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धर्म बदलनेमे


सब से ज्यादा रूपया खर्च करते है आदमी को कन्वर्ट करनेमे . धर्म बदलनेमे . आज तक सब से ज्यादा खून बहा होगा तो धर्म के लिए .
कभी सोचता हु सारी दुनिया क्रिस्टियन या मुस्लमान बन जाए तो ये जागड़ा ही खत्म हो जाएगा.सारी दुनिया एक हो जाए फिर देखते है तो एक ही धर्म के लोग अंदर अंदर एक दूसरे को काटते है . ये दुनिया कभी एक धर्म की नहीं बन सकती. तो फिर धर्म परिवर्तन के पीछे इतना रूपया क्यों बहते है ? क्यों एक दूसरेका गाला काटते है ?
सभी धर्म की किताब कहती है हमारे धर्म में आ जाओ मोक्ष मिल जाएगा , स्वर्ग मिल जाएगा. जैसे स्वर्ग उसके बाप का हो! ऐसा ही होता तो कोई अच्छा बनने की कोई कोशिस न करता , सिर्फ धर्म परिवर्तन कर लेता और स्वर्ग + ७२ नंगी हूरे ?
हमारी गीता कहती है मम वरतनु वर्तन्ते इत्ती मनुसयः जो मेरे कदमो पे चलते है वो ही मनुस्य है . स्वर्ग धरती पे खड़ा करने की बात कही है . जब दूसरे धर्म में ऐसा है जैसे वीमा की डेढ़ करोड़ की रकम मरने के बाद मिलती है तो क्या फायदा ?
आज इसु को पूछेंगे तो वह कहेगा मेरा कोई धर्म ही नहीं मेरे मरने के बाद लोगोने खड़ा किया . पूरी गीता कह दी लेकिन ये कहा मनुस्य बनो इस लिए धर्म परिवर्तन चोदो गीता फॉलो करो सब धर्म के लोगो

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कृष्ण भगवान को पूछा गया की पाप होते हुए देखने वालो को भी पाप लगता है ?


कृष्ण भगवान को पूछा गया की पाप होते हुए देखने वालो को भी पाप लगता है ?
कृष्णा का जवाब परम सत्य था .
जो पाप देखता है ….जो देख के चुप रहता है …. वो इतनाही पापी है जितना पाप करने वाला .
द्रौपदी के चिर हरण के समय बड़े दिग्गज बैठे हुए थे कुछ देख रहे थे कोई सुन रहे थे चाहते तो वे रुकवा सकते थे उतनी सत्ता थी उनके पास . लेकिन खामोश . अंतकाल सब मरे गए
महाभारत में ये एक नियम प्रस्तापित हुआ .
पाप होते हुए देखोगे ..चुप बैठोगे तो उतने ही पापी हो . आज कृष्णा के देस में नारी की लाज हमारे हाथ में है
हम चुप नै बैठेंगे . जिनको लिखना आता हो वो लिखो दिल की बात . खत्रिया तलवार चलाओ. आज चुप बैठोगे तो मरे जाओगे .
महाभारत में ये एक नियम प्रस्तापित हुआ . images

