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श्रीमद्भागवतपुराण विद्या का अक्षय भण्डार है।


श्रीमद्भागवतपुराण विद्या का अक्षय भण्डार है। यह पुराण सभी प्रकार के कल्याण देने वाला तथा त्रय ताप-आधिभौतिक, आधिदैविक और आधिदैहिक आदि का शमन करता है। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का यह महान ग्रन्थ है।

आज किसी मित्र के आग्रह पर उसी भागवत् कथा के एक प्रसंग का रसास्वादन करेंगे, जिसे आप मेरे द्वारा प्रस्तुत श्रीमद्भागवत कथा में पढ़ चुके है, कैसे भगवान् भोलेनाथ ने माता पार्वतीजी को भागवत् कथा का अमृत पान कराया? कैसे शुकदेवजी महाराज का प्रादुर्भाव हुआ? उसी भागवतजी के अलौकिक प्रसंग का एक बार फिर से हम सभी रसास्वादन करेंगे।

सज्जनों! एक बार भगवान् भोलेनाथ कहीं भ्रमण को चले गयें, भगवान् शिवजी की अनुपस्थिति में श्री नारदजी कैलाश पधारे और कुछ गड़बड़ करके चले गये, यानी माता से झगड़ा लगवाकर भगवान् के आते ही चले गये, भगवान् भोलेनाथ के आगमन पर प्रभु को कुछ शंका हुई, भगवान् ने कहा- क्या बात है? आज कैलाश पर सन्नाटा क्यों है?

पार्वतीजी ने सुन्दर वस्त्र उतार कर मलीन वस्त्र धारण कर लिये, आभूषण उतार दिये और अंधेरे में विराजमान है, पुराने जमाने में जब मकान बनवाते थे तो राजा-महाराजाओं के घर पर एक अलग से रूठने के लिये कमरा बनाया जाता था, जिसे कोप भवन कहते थे, लेकिन देवीयों के लिये ऐसी सुविधा होती थी या नहीं मुझे नहीं मालूम?

यानी स्त्रियों के रूठने का कमरा अलग से बनता था, अगर कोई उसमें चली गयी तो समझो वो रूठ गयी हैं, और पतिदेव बड़ी मनुहार से मनाया करते थे, माता पार्वती भी ऐसे ही भगवान् भोलेनाथ से रूठकर भवन में चली गयी, शंकरजी ने देखा, मेरे आश्रम से नारदजी निकलकर जा रहे हैं, और जाते-जाते शंकरजी से कहते गये, आश्रम में जल्दी पधारना प्रभु, माताजी ने याद किया है।

शंकरजी ने मन में सोचा, आप घर पधारकर आये है तो जरूर याद करती होंगी, जहाँ आपके चरण पडे वहाँ तो कल्याण ही होगा, शिवजी ने कहा क्या बात है देवी! आप इतनी उदास क्यों हैं? पार्वतीजी ने कहा रहने दीजिये, मैं तो आपको पति परमेश्वर मानती हूँ, आपकी सेवा करती हूंँ, पर आप अन्दर से भी काले और ऊपर से भी काले हैं।

शिवजी ने कहा, अन्दर से काला तो वो होता है जो कपट करता है और मैंने तो जीवन में कोई कपट नहीं किया आपसे, आप मुझे कपटी बोलती है, पार्वतीजी ने कहा, चौबीस घण्टे मुंडो की माला पहनते है, उसमें किसके मुंड लगे है, ये बात मुझे कभी बतायी? भगवान शिव ने कहा, आप ने कभी अवसर नहीं दिया, लेकिन मैं आपसे कितना प्रेम करता हूँ इसका यदि वास्तव में कोई प्रमाण है तो ये मुंडो की माला है।

मुंडमाला में किसी और के सिर नहीं लगे, आपके ही सिर है देवी, वैसे तो आप पराम्बा हैं, जगदम्बा है लेकिन लीला की सिद्धी के लिए जब-जब अपने जीवन में तुम परिवर्तन लाती हो, चरित्र में परिवर्तन लाती हो, तुम्हारी याद मुझे बनी रहे इसके लिए तुम्हारे ही सिर अपनी माला में पिरो लेता हूँ, मेरे जीवन में इतनी बार तुमने देह का परित्याग किया है, ये तुम्हारे ही सिर लगे है किसी और के नहीं।

