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यही गौ हत्या के चलते इंदिरा गांधी ने लाखों संतो के ऊपर दिल्ली में गोलियां चार्ज करवाई थी


यही गौ हत्या के चलते इंदिरा गांधी ने लाखों संतो के ऊपर दिल्ली में गोलियां चार्ज करवाई थी वो दिन था गोपाष्टमी उसी के चलते उसे एक महान संत कृपात्रि जी महाराज ने उसी दिन सराफ दिया था दिल्ली में और बोला था जा तूने गोपाष्टमी के दिन में ही संतो को मारी है उसी दिन तेरा बिनास होगा तो सच में हो भी गया तो इंद्रा मरी दिल्ली में दिन था गोपाष्टमी राजीव मरे मद्रास में दिन था गोपाष्टमी संजय मरे आकाश में दिन था वह भी गोपाष्टमी आप सोचो किसी ने कभी यह बातें बताई भारत बचाओ आंदोलन

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चंद्रशेखर आज़ाद की मौत ( असली राज )

मित्रों, चंद्रशेखर आज़ाद की मौत से जुडी फ़ाइल आज भी लखनऊ के सीआइडी ऑफिस १- गोखले मार्ग मे रखी है .. उस फ़ाइल को नेहरु ने सार्वजनिक करने से मना कर दिया .. इतना ही नही नेहरु ने यूपी के प्रथम मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त को उस फ़ाइल को नष्ट करने का आदेश दिया था .. लेकिन चूँकि पन्त जी खुद

एक महान क्रांतिकारी रहे थे इसलिए उन्होंने नेहरु को झूठी सुचना दी की उस फ़ाइल

को नष्ट कर दिया गया है ..

क्या है

उस फ़ाइल मे ?

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उस फ़ाइल मे इलाहबाद के तत्कालीन पुलिस सुपरिटेंडेंट मिस्टर नॉट वावर के बयान दर्ज है जिसने अगुवाई मे ही पुलिस ने अल्फ्रेड पार्क मे बैठे आजाद को घेर लिया था और एक भीषण गोलीबारी के बाद आज़ाद शहीद हुए |

नॉट वावर ने अपने बयान मे कहा है कि ” मै खाना खा रहा था तभी नेहरु का एक संदेशवाहक आया उसने कहा कि नेहरु जी ने एक संदेश दिया है कि आपका शिकार अल्फ्रेड पार्क मे है और तीन बजे तक रहेगा .. मै कुछ समझा नही फिर मैं तुरंत आनंद भवन भागा और नेहरु ने बताया कि अभी आज़ाद अपने साथियो के साथ आया था वो रूस भागने के लिए बारह सौ रूपये मांग रहा था मैंने उसे अल्फ्रेड पार्क मे बैठने को कहा है ”

फिर मै बिना देरी किये पुलिस बल लेकर अल्फ्रेड पार्क को चारो ओर घेर लिया और आजाद को आत्मसमर्पण करने को कहा लेकिन उसने अपना माउजर निकालकर हमारे एक इंस्पेक्टर को मार दिया फिर मैंने भी गोली चलाने का हुकम दिया .. पांच गोली से आजाद ने हमारे पांच लोगो को मारा फिर छठी गोली अपने कनपटी पर मार दी |”

आजाद नेहरु से मिलने क्यों गए थे ?

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इसके दो कारण है

१- भगत सिंह की फांसी की सजा माफ़ करवाना

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महान क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद जिनके नाम से ही अंग्रेज अफसरों की पेंट गीली हो जाती थी, उन्हें मरवाने में किसका हाथ था ? 27 फरवरी 1931 को क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद की मौत हुयी थी । इस दिन सुबह आजाद नेहरु से आनंद भवन में उनसे भगत सिंह की फांसी की सजा को उम्र केद में बदलवाने के लिए मिलने गये थे, क्यों की वायसराय लार्ड इरविन से नेहरु के अच्छे ”सम्बन्ध” थे, पर नेहरु ने आजाद की बात नही मानी,दोनों में आपस में तीखी बहस हुयी, और नेहरु ने तुरंत आजाद को आनंद भवन से निकल जाने को कहा । आनंद भवन से निकल कर आजाद सीधे अपनी साइकिल से अल्फ्रेड पार्क गये । इसी पार्क में नाट बाबर के साथ मुठभेड़ में वो शहीद हुए थे ।अब आप अंदाजा लगा लीजिये की उनकी मुखबरी किसने की ? आजाद के लाहोर में होने की जानकारी सिर्फ नेहरु को थी । अंग्रेजो को उनके बारे में जानकारी किसने दी ? जिसे अंग्रेज शासन इतने सालो तक पकड़ नही सका,तलाश नही सका था, उसे अंग्रेजो ने 40 मिनट में तलाश कर, अल्फ्रेड पार्क में घेर लिया । वो भी पूरी पुलिस फ़ोर्स और तेयारी के साथ ?

अब आप ही सोच ले की गद्दार कोन हें ?

