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कृष्ण की राधा का ये रहस्य, बहुत कम लोगों को पता है
राधा का नाम भगवान श्रीकृष्ण से अलग नहीं किया जा सकता है। इसलिए कहते हैं जहां राधा नहीं है वहां कृष्ण हो नहीं सकते, लेेकिन भगवान कृष्ण से संबंधित प्राचीन प्रमाणिक साहित्य में राधा का नाम ही नहीं है। महाभारत और श्रीमद् भागवत जो कि श्रीकृष्ण भक्ति के आधार ग्रंथ माने गए हैं में राधा नहीं है।
भागवत में श्रीकृष्ण की गोपियों के नामों मे एक नाम अनुराधा जरूर आता है, लेकिन राधा यहां भी गायब है। विद्वानों की मन्यता है राधा का नाम कृष्ण से जयदेव के गीत गोविंद की रचना के बाद जुड़ा और फिर अभिन्न हो गया।यह भी बताया जाता है कि कृष्ण के जीवन में राधा थी ही नहीं। वही गीत गोविंद के बाद ही चर्चा में आई और देखते ही देखते प्रथम पूज्य हो गई।
राधा का नामकरण सांख्य दर्शन के आधार पर हुआ, माना जाता है। जिसका अर्थ धारा से लिया गया है। जल की धारा वह होती है। जो मूल पात्र से अलग हो जाती है। भगवान के मूल तत्व से अलग लोग धारा है और जो मूल की ओर लौट जाएं वे राधा हो जाते हैं। इस अर्थ में राधा वह है जो अपनी यात्रा भगवान की ओर करती है। इस अर्थ में राधा भगवान के उतना ही निकट है जितनी की अभिन्न भक्तों की दृष्टि और भाव में है।
जय श्री राधेकृष्ण …

संजय गुप्ता

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बहुतसुन्दरप्रसंग
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जब भगवान श्री कृष्ण ने सुदामा जी को तीनों लोकों का स्वामी बना दिया तो सुदामा जी की संपत्ति देखकर यमराज से रहा न गया !

यम भगवान को नियम कानूनों का पाठ पढ़ाने के लिए अपने बहीखाते लेकर द्वारिका पहुंच गये !

भगवान से कहने लगे कि – अपराध क्षमा करें भगवन लेकिन सत्य तो ये है कि यमपुरी में शायद अब मेरी कोई आवश्यकता नही रह गयी है इसलिए में पृथ्वी लोक के प्राणियों के कर्मों का बहीखाता आपको सौंपने आया हूँ !

इस प्रकार यमराज ने सारे बहीखाते भगवान के सामने रख दिये भगवान मुस्कुराए बोले – यमराज जी आखिर ऐसी क्या बात है जो इतना चिंतित लग रहे हो ?

यमराज कहने लगे – प्रभु आपके क्षमा कर देने से अनेक पापी एक तो यमपुरी आते ही नही है वे सीधे ही आपके धाम को चले जाते हैं और फिर आपने अभी अभी सुदामा जी को तीनों लोक दान दे दिए हैं । सो अब हम कहाँ जाएं ?

यमराज भगवान से कहने लगे – प्रभु ! सुदामा जी के प्रारब्ध में तो जीवन भर दरिद्रता ही लिखी हुई थी लेकिन आपने उन्हें तीनों लोकों की संपत्ति देकर विधि के बनाये हुए विधान को ही बदलकर रख दिया है !

अब कर्मों की प्रधानता तो लगभग समाप्त ही हो गयी है !

भगवान बोले – यम तुमने कैसे जाना कि सुदामा के भाग्य में आजीवन दरिद्रता का योग है ?

यमराज ने अपना बही खाता खोला तो सुदामा जी के भाग्य वाले स्थान पर देखा तो चकित रह गए देखते हैं कि जहां श्रीक्षय’ सम्पत्ति का क्षय लिखा हुआ था !

वहां स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने उन्ही अक्षरों को उलटकर ‘उनके स्थान पर यक्षश्री’ लिख दिया अर्थात कुबेर की संपत्ति !

भगवान बोले – यमराज जी ! शायद आपकी जानकारी पूरी नही है क्या आप जानते हैं कि सुदामा ने मुझे अपना सर्वस्व अपर्ण कर दिया था ! मैने तो सुदामा के केवल उसी उपकार का प्रतिफल उसे दिया है !

यमराज बोले – भगवन ऐसी कौनसी सम्पत्ति सुदामा ने आपको अर्पण कर दी उसके पास तो कुछ भी नही !

भगवान बोले – सुदामा ने अपनी कुल पूंजी के रूप में बड़े ही प्रेम से मुझे चावल अर्पण किये थे जो मैंने और देवी लक्ष्मी बड़े प्रेम से खाये थे !

जो मुझे प्रेम से कुछ खिलाता है उसे सम्पूर्ण विश्व को भोजन कराने जितना पुण्य प्राप्त होता है.बस उसी का प्रतिफल सुदामा को मैंने दिया है !

ऐसे दयालु हैं हमारे प्रभु श्रीकृष्ण भगवान जिन्होंने न केवल सुदामा जी पर कृपा की बल्कि द्रौपदी की बटलोई से बचे हुए साग के पत्ते को भी बड़े चाव से खाकर दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्यों सहित सम्पूर्ण विश्व को तृप्त कर दिया था ओर पांडवो को श्राप से बचाया था !!

        ।। जय जय श्रीराधे ।।

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भगवान कृष्ण क्यों बने थे अर्जुन के सारथी?????

पीतांबरधारी चक्रधर भगवान कृष्ण महाभारत युद्ध में सारथी की भूमिका में थे। उन्होंने अपनी यह भूमिका स्वयं चयन की थी। अपने सुदर्शन चक्र से समस्त सृष्टि को क्षण भर में मुट्ठी भर राख बनाकर उड़ा देने वाले या फिर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता भगवान कृष्ण महाभारत में अपने प्रिय सखा धनुर्धारी अर्जुन के सारथी बने थे। इस बात से अर्जुन को बड़ा ही अटपटा लग रहा था कि उसके प्रिय सखा कृष्ण रथ को हांकेंगे।

सारथी की भूमिका ही नहीं, बल्कि महाभारत रूपी महायुद्ध की पटकथा भी उन्हीं के द्वारा लिखी गई थी और युद्ध से पूर्व ही अधर्म का अंत एवं धर्म की विजय वह सुनिश्चित कर चुके थे। उसके बाद भी उनका सारथी की भूमिका को चुनना अर्जुन को असहज कर देने वाला था।

भगवान कृष्ण सारथी के संपूर्ण कर्म कर रहे थे। एक सारथी की तरह वह सर्वप्रथम पांडुपुत्र अर्जुन को रथ में सम्मान के साथ चढ़ाने के साथ फिर आरूढ़ होते थे और अर्जुन के आदेश की प्रतीक्षा करते थे। हालांकि अर्जुन उन्हीं के आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन के अनुरूप चलते थे, परंतु भगवान कृष्ण अपने इस अभिनय का संपूर्ण समर्पण के साथ निर्वहन करते थे।

युद्ध के अंत में वह पहले अर्जुन को उतार कर ही उतरते थे। भगवान कृष्ण अर्जुन से युद्ध के पूर्व बोले थे, ‘‘हे परंतप अर्जुन! युद्ध की विजय सुनिश्चित करने के लिए भगवती दुर्गा से आशीष लेना उपयुक्त एवं उचित रहेगा। भगवती दुर्गा के आशीर्वाद के पश्चात ही युद्ध प्रारंभ करना चाहिए।’’

सारथी के रूप में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को एक और सलाह दी थी, ‘‘हे धनुर्धारी अर्जुन! मेरे प्रिय हनुमान का आह्वान करो। वह महावीर हैं, अजेय हैं और धर्म के प्रतीक हैं। उन्हें अपने रथ की ध्वजा पर आरूढ़ होने के लिए उनका आह्वान करो।’’

