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कल हमारे गृहमंत्री अमित शाह ने अपने मंत्रालय में ताबड़तोड़ मीटिंग्स किये और जम्मू कश्मीर में परिसीमन करने एवं परिसीमन आयोग बनाने की बात कही.

परिसीमन का मतलब होता है कि…. आबादी के और क्षेत्रफल के हिसाब से किसी भी लोकसभा अथवा विधानसभा क्षेत्र का पुनर्गठन करना.

अभी जम्मू कश्मीर के विधानसभा का परिसीमन किया जा रहा है.

असल में…. कश्मीर विधानसभा में कुल 111 सीटें हैं… लेकिन, इनमें से 24 सीटों को जम्मू-कश्मीर के संविधान के सेक्शन 47 के मुताबिक पाक अधिकृत कश्मीर के लिए खाली छोड़ गया है… और, बाकी बची 87 सीटों पर ही चुनाव होता है.

राज्य में आखिरी परिसीमन 1995 में किया गया था… और , गवर्नर जगमोहन के आदेश पर जम्मू-कश्मीर में 87 सीटों का गठन किया गया था.

अब चूंकि…. जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कुल सीटों की संख्या 87 है, सरकार बनाने के लिए किसी भी दल को 44 सीटों का बहुमत चाहिए.

झमेला यहीं पर है…..

हालांकि…. क्षेत्रफल की दृष्टि से जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कश्मीर संभाग का क्षेत्रफल राज्य के क्षेत्रफल का मात्र 15.73% है… लेकिन, यहां से कुल 46 विधायक चुने जाते हैं.

जबकि, राज्य का 25.93 फीसदी क्षेत्रफल जम्मू संभाग के अंतर्गत आता है… लेकिन, विधानसभा की मात्र 37 सीटें ही यहां से चुनी जाती है.

इसके अलावा राज्य के 58.33% क्षेत्रफल वाले लद्दाख संभाग में 4 विधानसभा सीटें हैं.

इसी गिनती में बहुत बड़ा झोल है क्योंकि….

इसमें …. कश्मीर घाटी जो कि मुस्लिम बहुत क्षेत्र है में मात्र 25,000 लोगों पर ही एक विधानसभा क्षेत्र है….

जबकि, जम्मू क्षेत्र जो कि हिन्दू बहुल क्षेत्र है में लगभग 2,00,000 लोगों पर एक विधानसभा क्षेत्र है.

इसीलिए…. जम्मू कश्मीर के चुनाव में हमेशा कश्मीर घाटी से ही ज्यादा सदस्य चुने जाते हैं … जो कि ज्यादातर आतंकवाद समर्थक होते हैं…. क्योंकि, घाटी में अधिकतर आबादी “”उन्हीं”” की है.

इसीलिए…. जम्मू क्षेत्र से काफी लंबे समय से ये मांग उठती रही है कि… जम्मू-कश्मीर का परिसीमन किया जाए …. ताकि, सभी को आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से बराबर का प्रतिनिधित्व मिले…!

और…. नियम के अनुसार ये परिसीमन 1995 के दस साल बाद अर्थात 2005 में हो जाना चाहिए था …. लेकिन, साजिशन अब्दुल्ला सरकार ने 2002 में इसके परिसीमन पर 2026 तक रोक लगा दी.

क्योंकि, अगर परिसीमन हुआ तो जम्मू क्षेत्र को अधिक विधानसभा सीट मिल जाएगी और फिर कश्मीर में गैर मुस्लिम मुख्यमंत्री भी बन सकता है.

हालांकि, जम्मू-कश्मीर के परिसीमन के लिए वहां की विधानसभा की अनुमति चाहिए लेकिन…. चूंकि, अभी वहाँ विधान सभा निरस्त है और राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है इसीलिए, अभी वहाँ परिसीमन के लिए राज्यपाल की अनुमति ही पर्याप्त है.

