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मूर्ति-पूजा का वास्तविक तात्पर्य और महत्व!!!!!

भारतीय संस्कृति में प्रतीकवाद का महत्वपूर्ण स्थान है। सबके लिए सरल सीधी पूजा-पद्धति को आविष्कार करने का श्रेय को ही प्राप्त है। पूजा-पद्धति की उपयोगिता और सरलता की दृष्टि से हिन्दू धर्म की तुलना अन्य सम्प्रदायों से नहीं हो सकती। हिन्दू धर्म में ऐसे वैज्ञानिक मूलभूत सिद्धाँत दिखाई पड़ते हैं, जिनसे हिन्दुओं की कुशाग्र बुद्धि, विवेक और मनोविज्ञान की अपूर्व जानकारी का पता चलता है। मूर्ति-पूजा ऐसी ही प्रतीक पद्धति है।

मूर्ति-पूजा क्या है? पत्थर, मिट्टी, धातु या चित्र इत्यादि की प्रतिमा को मध्यस्थ बनाकर हम सर्वव्यापी अनन्त शक्तियों और गुणों से सम्पन्न परमात्मा को अपने सम्मुख उपस्थित देखते हैं। निराकार ब्रह्म का मानस चित्र निर्माण करना कष्टसाध्य है। बड़े योगी, विचारक, तत्ववेत्ता सम्भव है यह कठिन कार्य कर दिखायें, किन्तु साधारण जन के लिए तो वह निताँत असम्भव-सा है।

भावुक भक्तों, विशेषतः नारी उपासकों के लिए तो किसी प्रकार की मूर्ति का आधार रहने से उपासना में बड़ी सहायता मिलती है। मानस चिन्तन और एकाग्रता की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रतीक रूप में मूर्ति-पूजा की योजना बनी है। साधक अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान की कोई भी मूर्ति चुन लेता है और साधना करने लगता है। उस मूर्ति को देखकर हमारी अन्तः चेतना ऐसा अनुभव करती है मानो साक्षात् भगवान से हमारा मिलन हो रहा है।

आचार्य श्रीराम शर्मा का यह कथन सत्य है कि यद्यपि इस प्रकार की मूर्ति-पूजा में भावना प्रधान और प्रतिमा गौण है, तो भी प्रतिमा को ही यह श्रेय देना पड़ेगा कि वह भगवान की भावनाओं का उद्रेक और सञ्चार विशेष रूप से हमारे अन्तःकरण में करती है।

यों कोई चाहे, तो चाहे जब, चाहे जहाँ भगवान को स्मरण कर सकता है, पर मन्दिर में जाकर प्रभु-प्रतिमा के सम्मुख अनायास ही जो आनन्द प्राप्त होता है, वह बिना मन्दिर में जाये, चाहे जब कठिनता से ही प्राप्त होगा। गंगा-तट पर बैठकर ईश्वरीय शक्तियों का जो चमत्कार मन में उत्पन्न होता है, वह अन्यत्र मुश्किल से ही हो सकता है।

मूर्ति-पूजा के साथ-साथ धर्म-मार्ग में सिद्धाँतमय प्रगति करने के लिए हमारे यहाँ त्याग और संयम पर बड़ा जोर दिया गया है। सोलह संस्कार, नाना प्रकार के धार्मिक कर्मकाण्ड, व्रत, जप, तप, पूजा, अनुष्ठान, तीर्थ-यात्राएं, दान, पुण्य, स्वाध्याय, सत्संग ऐसे ही दिव्य प्रयोजन हैं, जिनसे मनुष्य में संयम और व्यवस्था आती है। मन दृढ़ बनकर दिव्यत्व की ओर बढ़ता है। आध्यात्मिक नियन्त्रण में रहने का अभ्यस्त बनता है।

मूर्ति-पूजा के पक्ष में पं. दीनानाथ शर्मा के विचार बहुमूल्य हैं। शर्मा जी लिखते हैं :-

“जड़ (मूल) ही सबका आधार हुआ करती है। जड़ सेवा के बिना किसी का भी कार्य नहीं चलता। दूसरे की आत्मा की प्रसन्नतार्थ उसके आधार भूत जड़ शरीर एवं उसके अंकों की सेवा करनी पड़ती है। परमात्मा की उपासना के लिए भी उसके आश्रय स्वरूप जड़ प्रकृति की पूजा करनी पड़ती है। हम वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, प्रकाश आदि की उपासना से प्रचुर लाभ उठाते हैं, तब मूर्ति-पूजा से क्यों घबड़ाना चाहिए? उसके द्वारा तो आप अणु-अणु में व्यापक चेतन (सच्चिदानन्द) की पूजा कर रहे होते हैं।

आप जिस बुद्धि को या मन को आधारीभूत करके परमात्मा का अध्ययन कर रहे होते हैं क्या वे जड़ नहीं हैं? परमात्मा भी जड़ प्रकृति के बिना कुछ नहीं कर सकता, सृष्टि भी नहीं रच सकता। तब सिद्ध हुआ कि जड़ और चेतन का परस्पर सम्बन्ध है। तब परमात्मा भी किसी मूर्ति के बिना उपास्य कैसे हो सकता है?

हमारे यहाँ मूर्तियाँ मन्दिरों में स्थापित हैं, जिनमें भावुक जिज्ञासु पूजन, वन्दन, अर्चन के लिए जाते हैं और ईश्वर की मूर्तियों पर चित्त एकाग्र करते हैं। घर में परिवार की नाना चिन्ताओं से भरे रहने के कारण पूजा, अर्चन, ध्यान इत्यादि इतनी अच्छी तरह नहीं हो पाता, जितना मन्दिर के प्रशान्त स्वच्छ वातावरण में हो सकता है। अच्छे वातावरण का प्रभाव हमारी उत्तम वृत्तियों को शक्तिवान् बनाने वाला है। मंदिर के सात्विक वातावरण में कुप्रवृत्तियाँ स्वयं फीकी पड़ जाती हैं। इसलिए हिन्दू संस्कृति में मंदिर की स्थापना को बड़ा महत्व दिया गया है, जो उचित ही है।”

कुछ व्यक्ति कहते हैं कि मन्दिरों में अनाचार होते हैं। उनकी संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। उन पर बहुत व्यय हो रहा है। अतः उन्हें समाप्त कर देना चाहिए।

सम्भव है इनमें से कुछ आक्षेप सत्य हों; किन्तु मन्दिरों को समाप्त कर देने या सरकार द्वारा जब्त कर लेने मात्र से क्या अनाचार दूर हो जाएंगे? यदि किसी अंग में कोई विकार आ जाय, तो क्या उसे जड़मूल से नष्ट कर देना उचित है?

