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देवी सिंग तोमर

19 जनवरी 1990 को काश्मीर में जो कुछ भी हुआ उसकी नींव करीब सौ साल पहले रखी गयी थी ।

सन 1889 में डोगरा शाषक प्रताप सिंह की राजकीय ताकतें छीन कर ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाई गई स्टेट काउंसिल को दे दी गयी ।
स्टेट काउंसिल ने प्रशासनिक भर्तियों की प्रकिया को इंडियन सिविल सर्विसेज के द्वारा लागू कर दिया गया और राज्य भाषा फ़ारसी से बदलकर उर्दू कर दी गयी ।
अभी तक राज्य के प्रशाषन में कश्मीरी पंडितों का बोलबाला था जो अंग्रेजी माध्यम की परीक्षा व्यवस्था के बाद बदल गया । कश्मीर के प्रशासनिक पदों में बाहरी राज्य के लोगों का दबदबा बढ़ने लगा खासकर हिन्दू पंजाबियों का ।
लगातार अपना दबदबा खो रहे पंडितों ने स्टेट कॉउन्सिल से लेकर डोगरा राजा और ब्रिटिश सरकार तक बार बार अपनी बात पहुंचाई ।
1905 में प्रताप सिंह को वापस राजा बना दिया गया और कश्मीरी पंडितों के दबाव में 1912 में सीमित बनाई गई जिसने ये माना कि हर वो व्यक्ति जिसके पास राज्य में स्थाई सम्पत्ति है या जो 20 वर्ष से राज्य में रह रहा हो उसे स्थाई निवासी माना जायेगा और प्रशासनिक पदों में उनको वरियता दी जायेगी ।
1912 के बने इस फार्मूले ने भी पंडितों में ज्यादा उत्साह नही भरा क्योंकि अधिकतर पंजाबी राज्य में बीस से अधिक वर्ष से रह रहे थे और मुस्लिम समाज ने अपने समाज की पिछड़ी स्थिति को देखकर इस दौड़ से खुद को दूर ही रखा क्योंकि वो जानते थे मेरिट के आधार पर चयन से उनका कोई फायदा नही होना है हालांकि उन्होंने मुस्लिमों की संख्या बढ़ाने के लिये दूसरे राज्य से मुस्लिमों को चुने जाने की मांग रखी जिसे डोगरा राजा द्वारा खारिज कर दिया गया ।
कश्मीरी पंडितों ने इसके बाद स्थाई निवासी की परिभाषा बदलने के लिये दबाव बनाना शुरू किया ।
संकर लाल कौल ने पहली बार कश्मीरियत को परिभाषित करने का प्रयास किया और सिर्फ उन्हें ही कश्मीरी मुल्की माना जो पाँच जनरेशन से राज्य में रह रहा हो ।
कश्मीरियत के इस फार्मूले से काश्मीरी पंडितों ने काश्मीरी मुसलमानों को भी अपनी मुहिम में जोड़ने की कोसिस शुरू की जो अभी तक मेरिट के सवाल पर चयन के विरुद्ध थे ।
प्रताप सिंह की मृत्यु के बाद राजा हरि सिंह ने शाषन सम्भाला और 31 जनवरी 1927 को नये स्टेट ऑर्डर द्वारा कश्मीरी मुल्की होने को फिर से डिफाइन किया गया और प्रथम दर्जे का नागरिक उन्हें माना गया जो प्रथम डोगरा राजा के समय से राज्य में बसे हुये थे और इन्हें प्रशसनिक पदों में उच्च वरीयता दी गयी ।
जन्हा एक ओर इस कानून के बाद पंडितो का बोलबाला प्रशासन में फिर से बढ़ने लगा मुसलमानों की स्थिति में शिक्षा की कमी की वजह से ज्यादा सुधार ना हुआ और उन्होंने जनसँख्या के आधार पर रिजर्वेशन की मांग की जिसे सिरे से नकार दिया गया ।
मुसलमानों ने इसके बाद राजा हरि सिंह और कश्मीरी पंडितों के खिलाफ मुहिम शुरू कर दी जिसका परिणीति हुई 13 जुलाई 1931 को भयानक दंगो के रूप ने जिसमे मुसलमानों ने कश्मीरी पंडितों पर हमले कर घरो को जलाना शुरू कर दिया जिसका अंतिम विस्तार 19 जनवरी 1990 को कश्मीरी पंडितों के निर्वासन के रूप में हुआ ।
आज सीएए और एनसीआर का विरोध करने वाले हिंदुओं खासकर असमिया हिंदुओं के तर्क आज वही नजर आते हैं जो 1912 में कश्मीरी पंडितों के थे ।

इतिहास पढ़ने का कोई फायदा नही अगर उससे कुछ सीखा ना जाय

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कश्मीर का शब्दार्थ है :—
वह भू-भाग जहाँ से पानी को निकाल दिया गया हो।
ब्रह्मा के पौत्र और मरीचि के पुत्र कश्यप ऋषि ने इस भूमि से वराहमूल (आज का बारामुल्ला) की पहाड़ियों को काटकर स्थिर जल को रास्ता देकर यहाँ ब्राह्मणों को बसाया था। कश्मीर के मुख्य शहर को कश्यपपुर भी कहा जाता था जिसका रिकॉर्ड हेकेटेइयस और हेरोडोटस के लेखन में क्रमशः कसपेपीरोस और कसपातायरोस, एवम् टोल्मी के समय में ‘कस्पेरिया’ के नाम से मिल जाता है।

यूँ तो कश्मीर में मानवीय सभ्यता आज से लगभग 5,000 वर्ष पूर्व से शुरु हो जाती है, जिसके पौराणिक, वैदिक और प्रागौतिहैसिक प्रमाण उपलब्ध हैं जहाँ वैदिक काल में उत्तर कुरुओं को कश्मीर में बसने का जिक्र आता है। अगर ऐतिहासिक तथ्यों की बात करें तो कल्हण की ‘राज-तरंगिनी’ में पौराणिक काल से ले कर बारहवीं शताब्दी तक के शासकों की चर्चा है।

सिकंदर के समकालीन, 326 ईसा पूर्व में अभिसार कश्मीर का राजा था। उसके बाद यह मौर्य साम्राज्य का हिस्सा बना और बौद्ध स्तूप और शिव मंदिरों ने कश्मीर में जगह बनाई। फिर कनिष्क का शासनकाल आया, जब बौद्ध और हिन्दू धर्म की शिक्षा का केन्द्र बन कर कश्मीर की ख्याति चीन तक पहुँच चुकी थी। उसके बाद हूणों ने कश्मीर को जीत लिया, फिर कारकोटा साम्राज्य आया, तत्पश्चात उत्पलों का शासन चला। नवीं से 11वीं शताब्दी तक शैव दर्शन पर यहाँ खूब कार्य हुआ ।

उसके बाद लोहार वंश के जनविरोधी शासन के कारण वहाँ पहली बार मुसलमानों के आगमन का रास्ता खुला। चौदहवीं शताब्दी आते-आते इस्लाम कश्मीर घाटी का बहुसंख्यक मजहब बन चुका था। संस्कृत साहित्य गायब कर दिया गया और सुल्तान सिकंदर ने ‘बुतशिकन’ की उपाधि ले कर इस्लामी आतंक की नींव रख दी थी। फारसी ने लगभग आधिकारिक भाषा की जगह ले ली।

16वीं शताब्दी में हुमायूँ के सेनापति ने हमला बोल कर कश्मीर को कब्जे में लिया, लेकिन अकबर के काल तक इसे सीधे तौर पर मुगलों ने शासन में नहीं लिया था। शिया, शाफी और सूफियों की प्रताड़ना का सिलसिला हुमायूँ के दौर में खूब चला। बाद में औरंगजेब ने मुसलमान आतंकी शासकों की परंपरा कायम रखी और मजहबी भेदभाव के साथ-साथ हिन्दुओं और बौद्धों से मुगलिया जजिया उगाही जारी रखी।

लगभग चार सौ सालों के मुसलमानी शासन के बाद 19वीं शताब्दी में कुछ समय तक कश्मीर सिखों के शासन में रहा जब पंजाब के रंजीत सिंह ने इसे अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाया। 1846-1947 तक डोगरा राजाओं ने कश्मीर पर राज किया। 1901 में कश्मीर घाटी में मुसलमानों का प्रतिशत 93.6 था, हिन्दू 5.4% थे। कहने को तो मुसलमानों का यह प्रतिशत सौ सालों में बहुत बदला नहीं है, जो कि अब 95% से ज्यादा है, लेकिन कश्यप ऋषि के द्वारा वराहमुला की पहाड़ी को काट कर ब्राह्मणों को बसाने वाले कश्मीर में तीस साल पहले जो हुआ, वो धार्मिक नरसंहार हिन्दुओं को भूलना नहीं चाहिए।

