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🕉~:||सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम्|

ज्योति अग्रवाल

~🚩 जय श्रीहरिः शरणम्… जय श्रीकृष्ण शरणम् मम्: 💓________________ 💫🍃आज हम आपको भगवान श्रीकृष्ण के आठ विवाह और उनके अस्सी पुत्रों की कथा का वर्णन बताते है:~👨‍👨‍👧‍👧🌹👏🙏🕉🚩

पुराणों के अनुसार श्री कृष्ण जी ने ने 8 स्त्रियों से विवाह किया था जो उनकी पटरानियां बनी थी। ये थी :– रुक्मिणी, जाम्बवती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रविंदा, सत्या(नाग्नजिती), भद्रा और लक्ष्मणा। प्रत्येक पत्नी से उन्हें 10 पुत्रों की प्राप्ति हुई थी इस तरह से उनके 80 पुत्र थे। आज हम आपको श्री कृष्ण जी की 8 रानियों और 80 पुत्रों के बारे में बताएँगे:~~

1:~ रुक्मिणी विदर्भ राज्य का भीष्म नामक एक वीर राजा था। उसकी पुत्री का नाम रुक्मिणी था। वह साक्षात लक्ष्मीजी का ही अंश थीं। वह अत्यधिक सुंदर और सभी गुणों वाली थी। नारद जी द्वारा श्रीकृष्ण के गुणों सा वर्णन सुनने पर रुक्मिणी श्रीकृष्ण से ही विवाह करना चाहती थी। रुक्मिणी के रूप और गुणों की चर्चा सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने भी रुक्मिणी के साथ विवाह करने का निश्चय कर लिया था।

रुक्मिणी का एक भाई था, जिसना नाम रुक्मि था। उसने रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से साथ तय कर दिया था। जब यह बात श्रीकृष्ण को पता चली तो वे विवाह से एक दिन पहले बलपूर्वक रुक्मिणी का हरण कर द्वारका ले गए। द्वारका पहुंचने के बाद श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का विवाह किया गया। रुकमणी के दस पुत्र पैदा हुये।

रूक्मिणी के पुत्रों के ये नाम थे :- प्रद्युम्न, चारूदेष्ण, सुदेष्ण, चारूदेह, सुचारू, विचारू, चारू, चरूगुप्त, भद्रचारू, चारूचंद्र।

2:~जाम्बवत सत्राजित नामक एक यादव था। उसने भगवान सूर्य की बहुत भक्ति की। जिससे खुश होकर भगवान ने उसे एक मणि प्रदान की थी। भगवान कृष्ण ने सत्राजित को वह मणि राजा उग्रसेन को भेंट करने को कहा, लेकिन सत्राजित ने उनकी बात नहीं मानी और मणि अपने पास ही रखी। एक दिन सत्राजित का भाई प्रसेन उस मणि को लेकर जंगल में शिकार करने गया। वहां एक शेर ने प्रसेन का वध करके वह मणि छीन ली और अपनी गुफा में जा छिपा। कुछ दिनों बाद ऋक्षराज जाम्बवन्त ने शेर को मारकर वह मणि अपने पास रख ली।

सत्राजित ने मणि चुराने और अपने भाई का वध करने का दोष श्रीकृष्ण पर लगा। इस दोष के मुक्ति पाने के लिए श्रीकृष्ण उस मणि की खोज करने के लिए वन में गए। मणि की रोशनी से श्रीकृष्ण उस गुफा तक पहुंच गए, जहां जाम्बवन्त और उसकी पुत्री जाम्बवती रहती थी। श्रीकृष्ण और जाम्बवन्त के बीच घोर युद्ध हुआ।

युद्ध में पराजित होने पर जाम्बवन्त को श्रीकृष्ण के स्वयं विष्णु अवतार होने की बात पता चली। श्रीकृष्ण का असली रूप जानने पर जाम्बवन्त ने उनसे क्षमा मांगी और अपने अपराध का प्रायश्चित करने के लिए अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।

जाम्बवंती के पुत्र ये थे:- साम्ब, सुमित्र, पुरूजित, शतजित, सहस्रजित, विजय, चित्रकेतु, वसुमान, द्रविड़ व क्रतु।

3:~सत्यभाम मणि लेकर श्रीकृष्ण द्वारका पहुंचे। वहां पहुंचकर श्रीकृष्ण ने वह मणि सत्राजित को दी और खुद पर लगाए दोष को गलत साबित किया। श्रीकृष्ण के निर्दोष साबित होने पर सत्राजित खुद को अपमानित महसूस करने लगा। वह श्रीकृष्ण के तेज को जानता था, इसलिए वह बहुत भयभीत हो गया। उसकी मूर्खता की वजह से कहीं श्रीकृष्ण की उससे कोई दुश्मनी न हो जाए, इस डर से सत्राजित ने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।

सत्यभामा के पुत्रों के नाम थे :- भानु, सुभानु, स्वरभानु, प्रभानु, भानुमान, चंद्रभानु, वृहद्भानु, अतिभानु, श्रीभानु और प्रतिभानु।

4:~ सत्या (नग्नजिती) कौशल राज्य के राजा नग्नजित की एक पुत्री थी। जिसका नाम नग्नजिती थी। वह बहुत सुंदर और सभी गुणों वाली थी। अपनी पुत्री के लिए योग्य वर पाने के लिए नग्नजित ने शर्त रखी। शर्त यह थी कि जो भी क्षत्रिय वीर सात बैलों पर जीत प्राप्त कर लेगा, उसी के साथ नग्नजिती का विवाह किया जाएगा। एक दिन भगवान कृष्ण को देख नग्नजिती उन पर मोहित हो गई और मन ही मन भगवान कृष्ण से ही विवाह करने का प्रण ले लिया। भगवान कृष्ण यह बात जान चुके थे।

अपनी भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान कृष्ण ने सातों बैल को अपने वश में करके उन पर विजय प्राप्त की। भगवान का यह पराक्रम देखकर नग्नजित ने अपनी पुत्री का विवाह भगवान कृष्ण के साथ किया।

सत्या के बेटों के नाम ये थे :- वीर, अश्वसेन, चंद्र, चित्रगु, वेगवान, वृष, आम, शंकु, वसु और कुंत।

5:~ कालिन्दी एक बार भगवान कृष्ण अपने प्रिय अर्जुन के साथ वन में घूम रहे थे। यात्रा की धकान दूर करने के लिए वे दोनों यमुना नदीं के किनार जाकर बैठ गए। वहां पर श्रीकृष्ण और अर्जुन को एक युवती तपस्या करती हुई दिखाई दी। उस युवती को देखकर अर्जुन ने उसका परिचय पूछा। अर्जुन द्वारा ऐसा पूछने पर उस युवती ने अपना नाम सूर्यपुत्री कालिन्दी बताया।

वह यमुना नदीं में निवास करते हुए भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। यह बात जान कर भगवान श्रीकृष्ण ने कालिन्दी को अपने भगवान विष्णु के अवतार होने की बात बताई और उसे अपने साथ द्वारका ले गए। द्वारका पहुंचने पर भगवान श्रीकृष्ण और कालिन्दी का विवाह किया गया।