कदापि नहीं। उसमें उचित परिष्कार और सुधार करना चाहिए। इसी बात की आवश्यकता आज हमारे मन्दिरों में है। मन्दिर स्वच्छ नैतिक शिक्षण के केन्द्र रहें। उनमें पढ़े-लिखे निस्पृह पुजारी रखे जायं, जो मित्रि, पूजा कराने के साथ-साथ जनता को धर्मग्रन्थों, आचार, शास्त्रों, नीति, ज्ञान की शिक्षण भी दें और जिनका चरित्र जनता के लिए आदर्श रूप हो।

मूर्ति-पूजा चित्त-शुद्धि का साधन।

मनुष्य का यह स्वभाव है कि जब तक वह यह जानता है कि कोई उसके कामों, चरित्र या विविध हाव-भाव विचारों को देख रहा है, तब तक वह बड़ा सावधान रहता है। बाह्य नियन्त्रण हटते ही वह शिथिल-सा होकर पुनः पतन में बहक जाता है। मंदिर में भगवान की मूर्ति के सम्मुख उसे सदैव ऐसा अनुभव होता रहता है कि वह ईश्वर के सम्मुख है, परमात्मा उसके कार्यों, मन्तव्यों और विचारों को सतर्कता से देख रहे हैं, अतः उसे चित्त-शुद्धि में सहायता मिलती है।

मूर्ति चित-शुद्धि के लिए प्रत्यक्ष परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करती है। जिन भारतीय ऋषियों ने भगवान की मूर्ति की कल्पना की थी, वे मनोविज्ञान-वेत्ता भी थे। उनके इस उपाय से भोली भावुक जनता की चित्त-शुद्धि हुई। मनुष्य ने अपने सात्विक प्रवृत्तियों, कला और सौंदर्य-वृत्ति का सारा प्रदर्शन मन्दिरों में किया हैं। मूर्ति में भगवान की भावना और अपनी श्रद्धा भरकर उन्होंने आत्मविकास किया।

आचार्य बिनोवा भावे ने लिखा हैं कि मूर्ति न होती तो बगीचे में से फूल तोड़कर मनुष्य केवल उसे अपनी नाक तक ही लगाता, किन्तु सात्विक भावना से भरकर भगवान की मूर्ति पर फूल चढ़ाकर, जो कि फूल के लिए शायद सर्वोच्च स्थान है- मनुष्य ने अपनी गंध वासना संयत और उन्नत की। अपनी वासना को उन्नत, परिष्कृत और संयमित करने के लिये भगवान के समर्पण की युक्ति निकाली।”

रामदास स्वामी ने एक स्थान पर लिखा है, “देवाचें वैभव बाढ़वावें” (भगवान का वैभव बढ़ाओ)

अल्पज्ञ, अशक्त, अज्ञान मनुष्य भला भगवान का वैभव क्या बढ़ावेगा? वह महान है, स्वयं असीम शक्तियों का पुञ्ज है। उधर हम रंक हैं; अशक्त हैं; अपनी शक्तियों में सीमित हैं।

लेकिन इस उक्ति का तात्पर्य यही है कि हम ऐसे कार्य, ऐसी भावना प्रकट करें, जो हमारे माध्यम से हमारे पिता परमेश्वर के महत्व को प्रकट करने वाले हों। परमेश्वर का वैभव बढ़ाने की कोशिश करने में हम स्वयं अपना जीवन उन्नत कर लेते हैं, उसे ईश्वरीय शक्तियों से भर लेते हैं।

मन्दिर में ईश्वर की कोई प्रतिमा स्थापित कर निरन्तर उन्हें अपने कार्यों का दृष्टा मानकर हम जो सदाचरण करते हैं, अपने कर्तव्यों को पूर्ण करते हैं, भजन, पूजन, स्वाध्याय, प्रार्थना करते हैं, वही भगवान का वैभव बढ़ाने वाली बातें हैं। जिन विचारों या कार्यों से हमारा देवत्व प्रकट होता है, वे ही इस दुर्लभ मानव-देह से करने योग्य कार्य हैं। वाणी से भगवान के दिव्य गुणों, अतुल सामर्थ्यों का गुण-गान करें, हाथों से पवित्र कार्य करे, ब्रह्म-चिन्तन भजन-गायन, और अर्चन से बुद्धि को शुद्ध बनाये, यही हमारे अहंकार को दूर कर सकता है और चित्त शुद्ध कर सकता है।

जब मूर्ति में हम भगवान की आस्था, श्रद्धा और विश्वास के साथ स्थापित कर देते हैं, तो वही दिव्य सामर्थ्यों से पूर्ण हो जाती है। उसी पत्थर की प्रतिमा के सामने हमारा सिर अपने आप झुक जाता है। यह मनुष्य की श्रद्धा का चमत्कार है।

इस मूर्ति के सामने निरन्तर रहने से चित्त-शुद्धि होती है और आत्मानुशासन प्राप्त हो जाता है। जीवन का चरम लक्ष्य होना चाहिए ईश्वर से तादात्म्य और इसी को मानना चाहिए- परम पुरुषार्थ। मूर्ति-पूजा वह प्रारम्भिक अवस्था है जिसमें मनुष्य दिव्य गुणों के विकास की पहली सीढ़ी पर चढ़ता है।

योगसूत्र में भगवान की व्याख्या “रागद्वेषादि रहित पुरुष विशेषः” की है। इस प्रकार मूर्ति-पूजा करते-करते मनुष्य निरहंकार बनता है। जिस मूर्ति में वह जिन देव गुणों का आरोपण का पूजा करने लगता है, कालान्तर में वे ही उसके चरित्र में प्रकट होने लगते हैं। इस प्रकार मूर्ति-पूजा उपयोगी है और आवश्यक भी।

संजय गुप्ता

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मूर्ति पूजा के प्रमाण


 

मूर्ति पूजा के प्रमाणवेद में मूर्ति पूजा के प्रमाण !!

