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जानिए क्यूँ तोड़ी हमने हत्यारी विक्टोरिया की मूर्ति —आर्य जितेंद्र


जानिए क्यूँ तोड़ी हमने हत्यारी विक्टोरिया की मूर्ति —आर्य जितेंद्र

1. इसी विक्टोरिया ने भारत मे गौ माँ को काटने के कत्ल कारखाने लगवाए थे ।

2. अंग्रेज़ो ने प्रत्यक्ष रूप से 7लाख 80000 क्रांतिकारियों को मौत के घाट निर्ममता से उतार दिया । किसी को तोप से उड़ा दिया किसी को बंदूक से तो किसी को फांसी पर ,बिठुर जैसे गाँव के तो 24000 लोगो को जिनमे एक दिन का बच्चा भी था और 100 वर्ष का बुजुर्ग भी अंग्रेज़ो ने पेड़ से बांध कर जला दिया ।

3. ऐसे अंग्रेज़ो के नाम पर जब हमारा देश गुलाम था तो हमारे देश के गद्दार राजाओ ने और काले अंग्रेज़ो कुछ पार्क ,कुछ महल ,कुछ नगर बनवाए लेकिन भारत तो 68 वर्ष पहले ही आजाद हो गया फिर इन नगरो ,मूर्तियो ,दरवाजो की भारत को क्या जरूरत ये ही हमारे युवा खून मे उबाल लाती है और हमारे शहीदो की शहादत को मुह चिड़ाती है इसलिए हमने बहुत सोच समझकर इस घटना को अंजाम दिया है

4. जिन लोगो ने जालिया वाला भाग मे शान्तिप्रिय तरीके से आंदोलन कर कर रहे 22000 लोगो पर गोलिया चला दी जिसमे 5000 क्रांतिकारी एक ही साथ मर गए ऐसे कुख्यात हत्यारो के नाम पर आज भी इस देश मे कई सड़को के नाम है क्या ये आज भी मानसिक गुलामी आपको नहीं लगती है यदि हाँ तो आइये हमारे इस आंदोलन का हिस्सा बनिए ।

5. आज भी इस देश मे वास्को डी गामा ,डलहोजी ,मेकलोड आदि कई बार्बर अंग्रेज़ो के नाम पर सड़के है इन्हे जड़ से हटाकर इस देश को पुनः भारत बनाना हमारा उद्देश्य है ।

6. आज भी इस देश मे UPSC की परीक्षा मे हिन्दी या भारतीय भाषी छात्र अपने आप को अपमानित महसूस करता है आज भी इस देश मे अंग्रेज़ो को गौरव की भाषा माना जाता है और हिन्दी की बात करने वाले छात्रो पर अंग्रेज़ो की तरह लठिया चलाई जाती है ।

7. आज भी इस देश मे विदेशी कंपनिया भारतवासियों को लूट रही है उन्हे गौ माँ और सूअर की चर्बी का मांस खिला रही है । आज भी लाखो करोड़ रुपये भारत से बहार जा रहे है ।

8. आज भी इस देश का किसान मरा जा रहा है कर्ज तले दबा जा रहा है । क्या भगत सिंह और उनके साथियो ने इस दिन के लिए फांसी के फंदे को चूमा था । क्या इस लिए झाँसी की रानी अपनी राजसत्ता छोड़कर महलो का वैभव छोड़कर बंजारा बनकर युद्ध मैदान मे उतरी थी

9. हमे अपने भारत को बचना है तो फिर से भारत को भारतीयता के आधार पर खड़ा करना ही होगा और तभी हर भारत वासी सुख चैन और गौरव से अपना जीवन व्यपन कर सकेगा ।

10. भारत मे आज जीतने भी अंग्रेज़ अधिकारियों ,राजाओ के नाम की मूर्तिया है ,नगर है ,सड़के है भारत सरकार उन्हे जल्द से जल्द संवैधानिक रूप से हता दे वरना इस देश मे आज भी भगत सिंह ही जन्म लेते है

!!वंदे मातरम !

साभार :- हिन्दुस्तान मेरी जान

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गति के तीन नियमों को किसने लिखा है ?


गति के तीन नियमों को किसने लिखा है ?? �
जानिए और सबको बताइए : http://phys.org/news106238636.html
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हम सभी न्यूटन के गति के नियमों से परिचित हैं | उन्होंने 5 जुलाई 1687 को अपने कार्य “फिलोसोफी नेचुरेलिस प्रिन्सिपिया मेथेमेटिका” में इन नियमों को प्रकाशित किया |

लेकिन …………………….

न्यूटन के, गति के नियमों की खोज से पहले भारतीय वैज्ञानिक और दार्शनिक महर्षि कणाद ने (600 ईसा पूर्व में) “वैशेशिका सूत्र” दिया था जो शक्ति और गति के बीच संबंध का वर्णन करता है |
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Albert Einstein – “We owe a lot to the Indians, who taught us how to count, without which no worthwhile scientific discovery could have been made”

गति के तीन नियमों को किसने लिखा है ?? � 
जानिए और सबको बताइए : http://phys.org/news106238636.html 
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हम सभी न्यूटन के गति के नियमों से परिचित हैं | उन्होंने 5 जुलाई 1687 को अपने कार्य “फिलोसोफी नेचुरेलिस प्रिन्सिपिया मेथेमेटिका” में इन नियमों को प्रकाशित किया |

लेकिन .........................

न्यूटन के, गति के नियमों की खोज से पहले भारतीय वैज्ञानिक और दार्शनिक महर्षि कणाद ने (600 ईसा पूर्व में) “वैशेशिका सूत्र” दिया था जो शक्ति और गति के बीच संबंध का वर्णन करता है |
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Albert Einstein - "We owe a lot to the Indians, who taught us how to count, without which no worthwhile scientific discovery could have been made"
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ओशो


ओशो का वह प्रवचन, जिससे ईसायत तिलमिला उठी थी और अमेरिका की रोनाल्‍ड रीगन सरकार ने उन्‍हें हाथ-पैर में बेडि़यां डालकर गिरफ्तार किया और फिर मरने के लिए थेलियम नामक धीमा जहर दे दिया था। इतना ही नहीं, वहां बसे रजनीशपुरम को तबाह कर दिया गया था और पूरी दुनिया को यह निर्देश भी दे दिया था कि न तो ओशो को कोई देश आश्रय देगा और न ही उनके विमान को ही लैंडिंग की इजाजत दी जाएगी। ओशो से प्रवचनों की वह श्रृंखला आज भी मार्केट से गायब हैं।

पढिए वह चौंकाने वाला सच मित्रगण ॰हरिः ॐ॰
जय महाकाल…!!!

ओशो:
जब भी कोई सत्‍य के लिए प्‍यासा होता है, अनायास ही वह भारत में उत्‍सुक हो उठता है। अचानक पूरब की यात्रा पर निकल पड़ता है। और यह केवल आज की ही बात नहीं है। यह उतनी ही प्राचीन बात है, जितने पुराने प्रमाण और उल्‍लेख मौजूद हैं। आज से 2500 वर्ष पूर्व, सत्‍य की खोज में पाइथागोरस भारत आया था। ईसा मसीह भी भारत आए थे।

ईसामसीह के 13 से 30 वर्ष की उम्र के बीच का बाइबिल में कोई उल्‍लेख नहीं है। और यही उनकी लगभग पूरी जिंदगी थी, क्‍योंकि 33 वर्ष की उम्र में तो उन्‍हें सूली ही चढ़ा दिया गया था। तेरह से 30 तक 17 सालों का हिसाब बाइबिल से गायब है! इतने समय वे कहां रहे? आखिर बाइाबिल में उन सालों को क्‍यों नहीं रिकार्ड किया गया? उन्‍हें जानबूझ कर छोड़ा गया है, कि ईसायत मौलिक धर्म नहीं है, कि ईसा मसीह जो भी कह रहे हैं वे उसे भारत से लाए हैं।

यह बहुत ही विचारणीय बात है। वे एक यहूदी की तरह जन्‍मे, यहूदी की ही तरह जिए और यहूदी की ही तरह मरे। स्‍मरण रहे कि वे ईसाई नहीं थे, उन्‍होंने तो-ईसा और ईसाई, ये शब्‍द भी नहीं सुने थे। फिर क्‍यों यहूदी उनके इतने खिलाफ थे? यह सोचने जैसी बात है, आखिर क्‍यों ? न तो ईसाईयों के पास इस सवाल का ठीक-ठाक जवाबा है और न ही यहूदियों के पास। क्‍योंकि इस व्‍यक्ति ने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। ईसा उतने ही निर्दोष थे जितनी कि कल्‍पना की जा सकती है।