कालिंदी के पुत्रों के नाम ये थे :- श्रुत, कवि, वृष, वीर, सुबाहु, भद्र, शांति, दर्श, पूर्णमास एवं सोमक।

6:~ लक्ष्मणा लक्ष्मणा ने देवर्षि नारद से भगवान विष्णु के अवतारों के बारे में कई बातों सुनी थी। उसका मन सदैव भगवान के स्मरण और भक्ति में लगा रहता था। लक्ष्मणा भगवान विष्णु को ही अपने पति रूप में प्राप्त करना चाहती थी। उसके पिता यह बात जानते थे।

अपनी पुत्री की इच्छा पूरी करने के लिए उसके पिता ने स्वयंवर का एक ऐसा आयोजन किया, जिसमें लक्ष्य भेद भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण के सिवा कोई दूसरा नही कर सके। लक्ष्मणा के पिता ने अपनी पुत्री के विवाह उसी वीर से करने का निश्चय किया, जो की पानी में मछली की परछाई देखकर मछली पर निशाना लगा सके।

शिशुपाल, कर्ण, दुर्योधन, अर्जुन कोई भी इस लक्ष्य का भेद नही कर सका। तब भगवान कृष्ण ने केवल परछाई देखकर मछली पर निशाना लगाकर स्वयंवर में विजयी हुए और लक्ष्मणा के साथ विवाह किया।

लक्ष्मणा के पुत्रों के नाम थे :- प्रघोष, गात्रवान, सिंह, बल, प्रबल, ऊध्र्वग, महाशक्ति, सह, ओज एवं अपराजित।

7:~ मित्रविंदा अवंतिका (उज्जैन) की राजकुमारी मित्रविंदा के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन किया गया था। उस स्वयंवर में मित्रविंदा जिसे भी अपने पति रूप में चुनती उसके साथ मित्रविंदा का विवाह कर दिया जाता। उस स्वयंवर में भगवान कृष्ण भी पहुंचे। मित्रविंदा भगवान कृष्ण के साथ ही विवाह करना चाहती था, लेकिन उसका भाई विंद दुर्योधन का मित्र था।

इसलिए उसने अपनी बहन को बल से भगवान कृष्ण को चुनने से रोक लिया। जब भगवान कृष्ण को मित्रविंदा के मन की बात पता चली। तब भगवान ने सभी विरोधियों के सामने ही मित्रविंदा का हरण कर लिया और उसके साथ विवाह किया।

मित्रविंदा के पुत्रों के नाम यह है :- वृक, हर्ष, अनिल, गृध, वर्धन, अन्नाद, महांश, पावन, वहिन तथा क्षुधि।

8:~भद्रा भगवान श्रीकृष्ण की श्रुतकीर्ति नामक एक भुआ कैकय देश में रहती थी। उनकी एक भद्रा नामक कन्या थी। भद्रा और उसके भाई भगवान श्रीकृष्ण के गुणों को जानते थे। इसलिए भद्रा के भाइयों ने उसका विवाह भगवान श्रीकृष्ण के साथ करने का निर्णय किया। अपनी भुआ और भाइयों के इच्छा पूरी करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने पूरे विधि-विधान के साथ भद्रा के साथ विवाह किया।

भद्रा के पुत्र :- संग्रामजित, वृहत्सेन, शूर, प्रहरण, अरिजित, जय, सुभद्र, वाम, आयु और सत्यक।

विशेष:~~ इनके अलावा भी श्रीकृष्ण जी की 16100 और पत्नियां बताई जाती है। इन 16100 कन्याओं को श्री कृष्ण ने नरकासुर राक्षस का वध कर मुक्त कराया था और अपने यहाँ आश्रय दिया था। इन सभी कन्याओं ने श्री कृष्ण को पति स्वरुप मान लिया था।हरि-ॐ- जय जै श्रीकृष्णा कृष्णा हरे हरे-हरे मुरारी🌹👏 जय श्रीमन्न नारायणः नारायणः श्रीहरिः 🦅$–राधे💞राधे–👏-💓______________________

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पारब्रह्म भगवान कृष्ण

आठ अंक के साथ भगवान कृष्ण का सम्बंध

अष्टमी तिथि
आठवे पहर ,
आठवाँ सन्तान,
आठवाँ अवतार,
आठ भाई ,
16100 रानी ( 1+6+1=8)
आठ पटरानी,
आठ सखिया,
125 वर्ष तक धरती पर रहे ,
(1+2+5 = 8)
आठ प्रकार के अपशकुन देखे कंश ने कृष्ण जन्म के समय।
आठों पहर का नींद खराब हो गया था उनका।

8-8 अक्षरों के तारक मंत्र –

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।

भगवान् श्री कृष्ण को अलग अलग स्थानों में अलग अलग नामो से जाना जाता है।

  • उत्तर प्रदेश में कृष्ण ,गोपाल ,गोविन्द, नन्दलाल इत्यादि नामो से जानते है।
  • राजस्थान में श्रीनाथजी या ठाकुरजी के नाम से जानते है।

  • महाराष्ट्र में बिट्ठल के नाम से भगवान् जाने जाते है।

  • उड़ीसा में जगन्नाथ के नाम से जाने जाते है।

  • बंगाल में गोपालजी के नाम से जाने जाते है।

  • दक्षिण भारत में वेंकटेश या गोविंदा के नाम से जाने जाते है।

  • गुजरात में द्वारिकाधीश के नाम से जाने जाते है।

  • असम ,त्रिपुरा,नेपाल इत्यादि पूर्वोत्तर क्षेत्रो में कृष्ण नाम से ही पूजा होती है।

  • मलेशिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंग्लैंड, फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है।

  • गोविन्द या गोपाल में “गो” शब्द का अर्थ गाय एवं इन्द्रियों , दोनों से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद में गो का अर्थ होता है मनुष्य की इंद्रिया…जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश में इंद्रिया हो वही गोविंद है गोपाल है।

  • श्री कृष्ण के पिता का नाम वसुदेव था इसलिए इन्हें आजीवन “वासुदेव” के नाम से जाना गया। श्री कृष्ण के दादा का नाम शूरसेन था..

  • श्री कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के राजा कंस की जेल में हुआ था।

  • श्री कृष्ण के भाई बलराम थे लेकिन उद्धव और अंगिरस उनके चचेरे भाई थे,

अंगिरस ने बाद में तपस्या की थी और जैन धर्म के तीर्थंकर नेमिनाथ के नाम से विख्यात हुए थे।

  • श्री कृष्ण ने 16000 राजकुमारियों को असम के राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था और उन राजकुमारियों को आत्महत्या से रोकने के लिए मजबूरी में उनके सम्मान हेतु उनसे विवाह किया था।

क्योंकि उस युग में हरण की हुयी स्त्री अछूत समझी जाती थी और समाज उन स्त्रियों को अपनाता नहीं था।।

  • श्री कृष्ण की मूल पटरानी एक ही थी जिनका नाम रुक्मणी था जो महाराष्ट्र के विदर्भ राज्य के राजा रुक्मी की बहन थी।। रुक्मी शिशुपाल का मित्र था और श्री कृष्ण का शत्रु ।
  • दुर्योधन श्री कृष्ण का समधी था और उसकी बेटी लक्ष्मणा का विवाह श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ हुआ था।

