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पटना के गाँधी मैदान

Arun Kumar shared a photo to the group Save Ganga !!
2 hrs · Edited ·
पटना के गाँधी मैदान में भगदड़ से दर्जनों जानें गयी, ज्यादातर बच्चे और महिलायें ! मेरी अश्रुपूर्ण श्रधांजलि | भगवान उन आत्माओं को अपने चरणों में स्थान दें जिन्हें अपनी जिंदगी, अपने सपनों को अधूरी छोडकर दुनियाँ से इस तरह विदा होना पड़ा | परन्तु एक सवाल है जो अधूरा रह गया | ये किसकी गलती है ?  1. स्थानीय प्रशासन की, जिन्हें पिछली घटनओं से कोई सीख नहीं मिली ? 2. आला अधिकारीयों की जिन्होंने इतने बड़े आयोजन को गंभीरता से नहीं लिया और CM साहब को उनके आवास तक छोड़ना उचित समझा ? 3. व्यवस्थापकों की जिन्होंने बिजली और बल्ब तक में कंजूसी की और निकलने के रास्ते को अँधेरा छोड़ दिया ? 4. ड्यूटी पर तैनात सिपाही और ठेले वालों की मिलीभगत की जिन्होंने निकलने के रास्ते पर ठेला लगा दिया ? 5. उस नीच दरिन्दें की जिसने तार गिरने की अफवाह फैलाई ?  6. या फिर हमारी, जो हम हर समय उतावले रहते हैं ऐसे भीड़ भाड़ वाले आयोजनों का हिस्सा बनने के लिये, अपने छोटे छोटे बच्चों की जान खुद जोखिम में डालते हैं इतनी भीड़ वाली जगहों पर ले जाकर ?

पटना के गाँधी मैदान में भगदड़ से दर्जनों जानें गयी, ज्यादातर बच्चे और महिलायें ! मेरी अश्रुपूर्ण श्रधांजलि | भगवान उन आत्माओं को अपने चरणों में स्थान दें जिन्हें अपनी जिंदगी, अपने सपनों को अधूरी छोडकर दुनियाँ से इस तरह विदा होना पड़ा |

परन्तु एक सवाल है जो अधूरा रह गया | ये किसकी गलती है ?
1. स्थानीय प्रशासन की, जिन्हें पिछली घटनओं से कोई सीख नहीं मिली ?
2. आला अधिकारीयों की जिन्होंने इतने बड़े आयोजन को गंभीरता से नहीं लिया और CM साहब को उनके आवास तक छोड़ना उचित समझा ?
3. व्यवस्थापकों की जिन्होंने बिजली और बल्ब तक में कंजूसी की और निकलने के रास्ते को अँधेरा छोड़ दिया ?
4. ड्यूटी पर तैनात सिपाही और ठेले वालों की मिलीभगत की जिन्होंने निकलने के रास्ते पर ठेला लगा दिया ?
5. उस नीच दरिन्दें की जिसने तार गिरने की अफवाह फैलाई ?
6. या फिर हमारी, जो हम हर समय उतावले रहते हैं ऐसे भीड़ भाड़ वाले आयोजनों का हिस्सा बनने के लिये, अपने छोटे छोटे बच्चों की जान खुद जोखिम में डालते हैं इतनी भीड़ वाली जगहों पर ले जाकर ?

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ये रोमिला थापर है, इतिहास लेखन का काम करती है.

ये रोमिला थापर है, 
इतिहास लेखन का काम करती है. 
ये और इसके जैसे तमाम इतिहास लेखकों के ऊपर कोई सेंसर बोर्ड नहीं है, ये जो चाहे लिख सकते हैं, और हम तथा हमारे बच्चे इनके लिखे हुए विकृत और असत्य लेखों को दिमाग की बत्ती बंद करके पढते रहते हैं, जब हम इनको पढते रहते हैं, तब हमारा सरोकार सिर्फ इतना रहता है कि बस इसका रट्टा मारो और परीक्षा के दौरान कॉपी पर छाप दो जिससे अच्छे नम्बर आ जाएँ, 

लेकिन हम ये भूल जाते हैं, हम जो पढते हैं, उसको साथ साथ गढते भी हैं, उसकी छवियाँ और दृश्य साथ साथ दिमाग में घर बनाते रहते हैं, जिसका नतीजा ये होता है कि अगर इन्होने राम और महाभारत को काल्पनिक लिख दिया तो हम भी उसे काल्पनिक मानकर अपनी ही संस्कृति और परम्पराओं से घृणास्पद दूरी बना लेते हैं, 

और यही इन किराये के टट्टुओं का मकसद रहता है. 
इन विधर्मी और गद्दार लेखकों द्वारा देश के इतिहास के सम्बन्ध में जो विकृत लेख लिखे गए हैं, उसकी एक बानगी आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है. 
------------------------------------------------------

वैदिक काल में विशिष्ट अतिथियों के लिए गोमांस का परोसा जाना सम्मान सूचक माना जाता था।
(कक्षा 6-प्राचीन भारत, पृष्ठ 35, लेखिका-रोमिला थापर)

महमूद गजनवी ने मूर्तियों को तोड़ा और इससे वह धार्मिक नेता बन गया।
(कक्षा 7-मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 28)

