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एक श्लोकी रामायण : Ek shloki RAMAYAN


एक श्लोकी रामायण : Ek shloki RAMAYAN

श्री राम चरित मानस के अयोध्या काण्ड में श्लोक संख्या ३ एक श्लोकी रामायण कहलाती है | इसमें श्री राम के जीवन की चारो अवस्थाओं  का वर्णन है |

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नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं = नीले कमल के समान जिनके कोमल अंग है अर्थात बाल्यावस्था
सीतासमारोपितवामभागम् =सीता जी वाम भाग में है अर्थात विवाह समारोह
पाणौ महासायकचारुचापं =जिनके हाथ में अमोघ बाड़ और धनुष है अर्थात रावन से युद्ध

नमामि रामं रघुवंशनाथम्  =रघुवंश के स्वामी को प्रणाम  अर्थात रामराज्य स्थापित

ADUV speaks

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दो प्रकार के शत्रुओं को कभी क्षमा नहीं करना चाहि


द्रौपदी का नीति-ज्ञान

दो प्रकार के शत्रुओं को कभी क्षमा नहीं करना चाहिएः–

महाभारत में जब जयद्रथ ने द्रौपदी से अनाचार किया, तब युधिष्ठिर ने यह कहकर उसे क्षमा कर दिया कि वह हमारा रिश्तेदार है। इस दुष्ट रिश्तेदार ने युधिष्ठिर को ही मजा चखा दिया। कुरुक्षेत्र के मैदान में इस दुष्ट जयद्रथ के कारण ही अभिमन्यु मृत्यु का ग्रास बना।

जब जयद्रथ को युधिष्ठिर ने प्राणदान देने की बात कही तब द्रौपदी ने बहुत दूरदर्शितापूर्ण और नीतिमत्ता का परामर्श देते हुए कहाः—

राजन्, शत्रुओं को क्षमा भी किया जाता है, किन्तु दो प्रकार के शत्रुओं को कभी क्षमा नहीं करनी चाहिए, वे दो शत्रु कौन है—सुनिएः–

“भार्याभिहर्त्ता वैरी यो यश्च राज्यहरो रिपुः।
याचमानोsपि संग्रामे न मोक्तव्यः कदाचन।।” (म.भा.वनपर्व-85.46)

जो शत्रु स्त्रियों का अपहरण करना चाहे, उसे और जो राज्य को छिनना चाहे, उसे, ये दो प्रकार के शत्रु क्षमा-कोटि में नहीं आते।

किन्तु युधिष्ठिर ने भावुकता में किसी की नहीं सुनी और जयद्रथ को छुडवा दिया। किन्तु द्रौपदी की बात आगे चलकर अक्षरशः ठीक निकली और जयद्रथ का क्षमादान अभिमन्यु के वध का कारण बना।

युद्ध में जिन महारथियों ने मिलकर निहत्थे अभिमन्यु पर आक्रमण किया, उनमें सबसे प्रमुख जयद्रथ ही था। यह सब युधिष्ठिर की अदूरदर्शिता के कारण हुआ।

इतिहास साक्षी है कि अन्तिम हिन्दू सम्राट् महाराज पृथ्वी सिंह चौहान ने राज्य के लोभी मुहम्मद गोरी को एक बार तो क्या, 17 बार क्षमा कर दिया।

यह क्षमादान भारतवर्ष के लिए नासूर बन गया और भारत 1000 वर्षों के लिए गुलाम बन गया ।

आज भी चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश क्षमादान भारत की ओर से पा रहा है।

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पाण्डव


पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं –
1. युधिष्ठिर 2. भीम 3. अर्जुन
4. नकुल। 5. सहदेव

( इन पांचों के अलावा , महाबली कर्ण भी कुंती के ही पुत्र थे , परन्तु उनकी गिनती पांडवों में नहीं की जाती है )

यहाँ ध्यान रखें कि… पाण्डु के उपरोक्त पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन
की माता कुन्ती थीं ……तथा , नकुल और सहदेव की माता माद्री थी ।