  • श्री कृष्ण के धनुष का नाम सारंग था। शंख का नाम पाञ्चजन्य था। चक्र का नाम सुदर्शन था। उनकी प्रेमिका का नाम राधारानी था जो बरसाना के सरपंच वृषभानु की बेटी थी। श्री कृष्ण राधारानी से निष्काम और निश्वार्थ प्रेम करते थे। राधारानी श्री कृष्ण से उम्र में बहुत बड़ी थी। लगभग 6 साल से भी ज्यादा का अंतर था।

  • श्री कृष्ण ने 14 वर्ष की उम्र में वृंदावन छोड़ दिया था।। और उसके बाद वो राधा से कभी नहीं मिले।

    • श्री कृष्ण विद्या अर्जित करने हेतु मथुरा से उज्जैन मध्य प्रदेश आये थे। और यहाँ उन्होंने उच्च कोटि के ब्राह्मण महर्षि सान्दीपनि से अलौकिक विद्याओ का ज्ञान अर्जित किया था।।
  • श्री कृष्ण की कुल 125 वर्ष धरती पर रहे । उनके शरीर का रंग गहरा काला था और उनके शरीर से 24 घंटे पवित्र अष्टगंध महकता था।
    उनके वस्त्र रेशम के पीले रंग के होते थे और मस्तक पर मोरमुकुट शोभा देता था।
    उनके सारथि का नाम दारुक था और उनके रथ में चार घोड़े जुते होते थे। उनकी दोनो आँखों में प्रचंड सम्मोहन था।

  • श्री कृष्ण के कुलगुरु महर्षि शांडिल्य थे।

  • श्री कृष्ण का नामकरण महर्षि गर्ग ने किया था।

  • श्री कृष्ण के बड़े पोते का नाम अनिरुद्ध था जिसके लिए श्री कृष्ण ने बाणासुर और भगवान् शिव से युद्ध करके उन्हें पराजित किया था।

  • श्री कृष्ण ने गुजरात के समुद्र के बीचो बीच द्वारिका नाम की राजधानी बसाई थी। द्वारिका पूरी सोने की थी और उसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया था।

  • श्री कृष्ण को ज़रा नाम के शिकारी का बाण उनके पैर के अंगूठे मे लगा वो शिकारी पूर्व जन्म का बाली था,बाण लगने के पश्चात भगवान स्वलोक धाम को गमन कर गए।

  • श्री कृष्ण ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अर्जुन को पवित्र गीता का ज्ञान रविवार शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मात्र 45 मिनट में दे दिया था।

  • श्री कृष्ण ने सिर्फ एक बार बाल्यावस्था में नदी में नग्न स्नान कर रही स्त्रियों के वस्त्र चुराए थे और उन्हें अगली बार यु खुले में नग्न स्नान न करने की नसीहत दी थी।

  • श्री कृष्ण के अनुसार गौ हत्या करने वाला असुर है और उसको जीने का कोई अधिकार नहीं।

  • श्री कृष्ण अवतार नहीं थे बल्कि अवतारी थे….जिसका अर्थ होता है “पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्” न ही उनका जन्म साधारण मनुष्य की तरह हुआ था और न ही उनकी मृत्यु हुयी थी।

  • सर्वान् धर्मान परित्यजम मामेकं शरणम् व्रज
    अहम् त्वम् सर्व पापेभ्यो मोक्षस्यामी मा शुच–
    ( भगवद् गीता अध्याय 18 )

    श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी
    हे नाथ नारायण वासुदेव …👏🏼

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    हे आनंद उमंग भयो जय हो नन्द लाल की
    नन्द के आनंद भयो जय कनैया लाल की

    हे ब्रज में आनंद भयो जय यशोदा लाल की
    नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की

    हे आनंद उमंग भयो जय हो नन्द लाल की
    गोकुल के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की

    जय यशोदा लाल की जय हो नन्द लाल की
    हाथी, घोड़ा, पालकी जय कन्हैया लाल की

    जय हो नन्द लाल की जय यशोदा लाल की
    हाथी, घोड़ा, पालकी जय कन्हैया लाल की

    हे आनंद उमंग भयो जय कन्हैया लाल की

    हे कोटि ब्रह्माण्ड के अधिपति लाल की
    हाथी, घोड़ा, पालकी जय कन्हैया लाल की

    हे गौने चराने आये जय हो पशुपाल की
    नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की

    आनंद से बोलो सब जय हो ब्रज लाल की
    हाथी, घोड़ा, पालकी जय कन्हैया लाल की

    जय हो ब्रज लाल की पावन प्रतिपाल की
    हे नन्द के आनंद भयो जय हो नन्द लाल की

    जय श्री कृष्ण

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    कृष्ण जन्म का रहस्य


    कृष्ण जन्म का रहस्य…..♡

    Abhimanyu “Krishnaa” Kashyap
    ***************

    कृष्ण का जन्म होता है अँधेरी रात में, अमावस में। सभी का जन्म अँधेरी रात में होता है और अमावस में होता है। असल में जगत की कोई भी चीज उजाले में नहीं जन्मती, सब कुछ जन्म अँधेरे में ही होता है। एक बीज भी फूटता है तो जमीन के अँधेरे में जन्मता है। फूल खिलते हैं प्रकाश में, जन्म अँधेरे में होता है।

    असल में जन्म की प्रक्रिया इतनी रहस्यपूर्ण है कि अँधेरे में ही हो सकती है। आपके भीतर भी जिन चीजों का जन्म होता है, वे सब गहरे अंधकार में, गहन अंधकार में होती है। एक कविता जन्मती है, तो मन के बहुत अचेतन अंधकार में जन्मती है। बहुत अनकांशस डार्कनेस में पैदा होती है। एक चित्र का जन्म होता है, तो मन की बहुत अतल गहराइयों में जहाँ कोई रोशनी नहीं पहुँचती जगत की, वहाँ होता है। समाधि का जन्म होता है, ध्यान का जन्म होता है, तो सब गहन अंधकार में। गहन अंधकार से अर्थ है, जहाँ बुद्धि का प्रकाश जरा भी नहीं पहुँचता। जहाँ सोच-समझ में कुछ भी नहीं आता, हाथ को हाथ नहीं सूझता है।

    कृष्ण का जन्म जिस रात में हुआ, कहानी कहती है कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था, इतना गहन अंधकार था। लेकिन इसमें विशेषता खोजने की जरूरत नहीं है। यह जन्म की सामान्य प्रक्रिया है।

    दूसरी बात कृष्ण के जन्म के साथ जुड़ी है- बंधन में जन्म होता है, कारागृह में। किसका जन्म है जो बंधन और कारागृह में नहीं होता है? हम सभी कारागृह में जन्मते हैं। हो सकता है कि मरते वक्त तक हम कारागृह से मुक्त हो जाएँ, जरूरी नहीं है हो सकता है कि हम मरें भी कारागृह में। जन्म एक बंधन में लाता है, सीमा में लाता है। शरीर में आना ही बड़े बंधन में आ जाना है, बड़े कारागृह में आ जाना है। जब भी कोई आत्मा जन्म लेती है तो कारागृह में ही जन्म लेती है।

