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हैरत की बात ये है कि जिस मा.चो. इकबाल ने


हैरत की बात ये है कि जिस मा.चो. इकबाल ने
“सारे जहाँ से अच्छा हिदोस्तान हमारा”
लिखा
और “”मजहब नहीं सिखाता आपस में
बैर रखना” जैसे बोल बोले थे
उसी दोगले मा.चो. इकबाल ने मुस्लिम लीग
खिलाफत मूवमेंट के समय 1930 के
इलाहाबाद में मुस्लिम लीग के सम्मलेन में
ये भी कहा था कि
“हो जाये अगर शाहे खुरासां का इशारा,
सिजदा न करूं हिन्दोस्तां की नापाक
जमीं पर “

हैरत की बात ये है कि जिस मा.चो. इकबाल ने
"सारे जहाँ से अच्छा हिदोस्तान हमारा"
लिखा
और ""मजहब नहीं सिखाता आपस में
बैर रखना" जैसे बोल बोले थे
उसी दोगले मा.चो. इकबाल ने मुस्लिम लीग
खिलाफत मूवमेंट के समय 1930 के
इलाहाबाद में मुस्लिम लीग के सम्मलेन में
ये भी कहा था कि
"हो जाये अगर शाहे खुरासां का इशारा,
सिजदा न करूं हिन्दोस्तां की नापाक
जमीं पर "
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जानिए क्यूँ तोड़ी हमने हत्यारी विक्टोरिया की मूर्ति —आर्य जितेंद्र


जानिए क्यूँ तोड़ी हमने हत्यारी विक्टोरिया की मूर्ति —आर्य जितेंद्र

1. इसी विक्टोरिया ने भारत मे गौ माँ को काटने के कत्ल कारखाने लगवाए थे ।

2. अंग्रेज़ो ने प्रत्यक्ष रूप से 7लाख 80000 क्रांतिकारियों को मौत के घाट निर्ममता से उतार दिया । किसी को तोप से उड़ा दिया किसी को बंदूक से तो किसी को फांसी पर ,बिठुर जैसे गाँव के तो 24000 लोगो को जिनमे एक दिन का बच्चा भी था और 100 वर्ष का बुजुर्ग भी अंग्रेज़ो ने पेड़ से बांध कर जला दिया ।

3. ऐसे अंग्रेज़ो के नाम पर जब हमारा देश गुलाम था तो हमारे देश के गद्दार राजाओ ने और काले अंग्रेज़ो कुछ पार्क ,कुछ महल ,कुछ नगर बनवाए लेकिन भारत तो 68 वर्ष पहले ही आजाद हो गया फिर इन नगरो ,मूर्तियो ,दरवाजो की भारत को क्या जरूरत ये ही हमारे युवा खून मे उबाल लाती है और हमारे शहीदो की शहादत को मुह चिड़ाती है इसलिए हमने बहुत सोच समझकर इस घटना को अंजाम दिया है

4. जिन लोगो ने जालिया वाला भाग मे शान्तिप्रिय तरीके से आंदोलन कर कर रहे 22000 लोगो पर गोलिया चला दी जिसमे 5000 क्रांतिकारी एक ही साथ मर गए ऐसे कुख्यात हत्यारो के नाम पर आज भी इस देश मे कई सड़को के नाम है क्या ये आज भी मानसिक गुलामी आपको नहीं लगती है यदि हाँ तो आइये हमारे इस आंदोलन का हिस्सा बनिए ।

5. आज भी इस देश मे वास्को डी गामा ,डलहोजी ,मेकलोड आदि कई बार्बर अंग्रेज़ो के नाम पर सड़के है इन्हे जड़ से हटाकर इस देश को पुनः भारत बनाना हमारा उद्देश्य है ।

6. आज भी इस देश मे UPSC की परीक्षा मे हिन्दी या भारतीय भाषी छात्र अपने आप को अपमानित महसूस करता है आज भी इस देश मे अंग्रेज़ो को गौरव की भाषा माना जाता है और हिन्दी की बात करने वाले छात्रो पर अंग्रेज़ो की तरह लठिया चलाई जाती है ।

