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ज्यादातर देवी मंदिर पहाड़ों पर ही क्यों हैं? आखिर इसके पीछे असली वजह क्या है?

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22 hrs ·

ज्यादातर देवी मंदिर पहाड़ों पर ही क्यों हैं? आखिर इसके पीछे असली वजह क्या है?
आपका ये मित्र नवऱात्र उत्सव के मौके पर बताने जा रहा है इस रहस्य के बारे में।

ऊंचे पहाड़ों पर बने देवी मंदिरों की बात होती है तो सबसे पहला नाम कश्मीर की वैष्णो देवी फिर हिमाचल की ज्वाला देवी, नयना देवी, मध्य प्रदेश की मैहरवाली मां शारदा, छत्तीसगढ़ डोँगरगढ़ की बम्लेश्वरी मां,पावागढ़ वाली माता का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इनके अलावा हमारे देश में ऐसे कितने ही प्रसिद्ध मंदिर हैं जो ऊंचे पहाड़ों पर बने हैं।

आखिर अब प्रश्न उठता है कि ये मंदिर पहाड़ों पर क्यों बने हैं? पहाड़ों पर ऐसा क्या है जो समतल जमीन पर नहीं है? इस संबंध में जानकार लोग कहते हैं कि पहले और आज भी इन स्थानों को साधना केंद्र के रूप में जाना जाता था। पहले ऋषि-मुनि ऐसे स्थानों पर सालों तपस्या करके सिद्धि प्राप्त करते थे और उसका उपयोग मनुष्य के कल्याण के लिए करते थे। पहाड़ों पर एकांत होता है। धरती पर इंसान ज्यादातर समतल भूमि पर ही बसना पसंद करते हैं। लोगों ने घर बनाने के लिए पहाड़ी इलाकों की बजाय मैदानी क्षेत्रों को ही प्राथमिकता दी है। एकांत ने ही देवी मंदिरों के लिए पहाड़ों को महत्व दिया है। कार्य चाहे सांसारिक हो या आध्यात्मिक, उसकी सफलता मन की एकाग्रता (concentration of mind) पर ही निर्भर रहती है। पहाड़ों पर मन एकाग्र आसानी से हो जाता है। मौन, ध्यान एवं जप आदि कार्यों के लिए एकांत की जरूरत होती है और इसके लिए पहाड़ों से अच्छा कोई स्थान नहीं हो सकता।

प्राकृतिक सौन्दर्य- पहाड़ी क्षेत्रों पर इंसानों का आना-जाना कम ही रहता है, जिससे वहां का प्राकृतिक सौन्दर्य अपने असली रुप में जीवित रह पाता है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि सौन्दर्य इंसान को स्फूर्ति और ताजगी प्रदान करता है। कई बार लोगों को डॉक्टर भी पहाड़ी इलाके में कुछ दिन बिताने की सलाह देते हैं।

ऊंचाई का प्रभाव- वैज्ञानिक विश्लेषणों में पाया गया है कि निचले स्थानों की बजाय अधिक ऊंचाई पर इंसान का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। लगातार ऊंचे स्थान पर रहने से जमीन पर होने वाली बीमारियां खत्म हो जाती हैं। ऐसे में पहाड़ी स्थानों पर इंसान की धार्मिक और आध्यात्मिक भावनाओं का विकास जल्दी होता है।

इनका कहना है- भोपाल के प्रख्यात ज्योतिषि पंडित प्रहलाद पंड्या का कहना है कि पहाड़ों पर दैवीय स्थल होने की वजह यह है कि देवी राजा हिमाचल की पुत्री हैं। इन्ही के नाम पर अब हिमाचल प्रदेश है। इस स्थान को देवभूमि भी कहा जाता है। देवी का जन्म यहीं हुआ इसी कारण से इन्हें पहाड़ों वाली माता कहा जाता है। देखा जाए तो देवी राक्षसों के नाश के लिए अवतरित हुईं थीं। राक्षस मैदानी इलाके से आते थे और देवी पहाड़ों से उनको देख उनका वध कर देती थीं। इसलिए भी देव स्थान ऊंचे पहाड़ों पर हैं।

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NAVRATRI

NAVRATRI- NAV DURGA PUJA
JAI MATA DI
Navratri is a famous festival celebrated in India and many other parts of the world amongst Hindus. Navratri or Nav Ratri means 9 nights dedicated for 9 devine forms of Maa, Adishakti Maa Durga. Navratras come 4 times a year according to the Hindu Calender however celebrated once or twice an year only in different parts of the world including by Hindus and few Sikhs. Among Bengali’s it is celebrated before Dussehra once an year. The Navratras are The 9 names of Maa Durga are:

1. Maa Shailputri
2. Maa Brahmacharini
3. Maa Chandraghanta
4. Maa Kushmanda
5. Maa Katyayani
6. Maa Kalratri
7. Maa Siddhidatri
8. Maa Skandmata
9. Maa Mahagauri

1. MAA SHAILPUTRI

Day 1 belongs to Mata Shailputri

Vande Vaadidra Chhatalaabhaaya Chandrardh Kritshekhraam
Vrisharudhaam Shooldharaam Shaiputri Yashsvineem.
Durga Pooja ke pratham din Mata Shailputri ki pooja-vandana is mantra dwara ki jati hai.
Maa Durga ki pahli swaroopa aur Shailraaj Himalaya ki putri Shailputri ke pooja ke sath hi Durga Pooja aarambh ho jata hai. Navratra poojan ke pratham din kalash sthapna ke sath inki hi pooja aur aradhna ki jati hai. Mata Shailputri ka vahan Vrishabh hai, unke dahine hath me Trishul aur bayen hath me Kamal ka pushp hai. Navratra ke is pratham din ki upasna me Yogi apne man ko ‘Mooladhar’ chakra me sthit karte hain aur yahi se unki yog sadhna prarambh hota hai. Pauranik kathanusar Maa Shailputri apne purv janm me Prajapati Daksh ke ghar kanya roop me utpann huyi thi. Us samay mata ka naam Sati tha aur inka vivaah Bhagvan Shankar se hua tha. Ek bar Prajapati Daksh ne yagya aarambh kiya aur sabhi devtaao ko aamantrit kiya parantu Bhagvan Shiv ko aamantran na
hi diya. Apne maa aur bahno se milne ko aatur Maa Sati bina nimantran ke hi jab pita ke ghar pahunchi to unhe waha apne aur Bholenath ke prati tiraskar se bhara bhav mila. Maa Sati is apmaan ko sahan nahi kar saki aur wahi yogaagni dwara khud ko jalakar bhasm kar diya aur agle janm me Shailraj Himalaya ke ghar putri roop me janm liya. Shailraaj Himalaya ke ghar janm lene ke karan Maa Durga ke is pratham swaroop ko Shailputri kaha jata hai.

वंदे वाद्द्रिछतलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम |
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम्‌ ||

दुर्गा पूजा के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा-वंदना इस मंत्र द्वारा की जाती है.
मां दुर्गा की पहली स्वरूपा और शैलराज हिमालय की पुत्री शैलपुत्री के पूजा के साथ ही दुर्गा पूजा आरम्भ हो जाता है. नवरात्र पूजन के प्रथम दिन कलश स्थापना के साथ इनकी ही पूजा और उपासना की जाती है. माता शैलपुत्री का वाहन वृषभ है, उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प रहता है. नवरात्र के इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं और यहीं से उनकी योग साधना प्रारंभ होता है. पौराणिक कथानुसार मां शैलपुत्री अपने पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष के घर कन्या रूप में उत्पन्न हुई थी. उस समय माता का नाम सती था और इनका विवाह भगवान् शंकर से हुआ था. एक बार प्रजापति दक्ष ने यज्ञ आरम्भ किया और सभी देवताओं को आमंत्रित किया परन्तु भगवान शिव को आमंत्रण नहीं दिया. अपने मां और बहनों से मिलने को आतुर मां सती बिना निमंत्रण के ही जब पिता के घर पहुंची तो उन्हें वहां अपने और भोलेनाथ के प्रति तिरस्कार से भरा भाव मिला. मां सती इस अपमान को सहन नहीं कर सकी और वहीं योगाग्नि द्वारा खुद को जलाकर भस्म कर दिया और अगले जन्म में शैलराज हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया. शैलराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण मां दुर्गा के इस प्रथम स्वरुप को शैल पुत्री कहा जाता है.

2. MAA BRAHMACHARINI

The second day belongs to Maa Brahmacharini. She is the second manifestation of Maa Durga who is worshippied on the second day of Navratri. In her name the word “Brahm” refers to “Tapa”. So Brahmcharini means Tapa Charini – The one who perform Tapa or penance. It is Said that the “Vedas”, “Tatva” & “Tapa” are synonyms of word “Brahm”. The form of Brahmacharini is tremendously effulgent and extremely majestic.

Jai Maa Brahmacharini…
Navratre Ke Dusre Din Maa Brahmacharini Ki Puja Ki Jati Hai,
‘Brahm’ Ka Arth Hai ‘Tapa’ Arthath Maa Ne Shiv Ji Ko Pati Rup Main Varan Karne Ko Ghor Tapa Kia Tha,
Maa Ke Ek Hath Me Kamandalu Hai Or Dusre Me Rudrash Mala.,
Maa Brahmcharini Ki Puja Karne Manushya Ko Abishat Bhudhi Prapat Hoti Hai.

