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Can you hear a pin drop?

What is the meaning of pin drop silence?

Following are some instances when silence could speak louder than voice.

Take 1:

Field Marshal Sam Bahadur Maneckshaw once started addressing a public meeting at Ahmedabad in English.

The crowd started chanting, “Speak in Gujarati.

We will hear you only if you speak in Gujarati.”
Field Marshal Sam Bahadur Maneckshaw stopped.
Swept the audience with a hard stare and replied,

“Friends, I have fought many a battle in my long career.
I have learned Punjabi from men of the Sikh Regiment;
Marathi from the Maratha Regiment;
Tamil from the men of the Madras Sappers;
Bengali from the men of the Bengal Sappers,
Hindi from the Bihar Regiment; and
Even Nepali from the Gurkha Regiment.

Unfortunately there was no soldier from Gujarat from whom I could have learned Gujarati.”…

You could have heard a pin drop

Take 2:

Robert Whiting,
an elderly US gentleman of 83, arrived in Paris by plane.

At French Customs, he took a few minutes to locate his passport in his carry on.

“You have been to France before, Monsieur ?”, the Customs officer asked sarcastically.

Mr. Whiting admitted that he had been to France previously.

“Then you should know enough to have your passport ready.”

The American said,
“The last time I was here,
I didn’t have to show it.”

Americans always have to show their passports on arrival in France !”, the Customs officer sneered.

The American senior gave the Frenchman a long, hard look.

Then he quietly explained

“Well, when I came ashore at Omaha Beach,
at 4:40am, on D-Day in 1944, to help liberate your country, I couldn’t find a single Frenchman to show a passport to…. ”

You could have heard a pin drop

Take 3:

Soon after getting freedom from British rule in 1947, the de-facto prime minister of India, Jawahar Lal Nehru called a meeting of senior Army Officers to select the first General of the Indian army.

Nehru proposed, “I think we should appoint a British officer as a General of The Indian Army, as we don’t have enough experience to lead the same.”
Having learned under the British, only to serve and rarely to lead, all the civilians and men in uniform present nodded their heads in agreement.

However one senior officer, Nathu Singh Rathore, asked for permission to speak.

Nehru was a bit taken aback by the independent streak of the officer, though, he asked him to speak freely.

Rathore said, “You see, sir, we don’t have enough experience to lead a nation too, so shouldn’t we appoint a British person as the first Prime Minister of India?”

You could hear a pin drop.

After a pregnant pause, Nehru asked Rathore,
“Are you ready to be the first General of The Indian Army?”..

Rathore declined the offer saying “Sir, we have a very talented army officer, my senior, Gen. Cariappa, who is the most deserving among us.”

This is how the brilliant Gen. Cariappa became the first General and Rathore the first ever Lt. General of the Indian Army.

(Many thanks to Lt. Gen Niranjan Malik PVSM (Retd) for this article.)

Worth reading?!

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This is the daughter of a rice farmer, and her name is Hima.

She ate rice and daal (lentils), not supplements and protein bars.

She ran in rice fields before she could step onto any real track.

She wore cheap, worn-out spikes, but she didn’t let that matter.

She’s notorious for having a one-track mind, never caring about who her competition in the next lane is.

She just took Gold in the 400m event at the World U20 Championships in Finland.

And she’s the first Indian track athlete – male or female – to win a gold medal at any global track event.

That’s what success looks like.

Say her name: Hima Das.

निओ दीप

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अपने देश का नामकरण (भारतवर्ष) किस भरत के नाम पर हुआ ?

अपने देश का नामकरण (भारतवर्ष) किस भरत के नाम पर हुआ ? अनेक ‘विद्वान्’ डेढ़ सौ वर्ष से तोते की तरह रट रहे हैं कि दुष्यन्तपुत्र भरत (जो सिंह के दांत गिनता था) के नाम पर इस देश का नामकरण ‘भारत’ हुआ है। आइए, देखते हैं कि इस कथन में कितनी वास्तविकता है।