वेदों में ईश्वर उपासना दो रूपों में प्रचलित है
साकार तथा निराकार।

निराकारवादी प्रायः साकार
उपासना या मूर्ति पूजा का विरोध करते है
तथा केवल निराकारोपासनापरक ‘न तस्य
प्रतिमा अस्ति ‘ आदि वचनों को उद्धृत करके
ही एकतरफा निर्णय करके संतुष्ट हो जाते हैं पर वे
यह भूल जाते है कि ऋषि मनीषियों ने
दोनोँ उपासना पद्धतियों का निर्माण
मनुष्य के बौद्धिक स्तर की अनुकूलता के अनुरूप
किया है। जिस व्यक्ति का बौद्धिक स्तर
जितना ऊंचा है उसे उसी ढंग
की उपासना पद्धति का निर्देश गुरुजन देते है।

जिस व्यक्ति का बौद्धिक विकास मध्य
श्रेणी का है शास्त्रों के स्वाध्याय से भी वह
वंचित है उसे यदि निराकार
उपासना की दीक्षा दी जाय तो उसे उस
उपासना से कोई लाभ न होगा,
क्योंकि उसकी अन्तः चेतना का इतना
विकास नहीं हुआ है कि ईश्वर के वास्तविक
निराकार तत्व को समझ सके। यदि एक निर्बल
बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति से यह कहा जाय
कि ईश्वर सर्वव्यापक है परन्तु वह इन स्थूल
नेत्रों से दृष्टिगोचर नहीं होता उसका कोई
रंगरूप नहीं है तो निश्चित रूप से
उसकी बुद्धि ईश्वर के अस्तित्व को ही मानने से
इनकार कर देंगी।

चूँकि सामान्य बौद्धिक स्तर वाले
व्यक्तियों के लिये अध्यात्म के सूक्ष्म तथ्यों पर
ध्यानावस्थित होना कठिन होता है इसलिये
मानव मनोविज्ञान के ज्ञाता ऋषियों ने
प्रतीक
पूजा की मूर्ति पूजा की प्रथा चलाई
ताकि उस मूर्ति को माध्यम बनाकर वह उस
अनन्त को साकार रूप में अपने सामने देख सके।

निराकार ब्रह्म का मानसचित्र बनाना सबके
लिये संभव नहीं। यदि प्रतीकवाद
या मूर्ति पूजा का आरंभ न होता। तो आज
विश्व की अधिकांश जनसंख्या नास्तिक
होती क्यों कि अशिक्षित और पिछड़े स्तर के
जनमानस में ईश्वर के निराकार तत्व पर
विश्वास ही न होता। केवल उपासना थोड़े से
उच्चकोटि के विचारकों तत्ववेत्ताओं और
योगियों तक ही सीमित रह जाती ओर
मानव जाति का आत्मिक विकास रुक
जाता धार्मिक सम्प्रदायों का निर्माण न
होता और धर्म के व्यापक विस्तार के
बिना समाज में घोर अनास्था और
अव्यवस्था फैली होती।

देव प्रतिमा से प्रतीक से साधक को यह
विश्वास हो जाता है कि जिन गुणों से
सम्पन्न ईश्वर को वह पाना चाहता है,
अथवा जिन गुणों को अपने में विकसित
करना चाहता है वह मूर्ति उसके समक्ष उपस्थित
है। ध्यान धारणा के माध्यम से वह उसे
अपनी अन्तःचेतना में बिठाकर एकाकार
हो जाता है। ध्यान की परिपक्वता में पहुँचने पर
उसे सब ओर उसी की छाया दिखायी देती है
वह अणु अणु में समाया हुआ मिलता है उसे अपने
इष्ट के अतिरिक्त और कुछ
दिखायी नहीं देता। यह वह अवस्था है जब
प्रतीक पूजा के माध्यम से साधक का आत्मिक
स्तर विकसित होने लगता है और वह सब
प्राणियों में अपने प्रभु का ही दर्शन करता है
और अपने में सबका उद्देश्य होता है।

यहाँ आकर
उसकी प्रारंभिक मूर्ति उपासना छूट जाती है
और वह समस्त चलती फिरती प्रतिमाओं
को अपने ईश्वर का ही रूप मानने लगता हैं।

जब
उपासना का स्तर स्थूल से सूक्ष्म हो जाता है
तब वह निराकार तत्व की उपासना के योग्य
होता है क्योंकि स्तर की अनुकूलता में
ही शक्ति के विकास का रहस्य निहित है। स्तर
की प्रतिकूलता में अच्छे
परिणामों की आशा करना असंभव है। यह
भी ठीक है कि प्रतिमा पूजा से अन्तिम लक्ष्य
तक पहुँचना संभव नहीं क्योंकि ईश्वर सूक्ष्म है और
सूक्ष्म को प्राप्त करने के लिये उससे एकाकार
होने के लिये
अपनी अन्तःचेतना का उतना ही सूक्ष्म
बनाना होगा जितना कि वह है अन्यथा अपने
लक्ष्य में निराशा ही होगी।

वस्तुतः मूर्ति पूजा ईश्वर
उपासना का आरंभिक शिक्षा सत्र है। यह
चित्त शुद्धि का मानसिक परिष्कार का सरल
साधन है। इसमें अपने इष्टदेव का ध्यान
सुविधाजनक होता है निराकार
उपासना कष्टसाध्य है जैसा कि कृष्ण भगवान ने
गीता 12 /5-6 में निर्देश दिया है कि जो सबके
मूल अचल अव्यक्त सर्वव्यापी अचिन्त्य ओर
नित्य अक्षर ब्रह्म की उपासना सब
इन्द्रियों को रोककर सर्वत्र सम बुद्धि रखते हुये
करते है वे भी मुझे ही पाते है। परन्तु उनके चित्त
अव्यक्त में आसक्त रहने के कारण उनको क्लेश
अधिक होते है क्योंकि अव्यक्त
उपासना का मार्ग कष्ट से सिद्ध होता है।

इसका अभिप्राय यह है कि साधक सब
इन्द्रियों को जीतकर और सभी प्राणियों के
प्रति सम बुद्धि व्यावहारिक भावना बनाकर
ही उस निराकार
उपासना का अधिकारी बनता है।

यदि आरंभिक साधक के लिए सूक्ष्म और असीम
की उपासना निर्धारित कर दी जाय तो वह
अंधकार में ही टटोलता रहेगा और भटक
जायेगा। क्योंकि केनोपनिषद 1/3 के अनुसार
वहाँ न तो चक्षु पहुँचता है, व वाणी पहुँचती है
और न मन ही पहुँच सकता है। वह ज्ञात
पदार्थों से भिन्न है और अज्ञात से भी परे है।
ऐसी स्थिति में तत्ववेत्ता ऋषियों ने निश्चय
किया कि सीमित बुद्धि वाले साधक सीधे
असीम की उपासना करने से ही असीम तक पहुँच
पायेंगे। ईश्वर या देवप्रतिमायें आस्था की,
श्रद्धाभावना की उन्नायक मानी गयी हैं और
वे साधक की पवित्र भावनाओं को तददेव तक
पहुँचाती भी है। श्रद्धासिक्त भावना के
उन्नयन से आत्मा का सम्बन्ध उस चैतन्य सत्ता से
हो जाता है तो अणु-अणु में व्याप्त है।