अर्जुन ने यही किया था। सारथी की भूमिका में ही भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाओं ने बीच परम रहस्यमयी गीता का गान किया था।’’

भगवान कृष्ण ने सारथी के रूप में अर्जुन के पराक्रम को निखारा ही नहीं, कठिन से कठिनतम क्षणों में उनको सुरक्षित एवं संरक्षित कर अपनी भूमिका को सार्थक किया था। इसलिए तो भीष्म पितामह, अर्जुन को आशीर्वाद देकर बोले, ‘‘हे प्रिय अर्जुन! जिसके सारथी स्वयं भगवान कृष्ण हों, उसे कैसी चिंता! तुम्हारी विजय सुनिश्चित है। तुम ही विजयी होगे-विजयीभव।’’

सारथी भगवान कृष्ण ने अर्जुन को धर्म का पाठ तब पढ़ाया जब महादानी सूर्यपुत्र कर्ण के रथ के पहिए धरती में धंस गए थे और तब कर्ण, अर्जुन को धर्म एवं नीति का पाठ पढ़ा रहा था। उस समय भगवान कृष्ण अर्जुन से बोले, ‘‘हे पार्थ! कर्ण किस मुंह से धर्म की बात कर रहा है। द्रौपदी के चीरहरण के समय, अभिमन्यु के वध के समय, भीम को विष देते समय, लाक्षागृह को जलाने के समय उसका धर्म कहां चला गया था? यही क्षण है कर्ण को समाप्त करने का।’’

भगवान कृष्ण के मार्गदर्शन से ही कर्ण का अंत संभव हो सका। सारथी के रूप में ही भगवान कृष्ण ने अर्जुन से जयद्रथ का वध करने के लिए व्यूह रचना की थी और अर्जुन जयद्रथ का वध कर सके थे।

भगवान कृष्ण ने सारथी की भूमिका का इस खूबी से निर्वाह किया था कि अर्जुन को लग रहा था यदि कान्हा के हाथों में घोड़ों की लगाम न होती तो पता नहीं मेरा क्या होता? यहां भगवान के दृश्य हाथों में घोड़ों की लगाम थी और अदृश्य हाथों में महाभारत के महायुद्ध की समग्र डोर। महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था। कुरुक्षेत्र में भगवान कृष्ण रथ पर बैठे थे। भगवान कृष्ण के अधरों पर एक निश्छल मुस्कान सदा की तरह बिखरी हुई थी जो आज कुछ और भी गहरी हो गई थी। आज उनके हाव-भाव एवं व्यवहार में कुछ परिवर्तन था।

भगवान कृष्ण सदा की तरह रथ से अर्जुन से पहले नहीं उतरे और अर्जुन से बोले, ‘‘पार्थ! आज तुम रथ से पहले उतर जाओ। तुम उतर जाओगे तब मैं उतरता हूं।’’ यह सुनकर अर्जुन को कुछ अटपटा-सा लगा। कान्हा तो बड़े आदर से अर्जुन को रथ से उतारने के बाद उतरते थे, पर आज यह क्या हुआ?

भगवान कृष्ण, अर्जुन के रथ से उतरने के पश्चात कुछ देर मौन रहे, फिर वह धीरे से उतरे और अर्जुन के कंधे पर हाथ रखकर उन्हें रथ से दूर ले गए। उसके पश्चात जो घटा वह उन सर्वज्ञ भगवान कृष्ण के लिए तो परिचित था, परंतु अर्जुन के लिए विस्मयकारी, अकल्पनीय एवं आश्चर्यजनक था। अनायास ही रथ से अग्रि की लपटें निकलने लगीं और वह एक भयंकर विस्फोट करते हुए जलकर खाक हो गया।

अर्जुन देख रहे थे जो रथ इतने अजेय महारथियों के अंत की कहानी का प्रत्यक्षदर्शी था, आज वह पल भर में नष्ट हो गया। अर्जुन देख रहे थे उस रथ से जुड़े अतीत को, इसी रथ से पूज्य पितामह की देह को अस्त्रों से बींध दिया था। इसी रथ से अनगिनत महारथियों का वध किया था। इसी रथ पर बैठकर उनके प्रिय सखा ने उन्हें गीता का उपदेश दिया था। आज वह राख की ढेरी बन चुका था।

इस घटना से हतप्रभ अर्जुन ने भगवान कृष्ण से कहा, ‘‘हे कान्हा! आपके उतरते ही यह रथ पल भर में भस्मीभूत हो गया। ऐसे कैसे हो गया? इसके पीछे क्या रहस्य है?’’

भगवान कृष्ण बोले, ‘‘हे पार्थ! यह रथ तो बहुत पहले ही नष्ट हो चुका था, इस रथ की आयु तभी समाप्त हो गई थी जब पितामह भीष्म ने इस पर अपने दिव्या का प्रहार किया था। इस रथ में इतनी क्षमता नहीं थी कि भीष्म पितामाह के अचूक दिव्यास्त्रों को झेल सके। इसके पश्चात इसकी आयु फिर क्षीण हुई, जब इस पर द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महारथियों के भीषण दिव्यास्त्रों का पुन:-पुन: प्रहार होता रहा। यह रथ अपनी मृत्यु का वरण तो कब का कर चुका था।’’

अर्जुन, आश्चर्यमिश्रित भाव से बोले, ‘‘हे कान्हा! यह रथ इतने पहले मृत्यु का वरण कर चुका था, तो फिर यह इतने समय तक चला कैसे? कैसे इतने दिनों तक आपके हाथों सकुशल कार्य करता रहा।’’

भगवान कृष्ण बोले, ‘‘यह सत्य है कि इस दिव्य रथ की आयु पहले ही समाप्त हो चुकी थी, परंतु यह रथ मेरे संकल्प से चल रहा था। इसकी आयु की समाप्ति के पश्चात भी इसकी जरूरत थी, इसलिए यह चला। धर्म की स्थापना में इसका महत्ती योगदान था, अत: संकल्पबल से इसे इतने समय तक खींच लिया गया।’’

भगवान कृष्ण आगे बोले, ‘‘धनंजय! भगवान का संकल्प अटूट, अटल और अखंड होता है। यह संकल्प संपूर्ण सृष्टि में जहां कहीं भी लग जाता है, वहां अपना प्रभाव दिखाता है और यह प्रभाव संदेह से परे अवश्य ही पूर्ण परिणाम देने वाला होता है जैसे ही संकल्प पूर्ण होता है, संकल्प की शक्ति वापस भगवान के पास चली जाती है और उसका समय एवं प्रभाव समाप्त हो जाता है। ठीक इसी तरह इस रथ पर मेरा संकल्प-बल कार्य कर रहा था और उसके समाप्त होते ही जो हुआ, वह तुमने देखा।’’

भगवान कृष्ण आगे बोले, ‘‘इसीलिए हे अर्जुन! हम सबको भगवान के हाथों यंत्र बनकर अपना कार्य करना चाहिए। यंत्र का कार्य होता है-यंत्री के हाथों में अपना सर्वस्व समर्पण कर देना और उसके आदेशों का पालन करना। इससे कर्तापन का अहंकार समाप्त हो जाता है और जीवन का विकास होता है जिसका जितना योगदान है, उतना ही करना चाहिए और शेष यंत्री के हाथों में छोड़ देना चाहिए। यही जीवन के विकास का रहस्य है।
चलो! अपने शिविर की ओर चलें।’’ भगवान कृष्ण और अर्जुन पैदल ही शिविर की ओर बढ़ गए।

संजय गुप्ता

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कृष्ण रूक्मिणी प्रेम विवाह कथा।।