….. अब तीस साल पहले 1990 के कुछ किस्से !!
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25 जून 1990 गिरिजा टिकू नाम की कश्मीरी पंडित की हत्या के बारे में आप जानेंगे तो सिहर जाएँगे। सरकारी स्कूल में लैब असिस्टेंट का काम करती थी। मुसलमान आतंकियों के डर से वो कश्मीर छोड़ कर जम्मू में रहने लगी। एक दिन किसी ने उसे बताया कि स्थिति शांत हो गई है, वो बांदीपुरा आ कर अपनी तनख्वाह ले जाए। वो अपने किसी मुस्लिम सहकर्मी के घर रुकी थी। मुसलमान आतंकी आए, उसे घसीट कर ले गए। वहाँ के स्थानीय मुसलमान चुप रहे क्योंकि किसी काफ़िर की परिस्थितियों से उन्हें क्या लेना-देना। गिरिजा का सामूहिक बलात्कार किया गया, बढ़ई की आरी से उसे दो भागों में चीर दिया गया, वो भी तब जब वो जिंदा थी। ये खबर कभी अखबारों में नहीं दिखी।

4 नवंबर 1989 को जस्टिस नीलकंठ गंजू को दिनदहाड़े हायकोर्ट के सामने मार दिया गया। उन्होंने मुसलमान आतंकी मकबूल भट्ट को इंस्पेक्टर अमरचंद की हत्या के मामले में फाँसी की सजा सुनाई थी। 1984 में जस्टिज नीलकंठ के घर पर बम से भी हमला किया गया था। उनकी हत्या कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या की शुरुआत थी।

7 मई 1990 को प्रोफेसर के एल गंजू और उनकी पत्नी को मुसलमान आंतंकियों ने मार डाला। पत्नी के साथ सामूहिक बलात्कार भी किया। 22 मार्च 1990 को अनंतनाग जिले के दुकानदार पी एन कौल की चमड़ी जीवित अवस्था में शरीर से उतार दी गई और मरने को छोड़ दिया गया। तीन दिन बाद उनकी लाश मिली।

उसी दिन श्रीनगर के छोटा बाजार इलाके में बी के गंजू के साथ जो हुआ वो बताता है कि सिर्फ मुसलमान आतंकी ही इस लम्बे चले धार्मिक नरसंहार की चाहत नहीं रखते थे, बल्कि स्थानीय मुसलमानों का पूरा सहयोग उन्हें मिलता रहा। कर्फ्यू हटा था तो बी के गंजू, टेलिकॉम इंजीनियर, अपने घर लौट रहे थे। उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनका पीछा किया जा रहा है, हालाँकि घर के पास आने पर उनकी पत्नी ने यह देख लिया। उनके घर में घुसते ही पत्नी ने दरवाजा बंद कर दिया। दोनों ही घर के तीसरे फ्लोर पर चावल के बड़े डब्बों में छुप गए।

आतंकियों ने छान मारा, वो नहीं मिले। जब वो लौटने लगे तो मुसलमान पड़ोसियों ने उन मुसलमान आतंकियों को वापस बुलाया और बताया कि वो कहाँ छुपे थे। आतंकियों ने उन्हें बाहर निकाला, गोलियाँ मारी, और जब खून चावल में बह कर मिलने लगा, तो जाते हुए मुसलमान आतंकियों ने कहा, “इस चावल में खून को मिल जाने दो, और अपने बच्चों को खाने देना। कितना स्वादिष्ट भोजन होगा वो उनके लिए।”

12 फरवरी 1990 को तेज कृष्ण राजदान को उनके एक पुराने सहकर्मी ने पंजाब से छुट्टियों में उनके श्रीनगर आने पर भेंट की इच्छा जताई। दोनों लाल चौक की एक मिनि बस पर बैठे। रास्ते में मुसलमान मित्र ने जेब से पिस्तौल निकाली और छाती में गोली मारी। इतने पर भी वो नहीं रुका, उसने राजदान जी को घसीट कर बाहर किया और लोगों से बोला कि उन्हें लातों से मारें। फिर उनके पार्थिव शरीर को पूरी गली में घसीटा गया और नजदीकी मस्जिद के सामने रख दिया गया ताकि लोग देखें कि हिन्दुओं का क्या हश्र होगा।

24 फरवरी 1990 को अशोक कुमार काज़ी के घुटनों में गोली मारी गई, बाल उखाड़े गए, थूका गया और फिर पेशाब किया गया उनके ऊपर। किसी भी मुसलमान दुकानदार ने, जो उन्हें अच्छे से जानते थे, उनके लिए एक शब्द तक नहीं कहा। जब पुलिस का सायरन गूंजा तो भागते हुए उन्होंने बर्फीली सड़क पर उनकी पीड़ा का अंत कर दिया। पाँच दिन बाद नवीन सप्रू को भी इसी तरह बिना किसी मुख्य अंग में गोली मारे, तड़पते हुए छोड़ा गया, मुसलमानों ने उनके शरीर के जलने तक जश्न मनाया, नाचते और गाते रहे।

30 अप्रैल 1990 को कश्मीरी कवि और स्कॉलर सर्वानंद कौल प्रेमी और उनके पुत्र वीरेंदर कौल की हत्या बहुत भयावह तरीके से की गई। उन्होंने सोचा था कि ‘सेकुलर’ कश्मीरी उन्हें नहीं भगाएँगे, इसलिए परिवार वालों को लाख समझाने पर भी वो ‘कश्मीरी सेकुलर भाइयों’ के नाम पर रुके रहे। एक दिन तीन ‘सेकुलर’ आतंकी आए, परिवार को एक जगह बिठाया, और कहा कि सारे गहने-जेवर एक खाली सूटकेस में रख दें।

उन्होंने प्रेमी जी को कहा कि वो सूटकेस ले लें, और उनके साथ आएँ। घरवाले जब रोने लगे तो उन्होंने कहा, “अरे! हम प्रेमी जी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाएँगे। हम उन्हें वापस भेज देंगे।” 27 साल के बेटे वीरेन्द्र ने कहा कि पिता को अँधेरे में वापसी में समस्या होगी, तो वो साथ जाना चाहता है। “आ जाओ, अगर तुम्हारी भी यही इच्छा है तो!” दो दिन बाद दोनों की लाशें मिलीं। तिलक करने की जगह को छील कर चमड़ी हटा दी गई थी। पूरे शरीर पर सिगरेट से जलाने के निशान थे, हड्डियाँ तोड़ दी गईं थीं। पिता-पुत्र की आँखें निकाल ली गईं थीं। फिर दोनों को रस्सी से लटकाया गया था, और उनकी मृत्यु सुनिश्चित हो, इसके लिए गोली भी मारी गई थी।

मुजू और दो अन्य लोगों को मुसलमान आतंकियों ने किडनैप किया और कहा कि कुछ लोगों को खून की जरूरत है, तो उन्हें चलना होगा। आतंकियों ने उनके शरीर का सारा खून बहा दिया और उनकी मृत्यु हो गई। 9 जुलाई 1990 को हृदय नाथ और राधा कृष्ण के सर कटे हुए मिले। 26 जून 1990 को बी एल रैना जब अपने परिवार को जम्मू लाने के लिए कश्मीर जा रहे थे, तो मुसलमान आतंकियों ने घेर कर मार दिया। 3 जून को, आतंकियों ने उनके पिता दामोदर सरूप रैना की हत्या घर में घुस कर की थी। उन्होंने पड़ोसियों से मदद माँगी, मुसलमान ही थे, नहीं आए।

अशोक सूरी के भाई को गलती से मुसलमान आतंकियों ने उठा लिया। उसे खूब पीटा, टॉर्चर किया और पूरे शरीर को सिगरेट से जलाने के बाद, अधमरे हो जाने पर, बताया कि वो तो उसके भाई के मारना चाहते थे। उसे छोड़ दिया गया। वो किसी तरह घर पहुँच कर भाई को भाग जाने की सलाह देने लगे। भाई ने सलाह नहीं मानी। आधी रात को वो आतंकी घर में आए, लम्बे चाकू से गर्दन काटी और मरने छोड़ कर चले गए।

सोपोर के चुन्नी लाल शल्ला इंस्पेक्टर थे। कुपवाड़ा में पोस्टिंग होने पर उन्होंने दाढ़ी बढ़ा रखी थी कि उन्हें आतंकी पहचान न सकें। एक दिन आतंकी खोजते हुए आए और उन्हें पहचान नहीं पाए, और वापस जाने लगे। उनके साथ ही एक मुसलमान सिपाही भी काम करता था। उसने आतंकियों को वापस बुलाया और बताया कि दाढ़ी वाला ही शल्ला हैं। आतंकी कुछ करते उस से पहले उनके मुसलमान सहकर्मी ने छुरा निकाला और पूरा दाहिना गाल चमड़ी सहित छील दिया। चुन्नी लाल अवाक् रह गए। तब मुसलमान सिपाही ने कहा, “अबे सूअर! तेरे दूसरे गाल पर भी जमात-ए-इस्लामी वाली दाढ़ी नहीं रखने दूँगा।” फिर छुरे से दूसरी तरफ भी काट दिया गया। उसके बाद आतंकियों के साथ मिल कर चुन्नी लाल के चेहरे पर हॉकी स्टिक से ताबड़तोड़ प्रहार किया गया और फिर आतंकियों ने कहा, “दोगले, तेरे ऊपर गोली बर्बाद नहीं करेंगे हम।” रक्त बहते रहने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