    लेकिन इस प्रतीक को ठीक से नहीं समझा गया। इस बहुत काव्यात्मक बात को ऐतिहासिक घटना समझकर बड़ी भूल हो गई। सभी जन्म कारागृह में होते हैं। सभी मृत्युएँ कारागृह में नहीं होती हैं। कुछ मृत्युएँ मुक्ति में होती है। कुछ अधिक कारागृह में होती हैं। जन्म तो बंधन में होगा, मरते क्षण तक अगर हम बंधन से छूट जाएँ, टूट जाएँ सारे कारागृह, तो जीवन की यात्रा सफल हो गई।

    कृष्ण के जन्म के साथ एक और तीसरी बात जुड़ी है और वह यह है कि जन्म के साथ ही उन्हें मारे जाने की धमकी है। किसको नहीं है? जन्म के साथ ही मरने की घटना संभावी हो जाती है। जन्म के बाद – एक पल बाद भी मृत्यु घटित हो सकती है। जन्म के बाद प्रतिपल मृत्यु संभावी है। किसी भी क्षण मौत घट सकती है। मौत के लिए एक ही शर्त जरूरी है, वह जन्म है। और कोई शर्त जरूरी नहीं है। जन्म के बाद एक पल जीया हुआ बालक भी मरने के लिए उतना ही योग्य हो जाता है, जितना सत्तर साल जीया हुआ आदमी होता है। मरने के लिए और कोई योग्यता नहीं चाहिए, जन्म भर चाहिए।

    लेकिन कृष्ण के जन्म के साथ एक चौथी बात भी जुड़ी है कि मरने की बहुत तरह की घटनाएँ आती हैं, लेकिन वे सबसे बचकर निकल जाते हैं। जो भी उन्हें मारने आता है, वही मर जाता है। कहें कि मौत ही उनके लिए मर जाती है। मौत सब उपाय करती है और बेकार हो जाती है। कृष्ण ऐसी जिंदगी हैं, जिस दरवाजे पर मौत बहुत रूपों में आती है और हारकर लौट जाती है।

    वे सब रूपों की कथाएँ हमें पता हैं कि कितने रूपों में मौत घेरती है और हार जाती है। लेकिन कभी हमें खयाल नहीं आया कि इन कथाओं को हम गहरे में समझने की कोशिश करें। सत्य सिर्फ उन कथाओं में एक है, और वह यह है कि कृष्ण जीवन की तरफ रोज जीतते चले जाते हैं और मौत रोज हारती चली जाती है।

    मौत की धमकी एक दिन समाप्त हो जाती है। जिन-जिन ने चाहा है, जिस-जिस ढंग से चाहा है कृष्ण मर जाएँ, वे-वे ढंग असफल हो जाते हैं और कृष्ण जीए ही चले जाते हैं। लेकिन ये बातें इतनी सीधी, जैसा मैं कह रहा हूँ, कही नहीं गई हैं। इतने सीधे कहने का पुराने आदमी के पास कोई उपाय नहीं था। इसे भी थोड़ा समझ लेना जरूरी है।

    जितना पुरानी दुनिया में हम वापस लौटेंगे, उतना ही चिंतन का जो ढंग है, वह पिक्चोरियल होता है, चित्रात्मक होता है, शब्दात्मक नहीं होता। अभी भी रात आप सपना देखते हैं, कभी आपने खयाल किया कि सपनों में शब्दों का उपयोग करते हैं कि चित्रों का?

    सपने में शब्दों का उपयोग नहीं होता, चित्रों का उपयोग होता है। क्योंकि सपने हमारे आदिम भाषा हैं, प्रिमिटिव लैंग्वेज हैं। सपने के मामले में हममें और आज से दस हजार साल पहले के आदमी में कोई फर्क नहीं पड़ा है। सपने अभी भी पुराने हैं, प्रिमिटिव हैं, अभी भी सपना आधुनिक नहीं हो पाया। अभी भी सपने तो वही हैं जो दस हजार साल, दस लाख पुराने थे। गुहा-मानव ने एक गुफा में सोकर रात में जो सपने देखे होंगे, वही एयरकंडीशंड मकान में भी देखे जाते हैं। उससे कोई और फर्क नहीं पड़ा है। सपने की खूबी है कि उसकी सारी अभिव्यक्ति चित्रों में है।

    जितना पुरानी दुनिया में हम लौटेंगे- और कृष्ण बहुत पुराने हैं, इन अर्थों में पुराने हैं कि आदमी जब चिंतन शुरू कर रहा है, आदमी जब सोच रहा है जगत और जीवन के बाबत, अभी जब शब्द नहीं बने हैं और जब प्रतीकों में और चित्रों में सारा का सारा कहा जाता है और समझा जाता है, तब कृष्ण के जीवन की घटनाएँ लिखी गई हैं। उन घटनाओं को डीकोड करना पड़ता है। उन घटनाओं को चित्रों से तोड़कर शब्दों में लाना पड़ता है। और कृष्ण शब्द को भी थोड़ा समझना जरूरी है।

    कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, केंद्र। कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जो आकृष्ट करे, जो आकर्षित करे; सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन, कशिश का केंद्र। कृष्ण शब्द का अर्थ होता है जिस पर सारी चीजें खिंचती हों। जो केंद्रीय चुंबक का काम करे। प्रत्येक व्यक्ति का जन्म एक अर्थ में कृष्ण का जन्म है, क्योंकि हमारे भीतर जो आत्मा है, वह कशिश का केंद्र है। वह सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन है जिस पर सब चीजें खिँचती हैं और आकृष्ट होती हैं।

    शरीर खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है, परिवार खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है, समाज खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है, जगत खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है। वह जो हमारे भीतर कृष्ण का केंद्र है, आकर्षण का जो गहरा बिंदु है, उसके आसपास सब घटित होता है। तो जब भी कोई व्यक्ति जन्मता है, तो एक अर्थ में कृष्ण ही जन्मता है वह जो बिंदु है आत्मा का, आकर्षण का, वह जन्मता है, और उसके बाद सब चीजें उसके आसपास निर्मित होनी शुरू होती हैं। उस कृष्ण बिंदु के आसपास क्रिस्टलाइजेशन शुरू होता है और व्यक्तित्व निर्मित होता है। इसलिए कृष्ण का जन्म एक व्यक्ति विशेष का जन्म मात्र नहीं है, बल्कि व्यक्ति मात्र का जन्म है।

    कृष्ण जैसा व्यक्ति जब हमें उपलब्ध हो गया तो हमने कृष्ण के व्यक्तित्व के साथ वह सब समाहित कर दिया है जो प्रत्येक आत्मा के जन्म के साथ समाहित है। महापुरुषों की जिंदगी कभी भी ऐतिहासिक नहीं हो पाती है, सदा काव्यात्मक हो जाती है। पीछे लौटकर निर्मित होती है।

    पीछे लौटकर जब हम देखते हैं तो हर चीज प्रतीक हो जाती है और दूसरे अर्थ ले लेती है। जो अर्थ घटते हुए क्षण में कभी भी न रहे होंगे। और फिर कृष्ण जैसे व्यक्तियों की जिंदगी एक बार नहीं लिखी जाती, हर सदी बार-बार लिखती है।