पर उनका अपराध बहुत सूक्ष्‍म था। पढ़े-लिखे यहूदियों और चतुर रबाईयों ने स्‍पष्‍ट देख लिया था कि वे पूरब से विचार ले रहे हैं, जो कि गैर यहूदी हैं। वे कुछ अजीबोगरीब और विजातीय बातें ले रहे हैं। और यदि इस दृष्टिकोण से देखो तो तुम्‍हें समझ आएगा कि क्‍यों वे बारा-बार कहते हैं- ” अतीत के पैगंबरों ने तुमसे कहा था कि यदि कोई तुम पर क्रोध करे, हिंसा करे तो आंख के बदले में आंख लेने और ईंट का जवाब पत्‍थर से देने को तैयार रहना। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं कि अगर कोई तुम्‍हें चोट पहुंचाता है, एक गाल पर चांटा मारता है तो उसे अपना दूसरा गाल भी दिखा देना।” यह पूर्णत: गैर यहूदी बात है। उन्‍होंने ये बातें गौतम बुद्ध और महावीर की देशनाओं से सीखी थीं।

ईसा जब भारत आए थे-तब बौद्ध धर्म बहुत जीवंत था, यद्यपि बुद्ध की मृत्‍यु हो चुकी थी। गौतम बुद्ध के पांच सौ साल बाद जीसस यहां आए थे। पर बुद्ध ने इतना विराट आंदोलन, इतना बड़ा तूफान खड़ा किया था कि तब तक भी पूरा मुल्‍क उसमें डूबा हुआ था। बुद्ध की करुणा, क्षमा और प्रेम के उपदेशों को भारत पिए हुआ था।

जीसस कहते हैं कि ” अतीत के पैगंबरों द्वारा यह कहा गया था।” कौन हैं ये पुराने पैगंबर?” वे सभी प्राचीन यहूदी पैगंबर हैं: इजेकिएल, इलिजाह, मोसेस,- ” कि ईश्‍वर बहुत ही हिंसक है और वह कभी क्षमा नहीं करता है!? ” यहां तक कि प्राचीन यहूदी पैगंबरों ने ईश्‍वर के मुंह से ये शब्‍द भी कहलवा दिए हैं कि ” मैं कोई सज्‍जन पुरुष नहीं हूं, तुम्‍हारा चाचा नहीं हूं। मैं बहुत क्रोधी और ईर्ष्‍यालु हूं, और याद रहे जो भी मेरे साथ नहीं है, वे सब मेरे शत्रु हैं।” पुराने टेस्‍टामेंट में ईश्‍वर के ये वचन हैं।

और ईसा मसीह कहते हैं, ” मैं तुमसे कहता हूं कि परमात्‍मा प्रेम है।” यह ख्‍याल उन्‍हें कहां से आया कि परमात्‍मा प्रेम है? गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के सिवाए दुनिया में कहीं भी परमात्‍मा को प्रेम कहने का कोई और उल्‍लेख नहीं है।

उन 17 वर्षों में जीसस इजिप्‍त, भारत, लद्दाख और तिब्‍बत की यात्रा करते रहे। यही उनका अपराध था कि वे यहूदी परंपरा में बिल्‍कुल अपरिचित और अजनबी विचारधाराएं ला रहे थे। न केवल अपरिचित बल्कि वे बातें यहूदी धारणाओं के एकदम से विपरीत थीं।

तुम्‍हें जानकर आश्‍चर्य होगा कि अंतत: उनकी मृत्‍यु भी भारत में हुई! और ईसाई रिकार्ड्स इस तथ्‍य को नजरअंदाज करते रहे हैं। यदि उनकी बात सच है कि जीसस पुनर्जीवित हुए थे तो फिर पुनर्जीवित होने के बाद उनका क्‍या हुआ? आजकल वे कहां हैं ? क्‍योंकि उनकी मृत्‍यु का तो कोई उल्‍लेख है ही नहीं !

सच्‍चाई यह है कि वे कभी पुनर्जीवित नहीं हुए। वास्‍तव में वे सूली पर कभी मरे ही नहीं थे। क्‍योंकि यहूदियों की सूली आदमी को मारने की सर्वाधिक बेहूदी तरकीब है। उसमें आदमी को मरने में करीब-करीब 48 घंटे लग जाते हैं। चूंकि हाथों में और पैरों में कीलें ठोंक दी जाती हैं तो बूंद-बूंद करके उनसे खून टपकता रहता है। यदि आदमी स्‍वस्‍थ है तो 60 घंटे से भी ज्‍यादा लोग जीवित रहे, ऐसे उल्‍लेख हैं। औसत 48 घंटे तो लग ही जाते हैं। और जीसस को तो सिर्फ छह घंटे बाद ही सूली से उतार दिया गया था। यहूदी सूली पर कोई भी छह घंटे में कभी नहीं मरा है, कोई मर ही नहीं सकता है।

यह एक मिलीभगत थी, जीसस के शिष्‍यों की पोंटियस पॉयलट के साथ। पोंटियस यहूदी नहीं था, वो रोमन वायसराय था। जूडिया उन दिनों रोमन साम्राज्‍य के अधीन था। निर्दोष जीसस की हत्‍या में रोमन वायसराय पोंटियस को कोई रुचि नहीं थी। पोंटियस के दस्‍तखत के बगैर यह हत्‍या नहीं हो सकती थी।पोंटियस को अपराध भाव अनुभव हो रहा था कि वह इस भद्दे और क्रूर नाटक में भाग ले रहा है। चूंकि पूरी यहूदी भीड़ पीछे पड़ी थी कि जीसस को सूली लगनी चाहिए। जीसस वहां एक मुद्दा बन चुका था। पोंटियस पॉयलट दुविधा में था। यदि वह जीसस को छोड़ देता है तो वह पूरी जूडिया को, जो कि यहूदी है, अपना दुश्‍मन बना लेता है। यह कूटनीतिक नहीं होगा। और यदि वह जीसस को सूली दे देता है तो उसे सारे देश का समर्थन तो मिल जाएगा, मगर उसके स्‍वयं के अंत:करण में एक घाव छूट जाएगा कि राजनैतिक परिस्थिति के कारण एक निरपराध व्‍यक्ति की हत्‍या की गई, जिसने कुछ भी गलत नहीं किया था।

तो पोंटियस ने जीसस के शिष्‍यों के साथ मिलकर यह व्‍यवस्‍था की कि शुक्रवार को जितनी संभव हो सके उतनी देर से सूली दी जाए। चूंकि सूर्यास्‍त होते ही शुक्रवार की शाम को यहूदी सब प्रकार का कामधाम बंद कर देते हैं, फिर शनिवार को कुछ भी काम नहीं होता, वह उनका पवित्र दिन है। यद्यपि सूली दी जानी थी शुक्रवार की सुबह, पर उसे स्‍थगित किया जाता रहा। ब्‍यूरोक्रेसी तो किसी भी कार्य में देर लगा सकती है। अत: जीसस को दोपहर के बाद सूली पर चढ़ाया गया और सूर्यास्‍त के पहले ही उन्‍हें जीवित उतार लिया गया। यद्यपि वे बेहोश थे, क्‍योंकि शरीर से रक्‍तस्राव हुआ था और कमजोरी आ गई थी। पवित्र दिन यानि शनिवार के बाद रविवार को यहूदी उन्‍हें पुन: सूली पर चढ़ाने वाले थे। जीसस के देह को जिस गुफा में रखा गया था, वहां का चौकीदार रोमन था न कि यहूदी। इसलिए यह संभव हो सका कि जीसस के शिष्‍यगण उन्‍हें बाहर आसानी से निकाल लाए और फिर जूडिया से बाहर ले गए।

जीसस ने भारत में आना क्‍यों पसंद किया? क्‍योंकि युवावास्‍था में भी वे वर्षों तक भारत में रह चुके थे। उन्‍होंने अध्‍यात्‍म और ब्रह्म का परम स्‍वाद इतनी निकटता से चखा था कि वहीं दोबारा लौटना चाहा। तो जैसे ही वह स्‍वस्‍थ हुए, भारत आए और फिर 112 साल की उम्र तक जिए।

कश्‍मीर में अभी भी उनकी कब्र है। उस पर जो लिखा है, वह हिब्रू भाषा में है। स्‍मरण रहे, भारत में कोई यहूदी नहीं रहते हैं। उस शिलालेख पर खुदा है, ” जोशुआ”- यह हिब्रू भाषा में ईसामसीह का नाम है। ‘जीसस’ ‘जोशुआ’ का ग्रीक रुपांतरण है। ‘जोशुआ’ यहां आए’- समय, तारीख वगैरह सब दी है। ‘ एक महान सदगुरू, जो स्‍वयं को भेड़ों का गड़रिया पुकारते थे, अपने शिष्‍यों के साथ शांतिपूर्वक 112 साल की दीर्घायु तक यहांरहे।’ इसी वजह से वह स्‍थान ‘भेड़ों के चरवाहे का गांव’ कहलाने लगा। तुम वहां जा सकते हो, वह शहर अभी भी है-‘पहलगाम’, उसका काश्‍मीरी में वही अर्थ है-‘ गड़रिए का गांवा’

