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अम्मा कितना काम करती थी

अम्मा कितना काम करती थी

              And decide where we want our india to be
Sonia,
 अम्मा कितना काम करती थी, खोदकर लाया हूँ सारे कांड–

1987 – बोफोर्स तोप घोटाला,960 करोड
1992 – शेयर घोटाला, 5,000 करोड
1995 – कस्टम टैक्स घोटाला, 43 करोड़
1995 – कॉबलर घोटाला, 1,000 करोड़ 1995 – दीनार /हवाला घोटाला, 400 करोड़
1995 – मेघालय वन घोटाला, 300 करोड
1996 – उर्वरक आयत घोटाला1,300 करोड
1996 – चारा घोटाला, 950 करोड
1996 – यूरिया घोटाला, 133 करोड
1997 – बिहार भूमि घोटाला, 400 करोड
1997 – म्यूच्यूअल फण्ड घोटाला, 1,200 करोड
1997 – सुखराम टेलिकॉम घोटाला, 1,500 करोड
1998 – उदयगोयल कृषि उपज घोटाला,210 करोड
1998 -टीक पौध घोटाला,8,000 करोड
2001-डालमिया शेयर घोटाला,595 करोड
2001-UTI घोटाला,32 करोड
2002 – कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज घोटाला, 120 करोड
2003 – स्टाम्प घोटाला, 20,000 करोड
2005 – आई पि ओ कॉरिडोर घोटाला, 1,000 करोड
2005 – बिहार बाढ़ आपदा घोटाला, 17 करोड
2005 – सौरपियन पनडुब्बी घोटाला, 18,978 करोड
2006 – ताज कॉरिडोर घोटाला, 175 करोड
2008 – काला धन, 2,10,000 करोड
2008 – सत्यम घोटाला, 8,000 करोड
2008 – सैन्य राशन घोटाला, 5,000 करोड़
2008 – स्टेट बैंक ऑफ़ सौराष्ट्र, 95 करोड़
2008 – हसन् अली हवाला घोटाला, 39,120 करोड़
2009 – उड़ीसा खदान घोटाला, 7,000 करोड़
2009 – चावल निर्यात घोटाला, 2,500 करोड़
2009 – झारखण्ड खदान घोटाला, 4,000करोड़
2009 – झारखण्ड मेडिकल उपकरण घोटाला, 130 करोड़
2010 – आदर्श घर घोटाला, 900 करोड़
2010 – खाद्यान घोटाला, 35,000 करोड़
2010 S – बैंड स्पेक्ट्रम घोटाला, 2,00,000 करोड़
2011-2जी स्पेक्ट्रम घोटाला 1,76,000करोड़
2011-कॉमन वेल्थ घोटाला,70,000 करोड,
See…..Progress report for congress.
Need feed back from all friends and family.
Either we are stupid or they are smart.
And decide where we want our india to be.
Sonia Amma how work was, I am brought to dig all the scandal —
1987-bofors gun scam, 960 crore
1992-stock scam, 5,000 crore
1995-custom tax scam, 43 crore
1995-Kŏbalara scam, 1,000 crore in 1995-Dinar / hawala scam, 400 crore
1995-Meghalaya Forest scam, 300 crore
Verse 1996-Fertilizer scam 1,300 crores
1996-fodder scam, 950 crore
1996-Urea Scam, 133 crore
1997-Bihar land scam, 400 crore
1997-myūcyū’ala financial scam, 1,200 crore
1997-sukhatme ṭēlikŏma scam, 1,500 crore
1998-Udayagōyala Agricultural Yield scam, 210 crore
1998-hopes from saree paudha scam, 8,000 crore
2001-Dalmiya share scam, 595 crore
2001-UTI scam, 32 crore
2002-Calcutta stock exchange scam, 120 crore
2003-Stamp Scam, 20,000 crore
2005-eye p o kŏriḍōra scam, 1,000 crore
2005-Bihar flood disaster scam, 17 crore
2005-saurapiyana submarine scam, 18,978 crore
2006-Taj Kŏriḍōra scam, 175 crore
2008-Black money, 2,10,000 million
2008-Satyama scam, 8,000 crore
2008-Army ration scam, 5,000 crore
2008-State Bank of saurashtra, 95 million
2008-Hasan Ali is a scam, 39,120 crore
2009-Orissa mining scam, 7,000 crore
2009-rice export scam, 2,500 crore
2009-Jharkhand Mining Scam, 4,000 crore
2009-Jharkhand medical equipment scam, 130 crore
2010-ideal home scam, 900 crore
2010-Khādyāna scam, 35,000 crore
2010 s band spectrum scam, 2,00,000 crore
2011-2 G Spectrum Scam 1,76,000 crores
2011-common wealth scam, 70,000 million,
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सोनिया गाँधी

जळु भूपत यादव's photo.
जळु भूपत यादव to जय जवान जय किशान

क्या आप जानते है की जब सोनिया गाँधी का
जन्म हुआ था तब उसके पिता पिछले 4 साल से जेल
में थे ?

हैं न अस्चर्या वाली बात ?

आज हम आपको सोनिया गांधी के जीवन से जुड़े
कई रहस्यों को उजागर करेंगे | और सही मायने में
कैसे इन्होने हवा बना कर हमारे भोले-भले
देशवाशियो को ठगने का कम किया हैं |

सोनिया गाँधी कौन है ?

सरकारी या अधिकारिक रूप से कोई भी
सोनिया गाँधी नही है |

मोहतरमा जी का
वाश्ताविक नाम अन्तोनिया अल्बीना
माइनो (antonia albina maino ) हैं | जैसा की हमें
नाम से ही पता चलता हैं की सोनिया
इटालियन है और उनका पासपोर्ट भी
इटालियन हैं | जबकि इनका शादी राजीव
गाँधी के साथ हुआ था | इसीलिए इन्होने कभी
भी अधिकारिक रूप से आपना टाइटल नही
बदला | वैसे आपको बता दे की राजिव गाँधी
और सोनिया गाँधी के मिलने की कहानी भी
काफी विवादश्पद हैं आखिर काम्ब्रिज
यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त की हुई स्टूडेंट
की क्या मजबूरी हो सकती है की वो एक बार
डांसर का कम करे और वासना को खुलेयाम
परोसे |

जरा सोचिये भारत जैसी पवित्र
संस्कृति आज किन लोगो के हाथ में हैं और ऐसा
सिर्फ और सिर्फ हमारी उदासीनता के कारन
ही हैं |

राजिव गाँधी : वाश्त्विक नाम राजिव खान
,आप फ़िरोज़ खान और इंद्रा प्रियदर्शनी के बेटे
हैं जन्म से आप मुस्लिम हैं और भारतीय जनता
को भावुकता पूर्ण रूप से लालच देने के लिए खान
की जगह गाँधी का उपयोग किया है
सोनिया गाँधी के सामाजिक या फिर
अधिकारिक पिता का नाम स्तेफानो यूजीने
मैनो (Stefano Eugene Maino) हैं | सोनिया के
पिता जर्मन थे | और हिटलर की आर्मी के मेम्बर
भी थे |

जब ज़र्मन सेना रूस गई तो वह वो
रौस्सियन आर्मी द्वारा पकड़ी गई और उन्हें २०
साल की सजा सुनाई गई थी | लेकिन कुछ ही
समय में सोनिया के पिता KGB के लिए काम
करने लगे फिर उनकी सजा २० साल से कम करके 4
साल कर दी गई | और जब उसने आपनी सजा खत्म
करके घर लोटा तो उसने अन्तोनिया albina
maino का नाम जो इटालियन था बदल कर
सोनिया रख दिया जो की एक रुस्सियन नाम
है |

सोनिया गाँधी दावा करती है की उनका
जन्म बेसनो (besano) इटली में हुआ है | जहाँ तक
सोनिया गाँधी के जन्म प्रमाण पत्र की बात
माने तो सोनिया का जन्म लुसिआना में हुआ
था जो की इटली और स्विट्ज़रलैंड के बॉर्डर पे
स्थित हैं | ये शहर जर्मन आर्मी के लिए सैर –
सपाटा और मजे करने के लिए उस समय प्रसिद्ध
था |

शिक्षा : सोनिया गाँधी ने तो शुरुआती दौर
में indian govt को ये बताया की वो कैम्ब्रिज
यूनिवर्सिटी से शिक्षा ली है जो की बाद में
गलत साबित हो गया | उसने एक और दावा
किया था की वो बेल एजुकेशन ट्रस्ट से इंग्लिश
की स्टडी की है जो की ये भी बाद में गलत
साबित हो गया.

जहा तक सोनिया गाँधी के शिक्षा की बात
है ऐसा कोई भी दस्तावेज़ नही मिला है जिसके
अधार पर ये कहा जा सके की वो ५ वि पास है |

नागरिकता : अधिकारिक रूप से सोनिया
गाँधी के पास भारतीय नागरिक होने का
अधिकार नही है | इंदिरा गाँधी ने अपने power
का उपयोग किया और गैरकानूनी तरीके से
सोनिया गाँधी को भारत के राजनीती में
पूर्ण भागीदारी का रास्ता बनाया | सारे
दस्तावेज़ , प्रमाण होने का बावजूद भी क्या गृह
मंत्रालय ने कभी इस बात पर ध्यान भी दिया ?

क्या आज़ादी का मतलब यही है ?

धर्म : क्रिस्तियानिती ,इटली में सोनिया
गाँधी की बहन alexandria ( अनुष्का ) की अपनी
दो दुकाने है जिनमे भारत से चुराई गई मुर्तिया
बेचीं जाती है | सोनिया गाँधी अपने ताकत के
बलबूते पर अवैध रूप से इन मूर्तियों का हवाई
मार्गो से तस्करी कराती हैं |

BY SUBRAMANIAM SWAMI

ये बात तो हो गयी उनके इतिहास की राजीव
गाँधी के शादी तक की लेकिन उसके बाद से
राजिव गाँधी के मौत के बाद भारत की सारी
राजनीतिक ताकत सोनिया गाँधी या कहे
तो अप्र्ताय्क्ष रूप से विदेशी शासको के हाथ में
चली गई उसके बाद सोनिया गाँधी के साथ जैसे
समझो विवादों से रिश्ता सा जुड़ गया हो |
उनके कई गैर रिस्तो को अभी आज हम पूरी
इन्टरनेट पे पढ़ सकते है | इटली के बहुत बड़े बिज़नस मैन
Ottavio Quattrocchi के साथ भी उनका रिश्ता
और इस बात को विकिपीडिया भी दबे जुबान
में स्वीकार करता है |

http://en.wikipedia.org/wiki/Sonia_Gandhi
http://truthaboutsoniagandhi.wordpress.com/

https://www.youtube.com/watch?v=3bWtCkTt
CCE

भ्रस्टाचार की जननी सोनिया गाँधी के
कारनामे तो अनगिनत है जिनको शब्दों में बयाँ
करना बहुत ही मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है
सिर्फ लोगो के अन्दर जागरूकता लाने से ऐसा
संभव हो सकता हैं |

कृपया इस जानकारी को ज्यादा से ज्यादा
शेयर करे क्युकी सिर्फ सामाजिक जागरूकता
ही इस देश के भविष्य को बुर्के में रहने वाले लोगो
से भ्रष्ट सरकार से बचा सकती हैं |

Preview YouTube video Dr. Swamy on Sonia
Gandhi’s birth and birth certificate
Dr. Swamy on Sonia Gandhi’s birth and birth
certificate
Sonia Gandhi – Wikipedia, the free
encyclopedia
en.wikipedia.org
18 hrs ·
Sonia Gandhi – Wikipedia, the free
encyclopedia
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जागो भारतीय जागो !