7. आज भी इस देश मे विदेशी कंपनिया भारतवासियों को लूट रही है उन्हे गौ माँ और सूअर की चर्बी का मांस खिला रही है । आज भी लाखो करोड़ रुपये भारत से बहार जा रहे है ।

8. आज भी इस देश का किसान मरा जा रहा है कर्ज तले दबा जा रहा है । क्या भगत सिंह और उनके साथियो ने इस दिन के लिए फांसी के फंदे को चूमा था । क्या इस लिए झाँसी की रानी अपनी राजसत्ता छोड़कर महलो का वैभव छोड़कर बंजारा बनकर युद्ध मैदान मे उतरी थी

9. हमे अपने भारत को बचना है तो फिर से भारत को भारतीयता के आधार पर खड़ा करना ही होगा और तभी हर भारत वासी सुख चैन और गौरव से अपना जीवन व्यपन कर सकेगा ।

10. भारत मे आज जीतने भी अंग्रेज़ अधिकारियों ,राजाओ के नाम की मूर्तिया है ,नगर है ,सड़के है भारत सरकार उन्हे जल्द से जल्द संवैधानिक रूप से हता दे वरना इस देश मे आज भी भगत सिंह ही जन्म लेते है

!!वंदे मातरम !

साभार :- हिन्दुस्तान मेरी जान

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गुलामी का प्रतीक हमारा राष्ट्रगान जन गन मन


 
गुलामी का प्रतीक हमारा राष्ट्रगान जन गन मन
July 22, 2014 at 2:39pm
जन गन मन गुलामी का प्रतीक........!!
 
1911 मे जॉर्ज पंचम जब भारत आए तब उनके स्वागत में ये गीत गाया गया था ।।
--------------------------------------------------------
जन-गण-मन की पूरी कहानी
* जॉर्ज पंचम का भारत मे आगमन
“ सन1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था , सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया ,पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये ,इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया “
* टागोर के परिवार का पैसा “ ईस्ट इंडिया कंपनी” मे लगा हुवा था
“ रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा , उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक(Director) रहे, उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता" ... इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था “
इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है
"भारत के नागरिक,भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है ... हे अधिनायक(Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो | तुम्हारी जय हो ! जय हो! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात,मराठा मतलब महारास्त्र,द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है, तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है , तुम्हारी ही हम गाथा गाते है | हे भारत के भाग्य विधाता(सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो | "
* 1911 मे जॉर्ज पंचम भारत आए
“ जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया ,जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया , क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है ,जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की ,वह बहुत खुश हुआ ओर उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके(जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये , रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए .. जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था | “
* नोबल एवार्ड की बात इस तरहा थी
“ उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है ,जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया |
* एक हत्याकांड ओर गांधी का खत
“ रविन्द्र नाथ टैगोर की अंग्रेजों के प्रति ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलियावाला कांड हुआ और गाँधी जी ने उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधीजी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और कहा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली| इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया|
रबीन्द्रनाथ टागोर ने लिखा खत ओर किया इकरार
 
“ सन1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे | रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई,सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे| अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) | इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत 'जन गण मन' अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है ,इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है ,इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है ,लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे | 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया,और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये|
...........
जन-गन-मन गाकर देश को अपमानित ना करे

गुलामी का प्रतीक हमारा राष्ट्रगान जन गन मन
July 22, 2014 at 2:39pm
जन गन मन गुलामी का प्रतीक……..!!

1911 मे जॉर्ज पंचम जब भारत आए तब उनके स्वागत में ये गीत गाया गया था ।।
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जन-गण-मन की पूरी कहानी
* जॉर्ज पंचम का भारत मे आगमन
“ सन1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था , सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया ,पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये ,इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया “
* टागोर के परिवार का पैसा “ ईस्ट इंडिया कंपनी” मे लगा हुवा था
“ रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा , उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक(Director) रहे, उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है “जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता” … इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था “
इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है
“भारत के नागरिक,भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है … हे अधिनायक(Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो | तुम्हारी जय हो ! जय हो! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात,मराठा मतलब महारास्त्र,द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है, तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है , तुम्हारी ही हम गाथा गाते है | हे भारत के भाग्य विधाता(सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो | “
* 1911 मे जॉर्ज पंचम भारत आए
“ जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया ,जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया , क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है ,जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की ,वह बहुत खुश हुआ ओर उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके(जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये , रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए .. जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था | “
* नोबल एवार्ड की बात इस तरहा थी
“ उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है ,जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया |
* एक हत्याकांड ओर गांधी का खत
“ रविन्द्र नाथ टैगोर की अंग्रेजों के प्रति ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलियावाला कांड हुआ और गाँधी जी ने उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधीजी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और कहा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली| इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया|
रबीन्द्रनाथ टागोर ने लिखा खत ओर किया इकरार