जीसस यहां रहना चाहते थे ताकि और अधिक आत्मिक विकास कर सकें। एक छोटे से शिष्‍य समूह के साथ वे रहना चाहते थे ताकि वे सभी शांति में, मौन में डूबकर आध्‍यात्मिक प्रगति कर सकें। और उन्‍होंने मरना भी यहीं चाहा, क्‍योंकि यदि तुम जीने की कला जानते हो तो यहां (भारत में)जीवन एक सौंदर्य है और यदि तुम मरने की कला जानते हो तो यहां (भारत में)मरना भी अत्‍यंत अर्थपूर्ण है। केवल भारत में ही मृत्‍यु की कला खोजी गई है, ठीक वैसे ही जैसे जीने की कला खोजी गई है। वस्‍तुत: तो वे एक ही प्रक्रिया के दो अंग हैं।

यहूदियों के पैगंबर मूसा ने भी भारत में ही देह त्‍यागी थी!
इससे भी अधिक आश्‍चर्यजनक तथ्‍य यह है कि मूसा (मोजिज) ने भी भारत में ही आकर देह त्‍यागी थी! उनकी और जीसस की समाधियां एक ही स्‍थान में बनी हैं। शायद जीसस ने ही महान सदगुरू मूसा के बगल वाला स्‍थान स्‍वयं के लिए चुना होगा। पर मूसा ने क्‍यों कश्‍मीर में आकर मृत्‍यु में प्रवेश किया?

मूसा ईश्‍वर के देश ‘इजराइल’ की खोज में यहूदियों को इजिप्‍त के बाहर ले गए थे। उन्‍हें 40 वर्ष लगे, जब इजराइल पहुंचकर उन्‍होंने घोषणा की कि, ” यही वह जमीन है, परमात्‍मा की जमीन, जिसका वादा किया गया था। और मैं अब वृद्ध हो गया हूं और अवकाश लेना चाहता हूं। हे नई पीढ़ी वालों, अब तुम सम्‍हालो!”

मूसा ने जब इजिप्‍त से यात्रा प्रारंभ की थी तब की पीढ़ी लगभग समाप्‍त हो चुकी थी। बूढ़े मरते गए, जवान बूढ़े हो गए और नए बच्‍चे पैदा होते रहे। जिस मूल समूह ने मूसा के साथ यात्रा की शुरुआत की थी, वह बचा ही नहीं था। मूसा करीब-करीब एक अजनबी की भांति अनुभव कर रहे थेा उन्‍होंने युवा लोगों शासन और व्‍यवस्‍था का कार्यभारा सौंपा और इजराइल से विदा हो लिए।
यह अजीब बात है कि यहूदी धर्मशास्‍त्रों में भी, उनकी मृत्‍यु के संबंध में , उनका क्‍या हुआ इस बारे में कोई उल्‍लेख नहीं है। हमारे यहां (कश्‍मीर में ) उनकी कब्र है। उस समाधि पर भी जो शिलालेख है, वह हिब्रू भाषा में ही है। और पिछले चार हजार सालों से एक यहूदी परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन दोनों समाधियों की देखभाल कर रहा है।

मूसा भारत क्‍यों आना चाहते थे ? केवल मृत्‍यु के लिए ? हां, कई रहस्‍यों में से एक रहस्‍य यह भी है कि यदि तुम्‍हारी मृत्‍यु एक बुद्धक्षेत्र में हो सके, जहां केवल मानवीय ही नहीं, वरन भगवत्‍ता की ऊर्जा तरंगें हों, तो तुम्‍हारी मृत्‍यु भी एक उत्‍सव और निर्वाण बन जाती है।

सदियों से सारी दुनिया के साधक इस धरती पर आते रहे हैं। यह देश दरिद्र है, उसके पास भेंट देने को कुछ भी नहीं, पर जो संवेदनशील हैं, उनके लिए इससे अधिक समृद्ध कौम इस पृथ्‍वी पर कहीं नहीं हैं। लेकिन वह समृद्धि आंतरिक है।

ओशो
पुस्‍तक: मेरा स्‍वर्णिम भारत

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तात्या टोपे पर ‘अनोखा’ इतिहास पढ़ा रही है सरकार


^ तात्या टोपे पर ‘अनोखा’ इतिहास पढ़ा रही है सरकार

सन 1857 की क्रांति के नायक रहे तात्या टोपे को शिवपुरी की 12वीं की सामाजिक विज्ञान की किताब में शहीद के बजाय संन्यासी बताया गया है।
इस मामले में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रेमनारायण नागर ने कहा कि गलती नहीं सुधरने से कक्षा 12वीं के छात्र गलत इतिहास पढ़ रहे हैं।
प्रदेश सरकार का राज्य शिक्षा केंद्र तात्या टोपे को संन्यासी बता रहा है, जबकि स्वराज संचालनालय व संस्कृति विभाग उन्हें शहीद बताते हुए उनकी याद में शिवपुरी में हर साल मेला लगवाता है।

दसवीं की किताब में शहीद

कक्षा 10वीं की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक के अध्याय सात में पृष्ठ क्रमांक 110 पर लिखा है कि शिवपुरी में 18 अप्रैल 1859 को तात्या टोपे को फांसी दी गई।

बारहवीं की किताब में संन्यासी

कक्षा 12 वीं की हिन्दी विशिष्ट के गद्य खंड के पाठ 6 में पृष्ठ क्रमांक 64 में लिखा है कि अग्रेजों ने तात्याटोपे की जगह किसी अन्य को फांसी दी थी। इसके बाद तात्या संन्यासी हो गए थे। पुस्तक के लेखक डॉ. सुरेश चंद्र शुक्ल हैं।
सुधार के लिए दिया था ज्ञापन

12वीं की किताब में गलत जानकारी प्रकाशित होने के बाद 29 मई 2013 को शहर के बुद्धिजीवियों ने राज्य सरकार के नाम एक ज्ञापन एडीएम को सौंपा था। ज्ञापन में गलतियों को सुधारने की मांग की गई थी। मगर तथ्यों में सुधार नहीं हुआ।
शिवपुरी में तात्या टोपे को फांसी देते वक्त कई लोगों ने देखा था। कुछ लेखक ऐसे भी हैं, जो घर बैठकर किताबें लिख रहे हैं। इन लेखकों को इतिहास की कोई जानकारी नहीं रहती।

– प्रेमनारायण नागर, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, शिवपुरी
तात्या टोपे के संबंध में 10वीं और 12वीं की किताबों में छपी जानकारी को लेखन समिति के सदस्यों के सामने रखा जाएगा। तथ्यों का क्रॉस चेक कराया जाएगा। तथ्य गलत होंगे तो सुधारेंगे।
– गोविंद प्रसाद शर्मा, अध्यक्ष, पाठ्य पुस्तक लेखन समिति, मप्र

स्त्रोत : अमर उजाला
++++++
“जन-जागरण लाना है तो पोस्ट को Share करना है।”

Ojasvi Hindustan पेज के साथ जुड़े। जानीये हमसे जुड़ने का तरीका ।

लिंक :- http://goo.gl/G0ZZIu
++++++ — with आर्यवीर मेहुल रावल.