    हजारों लोग लिखते हैं। जब हजारों लोग लिखते हैं तो हजार व्याख्याएँ होती चली जाती हैं। फिर धीरे-धीरे कृष्ण की जिंदगी किसी व्यक्ति की जिंदगी नहीं रह जाती। कृष्ण एक संस्था हो जाते हैं, एक इंस्टीट्यूट हो जाते हैं। फिर वे समस्त जन्मों का सारभूत हो जाते हैं। फिर मनुष्य मात्र के जन्म की कथा उनके जन्म की कथा हो जाती है। इसलिए व्यक्तिवाची अर्थों में मैं कोई मूल्य नहीं मानता हूँ। कृष्ण जैसे व्यक्ति व्यक्ति रह ही नहीं जाते। वे हमारे मानस के, हमारे चित्त के, हमारे कलेक्टिव माइंड के प्रतीक हो जाते हैं। और हमारे चित्त ने जितने भी जन्म देखे हैं, वे सब उनमें समाहित हो जाते हैं।

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    भगवान कृष्ण के बारे में अनजाने तथ्य


    भगवान कृष्ण के बारे में अनजाने तथ्य

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    • उत्तर प्रदेश में कृष्ण या गोपाल गोविन्द इत्यादि नामो से जानते है।
    • राजस्थान में श्रीनाथजी या ठाकुरजी के नाम से जानते है।
    • महाराष्ट्र में बिट्ठल के नाम से भगवान् जाने जाते है।
    • उड़ीसा में जगन्नाथ के नाम से जाने जाते है।
    • बंगाल में गोपालजी के नाम से जाने जाते है।
    • दक्षिण भारत में वेंकटेश या गोविंदा के नाम से जाने जाते है।
    • गुजरात में द्वारिकाधीश के नाम से जाने जाते है।
    • असम ,त्रिपुरा,नेपाल इत्यादि पूर्वोत्तर क्षेत्रो में कृष्ण नाम से ही पूजा होती है।
    • मलेशिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंग्लैंड, फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है।
    • गोविन्द या गोपाल में “गो” शब्द का अर्थ गाय एवं इन्द्रियों , दोनों से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद में गो का अर्थ होता है मनुष्य की इंद्रिया…जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश में इंद्रिया हो वही गोविंद है गोपाल है।
    • श्री कृष्ण के पिता का नाम वसुदेव था इसलिए इन्हें आजीवन “वासुदेव” के नाम से जाना गया। श्री कृष्ण के दादा का नाम शूरसेन था..
    • श्री कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के राजा कंस की जेल में हुआ था।
    • श्री कृष्ण के भाई बलराम थे लेकिन उद्धव और अंगिरस उनके चचेरे भाई थे,

    अंगिरस ने बाद में तपस्या की थी और जैन धर्म के तीर्थंकर नेमिनाथ के नाम से विख्यात हुए थे।

    • श्री कृष्ण ने 16000 राजकुमारियों को असम के राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था और उन राजकुमारियों को आत्महत्या से रोकने के लिए मजबूरी में उनके सम्मान हेतु उनसे विवाह किया था।

    क्योंकि उस युग में हरण की हुयी स्त्री अछूत समझी जाती थी और समाज उन स्त्रियों को अपनाता नहीं था।।

    • श्री कृष्ण की मूल पटरानी एक ही थी जिनका नाम रुक्मणी था जो महाराष्ट्र के विदर्भ राज्य के राजा रुक्मी की बहन थी।। रुक्मी शिशुपाल का मित्र था और श्री कृष्ण का शत्रु ।
    • दुर्योधन श्री कृष्ण का समधी था और उसकी बेटी लक्ष्मणा का विवाह श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ हुआ था।
    • श्री कृष्ण के धनुष का नाम सारंग था। शंख का नाम पाञ्चजन्य था। चक्र का नाम सुदर्शन था। उनकी प्रेमिका का नाम राधारानी था जो बरसाना के सरपंच वृषभानु की बेटी थी। श्री कृष्ण राधारानी से निष्काम और निश्वार्थ प्रेम करते थे। राधारानी श्री कृष्ण से उम्र में बहुत बड़ी थी। लगभग 6 साल से भी ज्यादा का अंतर था।

    श्री कृष्ण ने 14 वर्ष की उम्र में वृंदावन छोड़ दिया था।। और उसके बाद वो राधा से कभी नहीं मिले।

    • श्री कृष्ण विद्या अर्जित करने हेतु मथुरा से उज्जैन मध्य प्रदेश आये थे। और यहाँ उन्होंने उच्च कोटि के ब्राह्मण महर्षि सान्दीपनि से अलौकिक विद्याओ का ज्ञान अर्जित किया था।।
    • श्री कृष्ण की कुल 125 वर्ष धरती पर रहे । उनके शरीर का रंग गहरा काला था और उनके शरीर से 24 घंटे पवित्र अष्टगंध महकता था।
      उनके वस्त्र रेशम के पीले रंग के होते थे और मस्तक पर मोरमुकुट शोभा देता था।
      उनके सारथि का नाम दारुक था और उनके रथ में चार घोड़े जुते होते थे। उनकी दोनो आँखों में प्रचंड सम्मोहन था।
    • श्री कृष्ण के कुलगुरु महर्षि शांडिल्य थे।
    • श्री कृष्ण का नामकरण महर्षि गर्ग ने किया था।
    • श्री कृष्ण के बड़े पोते का नाम अनिरुद्ध था जिसके लिए श्री कृष्ण ने बाणासुर और भगवान् शिव से युद्ध करके उन्हें पराजित किया था।
    • श्री कृष्ण ने गुजरात के समुद्र के बीचो बीच द्वारिका नाम की राजधानी बसाई थी। द्वारिका पूरी सोने की थी और उसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया था।
    • श्री कृष्ण को ज़रा नाम के शिकारी का बाण उनके पैर के अंगूठे मे लगा वो शिकारी पूर्व जन्म का बाली था,बाण लगने के पश्चात भगवान स्वलोक धाम को गमन कर गए।
    • श्री कृष्ण ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अर्जुन को पवित्र गीता का ज्ञान रविवार शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मात्र 45 मिनट में दे दिया था।
    • श्री कृष्ण ने सिर्फ एक बार बाल्यावस्था में नदी में नग्न स्नान कर रही स्त्रियों के वस्त्र चुराए थे और उन्हें अगली बार यु खुले में नग्न स्नान न करने की नसीहत दी थी।
    • श्री कृष्ण के अनुसार गौ हत्या करने वाला असुर है और उसको जीने का कोई अधिकार नहीं।
    • श्री कृष्ण अवतार नहीं थे बल्कि अवतारी थे….जिसका अर्थ होता है “पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्” न ही उनका जन्म साधारण मनुष्य की तरह हुआ था और न ही उनकी मृत्यु हुयी थी।

    सर्वान् धर्मान परित्यजम मामेकं शरणम् व्रज
    अहम् त्वम् सर्व पापेभ्यो मोक्षस्यामी मा शुच–
    ( भगवद् गीता अध्याय 18 )

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    શું આપણે હેપ્પી જન્માષ્ટમી કહેવાને લાયક છીએ? – જયવંત પંડ્યાનો બ્લૉગ


    શું આપણે હેપ્પી જન્માષ્ટમી કહેવાને લાયક છીએ?

