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साई का सच.


साई का सच…. शिरडी साई ट्रस्ट 60 वर्षों से एक मुस्लिम फ़क़ीर साई बाबा उर्फ चांदमियाँ को ना केवल हिंदू ब्राह्मण साबित करने का कुत्सित प्रयास कर रहा है, बल्कि अवतार प्रमाणित करने मे लगा हुआ है. धर्म का मूल उद्देश्य ही सत्य की खोज है .उस आस्था का क्या मूल्य जो झूठ और कपट के सहारे खड़ी हुई हो .सत्य तो यह है कि मौला साई के 99% भक्तों को उनकी असलियत के बारे मे कुछ मालूम ही नहीं है . मौला साई के जीवन के बारे मे सबसे प्रामाणिक जानकारी उनके सेवक गोविंदराव दाभोलकर की पुस्तक “‘साई सतचरित्र “” मे मिलती है . यह पुस्तक स्वयं मौला साई के द्वारा ही लिखी मानी जाती है, क्योंकि गोविंद राव ने जब बाबा से उनकी जीवनी लिखने की आज्ञा माँगी तो बाबा ने उन्हे आशीर्वाद देते हुए कहा कि “” मैं तुम्हारे अंतकरण मे प्रकट होकर स्वयं ही अपनी जीवनी लिखूंगा “”.गोविंद राव ने मस्जिद मे होने वाली घटनाओ को संकलित कर सर्वप्रथम मराठी मे पुस्तक लिखी . यही वह पुस्तक है जिसके बल पर चाँदमियाँ को महिमामंडित किया गया है . प्रस्तुत लेख मे साई सतचरित्र पुस्तक के उन तथ्यों को लिखा गया है जो साबित करते हैं कि साई बाबा कट्टर मुस्लिम था. इस लेख का मूल उद्देश्य सत्य को प्रकट करना है… 1 : साई बाबा सारा जीवन मस्जिद मे रहे ( पुस्तक मे हर जगह इस बात का उल्लेख है) नोट : मौला साई लगभग पेंसठ वर्ष तक शिर्डी मे रहे पर एक भी रात उन्होने किसी हिंदू मंदिर मे नही गुज़ारी 2 : अल्लाह मालिक सदा उनके ज़ुबान पर था वो सदा अल्लाह मालिक पुकारते रहते ( पूरी पुस्तक मे जगह जगह इस बात का उल्लेख है ) नोट : मौला साई के मुख से कभी जय श्रीराम, हर हर महादेव या जय माता दी नहीं निकलता था. ना ही कभी वो ओम का उच्चारण करते थे. 3 : रोहीला मुसलमान आठों प्रहार अपनी कर्कश आवाज़ मे क़ुरान शरीफ की कल्मे पढ़ता और अल्लाह ओ अकबर के नारे लगाता. परेशान होकर जब गाँव वालो ने बाबा से उसकी शिकायत की तो उन्होने कहा कि”” वे उसकी कलमो के समक्ष उपस्थित होने का साहस करने मे असमर्थ हैं .”” और बाबा ने गाँव वालों को भगा दिया.( अध्याय 3 पेज 5 ) नोट : शिरडी साई ट्रस्ट इन्ही मौला साई को अखिल ब्रह्मांड नायक कहता है जो क़ुरान की कलमो से डर गये. 4 : तरुण फ़क़ीर को उतरते देख म्हलसापति ने उन्हे सर्वप्रथम “” आओ साई “” कहकर पुकारा. (अध्याय 5 पेज 2 ) नोट : मौला साई मुस्लिम फ़क़ीर थे और फ़क़िरो को अरबी और उर्दू मे साई नाम से पुकारा जाता है. साई शब्द मूल रूप से हिन्दी नही है 5 : मौला साई हमेशा कफनी पहनते थे .(अध्याय 5 पेज 6 ) नोट : कफनी एक प्रकार का पहनावा है जो मुस्लिम फ़क़ीर पहनते हैं 6 : मौला साई सुन्नत (ख़तना ) कराने के पक्ष मे थे. (अध्याय 7 पेज1) नोट : सुन्नत कराना मुस्लिम धर्म की परंपरा है 7 : फ़क़िरो के संग बाबा माँस और मछली का सेवन भी कर लेते थे .(अध्यया 7 पेज 3) नोट : कोई भी हिंदू संत ऐसा घृणित काम नहीं कर सकता. 8 : बाबा ने कहा “” मैं मस्जिद मे एक बकरा हलाल करने वाला हूँ, हाज़ी सिधिक से पूछो की उसे क्या रुचिकर होगा .बकरे का माँस ,नाध या अंडकोष “” (अध्याय 11 पेज 5 ) नोट : हिंदू संत कभी स्वपन मे भी बकरा हलाल नही कर सकता. न ही ऐसे वीभत्स भोजन खा सकता है 9 : एक बार मस्जिद मे एक बकरा बलि चढाने लाया गया तब साई बाबा ने काका साहेब से कहा “” मैं स्वयं ही बलि चढाने का कार्य करूँगा “”.(अध्याय 23 पेज 6) नोट : हिंदू संत कभी ऐसा जघ्न्य कृत्य नही कर सकते. 10 : मालेगाँव के फ़क़ीर पीर मोहम्मद का साई बाबा बहुत आदर करते. वे सदेव उन्हे अपने दाहिने ओर बैठाते. सबसे पहले वो चिलम पीते फिर बाबा को देते .जब दोपहर का भोजन परोस दिया जाता तब बाबा बड़े आदर से उसे उन्हे बुलाकर अपनी दाहिनी ओर बैठाते तब सब भोजन करते .बाबा के पास जो भी दक्षिणा एकत्रित होती उसमे से रोज पचास रुपये वो पीर मोहम्म्द को देते. जब वो लौटते तो बाबा भी सौ कदम तक उनके साथ जाते.(अध्याय 23 पेज 5 ) नोट : मौला साई इतना सम्मान कभी किसी हिंदू संत को नही देते थे .रोज पचास रुपये वो उस समय देते थे जब बीस रुपया तोला सोना मिलता था. मौला साई के जीवन काल में उनके पास इतना दान आता था आयकर विभाग की जाँच भी हुई थी. 11 : एक बार बाबा के भक्त मेघा ने उन्हे गंगा जल से स्नान कराने की सोचा तो बाबा ने कहा “”मुझे इस झंझट से दूर ही रहने दो .मैं तो एक फ़क़ीर हूँ मुझे गंगाजल से क्या प्रायोजन. (अध्याय 28 पेज 7 ) नोट : किसी हिंदू के लिए गंगा स्नान जीवन भर का सपना होता है .गंगा जल का दर्शन भी हिंदुओं मे अति पवित्र माना जाता है 12 : कभी बाबा मीठे चावल बनाते और कभी माँस मिश्रित चावल (पुलाव) बनाते थे (अध्याय 38 पेज 2) नोट : माँस मिश्रित चावल अर्थात मटन बिरयानी सिर्फ़ मुस्लिम फ़क़ीर ही खा सकता हैं, कोई हिंदू संत उसे देखना भी पसंद नही करेगा. 13 : एकादशी को बाबा ने दादा केलकर को कुछ रुपये देकर कुछ माँस खरीद कर लाने को कहा (अध्याय 38 पेज 3 ) नोट : एकादशी हिंदुओं का सबसे पवित्र उपवास का दिन होता है कई घरो मे इस दिन चावल तक नही पकता. 14 : जब भोजन तैयार हो जाता तो बाबा मस्जिद से बर्तन मंगाकर मौलवी से फातिहा पढ़ने को कहते थे (अध्याय 38 पेज 3) नोट : फातिहा मुस्लिम धर्म का संस्कार है 15 : एक बार बाबा ने दादा केलकर को माँस मिश्रित पुलाव चख कर देखने को कहा .केलकर ने मुँहदेखी कह दिया कि अच्छा है .तब बाबा ने केलकर की बाँह पकड़ी और बलपूर्वक बर्तन मे डालकर बोले थोड़ा सा इसमे से निकालो अपना कट्टरपन छोड़कर चख कर देखो.(अध्याय 38 पेज 5) नोट : मौला साई ने परीक्षा लेने के नाम पर जीव हत्या कर एक ब्राहमण का धर्म भ्रष्ट कर दिया किंतु कभी अपने किसी मुस्लिम भक्त की ऐसी कठोर परीक्षा नही ली. अन्य तथ्य जो सिद्ध करते हैं साई बाबा जेहादी मुसलमान था… 1 : मुल्ला जेहादी साई का सेवक अब्दुल बाबा जो लगभग तीस साल तक बाबा के साथ मस्जिद मे ही रहा रोज बाबा को क़ुरान सुनाता था. वो रोज रामायण या गीता नही सुनता था. 2 : महाराष्ट्र मे शिर्डी साई मंदिर मे गाई जाने वाली आरती का अंश मंदा त्वांची उदरिले! मोमीन वंशी जन्मुनी लोँका तारिले!” उपरोक्त आरती मेँ “”मोमिन वंशी जन्मुनी “” अर्थात् मुसलमान वंश मे जन्मे शब्द स्पष्ट आया है. (15 साल से मोमीन वंशी गा रहे हैं फिर भी मौला को ब्राहमाण बता रहे हैं ) 3 : मौला साई ने अपनी मृत्यु के कुछ दिन पहले औरंगाबाद के मुस्लिम फ़क़ीर शमशूद्दीन मियाँ को दो सौ पचास रुपये भिजवाया ताकि उनका मुस्लिम रीति रिवाज़ से अंतिम संस्कार कर दिया जाए तथा सूचना भिजवाई की वो अल्लाह के पास जाने वाले हैं .( ये एक तरह से मृत्यु पूर्व बयान जैसा है जिसे कोर्ट भी सच मानती है अगर बाबा हिंदू होते तो तेरहवी करवाते गंगाजली करवाते ) 4 : मुल्ला साई जब तक जीवित रहा शिरडी मे सूफ़ी फ़क़ीर के नाम से ही जाने जाता था. 5 : मौला साई की मृत्यु के बाद उनकी मज़ार बनाई गई थी जो 1954 तक थी. फिर उसे समाधी मे बदल दिया गया .हम न मौला साईं विरोधी हैं न सांप्रदायिक हैं लेकिन हमारा प्रयास है कि चांदमियां को जानबूझकर हिन्दु न साबित किया जाए। पिछले पचास साल से पैसा कमाने के लिए जैसा अधर्म शिरडी ट्रस्ट ने किया वैसा इतिहास में कभी नहीं हुआ। श्री राम के नाम से सीता माता को हटा दिया. शिर्डी साई संस्थान के अरबपति लालची तथाकथित पंडो का फैलाया षड्यंत्रकारी जाल का झूठ… जिस मौला साई के जन्म तिथि का कोई अता पता नही उनकी कपट पूर्वक राम नवमी के दिन जयंती मनाई जा रही है . मौला साई हमेशा अल्लाह मलिक बोलता था, जबकि “”सबका मलिक एक”” नानक जी कहते थे . जो मौला साईं जीवन भर मस्जिद में रहे उसे मंदिर में बैठा दिया गया, जो मौला साईं व्रत उपवास के विरोधी थे उनके नाम से साईं व्रत कथा छप रही हैं, जो मौला साईं हमेशा अल्लाह मालिक बोलते थे उनके साथ ओम और राम को जोड़ दिया, जो मौला साईं रोज कुरान पड़ते थे उनके मंत्र बनाये जा रहे हैं, पुराण लिखी जा रही है. जो मौला साईं मांसाहारी था उन्हें हिन्दू अवतार बनाया जा रहा है, जिस मुल्ला साईं ने गंगा जल छूने से इंकार कर दिया उसके नाम से यज्ञ किये जा रहे हैं, गंगा जल से अभिषेक किया जा रहा है, जो खुद निगुरा था उसे सदगुरु बनाया जा रहा है। जो मुल्ला साई खुद अनपढ़ था उनके नाम से गीता छापी जा रही है, कब्रगाही व्यक्ति के मंदिर बनाना सनातन हिंदू धर्म मे पाप है . इस देश मे हज़ारों संत हुए किंतु किसी की भी मंदिर नही हैं. व्यास जैसे ऋषि जिन्होने 18 पुराण लिखे गीता लिखी, अगस्त्य, विश्वामित्र, कपिल मुनि ,नारद, दत्तात्रेय, भृिगु, पाराशर,सनक ,सनन्दन सनतकुमार ,शौनक, वशिष्ट, वामदेव ,बाल्मीक, तुलसीदास , गोरखनाथ , तुकाराम, मीरा, एकनाथ , मुक्ताबाई , नरहरी, नामदेव सोपान,संत रविदास , चैतन्य महाप्रभु ,राम कृष्ण परमहंस आदि आदि कितने ही संत हुए किंतु किसी के भी जगह जगह मंदिर नहीं हैं. हर राम भक्त हिन्दू से अनुरोध है कि हिन्दू धर्म की शुद्धि और पवित्रता के लिए इसे अधिक शेयर करें…