परिसीमन के बाद जम्मू क्षेत्र से विधानसभा की सीटें यदि बढ़ती है और कश्मीर क्षेत्र की सीटें कम होती है…. तो सरकार चलाने के लिए भाजपा को बहुमत प्राप्त हो सकता है… और, जम्मू कश्मीर में हिन्दू मुख्यमंत्री बन सकता है!

और…. इधर केंद्र में….. 2020-21 तक मोदी सरकार को राज्यसभा में बहुमत प्राप्त हो जाएगा…!

मतलब कि… संसद के दोनों सदनों में बहुमत.

तो…. परिसीमन के बाद जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में यदि भाजपा बहुमत प्राप्त कर लेती है तो धारा 370 का समाप्त होना शत प्रतिशत निश्चित है.

क्योंकि, उस स्थिति में…. जम्मू कश्मीर के विधानसभा से धारा 370 को हटाने की अनुशंसा की जाएगी जिसे यहाँ संसद से पास कर दिया जाएगा…!

इसीलिए…. जम्मू-कश्मीर के परिसीमन का फैसला बेहद दूरदर्शिता वाला फैसला है और इसके बेहद दूरगामी परिणाम होंगे.

शॉर्टकट में… ये कहा जा सकता है कि…. ये फैसला धारा 370 को समाप्त करने की एक बहुत अहम कड़ी है…

और…. ये फैसला धारा 370 के ताबूत में अंतिम कील साबित होगी.

जय महाकाल…!!!

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An interesting find I had once while going through some family papers. A Stamp paper document of some family property made before Independence when the Maharaja ruled.The Maharaja claimed suzerainity not only over Jammu and Kashmir but Tibet as well. This stamp paper head says “Shri Ramji Sahay Jammu Kashmir Tibet Aadi Rashtriya Stamp” which kind of means “By the grace of Lord Rama……….”. The bottom part of the stamp has the value written in Dogri in Takri script, Hindi and Urdu.The Tibet reference was largely to what we call Ladakh which was conquered by the Sikh/Dogra Army in the name of the Shere Punjab Maharaja Ranjit Singh led by the indomitable General Zorawar Singh who was immortalised when he fell on the battlefield on a cold day while on his campaign to capture Tibet. The Fort named after him still stands in Leh.

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कश्मीर यात्रा के दौरान वहां के बच्चो के साथ बातचीत करने का दिल किया ।


कश्मीर यात्रा के दौरान वहां के बच्चो के साथ बातचीत करने का दिल किया । बातचीत हैरान परेशान करने के साथ साथ भविष्य के प्रति भी अनिश्चितता दिखाती है । 10 साल के बच्चे भी आंतकवाद की तरफ आकर्षित नजर आ रहे हैं । अब ये सोचने वाली बात है कि उनको किस प्रकार से इस रास्ते पर जाने से रोक जा सकता है। पूरी यात्रा के दौरान सकारात्मकता भी देखने को मिली जहां ज़्यादातर जवान और बुजुर्ग ये भी कह रहे थे कि ये (आंतकवाद) सबका नज़रिया नहीं है। लेकिन दबी जुबान में ही ये बोला जाता है। मीडिया को भी लोग जमकर कोसते हैं कि अगर मीडिया खबरों को इतनी सनसनी के साथ न दिखाये तो भी नकारात्मकता कम फैलती है। लेकिन इस बात में सच्चाई नज़र आई कि केवल 5% लोग ही इस तरह की हरकतों को अंजाम देते हैं और अशांति चाहते हैं । यात्रा के दौरान ही लेफ्टिनेंट उम्मर फ़ैयाज़ की शहादत की खबर आई। इस दुर्घटना के बारे में भी स्थानीय लोगों के मन मे बहुत बहुत दुख देखने को मिला। गाड़ी का चालक जो 5 दिन तक लगातार साथ था ने भी बताया कि किस प्रकार से उसने भी अपने बच्चों को कश्मीर से बाहर ही भेज रखा है ताकि वो इस सब से बच के रहे और अपना काम सही रास्ते पर चलकर करें। चालक साहब ने ये बताया कि कैसे वो लोग 90 के दशक से पहले रात को 1-2 बजे तक बाहर घूमते रहते थे और आजकल तो बीवी 6 बजे ही फ़ोन करके पूछ लेती हैं कि कितनी देर में आ रहे हो। लोगों को ये भी लगता है कि अलगाववादी खुद कोई ड्रामा करके अपने आपको नज़रबंद करने के लिए प्रशासन को बोलते हैं ताकि उनको कोई खतरा ना रहे। ज़्यादातर लोग चाहते हैं कि हालात जल्दी सामानय हों और वो भी अपना जीवन अच्छे ढंग से जियें ।