२- लड़ाई को आगे जारी रखने के लिए रूस जाकर स्टालिन की मदद लेने की योजना

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मित्रों, आज़ाद पहले कानपूर गणेश शंकर विद्यार्थी जी के पास गए फिर वहाँ तय हुआ की स्टालिन की मदद ली जाये क्योकि स्टालिन ने खुद ही आजाद को रूस बुलाया था . सभी साथियो को रूस जाने के लिए बारह सौ रूपये की जरूरत थी .जो उनके पास नही था इसलिए आजाद ने प्रस्ताव रखा कि क्यों न नेहरु से पैसे माँगा जाये .लेकिन इस प्रस्ताव का सभी ने विरोध किया और कहा कि नेहरु तो अंग्रेजो का दलाल है लेकिन आजाद ने कहा कुछ भी हो आखिर उसके सीने मे भी तो एक भारतीय दिल है वो मना नही करेगा |

फिर आज़ाद अकेले ही कानपूर से इलाहबाद रवाना हो गए और आनंद भवन गए उनको सामने देखकर नेहरु चौक उठा |

आजाद ने उसे बताया कि हम सब स्टालिन के पास रूस जाना चाहते है क्योकि उन्होंने हमे बुलाया है और मदद करने का प्रस्ताव भेजा है .पहले तो नेहरु काफी गुस्सा हुआ फिर तुरंत ही मान गया और कहा कि तुम अल्फ्रेड पार्क बैठो मेरा आदमी तीन बजे तुम्हे वहाँ ही पैसे दे देगा |

मित्रों, फिर आपलोग सोचो कि कौन वो गद्दार है जिसने आज़ाद की मुखबिरी की थी ?

चंदन दुबे

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क्या है सोनिया गाँधी का सच?


क्या है सोनिया गाँधी का सच? कैसे अपने फायदे के लिए सोनिया ने बेटी प्रियंका की शादी रोबर्ट वाड्रा से कराई? सच आपको हिला देगा…

रॉबर्ट और प्रियंका की शादी सन 1997 में हुई थी .लेकिन अगर कोई रॉबर्ट को ध्यान से देखे तो यह बात सोचेगा कि सोनिया ने रॉबर्ट जैसे कुरूप और साधारण व्यक्ति से प्रियंका की शादी कैसे करवा दी? क्या उसे प्रियंका के लिए कोई उपयुक्त वर नहीं मिला ? और यह शादी जल्दी में और चुप चाप क्यों की गयी??? वास्तव में सोनिया ने रॉबर्ट से प्रियंका की शादी अपनी पोल खुलने के डर से की थी. क्योंकि जिस समय # सोनिया इंगलैंड में एक कैंटीन में # बार गर्ल थी . उसी समय उसी जगह रोबट की माँ # मौरीन(Maureen) भी यही काम करती थी. मौरीन को # सोनिया_और_माधव_ राव_सिंधिया की रास लीला की बात पता थी.

मौरीन यह भी जानती थी कि किन किन लोगों के साथ सोनिया के अवैध सम्बन्ध थे .

जब सोनिया राजीव से शादी करके दिल्ली आ गयी , तो कुछ समय बाद मौरीन भी दिल्ली में बस गयी . मौरीन जानती थी कि सोनिया सत्ता के लिए कुछ भी कर सकती है, क्योंकि जो भी व्यक्ति उसके खतरा बन सकता था सोनिया ने उसका पत्ता साफ कर दिया. जैसे संजय, माधव राव, पायलेट जितेन्द्र प्रसाद. यहाँ तक लोगों को यह भी शक है कि राजीव की हत्या में सोनिया का भी हाथ है , वर्ना वह अपने पति के हत्यारों को माफ़ क्यों कर देती?

चूँकि मौरीन का पति और रॉबर्ट का पिता राजेंदर वडरा पुराना जनसंघी था , और सोनिया को डर था कि अगर अपने पति के दवाब ने मौरीन अपना मुंह खोल देगी तो मुझे भारत पर हुकूमत करने और अपने # नालायकु_कुपुत्र _राहुलको प्रधानमंत्री बनाने में सफलता नहीं मिलेगी . इसीलिए # सोनिया ने मौरीन के लडके रॉबर्ट की शादी प्रियंका से करवा दी.

रोबर्ट वाड्रा ने भारत के सबसे बड़े राजनीतिज्ञ खानदान में शादी की क्या कीमत चुकाई और क्या इनाम पाए???  कैसे एक एक करके रोबर्ट के सभी जान पहचान वाले मरते चले गए???

………शादी के बाद-की कहानी -……….

राजेंद्र वडरा के दो पुत्र , रिचार्ड और रॉबर्ट

और एक पुत्री मिशेल थे . और प्रियंका की शादी के बाद सभी एक एक कर मर गए

या मार दिएगए . जैसे , # मिशेल( Michelle ) सन 2001 में # कार_दुर्घटनामें मारी गयी , # रिचार्ड( Richard ) ने सन 2003 में # आत्महत्या कर ली . और प्रियंका के # ससुर सन 2009 में एक # मोटेल में मरे हुए पाए गए थे . लेकिन इनकी मौत के कारणों की कोई जाँच नहीं कराई गयी|

और इसके बाद सोनिया ने रॉबर्ट को राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री के बराबर का दर्जा SPG इनाम के तौर पर दे दिया .

इस रॉबर्ट को कोई पडोसी भी नहीं जानता था , उसने मात्र तीन वर्षो में करोड़ों की संपत्ति कैसे बना ली और कई कंपनियों का मालिक बन गया, साथ ही सैकड़ों एकड़ कीमती जमीनें भी हथिया ली.

अमिताभ दिक्सित

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#इसे_भी_पाठ्यक्रम_में_शामिल_किया_जाना_चाहिए !!