जिस कथा को रोज द्वारका नाथ को सोते समय सुनाई जाती है

द्वारका रहते हुए भगवान श्रीकृष्ण और बलराम का नाम चारों ओर फैल गया। बड़े-बड़े नृपति और सत्ताधिकारी भी उनके सामने मस्तक झुकाने लगे। उनके गुणों का गान करने लगे। बलराम के बल-वैभव और उनकी ख्याति पर मुग्ध होकर रैवत नामक राजा ने अपनी पुत्री रेवती का विवाह उनके साथ कर दिया। बलराम अवस्था में श्रीकृष्ण से बड़े थे। अतः नियमानुसार सर्वप्रथम उन्हीं का विवाह हुआ।

कृष्ण और रुक्मिणी का विवाह

कृष्ण प्रेम
उन दिनों विदर्भ देश में भीष्मक नामक एक परम तेजस्वी और सद्गुणी नृपति राज्य करते थे। कुण्डिनपुर उनकी राजधानी थी। उनके पांच पुत्र और एक पुत्री थी। उसके शरीर में लक्ष्मी के शरीर के समान ही लक्षण थे। अतः लोग उसे ‘लक्ष्मीस्वरूपा’ कहा करते थे। रुक्मिणी जब विवाह योग्य हो गई तो भीष्मक को उसके विवाह की चिंता हुई। रुक्मिणी के पास जो लोग आते-जाते थे, वे श्रीकृष्ण की प्रशंसा किया करते थे। वे रुक्मिणी से कहा करते थे, श्रीकृष्ण अलौकिक पुरुष हैं। इस समय संपूर्ण विश्व में उनके सदृश अन्य कोई पुरुष नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण के गुणों और उनकी सुंदरता पर मुग्ध होकर रुक्मिणि ने मन ही मन निश्चय किया कि वह श्रीकृष्ण को छोड़कर किसी को भी पति रूप में वरण नहीं करेगी।

रुक्मी का द्वेष

उधर भगवान श्रीकृष्ण को भी इस बात का पता हो चुका था कि विदर्भ नरेश भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी परम रूपवती तो है ही, परम सुलक्षणा भी है। भीष्मक का बड़ा पुत्र रुक्मी भगवान श्रीकृष्ण से शत्रुता रखता था। वह बहन रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था, क्योंकि शिशुपाल भी श्रीकृष्ण से द्वेष रखता था। भीष्मक ने अपने बड़े पुत्र की इच्छानुसार रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल के साथ ही करने का निश्चय किया। उसने शिशुपाल के पास संदेश भेजकर विवाह की तिथि भी निश्चित कर दी।

कृष्ण को संदेश

रुक्मिणी को जब इस बात का पता लगा कि उसका विवाह शिशुपाल के साथ निश्चित हुआ है तो वह बड़ी दु:खी हुई। उसने अपना निश्चय प्रकट करने के लिए एक ब्राह्मण को द्वारका कृष्ण के पास भेजा।

रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण के पास जो संदेश भेजा था, वह इस प्रकार था

” हे नंद-नंदन! आपको ही पति रूप में वरण किया है। मै आपको छोड़कर किसी अन्य पुरुष के साथ विवाह नहीं कर सकती। मेरे पिता मेरी इच्छा के विरुद्ध मेरा विवाह शिशुपाल के साथ करना चाहते हैं। विवाह की तिथि भी निश्चित हो गई। मेरे कुल की रीति है कि विवाह के पूर्व होने वाली वधु को नगर के बाहर गिरिजा का दर्शन करने के लिए जाना पड़ता है। मैं भी विवाह के वस्त्रों में सज-धज कर दर्शन करने के लिए गिरिजा के मंदिर में जाऊंगी। मैं चाहती हूँ, आप गिरिजा मंदिर में पहुंचकर मुझे पत्नी रूप में स्वीकार करें। यदि आप नहीं पहुंचेंगे तो मैं आप अपने प्राणों का परित्याग कर दूँगी।”

रूक्मिणी का संदेश

रुक्मिणी का संदेश पाकर भगवान श्रीकृष्ण रथ पर सवार होकर शीघ्र ही कुण्डिनपुर की ओर चल दिए। उन्होंने रुक्मिणी के दूत ब्राह्मण को भी रथ पर बिठा लिया था। श्रीकृष्ण के चले जाने पर पूरी घटना बलराम के कानों में पड़ी। वे यह सोचकर चिंतित हो उठे कि श्रीकृष्ण अकेले ही कुण्डिनपुर गए हैं। अतः वे भी यादवों की सेना के साथ कुण्डिनपर के लिए चल पड़े।

शिशुपाल का बारात लेकर आना

उधर, भीष्मक ने पहले ही शिशुपाल के पास संदेश भेज दिया था। फलतः शिशुपाल निश्चित तिथि पर बहुत बड़ी बारात लेकर कुण्डिनपुर जा पहुँचा। बारात क्या थी, पूरी सेना थी। शिशुपाल की उस बारात में जरासंध, पौण्ड्रक, शाल्व और वक्रनेत्र आदि राजा भी अपनी-अपनी सेना के साथ थे। सभी राजा कृष्ण से शत्रुता रखते थे। विवाह का दिन था। सारा नगर बंदनवारों और तोरणों से सज्जित था। मंगल वाद्य बज रहे थे। मंगल गीत भी गाए जा रहे थे। पूरे नगर में बड़ी चहल-पहल थी। नगर-नगरवासियों को जब इस बात का पता चला कि श्रीकृष्ण और बलराम भी नगर में आए हुए हैं, तो वे बड़े प्रसन्न हुए। वे मन-ही मन सोचने लगे, कितना अच्छा होता यदि रुक्मिणी का विवाह श्रीकृष्ण के साथ होता, क्योंकि वे ही उसके लिए योग्य वर हैं।

    श्रीकृष्ण द्वारा रुक्मिणी का हरण

         ⭐ *कृष्ण द्वारा हरण*⭐

सन्ध्या के पश्चात का समय था। रुक्मिणी विवाह के वस्त्रों में सज-धजकर गिरिजा के मंदिर की ओर चल पड़ी। उसके साथ उसकी सहेलियाँ और बहुत-से अंगरक्षक भी थे। वह अत्यधिक उदास और चिंतित थी, क्योंकि जिस ब्राह्मण को उसने श्रीकृष्ण के पास भेजा था, वह अभी लौटकर उसके पास नहीं पहुँचा था। रुक्मिणी ने गिरिजा की पूजा करते हुए उनसे प्रार्थना की “हे मां। तुम सारे जगत की मां हो! मेरी अभिलाषा पूर्ण करो। मैं श्रीकृष्ण को छोड़कर किसी अन्य पुरुष के साथ विवाह नहीं करना चाहती।” रुक्मिणी जब मंदिर से बाहर निकली तो उसे वह ब्राह्मण दिखाई पड़ा। यद्यपि ब्राह्मण ने रुक्मिणी से कुछ कहा नहीं, किंतु ब्राह्मण को देखकर रुक्मिणी बहुत प्रसन्न हुई। उसे यह समझने में संशय नहीं रहा कि श्रीकृष्ण भगवान ने उसके समर्पण को स्वीकार कर लिया है। रुक्मिणी अपने रथ पर बैठना ही चाहती थी कि श्रीकृष्ण ने विद्युत तरंग की भांति पहुँचकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसे खींचकर अपने रथ पर बिठा लिया और तीव्र गति से द्वारका की ओर चल पड़े।