“ सन1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे | रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई,सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे| अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) | इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत ‘जन गण मन’ अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है ,इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है ,इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है ,लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे | 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया,और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये|
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जन-गन-मन गाकर देश को अपमानित ना करे

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गति के तीन नियमों को किसने लिखा है ?


गति के तीन नियमों को किसने लिखा है ?? �
जानिए और सबको बताइए : http://phys.org/news106238636.html
—————————————————————————-
हम सभी न्यूटन के गति के नियमों से परिचित हैं | उन्होंने 5 जुलाई 1687 को अपने कार्य “फिलोसोफी नेचुरेलिस प्रिन्सिपिया मेथेमेटिका” में इन नियमों को प्रकाशित किया |

लेकिन …………………….

न्यूटन के, गति के नियमों की खोज से पहले भारतीय वैज्ञानिक और दार्शनिक महर्षि कणाद ने (600 ईसा पूर्व में) “वैशेशिका सूत्र” दिया था जो शक्ति और गति के बीच संबंध का वर्णन करता है |
—————————————————————————–
Albert Einstein – “We owe a lot to the Indians, who taught us how to count, without which no worthwhile scientific discovery could have been made”

गति के तीन नियमों को किसने लिखा है ?? � 
जानिए और सबको बताइए : http://phys.org/news106238636.html 
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हम सभी न्यूटन के गति के नियमों से परिचित हैं | उन्होंने 5 जुलाई 1687 को अपने कार्य “फिलोसोफी नेचुरेलिस प्रिन्सिपिया मेथेमेटिका” में इन नियमों को प्रकाशित किया |

लेकिन .........................

न्यूटन के, गति के नियमों की खोज से पहले भारतीय वैज्ञानिक और दार्शनिक महर्षि कणाद ने (600 ईसा पूर्व में) “वैशेशिका सूत्र” दिया था जो शक्ति और गति के बीच संबंध का वर्णन करता है |
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Albert Einstein - "We owe a lot to the Indians, who taught us how to count, without which no worthwhile scientific discovery could have been made"
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गुलामी का प्रतीक हमारा राष्ट्रगान जन गन मन


गुलामी का प्रतीक हमारा राष्ट्रगान जन गन मन
July 22, 2014 at 2:39pm
जन गन मन गुलामी का प्रतीक……..!!

1911 मे जॉर्ज पंचम जब भारत आए तब उनके स्वागत में ये गीत गाया गया था ।।
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जन-गण-मन की पूरी कहानी
* जॉर्ज पंचम का भारत मे आगमन
“ सन1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था , सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया ,पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये ,इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया “
* टागोर के परिवार का पैसा “ ईस्ट इंडिया कंपनी” मे लगा हुवा था
“ रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा , उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक(Director) रहे, उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है “जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता” … इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था “
इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है
“भारत के नागरिक,भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है … हे अधिनायक(Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो | तुम्हारी जय हो ! जय हो! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात,मराठा मतलब महारास्त्र,द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है, तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है , तुम्हारी ही हम गाथा गाते है | हे भारत के भाग्य विधाता(सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो | “
* 1911 मे जॉर्ज पंचम भारत आए
“ जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया ,जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया , क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है ,जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की ,वह बहुत खुश हुआ ओर उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके(जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये , रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए .. जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था | “
* नोबल एवार्ड की बात इस तरहा थी
“ उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है ,जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया |
* एक हत्याकांड ओर गांधी का खत
“ रविन्द्र नाथ टैगोर की अंग्रेजों के प्रति ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलियावाला कांड हुआ और गाँधी जी ने उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधीजी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और कहा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली| इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया|
रबीन्द्रनाथ टागोर ने लिखा खत ओर किया इकरार

