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जम्मू-कश्मीर और लद्दाख होंगे देश के दो सबसे बड़े केंद्र शासित प्रदेश..

जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के केंद्र सरकार के प्रस्ताव के लागू होने पर क्षेत्रफल के लिहाज से जम्मू-कश्मीर के बाद लद्दाख देश का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र शासित प्रदेश होगा। जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के कई प्रावधानों को केंद्र सरकार द्वारा निष्प्रभावी घोषित किए जाने के साथ ही जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने संबंधी विधेयक को राज्यसभा में मंजूरी मिल गई। केंद्र शासित प्रदेश बनने के साथ ही अब जम्मू-कश्मीर में विधानसभा सीटों की संख्या भी बढ़कर 107 से 114 हो जाएगी।

लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश घोषित करने की मांग काफी समय से चल रही थी। केंद्र शासित प्रदेशों की फेहरिस्त में दो नए राज्य जुड़ने का मार्ग प्रशस्त होने के बाद अब केंद्र शासित प्रदेशों की संख्या 9 हो जाएगी। इनमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के अलावा दिल्ली, पुदुचेरी, दमन और दीव, दादर एवं नगर हवेली, चंडीगढ़, लक्षद्वीप और निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं।

मौजूदा समय में सिर्फ दिल्ली और पुदुचेरी में विधानसभा हैं, लेकिन अब जम्मू-कश्मीर भी विधानसभा वाला तीसरा केंद्र शासित प्रदेश हो जाएगा। विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों में केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में राज्यपाल की जगह उपराज्यपाल होते हैं। वहीं, केंद्र शासित प्रदेशों से संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के लिए सदस्य भी चुने जाते हैं। वह बात अलग है कि इनकी संख्या हर राज्य में अलग-अलग होती है। सांसदों की संख्या के लिहाज से दिल्ली नबंर एक पर है। संसद में दिल्ली का प्रतिनिधित्व 7 लोकसभा और 3 राज्यसभा सदस्य करते हैं।

संजय द्विवेदी

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कश्मीर के रक्षक ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह जामवाल

वो व्यक्ति जिसके कारण आज कश्मीर भारत का हिस्सा है।

—उड़ी सेक्टर में लड़ी गई उस जंग के सेनापति जिसे भारत का थर्मोपल्ली(300 फ़िल्म वाला) कहा जाता है जहां लियोनिडास ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह जामवाल थे जिनके नेतृत्व में 150 डोगरा राजपूत सैनिकों ने 10 हजार पाकिस्तानी कबाइली और सैनिकों को 4 दिन तक रोके रखा।—

22 अक्टूबर 1947 को महाराज हरिसिंह ने जब मुजफ्फराबाद पर पाक सेना के कब्जे और उनके मुस्लिम सैनिकों की बगावत की खबर सुनी तो उन्होंने खुद दुश्मन से मोर्चा लेने का फैसला करते हुए सैन्य वर्दी पहनकर ब्रिगेडियर राजेंद्रसिंह को बुलाया। सिंह ने महाराजा को मोर्चे से दूर रहने के लिए मनाते हुए खुद दुश्मन का आगे जाकर मुकाबला करने का निर्णय लिया।
महाराजा हरि सिंह ने ब्रिगेडियर को आखरी जवान और आखरी गोली तक आक्रमणकारियों का मुकाबला करने का आदेश दिया।

राजेंद्रसिंह महाराजा के साथ बैठक के बाद जब बादामी बाग पहुंचे तो वहां 150 के करीब ही सिपाही थे। इन डेढ़ सौ सिपाहियों को लेकर ब्रिगेडियर उड़ी के लिए निकले। उनके पास हथियारों, साजो सामान और रसद की कमी थी क्योंकि पाकिस्तान ने कश्मीर जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए थे, उनके पास पेट्रोल भी नही था इसलिए वो प्राइवेट गाड़ियों से निकले। वहीं दुश्मन उस समय के अत्याधुनिक हथियारों से लैस और दस हजार से ज्यादा की संख्या में था।

पहले गढ़ी और बाद में उड़ी में पाकिस्तानियो से खूनी झड़प हुई जिसमे कम संख्या के बावजूद ब्रिगेडियर सिंह के नेतृत्व में डोगरों ने आक्रमणकारियों को भारी नुकसान पहुँचाया। उसके बाद उड़ी में मोर्चाबंदी की और उड़ी नाले के ऊपर पुल को उड़ा दिया। यहां दो दिन तक दुश्मन हमले करता रहा लेकिन आगे नही बढ़ पाया। इस दौरान डोगरा फौज के भी अनेको सैनिक खेत रहे। ब्रिगेडियर सिंह ने हेडक्वार्टर से सहायता भेजने को कहा। उस समय 70 के करीब सैनिक ही और उपलब्ध थे जो महाराजा हरी सिंह कैप्टेन ज्वाला सिंह के नेतृत्व में यह कहकर भेजे कि किसी भी कीमत पर दुश्मन को उड़ी में रोका जाए। ब्रिगेडियर सिंह ने हालात देखकर अब माहुरा में मोर्चाबंदी करने का फैसला लिया। सुबह होते ही फिर दुश्मन ने हमला बोल दिया लेकिन जवाब ऐसा मिला कि पाकिस्तानियो को फिर से पीछे हटना पड़ा।

छोटी सी टुकड़ी से पार ना पाते देख आक्रमणकारियों ने झेलम किनारे आगे बढ़ पैदल पुलों से घुसने की कोशिश की। ब्रिगेडियर को इसका आभास हो गया और उन्होंने एक टुकड़ी भेजकर सभी पुलों को नष्ट करवा दिया लेकिन तब तक बड़ी संख्या में हमलावर अंदर आ गए थे। ब्रिगेडियर ने रामपुर में मोर्चाबंदी करने का फैसला किया। रात भर जवानों ने खंदक खोदी और तड़के ही दुश्मनों के हमले का सामना करना पड़ा। पूरे दिन गोलाबारी हुई लेकिन दुश्मन एक इंच भी आगे नही बढ़ पाया।