॥ बीते हुए दिन- 12 ॥॥ जवाहरलाल नेहरू अभिनेत्री नरगिस के मामा थे ॥नरगिस की नानी दिलीपा मंगल पाण्डेय के ननिहाल के राजेन्द्र पाण्डेय की बेटी थीं… उनकी शादी 1880 में बलिया में हुई थी लेकिन शादी के एक हफ़्ते के अंदर ही उनके पति गुज़र गए थे…दिलीपा की उम्र उस वक़्त सिर्फ़ 13 साल थी…उस ज़माने में विधवाओं की ज़िंदगी बेहद तक़लीफ़ों भरी होती थी…ज़िंदगी से निराश होकर दिलीपा एक रोज़ आत्महत्या के इरादे से गंगा की तरफ़ चल पड़ीं लेकिन रात में रास्ता भटककर मियांजान नाम के एक सारंगीवादक के झोंपड़े में पहुंच गयीं जो तवायफ़ों के कोठों पर सारंगी बजाता था…मियांजान के परिवार में उसकी बीवी और एक बेटी मलिका थे… वो मलिका को भी तवायफ़ बनाना चाहता था…दिलीपा को मियांजान ने अपने घर में शरण दी…और फिर मलिका के साथ साथ दिलीपा भी धीरेधीरे तवायफ़ों वाले तमाम तौर-तरीक़े सीख गयीं और एक रोज़ चिलबिला की मशहूर तवायफ़ रोशनजान के कोठे पर बैठ गयीं…रोशनजान के कोठे पर उस ज़माने के नामी वक़ील मोतीलाल नेहरू का आना जाना रहता था जिनकी पत्नी पहले बच्चे के जन्म के समय गुज़र गयी थी…दिलीपा के सम्बन्ध मोतीलाल नेहरू से बन गए…इस बात का पता चलते ही मोतीलाल के घरवालों ने उनकी दूसरी शादी लाहौर की स्वरूप रानी से करा दी जिनकी उम्र उस वक़्त 15 साल थी…इसके बावजूद मोतीलाल ने दिलीपा के साथ सम्बन्ध बनाए रखे…इधर दिलीपा का एक बेटा हुआ जिसका नाम मंज़ूर अली रखा गया…उधर कुछ ही दिनों बाद 14 नवम्बर 1889 को स्वरूपरानी ने जवाहरलाल नेहरू को जन्म दिया…साल 1900 में स्वरूप रानी ने विजयलक्ष्मी पंडित को जन्म दिया और 1901 में दिलीपा के जद्दनबाई पैदा हुईं…अभिनेत्री नरगिस इन्हीं जद्दनबाई की बेटी थीं…मंज़ूर अली आगे चलकर मंज़ूर अली सोख़्त के नाम से बहुत बड़े मज़दूर नेता बने…और साल 1924 में उन्होंने यह कहकर देशभर में सनसनी फैला दी कि मैं मोतीलाल नेहरू का बेटा और जवाहरलाल नेहरू का बड़ा भाई हूं…उधर एक रोज़ लखनऊ नवाब के बुलावे पर जद्दनबाई मुजरा करने लखनऊ गयीं तो दिलीपा भी उनके साथ थी…जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के किसी काम से उन दिनों लखनऊ में थे…उन्हें पता चला तो वो उन दोनों से मिलने चले आए…दिलीपा जवाहरलाल नेहरू से लिपट गयीं और रो-रोकर मोतीलाल नेहरू का हालचाल पूछने लगीं…मुजरा ख़त्म हुआ तो जद्दनबाई ने जवाहरलाल नेहरू को राखी बांधी…साल 1931 में मोतीलाल नेहरू ग़ुज़रे तो दिलीपा ने अपनी चूड़ियां तोड़ डालीं और उसके बाद से वो विधवा की तरह रहने लगीं…(गुजराती के वरिष्ठ लेखक रजनीकुमार पंड्या जी की क़िताब ‘आप की परछाईयां’ से साभार।)

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इस लेख को पढ़ते समय एक बात याद रखियेगा  ये वही “ 1962 “ था , जब आधा  हिंदुस्तान भुखमरी की  कगार पर था और चीन  हमारे सम्मान को रौंदने वाला था : 

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 जैकलीन 1962 में नौ दिन की भारत यात्रा पर आई थीं. चूँकि ये एक निजी यात्रा थी, इसलिए उन्हें सलाह दी गई कि किसी अमरीकी एयरलाइन के बजाए एयर इंडिया से भारत जाएं. उन्होंने ऐसा ही किया. उन्होंने रोम से दिल्ली के लिए एयर इंडिया की फ़्लाइट ली.उनके साथ उनकी बहन राजकुमारी ली रैद्ज़ीविल और उनकी आया प्रोवी भी भारत आई थी. 
हाँलाकि ये एक निजी यात्रा थी, लेकिन तब भी भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पालम हवाई अड्डे पर जैकलीन केनेडी के विमान का इंतज़ार कर रहे थे. विमान पालम के चक्कर पर चक्कर लगाए जा रहा था, लेकिन उतरने का नाम नहीं ले रहा था.

नेहरू ने उस समय अमरीका में भारत के राजदूत बीके नेहरू से कहा कि पता लगाएं कि माजरा क्या है.

बीके नेहरू अपनी आत्मकथा ‘नाइस गाइज़ फ़िनिश सेकेंड’ में लिखते हैं, “मैंने प्रधानमंत्री को बताया कि जहाज़ के न उतरने का कारण ये है कि जैकलीन ने अपना मेकअप पूरा नहीं किया है. नेहरू को थोड़ा अचरज हुआ और वो थोड़ा मुस्कराए. मैंने उनसे कहा कि अमरीका की इस प्रथम महिला को प्रोटोकॉल वगैरह की परवाह नहीं है. उनके लिए सुंदर दीखना, समय पर पहुंचने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है.”

बहरहाल जैकलीन उतरी और नेहरू ने गुलदस्तों से उनका स्वागत किया. पालम से तीनमूर्ति निवास तक के पूरे रास्ते में हज़ारों लोग जैकलीन कैनेडी के स्वागत में सड़कों के दोनों ओर खड़े थे. उनमें बहुत से लोग अपनी बैलगाड़ियों में ‘अमरीका की इस महारानी’ के दर्शन करने आए थे.