हमारे पुराणों में बताया गया है कि प्रलयकाल के पश्चात् स्वायम्भुव मनु के ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत ने रात्रि में भी प्रकाश रखने की इच्छा से ज्योतिर्मय रथ के द्वारा सात बार भूमण्डल की परिक्रमा की। परिक्रमा के दौरान रथ की लीक से जो सात मण्डलाकार गड्ढे बने, वे ही सप्तसिंधु हुए। फिर उनके अन्तर्वर्ती क्षेत्र सात महाद्वीप हुए जो क्रमशः जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्करद्वीप कहलाए। ये द्वीप क्रमशः दुगुने बड़े होते गए हैं और उनमें जम्बूद्वीप सबके बीच में स्थित है-

‘जम्बूद्वीपः समस्तानामेतेषां मध्यसंस्थितः’

(ब्रह्ममहापुराण, 18.13)

प्रियव्रत के 10 पुत्रों में से 3 के विरक्त हो जाने के कारण शेष 7 पुत्र— आग्नीध्र, इध्मजिह्व, यज्ञबाहु, हिरण्यरेता, घृतपृष्ट, मेधातिथि और वीतिहोत्र क्रमशः जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्करद्वीप के अधिपति हुए।

प्रियव्रत ने अपने पुत्र आग्नीध्र को जम्बूद्वीप दिया था-

‘जम्बूद्वीपं महाभाग साग्नीध्राय ददौ पिता’

मेधातिथेस्तथा प्रादात्प्लक्षद्वीपं तथापरम् ।।’

(विष्णुमहापुराण, 2.1.12)

जम्बूद्वीपाधिपति आग्नीध्र के 9 पुत्र हुए- नाभि, किंपुरुष, हरिवर्ष, इलावृत्त, रम्यक, हिरण्यमय, कुरु, भद्राश्व तथा केतुमाल। सम विभाग के लिए आग्नीध्र ने जम्बूद्वीप के 9 विभाग करके उन्हें अपने पुत्रों में बाँट दिया और उनके नाम पर ही उन विभागों के नामकरण हुए-

‘आग्नीध्रसुतास्तेमातुरनुग्रहादोत्पत्तिकेनेव संहननबलोपेताः पित्रा विभक्ता आत्म तुल्यनामानियथाभागं जम्बूद्वीपवर्षाणि बुभुजः’

(भागवतमहापुराण, 5.2.21; मार्कण्डेयमहापुराण, 53.31-35)

पिता (आग्नीध्र) ने दक्षिण की ओर का ‘हिमवर्ष’ (जिसे अब ‘भारतवर्ष’ कहते हैं) नाभि को दिया-

‘पिता दत्तं हिमाह्वं तु वर्षं नाभेस्तु दक्षिणम्’

(विष्णुमहापुराण, 2.1.18)

आठ विभागों के नाम तो ‘किंपुरुषवर्ष’, ‘हरिवर्ष’ आदि ही हुए, किंतु ज्येष्ठ पुत्र का भाग ‘नाभि’ से ‘अजनाभवर्ष’ हुआ। नाभि के एक ही पुत्र ऋषभदेव थे जो बाद में (जैनों के) प्रथम तीर्थंकर हुए। ऋषभदेव के एक सौ पुत्र हुए जिनमें भरत सबसे बड़े थे । ऋषभदेव ने वन जाते समय अपना राज्य भरत को दे दिया था, तभी से उनका खण्ड ‘भारतवर्ष’ कहलाया-

‘ऋषभाद्भरतोः जज्ञे ज्येष्ठः पुत्राशतस्य सः ।’

‘ततश्च भारतं वर्षमेतल्लोकेषु गीयते ।

भरताय यतः पित्रा दत्तं प्रतिष्ठिता वनम् ।।

(विष्णुमहापुराण, 2.1.28; कूर्ममहापुराण, ब्राह्मीसंहिता, पूर्व, 40-41)

‘येषां खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठः श्रेष्ठगुण आसीद्येनेदं वर्षं भारतमिति व्यदिशन्ति’

(भागवतमहापुराण, 5.4.9)

‘तेषां वै भरतो ज्येष्ठो नारायणपरायणः ।

विख्यातं वर्षमेतद् यन्नाम्ना भरतमद्भुतम् ।।’

(भागवतमहापुराण, 11.2.17)

‘ऋषभो मेरुदेव्यां च ऋषभाद् भरतोऽभवत् ।

भरताद् भारतंवर्षं भरतात् सुमतिस्त्वभूत् ।।’

(अग्निमहापुराण, 107.11)

‘नाभे पुत्रात्तु ऋषभाद् भरतो याभवत् ततः ।

तस्य नाम्ना त्विदंवर्षं भारतं येति कीर्त्यते ।।’