1857 का स्वतंत्रता संग्राम एक सैनिक विद्रोह था।
(कक्षा 8-सामाजिक विज्ञान भाग-1, आधुनिक भारत, पृष्ठ 166, लेखक-अर्जुन देव, इन्दिरा अर्जुन देव)

महावीर 12 वर्षों तक जहां-तहां भटकते रहे। 12 वर्ष की लम्बी यात्रा के दौरान उन्होंने एक बार भी अपने वस्त्र नहीं बदले। 42 वर्ष की आयु में उन्होंने वस्त्र का एकदम त्याग कर दिया।
(कक्षा 11, प्राचीन भारत, पृष्ठ 101, लेखक-रामशरण शर्मा)

तीर्थंकर, जो अधिकतर मध्य गंगा के मैदान में उत्पन्न हुए और जिन्होंने बिहार में निर्वाण प्राप्त किया, की मिथक कथा जैन सम्प्रदाय की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए गढ़ ली गई।
(कक्षा 11-प्राचीन भारत, पृष्ठ 101, लेखक-रामशरण शर्मा)

जाटों ने, गरीब हो या धनी, जागीरदार हो या किसान, हिन्दू हो या मुसलमान, सबको लूटा।
(कक्षा 12 - आधुनिक भारत, पृष्ठ 18-19, विपिन चन्द्र)

रणजीत सिंह अपने सिंहासन से उतरकर मुसलमान फकीरों के पैरों की धूल अपनी लम्बी सफेद दाढ़ी से झाड़ता था।
(कक्षा 12 -पृष्ठ 20, विपिन चन्द्र)

आर्य समाज ने हिन्दुओं, मुसलमानों, पारसियों, सिखों और ईसाइयों के बीच पनप रही राष्ट्रीय एकता को भंग करने का प्रयास किया।
(कक्षा 12-आधुनिक भारत, पृष्ठ 183, लेखक-विपिन चन्द्र)

तिलक, अरविन्द घोष, विपिनचन्द्र पाल और लाला लाजपतराय जैसे नेता उग्रवादी तथा आतंकवादी थे
(कक्षा 12-आधुनिक भारत-विपिन चन्द्र, पृष्ठ 208)

400 वर्ष ईसा पूर्व अयोध्या का कोई अस्तित्व नहीं था। महाभारत और रामायण कल्पित महाकाव्य हैं।
(कक्षा 11, पृष्ठ 107, मध्यकालीन इतिहास, आर.एस. शर्मा)

वीर पृथ्वीराज चौहान मैदान छोड़कर भाग गया और गद्दार जयचन्द गोरी के खिलाफ युद्धभूमि में लड़ते हुए मारा गया।

(कक्षा 11, मध्यकालीन भारत, प्रो. सतीश चन्द्र)
औरंगजेब जिन्दा पीर थे।

(मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 316, लेखक-प्रो. सतीश चन्द्र)
राम और कृष्ण का कोई अस्तित्व ही नहीं था। वे केवल काल्पनिक कहानियां हैं।

(मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 245, रोमिला थापर)

(ऐसी और भी बहुत सी आपत्तिजनक बाते आपको एन.सी.आर.टी. की किताबों में पढ़ने को मिल जायेंगी)

इन किताबों में जो छापा जा रहा हैं उनमें रोमिला थापर जैसी लेखको ने मुसलमानों द्वारा धर्म के नाम पर काफ़िर हिन्दुओं के ऊपर किये गये भयानक अत्याचारों को गायब कर दिया है. 

नकली धर्मनिरपेक्षतावादी नेताओं की शह पर झूठा इतिहास लिखकर एक समुदाय की हिंसक मानसिकता पर जानबूझकर पर्दा ड़ाला जा रहा है. इन भयानक अत्याचारों को सदियों से चली आ रही गंगा जमुनी संस्कृति, अनेकता में एकता और धार्मिक सहिष्णुता बताकर नौजवान पीढ़ी को धोखा दिया जा रहा है. 

उन्हें अंधकार में रखा जा रहा है. भविष्य में इसका परिणाम बहुत खतरनाक होगा क्योकि नयी पीढ़ी ऐसे मुसलमानों की मानसिकता न जानने के कारण उनसे असावधान रहेगी और खतरे में पड़ जायेगी.

सोचने का विषय है कि आखिर किसके दबाव में सत्य को छिपाया अथवा तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है?????

ये रोमिला थापर है,
इतिहास लेखन का काम करती है.
ये और इसके जैसे तमाम इतिहास लेखकों के ऊपर कोई सेंसर बोर्ड नहीं है, ये जो चाहे लिख सकते हैं, और हम तथा हमारे बच्चे इनके लिखे हुए विकृत और असत्य लेखों को दिमाग की बत्ती बंद करके पढते रहते हैं, जब हम इनको पढते रहते हैं, तब हमारा सरोकार सिर्फ इतना रहता है कि बस इसका रट्टा मारो और परीक्षा के दौरान कॉपी पर छाप दो जिससे अच्छे नम्बर आ जाएँ,

लेकिन हम ये भूल जाते हैं, हम जो पढते हैं, उसको साथ साथ गढते भी हैं, उसकी छवियाँ और दृश्य साथ साथ दिमाग में घर बनाते रहते हैं, जिसका नतीजा ये होता है कि अगर इन्होने राम और महाभारत को काल्पनिक लिख दिया तो हम भी उसे काल्पनिक मानकर अपनी ही संस्कृति और परम्पराओं से घृणास्पद दूरी बना लेते हैं,