क्षण भर में ही संपूर्ण कुण्डिनपुर में ख़बर फैल गई कि श्रीकृष्ण रुक्मिणी का हरण करके उसे द्वारकापुरी ले गए। शिशुपाल के कानों में जब यह समाचार पहुँचा तो वह क्रुद्ध हो उठा। उसने अपने मित्र राजाओं और उनकी सेनाओं के साथ श्रीकृष्ण का पीछा किया, किंतु बीच में ही बलराम और यदुवंशियों ने शिशुपाल आदि को रोक लिया। भयंकर युद्ध हुआ। बलराम और यदुवंशियों ने बड़ी वीरता के साथ लड़कर शिशुपाल आदि की सेना को नष्ट कर दिया। फलतः शिशुपाल आदि निराश होकर कुण्डिनपुर से चले गए। रुक्मी यह सुनकर क्रोध से काँप उठा। उसने बहुत बड़ी सेना लेकर श्रीकृष्ण का पीछा किया। उसने प्रतिज्ञा की कि वह या तो श्रीकृष्ण को बंदी बनाकर लौटेगा या फिर कुण्डिनपुर में अपना मुंह नहीं दिखाएगा। रुक्मी और श्रीकृष्ण का घनघोर युद्ध हुआ। श्रीकृष्ण ने उसे युद्ध में हराकर अपने रथ से बांध दिया, किंतु बलराम ने उसे छुड़ा लिया। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा- “रुक्मी अब अपना संबंधी हो गया है। किसी संबंधी को इस तरह का दंड देना उचित नहीं है।” रुक्मी अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार पुनः लौटकर कुण्डिनपुर नहीं गया। वह एक नया नगर बसाकर वहीं रहने लगा। कहते हैं कि रुक्मी के वंशज आज भी उस नगर में रहते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी को द्वारका ले जाकर उनके साथ विधिवत विवाह किया। प्रद्युम्न उन्हीं के गर्भ से उत्पन्न हुए थे, जो कामदेव के अवतार थे। श्रीकृष्ण की पटरानियों में रुक्मिणी का महत्त्वपूर्ण स्थान था। उनके प्रेम और उनकी भक्ति पर भगवान श्रीकृष्ण मुग्ध थे। उनके प्रेम और उनकी कई कथाएं मिलती हैं, जो बड़ी प्रेरक हैं।

भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी की संतानों के नाम

महारानी रुक्मिणी की संतान

पुत्र : प्रद्युम्न ,चारुदेष्ण, सुदेष्ण , पराक्रमी ,चारुदेह , सुचारु
चारुगुप्त, भद्रचारु, चारुचन्द्र ,विचारु ,चारु..

पुत्री :चारुमती…

       कृष्ण रूकमणी जी

Dev Sharma

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कब क्यों और कैसे डूबी कृष्ण की नगरी द्वारिका!!!!!!!

महाभारत युद्ध के 36 वर्ष पश्चात समुद्र में डूब जाती है। द्वारिका के समुद्र में डूबने से पूर्व श्री कृष्ण सहित सारे यदुवंशी भी मारे जाते है। समस्त यदुवंशियों के मारे जाने और द्वारिका के समुद्र में विलीन होने के पीछे मुख्य रूप से दो घटनाएं जिम्मेदार है। एक माता गांधारी द्वारा श्री कृष्ण को दिया गया श्राप और दूसरा ऋषियों द्वारा श्री कृष्ण पुत्र सांब को दिया गया श्राप। आइए इस घटना पर विस्तार से जानते है।

गांधारी ने दिया था यदुवंश के नाश का श्राप –

महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब युधिष्ठर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने महाभारत युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया की जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है ठीक उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा।

ऋषियों ने दिया था सांब को श्राप –

महाभारत युद्ध के बाद जब छत्तीसवां वर्ष आरंभ हुआ तो तरह-तरह के अपशकुन होने लगे। एक दिन महर्षि विश्वामित्र, कण्व, देवर्षि नारद आदि द्वारका गए। वहां यादव कुल के कुछ नवयुवकों ने उनके साथ परिहास (मजाक) करने का सोचा। वे श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को स्त्री वेष में ऋषियों के पास ले गए और कहा कि ये स्त्री गर्भवती है। इसके गर्भ से क्या उत्पन्न होगा?

ऋषियों ने जब देखा कि ये युवक हमारा अपमान कर रहे हैं तो क्रोधित होकर उन्होंने श्राप दिया कि- श्रीकृष्ण का यह पुत्र वृष्णि और अंधकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए एक लोहे का मूसल उत्पन्न करेगा, जिसके द्वारा तुम जैसे क्रूर और क्रोधी लोग अपने समस्त कुल का संहार करोगे। उस मूसल के प्रभाव से केवल श्रीकृष्ण व बलराम ही बच पाएंगे। श्रीकृष्ण को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कहा कि ये बात अवश्य सत्य होगी।

नियों के श्राप के प्रभाव से दूसरे दिन ही सांब ने मूसल उत्पन्न किया। जब यह बात राजा उग्रसेन को पता चली तो उन्होंने उस मूसल को चुरा कर समुद्र में डलवा दिया। इसके बाद राजा उग्रसेन व श्रीकृष्ण ने नगर में घोषणा करवा दी कि आज से कोई भी वृष्णि व अंधकवंशी अपने घर में मदिरा तैयार नहीं करेगा। जो भी व्यक्ति छिपकर मदिरा तैयार करेगा, उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। घोषणा सुनकर द्वारकावासियों ने मदिरा नहीं बनाने का निश्चय किया।द्वारका में होने लगे थे भयंकर अपशकुन

इसके बाद द्वारका में भयंकर अपशकुन होने लगे। प्रतिदिन आंधी चलने लगी। चूहे इतने बढ़ गए कि मार्गों पर मनुष्यों से ज्यादा दिखाई देने लगे। वे रात में सोए हुए मनुष्यों के बाल और नाखून कुतरकर खा जाया करते थे। सारस उल्लुओं की और बकरे गीदड़ों की आवाज निकालने लगे। गायों के पेट से गधे, कुत्तियों से बिलाव और नेवलियों के गर्भ से चूहे पैदा होने लगे। उस समय यदुवंशियों को पाप करते शर्म नहीं आती थी।

अंधकवंशियों के हाथों मारे गए थे प्रद्युम्न –

जब श्रीकृष्ण ने नगर में होते इन अपशकुनों को देखा तो उन्होंने सोचा कि कौरवों की माता गांधारी का श्राप सत्य होने का समय आ गया है। इन अपशकुनों को देखकर तथा पक्ष के तेरहवें दिन अमावस्या का संयोग जानकर श्रीकृष्ण काल की अवस्था पर विचार करने लगे। उन्होंने देखा कि इस समय वैसा ही योग बन रहा है जैसा महाभारत के युद्ध के समय बना था। गांधारी के श्राप को सत्य करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण ने यदुवंशियों को तीर्थयात्रा करने की आज्ञा दी। श्रीकृष्ण की आज्ञा से सभी राजवंशी समुद्र के तट पर प्रभास तीर्थ आकर निवास करने लगे।

प्रभास तीर्थ में रहते हुए एक दिन जब अंधक व वृष्णि वंशी आपस में बात कर रहे थे। तभी सात्यकि ने आवेश में आकर कृतवर्मा का उपहास और अनादर कर दिया। कृतवर्मा ने भी कुछ ऐसे शब्द कहे कि सात्यकि को क्रोध आ गया और उसने कृतवर्मा का वध कर दिया। यह देख अंधकवंशियों ने सात्यकि को घेर लिया और हमला कर दिया। सात्यकि को अकेला देख श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न उसे बचाने दौड़े। सात्यकि और प्रद्युम्न अकेले ही अंधकवंशियों से भिड़ गए। परंतु संख्या में अधिक होने के कारण वे अंधकवंशियों को पराजित नहीं कर पाए और अंत में उनके हाथों मारे गए।

यदुवंशियों के नाश के बाद अर्जुन को बुलवाया था श्रीकृष्ण ने –

अपने पुत्र और सात्यकि की मृत्यु से क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने एक मुट्ठी एरका घास उखाड़ ली। हाथ में आते ही वह घास वज्र के समान भयंकर लोहे का मूसल बन गई। उस मूसल से श्रीकृष्ण सभी का वध करने लगे। जो कोई भी वह घास उखाड़ता वह भयंकर मूसल में बदल जाती (ऐसा ऋषियों के श्राप के कारण हुआ था)। उन मूसलों के एक ही प्रहार से प्राण निकल जाते थे। उस समय काल के प्रभाव से अंधक, भोज, शिनि और वृष्णि वंश के वीर मूसलों से एक-दूसरे का वध करने लगे। यदुवंशी भी आपस में लड़ते हुए मरने लगे।