इस तथ्य की पुष्टि पाश्चात्य
मनोवैज्ञानिकों ने भी की है। अपने प्रसिद्ध
ग्रंथ “दि रिलीजंस एटीच्यूड” में मूर्धन्य
मनीशी वुडवर्न ने लिखा है,
कि मूर्ति का यथार्थ महत्व प्रतीकात्मक
होता है और इसका प्रभाव विषेशतः ऐसे
व्यक्तियों की चेतना पर पड़ता है जिन्होंने
मानसिक प्रतिमाओं का प्रयोग
करना नहीं सीखा है। अर्थात्
जिसका मानसिक स्तर पर्याप्त रूप से
विकसित नहीं हुआ है।

सुप्रसिद्ध
मनोवैज्ञानिक नाइट ने
भी अपनी कृति “सिम्बाँलिकल लैंग्वेज ऑफ
एनषियेण्ट आर्ट एण्ड माइथाँलाँजी” में कहा है
कि मूर्ति पूजकों का यह विश्वास
था कि दैवी-सत्य, प्रतीक में छिपा रहता है,
पहेली और कल्पित आख्यायिकाओं में प्रच्छन्न
रहता है। यह निर्बल
मानवीयता को समयानुकूल रखता है बशर्ते
कि यह ज्ञान और मूल दर्शन में प्रदर्शित हो।’

इससे स्पष्ट है कि आधुनिक मनोविज्ञान भी इस
मूलभूत सिद्धान्त को स्वीकार करता है
कि सामान्य मानसिक स्तर वाले
व्यक्तियों के लिए प्रार्थना व पूजा के लिए
कोई दृश्य चित्र
या प्रतिमा की आवश्यकता अनिवार्य है।

मनोवेत्ताओं का कहना है
कि जड़पूजा तो मनुष्य का प्रकृति प्रदत्त
स्वभाव है। जल, वायु, पृथ्वी, सूर्य,
चन्द्रमा को वेदों में देवता कहा है, क्योंकि वह
निरन्तर अपनी शक्तियों से हमें लाभान्वित
करते रहते हैं। उनके बिना हमारा जीवन असंभव है,
इसलिए जड़ होते हुए भी हम उनकी पूजा,
उपासना करते हैं। इन जड़ पदार्थों में स्वयमेव
कोई शक्ति नहीं है। उस आद्यशक्ति के कारण
ही इनमें प्राणप्रद गुणों का समावेश
हो पाया है। ईश्वर निराकार है। वह स्थूल
नेत्रों से दिखाई नहीं देता। उसके अनेकों दिव्य
गुण हैं। वह गुणों का समुच्चय है और तदनुरूप
ही उसकी अनन्त शक्तियां हैं। उन शक्तियों के
अनुसार आचार्यों ने उसे साकार रूप में ढाल
लिया है। मूर्ति पर फूल चढ़ाते हुए यह कोई
नहीं सोचता कि वह पत्थर की पूजा कर रहा है,
वरन् यह भाव रहता है कि इसमें व्याप्त जो चैतन्य
शक्ति है, वह ही हमारी श्रद्धा की पात्र है।

प्रतिमा की उपासना करने वाला जानता है
कि वह उस सर्वव्यापी ईश्वर
की ही उपासना कर रहा है।

श्रद्धाशक्ति इस पवित्र भावना से
उसकी आत्मा का संबंध सर्वव्यापी चैतन्य
सत्ता से हो जाता है। मूर्ति साधक के
विश्वास को बढ़ाती है कि यही ईश्वर है।
विश्वास की पूर्णता ही उसे आदि विद्युत
धारा से मिला देती है। इस मिलन से साधक
को जो अपार आनन्द की अनुभूति होती है,
वही ईश्वर प्राप्ति की ओर बढ़ने का चिन्ह
माना जाता है। सूक्ष्म तक स्थूल
की सीधी पहुँच नहीं है। स्थूल को स्थूल
का ही अवलम्बन लेना पड़ता है।

अतः मूर्तिपूजा स्वाभाविक व प्राकृतिक है।
वेद स्वयं स्थूल उपासना का प्रतिपादन करते हैं।

अग्नि उपासना से सम्बन्धित उनमें सैकड़ों मंत्र
उपलब्ध हैं। ऋग्वेद के मन्त्रों में उल्लेख है
कि “अग्नि उपासना से कल्याण होता है।
अग्नि उपासना के
बिना मुक्ति की प्राप्ति असंभव है।”

अग्नि उपासक के हृदय में परमात्मा का तेज
प्रकाशित होता है। अन्य शास्त्रों में
अग्नि को ब्रह्मरूप कहा गया है, परन्तु
अग्नि तो जड़ है। उसके माध्यम से चैतन्य
की प्रसन्नता प्राप्त करने में साधक कैसे सफल
हो सकता है। अग्नि स्थूल पदार्थों को सूक्ष्म
बनाकर देवताओं को अर्पण करती है।

मूर्तिपूजा भी साधक की पवित्र भावनाओं
को उदात्त बनाकर इष्टदेव तक पहुँचाती है। इन
दोनों में कुछ भी अन्तर नहीं हैं।
यदि अग्नि उपासना वैदिक है
तो मूर्तिपूजा भी वैदिक माननी पड़ेगी। वेद
स्वयं मूर्तिपूजा का प्रतीक दृष्टिगोचर होते हैं
क्योंकि उन्हें ईश्वर प्रदत्त ज्ञान
माना जाता है। अनेक वेद-मंत्र
इसकी साक्षी देते है। अथर्ववेद 3/10/3 में उल्लेख
है-

“संवत्सरस्य प्रतिमा याँ त्वा रात्र्युपास्महे।
सा न आयुश्मतीं प्रजाँ रायस्पोशेण सं सृज॥”

अर्थात् “ हे रात्रे ! संवत्सर की प्रतिमा ! हम
तुम्हारी उपासना करते हैं। तुम हमारे पुत्र-
पौत्रादि को चिर आयुष्य बनाओ और पशुओं से
हमको सम्पन्न करो।”