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क़िस्साएजम्मूकश्मीर


#क़िस्साएजम्मूकश्मीर

मितरों और मितरानियों , हुआ ये कि 1957 में एक बार जम्मू-काश्मीर में सफाई कर्मियों ने हड़ताल कर दी । उन दिनों वहां CM की जगह PM मने प्रधानमंत्री होता था । तो PM थे बक्शी गुलाम मुहम्मद । किसी ज़माने में बक्शी साब National Conference के सबसे बड़े नेता शेख अब्दुल्लाह के चेले हुआ करते थे और उसके डिप्टी PM हुआ करते थे पर 1953 में इन्ने बगावत कर दी और खुद PM बन बैठे ।
सो 1957 में सफाई कर्मियों ने हड़ताल कर दी । शहरों में गंदगी के अंबार लग गए ।
ऐसे में PM बक्शी ने पंजाब के CM प्रताप सिंह कैरों से बात की ……. भाई मेरे , 250- 300 आदमी भेज दे , सफाई करने को ……… बक्शी कैरों का पक्का यार …….
कैरों ने कहा , साले …… तेरी हिम्मत कैसे हुई …….. अबे पंजाबी बंदा तुम साले काशमीरियों की गंदगी उठाएगा ? हरगिज़ नही ……..
उन्ने कही , भाई ऐसे नही उठवाऊंगा , बाकायदे पक्की नौकरी दूंगा …….. मुंसिपाल्टी में सफाई कर्मी की ……..
कैरों ने कहा , ऐसे कैसे दे देगा ? , मने ये J&K के Permanent Resident तो हैं नही ……. कैसे देगा नौकरी ।
गुलाम मुहम्मद बक्शी ने नया प्रावधान निकाला ……. मुंसिपाल्टी में सफाई कर्मी की नौकरी पाने के लिए PR होना ज़रूरी नही ………
1957 में 250 से ज़्यादा परिवार पंजाब से आ के जम्मू में बस गए । उन्हें सफाई कर्मी की job दे दी गयी । उन्हें वाल्मीकि बस्ती , गांधी नगर जम्मू में बसा दिया गया ।
अब यहां से शुरू हुआ उन 250 परिवारों पे अतियाचार ……..
आज 60 साल बाद उन परिवारों की जनसंख्या बढ़ के लगभग 25,000 हो चुकी है ।
पर भारतीय संविधान की धारा 35A के कारण ये 25,000 लोग सिर्फ और सिर्फ भंगी मेहतर की नौकरी करने के लिए अभिशप्त हैं ।
क्यों ??????
आपको याद होगा कि PR तो इनपे थी नही , सो सिर्फ मुंसिपाल्टी का मेहतर बनने के लिए इनको PR से छूट मिली थी ।
PR वो आज तक न हुए ।
अब इनके बच्चे न किसी सरकारी Professional college Univ में पढ़ सकते हैं , न कोई Scholarship ले सकते हैं , न कोई जमीन मकान दुकान खरीद सकते हैं और न कोई सरकारी नौकरी कर सकते हैं । आज इनके परिवार का कोई बच्चा पढ़ लिख के Dr , Engineer कुछ भी बन जाये , J&K में नौकरी उसको सिर्फ और सिर्फ मेहतर की ही मिलेगी । मेहतर में भी उसको आजीवन कोई promotion नही मिलेगा क्योंकि मेहतर के अलावा और कोई पद पाने का हक़ ही नही ।
इन 25000 वाल्मीकियों को विधान सभा और local bodies के चुनावों में मतदान तक का अधिकार नही । ये सिर्फ लोकसभा में vote कर सकते हैं ।