    જયવંત પંડ્યાનો બ્લૉગ

    શ્રી કૃષ્ણની રાસ લીલા, નિયમો તોડવાની વાતને વધુ કહીને કેટલાક બુદ્ધુજીવીઓ હિન્દુઓને ગેરમાર્ગે દોરવાનું અર્બન નક્સલી કામ કરે છે ત્યારે આપણે આજે પોતાની જાતને અને આવા બુદ્ધુજીવીઓને કેટલાક પ્રશ્નો પૂછીએ.

    ૧. આપણે શ્રી કૃષ્ણની જેમ સુદામા જેવા આપણા મિત્રોને સાથ આપીએ છીએ? આર્થિક મદદની વાત નથી, પણ માનસિક સધિયારો પણ આપીએ છીએ? શ્રી કૃષ્ણ રાજા હતા, દુનિયાભરનાં કામો હતાં, તોય બાળપણનો ગોઠિયો મળવા આવ્યો એટલે પગ ધોઈ આદરથી આવકાર આપ્યો, વિશેષ સમય કાઢી તેની સાથે બાળપણનાં સંભારણાં તાજાં કર્યાં, પત્નીઓ સમક્ષ પણ તેનો પરિચય આદર સાથે કરાવ્યો. આપણે સફળ થયા પછી બાળપણના કે કૉલેજના મિત્રોને ભૂલી નથી જતા ને? કોઈ મિત્રને વિપરીત ઘડી આવે તો તેના ફૉન ઉપાડવા કે તેના વૉટ્સએપ સંદેશાનો જવાબ આપવાનું બંધ નથી કરી દેતા ને? આ પ્રશ્ન આપણી જાતને પૂછવો જોઈએ. અને સાથે જ જ્યારે આપણો મિત્ર વિષાદમાં ફસાયો હોય, કિંકર્તવ્યમૂઢ હોય ત્યારે તેનો સાથ છોડી દેવાના બદલે તેને સમજાવીએ છીએ? અને સમજાવીએ છીએ તો પણ તેને પસંદ પડે તેવો જવાબ આપીએ છીએ કે પછી તેને હિતકારી હોય તેવો જવાબ આપીએ છીએ? અને હિતકારી જવાબ આપીએ તો પછી એવો હઠાગ્રહ રાખીએ છીએ કે ના, મેં કહ્યું તેમ તારે કરવું જ પડે, નહીંતર તારો ને મારો સંબંધ પૂરો? કે પછી શ્રી કૃષ્ણની જેમ ‘યથેચ્છસિ તથા કુરુ’ કહીને ઉદ્દીપક જેવું પોતાનું કામ પૂરું કરવું તેવું આપણે કરીએ છીએ?

    ૨. પોતાના ગામ પર, રાષ્ટ્ર પર સંકટ આવે ત્યારે, “હું એકલો શું કરી શકું?” તેવી ભાવના આપણા મનમાં નથી જન્મતી ને? શ્રી કૃષ્ણએ તો નાનપણથી જ રાક્ષસોનો સંહાર કરવાનું શરૂ કરી દીધું હતું. નાનપણથી જ આવતાં સંકટો વખતે માથે હાથ દઈને કે હાથ ખંખેરીને બેસી નહોતા ગયા કે હું તો નાનો છું, એકલો શું કરી શકું? કંસ હોય કે જરાસંધ કે દુર્યોધન, અત્યાચારીઓ સામે કળ, બળ અને છળથી પણ લડવાનું તેમણે જ શીખવાડ્યું.

    ૩. કોઈ અબળા પર આફત હોય ત્યારે આપણે વિડિયો નથી ઉતારતા ને? કોઈ સ્ત્રીની છેડતી થતી હોય ત્યારે મૂંગા મોઢે જોતા નથી ને કે પછી ‘આવી માથાકૂટમાં કોણ પડે?’ તેમ કહી ચાલતી પકડતા નથી ને? પોતાની વાતો દ્વારા, પોતાની કલા દ્વારા, પોતાના લેખન દ્વારા, સૉશિયલ મિડિયા પર સૉફ્ટ પૉર્ન પ્રકારની પૉસ્ટ દ્વારા સ્ત્રી પર અત્યાચાર થાય, સ્ત્રીને ફટાકડી તરીકે જોવામાં આવે, તેને ચીજ તરીકે-વસ્તુ તરીકે જોવામાં આવે તેવું વાતાવરણ નિર્માણ નથી કરતા ને? રાધા સાથેના પ્રેમને વ્યભિચારનું નામ આપીને શ્રી કૃષ્ણના ઉદાહરણ દ્વારા અનૈતિકતાને પોષતા નથી ને? શ્રી કૃષ્ણ એક માત્ર વ્યક્તિ હતા જેણે દ્રૌપદીની લાજ બચાવી હતી. ગોપીઓનાં વસ્ત્રો હર્યાં તેની પાછળ કોઈ કામ લીલા નહોતી, પરંતુ ગોપીઓને સંદેશો હતો કે જાહેરમાં તમારે તમારી ગરીમા જાળવવી જોઈએ.

    ૪. આપણા સગાવહાલાને ત્યાં કોઈ પ્રસંગ હોય તો મોડા પહોંચી, જમીને, શુભેચ્છા આપીને નીકળી જતા નથી ને? કામ તો એ લોકો કરશે તેમ નથી વિચારતા ને? મારે તો મારા દીકરાની પરીક્ષા છે, ઘરનાં કેટલાં કામ હોય તેમ બહાના બનાવીને ઘરે ટીવી જોવા બેસી નથી રહેતા ને? અને પછી આપણા ઘરે પ્રસંગ હોય ત્યારે આપણે લોકોને દોષ દેતા હોઈએ કે કોઈ મદદ કરવા નથી આવ્યું. આવું તો કરતા હોય તો પહેલાં આપણે કેટલા પ્રસંગોમાં દોડીને કામ કરવા ગયા તે આપણી જાતને પૂછવું જોઈએ. શ્રી કૃષ્ણએ તો રાજસૂય યજ્ઞમાં પતરાળાં ઊંચકવાનું કામ કર્યું હતું.

    ૫. આપણે હંમેશાં કમ્ફર્ટ ઝૉનમાં જ રહેવાનું પસંદ નથી કરતા ને? શ્રી કૃષ્ણએ તો નાનપણમાં જ ગોકુળ છોડી દીધું અને તે પછી જરૂર પડી તો મથુરા પણ છોડી.

    ૬. આપણે ખોટું કામ કરતા આપણા લોકોને સાથ નથી આપતા ને? શ્રી કૃષ્ણએ મદમાં છકીને સદાચારી ઋષિઓની મજાક કરવા ગયેલા પોતાના જ વંશજોને બચાવ્યા નહીં. અત્યારે તો સદાચારીઓની મજાક કરવી એ ફેશન છે. આપણે આવા લોકોમાં નથી આવતા ને?