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क्षुद्र


बड़े दुःख की बात है की क्षुद्र ही आपने आप को अछूत मानता है . जहॉ जाओ वहां अपने आप को साबित करता है . आरक्षण के नाम पर या फिर कुछ और . समाज से संस्कृत भाषा और उनमे लिखा साहित्य गया की लोग बेवकूफ पैदा होने लगे. मनुस्मुर्ति पढ़ेंगे तो पता चलेगा की परिचर्मात्मक कर्म को क्षुद्र कहा जाता है अर्थात जो सेवा कार्य हो वो . जैसे डॉक्टर , वकील , रिक्शा चलने वाला इत्यादि . हम समझते है सिर्फ सफाईवाला …ये बिलकुल गलत है. डॉक्टर भी क्षुद्र है
मई एक बचपन की बात बताता हु. मैंने पहलीबार उनके साथ नास्ता का डिब्बा खोला तो उसने बताया तुम मेरा खाना नहीं खा सकते मई अछूत हु . दुःख की बात ये नहीं की वो अछूत है . दुःख की बात ये है की वो अपने आप को अछूत समाजता है . मैंने कहा उनसे तुम अस्व्छ हो सकते हो लेकिन अछूत नहीं . मैंने उनके साथ नास्ता किया .
नहेरु वर्ण व्यवस्था के खिलाफ था, कांग्रेस पहलेसे ही divide and rule फॉलो करती थी . गोरो की औलाद . बाद में आरक्षण के नाम पर और भी भेद बढ़ता गया .
भारत में कभी वर्ण भेद नहीं था . प्रभु राम भील जाती की सबरी के जूते बेर खाए . अमिताभ बच्चन के खानदान में आज भी होली के दिन उन क्षुद्र के गर जा के पहले उनके कदमो पे रंग उड़ाके फिर होली खेलते है .
लोगो से निवेदन है . मनुस्मुर्ति तटस्थ ता से पढ़े .अपनी बुद्धि का प्रदसन् न करे .

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My Vision


 भारत के हर राज्य में इतने मंदिर की इनकों है …जिनसे हर राज्य में एक हिन्दू टीवी चैनल खोला जा सके. इंडिया की कांग्रेस मंदिरों का सोना और पैसा लेले उनसे पहले ये करना चाहिए…मंदिरों का पैसा भगवन का है. उसे छूने का न हमको अधिकार है न सरकारको. दुसरे धर्मं वाले अपने धर्मं के विचारो को समाज में ले जाने के लिए पैसा लगा देते है. और हम मंदिरों में प्रसाद करना ..माला जपना …भजन करना… और भगवन के सामने भिखरी की तरह हमेशा मांगते रहेना उनसे आगे कहू तो हर सम्प्रदाय मंदिर नाम की एक दुकान खोल के बैठा है. हर मंदिरों के पैसो से एक धार्मिक लाइब्रेरी पुस्तकालय बनाया जाए. वेदों और उपनिषदों के विचारो को घर घर पहुचाया जाए. भगवन ने खुद कहा है वेद और उपनिषद् मेरे स्वसोस्वास है. मै कहेता हु जिस मंदिर में वेद और उपनिषदों का अब्यास न हो वो मंदिर में भगवन नहीं पत्थर है. आओ भगवन की प्राण प्रतिष्ठा करे उनके विचार घर घर ले जा कर.

 

कर्ण दानी था , लेकिन उसने अधर्म का साथ दिया. महाभारत के यूद्ध में कृष्ण ने कहा तू पांडवो का बड़ा भाई है. राज्य का पहेला ह़क तुजे मिलेगा …फिर भी वो अर्जुन को मरने की कसम लेता है..अपने छोटे भाई को मारने की कसम खता है…उसकी जय क्यों? ये कर्ण भी सेक्युलर की भाषा बोलता था. महाभारत में एक सिद्धांत कायम किया जो भगवन के खिलाफ खड़ा होगा वो कितना भी वीर होगा दानी होगा श्रेस्ठ होगा मारा जाएगा.

 

नाम में बहुत दम है. मई मेरी माँ को माँ कहू या फिर पिताजी की बीबी. दोनों का अर्थ एक ही है. लेकिन माँ कहने से जो ममता की खुसबू आती है वो दुसरे अर्थ में नहीं आती. भारत का नाम लेते ही उसकी खुसबू आती है. जो अंग्रेज के दिए हुए india में नहीं.

 

मूर्तिपूजा का रहस्य

एकलव्य जैसे आदिवासी भी सिर्फ द्रोण की मूर्ति की पूजा करके श्रेष्ठ सस्त्र विद्या प्राप्त कर ली. उस प्रकार किसी भी देवताकी मूर्ति को लेकर उसकी गुण पूजा की जाए तो आदमी श्रेष्ठत्व की और जा सकता है.