अमरीकी दूतावास पहुंचने के थोड़ी देर बाद भारत में अमरीकी राजदूत केन गालब्रेथ ने बीके नेहरू से कहा कि जैकलीन चाहती हैं कि भारत में वो जहाँ भी जाएं, आप उनके साथ चलें. इस तरह बीके नेहरू अपने ही देश में विदेशी राजदूत के मेहमान के मेहमान बन गए.

जैकलीन और उनकी बहन ने पहली रात प्रधानमंत्री निवास में बिताई. नेहरू ने उनके सम्मान में ज़बरदस्त भोज दिया. खाना जल्दी ख़त्म हो गया और इन दोनों के पास अपने अपने कमरों में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहा. तभी परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष होमी भाभा ने सलाह दी कि आप हमारे साथ नाचती क्यों नहीं.

जैकलीन की बहन ली तो इसके लिए फ़ौरन तैयार हो गई लेकिन जैकलीन थोड़ा झिझक रही थीं. बीके नेहरू और भाभा ने जैकलीन को उनके कमरे में छोड़ा और ली के साथ उस समय के दिल्ली के बेहतरीन होटल इंपीरियल के ‘द टैवर्न’ में डांस करने चले गए.

अगले दिन जैकलीन और उनकी बहन ली, केन और किटी गालब्रेथ, बीके नेहरू और विदेश मंत्रालय की एक अधिकारी सूनू कपाडिया जिन्हें जैकलीन का लियाज़ां अफ़सर बनाया गया था, एक विशेष रेलगाड़ी से आगरा के लिए रवाना हुए.

रेलवे बोर्ड ने जैकलीन के लिए भारत में उपलब्ध बेहतरीन रेल सैलून का बंदोबस्त किया था. खाने और वाइन का भी अच्छा प्रबंध था. जैकलीन को ये सब बहुत अच्छा लग रहा था, क्योंकि अमरीका में वो विमान से उड़ने की आदी थी और अर्से बाद वो ट्रेन से सफ़र कर रही थीं. जैकलीन ने फ़तहपुर सीकरी का अकबर का महल और ताज महल देखा. अगले दिन उन्हें विमान से अपनी यात्रा जारी रखनी थी, लेकिन जैकलीन ने इच्छा प्रकट की कि वो यहाँ से वाराणसी जाना चाहेंगी और वो भी ट्रेन से.

नेहरू लिखते हैं, “सूनू मेरे पास दौड़ी दौड़ी आईं और पूछने लगी कि क्या इतने कम नोटिस पर वाराणसी की यात्रा आयोजित की जा सकती है. मैंने रेलवे बोर्ड के चेयरमैन करनैल सिंह को फ़ोन मिलाया. उन्होंने आनन फानन में इसकी व्यवस्था कराई और हम सब लोग ट्रेन से वाराणसी के लिए रवाना हो गए. लेकिन अपने उत्साह में मैं इसके बारे में विदेश मंत्रालय को बताना भूल गया. दिल्ली वापस लौटने पर मुझे इस बात की डांट पिलाई गई कि मैंने अमरीका के राष्ट्रपति की पत्नी की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया है.”

वाराणसी से जैकी उदयपुर गईं जहाँ महाराणा के महल में दो रातें रूकी. महल इतना भव्य था कि जैकी ने अपने पति को चिट्ठी लिख कर कहा कि इसके एक विंग में पूरा का पूरा व्हाइट हाउस समा जाएगा.

जैकलीन का अगला पड़ाव जयपुर था. महाराजा जयपुर और महारानी गायत्री देवी दोनों जैकलीन की बहन ली रैद्ज़ीविल के निजी दोस्त थे.

उन्होंने दोनों मेहमानों को न्योता दिया था कि वो दोनों बहनें उनके साथ ही ठहरें और दोनों इसके लिए राज़ी भी थीं. लेकिन राज्य सरकार को इस पर ऐतराज़ था. कारण ये था कि उस समय राज्य सरकार और महाराजा के बीच उनके अधिकारों को ले कर एक तरह की जंग छिड़ी हुई थी.

सरकार को इस बात पर आपत्ति थी कि अगर अमरीका के राष्ट्रपति की पत्नी राज भवन के बजाए महाराजा के साथ रूकती हैं तो इससे उनके रसूख में वृद्धि होगी. जैकलीन का तर्क ये था कि ये एक निजी यात्रा है और भारत सरकार को कोई अधिकार नहीं है कि वो ये तय करे कि उन्हें रहना कहाँ है. व्हाइट हाउस और भारत सरकार के बीच चले कई संवादों के बाद बीच का रास्ता ये निकाला गया कि जैकलीन एक रात राज भवन में रूकेंगी और फिर दो रातों के ले महाराजा के महल में चली जाएंगी.

उस समय गुरुमुख निहाल सिंह राजस्थान के राज्यपाल हुआ करते थे. वो स्वतंत्रता सेनानी थे. शालीन और विनम्र भी थे. लेकिन उनमें इस पद के लिए ज़रूरी लालित्य और स्टाइल का अभाव था.

दिल्ली लौटने पर मुख्य समारोह अमरीकी राजदूत के यहाँ था. उन्होंने एक रात्रि भोज का आयोजन किया था जिसमें प्रधानमंत्री नेहरू भी शामिल हुए थे.

अगला दिन जैकलीन कैनेडी की भारत यात्रा का अंतिम दिन था और संयोग से उस दिन होली थी. हवाई अड्डे जाने से पहले जैकलीन नेहरू को गुड बाई कहने उनके निवास स्थान तीनमूर्ति भवन गईं.

