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गोमाता पूज्य क्यों हैं सनातन धर्म में ? कुछ रोचक तथ्य….
1. गौ माता जिस जगह खड़ी रहकर आनंदपूर्वक चैन की सांस लेती है । वहां वास्तु दोष समाप्त हो जाते हैं । 
2. गौ माता में तैंतीस कोटी देवी देवताओं का वास है ।
3. जिस जगह गौ माता खुशी से रभांने लगे उस देवी देवता पुष्प वर्षा करते हैं । 
4. गौ माता के गले में घंटी जरूर बांधे ; गाय के गले में बंधी घंटी बजने से गौ आरती होती है । 
5. जो व्यक्ति गौ माता की सेवा पूजा करता है उस पर आने वाली सभी प्रकार की विपदाओं को गौ माता हर लेती है । 
6. गौ माता के खुर्र में नागदेवता का वास होता है । जहां गौ माता विचरण करती है उस जगह सांप बिच्छू नहीं आते । 
7. गौ माता के गोबर में लक्ष्मी जी का वास होता है । 
8. गौ माता के मुत्र में गंगाजी का वास होता है । 
9. गौ माता के गोबर से बने उपलों का रोजाना घर दूकान मंदिर परिसरों पर धुप करने से वातावरण शुद्ध होता है सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। 
10. गौ माता के एक आंख में सुर्य व दूसरी आंख में चन्द्र देव का वास होता है । 
11. गाय इस धरती पर साक्षात देवता है । 
12. गौ माता अन्नपूर्णा देवी है कामधेनु है । मनोकामना पूर्ण करने वाली है । 
13. गौ माता के दुध मे सुवर्ण तत्व पाया जाता है जो रोगों की क्षमता को कम करता है। 
14. गौ माता की पूंछ में हनुमानजी का वास होता है । किसी व्यक्ति को बुरी नजर हो जाये तो गौ माता की पूंछ से झाड़ा लगाने से नजर उतर जाती है । 
15. गौ माता की पीठ पर एक उभरा हुआ कुबड़ होता है । उस कुबड़ में सूर्य केतु नाड़ी होती है । रोजाना सुबह आधा घंटा गौ माता की कुबड़ में हाथ फेरने से रोगों का नाश होता है । 
16. गौ माता का दूध अमृत है। 
17. गौ माता धर्म की धुरी है। गौ माता के बिना धर्म कि कल्पना नहीं की जा सकती ।
18. गौ माता जगत जननी है।
 

19. गौ माता पृथ्वी का रूप है। 
20. गौ माता सर्वो देवमयी सर्वोवेदमयी है । गौ माता के बिना देवों वेदों की पूजा अधुरी है । 
21. एक गौ माता को चारा खिलाने से तैंतीस कोटी देवी देवताओं को भोग लग जाता है । 
22. गौ माता से ही मनुष्यों के गौत्र की स्थापना हुई है । 
23. गौ माता चौदह रत्नों में एक रत्न है । 
24. गौ माता साक्षात् मां भवानी का रूप है । 
25. गौ माता के पंचगव्य के बिना पूजा पाठ हवन सफल नहीं होते हैं । 
26. गौ माता के दूध घी मख्खन दही गोबर गोमुत्र से बने पंचगव्य हजारों रोगों की दवा है । इसके सेवन से असाध्य रोग मिट जाते हैं । 
27. गौ माता को घर पर रखकर सेवा करने वाला सुखी आध्यात्मिक जीवन जीता है । उनकी अकाल मृत्यु नहीं होती । 
28. तन मन धन से जो मनुष्य गौ सेवा करता है । वो वैतरणी गौ माता की पुछ पकड कर पार करता है। उन्हें गौ लोकधाम में वास मिलता है । 
28. गौ माता के गोबर से ईंधन तैयार होता है । 
29. गौ माता सभी देवी देवताओं मनुष्यों की आराध्य है; इष्ट देव है । 
30. साकेत स्वर्ग इन्द्र लोक से भी उच्चा गौ लोक धाम है।
 

31. गौ माता के बिना संसार की रचना अधुरी है ।
32. गौ माता में दिव्य शक्तियां होने से संसार का संतुलन बना रहता है । 
33. गाय माता के गौवंशो से भूमि को जोत कर की गई खेती सर्वश्रेष्ट खेती होती है । 
34. गौ माता जीवन भर दुध पिलाने वाली माता है । गौ माता को जननी से भी उच्चा दर्जा दिया गया है । 
35. जहां गौ माता निवास करती है वह स्थान तीर्थ धाम बन जाता है । 
36. गौ माता कि सेवा परिक्रमा करने से सभी तीर्थो के पुण्यों का लाभ मिलता है । 
37. जिस व्यक्ति के भाग्य की रेखा सोई हुई हो तो वो व्यक्ति अपनी हथेली में गुड़ को रखकर गौ माता को जीभ से चटाये गौ माता की जीभ हथेली पर रखे गुड़ को चाटने से व्यक्ति की सोई हुई भाग्य रेखा खुल जाती है । 
38. गौ माता के चारो चरणों के बीच से निकल कर परिक्रमा करने से इंसान भय मुक्त हो जाता है । 
39. गाय माता आनंदपूर्वक सासें लेती है; छोडती है । वहां से नकारात्मक ऊर्जा भाग जाती है और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है जिससे वातावरण शुद्ध होता है । 
40. गौ माता के गर्भ से ही महान विद्वान धर्म रक्षक गौ कर्ण जी महाराज पैदा हुए थे । 
41. गौ माता की सेवा के लिए ही इस धरा पर देवी देवताओं ने अवतार लिये हैं । 
42. जब गौ माता बछड़े को जन्म देती तब पहला दूध बांझ स्त्री को पिलाने से उनका बांझपन मिट जाता है । 
43. स्वस्थ गौ माता का गौ मूत्र को रोजाना दो तोला सात पट कपड़े में छानकर सेवन करने से सारे रोग मिट जाते हैं । 
44. गौ माता वात्सल्य भरी निगाहों से जिसे भी देखती है उनके ऊपर गौकृपा हो जाती है । 
45. गाय इस संसार का प्राण है । 
46. काली गाय की पूजा करने से नौ ग्रह शांत रहते हैं । जो ध्यानपूर्वक धर्म के साथ गौ पूजन करता है उनको शत्रु दोषों से छुटकारा मिलता है । 
47. गाय धार्मिक ; आर्थिक ; सांस्कृतिक व अध्यात्मिक दृष्टि से सर्वगुण संपन्न है । 
48. गाय एक चलता फिरता मंदिर है । हमारे सनातन धर्म में तैंतीस कोटि देवी देवता है । हम रोजाना तैंतीस कोटि देवी देवताओं के मंदिर जा कर उनके दर्शन नहीं कर सकते पर गौ माता के दर्शन से सभी देवी देवताओं के दर्शन हो जाते हैं । 
49. कोई भी शुभ कार्य अटका हुआ हो बार बार प्रयत्न करने पर भी सफल नहीं हो रहा हो तो गौ माता के कान में कहिये रूका हुआ काम बन जायेगा । 
50. जो व्यक्ति मोक्ष गौ लोक धाम चाहता हो उसे गौ व्रती बनना चाहिए । 
51. गौ माता सर्व सुखों की दातार है । 
हे मां आप अनंत ! आपके गुण अनंत ! इतना मुझमें सामर्थ्य नहीं कि मैं आपके गुणों का बखान कर सकूं ।
हरे कृष्ण 👏