हम तो मरने के बाद भी तुम्हारे सिर को माला में लटकाये घूमते हैं, तुम कहती हो, हम कपटी हैं, पार्वतीजी बोली, हे भगवान! तब तो आप महाकपटी निकले, शिवजी बोले वो कैसे? ऐसी कौन सी दवाई पी रखी है, जो आप तो कभी मरते नहीं और मुझे बार-बार मरना पड़ता है, वास्तव में प्रेम किये होते तो वो औषधि आप मुझे भी पिलाते, जिसे पीने से मैं भी अमर हो जाती।

भगवान् शंकरजी गंभीर हो गये, उनके नेत्र सजल हो गये और पराम्बा पार्वतीजी से बोले, देवी मैंने एक अद्भुत कथामृत का पान किया है और वो अमृत है, श्रीमद्भागवत कथामृत (अमर कथा) उस अमर कथा का पान करने के की वजह से मेरा कभी जन्म नहीं होता, कभी मृत्यु नहीं होती, माता पार्वतीजी चरणों में गिरकर बोलीं, वो अमृत आप मुझे भी पिलाओ भगवन! शिवजी राजी हो गयें।

शिवजी ने कहा, भागवत् की कथा सुनने के तीन विधान है, भागवत की कथा सन्मुख बैठकर सुननी चाहिये, एकदम व्यास मंच के पीछे के पीछे बैठकर भागवत सुनना शास्त्रों में निषेध है, भागवत की कथा में बीच में उठना नहीं चाहिये, व्यर्थ की बात बीच में नहीं बोलनी चाहिये, बोलना है तो कीर्तन बोलो या भगवान् की जय बोले।

भागवतजी की कथा में सोना नहीं चाहिये, एकाग्र होकर तन्मय होकर सुननी चाहिये, देवी! मैं तो जब कथा सुनाता हूँ, नेत्र बन्द करके सुनाता हूँ, आप सुन रही हो कि नहीं, यह मैं कैसे जान पाऊँगा, इसलिये जब तक कथा चलेगी, आप बीच-बीच में ओउम्, ओउम् का हुँकारा देती रहना, या हरे हरे का हुँकारा देती रहना, माता पार्वतीजी बोली ठीक है।

शिवजी ने जब कथा का आरम्भ किया, कैलाश पर्वत पर कोई नहीं था, श्रोता माता पार्वतीजी, और वक्ता भगवान शिवजी, शिवजी के पीछे फूटा हुआ अंडा जरूर पड़ा है, वो ही तोते का अंडा था, भगवान् भोलेनाथ भागवत् कथा सुनाने लगे, माता पार्वती ॐ, ॐ, ॐ कहकर सुन रही है, पहले दिन की कथा का जैसे ही विश्राम हुआ, पीछे पड़ा तोते का अण्डा साबुत हो गया, उस अंडे में जीव का प्रादुर्भाव हो गया।

दूसरे दिन की कथा के प्रभाव से अंडा फूट गया, उसमें से सुन्दर सा पक्षी निकला, पड़ा हुआ पक्षी तीसरे दिन की कथा को सुन रहा है, गद् गद् हो रहा है, अमृत वचन है ना भागवतजी में तो, भागवतजी में चौथे दिन तो आनन्द की कथा है, श्रीकृष्ण जन्म-महोत्सव, उनको सुनकर पक्षी गद् गद् हो गया, माता पार्वती ध्यान लगाये बैठी है।

सज्जनों! शिवजी ने माता पार्वती को जो कथा सुनायी, वो मेरी आपकी तरह थोड़े ही सुनायी थी, तीन घंटे सुबह सुनी, तीन घंटे शाम को सुनी, तीनघंटे में पैर कभी ऐसे कर लिया, मौका लगा तो व्यासजी की ओर पांव फैलाकर ही बैठ गये, ऐसे ही थोड़े हुई थी कथा, वो तो एक ही आसन से बैठे रहे और देखो, पहले दिन की कथा शाम को छः बजे पूरी हुई, उसी समय दूसरे दिन की कथा छः बजकर एक मिनट पर शुरू हो गयी।

