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पाकिस्तानी योगा करते हुए

पाकिस्तानी योगा करते हुए

” महर्षि पतंजलि का जन्म हमारे पाकिस्तान के मुल्तान मे हुआ था और आप हिंदुस्तानियों ने इसे अपनाया, इसलिए “योग” पर पहला हक हमारा है ” :- पाकिस्तानी योग गुरु शमशाद हैदर

Yoga और Hinduism पर पूछे गए सवाल का कुछ यूं जबाब दिया था योगी हैदर ने । जहां पाकिस्तानी Muslim ज़ोर-शोर से ‪#‎InternationalYogaDay‬ की तैयारी कर रहे हैं और इसे अपनी जीवन शैली मे अपना भी रहे हैं । वहीं भारत के कुछ मदरसा छाप जाहिल इसको धर्म से जोड़ बिरोध करते है ।

क्या विश्व के जिन 45 इस्लामिक देशों ने “योग दिवस” का समर्थन किया है वे बेबकूफ हैं , और सिर्फ भारत के मुसलमान ही इस्लाम को अच्छी तरह जानते-समझते हैं ???

Sanjay Dwivedy's photo.
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कुतुब मीनार का अनकहा सच

कुतुब मीनार का अनकहा सच
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

कुतुब मीनार को पहले विष्णु स्तंभ कहा जाता था।
इससे पहले इसे सूर्य स्तंभ कहा जाता था।
इसके केंद्र में ध्रुव स्तंभ था जिसे आज कुतुब मीनार कहा जाता है।
इसके आसपास 27 नक्षत्र के आधार पर 27 मंडल थे। इसे वराहमिहिर की देखरेख में बनाया गया था ।

चंद्रगुप्त द्वितिय के आदेश से यह बना था।
ज्योतिष स्तंभों के अलावा भारत में कीर्ति स्तम्भ बनाने की परंपरा भी रही है।
खासकर जैन धर्म में इस तरह के स्तंभ बनाए जाते रहे हैं। आज भी देश में ऐसे कई स्तंभ है, लेकिन तथाकथित कुतुब मीनार से बड़े नहीं।
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में ऐसा ही एक स्तंभ स्थित है।
ऐसा भी कहते हैं कि समुद्रगुप्त ने दिल्ली में एक वेधशाला बनवाई थी, यह उसका सूर्य स्तंभ है।

कालान्तर में अनंगपाल तोमर और पृथ्वीराज चौहान के शासन के समय में उसके आसपास कई मंदिर और भवन बने, जिन्हें मुस्लिम हमलावरों ने दिल्ली में घुसते ही तोड़ दिया था।
कुतुबुद्दीन ने वहां ‘कुबत−उल−इस्लाम’ नाम की मस्जिद का निर्माण कराया और इल्तुतमिश ने उस सूर्य स्तंभ में तोड़-फोड़कर उसे मीनार का रूप दे दिया था।

माना जाता है कि गुलाम वंश के पहले शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1199 में कुतुब मीनार का निर्माण शुरू करवाया था और उसके दामाद एवं उत्तराधिकारी शमशुद्दीन इल्तुतमिश ने 1368 में इसे पूरा किया था ।

लेकिन क्या यह सच है?

मीनार में देवनागरी भाषा के शिलालेख के अनुसार यह मीनार 1326 में क्षतिग्रस्त हो गई थी और इसे मुहम्मद बिन तुगलक ने ठीक करवाया था ।
इसके बाद में 1368 में फिरोजशाह तुगलक ने इसकी ऊपरी मंजिल को हटाकर इसमें दो मंजिलें और जुड़वा दीं ।

इसके पास सुल्तान इल्तुतमिश, अलाउद्दीन खिलजी, बलबन व अकबर की धाय मां के पुत्र अधम खां के मकबरे स्थित हैं। उसी कुतुब मीनार की चारदीवारी में खड़ा हुआ है एक लौह स्तंभ ।

दिल्ली के कुतुब मीनार के परिसर में स्थित यह स्तंभ 7 मीटर ऊंचा है। इसका वजन लगभग 6 टन है।

इसे गुप्त साम्राज्य के चन्द्रगुप्त द्वितीय (जिन्हें चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य भी कहा जाता है) ने लगभग 1,600 वर्ष पूर्व बनवाया।
यह लौह स्तंभ प्रारंभ से यहां नहीं था। सवाल उठता है कि क्या यह लौह स्तंभ भी कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाया था?

इ‍तनी बड़ी मीनार जब बनी होगी तो यदि यह स्तंभ पहले से यहां रहा होगा तो उसी समय में हट जाना चाहिए था।

गुप्त साम्राज्य के सोने के सिक्कों से यह प्रमाणित होता है कि यह स्तंभ विदिशा (विष्णुपदगिरि/उदयगिरि- मध्यप्रदेश) में स्थापित किया गया था।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने जैन मंदिर परिसर के 27 मंदिर तोड़े तब यह स्तंभ भी उनमें से एक था।
दरअसल, मंदिर से तोड़े गए लोहे व अन्य पदार्थ से उसने मीनार में रिकंस्ट्रक्शन कार्य करवाया था।
उनके काल में यह स्तंभ समय बताने का भी कार्य करता था।

सम्राट अशोक ने भी कई स्तंभ बनवाए थे, उसी तरह चंद्रगुप्त द्वितीय ने भी कई स्तंभ बनवाए थे।
ऐसा माना जाता है कि तोमर साम्राज्य के राजा विग्रह ने यह स्तंभ कुतुब परिसर में लगवाया।

लौह स्तंभ पर लिखी हुई एक पंक्ति में सन् 1052 के तोमर राजा अनंगपाल (द्वितीय) का जिक्र है।

जाट इतिहास के अनुसार ऐबक को मीनार तो क्या, अपने लिए महल व किला बनाने तक का समय जाटों ने नहीं दिया।
उसने तो मात्र 4 वर्ष तक ही शासन किया।

इस मीनार को जाट सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य (विक्रमादित्य) के कुशल इंजीनियर वराहमिहिर के हाथों चौथी सदी के चौथे दशक में बनवाया गया था।

यह मीनार दिलेराज जाट दिल्ली के राज्यपाल की देखरेख में बनी थी। हरिदत्त शर्मा ने अपनी किताब ज्योतिष विश्‍व कोष में लिखा है कि कुतुब मीनार के दोनों ओर दो पहाड़ियों के मध्य में से ही उदय और अस्त होता है।

आचार्य प्रभाकर के अनुसार 27 नक्षत्रों का वेध लेने के लिए ही इसमें 27 भवन बनाए गए थे। 21 मार्च और 21 सितंबर को सूर्योदय तुगलकाबाद के स्थान पर और सूर्यास्त मलकपुर के स्थान पर होता देखा जा सकता है।

मीनार का प्रवेश द्वार उत्तर की ओर है न कि इस्लामिक मान्यता के अनुसार पश्‍चिम की ओर।

अंदर की ओर उत्कीर्ण अरबी के शब्द स्पष्ट ही बाद में अंकित किए हुए नजर आते हैं।
मुस्लिम विश्‍वविद्यालय, अलीगढ़ के संस्थापक ने यह स्वीकार किया है कि यह हिन्दू भवन है।