Photo: ^ तात्या टोपे पर 'अनोखा' इतिहास पढ़ा रही है सरकार

सन 1857 की क्रांति के नायक रहे तात्या टोपे को शिवपुरी की 12वीं की सामाजिक विज्ञान की किताब में शहीद के बजाय संन्यासी बताया गया है।
इस मामले में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रेमनारायण नागर ने कहा कि गलती नहीं सुधरने से कक्षा 12वीं के छात्र गलत इतिहास पढ़ रहे हैं।
प्रदेश सरकार का राज्य शिक्षा केंद्र तात्या टोपे को संन्यासी बता रहा है, जबकि स्वराज संचालनालय व संस्कृति विभाग उन्हें शहीद बताते हुए उनकी याद में शिवपुरी में हर साल मेला लगवाता है।

दसवीं की किताब में शहीद

कक्षा 10वीं की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक के अध्याय सात में पृष्ठ क्रमांक 110 पर लिखा है कि शिवपुरी में 18 अप्रैल 1859 को तात्या टोपे को फांसी दी गई।

बारहवीं की किताब में संन्यासी

कक्षा 12 वीं की हिन्दी विशिष्ट के गद्य खंड के पाठ 6 में पृष्ठ क्रमांक 64 में लिखा है कि अग्रेजों ने तात्याटोपे की जगह किसी अन्य को फांसी दी थी। इसके बाद तात्या संन्यासी हो गए थे। पुस्तक के लेखक डॉ. सुरेश चंद्र शुक्ल हैं।
सुधार के लिए दिया था ज्ञापन

12वीं की किताब में गलत जानकारी प्रकाशित होने के बाद 29 मई 2013 को शहर के बुद्धिजीवियों ने राज्य सरकार के नाम एक ज्ञापन एडीएम को सौंपा था। ज्ञापन में गलतियों को सुधारने की मांग की गई थी। मगर तथ्यों में सुधार नहीं हुआ।
शिवपुरी में तात्या टोपे को फांसी देते वक्त कई लोगों ने देखा था। कुछ लेखक ऐसे भी हैं, जो घर बैठकर किताबें लिख रहे हैं। इन लेखकों को इतिहास की कोई जानकारी नहीं रहती।

- प्रेमनारायण नागर, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, शिवपुरी
तात्या टोपे के संबंध में 10वीं और 12वीं की किताबों में छपी जानकारी को लेखन समिति के सदस्यों के सामने रखा जाएगा। तथ्यों का क्रॉस चेक कराया जाएगा। तथ्य गलत होंगे तो सुधारेंगे।
- गोविंद प्रसाद शर्मा, अध्यक्ष, पाठ्य पुस्तक लेखन समिति, मप्र

स्त्रोत : अमर उजाला
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भगतसिंह


Ojasvi Hindustan

^ शहीदे आजम भगतसिंह को फांसी दिए जाने
पर अहिंसा के महान पुजारी गांधी ने
कहा था, ‘‘हमें ब्रिटेन के विनाश के बदले
अपनी आजादी नहीं चाहिए ।’’ और आगे
कहा, ‘‘भगतसिंह की पूजा से देश को बहुत
हानि हुई और हो रही है ।
वहीं इसका परिणाम गुंडागर्दी का पतन
है । फांसी शीघ्र दे दी जाए ताकि 30
मार्च से करांची में होने वाले कांग्रेस
अधिवेशन में कोई बाधा न आवे ।”
अर्थात् गांधी की परिभाषा में
किसी को फांसी देना हिंसा नहीं थी ।
इसी प्रकार एक ओर महान्
क्रान्तिकारी जतिनदास
को जो आगरा में अंग्रेजों ने शहीद
किया तो गांधी आगरा में ही थे और जब
गांधी को उनके पार्थिक शरीर पर
माला चढ़ाने को कहा गया तो उन्होंने
साफ इनकार कर दिया अर्थात् उस
नौजवान द्वारा खुद को देश के लिए
कुर्बान करने पर भी गांधी के दिल में
किसी प्रकार की दया और
सहानुभूति नहीं उपजी, ऐसे थे हमारे
अहिंसावादी गांधी । जब सन् 1937 में
कांग्रेस अध्यक्ष के लिए नेताजी सुभाष और
गांधी द्वारा मनोनीत
सीताभिरमैया के मध्य मुकाबला हुआ
तो गांधी ने कहा यदि रमैया चुनाव
हार गया तो वे राजनीति छोड़ देंगे
लेकिन उन्होंने अपने मरने तक
राजनीति नहीं छोड़ी जबकि रमैया चुनाव
हार गए थे।
इसी प्रकार गांधी ने कहा था,
“पाकिस्तान उनकी लाश पर बनेगा”
लेकिन पाकिस्तान उनके समर्थन से
ही बना । ऐसे थे हमारे
सत्यवादी गांधी । इससे भी बढ़कर
गांधी और कांग्रेस ने दूसरे विश्वयुद्ध में
अंग्रेजों का समर्थन किया तो फिर
क्या लड़ाई में हिंसा थी या लड्डू बंट रहे
थे ? पाठक स्वयं बतलाएं ? गांधी ने अपने
जीवन में तीन आन्दोलन (सत्याग्रहद्) चलाए
और तीनों को ही बीच में वापिस ले
लिया गया फिर भी लोग कहते हैं
कि आजादी गांधी ने दिलवाई ।इससे
भी बढ़कर जब देश के महान सपूत उधमसिंह ने
इंग्लैण्ड में माईकल डायर
को मारा तो गांधी ने उन्हें पागल
कहा इसलिए नीरद चौ० ने
गांधी को दुनियां का सबसे बड़ा सफल
पाखण्डी लिखा है । इस आजादी के बारे
में इतिहासकार सी. आर. मजूमदार लिखते
हैं – “भारत
की आजादी का सेहरा गांधी के सिर
बांधना सच्चाई से मजाक होगा । यह
कहना उसने सत्याग्रह व चरखे से
आजादी दिलाई बहुत
बड़ी मूर्खता होगी । इसलिए
गांधी को आजादी का ‘हीरो’
कहना उन सभी क्रान्तिकारियों
का अपमान है जिन्होंने देश की आजादी के
लिए अपना खून बहाया ।”
यदि चरखों की आजादी की रक्षा सम्भव
होती है तो बार्डर पर टैंकों की जगह चरखे
क्यों नहीं रखवा दिए जाते ………..??

++++++

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Delhi’s last Hindu King Hemachandra Vikramaditya’s


Delhi’s last Hindu King Hemachandra Vikramaditya’s 80 year old father chooses death over Islam.

http://persian.packhum.org/persian/pf?file=80201016&ct=15

Delhi's last Hindu King Hemachandra Vikramaditya's 80 year old father chooses death over Islam.

http://persian.packhum.org/persian/pf?file=80201016&ct=15
Posted in P N Oak, Rajiv Dixit

‎Rajiv Dixit


नहीँ होगा कि कुछ साल बाद नाथू तो दूर राम
के नाम के अस्तित्तव पर ही सवाल ऊठ जाएगा!
3. महाराणा प्रताप भूल गये थे कि उनके
ही वंशज उनका भाला लेकर नहीँ,
मलेक्षोँ का साला बनकर जीना पसंद करेँगे!
4. साध्वि प्रज्ञा ठाकुर को ये
कहाँ पता था कि ये 90 करोङ उसके भाई
ही उसकी जग हंसाई पर उतारू हो जाएँगे!
5. भगतसिँह और चंद्रशेखर आजाद क्या जानते थे
कि उनकी Pistol की गोली से ज्यादा प्रभाव
सनी लियोन की चोली का होगा!
6. चंद्रगुप्त महान ये कहाँ जानते थे
कि असली सम्मान हिँदुस्तान मेँ शाहरुख और
आमिर जैसे खानोँ को मिलेगा!
7. श्री कृष्ण और देवादीदेव महादेव भूल गये थे
कि कल के भगवान सचिन ही बन जाएँगे!
अब बोलो क्या ये ही हिँदुओँ की पहचान है ???
क्या ये ही भारत का सम्मान है ??
क्या इसे ही कहते हिँदुस्तान हैँ ???
या भगवा अब भी किसी का गुलाम है ??
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इस महान देश में आपको बेवकूफी के कुछ ऐसे उदहारण