श्रीकृष्ण के देखते ही देखते सांब, चारुदेष्ण, अनिरुद्ध और गद की मृत्यु हो गई। फिर तो श्रीकृष्ण और भी क्रोधित हो गए और उन्होंने शेष बचे सभी वीरों का संहार कर डाला। अंत में केवल दारुक (श्रीकृष्ण के सारथी) ही शेष बचे थे। श्रीकृष्ण ने दारुक से कहा कि तुम तुरंत हस्तिनापुर जाओ और अर्जुन को पूरी घटना बता कर द्वारका ले आओ। दारुक ने ऐसा ही किया। इसके बाद श्रीकृष्ण बलराम को उसी स्थान पर रहने का कहकर द्वारका लौट आए।
बलरामजी के स्वधाम गमन के बाद ये किया श्रीकृष्ण ने –

द्वारका आकर श्रीकृष्ण ने पूरी घटना अपने पिता वसुदेवजी को बता दी। यदुवंशियों के संहार की बात जान कर उन्हें भी बहुत दुख हुआ। श्रीकृष्ण ने वसुदेवजी से कहा कि आप अर्जुन के आने तक स्त्रियों की रक्षा करें। इस समय बलरामजी वन में मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं, मैं उनसे मिलने जा रहा हूं। जब श्रीकृष्ण ने नगर में स्त्रियों का विलाप सुना तो उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि शीघ्र ही अर्जुन द्वारका आने वाले हैं। वे ही तुम्हारी रक्षा करेंगे। ये कहकर श्रीकृष्ण बलराम से मिलने चल पड़े।

वन में जाकर श्रीकृष्ण ने देखा कि बलरामजी समाधि में लीन हैं। देखते ही देखते उनके मुख से सफेद रंग का बहुत बड़ा सांप निकला और समुद्र की ओर चला गया। उस सांप के हजारों मस्तक थे। समुद्र ने स्वयं प्रकट होकर भगवान शेषनाग का स्वागत किया। बलरामजी द्वारा देह त्यागने के बाद श्रीकृष्ण उस सूने वन में विचार करते हुए घूमने लगे। घूमते-घूमते वे एक स्थान पर बैठ गए और गांधारी द्वारा दिए गए श्राप के बारे में विचार करने लगे। देह त्यागने की इच्छा से श्रीकृष्ण ने अपनी इंद्रियों का संयमित किया और महायोग (समाधि) की अवस्था में पृथ्वी पर लेट गए।

श्री कृष्ण की नगरी द्वारिका महाभारत युद्ध के 36 वर्ष पश्चात समुद्र में डूब जाती है। द्वारिका के समुद्र में डूबने से पूर्व श्री कृष्ण सहित सारे यदुवंशी भी मारे जाते है। समस्त यदुवंशियों के मारे जाने और द्वारिका के समुद्र में विलीन होने के पीछे मुख्य रूप से दो घटनाएं जिम्मेदार है। एक माता गांधारी द्वारा श्री कृष्ण को दिया गया श्राप और दूसरा ऋषियों द्वारा श्री कृष्ण पुत्र सांब को दिया गया श्राप। आइए इस घटना पर विस्तार से जानते है।

गांधारी ने दिया था यदुवंश के नाश का श्राप –

महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब युधिष्ठर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने महाभारत युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया की जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है ठीक उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा।
ऋषियों ने दिया था सांब को श्राप –

महाभारत युद्ध के बाद जब छत्तीसवां वर्ष आरंभ हुआ तो तरह-तरह के अपशकुन होने लगे। एक दिन महर्षि विश्वामित्र, कण्व, देवर्षि नारद आदि द्वारका गए। वहां यादव कुल के कुछ नवयुवकों ने उनके साथ परिहास (मजाक) करने का सोचा। वे श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को स्त्री वेष में ऋषियों के पास ले गए और कहा कि ये स्त्री गर्भवती है। इसके गर्भ से क्या उत्पन्न होगा?

ऋषियों ने जब देखा कि ये युवक हमारा अपमान कर रहे हैं तो क्रोधित होकर उन्होंने श्राप दिया कि- श्रीकृष्ण का यह पुत्र वृष्णि और अंधकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए एक लोहे का मूसल उत्पन्न करेगा, जिसके द्वारा तुम जैसे क्रूर और क्रोधी लोग अपने समस्त कुल का संहार करोगे। उस मूसल के प्रभाव से केवल श्रीकृष्ण व बलराम ही बच पाएंगे। श्रीकृष्ण को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कहा कि ये बात अवश्य सत्य होगी।

समुद्र में डूबे हुए द्वारका नगरी के अवशेष

मुनियों के श्राप के प्रभाव से दूसरे दिन ही सांब ने मूसल उत्पन्न किया। जब यह बात राजा उग्रसेन को पता चली तो उन्होंने उस मूसल को चुरा कर समुद्र में डलवा दिया। इसके बाद राजा उग्रसेन व श्रीकृष्ण ने नगर में घोषणा करवा दी कि आज से कोई भी वृष्णि व अंधकवंशी अपने घर में मदिरा तैयार नहीं करेगा। जो भी व्यक्ति छिपकर मदिरा तैयार करेगा, उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। घोषणा सुनकर द्वारकावासियों ने मदिरा नहीं बनाने का निश्चय किया।द्वारका में होने लगे थे भयंकर अपशकुन

इसके बाद द्वारका में भयंकर अपशकुन होने लगे। प्रतिदिन आंधी चलने लगी। चूहे इतने बढ़ गए कि मार्गों पर मनुष्यों से ज्यादा दिखाई देने लगे। वे रात में सोए हुए मनुष्यों के बाल और नाखून कुतरकर खा जाया करते थे। सारस उल्लुओं की और बकरे गीदड़ों की आवाज निकालने लगे। गायों के पेट से गधे, कुत्तियों से बिलाव और नेवलियों के गर्भ से चूहे पैदा होने लगे। उस समय यदुवंशियों को पाप करते शर्म नहीं आती थी।

अंधकवंशियों के हाथों मारे गए थे प्रद्युम्न –

जब श्रीकृष्ण ने नगर में होते इन अपशकुनों को देखा तो उन्होंने सोचा कि कौरवों की माता गांधारी का श्राप सत्य होने का समय आ गया है। इन अपशकुनों को देखकर तथा पक्ष के तेरहवें दिन अमावस्या का संयोग जानकर श्रीकृष्ण काल की अवस्था पर विचार करने लगे। उन्होंने देखा कि इस समय वैसा ही योग बन रहा है जैसा महाभारत के युद्ध के समय बना था। गांधारी के श्राप को सत्य करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण ने यदुवंशियों को तीर्थयात्रा करने की आज्ञा दी। श्रीकृष्ण की आज्ञा से सभी राजवंशी समुद्र के तट पर प्रभास तीर्थ आकर निवास करने लगे।

प्रभास तीर्थ में रहते हुए एक दिन जब अंधक व वृष्णि वंशी आपस में बात कर रहे थे। तभी सात्यकि ने आवेश में आकर कृतवर्मा का उपहास और अनादर कर दिया। कृतवर्मा ने भी कुछ ऐसे शब्द कहे कि सात्यकि को क्रोध आ गया और उसने कृतवर्मा का वध कर दिया। यह देख अंधकवंशियों ने सात्यकि को घेर लिया और हमला कर दिया। सात्यकि को अकेला देख श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न उसे बचाने दौड़े। सात्यकि और प्रद्युम्न अकेले ही अंधकवंशियों से भिड़ गए। परंतु संख्या में अधिक होने के कारण वे अंधकवंशियों को पराजित नहीं कर पाए और अंत में उनके हाथों मारे गए।