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तथ्य जो सिद्ध करते हैं साई बाबा मुसलमान थे


तथ्य जो सिद्ध करते हैं साई बाबा मुसलमान थे

१ :: मौला साई का सेवक अब्दुल बाबा जो लगभग तीस साल तक बाबा के साथ मस्जिद मे ही रहा रोज बाबा को क़ुरान सुनाता था . वो रोज रामायण या गीता नही सुनते थे .

२ :: महाराष्ट्र मे शिर्डी साई मंदिर मे गाई जाने वाली आरती का अंश
मंदा त्वांची उदरिले! मोमीन वंशी जन्मुनी लोँका तारिले!” उपरोक्त
.फिर उसे समाधी मे बदल दिया गया .चांद मियां को जानबूझकर हिन्दु न साबित किया जाए।पिछले पचास साल से पैसा स्पष्ट आया है .

( ९५ साल से मोमीन वंशी गा रहे हैं फिर भी मौला को ब्राहमाण बता रहे हैं )

३ :: मौला साई ने अपनी मृत्यु के कुछ दिन पहले औरंगाबाद के मुस्लिम
फ़क़ीर शमशूद्दीन मियाँ को दो सौ पचास रुपये भिजवाया ताकि उनका मुस्लिम रीति रिवाज़ से अंतिम संस्कार कर दिया जाए तथा सूचना भिजवाई की वो अल्लाह के पास जाने वाले हैं .( ये एक तरह से मृत्यु पूर्व बयान जैसा है
जिसे कोर्ट भी सच मानती है अगर बाबा हिंदू होते तो तेरहवी करवाते
गंगाजली करवाते .)

४ :: मौला साई जब तक जीवित रहे शिरडी मे सूफ़ी फ़क़ीर के नाम से ही जाने जाते थे .

५ :: मौला साई की मृत्यु के बाद उनकी मज़ार बनाई गई थी जो 1954 तक थी
.फिर उसे समाधी मे बदल दिया गया .चांद मियां को जानबूझकर हिन्दु न साबित किया जाए।पिछले पचास साल से पैसा माने के लिए जैसा अधर्म शिरडी ट्रस्ट ने किया वैसा इतिहास में कभी नहीं हुआ। श्री राम के नाम से सीता माता को हटा दिया .

शिर्डी साई संस्थान के झूठ —

जिस मौला साई के जन्म तिथि का कोई अता पता नही उनकी कपट पूर्वक राम नवमीके दिन जयंती मनाई जा रही है .

मौला साई हमेशा अल्लाह मलिक पुकारते थे जबकि “”सबका मलिक एक”” नानक जी कहते थे .

जो मौला साईं जीवन भर मस्जिद में रहे उसे मंदिर में बैठा दिया गया .जो मौला साईं व्रत उपवास के विरोधी थे उनके नाम से साईं व्रत कथा छप रही हैं

जो मौला साईं हमेशा अल्लाह मालिक बोलते थे उनके साथ ओम और राम को जोड़ दिया

जो मौला साईं रोज कुरान पड़ते थे उनके मंत्र बनाये जा रहे हैं पुराण लिखी
जा रही है .

जो मौला साईं मांसाहारी थे उन्हें हिन्दू अवतार बनाया जा रहा है

जिस मौला साईं ने गंगा जल छूने से इंकार कर दिया उसके नाम से यज्ञ किये
जा रहे हैं गंगा जल से अभिषेक किया जा रहा है जो खुद निगुरा था उसे
सदगुरु बनाया जा रहा है।

जो मौला साई खुद अनपढ़ थे उनके नाम से गीता छापी जा रही है

मरणधर्मा व्यक्ति के मंदिर बनाना हिंदू धर्म मे पाप है .

इस देश मे हज़ारों संत हुए किंतु किसी की भी मंदिर नही हैं व्यास जैसे ऋषि जिन्होने गीता भाष्य लिखी, अगस्त्य ,विश्वामित्र, कपिल मुनि ,नारद,
दत्तात्रेय, भृिगु, पाराशर,सनक ,सनन्दन सनतकुमार ,शौनक ,वशिष्ट ,वामदेव
,बाल्मीक ,तुलसीदास , गोरखनाथ ,तुकाराम, नामदेव, मीरा, एकनाथ ,मुक्ताबाई,, नरहरी, नामदेव ,सोपान,संत रविदास , चैतन्य महाप्रभु ,आदि आदि कितने ही संत हुए किंतु किसी के भी जगह जगह मंदिर नहीं हैं .