मित्रों,
भारत को महान देश कहा जाता है लेकिन इस महान देश में आपको बेवकूफी के कुछ ऐसे उदहारण देखने को मिलेंगे जो दुनिया के किसी देश में नहीं हैं...क्या कभी सुना है की किसी देश के लोग उन लोगों को सम्मान के साथ पुकारते हों जिन्होंने उनपर आक्रमण किया,उनकी बहु बेटियों का निर्ममता से बलात्कार किया और जबरन उनके पूर्वजों का धर्म परिवर्तन कराया..नहीं न लेकिन भारत में तो ये आम बात है
जी हाँ हम मुग़ल शासकों की ही बात कर रहे हैं
कौन थे मुग़ल??क्या किया था उन्होंने भारतवासियों के साथ??क्या वे सम्मान के लायक हैं??
दोस्तों इस से बड़ी बेशर्मी की बात नहीं हो सकती हमारे लिए की हम उन लोगों को सम्मान का दर्जा दें जिन्होंने न सिर्फ भारत की संस्कृति को नष्ट किया बल्कि असहनीय यातनाएं देकर हमारे पूर्वजों का जबरन धर्म परिवर्तन करवाया...
आखिर क्या कारण है की हमारे हिन्दू भाई इन मुग़लों को इतनी इज्ज़त देते हैं??इसमें सबसे मुख्य कारण है हमारे इतहास को तोड़ मरोड़ कर हमारे सामने पेश किया जाना.९९% हिन्दू ये समझते हैं की मुग़ल भी हमारे महान क्रांतिकारियों में से ही एक हैं लेकिन ये उन महान क्रांतिकारियों का अपमान है जो हम उनकी तुलना इन नीच अधर्मियों के साथ करें...जहां एक तरफ हमारे शूरवीरों ने अपने बलिदान से हमें इन क्रूर शासकों से आज़ादी दिलाई वहीँ इन मुगलों ने बाहर से आकर हमारे धर्म,हमारे मंदिर हमारी संस्कृति को इतना नुक्सान पहुंचाया की उसका परिणाम हम आज भी झेल रहे हैं.
दूसरा मुख्य कारण है हमारे देश की फिल्म इंडस्ट्री जिन्होंने "मुग़ल ऐ आज़म" और "टीपू सुलतान" नाम की फिल्मे बना कर बची खुची संस्कृति को भी नष्ट कर दिया...इन फिल्मों में उन्हें शूरवीर बताया गया जबकि सत्य इसके बिलकुल विपरीत है.
आज हालात ऐसे हैं की अगर किसीको सही इतहास पढ़ाने जाओ तो कहता है नहीं नहीं ये सब गलत है जो फिल्म में है वही सत्य है...इस कदर हमारे भोले भाले भारतवासियों के दिमाग इस जहर को भर दिया गया है...
मेरी आपसे केवल यही विनंती है की अगर आपके दिलों थोडा सा भी सम्मान महाराज शिवाजी और रानी लक्ष्मीबाई जैसे हमारे महान पूर्वजों के लिए बचा है तो आज से प्रतिज्ञा लें की इस जूठे इतहास को अब नहीं मानेगे..और न ही औरों को मानने देंगे..
बाबर,अकबर और टीपू सुल्तान की असलियत को जानने के लिए इस लिंक पर जाएँ,एक बार इसे पढ़ लेने के बाद आपके सभी सवालों के जवाब मिल जायेंगे..
http://agniveer.com/babri-masjid-hi/

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मित्रों,
भारत को महान देश कहा जाता है लेकिन इस महान देश में आपको बेवकूफी के कुछ ऐसे उदहारण देखने को मिलेंगे जो दुनिया के किसी देश में नहीं हैं…क्या कभी सुना है की किसी देश के लोग उन लोगों को सम्मान के साथ पुकारते हों जिन्होंने उनपर आक्रमण किया,उनकी बहु बेटियों का निर्ममता से बलात्कार किया और जबरन उनके पूर्वजों का धर्म परिवर्तन कराया..नहीं न लेकिन भारत में तो ये आम बात है
जी हाँ हम मुग़ल शासकों की ही बात कर रहे हैं
कौन थे मुग़ल??क्या किया था उन्होंने भारतवासियों के साथ??क्या वे सम्मान के लायक हैं??
दोस्तों इस से बड़ी बेशर्मी की बात नहीं हो सकती हमारे लिए की हम उन लोगों को सम्मान का दर्जा दें जिन्होंने न सिर्फ भारत की संस्कृति को नष्ट किया बल्कि असहनीय यातनाएं देकर हमारे पूर्वजों का जबरन धर्म परिवर्तन करवाया…
आखिर क्या कारण है की हमारे हिन्दू भाई इन मुग़लों को इतनी इज्ज़त देते हैं??इसमें सबसे मुख्य कारण है हमारे इतहास को तोड़ मरोड़ कर हमारे सामने पेश किया जाना.९९% हिन्दू ये समझते हैं की मुग़ल भी हमारे महान क्रांतिकारियों में से ही एक हैं लेकिन ये उन महान क्रांतिकारियों का अपमान है जो हम उनकी तुलना इन नीच अधर्मियों के साथ करें…जहां एक तरफ हमारे शूरवीरों ने अपने बलिदान से हमें इन क्रूर शासकों से आज़ादी दिलाई वहीँ इन मुगलों ने बाहर से आकर हमारे धर्म,हमारे मंदिर हमारी संस्कृति को इतना नुक्सान पहुंचाया की उसका परिणाम हम आज भी झेल रहे हैं.
दूसरा मुख्य कारण है हमारे देश की फिल्म इंडस्ट्री जिन्होंने “मुग़ल ऐ आज़म” और “टीपू सुलतान” नाम की फिल्मे बना कर बची खुची संस्कृति को भी नष्ट कर दिया…इन फिल्मों में उन्हें शूरवीर बताया गया जबकि सत्य इसके बिलकुल विपरीत है.
आज हालात ऐसे हैं की अगर किसीको सही इतहास पढ़ाने जाओ तो कहता है नहीं नहीं ये सब गलत है जो फिल्म में है वही सत्य है…इस कदर हमारे भोले भाले भारतवासियों के दिमाग इस जहर को भर दिया गया है…
मेरी आपसे केवल यही विनंती है की अगर आपके दिलों थोडा सा भी सम्मान महाराज शिवाजी और रानी लक्ष्मीबाई जैसे हमारे महान पूर्वजों के लिए बचा है तो आज से प्रतिज्ञा लें की इस जूठे इतहास को अब नहीं मानेगे..और न ही औरों को मानने देंगे..
बाबर,अकबर और टीपू सुल्तान की असलियत को जानने के लिए इस लिंक पर जाएँ,एक बार इसे पढ़ लेने के बाद आपके सभी सवालों के जवाब मिल जायेंगे..
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बाबरी मस्जिद का सच