सात दिन तक अविश्राम गति से कथा चलती रही, ऐसे ही कथा चल रही है, पांच दिन से कथा सुन रही है माता, श्रीकृष्ण की कथा बता रहे हैं भगवान् शिव, पक्षी बड़े प्रेम से सुन रहा हैं, भगवान् शंकरजी ने कहा, देवी पार्वती, जब उद्धवजी को पता चला, प्रभु श्रीकृष्ण अपनी लीला को समाप्त कर जाना चाहते है, तो उद्धव ने आकर कृष्ण चरणों में प्रणाम किया।

“योगेश योग विन्यासः” आप योग के स्वामी हैं, योग के अधीश्वर हैं, बताइये त्याग क्या है, वैराग्य क्या है, सन्यास क्या है? ये ज्ञानमय प्रसंग जब श्री उद्धव ने पूछा, इसको सुनते-सुनते माता पार्वती को निद्रा ने घेर लिया, पाँच दिन से अविरल सुन रही थी, शरीर में कभी-कभी थकान हो ही जाती है, तो पार्वतीजी माँ को झपकी लग गयी, झपकी लग गयी और वो सो गयीं।

लेकिन शिवजी तो नेत्र बन्द कर कथा सुना रहे है, उन्हें नहीं पता कौन सोया? पक्षी ने देखा, माँ सो गयी, हाजी, हाजी बंद हो गयी, और कहीं कथा विराम न ले लेवे, इसलिये पक्षी ने पार्वतीजी जैसे स्वर में ॐ-ॐ-ॐ कहना शुरू कर दिया, भागवतजी की कथा जब पूरी हो गयी, भगवान् शिव ने जोर से जयकार लगायी, बोलिये कृष्ण कन्हैया लाल की जय।

जैसे ही जोर से जयकारा लगाया, पार्वतीजी की नींद टूट गयी और कहने लगी, हाँ भगवान् फिर श्रीकृष्ण ने उद्धव से क्या कहा? शंकरजी ने कहा- क्या कहा का क्या मतलब? ये कथा तो पूरी भी हो गयी, पार्वतीजी बोली माफ करना प्रभु मेरे को थोड़ी निंद आ गयी, शिवजी ने कहा आप सो गई थी तो हूँकारा कौन भर रहा था? हूँकारे तो मुझे पुरे सुनाई दे रहे थे

भगवान् शिवजी ने इधर-उधर देखा कोई नहीं पर जैसे ही पिछे मुड के देखा तो वो ही शुक पक्षी दिखाई दिया, शिवजी ने कहा, इसने कथा सुनी, इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं, परन्तु कथा बिना विधि के सुनी इसमें आपत्ति है, सामने बैठकर सुन लेता, परन्तु इसने तो पिछे बैठ कर कथा सुनी है, इसने तो अमर कथा की चोरी की हैं।

त्रिशूल लेकर भोलेनाथ उस शुक पक्षी को मारने के लिए दौड़े, कैलाश पर्वत से उडता-उडता पक्षी दौड लगाता है, कैलाश से नीचे उतरकर आयेंगे तो नीचे पड़ता है बद्रीनाथ धाम, बद्रीनाथ धाम में भगवान् वेदव्यासजी वास करते हैं, उनकी कुटिया का नाम है सम्याप्रास, वहीं उनकी पत्नी श्रीमती पिंगला देवी बैठी थी।

अपने पति से बोलीं, बुढापा तो आ गया, बेटा तो हुआ नहीं, व्यासजी बोले, भगवान् सब कल्याण करेंगे चिन्ता मत करो, ऐसा व्यास पत्नी सोच रही थीं कि उन्हें जोर से उबासी आ गयी, उसी समय उडता हुआ वो नन्हा सा शुक पक्षी पिंगलाजी के मुँह से होकर गर्भ में चला गया, भाई-बहनों वह शुक बारह वर्ष तक माँ पिंगलाजी के गर्भ में रहा।