उन्होंने हमेशा की तरह काफ़ी फ़ैशनेबल कपड़े पहन रखे थे. अमरीकी राजदूत गालब्रैथ को होली के बारे में पता था, इसलिए वो कुर्ता पायजामा पहन कर आए थे.

बीके नेहरू लिखते हैं, “मैंने भी होली के मिज़ाज के ख़िलाफ़ लाउंज सूट पहन रखा था. मुझे पता था कि नेहरू होली खेलने के शैकीन थे. जैसे ही जैकलीन पहुंची, एक चाँदी की ट्रे में छोटी छोटी कटोरियों में कई रंगों के गुलाल उनके सामने लाए गए. नेहरू ने जैकलीन के माथे पर गुलाल का टीका लगाया. उन्होंने भी नेहरू के माथे पर टीका लगा दिया. वहाँ मौजूद इंदिरा गांधी ने भी यही किया.”

“लेकिन जब मेरी बारी आई तो मैंने एक मुट्ठी भर हरा गुलाल ले कर जैकलीन की पूरी नाक रंग दी. जैकलीन पहले ही नेहरू से कह चुकी थी कि मुझे उस दिन इन कपड़ो में नहीं आना चाहिए था और गालब्रेथ की तरह ही कपड़े पहनने चाहिए थे. जैसे ही मैंने जैकलीन को रंग लगाया, वो बोली मैं आपको सबक सिखाती हूँ. उन्होंने हरे गुलाल की पूरी कटोरी उठा कर मेरे सूट पर पलट दी.”

रंग गीले नहीं थे, इसलिए बी के नेहरू का सूट ख़राब नहीं हुआ. थोड़े पानी की मदद से जैकलीन का चेहरा और बीके नेहरू का सूट दोनों साफ़ हो गए. उन्होंने अमरीकी राजदूत गालब्रेथ के साथ पालम हवाई अड्डे पर जैकलीन कैनेडी को विदाई दी

दुर्गेश दुबे

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25 जून/इतिहास-स्मृति

*लोकतन्त्र पर काला धब्बा*

संविधान के निर्माताओं की इच्छा थी कि भारत एक लोकतान्त्रिक देश रहे; पर 25 जून, 1975 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, उनके पुत्र संजय गांधी और उनकी धूर्त मंडली ने लोकतन्त्र के मुख पर कीचड़ पोत दी।

1971 में लोकसभा चुनाव और फिर पाकिस्तान से युद्ध में सफलता से इंदिरा गांधी का दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ा था। वे उ.प्र. में रायबरेली से सांसद बनीं थी; पर उनके निर्वाचन क्षेत्र में हुई धांधली के विरुद्ध उनके प्रतिद्वन्द्वी राजनारायण ने प्रयाग उच्च न्यायालय में मुकदमा दायर कर दिया था। न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने साहसी निर्णय देते हुए इंदिरा गांधी के निर्वाचन को निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

इंदिरा गांधी सर्वोच्च न्यायालय में चली गयीं। वहां से उन्हें इस शर्त पर स्थगन मिला कि वे संसद में तो जा सकती हैं; पर बहस और मतदान में भाग नहीं ले सकतीं। माता-पिता की अकेली संतान होने के कारण वे बचपन से ही जिद्दी थीं। उन्होंने त्यागपत्र देने की बजाय आंतरिक उपद्रव से निबटने के नाम पर आपातकाल लगा दिया। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद तो उनके चमचे थे ही। उन्होंने 25 जून, 1975 की रात में कागजों पर हस्ताक्षर कर दिये।

वस्तुतः इसके लिए मंत्रिमंडल की सहमति आवश्यक थी; पर इंदिरा, संजय और उनके चमचों ने कुछ नहीं देखा। अगले दिन प्रातः मंत्रियों से हस्ताक्षर की औपचारिकता भी पूरी करा ली गयी। आपातकाल लगते ही नागरिकों के मूल अधिकार स्थगित हो गये। विपक्षी नेताओं को जेल में ठूंस दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। समाचार पत्रों पर सेंसरशिप लागू कर दी गयी। सारे देश में आतंक छा गया।

इसके बाद इंदिरा गांधी ने संविधान में ऐसे अनेक संशोधन कराये, जिससे प्रधानमंत्री पर कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता था। 39 वां संशोधन सात अगस्त, 1975 को संसद में केवल दो घंटे में ही पारित कर दिया गया। विपक्षी नेता जेल में थे और सत्ता पक्ष वाले आतंकित। ऐसे में विरोध कौन करता ? आठ अगस्त को यह राज्यसभा में भी पारित हो गया। नौ अगस्त, (शनिवार) को अवकाश के बावजूद सभी राज्यों की विधानसभाओं के विशेष सत्र बुलाकर वहां भी इसे पारित करा दिया गया। दस अगस्त ( रविवार) को राष्ट्रपति ने भी सहमति दे दी और इस प्रकार यह कानून बन गया।

इस तेजी का कारण यह था कि 11 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई होनी थी। नये कानून से इंदिरा गांधी न्यायालय से भी ऊंची हो गयीं और सुनवाई नहीं हो सकी। पूरा देश कांग्रेसी गुंडो की तानाशाही की गिरफ्त में आ गया; पर समय सदा एक सा नहीं रहता। धीरे-धीरे लोग आतंक से उबरने लगे। संघ द्वारा भूमिगत रूप से किये जा रहे प्रयास रंग लाने लगे। लोगों का आक्रोश फूटने लगा। आपातकाल और प्रतिबन्ध के विरुद्ध हुए सत्याग्रह में एक लाख से अधिक स्वयंसेवकों ने गिरफ्तारी दी। लोकतन्त्र की इस हत्या के विरुद्ध विदेशों में भी लोग इंदिरा गांधी से प्रश्न पूछने लगे।