माँ ब्रह्मचारिणी अपने सीधे हाथ में गुलाब का फूल पकड़े हुए हैं और अपने बाहिने हाथ में कमलदानु पकड़े हुए है. वह प्यार और वफ़ादारी को प्रदर्शित करती हैं. मा ब्रह्मचारिणी ज्ञान का भंडार है. रुद्राक्ष उनका बहुत सुंदर गहना हैं. माँ ब्रह्मचारिणी सक्षम है अनंत लाभ पहुँचाने मे . मा ब्रह्मचारिणी की आराधना करने से मनुष्य को प्राप्त होती हैं विजय और विजय हर जगह

3. MAA CHANDRAGHANTA

Pindaj Pravaraarudha Chandkopastra Kairyutaa
Prasaadam Tanute Mahyam Chandram Ghanshteti Vishruta.
Navratra ke tisre din Mata Chandraghanta ki pooja-vandna is mantra dwara ki jatia hi
Maa Durga ki 9 shaktiyo ki tisri swaroopa Bhagvati Chandraghanta ki pooja Navratra ke tisre din ki jati hai. Mata ke mathe par ghante aakar ka ardhchandra hai, jis karan inhe Chandraghanta kaha jata hai. Inka roop param shantidayak aur kalyankari hai. Mata ka sharir swarn ke saman ujjaval hai. Inka vahan Singh hai aur inked as hath hain jo ki vibhinn prakar ke astra-shastra se sushobhit rahte hain. Singh par savar Maa Chandraghanta ka roop yuddha ke liye uddhat dikhata hai aur unke ghante ki prachand dhvani se asur aur rakshas bhaybhit karte hain. Bhagvati Chandraghanta ki upasana karne se upasak aadhyatmik aur aatmik shakti prapt karta hai aur jo shraddhalu is din shraddha evam bhakti purvak Durga Saptsati ka path karta hai, wah sansar me yash, kirti evam samman ko prapt karta hai. Mata Chandraghanta ki pooja-archana bhakto ko sabhi janmo ke kashto aur paapo se mukt kar islok aur parlok me kalian pradan karti hai aur Bhagvati apne dono hatho se sadhko ko chirayu, such sampda aur rogo se mukt hone ka vardan deti hai. Manushya ko nirantar Mata Chandraghanta ke pavitra vigrah ko dhyam me rakhte huye sadhna ki or agrasar hone ka prayas karna chahiye aur is din mahilaon ko ghar me bulakar aadar samman purvak unhe bhojan karana chahiye aur kalash ya mandir ki ghanti unhe bhent swaroop pradan karna chahiye. Isase bhakt par sada Bhagvati ki kripa drishti bani rahti hai.

पिण्डज प्रवरारुढ़ा चण्डकोपास्त्र कैर्युता |
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्र घंष्टेति विश्रुता ||
नवरात्र के तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की पूजा-वंदना इस मंत्र के द्वारा की जाती है-
मां दुर्गा की 9 शक्तियों की तीसरी स्वरूपा भगवती चंद्रघंटा की पूजा नवरात्र के तीसरे दिन की जाती है. माता के माथे पर घंटे आकार का अर्धचन्द्र है, जिस कारण इन्हें चन्द्रघंटा कहा जाता है. इनका रूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है. माता का शरीर स्वर्ण के समान उज्जवल है. इनका वाहन सिंह है और इनके दस हाथ हैं जो की विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र से सुशोभित रहते हैं. सिंह पर सवार मां चंद्रघंटा का रूप युद्ध के लिए उद्धत दिखता है और उनके घंटे की प्रचंड ध्वनि से असुर और राक्षस भयभीत करते हैं. भगवती चंद्रघंटा की उपासना करने से उपासक आध्यात्मिक और आत्मिक शक्ति प्राप्त करता है और जो श्रद्धालु इस दिन श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक दुर्गा सप्तसती का पाठ करता है, वह संसार में यश, कीर्ति एवं सम्मान को प्राप्त करता है. माता चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना भक्तो को सभी जन्मों के कष्टों और पापों से मुक्त कर इसलोक और परलोक में कल्याण प्रदान करती है और भगवती अपने दोनों हाथो से साधकों को चिरायु, सुख सम्पदा और रोगों से मुक्त होने का वरदान देती हैं. मनुष्य को निरंतर माता चंद्रघंटा के पवित्र विग्रह को ध्यान में रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयास करना चाहिए और इस दिन महिलाओं को घर पर बुलाकर आदर सम्मान पूर्वक उन्हें भोजन कराना चाहिए और कलश या मंदिर की घंटी उन्हें भेंट स्वरुप प्रदान करना चाहिए. इससे भक्त पर सदा भगवती की कृपा दृष्टि बनी रहती है.

4. MAA KUSHMANDA

Maa Kushmanda is the name of the fourth Durga. This Shakti or celestial energy bestows the basic necessities and everyday sustenance on the world and creates the Universe merely by laughing. Residing in solar systems, She shines brightly in all ten directions very much like the Sun beaming with a radiant aura.

Equipped with eight hands, Ma Kushmanda holds seven types of brilliant weapons, gleaming in her seven hands and a rosary in her right. Seeming resplendent mounted on a Lion, Kumbh Bhand means seeing the cosmic dance in the form of Pindi; the knowledge of cosmic intricacies in humans. She likes the offerings of Kumhde, leading to her name Kushmanda. Her abode is Bhima Parvat.
भगवती माँ दुर्गा जी के चौथे स्वरुप का नाम कूष्मांडा है ! अपनी मंद हल्की हसीं द्वारा अंड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कुष्मांडा देवी के नाम से अभिहित किया गया है ! जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था , चारों ओर अन्धकार ही अंधकार व्याप्त था, तब माँ कुष्मांडा ने ही अपनी हास्य से ब्रह्माण्ड कि रचना की थी ! अतः यही सृष्टि की आदि – स्वरूपा आदि शक्ति है ! इनके पूर्व ब्रह्माण्ड का अस्तित्व था ही नहीं ! इनका निवास सूर्य मंडल के भीतर के लोक में है ! सूर्य लोक में निवास सूर्य मंडल के भीतर के लोक में है ! सूर्य लोक में निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्ही में है ! इनके शरीर की कान्ति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दीप्तिमान और भास्कर है ! इनके तेज की तुलना इन्ही से की जा सकती है ! अन्य कोई भी देवी – देवता इनके तेज और प्रभाव की समता नहीं कर सकते ! इन्ही के तेज और प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हो रही है ! ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्ही की छाया है ! इनकी आठ भुजाएं है ! अतः ये अष
्ट भुजी देवी के नाम से भी विख्यात है ! इनके सात हाथो में क्रमशः कमण्डलु , धनुष – बाण , कमल पुष्प , अमृत पूर्ण कलश , चक्र , तथा गदा है ! आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है ! इनका वाहन सिंह है ! इस कारण से भी कुष्मांडा कही जाती है ! नवरात्री – पूजन के चौथे दिन कुष्मांडा देवी के स्वरुप की ही पूजा उपासना की जाती है ! इस दिन साधक का मन अनाहत चक्र में अवस्थित होता है ! अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और अचल मन से कुष्मांडा देवी के स्वरुप को ध्यान में रख कर पूजा उपासना के कार्य में लगना चाहिए ! माँ कुष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग – शोक विनष्ट हो जाते है ! इनकी भक्ति से आयु , यश , बल , और आरोग्य की वृद्धि होती है ! माँ कुष्मांडा अत्यल्प सेवा और भक्ति से भी प्रसन्न होने वाली है ! यदि मनुष्य सच्चे ह्रदय से इनका शरणागत बन जाये तो फिर उसे अत्यंत सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है ! 

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नवरात्रि

🙏🌹नवरात्रि🌹🙏

चान्द्रमास के अनुसार चार नवरात्र होते है

आषाढ शुक्लपक्ष मे आषाढी नवरात्र ,
आश्विन शुक्लपक्ष मेँ शारदीय नवरात्र ,
माघशुक्ल पक्ष मेँ शिशिर नवरात्र एवं
चैत्र शुक्ल पक्ष मे वासिन्तक नवरात्र ।

तथापि परंपरा से दो नवरात्र – चैत्र एवं आश्विन मास मे सर्वमान्य है । चैत्रमास मधुमास एवं आश्विनमास ऊर्ज मास नाम से प्रसिद्ध है। जो शक्ति के पर्याय है❗

अतः शक्ति आराधना हेतु इस कालखण्ड को नवरात्र शब्द से सम्बोधित किया गया है “नवानां रात्रि”

नौ रात्रियो का समूह

रात्रि का तात्पर्य है विश्रामदात्री , सुखदात्री के साथ एक अर्थ जगदम्बा भी है।

“रात्रिरुपयतो देवी दिवरुपो महेश्वरः”

तंत्रग्रन्थोँ मेँ तीन रात्रि

कालरात्रि (फाल्गुन कृष्णपक्ष चतुर्दशी महाकाली की रात्रि

मोहरात्रि (आश्विन शुक्लपक्ष अष्टमी) महासरस्वती की रात्रि

महारात्रि कार्तिक कृष्णपक्ष अमावस्या महालक्ष्मी की रात्रि

एक अंक से सृष्टि का आरम्भ है, सम्पूर्ण मायिक सृष्टि का विस्तार आठ अंक तक ही है। इससे परे ब्रह्म है जो नौ अंक का प्रतिनिधित्व करता है। अस्तु नवमी तिथि के आगमन पर शिव शक्ति का मिलन होता है ।

शक्ति सहित शक्तिमान को प्राप्त करने हेतु भक्त को नवधा भक्ति का आश्रय लेना पडता है ,

जीवात्मा नौ द्वार वाले पुर(शरीर) का स्वामी है – “नवछिद्रमयो देह:”

इन छिद्रो को पार करता हुआ जीव ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है। अतः नवरात्र की प्रत्येक तिथि के लिए कुछ साधन ज्ञानियो द्वारा नियत किये गये है।

प्रतिपदा – इसे शुभेच्छा कहते है । जो प्रेम जगाती है। प्रेम बिना सब साधन व्यर्थ है , अस्तु प्रेम को अबिचल अडिग बनाने हेतु शैलपुत्री का आवाहन पूजन किया जाता है । अचल पदार्थो मे पर्वत सर्वाधिक अटल होता है ।

द्वितीया – धैर्यपूर्वक द्वैतबुद्धि का त्याग करके ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए माँ ब्रह्मचारिणी का पूजन करना चाहिए ।

तृतीया – त्रिगुणातीत (सत, रज, तम से परे) होकर माँ चन्द्रघण्टा का पूजन करते हुए मन की चंचलता को वश मेँ करना चाहिए ।

चतुर्थी – अन्तःकरण चतुष्टय मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार का त्याग करते हुए मन, बुद्धि को कूष्माण्डा देवी चरणोँ मेँ अर्पित करेँ ।

पंचमी – इन्द्रियो के पाँच विषयो अर्थात् शब्द रुप रस गन्ध स्पर्श का त्याग करते हुए स्कन्दमाता का ध्यान करेँ।

