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कश्मीर यात्रा के दौरान वहां के बच्चो के साथ बातचीत करने का दिल किया ।


कश्मीर यात्रा के दौरान वहां के बच्चो के साथ बातचीत करने का दिल किया । बातचीत हैरान परेशान करने के साथ साथ भविष्य के प्रति भी अनिश्चितता दिखाती है । 10 साल के बच्चे भी आंतकवाद की तरफ आकर्षित नजर आ रहे हैं । अब ये सोचने वाली बात है कि उनको किस प्रकार से इस रास्ते पर जाने से रोक जा सकता है। पूरी यात्रा के दौरान सकारात्मकता भी देखने को मिली जहां ज़्यादातर जवान और बुजुर्ग ये भी कह रहे थे कि ये (आंतकवाद) सबका नज़रिया नहीं है। लेकिन दबी जुबान में ही ये बोला जाता है। मीडिया को भी लोग जमकर कोसते हैं कि अगर मीडिया खबरों को इतनी सनसनी के साथ न दिखाये तो भी नकारात्मकता कम फैलती है। लेकिन इस बात में सच्चाई नज़र आई कि केवल 5% लोग ही इस तरह की हरकतों को अंजाम देते हैं और अशांति चाहते हैं । यात्रा के दौरान ही लेफ्टिनेंट उम्मर फ़ैयाज़ की शहादत की खबर आई। इस दुर्घटना के बारे में भी स्थानीय लोगों के मन मे बहुत बहुत दुख देखने को मिला। गाड़ी का चालक जो 5 दिन तक लगातार साथ था ने भी बताया कि किस प्रकार से उसने भी अपने बच्चों को कश्मीर से बाहर ही भेज रखा है ताकि वो इस सब से बच के रहे और अपना काम सही रास्ते पर चलकर करें। चालक साहब ने ये बताया कि कैसे वो लोग 90 के दशक से पहले रात को 1-2 बजे तक बाहर घूमते रहते थे और आजकल तो बीवी 6 बजे ही फ़ोन करके पूछ लेती हैं कि कितनी देर में आ रहे हो। लोगों को ये भी लगता है कि अलगाववादी खुद कोई ड्रामा करके अपने आपको नज़रबंद करने के लिए प्रशासन को बोलते हैं ताकि उनको कोई खतरा ना रहे। ज़्यादातर लोग चाहते हैं कि हालात जल्दी सामानय हों और वो भी अपना जीवन अच्छे ढंग से जियें ।

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क़िस्साएजम्मूकश्मीर


#क़िस्साएजम्मूकश्मीर

मितरों और मितरानियों , हुआ ये कि 1957 में एक बार जम्मू-काश्मीर में सफाई कर्मियों ने हड़ताल कर दी । उन दिनों वहां CM की जगह PM मने प्रधानमंत्री होता था । तो PM थे बक्शी गुलाम मुहम्मद । किसी ज़माने में बक्शी साब National Conference के सबसे बड़े नेता शेख अब्दुल्लाह के चेले हुआ करते थे और उसके डिप्टी PM हुआ करते थे पर 1953 में इन्ने बगावत कर दी और खुद PM बन बैठे ।
सो 1957 में सफाई कर्मियों ने हड़ताल कर दी । शहरों में गंदगी के अंबार लग गए ।
ऐसे में PM बक्शी ने पंजाब के CM प्रताप सिंह कैरों से बात की ……. भाई मेरे , 250- 300 आदमी भेज दे , सफाई करने को ……… बक्शी कैरों का पक्का यार …….
कैरों ने कहा , साले …… तेरी हिम्मत कैसे हुई …….. अबे पंजाबी बंदा तुम साले काशमीरियों की गंदगी उठाएगा ? हरगिज़ नही ……..
उन्ने कही , भाई ऐसे नही उठवाऊंगा , बाकायदे पक्की नौकरी दूंगा …….. मुंसिपाल्टी में सफाई कर्मी की ……..
कैरों ने कहा , ऐसे कैसे दे देगा ? , मने ये J&K के Permanent Resident तो हैं नही ……. कैसे देगा नौकरी ।
गुलाम मुहम्मद बक्शी ने नया प्रावधान निकाला ……. मुंसिपाल्टी में सफाई कर्मी की नौकरी पाने के लिए PR होना ज़रूरी नही ………
1957 में 250 से ज़्यादा परिवार पंजाब से आ के जम्मू में बस गए । उन्हें सफाई कर्मी की job दे दी गयी । उन्हें वाल्मीकि बस्ती , गांधी नगर जम्मू में बसा दिया गया ।
अब यहां से शुरू हुआ उन 250 परिवारों पे अतियाचार ……..
आज 60 साल बाद उन परिवारों की जनसंख्या बढ़ के लगभग 25,000 हो चुकी है ।
पर भारतीय संविधान की धारा 35A के कारण ये 25,000 लोग सिर्फ और सिर्फ भंगी मेहतर की नौकरी करने के लिए अभिशप्त हैं ।
क्यों ??????
आपको याद होगा कि PR तो इनपे थी नही , सो सिर्फ मुंसिपाल्टी का मेहतर बनने के लिए इनको PR से छूट मिली थी ।
PR वो आज तक न हुए ।
अब इनके बच्चे न किसी सरकारी Professional college Univ में पढ़ सकते हैं , न कोई Scholarship ले सकते हैं , न कोई जमीन मकान दुकान खरीद सकते हैं और न कोई सरकारी नौकरी कर सकते हैं । आज इनके परिवार का कोई बच्चा पढ़ लिख के Dr , Engineer कुछ भी बन जाये , J&K में नौकरी उसको सिर्फ और सिर्फ मेहतर की ही मिलेगी । मेहतर में भी उसको आजीवन कोई promotion नही मिलेगा क्योंकि मेहतर के अलावा और कोई पद पाने का हक़ ही नही ।
इन 25000 वाल्मीकियों को विधान सभा और local bodies के चुनावों में मतदान तक का अधिकार नही । ये सिर्फ लोकसभा में vote कर सकते हैं ।