“ सन1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे | रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई,सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे| अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) | इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत ‘जन गण मन’ अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है ,इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है ,इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है ,लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे | 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया,और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये|
………..
जन-गन-मन गाकर देश को अपमानित ना करे

गुलामी का प्रतीक हमारा राष्ट्रगान जन गन मन
July 22, 2014 at 2:39pm
जन गन मन गुलामी का प्रतीक........!!
 
1911 मे जॉर्ज पंचम जब भारत आए तब उनके स्वागत में ये गीत गाया गया था ।।
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जन-गण-मन की पूरी कहानी
* जॉर्ज पंचम का भारत मे आगमन
“ सन1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था , सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया ,पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये ,इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया “
* टागोर के परिवार का पैसा “ ईस्ट इंडिया कंपनी” मे लगा हुवा था
“ रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा , उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक(Director) रहे, उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता" ... इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था “
इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है
"भारत के नागरिक,भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है ... हे अधिनायक(Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो | तुम्हारी जय हो ! जय हो! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात,मराठा मतलब महारास्त्र,द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है, तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है , तुम्हारी ही हम गाथा गाते है | हे भारत के भाग्य विधाता(सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो | "
* 1911 मे जॉर्ज पंचम भारत आए
“ जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया ,जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया , क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है ,जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की ,वह बहुत खुश हुआ ओर उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके(जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये , रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए .. जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था | “
* नोबल एवार्ड की बात इस तरहा थी
“ उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है ,जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया |
* एक हत्याकांड ओर गांधी का खत
“ रविन्द्र नाथ टैगोर की अंग्रेजों के प्रति ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलियावाला कांड हुआ और गाँधी जी ने उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधीजी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और कहा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली| इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया|
रबीन्द्रनाथ टागोर ने लिखा खत ओर किया इकरार
 
“ सन1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे | रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई,सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे| अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) | इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत 'जन गण मन' अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है ,इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है ,इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है ,लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे | 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया,और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये|
...........
जन-गन-मन गाकर देश को अपमानित ना करे
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राजीव भाई


अगर आप मेमोरी कार्ड, वीडियो ऑडियो डीवीडी, पुस्तके खरीदना चाहते हो तो मुझे कॉल कर सकते है :- 09928064941, 09782705883

Total Books, AUDIOS And VIDEOS Price(कीमत) :- 1100/-

मित्रो वैसे तो राजीव भाई ने जीवन भर भारत मे अलग अलग स्थानो पर घूम -घूम कर 5000 से ज्यादा व्याख्यान दिये हैं ! लेकिन अबतक पूरे Internet पर मात्र 45 audio व्याख्यान (Lectures) ही उपलब्ध थे ! हम लोगो की टीम ने पिछले 3 साल से लगातार परिश्रम कर अलग अलग लोगो से संपर्क बनाकर बहुत से नये व्याख्यान खोजे है जिनकी अबतक कुल संख्या 154 हो गई है ! अगर घंटो मे बात की जाए तो कुल 330 घंटे के व्याख्यान है ये सारे व्याख्यान (Lectures) हमने