षष्ठी – काम क्रोध मद मोह लोभ एवं मात्सर्य का परित्याग करके कात्यायनी देवी का ध्यान करे ।

सप्तमी – रक्त, रस, माँस, मेदा, अस्थि, मज्जा एवं शुक्र इन सप्त धातुओ से निर्मित क्षण भंगुर दुर्लभ मानव देह को सार्थक करने के लिए कालरात्रि देवी की आराधना करे।

अष्टमी – ब्रह्म की अष्टधा प्रकृति पृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश, जल, मन, बुद्धि एवं अहंकार से परे महागौरी के स्वरुप का ध्यान करता हुआ ब्रह्म से एकाकार होने की प्रार्थना करे ।

नवमी – माँ सिद्धिदात्री की आराधना नवद्वार वाले शरीर की प्राप्ति को धन्य बनाता हुआ आत्मस्थ हो जाय ।

पौराणिक दृष्टि से आठ लोकमाताएँ हैं तथा तन्त्रग्रन्थोँ मेँ आठ शक्तियाँ है।

1 ब्राह्मी – सृष्टिक्रिया प्रकाशित करती है ।

2 माहेश्वरी – यह प्रलय शक्ति है ।

3 कौमारी – आसुरी वृत्तियोँ का दमन करके दैवीय गुणोँ की रक्षा करती है ।

4 वैष्णवी – सृष्टि का पालन करती है

5 वाराही – आधार शक्ति है इसे काल शक्ति कहते है ।

6 नारसिंही – ये ब्रह्म विद्या के रुप मेँ ज्ञान को प्रकाशित करती है

7 ऐन्द्री – ये विद्युत शक्ति के रुप मेँ जीव के कर्मो को प्रकाशित करती है ।

8 चामुण्डा – पृवृत्ति (चण्ड)और निवृत्ति (मुण्ड) का विनाश करने वाली है।

आठ आसुरी शक्तियाँ –

1 मोह – महिषासुर
2 काम – रक्तबीज
3 क्रोध – धूम्रलोचन
4 लोभ – सुग्रीव
5 मद मात्सर्य – चण्ड-मुण्ड
6 राग द्वेष – मधु कैटभ
7 ममता – निशुम्भ
8 अहंकार – शुम्भ

अष्टमी तिथि तक इन दुगुर्णो रुपी दैत्यो का संहार करके नवमी तिथि को प्रकृति पुरुष का एकाकार होना ही नवरात्र का आध्यात्मिक रहस्य है ।

🙏🌹जय माँ अम्बे🌹🙏

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जानिए नवरात्री का महत्व और मां की शक्तियों के बारे में

जानिए नवरात्री का महत्व और मां की शक्तियों के बारे में

नवरात्र संस्कृत शब्द है, नवरात्रि एक हिंदू पर्व है, जिसका अर्थ होता है नौ रातें। यह पर्व साल में दो बार आता है। एक शारदीय नवरात्रि, दूसरा है चैत्रीय नवरात्रि। नवरात्रि के नौ रातों में तीन हिंदू देवियों- पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ में स्वरूपों पूजा होती है, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं।


अनंत सिद्धियां देती हैं मां
नवदुर्गा और दस महाविधाओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दस महाविधाएं अनंत सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है।

नौ दिन माता के नौ रुपों की आराधना :


1. शैलपुत्री

नवरात्र के पहले दिन मां के रुप शैलपुत्री की पूजा की जाती है.पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा. माता शैलपुत्री का स्वरुप अति दिव्य है. मां के दाहिने हाथ में त्रिशूल है और मां के बाएं हाथ में कमल का फूल सुशोभित है. मां शैलपुत्री बैल पर सवारी करती हैं. मां को समस्त वन्य जीव-जंतुओं का रक्षक माना जाता है. इनकी आराधना से आपदाओं से मुक्ति मिलती है. इसीलिए दुर्गम स्थानों पर बस्तियां बनाने से पहले मां शैलपुत्री की स्थापना की जाती है माना जाता है कि इनकी स्थापना से वह स्थान सुरक्षित हो जाता है. मां की प्रतिमा स्थापित होने के बाद उस स्थान पर आपदा, रोग, ब्याधि, संक्रमण का खतरा नहीं होता और जीव निश्चिंत होकर अपना जीवन व्यतीत करता है.

2. ब्रह्मचारिणी

नवरात्र के दूसरे दिन मां के ब्रह्मचारिणी स्वरुप की आराधना की जाती है. मां ब्रह्मचारिणी की उपासना से भक्तों का जीवन सफल हो जाता है. मां भगवती दुर्गा की नौ शक्तियों का दूसरा स्वरूप है माता ब्रह्मचारिणी, ब्रह्म का अर्थ होता है तपस्या, यानी तप का आचरण करने वाली भगवती, जिस कारण उन्हें मां ब्रह्मचारिणी कहा गया। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यन्त भव्य है. मां के दाहिने हाथ में जप की माला है और मां के बायें हाथ में कमण्डल है. माता ब्रह्मचारिणी की पूजा और साधना करने से कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है. ऐसा भक्त इसलिए करते हैं ताकि उनका जीवन सफल हो सके और अपने सामने आने वाली किसी भी प्रकार की बाधा का सामना आसानी से कर सकें. मां ब्रह्मचारिणी की उपासना करने का मंत्र बहुत ही आसान है. मां जगदम्बे की भक्तों को मां ब्रह्मचारिणी को खुश करने के लिए इस मंत्र का जाप करना चाहिये.

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

3. चंद्रघंटा

नवरात्र के तीसरे दिन मां दुर्गा की तीसरी शक्ति माता चंद्रघंटा की पूजा अर्चना की जाती है. मां चंद्रघंटा की उपासना से भक्तों को भौतिक, आत्मिक, आध्यात्मिक सुख और शांति मिलती है. मां की उपासना से घर-परिवार से नकारात्मक ऊर्जा यानी कलह और अशांति दूर होती है. मां चंद्रघंटा का स्वरुप अति भव्य है. मां सिंह यानी शेर पर प्रसन्न मुद्रा में विराजमान होती हैं. दिव्य रुपधारी माता चंद्रघंटा की दस भुजाएं हैं. मां के इन दस हाथों में ढाल, तलवार, खड्ग, त्रिशूल, धनुष, चक्र, पाश, गदा और बाणों से भरा तरकश है. मां चन्द्रघण्टा का मुखमण्डल शांत, सात्विक, सौम्य किंतु सूर्य के समान तेज वाला है. इनके मस्तक पर घण्टे के आकार का आधा चन्द्रमा सुशोभित है. मां की घंटे की तरह प्रचण्ड ध्वनि से असुर सदैव भयभीत रहते हैं. मां चंद्रघंटा का स्मरण करते हुए साधकजन अपना मन मणिपुर चक्र में स्थित करते हैं. मां चंद्रघंटा नाद की देवी हैं. इनकी कृपा से साधक स्वर विज्ञान में प्रवीण होता है. मां चंद्रघंटा की जिस पर कृपा होती है उसका स्वर इतना मधुर होता है कि हर कोई उसकी तरफ खिंचा चला आता है. मां की कृपा से साधक को आलौकिक दिव्य दर्शन एवं दृष्टि प्राप्त होती है. साधक के समस्त पाप-बंधन छूट जाते हैं. प्रेत बाधा जैसी समस्याओं से भी मां साधक की रक्षा करती हैं. योग साधना की सफलता के लिए भी माता चन्द्रघंटा की उपासना बहुत ही असरदार होती है.


4. कुष्मांडा


नवरात्र के चौथे दिन मां पारांबरा भगवती दुर्गा के कुष्मांडा स्वरुप की पूजा की जाती है. माना जाता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब कुष्माण्डा देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी. अपनी मंद मंद मुस्कान भर से ब्रम्हांड की उत्पत्ति करने के कारण इन्हें कुष्माण्डा के नाम से जाना जाता है इसलिए ये सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं. देवी कुष्मांडा का निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है. वहाँ निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है. इनके शरीर की कांति और प्रभा सूर्य के समान ही अलौकिक हैं. माता के तेज और प्रकाश से दसों दिशाएँ प्रकाशित होती हैं ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में मौजूद तेज मां कुष्मांडा की छाया है. माँ की आठ भुजाएँ हैं. इसलिए मां कुष्मांडा को अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता हैं. इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है. आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है. मां सिंह के वाहन पर सवार रहती हैं. माँ कुष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं. इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है. आज के दिन साधक का मन ‘अदाहत’ चक्र में अवस्थित होता है. इस दिन साधक को बहुत ही पवित्र और अचंचल मन से कुष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा-उपासना के कार्य में लगना चाहिए. इनकी उपासना से सभी प्रकार के रोग-दोष दूर होते हैं. धन यश और सम्मान की वृद्धि होती है. माँ कूष्माण्डा थोड़ी सी पूजा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं. यदि मनुष्य सच्चे मन से माता की पूजा करे तो मन की सारी मुरादें पूरी होती हैं.

5. स्कंदमाता

नवरात्र के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है. आदिशक्ति का ये ममतामयी रूप है. गोद में स्कन्द यानी कार्तिकेय स्वामी को लेकर विराजित माता का यह स्वरूप जीवन में प्रेम, स्नेह, संवेदना को बनाए रखने की प्रेरणा देता है. भगवान स्कंद ‘कुमार कार्तिकेय’ नाम से भी जाने जाते हैं. ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे. पुराणों में स्कंद को कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है. इन्हीं भगवान स्कंद की माता होने के कारण माँ दुर्गा के इस स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है. मान्यता है कि स्कंदमाता की पूजा से सभी मनोरथ पूरे होते हैं. इस दिन साधक का मन ‘विशुद्ध’ चक्र में अवस्थित होता है. माँ स्कंदमाता की उपासना से भक्त की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं साधक को शांति और सुख का अनुभव होने लगता है. स्कंदमाता की उपासना से बालरूप स्कंद भगवान की उपासना अपने आप हो जाती है. सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण स्कंदमाता की पूजा करने वाला व्यक्ति अलौकिक तेज एवं कांति से संपन्न हो जाता है.