आखिर भगवान् श्री हरि को आकर उन्हें आश्वासन देना पड़ा कि मेरी माया को तुम पर कोई असर नहीं होगा, तब कहीं जाकर शुकदेवजी महाराज का जन्म हुआ, भाई-बहनों, आप सभी ने भगवान् शिवजी द्वारा माँ पार्वतीजी को सुनाई गई अमरकथा के एक घूंट का श्रवण किया, भगवान् भोलेनाथ आपका कल्याण करें।

Sanjay gupta

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હું તકલીફ માં હોવ ત્યારે આ મેસેજ એક થી બેવાર જરૂર વાંચું છું


Morpinchh 09012017 _/_ હું તકલીફ માં હોવ ત્યારે આ મેસેજ એક થી બેવાર જરૂર વાંચું છું મારી નજરે ભગવાન 💎💡 “શ્રીકૃષ્ણ” 💡💎 *શ્રીકૃષ્ણ* ભગવાન ની કથા એમ કહે છે કે તેઓ જન્મ્યા પહેલાજ તેમને મારી નાખવાની તૈયારી થઇ ગયી હતી. પણ તેમાંથી તેઓ આબાદ ઉગરી ગયા આગળ તેમના જીવન માં ઘણા સંકટો આવ્યા પણ તેઓ લડતા રહ્યા કોઈ ને કોઈ યુક્તિ કરીને હંમેશા બચતા રહ્યા કોઈ પ્રસંગ માં તો તેઓ રણ છોડી ભાગી પણ ગયા હતા, પણ મારા જીવન માં આટલી બધી તકલીફો કેમ છે કરી ને તેઓ કોઈ દિવસ પણ કોઈ ને પણ પોતાની જન્મકુંડળી બતાવવા નથી ગયા કે એવી કોઈ નોધ મેં નથી વાચી, ના કોઈ ઉપવાસ કર્યા, ના ખુલ્લા પગે ક્યાંય ચાલવા ની માનતા કરી, કે કોઈ માતાજી ના ભુવા પાસે દાણા જોવડાવ્યા, મારે આ પ્રસંગ યાદ રાખવા જેવો ને વિચારવા જેવો છે તેમણે તો યજ્ઞ કર્યો તે ફક્ત અને ફક્ત કર્મો નો. યુદ્ધ ના મૈદાન માં જયારે અર્જુને ધનુષ્ય બાણ નીચે નાખી દીધા, ત્યારે ભગવાન *શ્રીકુષ્ણ* એ ના તો અર્જુન ના જન્માક્ષર જોયા, ના તો તેને કોઈ દોરો કે તાવીજ તેને આપ્યા, આ તારું યુદ્ધ છે અને તારેજ કરવાનું છે એમ અર્જુન ને સ્પષ્ટ કહી દીધું, અર્જુને જયારે ધનુષ્ય નાખી દીધું ત્યારે તે ધનુષ ઉપાડી ભગવાને અર્જુન વતી લડાઈ નથી કરી। બાકી *શ્રીકુષ્ણ* ભગવાન ખુદ મહાન યોદ્ધા હતા. તેઓ એકલા હાથે આખી કૌરવો ની સેના ને હરાવી શકે તેમ હતા,પણ ભગવાને શસ્ત્ર હાથ માં નહોતું પકડ્યું પણ જો અર્જુને લડવાની તૈયારી બતાવી તો તેઓ તેના સારથી ( માર્ગદર્શક ) બનવા તૈયાર હતા. આ રીતે ભગવાન *શ્રીકૃષ્ણ* મને સમજાવે છે કે જો દુનિયા ની તકલીફો માં તું જાતે લડીશ તો હું હંમેશા તારી આગળ ઉભો હોઈશ તારી તકલીફો ને હું હળવી કરી નાખીશ અને તને માર્ગદર્શન પણ આપીશ, કદાચ આજ ગીતા નો સહુથી સંક્ષિપ્ત સાર છે. જયારે હું પ્રભુ સન્મુખ થાવ ત્યારે ભગવાન ને એટલીજ વિનંતી કરું કે ભગવાન મારી તકલીફો થી લડવાની મને શક્તિ આપજો, નહિ કે ભગવાન મારી તકલીફો થી છુટકારો આપજો, ભગવાન મારી પાસે ઉપવાસ નથી માંગતા નહિ કે તું ચાલતો આવ કે બીજું કઈ, ભગવાન માંગે છે તો મારુ કર્મ, માટે મારે કર્મ કરતા રહેવું. 💡🙏 *જય શ્રીકૃષ્ણ*🙏💡