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सोनिया गाँधी इतनी रहस्यमय क्यों ?

Status Update
By अरून शुक्ला
सोनिया गाँधी इतनी रहस्यमय क्यों ?राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने एक बार फिर यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को निशाने पर लिया है। संघ ने आरोप लगाया है कि यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने सार्वजनिक जीवन को लेकर बहुत अधिक रहस्यात्मक हैं। वह देश की जनता से तमाम तरह की जानकारियां छुपाती आ रही हैं।आरएसएस के हिन्दी और अंग्रेजी में छपने वाले मुखपत्रों ‘पांचजन्य’ व ‘ऑर्गनाइजर’ के ताजा अंकों में सोनिया पर ये आरोप लगाए गए हैं।
पांचजन्य के संपादकीय में कहा गया है कि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के जरिए सोनिया साम्प्रदायिक व लक्षित हिंसा रोकथाम विधेयक जैसे काले कानून का प्रारूप तैयार कराके विधायी प्रक्रिया में असंवैधानिक हस्तक्षेप करने जैसी हिमाकत कर रही हैं।इसमें सवाल किया गया है कि क्या देश कांग्रेस की जागीर है जो उसके राजनीतिक हितों, सत्ता स्वार्थों व मंसूबों के हिसाब से चलाया जाएगा? उधर ऑर्गनाइज़र के लेख में आरोप लगाया गया है कि सोनिया अपने सार्वजनिक जीवन को लेकर बहुत अधिक रहस्यात्मक हैं।इसमें कहा गया है, ‘सोनिया गांधी ने पहले अपने धर्म को छिपाया, फिर संबंधियों को छिपाया और अब अपनी बीमारी को। वह लगातार इन सब जानकारियों को देश की जनता से छुपाती आ रही हैं।’

लेख में कहा गया है कि इस छिपाने और गोपनीयता बरतने की कांग्रेस अध्यक्ष की आदत का सबसे ताजा उदाहरण पिछले दस साल की अपनी इनकम टैक्स की जानकारी देने से इनकार करना है। ऑर्गनाइजर में दावा किया गया है कि सोनिया ने प्रिवेसी और सिक्युरिटी के नाम पर उनके द्वारा पिछले 10 सालों में दिए गए इनकम टैक्स की जानकारी देने से इनकार कर दिया।

इसमें कहा गया है कि इससे पहले उन्होंने अपने धर्म की जानकारी देने से यह कहकर इनकार कर दिया था कि यह उनका निजी मामला है जिसे वह सार्वजनिक नहीं करना चाहेंगी। ऑर्गनाइजर ने कहा है कि सभी सरकारी कागजातों और फॉर्मों में यह जानकारी देना जरूरी होने के बावजूद सोनिया इससे बचती आईं।

संघ ने दावा किया है कि कांग्रेस अध्यक्ष ने अपनी शैक्षिक योग्यता को भी ‘अति गोपनीय’ बना कर छिपाया हुआ है। हाल ही में उनकी बीमारी और विदेश में इलाज के बारे में लेख में कहा गया है, ‘सोनिया जब बीमार हुईं और सरकारी खर्चे पर इलाज के लिए विदेश गईं तो भी ‘निजता का सम्मान’ किए जाने के नाम पर उन्होंने बीमारी के बारे में देश को कुछ भी बताने से इनकार कर दिया।

इसमें कहा गया है कि अगर उनके इलाज पर सरकारी पैसा खर्च हुआ है तो देश की जनता को यह जानने का हक है कि इसमें कितना सार्वजनिक
धन लगा और क्यों लगा? जनता को यह जानने का भी अधिकार है कि जिस बीमारी का इलाज कराने वह विदेश गईं, क्या उसके इलाज की सुविधा देश में नहीं थी? — with Mukesh Sharma and

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सोनिया गांधी का सच !

Sachin Patil shared his post.
1 hr ·

Sachin Patil's photo.
Sachin Patil's photo.
Sachin Patil's photo.

