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भगवान् श्रीकृष्ण जी के 51 नाम और उन के अर्थ


*भगवान् श्रीकृष्ण जी के 51 नाम और उन के अर्थ:…..* *1 कृष्ण* : सब को अपनी ओर आकर्षित करने वाला.। **** *2 गिरिधर*: गिरी: पर्वत ,धर: धारण करने वाला। अर्थात गोवर्धन पर्वत को उठाने वाले। **** *3 मुरलीधर*: मुरली को धारण करने वाले। **** *4 पीताम्बर धारी*: पीत :पिला, अम्बर:वस्त्र। जिस ने पिले वस्त्रों को धारण किया हुआ है। **** *5 मधुसूदन:* मधु नामक दैत्य को मारने वाले। **** *6 यशोदा या देवकी नंदन*: यशोदा और देवकी को खुश करने वाला पुत्र। **** *7 गोपाल*: गौओं का या पृथ्वी का पालन करने वाला। **** *8 गोविन्द*: गौओं का रक्षक। **** *9 आनंद कंद:* आनंद की राशि देंने वाला। **** *10 कुञ्ज बिहारी*: कुंज नामक गली में विहार करने वाला। **** *11 चक्रधारी*: जिस ने सुदर्शन चक्र या ज्ञान चक्र या शक्ति चक्र को धारण किया हुआ है। **** *12 श्याम*: सांवले रंग वाला। **** *13 माधव:* माया के पति। **** *14 मुरारी:* मुर नामक दैत्य के शत्रु। **** *15 असुरारी*: असुरों के शत्रु। **** *16 बनवारी*: वनो में विहार करने वाले। **** *17 मुकुंद*: जिन के पास निधियाँ है। **** *18 योगीश्वर*: योगियों के ईश्वर या मालिक। **** *19 गोपेश* :गोपियों के मालिक। **** *20 हरि*: दुःखों का हरण करने वाले। **** *21 मदन:* सूंदर। **** *22 मनोहर:* मन का हरण करने वाले। **** *23 मोहन*: सम्मोहित करने वाले। **** *24 जगदीश*: जगत के मालिक। **** *25 पालनहार*: सब का पालन पोषण करने वाले। **** *26 कंसारी*: कंस के शत्रु। **** *27 रुख्मीनि वलभ*: रुक्मणी के पति । **** *28 केशव*: केशी नाम दैत्य को मारने वाले. या पानी के उपर निवास करने वाले या जिन के बाल सुंदर है। **** *29 वासुदेव*:वसुदेव के पुत्र होने के कारन। **** *30 रणछोर*:युद्ध भूमि स भागने वाले। **** *31 गुड़ाकेश*: निद्रा को जितने वाले। **** *32 हृषिकेश*: इन्द्रियों को जितने वाले। **** *33 सारथी*: अर्जुन का रथ चलने के कारण। *** **** *35 पूर्ण परब्रह्म:* :देवताओ के भी मालिक। **** *36 देवेश*: देवों के भी ईश। **** *37 नाग नथिया*: कलियाँ नाग को मारने के कारण। **** *38 वृष्णिपति*: इस कुल में उतपन्न होने के कारण **** *39 यदुपति*:यादवों के मालिक। **** *40 यदुवंशी*: यदु वंश में अवतार धारण करने के कारण। **** *41 द्वारकाधीश*:द्वारका नगरी के मालिक। **** *42 नागर*:सुंदर। **** *43 छलिया*: छल करने वाले। **** *44 मथुरा गोकुल वासी*: इन स्थानों पर निवास करने के कारण। **** *45 रमण*: सदा अपने आनंद में लीन रहने वाले। **** *46 दामोदर*: पेट पर जिन के रस्सी बांध दी गयी थी। **** *47 अघहारी*: पापों का हरण करने वाले। **** *48 सखा*: अर्जुन और सुदामा के साथ मित्रता निभाने के कारण। **** *49 रास रचिया*: रास रचाने के कारण। **** *50 अच्युत*: जिस के धाम से कोई वापिस नही आता है। **** *51 नन्द लाला*: नन्द के पुत्र होने के कारण। *।। जय राधामाधव ।।*विष्णु कान्त शास्त्री वृन्दावन 9828970531