अथर्ववेद 2/13/4 में प्रार्थना है-

एह्याश्मा तिष्ठाश्मा भवतु ते तनूः ० “हे
भगवान! आइये और इस पत्थर की बनी मूर्ति में
अधिष्ठित होइये। आपका यह शरीर पत्थर
की बनी मूर्ति हो जाये।”

मा असि प्रमा असि प्रतिमा असि |
[तैत्तीरिय प्रपा० अनु ० ५ ]
हे महावीर तुम इश्वर की प्रतिमा हो |

सह्स्त्रस्य प्रतिमा असि | [यजुर्वेद १५.६५]
हे परमेश्वर , आप सहस्त्रो की प्रतिमा [मूर्ति ]
हैं |

अर्चत प्रार्चत प्रिय्मेधासो अर्चत |
(अथर्ववेद-20.92.5)
हे बुद्धिमान मनुष्यों उस प्रतिमा का पूजन
करो,भली भांति पूजन करो |

ऋषि नाम प्रस्त्रोअसि नमो अस्तु देव्याय
प्रस्तराय| [अथर्व ० १६.२.६ ]
हे प्रतिमा,, तू ऋषियों का पाषण है तुझ दिव्य
पाषण के लिए नमस्कार है |

गणपति अथर्व शीर्षम् की फलश्रुती है-
“सूर्यग्रहे
महानद्यां प्रतिमासन्निधौ वा जप्त्वा
सिद्धमनत्रो भवति ।।”

– सूर्यग्रहणके समय महानदीमें
अथवा ***प्रतिमाके*** निकट इस
उपनिषद्का जप करके साधक सिद्धमन्त्र
हो जाता है ।
इसी प्रकार देवी अथर्वशीर्षम् की फलश्रुती है

निशीथे
तुरीयसन्ध्यायां जप्त्वा वाक्सिद्धिर्भवति ।
नूतनायां प्रतिमायां जप्त्वा देवतासान्निध्यं
भवति । प्र्ाणप्रतिष्ठायां जप्त्वा प्राणानां
प्रतिष्ठा भवति ।।

प्रतिमा में शक्ति का अधिष्ठान
किया जाता है,
प्राणप्रतिष्ठा की जाती है। सामवेद के 36 वें
ब्राह्मण में उल्लेख है-

“देवतायतनानि कम्पन्ते दैवतप्रतिमा हसन्ति।
रुदान्त नृत्यान्त स्फुटान्त
स्विद्यन्त्युन्मालान्त निमीलन्ति॥

अर्थात्- देवस्थान काँपते हैं, देवमूर्ति हँसती,
रोती और नृत्य करती हैं, किसी अंग में स्फुटित
हो जाती है, वह पसीजती है,
अपनी आँखों को खोलती और बन्द
भी करती है।

“कपिल तंत्र” में इस भाव की पुष्टि करते हुए
कहा गया है-”जिस तरह गाय के सारे शरीर में
उत्पन्न होने वाला दुग्ध केवल उसके स्तनों के
द्वारा ही बाहर निकलता है, इसी तरह
परमात्मा की सर्वव्यापक
शक्ति का अधिष्ठान मूर्ति में होता है ।

इस
तरह से साधक यह विचार करता है कि वह उस
पत्थर निर्मित मूर्ति की उपासना नहीं कर
रहा है, वरन् वह उस अनन्त शक्ति की पूजा कर
रहा है जो उस मूर्ति में विद्यमान है। बाह्य
दृष्टि से दिखाई देता है कि वह
प्रतिमा की पूजा कर रहा है परन्तु वास्तव में
तो वह उस सर्वव्यापी शक्ति की उपासना कर
रहा होता है।

आधुनिक विज्ञान भी इसका समर्थन करता है।
साधक के भक्ति, विश्वास और
पूजा की शक्ति को यदि विषम-शक्ति मानें
और ईश्वर की शक्ति को सम तो निश्चय रूप से
साधक
की विषमशक्ति परमात्मा की समशक्ति को
मूर्ति के माध्यम से आकर्षित कर लेती है। विषय
और सम शक्तियों के मिलन से
ही विद्युतधारा का प्रवाह दृष्टिगोचर
होता है और प्रकाश की उत्पत्ति होती है।
इसी तरह से साधक
की अन्तःचेतना भी जगमगा उठती है।

मूर्तिपूजा-प्रतीक उपासना के पीछे एक सुदृढ़
मनोविज्ञान काम करता है। आधुनिक
मनोविज्ञानी भी मूर्ति की आवश्यकता को
अनुभव करते हैं और मानते हैं कि असीम
ही सीमित होकर प्रदर्शित होता है।

सुविख्यात मनोविज्ञानी कार्लाइल के
अनुसार वास्तविक प्रतीक में जिसे
ऐसा सम्बोधन किया जाता है, सदैव स्पष्ट और
प्रत्यक्ष रूप से असीम का रहस्योद्घाटन
होता है। इसमें निराकार का संयोजन साकार
में होता है जिससे वह दृष्टिगत हो सके और
प्राप्त हो सके।

विद्वान अर्बन ने
भी अपनी कृति-”लैग्वेज ऐण्ड रियलिटी” में
प्रतिमा उपासना के लाभों का विवेचन करते
हुए लिखा है कि धार्मिक प्रतीक
या प्रतिमायें सीमित और अन्तरदृश्ट्यात्मक
सम्बन्धों से उद्भूत की गयी है। (-अखण्ड
ज्योति Dec 1992 ) इनसे ऐसे
तथ्यों की अभिव्यक्ति होती है जो अधिक
सार्वभौम और आदर्श सम्बन्धों के लिए है,
जिनकी अभिव्यक्ति विस्तार अधिक होने से
और आदर्शवादिता के कारण सीधे
नहीं की जा सकती।

अन्यान्य
मनोवैज्ञानिकों ने इस तथ्य की पुष्टि करते हुए
लिखा है-भारतीय मन्दिरों में शिव, विष्णु,
बुद्ध, महावीर आदि की मूर्तियाँ आदर्श
को स्थूल रूप देने के उद्देश्य से स्थापित
की गयी है। सूक्ष्म रूप में बिना दृश्य वस्तु के,
जो इनका प्रतिरूप है, कल्पना करने पर आदर्श
अस्पष्ट रह जाता है। उदाहरण के लिए जैन धर्म में
24 तीर्थंकरों का पूजन मूर्ति रूप में इस कारण
प्रचलित नहीं है कि यह मूर्तियाँ ईश्वर के रूप में
है, क्योंकि जैनधर्म में ईश्वर का अस्तित्व
ही स्वीकार नहीं किया है। वस्तुतः वे आदर्श
की प्रतीक हैं, जहाँ पहुँचना व्यक्ति का लक्ष्य
होता है। स्थूल प्रतीक
की यही महत्ता होती है।