वहीँ …. धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र…..
कौरव कहलाए जिनके नाम हैं –
1. दुर्योधन 2. दुःशासन 3. दुःसह
4. दुःशल 5. जलसंघ 6. सम
7. सह 8. विंद 9. अनुविंद
10. दुर्धर्ष 11. सुबाहु। 12. दुषप्रधर्षण
13. दुर्मर्षण। 14. दुर्मुख 15. दुष्कर्ण
16. विकर्ण 17. शल 18. सत्वान
19. सुलोचन 20. चित्र 21. उपचित्र
22. चित्राक्ष 23. चारुचित्र 24. शरासन
25. दुर्मद। 26. दुर्विगाह 27. विवित्सु
28. विकटानन्द 29. ऊर्णनाभ 30. सुनाभ
31. नन्द। 32. उपनन्द 33. चित्रबाण
34. चित्रवर्मा 35. सुवर्मा 36. दुर्विमोचन
37. अयोबाहु 38. महाबाहु 39. चित्रांग 40. चित्रकुण्डल41. भीमवेग 42. भीमबल
43. बालाकि 44. बलवर्धन 45. उग्रायुध
46. सुषेण 47. कुण्डधर 48. महोदर
49. चित्रायुध 50. निषंगी 51. पाशी
52. वृन्दारक 53. दृढ़वर्मा 54. दृढ़क्षत्र
55. सोमकीर्ति 56. अनूदर 57. दढ़संघ 58. जरासंघ 59. सत्यसंघ 60. सद्सुवाक
61. उग्रश्रवा 62. उग्रसेन 63. सेनानी
64. दुष्पराजय 65. अपराजित
66. कुण्डशायी 67. विशालाक्ष
68. दुराधर 69. दृढ़हस्त 70. सुहस्त
71. वातवेग 72. सुवर्च 73. आदित्यकेतु
74. बह्वाशी 75. नागदत्त 76. उग्रशायी
77. कवचि 78. क्रथन। 79. कुण्डी
80. भीमविक्र 81. धनुर्धर 82. वीरबाहु
83. अलोलुप 84. अभय 85. दृढ़कर्मा
86. दृढ़रथाश्रय 87. अनाधृष्य
88. कुण्डभेदी। 89. विरवि
90. चित्रकुण्डल 91. प्रधम
92. अमाप्रमाथि 93. दीर्घरोमा
94. सुवीर्यवान 95. दीर्घबाहु
96. सुजात। 97. कनकध्वज
98. कुण्डाशी 99. विरज
100. युयुत्सु

( इन 100 भाइयों के अलावा कौरवों की एक बहनभी थी… जिसका नाम””दुशाला””था,
जिसका विवाह”जयद्रथ”सेहुआ था )

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आप सबने DD1 पर किसी समय BR Chopra का महाभारत सीरीयल देखा होगा ।


आप सबने DD1 पर किसी समय BR Chopra का महाभारत सीरीयल देखा होगा । जिसमें अर्जुण का किरदार फिरोज़ खान, कुंती का किरदार नाज़नीन खान, भीष्म का किरदार मुकेश खन्ना, भीम का किरदार प्रवीण कुमार, कर्ण का किरदार पंकज धीर, कृष्ण का किरदार नितिश भारद्वाज ने निभाया था आदि ।

तो इस महाभारत सीरीयल में केवल भीष्म के अभिनय मात्र से ही मुकेश खन्ना जी में इतना स्वाभिमान आया कि उन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने का संकल्प लिया है और वो हर बात में स्वाभिमान का ध्यान रखते हैं । तो महाभारत की समाप्ती के बाद उन्होंने फिल्मों में भी स्वाभिमानी क्षत्रीय राजपूत का ही अभिनय किया है ।

फिरोज़ खान एक मुसलमान हैं जिसने बहुत सी पंजाबी और हिंदी फिल्मों में खल्नायक की भूमिका निभाई है । वो भी अर्जुण के किरदार से ऐसा प्रभावित हुए कि उन्होंने ईस्लाम छोड़ कर वैदिक धर्मी बनना स्विकार किया और अपना वास्तविक नाम भी अर्जुण ही रख लिया ।