स्तंभ का घेरा 27 मोड़ों और ‍त्रिकोणों का है। बाद के लोगों ने कुतुब मीनार को कुतुबुद्दीन ऐबक से जोड़ दिया जबकि ‘कुतुब ‍मीनार’ का अर्थ अरबी में नक्षत्रीय और वेधशाला होता है। इसका पुराना नाम ‘ध्रुव स्तंभ’ और ‘विष्णु स्तंभ’था।

मुस्लिम शासकों ने इसका नाम बदला और इस पर से कुछ हिन्दू चिह्न मिटा दिए जिसके निशान आज भी देखे जा सकते हैं। राजा विक्रमादित्य के समय में उज्जैन और दिल्ली की कालजयी बस्ती के बीच का 252 फुट ऊंचा स्तंभ है।

वराह मिहिर के अनुसार 21 जून को सूर्य ठीक इसके ऊपर से गुजरता है। पड़ोस में जो बस्ती है उसे आजकल महरौली कहते हैं जबकि वह वास्तव में वह मिहिरावली थी।

इस म‍ीनार के आसपास 27 नक्षत्र मंडप थे जिसे ध्वस्त कर दिया गया। यह माना जाता है कि कुववत-उल-इस्लाम मस्जिद और कुतुब मीनार के परिसर में सत्ताइस हिन्दू मंदिरों के अवशेष आज भी मौजूद हैं।

महरौली स्थित लौह स्तम्भ जंग लगे बिना विभिन्न संघर्षों का मूक गवाह रहा है और हमारे गौरव और समृद्धि की कहानी को बयां करता है ।।

जागो हिन्दुओं जागो
ज्यादा से ज्यादा शेयर करो और सबको बताओ ।।

जय श्री राम

कुतुब मीनार का अनकहा सच
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कुतुब मीनार को पहले विष्णु स्तंभ कहा जाता था।
इससे पहले इसे सूर्य स्तंभ कहा जाता था।
इसके केंद्र में ध्रुव स्तंभ था जिसे आज कुतुब मीनार कहा जाता है।
इसके आसपास 27 नक्षत्र के आधार पर 27 मंडल थे। इसे वराहमिहिर की देखरेख में बनाया गया था ।

चंद्रगुप्त द्वितिय के आदेश से यह बना था।
ज्योतिष स्तंभों के अलावा भारत में कीर्ति स्तम्भ बनाने की परंपरा भी रही है।
खासकर जैन धर्म में इस तरह के स्तंभ बनाए जाते रहे हैं। आज भी देश में ऐसे कई स्तंभ है, लेकिन तथाकथित कुतुब मीनार से बड़े नहीं।
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में ऐसा ही एक स्तंभ स्थित है।
ऐसा भी कहते हैं कि समुद्रगुप्त ने दिल्ली में एक वेधशाला बनवाई थी, यह उसका सूर्य स्तंभ है।

कालान्तर में अनंगपाल तोमर और पृथ्वीराज चौहान के शासन के समय में उसके आसपास कई मंदिर और भवन बने, जिन्हें मुस्लिम हमलावरों ने दिल्ली में घुसते ही तोड़ दिया था।
कुतुबुद्दीन ने वहां 'कुबत−उल−इस्लाम' नाम की मस्जिद का निर्माण कराया और इल्तुतमिश ने उस सूर्य स्तंभ में तोड़-फोड़कर उसे मीनार का रूप दे दिया था।

माना जाता है कि गुलाम वंश के पहले शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1199 में कुतुब मीनार का निर्माण शुरू करवाया था और उसके दामाद एवं उत्तराधिकारी शमशुद्दीन इल्तुतमिश ने 1368 में इसे पूरा किया था ।

लेकिन क्या यह सच है?

मीनार में देवनागरी भाषा के शिलालेख के अनुसार यह मीनार 1326 में क्षतिग्रस्त हो गई थी और इसे मुहम्मद बिन तुगलक ने ठीक करवाया था ।
इसके बाद में 1368 में फिरोजशाह तुगलक ने इसकी ऊपरी मंजिल को हटाकर इसमें दो मंजिलें और जुड़वा दीं ।

इसके पास सुल्तान इल्तुतमिश, अलाउद्दीन खिलजी, बलबन व अकबर की धाय मां के पुत्र अधम खां के मकबरे स्थित हैं। उसी कुतुब मीनार की चारदीवारी में खड़ा हुआ है एक लौह स्तंभ ।

दिल्ली के कुतुब मीनार के परिसर में स्थित यह स्तंभ 7 मीटर ऊंचा है। इसका वजन लगभग 6 टन है।

इसे गुप्त साम्राज्य के चन्द्रगुप्त द्वितीय (जिन्हें चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य भी कहा जाता है) ने लगभग 1,600 वर्ष पूर्व बनवाया।
यह लौह स्तंभ प्रारंभ से यहां नहीं था। सवाल उठता है कि क्या यह लौह स्तंभ भी कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाया था?

इ‍तनी बड़ी मीनार जब बनी होगी तो यदि यह स्तंभ पहले से यहां रहा होगा तो उसी समय में हट जाना चाहिए था।

गुप्त साम्राज्य के सोने के सिक्कों से यह प्रमाणित होता है कि यह स्तंभ विदिशा (विष्णुपदगिरि/उदयगिरि- मध्यप्रदेश) में स्थापित किया गया था।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने जैन मंदिर परिसर के 27 मंदिर तोड़े तब यह स्तंभ भी उनमें से एक था।
दरअसल, मंदिर से तोड़े गए लोहे व अन्य पदार्थ से उसने मीनार में रिकंस्ट्रक्शन कार्य करवाया था।
उनके काल में यह स्तंभ समय बताने का भी कार्य करता था।

सम्राट अशोक ने भी कई स्तंभ बनवाए थे, उसी तरह चंद्रगुप्त द्वितीय ने भी कई स्तंभ बनवाए थे।
ऐसा माना जाता है कि तोमर साम्राज्य के राजा विग्रह ने यह स्तंभ कुतुब परिसर में लगवाया।

लौह स्तंभ पर लिखी हुई एक पंक्ति में सन् 1052 के तोमर राजा अनंगपाल (द्वितीय) का जिक्र है।

जाट इतिहास के अनुसार ऐबक को मीनार तो क्या, अपने लिए महल व किला बनाने तक का समय जाटों ने नहीं दिया।
उसने तो मात्र 4 वर्ष तक ही शासन किया।

इस मीनार को जाट सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य (विक्रमादित्य) के कुशल इंजीनियर वराहमिहिर के हाथों चौथी सदी के चौथे दशक में बनवाया गया था।

यह मीनार दिलेराज जाट दिल्ली के राज्यपाल की देखरेख में बनी थी। हरिदत्त शर्मा ने अपनी किताब ज्योतिष विश्‍व कोष में लिखा है कि कुतुब मीनार के दोनों ओर दो पहाड़ियों के मध्य में से ही उदय और अस्त होता है।

आचार्य प्रभाकर के अनुसार 27 नक्षत्रों का वेध लेने के लिए ही इसमें 27 भवन बनाए गए थे। 21 मार्च और 21 सितंबर को सूर्योदय तुगलकाबाद के स्थान पर और सूर्यास्त मलकपुर के स्थान पर होता देखा जा सकता है।

मीनार का प्रवेश द्वार उत्तर की ओर है न कि इस्लामिक मान्यता के अनुसार पश्‍चिम की ओर।