और यही इन किराये के टट्टुओं का मकसद रहता है.
इन विधर्मी और गद्दार लेखकों द्वारा देश के इतिहास के सम्बन्ध में जो विकृत लेख लिखे गए हैं, उसकी एक बानगी आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है.
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वैदिक काल में विशिष्ट अतिथियों के लिए गोमांस का परोसा जाना सम्मान सूचक माना जाता था।
(कक्षा 6-प्राचीन भारत, पृष्ठ 35, लेखिका-रोमिला थापर)

महमूद गजनवी ने मूर्तियों को तोड़ा और इससे वह धार्मिक नेता बन गया।
(कक्षा 7-मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 28)

1857 का स्वतंत्रता संग्राम एक सैनिक विद्रोह था।
(कक्षा 8-सामाजिक विज्ञान भाग-1, आधुनिक भारत, पृष्ठ 166, लेखक-अर्जुन देव, इन्दिरा अर्जुन देव)

महावीर 12 वर्षों तक जहां-तहां भटकते रहे। 12 वर्ष की लम्बी यात्रा के दौरान उन्होंने एक बार भी अपने वस्त्र नहीं बदले। 42 वर्ष की आयु में उन्होंने वस्त्र का एकदम त्याग कर दिया।
(कक्षा 11, प्राचीन भारत, पृष्ठ 101, लेखक-रामशरण शर्मा)

तीर्थंकर, जो अधिकतर मध्य गंगा के मैदान में उत्पन्न हुए और जिन्होंने बिहार में निर्वाण प्राप्त किया, की मिथक कथा जैन सम्प्रदाय की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए गढ़ ली गई।
(कक्षा 11-प्राचीन भारत, पृष्ठ 101, लेखक-रामशरण शर्मा)

जाटों ने, गरीब हो या धनी, जागीरदार हो या किसान, हिन्दू हो या मुसलमान, सबको लूटा।
(कक्षा 12 – आधुनिक भारत, पृष्ठ 18-19, विपिन चन्द्र)

रणजीत सिंह अपने सिंहासन से उतरकर मुसलमान फकीरों के पैरों की धूल अपनी लम्बी सफेद दाढ़ी से झाड़ता था।
(कक्षा 12 -पृष्ठ 20, विपिन चन्द्र)

आर्य समाज ने हिन्दुओं, मुसलमानों, पारसियों, सिखों और ईसाइयों के बीच पनप रही राष्ट्रीय एकता को भंग करने का प्रयास किया।
(कक्षा 12-आधुनिक भारत, पृष्ठ 183, लेखक-विपिन चन्द्र)

तिलक, अरविन्द घोष, विपिनचन्द्र पाल और लाला लाजपतराय जैसे नेता उग्रवादी तथा आतंकवादी थे
(कक्षा 12-आधुनिक भारत-विपिन चन्द्र, पृष्ठ 208)

400 वर्ष ईसा पूर्व अयोध्या का कोई अस्तित्व नहीं था। महाभारत और रामायण कल्पित महाकाव्य हैं।
(कक्षा 11, पृष्ठ 107, मध्यकालीन इतिहास, आर.एस. शर्मा)

वीर पृथ्वीराज चौहान मैदान छोड़कर भाग गया और गद्दार जयचन्द गोरी के खिलाफ युद्धभूमि में लड़ते हुए मारा गया।

(कक्षा 11, मध्यकालीन भारत, प्रो. सतीश चन्द्र)
औरंगजेब जिन्दा पीर थे।

(मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 316, लेखक-प्रो. सतीश चन्द्र)
राम और कृष्ण का कोई अस्तित्व ही नहीं था। वे केवल काल्पनिक कहानियां हैं।

(मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 245, रोमिला थापर)

(ऐसी और भी बहुत सी आपत्तिजनक बाते आपको एन.सी.आर.टी. की किताबों में पढ़ने को मिल जायेंगी)

इन किताबों में जो छापा जा रहा हैं उनमें रोमिला थापर जैसी लेखको ने मुसलमानों द्वारा धर्म के नाम पर काफ़िर हिन्दुओं के ऊपर किये गये भयानक अत्याचारों को गायब कर दिया है.

नकली धर्मनिरपेक्षतावादी नेताओं की शह पर झूठा इतिहास लिखकर एक समुदाय की हिंसक मानसिकता पर जानबूझकर पर्दा ड़ाला जा रहा है. इन भयानक अत्याचारों को सदियों से चली आ रही गंगा जमुनी संस्कृति, अनेकता में एकता और धार्मिक सहिष्णुता बताकर नौजवान पीढ़ी को धोखा दिया जा रहा है.

उन्हें अंधकार में रखा जा रहा है. भविष्य में इसका परिणाम बहुत खतरनाक होगा क्योकि नयी पीढ़ी ऐसे मुसलमानों की मानसिकता न जानने के कारण उनसे असावधान रहेगी और खतरे में पड़ जायेगी.

सोचने का विषय है कि आखिर किसके दबाव में सत्य को छिपाया अथवा तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है?????

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कुछ जानने और समझने योग्य कटु सत्य—

कुछ जानने और समझने योग्य कटु सत्य—
क्या आप समझ सकते हैं …????