28 अप्रैल 1990 को भूषण लाल रैना के साथ जो हुआ वो मुसलमान आतंकियों की क्रूरता सटीक तरीके से बयान करता है। अगले दिन अपनी माँ के साथ घाटी छोड़ने की योजना थी, सामान बाँध रहे थे। मुसलमान आतंकियों की एक टोली आई और रैना के सर में नुकीला छड़ घोंप कर हमला किया। उसके बाद उन्हें खींच कर बाहर निकाला गया, कपड़े उतार कर एक पेड़ पर कीलें ठोंक कर लटकाने के बाद वो उन्हें तड़पाते रहे। भूषण बार-बार कहते रहे कि वो उन्हें गोली मार दें, आतंकियों ने इंतजार किया, गोली नहीं मारी।

25 जनवरी 1998 की रात को वन्धामा गाँव के 23 कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या पूर्वनिर्धारित तरीके से की गई। एक बच्चा जो बच गया, उसने बताया कि मुसलमान आतंकी आर्मी की वर्दी में आए, चाय पिया, और अपने वायरलेस सेट पर संदेश का इंतजार करने लगे। जब खबर आ गई कि सारे कश्मीरी पंडितों के परिवार को एक साथ फँसा लिया गया है, तब एक साथ क्लासनिकोव रायफलों से उनकी नृशंस हत्या कर दी गई। उसके बाद हिन्दुओं के मंदिर तोड़ दिए गए और घरों में आग लगा दी गई।

अगर सिक्खों की बात करें तो कई सिक्खों को उनके परिवार के साथ 1990 से 1992 के बीच इसी क्रूरता से मारा गया। इनमें कई जम्मू कश्मीर पुलिस के सिपाही या अफसर भी शामिल थे। ऐसे ही 1989 से 1992 के बीच छः बार ईसाई मिशनरी स्कूलों पर मुसलमान आतंकियों ने बम धमाके किए।

ये कहानियाँ आज क्यों?
इन कहानियों को अभी कहने का मतलब क्या है? इन कहानियों को अभी कहने का मतलब मात्र यह है कि इसमें से 99% कहानियों के पात्रों का नाम आपको याद भी नहीं होगा। इसलिए, इन्हें इनके शीशे की तरह साफ दृष्टिकोण में मैं आपको बताना चाहता हूँ कि शाब्दिक भयावहता जब इतनी क्रूर है तो उनकी सोचिए जिनके साथ ऐसा हुआ होगा। ये किसी फिल्म के दृश्य नहीं हैं जहाँ नाटकीयता के लिए आरी से किसी को काटा जाता है, किसी की खोपड़ी में लोहे का रॉड ठोक दिया जाता है, किसी की आँखें निकाल ली जाती हैं, किसी के दोनों गाल चाकू से चमड़ी सहित छील दिए जाते हैं, किसी के तिलक लगाने वाले ललाट को चाकू से उखाड़ दिया जाता है…

ये सब हुआ है, और लम्बे समय तक हुआ है। इसमें वहाँ के वो मुसलमान भी शामिल थे, जो आतंकी नहीं थे, बल्कि किसी के सहकर्मी थे, किसी के पड़ोसी थे, किसी के जानकार थे। सर्वानंद कौल सोचते रहे कि उन्होंने तो हमेशा उदारवादी विचार रखे हैं, उन्हें कैसे कोई हानि पहुँचाएगा, लेकिन पुत्र समेत ऐसी हालत में मरे जिसे सोच कर रीढ़ की हड्डियों में सिहरन दौड़ जाती है।

ये आतंकी बनाम हिन्दू नहीं था, बल्कि ये मुसलमान बनाम गैर-मुसलमान था। आतंकी ही होते तो बाजार में घसीटे जा रहे लाश पर कोई मुसलमान कुछ बोलता, आतंकियों को घेरता, पत्थर ही फेंक देता। ऐसा नहीं हुआ। चार सौ सालों के इस्लामी शासन के बाद कश्मीर के गैर-मुसलमान सिमट कर 6% रह गए थे। 1990 की जनवरी से जो धार्मिक नरसंहारों का दौर चला और विभिन्न स्रोतों के मुताबिक तीन से आठ लाख कश्मीरी हिन्दू पलायन को मजबूर हुए।

आज शाहीन बाग के कुछ मुसलमान तख्तियाँ लिए उनके प्रति सहानुभूति जता रहे हैं। यह सहानुभूति नहीं है, यह अपने मतलब के लिए तिरंगे से ले कर राष्ट्रगान और संविधान पर थूकने वाले लोगों द्वारा चली गई एक बारीक चाल है। इनकी धूर्तता देखिए कि इनके पोस्टरों में कश्मीरी हिन्दुओं के लिए कथित सहानुभूति तो है, लेकिन जिन्होंने ऐसी नृशंस हत्याएँ की, उन मुसलमानों के लिए एक भी शब्द नहीं?

क्या कश्मीरी हिन्दू किसी उल्कापिंड के गिरने से कश्मीर छोड़ आए थे? क्या उनके मंदिरों पर उत्तरी कोरिया के इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइलों के नाभिकीय हथियारों से हमला हुआ था! क्या उनके घर दीवाली की पटाखेबाजी में जल गए थे? क्या उनके सिर में घुसा लोहे का रॉड किसी कश्मीरी भालाफेंक एथलीट का जैवलिन था? क्या भूषण रैना को पेड़ में कीलों से टाँगने की कोशिश रोम के लोगों ने की थी कि यह देखा जाए कि तीन दिन बाद पुनर्जीवित होता है कि नहीं?

तो वो लोग, जो स्वार्थ के कारण, आज कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा बाँटने की कोशिश कर रहे हैं, कम से कम अपने गिरेबान में तो झाँके कि ये सब वो बस इसलिए कर रहे हैं क्योंकि शाहीन बाग से पहले एक खास विचारधारा के लोगों ने देश के कई हिस्सों में तो आगजनी और पत्थरबाजी की है, पेट्रोल बम फेंके हैं और कट्टे चला कर 19 लोगों की जानें ली हैं, उनसे देश का ध्यान हट जाए।

वो जानते हैं कि शाहीन बाग की नौटंकी करते रहने से जामिया नगर के बसों में लगाई गई आग को लोग भूल जाएँगे। लोग यह भी भूल जाएँगे कि वहाँ इस्लामी कट्टरपंथी संगठन PFI के 150 मुसलमान घुस आए थे। लोग यह भी भूल जाएँगे कि वहाँ ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ के नारे लगे थे। लेकिन उन्हें भूलना नहीं चाहिए। वो तुम्हें ‘शाहीन बाग में आज ये हुआ’ दिखाते रहेंगे, लेकिन तुम जामिया नगर की आग, उत्तर प्रदेश में 19 मौतें, बंगाल में 250 करोड़ की प्रॉपर्टी के नुकसान, लखनऊ के परिवर्तन चौक की आगजनी, मस्जिदों से बाहर निकल कर पत्थरबाजी और पेट्रोल बम पर सवाल पूछते रहना। नहीं पूछोगे, तो ये वामपंथी मीडिया तुम्हें ही आतंकी बना कर भुना लेगी।

आपको इनकी दोगलई की दाद देनी चाहिए कि कश्मीर के दो-तीन नारे, जो विशुद्ध रूप से हिन्दुओं को भगाने के लिए ही बने थे, वो जामिया में लगते रहे, शाहीन बाग में लगते रहे, और इनकी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि उन्होंने कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा बाँटने के पोस्टर हाथ में ले लिए! ‘ला इलाहा इल्लिल्लाह’ और ‘आज़ादी‘ तो हिन्दुओं से घृणा दर्शाने के कश्मीरी नारे हैं। तुम वो नारे भी लगा रहे हो, और कश्मीरी हिन्दुओं का दुख बाँटने का भी दावा करते हो?

हम वापस आएँगे
आज हजारों कश्मीरी हिन्दुओं ने ये कहा है कि ‘हम वापस आएँगे’। लेकिन उनके ऐसा कहने भर से उनकी वापसी संभव नहीं हो जाती। वो अगर यह सोच रहे हैं कि शाहीन बाग के धूर्त प्रपंचियों की तरह उनके स्वागत में घाटी के मुसलमान तख्तियाँ ले कर खड़े मिलेंगे, तो यह उनकी मूर्खता है। सरकार ने कैम्प तो लगाए थे न इन हिन्दुओं के लिए, उस पर पत्थरबाजी किसने की?