सोनिया गांधी का सच ! पेश है “आप सोनिया
गाँधी को कितना जानते हैं”
“अब भूमिका बाँधने की आवश्यकता नहीं है और
समय भी नहीं है, हमें सीधे मुख्य मुद्दे पर आ
जाना चाहिये । भारत की खुफ़िया एजेंसी
“रॉ”, जिसका गठन सन १९६८ में हुआ, ने
विभिन्न देशों की गुप्तचर एजेंसियों जैसे
अमेरिका की सीआईए, रूस की केजीबी,
इसराईल की मोस्साद और फ़्रांस तथा जर्मनी
में अपने पेशेगत संपर्क बढाये और एक नेटवर्क
खडा़ किया । इन खुफ़िया एजेंसियों के अपने-
अपने सूत्र थे और वे आतंकवाद, घुसपैठ और चीन के
खतरे के बारे में सूचनायें आदान-प्रदान करने में
सक्षम थीं । लेकिन “रॉ” ने इटली की खुफ़िया
एजेंसियों से इस प्रकार का कोई सहयोग या
गठजोड़ नहीं किया था, क्योंकि “रॉ” के
वरिष्ठ जासूसों का मानना था कि इटालियन
खुफ़िया एजेंसियाँ भरोसे के काबिल नहीं हैं और
उनकी सूचनायें देने की क्षमता पर भी उन्हें
संदेह था । सक्रिय राजनीति में राजीव गाँधी
का प्रवेश हुआ १९८० में संजय की मौत के बाद
। “रॉ” की नियमित “ब्रीफ़िंग” में राजीव
गाँधी भी भाग लेने लगे थे (“ब्रीफ़िंग” कहते हैं
उस संक्षिप्त बैठक को जिसमें रॉ या सीबीआई
या पुलिस या कोई और सरकारी संस्था
प्रधानमन्त्री या गृहमंत्री को अपनी
रिपोर्ट देती है), जबकि राजीव गाँधी
सरकार में किसी पद पर नहीं थे, तब वे सिर्फ़
काँग्रेस महासचिव थे । राजीव गाँधी चाहते थे
कि अरुण नेहरू और अरुण सिंह भी रॉ की इन
बैठकों में शामिल हों । रॉ के कुछ वरिष्ठ
अधिकारियों ने दबी जुबान में इस बात का
विरोध किया था चूँकि राजीव गाँधी किसी
अधिकृत पद पर नहीं थे, लेकिन इंदिरा गाँधी ने
रॉ से उन्हें इसकी अनुमति देने को कह दिया
था, फ़िर भी रॉ ने इंदिरा जी को स्पष्ट कर
दिया था कि इन लोगों के नाम इस ब्रीफ़िंग
के रिकॉर्ड में नहीं आएंगे । उन बैठकों के दौरान
राजीव गाँधी सतत रॉ पर दबाव डालते रहते
कि वे इटालियन खुफ़िया एजेंसियों से भी
गठजोड़ करें, राजीव गाँधी ऐसा क्यों चाहते
थे ? या क्या वे इतने अनुभवी थे कि उन्हें
इटालियन एजेंसियों के महत्व का पता भी चल
गया था ? ऐसा कुछ नहीं था, इसके पीछे
एकमात्र कारण थी सोनिया गाँधी । राजीव
गाँधी ने सोनिया से सन १९६८ में विवाह
किया था, और हालांकि रॉ मानती थी कि
इटली की एजेंसी से गठजोड़ सिवाय पैसे और
समय की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है,
राजीव लगातार दबाव बनाये रहे । अन्ततः
दस वर्षों से भी अधिक समय के पश्चात रॉ ने
इटली की खुफ़िया संस्था से गठजोड़ कर लिया
। क्या आप जानते हैं कि रॉ और इटली के
जासूसों की पहली आधिकारिक मीटिंग की
व्यवस्था किसने की ? जी हाँ, सोनिया गाँधी
ने । सीधी सी बात यह है कि वह इटली के
जासूसों के निरन्तर सम्पर्क में थीं । एक मासूम
गृहिणी, जो राजनैतिक और प्रशासनिक
मामलों से अलिप्त हो और उसके इटालियन
खुफ़िया एजेन्सियों के गहरे सम्बन्ध हों यह
सोचने वाली बात है, वह भी तब जबकि उन्होंने
भारत की नागरिकता नहीं ली थी (वह
उन्होंने बहुत बाद में ली) । प्रधानमंत्री के घर
में रहते हुए, जबकि राजीव खुद सरकार में नहीं
थे । हो सकता है कि रॉ इसी कारण से इटली
की खुफ़िया एजेंसी से गठजोड़ करने मे कतरा
रहा हो, क्योंकि ऐसे किसी भी सहयोग के बाद
उन जासूसों की पहुँच सिर्फ़ रॉ तक न रहकर
प्रधानमंत्री कार्यालय तक हो सकती थी ।
जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था तब सुरक्षा
अधिकारियों ने इंदिरा गाँधी को बुलेटप्रूफ़
कार में चलने की सलाह दी, इंदिरा गाँधी ने
अम्बेसेडर कारों को बुलेटप्रूफ़ बनवाने के लिये
कहा, उस वक्त भारत में बुलेटप्रूफ़ कारें नहीं
बनती थीं इसलिये एक जर्मन कम्पनी को कारों
को बुलेटप्रूफ़ बनाने का ठेका दिया गया ।
जानना चाहते हैं उस ठेके का बिचौलिया कौन
था, वाल्टर विंसी, सोनिया गाँधी की बहन
अनुष्का का पति ! रॉ को हमेशा यह शक था
कि उसे इसमें कमीशन मिला था, लेकिन कमीशन
से भी गंभीर बात यह थी कि इतना महत्वपूर्ण
सुरक्षा सम्बन्धी कार्य उसके मार्फ़त दिया
गया । इटली का प्रभाव सोनिया दिल्ली तक
लाने में कामयाब रही थीं, जबकि इंदिरा
गाँधी जीवित थीं । दो साल बाद १९८६ में
ये वही वाल्टर विंसी महाशय थे जिन्हें
एसपीजी को इटालियन सुरक्षा एजेंसियों
द्वारा प्रशिक्षण दिये जाने का ठेका मिला,
और आश्चर्य की बात यह कि इस सौदे के लिये
उन्होंने नगद भुगतान की मांग की और वह
सरकारी तौर पर किया भी गया । यह नगद
भुगतान पहले एक रॉ अधिकारी के हाथों
जिनेवा (स्विटजरलैण्ड) पहुँचाया गया लेकिन
वाल्टर विंसी ने जिनेवा में पैसा लेने से मना
कर दिया और रॉ के अधिकारी से कहा कि वह
ये पैसा मिलान (इटली) में चाहता है, विंसी ने
उस अधिकारी को कहा कि वह स्विस और
इटली के कस्टम से उन्हें आराम से निकलवा देगा
और यह “कैश” चेक नहीं किया जायेगा । रॉ के
उस अधिकारी ने उसकी बात नहीं मानी और
अंततः वह भुगतान इटली में भारतीय दूतावास
के जरिये किया गया । इस नगद भुगतान के बारे
में तत्कालीन कैबिनेट सचिव बी.जी.देशमुख ने
अपनी हालिया किताब में उल्लेख किया है,
हालांकि वह तथाकथित ट्रेनिंग घोर असफ़ल
रही और सारा पैसा लगभग व्यर्थ चला गया ।
इटली के जो सुरक्षा अधिकारी भारतीय
एसपीजी कमांडो को प्रशिक्षण देने आये थे
उनका रवैया जवानों के प्रति बेहद रूखा था,
एक जवान को तो उस दौरान थप्पड़ भी मारा
गया । रॉ अधिकारियों ने यह बात राजीव
गाँधी को बताई और कहा कि इस व्यवहार से
सुरक्षा बलों के मनोबल पर विपरीत प्रभाव
पड़ रहा है और उनकी खुद की सुरक्षा व्यवस्था
भी ऐसे में खतरे में पड़ सकती है, घबराये हुए
राजीव ने तत्काल वह ट्रेनिंग रुकवा दी,लेकिन
वह ट्रेनिंग का ठेका लेने वाले विंसी को तब
तक भुगतान किया जा चुका था । राजीव
गाँधी की हत्या के बाद तो सोनिया गाँधी
पूरी तरह से इटालियन और पश्चिमी सुरक्षा
अधिकारियों पर भरोसा करने लगीं, खासकर
उस वक्त जब राहुल और प्रियंका यूरोप घूमने
जाते थे । सन १९८५ में जब राजीव सपरिवार
फ़्रांस गये थे तब रॉ का एक अधिकारी जो
फ़्रेंच बोलना जानता था, उनके साथ भेजा गया
था, ताकि फ़्रेंच सुरक्षा अधिकारियों से
तालमेल बनाया जा सके । लियोन (फ़्रांस) में
उस वक्त एसपीजी अधिकारियों में हड़कम्प मच
गया जब पता चला कि राहुल और प्रियंका गुम
हो गये हैं । भारतीय सुरक्षा अधिकारियों को
विंसी ने बताया कि चिंता की कोई बात नहीं
है, दोनों बच्चे जोस वाल्डेमारो के साथ हैं जो
कि सोनिया की एक और बहन नादिया के पति
हैं । विंसी ने उन्हें यह भी कहा कि वे
वाल्डेमारो के साथ स्पेन चले जायेंगे जहाँ
स्पेनिश अधिकारी उनकी सुरक्षा संभाल लेंगे ।
भारतीय सुरक्षा अधिकारी यह जानकर
अचंभित रह गये कि न केवल स्पेनिश बल्कि
इटालियन सुरक्षा अधिकारी उनके स्पेन जाने
के कार्यक्रम के बारे में जानते थे । जाहिर है
कि एक तो सोनिया गाँधी तत्कालीन
प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के अहसानों के
तले दबना नहीं चाहती थीं, और वे भारतीय
सुरक्षा एजेंसियों पर विश्वास नहीं करती थीं
। इसका एक और सबूत इससे भी मिलता है कि
एक बार सन १९८६ में जिनेवा स्थित रॉ के
अधिकारी को वहाँ के पुलिस कमिश्नर जैक
कुन्जी़ ने बताया कि जिनेवा से दो वीआईपी
बच्चे इटली सुरक्षित पहुँच चुके हैं, खिसियाये
हुए रॉ अधिकारी को तो इस बारे में कुछ
मालूम ही नहीं था । जिनेवा का पुलिस
कमिश्नर उस रॉ अधिकारी का मित्र था,
लेकिन यह अलग से बताने की जरूरत नहीं थी
कि वे वीआईपी बच्चे कौन थे । वे कार से
वाल्टर विंसी के साथ जिनेवा आये थे और स्विस
पुलिस तथा इटालियन अधिकारी निरन्तर
सम्पर्क में थे जबकि रॉ अधिकारी को सिरे से
कोई सूचना ही नहीं थी, है ना हास्यास्पद
लेकिन चिंताजनक… उस स्विस पुलिस कमिश्नर
ने ताना मारते हुए कहा कि “तुम्हारे
प्रधानमंत्री की पत्नी तुम पर विश्वास नहीं
करती और उनके बच्चों की सुरक्षा के लिये
इटालियन एजेंसी से सहयोग करती है” । बुरी
तरह से अपमानित रॉ के अधिकारी ने अपने
वरिष्ठ अधिकारियों से इसकी शिकायत की,
लेकिन कुछ नहीं हुआ । अंतरराष्ट्रीय खुफ़िया
एजेंसियों के गुट में तेजी से यह बात फ़ैल गई थी
कि सोनिया गाँधी भारतीय अधिकारियों,
भारतीय सुरक्षा और भारतीय दूतावासों पर
बिलकुल भरोसा नहीं करती हैं, और यह
निश्चित ही भारत की छवि खराब करने वाली
बात थी । राजीव की हत्या के बाद तो उनके
विदेश प्रवास के बारे में विदेशी सुरक्षा
एजेंसियाँ, एसपीजी से अधिक सूचनायें पा जाती
थी और भारतीय पुलिस और रॉ उनका मुँह देखते
रहते थे । (ओट्टावियो क्वात्रोची के बार-
बार मक्खन की तरह हाथ से फ़िसल जाने का
कारण समझ में आया ?) उनके निजी सचिव
विंसेंट जॉर्ज सीधे पश्चिमी सुरक्षा
अधिकारियों के सम्पर्क में रहते थे, रॉ
अधिकारियों ने इसकी शिकायत नरसिम्हा