1 )

अगर आप खोटालेबाज है आपने कितना चारा खाया तो कोई फर्क नही पड़ता । आपको जमानत मिल सकता है ।
|
लालूप्रसाद

( 2 )

अगर आपने अवैध हथियार रखा है और पकड़े गए तो भी आपको पेरोल पे छूटकर मौज कर सकते है ।
|
संजय दत्त

( 3 )

अगर आप अपने महिला सहयोगी से छेड़छाड़ करते है और cctv फुटेज में साबित हो जाता है तो भी आपको जमानत मिल जायेगा ।
|
तरुण तेजपाल

1) 2) 3 )4)

लेकिन

आप अगर एक सच्चे संत है और कोई भी सबूत आपके खिलाफ न हो, और आप
75 वर्ष के हो और बीमार भी हो तो आपको इलाज के लिए भी इजाजत नही मिलेगा और न ही आपको जमानत भी मिलेगा ।क्यों कि आप भारत के संत हैं और हिन्दू संस्कृति की रक्षा की आपने जिम्मेदारी ली है ।
|
संत श्री आशाराम बापू

??????????????????????????????????

ये है हमारे जागरूक भारत का न्याय !!!…..???

क्या यह न्याय सही है ???

अगर नही — !!
तो —
आप खुलकर इस समस्या का विरोध करे और
मांग करे कि निर्दोष लोगों को जेल क्यों और भ्रष्टाचारी, आतंकवादी और फरेबियों को बेल क्यों ???

अगर आप विरोध नही करते हैं तो आप भ्रष्टाचारी ,क्रिमनल ,और रेपिस्ट को समर्थन करते है और आप उससे कम गुनाहगार नही हैं ।

*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*
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॥ॐ॥ हिन्दुत्व ॥ॐ॥ भारतीय संस्कृति, साहित्य, समाज और भारत के संत ।'s photo.
॥ॐ॥ हिन्दुत्व ॥ॐ॥ भारतीय संस्कृति, साहित्य, समाज और भारत के संत ।'s photo.
॥ॐ॥ हिन्दुत्व ॥ॐ॥ भारतीय संस्कृति, साहित्य, समाज और भारत के संत ।'s photo.
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रक्षाबंधन पर मुर्खता

I Request to you , Please read it completly otherwise ignore 😐

आजकल एक बड़ा खतरनाक प्रचलन चला हे हिन्दुओ में वह यह की जेसे ही कोई त्यौहार आनेवाला होता हे खुद हिन्दू ही उस त्यौहार को ऐसे पेश करते हे जेसे वो उनके ऊपर बोझ हे :1) रक्षाबंधन पर मुर्खता :कुछ हिन्दू ऐसे मेसेज भेजते हे की ||कोई भी अनजान चीज को हाथ नहीं लगाये उसमे राखी हो सकती हे !! ||अरे कूल दूध !! तुम्हारे लिए अपनी बहन बोझबन रही हे तुम तो राखी का मजाक बना बेठे हो तुम क्या अपनी माँ बहन की रक्षा करोगे। राखी एक रक्षा सूत्र हे अगर तुम भूल रहे हो तो याद दिलाऊ राजस्थान में औरतो ने अपनी रक्षा के लिए जोहर कर आग में कूद जाती थी।रानी पद्मिनी के साथ 36000 औरते जोहर होगयी थी । एक महिला की रक्षा तुमे मजाक लगती हे ???2) दशहरा पर मुर्खता :यह मेसेज आजकल खूब प्रचलन में हे की || रावण सीता जी को उठा ले गया हे और राम जी लंका पर चढ़ाई करने जा रहे हे उसके लिय बंदरो की आवश्यकता हे जो भी मेसेज पढ़े तुरंत निकल जाये ||वाह !!! आज सीता अपहरण हिन्दुओ के लिए मजाक का विषय हो गया हे। जोरू का गुलाम बनना गर्व का विषय राम का सेनिक बनना मजाक हो रहा हे !!!दूसरा जोक || रावण को कोर्ट ले जाया गया वह कहा गया की गीता पर हाथ रख कसम खाओ तब रावण कहता हे सीता पर हाथ रखा उसमे इतना बवाल हो गया गीता पर रखा तो……||यह बड़े शर्म की बात हे की अग्नि परीक्षादेने के बाद भी आज हिन्दू सीता माता के चरित्र पर सवाल उठाने को मजाक समझते हे। कभी घर पर बेठी माँ से पुछो पिताजी कहा कहा हाथ लगाते हे अगर नहीं तो तुम्हे किसने हक दिया समस्त हिंदुत्व की माता पर हाथ रखने को मजाक बनाने का ????एक हमारा मीडिया पहले ही हिन्दू त्योहारों के पीछे पड़ा हे होली पर पानी बर्बाद होता हे. पर जानवरों की क़ुरबानी धर्म हे , दिवाली पर पटाके छोड़ना प्रदुषण हे पर इसाई नव वर्ष पर आतिशबाजी जश्न हे।नवरात्री पर 10 बजे के बाद गरबा ध्वनी प्रदुषण हो जाती हे वही मोहरम की रात ढोलताशे और नववर्ष की रात जानवरों की तरह 12 बजे तक बाजे बजाना धर्म हे !!करवा चौथ और नाग पंचमी पाखंड हे वही इसा के पुनः मरकर लोटना गुड फ्राइडे विज्ञानिक हे !!!हिन्दुओ को यह लगता हे की अपने पर्व का मजाक बनाना सही हे तो यह गलत हे।हम राखी और सीता अपहरण पर मजाक करते हे इसके पीछे समाज की मानसिकता बनती हे। लोग लड़की की रक्षा से कतराते है क्यों की राखी को हमने मजाक बना दिया हे हमने सीतामाता जेसी पवित्र माँ का मजाक बना दिया हे।आज हमने समाज में महिला का मजाक बना दियाहे उसकी रक्षा और उसकी अस्मिता एक जोक बनकर हमारा हास्य कर रही हे इससे पता चलता हे हम कितने धार्मिक हे।
🚩Jai Shree Ram 🚩