http://www.rajivdixitmp3.com
पर upload कर दिये है और भी नये व्याख्यान खोजने का काम जारी है जैसे जैसे और नये व्याख्यान मिलते जाएंगे हम इसी site पर upload करते रहेंगे ! आप चाहें तो website से सीधा download कर सकते हैं ! और किसी कारण download करने मे असमर्थ हैं तो हमने 2 dvd का एक set बनाया है और इन 2 dvd मे सारे 154 व्याख्यान डाल दिये है  जो आप खरीद सकते हैं हम राजीव भाई के नाम पर धंधा करने वालों की भांति 1- 1 लैक्चर को एक cd मे नहीं बेच रहे हमने 154 lectures को सीधा 2 dvd मे ही डाल दिया है जो  हमने कुल 154 व्याख्यान डाले है उनकी सूची नीचे दी गई है !
DVD Part (1)
____________________
1) आपके स्वास्थ्य संबन्धित समस्याएं ! (18 Lectures)
2) भारत की आजादी या धोखा ? (18 Lectures )
3) देश मे हो रही गौ ह्त्या !! ( 5 Lectures )
4) गोबर,गौ मूत्र से देशी खेती खुशहाल किसान !! ( 8 Lectures )
5) WTO समझौता भारत को गुलाम बनाने की साजिश ( 7 Lectures )
6) गलोबलाईशन और अँग्रेजी नीतियों के कारण खत्म होते
स्वदेशी उद्योग,आर्थिक गुलामी मे ढसता भारत ! (20 Lectures)

 

DVD Part -2
____________________
7) भारत और यूरोप की सभ्यता,संस्कृति मे अंतर ( 12 Lectures )
8) कार्गिल युद्ध और कश्मीर की समस्या ( 2 Lectures )
9) भारत स्वाभिमान आंदोलन के दौरान दिये गए व्याख्यान (44 Lectures)
10) राम कथा मे भारत की स्मस्याओ का समाधान ( 3 Lectures )
11) कार्यकर्ताओ के लिए व्याख्यान ( 5 Lectures )
12) अन्य मुख्य व्याख्यान (12 Lectures )
_______________________________________________
कुल 18+18+5+8+7+20+12+2+44+3+5+12+= 154 व्याख्यान ! (330 घंटे )

 

इन दो dvd के एक set की कीमत मात्र 40 रूपये है और इसके अतिरिक्त भेजने का खर्चा कूरियर चार्ज 55 रूपये हैं
कुल कीमत  40+55= 95 रूपये मे (154 व्याख्यान 330 घंटे) !!

 

जबकि राजीव भाई के नाम पर धंधा करने वाले 1 लैक्चर को पहले एक CD मे डालेंगे फिर उसको कोई नाम देंगे और फिर एक लैक्चर 20 रूपये मे बेचेंगे ! ऐसे वो केवल 10 लैक्चर को 10 CD डाल कर 20 रूपये प्रति CD के हिसाब से 200 रूपये का set बेचते है  ! इसके बाद फिर आपको कहेंगे भारत स्वाभिमान वाले लैक्चर की CD set 350 रूपये का अलग से है ! तो आपके कुल 200 +350 =550 रूपये खर्च हो जाएंगे और आपको 550 रूपये मे केवल 172 घंटे के व्याख्यान मिलेंगे !!
यहाँ हम  मात्र 95 रूपये मे बीच मे ही कूरियर चार्ज सहित 2 dvd का set देते है जिसमे 154 व्याख्यान 330 घंटे के है ! क्योंकि हमारा लक्ष्य राजीव भाई की आवाज को हर भारतीय तक पहुंचाना है उनके नाम पर धंधा करना नहीं है !!

आप भुगतान (payment) दो तरीके से कर सकते हैं या तो नीचे लिखे बैंक अकाउंट मे 95 रूपये जमा करवा दें ! अगर आप सीधा CASH जमा करवा रहे है तो 145  रूपये जमा करवाये क्यूंकि 50  रूपये bank intercity charges काट लेता है !पहले बैंक मात्र 10 रूपये intercity charges काट रहा था  लेकिन अब 14 मार्च के बाद से  intercity charges बैंक ने सीधा 50 रूपये कर दिया है !! इसलिए आप  net banking से करवाये तो ज्यादा अच्छा रहेगा क्योंकि आपके 95 ही रूपये लगेंगे !!