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*गोबर है गऊ का बरदान*

*आओ इस को लें पहचान*
वैसे तो भारत के ग्रामीण आंचल में आज भी हम हिंदूओ का अंतिम संस्कार गोसो (उपलों) से ही किया जाता है लेकिन हम शहरी कुछ ज्यादा ही पढ़ लिख गये और कुछ ज्यादा ही समझदार हो गए। शहरों के लगभग सभी शमशान घाटों पर लकड़ी से ही अंतेष्ठी की जाती है तथा कई जगह तो आधूनिकता व पर्यावरण संरक्षण के नाम पर गैस या बिजली से भी अंतिम संस्कार होने लगे हैं जो कि पूर्णतया गलत हैं। 
हम हिन्दूओं का सोलहवां संस्कार एक यज्ञ ही तो है और वह यज्ञ गौमाता के गोबर में ही होना चाहिए। पर्यीवरण रक्षक हमारे पुर्वजों ने जो अंतिम संस्कार की जो विधि बनाई थी उस में गोबर अनिवार्य अंग था लेकिन आज हम अपने अंतिम संस्कार के लिए हर वर्ष पांच से छः करोड़ पेड़ काट कर शमशान घाटों में जला देते हैं तथा हमारी अज्ञानता से गोबर गौशालाओं में सड़ रहा है व गौशालाएं चंदे पर चल रही हैं।
अगर गोबर का सही प्रबंधन कर हम उस गोबर को शमशान घाट पहुंचाने लगें तो सोने पर सुहागा होगा और गौशाला आर्थिक रूप से स्वावलंबी होंगी। कल हमने रोहतक के शीला बाईपास स्थित रामबाण में यह प्रयोग कर के देखा। एक अंतिम संस्कार पर औसतन तीन सौ किलो लकड़ी यानि एक पंद्रह साल का पेढ़ लगता है। हमनें जब गौकाष्ठ में अंतेष्ठी की तो मात्र 200 किलो ही गौकाष्ठ लगा। कल हमनें एक पेड़ व 2500/- ₹ बचाए तथा एक विलुप्त होती परम्पारा को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। 
इस अवसर के बाबा कर्ण पुरी जी  महाराज, भारत भूषण खुराना, गुलशन डंग, सुरेन्द्र बत्रा, गुलशन खुराना, कृष्ण लाल शर्मा, नरेंद्र वासन, शमशेर दहिया, डॉ. संदीप कुमार तथा मिडिया के साथी व पराहवर गौशाला के सदस्य साक्षी बने।
यह रोजगार सृजन का, पर्यीवरण संरक्षण का, व गौ संवर्धन का एक सटीक तरीका है अगर हर गौशाला यह गौकाष्ठ बनाना शुरु कर दे तथा इसको हर शमशान घाट पर अनिवार्य कर दें तो गौशाला गौधाम बन जाएंगी। 
करना हमें व आपको ही है, क्योंकि यह हमारे व आपके धर्म से जुड़ा है विदेशी कंपनी तो चाहें गी ही कि उनकी बिजली व गैस बिके। कल के गौकाष्ठ से अंतेष्ठी के कुछ चित्र आप सबके लिए नीचे डाल रहा हूँ।
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गाय के घी के 28 ज़बर्दस्त फायदे
 ● देसी गाय के घी को रसायन कहा गया है। जो जवानी को कायम रखते हुए, बुढ़ापे को दूर रखता है। गाय का घी खाने से बूढ़ा व्यक्ति भी जवान जैसा हो जाता है। गाय के घी में स्वर्ण छार पाए जाते हैं जिसमे अदभुत औषधिय गुण होते है, जो की गाय के घी के इलावा अन्य घी में नहीं मिलते
गाय के घी से बेहतर कोई दूसरी चीज नहीं है। गाय के घी में वैक्सीन एसिड, ब्यूट्रिक एसिड, बीटा-कैरोटीन जैसे माइक्रोन्यूट्रींस मौजूद होते हैं। जिस के सेवन करने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचा जा सकता है। गाय के घी से उत्पन्न शरीर के माइक्रोन्यूट्रींस में कैंसर युक्त तत्वों से लड़ने की क्षमता होती है।