बाबरी मस्जिद का सच

हमने इतिहास में लिखे हिन्दू मुस्लिम एकता के
प्रतीकों पर एक दृष्टि डाली. सदैव
कहा जाता रहा कि सदियों से हिन्दू मुसलमान इस देश भारत में
साथ साथ रहते आये हैं,
हमारी संस्कृति गंगा जमुनी है,
हमारा प्यार मुहब्बत का रिश्ता है, इंसानियत का रिश्ता है….
मिसाल के तौर पर इस्लाम के
सूफी ख्वाजा मोईनुद्दीन
चिश्ती हर हिन्दू मुसलमान के दिल में बसे हैं.
उनकी कब्र पर जहां मुसलमान सर झुकाते हैं
तो भाईचारे की भावना से विवश हिन्दू
भी सर झुकाते हैं.
फिर, अजीमोशान शहंशाह अकबर जो हर दिल
अजीज हैं, जिन्होंने भारत के राजाओं और प्रजाओं
को काट काटकर एक छत्र में खड़ा कर दिया . जिन्होंने धर्म के
बन्धनों को तोड़कर छत्तीसों हिन्दू राजपूत कन्याओं
को अपने हरम में डालकर अपने सबसे करीब आने
का सुनहरा अवसर दिया . क्या इससे बढ़कर हिन्दू मुस्लिम
एकता का प्रतीक कुछ हो सकता है? ये और बात
है कि कभी इन शौक़ीन सुल्तानों ने
अपने हरम से उत्पन्न हुई
किसी स्त्री को किसी हिन्दू
को नहीं ब्याहने दिया.
फिर, टीपू सुलतान ने
अपनी मातृभूमि भारत के लिए अंग्रेजों से लड़ाई
की और शहीद हो गए.
अतः मोईनुद्दीन चिश्ती, अकबर, और
टीपू सुलतान जैसे व्यक्ति ही वास्तव
में हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक हैं, ऐसा हमारे
इतिहास को पढने से प्रतीत होता है.
यह बात अलग है कि कुछ सिरफिरे ऐसे एकता के
प्रतीकों पर यह कह कर प्रश्न खडा कर देते
हैं कि मोईनुद्दीन चिश्ती तो एक गद्दार
घुसपैठिया था जिसने मुहम्मद गौरी को भारत के
हिन्दू राजा पृथ्वीराज चौहान पर हमला करने के
लिए उकसाया था और सहायता दी थी. वे
कहते हैं कि अकबर ने जब चित्तौड़ विजय के समय
तीस हज़ार निर्दोष लोगों के कत्ले आम के आदेश
दिए (और उतनी स्त्रियों को या जल मरने के लिए
या अपने सैनिको कि हवस पूर्ती के लिए छोड़ दिया),
और उनके सिरों को काटकर उनसे मीनार
बनवायीं तो फिर वह एकता का प्रतीक
कैसे हुआ? जब टीपू सुलतान ने हजारों हिन्दुओं
को जबरन मुसलमान बनाया और हजारों को क़त्ल किया क्योंकि वे
मुसलमान न बने तो फिर वह एकता का प्रतीक
कैसे? वे कहते हैं कि टीपू भारत के लिए
नहीं बल्कि अपनी हुकूमत के लिए
अंग्रेजों से लड़ रहा था.
सदियों से साथ साथ रहने की बात पर जब ये सिरफिरे
सवाल उठाते हैं कि एक समय इस देश
की सीमाएं पश्चिम में ईरान को तो पूर्व में
बर्मा को छूती थीं, और उत्तर में
कश्मीर भी इसी भारत
भूमि का अंश था तो फिर ऐसा कैसे हुआ कि सदियों से साथ साथ
रहने वाले भाइयों ने हमारी भारत माता को पांच
टुकड़ों (अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, कश्मीर,
बंगलादेश) में तोड़ डाला जिनमें से चार में आज साथ रहने वाले
हिन्दू दीखते ही नहीं,
तो इस पर सब इतिहासकार और सेकुलरवादी बिफर
पड़ते हैं. हम भी इन सिरफिरों से बिलकुल संतुष्ट
नहीं!
अरे! क्या हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए कुछ हिन्दू सिर्फ अपने
सिर, अपनी स्त्रियाँ, अपना धर्म और
अपनी जमीन
भी नहीं दे सकते? क्या हिन्दुओं
का यह कर्त्तव्य नहीं था कि दुनिया भर में
इस्लामी परोपकार और
कल्याणकारी भावना से ओतप्रोत घूम रहे मुगलों,
अरबों, तुर्कों आदि को कुछ सिर, बहनें, बेटियां और धर्म अर्पण
कर उनके परोपकार का मोल चुकाते? जो मुग़ल आदि सदा अपने
मुल्क छोड़कर पराये मुल्क भारत को एक करने के महान
उद्देश्य से यहाँ संघर्ष करते रहे, वे इतना तो अधिकार रखते
ही थे कि उन्हें पारितोषिक के रूप में धन, स्त्रियाँ,
राज्य, धर्म और इन सबसे बढ़कर
“एकता का प्रतीक” सम्मान मिले. अरे लानत है ऐसे
स्वाभिमानी हिन्दुओं पर जो सांप्रदायिक सद्भाव के
लिए इतना भी नहीं कर सकते! इस
देश के अधिकाँश इतिहासकारों के लिए यह हर्ष का विषय
होना चाहिए कि ऐसा ही हुआ | भले
ही कुछ सिरफिरे आज इसका विरोध करते रहें
जैसा कि महान मुगलों के समय क्षुद्र महाराणा प्रताप और
शिवाजी ने किया था और यहाँ अग्निवीर
कर रहा है. पर कौन पूछता है इनको? दिल्ली में
ही अकबर, बाबर, हुमायूं, औरंगजेब,
लोदी, आदि के नाम पर सड़कों और स्थानों के नाम रखे
गए हैं ताकि एकता के धरोहर इन नामों का सम्मान हो सके!
खैर छोड़ें इन व्यर्थ बातों को.
आज हम जिस विषय पर लिखने जा रहे हैं, वह
सेकुलरवादियों और एकपक्षीय एकता चाहने
वालों को शायद अच्छा न लगे. आज से अट्ठारह वर्ष पहले ६
दिसंबर सन १९९२ को इस देश के एक और “एकता के
प्रतीक” मुगलों में से एक बाबर के नाम पर
बनाया गया एक ढांचा तोड़ डाला गया. इसका इतिहास कुछ ऐसा है
कि अयोध्या में बहुत पुराना राम मंदिर हुआ करता था जिस के बारे
में करोड़ों हिन्दुओं का यह विश्वास है कि श्रीराम
उसी स्थान पर जन्मे थे. इसे कुफ्र
की निशानी मानकर बाबर के जिहादियों ने
बलपूर्वक तोड़ डाला क्योंकि मूर्तिपूजा इस्लाम में वर्जित है और
इसलिए वहां बाबर के नाम की मस्जिद
बना दी. राम मंदिर को बलपूर्वक तोड़े जाने
की घटना पर एक शब्द भी न निकालने
वाले सेकुलरिस्टों और जिहादियों को जैसे
ही बाबरी ढांचा टूटने
की खबर मिली, उनके हृदयों पर जैसे
आकाश टूट पडा, जैसे
बिजली सी गिरी या वज्रपात
हो गया.
ठीक ही था, राम ठहरा इस देश के
निवासियों का पूर्वज और बाबर ठहरा पराये मुल्क से यहाँ आकर
परोपकार के निमित्त धन, स्त्रियाँ, राज्य
आदि की व्यवस्था करने वाला जिसका एकमात्र
उद्देश्य इस भारत को एकछत्र के नीचे लाकर विश्व
का कल्याण करना था! एक राम था जिसने पराया देश लंका विजय
करने पर भी राज्य वहीँ के
स्थानीय लोगों को दे दिया,
उनकी स्त्रियों को माता कहकर
उनकी ओर
देखा भी नहीं और एक ओर बाबर
था जिसने राज्य जीतकर यहाँ के
स्थानीय लोगों की सेवा करना ज्यादा उचित
समझा और स्त्रियाँ जीतकर इन्हें
अपना ही कर्त्तव्य समझ कर अपने हरम
की ओर रवाना कर दिया! इस तरह के “एकता के
प्रतीक” बाबर के जीवन के कुछ और
प्रेरक (?) प्रसंगों को पढने की इच्छा से हमने
स्वयं बाबर का लिखा हुआ “ बाबरनामा ” पढ़ा जिसमें उसने अपने
जीवन की घटनाएं
अपनी लेखनी से
ही लिखी हैं ताकि आने
वाली पीढी भी उनसे
कुछ सीख ले सके. आप
भी बाबरनामा को यहाँ पढ़ सकते हैं http://
http://www.archive.org/details/baburnama017152mbp
हमारा यह दृढ विश्वास था कि बाबर एक पक्का मुसलमान
था और इस्लामी रिवाज के अनुसार अपने देश से
अधिक दूसरे देशों के लोगों, धर्म, राज्य और स्त्रियों का अधिक
ध्यान उसे सताता था. पर अचानक हमने कुछ ऐसा पढ़ा कि जिससे
इस महात्मा मोमिन बाबर के चरित्र के कुछ और रंग सामने आये!
और तब हमें लगा कि हिन्दू मुस्लिम एकता के
प्रतीकों में से सबसे अधिक यदि कोई मूल्यवान है
तो वह है बाबरी ढाँचे का विध्ध्वंस. चौंकिए
नहीं! खुद बाबर के लिखे बाबरनामा से यह
पता चलता है कि राम मंदिर तोड़कर उसके नाम पर
बनाया गया ढांचा असल में मस्जिद
ही नहीं था! ऐसा इसलिए क्योंकि बाबर
खुद मुसलमान ही नहीं था! क्योंकि-
बाबर एक समलैंगिक
(homosexual),
