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चिदंबरम


आज वो चिदंबरम जेल में है और उसे गिरफ्तार करते हुए हम सबने टीवी पर लाइव देखा.

चिदंबरम ने कुछ गलत किया है ये तो सब जानते हैं लेकिन… वो किस मामले में जेल में है… और, असल में उसने किया क्या है … ये बहुत ही कम लोगों को मालूम होगा.

असल में ये सारा खेल 2006 में शुरू हुआ था…. जब, पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी ने मिलकर INX MEDIA नामक एक कंपनी शुरू की जिसके लिए उन दोनों विदेशी निवेश की आवश्यकता थी.

अब नियम यह है कि…. अगर, आप को अपना बिजनेस चलाने के लिये विदेशी फंड की आवश्यकता है तो आप Direct route से पैसे ले सकते हैं.

लेकिन…. अगर आपको देश की सुरक्षा या सम्प्रभुता से जुड़े किसी बिजनेस जैसे कि…. रक्षा, बैंकिग या फिर मीडिया जैसे कार्यों के लिये विदेशी निवेश चाहिये तो उसके लिये आपको सरकार के FIPB (Foreign Investment Promotion Board) से मंजूरी लेनी पड़ती है.

सरकारी भाषा में इसे Approved Route कहते हैं.

तो, नियम के तहत…. पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी FIPB के पास गए और और दो चीजों की परमिशन माँगी….!

जिसमें से पहला…. विदेशी निवेश की.

और, दूसरा…. उस निवेश का 26% पैसा अपने ही किसी और बिजनेस ( INX News ) में लगाने की.

लेकिन…. FIPB ने मुखर्जी को सिर्फ 4.62 करोड़ रूपये की ही विदेशी निवेश की परमिशन दी तथा 26% पैसा INX news में लगाने की मंजूरी नहीं दी और उसके लिए मना कर दिया.

लेकिन…. मुखर्जीयों ने 4.62 करोड़ की मंजूरी को नजरअंदाज कर 305 करोड़ का विदेशी निवेश ले आये… जिससे, यह कानून का उल्लंघन हुआ … और, यह अवैध मनी लॉन्ड्रिंग का मामला बन गया.

इसके साथ ही मुखर्जीयों ने FIPB के मंजूरी के खिलाफ जाकर विदेशी निवेश का 26% पैसा INX news में लगा दिया.

लेकिन… आयकर विभाग को गड़बड़ की भनक लगी और इसकी जाँच शुरू हुई.

आयकर के जाँच में जब…. मुखर्जी फंसने लगे तो, उन्होंने सोचा किसी बड़े आदमी को अगर अपने बिजनेस से जोड़ लें तो हम बच सकते हैं.

और, इस काम के लिए उन्होंने पकड़ा तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम को और कार्ति चिदंबरम के बेटे की कंपनी Chess Management Services limited को अपनी कंपनी का Consultant बना दिया.

पी. चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम के INX Media से जुड़ते ही मुखर्जी के खिलाफ चल रही Revenue Department की सारी जाँच बंद हो गयी क्योंकि कार्ति की पिता पी चिदंबरम देश के वित्त मंत्री थे और देश के सारे REVENUE DEPARTMENT उनके ही अधीन थे.

सिर्फ इतना ही नहीं…. कार्ति चिदंबरम के जुड़ने के बाद …. अब FIPB ने भी INX Media को नया प्रपोजल भेजने कहा और उनकी विदेशी निवेश की लिमिट बढा दी.

यह सब कुछ इसलिये हो रहा था क्योंकि…. पी चिदंबरम भारत के वित्त मंत्री थे.

अब…. कार्ति की कंपनी CMSL को कंसल्टंट होने की वजह से 3.5 करोड़ दिये जाने थे… लेकिन, कार्ति चिदंबरम सयाना था और उसे लगा कि पैसा अगर डायरेक्ट अपनी कंपनी लिया तो आगे चलकर फँस सकता हूँ…. इसलिये, उसने एक बेनामी कंपनी Advanced Consulting Limited and Services के द्वारा पैसा लिया।

बस… यहीं से सारा घोटाला फंस गया.

2014 में सरकार बदली.

और… 2017 में ED ने कार्ति चिंदबरम, INX Media उसके Directors पर केस दर्ज किया.

और, उसकी CBI जाँच हुई तथा कार्ति एक महीना जेल में भी रहा.

जाँच चलती रही…. और, जांच में देश विदेश में इसके पास 54 करोड़ की आय से ज्यादा संपत्ति का भी पता लगा.

अब तक तो केवल कार्ति ही लपेटे में था…. लेकिन, पी चिदंबरम तब फँस गया जब इंद्राणी मुखर्जी ने सरकारी गवाह बन यह कह दिया कि मैंने पी चिंदबरम को रिश्वत दी थी.

चिदंबरम ने केस दर्ज होने से ही पहले Anticipatory bail ले लिया और हर बार बचता रहता तथा, जाँच में सहयोग नहीं किया.

लेकिन इस बार दिल्ली HC के जज ने बेल से मना कर दिया और अरेस्ट वारंट जारी हो गया और इस तरह अब पी चिदंबरम फिलहाल जेल में है.

वैसे मेरा निजी तौर पर मानना है कि…. राजदंड सबपर समान रूप से लागू होना बिल्कुल न्यायसंगत है क्योंकि हमारा संविधान ही कहता है कि…. राजा हो या रंक… कानून की नजर में सब बराबर है.

जय महाकाल…!!!

नोट : जानकार बताते हैं कि चिदंबरम साहब बहुत गुणवान है और उनकी उपलब्धियां बहुत बड़ी बड़ी है….
और, ये inx media केस तो बहुत ही छोटी है उन कारनामों के सामने.

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अजय वर्मा

तेलगु फिल्मों के महानायक हुआ करते थे स्व नन्दमूरी तारक रामाराव जिन्हें उनके प्रशंसक एन टी आर भी कहा करते थे। साठ के दशक में उनकी कृष्ण अर्जुन की कहानी पर फिल्म आई थी। आलम यह था कि टिकट पाने के लिए लोग घण्टों तक लाईन में लगा करते थे। वे दक्षिण भारत में भगवान की तरह पूजे जाते हैं। बहुचर्चित फिल्म बाहुबली के निर्देशक राजामौली इसी फिल्म का रिमेक बना रहे हैं। फिल्म के रिमेक में उनके पोते जूनियर एनटीआर भी काम कर रहे हैं। जूनियर एनटीआर को टीवी पर फिल्म देखने वाले कृष और जनता गैराज के हीरो के रूप में पहचानते हैं। जूनियर एनटीआर की शक्ल अपने दादा से मिलती है। प्रशंसको की मांग पर वह मात्र 16 साल की उम्र में ही फिल्में करने लगे। उनकी लगातार सात फिल्में सुपरहिट हुई थी। एनटीआर जूनियर लगभग हर फिल्म में अपने जंघे को थाप देते हैं। यह उनके दादा के स्टाइल की कापी है। फिल्म कृष के आखरी सीन में एनटीआर सीनियर भी दिखते हैं, जो कि उनकी पुरानी फिल्म की क्लिपिंग है।
अस्सी के दशक में किसी बात को लेकर वे देश की प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गांधी से मिलने के लिए दिल्ली पहुंचे थे। तीन दिनों तक समय मिलने का इंतजार करते रहे। किन्तु श्रीमती गांधी ने उन्हें मिलने का समय ही नहीं दिया। इससे वे खूब खफा हुए। इसे उन्होंने तेलगु विडा मतलब तेलगु जनता का अपमान निरूपित किया। वापस आंध्र लौटे और तेलगु अस्मिता के नाम पर उन्होंने तेलगु देशम पार्टी बनाई। कुछ समय बाद हुए विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी प्रचंड बहुमत से जीती और वे राज्य के मुख्यमंत्री बने। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व वीपी सिंह जब जनमोर्चा पार्टी बनाकर कांग्रेस की खिलाफत कर रहे थे, तब स्व एनटीआर ने कांग्रेस विरोधी सभी पार्टियों को एकजुट कर राष्ट्रीय मोर्चा का गठन किया। राष्ट्रीय मोर्चा के वे संयोजक बनाए गए थे।
उनकी उम्र ढल रही थी और वे बीमार भी रहने लगे थे। इसी दौरान उनके दामाद चन्द्र बाबू नायडू ने उनकी पार्टी का हाईजैक कर लिया था। चंद्रबाबू नायडू आंध्र के मुख्यमंत्री भी बने। अटल सरकार के समय उन्होंने बाहर से समर्थन किया। तब उन्ही की पार्टी के स्व जीएमसी बालयोगी लोकसभा के अध्यक्ष बनाए गए थे। नरेंद्र मोदी की जब साल 2014 में सरकार आई तब भी शुरुआती दौर में सरकार का वे बाहर से समर्थन कर रहे थे। बाद में सरकार का विरोध करने लगे। अभी हुए लोकसभा चुनाव के समय भाजपा विरोधी हर पार्टी प्रमुख से मिलकर उन्होंने ना जाने क्या चर्चा की। आंध्र में लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव भी हुए। जिसमें उनकी पार्टी बुरी तरह से हार गई। इस तरह से वे ना तो घर के रहे ना तो घाट के। तेलगु अस्मिता के नाम पर उनके ससुर एनटीआर की पार्टी तेलगु देशम की साख भी वे ले डूबे।