इससे इंदिरा गांधी पर दबाव पड़ा। उसके गुप्तचरों ने सूचना दी कि देश में सर्वत्र शांति हैं और चुनाव में आपकी जीत सुनिश्चित है। इस भ्रम में इंदिरा गांधी ने चुनाव घोषित कर दिये; पर यह दांव उल्टा पड़ा। चुनाव में उसकी पराजय हुई और दिल्ली में जनता पार्टी की सरकार बन गयी। मां और पुत्र दोनों चुनाव हार गये। इस शासन ने वे सब असंवैधानिक संशोधन निरस्त कर दिये, जिन्होंने प्रधानमंत्री को न्यायालय से भी बड़ा बना दिया था। इस प्रकार इंदिरा गांधी की तानाशाही समाप्त होकर देश में लोकतन्त्र की पुनर्स्थापना हुई…✍🚩

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डॉ राजेंद्र प्रसाद


डॉ राजेंद्र प्रसाद जी के साथ नेहरू ने जो किया, उसको बेनकाब करता राज्यसभा सांसद आरके सिन्हा जी का लेख। पढिए और अतीत के सत्य का सामना कीजिए।.
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डा. राजेन्द्र प्रसाद की शख्सियत से पंडित नेहरु हमेशा अपने को असुरक्षित महसूस करते रहे। उन्होंने राजेन्द्र बाबू को नीचा दिखाने का कोई अवसर भी हाथ से जाने नहीं दिया। हद तो तब हो गई जब 12 वर्षो तक राष्ट्रपति रहने के बाद राजेन्द्र बाबू देश के राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद पटना जाकर रहने लगे तो नेहरु ने उनके लिए वहां पर एक सरकारी आवास तक की व्यवस्था नहीं की। उनकी सेहत का ध्यान नहीं रखा गया। दिल्ली से पटना पहुंचने पर राजेन्द्र बाबू बिहार विद्यापीठ, सदाकत आश्रम के एक सीलन भरे कमरे में रहने लगे।

उनकी तबीयत पहले से खराब रहती थी, पटना जाकर ज्यादा खराब रहने लगी। वे दमा के रोगी थे। सीलनभरे कमरे में रहने के बाद उनका दमा ज्यादा बढ़ गया। वहां उनसे मिलने के लिए श्री जयप्रकाश नारायण पहुंचे। वे उनकी हालत देखकर हिल गए। उस कमरे को देखकर जिसमें देश के पहले राष्ट्रपति और संविधान सभा के पहले अध्यक्ष डा.राजेन्द्र प्रसाद रहते थे, उनकी आंखें नम हो गईं। उन्होंने उसके बाद उस सीलन भरे कमरे को अपने मित्रों और सहयोगियों से कहकर कामचलाउ रहने लायक करवाया। लेकिन, उसी कमरे में रहते हुए राजेन्द्र बाबू की 28 फरवरी,1963 को मौत हो गई।

क्या आप मानेंगे कि उनकी अंत्येष्टि में पंडित नेहरु ने शिरकत करना तक भी उचित नहीं समझा। वे उस दिन जयपुर में एक अपनी ‘‘‘तुलादान’’ करवाने जैसे एक मामूली से कार्यक्रम में चले गए। यही नहीं, उन्होंने राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल डा.संपूर्णानंद को राजेन्द्र बाबू की अंत्येष्टि में शामिल होने से रोका। इस मार्मिक और सनसनीखेज तथ्य का खुलासा खुद डा.संपूर्णानंद ने किया है। संपूर्णानंद जी ने जब नेहरू को कहा कि वे पटना जाना चाहते हैं, राजेन्द्र बाबू की अंत्येष्टि में भाग लेने के लिए तो उन्होंने (नेहरु) संपूर्णानंद से कहा कि ये कैसे मुमकिन है कि देश का प्रधानमंत्री किसी राज्य में आए और उसका राज्यपाल वहां से गायब हो। इसके बाद डा. संपूर्णानंद ने अपना पटना जाने का कार्यक्रम रद्द किया। हालांकि, उनके मन में हमेशा यह मलाल रहा कि वे राजेन्द्र बाबू के अंतिम दर्शन नहीं कर सके। वे राजेन्द्र बाबू का बहुत सम्मान करते थे। डा0 सम्पूर्णानंद ने राजेन्द बाबू के सहयोगी प्रमोद पारिजात शास्त्री को लिखे गए पत्र में अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए लिखा था कि ‘‘घोर आश्चर्य हुआ कि बिहार के जो प्रमुख लोग दिल्ली में थे उनमें से भी कोई पटना नहीं गया। (किसके डर से?)

सबलोगों को इतना कौन सा आवशयक काम अचानक पड़ गया, यह समझ में नहीं आया। यह अच्छी बात नहीं हुई। यह बिलकुल ठीक है कि उनके जाने न जाने से उस महापुरुष भी बनता बिगड़ता नहीं। परन्तु, ये लोग तो निष्चय ही अपने कर्तव्य से च्युत हुए। कफ निकालने वाली मशीन वापस लाने की बात तो अखबारों में भी आ गई हैं मुख्यमंत्री की बात सुनकर आश्चर्य हुआ। यही नहीं, नेहरु ने राजेन्द्र बाबू के उतराधिकारी डा. एस. राधाकृष्णन को भी पटना न जाने की सलाह दे दी। लेकिन, डा0 राधाकृष्णन ने नेहरू के परामर्श को नहीं माना और वे राजेन्द्र बाबू के अंतिम संस्कार में भाग लेने पटना पहुंचे। इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि नेहरू किस कदर राजेन्द्र प्रसाद से दूरियां बनाकर रखते थे।