(नृसिंहपुराण, 30; स्कन्दमहापुराण,

उसी दिन से इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ हो गया जो आज तक है।

(ऋषभदेव का) अजनाभवर्ष ही भरत के नाम पर ‘भारतवर्ष’ कहलाया—

‘अजनाभं नामैतद्वर्षं भारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति’

(भागवतमहापुराण, 5.7.3)

चूँकि ऋषभदेव ने अपने ‘हिमवर्ष’ नामक दक्षिणी खण्ड को अपने पुत्र भरत को दिया था, इसी कारण उसका नाम भरत के नामानुसार ‘भारतवर्ष’ पड़ा-

‘नाभेस्तु दक्षिणं वर्षं हेमाख्यं तु पिता ददौ’

(लिंगमहापुराण, 47.6)

‘हिमाह्वं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत् ।

तस्मात् तद् भारतं वर्षं तस्य नाम्ना विदुर्बुधः ।।’

(वायुपुराण, 33.52; ब्रह्माण्डमहापुराण, 2.14.62; लिंगमहापुराण, 47.23-24)

‘हिमाह्वंदक्षिणंवर्षं भरतायपिताददौ ।

तस्मात्तु भारतंवर्षं तस्यनाम्नामहात्मनः ।।’

(मार्कण्डेयमहापुराण, 50.40-41)

‘इदं हैमवतं वर्षं भारतं नाम विश्रुतम् ।।’

(मत्स्यमहापुराण, 113.28)

पाश्चात्य इतिहासकारों को तो यह सिद्ध करना था कि यह देश (भारतवर्ष) बहुत प्राचीन नहीं है, केवल पाँच हज़ार वर्ष का ही इसका इतिहास है। इसलिए उन्होंने बताया कि स्वायम्भुव मनु, प्रियव्रत, नाभि, ऋषभदेव, आदि तो कभी हुए ही नहीं, ये सब पुराणों की कल्पनाएँ हैं । ‘पुराणों के विद्वान्’ (?) कहे जानेवाले फ्रेडरिक ईडन पार्जीटर (1852-1927) ने अपने ग्रन्थ ‘Ancient Indian Historical Tradition’ (Oxford University Press, London, 1922) में स्वायम्भुव मनु से चाक्षुस मनु तक के इतिहास को लुप्त कर दिया। दुर्भाग्य की बात है कि हमारे देश के अनेक स्वनामधन्य इतिहासकारों ने भी पाश्चात्यों का अंधानुकरण करते हुए हमारी प्राचीन परम्परा को बर्बादकर दुष्यन्तपुत्र भरत के नाम से ही अपने देश का नामकरण माना।

डा. राधाकुमुद मुखर्जी-जैसे विद्वान् तक ने अपने ग्रन्थ ‘Fundamental Unity of India’ (Bharatiya Vidya Bhawan, Bombay) में लगता है सुनी-सुनाई बातों के आधार पर ही दुष्यन्तपुत्र भरत के नाम से अपने देश का नामकरण माना है। कहाँ तक कहा जाए ! आधुनिक काल के इतिहासकारों ने किस प्रकार भारतीय इतिहास का सर्वनाश किया है, यह व्यापक अनुसन्धान का विषय है।

‘भारतवर्ष’ शब्द की व्युत्पत्ति बताते हुए श्रीश्री आनन्दमूर्ति (प्रभात रंजन सरकार: 1921-1990) ने लिखा है : ‘दो धातुओं का योग- भर् भरणे तथा तन् विस्तारे। भर्+अल् एवं तन्+ऽ से ‘भारत’ शब्द बना है। ‘भर’ का अर्थ है भरण-पोषण करनेवाला एवं ‘तन्’ माने विस्तार करनेवाला, क्रम-क्रम से बढ़नेवाला…. इस तरह ‘भारत’ शब्द बना । वर्ष का अर्थ है भूमि। अतः इस भूमिखण्ड के लिए ‘भारतवर्ष’ नाम अत्यन्त सार्थक है ।’ (महाभारत की कथाएँ, पृष्ठ 7, आनन्दमार्ग प्रचारक संघ, कलकत्ता, 1981 ई.)