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🙏भाजपा की मजबूरी >>><<<

🚩 समस्त कट्टर हिंदू “भाइयों से निवेदन है “की पूरा पोस्ट जरूर पढ़ें!
तथा इस पोस्ट को “अधिक से अधिक शेयर कर” भाजपा की मजबूरी को बताएं !

😣कुछ लोग यह “अफवाह फैलाते हैं “कि भाजपा की केंद्र में पूर्ण बहुमत की” मोदी सरकार है !

तथा उत्तर प्रदेश में भी पूर्ण बहुमत की” योगी सरकार है !

तब भी भाजपा “क्यों राम मंदिर का निर्माण तथा कश्मीर में धारा 370 हटाने का निर्णय” क्यों नहीं लेती है!

भाजपा सिर्फ” हिंदुत्व के नाम पर
हिंदू का वोट लेकर” हिंदू के लिए कोई काम नहीं करती !

👕 ऐसे लोगो के प्रश्न का उत्तर “मैं देता हूं !

😎कृपया ध्यान से पढ़ें “और समझे फिर विचार करें !

राज्यसभा में “”भाजपा के पास” बहुमत नहीं है !!!

🇮🇳भारत में किसी भी “बिल को कानून बनाने के लिए” संसद के दोनों सदनों में “बिल को पास कराना पड़ता है!
तभी वह बिल कानून बनता है !

🇮🇳 भारत में दो सदन हैं !
(1) लोकसभा (2) राज्यसभा

वर्तमान में “भाजपा के पास लोकसभा में बहुमत है !

🎇लेकिन “राज्यसभा में बहुमत नहीं है !

नोट >><< ( विधानसभा अलग होता है)

🌷लोकसभा का आशय >>><< लोकसभा में बहुमत ” सरकार बनाने के लिए होता है !
अर्थात- सरकार चलाने के लिए होता है !

💥राज्यसभा का आशय >>><<< राज्यसभा में बहुमत बिल को” पास कराकर “कानून बनाने के लिए होता है!
अर्थात- राज्यसभा में बहुमत संविधान” संशोधन के लिए होता है !

🏛 अगर भाजपा ” राम मंदिर निर्माण का बिल “लोकसभा में लाती है !

तो भाजपा “लोकसभा में अपने दम पर बिल को” लोकसभा मे पास करा ले जाएगी !

क्योंकि भाजपा के पास लोकसभा में बहुमत है !

अर्थात “भाजपा के अपने पास लोकसभा की 272 सीटें हैं !
जो पूर्ण बहुमत है !

लोकसभा में” बिल पास होने के बाद “राम मंदिर निर्माण का बिल राज्यसभा में जाएगा !

👎राज्यसभा में भाजपा के पास बहुमत नहीं है !

तथा कोई भी “राजनीतिक पार्टी राम मंदिर निर्माण के “इस बिल का समर्थन नहीं करेंगे !
👎जिससे बिल गिर जाएगा !

अर्थात राम मंदिर निर्माण का बिल” पास नहीं हो पाएगा !
जिससे राम मंदिर वाला” बिल कानून नहीं बनेगा !

😪सपा “बसपा” कांग्रेस तथा अन्य दल जो सेकुलर के नाम पर” इस बिल के विरोध में ही वोट करेंगी!

👉जैसे कि >><< तीन तलाक का मामला ही ले लीजिए!

✂भाजपा तीन तलाक के बिल को लोकसभा में “अपने दम पर पास करा ली!

लेकिन राज्यसभा में “भाजपा की बहुमत ना होने के कारण राज्यसभा में “तीन तलाक का बिल गिर गया !

जिससे तीन तलाक का बिल कानून नहीं बन सका !

🚩भाजपा को राज्य सभा में” 2019 के अंत तक “बहुमत होने की पूरी आशा है !

क्योंकि भारत के अधिकांश राज्यों में “भाजपा की सरकार बनी है !

जिस -जिस राज्य में “भाजपा की सरकार बनी है !
वहां पर “राज्यसभा की सीट खाली होने में अभी “2019 तक का समय लगेगा !

उसके बाद” उस राज्य की राज्य सभा सीट “पर
(राज्य सभा) सांसद” भाजपा का होगा !

🎠लेकिन उससे पहले” लोकसभा चुनाव में “भाजपा को अपने दम पर 272 सीटे ले कर पूर्ण बहुमत से जीतने के बाद ही” राज्यसभा में बहुमत का लाभ” भाजपा को मिल सकेगा !

👑राज्यसभा का चुनाव कैसे होता है आइए जाने >>><<<

भारत में 2 सदन होता है !

(1) लोकसभा (2) राज्यसभा

☝लोकसभा >><< लोकसभा का चुनाव” जनता सीधे अपने मत से करती है !

तथा जिस पार्टी के अधिक से अधिक सांसद जीतते हैं !
और बहुमत जिस पार्टी की होती है !
उसकी सरकार बनती हैं

जैसे >> वर्तमान में मोदी सरकार

✌राज्यसभा >>><< राज्यसभा का चुनाव जनता द्वारा “सीधे ना करके “जनता द्वारा चुने गए विधायक द्वारा होता है !

जिस भी पार्टी की” भारत के अधिक से अधिक राज्यों में सरकार होगी ”
उस पार्टी की राज्यसभा की सीट अधिक से अधिक होगी !

राज्यसभा संसद का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है !

🌹अतः सभी राज्य सभा की सीट” एक साथ रिक्त (खाली) नहीं होती हैं !

( राज्यसभा को उच्च सदन भी कहते हैं)

जैसे >><< उत्तर प्रदेश में राज्यसभा सांसद “की कुल 31 सीटें हैं !

लेकिन वर्तमान में” सिर्फ 10 ही सीट खाली हो रही हैं !

एक बार “जो भी पार्टी की”राज्यसभा की सीटें चुनने लायक विधायक है” तो राज्यसभा सांसद चुनने के बाद”
उस पार्टी की सरकार भी गिर जाए या सरकार की कार्यकाल की अवधि भी पूरा हो जाए !

लेकिन उस पार्टी के” विधायक द्वारा चुने गए” राज्यसभा सांसद” अपने 6 साल के “कार्यकाल को पूरा करने के बाद ही “वह राज्य सभा सीट खाली होगी !

जब वह सीट रिक्त होंगी !
और उस समय” जिसकी पार्टी की” सरकार होगी या जिसके विधायक अधिक होंगे !

वह पार्टी “उस सीट पर “अपना राज्य सभा “सांसद चुनकर भेजेगीं !

वर्तमान में( भाजपा 323”
सपा 57 “बसपा 19 “कांग्रेस 7 “आरएलडी के एक विधायक हैं)

🤝 वर्तमान में उत्तर प्रदेश की 31 में से 10 सीटें खाली हो रही हैं !

भाजपा व भाजपा के सहयोगी पार्टी के पास” उत्तर प्रदेश में “अपना कुल मिलाकर 323 विधायक हैं !

इस हिसाब से भाजपा “8 राज्य सभा सांसद “अपने विधायको के बल पर जीत लेगी !

8 राज्य सभा सांसद चुनने के पश्चात” भाजपा व उसके सहयोगी पार्टी के पास 28 अतिरिक्त विधायक बचेंगे !

यानी नौवें राज्य सभा सांसद चुनने के लिए”” भाजपा को 9 अतिरिक्त ( एक्स्ट्रा) विधायक की जरूरत होगी !

🚲सपा के पास” वर्तमान में 47 विधायक हैं !