दुश्मन की एक टुकड़ी ने पीछे से आकर सड़क पर अवरोधक तैयार कर दिए, ताकि महाराजा के सिपाहियों को वहां से निकलने का मौका नहीं मिले।

ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह को दुश्मन की योजना का पता चल गया और उन्होंने 27 अक्टूबर की सुबह एक बजे अपने सिपाहियों को पीछे हटने और सेरी पुल पर डट जाने को कहा। पहला अवरोधक तो उन्होंने आसानी से हटा लिया, लेकिन बोनियार मंदिर के पास दुश्मन की फायरिंग की चपेट में आकर राज्य के सिपाहियों के वाहनों का काफिला थम गया। आगे के तीनो वाहनों के चालक शहीद हो गए। ब्रिगेडियर सिंह अपने वाहन चालक के शहीद होने पर खुद ही वाहन लेकर आगे निकल गए। सेरी के पुल पर दुश्मन के हमले का जवाब देते हुए वो जख्मी हो गए। उनकी दाई टांग बुरी तरह जख्मी थी।

उन्होंने उसी समय जवानों को बारामूला में मोर्चा बनाकर दुश्मनों को रोकने के लिए कहा। जब उन्हें जवानों ने उठाने का प्रयास किया तो उन्होंने जाने से मना किया और कहा की उन्हें रिवाल्वर देकर पुलिया की आड़ में लिटा दिया जाए, वो यहीं से दुश्मनों का मुकाबला करेंगे क्योंकि उन्होंने महाराज हरि सिंह को वचन दिया है कि दुश्मन उनकी लाश पर से ही उड़ी से आगे बढ़ेगा। उसके बाद उन्हें किसी ने नही देखा और 27 अक्टूबर की दोपहर को सेरी के पुल पर दुश्मनों का अकेले मुकाबला करते हुए वो वीरगति को प्राप्त हुए।

26 अक्टूबर 1947 की शाम को जम्मू कश्मीर के भारत में विलय को लेकर समझौता हो चुका था और 27 अक्टूबर को जब राजेंद्रसिंह शहीद हुए तो उस समय कर्नल रंजीत राय भारतीय फौज का नेतृत्व करते हुए श्रीनगर एयरपोर्ट पर पहुंच चुके थे।

दुनिया में ऐसी वीरता का उदाहरण शायद ही कहीं और मिले जहां इतनी छोटी सैनिकों की टुकड़ी जिसके पास संसाधनों की जबरदस्त कमी थी ने अपने से सौ गुना विशाल और साधन सम्पन्न दुश्मन को 4 दिन तक रोके रखा। सभी सैन्य विशेषज्ञ यह मानते हैं कि अगर ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह ने अपनी इस छोटी सी टुकड़ी को लेकर आखरी दम तक लड़ने के इरादे और सूझबूझ के साथ हमलावरों को रोका नही होता तो पाकिस्तानी हमलावर 23 तारीख को ही श्रीनगर पहुँच जाते और फिर ना तो कभी भारतीय सेना वहां पहुँचती और ना आज कश्मीर भारत का हिस्सा होता।

(हालांकि भारतीय सेना 27 से पहले पहुँच जाति लेकिन नेहरू के भेजे हुए दूत वीपी मेनन ने instrument ऑफ accesion को sign करवाने में देरी करवाई, वो महाराज हरी सिंह पर नेहरू के चहेते शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री बनाने और उन्हें अन्य कई अधिकार देने के लिए दबाव डाल रहे थे जबकि सरदार पटेल ने कहा था कि महाराज अगर समझौता पे दस्तखत करने को तैयार हैं तो कोई और शर्त ना लादी जाए। वीपी मेनन के इस रवैय्ये से परेशान होकर महाराज ने अपने सेवको से कह दिया कि अगर कल तक समझौता नही होता है तो मुझे सोते हुए गोली मार दी जाए। अगले दिन 26 को समझौता हुआ और 27 को भारतीय फौज कश्मीर पहुँची।)

लेकिन ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह और अन्य डोगरा सैनिकों के इस बलिदान को वो सम्मान नही मिला जो उन्हें मिलना चाहिए था। डेढ़ साल बाद उन्हें भारत का पहला महावीर चक्र मिला लेकिन भारतीय राजनीतिक वर्ग ने उनके बलिदान को बिलकुल दरकिनार कर दिया जिस कारण भारत में बहुत कम लोग उनके बारे में जानते हैं। जिस व्यक्ति के बलिदान के कारण कश्मीर आज भारत का हिस्सा है उसे तो भारत रत्न मिलना चाहिए था लेकिन उनके नाम कश्मीर में एक कॉलेज तक नही है। आज जब सब जगह कश्मीर की बात हो रही है, लोग नेताओ की जयजयकार कर रहे हैं, ऐसे में भी ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह जामवाल का कहीं कोई जिक्र नही है।

इसलिए हमारी जिम्मेदारी बनती है कि ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह जामवाल और उन डोगरा राजपूतो के बलिदान के बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगो को पता चले, इसलिए इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।

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वास्तव में अगर जम्मू कश्मीर के बारे में बातचीत करने की जरूरत है तो वह है POK-अक्साई चीन के बारे में । इसके ऊपर देश में चर्चा होनी चाहिए गिलगित जो अभी POK में है विश्व में एकमात्र ऐसा स्थान है, जो कि 5 देशों से जुड़ा हुआ है अफगानिस्तान, तजाकिस्तान, पाकिस्तान, भारत और तिब्बत -चाइना ।

वास्तव में जम्मू कश्मीर की महत्वता जम्मू के कारण नहीं, कश्मीर के कारण नहीं, लद्दाख के कारण नहीं है अगर इसकी महत्वता है तो वह है गिलगित-बाल्टिस्तान के कारण ।
इतिहास में भारत पर जितने भी आक्रमण हुए यूनानियों से लेकर आज तक (शक , हूण, कुषाण , मुग़ल ) वह सारे गिलगित से हुए ।