उन 25,000 वाल्मीकियों पे ये अतियाचार होता है हमारे संविधान की धारा 35A के कारण । धारा 35A के कारण ही जम्मू काश्मीर में धारा 370 का दुरुपयोग होता है ।
जबकि धारा 35A पूरी तरह असंवैधानिक है क्योंकि इसका कभी भारत की संसद ने पास ही नही किया । ये चोर दरवाजे से सिर्फ President Of India के order से ही लागू कर दी गयी जिसका उन्हें अधिकार ही नही ।

अब धारा 35A को रद्द करने की याचिका सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है ।

Vikash Khurana

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धारा 370


Sanjay Dwivedy;; *धारा 370 हटाने से पहले सरकार कर ले यह काम, * आधी हो जायेगी कश्मीर की समस्या !! कश्मीर की कारस्तानी का अगर जायजा लेना हो तो आपको जम्मू कश्मीर विधानसभा की सीटों का विश्लेषण करना होगा। J & K का असली क्षेत्रफल 222236 वर्ग किलोमीटर है। इसमें से भारत के पास सिर्फ 101387 वर्ग किलोमीटर इलाका है जो लद्दाख, जम्मू और कश्मीर तीन हिस्सों में विभक्त है और तीन हिस्सों की अपनी अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत है। *लद्दाख के लोग बौद्ध पंथ को मानते हैं, जम्मू के लोग हिन्दू धर्म के अनुयायी हैं और कश्मीर घाटी में इस्लाम बहुल वर्चस्व* है। इन तीनो क्षेत्रों में सबसे बड़ा भुभाग है लद्दाख का जिसका कुल इलाका है 59146 वर्ग किलोमीटर यानि कुल क्षेत्र का 58% पर उन्हें राज्य की कुल 87 विधान सभा की सीटों में से सिर्फ 4 सीटें दी गयी है और 6 लोकसभा सीटों में से सिर्फ 1 सीट। जम्मू का इलाका है 26293 वर्ग किलोमीटर यानि कुल क्षेत्रफल का लगभग 26% पर इसके हिस्से में 2 लोकसभा सीट हैं और 37 विधान सभा सीटें। अब आइये देखते हैं कश्मीर घाटी की स्थिति। इसका कुल इलाका है 15948 वर्ग किलोमीटर यानि कुल इलाके का 15% पर इसे 3 लोकसभा हासिल हैं यानि कुल लोकसभा सीटों का 50% और इन *कश्मीरियों ने नेहरू की मूर्खता का फायदा उठा कर 46 विधानसभा सीटें अपने कब्जे में कर रखी* है यानि कुल सीटों का 54%। इस गूंडागर्दी का ही यह फल है की आज तक जितने भी मुख्यमंत्री बने हैं सब घाटी से। केंद्र से जो अनुदान मिलता है उसका 80% भाग कश्मीरी डकार जाते हैं जो अंत में आतंकवादियों के हाथों में पहुँच जाता है। अब समय आ गया है की इस गूंडागर्दी को रोका जाये। *तीनो क्षेत्रों के बीच विधानसभा की सीटों का बंटवारा उनके क्षेत्रफल के हिसाब से हो* यानि लद्दाख को 58% सीटें मिलें, जम्मू को 26% और कश्मीर को 16% तभी पूरे राज्य के लोगो के साथ न्याय हो पायेगा। धारा 370 तो जब ख़त्म होगी सो होगी पर कम से कम राज्य की विधानसभा की सीटों का तो तर्कसंगत और न्यायसंगत बंटवारा पहले हो सकता हैं ताकि *जम्मू और लद्दाख के साथ जो भेदभाव हो रहा है वो ख़त्म हो। सदा सर्वदा सुमंगल,,, वंदेमातरम्,,, जय भवानी, जय श्रीराम