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कृष्ण


#चेतनाकासहजतम_शिखर #कृष्ण बात अगर कृष्ण की करो तो शुरु करो उन छह निरपराध बड़े भाइयों से जो सिर्फ इसलिए पछाड़कर मारे गए कि कहीं वे कृष्ण न हों। बात उस बहिन की भी करो जो दुष्ट मामा के हाथ से फिसलकर अदृश्य हो गई उसके काल का संकेत देकर (योगमाया)। उसकी भी बात करो तो खुद बचपन से प्राणघातक षड़यंत्रों से खेलते हुए बड़ा हुआ। हर बार मौत से दो कदम आगे चलकर खुद को भी बचाया और अपने पर भरोसा करनेवालों को भी। जेल में ही पैदा हुआ। पूरा जीवन आर्यावर्त में शक्ति संतुलन में झोंक दिया पर खुद एक गाँव की जागीर भी नहीं रखी। सत्य के प्रति निष्ठा इतनी गहन कि सत्य की रक्षा हेतु असत्य के प्रयोग से भी परहेज नहीं। धर्म के पक्ष में खड़े अर्जुन ने जब अपने मोह के आगे अस्त्र डालने चाहे तो इसने अपना ईश्वरत्व प्रकट किया कि “ठहर ! तू कुछ नहीं है सब मैं कर रहा हूँ। तू इसे साधना समझ। ये तेरा निर्वाण पथ है।” शक्तिपात का जो गुह्यतम ज्ञान अबतक कोई सिद्ध किसी शिष्य को बहुत ही पावन वातावरण में कहीं सघन वन में या गिरि कंदरा में देता था, इस सद्गुरु ने अपने शिष्य अर्जुन को रक्तसंबंधियों की रक्तपिपासा से आसक्त भूमि में दिया।(गीता) ये इस अवतार का प्रयोजन भी सिद्ध करता है क्योंकि इस घटना से भविष्य में संदेश जाता है कि “यदि ऐसी भूमि में आत्मज्ञान हो सकता है जहाँ रक्तसंबंध ही रक्तपिपासु हो रहे हों, तो किसी सामान्य व्यक्ति को उसके घर में क्यों नहीं हो सकता???” इस संदेश का असर था मध्यकाल का विराट संत आंदोलन। जब सनातन इस्लाम के खूनी खेल से त्रस्त था तब हर गाँव में कोई नानक , कोई कबीर, कोई दादू, कोई गोरख,कोई सहजो,दया,चरणदास, कोई भीखा, कोई पलटूदास ,कोई मीरा,कोई रैदास ऋषियों की अध्यात्म ज्योति लिए बैठा सनातन संस्कृति को जीवंत रखे हुए था। भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के प्राणों में भी गीता का ही गुंजन था….”न हन्यते हन्यमाने शरीरे।” फिर धर्म राज्य की स्थापना में स्वयं का खानदान भी रोड़ा बनते दिखा तो उसे भी समाप्ति की ओर जाने दिया। अंतत: स्वयं प्रभास पट्टन के नीले समंदर का तीन नदियों से संगम देखते हुए एक व्याध के बाण का निमित्त चुनकर लीला का पटाक्षेप किया। बहुत सस्ता है उसके नाम पर भाँडगिरी करना, छिछोरापन करना या उसके लीचड़ भक्त बनकर स्वयं को छलना। और दुरूहतम है उसे अपने भीतर जगाना….. कृष्ण को….. जो आकर्षण करता है सत्यम्-शिवम्-सुंदरम् को। #अज्ञेय

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भगवान् श्रीकृष्ण जी के 51 नाम और उन के अर्थ