अर्थात सपा 47 विधायक के दम पर “एक राज्यसभा सांसद आसानी से चुन सकती है !

राज्य सभा सांसद चुनने के पश्चात “”सपा के पास 10 अतिरिक्त विधायक बचेंगे!

🐘बसपा के पास” इस समय 19 विधायक हैं !

इस हिसाब से” मायावती अपने विधायक के बल पर “एक भी राज्य सभा सांसद नहीं चुन सकती हैं !

इसलिए मायावती ने “सपा “बसपा “कांग्रेस “आरएलडी से समर्थन मांगी है

अगर सपा के 10 विधायक
(जो अतिरिक्त बचे हैं )

सपा के 10 “बसपा के 19
कांग्रेस के 7 तथा आरएलडी के एक विधायक मिलकर 37 का आंकड़ा पार कर लेंगे !

जिससे मायावती की पार्टी “को भी एक राज्य सभा सांसद मिल जाएग!

भाजपा अतिरिक्त “8 विधायकों की “व्यवस्था नहीं कर पा रही है

लेकिन बसपा 18 विधायक का समर्थन पा रही है !

⛲इसी प्रकार “भारत के सभी राज्यों में “राज्यसभा का चुनाव होता है !

🇮🇳भारत में जो भी पार्टी ” हिंदुत्व की बात करेगा !
वह पार्टी “संप्रदायिक हो जाती है !
जैसे >><< भाजपा

🍏जो भी पार्टी “मुस्लिम तुष्टिकरण करेंगी !
वह सेकूलर हो जाती हैं!

जैसे <<>> सपा “बसपा” कांग्रेस

सभी पार्टी “भाजपा को संप्रदायिक कह कर “भाजपा पार्टी” साथ कोई नहीं देंगी!

🌹 राज्यसभा में कुल 225 सीटें हैं !
वर्तमान में भाजपा के पास 75 सीटें हैं !
जो बहुमत से कम हैं ”

बहुमत के लिए “”राज्य सभा में 112 राज्य सभा सांसद होना चाहिए !

🐵राज्य सभा कभी “भंग नहीं होता है !

6 महीने या साल भर” के अंदर किसी ना किसी “राज्य मे राज्य सभा सांसद “”की सीट
रिक्त (खाली )होती रहती हैं!

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यह मुस्लिम तुष्टिकरण कब तक होगा?
डॉ विवेक आर्य
दिल्ली से एक समाचार मिला। कुछ महीनों पहले रघुबीर नगर में मारे गए अंकित सक्सेना के पिता रमजान के महीने में मुसलमानों को इफ्तार पार्टी देंगे। ध्यान दीजिये कि अंकित की हत्या शांतिप्रिय कौम के सदस्यों ने इसलिए कर दी थी क्यूंकि अंकित का किसी मुसलमान लड़की से प्रेम प्रसंग था। यह बात शांतिप्रिय कौम के सदस्यों को किसी भी प्रकार से सहनीय नहीं थी। टाइम्स ऑफ़ इंडिया, दिल्ली संस्करण दिनांक 31/5/18 में आज एक कार्टून इस विषय में छापा है। इस कार्टून में दर्शाया गया है कि अंकित के पिता गिरते हुए महात्मा गाँधी को संभाल रहे हैं। और महात्मा गाँधी उनका सत्य, अहिंसा और शत्रु को क्षमा करने के सिद्धांत का पालन करने के लिए धन्यवाद कर रहे हैं। सेक्युलर लॉबी की बाछें इस कार्टून को देखकर खिल गई है। मगर इतिहास हमें कुछ ओर ही बताता है। महात्मा गाँधी ने सदा मुसलमानों के तुष्टिकरण के लिए हिन्दुओं के हितों की अनदेखी की। इसका परिणाम भारत-पाक विभाजन के रूप में निकला। हिन्दुओं को सदा अत्याचार सहना पड़ा। आज भी यही हो रहा है। आईये इतिहास से हमें क्या सिखाता है। उसे जाने।

1920 के आरम्भ की बात है। महात्मा गाँधी ने देश के आज़ादी की लड़ाई को मुसलमानों को रिझाने के लिए खिलाफत आंदोलन जो मुसलमानों का निजी मामला था से नत्थी कर दिया था। स्वामी श्रद्धानन्द भी उसी काल में राष्ट्रीय राजनीती में उभरे थे। महात्मा गाँधी ने हिन्दुओं को खिलाफत से जुड़ने का आवाहन किया। हिन्दुओं ने कहा की गौहत्या पर प्रतिबन्ध के मुद्दे पर वे कांग्रेस को सहयोग देने को तैयार है तब महात्मा गाँधी ने यंग इंडिया के 10 दिसंबर, 1919 के अंक में लिखा-

“मेरे विचार है कि हिन्दुओं को गौरक्षा के मुद्दे को यहाँ पर नहीं रखना चाहिए। मित्रता की परीक्षा आपदाकाल में ही होती है, वो भी बिना किसी शर्त के। जो सहयोग शर्त पर आधारित हो वह सहयोग नहीं। अपितु व्यापारिक समझौता है। सशर्त सहयोग उस मिलावटी सीमेंट के समान है, जो कभी नहीं जोड़ती। यह हिन्दुओं का कर्त्तव्य है कि अगर वे मुसलमानों के मुद्दे में इन्साफ देखते है तो उन्हें सहयोग अवश्य देना चाहिए। और अगर मुसलमान भी हिन्दुओं की भावना का सम्मान करते हुए गौवध न करे तो उन्हें भी ऐसा करना चाहिए। चाहे हिन्दू उन्हें सहयोग दे न दे। इसलिए मैं हिन्दुओं से प्रार्थना करूँगा कि उन्हें गौ वध पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग नहीं करनी चाहिए। अपितु बिना किसी शर्त के सहयोग करना चाहिए जो कि गौरक्षा के समान हैं।”

1921 में गाँधी ने अंग्रेजी कपड़ों के बहिष्कार का ऐलान किया। उन्होंने विदेशी कपड़ों की होली जलाने का निर्णय लिया। स्वामी श्रद्धानन्द को जब यह पता चला तो उन्होंने महात्मा गाँधी को तार भेजा। उसमें उन्होंने गाँधी जी से कहा कि आप विदेशी कपड़ों को जलाकर अंग्रेजों के प्रति शत्रुभाव को बढ़ावा न दे। आप उन कपड़ों को जलाने के स्थान पर निर्धन और नग्न गरीबों में बाँट दे। स्वामी जी की सलाह को दरकार कर सी.आर.दास और नेहरू ने विदेशी कपड़ों की होली जलाई। जबकि खिलाफत आंदोलन से जुड़े मुसलमानों ने गाँधी जी से कपड़ों को तुर्की की पीड़ित जनता को भेजने की अनुमति प्राप्त कर ली। स्वामी जी के लिए यह एक सदमे जैसा था। हिन्दुओं के मुद्दों पर स्वामी जी पहाड़ के समान अडिग और सिद्धांतवादी बन जाते थे। जबकि मुसलमानों के लिए उनके हृदय में सदा कोमल स्थान उपलब्ध रहता था।स्वामी जी लिखते है कि मैं कभी अपने जीवन में यह समझ नहीं पाया कि अपने देश के लाखों गरीबों को अपनी नग्नता छुपाने देने के स्थान पर कपड़ों को सुदूर दूसरे देश तुर्की भेजने में कौनसी नैतिकता है।

1920-1921 के दौर में स्वामी जी ने खिलाफत की आड़ में मुसलमानों को दिए जा रहे प्रलोभनों से यह आशंका पहले ही भांप ली थी कि या प्रयास मुसलमानों को स्वराज से अधिक कट्टरपंथ की ओर ले जायेगा। नागपुर कांग्रेस अधिवेशन के समय कांग्रेस के मंच से क़ुरान की वो आयतें पढ़ी गई जिनका लक्ष्य गैर मुसलमानों अर्थात काफिरों को जिहाद में मारना था। स्वामी जी ने इन आयतों की ओर गाँधी जी का ध्यान दिलाया। गाँधी जी ने कहा कि ये इन आयतों का ईशारा अंग्रेजी राज के लिए है। स्वामी जी ने उत्तर दिया कि ये आयतें अहिंसा के सिद्धांत के प्रतिकूल है। और जब विरोध के स्वर उठेंगे तो मुसलमान इनका प्रयोग हिन्दुओं के लिए करने से पीछे नहीं हटेंगे। इसी बीच में मुहम्मद अली का तार सार्वजानिक हो गया। जिसमें उनसे काबुल के सुल्तान को अंग्रेजों से सुलह न करने का परामर्श दिया था। स्वामी जी को मुहम्मद अली का यह व्यवहार बहुत अखरा।