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Article 35A


Article 35A !! इसमें ऐसा क्या है जिसके बल पर कश्मीरी भारत का खाते हैं, संविधान के अनुरूप सारी सुविधायें भारत से लेते हैं, मुख्य मंत्री भी बनते हैं किंतु सुनते हैं पाकिस्तान का !! भारत मुर्दाबाद चिल्लाते हैं !! 370 नहीं अनुच्छेद 35A है, कश्मीर समस्या की असली जड़ !! संविधान की किताबों से है ‘नदारद’ है अनुच्छेद 35A – मजे की बात ये है की यदि आप संविधान की किसी भी प्रमाणिक पुस्तक को पढेंगे तो आपको यह धारा शायद कहीं दिखायी न दे। आपको अनुच्छेद 35(a) अवश्य पढ़ने को मिलेगा पर 35A ढूंढने के लिए आपको संविधान की (एपेंडिक्स) पर नजर डालनी होगी। यदि इसे संवैधानिक ‘चोरी’ कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)के करीबी माने जाने वाले थिंक टैंक संगठन जम्मू और कश्मीर स्टडी सेंटर(JKSC)अनुच्छेद 35A के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। संस्थान के निदेशक श्री आशुतोष भटनागर के मुताबिक़ यह आर्टिकल संविधान के मूलभूत ढाँचे के खिलाफ है,जिसमें संसद भी संशोधन नहीं कर सकती है। इसलिए यह अनुच्छेद पूर्णतः असंवैधानिक है इसलिए सुप्रीम कोर्ट को स्वतः इस मामले पर ‘संज्ञान’ लेना चाहिये। आर्टिकल 370 से पहले अनुच्छेद 35A को हटाया जाना बेहद जरुरी है। भारतीय संविधान की बहु ‘विवादास्पद’ धारा 370 के निरस्तीकरण की माँगे संविधान निर्माण के शुरुआती वर्षों से ही उठती रही है। अनुच्छेद 370 वास्तव में एक प्रक्रिया है और इसे इस आशा से पारित कराया गया कि एक अल्पकालीन व्यवस्था के रूप में स्वतः ही भविष्य में समाप्त हो जाएगी। जम्मू-कश्मीर में छिड़े संग्राम के कारण संविधान सभा के अभाव में राज्य में भारतीय संविधान को लागू करने की तात्कालिक एवं अंतरिम व्यवस्था बनायी गयी। स्वयं संविधान में इस व्यवस्था को ‘अस्थाई उपबंध’ कहा गया है। इसका जम्मू-कश्मीर राज्य से किसी विशिष्ठ व्यवहार एवं विशेष दर्जे का कोई भी लेना-देना नही था। ऐसे में 370 को आखिर भारतीय साम्राज्य की अखंडता पर ग्रहण के रूप में क्यों देखा जाने लगा ? बहुत से लोग हैं जो यह मानते हैं कि धारा 370 को समाप्त कर देने कश्मीर की लगभग सारी समस्याएँ समाप्त हो जायेंगी। किन्तु यह अधूरा सत्य है व्यवहार में धारा 370 इतना घातक नहीं जितना की 35A है। जी हाँ यही है कश्मीर की वो सबसे दुखती रग जिसकी सततता बनाये रखने की जिद को लेकर कश्मीर की सबसे बड़ी पार्टी पीडीपी सरकार बनाने के लिए बीजेपी से हाँथ मिलाने में कतरा रही थी। आज तो मुख्यमंत्री खुलकर इसके समर्थन में आ गई है। संविधान की स्पष्ट अवमानना है 35A – धारा 370 के कारण हो रही अधिकांश विसंगतियों की जड़ अनुच्छेद 35A ही बना। अनुच्छेद 370 को सशक्त करने के उद्देश्य से तत्कालीन राष्ट्रपति ने 14 मई 1954 को बिना किसी संसदीय कार्यवाही के एक संवैधानिक आदेश निकाला,जिसमें उन्होने एक नये अनुच्छेद 35A को भारत के संविधान में जोड़ दिया। जबकी यह शक्ति अनुच्छेद 368 के अंतर्गत केवल संसद को प्राप्त थी। बगैर किसी संसदीय कार्यवाही के अनुच्छेद 370 में एक नया अनुच्छेद जोड़ कर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 का सरासर उल्लंघन किया गया। इस अनुच्छेद में कहा गया कि “जम्मू-कश्मीर राज्य की विधान सभा स्थायी निवासी की परिभाषा निश्चित कर उनके विशेष अधिकार सुनिश्चित करे तथा शेष लोगों के नागरिक अधिकारों को सीमित करे।” 35A की आड़ में संविधान में वर्णित मूल अधिकारों की अवमानना – इस विशेष अनुच्छेद के नियमों के अनुसार जम्मू और कश्मीर में किसी भी व्यक्ति की नागरिकता को स्थाई या अस्थाई मानना जम्मू-कश्मीर सरकार की इच्छा-अनिच्छा पर निर्भर हो गया। इस संवैधानिक भूल का जम्मू और कश्मीर के राजनीतिक दलों ने जम कर दुरूपयोग किया। परिणाम आपके सामने है भारतीय संविधान की पंथनिरपेक्ष व्यवस्था को मुस्लिम तुष्टीकरण की भेंट चढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। इस अनुच्छेद के अनुसार जो जम्मू कश्मीर राज्य का रहने वाला नहीं है वह वहाँ पर ज़मीन नही खरीद सकता, वह वहाँ पर रोजगार नही कर सकता और वह वहाँ पर निवेश नही कर सकता। अब इसकी आड़ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14,15,19 एवं 21 में भारतीय नागरिकों को समानता और कहीं भी बसने के जो अधिकार दिए, वह प्रतिबंधित कर दिए गए। इस प्रकार एक ही भारत के नागरिकों को इस अनुच्छेद 35A ने बाँट दिया। दलित ‘हिन्दू’ हैं नरकीय जीवन जीने को मजबूर- अनुच्छेद 35A की सबसे ज्यादा मार,1947 में पश्चिमी पाकिस्तान से आए 20 लाख से ज्यादा प्रवासी ‘हिन्दू’ झेल रहे हैं। इन प्रवासी हिन्दुओं में ज्यादातर आबादी ‘दलितों’ की थी। पिछले 70 वर्षों से कश्मीर में बसे होने के बावजूद उन्हे वहाँ की ‘नागरिकता’ नहीं मिली है। उन्हें राज्य में ज़मीन खरीदने का अधिकार नहीं है,उनके बच्चे को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती, व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों के दरवाजे उनके लिए अवरुद्ध हैं। वे लोकसभा चुनावों में तो वोटिंग कर सकते हैं,परन्तु विधान सभा एवं अन्य स्थानीय चुनावों में वे न तो वोट डाल सकते हैं न ही अपनी उम्मीदवारी रख सकते हैं। सीधे तौर पर कहें तो ये भारत के नागरिक तो हैं पर जम्मू और कश्मीर के नहीं। आज इतने सालों बाद भी ये लोग शरणार्थियों सरीखा जीवन जीने को मजबूर हैं। (अधिकांश ने इस विडम्बना से उबरने के लिये इस्लाम अपना लिया है) यह अनुच्छेद केवल कुछ चुनिन्दा लोगों को 370 के तहत ‘विशेषाधिकार’ प्रदान करने में मदद करता है,जबकि शेष को मूलभूत अधिकारों से भी वंचित कर देता है। बहुत अफ़सोस की बात है की रोहित वेमुला एवं दलितों के मुद्दे में राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले सभी तथाकथित लिबरल वर्ग ने कभी भी उसी कश्मीर के वंचित ‘दलित’ तबके के प्रति हुए संवैधानिक अन्याय के खिलाफ अपनी चोंच खोलने की तो छोडिये,संवेदना व्यक्त करने की भी जहमत नहीं फ़रमायी। ================== http://hindutva.info/35a-is-real-prob lem-and-not-370/ ================== सदा सर्वदा सुमंगल., हर हर महादेव,, वंदेमातरम्,, जय सिया भवानी,,, जय श्री राम,,