हमारे पूर्वज जम्मू-कश्मीर के महत्व को समझते थे, उनको पता था कि अगर भारत को सुरक्षित रखना है तो दुश्मन को हिंदूकुश अर्थात गिलगित-बाल्टिस्तान उस पार ही रखना होगा । किसी समय इस गिलगित में अमेरिका बैठना चाहता था, ब्रिटेन अपना अड्डा गिलगित में बनाना चाहता था ।

रूस भी गिलगित में बैठना चाहता था । यहां तक कि पाकिस्तान ने 1965 में गिलगित को रूस को देने का वादा तक कर लिया था । आज चाइना गिलगित में बैठना चाहता है और वह अपने पैर पसार भी चुका है और पाकिस्तान तो बैठना चाहता ही था ।

दुर्भाग्य से इस गिलगित के महत्व को सारी दुनिया समझती है केवल एक को छोड़कर । जिसका वास्तव में गिलगित-बाल्टिस्तान है और वह है भारत । क्योंकि हमको इस बात की कल्पना तक नहीं है । भारत को अगर सुरक्षित रहना है तो हमें गिलगित-बाल्टिस्तान किसी भी हालत में चाहिए ।

आज हम आर्थिक शक्ति बनने की सोच रहे हैं । क्या आपको पता है गिलगित से सड़क मार्ग द्वारा आप विश्व के अधिकांश कोनों में जा सकते हैं । गिलगित से सड़क मार्ग 5000 Km दुबई है, 1400 Km दिल्ली है, 2800 Km मुंबई है, 3500 Km रूस है, चेन्नई 3800 Km है और लंदन 8000 Km है ।

जब हम सोने की चिड़िया थे तब हमारा सारे देशों से व्यापार चलता था । 85 % जनसंख्या इन मार्गों से जुड़ी हुई थी मध्य एशिया, यूरेशिया, यूरोप, अफ्रीका सब जगह हम सड़क मार्ग द्वारा जा सकते हैं, अगर गिलगित-बाल्टिस्तान हमारे पास हो…!

आज हम पाकिस्तान के सामने IPI (Iran-Pakistan-India) गैस लाइन बिछाने के लिए गिड़गिड़ाते हैं । ये तापी की परियोजना है जो कभी पूरी नहीं होगी । अगर हमारे पास गिलगित होता तो गिलगित के आगे तज़ाकिस्तान था, हमें किसी के सामने हाथ नहीं फैलाने पड़ते ।

हिमालय की 10 बड़ी चोटियां जो कि विश्व की 10 बड़ी चोटियों में से है और ये सारी हमारी है और इन 10 में से 8 गिलगित-बाल्टिस्तान में है । तिब्बत पर चीन का कब्जा होने के बाद जितने भी पानी के वैकल्पिक स्त्रोत(Alternate Water Resources) हैं वह सारे गिलगित-बाल्टिस्तान में है l

आप हैरान हो जाएंगे वहाँ बड़ी बड़ी यूरेनियम और सोने की खदानें हैं । आप POK के मिनरल डिपार्टमेंट की रिपोर्ट को पढ़िए आप आश्चर्यचकित रह जाएंगे । वास्तव में गिलगित-बाल्टिस्तान का महत्व हमको मालूम नहीं है और सबसे बड़ी बात गिलगित-बाल्टिस्तान के लोग Strong Anti PAK हैं ।

दुर्भाग्य क्या है ! हम हमेशा कश्मीर बोलते हैं जम्मू- कश्मीर नहीं बोलते हैं । कश्मीर कहते ही जम्मू, लद्दाख, गिलगित-बाल्टिस्तान दिमाग से निकल जाता है । ये जो पाकिस्तान के कब्जे में जो POK है, उसका क्षेत्रफल 79000 वर्ग किलोमीटर है । उसमें कश्मीर का हिस्सा तो सिर्फ 6000 वर्ग किलोमीटर है । 9000 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा जम्मू का है और 64000 वर्ग कि.मी हिस्सा लद्दाख का है जो कि गिलगित-बाल्टिस्तान है ।

यह कभी कश्मीर का हिस्सा नहीं था । यह लद्दाख का हिस्सा था वास्तव में सच्चाई यही है । इसलिए पाकिस्तान यह जो बार-बार कश्मीर का राग अलापता रहता है तो उसको कोई यह पूछे तो सही
क्या गिलगित-बाल्टिस्तान और जम्मू का हिस्सा जिस पर तुमने कब्जा कर रखा है, क्या ये भी कश्मीर का ही भाग है ? कोई जवाब नहीं मिलेगा !

क्या आपको पता है गिलगित -बाल्टिस्तान, लद्दाख के रहने वाले लोगों की औसत आयु विश्व में सर्वाधिक है, यहाँ के लोग विश्व अन्य लोगों की तुलना में ज्यादा जीते है ।

भारत में आयोजित एक सेमिनार में गिलगित-बाल्टिस्तान के एक बड़े नेता को बुलाया गया था । उसने कहा कि “we are the forgotten people of forgotten lands of BHARAT” । उसने कहा कि देश हमारी बात ही नहीं जानता ।

किसी ने उससे सवाल किया कि क्या आप भारत में रहना चाहते हैं…??

जवाब था “60 साल बाद तो आपने मुझे भारत बुलाया और वह भी अमेरिकन टूरिस्ट वीजा पर ! और आप मुझसे सवाल पूछते हैं कि क्या आप भारत में रहना चाहते हैं ।” उसने कहा कि आप गिलगित-बाल्टिस्तान के बच्चों को IIT, IIM में दाखिला दीजिए AIIMS में हमारे लोगों का इलाज कीजिए…हमें यह लगे तो सही कि भारत हमारी चिंता करता है हमारी बात करता है । गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तान की सेना कितने अत्याचार करती है, लेकिन आपके किसी भी राष्ट्रीय अखबार में उसका जिक्र तक नहीं आता है । आप हमें ये अहसास तो दिलाइये की आप हमारे साथ है…!