नाज़नीन खान एक मुस्लिम अभिनेत्री हैं जिन्होंने केवल ये महाभारत सीरीयल ही किया इससे उनके मन में ईस्लाम के स्थान पर आर्यों का वो स्वाभिमान भर गया जो महाभारत के समय था । और उन्होंने भी ईस्लाम को त्याग करके सनातन धर्म में वापसी की है ।

तो मित्रों आप समझ सकते हैं कि आर्यों का स्वाभिमान महाभारतकाल तक कितना ऊँचा था ? जिसके केवल अभिनय मात्र से ही इन लोगों को परिवर्तित कर दिया है तो सोचो यदि वही प्राचीन स्वाभिमान पुनः आ जाए तो कितने लोग परिवर्तित हो जायेंगे ? और राष्ट्र में कैसा परिवर्तन आ सकेगा ?

सीख हम बीते युगों से नए युग का करें स्वागत…

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कर्मों का फल


कर्मों का फल

बात प्राचीन महाभारत काल की है। महाभारत के युद्ध में जो कुरुक्षेत्र के मैंदान में हुआ, जिसमें अठारह अक्षौहणी सेना मारी गई, इस युद्ध के समापन और सभी मृतकों को तिलांज्जलि देने के बाद पांडवों सहित श्री कृष्ण पितामह भीष्म से आशीर्वाद लेकर हस्तिनापुर को वापिस हुए तब श्रीकृष्ण को रोक कर पितामाह ने श्रीकृष्ण से पूछ ही लिया, “मधुसूदन, मेरे कौन से कर्म का फल है जो मैं सरसैया पर पड़ा हुआ हूँ?” यह बात सुनकर मधुसूदन मुस्कराये और पितामह भीष्म से पूछा, ‘पितामह आपको कुछ पूर्व जन्मों का ज्ञान है?” इस पर पितामह ने कहा, ‘हाँ”। श्रीकृष्ण मुझे अपने सौ पूर्व जन्मों का ज्ञान है कि मैंने किसी व्यक्ति का कभी अहित नहीं किया? इस पर श्रीकृष्ण मुस्कराये और बोले पितामह आपने ठीक कहा कि आपने कभी किसी को कष्ट नहीं दिया, लेकिन एक सौ एक वें पूर्वजन्म में आज की तरह तुमने तब भी राजवंश में जन्म लिया था और अपने पुण्य कर्मों से बार-बार राजवंश में जन्म लेते रहे, लेकिन उस जन्म में जब तुम युवराज थे, तब एक बार आप शिकार खेलकर जंगल से निकल रहे थे, तभी आपके घोड़े के अग्रभाग पर एक करकैंटा एक वृक्ष से नीचे गिरा। आपने अपने बाण से उठाकर उसे पीठ के पीछे फेंक दिया, उस समय वह बेरिया के पेड़ पर जा कर गिरा और बेरिया के कांटे उसकी पीठ में धंस गयेऋ क्योंकि पीठ के बल ही जाकर गिरा था? करकेंटा जितना निकलने की कोशिश करता उतना ही कांटे उसकी पीठ में चुभ जाते और इस प्रकार करकेंटा अठारह दिन जीवित रहा और यही ईश्वर से प्रार्थना करता रहा, ‘हे युवराज! जिस तरह से मैं तड़प-तड़प कर मृत्यु को प्राप्त हो रहा हूँ, ठीक इसी प्रकार तुम भी होना।” तो, हे पितामह भीष्म! तुम्हारे पुण्य कर्मों की वजह से आज तक तुम पर करकेंटा का श्राप लागू नहीं हो पाया। लेकिन हस्तिनापुर की राज सभा में द्रोपदी का चीर-हरण होता रहा और आप मूक दर्शक बनकर देखते रहे। जबकि आप सक्षम थे उस अबला पर अत्याचार रोकने में, लेकिन आपने दुर्योधन और दुःशासन को नहीं रोका। इसी कारण पितामह आपके सारे पुण्यकर्म क्षीण हो गये और करकेंटा का ‘श्राप’ आप पर लागू हो गया। अतः पितामह प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्मों का फल कभी न कभी तो भोगना ही पड़ेगा। प्रकृति सर्वोपरि है, इसका न्याय सर्वोपरि और प्रिय है। इसलिए पृथ्वी पर निवास करने वाले प्रत्येक प्राणी व जीव जन्तु को भी भोगना पड़ता है और कर्मों के ही अनुसार ही जन्म होता है