राव से की थी, लेकिन जैसी की उनकी आदत (?)
थी वे मौन साध कर बैठ गये ।संक्षेप में तात्पर्य
यह कि, जब एक गृहिणी होते हुए भी वे गंभीर
सुरक्षा मामलों में अपने परिवार वालों को
ठेका दिलवा सकती हैं, राजीव गाँधी और
इंदिरा गाँधी के जीवित रहते रॉ को
इटालियन जासूसों से सहयोग करने को कह
सकती हैं, सत्ता में ना रहते हुए भी भारतीय
सुरक्षा अधिकारियों पर अविश्वास दिखा
सकती हैं, तो अब जबकि सारी सत्ता और ताकत
उनके हाथों मे है, वे क्या-क्या कर सकती हैं,
बल्कि क्या नहीं कर सकती । हालांकि “मैं
भारत की बहू हूँ” और “मेरे खून की अंतिम बूँद
भी भारत के काम आयेगी” आदि वे यदा-कदा
बोलती रहती हैं, लेकिन यह असली सोनिया
नहीं है । समूचा पश्चिमी जगत, जो कि जरूरी
नहीं कि भारत का मित्र ही हो, उनके बारे में
सब कुछ जानता है, लेकिन हम भारतीय लोग
सोनिया के बारे में कितना जानते हैं ? (भारत
भूमि पर जन्म लेने वाला व्यक्ति चाहे कितने
ही वर्ष विदेश में रह ले, स्थाई तौर पर बस
जाये लेकिन उसका दिल हमेशा भारत के लिये
धड़कता है, और इटली में जन्म लेने वाले व्यक्ति
का
ोनिया गाँधी, इटली, रॉ, खुफ़िया एजेंसी,
राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी,
सोनिया गाँधी भारत की प्रधानमंत्री बनने
के योग्य हैं या नहीं, इस प्रश्न का
“धर्मनिरपेक्षता “, या “हिन्दू राष्ट्रवाद”
या “भारत की बहुलवादी संस्कृति” से कोई
लेना-देना नहीं है। इसका पूरी तरह से नाता
इस बात से है कि उनका जन्म इटली में हुआ,
लेकिन यही एक बात नहीं है, सबसे पहली बात
तो यह कि देश के सबसे महत्वपूर्ण पद पर
आसीन कराने के लिये क
ैसे उन पर भरोसा किया जाये। सन १९९८ में
एक रैली में उन्होंने कहा था कि “अपनी
आखिरी साँस तक मैं भारतीय हूँ”, बहुत ही उच्च
विचार है, लेकिन तथ्यों के आधार पर यह बेहद
खोखला ठहरता है। अब चूँकि वे देश के एक खास
परिवार से हैं और प्रधानमंत्री पद के लिये
बेहद आतुर हैं (जी हाँ) तब वे एक सामाजिक
व्यक्तित्व बन जाती हैं और उनके बारे में जानने
का हक सभी को है (१४ मई २००४ तक वे
प्रधानमंत्री बनने के लिये जी-तोड़ कोशिश
करती रहीं, यहाँ तक कि एक बार तो पूर्ण
समर्थन ना होने के बावजूद वे दावा पेश करने
चल पडी़ थीं, लेकिन १४ मई २००४ को
राष्ट्रपति कलाम साहब द्वारा कुछ
“असुविधाजनक” प्रश्न पूछ लिये जाने के बाद
यकायक १७ मई आते-आते उनमे वैराग्य भावना
जागृत हो गई और वे खामख्वाह “त्याग” और
“बलिदान” (?) की प्रतिमूर्ति बना दी गईं –
कलाम साहब को दूसरा कार्यकाल न मिलने के
पीछे यह एक बडी़ वजह है, ठीक वैसे ही जैसे
सोनिया ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति
इसलिये नहीं बनवाया, क्योंकि इंदिरा गाँधी
की मृत्यु के बाद राजीव के प्रधानमंत्री बनने
का उन्होंने विरोध किया था… और अब एक
तरफ़ कठपुतली प्रधानमंत्री और जी-हुजूर
राष्ट्रपति दूसरी तरफ़ होने के बाद अगले
चुनावों के पश्चात सोनिया को प्रधानमंत्री
बनने से कौन रोक सकता है?)बहरहाल…
सोनिया गाँधी उर्फ़ माइनो भले ही आखिरी
साँस तक भारतीय होने का दावा करती रहें,
भारत की भोली-भाली (?) जनता को
इन्दिरा स्टाइल में,सिर पर पल्ला ओढ़ कर
“नामास्खार” आदि दो चार हिन्दी शब्द
बोल लें, लेकिन यह सच्चाई है कि सन १९८४
तक उन्होंने इटली की नागरिकता और
पासपोर्ट नहीं छोडा़ था (शायद कभी जरूरत
पड़ जाये) । राजीव और सोनिया का विवाह
हुआ था सन १९६८ में,भारत के नागरिकता
कानूनों के मुताबिक (जो कानून भाजपा या
कम्युनिस्टों ने नहीं बल्कि कांग्रेसियों ने ही
सन १९५० में बनाये) सोनिया को पाँच वर्ष
के भीतर भारत की नागरिकता ग्रहण कर लेना
चाहिये था अर्थात सन १९७४ तक, लेकिन
यह काम उन्होंने किया दस साल बाद…यह
कोई नजरअंदाज कर दिये जाने वाली बात नहीं
है। इन पन्द्रह वर्षों में दो मौके ऐसे आये जब
सोनिया अपने आप को भारतीय(!)साबित कर
सकती थीं। पहला मौका आया था सन १९७१
में जब पाकिस्तान से युद्ध हुआ (बांग्लादेश को
तभी मुक्त करवाया गया था), उस वक्त
आपातकालीन आदेशों के तहत इंडियन एयरलाइंस
के सभी पायलटों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गईं
थीं, ताकि आवश्यकता पड़ने पर सेना को किसी
भी तरह की रसद आदि पहुँचाई जा सके । सिर्फ़
एक पायलट को इससे छूट दी गई थी, जी हाँ
राजीव गाँधी, जो उस वक्त भी एक
पूर्णकालिक पायलट थे । जब सारे भारतीय
पायलट अपनी मातृभूमि की सेवा में लगे थे तब
सोनिया अपने पति और दोनों बच्चों के साथ
इटली की सुरम्य वादियों में थीं, वे वहाँ से
तभी लौटीं, जब जनरल नियाजी ने समर्पण के
कागजों पर दस्तखत कर दिये। दूसरा मौका
आया सन १९७७ में जब यह खबर आई कि
इंदिरा गाँधी चुनाव हार गईं हैं और शायद
जनता पार्टी सरकार उनको गिरफ़्तार करे
और उन्हें परेशान करे। “माईनो” मैडम ने
तत्काल अपना सामान बाँधा और अपने दोनों
बच्चों सहित दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित
इटालियन दूतावास में जा छिपीं। इंदिरा
गाँधी, संजय गाँधी और एक और बहू मेनका के
संयुक्त प्रयासों और मान-मनौव्वल के बाद वे
घर वापस लौटीं। १९८४ में भी भारतीय
नागरिकता ग्रहण करना उनकी मजबूरी
इसलिये थी कि राजीव गाँधी के लिये यह बडी़
शर्म और असुविधा की स्थिति होती कि एक
भारतीय प्रधानमंत्री की पत्नी इटली की
नागरिक है ? भारत की नागरिकता लेने की
दिनांक भारतीय जनता से बडी़ ही सफ़ाई से
छिपाई गई। भारत का कानून अमेरिका,
जर्मनी, फ़िनलैंड, थाईलैंड या सिंगापुर आदि
देशों जैसा नहीं है जिसमें वहाँ पैदा हुआ व्यक्ति
ही उच्च पदों पर बैठ सकता है। भारत के
संविधान में यह प्रावधान इसलिये नहीं है कि
इसे बनाने वाले “धर्मनिरपेक्ष नेताओं” ने सपने
में भी नहीं सोचा होगा कि आजादी के साठ
वर्ष के भीतर ही कोई विदेशी मूल का व्यक्ति
प्रधानमंत्री पद का दावेदार बन जायेगा।
लेकिन कलाम साहब ने आसानी से धोखा नहीं
खाया और उनसे सवाल कर लिये (प्रतिभा ताई
कितने सवाल कर पाती हैं यह देखना बाकी है)।
संविधान के मुताबिक सोनिया प्रधानमंत्री
पद की दावेदार बन सकती हैं, जैसे कि मैं या
कोई और। लेकिन भारत के नागरिकता कानून के
मुताबिक व्यक्ति तीन तरीकों से भारत का
नागरिक हो सकता है, पहला जन्म से, दूसरा
रजिस्ट्रेशन से, और तीसरा प्राकृतिक कारणों
(भारतीय से विवाह के बाद पाँच वर्ष तक
लगातार भारत में रहने पर) । इस प्रकार मैं
और सोनिया गाँधी,दोनों भारतीय नागरिक
हैं, लेकिन मैं जन्म से भारत का नागरिक हूँ और
मुझसे यह कोई नहीं छीन सकता, जबकि
सोनिया के मामले में उनका रजिस्ट्रेशन रद्द
किया जा सकता है। वे भले ही लाख दावा करें
कि वे भारतीय बहू हैं, लेकिन उनका
नागरिकता रजिस्ट्रेशन भारत के नागरिकता
कानून की धारा १० के तहत तीन उपधाराओं
के कारण रद्द किया जा सकता है (अ) उन्होंने
नागरिकता का रजिस्ट्रेशन धोखाधडी़ या
कोई तथ्य छुपाकर हासिल किया हो, (ब) वह
नागरिक भारत के संविधान के प्रति बेईमान
हो, या (स) रजिस्टर्ड नागरिक युद्धकाल के
दौरान दुश्मन देश के साथ किसी भी प्रकार के
सम्पर्क में रहा हो । (इन मुद्दों पर डॉ.
सुब्रह्मण्यम स्वामी काफ़ी काम कर चुके हैं और
अपनी पुस्तक में उन्होंने इसका उल्लेख भी किया
है, जो आप पायेंगे इन अनुवादों के “तीसरे भाग”
में)। राष्ट्रपति कलाम साहब के दिमाग में एक
और बात निश्चित ही चल रही होगी, वह यह
कि इटली के कानूनों के मुताबिक वहाँ का कोई
भी नागरिक दोहरी नागरिकता रख सकता है,
भारत के कानून में ऐसा नहीं है, और अब तक यह
बात सार्वजनिक नहीं हुई है कि सोनिया ने
अपना इटली वाला पासपोर्ट और नागरिकता
कब छोडी़ ? ऐसे में वह भारत की प्रधानमंत्री
बनने के साथ-साथ इटली की भी प्रधानमंत्री
बनने की दावेदार हो सकती हैं। अन्त में एक और
मुद्दा, अमेरिका के संविधान के अनुसार
सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले व्यक्ति को
अंग्रेजी आना चाहिये, अमेरिका के प्रति
वफ़ादार हो तथा अमेरिकी संविधान और
शासन व्यवस्था का जानकार हो। भारत का
संविधान भी लगभग मिलता-जुलता ही है,
लेकिन सोनिया किसी भी भारतीय भाषा में
निपुण नहीं हैं (अंग्रेजी में भी), उनकी भारत के
प्रति वफ़ादारी भी मात्र बाईस-तेईस साल
पुरानी ही है, और उन्हें भारतीय संविधान और
इतिहास की कितनी जानकारी है यह तो सभी
जानते हैं। जब कोई नया प्रधानमंत्री बनता है
तो भारत सरकार का पत्र सूचना ब्यूरो
(पीआईबी) उनका बायो-डाटा और अन्य
जानकारियाँ एक पैम्फ़लेट में जारी करता है।
आज तक उस पैम्फ़लेट को किसी ने भी ध्यान से
नहीं पढा़, क्योंकि जो भी प्रधानमंत्री बना
उसके बारे में जनता, प्रेस और यहाँ तक कि
छुटभैये नेता तक नख-शिख जानते हैं। यदि
(भगवान न करे) सोनिया प्रधानमंत्री पद पर
आसीन हुईं तो पीआईबी के उस विस्तृत पैम्फ़लेट