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Spread the word: Patna stampede helpline number is 0612-2219810

Spread the word: Patna stampede helpline number is 0612-2219810
—————————
Center has asked the Bihar government for a detailed report on how it can let such a stampede happen (claiming at least 33 lives by state records), when it is well known in advance how crowded our festivities are.
The bigger question however is, how long are our devotees and pilgrims going to suffer due to negligence of our administration ?

Reportedly 3-4 people from the back of the crowd shouted that an electrical wire has fallen loose – which led to the stampede.So sloppy was the administration that eyewitnesses say that 3 gates were opened for less than a 100 VIPs present at the occasion while only one gate was opened for approximately a lakh of not-so-Important citizens. There goes all your safety norms in the waste basket. Who cares for the so called ‘majority’ ?

Had it been some minority crowd, imagine the rush of media, police and administration. every victim’s next of kin would have had a job and ten lakh compensation in their kitty before sunrise today.
But alas it’s the ‘majority’ ones who’ve suffered so they’ve to rush from pillar to post just to get their injured admitted and bribe the officials to get compensation to treat their injuries.
You know this is the truth, however inconvenient, communal, or disturbing it may sound.
Sample this: It’s been learnt that the state CM had no information about the incident for hours after the incident. maybe he heard it from the TV while casually switching channels. Even the state health minister took 16 hours to reach the spot.
———————–
On a hindsight, one also gets a suspicion – isn’t all this happening too often to our devotees these days ? hand of ideologically motivated miscreants can’t be ruled out given the nature and identity of victims. To avoid further deepening of distrust, will the state governments wake up and learn their lessons ?

Spread the word: Patna stampede helpline number is 0612-2219810
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Center has asked the Bihar government for a detailed report on how it can let such a stampede happen (claiming at least 33 lives by state records), when it is well known in advance how crowded our festivities are.
The bigger question however is, how long are our devotees and pilgrims going to suffer due to negligence of our administration ?

Reportedly 3-4 people from the back of the crowd shouted that an electrical wire has fallen loose - which led to the stampede.So sloppy was the administration that eyewitnesses say that 3 gates were opened for less than a 100 VIPs present at the occasion while only one gate was opened for approximately a lakh of not-so-Important citizens. There goes all your safety norms in the waste basket. Who cares for the so called 'majority' ?

Had it been some minority crowd, imagine the rush of media, police and administration. every victim's next of kin would have had a job and ten lakh compensation in their kitty before sunrise today.
But alas it's the 'majority' ones who've suffered so they've to rush from pillar to post just to get their injured admitted and bribe the officials to get compensation to treat their injuries.
You know this is the truth, however inconvenient, communal, or disturbing it may sound.
Sample this: It's been learnt that the state CM had no information about the incident for hours after the incident. maybe he heard it from the TV while casually switching channels. Even the state health minister took 16 hours to reach the spot. 
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On a hindsight, one also gets a suspicion - isn't all this happening too often to our devotees these days ? hand of ideologically motivated miscreants can't be ruled out given the nature and identity of victims. To avoid further deepening of distrust, will the state governments wake up and learn their lessons ?
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Patna ghandhi maidan

कुछ लोगों का कहना है कि कुछ लोगों के एक नाले में गिर जाने के बाद यह घटना हुई. कुछ लोग बिजली के करंट से लैस एक तार के गिरने की अफवाह और कुछ लोगों की ओर से भीड़ में फैलाई गई अफवाह की बात कर रहे हैं. घटना की विस्तृत जांच के बाद ही सच्चाई सामने आ पाएगी.
प्रत्यक्षदर्शी मनीष कुमार ने बताया, ‘कुछ युवकों ने ‘भागो-भागो’ चिल्लाना शुरू कर दिया जिसके बाद लोगों में दहशत फैल गयी और भगदड़ मच गई. सैकड़ों महिलाएं और बच्चे गिर गए और अपनी जान बचाने के लिए भाग रही भीड़ के पैरों नीचे कुचले गए.

गांधी मैदान के दक्षिण की ओर यातायात और लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए कोई पुलिसकर्मी मौजूद नहीं था.
घटना के गवाह होने का दावा करने वाले आइसक्रीम बेचने वाले सुमन और उसके दोस्तों- रंजीत कुमार तथा अजय प्रसाद ने बताया कि कुछ युवकों ने ऊपर लटकते बिजली के तारों के गिरने की अफवाह फैलाई, एक लटकते तार से उलझकर एक बुजुर्ग व्यक्ति का गिर पड़ना तथा बाहर निकलती भीड़ के धक्कामुक्की करने समेत कई चीजों के चलते भगदड़ मच गई.