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370 नहीं अनुच्छेद 35A है कश्मीर समस्या की असली जड़


370 नहीं अनुच्छेद 35A है कश्मीर समस्या की असली जड़

क्या आप ऊपर की लिखी ये बात जानते है??????

भारतीय संविधान की बहु ‘विवादास्पद’ धारा 370 के निरसन की माँगे संविधान निर्माण के शुरुआती वर्षों से ही उठती रही है। अनुच्छेद 370 वास्तव में एक प्रक्रिया है और इसे इस आशा से पारित कराया गया कि एक अल्पकालीन व्यवस्था के रूप में स्वतः ही भविष्य में समाप्त हो जाएगी। जम्मू-कश्मीर में छिड़े संग्राम के कारण संविधान सभा के अभाव में राज्य में भारतीय संविधान को लागू करने की तात्कालिक एवं अंतरिम व्यवस्था बनायी गयी। स्वयं संविधान में इस व्यवस्था को ‘अस्थाई उपबंध’ कहा गया है। इसका जम्मू-कश्मीर राज्य से किसी विशिष्ठ व्यवहार एवं विशेष दर्जे का कोई भी लेना-देना नही था। ऐसे में 370 को आखिर भारतीय साम्राज्य की अखंडता पर ग्रहण के रूप में क्यों देखा जाने लगा ? बहुत से लोग हैं जो यह मानते हैं की धारा 370 को समाप्त कर देने कश्मीर की लगभग सारी समस्याएँ समाप्त हो जायेंगी। किन्तु यह अधूरा सत्य है व्यवहार में धारा 370 इतना घातक नहीं जितना की 35A है। जी हाँ यही है कश्मीर की वो सबसे दुखती रग जिसकी सततता बनाये रखने की जिद को लेकर कश्मीर की सबसे बड़ी पार्टी पीडीपी सरकार बनाने के लिए बीजेपी से हाँथ मिलाने में कतरा रही है।

संविधान की स्पष्ट अवमानना है 35A –

धारा 370 के कारण हो रही अधिकतर विसंगतियों की जड़ अनुच्छेद 35A ही बना। अनुच्छेद 370 को सशक्त करने के उद्देश्य से तत्कालीन राष्ट्रपति ने 14 मई 1954 को बिना किसी संसदीय कार्यवाही के एक संवैधानिक आदेश निकाला,जिसमें उन्होने एक नये अनुच्छेद 35A को भारत के संविधान में जोड़ दिया। जबकी यह शक्ति अनुच्छेद 368 के अंतर्गत केवल संसद को प्राप्त थी। बगैर किसी संसदीय कार्यवाही के अनुच्छेद 370 में एक नया अनुच्छेद जोड़ कर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 का सरासर उल्लंघन किया गया। इस अनुच्छेद में कहा गया कि “जम्मू-कश्मीर राज्य की विधानसभा स्थायी निवासी की परिभाषा निश्चित कर उनके विशेष अधिकार सुनिश्चित करे तथा शेष लोगों के नागरिक अधिकारों को सीमित करे।”

35A की आड़ में संविधान में वर्णित मूल अधिकारों की अवमानना –

इस विशेष अनुच्छेद के नियमों के अनुसार जम्मू और कश्मीर में किसी भी व्यक्ति की नागरिकता को स्थाई या अस्थाई मानना जम्मू-कश्मीर सरकार की इच्छा-अनिच्छा पर निर्भर हो गया। इस संवैधानिक भूल का जम्मू और कश्मीर के राजनीतिक दलों ने जम कर दुरूपयोग किया। परिणाम आपके सामने है भारतीय संविधान की पंथनिरपेक्ष व्यवस्था को मुस्लिम तुष्टीकरण की भेंट चढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। इस अनुच्छेद के अनुसार जो जम्मू-कश्मीर राज्य का रहने वाला नहीं है वह वहाँ पर ज़मीन नही खरीद सकता, वह वहाँ पर रोजगार नही कर सकता और वह वहाँ पर निवेश नही कर सकता। अब इसकी आड़ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 एवं 21 में भारतीय नागरिकों को समानता और कहीं भी बसने के जो अधिकार दिए,वह प्रतिबंधित कर दिए गए। इस प्रकार एक ही भारत के नागरिकों को इस अनुच्छेद 35A ने बाँट दिया।