कर्मों का फल 

बात प्राचीन महाभारत काल की है। महाभारत के युद्ध में जो कुरुक्षेत्र के मैंदान में हुआ, जिसमें अठारह अक्षौहणी सेना मारी गई, इस युद्ध के समापन और सभी मृतकों को तिलांज्जलि देने के बाद पांडवों सहित श्री कृष्ण पितामह भीष्म से आशीर्वाद लेकर हस्तिनापुर को वापिस हुए तब श्रीकृष्ण को रोक कर पितामाह ने श्रीकृष्ण से पूछ ही लिया, "मधुसूदन, मेरे कौन से कर्म का फल है जो मैं सरसैया पर पड़ा हुआ हूँ?'' यह बात सुनकर मधुसूदन मुस्कराये और पितामह भीष्म से पूछा, 'पितामह आपको कुछ पूर्व जन्मों का ज्ञान है?'' इस पर पितामह ने कहा, 'हाँ''। श्रीकृष्ण मुझे अपने सौ पूर्व जन्मों का ज्ञान है कि मैंने किसी व्यक्ति का कभी अहित नहीं किया? इस पर श्रीकृष्ण मुस्कराये और बोले पितामह आपने ठीक कहा कि आपने कभी किसी को कष्ट नहीं दिया, लेकिन एक सौ एक वें पूर्वजन्म में आज की तरह तुमने तब भी राजवंश में जन्म लिया था और अपने पुण्य कर्मों से बार-बार राजवंश में जन्म लेते रहे, लेकिन उस जन्म में जब तुम युवराज थे, तब एक बार आप शिकार खेलकर जंगल से निकल रहे थे, तभी आपके घोड़े के अग्रभाग पर एक करकैंटा एक वृक्ष से नीचे गिरा। आपने अपने बाण से उठाकर उसे पीठ के पीछे फेंक दिया, उस समय वह बेरिया के पेड़ पर जा कर गिरा और बेरिया के कांटे उसकी पीठ में धंस गयेऋ क्योंकि पीठ के बल ही जाकर गिरा था? करकेंटा जितना निकलने की कोशिश करता उतना ही कांटे उसकी पीठ में चुभ जाते और इस प्रकार करकेंटा अठारह दिन जीवित रहा और यही ईश्वर से प्रार्थना करता रहा, 'हे युवराज! जिस तरह से मैं तड़प-तड़प कर मृत्यु को प्राप्त हो रहा हूँ, ठीक इसी प्रकार तुम भी होना।'' तो, हे पितामह भीष्म! तुम्हारे पुण्य कर्मों की वजह से आज तक तुम पर करकेंटा का श्राप लागू नहीं हो पाया। लेकिन हस्तिनापुर की राज सभा में द्रोपदी का चीर-हरण होता रहा और आप मूक दर्शक बनकर देखते रहे। जबकि आप सक्षम थे उस अबला पर अत्याचार रोकने में, लेकिन आपने दुर्योधन और दुःशासन को नहीं रोका। इसी कारण पितामह आपके सारे पुण्यकर्म क्षीण हो गये और करकेंटा का 'श्राप' आप पर लागू हो गया। अतः पितामह प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्मों का फल कभी न कभी तो भोगना ही पड़ेगा। प्रकृति सर्वोपरि है, इसका न्याय सर्वोपरि और प्रिय है। इसलिए पृथ्वी पर निवास करने वाले प्रत्येक प्राणी व जीव जन्तु को भी भोगना पड़ता है और कर्मों के ही अनुसार ही जन्म होता है
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अर्जुन ने युधिष्ठिर पर उठा ली थी तलवार….जब ….