आप सभी ने पाक को हमारे कश्मीर में हर सहायता उपलब्ध कराते हुए देखा होगा । वह कहता है कि हम कश्मीर की जनता के साथ हैं, कश्मीर की आवाम हमारी है । लेकिन क्या आपने कभी यह सुना है कि किसी भी भारत के नेता, मंत्री या सरकार ने यह कहा हो कि हम POK – गिलगित-बाल्टिस्तान की जनता के साथ हैं…!

वह हमारी आवाम है, उनको जो भी सहायता उपलब्ध होगी हम उपलब्ध करवाएंगे, आपने यह कभी नहीं सुना होगा । कांग्रेस सरकार ने कभी POK – गिलगित-बाल्टिस्तान को पुनः भारत में लाने के लिए कोई बयान तक नहीं दिया, प्रयास तो बहुत दूर की बात है ।

हालाँकि पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार के समय POK का मुद्दा उठाया गया । फिर 10 साल पुनः मौन धारण हो गया और फिर से नरेंद्र मोदी जी की सरकार आने पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में ये मुद्दा उठाया । आज अगर आप किसी को गिलगित के बारे में पूछ भी लोगे तो उसे यह पता नहीं है कि यह जम्मू कश्मीर का ही भाग है । वह यह पूछेगा क्या यह कोई चिड़िया का नाम है ? वास्तव में हमें जम्मू कश्मीर के बारे में जो गलत नजरिया है, उसको बदलने की जरूरत है ।

अब करना क्या चाहिए ? तो पहली बात है सुरक्षा में किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए । जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा का मुद्दा बहुत संवेदनशील है इस पर अनावश्यक वाद-विवाद नहीं होना चाहिए । एक अनावश्यक वाद विवाद चलता है कि जम्मू कश्मीर में इतनी सेना क्यों है ?

तो बुद्धिजीवियों को बता दिया जाए कि जम्मू-कश्मीर का 2800 किलोमीटर का बॉर्डर है, जिसमें 2400 किलोमीटर पर LOC है । आजादी के बाद भारत ने पांच युद्ध लड़े, वह सभी जम्मू-कश्मीर से लड़े भारतीय सेना के 18 लोगों को परमवीर चक्र मिला और वह 18 के 18 जम्मू-कश्मीर में शहीद हुए हैं । इनमें 14000 भारतीय सैनिक शहीद हुए हैं, जिनमें से 12000 जम्मू कश्मीर में शहीद हुए हैं । अब सेना बॉर्डर पर नहीं तो क्या मध्यप्रदेश में रहेगी ? क्या यह सब जो सेना की इन बातों को नहीं समझते वही यह सब अनर्गल चर्चा करते हैं ।

वास्तव में जम्मू कश्मीर पर बातचीत करने के बिंदु होने चाहिए- POK , वेस्ट पाक रिफ्यूजी, कश्मीरी हिंदू समाज, आतंक से पीड़ित लोग, धारा 370 और 35A का दुरूपयोग, गिलगित-बाल्टिस्तान का वह क्षेत्र जो आज पाकिस्तान -चाइना के कब्जे में है । जम्मू- कश्मीर के गिलगित- बाल्टिस्तान में अधिकांश जनसंख्या शिया मुसलमानों की है और वह सभी पाक विरोधी है । वह आज भी अपनी लड़ाई खुद लड़ रहे हैं, पर भारत उनके साथ है ऐसा उनको महसूस कराना चाहिए, देश कभी उनके साथ खड़ा नहीं हुआ । वास्तव में पूरे देश में इसकी चर्चा होनी चाहिए ।

वास्तव में जम्मू-कश्मीर के विमर्श का मुद्दा बदलना चाहिए । जम्मू कश्मीर को लेकर सारे देश में सही जानकारी देने की जरूरत है । इसके लिए एक इंफॉर्मेशन कैंपेन चलना चाहिए । पूरे देश में वर्ष में एक बार 26 अक्टूबर को जम्मू कश्मीर का दिवस मनाना चाहिए ।
अगर आप इस श्रंखला को अधिक से अधिक जनता के अंदर प्रसारित करेंगे, तभी हम जम्मू कश्मीर के विमर्श का मुद्दा बदल सकते हैं अन्यथा नहीं । इसलिए मेरा आप सभी से यही अनुरोध है श्रृंखला को अधिक से अधिक लोगों की जानकारी में लाया जाए ।

देश की जनता को जम्मू कश्मीर के संदर्भ में सही तथ्यों का पता लग सके, ऐसा मेरा प्रयास है ।

साभार :-
अभिजीत श्रीवास्तव
INDIA INDEPENDECE ACT 1947
INDIAN CONSTITUTION ACT 1950
JAMMU & KASHMIR ACT 1956
INDIAN GOVT. ACT 1935

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कश्मीर के हिंदू राजा हरिसिंह ने भरे दरबार में जवाहरलाल नेहरु को थप्पड़ भी मारा था
पूरी कहानी पढ़िए ————

आप लोगों में से बहुत ही कम जानते होंगे कि नेहरू पेशे से वकील था लेकिन किसी भी क्रांतिकारी का उसने केस नहीं लड़ा ॥

बात उस समय की है जिस समय महाराजा हरिसिंह 1937 के दरमियान ही जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे लेकिन शेख अब्दुल्ला इसके विरोध में थे क्योंकि शेख अब्दुल्ला महाराजा हरिसिंह के प्रधानमंत्री थे और कश्मीर का नियम यह था कि जो प्रधानमंत्री होगा वही अगला राजा बनेगा लेकिन महाराजा हरि सिंह प्रधानमंत्री के कुकृत्य से भलीभांति परिचित थे इसलिए कश्मीर के लोगों की भलाई के लिए वह 1937 में ही वहां लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे लेकिन शेख अब्दुल्ला ने बगावत कर दी और सिपाहियों को भड़काना शुरू कर दिया लेकिन राजा हरि सिंह ने समय रहते हुए उस विद्रोह को कुचल डाला और शेख अब्दुल्ला को देशद्रोह के केस में जेल के अंदर डाल दिया ॥

शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरू की दोस्ती प्रसिद्ध थी , जवाहरलाल नेहरू शेख अब्दुल्ला का केस लड़ने के लिए कश्मीर पहुंच जाते हैं , वह बिना इजाजत के राजा हरिसिंह द्वारा चलाई जा रही कैबिनेट में प्रवेश कर जाते हैं , महाराजा हरि सिंह के पूछे जाने पर नेहरु ने बताया कि मैं भारत का भावी प्रधानमंत्री हूं ॥

राजा हरिसिंह ने कहा चाहे आप कोई भी है , बगैर इजाजत के यहां नहीं आ सकते , अच्छा रहेगा आप यहां से निकल जाएं ॥

नेहरु ने जब राजा हरि सिंह के बातों को नहीं माना तो राजा हरिसिंह ने गुस्सा में आकर नेहरु को भरे दरबार में जोरदार थप्पड़ जड़ दिया और कहा यह तुम्हारी कांग्रेस नहीं है या तुम्हारा ब्रिटिश राज नहीं है जो तुम चाहोगे वही होगा ॥ तुम होने वाले प्रधानमंत्री हो सकते हो लेकिन मैं वर्तमान राजा हूं और उसी समय अपने सैनिकों को कहकर कश्मीर की सीमा से बाहर फेंकवा दिया ॥

कहते हैं फिर नेहरू ने दिल्ली में आकर शपथ ली कि वह 1 दिन शेख अब्दुल्ला को कश्मीर के सर्वोच्च पद पर बैठा कर ही रहेगा इसीलिए बताते हैं कि कश्मीर को छोड़कर अन्य सभी रियासतों का जिम्मा सरदार पटेल को दिया गया और एकमात्र कश्मीर का जिम्मा भारत में मिलाने के लिए जवाहरलाल नेहरु ने लिया था ॥

सरदार पटेल ने सभी रियासतों को मिलाया लेकिन नेहरू ने एक थप्पड़ के अपमान के लिए भारत के साथ गद्दारी की ओर शेख अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाया और 1955 में जब वहां की विधानसभा ने अपना प्रस्ताव पारित करके जवाहरलाल नेहरू को पत्र सौंपा कि हम भारत में सभी शर्तों के साथ कश्मीर का विलय करना चाहते हैं तो जवाहरलाल नेहरू ने कहा —- नहीं अभी वह परिस्थितियां नहीं आई है कि कश्मीर का पूर्ण रूप से भारत में विलय हो सके ॥ इस प्रकार उस पत्र को प्रधानमंत्री नेहरू ने ठुकरा दिया था और उसका खामियाजा भारत आज तक भुगत रहाहै।

डोगरा राजा हरिसिंह जी द्वारा 👉इंडियन डोमीनियन स्टेट 👈 मे बिना शर्त शामिल होने वाला संधि / समझौता / एक्सेशन लैटर लागू हो ।

ढकोसला बंद हो

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जनमेजय अध्वर्यु

✍ કાશ્મીર અને નાગજાતિ ✍

👉 શું આ તમે જાણો છો ?
કાશ્મીર નામ કોના પરથી પડયું તે!!!
કાશ્મીરનો ઉલ્લેખ મહાભારત અને આપણા પ્રાચીન ગ્રંથોમાં થયો છે
કારણકે કાશ્મીર નામ કાશ્મીરના પ્રથમ રાજા કશ્યપ ઋષિના નામ પરથી જ પડયું છે
એમની પત્ની કદ્રુનાં ગર્ભમાંથી નાગોની ઉત્પત્તિ થઇ થઇ
આ આખી જાતિ હતી જે લગભગ ઈસ્વીસનની ૯મી સદીમાં ત્યાંથી વિલુપ્ત થઇ ગઈ હતી
એવું માનવામાં આવે છે કે —–
આત્યારના કાશ્મીરી પંડિતોની જેમ એમને પણ ત્યાંથી કાઢી મુકવામાં આવેલાં
કહો કે એમનું સ્થળાંતર થઇ ગયું હતું
ત્યાર પછી આ જાતિનું શું થયું એની કોઈને પણ ખબર નથી
એનો ત્યાર પછી ક્યાંય પણ ઉલ્લેખ નથી
૮મી ૯મી સદીમાં કાશ્મીરની રાજધાની હતી અવંતિપુરા
એ પણ એમના રાજાના નામ પરથી આ નામ પડયું છે
એમને ત્યાં શિવ મંદિરો અને અને વિષ્ણુ મંદિરો બંધાવેલા
તેમાં આ નાગોના શિલ્પો ખાસ જ જોવાં જેવાં છે
એ વિષે હું વિગતે વાત અવંતિપુરાના લેખમાં કરીશ
અત્યારે મારે તમને આ ખાસ આ નાગજાતિ વિષે જણાવવું હતું !!!
આ આ નાગજાતિની સરખામણી આપણા કાશ્મીરી પંડિતો સાથે કરવામાં આવે છે
અ એવો પણ એક મત પ્રવર્તે છે કે આ નાગજાતિમાંથી જ આ પંડિતો જન્મ્યા હતાં
એવું મન માનવામાં આવે છે કે આ નાગજાતિએ પોતાની ઓળખ છુપાવવા નામ અને જાતિ બદલીને ત્યાં રહેતાં હતાં
જેઓ પાછળથી કાશ્મીરી પંડિતો કહેવાયા
હવે નાગજાતિ તો ત્યાંથી જતી રહી
પણ ત્યારબાદ એનું સ્થાન આ પંડિતોએ લીધું એટલે એવું માનવા માટે મન પ્રેરાય છે જરૂર !!!
પંડિતોએ જે શૈવ સંપ્રદાય શરુ કર્યો હતો તે પણ આ આઠમી સદીમાં જ
આ જ અરસામાં એક મહાન શક્તિશાળી ને લડવૈયો રાજા ત્યાં થયો નામ છે એનું ——- લાલીતાદિત્ય મુક્તાપીડ
જેમણે અનંતનાગમાં માર્તંડ સૂર્યમંદિર બંધાવ્યું હતું
એ વિષે મેં લખ્યું છે એ વાંચજો ના વાંચ્યું હોય તો આ માર્તંડ સૂર્ય મંદિર વિષે હું ફરીથી લખવાનો જ છું ત્યારે વાંચજો
આ રાજાનો ઉલ્લેખ મારે ખાસ કરવો જોઈએ
એટલાં માટે કે આ રાજાને કોઈએ પણ બિરદાવ્યો નથી
ત્યાંના ઇતિહાસમાં માત્ર એનું માત્ર નામ અને જગ્યાઓ જ છે
અવંતિપુરા અને ડોગરા વંશના મહારાજા હરિસિંહનાં જ વધારે વખાણ થાય છે
જયારે હકીકતમાં વખાણને લાયક આ રાજા લલિતાદિત્ય મુક્તાપીડ વધારે છે
એજ હું સાબિત કરવાનો છું એમનાં વિશેના સ્વતંત્ર લેખમાં !!!