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श्री कृष्ण पूजा


श्री कृष्ण पूजा

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श्री कृष्ण पूजन का हर शास्त्र में विशेष महत्व बताया गया है। आइए 6 विशेष मंत्रों के माध्यम से जानें कि क्या लाभ मिलता है श्रीकृष्ण का ध्यान लगाने से… उनके पूजन से, उनकी आराधना से…
श्री शुकदेवजी राजा परीक्षित्‌ से कहते हैं-
सकृन्मनः कृष्णापदारविन्दयोर्निवेशितं तद्गुणरागि यैरिह।
न ते यमं पाशभृतश्च तद्भटान्‌ स्वप्नेऽपि पश्यन्ति हि चीर्णनिष्कृताः॥
जो मनुष्य केवल एक बार श्रीकृष्ण के गुणों में प्रेम करने वाले अपने चित्त को श्रीकृष्ण के चरण कमलों में लगा देते हैं, वे पापों से छूट जाते हैं, फिर उन्हें पाश हाथ में लिए हुए यमदूतों के दर्शन स्वप्न में भी नहीं होते।
अविस्मृतिः कृष्णपदारविन्दयोः
क्षिणोत्यभद्रणि शमं तनोति च।
सत्वस्य शुद्धिं परमात्मभक्तिं
ज्ञानं च विज्ञानविरागयुक्तम्‌॥
श्रीकृष्ण के चरण कमलों का स्मरण सदा बना रहे तो उसी से पापों का नाश, कल्याण की प्राप्ति, अन्तः करण की शुद्धि, परमात्मा की भक्ति और वैराग्ययुक्त ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ति आप ही हो जाती है।
पुंसां कलिकृतान्दोषान्द्रव्यदेशात्मसंभवान्‌।
सर्वान्हरित चित्तस्थो भगवान्पुरुषोत्तमः॥
भगवान पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण जब चित्त में विराजते हैं, तब उनके प्रभाव से कलियुग के सारे पाप और द्रव्य, देश तथा आत्मा के दोष नष्ट हो जाते हैं।
शय्यासनाटनालाप्रीडास्नानादिकर्मसु।
न विदुः सन्तमात्मानं वृष्णयः कृष्णचेतसः॥
श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व समझने वाले भक्त श्रीकृष्ण में इतने तन्मय रहते थे कि सोते, बैठते, घूमते, फिरते, बातचीत करते, खेलते, स्नान करते और भोजन आदि करते समय उन्हें अपनी सुधि ही नहीं रहती थी।
वैरेण यं नृपतयः शिशुपालपौण्ड्र-
शाल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः।
ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ
तत्साम्यमापुरनुरक्तधियां पुनः किम्‌॥
जब शिशुपाल, शाल्व और पौण्ड्रक आदि राजा वैरभाव से ही खाते, पीते, सोते, उठते, बैठते हर वक्त श्री हरि की चाल, उनकी चितवन आदि का चिन्तन करने के कारण मुक्त हो गए, तो फिर जिनका चित्त श्री कृष्ण में अनन्य भाव से लग रहा है, उन विरक्त भक्तों के मुक्त होने में तो संदेह ही क्या है?
एनः पूर्वकृतं यत्तद्राजानः कृष्णवैरिणः।
जहुस्त्वन्ते तदात्मानः कीटः पेशस्कृतो यथा॥
श्रीकृष्ण से द्वेष करने वाले समस्त नरपतिगण अन्त में श्री भगवान के स्मरण के प्रभाव से पूर्व संचित पापों को नष्ट कर भगवद  रूप हो जाते हैं,  अतएव श्रीकृष्ण का स्मरण सदा करते रहना चाहिए।
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યશોદા તને કાનુડા પર ભરોસો નહી કે નહી કે