यदि आप गाय के 10 ग्राम घी से हवन अनुष्ठान (यज्ञ) करते हैं तो इसके परिणाम स्वरूप वातावरण में लगभग 1 टन ताजा ऑक्सीजन का उत्पादन कर सकते हैं। यही कारण है कि मंदिरों में गाय के घी का दीपक जलाने कि तथा, धार्मिक समारोह में यज्ञ करने कि प्रथा प्रचलित है। इससे वातावरण में फैले परमाणु विकिरणों को हटाने की अदभुत क्षमता होती है।

》 गाय के घी के अन्य महत्वपूर्ण उपयोग :–

1.गाय का घी नाक में डालने से पागलपन दूर होता है।

2.गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म हो जाती है।

3.गाय का घी नाक में डालने से लकवा का रोग में भी उपचार होता है।

4) 20-25 ग्राम घी व मिश्री खिलाने से शराब, भांग व गांझे का नशा कम हो जाता है।

5) गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना ओपरेशन के ही ठीक हो जाता है।

6) नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तारो ताजा हो जाता है।

7) गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बहार निकल कर चेतना वापस लोट आती है।

8) गाय का घी नाक में डालने से बाल झडना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते है
9) गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है।

10) हाथ पाव मे जलन होने पर गाय के घी को तलवो में मालिश करें जलन ढीक होता है

11) हिचकी के न रुकने पर खाली गाय का आधा चम्मच घी खाए, हिचकी स्वयं रुक जाएगी।

12) गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है।

13) गाय के घी से बल और वीर्य बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक ताकत में भी इजाफा होता है

14) गाय के पुराने घी से बच्चों को छाती और पीठ पर मालिश करने से कफ की शिकायत दूर हो जाती है।

15) अगर अधिक कमजोरी लगे, तो एक गिलास दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री डालकर पी लें।

16) हथेली और पांव के तलवो में जलन होने पर गाय के घी की मालिश करने से जलन में आराम आयेगा।

17) गाय का घी न सिर्फ कैंसर को पैदा होने से रोकता है और इस बीमारी के फैलने को भी आश्चर्यजनक ढंग से रोकता है।

18) जिस व्यक्ति को हार्ट अटैक की तकलीफ है और चिकनाइ खाने की मनाही है तो गाय का घी खाएं, हर्दय मज़बूत होता है।

19) देसी गाय के घी में कैंसर से लड़ने की अचूक क्षमता होती है। इसके सेवन से स्तन तथा आंत के खतरनाक कैंसर से बचा जा सकता है।

20) संभोग के बाद कमजोरी आने पर एक गिलास गर्म दूध में एक चम्मच देसी गाय का घी मिलाकर पी लें। इससे थकान बिल्कुल कम हो जाएगी।

21) फफोलो पर गाय का देसी घी लगाने से आराम मिलता है।गाय के घी की झाती पर मालिस करने से बच्चो के बलगम को बहार निकालने मे सहायक होता है।

22) सांप के काटने पर 100 -150 ग्राम घी पिलायें उपर से जितना गुनगुना पानी पिला सके पिलायें जिससे उलटी और दस्त तो लगेंगे ही लेकिन सांप का विष कम हो जायेगा।

23) दो बूंद देसी गाय का घी नाक में सुबह शाम डालने से माइग्रेन दर्द ढीक होता है। सिर दर्द होने पर शरीर में गर्मी लगती हो, तो गाय के घी की पैरों के तलवे पर मालिश करे, सर दर्द ठीक हो जायेगा।

24) यह स्मरण रहे कि गाय के घी के सेवन से कॉलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता है। वजन भी नही बढ़ता, बल्कि वजन को संतुलित करता है । यानी के कमजोर व्यक्ति का वजन बढ़ता है, मोटे व्यक्ति का मोटापा (वजन) कम होता है।

25) एक चम्मच गाय का शुद्ध घी में एक चम्मच बूरा और 1/4 चम्मच पिसी काली मिर्च इन तीनों को मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय चाट कर ऊपर से गर्म मीठा दूध पीने से आँखों की ज्योति बढ़ती है।

26) गाय के घी को ठन्डे जल में फेंट ले और फिर घी को पानी से अलग कर ले यह प्रक्रिया लगभग सौ बार करे और इसमें थोड़ा सा कपूर डालकर मिला दें। इस विधि द्वारा प्राप्त घी एक असर कारक औषधि में परिवर्तित हो जाता है जिसे जिसे त्वचा सम्बन्धी हर चर्म रोगों में चमत्कारिक मलहम कि तरह से इस्तेमाल कर सकते है। यह सौराइशिस के लिए भी कारगर है।

27) गाय का घी एक अच्छा(LDL)कोलेस्ट्रॉल है। उच्च कोलेस्ट्रॉल के रोगियों को गाय का घी ही खाना चाहिए। यह एक बहुत अच्छा टॉनिक भी है। अगर आप गाय के घी की कुछ बूँदें दिन में तीन बार,नाक में प्रयोग करेंगे तो यह त्रिदोष (वात पित्त और कफ) को संतुलित करता है।

28) घी, छिलका सहित पिसा हुआ काला चना और पिसी शक्कर (बूरा) तीनों को समान मात्रा में मिलाकर लड्डू बाँध लें। प्रातः खाली पेट एक लड्डू खूब चबा-चबाकर खाते हुए एक गिलास मीठा कुनकुना दूध घूँट-घूँट करके पीने से स्त्रियों के प्रदर रोग में आराम होता है, पुरुषों का शरीर मोटा ताजा यानी सुडौल और बलवान बनता है।