अंत में वही हुआ जिसका स्वामी जी को अंदेशा था। 1921 में केरल में मोपला के दंगे हुए। निरपराध हिन्दुओं को बड़ी संख्या में मुसलमानों ने मारा, उनकी संपत्ति लूटी,उनका सामूहिक धर्म परिवर्तन किया। आर्यसमाज ने सुदूर लाहौर से महात्मा आनंद स्वामी जी, पंडित ऋषिराम आदि के नेतृत्व में सुदूर केरल में राहत कार्य हेतु स्वयंसेवक भेजे। वहां से वापिस लौटकर महात्मा आनंद स्वामी जी ने “आर्यसमाज और मालाबार” के नाम से पुस्तक छापी जिससे दुनिया को प्रथम बार मालाबार में हुए अत्याचार का आँखों देखा हाल पता चला। इस नरपिशाच तांडव के होने के बाद भी महात्मा गाँधी जी का मौन स्वामी जी बेहद अखरा। महात्मा गाँधी हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए हिन्दुओं की सामूहिक हत्या पर प्रतिवाद तक करने से बचते रहे। न ही उन्होंने मुसलिम नेताओं को मोपला दंगों की सार्वजानिक निंदा करने के लिए कहा। आखिर में दबाव बढ़ने पर गाँधी ने बोला तो भी वह मुसलमानों के हिमायती ही बने रहे।

गाँधी जी सबसे पहले तो मोपला मुसलमानों को बहादुर ईश्वर ‘भक्त’ मोपला लिखते हुए इस युद्ध के लिए जिसे वो धार्मिक युद्ध समझते है के लिए बधाई देते हैं। फिर हिन्दुओं को सुझाव देते है कि हिन्दुओं में साहस और विश्वास होना चाहिए कि वे ऐसे कट्टर विद्रोह में अपनी धर्मरक्षा कर सके। मोपला मुसलमानों ने जो किया उसे हिन्दू मुस्लिम सहयोग की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। मुसलमानों के लिए ऐसा करना निंदनीय है, जो उन्होंने मोपला में जबरन धर्मान्तरण और लूट खसोट के रूप में किया। उन्हें अपना कार्य चुपचाप और प्रभावशाली रूप में करना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसा न हो।चाहे उनमें कोई कितना भी कट्टर क्यों न हो। मेरा मानना है कि हिन्दुओं को मोपला के पागलपन को समभाव के रूप में लेना चाहिए। और जो सभ्य मुसलमान है उन्हें मोपला मुसलमानों को नबी की शिक्षाओं को गलत अर्थ में लेने के लिए क्षमा मांगनी चाहिए।

कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने भी मोपला दंगों पर आधिकारिक बयान दिया। उस बयान में कहा गया कि मोपला देंगे खेदजनक है। अभी भी देश में ऐसे लोग है जो कांग्रेस और खिलाफत कमेटी ने सन्देश को समझ नहीं पा रहे है। हम सभी कांग्रेस के सदस्यों से यही कहेंगे कि चाहे उन्हें भारत के किसी भी कौने में कितनी भी चुनौती मिले, वे अहिंसा का मार्ग नहीं छोड़ेगे। हमें कुछ जबरन धर्मपरिवर्तन की सुचना मिली है। ये धर्मपरिवर्तन उन मुसलमानों द्वारा किये गए है जो खिलाफत और असहयोग आंदोलन के भी विरुद्ध थे।

इस प्रकार से गाँधी जी और कांग्रेस ने हिन्दू मुस्लिम एकता के नाम पर मुसलमानों के इस कुकृत्य का जोरदार प्रतिवाद करने के स्थान पर कूटनीतिक भाषा का प्रयोग कर अपना मंतव्य प्रकट किया।

स्वामी श्रद्धांनद लिबरेटर के अंक में मोपला के दंगों के विषय में लिखते है-

“मुझे सबसे पहला आभास तब हुआ जब कांग्रेस की सब्जेक्ट कमेटी में मोपला द्वारा हिन्दुओं पर अत्याचार के लिए निंदा प्रस्ताव रखा गया था। तब उस प्रस्ताव को बदल कर मोपला मुसलमानों के स्थान पर कुछ व्यक्तिगत लोगों द्वारा किया गया कृत्या करार दिया गया। प्रस्ताव में परिवर्तन का आग्रह करने वाले कुछ हिन्दू भी थे। परन्तु कुछ मुस्लिम सदस्यों को भी नामंजूर था। मौलाना फ़क़ीर और अन्य मौलाना ने स्वाभाविक रूप से इस प्रस्ताव का विरोध किया। परन्तु मेरे आश्चर्य की सीमा तब न रही जब मैंने राष्ट्रवादी कहे जाने वाले मौलाना हसरत मोहानी को इस प्रस्ताव का विरोध करते सुना। उनका कहना था कि मोपला अब दारुल-अमन नहीं बल्कि दारुल-हर्ब है। वहां के हिन्दुओं ने मोपला के शत्रु अंग्रेजों के साथ सहभागिता की हैं। इसलिए मोपला मुसलमानों का हिन्दुओं को क़ुरान या तलवार देने का प्रस्ताव उचित हैं। और अगर अपने प्राण बचाने के लिए हिन्दुओं ने इस्लाम स्वीकार कर लिया तो यह स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन कहलायेगा नाकि जबरन धर्म परिवर्तन। अंत में नाममात्र का निंदा प्रस्ताव भी सहमति से स्वीकार नहीं हो पाया। अंत में वोटिंग द्वारा प्रस्ताव स्वीकार हुआ जिसमें बहुमत प्रस्ताव के पक्ष में था। यह प्रकरण एक बात और सिद्ध करता था कि मुसलमानों कांग्रेस को अधिक बर्दाश करने वाले नहीं हैं। अगर उनके अनुसार कांग्रेस नहीं चली तो वह इस दिखावटी एकता का त्याग करने से पीछे नहीं हटेंगे।”

स्वामी जी का कांग्रेस से मोहभंग होता गया। अंत में 1922 में उन्होंने गाँधी जी और कांग्रेस से दूरी बना ली। स्वामी जी अब खुलकर हिन्दू हितों की बात करने लगे।

कांग्रेस से असंतुष्ट होकर स्वामी जी पंडित मदन मोहन मालवीय और सेठ घनश्याम बिरला के प्रस्ताव पर हिन्दू महासभा से जुड़े। उनका कर्नल यु. सी. मुखर्जी से मिलना हुआ जिन्होंने 1921 की जनसँख्या जनगणना के आधार पर स्वामी जी को बताया कि अगर हिन्दुओं की जनसंख्या इसी प्रकार से घटती गई तो लगभग 420 वर्षों में हिन्दू इस धरा से सदा के लिए विलुप्त हो जायेगा।

स्वामी जी ने जब देखा कि अछूतों को सार्वजानिक कुँए से पानी भरने का अधिकार नहीं मिल रहा है तो उन्होंने 13, फरवरी 1924 को अछूतों के साथ मिलकर दिल्ली में जुलुस निकाला। वे अनेक कुओं पर गए और सार्वजानिक रूप से पानी पिया। एक कुँए मुसलमानों से विवाद हुआ जिन्होंने उन्हें पानी भरने से रोका। इस विवाद में पत्थरबाजी हुई जिसमें स्वामी जी के साथ आये अछूतों और आर्यों को चोटें आई। बाद में पुलिस ने आकर दखल दिया।

नौ मुसलमानों की शुद्धि के लिए स्वामी जी ने 13 फरवरी, 1923 को आगरा में भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा की स्थापना की। स्वामीजी इस सभा के प्रधान और लाला हंसराज इसके उपप्रधान चुने गए।