अर्जुन ने युधिष्ठिर पर उठा ली थी तलवार….जब ….
स्रोत: महाभारत का कर्ण पर्व
यह प्रसंग कुछ इस प्रकार है कि महाभारत के युद्ध के दौरान जब कर्ण कौरव सेना के सेनापति थे, उस समय कर्ण और युधिष्ठिर में भयंकर युद्ध हुआ। युद्ध में कर्ण ने युधिष्ठिर को घायल कर दिया। घायल युधिष्ठिर अपने शिविर में आराम कर रहे थे, उसी समय अर्जुन व श्रीकृष्ण उनसे मिलने पहुंचे। युधिष्ठिर को लगा कि अर्जुन ने कर्ण का वध कर दिया है। इसलिए वह मुझसे मिलने आया है, लेकिन जब युधिष्ठिर को पता लगा कि कर्ण जीवित है, तो उन्होंने अर्जुन से उनके शस्त्र दूसरे को देने के लिए कहा।
अर्जुन ने प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई मुझसे शस्त्र दूसरे को देने के लिए कहेगा, मैं उसका वध कर दूंगा। प्रतिज्ञा का पालन करते हुए अर्जुन ने युधिष्ठिर का वध करने के लिए जैसे ही अपनी तलवार उठाई, श्रीकृष्ण ने उन्हें रोक लिया। इसके बाद अर्जुन ने युधिष्ठिर को अपशब्द भी कहे। तब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर और अर्जुन को समझा कर यह विवाद समाप्त किया और अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा भी पूर्ण की।
अर्जुन द्वारा युधिष्ठिर का वध करने के लिए शस्त्र उठाने का प्रसंग महाभारत के कर्ण पर्व में मिलता है। सेनापति बनते ही कर्ण ने पांडवों की सेना में खलबली मचा दी। कर्ण द्वारा अपनी सेना का सफाया होते देख युधिष्ठिर को भी क्रोध आ गया और वे कौरवों की सेना का नाश करने लगे। तब दुर्योधन ने कर्ण को कहा कि वह युधिष्ठिर को बंदी बना ले।
कर्ण और युधिष्ठिर के बीच भीषण युद्ध हुआ। कर्ण ने अपने तीखे बाणों से युधिष्ठिर को घायल कर दिया। युधिष्ठिर को घायल देख सारथी उन्हें युद्ध से दूर ले गया। युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए दुर्योधन आदि महारथी उनके पीछे दौड़े, लेकिन नकुल और सहदेव ने पराक्रम दिखाकर उन्हें रोक लिया। कर्ण से पराजित होकर युधिष्ठिर को बड़ी लज्जा आ रही थी।
घायल युधिष्ठिर को नकुल-सहदेव छावनी लेकर आए और उपचार करने लगे। कर्ण द्वारा युधिष्ठिर की पराजय का समाचार जब अर्जुन को पता लगा, तो उन्हें बहुत दु:ख हुआ और वे श्रीकृष्ण के साथ अपने बड़े भाई युधिष्ठिर को देखने उनकी छावनी में पहुंचे। अर्जुन और श्रीकृष्ण को एक साथ देखकर धर्मराज युधिष्ठिर ने समझा कि अर्जुन ने कर्ण का वध कर मेरी पराजय का बदला ले लिया है।
यह सोचकर वे बहुत प्रसन्न हुए और उन्होने अर्जुन को गले लगा लिया, लेकिन बाद में जब युधिष्ठिर का ज्ञात हुआ कि अर्जुन ने कर्ण का वध नहीं किया है, तो उन्हें अर्जुन पर बहुत क्रोध आया और युधिष्ठिर ने अर्जुन को अपने शस्त्र दूसरे को देने के लिए कह दिया। यह सुनते ही अर्जुन को बहुत क्रोध आया और उसने धर्मराज युधिष्ठिर को मारने के लिए तलवार उठा ली।
अर्जुन ने जैसे ही युधिष्ठिर को मारने के लिए तलवार उठाई, श्रीकृष्ण उसकी मंशा ताड़ गए और उन्होंने अर्जुन को रोक दिया। तब अर्जुन ने श्रीकृष्ण को बताया कि मैंने गुप्त रूप से यह प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई मुझसे ऐसा कहेगा कि तुम अपना गांडीव दूसरे को दे डालो, मैं उसका सिर काट लूंगा। इसलिए धर्मराज का वध करने के लिए मैं प्रतिज्ञाबद्ध हूं। अर्जुन की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने उसे धर्म-अधर्म का ज्ञान दिया।
तब अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा कि कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरी प्रतिज्ञा भी पूरी हो जाए और मैं भाई की हत्या के अपराध से भी बच जाऊं। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि सम्माननीय पुरुष जब तक सम्मान पाता है, तब तक ही उसका जीवित रहना माना जाता है। जिस दिन उसका बहुत बड़ा अपमान हो जाए, उस समय वह जीते-जी मरा समझा जाता है। तुमने सदा ही धर्मराज युधिष्ठिर का सम्मान किया है। आज तुम उनका थोड़ा अपमान कर दो।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि बड़े भाई होने के कारण युधिष्ठिर तुम्हारे लिए पूजनीय हैं और आप कहने योग्य हैं। शास्त्रों के अनुसार यदि तुम इन्हें तू कह दोगे तब भी यह धर्मराज का वध करना ही होगा। गुरुजन या सम्माननीय व्यक्ति को तू कह देना उनका वध कर देने के ही समान है। भगवान श्रीकृष्ण की बात सुनकर अर्जुन ने युधिष्ठिर को ऐसे कटुवचन कहे, जैसे पहले कभी नहीं कहे थे।
अर्जुन धर्म से डरने वाले थे। वे युधिष्ठिर को ऐसी कठोर बातें कहकर बहुत उदास हो गए और स्वयं आत्महत्या करने को उतारू हो गए। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पुन: समझाया कि भाई का वध करने से जिस नरक की प्राप्ति होती है, उससे भी भयानक नरक तुम्हें आत्मघात करने से मिलेगा। इसलिए अब तुम अपने ही मुंह से अपने गुणों का बखान करो, ऐसा करने से यही समझा जाएगा कि तुमने अपने ही हाथों अपने को मार लिया। श्रीकृष्ण की बात सुनकर अर्जुन ने अपने गुणों का खूब बखान किया और अपने हथियार और धनुष नीचे डाल दिए। फिर युधिष्ठिर के चरणों में सिर झुकाया और हाथ जोड़कर अपने कटु वचनों के लिए क्षमा मांगी ।