*भगवान् श्रीकृष्ण जी के 51 नाम और उन के अर्थ:…..* *1 कृष्ण* : सब को अपनी ओर आकर्षित करने वाला.। **** *2 गिरिधर*: गिरी: पर्वत ,धर: धारण करने वाला। अर्थात गोवर्धन पर्वत को उठाने वाले। **** *3 मुरलीधर*: मुरली को धारण करने वाले। **** *4 पीताम्बर धारी*: पीत :पिला, अम्बर:वस्त्र। जिस ने पिले वस्त्रों को धारण किया हुआ है। **** *5 मधुसूदन:* मधु नामक दैत्य को मारने वाले। **** *6 यशोदा या देवकी नंदन*: यशोदा और देवकी को खुश करने वाला पुत्र। **** *7 गोपाल*: गौओं का या पृथ्वी का पालन करने वाला। **** *8 गोविन्द*: गौओं का रक्षक। **** *9 आनंद कंद:* आनंद की राशि देंने वाला। **** *10 कुञ्ज बिहारी*: कुंज नामक गली में विहार करने वाला। **** *11 चक्रधारी*: जिस ने सुदर्शन चक्र या ज्ञान चक्र या शक्ति चक्र को धारण किया हुआ है। **** *12 श्याम*: सांवले रंग वाला। **** *13 माधव:* माया के पति। **** *14 मुरारी:* मुर नामक दैत्य के शत्रु। **** *15 असुरारी*: असुरों के शत्रु। **** *16 बनवारी*: वनो में विहार करने वाले। **** *17 मुकुंद*: जिन के पास निधियाँ है। **** *18 योगीश्वर*: योगियों के ईश्वर या मालिक। **** *19 गोपेश* :गोपियों के मालिक। **** *20 हरि*: दुःखों का हरण करने वाले। **** *21 मदन:* सूंदर। **** *22 मनोहर:* मन का हरण करने वाले। **** *23 मोहन*: सम्मोहित करने वाले। **** *24 जगदीश*: जगत के मालिक। **** *25 पालनहार*: सब का पालन पोषण करने वाले। **** *26 कंसारी*: कंस के शत्रु। **** *27 रुख्मीनि वलभ*: रुक्मणी के पति । **** *28 केशव*: केशी नाम दैत्य को मारने वाले. या पानी के उपर निवास करने वाले या जिन के बाल सुंदर है। **** *29 वासुदेव*:वसुदेव के पुत्र होने के कारन। **** *30 रणछोर*:युद्ध भूमि स भागने वाले। **** *31 गुड़ाकेश*: निद्रा को जितने वाले। **** *32 हृषिकेश*: इन्द्रियों को जितने वाले। **** *33 सारथी*: अर्जुन का रथ चलने के कारण। *** **** *35 पूर्ण परब्रह्म:* :देवताओ के भी मालिक। **** *36 देवेश*: देवों के भी ईश। **** *37 नाग नथिया*: कलियाँ नाग को मारने के कारण। **** *38 वृष्णिपति*: इस कुल में उतपन्न होने के कारण **** *39 यदुपति*:यादवों के मालिक। **** *40 यदुवंशी*: यदु वंश में अवतार धारण करने के कारण। **** *41 द्वारकाधीश*:द्वारका नगरी के मालिक। **** *42 नागर*:सुंदर। **** *43 छलिया*: छल करने वाले। **** *44 मथुरा गोकुल वासी*: इन स्थानों पर निवास करने के कारण। **** *45 रमण*: सदा अपने आनंद में लीन रहने वाले। **** *46 दामोदर*: पेट पर जिन के रस्सी बांध दी गयी थी। **** *47 अघहारी*: पापों का हरण करने वाले। **** *48 सखा*: अर्जुन और सुदामा के साथ मित्रता निभाने के कारण। **** *49 रास रचिया*: रास रचाने के कारण। **** *50 अच्युत*: जिस के धाम से कोई वापिस नही आता है। **** *51 नन्द लाला*: नन्द के पुत्र होने के कारण। *।। जय राधामाधव ।।*विष्णु कान्त शास्त्री वृन्दावन 9828970531