गोस्वामी तुलसीदास (1497-1623) ने भी ‘भरत’ के नामकरण-प्रसंग में उल्लेख किया है—

‘बिस्व भरन पोषन कर जोई । ताकर नाम भरत अस होई ।’

(श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, 196.7)

अस्तु ! हमारे किसी भी ग्रन्थ में दुष्यन्तपुत्र भरत से ‘भारत’ नामकरण की बात नहीं कही गयी है । चन्द्रवंशीय दुष्यन्तपुत्र भरत वैवस्वत मन्वन्तर के 16वें सत्ययुग (5.4005 करोड वर्ष पूर्व) में हुए थे जबकि देश का नामकरण ‘भारतवर्ष’ स्वायम्भुव मन्वन्तर (1.955885 अरब वर्ष पूर्व) में ही हो चुका था। हाँ, दुष्यन्तपुत्र भरत के नाम पर क्षत्रियों की एक शाखा ‘भरतवंश’ अवश्य प्रचलित हुई जिसके कारण अर्जुन, धृतराष्ट्र आदि को ‘भारत’ कहा गया है और यह महाभारत (आदिपर्व, 74.123) के—

‘………………….येनेदं भारतं कुलम् ।

अपरे ये च पूर्वे वै भारता इति विश्रुताः ।।’

से भी स्पष्ट है । ‘भारता’ शब्द बहुवचन है अतएव बहुत-से मनुष्यों का वाचक है । कुल तो स्पष्ट है ही ।  महाकवि कालिदास ने भी अपने ग्रन्थ ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ में दुष्यन्तपुत्र भरत के नाम पर अपने देश का नामकरण होने की बात नहीं कही है।

एक ज्ञान की मिसाल जड़ भारत

दूसरी त्याग, प्रेम और कर्तव्य की मिसाल श्री राम के भाई भारत

तीसरा सौर्य की मिसाल सकुन्तला  का भारत

इन तीनो विचारधारा से ये भारत हुआ।

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आरएसएस की प्रार्थना व उसका हिन्दी भाषा में अर्थ।

आरएसएस की प्रार्थना व उसका हिन्दी भाषा में अर्थ।

नमस्ते सदा वत्सले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना है। सम्पूर्ण प्रार्थना संस्कृत में है केवल इसकी अन्तिम पंक्ति (भारत माता की जय!) हिन्दी में है।

इस प्रार्थना की रचना नरहरि नारायण भिड़े[1] ने फरवरी १९३९ में की थी। इसे सर्वप्रथम २३ अप्रैल १९४० को पुणे के संघ शिक्षा वर्ग में गाया गया था। यादव राव जोशी ने इसे सुर प्रदान किया था।

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम्।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥ १॥
प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयम्
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये।
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं
स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत्॥ २॥
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम्।
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥ ३॥
॥ भारत माता की जय ॥

प्रार्थना का हिन्दी में अर्थ:

हे वात्सल्यमयी मातृभूमि, तुम्हें सदा प्रणाम! इस
मातृभूमि ने हमें अपने बच्चों की तरह स्नेह और
ममता दी है। इस हिन्दू भूमि पर सुखपूर्वक मैं
बड़ा हुआ हूँ। यह भूमि महा मंगलमय और पुण्यभूमि है।
इस भूमि की रक्षा के लिए मैं यह नश्वर
शरीर मातृभूमि को अर्पण करते हुए इस भूमि को
बार-बार प्रणाम करता हूँ।
हे सर्व शक्तिमान परमेश्वर, इस हिन्दू राष्ट्र के घटक के
रूप में मैं तुमको सादर प्रणाम करता हूँ। आपके ही
कार्य के लिए हम कटिबद्ध हुवे है। हमें इस कार्य को पूरा
करने किये आशीर्वाद दे। हमें ऐसी
अजेय शक्ति दीजिये कि सारे विश्व मे हमे कोई न
जीत सकें और ऐसी नम्रता दें कि पूरा
विश्व हमारी विनयशीलता के सामने
नतमस्तक हो। यह रास्ता काटों से भरा है, इस कार्य को
हमने स्वयँ स्वीकार किया है और इसे सुगम कर
काँटों रहित करेंगे।
ऐसा उच्च आध्यात्मिक सुख और ऐसी महान
ऐहिक समृद्धि को प्राप्त करने का एकमात्र श्रेष्ट साधन उग्र
वीरव्रत की भावना हमारे अन्दर सदेव
जलती रहे। तीव्र और अखंड ध्येय
निष्ठा की भावना हमारे अंतःकरण में
जलती रहे। आपकी
असीम कृपा से हमारी यह
विजयशालिनी संघठित कार्यशक्ति हमारे धर्म का
सरंक्षण कर इस राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने में समर्थ
॥ भारत माता की जय॥