हर हिन्दू से अनुरोध है कि हिन्दू धर्म की शुद्धि और पवित्रता
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जागो हिंदू जागो !! जागो हिंदू जागो !! जागो हिंदू जागो !! जागो
हिंदू जागो !! जागो हिंदू जागो !!

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पिण्डारी डाकू साईं की असली कहानी और उसके द्वारा हिन्दुओं के खिलाफ जिहाद फैलाने के षड्यंत्र का खुलाशा :-


पिण्डारी डाकू साईं की असली कहानी और उसके द्वारा हिन्दुओं के खिलाफ जिहाद फैलाने के षड्यंत्र का खुलाशा :-
पिछले दिनों मेरे एक मित्र ने शिर्डी साईं के बारे में बहुत सी जानकारी इकठ्ठा की और मुझे बताया की साईं असल में क्या है कहा से आया, जन्म मरण और फिर इतना लम्बे समय बाद उसका अचानक भगवान बनकर निकलना, ये सब कोई संयोग नहीं सोचा समझा षड्यंत्र है।
साईं का जन्म 1838 में हुआ था, पर कैसे हुआ और उसके बाद की पूरी कथा बहुत ही रोचक है, साईं के पिता का असली नाम था बहरुद्दीन, जो की अफगानिस्तान का एक पिंडारी था, वैसे इस पर एक फिल्म भी आई थी जिसमे पिंडारियो को देशभक्त बताया गया है, ठीक वैसे ही जैसे गाँधी ने मोपला और नोआखली में हिन्दुओ के हत्यारों को स्वतंत्रा सेनानी कहा था, औरंगजेब की मौत के बाद मुग़ल साम्राज्य ख़तम सा हो गया था केवल दिल्ली उनके आधीन थी, मराठा के वीर सपूतों ने एक तरह से हिन्दू साम्राज्य की नीव रख ही दी थी। ऐसे समय में मराठाओं को बदनाम करके उनके इलाकों में लूटपाट करने का काम ये पिंडारी करते थे, इनका एक ही काम था लूटपाट करके जो औरत मिलती उसका बलात्कार करना। आज एक का बलात्कार, कल दूसरी का, इस तरह से ये मराठाओं को तंग किया करते थे, पर समय के साथ साथ देश में अंग्रेज आये और उन्होंने इन पिंडारियो को मार मार कर ख़तम करना शुरू किया, साईं का बाप जो एक पिंडारी ही था, उसका मुख्य काम था अफगानिस्तान से आकर भारत के राज्यों में लूटपाट करना, एक बार लूटपाट करते करते वह महाराष्ट्र के अहमदनगर पहुंचा जहा वह एक वेश्या के घर रुक गया, उम्र भी जवाब दे रही थी, सो वो उसी के पास रहने लग गया, कुछ समय बाद उस वेश्या से उसे एक लड़का और एक लड़की पैदा हुआ, लड़के का नाम उसने चाँद मियां रखा और उसे लेकर लूटपाट करना सिखाने के लिए उसे अफगानिस्तान ले गया, उस समय अंग्रेज पिंडारियों की ज़बरदस्त धर पकड़ कर रहे थे इसलिए बहरुद्दीन भेस बदल कर लूटपाट करता था उसने अपने सन्देश वाहक के लिए चाँद मिया को रख लिया, चाँद मिया आज कल के उन मुसलमान भिखारियों की तरह था जो चादर फैला कर भीख मांगते थे। जिन्हें अँगरेज़ blanket beggar कहते थे, चाँद मिया का काम था लूट के लिए सही वक़्त देखना और सन्देश अपने बाप को देना, वह उस सन्देश को लिख कर उसे चादर के निचे सिल कर हैदराबाद से अफगानिस्तान तक ले जाता था, पर एक दिन ये चाँद मियां अग्रेजो के हत्थे लग गया और उसे पकड़वाने में झाँसी के लोगों ने अंग्रेजों की मदद की जो अपने इलाके में हो रही लूटपाट से तंग थे। उसी समय देश में पहली आजादी की क्रांति हुई और पूरा देश क्रांति से गूंज उठा, अंग्रेजो के लिए बुरा समय था और इसके लिए उन्हें खूंखार लोगों की जरुरत थी, बहर्दुद्दीन तो था ही लालची, सो उसने अंग्रेजो से हाथ मिला लिया और झाँसी चला गया, वहां उसने लोगों से घुलमिल कर झाँसी के किले में प्रवेश किया और समय आने पर पीछे से दरवाजा खोलकर रानी लक्ष्मी बाई को हाराने में अहम्भूमिका अदा की, यही चाँद मिया आठ साल बाल जेल से छूटकर कुछ दिन बाद शिर्डी पंहुचा और वह के सुलेमानी लोगोंसे मिला; जिनका असली काम था गैरमुसलमानों के बीच रह कर चुपचाप इस्लाम को बढ़ाना|
चाँद मियां ने वहीं से अल तकिया का ज्ञान लिया और हिन्दुओं को फ़साने के लिए साईं नाम रख कर शिर्डीमें आसन जमा कर बैठ गया, मस्जिद को जानबूझकर एक हिन्दू नाम दिया और उसके वहा ठहराने का पूरा प्रबंध सुलेमानी मुसलमानों ने किया, एक षड्यंत्र के तहत साईं को भगवान का रूप दिखाया गया और पीछे से ही हिन्दू मुस्लिम एकता की बातें करके स्वाभिमानी मराठाओं को मुर्दा बनाने के लिए उन्हें उनके ही असली दुश्मनों से एकता निभाने का पाठ पढ़ाया गया; पर पीछे ही पीछे साईं का असली मकसद था लोगों में इस्लाम को बढ़ाना।
इसका एक उदाहरण साईंसत्चरित्र में है कि साईं के पास एक पोलिसवाला आता है जिसे साईं मार मार भगाने की बात कहता है, अब असल में हुआ ये की एक पंडित जी ने अपने पुत्र को शिक्षा दिलवाने के लिए साईं को सोंप दिया पर साईं ने उसका खतना कर दिया जब पंडित जी को पता चला तो उन्होंने कोतवाली में रिपोर्ट कर दी, साईं को पकड़ने के लिए एक पुलिस वाला भी आया जिसे साईं ने मार कर भगाने की बात कही थी। मेरी साई बाबा से कोई निजी दुश्मनी नहीं है, परतुं हिन्दू धर्म का नाश हो रहा है, इसलिए मै कुछ सवाल करना चाहता हूं, हिन्दू धर्म एक सनातन धर्म है, लेकिन आज कल लोग इस बात से परिचित नहीं हैं ? क्या जब भारत मे अंग्रेजी सरकार अत्याचार और सबको मौत के घाट उतार रहे थे तब साईबाबा ने कौन से ब्रिटिश अंग्रेजो के साथ आंदोलन किया ? जिदंगी भीख मांगने मे कट गई? मस्जिद मे रह कर कुरान पढ़ना जरूरी था? बकरे हलाल करना क्या जरूरी था ? सब पाखंड है, पैसा कमाने का जरिया है।
ऐसा कौन सा दुख है कि उसे भगवान दूर नही कर सकते है, श्रीमतभगवतगीता मे लिखा है कि श्मशान और समाधि की पुजा करने वाले मनुष्य राक्षस योनी को प्राप्त होते हैं! साई जैसे पाखंडी की आज इतनी ज्यादा मार्केटिंग हो गयी है कि हमारे हिन्दू भाई बहिन आज अपने मूलधर्म से अलग होकर साई मुल्ले कि पूजा करने लगे हैं।
आज लगभग हर मंदिर में इस जिहादी ने कब्जा कर लिया है। हनुमान जी ने हमेशा सीता राम कहा और आज के मूर्ख हिन्दू हुनमान जी का अपमान करते हुए सीताराम कि जगह साईं राम कहने लग गए । बड़े शर्म कि बात है। आज जिसकी मार्केटिंग ज्यादा; उसी कि पूजा हो रही है। इसी लिए कृष्ण भगवान ने कहा था कि कलयुग में इंसान पथ और धर्म दोनों से भ्रष्ट हो जाएगा। 100 मे से 99 को नहीं पता साईं कौन था? इसने कौन सी किताब लिखी? क्या उपदेश दिये ?पर फिर भी भगवान बनाकर बैठे हैं। साई के माँ बाप का सही सही पता नहीं ?पर मूर्खो को ये पता है कि ये किस किस के अवतार हैं?
अंग्रेज़ो के जमाने मे मूर्खो के साई भगवान पैदा होकर मर गए पर किसी भी एक महामारी भुखमरी मे मदद नहीं की। इनके रहते भारत गुलाम बना रहा पर इन महाशय को कोई खबर नहीं रही। शिर्डी से कभी बाहर नहीं निकले पर पूरे देश मे अचानक इनकी मौत के 90-100 साल बाद इनके मंदिर कुकरमूत्ते की तरह बनने लगे? चालीसा हनुमान जी की हुआ करती थी ;पर आज साईं की हो गयी। राम सीता के हुआ करते थे। आज साईं ही राम हो गए। श्याम राधा के थे आज वो भी साईं बना दिये गए। ब्रहस्पति दिन विष्णु भगवान का होता था; आज साई का मनाया जाने लगा। भगवान की मूर्ति मंदिरो में छोटी हो गयी और साईं विशाल मूर्ति में हो गया।प्राचीन हनुमान मंदिर दान को तरस गए और साई मंदिरो के तहखाने तक भर गए।
मूर्ख हिन्दुओं अगर दुनिया मे सच मे कलयुग के बाद भगवान ने इंसाफ किया तो याद रखना मुंह छुपाने के लिए और अपनी मूर्ख बुद्धि पर तरस खाने के लिए कहीं शरण भी न मिलेगी। इसलिए भागवानों की तुलना मुल्ले साईं से करके पाप मत करो !
साभार : – डाक्टर वैद्य पंडित विनय कुमार उपाध्याय