ये बात भी अब सबको मालूम है कि पटना में डा. राजेन्द्र बाबू को उत्तम क्या मामूली स्वास्थ्य सुविधाएं तक नहीं मिलीं। उनके साथ बेहद बेरुखी वाला व्यवहार होता रहा। मानो सबकुछ केन्द्र के निर्देश पर हो रहा हो। उन्हें कफ की खासी शिकायत रहती थी। उनकी कफ की शिकायत को दूर करने के लिए पटना मेडिकल कालेज में एक मशीन थी ही कफ निकालने वाली। उसे भी केन्द्र के निर्देश पर मुख्यमंत्री ने राजेन्द्र बाबू के कमरे से निकालकर वापस पटना मेडिकल काॅलेज भेज दिया गया। जिस दिन कफ निकालने की मशीन वापस मंगाई गई उसके दो दिन बाद ही राजेन्द बाबू खास्ते-खास्ते चल बसे। यानी राजेन्द्र बाबू को मारने का पूरा और पुख्ता इंतजाम किया गया था ।

दरअसल नेहरु अपने को राजेन्द्र प्रसाद के समक्ष बहुत बौना महसूस करते थे। उनमें इस कारण से बढ़ी हीन भावना पैदा हो गई थी। इसलिए वे उनसे छतीस का आंकड़ा रखते थे। वे डा.राजेन्द्र प्रसाद को किसी न किसी तरह से आदेश देने की मुद्रा में रहते थे जिसे राजेन्द्र बाबू मुस्कुराकर टाल दिया करते थे।

नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद से सोमनाथ मंदिर का 1951 में उदघाटन न करने का आग्रह किया था। उनका तर्क था कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के प्रमुख को मंदिर के उदघाटन से बचना चाहिए। हालांकि, नेहरू के आग्रह को न मानते हुए डा. राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर में शिव मूर्ति की स्थापना की थी।

डा. राजेन्द्र प्रसाद मानते थे कि ‘‘धर्मनिरपेक्षता का अर्थ अपने संस्कारों से दूर होना या धर्मविरोधी होना नहीं हो सकता।’’ सोमनाथ मंदिर के उदघाटन के वक्त डा. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है लेकिन नास्तिक राष्ट्र नहीं है। डा. राजेंद्र प्रसाद मानते थे कि उन्हें सभी धर्मों के प्रति बराबर और सार्वजनिक सम्मान प्रदर्शित करना चाहिए।

नेहरु एक तरफ तो डा. राजेन्द्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर में जाने से मना करते रहे लेकिन, दूसरी तरफ वे स्वयं 1956 के इलाहाबाद में हुए कुंभ मेले में डुबकी लगाने चले गए। बताते चलें कि नेहरु के वहां अचानक पहुँच जाने से कुंभ में अव्यवस्था फैली और भारी भगदड़ में करीब 800 लोग मारे गए।

हिन्दू कोड बिल पर भी नेहरु से अलग राय रखते थे डा. राजेन्द्र प्रसाद। जब पंडित जवाहर लाल नेहरू हिन्दुओं के पारिवारिक जीवन को व्यवस्थित करने के लिए हिंदू कोड बिल लाने की कोशिश में थे, तब डा.राजेंद्र प्रसाद इसका खुलकर विरोध कर रहे थे। डा. राजेंद्र प्रसाद का कहना था कि लोगों के जीवन और संस्कृति को प्रभावित करने वाले कानून न बनाये जायें।

दरअसल जवाहर लाल नेहरू चाहते ही नहीं थे कि डा. राजेंद्र प्रसाद देश के राष्ट्रपति बनें। उन्हें राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए उन्होंने ‘‘झूठ’’ तक का सहारा लिया था। नेहरु ने 10 सितंबर, 1949 को डा. राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर कहा कि उन्होंने (नेहरू) और सरदार पटेल ने फैसला किया है कि सी.राजगोपालाचारी को भारत का पहला राष्ट्रपति बनाना सबसे बेहतर होंगा।नेहरू ने जिस तरह से यह पत्र लिखा था, उससे डा.राजेंद्र प्रसाद को घोर कष्ट हुआ और उन्होंने पत्र की एक प्रति सरदार पटेल को भिजवाई। पटेल उस वक्त बम्बई ) में थे। कहते हैं कि सरदार पटेल उस पत्र को पढ़ कर सन्न थे, क्योंकि, उनकी इस बारे में नेहरू से कोई चर्चा नहीं हुई थी कि राजाजी (राजगोपालाचारी) या डा. राजेंद्र प्रसाद में से किसे राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए। न ही उन्होंने नेहरू के साथ मिलकर यह तय किया था कि राजाजी राष्ट्रपति पद के लिए उनकी पसंद के उम्मीदवार होंगे। यह बात उन्होंने राजेन्द्र बाबू को बताई। इसके बाद डा. राजेंद्र प्रसाद ने 11 सितंबर,1949 को नेहरू को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ‘‘पार्टी में उनकी (डा0 राजेन्द प्रसाद की) जो स्थिति रही है, उसे देखते हुए वे बेहतर व्यवहार के पात्र हैं। नेहरू को जब यह पत्र मिला तो उन्हें लगा कि उनका झूठ पकड़ा गया। अपनी फजीहत कराने के बदले उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करने का निर्णय लिया।