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हनुमान चालीसा में एक श्लोक है:-

हनुमान चालीसा में एक श्लोक है:-

जुग (युग) सहस्त्र जोजन (योजन) पर भानु |

लील्यो ताहि मधुर फल जानू ||

अर्थात हनुमानजी ने

एक युग सहस्त्र योजन दूरी पर

स्थित भानु अर्थात सूर्य को

मीठा फल समझ के खा लिया था |


1 युग = 12000 वर्ष

1 सहस्त्र = 1000

1 योजन = 8 मील


युग x सहस्त्र x योजन = पर भानु

12000 x 1000 x 8 मील = 96000000 मील


1 मील = 1.6 किमी

96000000 x 1.6 = 1536000000 किमी


अर्थात हनुमान चालीसा के अनुसार

सूर्य पृथ्वी से 1536000000 किमी  की दूरी पर है |

NASA के अनुसार भी सूर्य पृथ्वी से बिलकुल इतनी ही दूरी पर है|


इससे पता चलता है की हमारा पौराणिक साहित्य कितना सटीक एवं वैज्ञानिक है ,

इसके बावजूद इनको बहुत कम महत्व दिया जाता है |


भारत के प्राचीन साहित्य की सत्यता को प्रमाणित करने वाली ये जानकारी अवश्य शेयर करें |

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अगर हिंदू धर्म बुरा है :-

अगर हिंदू धर्म बुरा है :-

(1) तो क्यो


ने माना की




” ॐ ”

”  ”

की आवाज निकलती है?

(2) क्यो ‘अमेरिका’ ने

“भारतीय – देशी – गौमुत्र”  पर

4 Patent लिया ,


कैंसर और दूसरी बिमारियो के

लिये दवाईया बना रहा है ?

जबकी हम

”  गौमुत्र  ”

का महत्व

हजारो साल पहले से जानते है,


(3) क्यो अमेरिका के

‘सेटन-हाल-यूनिवर्सिटी’ मे


पढाई जा रही है?


(4) क्यो इस्लामिक देश  ‘इंडोनेशिया’.       के Aeroplane का नाम

“भगवान नारायण के वाहन गरुड” के नाम पर  “Garuda Indonesia”  है, जिसमे  garuda  का symbol भी है?


(5) क्यो इंडोनेशिया के

रुपए पर

“भगवान गणेश”

की फोटो है?


(6) क्यो  ‘बराक-ओबामा’  हमेशा अपनी जेब मे


की फोटो रखते है?


(7) क्यो आज

पूरी दुनिया


की दिवानी है?


(8) क्यो  भारतीय-हिंदू-वैज्ञानीको”


‘ हजारो साल पहले ही ‘

बता दिया  की

धरती गोल है ?


(9) क्यो जर्मनी के Aeroplane का



है ?


(10) क्यो हिंदुओ के नाम पर  ‘अफगानिस्थान’  के पर्वत का नाम

“हिंदूकुश”  है?

(11) क्यो हिंदुओ के नाम पर

हिंदी भाषा,


हिंद महासागर

ये सभी नाम है?


(12) क्यो  ‘वियतनाम देश’  मे

“Visnu-भगवान”  की

4000-साल पुरानी मूर्ति पाई



(13) क्यो अमेरिकी-वैज्ञानीक

Haward ने,

शोध के बाद माना –



“गायत्री मंत्र मे  ” 110000 freq ”


के कंपन है?


(14) क्यो  ‘बागबत की बडी मस्जिद के इमाम’



पढने के बाद हिंदू-धर्म अपनाकर,

“महेंद्रपाल आर्य”  बनकर,

हजारो मुस्लिमो को हिंदू बनाया,

और वो कई-बार

‘जाकिर-नाईक’ से

Debate के लिये कह चुके है,

मगर जाकिर की हिम्म्त नही हुइ,


(15) अगर हिंदू-धर्म मे



अंधविश्वास है,

तो ,

क्यो  ‘भोपाल-गैस-कांड’   मे,

जो    “कुशवाह-परिवार”  एकमात्र बचा,

जो उस समय   यज्ञ   कर रहा था,


(16) ‘गोबर-पर-घी जलाने से’

“१०-लाख-टन आक्सीजन गैस”

बनती है,


(17) क्यो “Julia Roberts”

(American actress and producer)

ने हिंदू-धर्म

अपनाया और

वो हर रोज


जाती है,





झूठा है,

तो क्यो दुनियाभर मे केवल


के ही पत्थर आज भी तैरते है?