अंदर की ओर उत्कीर्ण अरबी के शब्द स्पष्ट ही बाद में अंकित किए हुए नजर आते हैं।
मुस्लिम विश्‍वविद्यालय, अलीगढ़ के संस्थापक ने यह स्वीकार किया है कि यह हिन्दू भवन है।

स्तंभ का घेरा 27 मोड़ों और ‍त्रिकोणों का है। बाद के लोगों ने कुतुब मीनार को कुतुबुद्दीन ऐबक से जोड़ दिया जबकि 'कुतुब ‍मीनार' का अर्थ अरबी में नक्षत्रीय और वेधशाला होता है। इसका पुराना नाम 'ध्रुव स्तंभ' और 'विष्णु स्तंभ'था।

मुस्लिम शासकों ने इसका नाम बदला और इस पर से कुछ हिन्दू चिह्न मिटा दिए जिसके निशान आज भी देखे जा सकते हैं। राजा विक्रमादित्य के समय में उज्जैन और दिल्ली की कालजयी बस्ती के बीच का 252 फुट ऊंचा स्तंभ है।

वराह मिहिर के अनुसार 21 जून को सूर्य ठीक इसके ऊपर से गुजरता है। पड़ोस में जो बस्ती है उसे आजकल महरौली कहते हैं जबकि वह वास्तव में वह मिहिरावली थी।

इस म‍ीनार के आसपास 27 नक्षत्र मंडप थे जिसे ध्वस्त कर दिया गया। यह माना जाता है कि कुववत-उल-इस्लाम मस्जिद और कुतुब मीनार के परिसर में सत्ताइस हिन्दू मंदिरों के अवशेष आज भी मौजूद हैं।

महरौली स्थित लौह स्तम्भ जंग लगे बिना विभिन्न संघर्षों का मूक गवाह रहा है और हमारे गौरव और समृद्धि की कहानी को बयां करता है ।।

जागो हिन्दुओं जागो
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जय श्री राम
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Communal-Violence-Bill-2011

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Shape of original Indian flag used by Rana Pratap, Shivaji-is shape of map of India from Arab to Vietnam & Indonesia. Mountain chain from Iran to Manipur is flag-staff as Himalayas indicated by Kalidasa in Kumara-sambhava- अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः। पूर्वापरौ तोयनिधीव ग्राह्यः स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः॥ (कुमारसम्भव १/१) Mainland Bharata is lower or base triangle. Upper triangle is Burma to Vietnam.

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VIJAYA STAMBH AND NOT KUTUB MINAR …

JEWELS OF BHARATAM …..SERIES [TM]

VIJAYA STAMBH AND NOT KUTUB MINAR …

Vijaya Stammbha now called – Kutub Minar was built by Sriharsha-Vikramaditya in 456 BC. In 300 BC, Megasthenes has called it Pillar of Hercules. Hercules is Vishnu or his incarnation/ krishna .

The Hindu title of the tower was Vishnu Dhwaj (i.e. Vishnu’s standard) alias Vishnu Stambh alias Dhruv Stambh (i.e., a polar pillar) obviously connoting an astronomical observa- tion tower. The Sanskrit inscription in Brahmi script on the non-rusting iron pillar close by proclaims that the lofty standard of Vishnu was raised on the hillock named Vishnupad Giri. That description indicates that a statue of the rec- lining Vishnu initiating the creation was consecrated in the central shrine there which was ravaged by Mohammad Ghori and his henchman Kutubuddin. The pillar was raised at the com- mand is an ancient Hindu king who had made great conquests in the East and the West.

https://www.facebook.com/rayvikumar/media_set?set=a.131288093590797.31090.100001288223976&type=3

In the inscription is interesting and particularly the last line of the inscription gives some curious information. The last line of the inscription is like this:

विष्णुपदे गिरौ भगवतो विष्नोर्ध्वज: स्थापित:।

Al-biruni has said Sri Harsha Shaka from 456 BC-that might be date of this pillar.

Ibn-Batuta has written that Kutub-minar was built 1500 years before Kutub-ud-Din Aibak (1206-1210).

Sir Saiyad Ahmed had protested calling Kutub-minar an Islamic structure as it was full of Hindu marks. He wrote a 300 page book in 1911 to prove his point. It is not a question of Hindu or Islamic marks.

It is assumed by secularist and anti hindu historians that Qutubuddib and Iltutmish finished it though the pictures will clearly show that the tower was a Hindu cultural place .

Kutub Minar itself there is overwhelming proof that it was a Hindu tower existing hundreds of years before Kutubuddin and therefore it is wrong to ascribe the tower to Kutubuddin.

The township adjoining the Kutub Minar is known as Mehrauli. That is a Sanskrit word Mihira-awali. It signifies the town- ship where the well known astronomer Mihira of Vikramaditya’s court lived along with his helpers, mathemati- cians and technicians. They used the so-called Kutub tower as an observation post for astronomical study. Around the tower were pavilions dedicated to the 27 constel- lations of the Hindu Zodiac.

Kutubuddin has left us an inscription that he destroyed these pavilions. But he has not said that he raised any tower. The ravaged temple was renamed as Kuwat-ul-Islam mosque.

Stones dislodged from the so-called Kutub Minar have Hindu images on one side with Arabic lettering on the other. Those stones have now been removed to the Museum. They clearly show that Muslim invaders used to remove the stone- dressing of Hindu buildings, turn the stones inside out to hide the image facial and inscribe Arabic lettering on the new frontage.

Bits of Sanskrit inscriptions can still be deciphered in the premises on numerous pillars and walls. Numerous images still adorn the cornices though disfigured.

The tower is but a part of the surrounding structures. It is not that while the temples around are earlier Hindu build- ings there was sufficient space left in between for Kutubud- din to come and build a tower. Its very ornate style proves that it is a Hindu tower. Mosque minarets have plane sur- faces. Those who contend that the tower was meant to call the Muslim residents to prayer have perhaps never tried to go to the top and try to shout to the people below. Had they done so they would have found out for themselves that no one on the ground can hear them from that height. Such absurd claims have been made to justfy Muslim authorship of earlier Hindu buildings.

Another important consideration is that the entrance to the tower faces north and not the west as is enjoined by Islamic theology and practice.

At either side of the entrance is the stone lotus flower emblem which also proves that it was a Hindu building. The stone flowers are a very important sign of the Hindu author- ship of mediaeval buildings. Muslims never use such flowers on the buildings they construct.

The frieze Patterns on the tower show signs of tampering, ending abruptly or in a medley of incongruent lines. The Arabic lettering is interspersed with Hindu motifs like lotus buds hanging limp. Sir Sayyad Ahmad Khan, a staunch Muslim and a scholar, has admitted that the tower is a Hindu building.

If one were to hoover in an aeroplane over the top of the tower the various galleries sliding into each other from top to bottom appear like a 24-petal lotus in full bloom. The figure 24 being a multiple of 8 is sacred in Vedic tradi- tion. Even the brick red colour of the tower is sacred to the Hindus.

The tower had seven storeys representing the week of those only five exist now. The sixth was dismantled, hauled down and re-erected on the lawns closeby.