👉 પણ આ પહેલાં સ્થળોનાં નામ તો પહેલેથી જ હતાં
આજે નાગજાતિ કે કશ્યપના પુત્રો નાગ પરથી જ પાડવામાં આવેલાં છે
કાશ્મીરમાં નાગ નામનાં ઘણાં સ્થળો છે
જેમકે —

● અનંતનાગ
● કમરૂનાગ
● કોકરનાગ
● વેરીનાગ
● નારાનાગ
● કૌસરનાગ

👉 આ બધાં નામો એ નાગજાતિનું પ્રભુત્વ જ દર્શાવે છે
ત્યાર પછી બુટશીકાન નામનો મુસ્લિમ શાસક ત્યાં રાજગાદીએ આવ્યો
અને તેનાં આવ્યાં પછી જ ત્યાં હિન્દુધર્મ ખતરામાં આવ્યો
અને એના પરિણામ સ્વરૂપે આ સ્થળાંતર અને ધર્મ પરિવર્તન શરુ થયાં
એમનું અસ્તિત્વ જોખમમાં તો પહેલેથી જ હતું તેમાં મુસ્લિમોના શાસને બળતામાં ઘી હોમવાનું કામ કર્યું
એ વખતે કાશ્મીર એક અલગ રાજ્ય હતું
જે પાછળથી માલેચ્છોના કારણે ભારતનો હિસ્સો બન્યું
આમ તો ચંદ્રગુપ્તે કાશ્મીરને અખંડ ભારતનો હિસ્સો બનાવ્યો હતો
પણ ત્યાર પછીથી સમ્રાટ હર્ષવર્ધનનાં અસ્ત પછી મધ્યકાળ સમાપ્ત થઇ ગયો
અને ત્યાં પછી ઇસ્લામ ધર્મના આગમને જ કાશ્મીરની ઘોર ખોદી અને એની પડતી શરુ થઇ
આ ધર્મઝનુન તે સમયથી જ કાશ્મીરમાં હતું
કાશ્મીર એ મોગલોને પણ પ્રિય હતું
એટલેજ શ્રીનગર એ મોગલોનું ઉનાળુ પાટનગર હતું
આમેય કાશ્મીર સાથે મોગલોને બહુજ ઘેરો નાતો છે
પાકિસ્તાન – અફઘાનિસ્તાન અને મોંગોલિયા ત્યાંથી જ જવાય ને !!!
ગઝની ની નજર આના પર પડી નહોતી નહીંટર એ એને પોતાનામાં જ ભેળવી દેત
અને ઘોરી અને ખિલજીની પણ !!!
કાશ્મીરમાં ઘણાં મુસ્લિમ શાસકોએ મોગલ પહેલાં રાજ્ય કર્યું હતું
તેમણે બીજું તો કંઈ જ ના કર્યું પણ પ્રજાને રંજાડવાનું જ કાર્ય કર્યું
એ રાજાઓ – શાસકો એટલાં બધાં મહત્વનાં નહોતાં
એટલે એમનો ક્યાંય પણ ઉલ્લેખ થયો નહીં
કે એમની નોંધ પણ ક્યાંય લેવાઈ નહીં
એટલે કાશ્મીર એકલું અટુલું પડી ગયું અને પાછળથી મનસ્વી બની ગયું
કાશ્મીર એ પ્રવાસીઓને પહેલાં પણ આકર્ષતું હતું
એટલે જ ત્યાં આક્રમણો થતાં નહોતાં
એના પર રાજ કરવાની બધાંની મહેચ્છાઓ હતી
દિલ્હીનાં શાસકોને ખાલી મેવાડ જ મનમાં ખટકતું હતું
મોગલોના દીર્ઘકાલીન શાસન દરમિયાન એમને કાશ્મીર પર નજર દોડાવી હતી
રાજધાની ઉનાળુ શ્રીનગર બનાવી અને કાશ્મીર ભારતના લોકોની નજરે ચડયું
પ્રજા તો ત્રસ્ત આઠમી સદીથી જ હતી
પણ એવું ના કહી શકાય કે એ વિસ્તાર સમગ્ર મુસ્લિમોનો હતો !!!
પણ દિલ્હીના શાસકોએ એને અવગણ્યું
એની મહતા વધારી મોગલસમયમાં
એટલેજ તે સમય દરમિયાન ૧૫મી સદીથી ત્યાં સરોવરો અને ગાર્ડનો બન્યાં
જે આ જે ભારતની શાન સમાં છે !!!