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साईं


*साई का इतिहास-* अवश्य पढ़ें 

 बीरगति को प्राप्त हुई रानी लक्ष्मी बाई को मरवाने वाले गद्दारो के बारे मे इतिहास लोगों मेंअब तक यही धारणा हे कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई अँगरेजों से लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुई थी और यह बात सत्य भी हे परंतु कितने लोगों को पता है कि इस विरांगन को पकड़ना अँगरेजों के लिए दुष्कर ही नहीं बल्कि असंभव था ।सालों से अँगरेजों के नाकमें दम करने वाली रानी को पकड़ने के लिए जब अंग्रेजों को कुछ उपाय नहीं सुझा तब उन्होंने पुराने तरीके आजमाए । यानी कि किसी गद्दार सैनिक की खोज जो रानी की सेना में हो और रानी के बारे में काफी कुछ जानता हो गद्दारों का इतिहास देखें तो सिर्फ दो नाम ऐसे हें जिन्होंने भारत के इतिहास को बदल कर रख दिया था पहला गद्दार जयचंद था जो हिन्दू साम्राज्य के विनाश का कारण बना । पृथ्वी राज चौहान अंतिम हिन्दू राजा थे जिनके बादआठ सौ वर्षों तक मुस्लिमों ने शासन किया दूसरा गद्दार मीर जाफर हुआ जो बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला का सेनापति था। वह महत्वाकांक्षी एवं लालची था भारत में अंग्रेजी राज्य की नींव बंगाल से ही पड़ी थी जब प्लासी की लड़ाई में अँगरेजों(रॉबर्टक्लाइव) ने नवाब को हराया था और उसी लड़ाई में गद्दार मीर जाफर अँगरेजों से मिल गया था। बाद में यानी 1757 में अँगरेजों ने उसे बंगाल का नवाब बनाया अब आते हे तीसरे गद्दार पर जो रानी लक्ष्मीबाई की मौत का कारण बना वह था बहरूद्दीन यानी कि चाँद मियाँ ( साँईंबाबा) का बाप बहरूद्दीन एक अफगानी पिंडारी मुसलमान था रानी लक्ष्मीबाई की सेना में लगभग 500 पिंडारी सैनिक थे जिसमें साँईं के पिता का स्थान रानी के निकटतम एवं विश्वस्त सैनिको में था अब अँगरेजों ने बहरूद्दीन को लालच देकर रानी से गद्दारी करने को तैयार कर लिया इसी के निशान देही पर अँगरेजों ने रानी को घेरा रानी अपने इकलौते बेटे को पीठ पर बाँधे भागती रही अंग्रेज पीछा करते रहे रानी हाथ नहीं लगी अब रानी का पीछा करने का जिम्मा पाँच पिंडारियों को दिया गया जिसमें एक शिर्डी वाले चाँद मिया उर्फ़ साईँ का पिता भी था उसे रानी के छिपने के स्थानों का पता था अन्ततः रानी को घेर लिया गया। रानी रणचण्डी की तरह माँ भारती की शान को ना झुकने का प्रण लिए अपनी तलवार से कत्लेआम मचाती रही अंग्रेज सेनापति हैरान था कि कैसे एक अकेली महिला उसके सैनिकों को काट रही है ।रानी गिरती फिर उठती फिर गिरती फिर उठकर लड़ती कईयों की गर्दनें उड़ा देने के पश्चात अंत में वो गिरी तलवार उसके हाथों से दूर जा गिरा हार फिर भी ना मानी वो अपनी तलवार लेने के लिए अंतिम बार उठी , निहत्था पाकर पिंडारी सैनिकों ने रानी पर जोरदार वार किया , रानी फिर कभी नहीं उठी। रानी वीर गति को प्राप्त कर चुकी थी भारत की इस बेटी ने अपनी अंतिम साँस तक अपनी मातृभूमि की , अपने देश की रक्षा की इस महान विरांगना के चरणों में मैं शीष नवाता हूँ——————————
->>यह रहा साईं बाबा का कच्चा चिट्ठा 