स्वामी जी ने लीडर समाचार पत्र में शुद्धि के लिए अपील निकाली जो इस प्रकार थी।

“हमारा महान आर्याव्रत देश वर्तमान में पतन की ओर विमुख है। न केवल इसके सदस्यों की संख्या कम हो रही है। अपितु यह पूरी तरह से अव्यवस्थित भी है। इस देश के निवासीयों के समान पूरी दुनिया में कोई अन्य नहीं हैं। उनके समान प्रतिभा, उनके क्षमता, उनके नैतिकता दुनिया ें किसी अन्य नस्ल में नहीं मिलती। इतना होते हुए भी यह नस्लविभाजित और स्वार्थी होने के कारण असहाय है। लाखों मुसलमान बन गए और हजारों ईसाई बन गए। पिछली दो शताब्दियों से जो ब्राह्मण, वैश्य, राजपूत और जाट नवमुस्लिम बनने के बाद भी हिन्दू समाज की और आशाभरी नज़रों से देखते है कि एक दिन उन्हें वापिस अपने भ्रातित्व में शामिल कर लिया जायेगा।

अगले दो महीनों तक स्वामी जी गांव गांव घूमकर वर्ष के अंत तक 30000 शुद्धियाँ कर लेते है। स्वामी जी स्वाभाविक रूप से मुसलमानों के विरोधी बन गए। जमायत-अल-उलेमा ने 18 मार्च, 1923 को स्वामी जी के विरोध में मुंबई में सभी का आयोजन किया। अनेक शहरों में विज्ञापन के माध्यम यह अफ़वाह उड़ाई गई कि कुछ मुसलमान हिन्दू साधुओं के वेश में मल्कानों को डराने और स्वामी जी की निंदा के लिए घूम रहे हैं। कुछ आर्यों को अपने नेता की सुरक्षा की चिंता हुई। उन्होंने स्वामी जी को अंगरक्षक रखने की सलाह दी। पर उन्होंने परमपिता मेरा रक्षक है। कहकर मना कर दिया। मुरादाबाद में स्वामी जी को भाषण देने से मना कर दिया गया। अनेक स्थानों पर मुसलमानों ने विरोध में सभाएं भी आयोजित की।

राष्टीय स्तर पर अनेक नेताओं ने स्वामी जी का विरोध करना आरम्भ कर दिया। 8 अप्रैल, 1923 को मोतीलाल नेहरू ने लीडर समाचार पत्र में लिखा कि मुझे प्रसन्नता होती अगर यह आंदोलन इस समय न आरम्भ किया जाता जब पंजाब में हिन्दू और मुसलमानों के मध्य विवाद अपने चरम पर हैं। मौलाना अब्दुल कलाम ने लिखा की शुद्धि के बहाने व्यक्तियों का शोषण किया जा रहा हैं। स्वामी जी ने 5 और 6 मई ,1923 के लीडर में इसका प्रतिवाद लिखा। जवाहरलाल नेहरू ने 13 मई, 1923 ले लीडर में अच्छा होता इस समय यह मुद्दा न उछाला जाता। मेरे विचार से सभी बाहरी व्यक्तियों को मलकाना को तुरंत छोड़ देना चाहिए और उन्हें अपने आप शांति पूर्वक अपना काम करने देना चाहिए।

उस काल की CID रिपोर्ट में शुद्धि को लेकर अनेक समाचार दर्ज है। जहां आर्यसमाज और हिन्दू सभा शुद्धि पक्षधर थे। वही कांग्रेस के बड़े नेताओं जहाँ शुद्धि की निंदा कर रहे थे। तो मुसलमानों के प्रतिनिधि बड़े बड़े बयान देकर उकसाने से पीछे नहीं हट रहे थे। स्वामी जी शुद्धि अभियान को दरभंगा के महाराज और बनारस के भारत धर्म महामण्डल के पंडितों का साथ मिला। निःसन्देश स्वामी दयानन्द द्वारा आरम्भ किये गए शुद्धि आंदोलन को स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा गति देकर लाखों बिछुड़ें हुए को वापिस हिन्दू धर्म में शामिल किया गया।

देश में 1923 में हिन्दू और मुसलमानों के मध्य अनेक दंगे हुए। मुलतान, अमृतसर, कोलकाता, सहारनपुर जल उठे। कांग्रेस द्वारा 1923 में एक सम्मेलन कर तत्कालीन परिस्थितियों पर विचार किया गया। मौलाना अहमद सौद ने स्वामी जी पर हिन्दू मुस्लिम एकता को भंग करने का आरोप लगाया। उसने यहाँ तक कह दिया कि स्वामी जी को इस कार्य के लिए अंग्रेजों से पैसा मिलता है। स्वामी जी ने शुद्धि और संगठन के समर्थन में अपना वक्तव्य पेश किया जो दो घंटे चला। उनका कहना था कि हिन्दू मुस्लिम एकता भारत की स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है। मगर इस एकता का शुद्धि या संगठन से कुछ भी लेना देना नहीं है। अपने अपने प्रचारकों को आगरा से हटाने पर कोई सहमति नहीं बन पाई। (सन्दर्भ- हिन्दू मुस्लिम इत्तिहाद की कहानी, दिल्ली ,1924)

यह विवाद चल ही रहा था कि स्वामी जी के प्रकाश में ख्वाजा हसन निज़ामी का लिखा एक उर्दू दस्तावेज “दाइये इस्लाम” के नाम से आया। इस पुस्तक को इतने गुप्त तरीके से छापा गया था की इसका प्रथम संस्करण का प्रकाशित हुआ और कब समाप्त हुआ इसका मालूम ही नहीं चला। इसके द्वितीय संस्करण की प्रतियाँ अफ्रीका तक पहुँच गई थी। एक आर्य सज्जन को उसकी यह प्रति अफ्रीका में प्राप्त हुई जिसे उन्होंने स्वामी श्रद्धानंद जी को भेज दिया। स्वामी ने इस पुस्तक को पढ़ कर उसके प्रतिउत्तर में पुस्तक लिखी जिसका नाम था “अलार्म बेल अर्थात खतरे का घंटा”। इस पुस्तक में उस समय के 21 करोड़ हिन्दुओं में से १ करोड़ हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित करने का लक्ष्य रखा गया था। स्वामी जी ने अलार्म बेल अर्थात खतरे का घंटा के नाम से पुस्तक लिखकर हिन्दुओं को इस सुनियोजित षड़यंत्र के प्रति आगाह किया। स्वामी जी ने आर्यसमाज से 250 प्रचारक और 25 लाख रुपये एकत्र करने की अपील की ताकि इस षड़यंत्र को रोका जा सके। सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा केअंतर्गत दलितोद्धार फण्ड के अंतर्गत यह अपील निकाली गई थी।

स्वामी जी इस बीच में दक्षिण भारत जाते हुए महात्मा गाँधी से जुहू में मिले। दोनों में 2 घंटा चर्चा हुई। गाँधी जी ने अपनी असहमति को 29 मई, 1925 के यंग इंडिया समाचार पत्र में “हिन्दू मुस्लिम तनाव: कारण और निवारण ” के नाम से एक लेख लिखा। इस लेख में गाँधी जी ने आर्यसमाज,स्वामी दयानन्द और स्वामी श्रद्धानन्द तीनों के मंतव्यों पर प्रहार किया। गाँधी जी लिखते है-