एक पीड़ित प्रत्यक्षदर्शी महिला ने कहा की पुलिस लाठी नहीं चलाती तो इतनी भगदड़ नहीं होती !
गांधी मैदान के दक्षिणी-पूर्वी छोर पर अपनी जान बचाने के लिए भागे चले गए थे और इनमें से कुछ सैंकड़ों की भीड़ के पैरों के नीचे रौंदे गए.’भगदड़ के बाद गांधी मैदान व मुख्य सड़क पर दूर-दूर तक चप्पलें, जूते, खिलौने बिखरे पड़े थे.

घटना के वक्त मौजूद लोगों के मुताबिक, गांधी मैदान के दक्षिण पूर्वी छोर पर स्थित सड़क पर जिला पुलिस और वीआईपी की गाड़ियां खडी होने के कारण सड़क पर लोगों के लिए बहुत कम जगह थी.

शहर के लोगों ने जिला प्रशासन पर आरोप लगाया कि दशहरा उत्सव समाप्त होने के बावजूद गांधी मैदान के निकासी द्वारों को लोगों के लिए नहीं खोला गया.
‘मैदान के 11 गेटों में से केवल दो निकासी के लिए थे और लोग बाहर निकलने के लिए एक दूसरे को रौंदे डाल रहे थे.’

व्यवस्था में लापरवाही ! :->

जब गांधी मैदान में रावण जल रहा था, तो मुख्यमंत्री गर्व से सीना ताने खड़े थे. शाम 6 बजकर 10 मिनट में रावण को ‘निपटाकर’ मुख्यमंत्री अपने गांव महकार के लिए रवाना हो गए, जो पटना से करीब 125 किलोमीटर है. उनकी रवानगी के 35 मिनट बाद जहां रावण जला, ठीक उसी मैदान के पास 33 जिंदगियां लापरवाही की भेंट चढ़ गईं. मुख्यमंत्री तो वक्त पर पहुंचे नहीं और उनके मंत्री जो सामने आए, उनका सारा ध्यान जीतन राम मांझी का बचाव करने में गुजर गया.जब लोगों को सरकार और सहायता की सबसे ज्यादा जरुरत थी, तो सूबे के मुख्यमंत्री को तो छोड़िए, उनका कोई सिपहसालार भी वहां मौजूद नहीं था. घटना कोई दूर-दराज की नहीं, राजधानी पटना की थी. इसके बावजूद न तो समय पर एम्बुलेंस, न ही कोई सहायता, न ही सरकार की ओर से कोई संजीदगी दिखी. आखिरकार देर रात मुख्यमंत्री आए.. हादसे का जायजा लेने की रस्म निभाई. हॉस्पीटल के भीतर गए, अधिकारियों से बात की और मीडिया के सामने आकर रटा-रटाया बयान दिया और फिर चले गए.

हैरान कर देने वाली खबर तो यह है कि हादसे की जगह से सटे मौर्या होटल में एक बड़े अधिकारी के बेटे के जन्मदिन की पार्टी चल रही थी, जिसमें बिहार के कई आला अधिकारी और नेता शामिल थे. खबरों के मुताबिक हादसे के दो घंटे बाद तक पार्टी चलती रही. मौतों से बेपरवाह अधिकारी और नेता पार्टी का लुत्फ उठाते रहे, लेकिन किसी ने रंग में भंग नहीं होने दी.

जब सरकार अपंग हो, प्रशासन का नामोनिशान न हो, तो समझा जा सकता है कि इतना बड़ा आयोजन कैसे हो रहा होगा. गांधी मैदान में सालों से रावण दहन होता रहा है. लाखों की भीड़ जमा होती रही है. इस बार करीब 5 लाख की भीड़ थी, लेकिन पूरा आयोजन भगवान भरोसे रहा. न इतनी बड़ी भीड़ के लिए कोई खास बंदोबस्त था, न ही ट्रैफिक के लिए कोई इंतजाम. सड़कों पर घुप्प अंधेरा पसरा था, लेकिन इसकी चिंता किसी को नहीं थी. जब बेसिक प्लानिंग नहीं थी, फिर आगे की कौन सोचे? ऐसी तैयारी की बात तो दूर-दूर तक नहीं सोची गई कि कोई हादसा हो भी सकता है या भगदड़ भी मच सकती है.

पटना में रावण दहन के बाद भीड़ में भगदड़ से मरने वालों की संख्या बढ़कर 33 हो गई है. 100 से ज्यादा घायल हुए लोगों का तत्परता से चिकित्सा करवाया जा रहा है. घायलों के परिजन चिकित्सालय के बाहर बिलख रहे हैं. जो अपनो को खो चुके हैं, वे शवगृह के बाहर रो रहे हैं. पूरा पटना महा नगर ही आंसुओं के ज्वार में डूबा हुआ है. जिंदगी के मेले से मौत के मुहल्ले में परिवर्तित हुए गांधी मैदान की पीड़ादायी दृश्य किसी को भी रुला देने के लिए काफी है. पूरी रात सदमे का साया पटना पर मंडराता रहा. जो लोग अपनों को खो चुके हैं, उनके लिए बीती रात का एक-एक घडी १०० वर्ष लग रहा थी. लोगों की चीख रह-रहकर शहर के सन्नाटे को चीर रही थी.

राम भरोसे …….