 

Combo DVD

 

Price(कीमत)

  1. DVD Audio Price(कीमत) :- 120/-
  2. Memory Card Price(कीमत) :- 445/-
  3. Only Health Books Price(कीमत) :- 250/-
  4. Only Health Books, AUDIOS And VIDEOS Price(कीमत) :- 550/-
  5. Total Books Price(कीमत) :- 650/-
  6. Total Videos Price(कीमत) :- 600/-
  7. Total Books, AUDIOS And VIDEOS Price(कीमत) :- 1100/-
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हिंदुस्तान की न्याय व्यवस्था में काम करने वाले जो एडवोकेट्स


पूरी पोस्ट नही पड़ सकते तो यहाँ Click करें : http://www.youtube.com/watch?v=0fo5tDYfMi8

हिंदुस्तान की न्याय व्यवस्था में काम करने वाले जो एडवोकेट्स मित्र है उनसे माफ़ी मांगते हुए आप सबसे ये पूछता हूँ के क्या आप जानते है यह काला कोट पेहेनके अदालत में क्यों जाते है ? क्या काले को छोड़ के दूसरा रंग नही है भारत में ? सफ़ेद नही है नीला नही है पिला नही है हरा नही है ?? और कोई रंग ही नही है कला ही कोट पहनना है । वो भी उस देश की न्यायपालिका में जहाँ तापमान 45 डिग्री हो। तो 45 तापमान जिस देशमे रहता हो उहाँ के वोकिल काला कोट पेहेनके बहेस करे, तो बहस के समय जो पसीना आता है वो और गर्मी के कारन जो पसीना आता है वो, तरबतर होते जाये और उनके कोट पर पसीने से सफ़ेद सफ़ेद दाग पड़ जाये पीछे कोलार पर और कोट को उतारते ही इतनी बदबू आये की कोई तिन मीटर दूर खिसक जाये लेकिन फिर भी कोट का रंग नही बदलेंगे। क्योंकि ये अंग्रेजो का दिया हुआ है।

आपको मलिम है अंग्रेजो की अदालत में काला कोट पहनके न्यायपालिका के लोग बैठा करते थे। और उनके यहाँ स्वाभाविक है क्योंकि उनके यहाँ नुन्यतम -40 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान होता है जो भयंकर ठण्ड है । तो इतनी ठण्ड वाली देश में काला कोट ही पेहेनना पड़ेगा कियोंकि वो गर्मी देता है। ऊष्मा का अच्छा अवशोषक है। अन्दर की गर्मी को बाहर नही निकलने देता और बाहर से गर्मी को खिंच के अन्दर डालता है । इसीलिए ठण्ड वाले देश के लोग काला कोट पेहेनके अदालत में बहस करे तो समझ में आता है पर हिंदुस्तान के गरम देश के लोग काला कोट पेहेनके बहस करे !!!!!! 1947 के पहले होता था समझमे आता है पर 1947 के बाद भी चल रहा है ??? हमारी बार काउन्सिल कोइत्नि समझ नही है क्या? के इस छोटी सी बात को ठीक कर ले बदल ले । सुप्रीम कोर्ट की बार काउन्सिल है हाई कोर्ट की बार काउन्सिल है डिस्ट्रिक्ट कोर्ट की बार काउन्सिल है सभी बार काउन्सिल मिलके एक मिनट में फैसला कर सकते है की काल से हम ये काला कोर्ट नही पहनेंगे।

वो तो भला हो हिंदुस्तान में कुछ लोगों का हमारे देश पहले अंग्रेज न्यायाधीश हुआ करते थे तो सर पे टोपा पेहेनके बैठते थे, उसमे नकली बाल होते थे। आज़ादी के बाद 40 -५० साल तक टोपा लगा कर यहाँ बहुतसारे जज बैठते रहे है इस देश की अदालत में। अभी यहाँ क्या विचित्रता है के काला कोट पेहेन लिया ऊपर से काला पंट पेहेन लिया, बो लगा लिया सब एकदम टाइट कर दिया हवा अन्दर बिलकुल न जाये फिर मांग करते है के सभी कोट में एयर कंडीशनर होना चाहिए!! ये कोट उतर के फेंक दो न एयर कंडीशन की जरुरत क्या है ? और उसके ऊपर एक गाउन और लाद लेते है वो निचे तक लहंगा फैलता हुआ। ऐसी विचित्रताए इस देश में आज़ादी के ६० साल बाद भी दिखाई दे रहा है।

अंग्रेजो की गुलामी की एक भी निशानी को आज़ादी के 65 साल में हमने मिटाया नही, सबको संभाल के रखा है।