6. कात्यायनी

नवरात्र के छठवें दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है. कात्यायन ऋषि के यहां जन्म लेने के कारण माता के इस स्वरुप का नाम कात्यायनी पड़ा. अगर मां कात्यायनी की पूजा सच्चे मन से की जाय तो भक्त के सभी रोग दोष दूर होते हैं. इस दिन साधक का मन ‘आज्ञा’ चक्र में स्थित होता है. योगसाधना में आज्ञा चक्र का विशेष महत्व है. मां कात्यायनी शत्रुहंता है इनकी पूजा करने से शत्रु पराजित होते हैं और जीवन सुखमय बनता है. मां कात्यायनी की पूजा करने से कुंवारी कन्याओं का विवाह होता है. भगवान कृष्ण को पति के रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने कालिन्दी यानि यमुना के तट पर मां की आराधना की थी. इसलिए मां कात्यायनी ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में जानी जाती है. माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भव्य है. इनकी चार भुजाएँ हैं. मां कात्यायनी का दाहिनी तरफ का ऊपरवाला हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है. बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है. इनका वाहन सिंह है. माँ कात्यायनी की भक्ति और उपासना से मनुष्य को बड़ी सरलता से अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है. वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है. मां कात्यायनी का जन्म आसुरी शक्तियों का नाश करने के लिए हुआ था. इन्होंने शंभु और निशंभु नाम के राक्षसों का संहार कर संसार की रक्षा की थी.

7. कालरात्रि

माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति को कालरात्रि के नाम से जाना जाता हैं. दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है. इस दिन साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में स्थित रहता है. उसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है. सहस्रार चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णतः माँ कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है. उनके साक्षात्कार से मिलने वाले पुण्य का वह भागी हो जाता है. उसके समस्त पापों-विघ्नों का नाश हो जाता है. उसे अक्षय पुण्य-लोकों की प्राप्ति होती है. मां कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली देवी हैं. दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं. मां कालरात्री हमारे जीवन में आने वाली सभी ग्रह-बाधाओं को भी दूर करती है. माता की पूजा करने वाले को अग्नि-भय, जल-भय, जंतु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय कभी नहीं सताता इनकी कृपा से भक्त हमेशा-हमेशा के लिए भय-मुक्त हो जाता है. देवी कालरात्रि का वर्ण काजल के समान काले रंग का है जो काले अमावस की रात्रि को भी मात देता है. मां कालरात्रि के तीन बड़े बड़े उभरे हुए नेत्र हैं जिनसे मां अपने भक्तों पर अनुकम्पा की दृष्टि रखती हैं. देवी की चार भुजाएं हैं दायीं ओर की उपरी भुजा से महामाया भक्तों को वरदान दे रही हैं और नीचे की भुजा से अभय का आशीर्वाद प्रदान कर रही हैं. बायीं भुजा में: तलवार और खड्ग मां ने धारण किया है. देवी कालरात्रि के बाल खुले हुए हैं और हवाओं में लहरा रहे हैं. देवी कालरात्रि गर्दभ पर सवार हैं. मां का वर्ण काला होने पर भी कांतिमय और अद्भुत दिखाई देता है. देवी कालरात्रि का यह विचित्र रूप भक्तों के लिए अत्यंत शुभ है इसलिए देवी को शुभंकरी भी कहा गया है. इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है.

8. महागौरी

माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है. इन्होंने भगवान शिव के वरण के लिए कठोर संकल्प लिया था. इस कठोर तपस्या के कारण इनका शरीर एकदम काला पड़ गया. इनकी तपस्या से प्रसन्न और संतुष्ट होकर जब भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगाजी के पवित्र जल से मलकर धोया तब वह विद्युत प्रभा के समान अत्यंत कांतिमान-गौर हो उठा. तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा. इन्हें अन्नपूर्णा, ऐश्वर्य प्रदायिनी, चैतन्यमयी, त्रैलोक्यपूज्या, शारीरिक मानसिक और सांसारिक ताप का हरण करने वाली माता महागौरी के नाम से जाना जाता है. इनकी शक्ति अमोघ है और ये सद्यः फलदायिनी है. इनकी उपासना से भक्तों के सभी पाप धुल जाते हैं. देवी महागौरी की उपासना से इस जन्म के ही नहीं पूर्व जन्म के पाप भी कट जाते है. यही नहीं भविष्य में पाप-संताप, दैन्य-दुःख कभी भक्त को परेशान नहीं करते. देवी गौरी का उपासक पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है. मां महागौरी का वर्ण पूर्णतः गौर है. इस गौरता की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है. इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है. इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत होते हैं. महागौरी की चार भुजाएँ हैं. इनका वाहन वृषभ यानी बैल है. मां गौरी के ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है. ऊपरवाले बाएँ हाथ में डमरू और नीचे के बाएँ हाथ में वर-मुद्रा हैं. इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है. जिनके स्मरण मात्र से भक्तों को अपार खुशी मिलती है, इसलिए इनके भक्त अष्टमी के दिन कन्याओं का पूजन और सम्मान करते हुए महागौरी की कृपा प्राप्त करते हैं. यह धन-वैभव और सुख-शांति की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं.

9. सिद्धिदात्री

भक्तों नवरात्र के आखिरी दिन मां जगदंबा के सिद्धिदात्री स्वरुप की पूजा की जाती है. मां सिद्धिदात्री भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करती है. देवी दुर्गा के इस अंतिम स्वरुप को नव दुर्गाओं में सबसे श्रेष्ठ और मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है. मां सिद्धिदात्री के स्वरुप की पूजा देव, यक्ष, किन्नर, दानव, ऋषि-मुनि, साधक और संसारी जन नवरात्र के नवें दिन करते हैं. मां की पूजा अर्चना से भक्तों को यश, बल और धन की प्राप्ति होती है. मां सिद्धिदात्री उन सभी भक्तों को महाविद्याओं की अष्ट सिद्धियां प्रदान करती है जो सच्चे मन से उनके लिए आराधना करते हैं. मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिया, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिध्दियां होती हैं. देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव ने इन्हीं की कृपा से सिध्दियों को प्राप्त किया था. इन्हीं की अनुकम्पा से भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था. इसी कारण वह संसार में अर्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए. माता सिद्धीदात्री चार भुजाओं वाली हैं. इनका वाहन सिंह है. ये कमल पुष्प पर आसीन होती हैं. इनकी दाहिनी नीचे वाली भुजा में चक्र,ऊपर वाली भुजा में गदा और बांयी तरफ नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमलपुष्प है नवरात्रि पूजन के नवें दिन इनकी पूजा की जाती है. देवी सिद्धिदात्री को मां सरस्वती का स्वरुप माना जाता है. जो श्वेत वस्त्रों में महाज्ञान और मधुर स्वर से भक्तों को सम्मोहित करती है. मधु कैटभ को मारने के लिए माता सिद्धिदात्री ने महामाया फैलाई, जिससे देवी के अलग-अलग रुपों ने राक्षसों का वध किया. यह देवी भगवान विष्णु की अर्धांगिनी हैं और नवरात्रों की अधिष्ठात्री हैं. इसलिए मां सिद्धिदात्री को ही जगत को संचालित करने वाली देवी कहा गया है.

शारदीय नवरात्री व्रत 2015 तिथियां

50 नवरात्री शुभकामनाएं सन्देश हिंदी में

नवरात्र में सावधानी

नवरात्र का पर्व अति पावन है. इन नौ दिनों में भक्तों को मां भगवती की आराधना पूरे ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए करनी चाहिये. मां की शुद्ध मन और अंतःकरण से पूजा करने से भक्तों को उनकी तपस्या का सबसे ज्यादा फल मिलता है. मां की भक्ति के वक्त निम्नलिखित बातों का रखना चाहिये.

माता की कृपा पाने के लिए नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का पाठ का पाठ करना चाहिये. दुर्गा सप्तशती में बताये मंत्रों और श्लोकों से मां खुश होती हैं. देवी की जागरण करके पूजा की जाती है. दिन रात जागरण करने से देवी जल्द खुश होती हैं. देवी जागरण के अलावा भक्तों को इन नौ दिनों में मंगल कार्यों को करना चाहिये. इन नौ दिनों के दौरान देवी की आराधना करने वाले भक्तों को ब्रह्माचर्य पालन का पालन करना चाहिए. ब्रह्मचर्य का पालन कर मां भगवती की भक्ति करने वालों से मां जल्द खुश होती हैं और उनकी सारी मनोकामनाओं को पूरा करती है. नवरात्र में नवदुर्गाओं की उपासनाओं का महत्व सबसे ज्यादा है. देवी के हर रुप की उपासना पूरे अंतःकरण और शुद्ध मन से करने से देवी दुर्गा का आशीष हमें मिलना शुरु हो जाता है. मां दुर्गा की पूजा के दौरान किन बातों का बेहद ध्यान रखना चाहिये. मां की पूजा के दौरान भक्तों को कभी भी दूर्वा, तुलसी और आंवला का प्रयोग नहीं करना चाहिये. मां दुर्गा की पूजा में लाल रंग के पुष्पों का बहुत महत्व है. गुलहड़ के फूल तो मां को अति प्रिय हैं. इसके अलावा बेला, कनेल, केवड़ा, चमेली, पलाश, तगर, अशोक, केसर, कदंब के पुष्पों से भी पूजा की जा सकती है. हां फूलों में मदार के फूल मां दुर्गा को कभी नहीं चढ़ाने चाहिए.

मां की पूजा करने के दौरान भक्तों को नहाने के बाद सूखे कपड़े पहनने चाहिये. गीले कपड़े पहनने या गीले और खुले बाल रखकर मां की पूजा नहीं करनी चाहिये. मां की पूजा के पहले बालों को सुखा कर और बांध कर ही देवी की आराधना करनी चाहिये. देवी की आराधना के पहले इन उपायों पर अमल करने से मां की कृपा भक्तों पर बरसने लगती है और भक्त अपनी सभी तरह की बाधाओँ से मुक्ति पाता है. उसकी हर जगह विजय होती है.