दलित ‘हिन्दू’ हैं नरकीय जीवन जीने को मजबूर-

अनुच्छेद 35A की सबसे ज्यादा मार,1947 में पश्चिमी पाकिस्तान से आए 20 लाख से ज्यादा प्रवासी ‘हिन्दू’ झेल रहे हैं। इन प्रवासी हिन्दुओं में ज्यादातर आबादी ‘दलितों’ की थी। पिछले 68 वर्षों से कश्मीर में बसे होने के बावजूद उन्हे वहाँ की ‘नागरिकता’ नहीं मिली है। उन्हें राज्य में ज़मीन खरीदने का अधिकार नहीं है,उनके बच्चे को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती,व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों के दरवाजे उनके लिए अवरुद्ध हैं। वे लोकसभा चुनावों में तो वोटिंग कर सकते हैं,परन्तु विधान सभा एवं अन्य स्थानीय चुनावों में वे न तो वोट डाल सकते हैं न ही अपनी उम्मीदवारी रख सकते हैं। सीधे तौर पर कहें तो ये भारत के नागरिक तो हैं पर जम्मू और कश्मीर के नहीं। आज इतने सालों बाद भी ये लोग शरणार्थियों सरीखा जीवन जीने को मजबूर हैं। यह अनुच्छेद केवल कुछ चुनिन्दा लोगों को 370 के तहत ‘विशेषाधिकार’ प्रदान करने में मदद करता है,जबकि शेष को मूलभूत अधिकारों से भी वंचित कर देता है। बहुत अफ़सोस की बात है की रोहित वेमुला के मुद्दे में राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले सभी तथाकथित लिबरल वर्ग ने कभी भी उसी कश्मीर के वंचित ‘दलित’ तबके के प्रति हुए संवैधानिक अन्याय के खिलाफ अपनी चोंच खोलने की तो छोडिये,संवेदना व्यक्त करने की भी जहमत नहीं फ़रमायी।

संविधान की किताबों से है ‘नदारद’ है अनुच्छेद 35A –

मजे की बात ये है की यदि आप संविधान की किसी भी प्रमाणिक पुस्तक को पढेंगे तो आपको यह धारा शायद कहीं दिखायी न दे.आपको अनुच्छेद 35(a) अवश्य पढ़ने को मिलेगा पर 35A ढूंढने के लिए आपको संविधान की (एपेंडिक्स) पर नजर डालनी होगी। यदि इसे संवैधानिक ‘चोरी कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के करीबी माने जाने वाले थिंक टैंक संगठन जम्मू और कश्मीर स्टडी सेंटर (JKSC) अनुच्छेद 35A के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। संस्थान के निदेशक श्री आशुतोष भटनागर के मुताबिक़ यह आर्टिकल संविधान के मूलभूत ढाँचे के खिलाफ है,जिसमें संसद भी संशोधन नहीं कर सकती है। इसलिए यह अनुच्छेद पूर्णतः असंवैधानिक है इसलिए सुप्रीम कोर्ट को स्वतः इस मामले पर ‘संज्ञान’ लेना चाहिये। आर्टिकल 370 से पहले अनुच्छेद 35A को हटाया जाना बेहद जरुरी है।

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POK_गिलगित_बाल्टिस्तान


#POK_गिलगित_बाल्टिस्तान
पोस्ट थोड़ी लम्बी है, लेकिन समय निकाल कर पढियेगा जरूर।।
वास्तव में अगर जम्मू कश्मीर के बारे में बातचीत करने की जरूरत है तो वह है POK  और अक्साई चीन के बारे मेंl इसके ऊपर देश में चर्चा होनी चाहिए गिलगित जो अभी POK में है  विश्व में एकमात्र ऐसा स्थान है जो कि 5 देशों से जुड़ा हुआ है.

अफगानिस्तान, तजाकिस्तान (जो कभी Russia का हिस्सा था), पाकिस्तान, भारत और  तिब्बत -चाइना l
“वास्तव में *जम्मू कश्मीर का महत्व, जम्मू के कारण नहीं,  कश्मीर के कारण नहीं, लद्दाख के कारण नहीं है. वास्तव में अगर इसका महत्व है तो उसका कारण है

गिलगित-बाल्टिस्तान l”
भारत के इतिहास में भारत पर जितने भी आक्रमण हुए यूनानियों से लेकर आज तक (शक , हूण, कुषाण , मुग़ल ) वह सारे ‘गिलगित’ से हुएl  हमारे पूर्वज, जम्मू-कश्मीर के महत्व को समझते थे उनको पता था कि अगर भारत को सुरक्षित रखना है तो दुश्मन को हिंदूकुश अर्थात गिलगित-बाल्टिस्तान उस पार  ही रखना हैl  किसी समय, इस गिलगित में, अमेरिका बैठना चाहता था, ब्रिटेन अपना नियंत्रण केन्द्र, “गिलगित” में बनाना चाहता था , Russia भी गिलगित में  बैठना चाहता था यहां तक कि पाकिस्तान में 1965 में गिलगित को रूस, को देने का वादा तक कर लिया था. आज चाइना “गिलगित” में बैठना चाहता है और वह अपने पैर पसार भी चुका है और पाकिस्तान तो बैठना चाहता ही थाl
दुर्भाग्य से इस “गिलगित” के महत्व को सारी दुनिया ने समझा है  केवल एक को छोड़कर, जिसका वास्तव में “गिलगित-बाल्टिस्तान” है और वह है भारत l
क्योंकि हमको इस बात की कल्पना भी नहीं है, भारत को अगर सुरक्षित रहना है तो हमें “गिलगित-बाल्टिस्तान” किसी भी हालत में  चाहिए l आज हम “आर्थिक शक्ति” बनने की सोच रहे हैं.  🌟✨