The seventh storey had actually a statue of the four-faced Brahma holding the Vedas at the beginning of creation. Above Brahma was a white marble canopy with gold bell patterns laid in it. The t top three stories were in mle. They were ravaged by iconoclastic muslims who detested the Brahma sta- tue. The Muslim raiders also destroyed the reclining Vishnu image at the bottom.

The iron pillar was the Garud Dhwaj alias Garud Stambh, i.e, the sentinel post of the Vishnu temple.

On one side was an elliptical enclave formed by 27 Nakshatra (constellation) temples. A gigantic red-stone, ornate gate- way led to the sacred enclave known as Nakshatralaya. There- fore gateway is traditionally known as Alaya-Dwar.

Cunningham twists the traditional Hindu name to fraudulently ascribe the great doorway to Sultan Allauddin though Allaud- din himself makes no such claim.

By Allauddin’s time the surroundings were totally crumbling ruins. Why would Allauddin want to raise an ornate gigantic gatewwa(of the Hindu orange colour) leading from nowhere to nowhere ?

The theory propounded by interested Muslims that it is a muazzin’s tower is a motivated lie. No muazzin would even for a day adept a job where he has to climb and unclimb five times a day a flight of 365 narrowing, curving steps in the dark confines of the tower. He is bound to fall and die through sheer exhaustion.

The arched gateway of the adjoining so-called Kuwat-ul-Islam mosque is in no way different from the ornate archways of temples in Gujarat. The frieze patterns on this building too. The frieze patterns on this building too show signs of tampering proving that Muslim conquerors transposed stones at random to ease their conscience in readying earlier tem- ples for use as mosques.

The tower girth is made up of exactly 24 folds, arcs and triangles alternating. This shows that the figure 24 had social prominence and significance in the premises. The apertures for letting in light are 27. Considered along with the 27 constellation pavilions mentioned earlier it leaves no doubt that the tower too was an astronomical observation pole.

In Arabic the term ‘Kutub Minar’ signifies an astronomical Tower. That was how it was described to Sultan and later referred to in court correspondence. In course of time the name of Sultan Kutubuddin came to be unwittingly associated with the Kutub Tower leading to the misleading asserion that Kutubuddin built the Kutub Minar.

Iron strips have been used to keep the huge boulders fastened together in the construction of the tower. Similar strips have been used in the stone walls of Agra Fort.

PN OAK – Tajmahal was a Rajput Palace I have already dealt at some length on the origin of the fort and proved that it existed during pre-muslim times.

Therefore it is apparent that the use of iron strips to keep together stones in huge buildings was a Hindu device. That device used in the so- called Kutub Minar in Delhi another proof of its having been a pre-Muslim Hindu tower. If a 24-petal lotus is pulled up from its centre it will form a tower of that pattern. Lotus pattern is never Muslim.

JEWELS OF BHARATAM .....SERIES [TM]

VIJAYA STAMBH AND NOT KUTUB MINAR ...

Vijaya Stammbha now called - Kutub Minar was built by Sriharsha-Vikramaditya in 456 BC. In 300 BC, Megasthenes has called it Pillar of Hercules. Hercules is Vishnu or his incarnation/ krishna .

The Hindu title of the tower was Vishnu Dhwaj (i.e. Vishnu's standard) alias Vishnu Stambh alias Dhruv Stambh (i.e., a polar pillar) obviously connoting an astronomical observa- tion tower. The Sanskrit inscription in Brahmi script on the non-rusting iron pillar close by proclaims that the lofty standard of Vishnu was raised on the hillock named Vishnupad Giri. That description indicates that a statue of the rec- lining Vishnu initiating the creation was consecrated in the central shrine there which was ravaged by Mohammad Ghori and his henchman Kutubuddin. The pillar was raised at the com- mand is an ancient Hindu king who had made great conquests in the East and the West.

https://www.facebook.com/rayvikumar/media_set?set=a.131288093590797.31090.100001288223976&type=3

In the inscription is interesting and particularly the last line of the inscription gives some curious information. The last line of the inscription is like this:

विष्णुपदे गिरौ भगवतो विष्नोर्ध्वज: स्थापित:।

Al-biruni has said Sri Harsha Shaka from 456 BC-that might be date of this pillar.

Ibn-Batuta has written that Kutub-minar was built 1500 years before Kutub-ud-Din Aibak (1206-1210).

Sir Saiyad Ahmed had protested calling Kutub-minar an Islamic structure as it was full of Hindu marks. He wrote a 300 page book in 1911 to prove his point. It is not a question of Hindu or Islamic marks.

It is assumed by secularist and anti hindu historians that Qutubuddib and Iltutmish finished it though the pictures will clearly show that the tower was a Hindu cultural place .

Kutub Minar itself there is overwhelming proof that it was a Hindu tower existing hundreds of years before Kutubuddin and therefore it is wrong to ascribe the tower to Kutubuddin.

The township adjoining the Kutub Minar is known as Mehrauli. That is a Sanskrit word Mihira-awali. It signifies the town- ship where the well known astronomer Mihira of Vikramaditya's court lived along with his helpers, mathemati- cians and technicians. They used the so-called Kutub tower as an observation post for astronomical study. Around the tower were pavilions dedicated to the 27 constel- lations of the Hindu Zodiac.

Kutubuddin has left us an inscription that he destroyed these pavilions. But he has not said that he raised any tower. The ravaged temple was renamed as Kuwat-ul-Islam mosque.

Stones dislodged from the so-called Kutub Minar have Hindu images on one side with Arabic lettering on the other. Those stones have now been removed to the Museum. They clearly show that Muslim invaders used to remove the stone- dressing of Hindu buildings, turn the stones inside out to hide the image facial and inscribe Arabic lettering on the new frontage.

Bits of Sanskrit inscriptions can still be deciphered in the premises on numerous pillars and walls. Numerous images still adorn the cornices though disfigured.

The tower is but a part of the surrounding structures. It is not that while the temples around are earlier Hindu build- ings there was sufficient space left in between for Kutubud- din to come and build a tower. Its very ornate style proves that it is a Hindu tower. Mosque minarets have plane sur- faces. Those who contend that the tower was meant to call the Muslim residents to prayer have perhaps never tried to go to the top and try to shout to the people below. Had they done so they would have found out for themselves that no one on the ground can hear them from that height. Such absurd claims have been made to justfy Muslim authorship of earlier Hindu buildings.

Another important consideration is that the entrance to the tower faces north and not the west as is enjoined by Islamic theology and practice.

At either side of the entrance is the stone lotus flower emblem which also proves that it was a Hindu building. The stone flowers are a very important sign of the Hindu author- ship of mediaeval buildings. Muslims never use such flowers on the buildings they construct.

The frieze Patterns on the tower show signs of tampering, ending abruptly or in a medley of incongruent lines. The Arabic lettering is interspersed with Hindu motifs like lotus buds hanging limp. Sir Sayyad Ahmad Khan, a staunch Muslim and a scholar, has admitted that the tower is a Hindu building.

If one were to hoover in an aeroplane over the top of the tower the various galleries sliding into each other from top to bottom appear like a 24-petal lotus in full bloom. The figure 24 being a multiple of 8 is sacred in Vedic tradi- tion. Even the brick red colour of the tower is sacred to the Hindus.

The tower had seven storeys representing the week of those only five exist now. The sixth was dismantled, hauled down and re-erected on the lawns closeby.