जब अर्जुन ने युधिष्ठिर पर उठा ली थी तलवार........ 
स्रोत: महाभारत का कर्ण पर्व
यह प्रसंग कुछ इस प्रकार है कि महाभारत के युद्ध के दौरान जब कर्ण कौरव सेना के सेनापति थे, उस समय कर्ण और युधिष्ठिर में भयंकर युद्ध हुआ। युद्ध में कर्ण ने युधिष्ठिर को घायल कर दिया। घायल युधिष्ठिर अपने शिविर में आराम कर रहे थे, उसी समय अर्जुन व श्रीकृष्ण उनसे मिलने पहुंचे। युधिष्ठिर को लगा कि अर्जुन ने कर्ण का वध कर दिया है। इसलिए वह मुझसे मिलने आया है, लेकिन जब युधिष्ठिर को पता लगा कि कर्ण जीवित है, तो उन्होंने अर्जुन से उनके शस्त्र दूसरे को देने के लिए कहा। 
अर्जुन ने प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई मुझसे शस्त्र दूसरे को देने के लिए कहेगा, मैं उसका वध कर दूंगा। प्रतिज्ञा का पालन करते हुए अर्जुन ने युधिष्ठिर का वध करने के लिए जैसे ही अपनी तलवार उठाई, श्रीकृष्ण ने उन्हें रोक लिया। इसके बाद अर्जुन ने युधिष्ठिर को अपशब्द भी कहे। तब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर और अर्जुन को समझा कर यह विवाद समाप्त किया और अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा भी पूर्ण की।
अर्जुन द्वारा युधिष्ठिर का वध करने के लिए शस्त्र उठाने का प्रसंग महाभारत के कर्ण पर्व में मिलता है। सेनापति बनते ही कर्ण ने  पांडवों की सेना में खलबली मचा दी। कर्ण द्वारा अपनी सेना का सफाया होते देख युधिष्ठिर को भी क्रोध आ गया और वे कौरवों की सेना का नाश करने लगे। तब दुर्योधन ने कर्ण को कहा कि वह युधिष्ठिर को बंदी बना ले। 
 कर्ण और युधिष्ठिर के बीच भीषण युद्ध हुआ। कर्ण ने अपने तीखे बाणों से युधिष्ठिर को घायल कर दिया। युधिष्ठिर को घायल देख सारथी उन्हें युद्ध से दूर ले गया। युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए दुर्योधन आदि महारथी उनके पीछे दौड़े, लेकिन नकुल और सहदेव ने पराक्रम दिखाकर उन्हें रोक लिया। कर्ण से पराजित होकर युधिष्ठिर को बड़ी लज्जा आ रही थी।
घायल युधिष्ठिर को नकुल-सहदेव छावनी लेकर आए और उपचार करने लगे। कर्ण द्वारा युधिष्ठिर की पराजय का समाचार जब अर्जुन को पता लगा, तो उन्हें बहुत दु:ख हुआ और वे श्रीकृष्ण के साथ अपने बड़े भाई युधिष्ठिर को देखने उनकी छावनी में पहुंचे। अर्जुन और श्रीकृष्ण को एक साथ देखकर धर्मराज युधिष्ठिर ने समझा कि अर्जुन ने कर्ण का वध कर मेरी पराजय का बदला ले लिया है। 