पूरी पोस्ट नही पड़ सकते तो यहाँ Click करें : http://www.youtube.com/watch?v=0fo5tDYfMi8

हिंदुस्तान की न्याय व्यवस्था में काम करने वाले जो एडवोकेट्स मित्र है उनसे माफ़ी मांगते हुए आप सबसे ये पूछता हूँ के क्या आप जानते है यह काला कोट पेहेनके अदालत में क्यों जाते है ? क्या काले को छोड़ के दूसरा रंग नही है भारत में ? सफ़ेद नही है नीला नही है पिला नही है हरा नही है ?? और कोई रंग ही नही है कला ही कोट पहनना है । वो भी उस देश की न्यायपालिका में जहाँ तापमान 45 डिग्री हो। तो 45 तापमान जिस देशमे रहता हो उहाँ के वोकिल काला कोट पेहेनके बहेस करे, तो बहस के समय जो पसीना आता है वो और गर्मी के कारन जो पसीना आता है वो, तरबतर होते जाये और उनके कोट पर पसीने से सफ़ेद सफ़ेद दाग पड़ जाये पीछे कोलार पर और कोट को उतारते ही इतनी बदबू आये की कोई तिन मीटर दूर खिसक जाये लेकिन फिर भी कोट का रंग नही बदलेंगे। क्योंकि ये अंग्रेजो का दिया हुआ है।

आपको मलिम है अंग्रेजो की अदालत में काला कोट पहनके न्यायपालिका के लोग बैठा करते थे। और उनके यहाँ स्वाभाविक है क्योंकि उनके यहाँ नुन्यतम -40 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान होता है जो भयंकर ठण्ड है । तो इतनी ठण्ड वाली देश में काला कोट ही पेहेनना पड़ेगा कियोंकि वो गर्मी देता है। ऊष्मा का अच्छा अवशोषक है। अन्दर की गर्मी को बाहर नही निकलने देता और बाहर से गर्मी को खिंच के अन्दर डालता है । इसीलिए ठण्ड वाले देश के लोग काला कोट पेहेनके अदालत में बहस करे तो समझ में आता है पर हिंदुस्तान के गरम देश के लोग काला कोट पेहेनके बहस करे !!!!!! 1947 के पहले होता था समझमे आता है पर 1947 के बाद भी चल रहा है ??? हमारी बार काउन्सिल कोइत्नि समझ नही है क्या? के इस छोटी सी बात को ठीक कर ले बदल ले । सुप्रीम कोर्ट की बार काउन्सिल है हाई कोर्ट की बार काउन्सिल है डिस्ट्रिक्ट कोर्ट की बार काउन्सिल है सभी बार काउन्सिल मिलके एक मिनट में फैसला कर सकते है की काल से हम ये काला कोर्ट नही पहनेंगे।

वो तो भला हो हिंदुस्तान में कुछ लोगों का हमारे देश पहले अंग्रेज न्यायाधीश हुआ करते थे तो सर पे टोपा पेहेनके बैठते थे, उसमे नकली बाल होते थे। आज़ादी के बाद 40 -५० साल तक टोपा लगा कर यहाँ बहुतसारे जज बैठते रहे है इस देश की अदालत में। अभी यहाँ क्या विचित्रता है के काला कोट पेहेन लिया ऊपर से काला पंट पेहेन लिया, बो लगा लिया सब एकदम टाइट कर दिया हवा अन्दर बिलकुल न जाये फिर मांग करते है के सभी कोट में एयर कंडीशनर होना चाहिए!! ये कोट उतर के फेंक दो न एयर कंडीशन की जरुरत क्या है ? और उसके ऊपर एक गाउन और लाद लेते है वो निचे तक लहंगा फैलता हुआ। ऐसी विचित्रताए इस देश में आज़ादी के ६० साल बाद भी दिखाई दे रहा है।

अंग्रेजो की गुलामी की एक भी निशानी को आज़ादी के 65 साल में हमने मिटाया नही, सबको संभाल के रखा है।
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शिवाजी