क्या आपको पता है?  गिलगित से सड़क के रास्ते, आप विश्व के अधिकांश कोनों में जा सकते हैं!!  “गिलगित’ से ,  5000 Km दुबई है,

1400 Km  दिल्ली है,

2800 Km  मुंबई है,

3500 Km रूस  है,

चेन्नई 3800 Km है और

लंदन 8000 Km है l

जब हम सोने की चिड़िया थे, हमारा सारे देशों से “व्यापार चलता था.” 85 % जनसंख्या इन मार्गों से जुड़ी हुई थी, मध्य एशिया, यूरेशिया, यूरोप, अफ्रीका सब जगह हम सड़कों से जा सकते हैं अगर “गिलगित-बाल्टिस्तान” हमारे पास हो l आज हम पाकिस्तान के सामने IPI (Iran-Pakistan-India) गैस लाइन बिछाने के लिए गिड़गिड़ाते हैं. ये तापी की परियोजना है, जो  कभी पूरी नहीं होगी अगर हमारे पास “गिलगित” होता तो गिलगित के आगे तज़ाकिस्तान था. हमें किसी के सामने हाथ नहीं फ़ैलाने पड़ते l   💫 🍃
हिमालय की 10 बड़ी चोटियाँ हैं जो कि विश्व की 10 बड़ी चोटियों में से है. ये सारी हमारी है और इन 10  में से 8  गिलगित-बाल्टिस्तान में है l  तिब्बत, पर चीन का कब्जा होने के बाद जितने भी पानी के वैकल्पिक स्त्रोत (Alternate Water Resources) हैं. वह सारे “गिलगित-बाल्टिस्तान” में हैं l
आप हैरान हो जाएंगे, वहां बड़ी-बड़ी 50-100  यूरेनियम और सोने की खदानें हैं. आप POK के “मिनरल डिपार्टमेंट” की रिपोर्ट को पढ़िए आप आश्चर्यचकित रह जाएंगे !!  वास्तव में  गिलगित-बाल्टिस्तान का महत्व हमको मालूम नहीं है और *सबसे बड़ी बात, “गिलगित-बाल्टिस्तान” के लोग बहुत बड़े पाकिस्तान विरोधी हैं l

दुर्भाग्य क्या है? हम हमेशा ‘कश्मीर’ बोलते हैं, जम्मू- कश्मीर नहीं बोलते हैं l कश्मीर, कहते ही जम्मू, लद्दाख, गिलगित-बाल्टिस्तान दिमाग से निकल जाता है l ये जो पाकिस्तान के कब्जे में, जो POK  है, उसका क्षेत्रफल 79000 वर्ग किलोमीटर है. उसमें ‘कश्मीर’ का हिस्सा तो सिर्फ 6000 वर्ग किलोमीटर है, 9000 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा ‘जम्मू’ का है और 64000 वर्ग किलोमीटर हिस्सा लद्दाख का है, जो कि “गिलगित-बाल्टिस्तान” है l यह कभी “कश्मीर का हिस्सा” नहीं था. यह “लद्दाख” का हिस्सा था, वास्तव में सच्चाई यही है l इसलिए “पाकिस्तान” यह जो बार-बार कश्मीर का राग अलापता रहता है, “उसको कोई यह पूछे तो सही – क्या गिलगित-बाल्टिस्तान और जम्मू का हिस्सा जिस पर  तुमने कब्ज़ा कर रखा है, क्या ये  भी कश्मीर का ही भाग है ??

😶😶 कोई जवाब नहीं मिलेगा l   💫
क्या आपको पता है “गिलगित-बाल्टिस्तान” , लद्दाख, के रहने वाले लोगो की औसत आयु  विश्व में सर्वाधिक है! यहाँ के लोग विश्व अन्य लोगो की तुलना में ज्यादा जीते है l

😮

भारत में आयोजित एक सेमिनार में गिलगित-बाल्टिस्तान के एक बड़े नेता को बुलाया गया था उसने कहा, “we are the forgotten people of forgotten lands of BHARAT”.

 

उसने कहा,  “देश हमारी बात ही नहीं जानता l” ❕😲

किसी ने उनसे सवाल किया, “क्या आप भारत में रहना चाहते हैं??”

तो उन्होंने कहा, “60 साल बाद तो आपने मुझे भारत बुलाया और वह भी अमेरिकन टूरिस्ट वीजा पर, और आप मुझसे सवाल पूछते हैं कि क्या आप भारत में रहना चाहते हैं l आप गिलगित-बाल्टिस्तान के बच्चों को IIT , IIM  में दाखिला दीजिए  AIIMS  में हमारे लोगों का इलाज कीजिए l हमें यह लगे तो सही कि भारत हमारी चिंता करता है हमारी बात करता है l गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तान की सेना कितने अत्याचार करती है लेकिन आपके  किसी भी राष्ट्रीय अखबार में उसका जिक्र तक नहीं आता है l आप हमें ये अहसास तो दिलाइये की आप हमारे साथ है l”
यहाँ, मैं खुद आपसे यह पूछता हूं कि आप सभी ने पाकिस्तान, को हमारे कश्मीर में हर सहायता उपलब्ध कराते हुए देखा होगा l वह बार-बार कहता है कि हम कश्मीर की जनता के साथ हैं, कश्मीर की  आवाम हमारी है l लेकिन क्या आपने कभी यह सुना है कि किसी भी भारत के नेता, मंत्री या सरकार ने यह कहा हो कि हम POK गिलगित-बाल्टिस्तान की जनता के साथ हैं, वह हमारी आवाम है, उनको जो भी सहायता उपलब्ध होगी हम उपलब्ध करवाएंगे आपने यह कभी नहीं सुना होगा l  कांग्रेस सरकार ने, कभी POK  गिलगित-बाल्टिस्तान, को पुनः भारत में लाने के लिए कोई बयान तक नहीं दिया प्रयास तो बहुत दूर की बात है l हालाँकि पहली बार “अटल बिहारी वाजपेयी जी” की सरकार के समय POK का मुद्दा उठाया गया फिर 10 साल पुनः मौन धारण हो गया और फिर से नरेंद्र मोदी जी की सरकार आने पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में ये मुद्दा उठाया l
आज अगर आप किसी को गिलगित के बारे में पूछ भी लोगे तो उसे यह पता नहीं है कि यह जम्मू कश्मीर का ही भाग है l वह यह पूछेगा क्या यह कोई चिड़िया का नाम है ?? वास्तव में हमें जम्मू कश्मीर के बारे में जो गलत नजरिया है उसको बदलने की जरूरत है l
अब करना क्या चाहिए?? तो पहली बात है सुरक्षा में किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा का मुद्दा बहुत “संवेदनशील” है. इस पर अनावश्यक वाद-विवाद नहीं होना चाहिए l