साईं का जन्म 1838 में हुआ था, पर कैसे हुआ और उसके बाद की पूरी कथा बहुत ही रोचक है, साईं के पिता का असली नाम था बहरुद्दीन, जो कि अफगानिस्तान का एक पिंडारी था, वैसे इस पर एक फिल्म भी आई थी जिसमे पिंडारियो को देशभक्त बताया गया है, ठीक वैसे ही जैसे गाँधी ने मोपला और नो आखली में हिन्दुओ के हत्यारों को स्वतंत्रता सेनानी कहा था.औरंगजेब की मौत के बाद मुग़ल साम्राज्य ख़तम सा हो गया था केवल दिल्ली उनके अधीन थी, मराठा के वीर सपूतो ने एक तरह से हिन्दू साम्राज्य की नीव रख ही दी थी, ऐसे समय में मराठाओ को बदनाम करके उनके इलाको में लूटपाट करने का काम ये पिंडारी करते थे, इनका एक ही काम था लूटपाट करके जो औरत मिलती उसका बलात्कार करना, आज एक का बलात्कार कल दूसरी का, इस तरह से ये मराठाओ को तंग किया करते थे, पर समय के साथ साथ देश में अंग्रेज आये और उन्होंने इन पिंडारियो को मार मार कर ख़तम करना शुरू किया.साईं का बाप जो एक पिंडारी ही था, उसका मुख्यकाम था अफगानिस्तान से भारत के राज्यों में लूटपाट करना, एक बार लूटपाट करते करते वह महाराष्ट्र के अहमदनगर पहुचा, जहा वह एक वेश्या के घर रुक गया, उम्र भी जवाब दे रही थी, सो वो उसी के पास रहने लग गया, कुछ समय बाद उस वेश्या से उसे एक लड़का और एक लड़की पैदा हुआ, लड़के का नाम उसने चाँद मियां रखा और उसे लेकर लूटपाट करना सिखाने के लिए उसे अफगानिस्तान ले गया.उस समय अंग्रेज पिंडारियो की ज़बरदस्त धर पकड़ कर रहे थे, इसलिए बहरुद्दीन भेष बदल कर लूटपाट करता था. उसने अपने सन्देश वाहक के लिए चाँद मिया को रख लिया, चाँद मिया आज कल के उन मुसलमान भिखारियों की तरह था जो चादर फैला कर भीख मांगते थे, जिन्हें अँगरेज़ Blanket Begger कहते थे, चाँद मिया का काम था लूट के लिए सही वक़्त देखना और सन्देश अपने बाप को देना, वह उस सन्देश को लिख कर उसे चादर के नीचे सिल कर हैदराबाद से अफगानिस्तान तक ले जाता था, पर एक दिन ये चाँद मियां अग्रेजो के हत्थे लग गया और उसे पकडवाने में झाँसी के लोगो ने अंग्रेजो की मदद की जो अपने इलाके में हो रही लूटपाट से तंग थे.उसी समय देश में पहली आजादी की क्रांति हुई और पूरा देश क्रांति से गूंज उठा, अंग्रेजो के लिए विकट समय था और इसके लिए उन्हें खूंखार लोगो की जरुरत थी, बहर्दुद्दीन तो था ही धन का लालची, सो उसने अंग्रेजो से हाथ मिला लिया और झाँसी चला गया. उसने लोगो से घुलमिल कर झाँसी के किले में प्रवेश किया और समय आने पर पीछे से दरवाजा खोल कर रानी लक्ष्मी बाई को हराने में अहम् भूमिका अदा की, यही चाँद मिया आठ साल बाद जेल से छुटकर कुछ दिन बाद शिर्डी पंहुचा और वहके सुलेमानी लोगो से मिला जिनका असली काम था गैर-मुसलमानों के बीच रह कर चुपचाप इस्लाम को बढ़ाना.चाँद मियां ने वही से अलतकिया का ज्ञान लिया और हिन्दुओ को फ़साने के लिए साईं नाम रख कर शिर्डी में आसन जमा कर बैठ गया, मस्जिद को जानबूझ कर एक हिन्दू नाम दिया और उसके वहा ठहराने का पूरा प्रबंध सुलेमानी मुसलमानों ने किया, एक षड्यंत्र के तहत साईं को भगवान का रूप दिखाया गया और पीछे से ही हिन्दू मुस्लिम एकता की बाते करके स्वाभिमानी मराठाओ को मुर्दा बनाने के लिए उन्हें उनके ही असली दुश्मनों से एकता निभाने का पाठ पढाया गया. पर पीछे ही पीछे साईं काअसली मकसद था लोगो में इस्लाम को बढ़ाना, इसका एक उदाहरण साईं सत्चरित्र में है कि साईं के पास एक पुलिस वाला आता है जिसे साईं मार मार भगाने की बात कहता है, अब असल में हुआ ये की एक पंडित जी ने अपने पुत्र को शिक्षा दिलवाने के लिए साईं को सोंप दिया, पर साईं ने उसका खतना कर दिया. जब पंडितजी को पता चला तो उन्होंने कोतवाली में रिपोर्ट कर दी, साईं को पकड़ने के लिए एक पुलिस वाला भी आया जिसे साईं ने मार कर भगाने की बात कही थी, ये तभी की फोटो है जब पुलिस वाला साईं को पकड़ने गया था और साईं बुरका पहन कर भागा था.मेरी साई बाबा से कोई निजी दुस्मनी नही है, परतुं हिन्दू धर्म को नाश होरहा है, इसलिए मै कुछ सवाल करना चाहता हूँ. हिन्दू धर्म एक सनातन धर्म है, लेकिन आज कल लोग इस बात से परिचित नही है क्या? जब भारत मे अंग्रेजी सरकार अत्याचार और सबको मौत के घाट उतार रहे थे तब साई बाबा ने कौन से ब्रिटिश अंग्रेजो के साथ आंदोलन किया ? जिदंगी भीख मांगने मे कट गई? मस्जिदमे रह कर कुरान पढना जरूरी था. बकरे हलाल करना क्या जरूरी था ? सब पाखंड है, लोगो को मुर्ख बना कर पैसा कमाने का जरिया है। ऐसा कौन सा दुख है कि उसे भगवान दूर नही कर सकते है.श्रीमद भगवत गीता मे लिखा है कि श्मशान और समाधि की पुजा करने वाले मनुष्य राक्षस योनी को प्राप्त होते हैं.साई जैसे पाखंडी की आज इतनी ज्यादा सेल्स मार्केटिंग हो गयी है कि हमारे हिन्दू भाई बहिन आज अपने मूल धर्म से अलग होकर साई मुल्ले कि पूजा करने लगे है। आज लगभग हर मंदिर में इस जिहादी ने कब्जा कर लिया है।हनुमान जी ने हमेशा सीता राम कहा और आज के मूर्ख हिन्दू हुनमान जी का अपमान करते हुए सीता राम कि जगह साई राम कहने लग गए । बड़ी शर्म कि बात है। आज जिसकी मार्केटिंग ज्यादा उसी कि पूजा हो रही है। इसी लिए कृष्ण भगवान ने कहा था कि कलयुग में इंसान पथ और धर्म दोनों से भ्रष्ट हो जाएगा।100 मे से 99 को नहीं पता साई कौन था, इसने कौन सी किताब लिखी, क्या उपदेश दिये पर फिर भी भगवान बनाकर बैठे है ! साई के माँ बाप का सही सही पता नहीं ,पर मूर्खो को ये पता है कि ये किस किस के अवतार है ! अंग्रेज़ो के जमाने मे मूर्खो के साई भगवान पैदा होकर मर गए पर किसी भी एक महामारी भुखमरी मे मदद नहीं की। इनके रहते भारत गुलाम बना रहा पर इन महाशय को कोई खबर नहीं रही। शिर्डी से कभी बाहर नहीं निकले पर पूरे देश मे अचानक इनकी मौत के 90-100 साल बाद इनके मंदिर कुकुरमुत्ते की तरह बनने लगे।चालीसा हनुमान जी की हुआ करती थी, आज साई की हो गयी ! राम सीता के हुआ करते थे,आज साई ही राम हो गए ! श्याम राधा के थे, आज वो भी साई बना दिये गए ! बृहस्पति दिन विष्णु भगवान का होता था, आज साई का मनाया जाने लगा!भगवान की मूर्ति मंदिरो में छोटी हो गयी और साई विशाल मूर्ति मे हो गए ! प्राचीन हनुमान मंदिर दान को तरस गए और साई मंदिरो के तहखाने तक भर गए!मूर्ख हिन्दुओ अगर दुनिया मे सच मे कलयुग के बाद भगवान ने इंसाफ किया तो याद रखना मुह छुपाने के लिए और अपनी मूर्ख बुद्धि पर तरस खाने के लिए कही शरण भी न मिलेगी ! इसलिए भागवानो की तुलना मुल्ले साई से करके पाप मत करो।इस लेख को पढ़ने के बाद भीन समझ मे आए तो अपना खतना करवा के मुसलमान बन जाओ!क्या करोगे शेयर करके…⁉————–>>>साईं की मृत्यु के बाद –**दशकों तक सांई का कहीं कोई नाम लेवा नहीं था। हो सकता है कि मात्र थोड़ी दूर तक के लोग जानते होंगे। पर अब कुछ तीस या चालीस वर्षों में उनकी उपस्थिति आम हो गई है और लोगों की आस्था का पारा अचानक से उबाल करने लगा है।अच्छा मैं एक बात पूछता हूँ… आप किसी भी साठ या सत्तर साल के व्यक्ति से पूछ लें कि वे साईं बाबा का नाम पहली बार अपने जीवन में कब सुना था?.. निश्चित ही वो कहेगा कि वो पहले नहीं सुना था… कोई नब्बे या कोई अस्सीे के दशक में हीं सुना हुआ कहेगा।इत्ती जल्दी ये इत्ता बड़ा भगवान कैसे बन गया ?एक बात और… हिन्दुओं के भगवान बनाने के पहले इनके चेले चपाटों ने इन्हें कुछ इस प्रकार से पेश किया था जैसे कि सभी धर्मों के यही एक मात्र नियंता हों। हिन्दू , मुस्लिम, सिक्ख ईसाई…सभी के इष्ट यही थे।और इन्हें पेश किया कौन?.. जराये भी समझिए…सत्तर – अस्सी के दशक में जो फिल्में बनती थी या गाने होते थे उसमें या तो हिन्दूओं के भगवान या फिर मुस्लिमों के अल्लाह का जिक्र होता था। भगवान वाला सीन मुस्लिमों को स्वीकार नहीं थाऔर अल्लाह वाला हिन्दूओं को। पर नायक को अलौकिक शक्ति देने के लिए इनका सीन डालना भी जरूरी ही था।..किया क्या जाय?… तो….यह किसी निर्देशक की सोच रही होगी कि.. किसी ऐसे व्यक्ति को अलौकिक शक्ति से लैस करके दिखाया जाय ताकि किसी भी धर्म के लोगो का विरोध ना झेलनी पड़े और वे अपनी फिल्म को सफल बना लें। ऐसा ही कुछ उनके दिमाग में आया होगा… और अचानक से उनके दिमाग की बत्ती जल गई होगी जब किसी ने साईं का नाम सुझाया होगा।Eurekkka….Eurekkka कहते हुए वे उछल पड़े होंगे। इस नये भगवान का सफल परीक्षण उस ऐतिहासिक दिन को किया गया जो साईं भक्तों के लिए एक पवित्र दिन से कम नहीं है।7 जनवरी 1977 को रूपहले पर्दे पर एक फिल्म आई “”अमर अकबर एंथोनी””इस फिल्म में एक गाना बजा “शिर्डी वाले साई बाबा आया हूँ तेरे दर पे सवाली”??बस क्या था.. संयोगवश फिल्म भी हिट… बाबा भी हिट….।साई बाबा के चेले चपाटों के पैर अब तो जमीन पर पड़ ही नहीं रहे थे साई की स्वीकार्यता को देखकर। उससे पहले तक ना कहीं तस्वीर, ना कहीं मुर्ति और नाही कोई चर्चा।और उसके बाद तो हर जगह साई ही साई। फोटोशॉप करके आग से भी निकाले गए साई, जो कई भक्तों के घरों की शोभा बढ़ा रहे हैं। धीरे धीरे, चुपके चुपके हिन्दुओं के मंदिरों में मुर्तियां बैठने लगी… इनके अपने मंदिर भी बनने लगे। एक और मजे की बात कि किसी अन्य धर्मों के लोगों ने इन्हें स्वीकार किया ही नहीं सिवाय हिन्दुओं के। अब देखिए, हमारा सनातनी हिन्दू समाज अब धीरे धीरे उस मोड़ पर जा रहा है जहाँ से दो धड़े साफ साफ दिखेंगे… एक विधर्मी साईं को मानने वाले हिन्दू और दूसरे अपने सनातनी मार्ग पर चलने वाले हिन्दू। इनमें अब दूरियां बढ़ती जाएंगी और आने वाले समय में इस समाज में दो फाड़ होगा। एक “सनातनी हिन्दू” और दूसरा “साईं पूजक हिन्दू”। सनातनी वाले साईं को मान्यता नहीं देंगे और साईं वाले साईं भक्ति नहीं छोड़ेंगे। बात और आगे जाएगी… ये दोनो एक दूसरे के मंदिरों में जाना बंद कर देंगे…. यदि नहीं तो फिर सनातनी उन्हें अपने मंदिरों में आने से रोकेंगे। कोई हार मानने को तैयार नहीं होगा। और यही वो समय होगा जब हिन्दू समाज दो खेमे में बँट जायेगा। बिल्कुल उसी तरह जैसे…मुस्लिम बंटकर शिया – सुन्नी हुए….ईसाई बंटकर कैथोलिक प्रोटेस्टेन्ट हुए…..जैन बंटे तो श्वेतांबर – दिगम्बर हुए…..बौद्ध बंटे तो हीनयान – महायान हुए। हो सकता है ये सुनकर आपको अचम्भा लगे पर हिन्दू धर्म में पड़ रही यही दरार ही विभाजन का कारण बनेगी। “मेरा यह मानना है कि साईं बाबा को एक षडयंत्र की तरह हमारे बीच रोपा गया है और मैं प्राण प्रण से इसका विरोध करता रहूँगा।”शिरडी में सांई की कब्र यानि मजार पर मन्दिर बना दिया।”ना मैं पूर्वाग्रही हूँ.. ना ही दुराग्रही हूँ….और ना ही किसी से चिढ़ है। एक सनातनी हिन्दू होने के नाते अपने धर्म को दूषित और विभाजित होते नहीं देख सकता हूँ।””इसके गुनाहगार वे लोग भी होंगे जो सिर्फ़ तमाशा देख रहे हैं और आवाज नहीं उठा रहे हैं।सनातन धर्म की जय…….!जय श्री राम 