☆ गाय का घी और चावल की आहुती डालने से महत्वपूर्ण गैसे जैसे – एथिलीन ऑक्साइड, प्रोपिलीन ऑक्साइड, फॉर्मल्डीहाइड आदि उत्पन्न होती हैं । इथिलीन ऑक्साइड गैस आजकल सबसे अधिक प्रयुक्त होनेवाली जीवाणुरोधक गैस है, जो शल्य-चिकित्सा (ऑपरेशन थियेटर) से लेकर जीवनरक्षक औषधियाँ बनाने तक में उपयोगी हैं ।

वैज्ञानिक प्रोपिलीन ऑक्साइड गैस को कृत्रिम वर्षो का आधार मानते है । आयुर्वेद विशेषज्ञो के अनुसार अनिद्रा का रोगी शाम को दोनों नथुनो में गाय के घी की दो – दो बूंद डाले और रात को नाभि और पैर के तलुओ में गौघृत लगाकर लेट जाय तो उसे प्रगाढ़ निद्रा आ जायेगी ।

☆ गौघृत में मनुष्य – शरीर में पहुंचे रेडियोधर्मी विकिरणों का दुष्प्रभाव नष्ट करने की असीम क्षमता हैं । अग्नि में गाय का घी कि आहुति देने से उसका धुआँ जहाँ तक फैलता है, वहाँ तक का सारा वातावरण प्रदूषण और आण्विक विकरणों से मुक्त हो जाता हैं । सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि एक चम्मच गौघृत को अग्नि में डालने से एकटन प्राणवायु (ऑक्सीजन) बनती हैं जो अन्य किसी भी उपाय से संभव नहीं हैं|

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तो सम्पर्क करे : 

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आखिर  गौ हत्या रुकती क्यों नहीं ?
देश की तथाकथित आजादी 15 अगस्त 1947 को मिलने के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के आगे सबसे बड़ी समस्या यह थी कि “भारत के आम आवाम को भरपेट भोजन कैसे प्राप्त हो ?”  क्योंकि उस समय तक अंग्रेजों ने भारत के पूरे के पूरे कृषि आधारित जीवन शैली को अपने औद्योगिक लाभ के लिए नष्ट कर दिया था | 
अतः भारत में अधिक से अधिक अन्न कैसे पैदा किया जाए, इसके लिए भारतीय किसानों से परामर्श करने के स्थान पर तत्कालीन प्रधानमंत्री ने विदेश से कृषि विशेषज्ञों की टीम को बुलाया और उन्होंने सरकारी खर्चे पर पूरे देश का भ्रमण किया फिर अपनी एक रिपोर्ट पेश की कि “भारत के किसान क्योंकि परंपरागत तरीके से कृषि करते हैं, इसलिए भारत में कृषि उत्पाद कम पैदा होता है | अतः भारत के किसानों को परंपरागत तरीके से कृषि को छोड़कर यूरिया, फ़र्टिलाइज़र, पेस्टिसाइड आदि पर आधारित आधुनिक पद्धति से ट्रेक्टर, थ्रेशर, हार्वेस्टर आदि के द्वारा कृषि करना चाहिए | 
दूसरा उससे भी महत्वपूर्ण जो सुझाव दिया वह यह था कि “भारत के अंदर अनुपयोगी आवारा गोवंशीय पशु बहुत अधिक है | जो खेतों में घुसकर कृषि का नुकसान करते हैं | अतः उन्हें तत्काल प्रभाव से वध करके समाप्त कर दिया जाना चाहिए |”
भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने दोनों ही सुझावों पर बड़ी गंभीरता से कार्य प्रारंभ किया | पूरे देश भर में जगह-जगह यूरिया, फ़र्टिलाइज़र, पेस्टिसाइड, ट्रेक्टर, थ्रेशर, हार्वेस्टर आदि बनाने के लिए विदेशी पूंजीपतियों को आमंत्रित किया और भारत सरकार ने स्वयं अपने भी कोष से धन लगाकर पूरे भारत में अनेक स्थानों पर यूरिया, फ़र्टिलाइज़र, पेस्टिसाइड, ट्रेक्टर, थ्रेशर, हार्वेस्टर आदि बनाने के कारखाने डाल दिये |
अब दूसरा विषय था भारत के तथाकथित अनुपयोगी, आवारा गोवंशीय पशुओं को कैसे नियंत्रित किया जाए | तो इसके लिए भारतीय संविधान के अंतर्गत क्योंकि गौवंशीय  पशुओं का संरक्षण एवं संवर्धन राज्य सरकारों का विषय है ( जिसमें गोहत्या नहीं आती फिर भी ) | भारत के सभी राज्य सरकारों को यह निर्देश दिया गया कि “सर्वप्रथम वह अपने-अपने राज्यों में अनुपयोगी, आवारा गोवंशीय पशुओं के वध की व्यवस्था सुनिश्चित करें | 
अतः राज्य सरकारों ने अपने प्रत्येक जिले के नगर निगम व जिला परिषद को निर्देशित कर शहर-शहर में वधशालाओं की स्थापना शुरू कर दी | जो जिला परिषद और नगर निगम के नियंत्रण में थी  तथा राज्यों ने “गोवध निवारण अधिनियम” के तहत इन वधशालाओं को गोवंशीय पशुओं का वध करने या करवाने का लाइसेंस जारी करने का अधिकार दे दिया गया | जिस कानून के अनुसार 15 वर्ष से अधिक अनुपयोगी गोवंशीय पशुओं का वध किया जा सकता था | जो  वध क्षेत्रीय सरकारी पशु चिकित्सक के द्वारा दिए गए प्रमाणपत्र के बाद ही किया जा सकेगा | किंतु भ्रष्टाचार की असीम कृपा प्राप्त करके सरकारी पशु चिकित्सकों ने न केवल नितांत उपयोगी बल्कि छोटे-छोटे बछड़ों को भी 15 वर्ष से अधिक अनुपयोगी गोवंशीय पशु  मानकर पशुओं को वध योग्य बतलाकर उनके वध का प्रमाण पत्र जारी कर दिया और इस तरह भारत के अंदर प्रत्येक जिले ही नहीं बल्कि  अधिकांश गांव में भी गोवध किया जाने लगा |  जो बाद में क्षेत्रीय पुलिस की मिलीभगत से निरंतर बढ़ता ही गया और कुटीर उद्योग में परिवर्तित हो गया | आज कुछ गोहत्यारे इसे मौलिक अधिकार भी मानते हैं |
एक संत प्रवित्ति के IAS अधिकारी श्री राजीव गुप्ता जो कि वर्ष 2001 में उत्तर प्रदेश  सरकार में पशुधन सचिव के पद पर कार्यरत थे | उनके मन में यह प्रेरणा हुई कि उत्तर प्रदेश में गौ वध को रोकने के लिए उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम 1955 के अंदर कुछ ऐसे संशोधन किए जायें, जिससे कम से कम उत्तर प्रदेश की जमीन पर तो पूरी तरह गौ हत्या रोकी जा सके | 
इसके लिए उन्होंने अपने विधि परामर्शी और विशेष कार्य अधिकारी श्री रतन कुमार श्रीवास्तव जी को इस दिशा में कार्य करने के लिए निर्देशित किया | संयोगवश मैं भी उस समय उत्तर प्रदेश में ही रतन कुमार श्रीवास्तव जी के साथ गौ हत्या को रोकने की दिशा में कार्य कर रहा था | अतः ईश्वर की कृपा से हम सभी लोगों ने मिलकर उत्तर प्रदेश में पूर्ण गोवध रोकने हेतु “उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम 1955” में कुछ गंभीर संशोधन किये | जिसे बाद में राज्य सरकार द्वारा स्वीकृति प्राप्त हो गई | 
इस तरह  संपूर्ण भारत में सर्वप्रथम  उत्तर प्रदेश ही ऐसा राज्य बना जहां गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध वर्ष में 2002 लागू हुआ | बाद को इसी अधिनियम को आदर्श मानकर अन्य राज्यों ने भी अपने राज्य में गोहत्या रोकने हेतु कानून में संशोधन किये | आज उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे बड़े-बड़े राज्यों में पूर्ण  गोवध निषेध का कानून प्रभावशाली तरीके से कार्य कर रहा है | आवश्यकता है जो राज्य बच गए हैं उनमें भी यह कानून प्रभावशाली तरीके से लागू करवाया जाए जिससे भारत को पुनः गोहत्या मुक्त राष्ट्र बनाया जा सके |
योगेश कुमार मिश्र 