ये वही मुसलमान हैं जिन्होंने अपने पड़ोसी बी के गंजू के चावल के कंटेनर में छिपे होने की बात घर छोड़ कर वापस जाते आतंकियों को बताई थी। और ऐसे पड़ोसियों ने एक बार नहीं, कई बार अपने पड़ोसी होने के इस धर्म को निभाया जब हिन्दुओं की हत्या करने आए मुसलमान आतंकियों को इन्होंने प्रत्यक्ष सहयोग से ले कर, मौन सहमति तक दी। इसलिए आप यह तो भूल ही जाएँ कि इस्लामी शासन के शुरुआत से ही गायब हुए संस्कृत को फारसी से बदल देने वाले लोगों की संतानें ‘स्वागतम्-स्वागतम्’ करती लाल चौक पर आएँगीं।

इनकी वापसी का रास्ता इतना आसान नहीं है। मुसलमानों का इतिहास और वर्तमान बड़ा ही स्पष्ट रहा है, जिस भी इलाके में ये बहुसंख्यक हैं, वहाँ अल्पसंख्यकों के लिए इनके पास घृणा के अलावा और कुछ नहीं। अगर सिर्फ मुसलमान ही रहे, तो भी इसी कश्मीर ने 16वीं शताब्दी में इन्हीं मुसलमानों को आपस ही में शिया, शाफी, और सूफी को प्रताड़ित करते देखा है। म्याँमार में बौद्धों को वहाँ के मुसलमानों ने हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया! उदाहरण असंख्य हैं, इसलिए 95% से ज़्यादा मुस्लिम जनसंख्या वाले इस इलाके में हिन्दुओं को पुनर्स्थापित करना लगभग असंभव कार्य है।

अगर ये हिन्दू वापस जा कर, सर्वानंद कौल की तरह ‘सेकुलर’ राग गा कर, ये सोचने लगेंगे कि तीस साल में वहाँ के मुसलमानों में बदलाव आ गया होगा, और वो उनकी कविताएँ सुन कर भावुक हो जाएँगे, तो वो भूल जाएँ। भूल इसलिए जाएँ कि हिन्दुओं की सहिष्णुता और उदारवाद को इस्लामी आतंकियों ने सदियों से रौंदा है, उसका फायदा उठाया है। जैसा कि के के मुहम्मद कहते हैं कि भारत अगर एक धर्मनिरपेक्ष और शांत समाज है, जिसमें बीस करोड़ मुसलमान भी हैं, तो ये सिर्फ हिन्दुओं की वजह से है।

हिन्दुओं को वहाँ बसने के लिए पुराने तरीके त्यागने होंगे। उन्हें यह याद रखना होगा कि उनके मंदिरों पर जब लाउडस्पीकर लगे थे, और वहाँ से न सिर्फ इस्लामी शब्द कहे गए थे, बल्कि यह भी गूँज रहा था कि इनके मर्दों को जाने दो, हमें सिर्फ हिन्दू औरतें चाहिए। इन्होंने उन लड़कियों और स्त्रियों के साथ हर बार एक ही दुष्कृत्य किया है, और उसका पाप वहाँ के हर उस मुसलमान को ढोना ही पड़ेगा जो इस त्रासदी पर चुप रहता है।

शाहीन बाग की नौटंकीबाज़ मुसलमान औरतों को हर उस हिन्दू का नाम, उनकी हत्या की तारीख, उनकी हत्या का पूर्ण विवरण, हत्या का कारण और उनकी बहू-बेटियों की स्थिति के पोस्टर हाथ में ले कर पूरी दिल्ली में फैल जाना चाहिए और कहना चाहिए कि मुसलमानों के इन कुकर्मों के लिए उनका पूरा समुदाय शर्मिंदा है। अगर इससे एक डिग्री कम भी कुछ कर रहे हैं ये लोग, तो ये बस स्टंट है अपने पिछले पापों को छुपाने का।

मैं नहीं जानता कश्मीरी हिन्दू वापस कब जाएँगे, कैसे जाएँगे। लेकिन मैं यह बात अवश्य जानता हूँ कि कश्यप ऋषि की धरती पर, शारदा और शिव की भूमि पर, जबरन बसे हुए मुसलमान इन हिन्दुओं के लिए पलक-पाँवड़े तो नहीं बिछाएँगे। अगर ये सत्ता के संरक्षण में उस धरती पर कदम रख कर, अपने काष्ठगृहों को दोबारा उठाने की कोशिश करेंगे, तो हाथ में पेट्रोल बम और माचिस ले कर घूमते मुसलमान आतंकियों का कोई जत्था, उसे जलाने से बिलकुल नहीं हिचकेगा।

उन्हें यह याद रखना चाहिए कि जब उनकी बेटी को कोई खींच कर ले जाएगा, सामूहिक बलात्कार करने को बाद, बढ़ई की आरी से दो हिस्सों में काट देगा, और लाश दो जगह मिलेगी, तब सेना या पुलिस ये सब होने के बाद मदद को आएगी। क्योंकि सरकारी और न्यायिक प्रक्रिया तो इसी तरह से चलती है। लेकिन ऐसा होने ही न पाए, उसके लिए कश्मीरी हिन्दू क्या करेगा?

तब सवाल यह उठता है कि अगर वो इस बार भी पेट्रोल बम, माचिस, सरिया, क्लासनिकोव, चाकू और बमों से तुम्हारा स्वागत करते हैं, तो हिन्दू इस बार क्या करेगा ? मेरे ख्याल से वापस जाने वाले हिन्दुओं को इज़रायल के यहूदियों की कहानी पढ़नी चाहिए। विशेषत: द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वाली।

Posted in Kashmir, PM Narendra Modi

Photo from Harshad Ashodiya


કાશ્મીરનો ઇતિહાસ પંદર કે સોળમી સદીથી શરૃ થતો નથી, પરંતુ તે ઇતિહાસ ઓછામાં ઓછો ૭,૦૦૦ વર્ષ જૂનો છે

કવર સ્ટોરી – જયેશ શાહ
આજે એક એવી માન્યતા પ્રવર્તે છે કે કાશ્મીર પહેલેથી જ ઇસ્લામના પ્રભાવ અને પ્રભુત્વમાં હતું, પરંતુ એ વાત ઇતિહાસ સાથે બંધબેસતી નથી. આપણે હિન્દુઓ ઋષિપંચમીના દિવસે પ્રાચીન ભારતના સાત સર્વશ્રેષ્ઠ મહાન ઋષિઓની પૂજા-અર્ચના કરીએ છીએ. આ સાત મહાન ઋષિઓને આકાશના તારાસમૂહમાં ‘સપ્તર્ષિ‘નું સ્થાન આપીને આપણે કાયમ માટે અમર બનાવ્યા છે. તેઓમાંના એક એટલે કે ‘સર્વમાં શ્રેષ્ઠ‘ એવા મહર્ષિ કશ્યપ હતા જેઓ બ્રહ્માના માનસપુત્ર એવા મરીચિના પુત્ર હતા અને જટિલ ધર્મશાસ્ત્રોના માંધાતા હતા. તેઓ દક્ષ પ્રજાપતિની કન્યાઓને પરણ્યા હતા. તેમાંથી તેઓને સૌથી વધુ પ્રિય એવી અદિતિ હતી અને એમનાથી તેમને બાર આદિત્ય અને ઇન્દ્ર વગેરે દેવતાઓ થયા હતા.

ભૂગર્ભશાસ્ત્રીઓના મત પ્રમાણે તથા પ્રસિદ્ધ ઇતિહાસકારોના મત પ્રમાણે પૂર્વકાળમાં કાશ્મીરની ભૂમિ જળમય હતી જેને મહર્ષિ કશ્યપે પોતાના તેજથી સૂકવી નાખી હતી. નીલમત પુરાણમાં પણ ઉલ્લેખ મળે છે કે કાશ્મીરની ભૂમિ પહેલાં જળમાં ડૂબેલી હતી અને મહર્ષિ કશ્યપે તેને બહાર કાઢી હતી. અન્ય પુરાણોમાં એવો ઉલ્લેખ મળે છે કે એક વખત કાશ્મીરની ઘાટી જળમગ્ન થઈ ગઈ. તેણે એક મોટા સરોવરનું સ્વરૃપ લઈ લીધું. જગતનાં પ્રાણીઓની રક્ષા કાજે મહર્ષિ કશ્યપે આ પાણીને અનેક નદીઓ અને નાના-નાના જળસ્ત્રોતો દ્વારા વહાવી દીધું અને કાશ્મીરની ઘાટીને બચાવી લીધી હતી. બારમી સદીમાં થઈ ગયેલા કાશ્મીરના વિખ્યાત ઇતિહાસકાર કલ્હણે પણ ઈ.સ. ૧૧૪૮થી ૧૧૫૦ દરમિયાન તેમના દ્વારા સર્જન થયેલા ‘રાજતરંગિણી‘ નામના ગ્રંથમાં કાશ્મીરના આરંભથી લઈને અનેક રાજકીય અને ઊથલપાથલનો ઇતિહાસ દર્શાવ્યો છે. આ ઇતિહાસકારની નોંધમાંથી પ્રાપ્ત માહિતી મુજબ કાશ્મીર ઘાટીમાં સૌથી મોટું ઝરણું વહેતું હતું. અહીં મહર્ષિ કશ્યપનો નિવાસ હતો. કાશ્મીરના બારામુલા શબ્દ વરાહમૂલ પરથી ઉતરી આવ્યો છે. ચોથી-પાંચમી સદીમાં થઈ ગયેલ મહાકવિ કાલિદાસે પણ તેમના ગ્રંથોમાં કાશ્મીરની નૈસર્ગિક સમૃદ્ધિનો ખૂબ જ સુંદર રીતે ઉલ્લેખ કરેલો છે.