The seventh storey had actually a statue of the four-faced Brahma holding the Vedas at the beginning of creation. Above Brahma was a white marble canopy with gold bell patterns laid in it. The t top three stories were in mle. They were ravaged by iconoclastic muslims who detested the Brahma sta- tue. The Muslim raiders also destroyed the reclining Vishnu image at the bottom.

The iron pillar was the Garud Dhwaj alias Garud Stambh, i.e, the sentinel post of the Vishnu temple.

On one side was an elliptical enclave formed by 27 Nakshatra (constellation) temples. A gigantic red-stone, ornate gate- way led to the sacred enclave known as Nakshatralaya. There- fore gateway is traditionally known as Alaya-Dwar.

Cunningham twists the traditional Hindu name to fraudulently ascribe the great doorway to Sultan Allauddin though Allaud- din himself makes no such claim.

By Allauddin's time the surroundings were totally crumbling ruins. Why would Allauddin want to raise an ornate gigantic gatewwa(of the Hindu orange colour) leading from nowhere to nowhere ?

The theory propounded by interested Muslims that it is a muazzin's tower is a motivated lie. No muazzin would even for a day adept a job where he has to climb and unclimb five times a day a flight of 365 narrowing, curving steps in the dark confines of the tower. He is bound to fall and die through sheer exhaustion.

The arched gateway of the adjoining so-called Kuwat-ul-Islam mosque is in no way different from the ornate archways of temples in Gujarat. The frieze patterns on this building too. The frieze patterns on this building too show signs of tampering proving that Muslim conquerors transposed stones at random to ease their conscience in readying earlier tem- ples for use as mosques.

The tower girth is made up of exactly 24 folds, arcs and triangles alternating. This shows that the figure 24 had social prominence and significance in the premises. The apertures for letting in light are 27. Considered along with the 27 constellation pavilions mentioned earlier it leaves no doubt that the tower too was an astronomical observation pole.

In Arabic the term 'Kutub Minar' signifies an astronomical Tower. That was how it was described to Sultan and later referred to in court correspondence. In course of time the name of Sultan Kutubuddin came to be unwittingly associated with the Kutub Tower leading to the misleading asserion that Kutubuddin built the Kutub Minar.

Iron strips have been used to keep the huge boulders fastened together in the construction of the tower. Similar strips have been used in the stone walls of Agra Fort.

PN OAK - Tajmahal was a Rajput Palace I have already dealt at some length on the origin of the fort and proved that it existed during pre-muslim times.

Therefore it is apparent that the use of iron strips to keep together stones in huge buildings was a Hindu device. That device used in the so- called Kutub Minar in Delhi another proof of its having been a pre-Muslim Hindu tower. If a 24-petal lotus is pulled up from its centre it will form a tower of that pattern. Lotus pattern is never Muslim.
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यह हमारे देश की विडम्बना