9451252162

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भारतीय नस्ल के गोवंश को समाप्त करने के लिए ही हुई थी श्वेत क्रांति”

 

 

भारत में अंग्रेजों  के विरुद्ध 1857 का विद्रोह हो चुका था | हिंदुस्तान के कुछ गद्दार राजाओं का समर्थन मिलने की वजह से अंग्रेजों ने इस स्वतंत्रता संग्राम को पूरी तरह कुचल दिया था | राष्ट्र के लिए अंग्रेजो के विरुद्ध हथियार उठाने वालों को चुन-चुन कर अंग्रेजों द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर उल्टा लटका कर जिंदा आग में जला कर भून दिया गया था और कुछ लोगों को सरेआम पेड़ों पर लटका कर फांसी दे दी गई थी | शहीदों की लाशें तब तक लटकती रहीं जब तक उनमें बदबू नहीं आने लगी और उन्हें चील कौए नोंच-नोंच कर नहीं खाने लगे | लोग इन लाशों को कोई उतार न ले इसलिए पुलिस के हिंदुस्तानी सिपाही इन लाशो की हिफाजत में बन्दूक लेकर तैनात थे | 
ब्रिटेन के संसद से भारतीयों को दण्डित व नियंत्रित करने के लिए “भारतीय दंड संहिता 1860”  लागू हो गई थी | साथ ही भारतीयों के हथियार रखने के अधिकार को समाप्त करने के लिए “आर्म्स एक्ट 1878” भी लागू कर दिया गया था | विद्रोह को इस बुरी तरह से कुचला गया था ताकि अब अंग्रेजों के लूट के विरुद्ध आवाज उठाने वाला कोई भी व्यक्ति न बच सके | इसमें बहुत से निर्दोष हिंदुस्तानियों को भी तोप के मुहाने पर बांधकर उड़ा दिया गया था |

 

भारतीयों को बीमार और कमजोर करने के लिए भारत से लूटी गई संपदा से ब्रिटेन के अंदर बड़ी-बड़ी एलोपैथी दवाओं के निर्माण के लिये प्रयोगशालाएं स्थापित की जाने लगी थी | जिनमें एलोपैथी दवाइयों का निर्माण शुरू हो गया था और इन दवाओं की खपत के लिए भारत के अंदर ब्रिटिश सत्ताधारियों द्वारा तरह-तरह के वायरस छोड़े कर चेचक, प्लीज, हैजा, जैसे गंभीर रोग हिंदुस्तान में फैला कर बड़ी संख्या में हिन्दुस्तानियों की हत्या की जाने लगी थी | किंतु ब्रिटिश डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने देखा के हिंदुस्तान के अंदर यह वायरस उतने प्रभावशाली नहीं थे, जितने अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों में थे | परिणामत: एलोपैथी दवाइयों की खपत अन्य ब्रिटिश उपनिवेश के मुकाबले भारत में काफी कम थी | अब इन वायरसों के भारत में कम प्रभावी होने का कारण ढूंढा जाने लगा |

 