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नवरात्रि में किस दिन करें कौन सी देवी का पूजन

नवरात्रि में किस दिन करें कौन सी देवी का पूजन

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हिंदू धर्म के अनुसार एक वर्ष में चार नवरात्रि होती है, लेकिन आमजन केवल दो नवरात्रि (चैत्र व शारदीय नवरात्रि) के बारे में ही जानते हैं। आषाढ़ तथा माघ मास की नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है।

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धर्म ग्रंथों के अनुसार नवरात्रि में हर तिथि पर माता के एक विशेष रूप का पूजन किया जाता है। जानिए नवरात्रि में किस दिन कौन सी देवी की पूजा करें-

पहले दिन करें मां शैलपुत्री का पूजन

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नवरात्रि के पहले दिन  को मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार देवी का यह नाम हिमालय के यहां जन्म होने से पड़ा। हिमालय हमारी शक्ति, दृढ़ता, आधार व स्थिरता का प्रतीक है। मां शैलपुत्री को अखंड सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है। नवरात्रि के प्रथम दिन योगीजन अपनी शक्ति मूलाधार में स्थित करते हैं व योग साधना करते हैं।

हमारे जीवन प्रबंधन में दृढ़ता, स्थिरता व आधार का महत्व सर्वप्रथम है। अत: इस दिन हमें अपने स्थायित्व व शक्तिमान होने के लिए माता शैलपुत्री से प्रार्थना करनी चाहिए। शैलपुत्री का आराधना करने से जीवन में स्थिरता आती है। हिमालय की पुत्री होने से यह देवी प्रकृति स्वरूपा भी है। स्त्रियों के लिए उनकी पूजा करना ही श्रेष्ठ और मंगलकारी है।

उपाय- प्रतिपदा यानी पहले दिन माता को घी का भोग लगाएं तथा उसका दान करें। इस उपाय से रोगी को कष्टों से मुक्ति मिलती है तथा शरीर निरोगी होता है।

दूसरे दिन करें मां ब्रह्मचारिणी की आराधना

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नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। देवी ब्रह्मचारिणी ब्रह्म शक्ति यानि तप की शक्ति का प्रतीक हैं। इनकी आराधना से भक्त की तप करने की शक्ति बढ़ती है। साथ ही सभी मनोवांछित कार्य पूर्ण होते हैं।

ब्रह्मचारिणी हमें यह संदेश देती हैं कि जीवन में बिना तपस्या अर्थात कठोर परिश्रम के सफलता प्राप्त करना असंभव है। बिना श्रम के सफलता प्राप्त करना ईश्वर के प्रबंधन के विपरीत है। अत: ब्रह्मशक्ति अर्थात समझने व तप करने की शक्ति हेतु इस दिन शक्ति का स्मरण करें। योग शास्त्र में यह शक्ति स्वाधिष्ठान में स्थित होती है। अत: समस्त ध्यान स्वाधिष्ठान में करने से यह शक्ति बलवान होती है एवं सर्वत्र सिद्धि व विजय प्राप्त होती है।

उपाय- द्वितीया तिथि यानी नवरात्रि के दूसरे दिन माता को शक्कर का भोग लगाएं तथा उसका दान करें। इससे साधक को लंबी उम्र प्राप्त होती है।

तीसरे दिन करें मां चंद्रघंटा का पूजन

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गुप्त नवरात्रि का तीसरा दिन (23 जनवरी, शुक्रवार) माता चंद्रघंटा को समर्पित है। यह शक्ति माता का शिवदूती स्वरूप है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है।

असुरों के साथ युद्ध में देवी चंद्रघंटा ने घंटे की टंकार से असुरों का नाश कर दिया था। नवरात्रि के तृतीय दिन इनका पूजन किया जाता है। इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वत: प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।

उपाय- तृतीया तिथि को माता को दूध चढ़ाएं तथा इसका दान करें। ऐसा करने से सभी प्रकार के दुखों से मुक्ति मिलती है।

चौथे दिन करें मां कुष्मांडा की उपासना

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नवरात्रि के चौथे दिन की प्रमुख देवी मां कुष्मांडा हैं। देवी कुष्मांडा रोगों को तुरंत की नष्ट करने वाली हैं। इनकी भक्ति करने वाले श्रद्धालु को धन-धान्य और संपदा के साथ-साथ अच्छा स्वास्थ्य भी प्राप्त होता है।

​मां दुर्गा के इस चतुर्थ रूप कुष्मांडा ने अपने उदर से अंड अर्थात ब्रह्मांड को उत्पन्न किया। इसी वजह से दुर्गा के इस स्वरूप का नाम कुष्मांडा पड़ा। नवरात्रि के चतुर्थ दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। मां कुष्मांडा के पूजन से हमारे शरीर का अनाहत चक्र जागृत होता है। इनकी उपासना से हमारे समस्त रोग व शोक दूर हो जाते हैं। साथ ही भक्तों को आयु, यश, बल और आरोग्य के साथ-साथ सभी भौतिक और आध्यात्मिक सुख भी प्राप्त होते हैं।

उपाय- चतुर्थी तिथि को माता को मालपूआ चढ़ाएं व गरीबों को दान कर दें। इससे सभी प्रकार की समस्याएं स्वत: ही समाप्त हो जाती हैं।

पांचवे दिन करे स्कंदमाता की पूजा

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धर्म शास्त्रों के अनुसार नवरात्रि की पंचमी तिथि को स्कंदमाता की पूजा की जाती है। स्कंदमाता भक्तों को सुख-शांति प्रदान वाली हैं। देवासुर संग्राम के सेनापति भगवान स्कन्द की माता होने के कारण मां दुर्गा के पांचवे स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जानते हैं।

स्कंदमाता हमें सिखाती हैं कि जीवन स्वयं ही अच्छे-बुरे के बीच एक देवासुर संग्राम है व हम स्वयं अपने सेनापति हैं। हमें सैन्य संचालन की शक्ति मिलती रहे। इसलिए स्कंदमाता की पूजा-आराधना करनी चाहिए।इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होना चाहिए जिससे कि ध्यान वृत्ति एकाग्र हो सके। यह शक्ति परम शांति व सुख का अनुभव कराती है।

उपाय- पंचमी तिथि यानी नवरात्रि के पांचवे दिन माता दुर्गा को केले का भोग लगाएं व गरीबों को केले का दान करें। इससे आपके परिवार में सुख-शांति रहेगी।

छठे दिन करें मां कात्यायनी का पूजन

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नवरात्रि के छठे दिन आदिशक्ति श्री दुर्गा के छठे रूप कात्यायनी की पूजा-अर्चना का विधान है। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसलिए वे कात्यायनी कहलाती हैं।

माता कात्यायनी की उपासना से आज्ञा चक्र जाग्रति की सिद्धियां साधक को स्वयंमेव प्राप्त हो जाती हैं। वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है तथा उसके रोग, शोक, संताप, भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं।

उपाय- षष्ठी तिथि यानी छठे दिन माता दुर्गा को शहद का भोग लगाएं व इसका दान भी करें। इस उपाय से धन आगमन के योग बनते हैं।

सातवे दिन करें मां कालरात्रि की पूजा

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महाशक्ति मां दुर्गा का सातवां स्वरूप है कालरात्रि। मां कालरात्रि काल का नाश करने वाली हैं, इसी वजह से इन्हें कालरात्रि कहा जाता है। नवरात्रि के सातवे दिन  मां कालरात्रि की पूजा की जाती है।

मां कालरात्रि की आराधना के समय भक्त को अपने मन को भानु चक्र जो ललाट अर्थात सिर के मध्य स्थित करना चाहिए। इस आराधना के फलस्वरूप भानु चक्र की शक्तियां जागृत होती हैं। मां कालरात्रि की भक्ति से हमारे मन का हर प्रकार का भय नष्ट होता है। जीवन की हर समस्या को पलभर में हल करने की शक्ति प्राप्त होती है। शत्रुओं का नाश करने वाली मां कालरात्रि अपने भक्तों को हर परिस्थिति में विजय दिलाती है।

उपाय- सप्तमी तिथि को माता को गुड़ की वस्तुओं का भोग लगाएं तथा दान भी करें। इससे दरिद्रता का नाश होता है।

आठवे दिन करें माता महागौरी की आराधना

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नवरात्रि के आठवे दिन  मां महागौरी की पूजा की जाती है। आदिशक्ति श्री दुर्गा का अष्टम रूप श्री महागौरी हैं। मां महागौरी का रंग अत्यंत गौरा है इसलिए इन्हें महागौरी के नाम से जाना जाता है।

नवरात्रि का आठवां दिन हमारे शरीर का सोम चक्र जागृत करने का दिन है। सोम चक्र उध्र्व ललाट में स्थित होता है। आठवें दिन साधना करते हुए अपना ध्यान इसी चक्र पर लगाना चाहिए। श्री महागौरी की आराधना से सोम चक्र जागृत हो जाता है और इस चक्र से संबंधित सभी शक्तियां श्रद्धालु को प्राप्त हो जाती है। मां महागौरी के प्रसन्न होने पर भक्तों को सभी सुख स्वत: ही प्राप्त हो जाते हैं। साथ ही इनकी भक्ति से हमें मन की शांति भी मिलती है।

उपाय- अष्टमी तिथि के दिन माता दुर्गा को नारियल का भोग लगाएं तथा नारियल का दान भी करें। इससे सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

अंतिम दिन करें मां सिद्धिदात्री की उपासना

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नवरात्रि के अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। मां सिद्धिदात्री भक्तों को हर प्रकार की सिद्धि प्रदान करती हैं।

अंतिम दिन भक्तों को पूजा के समय अपना सारा ध्यान निर्वाण चक्र जो कि हमारे कपाल के मध्य स्थित होता है, वहां लगाना चाहिए। ऐसा करने पर देवी की कृपा से इस चक्र से संबंधित शक्तियां स्वत: ही भक्त को प्राप्त हो जाती हैं। सिद्धिदात्री के आशीर्वाद के बाद श्रद्धालु के लिए कोई कार्य असंभव नहीं रह जाता और उसे सभी सुख-समृद्धि प्राप्त हो जाते हैं।

उपाय- नवमी तिथि के दिन माता को विभिन्न प्रकार के अनाजों का भोग लगाएं व यथाशक्ति गरीबों में दान करें। इससे लोक-परलोक में आनंद व वैभव मिलता है।

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नवरात्रों में माता की पूजा कैसे करें

नवरात्रों में माता की पूजा कैसे करें

नवरात्रों में माता की पूजा कैसे करें
Method of Worshiping Mata

नवरात्रों के विषय में मान्यता है कि देवता भी मां भगवती की पूजा किया करते है. नवरात्रों में मां भगवती के नौ विभिन्न रुपों की पूजा की जाती है. मां भगवती को शक्ति कहा गया है. नवरात्रों में नौ दिन क्रमश शैलपुत्री, ब्रह्माचारिणी, चन्द्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्ययायनी, कालरात्रि, मां गौरी और सिद्धिदात्रि की पूजा की जाती है.