उन 25,000 वाल्मीकियों पे ये अतियाचार होता है हमारे संविधान की धारा 35A के कारण । धारा 35A के कारण ही जम्मू काश्मीर में धारा 370 का दुरुपयोग होता है ।
जबकि धारा 35A पूरी तरह असंवैधानिक है क्योंकि इसका कभी भारत की संसद ने पास ही नही किया । ये चोर दरवाजे से सिर्फ President Of India के order से ही लागू कर दी गयी जिसका उन्हें अधिकार ही नही ।

अब धारा 35A को रद्द करने की याचिका सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है ।

Vikash Khurana

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धारा 370


Sanjay Dwivedy;; *धारा 370 हटाने से पहले सरकार कर ले यह काम, * आधी हो जायेगी कश्मीर की समस्या !! कश्मीर की कारस्तानी का अगर जायजा लेना हो तो आपको जम्मू कश्मीर विधानसभा की सीटों का विश्लेषण करना होगा। J & K का असली क्षेत्रफल 222236 वर्ग किलोमीटर है। इसमें से भारत के पास सिर्फ 101387 वर्ग किलोमीटर इलाका है जो लद्दाख, जम्मू और कश्मीर तीन हिस्सों में विभक्त है और तीन हिस्सों की अपनी अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत है। *लद्दाख के लोग बौद्ध पंथ को मानते हैं, जम्मू के लोग हिन्दू धर्म के अनुयायी हैं और कश्मीर घाटी में इस्लाम बहुल वर्चस्व* है। इन तीनो क्षेत्रों में सबसे बड़ा भुभाग है लद्दाख का जिसका कुल इलाका है 59146 वर्ग किलोमीटर यानि कुल क्षेत्र का 58% पर उन्हें राज्य की कुल 87 विधान सभा की सीटों में से सिर्फ 4 सीटें दी गयी है और 6 लोकसभा सीटों में से सिर्फ 1 सीट। जम्मू का इलाका है 26293 वर्ग किलोमीटर यानि कुल क्षेत्रफल का लगभग 26% पर इसके हिस्से में 2 लोकसभा सीट हैं और 37 विधान सभा सीटें। अब आइये देखते हैं कश्मीर घाटी की स्थिति। इसका कुल इलाका है 15948 वर्ग किलोमीटर यानि कुल इलाके का 15% पर इसे 3 लोकसभा हासिल हैं यानि कुल लोकसभा सीटों का 50% और इन *कश्मीरियों ने नेहरू की मूर्खता का फायदा उठा कर 46 विधानसभा सीटें अपने कब्जे में कर रखी* है यानि कुल सीटों का 54%। इस गूंडागर्दी का ही यह फल है की आज तक जितने भी मुख्यमंत्री बने हैं सब घाटी से। केंद्र से जो अनुदान मिलता है उसका 80% भाग कश्मीरी डकार जाते हैं जो अंत में आतंकवादियों के हाथों में पहुँच जाता है। अब समय आ गया है की इस गूंडागर्दी को रोका जाये। *तीनो क्षेत्रों के बीच विधानसभा की सीटों का बंटवारा उनके क्षेत्रफल के हिसाब से हो* यानि लद्दाख को 58% सीटें मिलें, जम्मू को 26% और कश्मीर को 16% तभी पूरे राज्य के लोगो के साथ न्याय हो पायेगा। धारा 370 तो जब ख़त्म होगी सो होगी पर कम से कम राज्य की विधानसभा की सीटों का तो तर्कसंगत और न्यायसंगत बंटवारा पहले हो सकता हैं ताकि *जम्मू और लद्दाख के साथ जो भेदभाव हो रहा है वो ख़त्म हो। सदा सर्वदा सुमंगल,,, वंदेमातरम्,,, जय भवानी, जय श्रीराम

