मूर्ख है ।

…… इतना बहुत है …….जिस साई के उपासक के पास इन सब बातो का पूर्णतः ठोस जवाब हो तो ही बात करे … वरना इतने पर भी इन बातो को दरकिनार कर अब भी पूजा कि अलमारी मे भगवान के बीच में रखे साई बाबा के सामने बैठकर … साई राम , साई राम चिल्लाना इससे बड़ा मूर्खता का उदाहरण मुझे तो ढूँढे नहीं मिलेगा……..

……… सोचिए……… और निस्कर्ष निकालिए ….. सच क्या है ….और इतने पर भी जो हिन्दू साई का लॉकेट अपने गले से न निकाले तो उसे खुद को हिन्दू कहने का हक तो है पर वो सनातन धर्मी कतई नहीं है ….क्यो कि सनातन धर्म मे साई था ही नहीं …….न है ।

अक्सर इन बातो को सुनकर भी कुछ धर्मप्रिय हिंदुत्ववादी हिन्दू साई का मोह नहीं छोड़ पाते इसलिए वो अंत मे एक तर्क देते है कि हे हे हे अजी हम तो साई को संत मानते है इसलिए मंदिरो में स्थापित करके उनकी पूजा करते है ।

तो क्या साई महाराज से पहले कोई ज्ञानी संत नहीं हुये थे … महर्षि वाल्मीकि जिन्होने कि अपनी त्रिकाल दर्शिता से राम की लीलाओ के अंत से पहले ही रामायण कि रचना पूर्ण कर दी थी क्या साई महाराज जी उनसे ज्यादा त्रिकालदर्शी थे या ब्रह्मऋषि वशिष्ठ से भी ज्यादा श्रेष्ठ थे , जो कि स्वयं श्री राम के कुलगुरु थे …. या विश्वामित्र से ज्यादा बड़े तपस्वी थे…. या वेद व्यास जी जिनके द्वारा अठारह पुराण , चारो वेद , महाभारत , श्रीमदभगवतगीता सहित अनेकों धर्मग्रंथो कि रचना कि थी उनसे बड़े ज्ञानी … या महर्षि दधीचि से ज्यादा बड़े त्यागी थे….चमत्कारों कि कहो तो साई महाराज से बड़े बड़े चमत्कार पहले भी ऋषि मुनियो ने प्रकट किए है ।

तुलसी दास जी ने भी किए थे , सूरदास जी ने भी…..तो ये बस ईश्वर भक्त थे , भगवान नहीं तो साई महाराज भगवान कैसे हो गए ?

……या बस कोई साधारण मनुष्य साई चरित नाम से कोई पुस्तक लिख दे उसी के आधार पर उन्हे भगवान मान लिया ?

अरे मुर्खाधिराजों ( सच है कृपया मुंह कड़वा मत होने देना ) … इन धर्मग्रंथो कि रचना क्यो कि गयी …. इसीलिए ताकि जब मनुष्य भटके तो इनसे धर्म की प्रेरणा ले सके ।

…किस धर्मग्रंथ में लिखा है कि साई महाराज नाम के कोई अवतार होंगे ?

…..लिखा हुआ तो बहुत दूर रामायण , महाभारत , श्रीमद्भगवत गीता , वेद , उपनिषद श्रुतिया पुराण इनमे साई महाराज का नाम तक नहीं है….

तो हिन्दू हो तो क्या धर्मग्रंथो को भी झूठा साबित करोगे ।

इनमे कलयुग में सिर्फ दो अवतार लिखे गए है एक हो चुका और दूसरा कलयुग के अंतिम चरण में होगा कल्कि अवतार…..

तो क्या वेद व्यास जी साई महाराज का जिक्र करना भूल गए होंगे ?

…..वेदव्यास जी ने ग्रंथो में और तुलसी दास जी ने रामायण में बहुत पहले ही कलयुग का चित्रण किया है जो कि बिलकुल सही है तो क्या उन्होने जान बूझकर साई महाराज के बारे में नहीं लिखा कि साई महाराज नाम के कोई अवतार होंगे ?

…… नहीं जिसको भी भक्ति का क्षय और अपना धर्म भ्रष्ट करना हो …..वही साई साई करे …..

जो हिन्दू है …..और भगवान को प्यार करता है ……साई बाबा के चक्कर में न पड़े…….

भगवान को छोडकर …… किसी और को भगवान के स्थान पर पूजना …..भगवान के साथ साथ भक्ति और धर्म का भी अपमान है …… 

जय श्री राम
अपने परमसमर्थ , परम कृपालु , परम भक्तवत्सल…… परम दयालु श्री भगवान को छोडकर ……साई के दर पर जाकर दौलत की भीख मांगने वालो , साई से अपनी इच्छाओं की पूर्ति की आशा रखने वालो तुमसे बड़ा मूर्खता का उदाहरण कलियुग में और क्या होगा ?"
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