जय श्री कृष्ण 

हर हर महादेव……..

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साई बाबा


Anju Chaudhary
१ : साई बाबा सारा जीवन मस्जिद मे रहे

एक भी रात उन्होने किसी हिंदू मंदिर मे नही गुज़ारी
२ : अल्लाह मालिक सदा उनके ज़ुबान पर था वो सदा अल्लाह मालिक पुकारते रहते
३ : रोहीला मुसलमान आठों प्रहार अपनी कर्कश आवाज़ मे क़ुरान शरीफ की कल्मे पढ़ता और अल्लाह ओ अकबर के नारे लगाता परेशान होकर जब गाँव वालो ने बाबा से उसकी शिकायत की तो बाबा ने गाँव वालों को भगा दिया .( अध्याय ३ पेज ५ )
४ : तरुण फ़क़ीर को उतरते देख म्हलसापति ने उन्हे सर्व प्रथम ” आओ साई ” कहकर पुकारा .(अध्याय५ पेज २ )
नोट : मौला साई मुस्लिम फ़क़ीर थे और फ़क़िरो को अरबी और उर्दू मे साई नाम से पुकारा जाता है .साई शब्द मूल रूप से हिन्दी नही है
५ : मौला साई हमेशा कफनी पहनते थे .(अध्याय ५ पेज ६ )
नोट : कफनी एक प्रकार का पहनावा है जो मुस्लिम फ़क़ीर पहनते हैं
६ : मौला साई सुन्नत(ख़तना) कराने के पक्ष मे थे . (अध्याय ७ पेज १ )
७ : फ़क़िरो के संग बाबा माँस और मछली का सेवन भी कर लेते थे .(अध्यया ७ पेज २)
८ : बाबा ने कहा “” मैं मस्जिद मे एक बकरा हलाल करने वाला हूँ हाज़ी सिधिक से पूछो की उसे क्या रुचिकर होगा बकरे का माँस ,नाध या अंडकोष ” (अध्याय ११ पेज ४ )
नोट : हिंदू संत कभी स्वपन मे भी बकरा हलाल नही कर सकता .न ही ऐसे वीभत्स भोजन खा सकता है
९ : एक बार मस्जिद मे एक बकरा बलि चढाने लाया गया तब साई बाबा ने काका साहेब से कहा “” मैं स्वयं ही बलि चढाने का कार्य करूँगा “(अध्याय २३ पेज ६)
नोट : हिंदू संत कभी ऐसा जघ्न्य कृत्य नही कर सकते .
१०: बाबा के पास जो भी दक्षिणा एकत्रित होती उसमे से रोज पचास रुपये वो पीर मोहम्म्द को देते. जब वो लौटते तो बाबा भी सौ कदम तक उनके साथ जाते .(अध्याय २३ पेज ५ )
नोट : मौला साई इतना सम्मान कभी किसी हिंदू संत को नही देते थे .रोज पचास रुपये वो उस समय देते थे जब बीस रुपया तोला सोना मिलता था .मौला साई के जीवन काल में उनके पास इतना दान आता था आयकर विभाग की जाँच भी हुई थी
११ : एक बार बाबा के भक्त मेघा ने उन्हे गंगा जल से स्नान कराने की सोचा तो बाबा ने कहा मुझे इस झंझट से दूर ही रहने दो .मैं तो एक फ़क़ीर हूँ मुझे गंगाजल से क्या प्रायोजन .(अध्याय २८ पेज ७ )
नोट : किसी हिंदू के लिए गंगा स्नान जीवन भर का सपना होता है .गंगा जल का दर्शन भी हिंदुओं मे अति पवित्र माना जाता है
१२ : कभी बाबा मीठे चावल बनाते और कभी माँस मिश्रित चावल (पुलाव )बनाते थे (अध्याय ३८ पेज २)
नोट : माँस मिश्रित चावल अर्थात मटन बिरयानी सिर्फ़ मुस्लिम फ़क़ीर ही खा सकता हैं कोई हिंदू संत उसे देखना भी पसंद नही करेगा .
१३ : एक एकादशी को बाबा ने दादा केलकर को कुछ रुपये देकर कुछ माँस खरीद कर लाने को कहा (अध्याय३८ पेज३ )
नोट : एकादशी हिंदुओं का सबसे पवित्र उपवास का दिन होता है कई घरो मे इस दिन चावल तक नही पकता .
१४ : जब भोजन तैयार हो जाता तो बाबा मस्जिद से बर्तन मंगाकर मौलवीसे फातिहा पढ़ने को कहते थे(अध्याय ३८ पेज ३)
नोट : फातिहा मुस्लिम धर्म का संस्कार है
१५ : एक बार बाबा ने दादा केलकर को माँस मिश्रित पुलाव चख कर देखने को कहा .केलकर ने मुँहदेखी कह दिया कि अच्छा है .तब बाबा ने केलकर की बाँह
पकड़ी और बलपूर्वक बर्तन मे डालकर बोले थोड़ा सा इसमे से निकालो अपना कट्टरपन छोड़कर चख कर देखो (अध्याय ३८ पेज४ )
नोट : मौला साई ने परीक्षा लेने के नाम पर जीव हत्या कर एक ब्राहमण का धर्म भ्रष्ट कर दिया किंतु कभी अपने किसी मुस्लिम भक्त की ऐसी कठोर परीक्षा नही ली।

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क्या है धूर्त साई बाबा का सच??


शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
9602109997शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
9602109997

क्या है धूर्त साई बाबा का सच??

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने साई बाबा को मुसलमान फकीर कहा है। विवादित पोस्टर से कई लोगों की भावनाएं आहत हुई तो कई सवाल भी खड़ी हुए हैं। साई बाबा के बारे में बहुत भ्रम फैला है। वे हिन्दू थे या मुसलमान? क्या वे कबीर, नामदेव, पांडुरंग आदि के अवतार थे??