યશોદા તને કાનુડા પર ભરોસો નહી કે
નહી કે
યશોદાનો લાલ કેવો નટખટ
નટખટ
નટખટ માખણ ખાય કેવુ ફટફટ
ફટફટ
માખણની મટકી કેવી ગોલ ગોલ
ગોલ ગોલ
યશોદા તુ કાન્હા સાથે મીઠુ બોલ
મીઠુ બોલ
યશોદા તને કાનુડા પર ભરોસો નહી કે
નહી કે
યશોદાનો લાલ વગાડે વાંસળી
વાંસળી
વાંસળીની ધુન સાંભળી ગોપીઓ જાય હાંફળી
હાંફળી
એમા કાનુડાનો નથી કોઈ રોલ રોલ
રોલ રોલ
યશોદા તુ કાનુડા સાથે મીઠુ બોલ
મીઠુ બોલ
યશોદા તમને ગોપાલ પર ભરોસો નહી
નહી કે
કાનુડાની ફરિયાદથી યશોદા જાય થાકી
થાકી
કાનુડાની મસ્તીમાં નથી રહ્યુ કશુ બાકી
બાકી
કાનુડાની મસ્તીનો નથી કોઈ મોલ મોલ
મોલ મોલ
યશોદા તુ કાનુડા સાથે મીઠુ બોલ
મીઠુ બોલ
કાનુડા તને માખણથી ફુરસદ નથી કે
નથી કે
નથી કે .. નથી કે.. નથી કે..
નંદ ઘેર આનંદ ભયો જય કનૈયા લાલ કી
જય કનૈયા લાલ કી હાથી ઘોડા પાલકી

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इस बार जन्माष्टमी को लेकर लोगों में शंका हो रही है कि जन्माष्टमी 14 को मनाई जाए या 15 को – 2017


इस बार जन्माष्टमी को लेकर लोगों में शंका हो रही है कि जन्माष्टमी 14 को मनाई जाए या 15 को तो मैं कुछ शास्त्र प्रमाणों के साथ बताने की कोशिश करता हूँ जिस से कि आप का भ्रम दूर हो जाए

अग्नि पुराण में लिखा है कि

वर्जनीया प्रयत्नेन सप्तमीसंयुताष्टमी|

विना ऋक्षेण कर्तव्या नवमी संयुताष्टमी|

 

अथवा जिस दिन सप्तमी में सूर्योदय हो कर रात को अष्टमी आ रही हो उस दिन भले ही रोहिणी नक्षत्र हो पर उस दिन व्रत नहीं करना चाहिए दूसरे दिन नवमी युक्त अष्टमी को ही व्रत करना चाहिए |

 

पद्म पुराण में लिखा है कि

 

पुत्रान् हन्ति पशून् हन्ति हन्ति राष्ट्रं सराजकम् |

हन्ति जातानजातांश्च सप्तमीसहिताष्टमी |

 

अष्टमी यदि सप्तमी विद्धा हो  और उस में व्रत उपवास करे तो पुत्र पशु राज्य राष्ट्र जात अजात सब को नष्ट कर देती है |

 

स्कन्द पुराण में लिखा है कि

 

पलवेधेपि विप्रेन्द्र सप्तम्यामष्टमीं त्यजेत् |

सुरया बिन्दुना स्पृष्टं गंगांभः कलशं यथा |

 

जिस प्रकार गंगाजल से भरा हुआ कलश एक बूंद मदिरा से दूषित हो जाता है उसी प्रकार लेश मात्र भी सप्तमी हो तो वह अष्टमी व्रत उपवास के लिए दूषित हो जाती है |

इस बार 14 तारीख को पूरे दिन सप्तमी है वैसे भी सभी शास्त्रों की मान्यता है कि तिथि वही सफल होती है जो सूर्योदयी होती है ऐसे शास्त्रों के सैकड़ों प्रमाण हैं जो यहाँ उद्धृत करना संभव नहीं है इसलिए शुद्ध और शास्त्र संमत जन्माष्टमी 15 तारीख मंगलवार को ही है व्रत उपवास अनुष्ठान पूजा आप इसी दिन करें |

 

भगवान बालकृष्ण गोपाल जी आप की मनोकामना पूरी करें |

जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ

🙏🙏 पं.  प्रदीप तिवारी 🙏🙏

🙏श्री सनातन धर्म मन्दिर डी ब्लॉक जनकपुरी नई दिल्ली🙏

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कृष्ण उठत कृष्ण चलत कृष्ण शाम भोर है,