यदुवंशियों के नाश के बाद अर्जुन को बुलवाया था श्रीकृष्ण ने –

अपने पुत्र और सात्यकि की मृत्यु से क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने एक मुट्ठी एरका घास उखाड़ ली। हाथ में आते ही वह घास वज्र के समान भयंकर लोहे का मूसल बन गई। उस मूसल से श्रीकृष्ण सभी का वध करने लगे। जो कोई भी वह घास उखाड़ता वह भयंकर मूसल में बदल जाती (ऐसा ऋषियों के श्राप के कारण हुआ था)। उन मूसलों के एक ही प्रहार से प्राण निकल जाते थे। उस समय काल के प्रभाव से अंधक, भोज, शिनि और वृष्णि वंश के वीर मूसलों से एक-दूसरे का वध करने लगे। यदुवंशी भी आपस में लड़ते हुए मरने लगे।

श्रीकृष्ण के देखते ही देखते सांब, चारुदेष्ण, अनिरुद्ध और गद की मृत्यु हो गई। फिर तो श्रीकृष्ण और भी क्रोधित हो गए और उन्होंने शेष बचे सभी वीरों का संहार कर डाला। अंत में केवल दारुक (श्रीकृष्ण के सारथी) ही शेष बचे थे। श्रीकृष्ण ने दारुक से कहा कि तुम तुरंत हस्तिनापुर जाओ और अर्जुन को पूरी घटना बता कर द्वारका ले आओ। दारुक ने ऐसा ही किया। इसके बाद श्रीकृष्ण बलराम को उसी स्थान पर रहने का कहकर द्वारका लौट आए।

बलरामजी के स्वधाम गमन के बाद ये किया श्रीकृष्ण ने –

द्वारका आकर श्रीकृष्ण ने पूरी घटना अपने पिता वसुदेवजी को बता दी। यदुवंशियों के संहार की बात जान कर उन्हें भी बहुत दुख हुआ। श्रीकृष्ण ने वसुदेवजी से कहा कि आप अर्जुन के आने तक स्त्रियों की रक्षा करें। इस समय बलरामजी वन में मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं, मैं उनसे मिलने जा रहा हूं। जब श्रीकृष्ण ने नगर में स्त्रियों का विलाप सुना तो उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि शीघ्र ही अर्जुन द्वारका आने वाले हैं। वे ही तुम्हारी रक्षा करेंगे। ये कहकर श्रीकृष्ण बलराम से मिलने चल पड़े।

वन में जाकर श्रीकृष्ण ने देखा कि बलरामजी समाधि में लीन हैं। देखते ही देखते उनके मुख से सफेद रंग का बहुत बड़ा सांप निकला और समुद्र की ओर चला गया। उस सांप के हजारों मस्तक थे। समुद्र ने स्वयं प्रकट होकर भगवान शेषनाग का स्वागत किया। बलरामजी द्वारा देह त्यागने के बाद श्रीकृष्ण उस सूने वन में विचार करते हुए घूमने लगे। घूमते-घूमते वे एक स्थान पर बैठ गए और गांधारी द्वारा दिए गए श्राप के बारे में विचार करने लगे। देह त्यागने की इच्छा से श्रीकृष्ण ने अपनी इंद्रियों का संयमित किया और महायोग (समाधि) की अवस्था में पृथ्वी पर लेट गए।
ऐसे त्यागी श्रीकृष्ण ने देह –
When, why and how steeped Dwarka

जिस समय भगवान श्रीकृष्ण समाधि में लीन थे, उसी समय जरा नाम का एक शिकारी हिरणों का शिकार करने के उद्देश्य से वहां आ गया। उसने हिरण समझ कर दूर से ही श्रीकृष्ण पर बाण चला दिया। बाण चलाने के बाद जब वह अपना शिकार पकडऩे के लिए आगे बढ़ा तो योग में स्थित भगवान श्रीकृष्ण को देख कर उसे अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ। तब श्रीकृष्ण को उसे आश्वासन दिया और अपने परमधाम चले गए। अंतरिक्ष में पहुंचने पर इंद्र, अश्विनीकुमार, रुद्र, आदित्य, वसु, मुनि आदि सभी ने भगवान का स्वागत किया।

इधर दारुक ने हस्तिनापुर जाकर यदुवंशियों के संहार की पूरी घटना पांडवों को बता दी। यह सुनकर पांडवों को बहुत शोक हुआ। अर्जुन तुरंत ही अपने मामा वसुदेव से मिलने के लिए द्वारका चल दिए। अर्जुन जब द्वारका पहुंचे तो वहां का दृश्य देखकर उन्हें बहुत शोक हुआ। श्रीकृष्ण की रानियां उन्हें देखकर रोने लगी। उन्हें रोता देखकर अर्जुन भी रोने लगे और श्रीकृष्ण को याद करने लगे। इसके बाद अर्जुन वसुदेवजी से मिले। अर्जुन को देखकर वसुदेवजी बिलख-बिलख रोने लगे। वसुदेवजी ने अर्जुन को श्रीकृष्ण का संदेश सुनाते हुए कहा कि द्वारका शीघ्र ही समुद्र में डूबने वाली है अत: तुम सभी नगरवासियों को अपने साथ ले जाओ।

अर्जुन अपने साथ ले गए श्रीकृष्ण के परिजनों को –

वसुदेवजी की बात सुनकर अर्जुन ने दारुक से सभी मंत्रियों को बुलाने के लिए कहा। मंत्रियों के आते ही अर्जुन ने कहा कि मैं सभी नगरवासियों को यहां से इंद्रप्रस्थ ले जाऊंगा, क्योंकि शीघ्र ही इस नगर को समुद्र डूबा देगा। अर्जुन ने मंत्रियों से कहा कि आज से सातवे दिन सभी लोग इंद्रप्रस्थ के लिए प्रस्थान करेंगे इसलिए आप शीघ्र ही इसके लिए तैयारियां शुरू कर दें। सभी मंत्री तुरंत अर्जुन की आज्ञा के पालन में जुट गए। अर्जुन ने वह रात श्रीकृष्ण के महल में ही बिताई।

अगली सुबह श्रीकृष्ण के पिता वसुदेवजी ने प्राण त्याग दिए। अर्जुन ने विधि-विधान से उनका अंतिम संस्कार किया। वसुदेवजी की पत्नी देवकी, भद्रा, रोहिणी व मदिरा भी चिता पर बैठकर सती हो गईं। इसके बाद अर्जुन ने प्रभास तीर्थ में मारे गए समस्त यदुवंशियों का भी अंतिम संस्कार किया। सातवे दिन अर्जुन श्रीकृष्ण के परिजनों तथा सभी नगरवासियों को साथ लेकर इंद्रप्रस्थ की ओर चल दिए। उन सभी के जाते ही द्वारका नगरी समुद्र में डूब गई। ये दृश्य देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ।

Sanjay Gupta

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श्रीमद्भागवतपुराण विद्या का अक्षय भण्डार है।


श्रीमद्भागवतपुराण विद्या का अक्षय भण्डार है। यह पुराण सभी प्रकार के कल्याण देने वाला तथा त्रय ताप-आधिभौतिक, आधिदैविक और आधिदैहिक आदि का शमन करता है। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का यह महान ग्रन्थ है।

आज किसी मित्र के आग्रह पर उसी भागवत् कथा के एक प्रसंग का रसास्वादन करेंगे, जिसे आप मेरे द्वारा प्रस्तुत श्रीमद्भागवत कथा में पढ़ चुके है, कैसे भगवान् भोलेनाथ ने माता पार्वतीजी को भागवत् कथा का अमृत पान कराया? कैसे शुकदेवजी महाराज का प्रादुर्भाव हुआ? उसी भागवतजी के अलौकिक प्रसंग का एक बार फिर से हम सभी रसास्वादन करेंगे।

सज्जनों! एक बार भगवान् भोलेनाथ कहीं भ्रमण को चले गयें, भगवान् शिवजी की अनुपस्थिति में श्री नारदजी कैलाश पधारे और कुछ गड़बड़ करके चले गये, यानी माता से झगड़ा लगवाकर भगवान् के आते ही चले गये, भगवान् भोलेनाथ के आगमन पर प्रभु को कुछ शंका हुई, भगवान् ने कहा- क्या बात है? आज कैलाश पर सन्नाटा क्यों है?