    ૭. કોઈ આપણી ટીકા કરે ત્યારે તેનાથી નીચલી સ્તરે ઉતરીને આપણે ગાળો ભાંડવા નથી માંડતા ને? અને પછી પાછા હું તો શ્રી કૃષ્ણ જેવો, સુદર્શન ચક્ર ચલાવું તેમ કહીને પોતાની જાતને શ્રી કૃષ્ણ સાથે નથી સરખાવતા ને? કારણકે શ્રી કૃષ્ણની જેમ શિશુપાલ પર સુદર્શન ચક્ર ચલાવવા સો ગાળો ખાવાની-સાંભળવાની હિંમત જોઈએ.

    ૮. શ્રી કૃષ્ણએ નરકાસુરને ત્યાં કેદ રહેલી સ્ત્રીઓને સમાજમાં માનભર્યું સ્થાન મળે તે માટે સોળ હજાર સ્ત્રીઓને પત્ની બનાવી. આ આંકડો કદાચ વધુ હોઈ શકે કે પછી સમ્સ્કૃત (સંસ્કૃતનો સાચો ઉચ્ચાર સમજાય તે માટે આ રીતે લખ્યું છે. તેનો ઉચ્ચાર સન્સ્કૃત નથી.) શ્લોકનું અર્થઘટન ખોટું હોઈ શકે, પરંતુ તેમણે આ કામ સ્ત્રીઓની ગરીમા માટે કર્યું હતું. પરંતુ આ સિવાય તેઓ ધારત તો કુબજાથી લઈને દ્રૌપદી સહિતની સ્ત્રીઓને પોતાની પ્રેમજાળમાં ફસાવી શકત. તેઓ મનમોહન હતા. મોહક વ્યક્તિત્વ ધરાવતા હતા. પરંતુ તેમણે તેમ કર્યું નથી. આવું તો આપણે નથી કરતા ને? મુગ્ધ છોકરીઓને, પરિણિત કે અપરિણીત સ્ત્રીઓને પ્રેમજાળમાં ફસાવી અને પછી પાછા શ્રી કૃષ્ણની સાથે આપણી જાતને સરખાવી તેને રાસલીલાનું રૂપાળું નામ આપવું તેવું નથી કરતા ને?

    આ આઠ સવાલોની અષ્ટમી પર ચિંતન કરી જન્મને સુધારીએ તો જ જન્માષ્ટમી સાર્થક ગણાય.

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    [02/09, 3:43 p.m.] संस्कृति ईबुक्स: 1भगवान् श्री कृष्ण जी के 51 नाम और उन के अर्थ:…..

    1 कृष्ण : सब को अपनी ओर आकर्षित करने वाला.।


    2 गिरिधर: गिरी: पर्वत ,धर: धारण करने वाला। अर्थात गोवर्धन पर्वत को उठाने वाले।


    3 मुरलीधर: मुरली को धारण करने वाले।


    4 पीताम्बर धारी: पीत :पिला, अम्बर:वस्त्र। जिस ने पिले वस्त्रों को धारण किया हुआ है।


    5 मधुसूदन: मधु नामक दैत्य को मारने वाले।


    6 यशोदा या देवकी नंदन: यशोदा और देवकी को खुश करने वाला पुत्र।


    7 गोपाल: गौओं का या पृथ्वी का पालन करने वाला।


    8 गोविन्द: गौओं का रक्षक।


    9 आनंद कंद: आनंद की राशि देंने वाला।


    10 कुञ्ज बिहारी: कुंज नामक गली में विहार करने वाला।


    11 चक्रधारी: जिस ने सुदर्शन चक्र या ज्ञान चक्र या शक्ति चक्र को धारण किया हुआ है।


    12 श्याम: सांवले रंग वाला।


    13 माधव: माया के पति।


    14 मुरारी: मुर नामक दैत्य के शत्रु।


    15 असुरारी: असुरों के शत्रु।


    16 बनवारी: वनो में विहार करने वाले।


    17 मुकुंद: जिन के पास निधियाँ है।


    18 योगीश्वर: योगियों के ईश्वर या मालिक।


    19 गोपेश :गोपियों के मालिक।


    20 हरि: दुःखों का हरण करने वाले।


    21 मदन: सूंदर।


    22 मनोहर: मन का हरण करने वाले।


    23 मोहन: सम्मोहित करने वाले।


    24 जगदीश: जगत के मालिक।


    25 पालनहार: सब का पालन पोषण करने वाले।


    26 कंसारी: कंस के शत्रु।


    27 रुख्मीनि वलभ: रुक्मणी के पति ।


    28 केशव: केशी नाम दैत्य को मारने वाले. या पानी के उपर निवास करने वाले या जिन के बाल सुंदर है।


    29 वासुदेव:वसुदेव के पुत्र होने के कारन।


    30 रणछोर:युद्ध भूमि स भागने वाले।


    31 गुड़ाकेश: निद्रा को जितने वाले।


    32 हृषिकेश: इन्द्रियों को जितने वाले।


    33 सारथी: अर्जुन का रथ चलने के कारण।



    35 पूर्ण परब्रह्म: :देवताओ के भी मालिक।


    36 देवेश: देवों के भी ईश।


    37 नाग नथिया: कलियाँ नाग को मारने के कारण।


    38 वृष्णिपति: इस कुल में उतपन्न होने के कारण


    39 यदुपति:यादवों के मालिक।


    40 यदुवंशी: यदु वंश में अवतार धारण करने के कारण।


    41 द्वारकाधीश:द्वारका नगरी के मालिक।


    42 नागर:सुंदर।


    43 छलिया: छल करने वाले।


    44 मथुरा गोकुल वासी: इन स्थानों पर निवास करने के कारण।


    45 रमण: सदा अपने आनंद में लीन रहने वाले।


    46 दामोदर: पेट पर जिन के रस्सी बांध दी गयी थी।


    47 अघहारी: पापों का हरण करने वाले।


    48 सखा: अर्जुन और सुदामा के साथ मित्रता निभाने के कारण।


    49 रास रचिया: रास रचाने के कारण।


    50 अच्युत: जिस के धाम से कोई वापिस नही आता है।


    51 नन्द लाला: नन्द के पुत्र होने के कारण।
    🌺 ।। जय श्री कृष्णा ।।

    ” कृष्ण का मोबाइल “
    📱
    लगाया कभी…???