निष्कर्ष यह निकला के भारत के अंदर  भारतीय ऋषियों द्वारा तैयार किया गया जो भारतीय नस्ल का गोवंश था, वह एक विशेष तरह का दूध देता है | जिसके अंदर प्राकृतिक रूप से सुपाच्य स्वर्ण होता है | यही सुपाच्य स्वर्ण भारतीयों के अंदर “रोग प्रतिरोधक क्षमता” विकसित करता है क्योंकि भारतीय ऋषियों द्वारा विकसित किये गये गोवंश की पीठ पर एक विशेष तरह की “सूर्यकेतु नाड़ी” होती है जो सूर्य से ऊर्जा लेकर सुपाच्य स्वर्ण अपने अंदर विकसित करती है | यही सुपाच्य स्वर्ण भारतीयों को रोगी होने से बचाती है | जिसका निरंतर प्रयोग करने के कारण हिंदुस्तानियों के शरीर में एक ऐसी अद्भुत रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई है, जिसके ऊपर ब्रिटिश प्रयोगशालाओं में तैयार किया गया कोई भी घातक से घातक वायरस असर नहीं करता | 
अब एलोपैथी दवाइयों का उत्पादन और व्यवसाय करने वालों के आगे यह समस्या थी कि वह इन भारतीय नस्ल के गौवंशों को कैसे समाप्त करें | इसके लिए अनेक भारतीय  डॉक्टर और वैज्ञानिकों को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश की जाने लगी तथा भारतीय गोवंश की कमियाँ बतलाई जाने लगी | किंतु आस्था और संस्कार के कारण भारतीय डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के प्रयास के बाद भी भारतीय नस्ल के गोवंशों के विरुद्ध ब्रिटिश एलोपैथी व्यवसाइयों का यह षड्यंत्र सफल नहीं हुआ | 

 

अतः कालांतर में भारतीय नस्ल के गोवंश को समाप्त करने के लिए दूसरा रास्ता अपनाया गया | वह था “श्वेत क्रांति” इस श्वेत क्रांति में यह तय किया गया कि यदि भारत के अंदर भारतीय नस्ल के गोवंश को समाप्त करके फ्रीजियन या जर्सी नस्ल के गोवंश को पालने की आदत भारतीयों में  अधिक दूध प्राप्त करने का लालच देकर पैदा कर दी जाए | तो भारतीय स्वयं ही भारतीय नस्ल का गोवंश छोड़कर फ्रीजियन और जर्सी नस्ल के गोवंश का पालन शुरू कर देंगे | 
इसके लिये भारतीय नस्ल के  “बैल व सांड़” को ट्रैक्टर की आड़ में अनुपयोगी पशु बतला कर खत्म करने के लिए पूरे देश भर में पशु कत्लखानों की स्थापना की जाने लगी | जिसमें भारतीय नस्ल के “बैल व सांड़” खुलेआम लाइसेंस देकर कत्ल किए जाने लगे | जिस कारण से भारतीय नस्ल की गायों को प्रजनन हेतु “बैल व सांड़” मिलने बंद हो गए | अतः मजबूरीवश फ्रीजियन और जर्सी नस्ल के गोवंश से भारतीय नस्ल के गायों का प्रजनन करवाया जाने लगा | इस कार्य के लिए भारत वर्ष में सन् 1937 में पैलेस डेयरी फार्म मैसूर में पहला  “कृतिम गर्भाधान विभाग” का निर्माण किया गया | आज भी का पशुपालन विभाग के अधीन “कृतिम गर्भाधान विभाग” द्वारा फ्रीजियन और जर्सी नस्ल के गोवंश के वीर्य को संग्रह करके भारतीय नस्ल की गायों में प्रजनन हेतु प्रयोग किया जाता है |

 

 और इसके अलावा बैंकों के माध्यम से फ्रीजियन और जर्सी नस्ल की गाय व भैंसों को खरीदने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में किसानों और दुग्ध व्यवसायियों को कर्ज का लालच दिया जाने लगा | धन के लालच में लाखों की संख्या में भारतीय किसानों और दुग्ध व्यवसायियों होने फ्रीजियन और जर्सी नस्ल की गाय तथा भैंसों को पालना शुरू कर दिया कालांतर में यह  प्रचार किया जाने लगा कि भारतीय नस्ल का गोवंश कम दूध देता है | अतः आर्थिक दृष्टिकोण से यह उपयोगी नहीं है |
 

यह सारे प्रयास “श्वेत क्रांति” योजना के तहत किये गये | इस तरह “श्वेत क्रांति” के नाम पर भारत में अमृत तुल्य दूध देने वाली भारतीय नस्ल के गोवंश को योजनाबद्ध तरीके से समाप्त कर दिया गया और उसके स्थान पर फ्रीजियन और जर्सी नस्ल एवं भैसों का प्रयोग किया जाने लगा |

 

 

अगर भारत को पुनः स्वस्थ बनाना है तो भारत के अंदर भारतीय ऋषियों द्वारा विकसित
 “भारतीय नस्ल का गोवंश”

स्थापित करना होगा  फ्रीजियन ,जर्सी नस्ल या भैंस के स्थान पर |
Subham varma

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भारतीय नस्ल के गोवंश को समाप्त करने के लिए हुई थी “श्वेत क्रांति”

 

 