आचार्य चतुरसेन का उपन्यास ‘सोमनाथ’ में उन्होंने लिखा है कि मुगल और अंग्रेजों के शासनकाल में ऐसा अकसर होता था कि जासूसी या हिन्दू क्षेत्र की रेकी करने के लिए सूफी संतों के वेश में फकीरों की टोली को भेजा जाता था।जो गांव या शहर के बाहर डेरा डाल देती थी। इनका काम था सीमा पर डेरा डाल कर वहां के लोगों और राजाओं की ताकत का अंदाजा लगाना और प्रजा में विद्रोह भड़काना।

किसने कहा सबसे पहले साई
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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‘साई शब्द फारसी का है जिसका अर्थ होता है “भिखारी”(संत)। उस काल में आमतौर पर भारत के पाकिस्तानी हिस्से में मुस्लिम संन्यासियों के लिए इस शब्द का प्रयोग होता था। शिर्डी में साई सबसे पहले जिस मंदिर के बाहर आकर रुके थे उसके पुजारी ने उन्हें साई कहकर ही संबोधित किया था। मंदिर के पुजारी को वे मुस्लिम फकीर ही नजर आए।तभी तो उन्होंने उन्हें साई कहकर पुकारा।
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
9602109997
साई ने यह कभी नहीं कहा कि ‘सबका मालिक एक’। साई सच्चरित्र के अध्याय 4, 5, 7 में इस बात का उल्लेख है कि वे जीवन भर सिर्फ अल्लाह मालिक है’यही बोलता रहा । कुछ लोगों ने उनको हिन्दू संत बनाने के लिए यह झूठ प्रचारित किया कि वे ‘सबका मालिक एक है’ भी बोलता था।यदि वे एकता की बात करते थे, तो कभी यह क्यों नहीं कहा कि ‘राम मालिक है’ या ‘भगवान मालिक है।’

कोई हिन्दू संत सिर पर कफन जैसा नहीं बांधता।ऐसा सिर्फ मुस्लिम फकीर व भिखारी ही बांधता है। जो पहनावा साई का था, वह एक मुस्लिम फकीर (भिखारी) का ही हो सकता है। हिन्दू धर्म में सिर पर सफेद कफन जैसा बांधना वर्जित है या तो जटा रखी जाती है या किसी भी प्रकार से सिर पर बाल नहीं होते।

साई बाबा मस्जिद में क्यों रहे
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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साई बाबा ने रहने के लिए मस्जिद का ही चयन क्यों किया? वहां और भी स्थान थे, लेकिन वे जिंदगीभर मस्जिद में ही रहे। मस्जिद के अलावा भी तो शिर्डी में कई और स्थान थे, जहां वे रह सकते थे। मस्जिद ही क्यों? भले ही मंदिर में न रहते, तो नीम के वृक्ष के नीचे एक कुटिया ही बना लेते। उनके भक्त तो इसमें उनकी मदद कर ही देते।

साईं सच्चरित्र के अनुसार, साईं बाबा पूजा-पाठ, ध्यान, प्राणायाम और योग के बारे में लोगों से कहते थे कि इसे करने की कोई जरूरत नहीं है। उनके इस प्रवचन से पता चलता है कि वह हिन्दू धर्म विरोधी था।धूर्त साई का मिशन था- लोगों में एकेश्वरवाद के प्रति विश्वास पैदा करना। उन्हें कर्मकांड, ज्योतिष आदि से दूर रखना।

मस्जिद से बर्तन मंगवाकर वे मौलवी से फातिहा पढ़ने के लिए कहते थे। इसके बाद ही भोजन की शुरुआत होती थी। उन्होंने कभी भी मस्जिद में गीता पाठ नहीं करवाया या भोजन कराने के पूर्व ‘श्रीगणेश करो’ ऐसा भी नहीं कहा। यदि वह हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करते था तो फिर दोनों ही धर्मों का सम्मान करना चाहिए था।

क्या अफगानिस्तान के था साई

साई को सभी यवन मानते थे। वह हिन्दुस्तान का नहीं, अफगानिस्तान का था ।इसीलिए लोग उन्हें यवन का मुसलमान कहते थे। उनकी कद-काठी और डील-डौल यवनी ही था। साई सच्चरित्र के अनुसार, एक बार साई ने इसका जिक्र भी किया था। जो भी लोग उनसे मिलने जाते थे उन्हें मुस्लिम फकीर ही मानते थे। लेकिन उनके सिर पर लगे चंदन को देखकर लोग भ्रमित हो जाते थे।
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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बाबा कोई धूनी नहीं रमाते थे जैसा कि नाथ पंथ के लोग करते हैं। ठंड से बचने के लिए बाबा एक स्थान पर लड़की इकट्ठी करके आग जलाते थे। उनके इस आग जलाने को लोगों ने धूनी रमाना समझा। चूंकि बाबा के पास जाने वाले लोग चाहते थे कि बाबा हमें कुछ न कुछ दे तो वे धूनी की राख को ही लोगों को प्रसाद के रूप में दे देते थे। यदि प्रसाद देना ही होता था तो वे अपने भक्तों को मांस मिला हुआ नमकीन चावल देते थे।

🖊 आजकल साई बाबा को पुस्तकों और लेखों के माध्यम से ब्राह्मण कुल में जन्म लेने की कहानी को प्रचारित किया जा रहा है। क्या कोई ब्राह्मण मस्जिद में रहना पसंद करेगा ???

क्यों डराया था गांव वालों को
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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साई के समय दो बार अकाल पड़ा। लेकिन साई उस वक्त अपने भक्तों के लिए कुछ नहीं कर पाया। एक बार प्लेग फैला तो उन्होंने गांव के सभी लोगों को गांव से बाहर जाने के लिए मना किया।क्योंकि कोई जाकर वापस आएगा तो वह भी इस गांव में प्लेग फैला देता।तब उसने लोगों में डर भर दिया कि जो भी मेरे द्वारा खींची गई लकीर के बाहर जाएगा, वह मर जाएगा। इस डर के कारण भोली-भाली जनता गांव से बाहर नहीं गई और लोगों ने इसे चमत्कार के रूप में प्रचारित किया कि साई ने गांव की प्लेग से रक्षा की। प्लेग उनके गांव में नहीं आ सका। साई के पास कई ऐसे लोग आते जाते थे, जो उन्हें बाहर की दुनिया का हालचाल बता देते थे।

साई का जन्म 1830 में हुआ।परन्तु इसने आजादी की लड़ाई में भारतीयों की मदद करना जरूरी नहीं समझा।क्योंकि वह भारतीय नहीं था।वह अंग्रेजों के जासूस था । *अफगानिस्तानी पंडारियों के समाज से थाऔर उन्हीं के साथ उनके पिता भारत आए थे। उनके पिता का नाम बहरुद्दीन था और उनका नाम चांद मियां।

साई के विरोधी साई चरित में उल्लेखित घटना का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि 1936 में हरि विनायक साठे (एक साई भक्त) ने अपने साक्षात्कार में नरसिम्हा स्वामी को बोला था कि बाबा किसी भी हिन्दू देवी-देवता या स्वयं की पूजा मस्जिद में नहीं करने देते थे, न ही मस्जिद में किसी देवता के चित्र वगैरह लगाने देते।

क्यों बोलता था अल्लाह मालिक
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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साई सच्चरित्र साईं भक्तों और शिर्डी साई संस्थान द्वारा बताई गई साई के बारे में सबसे उचित पुस्तक है। पुस्तक के पेज नंबर 17, 28, 29, 40, 58, 78, 120, 150, 174 और 183 पर साईं ने ‘अल्लाह मालिक’ बोला’ऐसा लिखा है। पूरी पुस्तक में साई ने एक बार भी किसी हिन्दू देवी-देवता का नाम नहीं बोला और न ही कहीं ‘सबका मालिक एक’ बोला। साई भक्त बताएं कि जो बात साई ने अपने मुंह से कभी कही ही नहीं, उसे साई के नाम पर क्यों प्रचारित किया जा रहा है?