ગ્રીક ભૂગોળશાસ્ત્રી હેકાતાઓસીસે તેના લખાણમાં કાશ્મીર માટે તે સમયે ‘Kaspapyros‘ શબ્દ વાપર્યો હતો તથા ગ્રીક વિદ્વાન હેરોડોટસે એવું દર્શાવ્યું હતું કે ઇન્ડસ નદીના માર્ગને શોધતા શોધતા હું ‘Kaspapyros‘માં પહોંચી ગયો હતો. ‘Kaspapyros‘ એટલે ‘Kaspa-pyrus‘ એટલે કે કશ્યપપુર – આ શબ્દો કાશ્મીર માટે અન્ય ઇતિહાસકારો અને ભૂગોળશાસ્ત્રીઓએ તેમના લખાણમાં ઉલ્લેખ્યા છે.

આ તમામ હકીકતો જોતાં એક વાત તો સ્પષ્ટ થાય છે કે કાશ્મીરનો ઇતિહાસ પંદર કે સોળમી સદીથી શરૃ થતો નથી, પરંતુ તે ઇતિહાસ ઓછામાં ઓછો ૭,૦૦૦ વર્ષ જૂનો છે. ઇન્ડસવેલી સિવિલાઇઝેશનની શરૃઆતથી જ કાશ્મીરનું અસ્તિત્વ રહેલું છે એટલું તો સાબિત થઈ શકે તેમ છે. આજથી ૨૫૦૦ વર્ષ પૂર્વે કાશ્મીરમાં નીઓ-લિથીક સંસ્કૃતિ હતી તેવો ઉલ્લેખ ઇતિહાસકારોના ગ્રંથમાં મળી આવે છે. કાશ્મીરમાં હિન્દુઓના ઘણા ધર્મસ્થાનો એવા છે કે જેમનું અસ્તિત્વ ઇસ્લામની સ્થાપના થઈ તે પહેલાંનું છે. ઉદાહરણ તરીકે અનંતનાગ નજીક આવેલ માર્તન્ડ સૂર્ય મંદિર કે જેની સ્થાપના આજથી લગભગ ૧૩૦૦ વર્ષ પહેલાં થઈ હોવાના પુરાવા મળી આવે છે. તેવી જ રીતે પહેલગામ પાસે આવેલ મમલેશ્વર મહાદેવ મંદિરની સ્થાપના લગભગ ૧૬૦૦ વર્ષ પહેલાં થઈ હોવાની સાબિતીઓ ઇતિહાસકારોના ગ્રંથમાંથી મળી આવે છે. એટલે જે માન્યતા પ્રવર્તે છે કે કાશ્મીરમાં ઇસ્લામનું પ્રભુત્વ પહેલેથી જ છે તે વાત માત્ર માન્યતા જ છે. ભાટ, પંડિત અને રાઝદાન – આ ત્રણ મૂળ કાશ્મીરી અટકો છે. તેમાંથી વધુ ઊતરી આવી છે. આજે કાશ્મીરી હિન્દુઓમાં લગભગ ૧૯૯ ગોત્ર છે, પરંતુ તેમાં મહર્ષિ કશ્યપ ગોત્ર તથા દત્તાત્રેય અને ભારદ્વાજ મુખ્ય છે. આજની તારીખે મોટા ભાગના કાશ્મીરી મુસ્લિમો મૂળ કાશ્મીરી પંડિતો જ છે જેઓ મૂળ આ ત્રણ ગોત્રમાંથી જ ઊતરી આવે છે. કાશ્મીરી પંડિતોની અટકો જેવી કે ભાટ, ઝુત્સી, રૈના, ધાર કાશ્મીરી મુસ્લિમો ધરાવે છે તે એવું સ્પષ્ટ રીતે સૂચવે છે કે તેઓ મૂળ કાશ્મીરી પંડિતો જ હતા.

કાશ્મીરમાં હિન્દુઓનું સૌથી પ્રથમ સ્થળાંતર આજથી લગભગ ૭૦૦ વર્ષ અગાઉ થયું હતું. તે સમયે તુર્કિશ તાર્તાર દ્વારા કાશ્મીરમાં બેફામ લૂંટ ચલાવાઈ હતી અને હજારો લોકોની કતલ કરીને મહિલાઓ સાથે દુર્વ્યવહાર કરવામાં આવ્યો હતો. એવું કહેવાય છે કે તે તેની સાથે ૨૦,૦૦૦ હિન્દુઓને લઈ ગયો હતો, પરંતુ તુર્કસ્તાન પહોંચતા પહેલાં સખત ઠંડીના કારણે તમામ મૃત્યુ પામ્યાં હતાં. ત્યાર બાદ બીજું સ્થળાંતર ઈ.સ. ૧૩૭૫ની આસપાસ થયું હતું. તે સમયે કુતબુદ્દીને લગભગ ૫૦,૦૦૦ કાશ્મીરી પંડિતોને ઇસ્લામ અંગીકાર કરવા ફરજ પાડી હતી. ઈ.સ. ૧૩૭૫થી ૧૪૧૫ના સમયગાળામાં હિન્દુઓને બહુ જ સહન કરવું પડ્યું હતું અને આ સમયગાળા દરમિયાન બહુ મોટા પ્રમાણમાં અત્યાચાર ગુજારીને હિન્દુઓને ઇસ્લામ સ્વીકારવા મજબૂર કરી દીધા હતા. ઘણા હિન્દુઓ કાશ્મીરમાંથી સ્થળાંતર કરીને દેશના અન્ય પ્રાંતોમાં સ્થાયી થયા હતા. આ સમયગાળાથી કાશ્મીર ખીણમાં ઇસ્લામનો દબદબો થવા માંડ્યો હતો.

ઈ.સ. ૧૪૧૫ પછી થોડાં વર્ષો ખીણમાં શાંતિ રહી અને સૌહાર્દ જળવાઈ રહ્યો, પરંતુ સો વર્ષ પછી ઈ.સ. ૧૫૧૫ પછી ફરી એક વખત હિન્દુઓ ઉપર વ્યાપક અત્યાચાર શરૃ થયા અને તે સમયે લગભગ ૨૫,૦૦૦ કાશ્મીરી પંડિતોને ઇસ્લામ અંગીકાર કરવા ફરજ પાડવામાં આવી હતી. આ સમય દરમિયાન જેઓ ઇસ્લામ અંગીકાર ન કરે તેઓને અન્ય પ્રાંતમાં ભાગી જવા દેવામાં નહોતા આવતા અને તેઓના માથા ધડથી અલગ કરી દેવામાં આવતા હતા. દરરોજ ૧૦૦૦ ગાયોની કતલ કરવામાં આવતી હતી કારણ એક જ હતું કે ગાયો હિન્દુઓ માટે ખૂબ જ પવિત્ર હતી.

ત્યાર બાદ મોગલ સમ્રાટ અકબરના સમયમાં (ઈ.સ. ૧૫૫૬-૧૬૦૫) શાંતિ અને સૌહાર્દ જળવાયા, પરંતુ તે બહુ લાંબો સમય ન ટક્યા. ઈ.સ. ૧૬૭૧થી ૧૬૭૫ના પાંચ વર્ષ દરમિયાન ફરી એક વખત કાશ્મીરી પંડિતો ઉપર ખૂબ જ અત્યાચાર ગુજારવામાં આવ્યા અને ઇસ્લામ અંગીકાર કરાવવામાં આવ્યો. આ સમય દરમિયાન કાશ્મીરી પંડિતોનું તથા અન્ય હિન્દુઓનું ત્રીજું સ્થળાંતર થયું. અફઘાન શાસન દરમિયાન એટલે કે ઈ.સ. ૧૭૫૩થી ૧૮૨૦ દરમિયાન ચોથું સ્થળાંતર થયું. ૧૮૪૬થી ડોગરા શાસન શરૃ થયું અને કાશ્મીરમાં હિન્દુઓ માટે મોગલ સમ્રાટ અકબર બાદ શાંતિના દિવસો ફરી એક વખત શરૃ થયા. ત્યાર પછીનો ઇતિહાસ આપણે સૌ જાણીએ છીએ.
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અભિયાન મેગેઝીન

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जम्मू-कश्मीर और लद्दाख होंगे देश के दो सबसे बड़े केंद्र शासित प्रदेश..

जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के केंद्र सरकार के प्रस्ताव के लागू होने पर क्षेत्रफल के लिहाज से जम्मू-कश्मीर के बाद लद्दाख देश का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र शासित प्रदेश होगा। जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के कई प्रावधानों को केंद्र सरकार द्वारा निष्प्रभावी घोषित किए जाने के साथ ही जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने संबंधी विधेयक को राज्यसभा में मंजूरी मिल गई। केंद्र शासित प्रदेश बनने के साथ ही अब जम्मू-कश्मीर में विधानसभा सीटों की संख्या भी बढ़कर 107 से 114 हो जाएगी।

लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश घोषित करने की मांग काफी समय से चल रही थी। केंद्र शासित प्रदेशों की फेहरिस्त में दो नए राज्य जुड़ने का मार्ग प्रशस्त होने के बाद अब केंद्र शासित प्रदेशों की संख्या 9 हो जाएगी। इनमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के अलावा दिल्ली, पुदुचेरी, दमन और दीव, दादर एवं नगर हवेली, चंडीगढ़, लक्षद्वीप और निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं।

मौजूदा समय में सिर्फ दिल्ली और पुदुचेरी में विधानसभा हैं, लेकिन अब जम्मू-कश्मीर भी विधानसभा वाला तीसरा केंद्र शासित प्रदेश हो जाएगा। विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों में केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में राज्यपाल की जगह उपराज्यपाल होते हैं। वहीं, केंद्र शासित प्रदेशों से संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के लिए सदस्य भी चुने जाते हैं। वह बात अलग है कि इनकी संख्या हर राज्य में अलग-अलग होती है। सांसदों की संख्या के लिहाज से दिल्ली नबंर एक पर है। संसद में दिल्ली का प्रतिनिधित्व 7 लोकसभा और 3 राज्यसभा सदस्य करते हैं।

संजय द्विवेदी

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कश्मीर के रक्षक ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह जामवाल

वो व्यक्ति जिसके कारण आज कश्मीर भारत का हिस्सा है।

—उड़ी सेक्टर में लड़ी गई उस जंग के सेनापति जिसे भारत का थर्मोपल्ली(300 फ़िल्म वाला) कहा जाता है जहां लियोनिडास ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह जामवाल थे जिनके नेतृत्व में 150 डोगरा राजपूत सैनिकों ने 10 हजार पाकिस्तानी कबाइली और सैनिकों को 4 दिन तक रोके रखा।—

22 अक्टूबर 1947 को महाराज हरिसिंह ने जब मुजफ्फराबाद पर पाक सेना के कब्जे और उनके मुस्लिम सैनिकों की बगावत की खबर सुनी तो उन्होंने खुद दुश्मन से मोर्चा लेने का फैसला करते हुए सैन्य वर्दी पहनकर ब्रिगेडियर राजेंद्रसिंह को बुलाया। सिंह ने महाराजा को मोर्चे से दूर रहने के लिए मनाते हुए खुद दुश्मन का आगे जाकर मुकाबला करने का निर्णय लिया।
महाराजा हरि सिंह ने ब्रिगेडियर को आखरी जवान और आखरी गोली तक आक्रमणकारियों का मुकाबला करने का आदेश दिया।

राजेंद्रसिंह महाराजा के साथ बैठक के बाद जब बादामी बाग पहुंचे तो वहां 150 के करीब ही सिपाही थे। इन डेढ़ सौ सिपाहियों को लेकर ब्रिगेडियर उड़ी के लिए निकले। उनके पास हथियारों, साजो सामान और रसद की कमी थी क्योंकि पाकिस्तान ने कश्मीर जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए थे, उनके पास पेट्रोल भी नही था इसलिए वो प्राइवेट गाड़ियों से निकले। वहीं दुश्मन उस समय के अत्याधुनिक हथियारों से लैस और दस हजार से ज्यादा की संख्या में था।

पहले गढ़ी और बाद में उड़ी में पाकिस्तानियो से खूनी झड़प हुई जिसमे कम संख्या के बावजूद ब्रिगेडियर सिंह के नेतृत्व में डोगरों ने आक्रमणकारियों को भारी नुकसान पहुँचाया। उसके बाद उड़ी में मोर्चाबंदी की और उड़ी नाले के ऊपर पुल को उड़ा दिया। यहां दो दिन तक दुश्मन हमले करता रहा लेकिन आगे नही बढ़ पाया। इस दौरान डोगरा फौज के भी अनेको सैनिक खेत रहे। ब्रिगेडियर सिंह ने हेडक्वार्टर से सहायता भेजने को कहा। उस समय 70 के करीब सैनिक ही और उपलब्ध थे जो महाराजा हरी सिंह कैप्टेन ज्वाला सिंह के नेतृत्व में यह कहकर भेजे कि किसी भी कीमत पर दुश्मन को उड़ी में रोका जाए। ब्रिगेडियर सिंह ने हालात देखकर अब माहुरा में मोर्चाबंदी करने का फैसला लिया। सुबह होते ही फिर दुश्मन ने हमला बोल दिया लेकिन जवाब ऐसा मिला कि पाकिस्तानियो को फिर से पीछे हटना पड़ा।

छोटी सी टुकड़ी से पार ना पाते देख आक्रमणकारियों ने झेलम किनारे आगे बढ़ पैदल पुलों से घुसने की कोशिश की। ब्रिगेडियर को इसका आभास हो गया और उन्होंने एक टुकड़ी भेजकर सभी पुलों को नष्ट करवा दिया लेकिन तब तक बड़ी संख्या में हमलावर अंदर आ गए थे। ब्रिगेडियर ने रामपुर में मोर्चाबंदी करने का फैसला किया। रात भर जवानों ने खंदक खोदी और तड़के ही दुश्मनों के हमले का सामना करना पड़ा। पूरे दिन गोलाबारी हुई लेकिन दुश्मन एक इंच भी आगे नही बढ़ पाया।

दुश्मन की एक टुकड़ी ने पीछे से आकर सड़क पर अवरोधक तैयार कर दिए, ताकि महाराजा के सिपाहियों को वहां से निकलने का मौका नहीं मिले।

ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह को दुश्मन की योजना का पता चल गया और उन्होंने 27 अक्टूबर की सुबह एक बजे अपने सिपाहियों को पीछे हटने और सेरी पुल पर डट जाने को कहा। पहला अवरोधक तो उन्होंने आसानी से हटा लिया, लेकिन बोनियार मंदिर के पास दुश्मन की फायरिंग की चपेट में आकर राज्य के सिपाहियों के वाहनों का काफिला थम गया। आगे के तीनो वाहनों के चालक शहीद हो गए। ब्रिगेडियर सिंह अपने वाहन चालक के शहीद होने पर खुद ही वाहन लेकर आगे निकल गए। सेरी के पुल पर दुश्मन के हमले का जवाब देते हुए वो जख्मी हो गए। उनकी दाई टांग बुरी तरह जख्मी थी।

उन्होंने उसी समय जवानों को बारामूला में मोर्चा बनाकर दुश्मनों को रोकने के लिए कहा। जब उन्हें जवानों ने उठाने का प्रयास किया तो उन्होंने जाने से मना किया और कहा की उन्हें रिवाल्वर देकर पुलिया की आड़ में लिटा दिया जाए, वो यहीं से दुश्मनों का मुकाबला करेंगे क्योंकि उन्होंने महाराज हरि सिंह को वचन दिया है कि दुश्मन उनकी लाश पर से ही उड़ी से आगे बढ़ेगा। उसके बाद उन्हें किसी ने नही देखा और 27 अक्टूबर की दोपहर को सेरी के पुल पर दुश्मनों का अकेले मुकाबला करते हुए वो वीरगति को प्राप्त हुए।

26 अक्टूबर 1947 की शाम को जम्मू कश्मीर के भारत में विलय को लेकर समझौता हो चुका था और 27 अक्टूबर को जब राजेंद्रसिंह शहीद हुए तो उस समय कर्नल रंजीत राय भारतीय फौज का नेतृत्व करते हुए श्रीनगर एयरपोर्ट पर पहुंच चुके थे।

दुनिया में ऐसी वीरता का उदाहरण शायद ही कहीं और मिले जहां इतनी छोटी सैनिकों की टुकड़ी जिसके पास संसाधनों की जबरदस्त कमी थी ने अपने से सौ गुना विशाल और साधन सम्पन्न दुश्मन को 4 दिन तक रोके रखा। सभी सैन्य विशेषज्ञ यह मानते हैं कि अगर ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह ने अपनी इस छोटी सी टुकड़ी को लेकर आखरी दम तक लड़ने के इरादे और सूझबूझ के साथ हमलावरों को रोका नही होता तो पाकिस्तानी हमलावर 23 तारीख को ही श्रीनगर पहुँच जाते और फिर ना तो कभी भारतीय सेना वहां पहुँचती और ना आज कश्मीर भारत का हिस्सा होता।