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श्री कृष्ण पूजा


श्री कृष्ण पूजा

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श्री कृष्ण पूजन का हर शास्त्र में विशेष महत्व बताया गया है। आइए 6 विशेष मंत्रों के माध्यम से जानें कि क्या लाभ मिलता है श्रीकृष्ण का ध्यान लगाने से… उनके पूजन से, उनकी आराधना से…
श्री शुकदेवजी राजा परीक्षित्‌ से कहते हैं-
सकृन्मनः कृष्णापदारविन्दयोर्निवेशितं तद्गुणरागि यैरिह।
न ते यमं पाशभृतश्च तद्भटान्‌ स्वप्नेऽपि पश्यन्ति हि चीर्णनिष्कृताः॥
जो मनुष्य केवल एक बार श्रीकृष्ण के गुणों में प्रेम करने वाले अपने चित्त को श्रीकृष्ण के चरण कमलों में लगा देते हैं, वे पापों से छूट जाते हैं, फिर उन्हें पाश हाथ में लिए हुए यमदूतों के दर्शन स्वप्न में भी नहीं होते।
अविस्मृतिः कृष्णपदारविन्दयोः
क्षिणोत्यभद्रणि शमं तनोति च।
सत्वस्य शुद्धिं परमात्मभक्तिं
ज्ञानं च विज्ञानविरागयुक्तम्‌॥
श्रीकृष्ण के चरण कमलों का स्मरण सदा बना रहे तो उसी से पापों का नाश, कल्याण की प्राप्ति, अन्तः करण की शुद्धि, परमात्मा की भक्ति और वैराग्ययुक्त ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ति आप ही हो जाती है।
पुंसां कलिकृतान्दोषान्द्रव्यदेशात्मसंभवान्‌।
सर्वान्हरित चित्तस्थो भगवान्पुरुषोत्तमः॥
भगवान पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण जब चित्त में विराजते हैं, तब उनके प्रभाव से कलियुग के सारे पाप और द्रव्य, देश तथा आत्मा के दोष नष्ट हो जाते हैं।
शय्यासनाटनालाप्रीडास्नानादिकर्मसु।
न विदुः सन्तमात्मानं वृष्णयः कृष्णचेतसः॥
श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व समझने वाले भक्त श्रीकृष्ण में इतने तन्मय रहते थे कि सोते, बैठते, घूमते, फिरते, बातचीत करते, खेलते, स्नान करते और भोजन आदि करते समय उन्हें अपनी सुधि ही नहीं रहती थी।
वैरेण यं नृपतयः शिशुपालपौण्ड्र-
शाल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः।
ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ
तत्साम्यमापुरनुरक्तधियां पुनः किम्‌॥
जब शिशुपाल, शाल्व और पौण्ड्रक आदि राजा वैरभाव से ही खाते, पीते, सोते, उठते, बैठते हर वक्त श्री हरि की चाल, उनकी चितवन आदि का चिन्तन करने के कारण मुक्त हो गए, तो फिर जिनका चित्त श्री कृष्ण में अनन्य भाव से लग रहा है, उन विरक्त भक्तों के मुक्त होने में तो संदेह ही क्या है?
एनः पूर्वकृतं यत्तद्राजानः कृष्णवैरिणः।
जहुस्त्वन्ते तदात्मानः कीटः पेशस्कृतो यथा॥
श्रीकृष्ण से द्वेष करने वाले समस्त नरपतिगण अन्त में श्री भगवान के स्मरण के प्रभाव से पूर्व संचित पापों को नष्ट कर भगवद  रूप हो जाते हैं,  अतएव श्रीकृष्ण का स्मरण सदा करते रहना चाहिए।
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યશોદા તને કાનુડા પર ભરોસો નહી કે નહી કે