पार्वतीजी ने सुन्दर वस्त्र उतार कर मलीन वस्त्र धारण कर लिये, आभूषण उतार दिये और अंधेरे में विराजमान है, पुराने जमाने में जब मकान बनवाते थे तो राजा-महाराजाओं के घर पर एक अलग से रूठने के लिये कमरा बनाया जाता था, जिसे कोप भवन कहते थे, लेकिन देवीयों के लिये ऐसी सुविधा होती थी या नहीं मुझे नहीं मालूम?

यानी स्त्रियों के रूठने का कमरा अलग से बनता था, अगर कोई उसमें चली गयी तो समझो वो रूठ गयी हैं, और पतिदेव बड़ी मनुहार से मनाया करते थे, माता पार्वती भी ऐसे ही भगवान् भोलेनाथ से रूठकर भवन में चली गयी, शंकरजी ने देखा, मेरे आश्रम से नारदजी निकलकर जा रहे हैं, और जाते-जाते शंकरजी से कहते गये, आश्रम में जल्दी पधारना प्रभु, माताजी ने याद किया है।

शंकरजी ने मन में सोचा, आप घर पधारकर आये है तो जरूर याद करती होंगी, जहाँ आपके चरण पडे वहाँ तो कल्याण ही होगा, शिवजी ने कहा क्या बात है देवी! आप इतनी उदास क्यों हैं? पार्वतीजी ने कहा रहने दीजिये, मैं तो आपको पति परमेश्वर मानती हूँ, आपकी सेवा करती हूंँ, पर आप अन्दर से भी काले और ऊपर से भी काले हैं।

शिवजी ने कहा, अन्दर से काला तो वो होता है जो कपट करता है और मैंने तो जीवन में कोई कपट नहीं किया आपसे, आप मुझे कपटी बोलती है, पार्वतीजी ने कहा, चौबीस घण्टे मुंडो की माला पहनते है, उसमें किसके मुंड लगे है, ये बात मुझे कभी बतायी? भगवान शिव ने कहा, आप ने कभी अवसर नहीं दिया, लेकिन मैं आपसे कितना प्रेम करता हूँ इसका यदि वास्तव में कोई प्रमाण है तो ये मुंडो की माला है।

मुंडमाला में किसी और के सिर नहीं लगे, आपके ही सिर है देवी, वैसे तो आप पराम्बा हैं, जगदम्बा है लेकिन लीला की सिद्धी के लिए जब-जब अपने जीवन में तुम परिवर्तन लाती हो, चरित्र में परिवर्तन लाती हो, तुम्हारी याद मुझे बनी रहे इसके लिए तुम्हारे ही सिर अपनी माला में पिरो लेता हूँ, मेरे जीवन में इतनी बार तुमने देह का परित्याग किया है, ये तुम्हारे ही सिर लगे है किसी और के नहीं।

हम तो मरने के बाद भी तुम्हारे सिर को माला में लटकाये घूमते हैं, तुम कहती हो, हम कपटी हैं, पार्वतीजी बोली, हे भगवान! तब तो आप महाकपटी निकले, शिवजी बोले वो कैसे? ऐसी कौन सी दवाई पी रखी है, जो आप तो कभी मरते नहीं और मुझे बार-बार मरना पड़ता है, वास्तव में प्रेम किये होते तो वो औषधि आप मुझे भी पिलाते, जिसे पीने से मैं भी अमर हो जाती।

भगवान् शंकरजी गंभीर हो गये, उनके नेत्र सजल हो गये और पराम्बा पार्वतीजी से बोले, देवी मैंने एक अद्भुत कथामृत का पान किया है और वो अमृत है, श्रीमद्भागवत कथामृत (अमर कथा) उस अमर कथा का पान करने के की वजह से मेरा कभी जन्म नहीं होता, कभी मृत्यु नहीं होती, माता पार्वतीजी चरणों में गिरकर बोलीं, वो अमृत आप मुझे भी पिलाओ भगवन! शिवजी राजी हो गयें।

शिवजी ने कहा, भागवत् की कथा सुनने के तीन विधान है, भागवत की कथा सन्मुख बैठकर सुननी चाहिये, एकदम व्यास मंच के पीछे के पीछे बैठकर भागवत सुनना शास्त्रों में निषेध है, भागवत की कथा में बीच में उठना नहीं चाहिये, व्यर्थ की बात बीच में नहीं बोलनी चाहिये, बोलना है तो कीर्तन बोलो या भगवान् की जय बोले।

भागवतजी की कथा में सोना नहीं चाहिये, एकाग्र होकर तन्मय होकर सुननी चाहिये, देवी! मैं तो जब कथा सुनाता हूँ, नेत्र बन्द करके सुनाता हूँ, आप सुन रही हो कि नहीं, यह मैं कैसे जान पाऊँगा, इसलिये जब तक कथा चलेगी, आप बीच-बीच में ओउम्, ओउम् का हुँकारा देती रहना, या हरे हरे का हुँकारा देती रहना, माता पार्वतीजी बोली ठीक है।

शिवजी ने जब कथा का आरम्भ किया, कैलाश पर्वत पर कोई नहीं था, श्रोता माता पार्वतीजी, और वक्ता भगवान शिवजी, शिवजी के पीछे फूटा हुआ अंडा जरूर पड़ा है, वो ही तोते का अंडा था, भगवान् भोलेनाथ भागवत् कथा सुनाने लगे, माता पार्वती ॐ, ॐ, ॐ कहकर सुन रही है, पहले दिन की कथा का जैसे ही विश्राम हुआ, पीछे पड़ा तोते का अण्डा साबुत हो गया, उस अंडे में जीव का प्रादुर्भाव हो गया।

दूसरे दिन की कथा के प्रभाव से अंडा फूट गया, उसमें से सुन्दर सा पक्षी निकला, पड़ा हुआ पक्षी तीसरे दिन की कथा को सुन रहा है, गद् गद् हो रहा है, अमृत वचन है ना भागवतजी में तो, भागवतजी में चौथे दिन तो आनन्द की कथा है, श्रीकृष्ण जन्म-महोत्सव, उनको सुनकर पक्षी गद् गद् हो गया, माता पार्वती ध्यान लगाये बैठी है।

सज्जनों! शिवजी ने माता पार्वती को जो कथा सुनायी, वो मेरी आपकी तरह थोड़े ही सुनायी थी, तीन घंटे सुबह सुनी, तीन घंटे शाम को सुनी, तीनघंटे में पैर कभी ऐसे कर लिया, मौका लगा तो व्यासजी की ओर पांव फैलाकर ही बैठ गये, ऐसे ही थोड़े हुई थी कथा, वो तो एक ही आसन से बैठे रहे और देखो, पहले दिन की कथा शाम को छः बजे पूरी हुई, उसी समय दूसरे दिन की कथा छः बजकर एक मिनट पर शुरू हो गयी।

सात दिन तक अविश्राम गति से कथा चलती रही, ऐसे ही कथा चल रही है, पांच दिन से कथा सुन रही है माता, श्रीकृष्ण की कथा बता रहे हैं भगवान् शिव, पक्षी बड़े प्रेम से सुन रहा हैं, भगवान् शंकरजी ने कहा, देवी पार्वती, जब उद्धवजी को पता चला, प्रभु श्रीकृष्ण अपनी लीला को समाप्त कर जाना चाहते है, तो उद्धव ने आकर कृष्ण चरणों में प्रणाम किया।