कृष्ण उठत कृष्ण चलत कृष्ण शाम भोर है,

कृष्ण बुद्धि कृष्ण चित्त कृष्ण मन विभोर है।

कृष्ण रात्रि कृष्ण दिवस कृष्ण स्वप्न शयन है,

कृष्ण काल कृष्ण कला कृष्ण मास अयन है।

कृष्ण शब्द कृष्ण अर्थ कृष्ण ही परमार्थ है,

कृष्ण कर्म कृष्ण भाग्य कृष्णहि पुरुषार्थ है।

कृष्ण स्नेह कृष्ण राग कृष्णहि अनुराग है,

कृष्ण कली कृष्ण कुसुम कृष्ण ही पराग है।

कृष्ण भोग कृष्ण त्याग कृष्ण तत्व ज्ञान है,

कृष्ण भक्ति कृष्ण प्रेम कृष्णहि विज्ञान है।

कृष्ण स्वर्ग कृष्ण मोक्ष कृष्ण परम साध्य है,

कृष्ण जीव कृष्ण ब्रह्म कृष्णहि आराध्य है।

आपको और आपके परिवार को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ ।

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श्रीकृष्ण की व्रज में आनन्द बांटने की बाललीला


श्रीकृष्ण की व्रज में आनन्द बांटने की बाललीला…………. कृष्णावतार आनन्द अवतार है। भगवान श्रीकृष्ण व्रज के सुख की टोकरी सिर पर लेकर ढोते हैं और व्रज की गलियों में कहते फिरते हैं–आनंद लो आनंद एक दिन नंद के दुलारे श्रीकृष्ण प्रात:काल जल्दी उठकर अपनी बालसुलभ क्रीड़ाओं से यशोदामाता को बहुत खिझाने लगे। यशोदामाता ने कई बार समझाया–कन्हैया उत्पात मत कर। आज मुझे बहुत काम है पर कन्हैया ने एक नहीं सुनी। खीजकर मैया ने उन्हें घर से बाहर सखाओं के साथ जाकर खेलने को कह दिया। श्रीकृष्ण तो मानो इसी ताक में थे। आज उन्हें अपनी बाललीला में कुछ नवीन रंग भरने थे। वात्सल्य-प्रेम में आकण्ठ डूबी हुई किसी गोपी को अपनी बाललीला के द्वारा कृतार्थ करना था। इसलिए वे मैया से डरने का बहाना करके यमुनातट की ओर भाग चले। श्रीकृष्ण का मनोहारी स्वरूप छोटे से कृष्ण हैं, पीली धोती धारण किये, उसके ऊपर लाल-हरा कछोटा बांधे, कन्धे तक घुँघराले केश मुख पर लहराते हुए, मस्तक पर गोरोचन का तिलक लगाये, कमनीय कण्ठ में कठुला पहने, हृदय पर बघनखा आदि टोना-निवारक वस्तुओं से निर्मित माला पहने, पांव में नुपुर पहने हुए हैं। इधर-उधर घूमने के बाद उन्हें भूख सताने लगी तो वह एक गोपी के पास जाकर खड़े हो गये। गोपी उनकी वेशभूषा, मन्द-मन्द कटीली मुस्कान, प्रेम भरी चितवन, भौंहों की मटकन आदि को देखकर मन-ही-मन उन पर रीझ गयी और कन्हैया से बोली–क्या चाहिए? कन्हैया गोपी से थोड़ा माखन-छाछ देने का अनुरोध करने लगे; परन्तु गोपी ने कन्हैया से कहा– ’बिना मूल्य दिये कहीं भी कुछ नहीं मिलता। गोपी के इस स्वार्थभरे उत्तर को सुनकर कन्हैया ने कहा– श्रीकृष्ण ने माखन के लिए उठाये गोपियों के गोमय (गोबर) के टोकरे गोपी को कन्हैया पर जरा भी दया नहीं आयी और उसने कहा–कन्हैया ! कोई बात नहीं है। तू यदि मेरे माखन का मूल्य नहीं दे सकता तो न सही, तू मेरा कुछ काम कर दे। माखन बनाने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ता है? देख कन्हैया ! ब्राह्ममुहुर्त में जगकर हम दधिमंथन करती हैं, दिन-रात गौओं की सेवा करती हैं– गौओं को चारा आदि देना, उन्हें स्नान कराना, गोष्ठ की झाड़ू-बुहारी लगाना, गोबर (गोमय) को खाँच (टोकरी) में भर-भर कर पुष्पवाटिका में डालना, यमुनाजी से जल भरकर लाना और ऊपर से घर के सारे काम भी हम ही करते हैं। हम सभी गोपियां तेरी मैया के समान ‘व्रजरानी’ तो हैं नहीं कि हमारे सब काम दास-दासियां कर दें। अत: कन्हैया ! तू यदि सचमुच मेरा ताजा माखन अरोगना चाहता है तो गोष्ठ में चलकर मेरा थोड़ा-सा काम कर दे। काम यह है कि मैं गोष्ठ की सफाई करके जब गोबर की टोकरियां भर-भर