नशेड़ी,
शराबी, और बाल
उत्पीड़क (child
molester) था
बाबरनामा के विभिन्न पृष्ठों से लिए गए निम्नलिखित अंश पढ़िए
१. पृष्ठ १२०-१२१ पर बाबर लिखता है कि वह
अपनी पत्नी में अधिक
रूचि नहीं लेता था बल्कि वह
तो बाबरी नाम के एक लड़के
का दीवाना था. वह लिखता है कि उसने
कभी किसी को इतना प्यार
नहीं किया कि जितना दीवानापन उसे उस
लड़के के लिए था. यहाँ तक कि वह उस लड़के पर
शायरी भी करता था. उदाहरण के लिए-
“मुझ सा दर्दीला, जुनूनी और बेइज्जत
आशिक और कोई नहीं है. और मेरे आशिक
जैसा बेदर्द और तड़पाने वाला भी कोई और
नहीं है.”
२. बाबर लिखता है कि जब बाबरी उसके
‘करीब’ आता था तो बाबर इतना रोमांचित
हो जाता था कि उसके मुंह से शब्द
भी नहीं निकलते थे. इश्क के नशे
और उत्तेजना में वह बाबरी को उसके प्यार के लिए
धन्यवाद देने को भी मुंह नहीं खोल
पता था.
३. एक बार बाबर अपने दोस्तों के साथ एक गली से
गुजर रहा था तो अचानक उसका सामना बाबरी से
हो गया! बाबर इससे इतना उत्तेजित हो गया कि बोलना बंद
हो गया, यहाँ तक कि बाबरी के चेहरे पर नजर
डालना भी नामुमकिन हो गया. वह लिखता है- “मैं
अपने आशिक को देखकर शर्म से डूब जाता हूँ. मेरे
दोस्तों की नजर मुझ पर
टिकी होती है और
मेरी किसी और पर.” स्पष्ट है
की ये सब साथी मिलकर क्या गुल खिलाते
थे!
४. बाबर लिखता है कि बाबरी के जूनून और चाह में
वह बिना कुछ देखे पागलों की तरह नंगे सिर और
नागे पाँव इधर उधर घूमता रहता था.
५. वह लिखता है- “मैं उत्तेजना और रोमांच से पागल
हो जाता था. मुझे नहीं पता था कि आशिकों को यह
सब सहना होता है. ना मैं तुमसे दूर जा सकता हूँ और न
उत्तेजना की वजह से तुम्हारे पास ठहर
सकता हूँ. ओ मेरे आशिक (पुरुष)! तुमने मुझे बिलकुल पागल
बना दिया है”.
इन तथ्यों से पता चलता है कि बाबर और उसके
साथी समलैंगिक और बाल उत्पीड़क थे.
अब यदि इस्लामी शरियत की बात करें
तो समलैंगिकों के लिए मौत की सजा
ही मुक़र्रर की जाती है.
बहुत से इस्लामी देशों में यह सजा आज
भी दी जाती है. बाबर
को भी यही सजा मिलनी चाहिए
थी. दूसरी बात यह है कि उसके नाम
पर बनाए ढाँचे का नाम “बाबरी मस्जिद”
था जो कि उसके पुरुष आशिक “बाबरी” के नाम पर था!
हम पूछते हैं कि क्या अल्लाह के इबादत के लिए कोई
ऐसी जगह क़ुबूल
की जा सकती है कि जिसका नाम
ही समलैंगिकता के प्रतीक बाबर के
पुरुष आशिक “बाबरी” के नाम पर रखा गया हो?
इससे भी बढ़कर एक
आदमी द्वारा जो कि मुसलमान
ही नहीं हो, समलैंगिक और बच्चों से
कुकर्म करने वाला हो , उसके नाम पर मस्जिद
किसी भी मुसलमान को कैसे क़ुबूल
हो सकती है?
यह सिद्ध हो गया है कि बाबरी मस्जिद कोई
इबादतघर नहीं लेकिन समलैंगिकता और बाल
उत्पीडन का प्रतीक जरूर
थी. और इस तरह यह अल्लाह, मुहम्मद,
इस्लाम आदि के नाम पर कलंक थी कि जिसको खुद
मुसलमानों द्वारा ही नेस्तोनाबूत कर दिया जाना चाहिए
था. खैर वे यह नहीं कर सके पर जिसने यह
काम किया है उनको बधाई और धन्यवाद तो जरूर देना चाहिए था.
यह बहुत शर्म की बात है कि पशुतुल्य और
समलैंगिकता के महादोष से ग्रसित आदमी के बनाए
ढाँचे को, जो कि भारत की हार का प्रतीक
था, यहाँ के इतिहासकारों, मुसलमानों, और सेकुलरवादियों ने
किसी अमूल्य धरोहर की तरह
संजो कर रखना चाहा.
यह ऐसी ही बात है कि जैसे मुंबई में
छत्रपति शिवाजी टर्मिनल्स स्टेशन पर नपुंसक और
कायर आतंकवादी अजमल कसब द्वारा निर्दोष
लोगों को मौत के घाट उतारने के उपलक्ष्य में उस स्थान का नाम
“कसब भूमि” रखकर उसे भी धरोहर बना दिया जाये!
बाबर नरसंहारक, लुटेरा,
बलात्कारी,
शराबी और
नशेड़ी था
यहाँ पर इस विषय में कुछ ही प्रमाण इस दरिन्दे
की लिखी जीवनी बाबरनामा से
दिए जा रहे हैं. इसके और अधिक कारनामे जानने के लिए
पूरी पुस्तक पढ़ लें.
पृष्ठ २३२- वह लिखता है कि उसकी सेना ने
निरपराध अफगानों के सिर काट लिए जो उसके साथ
शान्ति की बात करने आ रहे थे. इन कटे हुए
सिरों से इसने मीनार बनवाई.
ऐसा ही कुछ इसने हंगू में किया जहाँ २००
अफगानियों के सिर काट कर खम्बे बनाए गए.
पृष्ठ ३७०- क्योंकि बाजौड़ में रहने वाले लोग दीन
(इस्लाम) को नहीं मानते थे इसलिए वहां ३०००
लोगों का क़त्ल कर दिया गया और उनके
बीवी बच्चों को गुलाम बना लिया गया.
पृष्ठ ३७१- गुलामों में से कुछों के सिर काटकर काबुल और बल्ख
भेजे गए ताकि फतह
की सूचना दी जा सके.
पृष्ठ ३७१- कटे हुए सिरों के खम्बे बनाए गए
ताकि जीत का जश्न मनाया जा सके.
पृष्ठ ३७१- मुहर्रम की एक रात को जश्न मनाने
के लिए शराब की एक महफ़िल जमाई
गयी जिसमें हमने पूरी रात
पी. (पूरे बाबरनामा में जगह जगह
ऐसी शराब की महफ़िलों का वर्णन है.
ध्यान रहे कि शराब इस्लाम में हराम है.)
पृष्ठ ३७३- बाबर ने एक बार ऐसा नशा किया कि नमाज पढने
भी न जा सका. आगे लिखता है
कि यदि ऐसा नशा वह आज करता तो उसे पहले से
आधा नशा भी नहीं होता.
पृष्ठ ३७४- बाबर ने अपने हरम की बहुत
सी महिलाओं से बहुत से बच्चे उत्पन्न किये.
उसकी पहली बेगम ने उससे
वादा किया कि वह उसके हर बच्चे
को अपनाएगी चाहे वे
किसी भी बेगम से हुए हों,
ऐसा इसलिए क्योंकि उसके पैदा किये कुछ बच्चे चल बसे थे. यह
तो जाहिर ही है कि इसके हरम बनाम
मुर्गीखाने में इसकी हवस मिटाने के लिए
कुछ हजार औरतें तो होंगी ही जैसे
कि इसके पोते स्वनामधन्य अकबर के हरम में पांच हजार
औरतें थीं जो इसकी ३६
(छत्तीस) पत्नियों से अलग थीं. यह
बात अलग है कि इसका हरम अधिकतर समय
सूना ही रहता होगा क्योंकि इसको स्त्रियों से अधिक
पुरुष और बच्चे पसंद थे ! और बाबरी नाम के बच्चे
में तो इसके प्राण ही बसे थे.
पृष्ठ ३८५-३८८- अपने बेटे हुमायूं के पैदा होने पर बाबर
बहुत खुश हुआ था, इतना कि इसका जश्न मनाने के लिए
अपने दोस्तों के साथ नाव में गया जहां पूरी रात इसने
शराब पी और
नशीली चीजें खाकर अलग
से नशा किया. फिर जब नशा इनके सिरों में चढ़ गया तो आपस में
लड़ाई हुई और महफ़िल बिखर गयी.
इसी तरह एक और शराब
की महफ़िल में इसने बहुत
उल्टी की और सुबह तक सब कुछ
भूल गया.
पृष्ठ ५२७- एक और महफ़िल एक मीनारों और
गुम्बद वाली इमारत में हुई
थी जो आगरा में है. (ध्यान रहे यह इमारत
ताजमहल ही है जिसे अधिकाँश सेकुलर
इतिहासकार शाहजहाँ की बनायी बताते
हैं, क्योंकि आगरा में इस प्रकार की कोई और इमारत
न पहले थी और न आज है! शाहजहाँ से चार
पीढी पहले जिस महल में उसके
दादा ने गुलछर्रे उड़ाए थे उसे वह खुद कैसे बनवा सकता है?)
बाबरनामा का लगभग हर एक पन्ना इस दरिन्दे के कातिल होने,
लुटेरा होने, और दुराचारी होने का सबूत है.
यहाँ यह याद रखना चाहिए कि जिस तरह बाबर यह सब
लिखता है, उससे यह पता चलता है कि उसे इन सब
बातों का गर्व है, इस बात का पता उन्हें चल जाएगा जो इसके
बाबरनामा को पढेंगे. आश्चर्य इस बात का है कि जिन बातों पर इसे
गर्व था यदि वे ही इतनी भयानक हैं
तो जो आदतें
इसकी कमजोरी रही होंगी,
जिन्हें इसने लिखा ही नहीं, वे
कैसी क़यामत ढहाने