प्रतिपदा तिथि में पूजा प्रारम्भ करना

नवरात्रों में माता की पूजा करने के लिये मां भगवती की प्रतिमा के सामने किसी बडे बर्तन में रेत भरकर उसमें जौ उगने के लिये रखे जाते है. इस के एक और पानी से भरा कलश स्थापित किया जाता है. कलश पर कच्चा नारियल रखा जाता है. कलश स्थापना के बाद मां भगवती की अंखंड ज्योति जलाई जाती है. यह ज्योति पूरे नौ नवरात्रे दिन रात जलती रहनी चाहिए.

सबसे पहले भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है. उसके बाद श्री वरूण देव, श्री विष्णु देव की पूजा की जाती है. शिव, सूर्य, चन्द्रादि नवग्रह की पूजा भी की जाती है.

प्रतिदिन पाठ करना

उपरोक्त देवताओं कि पूजा करने के बाद मां भगवती की पूजा की जाती है. नवरात्रों के दौरान प्रतिदिन उपवास रख कर दुर्गा सप्तशती और देवी का पाठ किया जाता है. इन दिनों में इन पाठों का विशेष महत्व है. माता दुर्गा को अनेक नामों से जाना जाता है. उसे ज्ञाना, क्रिया, नित्या, बलपर्दा, शुभ, निशुभं हरणी, महिषासुर मर्दनी, चंद-मुंड विनाशिनी, परमेश्वरी, ब्रह्मा, विष्णु और शिव को वरदान देने वाली भी कहा जाता है. इसके अतिरिक्त निम्न मंत्र का भी जाप किया जा सकता है.

या देवी सर्व भूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता
नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमो नम: ।।

नवरात्रे में नवग्रह शात्नि पूजा विधि
Navgrah Shastri Puja Method on Navratri

नवरात्रि के नौ दिनों में नौ ग्रहों की शान्ति पूजा की जाती है. प्रतिपदा के दिन मंगल ग्रह की शान्ति हेतू पूजा की जाती है. द्वितीया तिथि के दिन राहू ग्रह की शान्ति पूजा की जाती है. तृ्तिया के दिन बृ्हस्पति के दिन, चतुर्थी के दिन शनि ग्रह, पंचमी के दिन बुध, षष्ठी के दिन केतु, सप्तमी के दिन शुक्र, अष्टमी के दिन सूर्य व नवमी के दिन चन्द्र देव की शान्ति पूजा की जाती है.
यह शान्ति क्रिया शुरु करने से पहले कलश की स्थापना और माता की पूजा करनी चाहिए. पूजा के बाद लाल वस्त्र पर एक यंत्र बनाया जाता है. इस यंत्र में नौ खाने बनाये जाते है. पहले तीन खानों में उसमें बुध, शुक्र, चन्द्र, बीच में गुरु, सुर्य, मंगल और नीचे के खानों में केतु, शनि, राहू को स्थान दिया जाता है.
इसके बाद नवग्रह बीच मंत्र की पूजा की जाती है. इसके बाद नवग्रह शात्नि संकल्प लिया जाता है. इसके बाद दिन अनुसार ग्रह के मंत्र का जा किया जाता है.

ग्रहों के मंत्र इस प्रकार है.

सूर्य बीज मंत्र – ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम:
चन्द्र बीज मंत्र – ऊँ श्रां श्रीं श्रौं स: चन्द्रमसे नम:
मंगल बीज मंत्र- ऊँ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:
बुध बीज मंत्र – उँ ब्रां ब्रीं ब्रौ स: बुधाय नम:
गुरु बीज मंत्र – ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:
शुक्र बीज मंत्र – ऊँ द्रां द्रीं द्रौ स: शुक्राय नम:
शनि बीज मंत्र – ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:
राहू बीज मंत्र – उँ भ्रां भ्रीं भौं स: राहुवे नम:
केतु बीज मंत्र – उँ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम:

दुर्गासप्तशती में सात सौ महामंत्र होने से इसे सप्तशती कहते है. सप्तशती उपासना से असाध्य रोग दूर होते है. और आराधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है.

नवरात्रों में ध्यान देने योग्य बातें
Important things to be Kept in Mind During Navratri

नवरात्रों की पूजा करते समय ध्यान देने योग्य यह विशेष बात है कि एक ही घर में तीन शक्तियों की पूजा नहीं करनी चाहिए. देगी को कनेर और सुगन्धित फूल प्रिय है. इसलिये पूजा के लिये इन्ही फूलों का प्रयोग करें, कलश स्थापना दिन में ही करें, मां की प्रतिमा को लाल वस्त्रों से ही सजायें. साधना करने वाले को लाल वस्त्र या गर्म आसन पर बैठकर पूजा करनी चाहिए.

उपवासक को क्या नहीं करना चाहिए
Things Should be Avoided by those Who Fast

नवरात्रों का व्रत करने वाले उपवासक को दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन करना चाहिए. मांस, मदिरा का त्याग करना चाहिए. इसके अतिरिक्त नवरात्रों में बाल कटवाना, नाखून काटना आदि कार्य भी नहीं करने चाहिए. ब्रह्मचार्य का पूर्णत: पालन करना चाहिए. नवरात्रे की अष्टमी या नवमी के दिन दस साल से कम उम्र की नौ कन्याओं और एक लडके को भोजन करा कर साथ ही दक्षिणा देनी चाहिए.
लडके को भैरव का रुप माना जाता है. कंजनों को भोजन करवाने से एक दिन पूर्व रात्रि को हवन कराना विशेष शुभ माना जाता है. कंजकों को भोजन करवाने के बाद उगे हुए जौ और रेत को जल में विसर्जित कर दिया जाता है. कुछ जौं को जड सहित उखाडकर समृ्द्धि हेतू घर की तिजौरी या धन रखने के स्थान पर रखना चाहिए.
कलश के पानी को पूरे घर में छिडक देना चाहिए. इससे घर से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है. और नारियल को माता दुर्गा के प्रसाद स्वरुप खा लिया जाता है.

नवरात्रा पूजन प्रारम्भ विधि
Method of Beginning Navratri Puja

नवरात्रे चैत्र मास के हो, या फिर शारदीय नवरात्रे हो, दोनों ही में प्रतिपदा तिथि के दिन कलश स्थापना कि जाती है. कलश स्थापना करने से भी पहले उपवासक को नवरात्रे व्रत का संकल्प लिया जाता है. कलश से संबन्धित एक मान्यता के अनुसार कलश को भगवान श्री गणेश का प्रतिरुप माना गया है. इसलिये सबसे पहले कलश का पूजन किया जाता है.
कलश स्थापना करने से पहले भूमि को गंगा जल छिडकर शुद्ध किया जाता है. भूमि शुद्ध करने के लिये गाय का गोबर भी प्रयोग किया जा सकता है. पूजा में सभी नदियों, समुद्रों, नवग्रहों, दिशापालकों, दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता सहित सभी को आमंत्रित किया जाता है. पांच प्रकार के पत्तों से कलश को सजाया जाता
सर्वप्रथम श्री गणेश का पूजन
प्रतिपदा तिथि के दिन नवरात्रे पूजा शुरु करने से पहले कलश स्थापना जिसे घट स्थापना के नाम से भी जाना जाता है. हिन्दू धर्म में देवी पूजन का विशेष महात्मय है. इसमें नौ दिनों तक व्रत-उपवास कर, नवें दिन दस वर्ष की कन्याओं का पूजन और उन्हें भोजन कराया जाता है.

शुभ मुहूर्त में घट स्थापना

सभी धार्मिक तीर्थ स्थलों में इस दिन प्रात: सूर्योदय के बाद शुभ मुहूर्त समय में घट स्थापना की जाती है. नवरात्रे के पहले दिन माता दुर्गा, श्री गणेश देव की पूजा की जाती है. इस दिन मिट्टी के बर्तन में रेत-मिट्टी डालकर जौ-गेहूं आदि बीज डालकर बोने के लिये रखे जाते है.
भक्त जन इस दिन व्रत-उपवास तथा यज्ञ आदि का संकल्प लेकर माता की पूजा प्रारम्भ करते है. नवरात्रे के पहले दिन माता के शैलपुत्री रुप की पूजा की जाती है. जैसा की सर्वविदित है, माता शैलपुत्री, हिमालय राज जी पुत्री है, जिन्हें देवी पार्वती के नाम से भी जाना जाता है. नवरात्रों में माता को प्रसन्न करने के लिये उपवास रखे जाते है. तथा रात्रि में माता दुर्गा के नाम का पाठ किया जाता है. इन नौ दिनों में रात्रि में जागरण करने से भी विशेष शुभ फल प्राप्त होते है. 

चैत्र पक्ष पहला नवरात्रा – घट स्थापना विधि

शारदीय नवरात्रा का प्रारम्भ आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापन के साथ होता है. कलश को हिन्दु विधानों में मंगलमूर्ति गणेश का स्वरूप माना जाता है अत: सबसे पहले कलश की स्थान की जाती है. कलश स्थापन के लिए भूमि को सिक्त यानी शुद्ध किया जाता है. भूमि की सुद्धि के लिए गाय के गोबर और गंगाजल से भूमि को लिपा जाता है. विधान के अनुसार इस स्थान पर सात प्रकार की मिट्टी को मिलाकर एक पीठ तैयार किया जाता है, अगर सात स्थान की मिट्टी नहीं उपलब्ध हो तो नदी से लायी गयी मिट्टी में गंगोट यानी गांगा नदी की मिट्टी मिलाकर इस पर कलश स्थापित किया जा सकता है.
कलश में सप्तमृतिका यानी सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, मुद्रा सादर भेट किया जाता है और पंच प्रकार के पल्लव से कलश को सुशोभित किया जाता है. इस कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ बोये जाते हैं जिन्हें दशमी तिथि को काटा जाता है “जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नामोस्तुते”. इसी मंत्र जाप से साधक के परिवार को सुख, सम्पत्ति एवं आरोग्य का आर्शीवाद प्राप्त होता है. 