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Article 35A


Article 35A !! इसमें ऐसा क्या है जिसके बल पर कश्मीरी भारत का खाते हैं, संविधान के अनुरूप सारी सुविधायें भारत से लेते हैं, मुख्य मंत्री भी बनते हैं किंतु सुनते हैं पाकिस्तान का !! भारत मुर्दाबाद चिल्लाते हैं !! 370 नहीं अनुच्छेद 35A है, कश्मीर समस्या की असली जड़ !! संविधान की किताबों से है ‘नदारद’ है अनुच्छेद 35A – मजे की बात ये है की यदि आप संविधान की किसी भी प्रमाणिक पुस्तक को पढेंगे तो आपको यह धारा शायद कहीं दिखायी न दे। आपको अनुच्छेद 35(a) अवश्य पढ़ने को मिलेगा पर 35A ढूंढने के लिए आपको संविधान की (एपेंडिक्स) पर नजर डालनी होगी। यदि इसे संवैधानिक ‘चोरी’ कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)के करीबी माने जाने वाले थिंक टैंक संगठन जम्मू और कश्मीर स्टडी सेंटर(JKSC)अनुच्छेद 35A के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। संस्थान के निदेशक श्री आशुतोष भटनागर के मुताबिक़ यह आर्टिकल संविधान के मूलभूत ढाँचे के खिलाफ है,जिसमें संसद भी संशोधन नहीं कर सकती है। इसलिए यह अनुच्छेद पूर्णतः असंवैधानिक है इसलिए सुप्रीम कोर्ट को स्वतः इस मामले पर ‘संज्ञान’ लेना चाहिये। आर्टिकल 370 से पहले अनुच्छेद 35A को हटाया जाना बेहद जरुरी है। भारतीय संविधान की बहु ‘विवादास्पद’ धारा 370 के निरस्तीकरण की माँगे संविधान निर्माण के शुरुआती वर्षों से ही उठती रही है। अनुच्छेद 370 वास्तव में एक प्रक्रिया है और इसे इस आशा से पारित कराया गया कि एक अल्पकालीन व्यवस्था के रूप में स्वतः ही भविष्य में समाप्त हो जाएगी। जम्मू-कश्मीर में छिड़े संग्राम के कारण संविधान सभा के अभाव में राज्य में भारतीय संविधान को लागू करने की तात्कालिक एवं अंतरिम व्यवस्था बनायी गयी। स्वयं संविधान में इस व्यवस्था को ‘अस्थाई उपबंध’ कहा गया है। इसका जम्मू-कश्मीर राज्य से किसी विशिष्ठ व्यवहार एवं विशेष दर्जे का कोई भी लेना-देना नही था। ऐसे में 370 को आखिर भारतीय साम्राज्य की अखंडता पर ग्रहण के रूप में क्यों देखा जाने लगा ? बहुत से लोग हैं जो यह मानते हैं कि धारा 370 को समाप्त कर देने कश्मीर की लगभग सारी समस्याएँ समाप्त हो जायेंगी। किन्तु यह अधूरा सत्य है व्यवहार में धारा 370 इतना घातक नहीं जितना की 35A है। जी हाँ यही है कश्मीर की वो सबसे दुखती रग जिसकी सततता बनाये रखने की जिद को लेकर कश्मीर की सबसे बड़ी पार्टी पीडीपी सरकार बनाने के लिए बीजेपी से हाँथ मिलाने में कतरा रही थी। आज तो मुख्यमंत्री खुलकर इसके समर्थन में आ गई है। संविधान की स्पष्ट अवमानना है 35A – धारा 370 के कारण हो रही अधिकांश विसंगतियों की जड़ अनुच्छेद 35A ही बना। अनुच्छेद 370 को सशक्त करने के उद्देश्य से तत्कालीन राष्ट्रपति ने 14 मई 1954 को बिना किसी संसदीय कार्यवाही के एक संवैधानिक आदेश निकाला,जिसमें उन्होने एक नये अनुच्छेद 35A को भारत के संविधान में जोड़ दिया। जबकी यह शक्ति अनुच्छेद 368 के अंतर्गत केवल संसद को प्राप्त थी। बगैर किसी संसदीय कार्यवाही के अनुच्छेद 370 में एक नया अनुच्छेद जोड़ कर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 का सरासर उल्लंघन किया गया। इस अनुच्छेद में कहा गया कि “जम्मू-कश्मीर राज्य की विधान सभा स्थायी निवासी की परिभाषा निश्चित कर उनके विशेष अधिकार सुनिश्चित करे तथा शेष लोगों के नागरिक अधिकारों को सीमित करे।” 