    🌍(1) ” कृष्ण ” का नम्बर कभी ” एंगेज ” नही आता चाहे एक साथ लाखो करोड़ो लोग बात करे…🌍

    🎧(2) ” कृष्ण ” का नम्बर कभी ” स्विच ओफ ” नही होता चाहे कितनी ही देर बात करे…🎤

    🍒(3) ” कृष्ण ” का नम्बर कभी ” कवरेज छेत्र “के बाहर नही आता चाहे आप कही भी चले जाए । सब जगह इसका ‘ फुल नेटवर्क ‘ आता है…🍒

    🙏(4) ” कृष्ण ” से कितनी भी बात कर ले आपकी बैटरी डिस्चार्ज नही होगी बल्कि जितनी बात करेंगे उतनी ही फुल चार्ज होगी…🙏

    📱(5) ” कृष्ण ” से बात करने के लिए सब जगह रोमिग फ्री है ☎

    ” कृष्ण ” का नम्बर है…
    “श्री कृष्ण: शरणं मम “

    🌹🙏जय श्री कृष्ण🙏🌹
    [02/09, 3:56 p.m.] संस्कृति ईबुक्स: कृष्ण जी के 108 नाम

    1 अचला : भगवान।
    2 अच्युत : अचूक प्रभु, या जिसने कभी भूल ना की हो।
    3 अद्भुतह : अद्भुत प्रभु।
    4 आदिदेव : देवताओं के स्वामी।
    5 अदित्या : देवी अदिति के पुत्र।
    6 अजंमा : जिनकी शक्ति असीम और अनंत हो।
    7 अजया : जीवन और मृत्यु के विजेता।
    8 अक्षरा : अविनाशी प्रभु।
    9 अम्रुत : अमृत जैसा स्वरूप वाले।
    10 अनादिह : सर्वप्रथम हैं जो।
    11 आनंद सागर : कृपा करने वाले
    12 अनंता : अंतहीन देव
    13 अनंतजित : हमेशा विजयी होने वाले।
    14 अनया : जिनका कोई स्वामी न हो।
    15 अनिरुध्दा : जिनका अवरोध न किया जा सके।
    16 अपराजीत : जिन्हें हराया न जा सके।
    17 अव्युक्ता : माणभ की तरह स्पष्ट।
    18 बालगोपाल : भगवान कृष्ण का बाल रूप।
    19 बलि : सर्व शक्तिमान।
    20 चतुर्भुज : चार भुजाओं वाले प्रभु।
    21 दानवेंद्रो : वरदान देने वाले।
    22 दयालु : करुणा के भंडार।
    23 दयानिधि : सब पर दया करने वाले।
    24 देवाधिदेव : देवों के देव
    25 देवकीनंदन : देवकी के लाल (पुत्र)।
    26 देवेश : ईश्वरों के भी ईश्वर
    27 धर्माध्यक्ष : धर्म के स्वामी
    28 द्वारकाधीश : द्वारका के अधिपति।
    29 गोपाल : ग्वालों के साथ खेलने वाले।
    30 गोपालप्रिया : ग्वालों के प्रिय
    31 गोविंदा : गाय, प्रकृति, भूमि को चाहने वाले।
    32 ज्ञानेश्वर : ज्ञान के भगवान
    33 हरि : प्रकृति के देवता।
    34 हिरंयगर्भा : सबसे शक्तिशाली प्रजापति।
    35 ऋषिकेश : सभी इंद्रियों के दाता।
    36 जगद्गुरु : ब्रह्मांड के गुरु
    37 जगदिशा : सभी के रक्षक
    38 जगन्नाथ : ब्रह्मांड के ईश्वर।
    39 जनार्धना : सभी को वरदान देने वाले।
    40 जयंतह : सभी दुश्मनों को पराजित करने वाले।
    41 ज्योतिरादित्या : जिनमें सूर्य की चमक है।
    42 कमलनाथ : देवी लक्ष्मी की प्रभु
    43 कमलनयन : जिनके कमल के समान नेत्र हैं।
    44 कामसांतक : कंस का वध करने वाले।
    45 कंजलोचन : जिनके कमल के समान नेत्र हैं।
    46 केशव :
    47 कृष्ण : सांवले रंग वाले।
    48 लक्ष्मीकांत : देवी लक्ष्मी की प्रभु।
    49 लोकाध्यक्ष : तीनों लोक के स्वामी।
    50 मदन : प्रेम के प्रतीक।
    51 माधव : ज्ञान के भंडार।
    52 मधुसूदन : मधु- दानवों का वध करने वाले।
    53 महेंद्र : इन्द्र के स्वामी।
    54 मनमोहन : सबका मन मोह लेने वाले।
    55 मनोहर : बहुत ही सुंदर रूप रंग वाले प्रभु।
    56 मयूर : मुकुट पर मोर- पंख धारण करने वाले भगवान।
    57 मोहन : सभी को आकर्षित करने वाले।
    58 मुरली : बांसुरी बजाने वाले प्रभु।
    59 मुरलीधर : मुरली धारण करने वाले।
    60 मुरलीमनोहर : मुरली बजाकर मोहने वाले।
    61 नंद्गोपाल : नंद बाबा के पुत्र।
    62 नारायन : सबको शरण में लेने वाले।
    63 निरंजन : सर्वोत्तम।
    64 निर्गुण : जिनमें कोई अवगुण नहीं।
    65 पद्महस्ता : जिनके कमल की तरह हाथ हैं।
    66 पद्मनाभ : जिनकी कमल के आकार की नाभि हो।
    67 परब्रह्मन : परम सत्य।
    68 परमात्मा : सभी प्राणियों के प्रभु।
    69 परमपुरुष : श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले।
    70 पार्थसार्थी : अर्जुन के सारथी।
    71 प्रजापती : सभी प्राणियों के नाथ।
    72 पुंण्य : निर्मल व्यक्तित्व।
    73 पुर्शोत्तम : उत्तम पुरुष।
    74 रविलोचन : सूर्य जिनका नेत्र है।
    75 सहस्राकाश : हजार आंख वाले प्रभु।
    76 सहस्रजित : हजारों को जीतने वाले।
    77 सहस्रपात : जिनके हजारों पैर हों।
    78 साक्षी : समस्त देवों के गवाह।
    79 सनातन : जिनका कभी अंत न हो।
    80 सर्वजन : सब- कुछ जानने वाले।
    81 सर्वपालक : सभी का पालन करने वाले।
    82 सर्वेश्वर : समस्त देवों से ऊंचे।
    83 सत्यवचन : सत्य कहने वाले।
    84 सत्यव्त : श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले देव।
    85 शंतह : शांत भाव वाले।
    86 श्रेष्ट : महान।
    87 श्रीकांत : अद्भुत सौंदर्य के स्वामी।
    88 श्याम : जिनका रंग सांवला हो।
    89 श्यामसुंदर : सांवले रंग में भी सुंदर दिखने वाले।
    90 सुदर्शन : रूपवान।
    91 सुमेध : सर्वज्ञानी।
    92 सुरेशम : सभी जीव- जंतुओं के देव।
    93 स्वर्गपति : स्वर्ग के राजा।
    94 त्रिविक्रमा : तीनों लोकों के विजेता
    95 उपेंद्र : इन्द्र के भाई।
    96 वैकुंठनाथ : स्वर्ग के रहने वाले।
    97 वर्धमानह : जिनका कोई आकार न हो।
    98 वासुदेव : सभी जगह विद्यमान रहने वाले।
    99 विष्णु : भगवान विष्णु के स्वरूप।
    100 विश्वदक्शिनह : निपुण और कुशल।
    101 विश्वकर्मा : ब्रह्मांड के निर्माता
    102 विश्वमूर्ति : पूरे ब्रह्मांड का रूप।
    103 विश्वरुपा : ब्रह्मांड- हित के लिए रूप धारण करने वाले।
    104 विश्वात्मा : ब्रह्मांड की आत्मा।
    105 वृषपर्व : धर्म के भगवान।
    106 यदवेंद्रा : यादव वंश के मुखिया।
    107 योगि : प्रमुख गुरु।
    108 योगिनाम्पति : योगियों के स्वामी।