भारत में अंग्रेजों  के विरुद्ध 1857 का विद्रोह हो चुका था | हिंदुस्तान के कुछ गद्दार राजाओं का समर्थन मिलने की वजह से अंग्रेजों ने इस स्वतंत्रता संग्राम को पूरी तरह कुचल दिया था | राष्ट्र के लिए अंग्रेजो के विरुद्ध हथियार उठाने वालों को चुन-चुन कर अंग्रेजों द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर उल्टा लटका कर जिंदा आग में जला कर भून दिया गया था और कुछ लोगों को सरेआम पेड़ों पर लटका कर फांसी दे दी गई थी | शहीदों की लाशें तब तक लटकती रहीं जब तक उनमें बदबू नहीं आने लगी और उन्हें चील कौए नोंच-नोंच कर नहीं खाने लगे | लोग इन लाशों को कोई उतार न ले इसलिए पुलिस के हिंदुस्तानी सिपाही इन लाशो की हिफाजत में बन्दूक लेकर तैनात थे | 
ब्रिटेन के संसद से भारतीयों को दण्डित व नियंत्रित करने के लिए “भारतीय दंड संहिता 1860”  लागू हो गई थी | साथ ही भारतीयों के हथियार रखने के अधिकार को समाप्त करने के लिए “आर्म्स एक्ट 1878” भी लागू कर दिया गया था | विद्रोह को इस बुरी तरह से कुचला गया था ताकि अब अंग्रेजों के लूट के विरुद्ध आवाज उठाने वाला कोई भी व्यक्ति न बच सके | इसमें बहुत से निर्दोष हिंदुस्तानियों को भी तोप के मुहाने पर बांधकर उड़ा दिया गया था |

 

भारत से लूटी गई संपदा से ब्रिटेन के अंदर बड़ी-बड़ी एलोपैथी दवाओं के निर्माण के लिये प्रयोगशालाएं स्थापित की जाने लगी थी | जिनमें एलोपैथी दवाइयों का निर्माण शुरू हो गया था और इन दवाओं की खपत के लिए भारत के अंदर ब्रिटिश सत्ताधारियों द्वारा तरह-तरह के वायरस छोड़े कर चेचक, प्लीज, हैजा, जैसे गंभीर रोग हिंदुस्तान में फैला कर बड़ी संख्या में हिन्दुस्तानियों की हत्या की जाने लगी थी | किंतु ब्रिटिश डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने देखा के हिंदुस्तान के अंदर यह वायरस उतने प्रभावशाली नहीं थे, जितने अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों में थे | परिणामत: एलोपैथी दवाइयों की खपत अन्य ब्रिटिश उपनिवेश के मुकाबले भारत में काफी कम थी | अब इन वायरसों के भारत में कम प्रभावी होने का कारण ढूंढा जाने लगा |

 

निष्कर्ष यह निकला के भारत के अंदर  भारतीय ऋषियों द्वारा तैयार किया गया जो भारतीय नस्ल का गोवंश था, वह एक विशेष तरह का दूध देता है | जिसके अंदर प्राकृतिक रूप से सुपाच्य स्वर्ण होता है | यही सुपाच्य स्वर्ण भारतीयों के अंदर “रोग प्रतिरोधक क्षमता” विकसित करता है क्योंकि भारतीय ऋषियों द्वारा विकसित किये गये गोवंश की पीठ पर एक विशेष तरह की “सूर्यकेतु नाड़ी” होती है जो सूर्य से ऊर्जा लेकर सुपाच्य स्वर्ण अपने अंदर विकसित करती है | यही सुपाच्य स्वर्ण भारतीयों को रोगी होने से बचाती है | जिसका निरंतर प्रयोग करने के कारण हिंदुस्तानियों के शरीर में एक ऐसी अद्भुत रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई है, जिसके ऊपर ब्रिटिश प्रयोगशालाओं में तैयार किया गया कोई भी घातक से घातक वायरस असर नहीं करता | 
अब एलोपैथी दवाइयों का उत्पादन और व्यवसाय करने वालों के आगे यह समस्या थी कि वह इन भारतीय नस्ल के गौवंशों को कैसे समाप्त करें | इसके लिए अनेक भारतीय  डॉक्टर और वैज्ञानिकों को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश की जाने लगी तथा भारतीय गोवंश की कमियाँ बतलाई जाने लगी | किंतु आस्था और संस्कार के कारण भारतीय डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के प्रयास के बाद भी भारतीय नस्ल के गोवंशों के विरुद्ध ब्रिटिश एलोपैथी व्यवसाइयों का यह षड्यंत्र सफल नहीं हुआ | 

 

अतः कालांतर में भारतीय नस्ल के गोवंश को समाप्त करने के लिए दूसरा रास्ता अपनाया गया | वह था “श्वेत क्रांति” इस श्वेत क्रांति में यह तय किया गया कि यदि भारत के अंदर भारतीय नस्ल के गोवंश को समाप्त करके फ्रीजियन या जर्सी नस्ल के गोवंश को पालने की आदत भारतीयों में  अधिक दूध प्राप्त करने का लालच देकर पैदा कर दी जाए | तो भारतीय स्वयं ही भारतीय नस्ल का गोवंश छोड़कर फ्रीजियन और जर्सी नस्ल के गोवंश का पालन शुरू कर देंगे | 
इसके लिये भारतीय नस्ल के  “बैल व सांड़” को अनुपयोगी पशु बतला कर खत्म करने के लिए पूरे देश भर में पशु कत्लखानों की स्थापना की जाने लगी | जिसमें भारतीय नस्ल के “बैल व सांड़” खुलेआम लाइसेंस देकर कत्ल किए जाने लगे | जिस कारण से भारतीय नस्ल की गायों को प्रजनन हेतु “बैल व सांड़” मिलने बंद हो गए | अतः मजबूरीवश फ्रीजियन और जर्सी नस्ल के गोवंश से भारतीय नस्ल के गायों का प्रजनन करवाया जाने लगा | इस कार्य के लिए भारत वर्ष में सन् 1937 में पैलेस डेयरी फार्म मैसूर में पहला  “कृतिम गर्भाधान विभाग” का निर्माण किया गया | आज भी का पशुपालन विभाग के अधीन “कृतिम गर्भाधान विभाग” द्वारा फ्रीजियन और जर्सी नस्ल के गोवंश के वीर्य को संग्रह करके भारतीय नस्ल की गायों में प्रजनन हेतु प्रयोग किया जाता है |

 