नेहरू यह भी नहीं चाहते थे कि हालात उनके नियंत्रण से बाहर हों और इसलिए ऐसा बताते हैं कि उन्होंने इस संबंध में रातभर जाग कर डा. राजेन्द्र प्रसाद को जवाब लिखा। डा. राजेन्द्र बाबू, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के विरोध के बावजूद दो कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति चुने गए थे। बेशक, नेहरू सी राजगोपालाचारी को देश का पहला राष्ट्रपति बनाना चाहते थे, लेकिन सरदार पटेल और कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ नेताओं की राय डा. राजेंद्र प्रसाद के हक में थी। आखिर नेहरू को कांग्रेस नेताओं सर्वानुमति की बात माननी ही पड़ी और राष्ट्रपति के तौर पर डा. राजेन्द्र प्रसाद को ही अपना समर्थन देना पड़ा।

जवाहर लाल नेहरू और डा. राजेंद्र प्रसाद में वैचारिक और व्यावहारिक मतभेद बराबर बने रहे थे। ये मतभेद शुरू से ही थे, लेकिन, 1950 से 1962 तक राजेन्द्र बाबू के राष्ट्रपति रहने के दौरान ज्यादा मुखर और सार्वजनिक हो गए। नेहरु पश्चिमी सभ्यता के कायल थे जबकि राजेंद्र प्रसाद भारतीय सभ्यता देष के एकता का मूल तत्व मानते थे। राजेन्द्र बाबू को देश के गांवों में जाना पसंद था, वहीं नेहरु लन्दन और पेरिस में चले जाते थे। पेरिस के घुले कपड़े तक पहनते थे। सरदार पटेल भी भारतीय सभ्यता के पूर्णतया पक्षधर थे। इसी कारण सरदार पटेल और डा. राजेंद्र प्रसाद में खासी घनिष्ठता थी। सोमनाथ मंदिर मुद्दे पर डा. राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल ने एक जुट होकर कहा की यह भारतीय अस्मिता का केंद्र है इसका निर्माण होना ही चाहिए।

अगर बात बिहार की करें तो वहां गांधीजी के बाद राजेन्द्र प्रसाद ही सबसे बड़े और लोकप्रिय नेता थे। गांधीजी के साथ ‘राजेन्द्र प्रसाद जिन्दाबाद’ के भी नारे लगाए जाते थे। लंबे समय तक देश के राष्ट्रपति रहने के बाद भी राजेन्द्र बाबू ने कभी भी अपने किसी परिवार के सदस्य को न पोषित किया और न लाभान्वित किया। हालांकि नेहरु इसके ठीक विपरीत थे। उन्होंने अपनी पुत्री इंदिरा गांधी और बहन विजयालक्ष्मी पंडित को सत्ता की रेवडि़यां खुलकर बांटीं। सारे दूर-दराज के रिष्तेदारों को राजदूत, गवर्नर, जज बनाया।

एक बार जब डा. राजेंद्र प्रसाद ने बनारस यात्रा के दौरान खुले आम काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारियों के पैर छू लिए तो नेहरू नाराज हो गए और सार्वजनिक रूप से इसके लिए विरोध जताया, और कहा की भारत के राष्ट्रपति को ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए। हालांकि डा. राजेन्द्र प्रसाद ने नेहरु की आपत्ति पर प्रतिक्रिया देना भी उचित नहीं समझा। राजेन्द्र प्रसाद नेहरू की तिब्बत नीति और हिन्दी-चीनी भाई-भाई की नीति से असहमत थे। नेहरु की चीन नीति के कारण भारत 1962 की जंग में करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। राजेन्द्र बाबू और नेहरु में राज्यभाषा हिन्दी को लेकर भी मतभेद था। मुख्यमंत्रियों की सभा (1961) को राष्ट्रपति ने लिखित सुझाव भेजा कि अगर भारत की सभी भाषाएं देवनागरी लिपि अपना लें, जैसे यूरोप की सभी भाषाएं रोमन लिपि में लिखी जाती हैं, तो भारत की राष्ट्रीयता मजबूत होगी। सभी मुख्यमंत्रियों ने इसे एकमत से स्वीकार कर लिया, किन्तु अंग्रेजी परस्त नेहरू की केंद्र सरकार ने इसे नहीं माना क्योंकि, इससे अंग्रेजी देश की भाषा नहीं बनी रहती जो नेहरू चाहते थे।

वास्तव में डा. राजेंद्र प्रसाद एक दूरदर्शी नेता थे वो भारतीय संस्कृति सभ्यता के समर्थक थे, राष्ट्रीय अस्मिता को बचाकर रखने वालो में से थे।जबकि नेहरु पश्चिमी सभ्यता के समर्थक और, भारतीयता के विरोधी थे। बहरहाल आप समझ गए होंगे कि नेहरु जी किस कद्र भयभीत रहते थे राजेन्द्र बाबू से।

अभी संविधान पर देशभर में चर्चायें हो रही हैं। डा0 राजेन्द्र प्रसाद ही संविधान सभा के अध्यक्ष थे और उन्होंने जिन 24 उप-समितियों का गठन किया था, उन्हीं में से एक ‘‘मसौदा कमेटी’’ के अध्यक्ष डा0 भीमराव अम्बेडकर थे। उनका काम 300 सदस्यीय संविधान सभा की चर्चाओं और उप-समितियों की अनुषंसाओं को संकलित कर एक मसौदा (ड्राफ्ट) तैयार करना था जिसे संविधान सभा के अध्यक्ष के नाते डा0 राजेन्द्र प्रसाद स्वीकृत करते थे। फिर वह ड्राफ्ट संविधान में शामिल होता था। संविधान निर्माण का कुछ श्रेय तो आखिरकार देशरत्न डा0 राजेन्द्र प्रसाद को भी मिलना ही चाहिए।