को पढ़ना बेहद दिलचस्प होगा। आखिर
भारतीयों को यह जानना ही होगा कि
सोनिया का जन्म दरअसल कहाँ हुआ? उनके
माता-पिता का नाम क्या है और उनका
इतिहास क्या है? वे किस स्कूल में पढीं? किस
भाषा में वे अपने को सहज पाती हैं? उनका
मनपसन्द खाना कौन सा है? हिन्दी फ़िल्मों
का कौन सा गायक उन्हें अच्छा लगता है? किस
भारतीय कवि की कवितायें उन्हें लुभाती हैं?
क्या भारत के प्रधानमंत्री के बारे में इतना
भी नहीं जानना चाहिये!
राजीव से विवाह के बाद सोनिया और उनके
इटालियन मित्रों को स्नैम प्रोगैती की
ओट्टावियो क्वात्रोची से भारी-भरकम
राशियाँ मिलीं, वह भारतीय कानूनों से बेखौफ़
होकर दलाली में रुपये कूटने लगा। कुछ ही
वर्षों में माइनो परिवार जो गरीबी के भंवर
में फ़ँसा था अचानक करोड़पति हो गया ।
लोकसभा के नयेनवेले सदस्य के रूप में मैंने 19
नवम्बर 1974 को संसद में ही तत्कालीन
प्रधानमंत्री श
्रीमती इन्दिरा गाँधी से पूछा था कि “क्या
आपकी बहू सोनिया गाँधी, जो कि अपने-आप
को एक इंश्योरेंस एजेंट बताती हैं (वे खुद को
ओरियंटल फ़ायर एंड इंश्योरेंस कम्पनी की एजेंट
बताती थीं), प्रधानमंत्री आवास का पता
उपयोग कर रही हैं?” जबकि यह अपराध है
क्योंकि वे एक इटालियन नागरिक हैं (और यह
विदेशी मुद्रा उल्लंघन) का मामला भी बनता
है”, तब संसद में बहुत शोरगुल मचा, श्रीमती
इन्दिरा गाँधी गुस्सा तो बहुत हुईं, लेकिन
उनके सामने और कोई विकल्प नहीं था, इसलिये
उन्होंने लिखित में यह बयान दिया कि “यह
गलती से हो गया था और सोनिया ने इंश्योरेंस
कम्पनी से इस्तीफ़ा दे दिया है” (मेरे प्रश्न
पूछने के बाद), लेकिन सोनिया का भारतीय
कानूनों को लतियाने और तोड़ने का यह
सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। 1977 में
जनता पार्टी सरकार द्वारा उच्चतम
न्यायालय के जस्टिस ए.सी.गुप्ता के नेतृत्व में
गठित आयोग ने जो रिपोर्ट सौंपी थी, उसके
अनुसार “मारुति” कम्पनी (जो उस वक्त
गाँधी परिवार की मिल्कियत था) ने “फ़ेरा
कानूनों, कम्पनी कानूनों और विदेशी पंजीकरण
कानून के कई गंभीर उल्लंघन किये”, लेकिन ना
तो संजय गाँधी और ना ही सोनिया गाँधी के
खिलाफ़ कभी भी कोई केस दर्ज हुआ, ना मुकदमा
चला। हालांकि यह अभी भी किया जा सकता
है, क्योंकि भारतीय कानूनों के मुताबिक
“आर्थिक घपलों” पर कार्रवाई हेतु कोई
समय-सीमा तय नहीं है।
जनवरी 1980 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी
पुनः सत्तासीन हुईं। सोनिया ने सबसे पहला
काम यह किया कि उन्होंने अपना नाम “वोटर
लिस्ट” में दर्ज करवाया, यह साफ़-साफ़ कानून
का मखौल उड़ाने जैसा था और उनका वीसा
रद्द किया जाना चाहिये था (क्योंकि उस
वक्त भी वे इटली की नागरिक थीं)। प्रेस
द्वारा हल्ला मचाने के बाद दिल्ली के चुनाव
अधिकारी ने 1982 में उनका नाम मतदाता
सूची से हटाया। लेकिन फ़िर जनवरी 1983 में
उन्होंने अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वा
लिया, जबकि उस समय भी वे विदेशी ही थीं
(आधिकारिक रूप से उन्होंने भारतीय
नागरिकता के लिये अप्रैल 1983 में आवेद
दिया था)। हाल ही में ख्यात कानूनविद,
ए.जी.नूरानी ने अपनी पुस्तक “सिटीजन्स
राईट्स, जजेस एंड अकाऊण्टेबिलिटी
रेकॉर्ड्स” (पृष्ठ 318) पर यह दर्ज किया है
कि “सोनिया गाँधी ने जवाहरलाल नेहरू के
प्रधानमंत्रित्व काल के कुछ खास कागजात
एक विदेशी को दिखाये, जो कागजात उनके
पास नहीं होने चाहिये थे और उन्हें अपने पास
रखने का सोनिया को कोई अधिकार नहीं
था।“ इससे साफ़ जाहिर होता है उनके मन में
भारतीय कानूनों के प्रति कितना सम्मान है
और वे अभी भी राजतंत्र की मानसिकता से
ग्रस्त हैं। सार यह कि सोनिया गाँधी के मन में
भारतीय कानून के सम्बन्ध में कोई इज्जत नहीं
है, वे एक महारानी की तरह व्यवहार करती
हैं। यदि भविष्य में उनके खिलाफ़ कोई मुकदमा
चलता है और जेल जाने की नौबत आ जाती है तो
वे इटली भी भाग सकती हैं। पेरू के राष्ट्रपति
फ़ूजीमोरी जीवन भर यह जपते रहे कि वे जन्म
से ही पेरूवासी हैं, लेकिन जब भ्रष्टाचार के
मुकदमे में उन्हें दोषी पाया गया तो वे अपने
गृह देश जापान भाग गये और वहाँ की
नागरिकता ले ली।
भारत से घृणा करने वाले मुहम्मद गोरी,
नादिर शाह और अंग्रेज रॉबर्ट क्लाइव ने
भारत की धन-सम्पदा को जमकर लूटा, लेकिन
सोनिया तो “भारतीय” हैं, फ़िर जब राजीव
और इन्दिरा प्रधानमंत्री थे, तब बक्से के बक्से
भरकर रोज-ब-रोज प्रधानमंत्री निवास से
सुरक्षा गार्ड चेन्नई के हवाई अड्डे पर इटली
जाने वाले हवाई जहाजों में क्या ले जाते थे?
एक तो हमेशा उन बक्सों को रोम के लिये बुक
किया जाता था, एयर इंडिया और
अलिटालिया एयरलाईन्स को ही जिम्मा
सौंपा जाता था और दूसरी बात यह कि
कस्टम्स पर उन बक्सों की कोई जाँच नहीं
होती थी। अर्जुन सिंह जो कि मुख्यमंत्री भी
रह चुके हैं और संस्कृति मंत्री भी, इस मामले में
विशेष रुचि लेते थे। कुछ भारतीय कलाकृतियाँ,
पुरातन वस्तुयें, पिछवाई पेंटिंग्स, शहतूश शॉलें,
सिक्के आदि इटली की दो दुकानों, (जिनकी
मालिक सोनिया की बहन अनुस्का हैं) में आम
तौर पर देखी जाती हैं। ये दुकानें इटली के
आलीशान इलाकों रिवोल्टा (दुकान का नाम
– एटनिका) और ओर्बेस्सानो (दुकान का नाम
– गनपति) में स्थित हैं जहाँ इनका धंधा नहीं के
बराबर चलता है, लेकिन दरअसल यह एक “आड़”
है, इन दुकानों के नाम पर फ़र्जी बिल तैयार
करवाये जाते हैं फ़िर वे बेशकीमती वस्तुयें लन्दन
ले जाकर “सौथरबी और क्रिस्टीज” द्वारा
नीलामी में चढ़ा दी जाती हैं, इन सबका क्या
मतलब निकलता है? यह पैसा आखिर जाता कहाँ
है? एक बात तो तय है कि राहुल गाँधी की
हार्वर्ड की एक वर्ष की फ़ीस और अन्य खर्चों
के लिये भुगतान एक बार केमैन द्वीप की किसी
बैंक के खाते से हुआ था। इस सबकी शिकायत जब
मैंने वाजपेयी सरकार में की तो उन्होंने कोई
ध्यान नहीं दिया, इस पर मैंने दिल्ली
हाइकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की।
हाईकोर्ट की बेंच ने सरकार को नोटिस जारी
किया, लेकिन तब तक सरकार गिर गई, फ़िर
कोर्ट नें सीबीआई को निर्देश दिये कि वह
इंटरपोल की मदद से इन बहुमूल्य वस्तुओं के
सम्बन्ध में इटली सरकार से सहायता ले।
इटालियन सरकार ने प्रक्रिया के तहत भारत
सरकार से अधिकार-पत्र माँगा जिसके आधार
पर इटली पुलिस एफ़आईआर दर्ज करे। अन्ततः
इंटरपोल ने दो बड़ी रिपोर्टें कोर्ट और
सीबीआई को सौंपी और न्यायाधीश ने मुझे
उसकी एक प्रति देने को कहा, लेकिन आज तक
सीबीआई ने मुझे वह नहीं दी, और यह सवाल
अगली सुनवाई के दौरान फ़िर से पूछा जायेगा।
सीबीआई का झूठ एक बार और तब पकड़ा गया,
जब उसने कहा कि “अलेस्सान्द्रा माइनो”
किसी पुरुष का नाम है, और “विया बेल्लिनी,
14, ओरबेस्सानो”, किसी गाँव का नाम है, ना
कि “माईनो” परिवार का पता। बाद में
सीबीआई के वकील ने कोर्ट से माफ़ी माँगी और
कहा कि यह गलती से हो गया, उस वकील का
“प्रमोशन” बाद में “ऎडिशनल सॉलिसिटर
जनरल” के रूप में हो गया, ऐसा क्यों हुआ, इसका
खुलासा तो वाजपेयी-सोनिया की आपसी
“समझबूझ” और “गठजोड़” ही बता सकता है।
इन दिनों सोनिया गाँधी अपने पति हत्यारों
के समर्थकों MDMK, PMK और DMK से सत्ता
के लिये मधुर सम्बन्ध बनाये हुए हैं, कोई
भारतीय विधवा कभी ऐसा नहीं कर सकती।
उनका पूर्व आचरण भी ऐसे मामलों में संदिग्ध
रहा है, जैसे कि – जब संजय गाँधी का हवाई
जहाज नाक के बल गिरा तो उसमें विस्फ़ोट
नहीं हुआ, क्योंकि पाया गया कि उसमें ईंधन
नहीं था, जबकि फ़्लाईट रजिस्टर के अनुसार
निकलते वक्त टैंक फ़ुल किया गया था, जैसे
माधवराव सिंधिया की विमान दुर्घटना के
ऐन पहले मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित
को उनके साथ जाने से मना कर दिया गया।
इन्दिरा गाँधी की मौत की वजह बना था
उनका अत्यधिक रक्तस्राव, न कि सिर में
गोली लगने से, फ़िर सोनिया गाँधी ने उस वक्त
खून बहते हुए हालत में इन्दिरा गाँधी को
लोहिया अस्पताल ले जाने की जिद की जो कि
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान
(AAIMS) से बिलकुल विपरीत दिशा में है?
और जबकि “ऐम्स” में तमाम सुविधायें भी
उपलब्ध हैं, फ़िर लोहिया अस्पताल पहुँच कर
वापस सभी लोग AAIMS पहुँचे, और इस बीच
लगभग पच्चीस कीमती मिनट बरबाद हो गये?
ऐसा क्यों हुआ, क्या आज तक किसी ने इसकी
जाँच की? सोनिया गाँधी के विकल्प बन सकने
वाले लगभग सभी युवा नेता जैसे राजेश पायलट,
माधवराव सिन्धिया, जितेन्द्र प्रसाद
विभिन्न हादसों में ही क्यों मारे गये? अब
सोनिया की सत्ता निर्बाध रूप से चल रही है,
लेकिन ऐसे कई अनसुलझे और रहस्यमयी प्रश्न
चारों ओर मौजूद हैं, उनका कोई जवाब नहीं है,
और कोई पूछने वाला भी नहीं है, यही इटली
की स्टाइल है।