(19) अगर  “महाभारत”  झूठा है,

तो क्यो भीम के पुत्र ,


का विशालकाय कंकाल,

वर्ष 2007 में

‘नेशनल-जिओग्राफी’ की टीम ने,

‘भारतीय-सेना की सहायता से’

उत्तर-भारत के इलाके में खोजा?


(20) क्यो अमेरिका के सैनिकों को,

अफगानिस्तान (कंधार) की एक

गुफा में ,

5000 साल पहले का,



मिला है?


ये जानकारिया आप खुद google मे search कर

सकते है . …..

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क्या आपने कभी इन पश्चिमी philosophers को पढ़ा है:

क्या आपने कभी इन पश्चिमी philosophers को पढ़ा है:

1. लियो टॉल्स्टॉय (1828 -1910):

“हिन्दू और हिन्दुत्व ही एक दिन दुनिया पर राज करेगी, क्योंकि इसी में ज्ञान और बुद्धि का संयोजन है”।

2. हर्बर्ट वेल्स (1846 – 1946):

” हिन्दुत्व का प्रभावीकरण फिर होने तक अनगिनत कितनी पीढ़ियां अत्याचार सहेंगी और जीवन कट जाएगा । तभी एक दिन पूरी दुनिया उसकी ओर आकर्षित हो जाएगी, उसी दिन ही दिलशाद होंगे और उसी दिन दुनिया आबाद होगी । सलाम हो उस दिन को “।

3. अल्बर्ट आइंस्टीन (1879 – 1955):

“मैं समझता हूँ कि हिन्दूओ ने अपनी बुद्धि और जागरूकता के माध्यम से वह किया जो यहूदी न कर सके । हिन्दुत्व मे ही वह शक्ति है जिससे शांति स्थापित हो सकती है”।

4. हस्टन स्मिथ (1919):

“जो विश्वास हम पर है और इस हम से बेहतर कुछ भी दुनिया में है तो वो हिन्दुत्व है । अगर हम अपना दिल और दिमाग इसके लिए खोलें तो उसमें हमारी ही भलाई होगी”।

5. माइकल नोस्टरैडैमस (1503 – 1566):

” हिन्दुत्व ही यूरोप में शासक धर्म बन जाएगा बल्कि यूरोप का प्रसिद्ध शहर हिन्दू राजधानी बन जाएगा”।

6. बर्टरेंड रसेल (1872 – 1970):

“मैंने हिन्दुत्व को पढ़ा और जान लिया कि यह सारी दुनिया और सारी मानवता का धर्म बनने के लिए है । हिन्दुत्व पूरे यूरोप में फैल जाएगा और यूरोप में हिन्दुत्व के बड़े विचारक सामने आएंगे । एक दिन ऐसा आएगा कि हिन्दू ही दुनिया की वास्तविक उत्तेजना होगा “।

7. गोस्टा लोबोन (1841 – 1931):

” हिन्दू ही सुलह और सुधार की बात करता है । सुधार ही के विश्वास की सराहना में ईसाइयों को आमंत्रित करता हूँ”।

8. बरनार्ड शा (1856 – 1950):

“सारी दुनिया एक दिन हिन्दू धर्म स्वीकार कर लेगी । अगर यह वास्तविक नाम स्वीकार नहीं भी कर सकी तो रूपक नाम से ही स्वीकार कर लेगी। पश्चिम एक दिन हिन्दुत्व स्वीकार कर लेगा और हिन्दू ही दुनिया में पढ़े लिखे लोगों का धर्म होगा “।

9. जोहान गीथ (1749 – 1832):

“हम सभी को अभी या बाद मे हिन्दू धर्म स्वीकार करना ही होगा । यही असली धर्म है ।मुझे कोई हिन्दू कहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा, मैं यह सही बात को स्वीकार करता हूँ ।”