35A की आड़ में संविधान में वर्णित मूल अधिकारों की अवमानना – इस विशेष अनुच्छेद के नियमों के अनुसार जम्मू और कश्मीर में किसी भी व्यक्ति की नागरिकता को स्थाई या अस्थाई मानना जम्मू-कश्मीर सरकार की इच्छा-अनिच्छा पर निर्भर हो गया। इस संवैधानिक भूल का जम्मू और कश्मीर के राजनीतिक दलों ने जम कर दुरूपयोग किया। परिणाम आपके सामने है भारतीय संविधान की पंथनिरपेक्ष व्यवस्था को मुस्लिम तुष्टीकरण की भेंट चढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। इस अनुच्छेद के अनुसार जो जम्मू कश्मीर राज्य का रहने वाला नहीं है वह वहाँ पर ज़मीन नही खरीद सकता, वह वहाँ पर रोजगार नही कर सकता और वह वहाँ पर निवेश नही कर सकता। अब इसकी आड़ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14,15,19 एवं 21 में भारतीय नागरिकों को समानता और कहीं भी बसने के जो अधिकार दिए, वह प्रतिबंधित कर दिए गए। इस प्रकार एक ही भारत के नागरिकों को इस अनुच्छेद 35A ने बाँट दिया। दलित ‘हिन्दू’ हैं नरकीय जीवन जीने को मजबूर- अनुच्छेद 35A की सबसे ज्यादा मार,1947 में पश्चिमी पाकिस्तान से आए 20 लाख से ज्यादा प्रवासी ‘हिन्दू’ झेल रहे हैं। इन प्रवासी हिन्दुओं में ज्यादातर आबादी ‘दलितों’ की थी। पिछले 70 वर्षों से कश्मीर में बसे होने के बावजूद उन्हे वहाँ की ‘नागरिकता’ नहीं मिली है। उन्हें राज्य में ज़मीन खरीदने का अधिकार नहीं है,उनके बच्चे को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती, व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों के दरवाजे उनके लिए अवरुद्ध हैं। वे लोकसभा चुनावों में तो वोटिंग कर सकते हैं,परन्तु विधान सभा एवं अन्य स्थानीय चुनावों में वे न तो वोट डाल सकते हैं न ही अपनी उम्मीदवारी रख सकते हैं। सीधे तौर पर कहें तो ये भारत के नागरिक तो हैं पर जम्मू और कश्मीर के नहीं। आज इतने सालों बाद भी ये लोग शरणार्थियों सरीखा जीवन जीने को मजबूर हैं। (अधिकांश ने इस विडम्बना से उबरने के लिये इस्लाम अपना लिया है) यह अनुच्छेद केवल कुछ चुनिन्दा लोगों को 370 के तहत ‘विशेषाधिकार’ प्रदान करने में मदद करता है,जबकि शेष को मूलभूत अधिकारों से भी वंचित कर देता है। बहुत अफ़सोस की बात है की रोहित वेमुला एवं दलितों के मुद्दे में राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले सभी तथाकथित लिबरल वर्ग ने कभी भी उसी कश्मीर के वंचित ‘दलित’ तबके के प्रति हुए संवैधानिक अन्याय के खिलाफ अपनी चोंच खोलने की तो छोडिये,संवेदना व्यक्त करने की भी जहमत नहीं फ़रमायी। ================== http://hindutva.info/35a-is-real-prob lem-and-not-370/ ================== सदा सर्वदा सुमंगल., हर हर महादेव,, वंदेमातरम्,, जय सिया भवानी,,, जय श्री राम,,