👉 કાશ્મીરનો વિકાસ અને કાશ્મીરમાં હીન્દુનું પ્રભુત્વ વધાર્યું ડોગરા વંશે
એમાં પણ મહારાજા હરિસિંહે કાશ્મીરનો ખુબ વિકાસ કર્યો
ત્યારે પણ ત્યાં મુસ્લિમો તો હતાં જ પણ હળીમળીને સંપીને રહેતાં હતાં
કોઈ પ્રોબ્લેમ જ નહોતો
પ્રોબ્લેમ અંગ્રેજોના આગમનથી થયો
કાશ્મીર પર ધ્યાન આપવું જોઈએ એટલું કોઈએ આપ્યું નહિ અને મુસ્લિમોને ત્યાં છૂટો દોર મળી ગયો
આઝાદી પહેલાં કાશ્મીર વિષે જ્યારે આપણને ભાન થયું ત્યારે ઘણું મોડું થઇ ગયું હતું અને પાણી સરથી ઉપર જતું રહ્યું હતું
પણ તોય મહારાજા હરિસિંહના પિત્રુકોએ તેને બચાવી જરૂર રાખ્યું હતું
પણ એક માણસે મહારાજા હરીસીન્હને અંધારામાં રાખીને
મહારાજા હરિસિંહનું વલણ ભારત તરફી હોવાનું માલુમ થતાં
મહારાજા હરિસિંહ સ્વતંત્ર રહેવા માંગતા હતાં ત્યારે એ માણસે એમનું માન રાખવાં ખાતર એમની મહેચ્છા પરિપૂર્ણ થાય એ રીતે આઝાદી પછી સંધી કરાવી અને એ પોતે નહેરુ સાથે મળીને ત્યાનો સર્વે સર્વાં બની બેઠો
એની મહત્વકાંક્ષાએ જ કાશ્મીર પ્રોબ્લેમને આમંત્રણ આપ્યું
નામ છે એનું —– શેખ અબ્દુલ્લા !!!
નહેરુએ એમને ત્યાંના પ્રધાન મંત્રી બનાવ્યા
અને એનો ઝંડો અલગ આપ્વ્યો
આનો ઉહાપોહ થયો પછી જ સંવિધાનમાં બધી કલમો ઉમેરવામાં આવી શેખ અબ્દુલ્લની ઇચ્છાથી અને એને અનુકુળ થાય એ રીતે
આમ ધારા ૩૭૦ અને ધારા ૩૫Aનો જન્મ થયો
જે શેખ અબ્દુલ્લાને કહેવાતી ભારતીય બંધારણીય સત્તા આપતો હતી પણ એ બાકી બધીજ રીતે સ્વતંત્ર હતો
એને પ્રધાનમંત્રી ના કહેવો પડે અને મુખ્યમંત્રી ગણાય એ માટે જ બંધારણમાં એની જોગવાઈ કરવામાં આવી હતી
પણ નહેરુનાં કાશ્મીર પ્રેમે ક્સમીરને બિન્દાસ અને આઝાદ બનાવી દીધું !!!
કલમોનું તો અચ્યુતમ કેશવમ થઇ ગયું

👉 પણ અ નાગ જાતિ પર લાગેલું કલંક કોણ ભૂંસશે એ મારે મન એક તો સવાલ છે
આ નાગજાતિનાં પ્રેમને લીધે જ ૧૨૫ વર્ષે જે યોગ આવ્યો હતો એ સોમવારે નાગપંચમી એટલાં માટે આ દિવસ પસંદ કરવામાં આવ્યો હતો
કાલસર્પોનો નાશ કરવાનો !!!
અને આમ નાગોના પિતૃક દેશ કાશ્મીરને આઝાદ કર્યો
જે થઇ ગયું એનો મને તો બહુ જ આનંદ છે !!!
પણ આ મુહુર્ત માટે ચોક્કસ મોદીજી અને અમિત શાહને અભિનંદન આપવાં ઘટે !!!
એને અને પાંચમી ઓગષ્ટ સાથે કોઈજ લેવાદેવા નથી
પંડિતો તો પુનઃ વસવાટ કરી શકશે પણ નાગજાતિ પર હજી વધારે સંશોધન થવું જોઈએ એવું મારું તો સ્પષ્ટપણે માનવું છે !!!

***** કાશ્મીરનો ઈતિહાસ આમાં અલપઝલપ જ વણી લીધો છે
એ વિષે વિગતે અભ્યાસ લેખ હું જરૂર લખીશ *****

!! જય હિંદ !!
!! વંદે માતરમ !!

———– જનમેજય અધ્વર્યુ

🌲🌳🌿🌱☘🍀🍁🌻🌺

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas, Kashmir

कश्मीर के आखिरी राजा हरिसिह ने शेखअब्दुल्ला को देशद्रोह के आरोप मे जेल मे डाला था,शेखअब्दुल्ला के वकील
जवाहर लाल नेहरु
थे !

कश्मीर के हिंदू राजा हरिसिंह ने भरे दरबार में जवाहरलाल नेहरु को थप्पड़ भी मारा था
पूरी कहानी पढ़िए …. ————

आप लोगों में से बहुत ही कम जानते होंगे कि नेहरू पेशे से वकील था लेकिन किसी भी क्रांतिकारी का उसने केस नहीं लड़ा ॥

बात उस समय की है जिस समय महाराजा हरिसिंह 1937 के दरमियान ही जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे लेकिन शेख अब्दुल्ला इसके विरोध में थे क्योंकि शेख अब्दुल्ला महाराजा हरिसिंह के प्रधानमंत्री थे और कश्मीर का नियम यह था कि जो प्रधानमंत्री होगा वही अगला राजा बनेगा लेकिन महाराजा हरि सिंह प्रधानमंत्री के कुकृत्य से भलीभांति परिचित थे इसलिए कश्मीर के लोगों की भलाई के लिए वह 1937 में ही वहां लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे लेकिन शेख अब्दुल्ला ने बगावत कर दी और सिपाहियों को भड़काना शुरू कर दिया लेकिन राजा हरि सिंह ने समय रहते हुए उस विद्रोह को कुचल डाला और शेख अब्दुल्ला को देशद्रोह के केस में जेल के अंदर डाल दिया ॥

शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरू की दोस्ती प्रसिद्ध थी , जवाहरलाल नेहरू शेख अब्दुल्ला का केस लड़ने के लिए कश्मीर पहुंच जाते हैं , वह बिना इजाजत के राजा हरिसिंह द्वारा चलाई जा रही कैबिनेट में प्रवेश कर जाते हैं , महाराजा हरि सिंह के पूछे जाने पर नेहरु ने बताया कि मैं भारत का भावी प्रधानमंत्री हूं ॥

राजा हरिसिंह ने कहा चाहे आप कोई भी है , बगैर इजाजत के यहां नहीं आ सकते , अच्छा रहेगा आप यहां से निकल जाएं ॥

नेहरु ने जब राजा हरि सिंह के बातों को नहीं माना तो राजा हरिसिंह ने गुस्सा में आकर नेहरु को भरे दरबार में जोरदार थप्पड़ जड़ दिया और कहा यह तुम्हारी कांग्रेस नहीं है या तुम्हारा ब्रिटिश राज नहीं है जो तुम चाहोगे वही होगा ॥ तुम होने वाले प्रधानमंत्री हो सकते हो लेकिन मैं वर्तमान राजा हूं और उसी समय अपने सैनिकों को कहकर कश्मीर की सीमा से बाहर फेंकवा दिया ॥

कहते हैं फिर नेहरू ने दिल्ली में आकर शपथ ली कि वह 1 दिन शेख अब्दुल्ला को कश्मीर के सर्वोच्च पद पर बैठा कर ही रहेगा इसीलिए बताते हैं कि कश्मीर को छोड़कर अन्य सभी रियासतों का जिम्मा सरदार पटेल को दिया गया और एकमात्र कश्मीर का जिम्मा भारत में मिलाने के लिए जवाहरलाल नेहरु ने लिया था ॥

सरदार पटेल ने सभी रियासतों को मिलाया लेकिन नेहरू ने एक थप्पड़ के अपमान के लिए भारत के साथ गद्दारी की ओर शेख अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाया और 1955 में जब वहां की विधानसभा ने अपना प्रस्ताव पारित करके जवाहरलाल नेहरू को पत्र सौंपा कि हम भारत में सभी शर्तों के साथ कश्मीर का विलय करना चाहते हैं तो जवाहरलाल नेहरू ने कहा —- नहीं अभी वह परिस्थितियां नहीं आई है कि कश्मीर का पूर्ण रूप से भारत में विलय हो सके ॥ इस प्रकार उस पत्र को प्रधानमंत्री नेहरू ने ठुकरा दिया था और उसका खामियाजा भारत आज तक भुगत रहा है ॥

Posted in Kashmir

“धारा 370″( पढ़ कर आगे औरों के शेयर करे)
“जरूर जानिए”

Please 5 minutes tak is msg ko
aaram se padhiye,
samajhiye

जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है ।


जम्मू-कश्मीर का राष्ट्रध्वज अलग होता है

जम्मू – कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है

जबकी भारत के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल 5

वर्ष का होता है ।

जम्मू-कश्मीर के अन्दर भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं होता है ।

भारत के उच्चतम न्यायलय के आदेश जम्मू – कश्मीर के अन्दर मान्य नहीं होते हैं

भारत की संसद को जम्मू – कश्मीर के सम्बन्ध में अत्यंत सीमित

क्षेत्र में कानून बना सकती है ।

जम्मू कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के
व्यक्ति से विवाह कर ले तो उस महिला की नागरिकता समाप्त हो जायेगी ।
इसके विपरीत यदि वह पकिस्तान के

किसी व्यक्ति से विवाह कर ले तो उसे भी जम्मू – कश्मीर की नागरिकता मिल जायेगी ।

और

धारा 370 की वजह से कश्मीर में RTI लागु नहीं है ।
RTE लागू नहीं है ।
CAG लागू नहीं होता ।

भारत का कोई भी कानून लागु नहीं होता ।

कश्मीर में महिलाओ पर शरियत कानून लागु है ।
कश्मीर में पंचायत के अधिकार नहीं ।
कश्मीर में चपरासी को 2500 ही मिलते है.

कश्मीर में अल्पसंख्यको [ हिन्दू- सिख ] को 16 % आरक्षण नहीं मिलता ।

धारा 370 की वजह से कश्मीर में बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते है ।

धारा 370 की वजह से ही पाकिस्तानियो को भी भारतीय
नागरीकता मिल जाता है ।

इसके लिए पाकिस्तानियो को केवल किसी कश्मीरी लड़की से

शादी करनी होती है ।

अच्छी शुरुवात है कम से कम 370 हटाने की दिशा में एक कदम आगे की ओर मोदी जी को धन्यवाद जो उन्होनें धारा 370
का मुद्दा उठाया ।

अब यदि कोई सेकुलर इन तथ्यों के विषय में कुछ कहना चाहे
तो स्वागत हैं…!!!
370 धारा हटाना ही है…. इसलिए मेसेज को ज्यादा से ज्यादा फैलाओ
कश्मीर में आप
तिरंगा नहीं फहरा सकते,

कन्याकुमारी में रिक्शे के पीछे आप जय श्री राम नहीं लिख सकते,

हैदराबाद में मन्दिर की आप
घंटी नहीं बजा सकते,

कलकत्ता में आप अपने घर के दरवाजे पर
बजरंगबली की मूर्ति नहीं लगा सकते.

फिर कैसे कहूं की कश्मीर से
कन्याकुमारी तक भारत एक है ??

65 सालो के इतिहास में :-
पहली बार जिसने खुल के 370 का विरोध किया हे । तो उसका साथ दीजिये ।
सुशील कुमार सराओगी, पत्रकार, दिल्ली
आपको सिर्फ 3 लोगो को मेसेज जरुर करना है , जनहित का ये मेसेज सिर्फ आप सब के पढने के लिए नहीं है…. आगे क्या करना है इस मेसेज का, आप खुद समझदार है

भारत माता की जय