वाली होंगी?
सारांश
१. यदि एक आदमी समलैंगिक होकर
भी मुसलमान हो सकता है, बच्चों के साथ दुराचार
करके भी मुसलमान हो सकता है, चार से
ज्यादा शादियाँ करके भी मुसलमान हो सकता है,
शराब पीकर नमाज न पढ़कर
भी मुसलमान हो सकता है, चरस, गांजा,
अफीम खाकर भी मुसलमान
हो सकता है, हजारों लोगों के सिर काटकर उनसे
मीनार बनाकर भी मुसलमान
हो सकता है, लूट और बलात्कार करके
भी मुसलमान हो सकता है तो फिर वह कौन है
जो मुसलमान नहीं हो सकता? क्या इस्लाम इस सब
की इजाजत देता है?
यदि नहीं तो आज तक
किसी मौलवी मुल्ला ने इस विषय पर
एक शब्द भी क्यों नहीं कहा?
२. केवल यही नहीं, जो यह सब
करके अपने या अपने पुरुष आशिक के नाम
की मस्जिद बनवा दे, ऐसी जगह
को मस्जिद कहना हराम नहीं है क्या?
क्या किसी बलात्कारी समलैंगिक
शराबी व्यभिचारी के पुरुष आशिक के नाम
की मस्जिद में
अता की गयी नमाज अल्लाह को क़ुबूल
होगी? यदि हाँ तो अल्लाह ने इन सबको हराम
क्यों बताया? यदि नहीं तो अधिकतर मुसलमान और
मौलवी इस जगह को मस्जिद कहकर दंगा फसाद
क्यों कर रहे हैं? क्या इसका टूटना इस्लाम पर लगे कलंक
को मिटाने जैसा नहीं था? क्या यह काम खुद
मुसलमानों को नहीं करना चाहिए था?
३. जब इस दरिन्दे बाबर ने खुद क़ुबूल किया है कि इसने
हजारों के सिर कटवाए और कुफ्र को मिटाया तो फिर आजकल के
जाकिर नाइक जैसे आतंकी मुल्ला यह क्यों कहते
हैं कि इस्लाम तलवार के बल पर भारत में
नहीं फैला? जब खुद अकबर
(जिसको इतिहासकारों द्वारा हिन्दुओं का रक्षक कहा गया है
और जान ए हिन्दुस्तान नाम से पुकारा गया है) जैसा नेकदिल (?)
भी हजारों हिन्दुओं के सिरों को काटकर उनके खम्बे
बनाने में प्रसिद्ध था तो फिर यह कैसे माना जाए कि इस्लाम
तलवार से नहीं फैला? क्या ये लक्षण शान्ति से
धर्म फैलाने के हैं? फिर इस्लाम का मतलब ‘शान्ति’ कैसे
हुआ?
४. भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बंगलादेश में रहने वाले सब
मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू ही थे
जो हजारों सालों से यहाँ रहते आ रहे थे. जब बाबर जैसे और
इससे भी अधिक दरिंदों ने आकर यहाँ मारकाट
बलात्कार और तबाही मचाई, सिरों को काटकर
मीनारें लहरायीं तो दहशत के इस
वातावरण में बहुत से हिन्दुओं ने अपना धर्म बदल लिया और
उन्हीं लाचार पूर्वजों की संतानें आज
मुसलमान होकर अपने असली धर्म के खिलाफ
आग उगल रही हैं. जिन मुसलमानों के
बाबरी मस्जिद (?) विध्ध्वंस पर आंसू
नहीं थम रहे, जो बार बार यही कसम
खा रहे हैं कि बाबरी मस्जिद
ही बनेगी, जो बाबर को अपना पूर्वज
मान बैठे हैं, ज़रा एक बार खुद से सवाल तो करें- क्या मेरे
पूर्वज अरब, तुर्क या मंगोल से आये थे? क्या मेरे पूर्वज इस
भारत भूमि की पैदावार नहीं थे? कटे
हुए सिरों की मीनारें देखकर भय से
धर्म परिवर्तन करने वाले पूर्वजों के वंशज आज कौन हैं,
कहाँ हैं, क्या कभी सोचा है? क्या यह विचार
कभी मन में नहीं आता कि इतने कत्ले
आम और बलात्कार होने पर विवश माता पिताओं के वे लाल आज
कहाँ हैं कि जिन्हें अपना धर्म, माता, पिता सब खोने पड़े?
क्या भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बंगलादेश में रहने वाले
७०-८० करोड़ मुसलमान सीधे अरबों, तुर्कों के वंशज
हैं? कभी यह नहीं सोचा कि इतने
मुसलमान तो अरब, तुर्क, ईरान, ईराक में मिला कर
भी नहीं हैं जो इस्लाम के फैलाने में
कारण बने? क्या तुम्हारे पूर्वज राम को नहीं मानते
थे? क्या बलपूर्वक अत्याचार के कारण तुम्हारे पूर्वजों का धर्म
बदलने से तुम्हारा पूर्वज राम की बजाय बाबर
हो जाएगा? अगर नहीं तो आज अपने
असली पूर्वज राम को गाली और अपने
पूर्वजों के कातिल और बलात्कारी बाबर का गुणगान
क्यों?
५. अयोध्या की तरह काशी, मथुरा और
हजारों ऐसी ही जगहें जिन्हें
मस्जिद कह कर इस्लाम का मजाक उड़ाया जाता है, जो बाबर
की तरह ही इसके पूर्वजों और
वंशजों की हवस की निशानियाँ हैं,
इनको मुसलमान खुद क्यों मस्जिद मानने से इनकार
नहीं करते?
६. यदि बाबरी ढांचा टूटना गलत था तो राम मंदिर
टूटना गलत क्यों नहीं था? यदि राम मंदिर
की बात पुरानी हो गयी है
तो ढांचा टूटने की बात भी तो कोई
नयी नहीं! तो फिर उस पर
हायतौबा क्यों?
अंत में हम कहेंगे कि जिस तरह भारत में रहने वाले हिन्दू
मुसलमानों के पूर्वजों पर अत्याचार और बलात्कार करने वाले
वहशी दरिन्दे बाबर के नाम का ढांचा आज
नहीं है उसी तरह बाकी
सब ढांचे जो तथाकथित इस्लामी राज्य के दौरान
मंदिरों को तोड़कर बनवाये गए थे, जो सब हिन्दू मुसलमानों के
पूर्वजों के अपमान के प्रतीक हैं, उनको अविलम्ब
मिट्टी में मिला दिया जाए और
इसकी पहल हमारे खून के भाई मुसलमान
ही करें जिनके साथ
हमारा हजारों लाखों सालों का रक्त सम्बन्ध है. इस देश में
रहने वाले
किसी आदमी की, चाहे
वह हिन्दू हो या मुसलमान, धमनियों में दरिन्दे जानवर बाबर
या अकबर का खून नहीं किन्तु राम, कृष्ण,
महाराणा प्रताप और शिवाजी का खून है. और इस
एक खून की शपथ लेकर सबको यह प्रण
करना है कि अब हमारे पूर्वजों पर लगा कोई कलंक
भी देश में नहीं रह पायेगा.
क्या दृश्य होगा कि हिन्दू और मुसलमान एक साथ अपने एक
पूर्वजों पर लगे कलंकों को गिराएंगे और उस जगह अपने
पूर्वजों की यादगार के साथ साथ उनके
असली धर्म वेद की पाठशाला बनायेंगे
जहां राम और कृष्ण जैसे धर्मयोद्धा तैयार होंगे कि फिर कोई
बाबर आकर इस भूमि के पुत्रों को उनके माता पिता, दोस्तों और
धर्म से अलग न कर सके!
और तब तक के लिए, आओ हम सब हिन्दू और मुस्लिम भाई
मिलकर हर साल पूरे उत्साह के साथ ६ दिसंबर के पावन पर्व
को ‘शौर्य दिवस’ और ‘गौरव दिवस’ के रूप में मनाएं. हाँ,
मथुरा और वाराणसी में ऐसे
ही वहशी दरिन्दे ‘औरंगजेब’ के
बनाये ढांचें – जो इस्लाम के पावन नाम पर बदतर कलंक है –
उनको मिटाने का सौभाग्य हमारे मुस्लिम
भाइयों को ही मिले.
६ दिसंबर १९९२ के दिन हिन्दू-मुस्लिम एकता के सबसे बड़े
प्रतीक की स्थापना करने वाले
सभी भाई-बहनों को हम सब हिन्दू और
मुसलमानों का कोटि-कोटि नमन.
साभार: अग्नीवीर साईट

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राधे ,राधे ,राधे राधे ,


टीवी पर अकसर देखता हूँ अधिकतर साधू संत कृष्ण कथाओ मे बताते है !

कृष्ण बंसी बाजा रहे है ,गोपिया आनद ले रही है ,

राधे ,राधे ,राधे राधे ,

कृष्ण मटकिया फोड़ रहे है मांखन चुरा रहे है
यशोधा मैया डांट रही है !

फिर राधे राधे,राधे राधे ,माताएँ,बहने नाच रही हैं !
लगभग यही चलता है !

चलो ठीक है ! लेकिन यहाँ उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओ को आहात करना
नहीं है मित्रो !!
_____________
बस इतना ही कहना चाहता हूँ आज भारतीय समाज को हिन्दू समाज को
रास रचाने वाले कृष्ण की नहीं बल्कि सुदर्शन चक्रधारी श्री कृष्ण की कथाएँ
सुनाने की अधिक आवश्यकता है !

आज आवश्यकता है उस प्रभु राम की कथा सुनाने की जिन्होने वन मे अनेकों
राक्षसो का वध किया !