कर उन्हें बाहर ले आऊँ, तब तुम प्रत्येक बार सहारा देकर मेरे सिर पर खाँच रखवाते जाना। इसके बदले में मैं तुम्हें उतने ही माखन के लौंदे (गोले) दूँगी जितनी बार तुम टोकरी उठवाओगे कन्हैया ने गोपी की बात मान ली। पर कितनी टोकरी उठाई हैं–इस संख्या का पता कैसे चले क्योंकि दोनों को ही गिनती नहीं आती है। गोपी बहुत चालाक है, उसने कन्हैया को एक उपाय सुझाया– ‘तू जितनी बार मेरे सिर पर गोमय (गोबर) की टोकरी रखवाने में सहायता करेगा, मैं उतनी बार तेरे कपोलों पर गोबर की रेखाएं बनाती जाऊँगी। काम खत्म हो जाने पर हम किसी पढ़े-लिखे सयाने व्यक्ति से वे रेखाएं गिनवा लेंगे और उतने ही माखन के लोंदे मैं तुझे दे दूंगी। बोलो, स्वीकार है यह प्रस्ताव।’ श्रीकृष्ण ने गोपियों के मन की अभिलाषा पूरी की कन्हैया क्या करते? जो गोपी अनेक जन्मों से अपने हृदय के जिन भावों को श्रीकृष्ण को अर्पण करने की प्रतीक्षा कर रही है, उसकी उपेक्षा वह कैसे करें? इन्हीं गोपियों की अभिलाषाओं को पूरा करने के लिए ही तो निर्गुण-निराकार परम-ब्रह्म ने सगुण-साकार लीलापुरुषोत्तमरूप धारण किया है। दिन भर के भूखे-प्यासे श्यामसुन्दर गोपी के साथ उसकी गौशाला में जाकर गोमय की टोकरियां उठवाने लगे। एक हाथ से अपनी खिसकती हुई काछनी को सम्हालते और दूसरे हाथ से गोमय की खाँच गोपी के सिर पर रखवाते। ऐसा करते हुए कन्हैया का कमल के समान कोमल मुख लाल हो गया। चार-पांच टोकरियां उठवाने के बाद कन्हैया बोले–गोपी, तेरा कोई भरोसा नहीं है। तू बाद में धोखा दे सकती है, इसलिए गिनती करती जा। और उस निष्ठुर गोपी ने कन्हैया के लाल-लाल मुख पर गोमय की हरी-पीली आड़ी रेखाएं बना दीं। अब तो गोपी अपनी सुध-बुध भूल गयी और कन्हैया के सारे मुख-मण्डल पर गोमय के प्रेम-भरे चित्र अंकित हो गये–’गोमय-मण्डित-भाल-कपोलम्।’ जब गोपी को होश आया तब वह बोली कि मुझे इतना गोबर तो चाहिए नहीं था, मैं क्यों इतनी टोकरियां भर-भर कर ले गयी।? कन्हैया ने कहा–बहाना मत बना, गिनती के अनुसार गिन-गिन कर माखन के लोंदे ला। गोपी बोली–कन्हैया, ऐसे माखन नहीं मिलता। कन्हैया ने पूछा–फिर कैसे मिलेगा? गोपी ने कहा–पहले नाचो तब मिलेगा। छछिया भर छाछ पर नाच दिखावे अब कन्हैया एक हाथ अपनी कमर पर और दूसरा हाथ अपने सिर पर रखकर ‘ता-ता थेई, ता-ता थेई’ नाच रहे हैं। ब्राह्मणों द्वारा किये गये यज्ञ-आवाहन आदि कर्मकाण्ड भी जिन्हें अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाते वही प्रेमरससिन्धु भगवान श्रीकृष्ण व्रज में तनिक से माखन के लिए कभी नृत्य करते हैं तो कभी याचक बनने में भी संकोच नहीं करते हैं। व्रजमण्डल के आकाश में स्थित देवतागण गोपी और श्रीकृष्ण की इस झांकी को देखकर पुष्पवर्षा करते हैं। प्रेम की झिड़कियाँ भी मीठी होती हैं–मार भी मीठी लगती है। शेष, महेश, गणेश, सुरेश इस मजे को क्या जानें–सुस्वादु रस का यह जायका उनके भाग्य में कहाँ? वे जिस परब्रह्म की अपार महिमा का पार पाने के लिए दिन-रात नाक रगड़ते रहते हैं, वही सलोना श्यामसुन्दर व्रजमण्डल के प्रेमसाम्राज्य में छाछ की ओट से इसी रस के पीछे अहीर की छोकरियों (गोपियों) के इशारों पर तरह-तरह के नाच नाचता-फिरता है– श्रीमद्भागवत में कहा गया है– ’प्यारे कृष्ण ! आपकी एक-एक लीला मनुष्यों के लिए परम मंगलमयी और कानों के लिए अमृतस्वरूप हैं। जिसे एक बार उस रस का चस्का लग जाता है, उसके मन में फिर किसी दूसरी वस्तु के लिए लालसा ही नहीं रह जाती।’ जय हो मेरे प्यारे श्यामजू