“योगेश योग विन्यासः” आप योग के स्वामी हैं, योग के अधीश्वर हैं, बताइये त्याग क्या है, वैराग्य क्या है, सन्यास क्या है? ये ज्ञानमय प्रसंग जब श्री उद्धव ने पूछा, इसको सुनते-सुनते माता पार्वती को निद्रा ने घेर लिया, पाँच दिन से अविरल सुन रही थी, शरीर में कभी-कभी थकान हो ही जाती है, तो पार्वतीजी माँ को झपकी लग गयी, झपकी लग गयी और वो सो गयीं।

लेकिन शिवजी तो नेत्र बन्द कर कथा सुना रहे है, उन्हें नहीं पता कौन सोया? पक्षी ने देखा, माँ सो गयी, हाजी, हाजी बंद हो गयी, और कहीं कथा विराम न ले लेवे, इसलिये पक्षी ने पार्वतीजी जैसे स्वर में ॐ-ॐ-ॐ कहना शुरू कर दिया, भागवतजी की कथा जब पूरी हो गयी, भगवान् शिव ने जोर से जयकार लगायी, बोलिये कृष्ण कन्हैया लाल की जय।

जैसे ही जोर से जयकारा लगाया, पार्वतीजी की नींद टूट गयी और कहने लगी, हाँ भगवान् फिर श्रीकृष्ण ने उद्धव से क्या कहा? शंकरजी ने कहा- क्या कहा का क्या मतलब? ये कथा तो पूरी भी हो गयी, पार्वतीजी बोली माफ करना प्रभु मेरे को थोड़ी निंद आ गयी, शिवजी ने कहा आप सो गई थी तो हूँकारा कौन भर रहा था? हूँकारे तो मुझे पुरे सुनाई दे रहे थे

भगवान् शिवजी ने इधर-उधर देखा कोई नहीं पर जैसे ही पिछे मुड के देखा तो वो ही शुक पक्षी दिखाई दिया, शिवजी ने कहा, इसने कथा सुनी, इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं, परन्तु कथा बिना विधि के सुनी इसमें आपत्ति है, सामने बैठकर सुन लेता, परन्तु इसने तो पिछे बैठ कर कथा सुनी है, इसने तो अमर कथा की चोरी की हैं।

त्रिशूल लेकर भोलेनाथ उस शुक पक्षी को मारने के लिए दौड़े, कैलाश पर्वत से उडता-उडता पक्षी दौड लगाता है, कैलाश से नीचे उतरकर आयेंगे तो नीचे पड़ता है बद्रीनाथ धाम, बद्रीनाथ धाम में भगवान् वेदव्यासजी वास करते हैं, उनकी कुटिया का नाम है सम्याप्रास, वहीं उनकी पत्नी श्रीमती पिंगला देवी बैठी थी।

अपने पति से बोलीं, बुढापा तो आ गया, बेटा तो हुआ नहीं, व्यासजी बोले, भगवान् सब कल्याण करेंगे चिन्ता मत करो, ऐसा व्यास पत्नी सोच रही थीं कि उन्हें जोर से उबासी आ गयी, उसी समय उडता हुआ वो नन्हा सा शुक पक्षी पिंगलाजी के मुँह से होकर गर्भ में चला गया, भाई-बहनों वह शुक बारह वर्ष तक माँ पिंगलाजी के गर्भ में रहा।

आखिर भगवान् श्री हरि को आकर उन्हें आश्वासन देना पड़ा कि मेरी माया को तुम पर कोई असर नहीं होगा, तब कहीं जाकर शुकदेवजी महाराज का जन्म हुआ, भाई-बहनों, आप सभी ने भगवान् शिवजी द्वारा माँ पार्वतीजी को सुनाई गई अमरकथा के एक घूंट का श्रवण किया, भगवान् भोलेनाथ आपका कल्याण करें।

Sanjay gupta

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હું તકલીફ માં હોવ ત્યારે આ મેસેજ એક થી બેવાર જરૂર વાંચું છું


Morpinchh 09012017 _/_ હું તકલીફ માં હોવ ત્યારે આ મેસેજ એક થી બેવાર જરૂર વાંચું છું મારી નજરે ભગવાન 💎💡 “શ્રીકૃષ્ણ” 💡💎 *શ્રીકૃષ્ણ* ભગવાન ની કથા એમ કહે છે કે તેઓ જન્મ્યા પહેલાજ તેમને મારી નાખવાની તૈયારી થઇ ગયી હતી. પણ તેમાંથી તેઓ આબાદ ઉગરી ગયા આગળ તેમના જીવન માં ઘણા સંકટો આવ્યા પણ તેઓ લડતા રહ્યા કોઈ ને કોઈ યુક્તિ કરીને હંમેશા બચતા રહ્યા કોઈ પ્રસંગ માં તો તેઓ રણ છોડી ભાગી પણ ગયા હતા, પણ મારા જીવન માં આટલી બધી તકલીફો કેમ છે કરી ને તેઓ કોઈ દિવસ પણ કોઈ ને પણ પોતાની જન્મકુંડળી બતાવવા નથી ગયા કે એવી કોઈ નોધ મેં નથી વાચી, ના કોઈ ઉપવાસ કર્યા, ના ખુલ્લા પગે ક્યાંય ચાલવા ની માનતા કરી, કે કોઈ માતાજી ના ભુવા પાસે દાણા જોવડાવ્યા, મારે આ પ્રસંગ યાદ રાખવા જેવો ને વિચારવા જેવો છે તેમણે તો યજ્ઞ કર્યો તે ફક્ત અને ફક્ત કર્મો નો. યુદ્ધ ના મૈદાન માં જયારે અર્જુને ધનુષ્ય બાણ નીચે નાખી દીધા, ત્યારે ભગવાન *શ્રીકુષ્ણ* એ ના તો અર્જુન ના જન્માક્ષર જોયા, ના તો તેને કોઈ દોરો કે તાવીજ તેને આપ્યા, આ તારું યુદ્ધ છે અને તારેજ કરવાનું છે એમ અર્જુન ને સ્પષ્ટ કહી દીધું, અર્જુને જયારે ધનુષ્ય નાખી દીધું ત્યારે તે ધનુષ ઉપાડી ભગવાને અર્જુન વતી લડાઈ નથી કરી। બાકી *શ્રીકુષ્ણ* ભગવાન ખુદ મહાન યોદ્ધા હતા. તેઓ એકલા હાથે આખી કૌરવો ની સેના ને હરાવી શકે તેમ હતા,પણ ભગવાને શસ્ત્ર હાથ માં નહોતું પકડ્યું પણ જો અર્જુને લડવાની તૈયારી બતાવી તો તેઓ તેના સારથી ( માર્ગદર્શક ) બનવા તૈયાર હતા. આ રીતે ભગવાન *શ્રીકૃષ્ણ* મને સમજાવે છે કે જો દુનિયા ની તકલીફો માં તું જાતે લડીશ તો હું હંમેશા તારી આગળ ઉભો હોઈશ તારી તકલીફો ને હું હળવી કરી નાખીશ અને તને માર્ગદર્શન પણ આપીશ, કદાચ આજ ગીતા નો સહુથી સંક્ષિપ્ત સાર છે. જયારે હું પ્રભુ સન્મુખ થાવ ત્યારે ભગવાન ને એટલીજ વિનંતી કરું કે ભગવાન મારી તકલીફો થી લડવાની મને શક્તિ આપજો, નહિ કે ભગવાન મારી તકલીફો થી છુટકારો આપજો, ભગવાન મારી પાસે ઉપવાસ નથી માંગતા નહિ કે તું ચાલતો આવ કે બીજું કઈ, ભગવાન માંગે છે તો મારુ કર્મ, માટે મારે કર્મ કરતા રહેવું. 💡🙏 *જય શ્રીકૃષ્ણ*🙏💡