(हालांकि भारतीय सेना 27 से पहले पहुँच जाति लेकिन नेहरू के भेजे हुए दूत वीपी मेनन ने instrument ऑफ accesion को sign करवाने में देरी करवाई, वो महाराज हरी सिंह पर नेहरू के चहेते शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री बनाने और उन्हें अन्य कई अधिकार देने के लिए दबाव डाल रहे थे जबकि सरदार पटेल ने कहा था कि महाराज अगर समझौता पे दस्तखत करने को तैयार हैं तो कोई और शर्त ना लादी जाए। वीपी मेनन के इस रवैय्ये से परेशान होकर महाराज ने अपने सेवको से कह दिया कि अगर कल तक समझौता नही होता है तो मुझे सोते हुए गोली मार दी जाए। अगले दिन 26 को समझौता हुआ और 27 को भारतीय फौज कश्मीर पहुँची।)

लेकिन ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह और अन्य डोगरा सैनिकों के इस बलिदान को वो सम्मान नही मिला जो उन्हें मिलना चाहिए था। डेढ़ साल बाद उन्हें भारत का पहला महावीर चक्र मिला लेकिन भारतीय राजनीतिक वर्ग ने उनके बलिदान को बिलकुल दरकिनार कर दिया जिस कारण भारत में बहुत कम लोग उनके बारे में जानते हैं। जिस व्यक्ति के बलिदान के कारण कश्मीर आज भारत का हिस्सा है उसे तो भारत रत्न मिलना चाहिए था लेकिन उनके नाम कश्मीर में एक कॉलेज तक नही है। आज जब सब जगह कश्मीर की बात हो रही है, लोग नेताओ की जयजयकार कर रहे हैं, ऐसे में भी ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह जामवाल का कहीं कोई जिक्र नही है।

इसलिए हमारी जिम्मेदारी बनती है कि ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह जामवाल और उन डोगरा राजपूतो के बलिदान के बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगो को पता चले, इसलिए इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।

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वास्तव में अगर जम्मू कश्मीर के बारे में बातचीत करने की जरूरत है तो वह है POK-अक्साई चीन के बारे में । इसके ऊपर देश में चर्चा होनी चाहिए गिलगित जो अभी POK में है विश्व में एकमात्र ऐसा स्थान है, जो कि 5 देशों से जुड़ा हुआ है अफगानिस्तान, तजाकिस्तान, पाकिस्तान, भारत और तिब्बत -चाइना ।

वास्तव में जम्मू कश्मीर की महत्वता जम्मू के कारण नहीं, कश्मीर के कारण नहीं, लद्दाख के कारण नहीं है अगर इसकी महत्वता है तो वह है गिलगित-बाल्टिस्तान के कारण ।
इतिहास में भारत पर जितने भी आक्रमण हुए यूनानियों से लेकर आज तक (शक , हूण, कुषाण , मुग़ल ) वह सारे गिलगित से हुए ।

हमारे पूर्वज जम्मू-कश्मीर के महत्व को समझते थे, उनको पता था कि अगर भारत को सुरक्षित रखना है तो दुश्मन को हिंदूकुश अर्थात गिलगित-बाल्टिस्तान उस पार ही रखना होगा । किसी समय इस गिलगित में अमेरिका बैठना चाहता था, ब्रिटेन अपना अड्डा गिलगित में बनाना चाहता था ।

रूस भी गिलगित में बैठना चाहता था । यहां तक कि पाकिस्तान ने 1965 में गिलगित को रूस को देने का वादा तक कर लिया था । आज चाइना गिलगित में बैठना चाहता है और वह अपने पैर पसार भी चुका है और पाकिस्तान तो बैठना चाहता ही था ।

दुर्भाग्य से इस गिलगित के महत्व को सारी दुनिया समझती है केवल एक को छोड़कर । जिसका वास्तव में गिलगित-बाल्टिस्तान है और वह है भारत । क्योंकि हमको इस बात की कल्पना तक नहीं है । भारत को अगर सुरक्षित रहना है तो हमें गिलगित-बाल्टिस्तान किसी भी हालत में चाहिए ।

आज हम आर्थिक शक्ति बनने की सोच रहे हैं । क्या आपको पता है गिलगित से सड़क मार्ग द्वारा आप विश्व के अधिकांश कोनों में जा सकते हैं । गिलगित से सड़क मार्ग 5000 Km दुबई है, 1400 Km दिल्ली है, 2800 Km मुंबई है, 3500 Km रूस है, चेन्नई 3800 Km है और लंदन 8000 Km है ।

जब हम सोने की चिड़िया थे तब हमारा सारे देशों से व्यापार चलता था । 85 % जनसंख्या इन मार्गों से जुड़ी हुई थी मध्य एशिया, यूरेशिया, यूरोप, अफ्रीका सब जगह हम सड़क मार्ग द्वारा जा सकते हैं, अगर गिलगित-बाल्टिस्तान हमारे पास हो…!

आज हम पाकिस्तान के सामने IPI (Iran-Pakistan-India) गैस लाइन बिछाने के लिए गिड़गिड़ाते हैं । ये तापी की परियोजना है जो कभी पूरी नहीं होगी । अगर हमारे पास गिलगित होता तो गिलगित के आगे तज़ाकिस्तान था, हमें किसी के सामने हाथ नहीं फैलाने पड़ते ।

हिमालय की 10 बड़ी चोटियां जो कि विश्व की 10 बड़ी चोटियों में से है और ये सारी हमारी है और इन 10 में से 8 गिलगित-बाल्टिस्तान में है । तिब्बत पर चीन का कब्जा होने के बाद जितने भी पानी के वैकल्पिक स्त्रोत(Alternate Water Resources) हैं वह सारे गिलगित-बाल्टिस्तान में है l

आप हैरान हो जाएंगे वहाँ बड़ी बड़ी यूरेनियम और सोने की खदानें हैं । आप POK के मिनरल डिपार्टमेंट की रिपोर्ट को पढ़िए आप आश्चर्यचकित रह जाएंगे । वास्तव में गिलगित-बाल्टिस्तान का महत्व हमको मालूम नहीं है और सबसे बड़ी बात गिलगित-बाल्टिस्तान के लोग Strong Anti PAK हैं ।

दुर्भाग्य क्या है ! हम हमेशा कश्मीर बोलते हैं जम्मू- कश्मीर नहीं बोलते हैं । कश्मीर कहते ही जम्मू, लद्दाख, गिलगित-बाल्टिस्तान दिमाग से निकल जाता है । ये जो पाकिस्तान के कब्जे में जो POK है, उसका क्षेत्रफल 79000 वर्ग किलोमीटर है । उसमें कश्मीर का हिस्सा तो सिर्फ 6000 वर्ग किलोमीटर है । 9000 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा जम्मू का है और 64000 वर्ग कि.मी हिस्सा लद्दाख का है जो कि गिलगित-बाल्टिस्तान है ।

यह कभी कश्मीर का हिस्सा नहीं था । यह लद्दाख का हिस्सा था वास्तव में सच्चाई यही है । इसलिए पाकिस्तान यह जो बार-बार कश्मीर का राग अलापता रहता है तो उसको कोई यह पूछे तो सही
क्या गिलगित-बाल्टिस्तान और जम्मू का हिस्सा जिस पर तुमने कब्जा कर रखा है, क्या ये भी कश्मीर का ही भाग है ? कोई जवाब नहीं मिलेगा !

क्या आपको पता है गिलगित -बाल्टिस्तान, लद्दाख के रहने वाले लोगों की औसत आयु विश्व में सर्वाधिक है, यहाँ के लोग विश्व अन्य लोगों की तुलना में ज्यादा जीते है ।

भारत में आयोजित एक सेमिनार में गिलगित-बाल्टिस्तान के एक बड़े नेता को बुलाया गया था । उसने कहा कि “we are the forgotten people of forgotten lands of BHARAT” । उसने कहा कि देश हमारी बात ही नहीं जानता ।

किसी ने उससे सवाल किया कि क्या आप भारत में रहना चाहते हैं…??

जवाब था “60 साल बाद तो आपने मुझे भारत बुलाया और वह भी अमेरिकन टूरिस्ट वीजा पर ! और आप मुझसे सवाल पूछते हैं कि क्या आप भारत में रहना चाहते हैं ।” उसने कहा कि आप गिलगित-बाल्टिस्तान के बच्चों को IIT, IIM में दाखिला दीजिए AIIMS में हमारे लोगों का इलाज कीजिए…हमें यह लगे तो सही कि भारत हमारी चिंता करता है हमारी बात करता है । गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तान की सेना कितने अत्याचार करती है, लेकिन आपके किसी भी राष्ट्रीय अखबार में उसका जिक्र तक नहीं आता है । आप हमें ये अहसास तो दिलाइये की आप हमारे साथ है…!