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कुछ लोगों का कहना है कि कुछ लोगों के एक नाले में गिर जाने के बाद यह घटना हुई. कुछ लोग बिजली के करंट से लैस एक तार के गिरने की अफवाह और कुछ लोगों की ओर से भीड़ में फैलाई गई अफवाह की बात कर रहे हैं. घटना की विस्तृत जांच के बाद ही सच्चाई सामने आ पाएगी.
प्रत्यक्षदर्शी मनीष कुमार ने बताया, ‘कुछ युवकों ने ‘भागो-भागो’ चिल्लाना शुरू कर दिया जिसके बाद लोगों में दहशत फैल गयी और भगदड़ मच गई. सैकड़ों महिलाएं और बच्चे गिर गए और अपनी जान बचाने के लिए भाग रही भीड़ के पैरों नीचे कुचले गए.

गांधी मैदान के दक्षिण की ओर यातायात और लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए कोई पुलिसकर्मी मौजूद नहीं था.
घटना के गवाह होने का दावा करने वाले आइसक्रीम बेचने वाले सुमन और उसके दोस्तों- रंजीत कुमार तथा अजय प्रसाद ने बताया कि कुछ युवकों ने ऊपर लटकते बिजली के तारों के गिरने की अफवाह फैलाई, एक लटकते तार से उलझकर एक बुजुर्ग व्यक्ति का गिर पड़ना तथा बाहर निकलती भीड़ के धक्कामुक्की करने समेत कई चीजों के चलते भगदड़ मच गई.

एक पीड़ित प्रत्यक्षदर्शी महिला ने कहा की पुलिस लाठी नहीं चलाती तो इतनी भगदड़ नहीं होती !

गांधी मैदान के दक्षिणी-पूर्वी छोर पर अपनी जान बचाने के लिए भागे चले गए थे और इनमें से कुछ सैंकड़ों की भीड़ के पैरों के नीचे रौंदे गए.’भगदड़ के बाद गांधी मैदान व मुख्य सड़क पर दूर-दूर तक चप्पलें, जूते, खिलौने बिखरे पड़े थे. 

घटना के वक्त मौजूद लोगों के मुताबिक, गांधी मैदान के दक्षिण पूर्वी छोर पर स्थित सड़क पर जिला पुलिस और वीआईपी की गाड़ियां खडी होने के कारण सड़क पर लोगों के लिए बहुत कम जगह थी.

शहर के लोगों ने जिला प्रशासन पर आरोप लगाया कि दशहरा उत्सव समाप्त होने के बावजूद गांधी मैदान के निकासी द्वारों को लोगों के लिए नहीं खोला गया.
 ‘मैदान के 11 गेटों में से केवल दो निकासी के लिए थे और लोग बाहर निकलने के लिए एक दूसरे को रौंदे डाल रहे थे.’

व्यवस्था में लापरवाही ! :-> 

जब गांधी मैदान में रावण जल रहा था, तो मुख्यमंत्री गर्व से सीना ताने खड़े थे. शाम 6 बजकर 10 मिनट में रावण को 'निपटाकर' मुख्यमंत्री अपने गांव महकार के लिए रवाना हो गए, जो पटना से करीब 125 किलोमीटर है. उनकी रवानगी के 35 मिनट बाद जहां रावण जला, ठीक उसी मैदान के पास 33 जिंदगियां लापरवाही की भेंट चढ़ गईं. मुख्यमंत्री तो वक्त पर पहुंचे नहीं और उनके मंत्री जो सामने आए, उनका सारा ध्यान जीतन राम मांझी का बचाव करने में गुजर गया.जब लोगों को सरकार और सहायता की सबसे ज्यादा जरुरत थी, तो सूबे के मुख्यमंत्री को तो छोड़िए, उनका कोई सिपहसालार भी वहां मौजूद नहीं था. घटना कोई दूर-दराज की नहीं, राजधानी पटना की थी. इसके बावजूद न तो समय पर एम्बुलेंस, न ही कोई सहायता, न ही सरकार की ओर से कोई संजीदगी दिखी. आखिरकार देर रात मुख्यमंत्री आए.. हादसे का जायजा लेने की रस्म निभाई. हॉस्पीटल के भीतर गए, अधिकारियों से बात की और मीडिया के सामने आकर रटा-रटाया बयान दिया और फिर चले गए.

हैरान कर देने वाली खबर तो यह है कि हादसे की जगह से सटे मौर्या होटल में एक बड़े अधिकारी के बेटे के जन्मदिन की पार्टी चल रही थी, जिसमें बिहार के कई आला अधिकारी और नेता शामिल थे. खबरों के मुताबिक हादसे के दो घंटे बाद तक पार्टी चलती रही. मौतों से बेपरवाह अधिकारी और नेता पार्टी का लुत्फ उठाते रहे, लेकिन किसी ने रंग में भंग नहीं होने दी.  

जब सरकार अपंग हो, प्रशासन का नामोनिशान न हो, तो समझा जा सकता है कि इतना बड़ा आयोजन कैसे हो रहा होगा. गांधी मैदान में सालों से रावण दहन होता रहा है. लाखों की भीड़ जमा होती रही है. इस बार करीब 5 लाख की भीड़ थी, लेकिन पूरा आयोजन भगवान भरोसे रहा. न इतनी बड़ी भीड़ के लिए कोई खास बंदोबस्त था, न ही ट्रैफिक के लिए कोई इंतजाम. सड़कों पर घुप्प अंधेरा पसरा था, लेकिन इसकी चिंता किसी को नहीं थी. जब बेसिक प्लानिंग नहीं थी, फिर आगे की कौन सोचे? ऐसी तैयारी की बात तो दूर-दूर तक नहीं सोची गई कि कोई हादसा हो भी सकता है या भगदड़ भी मच सकती है.