नाम-शिवाजी 
उम्र-7 साल 
. 
हुआ ये की एक दिन छोटा शिवाजी पुणे में अपने लाल महल के सामने खेल रहे थे 
तभी किसी ने बताया की एक मुल्ला कसाई एक गौ को काटने के लिए ले जा रहा है 
एक हिन्दू किसान से छीन के,मदद कोई नहीं कर रहा है.
जैसे ही 7 साल के शिवाजी को ये बात पता चली 
वो दौड़ के अकेले ही पहुंच गए और उस कसाई का हाथ अपने छोटे से तलवार से काट डाली 
ऐसे थे महान शिवाजी महाराज 
शेयर कमेंट लाइक 
Admin whatsapp +91-8287556875

नाम-शिवाजी 
उम्र-7 साल 

हुआ ये की एक दिन छोटा शिवाजी पुणे में अपने लाल महल के सामने खेल रहे थे 
तभी किसी ने बताया की एक मुल्ला कसाई एक गौ को काटने के लिए ले जा रहा है 
एक हिन्दू किसान से छीन के,मदद कोई नहीं कर रहा है.
जैसे ही 7 साल के शिवाजी को ये बात पता चली 
वो दौड़ के अकेले ही पहुंच गए और उस कसाई का हाथ अपने छोटे से तलवार से काट डाली 
ऐसे थे महान शिवाजी महाराज 
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Posted in Rajiv Dixit

मारिया शारापोव


मारिया शारापोव ने क्या कह दिया की कौन है सचिन तेंदुलकर ? तो सारा देश गुस्सा गया…
पर ये गुस्सा करनेवालों को ये पता है की ये लड़की सीता साहू..आज अपने घर के सामने गोल गप्पे बेचती है…
इस सीता साहू ने सन २००५ के ओलंपिक मे दो ब्रोन्झ मेडल जीते थे..???
अब तक हार कर ये आरएसएस की सदस्य बन गयी है…
क्या ग़लत कहा मारिया शारापोव ने?? 
असल मे भारतीय मूर्ख और स्वार्थी हैं…बला के …

मारिया शारापोव ने क्या कह दिया की कौन है सचिन तेंदुलकर ? तो सारा देश गुस्सा गया...
पर ये गुस्सा करनेवालों को ये पता है की ये लड़की सीता साहू..आज अपने घर के सामने गोल गप्पे बेचती है...
इस सीता साहू ने सन २००५ के ओलंपिक मे दो ब्रोन्झ मेडल जीते थे..???
अब तक हार कर ये आरएसएस की सदस्य बन गयी है...
क्या ग़लत कहा मारिया शारापोव ने?? 
असल मे भारतीय मूर्ख और स्वार्थी हैं...बला के ...
Posted in Rajiv Dixit

Bollywood


FDI in Bollywood already ??
————————–
Most of us are blissfully ignorant to the fact that we’re being force fed everyday on high doses of “Sexual Objectification of Women”. Sexual objectification is the concept of treating a person merely as an object or instrument of sexual pleasure, tagging them as ‘sex objects’.

While men’s sexuality is always showcased as ‘subjective’ (or as a whole package viz. intelligence, smartness, attitude and looks), women’s sexuality is portrayed objectively. And nothing defines this better than the video below
“No Country For Women”
http://www.youtube.com/watch?v=Rt1Rhd_sRhg
—————————————
And that’s why, the question arises,
“Who is running the Bollywood ?”
And tell us one thing, 
if the mafias are putting money in bollywood, 
will it be for Making India or Breaking India ?
—————-
Famous writer Francois Gautier has explained a bit about it.

FDI in Bollywood already ??
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Most of us are blissfully ignorant to the fact that we’re being force fed everyday on high doses of “Sexual Objectification of Women”. Sexual objectification is the concept of treating a person merely as an object or instrument of sexual pleasure, tagging them as ‘sex objects’.

While men’s sexuality is always showcased as ‘subjective’ (or as a whole package viz. intelligence, smartness, attitude and looks), women’s sexuality is portrayed objectively. And nothing defines this better than the video below
“No Country For Women”
http://www.youtube.com/watch?v=Rt1Rhd_sRhg
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And that's why, the question arises,
"Who is running the Bollywood ?"
And tell us one thing, 
if the mafias are putting money in bollywood, 
will it be for Making India or Breaking India ?
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Famous writer Francois Gautier has explained a bit about it.
 
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