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“आप सोनिया गाँधी को कितना जानते हैं”

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ये सत्य अभी तक लोगों से दूर है ! क्योंकि ये खबरे कभी सरेआम नही होने दी जाती है मेरा बस चले तो में तो इनके प्रिंट आउट निकाल कर आम जनता में बटवा दूँ !
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Aditi Gupta added 4 new photos — with रा.स्व.से.पल्ली and 12 others.
सोनिया गांधी का सच ! पेश है “आप सोनिया गाँधी को कितना जानते हैं”

“अब भूमिका बाँधने की आवश्यकता नहीं है और समय भी नहीं है, हमें सीधे मुख्य मुद्दे पर आ जाना चाहिये । भारत की खुफ़िया एजेंसी “रॉ”, जिसका गठन सन १९६८ में हुआ, ने विभिन्न देशों की गुप्तचर एजेंसियों जैसे अमेरिका की सीआईए, रूस की केजीबी, इसराईल की मोस्साद और फ़्रांस तथा जर्मनी में अपने पेशेगत संपर्क बढाये और एक नेटवर्क खडा़ किया । इन खुफ़िया एजेंसियों के अपने-अपने सूत्र थे और वे आतंकवाद, घुसपैठ और चीन के खतरे के बारे में सूचनायें आदान-प्रदान करने में सक्षम थीं । लेकिन “रॉ” ने इटली की खुफ़िया एजेंसियों से इस प्रकार का कोई सहयोग या गठजोड़ नहीं किया था, क्योंकि “रॉ” के वरिष्ठ जासूसों का मानना था कि इटालियन खुफ़िया एजेंसियाँ भरोसे के काबिल नहीं हैं और उनकी सूचनायें देने की क्षमता पर भी उन्हें संदेह था । सक्रिय राजनीति में राजीव गाँधी का प्रवेश हुआ १९८० में संजय की मौत के बाद । “रॉ” की नियमित “ब्रीफ़िंग” में राजीव गाँधी भी भाग लेने लगे थे (“ब्रीफ़िंग” कहते हैं उस संक्षिप्त बैठक को जिसमें रॉ या सीबीआई या पुलिस या कोई और सरकारी संस्था प्रधानमन्त्री या गृहमंत्री को अपनी रिपोर्ट देती है), जबकि राजीव गाँधी सरकार में किसी पद पर नहीं थे, तब वे सिर्फ़ काँग्रेस महासचिव थे । राजीव गाँधी चाहते थे कि अरुण नेहरू और अरुण सिंह भी रॉ की इन बैठकों में शामिल हों । रॉ के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने दबी जुबान में इस बात का विरोध किया था चूँकि राजीव गाँधी किसी अधिकृत पद पर नहीं थे, लेकिन इंदिरा गाँधी ने रॉ से उन्हें इसकी अनुमति देने को कह दिया था, फ़िर भी रॉ ने इंदिरा जी को स्पष्ट कर दिया था कि इन लोगों के नाम इस ब्रीफ़िंग के रिकॉर्ड में नहीं आएंगे । उन बैठकों के दौरान राजीव गाँधी सतत रॉ पर दबाव डालते रहते कि वे इटालियन खुफ़िया एजेंसियों से भी गठजोड़ करें, राजीव गाँधी ऐसा क्यों चाहते थे ? या क्या वे इतने अनुभवी थे कि उन्हें इटालियन एजेंसियों के महत्व का पता भी चल गया था ? ऐसा कुछ नहीं था, इसके पीछे एकमात्र कारण थी सोनिया गाँधी । राजीव गाँधी ने सोनिया से सन १९६८ में विवाह किया था, और हालांकि रॉ मानती थी कि इटली की एजेंसी से गठजोड़ सिवाय पैसे और समय की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है, राजीव लगातार दबाव बनाये रहे । अन्ततः दस वर्षों से भी अधिक समय के पश्चात रॉ ने इटली की खुफ़िया संस्था से गठजोड़ कर लिया । क्या आप जानते हैं कि रॉ और इटली के जासूसों की पहली आधिकारिक मीटिंग की व्यवस्था किसने की ? जी हाँ, सोनिया गाँधी ने । सीधी सी बात यह है कि वह इटली के जासूसों के निरन्तर सम्पर्क में थीं । एक मासूम गृहिणी, जो राजनैतिक और प्रशासनिक मामलों से अलिप्त हो और उसके इटालियन खुफ़िया एजेन्सियों के गहरे सम्बन्ध हों यह सोचने वाली बात है, वह भी तब जबकि उन्होंने भारत की नागरिकता नहीं ली थी (वह उन्होंने बहुत बाद में ली) । प्रधानमंत्री के घर में रहते हुए, जबकि राजीव खुद सरकार में नहीं थे । हो सकता है कि रॉ इसी कारण से इटली की खुफ़िया एजेंसी से गठजोड़ करने मे कतरा रहा हो, क्योंकि ऐसे किसी भी सहयोग के बाद उन जासूसों की पहुँच सिर्फ़ रॉ तक न रहकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक हो सकती थी । जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था तब सुरक्षा अधिकारियों ने इंदिरा गाँधी को बुलेटप्रूफ़ कार में चलने की सलाह दी, इंदिरा गाँधी ने अम्बेसेडर कारों को बुलेटप्रूफ़ बनवाने के लिये कहा, उस वक्त भारत में बुलेटप्रूफ़ कारें नहीं बनती थीं इसलिये एक जर्मन कम्पनी को कारों को बुलेटप्रूफ़ बनाने का ठेका दिया गया । जानना चाहते हैं उस ठेके का बिचौलिया कौन था, वाल्टर विंसी, सोनिया गाँधी की बहन अनुष्का का पति ! रॉ को हमेशा यह शक था कि उसे इसमें कमीशन मिला था, लेकिन कमीशन से भी गंभीर बात यह थी कि इतना महत्वपूर्ण सुरक्षा सम्बन्धी कार्य उसके मार्फ़त दिया गया । इटली का प्रभाव सोनिया दिल्ली तक लाने में कामयाब रही थीं, जबकि इंदिरा गाँधी जीवित थीं । दो साल बाद १९८६ में ये वही वाल्टर विंसी महाशय थे जिन्हें एसपीजी को इटालियन सुरक्षा एजेंसियों द्वारा प्रशिक्षण दिये जाने का ठेका मिला, और आश्चर्य की बात यह कि इस सौदे के लिये उन्होंने नगद भुगतान की मांग की और वह सरकारी तौर पर किया भी गया । यह नगद भुगतान पहले एक रॉ अधिकारी के हाथों जिनेवा (स्विटजरलैण्ड) पहुँचाया गया लेकिन वाल्टर विंसी ने जिनेवा में पैसा लेने से मना कर दिया और रॉ के अधिकारी से कहा कि वह ये पैसा मिलान (इटली) में चाहता है, विंसी ने उस अधिकारी को कहा कि वह स्विस और इटली के कस्टम से उन्हें आराम से निकलवा देगा और यह “कैश” चेक नहीं किया जायेगा । रॉ के उस अधिकारी ने उसकी बात नहीं मानी और अंततः वह भुगतान इटली में भारतीय दूतावास के जरिये किया गया । इस नगद भुगतान के बारे में तत्कालीन कैबिनेट सचिव बी.जी.देशमुख ने अपनी हालिया किताब में उल्लेख किया है, हालांकि वह तथाकथित ट्रेनिंग घोर असफ़ल रही और सारा पैसा लगभग व्यर्थ चला गया । इटली के जो सुरक्षा अधिकारी भारतीय एसपीजी कमांडो को प्रशिक्षण देने आये थे उनका रवैया जवानों के प्रति बेहद रूखा था, एक जवान को तो उस दौरान थप्पड़ भी मारा गया । रॉ अधिकारियों ने यह बात राजीव गाँधी को बताई और कहा कि इस व्यवहार से सुरक्षा बलों के मनोबल पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है और उनकी खुद की सुरक्षा व्यवस्था भी ऐसे में खतरे में पड़ सकती है, घबराये हुए राजीव ने तत्काल वह ट्रेनिंग रुकवा दी,लेकिन वह ट्रेनिंग का ठेका लेने वाले विंसी को तब तक भुगतान किया जा चुका था । राजीव गाँधी की हत्या के बाद तो सोनिया गाँधी पूरी तरह से इटालियन और पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों पर भरोसा करने लगीं, खासकर उस वक्त जब राहुल और प्रियंका यूरोप घूमने जाते थे । सन १९८५ में जब राजीव सपरिवार फ़्रांस गये थे तब रॉ का एक अधिकारी जो फ़्रेंच बोलना जानता था, उनके साथ भेजा गया था, ताकि फ़्रेंच सुरक्षा अधिकारियों से तालमेल बनाया जा सके । लियोन (फ़्रांस) में उस वक्त एसपीजी अधिकारियों में हड़कम्प मच गया जब पता चला कि राहुल और प्रियंका गुम हो गये हैं । भारतीय सुरक्षा अधिकारियों को विंसी ने बताया कि चिंता की कोई बात नहीं है, दोनों बच्चे जोस वाल्डेमारो के साथ हैं जो कि सोनिया की एक और बहन नादिया के पति हैं । विंसी ने उन्हें यह भी कहा कि वे वाल्डेमारो के साथ स्पेन चले जायेंगे जहाँ स्पेनिश अधिकारी उनकी सुरक्षा संभाल लेंगे । भारतीय सुरक्षा अधिकारी यह जानकर अचंभित रह गये कि न केवल स्पेनिश बल्कि इटालियन सुरक्षा अधिकारी उनके स्पेन जाने के कार्यक्रम के बारे में जानते थे । जाहिर है कि एक तो सोनिया गाँधी तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के अहसानों के तले दबना नहीं चाहती थीं, और वे भारतीय सुरक्षा एजेंसियों पर विश्वास नहीं करती थीं । इसका एक और सबूत इससे भी मिलता है कि एक बार सन १९८६ में जिनेवा स्थित रॉ के अधिकारी को वहाँ के पुलिस कमिश्नर जैक कुन्जी़ ने बताया कि जिनेवा से दो वीआईपी बच्चे इटली सुरक्षित पहुँच चुके हैं, खिसियाये हुए रॉ अधिकारी को तो इस बारे में कुछ मालूम ही नहीं था । जिनेवा का पुलिस कमिश्नर उस रॉ अधिकारी का मित्र था, लेकिन यह अलग से बताने की जरूरत नहीं थी कि वे वीआईपी बच्चे कौन थे । वे कार से वाल्टर विंसी के साथ जिनेवा आये थे और स्विस पुलिस तथा इटालियन अधिकारी निरन्तर सम्पर्क में थे जबकि रॉ अधिकारी को सिरे से कोई सूचना ही नहीं थी, है ना हास्यास्पद लेकिन चिंताजनक… उस स्विस पुलिस कमिश्नर ने ताना मारते हुए कहा कि “तुम्हारे प्रधानमंत्री की पत्नी तुम पर विश्वास नहीं करती और उनके बच्चों की सुरक्षा के लिये इटालियन एजेंसी से सहयोग करती है” । बुरी तरह से अपमानित रॉ के अधिकारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से इसकी शिकायत की, लेकिन कुछ नहीं हुआ । अंतरराष्ट्रीय खुफ़िया एजेंसियों के गुट में तेजी से यह बात फ़ैल गई थी कि सोनिया गाँधी भारतीय अधिकारियों, भारतीय सुरक्षा और भारतीय दूतावासों पर बिलकुल भरोसा नहीं करती हैं, और यह निश्चित ही भारत की छवि खराब करने वाली बात थी । राजीव की हत्या के बाद तो उनके विदेश प्रवास के बारे में विदेशी सुरक्षा एजेंसियाँ, एसपीजी से अधिक सूचनायें पा जाती थी और भारतीय पुलिस और रॉ उनका मुँह देखते रहते थे । (ओट्टावियो क्वात्रोची के बार-बार मक्खन की तरह हाथ से फ़िसल जाने का कारण समझ में आया ?) उनके निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज सीधे पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों के सम्पर्क में रहते थे, रॉ अधिकारियों ने इसकी शिकायत नरसिम्हा राव से की थी, लेकिन जैसी की उनकी आदत (?) थी वे मौन साध कर बैठ गये ।संक्षेप में तात्पर्य यह कि, जब एक गृहिणी होते हुए भी वे गंभीर सुरक्षा मामलों में अपने परिवार वालों को ठेका दिलवा सकती हैं, राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी के जीवित रहते रॉ को इटालियन जासूसों से सहयोग करने को कह सकती हैं, सत्ता में ना रहते हुए भी भारतीय सुरक्षा अधिकारियों पर अविश्वास दिखा सकती हैं, तो अब जबकि सारी सत्ता और ताकत उनके हाथों मे है, वे क्या-क्या कर सकती हैं, बल्कि क्या नहीं कर सकती । हालांकि “मैं भारत की बहू हूँ” और “मेरे खून की अंतिम बूँद भी भारत के काम आयेगी” आदि वे यदा-कदा बोलती रहती हैं, लेकिन यह असली सोनिया नहीं है । समूचा पश्चिमी जगत, जो कि जरूरी नहीं कि भारत का मित्र ही हो, उनके बारे में सब कुछ जानता है, लेकिन हम भारतीय लोग सोनिया के बारे में कितना जानते हैं ? (भारत भूमि पर जन्म लेने वाला व्यक्ति चाहे कितने ही वर्ष विदेश में रह ले, स्थाई तौर पर बस जाये लेकिन उसका दिल हमेशा भारत के लिये धड़कता है, और इटली में जन्म लेने वाले व्यक्ति का