“स्वामी श्रद्धानन्द जी पर अविश्वास किया जाता है। मैं यह जानता हूँ कि उनकी वकृततायें भड़काने वाली होती है। परन्तु वे हिन्दू मुस्लिम एकता में भी विश्वास करते हैं। दुर्भाग्य से उनका यह विश्वास है कि किसी दिन सारे मुसलमान आर्य बन जायेंगे। जिस प्रकार कि संभवत: बहुत से मुसलमान यह समझते है कि किसी दिन सारे गैर-मुस्लिम इस्लाम को स्वीकार कर लेंगे। श्रद्धानन्द जी निर्भय है। अकेले ही उन्होंने एक निर्जन जंगल में आलीशान विश्वविद्यालय की स्थापना की। उनका अपनी शक्तियों और उद्देश्य में विश्वास है, परन्तु वे जल्दबाज़ हैं और शीघ्रता से क्रोध के आवेश में आ जाते हैं। उन्होंने आर्यसमाजिक स्वाभाव विरासत में लिए हैं। स्वामी दयानन्द सरस्वती के लिए मेरे हृदय में बड़ा सम्मान है। मैं समझता हूँ कि उन्होंने हिन्दू धर्म की बड़ी सेवा की है। उनकी वीरता में कोई संदेह नहीं किया जा सकता। परन्तु उन्होंने हिन्दू धर्म को तंग बना दिया है। मैंने आर्यसमाजियों की बाइबिल सत्यार्थ प्रकाश को पढ़ा है। जब में यरवदा जेल में था तब मेरे मित्रों ने मेरे पास तीन प्रतियाँ भेजी थीं। मैंने इस प्रकार से महान सुधारक के हाथ से लिखी, इससे अधिक निराशाजनक और कोई पुस्तक नहीं पढ़ी। उन्होंने इस बात का दावा किया है कि वह सत्य के प्रतिनिधि हैं। परन्तु उन्होंने अनजाने जैन धर्म, बौद्ध धर्म, ईसाई मत तथा इस्लाम की असत्य व्याख्या की हैं। उन्होंने संसार भर के अत्यंत विशाल और उदार धर्म को संकुचित बना दिया है। मूर्तिपूजा के विरुद्ध होते हुए भी उन्होंने मूर्तिपूजा चलाई है, क्यूंकि उन्होंने वेद का अक्षर-अक्षर सत्य माना है और सब विद्याओं का होना वेद में बताया है। आर्यसमाज की उन्नति का कारण सत्यार्थप्रकाश की शिक्षायें नहीं है, परन्तु इनके प्रवर्तक का उत्तम आचार है। जहाँ कहीं तुम आर्य समाजियों को देखो वहां जीवन दृष्टिगोचर होगा। परन्तु दृष्टि के संकुचित और दुराग्रही होने के कारण से वे और मतों के लोगों से लड़ाई ठान लेते हैं और जब कोई और लड़ने को नहीं होता तो आपस में लड़ पड़ते हैं। श्रद्धानन्द जी में इस भाव की पर्याप्त मात्रा है। परन्तु इन सब दोषों के होते हुए भी वह इस योग्य हैं कि उनके लिए मंगल कामना कीजिये। यह संभव है कि मेरे लेख से आर्यसमाजियों को क्रोध आयेगा। परन्तु में किसी पर आक्षेप करने के लिए नहीं लिख रहा हूँ। मेरा समाजियों से प्रेम हैं क्यूंकि उनमें से बहुत से मेरे सहयोगी हैं। जब दक्षिण अफ्रीका में था तब भी स्वामी जी से मेरा प्रेम था, यद्यपि अब मेरा उनसे पास का परिचय हो गया है तथापि मेरा उनसे प्रेम कम नहीं हुआ। यह सब बातें प्रेमभाव से लिखी हैं। ”

शुद्धि और तबलग के विषय में लिखते हुए गाँधी जी बोले-

“शुद्धि करने का वर्तमान दंग हिन्दू मुस्लिम ऐक्य को बिगाड़ने का एक प्रधान कारण हैं। मेरी सम्मति में हिन्दू धर्म में कहीं भी ऐसी शुद्धि का विधान नहीं है- जैसी ईसाईयों और उनसे कम मुलसमानों ने समझी है। मैं समझता हूँ कि इस प्रकार के प्रचार का दंग आर्यसमाज ने ईसाईयों से लिया है। यह वर्तमान दंग मुझे अपील नहीं करता। इससे लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक हुई है। एक आर्यसमाज का प्रचारक कभी इतना प्रसन्न नहीं होता, जितना दूसरे धर्मों की निंदा करने से। मेरी हिन्दू प्रकृति मुझसे कहती है कि सब धर्म थोड़े बहुत सच्चे हैं। सबका स्रोत्र एक ही परमात्मा है। परन्तु क्यूंकि उनके आने का साधन अपूर्ण मनुष्य हैं, इसलिए सब धर्म अपूर्ण हैं। वास्तविक शुद्धि यही है कि प्रत्येक मनुष्य अपने धर्म में पूर्णता प्राप्त करे। यदि धर्म परिवर्तन से आदमी में कोई उच्चता पैदा न हो तो इस प्रकार से धर्म परिवर्तन में कोई लाभ नहीं। हमें इससे क्या लाभ होगा कि यदि हम अन्य मतावलम्बियों को अपने धर्म में लायें जबकि हमारे धर्म के बहुत से अनुनायी अपने कार्यों से परमात्मा की सत्ता से इंकार कर रहे हैं। चिकित्सक पहिले अपने आपको स्वस्थ करें यह एक नित्य सच्चाई है। यदि आर्यसमाजी शुद्धि के लिए अपनी अंतरतमा से आवाज़ पाते हैं तो विशेष उन्हें इसके जारी रखने में कोई संकोच न करना चाहिये। इस प्रकार की आवाज़ के लिए समय की तथा अनुभव के कारण बाधा नहीं हो सकती। यदि अपनी आत्मा की आवाज़ को सुनकर कोई आर्यसमाजी या मुसलमान अपने धर्म का प्रचार करता है और उसके प्रचार करने से यदि हिन्दू मुस्लिम ऐक्य में विघ्न पड़े तो इसकी परवाह नहीं करनी चाहिये। इस प्रकार के आंदोलनों को रोका नहीं जा सकता। केवल उसके आधार में सच्चाई होनी चाहिए। यदि मलकाने हिन्दू धर्म में आना चाहते हैं, तो इसका उनको पूरा अधिकार है। परन्तु ऐसा कोई भी कार्य नहीं किया जाना चाहिये जिससे दूसरे धर्मों को हानि पहुंचे। इस प्रकार के कार्यों का समूह रूप से विरोध करना चाहिये। मुझे पता लगा है कि मुसलमान और आर्यसमाजी दोनों ही स्त्रियों को भगाकर अपने धर्मों में लाने का उद्योग करते हैं।”

आर्यसमाज में गाँधी जी के लेख की बड़ी भारी प्रतिक्रिया हुई। पूरे देश से गाँधी जी को अनेक पत्र इसके विरोध में लिखे गए। गाँधी जी ने मगर अपने शब्द वापिस नहीं लिए। स्वामी जी से जब इसका उत्तर देने के लिए कहा गया। तब स्वामी जी ने 13 जून, 1924 के लीडर उत्तर दिया कि

“मैं नहीं समझता कि गाँधी जी के लेख की किसी को उत्तर देने की आवश्यकता है। गाँधी जी की लेख ही उसका प्रतिउत्तर है क्यूँकि यह अंतर्विरोध से भरा पड़ा है। जो अपने आप यह सिद्ध करता है कि गाँधी जी ने आर्यसमाज के विरुद्ध क्यों लिखा है। आर्यसमाज का ऐसे लेखों से कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है। अगर आर्यसमाजी सही है तो न तो महात्मा गाँधी के लेख से और न ही किसी अन्य के लेख से आर्यसमाज की गतिविधियां रुकने वाली हैं।”

पंडित चमूपति और बृजनाथ मित्तल द्वारा गाँधी जी के लेख के प्रतिउत्तर में लिखे गए लेख पठनीय हैं। इतिहास की करवट देखिये कि जिन गाँधी जी ने शुद्धि का तीव्र विरोध किया था। उन्ही गाँधी जी का ज्येष्ठ पुत्र हीरालाल धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बन गया था। उसी हीरालाल को वापिस से शुद्ध करने के लिए गाँधी जी की पत्नी कस्तूरबा ने आर्यसमाज से गुहार लगाई। आर्यसमाज ने अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए मुंबई में अब्दुल्लाह गाँधी को वापिस हीरालाल बनाकर शुद्ध किया था।