यह सोचकर वे बहुत प्रसन्न हुए और उन्होने अर्जुन को गले लगा लिया, लेकिन बाद में जब युधिष्ठिर का ज्ञात हुआ कि अर्जुन ने कर्ण का वध नहीं किया है, तो उन्हें अर्जुन पर बहुत क्रोध आया और युधिष्ठिर ने अर्जुन को अपने शस्त्र दूसरे को देने के लिए कह दिया। यह सुनते ही अर्जुन को बहुत क्रोध आया और उसने धर्मराज युधिष्ठिर को मारने के लिए तलवार उठा ली।
अर्जुन ने जैसे ही युधिष्ठिर को मारने के लिए तलवार उठाई, श्रीकृष्ण उसकी मंशा ताड़ गए और उन्होंने अर्जुन को रोक दिया। तब अर्जुन ने श्रीकृष्ण को बताया कि मैंने गुप्त रूप से यह प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई मुझसे ऐसा कहेगा कि तुम अपना गांडीव दूसरे को दे डालो, मैं उसका सिर काट लूंगा। इसलिए धर्मराज का वध करने के लिए मैं प्रतिज्ञाबद्ध हूं। अर्जुन की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने उसे धर्म-अधर्म का ज्ञान दिया। 
तब अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा कि कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरी प्रतिज्ञा भी पूरी हो जाए और मैं भाई की हत्या के अपराध से भी बच जाऊं। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि सम्माननीय पुरुष जब तक सम्मान पाता है, तब तक ही उसका जीवित रहना माना जाता है। जिस दिन उसका बहुत बड़ा अपमान हो जाए, उस समय वह जीते-जी मरा समझा जाता है। तुमने सदा ही धर्मराज युधिष्ठिर का सम्मान किया है। आज तुम उनका थोड़ा अपमान कर दो।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि बड़े भाई होने के कारण युधिष्ठिर तुम्हारे लिए पूजनीय हैं और आप कहने योग्य हैं। शास्त्रों के अनुसार यदि तुम इन्हें तू कह दोगे तब भी यह धर्मराज का वध करना ही होगा। गुरुजन या सम्माननीय व्यक्ति को तू कह देना उनका वध कर देने के ही समान है। भगवान श्रीकृष्ण की बात सुनकर अर्जुन ने युधिष्ठिर को ऐसे कटुवचन कहे, जैसे पहले कभी नहीं कहे थे। 
अर्जुन धर्म से डरने वाले थे। वे युधिष्ठिर को ऐसी कठोर बातें कहकर बहुत उदास हो गए और स्वयं आत्महत्या करने को उतारू हो गए। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पुन: समझाया कि भाई का वध करने से जिस नरक की प्राप्ति होती है, उससे भी भयानक नरक तुम्हें आत्मघात करने से मिलेगा।  इसलिए अब तुम अपने ही मुंह से अपने गुणों का बखान करो, ऐसा करने से यही समझा जाएगा कि तुमने अपने ही हाथों अपने को मार लिया। श्रीकृष्ण की बात सुनकर अर्जुन ने अपने गुणों का खूब बखान किया और अपने हथियार और धनुष नीचे डाल दिए।  फिर युधिष्ठिर के चरणों में सिर झुकाया और हाथ जोड़कर अपने कटु वचनों के लिए क्षमा मांगी ।
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जयसंहिता में है मूल महाभारत