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सोनिया गाँधी भारत की प्रधानमंत्री बनने के योग्य हैं या नहीं, इस प्रश्न का “धर्मनिरपेक्षता”, या “हिन्दू राष्ट्रवाद” या “भारत की बहुलवादी संस्कृति” से कोई लेना-देना नहीं है। इसका पूरी तरह से नाता इस बात से है कि उनका जन्म इटली में हुआ, लेकिन यही एक बात नहीं है, सबसे पहली बात तो यह कि देश के सबसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन कराने के लिये क
ैसे उन पर भरोसा किया जाये। सन १९९८ में एक रैली में उन्होंने कहा था कि “अपनी आखिरी साँस तक मैं भारतीय हूँ”, बहुत ही उच्च विचार है, लेकिन तथ्यों के आधार पर यह बेहद खोखला ठहरता है। अब चूँकि वे देश के एक खास परिवार से हैं और प्रधानमंत्री पद के लिये बेहद आतुर हैं (जी हाँ) तब वे एक सामाजिक व्यक्तित्व बन जाती हैं और उनके बारे में जानने का हक सभी को है (१४ मई २००४ तक वे प्रधानमंत्री बनने के लिये जी-तोड़ कोशिश करती रहीं, यहाँ तक कि एक बार तो पूर्ण समर्थन ना होने के बावजूद वे दावा पेश करने चल पडी़ थीं, लेकिन १४ मई २००४ को राष्ट्रपति कलाम साहब द्वारा कुछ “असुविधाजनक” प्रश्न पूछ लिये जाने के बाद यकायक १७ मई आते-आते उनमे वैराग्य भावना जागृत हो गई और वे खामख्वाह “त्याग” और “बलिदान” (?) की प्रतिमूर्ति बना दी गईं – कलाम साहब को दूसरा कार्यकाल न मिलने के पीछे यह एक बडी़ वजह है, ठीक वैसे ही जैसे सोनिया ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति इसलिये नहीं बनवाया, क्योंकि इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद राजीव के प्रधानमंत्री बनने का उन्होंने विरोध किया था… और अब एक तरफ़ कठपुतली प्रधानमंत्री और जी-हुजूर राष्ट्रपति दूसरी तरफ़ होने के बाद अगले चुनावों के पश्चात सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से कौन रोक सकता है?)बहरहाल… सोनिया गाँधी उर्फ़ माइनो भले ही आखिरी साँस तक भारतीय होने का दावा करती रहें, भारत की भोली-भाली (?) जनता को इन्दिरा स्टाइल में,सिर पर पल्ला ओढ़ कर “नामास्खार” आदि दो चार हिन्दी शब्द बोल लें, लेकिन यह सच्चाई है कि सन १९८४ तक उन्होंने इटली की नागरिकता और पासपोर्ट नहीं छोडा़ था (शायद कभी जरूरत पड़ जाये) । राजीव और सोनिया का विवाह हुआ था सन १९६८ में,भारत के नागरिकता कानूनों के मुताबिक (जो कानून भाजपा या कम्युनिस्टों ने नहीं बल्कि कांग्रेसियों ने ही सन १९५० में बनाये) सोनिया को पाँच वर्ष के भीतर भारत की नागरिकता ग्रहण कर लेना चाहिये था अर्थात सन १९७४ तक, लेकिन यह काम उन्होंने किया दस साल बाद…यह कोई नजरअंदाज कर दिये जाने वाली बात नहीं है। इन पन्द्रह वर्षों में दो मौके ऐसे आये जब सोनिया अपने आप को भारतीय(!)साबित कर सकती थीं। पहला मौका आया था सन १९७१ में जब पाकिस्तान से युद्ध हुआ (बांग्लादेश को तभी मुक्त करवाया गया था), उस वक्त आपातकालीन आदेशों के तहत इंडियन एयरलाइंस के सभी पायलटों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गईं थीं, ताकि आवश्यकता पड़ने पर सेना को किसी भी तरह की रसद आदि पहुँचाई जा सके । सिर्फ़ एक पायलट को इससे छूट दी गई थी, जी हाँ राजीव गाँधी, जो उस वक्त भी एक पूर्णकालिक पायलट थे । जब सारे भारतीय पायलट अपनी मातृभूमि की सेवा में लगे थे तब सोनिया अपने पति और दोनों बच्चों के साथ इटली की सुरम्य वादियों में थीं, वे वहाँ से तभी लौटीं, जब जनरल नियाजी ने समर्पण के कागजों पर दस्तखत कर दिये। दूसरा मौका आया सन १९७७ में जब यह खबर आई कि इंदिरा गाँधी चुनाव हार गईं हैं और शायद जनता पार्टी सरकार उनको गिरफ़्तार करे और उन्हें परेशान करे। “माईनो” मैडम ने तत्काल अपना सामान बाँधा और अपने दोनों बच्चों सहित दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित इटालियन दूतावास में जा छिपीं। इंदिरा गाँधी, संजय गाँधी और एक और बहू मेनका के संयुक्त प्रयासों और मान-मनौव्वल के बाद वे घर वापस लौटीं। १९८४ में भी भारतीय नागरिकता ग्रहण करना उनकी मजबूरी इसलिये थी कि राजीव गाँधी के लिये यह बडी़ शर्म और असुविधा की स्थिति होती कि एक भारतीय प्रधानमंत्री की पत्नी इटली की नागरिक है ? भारत की नागरिकता लेने की दिनांक भारतीय जनता से बडी़ ही सफ़ाई से छिपाई गई। भारत का कानून अमेरिका, जर्मनी, फ़िनलैंड, थाईलैंड या सिंगापुर आदि देशों जैसा नहीं है जिसमें वहाँ पैदा हुआ व्यक्ति ही उच्च पदों पर बैठ सकता है। भारत के संविधान में यह प्रावधान इसलिये नहीं है कि इसे बनाने वाले “धर्मनिरपेक्ष नेताओं” ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आजादी के साठ वर्ष के भीतर ही कोई विदेशी मूल का व्यक्ति प्रधानमंत्री पद का दावेदार बन जायेगा। लेकिन कलाम साहब ने आसानी से धोखा नहीं खाया और उनसे सवाल कर लिये (प्रतिभा ताई कितने सवाल कर पाती हैं यह देखना बाकी है)। संविधान के मुताबिक सोनिया प्रधानमंत्री पद की दावेदार बन सकती हैं, जैसे कि मैं या कोई और। लेकिन भारत के नागरिकता कानून के मुताबिक व्यक्ति तीन तरीकों से भारत का नागरिक हो सकता है, पहला जन्म से, दूसरा रजिस्ट्रेशन से, और तीसरा प्राकृतिक कारणों (भारतीय से विवाह के बाद पाँच वर्ष तक लगातार भारत में रहने पर) । इस प्रकार मैं और सोनिया गाँधी,दोनों भारतीय नागरिक हैं, लेकिन मैं जन्म से भारत का नागरिक हूँ और मुझसे यह कोई नहीं छीन सकता, जबकि सोनिया के मामले में उनका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा सकता है। वे भले ही लाख दावा करें कि वे भारतीय बहू हैं, लेकिन उनका नागरिकता रजिस्ट्रेशन भारत के नागरिकता कानून की धारा १० के तहत तीन उपधाराओं के कारण रद्द किया जा सकता है (अ) उन्होंने नागरिकता का रजिस्ट्रेशन धोखाधडी़ या कोई तथ्य छुपाकर हासिल किया हो, (ब) वह नागरिक भारत के संविधान के प्रति बेईमान हो, या (स) रजिस्टर्ड नागरिक युद्धकाल के दौरान दुश्मन देश के साथ किसी भी प्रकार के सम्पर्क में रहा हो । (इन मुद्दों पर डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी काफ़ी काम कर चुके हैं और अपनी पुस्तक में उन्होंने इसका उल्लेख भी किया है, जो आप पायेंगे इन अनुवादों के “तीसरे भाग” में)। राष्ट्रपति कलाम साहब के दिमाग में एक और बात निश्चित ही चल रही होगी, वह यह कि इटली के कानूनों के मुताबिक वहाँ का कोई भी नागरिक दोहरी नागरिकता रख सकता है, भारत के कानून में ऐसा नहीं है, और अब तक यह बात सार्वजनिक नहीं हुई है कि सोनिया ने अपना इटली वाला पासपोर्ट और नागरिकता कब छोडी़ ? ऐसे में वह भारत की प्रधानमंत्री बनने के साथ-साथ इटली की भी प्रधानमंत्री बनने की दावेदार हो सकती हैं। अन्त में एक और मुद्दा, अमेरिका के संविधान के अनुसार सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले व्यक्ति को अंग्रेजी आना चाहिये, अमेरिका के प्रति वफ़ादार हो तथा अमेरिकी संविधान और शासन व्यवस्था का जानकार हो। भारत का संविधान भी लगभग मिलता-जुलता ही है, लेकिन सोनिया किसी भी भारतीय भाषा में निपुण नहीं हैं (अंग्रेजी में भी), उनकी भारत के प्रति वफ़ादारी भी मात्र बाईस-तेईस साल पुरानी ही है, और उन्हें भारतीय संविधान और इतिहास की कितनी जानकारी है यह तो सभी जानते हैं। जब कोई नया प्रधानमंत्री बनता है तो भारत सरकार का पत्र सूचना ब्यूरो (पीआईबी) उनका बायो-डाटा और अन्य जानकारियाँ एक पैम्फ़लेट में जारी करता है। आज तक उस पैम्फ़लेट को किसी ने भी ध्यान से नहीं पढा़, क्योंकि जो भी प्रधानमंत्री बना उसके बारे में जनता, प्रेस और यहाँ तक कि छुटभैये नेता तक नख-शिख जानते हैं। यदि (भगवान न करे) सोनिया प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुईं तो पीआईबी के उस विस्तृत पैम्फ़लेट को पढ़ना बेहद दिलचस्प होगा। आखिर भारतीयों को यह जानना ही होगा कि सोनिया का जन्म दरअसल कहाँ हुआ? उनके माता-पिता का नाम क्या है और उनका इतिहास क्या है? वे किस स्कूल में पढीं? किस भाषा में वे अपने को सहज पाती हैं? उनका मनपसन्द खाना कौन सा है? हिन्दी फ़िल्मों का कौन सा गायक उन्हें अच्छा लगता है? किस भारतीय कवि की कवितायें उन्हें लुभाती हैं? क्या भारत के प्रधानमंत्री के बारे में इतना भी नहीं जानना चाहिये!

राजीव से विवाह के बाद सोनिया और उनके इटालियन मित्रों को स्नैम प्रोगैती की ओट्टावियो क्वात्रोची से भारी-भरकम राशियाँ मिलीं, वह भारतीय कानूनों से बेखौफ़ होकर दलाली में रुपये कूटने लगा। कुछ ही वर्षों में माइनो परिवार जो गरीबी के भंवर में फ़ँसा था अचानक करोड़पति हो गया । लोकसभा के नयेनवेले सदस्य के रूप में मैंने 19 नवम्बर 1974 को संसद में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री श
्रीमती इन्दिरा गाँधी से पूछा था कि “क्या आपकी बहू सोनिया गाँधी, जो कि अपने-आप को एक इंश्योरेंस एजेंट बताती हैं (वे खुद को ओरियंटल फ़ायर एंड इंश्योरेंस कम्पनी की एजेंट बताती थीं), प्रधानमंत्री आवास का पता उपयोग कर रही हैं?” जबकि यह अपराध है क्योंकि वे एक इटालियन नागरिक हैं (और यह विदेशी मुद्रा उल्लंघन) का मामला भी बनता है”, तब संसद में बहुत शोरगुल मचा, श्रीमती इन्दिरा गाँधी गुस्सा तो बहुत हुईं, लेकिन उनके सामने और कोई विकल्प नहीं था, इसलिये उन्होंने लिखित में यह बयान दिया कि “यह गलती से हो गया था और सोनिया ने इंश्योरेंस कम्पनी से इस्तीफ़ा दे दिया है” (मेरे प्रश्न पूछने के बाद), लेकिन सोनिया का भारतीय कानूनों को लतियाने और तोड़ने का यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। 1977 में जनता पार्टी सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय के जस्टिस ए.सी.गुप्ता के नेतृत्व में गठित आयोग ने जो रिपोर्ट सौंपी थी, उसके अनुसार “मारुति” कम्पनी (जो उस वक्त गाँधी परिवार की मिल्कियत था) ने “फ़ेरा कानूनों, कम्पनी कानूनों और विदेशी पंजीकरण कानून के कई गंभीर उल्लंघन किये”, लेकिन ना तो संजय गाँधी और ना ही सोनिया गाँधी के खिलाफ़ कभी भी कोई केस दर्ज हुआ, ना मुकदमा चला। हालांकि यह अभी भी किया जा सकता है, क्योंकि भारतीय कानूनों के मुताबिक “आर्थिक घपलों” पर कार्रवाई हेतु कोई समय-सीमा तय नहीं है।