महात्मा गाँधी के लेख के पश्चात मुसलमानों में धार्मिक उन्माद चरम सीमा एक बढ़ गया। उन्हें गाँधी जी के रूप में समर्थक जो मिल गया था। मार्च 1926 में स्वामी जी के पास कराची असगरी बेगम के नाम से एक महिला अपने बच्चों को लेकर शुद्ध होने के लिए आयी। उन्होंने स्वेच्छा से शुद्ध होकर अपन नाम शांति देवी रख लिया। कुछ महीनों बाद उसका पति उसे खोजते हुए दिल्ली आया। उसने अपनी पत्नी का मन बदलने मगर वह नहीं मानी। उसने 2 सितम्बर को स्वामी जी, उनके पुत्र इंद्र जी और जमाई डॉ सुखदेव पर उसकी पति बहकाने का मुकदमा कर दिया। 4 दिसंबर को इस मुक़दमे में फैसला स्वामी जी के पक्ष में हुआ। इस दौरान मुसलमानों में विशेष उत्तेजना देखने को मिली। ख्वाजा हसन निज़ामी दरवेश पत्र के माध्यम से मुसलमानों को भड़का रहा था। इन्द्र विद्यावाचस्पति ने स्वामी जी मुस्लिम मोहल्लों से रोज़ाना भ्रमण करने से मना भी किया। इस दौरान बनारस का दौरा कर स्वामी जी लौटे तो उन्हें निमोनिया ने घेर लिया। वो बीमार होकर अपने निवास पर आराम कर रहे थे। 23 दिसंबर को अब्दुल रशीद के नाम से एक मुसलमान स्वामी जी से चर्चा करने आया। स्वामी जी के सेवक धर्म सिंह ने उसे कहा स्वामी जी बीमार है। आप नहीं मिल सकते। स्वामी जी ने उसे अंदर बुला लिया और कहा कि वो अभी बीमार है। ठीक होने पर उसकी शंका का समाधान अवश्य करेंगे। अब्दुल रशीद ने पीने को पानी माँगा। जैसे ही धर्म सिंह पानी लेने गया तो रशीद ने स्वामी जी पर दो गोलियां दाग दी। स्वामी जी का तत्काल देहांत हो गया। धर्म सिंह ने उसे पकड़ने का प्रयास किया तो उसने धर्म सिंह की जांघ पर गोली मार दी। शोर सुनकर धर्मपाल जो स्वामी जी का सचिव था अंदर आया। उसने रशीद को कसकर पकड़ लिया। इतनी देर में पुलिस आ गई। इंद्र जी ने आकर स्वमी जी का चेहरा देखा जिस पर असीम शांति थी। कुछ दिनों पहले ही स्वामी जी ने इंद्र से कहा था कि

“मुझे संतुष्टि है कि मेरा चुनाव अब बलिदान के लिए हो गया है।”

25 दिसंबर, 1926 को स्वामी जी की अंतिम यात्रा निकली। भीड़ इतनी अधिक थी कि बेकाबू हो रही थी। स्वामी जी का अंतिम संस्कार इंद्रा जी ने किया। अब्दुल रशीद को फांसी पर चढ़ा दिया गया। कट्टरपंथी मुसलमानों ने उसको पहले बचाने का और फिर शहीद घोषित करने का भरसक प्रयास किया। मगर उनका यह सपना सपना ही रह गया।

महात्मा गाँधी ने 1926 के पश्चात रंगीला रसूल मामले में महाशय राजपाल की हत्या पर भी मुसलमानों का पक्ष लिया। हैदराबाद आंदोलन में आर्यसमाज ने जब हिन्दू समाज के हितों के लिए निज़ाम हैदराबाद के विरोध में आंदोलन किया तब भी मुसलमानों का पक्ष लिया। 1945 में सिंध में सत्यार्थ प्रकाश सत्याग्रह के समय में गाँधी जी मुसलमानों के पक्ष में खड़े दिखाई दिए। 1946 में कोलकाता और नोआखली के दंगों में भी उनका यही हाल था। और देश के 1947 के विभाजन में भी वे मुसलमानों का तुष्टिकरण करते दिखाई दिए। खेदजनक बात यह है कि आज भी उसी गाँधीवादी मानसिकता को हमारे ऊपर थोपा जा रहा है।

आखिर यह मुस्लिम तुष्टिकरण कब तक होगा?
Copied

मनोज शर्मा

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#यहइतिहासबताताहैकिअंग्रजोंकादलाल
#चाटूकारकौनथा.?
लन्दन के बकिंघम पैलेस में ब्रिटेन की महारानी/महाराजा से ‘नाइटहुड’ (सर) की उपाधि लेने की प्रक्रिया अत्यन्त अपमानजनक है। यह उपाधि लेनेवाले व्यक्ति को ब्रिटेन के प्रति वफादारी की शपथ लेनी पड़ती है और इसके पश्चात् उसे महारानी/महाराजा के समक्ष सिर झुकाकर एक कुर्सी पर अपना दायाँ घुटना टिकाना पड़ता है। ठीक इसी समय महारानी/महाराजा उपाधि लेनेवाले व्यक्ति की गरदन के पास दोनों कन्धों पर नंगी तलवार से स्पर्श करते हैं। तत्पश्चात् महारानी/महाराजा उपाधि लेनेवाले व्यक्ति को ‘नाइटहुड’ पदक देकर बधाई देते हैं।
यह प्रक्रिया सैकड़ों वर्ष पुरानी है और भारत में जिस जिसको यह उपाधि मिली वो सभी ‘सर’ इस प्रक्रिया से गुजरे थे।
ब्रिटेन अपने देश और अपने उपनिवेशों में अपने चाटुकारों को ब्रिटेन के प्रति निष्ठवान बनाने के लिए ऐसी अनेक उपाधियाँ देता रहा है। नाइटहुड (सर) की उपाधि उनमें सर्वोच्च होती थी।
गुलाम भारत में ब्रिटिश शासकों द्वारा देश के अनेक राजा-महाराजा, सेठ-साहूकार, राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद् आदि ब्रिटेन के प्रति वफादार रहने की शपथ लेने के बाद ही ‘नाइटहुड’ से सम्मानित किए गए थे।
इतिहास बताता है कि ब्रिटिश हुकूमत उसी को नाइटहुड (सर) की सर्वोच्च उपाधि से सम्मानित करती थी जिसे वो अपना वफादार चाटूकार दलाल मुखबिर मानती थी। हालांकि औपचारिक रूप से कहा यह जाता था कि व्यक्ति को अपने कार्यक्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए यह उपाधि दी जाती है। इसीलिए कभी कभी दिखावे के लिए कुछ वैज्ञानिकों चिकित्सकों शिक्षाविदों को भी यह उपाधि दे दी जाती थी।
कुछ अपवादों को छोड़कर देश के लगभग सभी राजा महाराजा नवाब और सेठ साहूकार आदि ब्रिटिश शासकों के तलुए चाटा करते थे। यह रहस्य किसी से छुपा नहीं है।
अतः उनको दरकिनार कर के आइए जानिए तत्कालीन राजनीति से जुड़े कुछ ऐसे #बड़े नामों को जिन्होंने ब्रिटेन के प्रति वफादार रहने की शपथ लेकर नाइटहुड (सर) की उपाधि ब्रिटिश दरबार में घुटना टेक कर ग्रहण की थी।
#पहला_नाम
सन 1890 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष फिरोजशाह मेहता बने थे। मेहता जी ने भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई इतने जुझारू तरीके से लड़ी थी कि 1904 में ब्रिटिश शासकों ने उनको नाइटहुड (सर) की उपाधि से सम्मानित किया था।

#दूसरा_नाम
सन 1900 में नारायण गणेश चंदावरकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना था। वह देश के प्रति कितना वफादार था और अंग्रेजों के प्रति कितना वफादार था यह इसी से स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साल भर बाद ही अंग्रेज़ी हुकूमत ने नारायण गणेश चंदावरकर को 1901 में बॉम्बे हाईकोर्ट का जज नियुक्त कर दिया था। देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए बनी कांग्रेस के उस राष्ट्रीय अध्यक्ष नारायण गणेश चंदावरकर ने जज बनकर अंग्रेजों की इतनी गज़ब सेवा की कि 1910 में ब्रिटिश शासकों ने नारायण गणेश चंदावरकर को नाइटहुड (सर) की उपाधि से नवाजा था। 1913 में जज के पद से रिटायर होने के बाद यह चंदावरकर फिर कांग्रेस का बड़ा नेता बन गया था।

#तीसरा_नाम
1907 और 1908 में लगातार 2 बार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रासबिहारी घोष ने कांग्रेस के झंडे तले अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई इतनी जोरदारी और ईमानदारी से लड़ी थी कि सन 1915 में ब्रिटिश शासकों ने रासबिहारी घोष को नाइटहुड (सर) की उपाधि से सम्मानित किया था।

#चौथा_नाम
सन 1897 में अंग्रेज़ सरकार का एडवोकेट जनरल चेत्तूर संकरन नायर कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना था। नायर ने कांग्रेस के झंडे तले देश की आज़ादी की लड़ाई इतने भीषण तरीके से लड़ी थी कि अंग्रेजों ने 1904 में उसको कम्पेनियन ऑफ इंडियन एम्पायर की तथा 1912 में नाइटहुड (सर) की उपाधि देकर समान्नित तो किया ही था साथ ही साथ 1908 में ब्रिटिश सरकार ने उसे मद्रास हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया था। 1915 में वह उसी पद से रिटायर हुआ था।

यह👆🏼चार नाम किसी छोटे मोटे कांग्रेसी नेता के नहीं बल्कि कांग्रेस के उन राष्ट्रीय अध्यक्षों के हैं जिन्होंने ब्रिटिश दरबार में घुटने टेक कर ब्रिटेन के प्रति वफ़ादार रहने की कसम खायी थी।
अतः आज यह प्रश्न स्वाभाविक है कि पेशे से वकील इन राजनेताओं ने ऐसा कौन सा उल्लेखनीय कार्य किया था जिससे ब्रिटिश सरकार इतनी गदगद हो गयी थी कि उन्हें नाइटहुड (सर) की सर्वोच्च उपाधि से सम्मानित कर डाला था.?