आधुनिक मनोवैज्ञानिकों का दृढ़ मत है
कि मूर्ति पूजन की प्रथा इसलिए चली कि इनसे
प्रेरणा मिलती है और उस प्रेरणा के साथ
शक्ति और विश्वास मिलती है और उस
प्रेरणा के साथ शक्ति और विश्वास
छिपा रहता है। जिस किसी अवतार,
देवता या महापुरुष की साधक पूजा करता है,
उसके साथ उसके जीवन की महानताएँ
या तत्सम्बन्धी कथायें अवश्य जुड़ी रहती हैं।
प्रतिमा के सामने आते ही वह सभी दृश्य
नेत्रों के सामने तैरने लगते हैं और साधक उस महान
विभूति से अपने का संबंधित करके
उसकी महानताओं और विशेषताओं से अपने मन
मन्दिर को जगमगाता अनुभव करता है।

तादात्म्य हो जाने पर
अपनी अन्तरात्मा को वह परमात्म चेतना से
एकाकार कर देता है। साधक का तद्रूप
बनना उसकी भावना पर निर्भर करता है।
मूर्तिपूजा से जीवन निर्माण की सूक्ष्म
प्रक्रिया आरंभ होती है, जो साधक को उच्च
कक्षा में ले जाती है। इस तरह प्रतीक
पूजा लाभप्रद ही नहीं, बुद्धि सुलभ भी हैं।

नारायण श्री हरिः________________

 

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मूर्ति पूजा का विज्ञान और रहस्य!!!!!


मूर्ति पूजा का विज्ञान और रहस्य!!!!!

जिन लोगों ने भी मूर्ति विकसित की होगी, उन लोगों ने जीवन के परम रहस्य के प्रति सेतु बनाया था…मूर्ति-पूजा शब्द सेल्फ कंट्राडिकटरी है। इसीलिए जो पूजा करता है वह हैरान होता है कि मूर्ति कहां? और जिसने कभी पूजा नहीं की वह कहता है कि इस पत्थर को रख कर क्या होगा? इस मूर्ति को रख कर क्या होगा? ये दो तरह के लोगों के अनुभव हैं, जिनका कहीं तालमेल नहीं हुआ है। और इसीलिए दुनिया में बड़ी तकलीफ हुई है।
आप मंदिर के पास से गुजरेंगे तो मूर्ति दिखाई पड़ेगी, क्योंकि पूजा के पास से गुजरना आसान नहीं है। तो आप कहेंगे, इन पत्थर की मूर्तियों से क्या होगा? लेकिन जो उस मंदिर के भीतर कोई एक मीरा अपनी पूजा में लीन हो गई है, उसे वहां कोई भी मूर्ति नहीं बची। पूजा घटित होती है, मूर्ति विदा हो जाती है। मूर्ति सिर्फ प्रारंभ है। जैसे ही पूजा शुरू होती है, मूर्ति खो जाती है।

तो वह जो हमें दिखाई पड़ती है वह इसीलिए दिखाई पड़ती है कि हमें पूजा का कोई पता नहीं है। और दुनिया में जैसे-जैसे पूजा कम होती जाएगी, वैसे-वैसे मूर्तियां बहुत दिखाई पड़ेंगी। और जब बहुत मूर्तियां दिखाई पड़ेंगी और पूजा कम हो जाएगी तो मूर्तियों को हटाना पड़ेगा, क्योंकि पत्थरों को रख कर क्या करिएगा? उनका कोई प्रयोजन नहीं है। साधारणतः लोग सोचते हैं कि जितना पुराना आदमी होता है, जितना आदिम, उतना मूर्ति-पूजक होता है। जितना आदमी बुद्धिमान होता चला जाता है, उतना ही मूर्ति को छोड़ता चला जाता है। सच नहीं है यह बात। असल में पूजा का अपना विज्ञान है। वह जितना ही हम उससे अपरिचित होते चले जाते हैं, उतनी ही कठिनाई होती चली जाती है।

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व्‍याल – याली और संघाट पशु मूर्तियां


व्‍याल – याली और संघाट पशु मूर्तियां
देवालयों में पशुओं की नाना प्रकार की मूर्तियां देखने को मिलती है, इनको एकाधिक पशुओं की काया के रूप में संयुक्‍त करके भी दिखाया जाता है। इनको व्‍याल मूर्तियां कहा जाता है, कहीं वराल भी कहा जाता है। विरालिका मूर्तियों के रूप में शिल्पियों में इनका व्‍यवहार रहा है। मंदिरों की द्वार शाखाओं की आखिरी सिंहशाखों में इनका स्‍वरूप देखने को मिलता है। दक्षिण भारत के ग्रंथों, यथा विश्‍वकर्मवास्‍तुशास्त्र में इनको याली के रूप में स्‍वीकारा गया है।
दसवीं सदी के वास्‍तुविद्या नामक ग्रंथ में द्वार की आखिरी शाखा का नाम ही व्‍याल शाखा कहा गया है। इनमें वराह, अश्‍व, अज, मृग, महिष, बंदर, सियार आदि को सिंह, हाथी, मानव, ग्रास आदि के साथ दिखाया जाता है। इनके कई प्रयोग हुए हैं। इन पर स्‍वतंत्र शास्‍त्र को रचा जा सकता है। इनमें मिस्र, ग्रीक की कला का प्रभाव देखा जा सकता है।
समरांगण सूत्रधार और अपराजितपृच्‍छा जैसे ग्रंथों ही नहीं, अन्‍य प्रतिमा शास्‍त्रों में भी व्‍याल मूर्तियों का जिक्र आता है। समरांगण में इनके 16 रूप आए हैं। अपराजित व समरांगण में सिंह, हाथी, अश्‍व, नर, नंदी, मेंढा, तोता, सूअर, भैंसा, चूहा, श्‍वान, गर्दभ, हरिण, शार्दूल, सियार आदि को व्‍याल रूप में दिखाए जाने का वर्णन है। सच में ये कला अद्भुत है, बस इनको देखते ही याली, वराली कला की याद आ जाती है जो पिरामिड की कला के साथ अपना तालमेल दिखाती है।

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अतिवाहिक – एक अनूठे देवता का भारतीय संदर्भ