पटना में रावण दहन के बाद भीड़ में भगदड़ से मरने वालों की संख्या बढ़कर 33 हो गई है. 100 से ज्यादा घायल हुए लोगों का तत्परता से चिकित्सा करवाया जा रहा है. घायलों के परिजन चिकित्सालय  के बाहर बिलख रहे हैं. जो अपनो को खो चुके हैं, वे शवगृह के बाहर रो रहे हैं. पूरा पटना महा नगर ही आंसुओं के ज्वार में डूबा हुआ है. जिंदगी के मेले से मौत के मुहल्ले में परिवर्तित हुए गांधी मैदान की पीड़ादायी दृश्य किसी को भी रुला देने के लिए काफी है. पूरी रात सदमे का साया पटना पर मंडराता रहा. जो लोग अपनों को खो चुके हैं, उनके लिए बीती रात का एक-एक घडी १०० वर्ष लग रहा थी. लोगों की चीख रह-रहकर शहर के सन्नाटे को चीर रही थी.

राम भरोसे .......

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आजकल एक बड़ा खतरनाक प्रचलन चला हे हिन्दुओ में वह यह की जेसे ही कोई त्यौहार आनेवाला होता हे खुद हिन्दू ही उस त्यौहार को ऐसे पेश करते हे जेसे वो उनके ऊपर बोझ हे :

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आजकल एक बड़ा खतरनाक प्रचलन चला हे हिन्दुओ में वह यह की जेसे ही कोई त्यौहार आनेवाला होता हे खुद हिन्दू ही उस त्यौहार को ऐसे पेश करते हे जेसे वो उनके ऊपर बोझ हे :

1) रक्षाबंधन पर मुर्खता :
कुछ हिन्दू ऐसे मेसेज भेजते हे की ||कोई भी अनजान चीज को हाथ नहीं लगाये उसमे राखी हो सकती हे !! ||

अरे कूल दूध !! तुम्हारे लिए अपनी बहन बोझ बन रही हे तुम तो राखी का मजाक बना बेठे हो तुम क्या अपनी माँ बहन की रक्षा करोगे। राखी एक रक्षा सूत्र हे अगर तुम भूल रहे हो तो याद दिलाऊ राजस्थान में औरतो ने अपनी रक्षा के लिए जोहर कर आग में कूद जाती थी।

रानी पद्मिनी के साथ 36000 औरते जोहर हो गयी थी । एक महिला की रक्षा तुमे मजाक लगती हे ???

2) दशहरा पर मुर्खता :
यह मेसेज आजकल खूब प्रचलन में हे की || रावण सीता जी को उठा ले गया हे और राम जी लंका पर चढ़ाई करने जा रहे हे उसके लिय बंदरो की आवश्यकता हे जो भी मेसेज पढ़े तुरंत निकल जाये ||

वाह !!! आज सीता अपहरण हिन्दुओ के लिए मजाक का विषय हो गया हे। जोरू का गुलाम बनना गर्व का विषय राम का सेनिक बनना मजाक हो रहा हे !!!

दूसरा जोक || रावण को कोर्ट ले जाया गया वह कहा गया की गीता पर हाथ रख कसम खाओ तब रावण कहता हे सीता पर हाथ रखा उसमे इतना बवाल हो गया गीता पर रखा तो……||

यह बड़े शर्म की बात हे की अग्नि परीक्षा देने के बाद भी आज हिन्दू सीता माता के चरित्र पर सवाल उठाने को मजाक समझते हे। कभी घर पर बेठी माँ से पुछो पिताजी कहा कहा हाथ लगाते हे अगर नहीं तो तुम्हे किसने हक दिया समस्त हिंदुत्व की माता पर हाथ रखने को मजाक बनाने का ????

एक हमारा मीडिया पहले ही हिन्दू त्योहारों के पीछे पड़ा हे होली पर पानी बर्बाद होता हे पर ईद पर जानवरों की क़ुरबानी धर्म हे

दिवाली पर पटाके छोड़ना प्रदुषण हे पर इसाई नव वर्ष पर आतिशबाजी जश्न हे।

नवरात्री पर 10 बजे के बाद गरबा ध्वनी प्रदुषण हो जाती हे वही मोहरम की रात ढोल ताशे कुटना और नववर्ष की रात जानवरों की तरह 12 बजे तक बाजे बजाना धर्म हे !!!

करवा चौथ और नाग पंचमी पाखंड हे वही इसा के पुनः मरकर लोटना गुड फ्राइडे विज्ञानिक हे !!!

हिन्दुओ को यह लगता हे की अपने पर्व का मजाक बनाना सही हे तो यह गलत हे।

हम राखी और सीता अपहरण पर मजाक करते हे इसके पीछे समाज की मानसिकता बनती हे। लोग लड़की की रक्षा से कतराते ह क्यों की राखी को हमने मजाक बना दिया हे हमने सीता माता जेसी पवित्र माँ का मजाक बना दिया हे।

आज हमने समाज में महिला का मजाक बना दिया हे उसकी रक्षा और उसकी अस्मिता एक जोक बनकर हमारा हास्य कर रही हे इससे पता चलता हे हम कितने धार्मिक हे।

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देश धर्म से बढ़कर कुछ भी नहीं