कलश स्थापना के बाद देवी प्रतिमा स्थापित करना

कलश स्थापना के बाद देवी प्रतिमा स्थापित करना देवी दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल पर बीच में स्थापित की जाती है और उनके दोनों तरफ यानी दायीं ओर देवी महालक्ष्मी, गणेश और विजया नामक योगिनी की प्रतिमा रहती है और बायीं ओर कार्तिकेय, देवी महासरस्वती और जया नामक योगिनी रहती है.

चुंकि भगवान शंकर की पूजा के बिना कोई भी पूजा अधूरी मानी जाती है. अत: भगवान भोले नाथ की भी पूजा भी की जाती है. प्रथम पूजा के दिन “शैलपुत्री” के रूप में भगवती दुर्गा दुर्गतिनाशिनी की पूजा फूल, अक्षत, रोली, चंदन से होती है. इस प्रकार दुर्गा पूजा की शुरूआत हो जाती है प्रतिदिन संध्या काल में देवी की आरती होती है. आरती में “जग जननी जय जय” और “जय अम्बे गौरी” के गीत भक्त जन गाते हैं.

नवरात्रों में किस दिन करें किस ग्रह की शान्ति

नवरात्र में नवग्रह शांति की विधि:-

यह है कि प्रतिपदा के दिन मंगल ग्रह की शांति करानी चाहिए.
द्वितीय के दिन राहु ग्रह की शान्ति करने संबन्धी कार्य करने चाहिए.
तृतीया के दिन बृहस्पति ग्रह की शान्ति कार्य करना चाहिए.
चतुर्थी के दिन व्यक्ति शनि शान्ति के उपाय कर स्वयं को शनि के अशुभ प्रभाव से बचा सकता है.
पंचमी के दिन बुध ग्रह,
षष्ठी के दिन केतु
सप्तमी के दिन शुक्र
अष्टमी के दिन सूर्य
एवं नवमी के दिन चन्द्रमा की शांति कार्य किए जाते है.

किसी भी ग्रह शांति की प्रक्रिया शुरू करने से पहले कलश स्थापना और दुर्गा मां की पूजा करनी चाहिए. पूजा के बाद लाल वस्त्र पर नव ग्रह यंत्र बनावाया जाता है. इसके बाद नवग्रह बीज मंत्र से इसकी पूजा करें फिर नवग्रह शांति का संकल्प करें.
प्रतिपदा के दिन मंगल ग्रह की शांति होती है इसलिए मंगल ग्रह की फिर से पूजा करनी चाहिए. पूजा के बाद पंचमुखी रूद्राक्ष, मूंगा अथवा लाल अकीक की माला से 108 मंगल बीज मंत्र का जप करना चाहिए. जप के बाद मंगल कवच एवं अष्टोत्तरशतनाम का पाठ करना चाहिए. राहू की शांति के लिए द्वितीया को राहु की पूजा के बाद राहू के बीज मंत्र का 108 बार जप करना, राहू के शुभ फलों में वृ्द्धि करता है.

नवरात्रों में किस देव की पूजा करें.

नवरात्र में मां दुर्गा के साथ-साथ भगवान श्रीराम व हनुमान की अराधना भी फलदायी बताई गई है. सुंदरकाण्ड, रामचरित मानस और अखण्ड रामायण से साधक को लाभ होता है. शत्रु बाधा दूर होती है. मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है. नवरात्र में विघि विधान से मां का पूजन करने से कार्य सिद्ध होते हैं और चित्त को शांति मिलती है.
माता के नौ रुप

Nine Incarnation of Goddess

नवरात्रो में माता के नौ रुपों कि पूजा की जाती है. नौ देवीयों के नाम इस प्रकार है. प्रथम-शैलपुत्री, दूसरी-ब्रह्मचारिणी, तीसरी-चन्द्रघंटा, चौथी-कुष्मांडा, पांचवी-स्कंधमाता, छठी-कात्यायिनी, सातवीं-कालरात्री, आठवीं-महागौरी, नवमीं-सिद्धिदात्री.

पहले दिन माता शैलपुत्री पूजन,

नवरात्रि पूजन  के पहले दिन मां दुर्गा के पहले स्वरूप माता शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। ये ही नवदुर्गाओं  में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वत राज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। नवरात्र पूजन में प्रथम दिन इन्हीं की पूजा व उपासना की जाती है। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधरÓ चक्र में स्थित करते हैं और यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ भी होता है।

वृषभ सवार शैलपुत्री माताजी के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बांए हाथ में कमल- पुष्प सुशोभित है। अपने पूर्वजन्म में ये प्रजापति दक्ष के घर की कन्या के रूप में उत्पन्न हुईं थीं। तब इनका नाम ‘सतीÓ था और इनका विवाह भगवान शंकरजी से हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ किया जिसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना- अपना यज्ञ- भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया। किन्तु दक्ष ने शंकरजी को इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यन्त विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं तो वहां जाने के लिए उनका मन व्याकुल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई।

सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा – प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को आमंत्रित किया है। उनके यज्ञ- भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु जान- बूझकर हमें नहीं बुलाया है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहां जाना किसी भी प्रकार श्रेयस्कर नहीं होगा। शंकरजी के इस उपदेश से सती को कोई बोध नहीं हुआ और पिता का यज्ञ देखने, माता- बहनों से मिलने की इनकी व्यग्रता किसी भी प्रकार कम न हुई। उनका प्रबल आग्रह देखकर अंतत: शंकरजी ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे ही दी।

सती ने पिता के घर पहुंचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बात नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। केवल सती की माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे। परिजनों के इस व्यवहार से सती के मन को बहुत क्लेश पहुँचा। सती ने जब देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकर जी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है और दक्ष ने भी उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन कहे। यह सब देखकर सती का ब्रदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा और उन्होंने सोचा भगवान शंकर जी की बात न मान, यहां आकर मैने बहुत बड़ी भूल की है। सती अपने पति भगवान शंकर जी का अपमान न सह सकीं और उन्होंने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगग्नि द्वारा भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दु:खद समाचार को सुनकर शंकरजी ने अतिक्रुद्ध होकर अपने गणों को भेजकर दक्ष के यज्ञ का पूर्णतया: विध्वंस करा दिया।

सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे “शैलपुत्री” नाम से विख्यात हुईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद की कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व- भंजन किया था। “शेलपुत्री” देवी का विवाह भी शंकरजी से ही हुआ। पूर्वजन्म की ही भांति वे इस बार भी शिवजी की ही अर्धांगिनी बनीं। नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियाँ अनंत हैं।

द्वितीया तिथि माता के ब्रह्माचारिणी रुप की पूजा

द्वितीया तिथि के उपवास के दिन माता के दूसरे रुप देवी ब्रह्मचारिणी के रुप की उपासना की जाती है. माता ब्रह्माचारिणी का रुप उनके नाम के अनुसार ही तपस्विनी जैसा है. एक मान्यता के अनुसार दुर्गा पूजा में नवरात्रे के नौ दिनों तक देवी धरती पर रहती है. इन दिनों में साधना करन अत्यन्त उतम रहता है. माता ब्रह्माचारिणी को अरुहूल का फू और कमल बेहद प्रिय है. इन फूलों की माला माता को इस दिन पहनाई जाती है.

 तृ्तीया तिथि माता के चन्द्राघंटा रुप की पूजा

दूर्गा पूजा के तीसरे दिन माता के तीसरे रुप चन्द्रघंटा रुप की पूजा की जाती है. देवी चन्द्रघंटा सभी की बाधाओं, संकटों को दुर करने वाली माता है. सभी देवीयों में देवी चन्द्रघंटा को आध्यात्मिक और आत्मिक शक्तियों की देवी कहा गया है. जो व्यक्ति इस देवी की श्रद्धा व भक्ति भाव सहित पूजा करता है. उसे माता का आशिर्वाद प्राप्त होता है.
तृ्तीया तिथि के दिन माता चन्द्राघंटा की पूजा जिस स्थान पर की जाती है. वहां का वातावरण पवित्र ओर शुद्ध हो जाता है. वहां से सभी बाधाएं दुर होती है. वर्ष 2013 में तृ्तीया तिथि का क्षय रहेगा. इस कारण माता के इस रुप की पूजा भी चतुर्थी तिथि के दिन की जायेगी.

चतुर्थी तिथि माता के कुष्मांडा रुप की पूजा

देवी कुष्मांडा माता का चौथा रुप है. आश्चिन मास की चतुर्थी तिथि को माता के इसी रुप की पूजा की जाती है. देवी कुष्मांडा आंठ भुजाओं वाली है. इसलिये इन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है. मता कुष्माण्डा के आंठवें हाथ में कमल फूल के बीजों की माला होती है. यह माला भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली कही गई है. पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ जो जन माता के इस रुप की पूजा करते है. उन जनों के सभी प्रकार के कष्ट, रोग, शोक का नाश होता है.

 पंचमी तिथि माता के स्कन्द देवी रुप की पूजा

पंचमी तिथि को माता स्कन्द देवी की पूजा की जाती है. नवरात्रे के पांचवे दिन कुमार कार्तिकेय की माता की पूजा भी की जाती है. कुमार कार्तिकेय को ही स्कन्द कुमार के नाम से भी जाना जाता है. इसलिये इस दिन कुमार कार्तिकेय की माता की पूजा आराधना करना शुभ कहा गया है. जो भक्त माता के इस स्वरुप की पूजा करते है, मां उसे अपने पुत्र के समान स्नेह करती है. देवी की कृ्पा से भक्तों की मुराद पूरी होती है. और घर में सुख, शान्ति व समृ्द्धि वृ्द्धि होती है

 षष्ठी तिथि माता के कात्यायनी देवी रुप की पूजा

माता का छठा रुप माता कात्यायनी के नाम से जाना जाता है. ऋषि कात्यायन के घर जन्म लेने के कारण इनका नाम कात्यायनी पडा. माता कात्ययानी ने ही देवी अंबा के रुप में महिषासुर का वध किया था. नवरात्रे के छठे दिन इन्हीं की पूजा कि जाती है. इनकी पूजा करने से भक्तों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है.
निस्वार्थ भाव से माता की इस दिन पूजा करने से निर्बल भी बलवान बनता है. व भक्तजन को अपने शत्रुओ पर विजय प्राप्त होती है. इस माता की पूजा गोधूली बेला में की जाती है.