अतिवाहिक – एक अनूठे देवता का भारतीय संदर्भ

कुछ दिन पहले (4 जुलाई को) मैंने मिस्र के एक पुरातन देवता ‘अनुबिस’ के सम्‍बन्‍ध में लिखकर यह सवाल किया था कि क्‍या भारतीयों को भी किसी एेसे देवता में विश्‍वास है ? हालांकि तब कोई उत्‍तर नहीं मिला। आज जबकि शिवपुराण में एक सन्‍दर्भ खोज रहा था, कैलाशसंहिता में एक देवता के नाम पर मेरी निगाह जम गई। उसमें ”अतिवा‍हिक” या ”आतिवाहिक” नामक देवता का जिक्र आया है।
पुराणकार ने इसकी मान्‍यता ठीक वैसी ही लिखी है, जैसी मिस्र में रही है। पुराणकार ने कहा है कि नंदी द्वारा प्रेरित अातिवाहिक रूपी पांच देवता है। उसमें कोई आत्‍मघाती, कोई ज्‍योति आकार वाला, कोई दिन का, कोई रात्रि का तो काेई शुक्‍लपक्ष का अभिमान करने वाला तो कोई कृष्‍णपक्ष वाला, ध्रूम्रा, तमस्विनी, रात्रि आदि नाम हैं– श्‍लोक भ्रष्‍ट होने से यह सारा पाठ गड़बड़ लग रहा है किंतु यह जरूर उचित लगता है कि ये पांच देवता कर्म के अनुष्‍ठान में तत्‍पर रहने वाले जीवों को लेकर स्‍वर्ग में जाते है, वे अनेक भोगों को भोगते हैं। वे भूलोक से लेकर पांच प्रकार के मार्ग को बांटकर अग्नि आदि के क्रम से ग्रहण करते हैं… शिव या शव के आगे पीछे स्थित होते है।
इस विवरण को लिखने में पुराणकार या लिपिकार अथवा संपादक कहीं चूक कर गए हैं.. मगर यह विवरण अनुबिस से पर्याप्‍त मिलता है… कहना न होगा शिवपुराण के संपादनकाल, लगभग 11वीं सदी तक इन देवताओं का विवरण भारतीयों को मिल चुका था और यह संदर्भ लोकवर्णन के संबंध में लिखा गया है। जरूर यह कड़ी कहीं विस्‍तृत द्वीपीय धारणा का सूत्र हो सकता है…। विचार कीजिएगा और अन्‍य संदर्भ भी खोजियेगा।

अनुबिस देवता - ममीकरण और जीवन के बाद का सहारा

हमारे यहां प्रासादों के ऊर्ध्‍वतल या बीम को सहारा देने के लिए पुरातन काल से ही कीचक मुखादि के साथ साथ भारी पहलवान जैसे रूपों में पाषाण को गढ़कर लगाया जाता रहा है
। पुराने समय में ऐसा खास तौर पर चलन था। मिस्र में ऐसी मान्‍यता रही है क‍ि अनुबिस नामक देवता मृतात्‍माआें को इसलिए सहारा देते हैं कि वह जब पुनर्जीवन पाए तब तक उसका सहयोगी रहे। 
भारत में यूं तो ऐसे किसी देवता की मान्‍यता नहीं, मगर जनजातियों जरूर यह मान्‍यता रही है कि 'आभ्‍स' नामक कोई शक्ति है जो जीवात्‍मा को पुनर्जीवन देने में सहारा बनती है। उसका संबंध अंतिम क्रिया से साथ होता है। यह एक प्राण की तरह की शक्ति है, उसी दशम प्राण की तहत जो कपाल क्रिया होने तक शरीर को सहारा दिए रहता है। यह आभ्‍स आकाश या जल का नाम भी है जो सहारा देता है। यह अनुबिस से मिलता जुलता नाम है। 
मगर,अनुबिस ग्रीक नाम है जो जेकाल मुख नामक देवता के लिए काम में लाया जाता है, जैसा कि Luxor City - Egypt ने स्‍वीकारा है - Anubis columns. Anubis is the Greek name for a jackal-headed god associated with mummification and the afterlife in ancient Egyptian religion. Anubis attends the weighing scale in the Afterlife during the "Weighing Of The Heart" कहा गया है कि इसका संबंध मिस्र के प्राचीन धर्म में मृतक के ममीकरण और जीवन के बाद रहा है। ये सब देखियेगा, विशेष विचार करने लिए एक सुझाव मात्र है।

अनुबिस देवता – ममीकरण और जीवन के बाद का सहारा

हमारे यहां प्रासादों के ऊर्ध्‍वतल या बीम को सहारा देने के लिए पुरातन काल से ही कीचक मुखादि के साथ साथ भारी पहलवान जैसे रूपों में पाषाण को गढ़कर लगाया जाता रहा है
। पुराने समय में ऐसा खास तौर पर चलन था। मिस्र में ऐसी मान्‍यता रही है क‍ि अनुबिस नामक देवता मृतात्‍माआें को इसलिए सहारा देते हैं कि वह जब पुनर्जीवन पाए तब तक उसका सहयोगी रहे।
भारत में यूं तो ऐसे किसी देवता की मान्‍यता नहीं, मगर जनजातियों जरूर यह मान्‍यता रही है कि ‘आभ्‍स’ नामक कोई शक्ति है जो जीवात्‍मा को पुनर्जीवन देने में सहारा बनती है। उसका संबंध अंतिम क्रिया से साथ होता है। यह एक प्राण की तरह की शक्ति है, उसी दशम प्राण की तहत जो कपाल क्रिया होने तक शरीर को सहारा दिए रहता है। यह आभ्‍स आकाश या जल का नाम भी है जो सहारा देता है। यह अनुबिस से मिलता जुलता नाम है।
मगर,अनुबिस ग्रीक नाम है जो जेकाल मुख नामक देवता के लिए काम में लाया जाता है, जैसा कि Luxor City – Egypt ने स्‍वीकारा है – Anubis columns. Anubis is the Greek name for a jackal-headed god associated with mummification and the afterlife in ancient Egyptian religion. Anubis attends the weighing scale in the Afterlife during the “Weighing Of The Heart” कहा गया है कि इसका संबंध मिस्र के प्राचीन धर्म में मृतक के ममीकरण और जीवन के बाद रहा है। ये सब देखियेगा, विशेष विचार करने लिए एक सुझाव मात्र है।

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मूर्तिकला का एक अज्ञात केंद्र – तनेसर