યશોદા તને કાનુડા પર ભરોસો નહી કે
નહી કે
યશોદાનો લાલ કેવો નટખટ
નટખટ
નટખટ માખણ ખાય કેવુ ફટફટ
ફટફટ
માખણની મટકી કેવી ગોલ ગોલ
ગોલ ગોલ
યશોદા તુ કાન્હા સાથે મીઠુ બોલ
મીઠુ બોલ
યશોદા તને કાનુડા પર ભરોસો નહી કે
નહી કે
યશોદાનો લાલ વગાડે વાંસળી
વાંસળી
વાંસળીની ધુન સાંભળી ગોપીઓ જાય હાંફળી
હાંફળી
એમા કાનુડાનો નથી કોઈ રોલ રોલ
રોલ રોલ
યશોદા તુ કાનુડા સાથે મીઠુ બોલ
મીઠુ બોલ
યશોદા તમને ગોપાલ પર ભરોસો નહી
નહી કે
કાનુડાની ફરિયાદથી યશોદા જાય થાકી
થાકી
કાનુડાની મસ્તીમાં નથી રહ્યુ કશુ બાકી
બાકી
કાનુડાની મસ્તીનો નથી કોઈ મોલ મોલ
મોલ મોલ
યશોદા તુ કાનુડા સાથે મીઠુ બોલ
મીઠુ બોલ
કાનુડા તને માખણથી ફુરસદ નથી કે
નથી કે
નથી કે .. નથી કે.. નથી કે..
નંદ ઘેર આનંદ ભયો જય કનૈયા લાલ કી
જય કનૈયા લાલ કી હાથી ઘોડા પાલકી

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इस बार जन्माष्टमी को लेकर लोगों में शंका हो रही है कि जन्माष्टमी 14 को मनाई जाए या 15 को – 2017


इस बार जन्माष्टमी को लेकर लोगों में शंका हो रही है कि जन्माष्टमी 14 को मनाई जाए या 15 को तो मैं कुछ शास्त्र प्रमाणों के साथ बताने की कोशिश करता हूँ जिस से कि आप का भ्रम दूर हो जाए

अग्नि पुराण में लिखा है कि

वर्जनीया प्रयत्नेन सप्तमीसंयुताष्टमी|

विना ऋक्षेण कर्तव्या नवमी संयुताष्टमी|

 

अथवा जिस दिन सप्तमी में सूर्योदय हो कर रात को अष्टमी आ रही हो उस दिन भले ही रोहिणी नक्षत्र हो पर उस दिन व्रत नहीं करना चाहिए दूसरे दिन नवमी युक्त अष्टमी को ही व्रत करना चाहिए |

 

पद्म पुराण में लिखा है कि

 

पुत्रान् हन्ति पशून् हन्ति हन्ति राष्ट्रं सराजकम् |

हन्ति जातानजातांश्च सप्तमीसहिताष्टमी |

 

अष्टमी यदि सप्तमी विद्धा हो  और उस में व्रत उपवास करे तो पुत्र पशु राज्य राष्ट्र जात अजात सब को नष्ट कर देती है |

 

स्कन्द पुराण में लिखा है कि

 

पलवेधेपि विप्रेन्द्र सप्तम्यामष्टमीं त्यजेत् |

सुरया बिन्दुना स्पृष्टं गंगांभः कलशं यथा |

 

जिस प्रकार गंगाजल से भरा हुआ कलश एक बूंद मदिरा से दूषित हो जाता है उसी प्रकार लेश मात्र भी सप्तमी हो तो वह अष्टमी व्रत उपवास के लिए दूषित हो जाती है |

इस बार 14 तारीख को पूरे दिन सप्तमी है वैसे भी सभी शास्त्रों की मान्यता है कि तिथि वही सफल होती है जो सूर्योदयी होती है ऐसे शास्त्रों के सैकड़ों प्रमाण हैं जो यहाँ उद्धृत करना संभव नहीं है इसलिए शुद्ध और शास्त्र संमत जन्माष्टमी 15 तारीख मंगलवार को ही है व्रत उपवास अनुष्ठान पूजा आप इसी दिन करें |

 

भगवान बालकृष्ण गोपाल जी आप की मनोकामना पूरी करें |

जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ

🙏🙏 पं.  प्रदीप तिवारी 🙏🙏

🙏श्री सनातन धर्म मन्दिर डी ब्लॉक जनकपुरी नई दिल्ली🙏