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370 नहीं अनुच्छेद 35A है कश्मीर समस्या की असली जड़


370 नहीं अनुच्छेद 35A है कश्मीर समस्या की असली जड़

क्या आप ऊपर की लिखी ये बात जानते है??????

भारतीय संविधान की बहु ‘विवादास्पद’ धारा 370 के निरसन की माँगे संविधान निर्माण के शुरुआती वर्षों से ही उठती रही है। अनुच्छेद 370 वास्तव में एक प्रक्रिया है और इसे इस आशा से पारित कराया गया कि एक अल्पकालीन व्यवस्था के रूप में स्वतः ही भविष्य में समाप्त हो जाएगी। जम्मू-कश्मीर में छिड़े संग्राम के कारण संविधान सभा के अभाव में राज्य में भारतीय संविधान को लागू करने की तात्कालिक एवं अंतरिम व्यवस्था बनायी गयी। स्वयं संविधान में इस व्यवस्था को ‘अस्थाई उपबंध’ कहा गया है। इसका जम्मू-कश्मीर राज्य से किसी विशिष्ठ व्यवहार एवं विशेष दर्जे का कोई भी लेना-देना नही था। ऐसे में 370 को आखिर भारतीय साम्राज्य की अखंडता पर ग्रहण के रूप में क्यों देखा जाने लगा ? बहुत से लोग हैं जो यह मानते हैं की धारा 370 को समाप्त कर देने कश्मीर की लगभग सारी समस्याएँ समाप्त हो जायेंगी। किन्तु यह अधूरा सत्य है व्यवहार में धारा 370 इतना घातक नहीं जितना की 35A है। जी हाँ यही है कश्मीर की वो सबसे दुखती रग जिसकी सततता बनाये रखने की जिद को लेकर कश्मीर की सबसे बड़ी पार्टी पीडीपी सरकार बनाने के लिए बीजेपी से हाँथ मिलाने में कतरा रही है।

संविधान की स्पष्ट अवमानना है 35A –

धारा 370 के कारण हो रही अधिकतर विसंगतियों की जड़ अनुच्छेद 35A ही बना। अनुच्छेद 370 को सशक्त करने के उद्देश्य से तत्कालीन राष्ट्रपति ने 14 मई 1954 को बिना किसी संसदीय कार्यवाही के एक संवैधानिक आदेश निकाला,जिसमें उन्होने एक नये अनुच्छेद 35A को भारत के संविधान में जोड़ दिया। जबकी यह शक्ति अनुच्छेद 368 के अंतर्गत केवल संसद को प्राप्त थी। बगैर किसी संसदीय कार्यवाही के अनुच्छेद 370 में एक नया अनुच्छेद जोड़ कर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 का सरासर उल्लंघन किया गया। इस अनुच्छेद में कहा गया कि “जम्मू-कश्मीर राज्य की विधानसभा स्थायी निवासी की परिभाषा निश्चित कर उनके विशेष अधिकार सुनिश्चित करे तथा शेष लोगों के नागरिक अधिकारों को सीमित करे।”