साई को राम से जोड़ने की साजिश 12 अगस्त 1997 को गुलशन कुमार की हत्या के ठीक 6 महीने बाद 1998 में साईं नाम के एक नए भगवान का अवतरण हुआ। इसके कुछ समय बाद 28 मई 1999 में ‘बीवी नंबर 1’ फिल्म आई जिसमें साईं के साथ पहली बार राम को जोड़कर ‘ॐ साईं राम’ गाना बनाया था।

बाबा बाजार से खाद्य सामग्री में आटा, दाल, चावल, मिर्च, मसाला, मटन आदि सब मंगाते थे और इसके लिए वे किसी पर निर्भर नहीं रहे थे। भिक्षा मांगना तो उनका ढोंग था। बाबा के पास घोड़ा भी था। शिर्डी के अमीर हिन्दुओं ने उनके लिए सभी तरह की सुविधाएं जुटा दी थीं। उनके कहने पर ही कृष्णा माई गरीबों को भोजन करवाती थीं। मस्जिद में साफ-सफाई करती थीं और सभी तरह की देख-रेख का कार्य करती थीं।

मेघा से क्या कहा साईं ने

साई मेघा की ओर देखकर कहने लगे, ‘तुम तो एक उच्च कुलीन ब्राह्मण हो और मैं बस निम्न जाति का यवन (मुसलमान)।इसलिए तुम्हारी जाति भ्रष्ट हो जाएगी। इसलिए तुम यहां से बाहर निकलो। -साई सच्चरित्र।-(अध्याय 28)
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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एक एकादशी को उन्होंने पैसे देकर केलकर को मांस खरीदने लाने को कहा। -साईं सच्चरित्र (अध्याय 38)

बाबा ने एक ब्राह्मण को बलपूर्वक बिरयानी चखने को कहा। -साईं सच्चरित्र (अध्याय 38)

साई सच्चरित्र अनुसार साई बाबा गुस्से में आता था और गालियां भी बकता था।ज्यादा क्रोधित होने पर वह अपने भक्तों को पीट भी देता था । बाबा कभी पत्‍थर मारता और कभी गालियां देता। -पढ़ें 6, 10, 23 और 41 साईं सच्चरित्र अध्याय।

बाबा ने स्वयं कभी उपवास नहीं किया और न ही उन्होंने किसी को करने दिया। साई सच्चरित्र (अध्याय 32)

‘मुझे इस झंझट से दूर ही रहने दो। मैं तो एक फकीर हूं, मुझे गंगाजल से क्या प्रयोजन?- साई सच्चरित्र (अध्याय 28)
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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और क्या कह रहे हैं साई विरोधी

साई विरोधी कहते हैं कि साई अफगानिस्तान का एक पिंडारी लुटेरा था। इसके लिए वे एक कहानी बताते हैं कि औरंगजेब की मौत के बाद मुगल साम्राज्य खत्म-सा हो गया था। केवल दिल्ली उनके अधीन थी। मराठों के वीर सपूतों ने एक तरह से हिन्दू साम्राज्य की नींव रख ही दी थी।ऐसे समय में मराठाओं को बदनाम करके उनके इलाकों में लूटपाट करने का काम यह पिंडारी करते थे। जब अंग्रेज आए तो उन्होंने पिंडारियों को मार-मारकर खत्म करना शुरू किया। इस खात्मे के अभियान के चलते कई पिंडारी अंग्रेजों के जासूस बन गए थे।

क्या है झांसी की रानी का संबंध
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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साई के विरोधी कहते हैं कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की सेना में 500 पिंडारी अफगान पठान सैनिक थे। उनमें से कुछ सैनिकों को अंग्रेजों ने रिश्वत देकर मिला लिया था। उन्होंने ही झांसी की रानी के किले के राज अंग्रेजों को बताए थे। युद्ध के मैदान से रानी जिस रास्ते पर घोड़े के साथ निकल पड़ीं, उसका रास्ता इन्हीं पिंडारी पठानों ने अंग्रेजों को बताया। अंत में पीछा करने वाले अंग्रेजों के साथ 5 पिंडारी पठान भी थे। उसमें से एक शिर्डी के कथित धूर्त साई बाबा का पिता था ।जिसे बाद में झांसी छोड़कर महाराष्ट्र में छिपना पड़ा था। उसका नाम था *बहरुद्दीन। उसी पिंडारी पठान भगोड़े सैनिक का बेटा यह शिर्डी का साई है, जो वेश्या से पैदा हुआ और और जिसका नाम चांद मियां था।

क्या हुआ था 1857 में
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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1857 के दौरान हिन्दुस्तान में हिन्दू और मुसलमानों के बीच अंग्रेजों ने फूट डालने की नीति के तहत कार्य करना शुरू कर दिया था। इस क्रांति के असफल होने का कारण यही था कि कुछ हिन्दू और मुसलमान अंग्रेजों की चाल में आकर उनके लिए काम करते थे। बंगाल में भी हिन्दू-मुस्लिम संतों के बीच फूट डालने के कार्य को अंजाम दिया गया। इस दौर में कट्टर मुसलमान और पाकिस्तान का सपना देखने वाले मुसलमान अंग्रेजों के साथ थे।

क्या कह रह हैं साईं के पिता के बारे में

साईं का पिता जो एक पिंडारी ही था।उनका मुख्य काम था अफगानिस्तान से भारत के राज्यों में लूटपाट करना। एक बार लूटपाट करते-करते वे महाराष्ट्र के अहमदनगर पहुंचा।जहां वह एक वेश्या के घर में रुक गया। फिर वह उसी के पास रहने लगा । कुछ समय बाद उस वेश्या से उन्हें एक लड़का और एक लड़की पैदा हुए । लड़के का नाम उन्होंने चांद मियां रखा। लड़के को लेकर वह अफगानिस्तान चले गए। लड़की को वेश्या के पास ही छोड़ गया। अफगानिस्तान उस काल में इस्लामिक ट्रेनिंग सेंटर था। जहां लूटपाट, जिहाद और धर्मांतरण करने के तरीके सिखाए जाते थे।

कौन था चांद मियाँ

उस समय अंग्रेज पिंडारियों की जबरदस्त धरपकड़ कर रहे थे। इसलिए बहरुद्दीन भेस बदलकर लूटपाट करता और उसने अपने संदेशवाहक के लिए अपने बेटे चांद मियां ( साई ) को भी ट्रेंड कर दिया था। चांद मियाँ चादर फैलाकर भीख मांगता था। चांद मियाँ चादर पर यहां के हाल लिख देता था और उसे नीचे से सिलकर अफगानिस्तान भेज देता था। इससे जिहादियों को मराठाओं और अंग्रेजों की गतिविधि के बारे में पता चल जाता था।

किसे कहते थे यवनी

यह साई अफगानिस्तान का एक पिंडारी था।जिसे लोग यवनी कहकर पुकारते थे। यह पहले हिन्दुओं के गांव में फकीरों के भेष में रहकर चोरी-चकारी करने के लिए कुख्यात था। यह हरे रंग की चादर फैलाकर भीख मांगता था और उसे काबुल भेज देता था। किसी पीर की मजार पर चढ़ाने के लिए उसी चादर के भीतर वह मराठा फौज और हिन्दू धनवानों के बारे में सूचनाएं अन्य पिंडारियों को भेजता था।ताकि वे सेंधमारी कर सकें। इसकी चादर एक बार एक अंग्रेज ने पकड़ ली थी और उस पर लिखी गुप्त सुचनाओं को जान लिया था।

क्या चांद मियाँ उर्फ साई जेल से छूटा था

1857 की क्रांति का समय अंग्रेजों के लिए विकट समय था। ऐसे में चांद मियां अंग्रेजों के हत्थे चढ़ गया। अहमदनगर में पहली बार साई की फोटो ली गई थी। अपराधियों की पहले भी फोटो ली जाती थी। यही चांद मियां 8 साल बाद जेल से छुटकर कुछ दिन बाद एक बारात के माध्यम से शिर्डी पंहुचा और वहां के सुलेमानी लोगों से मिला। जिनका असली काम था गैर-मुसलमानों के बीच रहकर चुपचाप इस्लाम को बढ़ाना। इस मुलाकात के बाद साई पुन: बारातियों के साथ चले गए। कुछ दिन बाद चांद मियां शिर्डी पधारा और यही उसने अल-तकिया का ज्ञान लिया। मस्जिद को जान-बूझकर एक हिन्दू नाम दिया गया और उसके वहां ठहराने का पूरा प्रबंध सुलेमानी मुसलमानों ने किया।

किसने किया प्रचारित
शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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एक षड्यंत्र के तहत चांद मियां को चमत्कारिक फकीर के रूप में प्रचारित किया गया और गांव की भोली-भाली हिन्दू जनता उसके झांसे में आने लगी। चांद मियां कई तरह के जादू-टोने और जड़ी-बूटियों का जानकार था।इसलिए धीरे-धीरे गांव में लोग उसको मानने लगे। बाद में मंडलियों द्वारा उसके चमत्कारों का मुंबई में भी प्रचार-प्रसार किया गया।जिसके चलते धनवान लोग भी उसके संपर्क में आने लगे।

क्या पाठ पढ़ाया

चांद मियाँ उर्फ साई ने हिन्दू-मुस्लिम एकता की बातें करके मराठाओं को उनके ही असली दुश्मनों से एकता निभाने का पाठ पढ़ाया। यह मराठाओं की शक्ति को कमजोर करने का षड्यंत्र था। सिर्फ साई ही नहीं, ऐसे कई ढोंगी संत उस काल में यही कार्य पूरे महाराष्ट्र में कर रहे थे। मराठाओं की शक्ति से सभी भयभीत हो गए थे।तब उन्होंने ‘छल’ का उपयोग शुरू कर दिया था।
🖊 धन्य हो धूर्त साई उर्फ चाँद मियाँ के अंधे भक्तो।

शंकर सन्देश (समाचार पत्र)
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