आप सभी ने पाक को हमारे कश्मीर में हर सहायता उपलब्ध कराते हुए देखा होगा । वह कहता है कि हम कश्मीर की जनता के साथ हैं, कश्मीर की आवाम हमारी है । लेकिन क्या आपने कभी यह सुना है कि किसी भी भारत के नेता, मंत्री या सरकार ने यह कहा हो कि हम POK – गिलगित-बाल्टिस्तान की जनता के साथ हैं…!

वह हमारी आवाम है, उनको जो भी सहायता उपलब्ध होगी हम उपलब्ध करवाएंगे, आपने यह कभी नहीं सुना होगा । कांग्रेस सरकार ने कभी POK – गिलगित-बाल्टिस्तान को पुनः भारत में लाने के लिए कोई बयान तक नहीं दिया, प्रयास तो बहुत दूर की बात है ।

हालाँकि पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार के समय POK का मुद्दा उठाया गया । फिर 10 साल पुनः मौन धारण हो गया और फिर से नरेंद्र मोदी जी की सरकार आने पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में ये मुद्दा उठाया । आज अगर आप किसी को गिलगित के बारे में पूछ भी लोगे तो उसे यह पता नहीं है कि यह जम्मू कश्मीर का ही भाग है । वह यह पूछेगा क्या यह कोई चिड़िया का नाम है ? वास्तव में हमें जम्मू कश्मीर के बारे में जो गलत नजरिया है, उसको बदलने की जरूरत है ।

अब करना क्या चाहिए ? तो पहली बात है सुरक्षा में किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए । जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा का मुद्दा बहुत संवेदनशील है इस पर अनावश्यक वाद-विवाद नहीं होना चाहिए । एक अनावश्यक वाद विवाद चलता है कि जम्मू कश्मीर में इतनी सेना क्यों है ?

तो बुद्धिजीवियों को बता दिया जाए कि जम्मू-कश्मीर का 2800 किलोमीटर का बॉर्डर है, जिसमें 2400 किलोमीटर पर LOC है । आजादी के बाद भारत ने पांच युद्ध लड़े, वह सभी जम्मू-कश्मीर से लड़े भारतीय सेना के 18 लोगों को परमवीर चक्र मिला और वह 18 के 18 जम्मू-कश्मीर में शहीद हुए हैं । इनमें 14000 भारतीय सैनिक शहीद हुए हैं, जिनमें से 12000 जम्मू कश्मीर में शहीद हुए हैं । अब सेना बॉर्डर पर नहीं तो क्या मध्यप्रदेश में रहेगी ? क्या यह सब जो सेना की इन बातों को नहीं समझते वही यह सब अनर्गल चर्चा करते हैं ।

वास्तव में जम्मू कश्मीर पर बातचीत करने के बिंदु होने चाहिए- POK , वेस्ट पाक रिफ्यूजी, कश्मीरी हिंदू समाज, आतंक से पीड़ित लोग, धारा 370 और 35A का दुरूपयोग, गिलगित-बाल्टिस्तान का वह क्षेत्र जो आज पाकिस्तान -चाइना के कब्जे में है । जम्मू- कश्मीर के गिलगित- बाल्टिस्तान में अधिकांश जनसंख्या शिया मुसलमानों की है और वह सभी पाक विरोधी है । वह आज भी अपनी लड़ाई खुद लड़ रहे हैं, पर भारत उनके साथ है ऐसा उनको महसूस कराना चाहिए, देश कभी उनके साथ खड़ा नहीं हुआ । वास्तव में पूरे देश में इसकी चर्चा होनी चाहिए ।

वास्तव में जम्मू-कश्मीर के विमर्श का मुद्दा बदलना चाहिए । जम्मू कश्मीर को लेकर सारे देश में सही जानकारी देने की जरूरत है । इसके लिए एक इंफॉर्मेशन कैंपेन चलना चाहिए । पूरे देश में वर्ष में एक बार 26 अक्टूबर को जम्मू कश्मीर का दिवस मनाना चाहिए ।
अगर आप इस श्रंखला को अधिक से अधिक जनता के अंदर प्रसारित करेंगे, तभी हम जम्मू कश्मीर के विमर्श का मुद्दा बदल सकते हैं अन्यथा नहीं । इसलिए मेरा आप सभी से यही अनुरोध है श्रृंखला को अधिक से अधिक लोगों की जानकारी में लाया जाए ।

देश की जनता को जम्मू कश्मीर के संदर्भ में सही तथ्यों का पता लग सके, ऐसा मेरा प्रयास है ।

साभार :-
अभिजीत श्रीवास्तव
INDIA INDEPENDECE ACT 1947
INDIAN CONSTITUTION ACT 1950
JAMMU & KASHMIR ACT 1956
INDIAN GOVT. ACT 1935

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कश्मीर के हिंदू राजा हरिसिंह ने भरे दरबार में जवाहरलाल नेहरु को थप्पड़ भी मारा था
पूरी कहानी पढ़िए ————

आप लोगों में से बहुत ही कम जानते होंगे कि नेहरू पेशे से वकील था लेकिन किसी भी क्रांतिकारी का उसने केस नहीं लड़ा ॥

बात उस समय की है जिस समय महाराजा हरिसिंह 1937 के दरमियान ही जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे लेकिन शेख अब्दुल्ला इसके विरोध में थे क्योंकि शेख अब्दुल्ला महाराजा हरिसिंह के प्रधानमंत्री थे और कश्मीर का नियम यह था कि जो प्रधानमंत्री होगा वही अगला राजा बनेगा लेकिन महाराजा हरि सिंह प्रधानमंत्री के कुकृत्य से भलीभांति परिचित थे इसलिए कश्मीर के लोगों की भलाई के लिए वह 1937 में ही वहां लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे लेकिन शेख अब्दुल्ला ने बगावत कर दी और सिपाहियों को भड़काना शुरू कर दिया लेकिन राजा हरि सिंह ने समय रहते हुए उस विद्रोह को कुचल डाला और शेख अब्दुल्ला को देशद्रोह के केस में जेल के अंदर डाल दिया ॥

शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरू की दोस्ती प्रसिद्ध थी , जवाहरलाल नेहरू शेख अब्दुल्ला का केस लड़ने के लिए कश्मीर पहुंच जाते हैं , वह बिना इजाजत के राजा हरिसिंह द्वारा चलाई जा रही कैबिनेट में प्रवेश कर जाते हैं , महाराजा हरि सिंह के पूछे जाने पर नेहरु ने बताया कि मैं भारत का भावी प्रधानमंत्री हूं ॥

राजा हरिसिंह ने कहा चाहे आप कोई भी है , बगैर इजाजत के यहां नहीं आ सकते , अच्छा रहेगा आप यहां से निकल जाएं ॥

नेहरु ने जब राजा हरि सिंह के बातों को नहीं माना तो राजा हरिसिंह ने गुस्सा में आकर नेहरु को भरे दरबार में जोरदार थप्पड़ जड़ दिया और कहा यह तुम्हारी कांग्रेस नहीं है या तुम्हारा ब्रिटिश राज नहीं है जो तुम चाहोगे वही होगा ॥ तुम होने वाले प्रधानमंत्री हो सकते हो लेकिन मैं वर्तमान राजा हूं और उसी समय अपने सैनिकों को कहकर कश्मीर की सीमा से बाहर फेंकवा दिया ॥

कहते हैं फिर नेहरू ने दिल्ली में आकर शपथ ली कि वह 1 दिन शेख अब्दुल्ला को कश्मीर के सर्वोच्च पद पर बैठा कर ही रहेगा इसीलिए बताते हैं कि कश्मीर को छोड़कर अन्य सभी रियासतों का जिम्मा सरदार पटेल को दिया गया और एकमात्र कश्मीर का जिम्मा भारत में मिलाने के लिए जवाहरलाल नेहरु ने लिया था ॥

सरदार पटेल ने सभी रियासतों को मिलाया लेकिन नेहरू ने एक थप्पड़ के अपमान के लिए भारत के साथ गद्दारी की ओर शेख अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाया और 1955 में जब वहां की विधानसभा ने अपना प्रस्ताव पारित करके जवाहरलाल नेहरू को पत्र सौंपा कि हम भारत में सभी शर्तों के साथ कश्मीर का विलय करना चाहते हैं तो जवाहरलाल नेहरू ने कहा —- नहीं अभी वह परिस्थितियां नहीं आई है कि कश्मीर का पूर्ण रूप से भारत में विलय हो सके ॥ इस प्रकार उस पत्र को प्रधानमंत्री नेहरू ने ठुकरा दिया था और उसका खामियाजा भारत आज तक भुगत रहाहै।

डोगरा राजा हरिसिंह जी द्वारा 👉इंडियन डोमीनियन स्टेट 👈 मे बिना शर्त शामिल होने वाला संधि / समझौता / एक्सेशन लैटर लागू हो ।

ढकोसला बंद हो