अंग्रेजों के वफादार रहे कुछ और नामों के ऐसे उदाहरण भी हैं जिनको आजादी मिलने के बाद महत्वपूर्ण पद सौंप दिए गए।
आइए उनमें से कुछ नामों से आज आप भी परिचित होइए…
पहला नाम है फ़ज़ल अली का। इसे अंग्रेजों ने पहले खान साहिब फिर खान बहादुर की उपाधि दी और फिर 1942 में नाइटहुड (सर) की उपाधि से तब नवाजा गया था जब देश “अंग्रेजों भारत छोड़ो” आन्दोलन की तैयारी कर रहा था।
लेकिन 1947 में आज़ादी मिलने के बाद नेहरू सरकार ने इस फ़ज़ल अली को उड़ीसा का गवर्नर बनाया फिर असम का गवर्नर बनाया। फ़ज़ल अली 1959 में असम के गवर्नर के रूप में ही मरा था।

एन गोपालस्वामी अय्यंगर नाम के एक नौकरशाह की ब्रिटेन के प्रति वफादारी से अंग्रेज़ हुक्मरान इतना गदगद थे कि अंग्रेजों ने 1941 में उसको नाइटहुड (सर) की उपाधि से तो नवाजा ही था साथ ही साथ दीवान बहादुर, आर्डर ऑफ दी इंडियन एम्पायर, कम्पेनियन ऑफ दी ऑर्डर ऑफ दी स्टार ऑफ इंडिया सरीखीे 7 अन्य उपाधियों से भी नवाजा था।
1947 में देश को आज़ादी मिलते ही बनी पहली कांग्रेस सरकार का प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस गोपालस्वामी अय्यंगर पर इतना मेहरबान हुआ था कि उसे बिना विभाग का मंत्री बनाकर अपनी केबिनेट में जगह दी फिर 1948 से 1952 तक देश का पहला रेलमंत्री नियुक्त किया तत्पश्चात 1952 में उसे देश के रक्षामंत्री सरीखा महत्वपूर्ण पद सौंप दिया था।
पोस्ट बहुत लंबी हो जाएगी इसलिए बस इतने उदाहरण ही पर्याप्त हैं। क्योंकि अपने चाटूकार वफादारों दलेलौं को ब्रिटिश हुक्मरान राय बहादुर, साहेब बहादुर, खान बहादुर सरीखी उपाधियों से भी सम्मानित करती थी। उपरोक्त उपाधि पाने वालों की सूची में दर्ज तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं के नाम भी यदि लिखूंगा तो पोस्ट बहुत लंबी हो जाएगी।
अतः केवल सर्वोच्च उपाधि नाइटहुड (सर) के इन👆🏼उदाहरणों के उल्लेख के साथ ही यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि 1947 से पहले ब्रिटिश हुकूमत का वफादार होने का मतलब ही हिंदुस्तान का गद्दार होना होता था।
अतः कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि ब्रिटिश शासकों ने RSS के, हिन्दू महासभा के कितने नेताओं/कार्यकर्ताओं को नाइटहुड (सर) या राय बहादुर, साहेब बहादुर, खान बहादुर की उपाधि से सम्मानित किया था.?
मित्रों इसका जवाब शून्य ही है।
अतः इस सच्चाई व ऊपर उल्लिखित नाइटहुड (सर) की उपाधि पाए नामों को पढ़कर यह आप स्वयं तय कर लीजिए कि 1947 से पहले अंग्रेजों का वफादार दलाल मुखबिर कौन था.?
सोज़न्य से Satish Chandra Mishra
नीचे दाहिना घुटना टिकाकर सम्मान लेने की प्रक्रिया का छायाचित्र

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महाभारत का एक प्रसंग : तब तेरा धर्म कहाँ था?

महाभारत के युद्ध के 17वें दिन जब वीरवर अर्जुन और महावीर कर्ण के बीच भीषण संग्राम हो रहा था, तब लड़ते-लड़ते कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धँस गया। कर्ण रथ से उतरकर पहिये को निकालने लगा। तब अर्जुन ने मौका अच्छा जानकर बाण तान लिया और छोड़ने ही वाला था कि मौत सामने देखकर कर्ण चिल्लाया- ‘क्या कर रहे हो, अर्जुन? यह धर्म युद्ध नहीं है, मैं निहत्था हूँ!’

यह सुनकर अर्जुन ठिठक गया, लेकिन जबाब दिया भगवान कृष्ण ने-
‘अच्छा तो, महाशय, अब तुझे धर्म की याद आ रही है! तू क्या जानता है धर्म क्या होता है?
तब तेरा धर्म कहाँ था, जब तुमने दुर्योधन के साथ मिलकर वारणावत में पांडवों को जीवित ही जलाकर मारने की कोशिश की थी?
तब तेरा धर्म कहाँ गया था, जब तुमने शकुनि के साथ मिलकर द्यूतक्रीड़ा के बहाने पांडवों का सर्वस्व हरण कर लिया था?
तब तेरा धर्म कहाँ चला गया था, जब तुमने महारानी द्रोपदी को भरी सभा में नंगा करने की सलाह दी थी?
तब तेरा धर्म कहाँ उड़ गया था, जब तुम सात मुस्टंडों ने एक निहत्थे बालक को घेरकर मार डाला था?’

भगवान कृष्ण एक-एक करके कर्ण की करतूतें गिना रहे थे और बार-बार पूछते थे- ‘कु ते धर्मस्तदा गतः?’ बता तब तेरा धर्म कहाँ चला गया था?

कर्ण के पास कोई उत्तर नहीं था। भगवान ने फिर उसे फटकारा- ‘तू नीच, तू हमें क्या धर्म सिखाएगा? हमें अच्छी तरह मालूम है कि हमारा धर्म क्या है!’

तब भगवान ने अर्जुन से कहा- ‘अर्जुन, तुम इस दुष्ट की बातों में मत आओ। आजीवन पाप करने वाला और पापियों का साथ देने वाला यह आदमी धर्म की बात करने का अधिकारी नहीं है। इसे धर्म का नाम तक लेने का अधिकार नहीं है। तुम अभी इसका सिर काट दो, ताकि इसे पता चल जाये कि सच्चा धर्म क्या होता है।’

तब अर्जुन ने कर्ण को धर्म का जो सबक सिखाया, वह सबको मालूम है।

जब हम आज कश्मीर की परिस्थिति में इस प्रसंग पर विचार करते हैं, तो समानता स्पष्ट हो जाती है। आतंकवादियों को प्रोत्साहन देने वाले अलगाववादी संगठन से लेकर कश्मीर की मुख्य-मंत्री रमजान के अवसर पर एकतरफा वीराम करने का पक्ष ले रहे हैं। ये लोग क्यों भूल जाते है कि यही वो आतंकवादी हैं जो कश्मीर में चंद वर्षों पहले आये भूकंप के बाद भी नहीं रुके , कश्मीर में आई बाढ़ में भारतीय सेना के हेलीकाप्टर पर पत्थर फेंकने से पीछे नहीं हटे, अमरनाथ यात्रा पर हमला करते से पीछे नहीं हटे, जम्मू के मंदिरों पर हमला करने से पीछे नहीं हटे, चेन्नई से घूमने आये बेकसूर पर्यटक को मारकर भी नहीं रुके, स्कूल के बस में घर जा रहे बच्चों पर पत्थर फेंकने से नहीं रुके। जिनमें नैतिकता नाम की कोई चीज नहीं है। वे आज नैतिकता और लोकतंत्र की दुहाई दे रहे हैं। मोदी जी और भारतीय सेना को इनकी चिंता नहीं करनी चाहिए और देश के हित में जो आवश्यक हो वही करना चाहिए। इन आतकंवादियों और अलगाववादियों को एक ही बात कहनी चाहिए।

तब तेरा धर्म कहाँ था?

समीर शर्मा

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कर्नल पुरोहित मामले की अनकही कहानी