यह हमारे देश की विडम्बना ही है कि भारत को लूटने-खसोटनेवाले और हजार वर्षों तक गुलाम रखनेवाले अरब, तुर्क, पठान, मुग़ल और अंग्रेज साम्राज्यवादी आक्रांताओं के नाम पर रखे गये भवनों और सड़कों आदि के नाम स्वाधीनता के बाद भी “सेक्युलरिज्म” के नाम पर बड़ी बेशर्मी से न केवल ढोए जा रहे हैँ अपितु दासता तथा पराधीनता के इन चिन्हों को भारत की राष्ट्रीयता, स्वतंत्रता तथा एकता का प्रतीक मानने का प्रयास किया जा रहा है
सन ११९१ में विश्वप्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय को जलाकर नष्ट करनेवाले बख्तियार खिलजी के नाम पर पटना के पास “बख्तियारपुर” शहर और स्टेशन अभी भी विद्यमान है. यह हमारे देश पर एक कलंक है I इसी प्रकार आज भी हमारे उपनगरों व सड़कों के नाम (विशेषकर राजधानी दिल्ली में) विदेशी लुटेरों और भारतविरोधी तत्वों के नाम पर रखे जा रहे है, जैसे—
तुगलक रोड,
लोदी रोड,
अकबर रोड,
औरंगजेब रोड,
शाहजहाँ रोड,
जहांगीर रोड,
लार्ड मिंटो रोड,
लारेन्स रोड,
डलहोजी रोड,
आर्थर रोड आदि-आदि।
यह सर्वविदित है कि पहले मुस्लिम पठानों तथा मुगलों ने भारत की सैकड़ों कलाकृतियों, विशाल मंदिरों, राजमहलों, विश्वविद्यालयों का ध्वंस किया। बाद में इनके खण्डहरों पर अनेक मकबरों, मस्जिदों, किलों तथा भवनों का निर्माण किया। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे अनेक स्थान है जहां आज भी अनेक भग्नावशेषों को देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए दिल्ली की कुतुबमीनार, अजमेर में ढाई दिन का झोपड़ा, अयोध्या में रामजन्मभूमि मन्दिर, ताजमहल, फतेहपुरी के भवन तथा दिल्ली का लालकिला है। सोमनाथ मंदिर पर न जाने कितनी बार आक्रमण हुए। काबुल से कन्याकुमारी तक आज भी सैकड़ों नगरों, कस्बों, ग्रामों के नाम, मुख्य सड़कों के नाम इन्हीं बदले नामों से जाने जाते हैं। अंग्रेजी शासकों ने भी धूर्ततापूर्ण तथा बेशरमी से जहां जानबूझकर मुस्लिम कुकृत्यों को संरक्षण दिया वहीं अनेक स्थानों, सड़कों, भवनों को अपने नाम से जोड़ा। गौरीशंकर चोटी, एक अंग्रेज सर्वेक्षक के नाम से “माउंट एवरेस्ट” बन गई। रामसेतु को “एडम्सब्रिज” कहा जाने लगा। 1857 के अनेक क्रूर सेनापतियों के नाम से अण्डमान द्वीप के सहायक टापूओं को जोड़ दिया हयू्रोज, ओटुरम, हेवलाक, निकलसन, नील, जान लारेंस, हेनरी लारेंस आदि के नामों से उन्हें आज भी पुकारा जाता है। अंग्रेजों ने 1912 में दिल्ली को राजधानी बनाया और लाल किले को ब्रिटिश सैनिकों की छावनी बना दिया गया। शासनतंत्र को चलाने के लिए सर एडविन ल्युटिंयस के द्वारा अनेक नये भवनों का निर्माण कराया गया। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि लगभग एक हजार साल की गुलामी के बाद भी इसे आजादी का प्रतीक स्थल समझा गया।
इसका दूरगामी दुष्परिणाम यह हुआ कि भारतीय इतिहास में विदेशियों से सतत संघर्ष करने वाले अनेक योद्धाओं के क्रियाकलापों तथा उनके स्थलों को विस्मृत करने का योजनापूर्वक प्रयास हुआ। उदाहरण बप्पारावल, राणा सांगा, महाराणा प्रताप की संघर्ष स्थली चितौड़गढ़, हिन्दवी स्वराज्य के संस्थापक शिवाजी की जन्मभूमि शिवनेरी का दुर्ग तथा उनका राज्यभिषेक स्थल रायगढ़ का दुर्ग, खालसा पंथ के निर्माता गुरु गोविन्द सिंह के आनन्दपुर साहब को इतिहास के पन्नों से निकालकर, कुछ सेकुलरवादी तथा वामपंथी लेखकों ने इन महानायकों तथा उनके पवित्र तथा शौर्य स्थलों को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। बाबर, अकबर, औरंगजेब को उन्होंने संस्कृति का महान सन्देशवाहक, उदात्त भावनाओं का परिचायक तथा जिंदा पीर तक कह डाला।
भारत के शासकों की स्वाभिमानशून्यता और निर्लज्जता ऐसी है कि वे इन शर्मनाक-स्मारकों की सुरक्षा में जुटे हुए हैं। वर्तमान सत्ताधीशों की सत्ता लोलुपता तो देखिए कि काशी और मथुरा के कलंकों की सुरक्षा के लिए उन्होंने कानून तक बना दिये हैं। यही नहीं काशी-विश्वनाथ में जलाभिषेक होता है तो सारे सेकुलर-सियार हू-हू करना शुरु कर देते हैं। मथुरा में यज्ञ करने की बात आती है तो आसमान सर पर उठा लिया जाता है। पूरी केंद्र सरकार हरकत में आ जाती है, केंद्रीय मंत्री मथुरा पहुंच जाते हैं, जबकि इन मंत्रियों को कश्मीरी विस्थापितों की सुध लेने की याद तक भी नहीं आती है।
एक ओर भारत के हुक्मरानों की यह ‘आत्मगौरवहीनता’ है तो दूसरी ओर ऐसे राष्ट्रों के उदाहरण हैं जिन्होंने गुलामी के निशानों को जड़ सहित मिटा दिया। सन् 1914-15 में रूसियों ने पोलैंड की राजधानी वार्सा को जीत लिया तो उन्होंने शहर के मुख्य चौक में एक चर्च बनवाया। रूसियों ने यह पोलैंडवासियों को निरन्तर याद करवाने के लिए बनवाया कि पोलैंड में रूस का शासन है। जब पोलैंड 1918 में आजाद हुआ तो पोलैंडवासियों ने पहला काम उस चर्च को ध्वस्त करने का किया, हालांकि नष्ट करने वाले सभी लोग ईसाई मत को माननेवाले ही थे। मैं जब पोलैंड पहुंचा तो चर्च ध्वस्त करने का काम समाप्त हुआ ही था। मैं एक चर्च को ध्वस्त करने के लिए पोलैंड को दोषी नहीं मानता क्योंकि रूस ने वह चर्च राजनीतिक कारणों से बनवाया था। उनका मन्तव्य पोल लोगों का अपमान करना था।‘’
सन 1968 में भारत के सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल लोकसभा के तत्कालीन अध्यक्ष नीलम संजीव रेड्डी के नेतृत्व में रूस गया। रूसी दौरे के समय सांसदों को लेनिनग्राद शहर का एक महल दिखाने भी ले जाया गया। वह रूस के ‘जार’ (राजा) का सर्दियों में रहने के लिए बनवाया गया महल था। महल को देखते समय सांसदों के ध्यांन में आया कि पूरा महल तो पुराना लगता था किन्तुय कुछ मूर्तियां नई दिखाई देती थीं। पूछताछ करने पर पता लगा कि वे मूर्तियां ग्रीक देवी-देवताओं की हैं। सांसदों में प्रसिद्ध विचारक तथा भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी भी थे। उन्होंने सवाल किया कि, ‘आप तो धर्म और भगवान के खिलाफ हैं, फिर आपकी सरकार ने देवी-देवताओं की मूर्तियों को फिर से बनाकर यहां क्यों रखा है?’ इस पर साथ चल रहे रूसी अधिकारी ने उत्तर दिया, ‘इसमें कोई शक नहीं कि हम घोर नास्तिक हैं किन्तुत महायुद्ध के दौरान जब हिटलर की सेनाएं लेनिनग्राद पर पहुंच गई तो वहां हम लोगों ने उनसे जमकर संघर्ष किया। इस कारण जर्मन लोग चिढ़ गये और हमारा अपमान करने के लिए उन्हों ने यहां की देवी-देवताओं की प्राचीन मूर्तियां तोड़ दी। इसके पीछे यही भाव था कि रूस का राष्ट्रीय अपमान किया जाये। हमारी दृष्टि में हमें ही नीचा दिखाया जाये। इस कारण हमने भी प्रण किया कि महायुद्ध में हमारी विजय होने के पश्चात् राष्ट्रीय सम्मान की पुनर्स्थापना करने के लिए हम इन देवताओं की मूर्तियां फिर से स्थापित करेंगे। रूसी अधिकारी ने आगे कहा कि, ‘हम तो नास्तिक हैं ही किन्तु मूर्तिभंजन का काम हमारा अपमान करने के लिए किया गया था और इसलिए इस राष्ट्रीय अपमान को धो डालने के लिए हमने इन मूर्तियों का पुनर्निर्माण किया।‘ ये मूर्तियां आज भी जार के ‘विन्टशर पैलेस’ में रखी हैं और सैलानियों के मन में कौतुहल जगाती हैं I