  सप्तमी तिथि माता के कालरात्रि रुप की पूजा

तापसी गुणों स्वरुपा वाली मां कालरात्रि की पूजा की जाती है. माता के सांतवें रुप को माता कालरात्रि के नाम से जाना जाता है. देवी का यह रुप ऋद्धि व सिद्धि प्रदान करने वाला कहा गया है. यह तांत्रिक क्रियाएं करने वाले भक्तों के लिये विशेष कहा गया है. दुर्गा पूजा मेम सप्तमी तिथि को काफी महत्व दिया गया है. इस दिन से भक्त जनों के लिये देवी मां का दरवाजे खुल जाते है. और भक्तों की भीड देवी के दर्शनों हेतू जुटने लगती है.

 

   अष्टमी तिथि माता के महागौरी रुप की पूजा

माता का आंठवा रुप माता महागौरी का है. एक पौराणिक कथा के अनुसार शुभ निशुम्भ से पराजित होने के बाद गंगा के तट पर देवता माता महागौरी की पूजा कर रहे थे, और राक्षसों से रक्षा करने की प्रार्थना कर रहे थे, इसके बाद ही माता का यह रुप प्रकट हुआ और देवताओं की रक्षा हुई. इस माता के विषय में यह मान्यता है कि जो स्त्री माता के इस रुप की पूजा करती है, उस स्त्री का सुहाग सदैव बना रहता है. कुंवारी कन्या पूजा करें, तो उसे योग्य वर की प्राप्ति होती है. साथ ही जो पुरुष माता के इस रुप की पूजा करता है, उसका जीवन सुखमय रहता है. माता महागौरी अपने भक्तों को अक्षय आनन्द ओर तेज प्रदान करती है.

नवमी तिथि माता के सिद्धिदात्री रुप की पूजा

भक्तों का कल्याण करने के लिये माता नौ रुपों में प्रकट हुई. इन नौ रुपों में से नवम रुप माता सिद्धिदात्री का है. यह देवी अपने भक्तोम को सारे जगत की रिद्धि सिद्धि प्रदान करती है. माता के इन नौ रुपों की न केवल मनुष्य बल्कि देवता, ऋषि, मुनि, सुर, असुर, नाग सभी उनके आराधक है. माता सिद्धिदात्री अपने भक्तों के रोग, संताप व ग्रह बधाओं को दुर करने वाली कही गई है.

इस प्रकार नवरात्रों के नौ दिनों में माता के अलग अलग रुपों की पूजा की जाती है. 
(साभार संकलन : राहुल )

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माता शैलपुत्री की पूजा

नवरात्री दुर्गा पूजा पहले तिथि – माता शैलपुत्री की पूजा

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मां दुर्गा शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक सनातन काल से मनाया जाता रहा है. आदि-शक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में पूजा की जाती है. अत: इसे नवरात्र के नाम भी जाना जाता है. सभी देवता, राक्षस, मनुष्य इनकी कृपा-दृष्टि के लिए लालायित रहते हैं. यह हिन्दू समाज का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है जिसका धार्मिक, आध्यात्मिक, नैतिक व सांसारिक इन चारों ही दृष्टिकोण से काफी महत्व है.

 दुर्गा पूजा का त्यौहार वर्ष में दो बार आता है, एक चैत्र मास में और दूसरा आश्विन मास में (Chaitra Durga Puja  Ashwin Masa durgaPooja). चैत्र माह में देवी दुर्गा की पूजा बड़े ही धूम धाम से की जाती है लेकिन आश्विन मास का विशेष महत्व है. दुर्गा सप्तशती में भी आश्विन माह के शारदीय नवरात्रों की महिमा का विशेष बखान किया गया है. दोनों मासों में दुर्गा पूजा का विधान एक जैसा ही है, दोनों ही प्रतिपदा से दशमी तिथि तक मनायी जाती है.

वन्दे वांछितलाभाय चन्दार्धकृतशेखराम।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम्।।

 शैलपुत्री – नवरात्री प्रथम दिन

नवरात्र पूजन के प्रथम दिन मां शैलपुत्री जी का पूजन होता है. शैलराज हिमालय की कन्या होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा गया है, माँ शैलपुत्री दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल का पुष्प लिए अपने वाहन वृषभ पर विराजमान होतीं हैं. नवरात्र के इस प्रथम दिन की उपासना में साधक अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं, शैलपुत्री का पूजन करने से ‘मूलाधार चक्र’ जागृत होता है और यहीं से योग साधना आरंभ होती है जिससे अनेक प्रकार की शक्तियां प्राप्त होती हैं.

मंत्र :वन्दे वांछितलाभाय चन्दार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।

 कलश स्थापना:

नवरात्रा का प्रारम्भ आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापना के साथ होता है. कलश को हिन्दु विधानों में मंगलमूर्ति गणेश का स्वरूप माना जाता है अत: सबसे पहले कलश की स्थान की जाती है. कलश स्थापना के लिए भूमि को सिक्त यानी शुद्ध किया जाता है. भूमि की शुद्धि के लिए गाय के गोबर और गंगा-जल से भूमि को लिपा जाता है. 

शैलपुत्री  पूजा विधि:

शारदीय नवरात्र पर कलश स्थापना के साथ ही माँ दुर्गा की पूजा शुरू की जाती है. पहले दिन माँ दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है. दुर्गा को मातृ शक्ति यानी स्नेह, करूणा और ममता का स्वरूप मानकर हम पूजते हैं .अत: इनकी पूजा में सभी तीर्थों, नदियों, समुद्रों, नवग्रहों, दिक्पालों, दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता सहित सभी योगिनियों को भी आमंत्रित किया जाता और और कलश में उन्हें विराजने हेतु प्रार्थना सहित उनका आहवान किया जाता है. कलश में सप्तमृतिका यानी सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, मुद्रा सादर भेट किया जाता है और पंच प्रकार के पल्लव से कलश को सुशोभित किया जाता है.
इस कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ बोये जाते हैं जिन्हें दशमी तिथि को काटा जाता है और इससे सभी देवी-देवता की पूजा होती है. इसे जयन्ती (Jayanti) कहते हैं जिसे इस मंत्र के साथ अर्पित किया जाता है
 “जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नामोस्तुते”.
 इसी मंत्र से पुरोहित यजमान के परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर जयंती डालकर सुख, 
सम्पत्ति एवं आरोग्य का आर्शीवाद देते हैं।
कलश स्थापना के पश्चात देवी का आह्वान किया जाता है कि ‘हे मां दुर्गा हमने आपका स्वरूप जैसा सुना है उसी रूप में आपकी प्रतिमा बनवायी है आप उसमें प्रवेश कर हमारी पूजा अर्चना को स्वीकार करें’.
देवी दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल पर बीच में स्थापित की जाती है और उनके दोनों तरफ यानी दायीं ओर देवी महालक्ष्मी, गणेश और विजया नामक योगिनी की प्रतिमा रहती है और बायीं ओर कार्तिकेय, देवी महासरस्वती और जया नामक योगिनी रहती है तथा भगवान भोले नाथ की भी पूजा की जाती है. प्रथम पूजन के दिन “शैलपुत्री” के रूप में भगवती दुर्गा दुर्गतिनाशिनी की पूजा फूल, अक्षत, रोली, चंदन से होती हैं.

शैलपुत्री की ध्यान :

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रर्धकृत शेखराम्।
वृशारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥
पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥
प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥

शैलपुत्री की स्तोत्र पाठ:

प्रथम दुर्गा त्वंहिभवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्यदायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरी त्वंहिमहामोह: विनाशिन।
मुक्तिभुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

शैलपुत्री की कवच :

ओमकार: मेंशिर: पातुमूलाधार निवासिनी।
हींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥
श्रींकारपातुवदने लावाण्या महेश्वरी ।
हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।
फट्कार पात सर्वागे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥

 

मां दुर्गा की पहली स्वरूपा और शैलराज हिमालय की पुत्री शैलपुत्री के पूजा के साथ ही दुर्गा पूजा आरम्भ हो जाता है. नवरात्र पूजन के प्रथम दिन कलश स्थापना के साथ इनकी ही पूजा और उपासना की जाती है. माता शैलपुत्री का वाहन वृषभ है, उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प रहता है. नवरात्र के इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं और यहीं से उनकी योग साधना प्रारंभ होता है. पौराणिक कथानुसार मां शैलपुत्री अपने पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष के घर कन्या रूप में उत्पन्न हुई थी. उस समय माता का नाम सती था और इनका विवाह भगवान् शंकर से हुआ था. एक बार प्रजापति दक्ष ने यज्ञ आरम्भ किया और सभी देवताओं को आमंत्रित किया परन्तु भगवान शिव को आमंत्रण नहीं दिया. अपने मां और बहनों से मिलने को आतुर मां सती बिना निमंत्रण के ही जब पिता के घर पहुंची तो उन्हें वहां अपने और भोलेनाथ के प्रति तिरस्कार से भरा भाव मिला. मां सती इस अपमान को सहन नहीं कर सकी और वहीं योगाग्नि द्वारा खुद को जलाकर भस्म कर दिया और अगले जन्म में शैलराज हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया. शैलराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण मां दुर्गा के इस प्रथम स्वरुप को शैल पुत्री कहा जाता है.

नवरात्री में दुर्गा की दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता हैं ||   दुर्गा सप्तशती पाठ विधि

इस प्रकार दुर्गा पूजा की शुरूआत हो जाती है प्रतिदिन संध्या काल में देवी की आरती होती है.

आरती में “जय अम्बे गौरी”- दुर्गा आरती  गीत भक्त जन गाते हैं ||