जनवरी 1980 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी पुनः सत्तासीन हुईं। सोनिया ने सबसे पहला काम यह किया कि उन्होंने अपना नाम “वोटर लिस्ट” में दर्ज करवाया, यह साफ़-साफ़ कानून का मखौल उड़ाने जैसा था और उनका वीसा रद्द किया जाना चाहिये था (क्योंकि उस वक्त भी वे इटली की नागरिक थीं)। प्रेस द्वारा हल्ला मचाने के बाद दिल्ली के चुनाव अधिकारी ने 1982 में उनका नाम मतदाता सूची से हटाया। लेकिन फ़िर जनवरी 1983 में उन्होंने अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वा लिया, जबकि उस समय भी वे विदेशी ही थीं (आधिकारिक रूप से उन्होंने भारतीय नागरिकता के लिये अप्रैल 1983 में आवेद दिया था)। हाल ही में ख्यात कानूनविद, ए.जी.नूरानी ने अपनी पुस्तक “सिटीजन्स राईट्स, जजेस एंड अकाऊण्टेबिलिटी रेकॉर्ड्स” (पृष्ठ 318) पर यह दर्ज किया है कि “सोनिया गाँधी ने जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल के कुछ खास कागजात एक विदेशी को दिखाये, जो कागजात उनके पास नहीं होने चाहिये थे और उन्हें अपने पास रखने का सोनिया को कोई अधिकार नहीं था।“ इससे साफ़ जाहिर होता है उनके मन में भारतीय कानूनों के प्रति कितना सम्मान है और वे अभी भी राजतंत्र की मानसिकता से ग्रस्त हैं। सार यह कि सोनिया गाँधी के मन में भारतीय कानून के सम्बन्ध में कोई इज्जत नहीं है, वे एक महारानी की तरह व्यवहार करती हैं। यदि भविष्य में उनके खिलाफ़ कोई मुकदमा चलता है और जेल जाने की नौबत आ जाती है तो वे इटली भी भाग सकती हैं। पेरू के राष्ट्रपति फ़ूजीमोरी जीवन भर यह जपते रहे कि वे जन्म से ही पेरूवासी हैं, लेकिन जब भ्रष्टाचार के मुकदमे में उन्हें दोषी पाया गया तो वे अपने गृह देश जापान भाग गये और वहाँ की नागरिकता ले ली।

भारत से घृणा करने वाले मुहम्मद गोरी, नादिर शाह और अंग्रेज रॉबर्ट क्लाइव ने भारत की धन-सम्पदा को जमकर लूटा, लेकिन सोनिया तो “भारतीय” हैं, फ़िर जब राजीव और इन्दिरा प्रधानमंत्री थे, तब बक्से के बक्से भरकर रोज-ब-रोज प्रधानमंत्री निवास से सुरक्षा गार्ड चेन्नई के हवाई अड्डे पर इटली जाने वाले हवाई जहाजों में क्या ले जाते थे? एक तो हमेशा उन बक्सों को रोम के लिये बुक किया जाता था, एयर इंडिया और अलिटालिया एयरलाईन्स को ही जिम्मा सौंपा जाता था और दूसरी बात यह कि कस्टम्स पर उन बक्सों की कोई जाँच नहीं होती थी। अर्जुन सिंह जो कि मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और संस्कृति मंत्री भी, इस मामले में विशेष रुचि लेते थे। कुछ भारतीय कलाकृतियाँ, पुरातन वस्तुयें, पिछवाई पेंटिंग्स, शहतूश शॉलें, सिक्के आदि इटली की दो दुकानों, (जिनकी मालिक सोनिया की बहन अनुस्का हैं) में आम तौर पर देखी जाती हैं। ये दुकानें इटली के आलीशान इलाकों रिवोल्टा (दुकान का नाम – एटनिका) और ओर्बेस्सानो (दुकान का नाम – गनपति) में स्थित हैं जहाँ इनका धंधा नहीं के बराबर चलता है, लेकिन दरअसल यह एक “आड़” है, इन दुकानों के नाम पर फ़र्जी बिल तैयार करवाये जाते हैं फ़िर वे बेशकीमती वस्तुयें लन्दन ले जाकर “सौथरबी और क्रिस्टीज” द्वारा नीलामी में चढ़ा दी जाती हैं, इन सबका क्या मतलब निकलता है? यह पैसा आखिर जाता कहाँ है? एक बात तो तय है कि राहुल गाँधी की हार्वर्ड की एक वर्ष की फ़ीस और अन्य खर्चों के लिये भुगतान एक बार केमैन द्वीप की किसी बैंक के खाते से हुआ था। इस सबकी शिकायत जब मैंने वाजपेयी सरकार में की तो उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया, इस पर मैंने दिल्ली हाइकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट की बेंच ने सरकार को नोटिस जारी किया, लेकिन तब तक सरकार गिर गई, फ़िर कोर्ट नें सीबीआई को निर्देश दिये कि वह इंटरपोल की मदद से इन बहुमूल्य वस्तुओं के सम्बन्ध में इटली सरकार से सहायता ले। इटालियन सरकार ने प्रक्रिया के तहत भारत सरकार से अधिकार-पत्र माँगा जिसके आधार पर इटली पुलिस एफ़आईआर दर्ज करे। अन्ततः इंटरपोल ने दो बड़ी रिपोर्टें कोर्ट और सीबीआई को सौंपी और न्यायाधीश ने मुझे उसकी एक प्रति देने को कहा, लेकिन आज तक सीबीआई ने मुझे वह नहीं दी, और यह सवाल अगली सुनवाई के दौरान फ़िर से पूछा जायेगा। सीबीआई का झूठ एक बार और तब पकड़ा गया, जब उसने कहा कि “अलेस्सान्द्रा माइनो” किसी पुरुष का नाम है, और “विया बेल्लिनी, 14, ओरबेस्सानो”, किसी गाँव का नाम है, ना कि “माईनो” परिवार का पता। बाद में सीबीआई के वकील ने कोर्ट से माफ़ी माँगी और कहा कि यह गलती से हो गया, उस वकील का “प्रमोशन” बाद में “ऎडिशनल सॉलिसिटर जनरल” के रूप में हो गया, ऐसा क्यों हुआ, इसका खुलासा तो वाजपेयी-सोनिया की आपसी “समझबूझ” और “गठजोड़” ही बता सकता है।

इन दिनों सोनिया गाँधी अपने पति हत्यारों के समर्थकों MDMK, PMK और DMK से सत्ता के लिये मधुर सम्बन्ध बनाये हुए हैं, कोई भारतीय विधवा कभी ऐसा नहीं कर सकती। उनका पूर्व आचरण भी ऐसे मामलों में संदिग्ध रहा है, जैसे कि – जब संजय गाँधी का हवाई जहाज नाक के बल गिरा तो उसमें विस्फ़ोट नहीं हुआ, क्योंकि पाया गया कि उसमें ईंधन नहीं था, जबकि फ़्लाईट रजिस्टर के अनुसार निकलते वक्त टैंक फ़ुल किया गया था, जैसे माधवराव सिंधिया की विमान दुर्घटना के ऐन पहले मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित को उनके साथ जाने से मना कर दिया गया। इन्दिरा गाँधी की मौत की वजह बना था उनका अत्यधिक रक्तस्राव, न कि सिर में गोली लगने से, फ़िर सोनिया गाँधी ने उस वक्त खून बहते हुए हालत में इन्दिरा गाँधी को लोहिया अस्पताल ले जाने की जिद की जो कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AAIMS) से बिलकुल विपरीत दिशा में है? और जबकि “ऐम्स” में तमाम सुविधायें भी उपलब्ध हैं, फ़िर लोहिया अस्पताल पहुँच कर वापस सभी लोग AAIMS पहुँचे, और इस बीच लगभग पच्चीस कीमती मिनट बरबाद हो गये? ऐसा क्यों हुआ, क्या आज तक किसी ने इसकी जाँच की? सोनिया गाँधी के विकल्प बन सकने वाले लगभग सभी युवा नेता जैसे राजेश पायलट, माधवराव सिन्धिया, जितेन्द्र प्रसाद विभिन्न हादसों में ही क्यों मारे गये? अब सोनिया की सत्ता निर्बाध रूप से चल रही है, लेकिन ऐसे कई अनसुलझे और रहस्यमयी प्रश्न चारों ओर मौजूद हैं, उनका कोई जवाब नहीं है, और कोई पूछने वाला भी नहीं है, यही इटली की स्टाइल है।

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जो गोहत्या करके गाय के दूध से लोगो को वंचित करे, तलवार से उसका सर काट दो! अथर्ववेद 8.3.24

जो गोहत्या करके गाय के दूध से लोगो को वंचित करे, तलवार से उसका सर काट दो!
अथर्ववेद 8.3.24

‪#‎BanCowSlaughter‬

जो गोहत्या करके गाय के दूध से लोगो को वंचित करे, तलवार से उसका सर काट दो!
अथर्ववेद 8.3.24 

#BanCowSlaughter
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If you’re going to create a fuss about it, at least be fair to all

If you're going to create a fuss about it, at least be fair to all
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Not the economy, not the national security, not the course of national development - the reason for stalling the parliament these days is some statement made by a MP over Congress party.

Congress is the same party which destroyed the nation in its six decades of decay. People rejected this party because they felt Congress sold our national interests for a fortune in commissions, scams worth trillions, loss of national pride, separation in society and fostering anti national factions throughout the nation.
The adjective given by Sadhvi Jyoti is far far too less than what congress deserves. However, it was in a language that's considered 'unparliamentary' in our McCauley bred society.
She should have rather used terms like 'communal fascist dictator'
or 'right wing Hindu racist bigot' .

And is this the first time that a politician has used a so called 'unparliamentary' language ?
-Sonia said Modi is a merchant of death.
-Mayavati said "Tilak, Tarazu aur Talwar, Inko maaro jutey chaar" (slap the Brahmins, Kayasthas and Rajpoots with shoes)
-Azam Khan said "Bharat maata dayan hai"
-M Karunanidhi said "all hindus are theives"
:
:
The list is awfully long but you barely heard of them because none of them was wearing saffron clothes.
So the question is, again, why so choosy about it?

If you’re going to create a fuss about it, at least be fair to all
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Not the economy, not the national security, not the course of national development – the reason for stalling the parliament these days is some statement made by a MP over Congress party.

Congress is the same party which destroyed the nation in its six decades of decay. People rejected this party because they felt Congress sold our national interests for a fortune in commissions, scams worth trillions, loss of national pride, separation in society and fostering anti national factions throughout the nation.
The adjective given by Sadhvi Jyoti is far far too less than what congress deserves. However, it was in a language that’s considered ‘unparliamentary’ in our McCauley bred society.
She should have rather used terms like ‘communal fascist dictator’
or ‘right wing Hindu racist bigot’ .

And is this the first time that a politician has used a so called ‘unparliamentary’ language ?
-Sonia said Modi is a merchant of death.
-Mayavati said “Tilak, Tarazu aur Talwar, Inko maaro jutey chaar” (slap the Brahmins, Kayasthas and Rajpoots with shoes)
-Azam Khan said “Bharat maata dayan hai”
-M Karunanidhi said “all hindus are theives”
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The list is awfully long but you barely heard of them because none of them was wearing saffron clothes.
So the question is, again, why so choosy about it?

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