जयसंहिता में है मूल महाभारत

महाभारत अपने मूल में जयसंहिता का विशाल रूप है। वर्तमान महाभारत में एक लाख श्‍लोक हैं जबकि जयसंहिता में कुरुवंश के संघर्ष का ही रूप है। यह भी माना जा रहा है कि महाभारत अपने मूल रूप में ‘भारत’ नामक संस्‍करण के रूप में विद्यमान था। इसमें केवल 24 हजार श्‍लोक ही थे। इसका सर्वप्रथम उल्‍लेख आश्‍वलायन नामक गृह्यसूत्र में आता है। यह सूतों द्वारा कहा जाने वाला ग्रंथ था। बाद में इस पर भार्गवों का अधिकार हुआ और उन्‍हीं ने इसे राजस्‍थान के आसपास के प्रदेश में विशालकाय कर दिया। इस समय तक इस प्रदेश में यवन या ग्रीक, पहलव या पार्थियंस, चीना या चाइनीज, तुखार या तोखारियंस, हूण, रोमक या रोमंस, शक या सिथियंस प्रसारित हो चुके थे और महाभारत में उनका भी उल्‍लेख हो गया था किंतु इसकी रचना पुष्‍यमित्र शुंग के शासनकाल में निश्चित रूप से आरंभ हो चुकी थी।
धीरे धीरे इसी अठारह पर्वों की योजना खडी की गई।
जयसंहिता मूलत इसी ग्रंथ का पूर्व रूप है। केशवराम कांशीराम शास्‍त्री ने इस ग्रंथ का संपादन किया है। इसके प्रकाश में आने से महाभारत का मूलार्थ समझ में आया। हालांकि भांडारकर ऑरियंटल इंस्‍टीट्यूट, पूना ने इसका आलोचनात्‍मक संस्‍करण निकालकर हमें भारतीय सतत सृजन की परंपरा का अवबोध करवाया है।

जयसंहिता में है मूल महाभारत

महाभारत अपने मूल में जयसंहिता का विशाल रूप है। वर्तमान महाभारत में एक लाख श्‍लोक हैं जबकि जयसंहिता में कुरुवंश के संघर्ष का ही रूप है। यह भी माना जा रहा है कि महाभारत अपने मूल रूप में 'भारत' नामक संस्‍करण के रूप में विद्यमान था। इसमें केवल 24 हजार श्‍लोक ही थे। इसका सर्वप्रथम उल्‍लेख आश्‍वलायन नामक गृह्यसूत्र में आता है। यह सूतों द्वारा कहा जाने वाला ग्रंथ था। बाद में इस पर भार्गवों का अधिकार हुआ और उन्‍हीं ने इसे राजस्‍थान के आसपास के प्रदेश में विशालकाय कर दिया। इस समय तक इस प्रदेश में यवन या ग्रीक, पहलव या पार्थियंस, चीना या चाइनीज, तुखार या तोखारियंस, हूण, रोमक या रोमंस, शक या सिथियंस प्रसारित हो चुके थे और महाभारत में उनका भी उल्‍लेख हो गया था किंतु इसकी रचना पुष्‍यमित्र शुंग के शासनकाल में निश्चित रूप से आरंभ हो चुकी थी।
 धीरे धीरे इसी अठारह पर्वों की योजना खडी की गई।
जयसंहिता मूलत इसी ग्रंथ का पूर्व रूप है। केशवराम कांशीराम शास्‍त्री ने इस ग्रंथ का संपादन किया है। इसके प्रकाश में आने से महाभारत का मूलार्थ समझ में आया। हालांकि भांडारकर ऑरियंटल इंस्‍टीट्यूट, पूना ने इसका आलोचनात्‍मक संस्‍करण निकालकर हमें भारतीय सतत सृजन की परंपरा का अवबोध करवाया है।