35A की आड़ में संविधान में वर्णित मूल अधिकारों की अवमानना –

इस विशेष अनुच्छेद के नियमों के अनुसार जम्मू और कश्मीर में किसी भी व्यक्ति की नागरिकता को स्थाई या अस्थाई मानना जम्मू-कश्मीर सरकार की इच्छा-अनिच्छा पर निर्भर हो गया। इस संवैधानिक भूल का जम्मू और कश्मीर के राजनीतिक दलों ने जम कर दुरूपयोग किया। परिणाम आपके सामने है भारतीय संविधान की पंथनिरपेक्ष व्यवस्था को मुस्लिम तुष्टीकरण की भेंट चढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। इस अनुच्छेद के अनुसार जो जम्मू-कश्मीर राज्य का रहने वाला नहीं है वह वहाँ पर ज़मीन नही खरीद सकता, वह वहाँ पर रोजगार नही कर सकता और वह वहाँ पर निवेश नही कर सकता। अब इसकी आड़ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 एवं 21 में भारतीय नागरिकों को समानता और कहीं भी बसने के जो अधिकार दिए,वह प्रतिबंधित कर दिए गए। इस प्रकार एक ही भारत के नागरिकों को इस अनुच्छेद 35A ने बाँट दिया।

दलित ‘हिन्दू’ हैं नरकीय जीवन जीने को मजबूर-

अनुच्छेद 35A की सबसे ज्यादा मार,1947 में पश्चिमी पाकिस्तान से आए 20 लाख से ज्यादा प्रवासी ‘हिन्दू’ झेल रहे हैं। इन प्रवासी हिन्दुओं में ज्यादातर आबादी ‘दलितों’ की थी। पिछले 68 वर्षों से कश्मीर में बसे होने के बावजूद उन्हे वहाँ की ‘नागरिकता’ नहीं मिली है। उन्हें राज्य में ज़मीन खरीदने का अधिकार नहीं है,उनके बच्चे को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती,व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों के दरवाजे उनके लिए अवरुद्ध हैं। वे लोकसभा चुनावों में तो वोटिंग कर सकते हैं,परन्तु विधान सभा एवं अन्य स्थानीय चुनावों में वे न तो वोट डाल सकते हैं न ही अपनी उम्मीदवारी रख सकते हैं। सीधे तौर पर कहें तो ये भारत के नागरिक तो हैं पर जम्मू और कश्मीर के नहीं। आज इतने सालों बाद भी ये लोग शरणार्थियों सरीखा जीवन जीने को मजबूर हैं। यह अनुच्छेद केवल कुछ चुनिन्दा लोगों को 370 के तहत ‘विशेषाधिकार’ प्रदान करने में मदद करता है,जबकि शेष को मूलभूत अधिकारों से भी वंचित कर देता है। बहुत अफ़सोस की बात है की रोहित वेमुला के मुद्दे में राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले सभी तथाकथित लिबरल वर्ग ने कभी भी उसी कश्मीर के वंचित ‘दलित’ तबके के प्रति हुए संवैधानिक अन्याय के खिलाफ अपनी चोंच खोलने की तो छोडिये,संवेदना व्यक्त करने की भी जहमत नहीं फ़रमायी।

संविधान की किताबों से है ‘नदारद’ है अनुच्छेद 35A –

मजे की बात ये है की यदि आप संविधान की किसी भी प्रमाणिक पुस्तक को पढेंगे तो आपको यह धारा शायद कहीं दिखायी न दे.आपको अनुच्छेद 35(a) अवश्य पढ़ने को मिलेगा पर 35A ढूंढने के लिए आपको संविधान की (एपेंडिक्स) पर नजर डालनी होगी। यदि इसे संवैधानिक ‘चोरी कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के करीबी माने जाने वाले थिंक टैंक संगठन जम्मू और कश्मीर स्टडी सेंटर (JKSC) अनुच्छेद 35A के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। संस्थान के निदेशक श्री आशुतोष भटनागर के मुताबिक़ यह आर्टिकल संविधान के मूलभूत ढाँचे के खिलाफ है,जिसमें संसद भी संशोधन नहीं कर सकती है। इसलिए यह अनुच्छेद पूर्णतः असंवैधानिक है इसलिए सुप्रीम कोर्ट को स्वतः इस मामले पर ‘संज्ञान’ लेना चाहिये। आर्टिकल 370 से पहले अनुच्छेद 35A को हटाया जाना बेहद जरुरी है।