एक अनावश्यक वाद विवाद चलता है कि जम्मू कश्मीर में इतनी  सेना क्यों है??

तो ‘बुद्धिजीवियों’ को बता दिया जाए कि जम्मू-कश्मीर का 2800 किलोमीटर का “बॉर्डर” है, जिसमें 2400  किलोमीटर पर LOC है l आजादी, के बाद भारत ने “पांच युद्ध लड़े* वह सभी “जम्मू-कश्मीर से लड़े,” भारतीय सेना के 18 लोगों को “परमवीर चक्र” मिला और वह 18 के 18 जम्मू कश्मीर में ‘शहीद’ हुए हैं l
इनमें 14000 भारतीय सैनिक शहीद हुए हैं जिनमें से 12000 जम्मू कश्मीर में शहीद हुए हैं l

अब सेना, “बॉर्डर” पर नहीं, तो क्या मध्यप्रदेश में रहेगी? क्या यह सब जो सेना की इन बातों को नहीं समझते, वही यह सब अनर्गल चर्चा करते हैं l
वास्तव में जम्मू कश्मीर पर बातचीत करने के बिंदु होने चाहिए👉 POK  ,  वेस्ट पाक रिफ्यूजी, कश्मीरी हिंदू समाज, आतंक से पीड़ित लोग, धारा 370 और 35A  का दुरूपयोग, गिलगित-बाल्टिस्तान का वह क्षेत्र जो आज पाकिस्तान -चाइना के कब्जे में है l

जम्मू- कश्मीर के गिलगित- बाल्टिस्तान में अधिकांश जनसंख्या शिया मुसलमानों की है और वह सभी “पाक विरोधी” हैं. वह आज भी अपनी लड़ाई खुद लड़  रहे हैं. पर “भारत” उनके साथ है ऐसा उनको महसूस कराना चाहिए. देश कभी उनके साथ खड़ा नहीं हुआ वास्तव में पूरे देश में इसकी चर्चा होनी चाहिएl
वास्तव में जम्मू-कश्मीर के विमर्श का मुद्दा बदलना चाहिएl जम्मू कश्मीर को लेकर सारे देश में सही जानकारी देने की जरूरत हैl  इसके लिए एक इंफॉर्मेशन कैंपेन चलना चाहिए l  पूरे देश में  वर्ष में एक बार 26 अक्टूबर को  जम्मू कश्मीर का दिवस मनाना चाहिएl सबसे बड़ी बात है कि जम्मू कश्मीर को “राष्ट्रवादियों* की नजर से देखना होगा जम्मू कश्मीर की चर्चा हो तो वहां के राष्ट्रभक्तों की चर्चा होनी चाहिए तो उन 5 जिलों के कठमुल्ले तो फिर वैसे ही अपंग हो जाएंगे l

इस कश्मीर श्रृंखला के माध्यम से मैंने आपको पूरे जम्मू कश्मीर की पृष्ठभूमि और परिस्थितियों से अवगत करवाया और मेरा मुख्य उद्देश्य सिर्फ यही है कि जम्मू कश्मीर के बारे में देश के प्रत्येक नागरिक को यह सब जानकारियां होनी चाहिए l

अब आप इतने समर्थ हैं कि जम्मू कश्मीर को लेकर आप किसी से भी वाद-विवाद या तर्क कर सकते हैं l किसी को आप समझा सकते हैं कि वास्तव में जम्मू-कश्मीर की परिस्थितियां क्या है l वैसे तो जम्मू कश्मीर पर एक ग्रन्थ लिखा जा सकता है लेकिन मैंने जितना हो सका उतने संछिप्त रूप में इसे आपके सामने रखा है l

अगर आप  इस श्रंखला को अधिक से अधिक जनता के अंदर प्रसारित करेंगे तभी हम जम्मू कश्मीर के विमर्श का मुद्दा बदल सकते हैं अन्यथा नहीं l इसलिए मेरा आप सभी से यही अनुरोध है श्रृंखला को अधिक से अधिक लोगों की जानकारी में लाया जाए ताकि देश की जनता को जम्मू कश्मीर के संदर्भ में सही  तथ्यों  का पता लग सके l
Refrences :

INDIA INDEPENDECE ACT 1947

INDIAN CONSTITUTION ACT 1950

JAMMU & KASHMIR ACT 1956

INDIAN GOVT. ACT 1935

Dr. Kirshandev Jhari

Dr. kuldeep Chandra Agnihotri

Jammu-kashmir Adhyan Kendra

Sushil pandit (kashmiri pandit)