यदि मूर्ति की सिर्फ पूजा हो तो कोई लाभ नहीं वो पत्थर ही है . उनकी गुण पूजा होनी चाहिए.

 

 

Hum Ganga ko maa ki tarah pujte hai. Aur vohi Gangaame har gao ka mut aur sandas dalte hai….??? tab to ye hona hi tha…Britan me thems river ko bhi divotanal mante hai Father Thems kahte hai aur un ko clean bhi rakhate hai. 1947 ke baad Ganga ke kinare 7 FACTORY ki gandki usme dalte hai…har saal Khumbh mela hota hai aur koi nahi dekhata.jaise har saal ladka maa ko paisa bhejata aur khabar tak nahi puchata.!!!!!

युद्धबंदी के रुप मेँ पृथ्वीराज चौहान को जब
मोहम्मद गौरी के सामने लाया गया तो उसने
गौरी को घूर के देखा, गौरी ने उसे आँखे
नीची करने के लिऐ कहा, पृथ्वीराज ने कहा कि ”
राजपूतोँ की आँखे केवलमृत्यु के समय
नीची होती हैँ…” यह सुनते
ही गौरी आगबबूला हो गया और उसने लोहे के
गरम सरियोँ से पृथ्वीराज की आँखे फोङने
का आदेश दिया…! After some days in the
court of
Mohammad Ghauri….
” चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण ,
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूकेँ चौहान ”
कवि चंदरबरदाई का इतना ईशारा पाते
ही आखोँ से अंधे पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद
गौरी पर बाण चलादिया और अपने अपमान
का बदला उसके प्राणोँ से ले लिया….!
जय हो पृथ्वीराज चौहान की ।।

लोग कहते है इतिहास पढके क्या फायदा ? लेकिन लड़की की सादी होती है तो लड़के के खानदान का पूरा इतिहास वो देखता है.

मथुरा पे १८ बार आक्रमण करने वाला कालयवन. श्रीकृष्ण उसका वध करके स्वधाम पहुचा देते है. उन इतिहास को न शिखने वाले हम हिन्दू. महमद गौरी १७ बार पृत्वीराज चौहान पे आक्रमण करता है , १७ वि बार उसको पकड़ ने के बाद जिन्दा छोड़ देता है . और जब १८ वि बार महमद गौरी पृथ्वीराज को पकड़ता है तो कहता है गाय और हिन्दू तो हमारे दुसमन है हम उनको जिन्दा नहीं छोड़ते.

अफ़सोस की बात है हमने कभी इतिहास से सिखा नहीं और India ने कभी सच्चा इतिहास पढाया नहीं.

 

जाती व्यवस्था समाज एक अभिन्न अंग है. भारत में जाती व्यवस्ता की जगह जाती भेद खड़ा किया है. चार ब्राम्हण, खत्रिय, वैश्य, और क्षुद्र आपको हर देस में देखने मिलेंगे. हर देस में इसकी अलग कोम है. हर देस में मिलिट्री मिलेगी जो खत्रिय है. हर देस में बिज़नस पीपल मिलेंगे जो वैश्य है. और क्षुद्र का अर्थ है सेवा कर्म करने वाला ..बहुत कम लोग जानते है डॉक्टर और इंजिनियर भी क्षुद्र वर्ग में आते है. ये चार वार्ण से ही समाज बनता है. नहीं तो आदिमानव की तरह लोग रहेंगे. भगवन कृष्ण ने भी चार वार्ण को खुद की विभूति बताया है. ये व्यवस्थ फिर से सरू करनी चाहिए.

 

 

भारत नाम तीन महान व्यक्ति से हुआ…दशरथ पुत्र भारत……जिन्हें राज गाड़ी का मोह नहीं था….दूसरा जड़ भारत जो परम ज्ञानी थे…तीसरा..सकुन्तला का भारत जिन्होंने शेयर के दन्त बचपन में उनका मुह खोल कर गिने थे…..और इंडिया का नाम नेहरु ने रखा था…इंदिरा उनकी लड़की के नाम…और इंडिया का मतलब होता है…गुलाम…