दक्षिण कोरिया अनेक वर्षों तक जापान के कब्जेय में रहा है। जापानी सत्ताधारियों ने अपनी शासन सुविधा के लिए राजधानी सिओल के बीचों-बीच एक भव्य इमारत बनाई और उसका नाम ‘कैपिटल बिल्डिंग’ रखा। इस समय इस भवन में कोरिया का राष्ट्रीय संग्रहालय है। इस संग्रहालय में अनेक प्राचीन वस्तुओं के साथ जापानियों के अत्यााचारों के भी चित्रा हैं।
वर्ष 1995 में दक्षिण कोरिया को आजाद हुए पचास वर्ष पूरे हो रहे हैं। अत: वहां की सरकार आजादी का स्व र्ण जयंती वर्ष’ धूमधाम से मनाने की तैयारी कर रही है। इस स्वतंत्राता प्राप्ति की स्व र्णा जयंती महोत्साव का एक प्रमुख कार्यक्रम होगा ‘कैपिटल बिल्डिंग’ को ध्ववस्त करना। दक्षिण कोरिया की सरकार ने इस विशाल भवन को गिराने का निर्णय ले लिया है। इसमें स्थित संग्रहालय को नये बन रहे दूसरे भवन में ले जाया जायेगा। इस पूरी कार्रवाई में 1200 करोड़ रुपये खर्च होंगे।
यह समाचार 2 मार्च 1995 को बी.बी.सी. पर प्रसारित हुआ था। कार्यक्रम में ‘कैपिटल बिल्डिंग’ को भी दिखाया गया। इस भवन में स्थित ‘राष्ट्रीय वस्तु संग्रहालय’ के संचालक से बीबीसी संवाददाता की बातचीत भी दिखाई गई। जब उनसे इस इमारत को नष्ट करने का कारण पूछा गया तो संचालक महोदय ने बताया कि, ‘इस इमारत को देखते ही हमें जापान द्वारा हम पर लादी गई गुलामी की याद आ जाती है। इसको गिराने से जापान और दक्षिण कोरिया के बीच सम्बंकधों का नया दौर शुरु हो सकेगा। इसके पीछे बना हमारे राजा का महल लोगों की नजरों से ओझल रहे यही इसको बनाने का उद्देश्यख था और इसी कारण हम इसको गिराने जा रहे हैं।‘ दक्षिण कोरिया की जनता ने भी सरकार के इस निर्णय का उत्सा हपूर्वक स्वाहगत किया। (यह भवन उसी वर्ष ध्व स्तह कर दिया गया।)
पांच सौ साल पुराने गुलामी के निशान मिटाये कुछ वर्ष पहले तक युगोस्लाीविया एक राज्ये था जिसके अन्त र्गत कई राष्ट्र थे। साम्य वाद के समाप्तप होते ही ये सभी राष्ट्र स्व्तंत्र हो गये तथा सर्बिया, क्रोशिया, मान्टेदनेग्रो, बोस्निया हर्जेगोविना आदि अलग-अलग नाम से देश बन गये। बोस्निया में अभी भी काफी संख्याय में सर्ब लोग हैं। ऐसे क्षेत्रों में जहां सर्ब काफी संख्याग में हैं, इस समय (सन् 1995) सर्बियाई तथा बोस्निया की सेना में युद्ध चल रहा है। इस साल के शुरु में सर्ब सैनिकों ने बोस्निया के कब्जेैवाला एक नगर ‘इर्वोनिक’ अपने अधिकार में ले लिया।
इर्वोनिक की एक लाख की आबादी में आधे सर्ब हैं और शेष मुसलमान। सर्ब फौजों के कब्जे के बाद मुसलमान इस शहर से भाग गये तथा बोस्निया के ईसाई यहां आ गये। ब्रंकों ग्रूजिक नाम के एक सर्ब नागरिक को शहर का महापौर भी बना दिया गया। महापौर ने सबसे पहले यह काम किया कि नगर के बाहर बहने वाली ड्रिना नदी के किनारे बनी एक टेकड़ी पर एक ‘क्रास’ लगा दिया। महापौर ने बताया कि, ‘इस स्थानन पर हमारा चर्च था जिसे तुर्की के लोगों ने सन् 1463 में ध्वेस्तन कर डाला था। अब हम उस चर्च को इसी स्थाौन पर पुन: नये सिरे से खड़ा करेंगे।‘ श्री ग्रूजिक ने यह भी कहा कि तुर्कों की चार सौ साल की सत्ता में उनके द्वारा खड़े किये गये सारे प्रतीक मिटाये जाएंगे। उसी टेकड़ी पर पुराने तुर्क साम्राज्यक के रूप में एक मीनार खड़ी थी उसे सर्बों ने ध्व़स्ता कर दिया। टेकड़ी के नीचे ‘रिजे कॅन्का् ’ नाम की एक मस्जिद को भी बुलडोजर चलाकर मटियामेट कर दिया गया। यह विस्तृेत समाचार अमरीकी समाचार पत्र हेरल्डे ट्रिब्युरन में 8 मार्च 1995 को छपा। समाचार लाने वाला संवाददाता लिखता है कि उस टेकड़ी पर पांच सौ साल पहले नष्टा किये गये चर्च की एक घंटी पड़ी हुई थी। महापौर ने अस्थाायी क्रॉस पर घंटी टांककर उसको बजाया। घंटी गुंजायमान होने के बाद महापौर ने कहा कि, ‘मैं परमेश्वेर से प्रार्थना करता हूं कि वह क्लिंटन (अमरीकी राष्ट्र पति) को थोड़ी अक्लौ दे ताकि वह मुसलमानों का साथ छोड़कर उसके सच्चेए मित्र ईसाइयों का साथ दे।
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जब कलकत्ता महानगर पालिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाये गये तो उन्होंने कलकत्ता महानगरपालिका का पूरा तंत्र एवं उसकी कार्यपद्धति तथा कोलकाता के रास्तों के नाम बदलकर उन्हें भारतीय नाम दे दिये थे। कुछ इसी तरह का काम समाजवादी नेता राजनारायण (1917-1986) ने भी किया। उन्होंने बनारस के प्रसिद्ध बेनियाबाग में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया की स्थापित प्रतिमा के टुकडे-टुकडे कर गुलामी के प्रतीक को मिट्टी में मिला दिया। हालांकि उनके इस कृत्य के लिये पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था, परंतु आज उसी पार्क को “लोकबन्धु राजनारायण पार्क” के नाम से जाना जाता है। जबतक सत्ता की भूख नेताओं के सर पर सवार नहीं हुई थी, गुलामी के प्रतीकों को मिटाने का प्रयत्न किया गया। नागपुर के विधानसभा भवन के सामने लगी रानी विक्टोरिया की संगमरमर की मूर्ति आजादी के बाद हटा दी गई। मुम्बई के काला घोड़ा स्थान पर घोड़े पर सवार इंग्लैंड के राजा की प्रतिमा हटाई गई। विक्टोरिया, एडवर्ड और जार्ज v से जुड़े अस्पताल, भवन, सड़कों आदि तक के नाम बदले गये। लेकिन जब सत्ता का स्वार्थ और चाहे जैसे हो सत्ता में बने रहने की अंधी लालसा जगी तो दिल्ली की सड़कों के नाम अकबर, जहांगीर, शाहजहां तथा औरंगजेब रोड तक रख दिये गये। बिहार के भ्रष्टतम मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने पटना का नाम “अजीमाबाद” करवाने के लिए अथक प्रयास किया I खान्ग्रेस सरकार ने प्रारभ से ही अपने कार्यकाल में बनवाए भवनों, सडकों और स्मारकों के नाम जवाहर, इंदिरा और राजीव के नाम से रखने की नीति रखी जैसे इन नेताओं ने ही देश के लिए सबकुछ किया I
समस्त देशवासी तनिक विचार करें, राष्ट्रद्रोहियों और आतंकवादियों के नामों का इस प्रकार से भारत पर जबरदस्ती थोपा जाना एक षडयंत्र नहीं है क्या ..? ए.ओ. ह्यूम द्वारा स्थापित और सम्प्रति Edvige Antonia Albina Màino (सोनिया गांधी) द्वारा पोषित महानीच खान्ग्रेस-सरकार की भारतविरोधी नीति और मानसिक एवं वैचारिक गुलामी की यह एक झलकमात्र है I जिस देश का प्रधानमंत्री ही एक विदेशी औरत का पालतू कुत्ता है, वहां इनसे परिवर्तन की क्या अपेक्षा की जा सकती है ?
हम भारतीयों का पुनीत कर्तव्य है कि गुलामी के प्रतीक इन नामों के परिवर्तन के लिए देशव्यापी अभियान प्रारंभ करें। देश में सत्ता-परिवर्तन होने जा रहा है. खान्ग्रेस का जहाज डूब रह है. इस परिवर्तन में यह कार्य सम्भव है.
(विषय की परिपूर्णता के लिए इस पोस्ट के कुछ अंश साभार ग्रहण किये गए हैं)