मूर्तिकला का एक अज्ञात केंद्र – तनेसर

मेवाड़ अपनी गुहिल मूर्तिकला के लिए जाना जाता है, मगर इससे पूर्व यहां शुंगकालीन और गुप्‍तकालीन मूर्तिकला के भी दर्शन होते हैं। उदयपुर के समीप ही तनेसर नामक आज का छोटा सा गांव उत्‍तर गुप्‍तकाल में मूर्तिकला का समृद्ध केंद्र था, मगर आज वहां किसी को अपने अतीत पर न अभिमान है न ही जरा सी भी जानकारी। क्‍योंकि, यहां के अतीत का खजाना बहुत पहले ही खाली हो गया…। यहां मातृकाओं की मूर्तियां उस काल में बनी थी, जबकि सप्‍त मातृकाओं की मान्‍यता का विकासकाल था। नाना रूपों में मातृका मूर्तियों का निर्माण हुआ, उनकी स्‍थापना भी हुई और पूजा भी। यह दौर लगभग दो सौ साल तक रहा होगा। यह काल किस राजवंश का था और किस वंश ने यहां यह कार्य करवाया, निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता मगर, गुहिलों से पूर्व क्षत्रपों का वर्चस्‍व था और उनके अधीनस्‍थों ने जरूर इस क्षेत्र को मातृकापूजा के लिए सर्वथा योग्‍य समझा होगा।
यहां अनेक मातृकाओं की मूर्तियां एक भंड-खंड चबूतरे पर रखी हुई थी। ये यहां पर ही किसी मंदिर के लिए प्रयोग में लाई गई होंगी। तनेसर गांव उदयपुर-डूंगरपुर मार्ग पर यशद की खानों के लिए मशहूर जावर माइंस के पास है। यहां से खनन कार्य बहुत समय पहले से ही होता था, ऐसे में यहां श्रेष्ठियों या मातृकाओं के पूजकों ने यहां शिल्‍पकला काे प्रोत्‍साहन दिया होगा। यहां से मिली कुछ मूर्तियां metmuseum में है, जैसी कि एक मूर्ति Accession Number: 1993.477.5 पर हैं। एक मूर्ति शिल्‍प Lx Shalini ने शेयर किया है। आभार।
यह उत्‍तर गुप्‍तकाल,6वीं सदी की बनी हुई मानी गई है मगर इसमें गांधार, गुप्‍त और पाल कला का मिला-जुला रूप दिखाई देता है। हरे सुभाजा पाषाण (Gray schist) की बनी इस प्रतिमा की ऊंचाई 62.2 cm है। तनेसर के मूर्तिशिल्‍प का मुकाबला नहीं, ये मूर्तियां यहां अन्‍यत्र नहीं मिलती, न ही बनी है। लगता है कि निराले शिल्पियों ने मातृ तनेसर को ही इस शिल्‍प का केंद्र बनाए रखने का विचार किया होगा, मगर आज बहुत कम ही जनों को इस केंद्र की जानकारी होगी।

metmuseum

— with Rinkesh Agarwal.

मूर्तिकला का एक अज्ञात केंद्र - तनेसर

मेवाड़ अपनी गुहिल मूर्तिकला के लिए जाना जाता है, मगर इससे पूर्व यहां शुंगकालीन और गुप्‍तकालीन मूर्तिकला के भी दर्शन होते हैं। उदयपुर के समीप ही तनेसर नामक आज का छोटा सा गांव उत्‍तर गुप्‍तकाल में मूर्तिकला का समृद्ध केंद्र था, मगर आज वहां किसी को अपने अतीत पर न अभिमान है न ही जरा सी भी जानकारी। क्‍योंकि, यहां के अतीत का खजाना बहुत पहले ही खाली हो गया...। यहां मातृकाओं की मूर्तियां उस काल में बनी थी, जबकि सप्‍त मातृकाओं की मान्‍यता का विकासकाल था। नाना रूपों में मातृका मूर्तियों का निर्माण हुआ, उनकी स्‍थापना भी हुई और पूजा भी। यह दौर लगभग दो सौ साल तक रहा होगा। यह काल किस राजवंश का था और किस वंश ने यहां यह कार्य करवाया, निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता मगर, गुहिलों से पूर्व क्षत्रपों का वर्चस्‍व था और उनके अधीनस्‍थों ने जरूर इस क्षेत्र को मातृकापूजा के लिए सर्वथा योग्‍य समझा होगा। 
यहां अनेक मातृकाओं की मूर्तियां एक भंड-खंड चबूतरे पर रखी हुई थी। ये यहां पर ही किसी मंदिर के लिए प्रयोग में लाई गई होंगी। तनेसर गांव उदयपुर-डूंगरपुर मार्ग पर यशद की खानों के लिए मशहूर जावर माइंस के पास है। यहां से खनन कार्य बहुत समय पहले से ही होता था, ऐसे में यहां श्रेष्ठियों या मातृकाओं के पूजकों ने यहां शिल्‍पकला काे प्रोत्‍साहन दिया होगा। यहां से मिली कुछ मूर्तियां metmuseum में है, जैसी कि एक मूर्ति Accession Number: 1993.477.5 पर हैं। एक मूर्ति शिल्‍प Lx Shalini ने शेयर किया है। आभार। 
यह उत्‍तर गुप्‍तकाल,6वीं सदी की बनी हुई मानी गई है मगर इसमें गांधार, गुप्‍त और पाल कला का मिला-जुला रूप दिखाई देता है। हरे सुभाजा पाषाण (Gray schist) की बनी इस प्रतिमा की ऊंचाई 62.2 cm है। तनेसर के मूर्तिशिल्‍प का मुकाबला नहीं, ये मूर्तियां यहां अन्‍यत्र नहीं मिलती, न ही बनी है। लगता है कि निराले शिल्पियों ने मातृ तनेसर को ही इस शिल्‍प का केंद्र बनाए रखने का विचार किया होगा, मगर आज बहुत कम ही जनों को इस केंद्र की जानकारी होगी।

metmuseum
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Funňýəı Bőý Amit NæmĐĕv एक बार श्री कृष्ण जी ने पत्थर उठा कर ही गोकुल धाम प्रलय से बचाया , एक बार पत्थर ला कर हनुमान जी ने लक्ष्मण के प्राण बचाये , एक बार पत्थर ने ही हमारा केदार नाथ बचाया … फ़िर भी तमाम मूर्ख हम से पूछते हैं कि —- ** तुम हिंदू “पत्थर” क्यों पूजते हो **