SC & J&K HC Court judgements

News sources  &

Various ACCORDS & Statements
जय हिन्द !  #कश्मीर_श्रृंखला भाग ९

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कश्मीर कुछ अनकही कुछ अनसुनी बातें 

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नेपाल में राजशाही ख़त्म होने के बाद प्रजातंत्र आया।  डेमोक्रेटिक तरीके से सरकार की स्थापना हुई और शासन चलाने के लिए संविधान बना।  नेपाल की मुख्य पार्टियों में नेपाल कांग्रेस , प्रचन दा की नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी और बाकी छोटी छोटी पार्टियां हैं।  नेपाल में हिल और तराई क्षेत्र दो मुख्य इलाके हैं।  
तराई में रहने वाले मधेशी कहलाते हैं जिनके भारत से अभिन्न सम्बन्ध रहे हैं।  मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद नेपाल से भारत के सम्बन्ध बिगड़े।  क्योंकि नेपाली सरकार का आरोप था की नेपाल में चलते मधेशियों के आंदोलन को भारत की मोदी सरकार हवा दे रही है , भड़का रही है।  नेपाल की सरकार को  झुकाने के लिए अघोषित ब्लॉकेड कर रही है।  
सवाल ये है की मधेशियो का आंदोलन क्या था ? वो अपनी ही सरकार के खिलाफ क्यों थे ? इतने खिलाफ की महीनो उन्होंने ब्लॉकेड रखा।  अन्न जल पेट्रोल डीजल हर चीज की किल्लत होने दी।  
डेमोक्रेसी के बाद जब संविधान बना. साथ में चुनाव करवा कर सरकार की स्थापना के लिए नेपाल को चुनावी क्षेत्रो में बांटा गया।  संसदीय सीटें। 
उस समय की सरकार में कम्युनिस्ट ज्यादा थे जो हिली एरिया से बिलोंग करते थे।  आबादी ज्यादा तराई इलाको में थी।  मधेशी ज्यादा थे।  
लेकिन संसदीय सीटें इस तरह निर्धारित की गयी ताकि हिल रीजन से ज्यादा सांसद चुने जाएँ और तराई इलाकों से कम।  
इससे सत्ता में हमेशा पहाड़ी लोगों का वर्चस्व रहेगा।  सरकार उनकी रहेगी।  
और  यही नेपाल में अशांति का कारन बना।  आज तक असंतोष है और मधेशी आंदोलनरत हैं।  
कम जनसँख्या, कम इलाका  होते हुए भी नेपाल में एक वर्ग ने सत्ता पर पकड़ हासिल कर ली।  
क्या पहले भी ऐसा हुआ है कभी।  जब ऐसी ही किसी तरकीब से किसी वर्ग ने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत की हो ? 
नीचे सलंग्न तस्वीर देखिये।  ये नक्शा जम्मू कश्मीर का है।  कुल इलाका २ लाख वर्ग किलोमीटर।  जिसमे करीब 1 लाख भारत के पास है , 78 हजार पाकिस्तान के  पास और शेष चीन के पास।  
भारतीय जम्मू कश्मीर प्रदेश के तीन रीजन हैं। 
लद्दाख जो सबसे बड़ा डिवीजन है , जिसमे दो जिले हैं।  ये बौद्ध बहुल इलाका है।  
 जम्मू दूसरा बड़ा डिवीजन जिसमे दस जिले हैं , ये हिन्दू बहुल है और कुछ जिले मुस्लिम बहुल।  
कश्मीर जिसका कुल एरिया 15 हजार किलोमीटर है दस जिले हैं और मुस्लिम प्रधान है।  कश्मीर का कुल एरिया लद्दाख के कारगिल जिले के बराबर है और लेह जिला कश्मीर एरिया का तिगुना है।  
जम्मू एरिया से कुल 37 विधायक चुने जाते हैं।  लद्दाख से 4 और कश्मीर से 46 . 
कुल 87 विधायकों में 46 विधायक कश्मीर से।  सबसे छोटे इलाके से।  
फिर अचरज की क्या बात की जम्मू कश्मीर को हम कश्मीरी राजनीती से ही जानते हैं।  महबूबा मुफ़्ती , फारूख बाप बेटा , गुलाम नबी आजाद।  यही जम्मू कश्मीर को रिप्रेजेंट करते हैं।  
जम्मू कश्मीर की कुल आबादी में 68 % मुस्लिम हैं।  और इसीलिए गुलाम नबी आजाद ने पिछले चुनाव में कहा था की जम्मू कश्मीर में कोई मुख्य मंत्री बनेगा तो वो मुस्लिम ही होगा।  
लेकिन क्या आबादी में बहुलता ही सब कुछ है ? 
एरिया छोटा बड़ा महत्वपूर्ण नहीं है।  लद्दाख के हिस्से में 4 विधायक संतोषजनक हैं।  जिनमे एक विधायक का एरिया 35 हजार वर्ग किलोमीटर हैं।  कश्मीर का ढाई गुना।  क्या ये जस्टिफाइड है ? 
और प्रदेशों में आबादी कम होते हुए भी ज्यादा सीटें नहीं हैं ? 
प्रदेश की राजनीति , सत्ता पर अपनी पकड़ बनाये रखने का ये बेहद आसान तरीका है।  
कब कैसे ये विधानसभा सीटें निश्चित हुईं ? किसने किया , किसने साजिश रची , मालूम नहीं ? 
कश्मीर को लेकर फैली तमाम उत्तेजना में कुछ सवाल कभी नहीं पूछे गए।  
लेकिन अब वो सवाल सामने आएंगे जरूर।