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14-15 अगस्त सन् 194714-15 अगस्त सन् 1947


10402832_778744468832456_4870157026351807126_n को स्वतंत्र होने के बाद भारत 565 देशी रियासतों (प्रिंसली स्टेट्स, ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य का हिस्सा) में बंटा हुआ था. सरदार पटेल (1875-1950) तब उपप्रधानमंत्री के साथ देश के गृहमंत्री थे। जूनागढ, हैदराबाद और जम्मू-काश्मीर को छोडक़र 562 रियासतों ने स्वेच्छा से भारतीय परिसंघ में शामिल होने की स्वीकृति दी थी।
दरअसल, माउण्टबैटन ने जो प्रस्ताव भारत की आजादी को लेकर जवाहरलाल नेहरू के सामने रखा था उसमें ये प्रावधान था कि भारत के 565 रजवाड़े भारत या पाकिस्तान में किसी एक में विलय को चुनेंगे और वे चाहें तो दोनों के साथ न जाकर अपने को स्वतंत्र भी रख सकेंगे ।
इन 565 रजवाड़ों जिनमें से अधिकांश देशी रियासत थे, में से भारत के हिस्से में आए रजवाड़ों ने एक-एक करके विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए यूँ कह सकते हैं कि सरदार वल्लभभाई पटेल तथा वीपी मेनन (1893-1965) ने हस्ताक्षर करवा लिए।
रामपुर और पालनपुर के मुस्लिम नवाब ऐसे शासक थे जिन्होंने बिना देरी किये और बिना किसी संकोच के भारतीय संघ में मिलने की घोषणा कर दी। जबकि मंगरोल के शासक ने कुछ हिचकिचाहट के साथ अपना अस्तित्व भारतीय संघ के साथ विलीन कर दिया। टोंक रियासत के नवाब को भी जूनागढ़ के नवाब ने भड़काने का प्रयास किया। मुस्लिम लीगी नेता भी उसे पाकिस्तान के साथ विलय करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। पर उसे भी सरदार पटेल ने उधर जाने से रोक लिया।
बचे रह गए थे, हैदराबाद, जूनागढ़, जम्मू-काश्मीर और भोपाल । इनमें से भोपाल का विलय सबसे अंत में भारत में हुआ। भारत संघ में शामिल होने वाली अंतिम रियासत भोपाल इसलिए थी क्योंकि पटेल और मेनन को पता था कि भोपाल को अंतत: मिलना ही होगा। जूनागढ़ पाकिस्तान में मिलने की घोषणा कर चुका था तो जम्मू-काश्मीर स्वतंत्र बने रहने की.
आजादी के बाद पाकिस्तान सेना ने हमला कर दिया और इसके जवाब में जब भारतीय सेना ने आक्रमण किया तो पूरे कश्मीर को जीतने से पहले ही भारत सरकार ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी। उस समय जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं था. ऐसे में जम्मू-कश्मीर के पास दो विकल्प थे या तो वह भारत में शामिल हो जाए या फिर पाकिस्तान का हिस्सा बने. जम्मू-कश्मीर की जनता अधिकतर मुस्लिम थी जो पाक में शामिल होना चाहती थी लेकिन वहां के महाराजाधिराज हरि सिंह (1925-1961) का हिंदू होने के नाते भारत की ओर झुकाव था, किन्तु निर्णय लेने से हिचक रहे थे. हरि सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (श्री गुरुजी) को इस विषय पर परामर्श के लिए आनन-फानन में कश्मीर बुलाया. श्री गुरुजी ने महाराजा को कश्मीर में भारत में विलय कर लेने की सलाह दी, जिसके बाद हरि सिंह ने भारत में विलय करने का ऐलान किया और २६ अक्टूबर, १९४७ को ‘इंस्ट्रमेंट ऑफ एक्सेशन’ नाम के इस ऐतिहासिक दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए :
“Whereas the Indian Independence Act, 1947, provides that as from the fifteenth day of August, 1947, there shall be set up an independent Dominion known as INDIA, and that the Government of India Act, 1935, shall, with such omission, additions, adaptations and modifications as the Governor-General may by order specify, be applicable to the Dominion of India,
And whereas the Government of India Act, 1935, as so adapted, by the Governor General provides that an Indian State may accede to the Dominion of India by an Instrument of Accession executed by the Ruler thereof :
Now, therefore, I Shriman Inder Mahander Rajrajeshwar Maharajadhiraj Shri Hari Singhji Jammu and Kashmir Naresh Tatha Tibbet adi Deshadhipathi, Ruler of Jammu and Kashmir State, in the exercise of my Sovereignty in and over my said State do hereby execute this my Instrument of Accession; and
1. I hereby declare that I accede to the Dominion of India with the intent that the Governor-General of India, the Dominion Legislature, the Federal Court and any other Dominion authority established for the purposes of the Dominion shall, by virtue of this my Instrument of Accession but subject always to the terms thereof, and for the purposes only of the Dominion, exercise in relation to the State of Jammu and Kashmir (hereinafter refrred to as “this State”) such functions as may be vested in them by or under the Government of India Act, 1935, as in force in the Dominion of India, on the 15th Day of August 1947, (which Act as so in force is hereafter referred to as “the Act”).
2. I hereby assume the obligation of ensuring that due effect is given to provisions of the Act within this State so far as they are applicable therein by virtue of this my Instrument of Accession.
3. I accept the matters specified in the scheduled hereto as the matters with respect to which the Dominion Legislature may make laws for this State.
4. I hereby declare that I accede to the Dominion of India on the assurance that if an agreement is made between the Governor-General and the Ruler of this State whereby any functions in relation to the administration in this State of any law of the Dominion Legislature shall be exercised by the Ruler of this State, then any such agreement shall be deemed to form part of this Instrument and shall be construed and have effect accordingly.
5. The terms of this my Instrument of Accession shall not be varied by any amendment of the Act or the Indian Independence Act, 1947, unless such amendment is accepted by me by Instrument supplementary to this Instrument.
6. Nothing in this Instrument shall empower the Dominion Legislature to make any law for this State authorising the compulsory acquisition of land for any purpose, but I hereby undertake that should the Dominion for the purpose of a Dominion law which applies in this State deem it necessary to acquire any land, I will at their request acquire the land at their expense, or, if the land belongs to me transfer it to them on such terms as may be agreed or, in default of agreement, determined by an arbitrator to be appointed by the Chief justice of India.
7. Nothing in this Instrument shall be deemed to commit in any way to acceptance of any future constitution of India or to fetter my discretion to enter into arrangement with the Government of India under any such future constitution.
8. Nothing in this Instrument affects the continuance of my Sovereignty in and over this State, or, save as provided by or under this Instrument, the exercise of any powers, authority and rights now enjoyed by me as Ruler of this State or the validity of any law at present in force in this State.
9. I hereby declare that I execute this Instrument on behalf of this State and that any reference in this Instrument to me or to the Ruler of the State is to be construed as including a reference to my heirs and successors.
Given under my hand this 26th day of October, nineteen hundred and forty-seven.
Hari Singh,
Maharajadhiraj of Jammu and Kashmir State.
Acceptance of Accession by the Governor-General of India
I do hereby accept this Instrument of Accession.
Dated this twenty-seventh day of October, nineteen hundred and forty-seven.
Mountbatten of Burma,
Governor-General of India.
दिनांक २६ अक्टूबर, १९४७ को इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर होते ही सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर राज्य उसी क्षण से भारत का अभिन्न अंग हो गया और अब इसपर किसी संदेह या विवाद की कोई गुंजाईश ही नहीं है कि जम्मू-कश्मीर किसका अंग है. इससे सिद्ध है कि कांग्रेस सरकार की नाकामी की वजह से जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान और चीन ने जबरन अधिकार कर रखा है और भारत की स्वाभिमान की रक्षा के लिए नरेंद्र मोदी की सरकार को अब यह क्षेत्र उनसे वापस लेना चाहिए.