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10 Krishna Temples in India you should visit at least once in your life by Drishith Varma


10 Krishna Temples in India you should visit at least once in your life
by Drishith Varma

Some people believe that Krishna is the avatar of Vishnu, and some believe that Vishnu is an avatar of Krishna. However, one cannot deny that Krishna is the central figure in the Hindu Bhagavad Gita. Since he is such an important and powerful figure in Hindu dharma, there are many temples built to his name. Here is a list of 10 Krishna Temples in India You Should Visit

1. Banke Bihari Temple, Vrindavan

Situated at the holy city of Vrindavan, Banke Bihari temple is dedicated to Lord Krishna and is one of the seven temples of Thakur of Vrindavan. It is considered to be one of the holiest temples of Krishna in India too, and it attracts thousands of visitors every year.

2. Dwarkadish Temple, Dwaraka

It is also known as Jagat Mandir and is one of the four main pilgrimages of India. The temple is also one of the places during the Char Dham Yatra.

3. Krishna Balaram Mandir, Vrindavan source
Krishna Balaram was included in ISKCON temples of India and is the first one in the list. Thus, it is also known as ISKCON temple of Vrindavan. (ISKCON stands for International Society for Krishna Consciousness and known as Hare Krishna movement.)

4. Jugal Kishore Temple, Mathura

Also known as Keshi Ghat temple, Jugal Kishore Temple is one of the oldest temple built with Red sandstone. It is one of the famous Krishna temples in India that draws Hindu devotees throughout the year.

5. Guruvayur Temple, Kerala Photo by sreedas somasekharan
The temple is known as the “Holy Abode of Vishnu on Earth”, and thus, is one of the most important places of worship for god Krishna in Kerala. It is also known as Dwarka of South India. Only Hindus are allowed in this temple.

6. Sri Krishna Temple, Udupi Photo by Astro Mohan
It is known as Udupi Sri Krishna Matha and is located in the city of Udupi. The temple is amongst the eight Udupi mathas.

7. Govind Dev Ji Temple, Jaipur source
Located in the City Palace complex in Jaipur, the Govind Dev Temple is amongst the seven temples of Thakur of Vrindavan too, like Banke Bihari temple. The temple is dedicated to Krishna in the form of Govind Dev Ji; hence, the name too.

8. Shrinathji Temple, Nathdwara, Udaipur

Lying on the banks of Banas river, the Shrinathji Temple in Udaipur in dedicated to Lord Krishna. The town where the temple lies is known as the Apollo of Mewar and the Nathdwara is a Vaishnavite shrine.

9. Rajagopalaswamy Temple, Tamil Nadu Southern entrance Rajagopalaswamy Temple. Photo by Wanderlust India
Also known as Dakshina Dwarka, the Rajagopalaswamy temple in Mannargudi is an important shrine in South India. The temple surrounding is enormous with an area of 23 acres in the town of Mannargudi of Tamil Nadu.

10. Venugopala Swamy Temple, Karnataka Photo by Manjunatha Narasimhaiah on
Built in Hoysala style, Venugopala Swamy temple is located near Krishna Raja Sagara backwater. The temple was once submerged in the backwater of Krishna Raja Sagara. However, it has been shifted to a new location now.