 और इसके अलावा बैंकों के माध्यम से फ्रीजियन और जर्सी नस्ल की गाय व भैंसों को खरीदने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में किसानों और दुग्ध व्यवसायियों को कर्ज दिया जाने लगा | धन के लालच में लाखों की संख्या में भारतीय किसानों और दुग्ध व्यवसायियों होने फ्रीजियन और जर्सी नस्ल की गाय तथा भैंसों को पालना शुरू कर दिया कालांतर में यह  प्रचार किया जाने लगा कि भारतीय नस्ल का गोवंश कम दूध देता है | अतः आर्थिक दृष्टिकोण से यह उपयोगी नहीं है |
 

यह सारे प्रयास “श्वेत क्रांति” योजना के तहत किये गये | इस तरह “श्वेत क्रांति” के नाम पर भारत में अमृत तुल्य दूध देने वाली भारतीय नस्ल के गोवंश को योजनाबद्ध तरीके से समाप्त कर दिया गया और उसके स्थान पर फ्रीजियन और जर्सी नस्ल का गोवंश एवं भैसों का प्रयोग किया जाने लगा |

 

 

अगर भारत को पुनः स्वस्थ करना है तो “योगा” के नाम पर शारीरिक व्यायाम करने से भारत स्वस्थ नहीं होगा बल्कि भारत के अंदर पुनः भारतीय ऋषि द्वारा विकसित “भारतीय नस्ल का गोवंश” ही  दूध के लिए फ्रीजियन और जर्सी नस्ल का गोवंश या भैंस के स्थान पर स्थापित करना होगा |

 

योगेश कुमार मिश्र 

9451252162

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THE COW IS A WONDERFUL LABORATORY


अमेरिका के कृषि विभाग द्वारा प्रकाशित हुई पुस्तक ”
जरूर पढ़ें और आगे शेयर करें…
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“THE COW IS A WONDERFUL LABORATORY” के अनुसार-
प्रकृति के समस्त जीव-जंतुओं और सभी दुग्धधारी जीवों में केवल गाय ही है जिसे ईश्वर ने 180 फुट (2160 इंच ) लम्बी आँत दी है, जिसके कारण गाय जो भी खाती-पीती है वह अंतिम छोर तक जाता है।

लाभ :-
1) जिस प्रकार दूध से मक्खन निकालने वाली मशीन में जितनी अधिक गरारियां लगायी जाती है उससे उतना ही वसा रहित मक्खन निकलता है, इसी प्रकार गाय की आँत में दूध बनने की प्रक्रिया होती है। इसीलिये गाय का दूध सर्वोत्तम होता है।

2) गो वात्सल्य- देशी गाय बछेरु जनने के 18 घंटे तक अपने बच्चे के साथ रहती है और उसे चाटती है इसीलिए वह लाखों बछेरुओं में भी अपने बच्चे को पहचान लेती है। जबकि भैंस और जरसी गाय अपने बच्चे को नहीं पहचान पाती हैं।
गाय जब तक अपने बच्चे को अपना दूध नहीं पिलाती, तब तक दूध नहीं देती है। जबकि भैस, जर्सी होलिस्टयन के आगे चारा डालकर उनका दूध दुहा जा सकता है।बच्चों में क्रूरता इसीलिए बढ़ रही है क्योंकि आजकल बच्चे जिनका दूध पी रहे हैं, उनके अन्दर ममता नहीं है।

3) चीका/खीस- बच्चा देने के बाद गाय के स्तन से जो दूध निकलता है उसे खीस, चाका, पेवस और कीला भी कहते हैं। इसे तुरंत गर्म करने पर फट जाता है। बच्चा जनने के 15 दिनों तक गाय के दूध में प्रोटीन की अपेक्षा खनिज तत्वों की मात्रा अधिक होती है जैसे लेक्टोज, वसा (फैट) एवं पानी की मात्रा कम होती है। चीके वाले दूध में एल्व्युमिन दो गुनी, ग्लोव्लुलिन 12-15 गुनी तथा एल्युमीनियम की मात्रा 6 गुनी अधिक पायी जाती है। लाभ:- काली गाय के दूध/चीके का एक हफ्ते सेवन करने से वर्षो पुरानी टीबी ख़त्म हो जाती है।

4) सींग- गाय के सींगो का आकर सामान्यतः पिरामिड जैसा होता है, जोकि शक्तिशाली एंटीना की तरह आकाशीय उर्जा (कोस्मिक एनर्जी) को संग्रह करने का कार्य करते हैं।

5) गाय के गले की झालर- गाय के कुकुद्द में सूर्यकेतु नाड़ी होती है जो सूर्य से अल्ट्रावायलेट किरणों को रोकती है , गाये के 40 मन दूध में लगभग 10 ग्राम सोना पाया जाता है जिससे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसीलिए गाय का घी हल्के पीले रंग का होता है।

6) गाय के दूध के अन्दर जल = 87 %, वसा = 4 %, प्रोटीन = 4%, शर्करा = 5 %, तथा अन्य तत्व 1 से 2 % प्रतिशत पाए जाते हैं।
गाय के दूध में 8 प्रकार के प्रोटीन्स, 11 प्रकार के विटामिन्स, गाय के दूध में ‘कैरोटिन‘ नामक पदार्थ भैस के दूध से दस गुना अधिक होता है।
भैस का दूध गर्म करने पर उसके ज्यादातर पोषक-तत्व ख़त्म हो जाते हैं, परन्तु गाय के दूध के पोषक तत्व गर्म करने पर भी सुरक्षित रहते हैं।

7) गोमूत्र- गाय के मूत्र में आयुर्वेद का खजाना होता है। इसके अन्दर कार्बोलिक एसिड होता है जो कीटाणु नाशक है। गौमूत्र चाहे जितने दिनों तक रखें, ख़राब नहीं होता है। इसमें कैसर को रोकने वाली ‘करक्यूमिन‘ पाई जाती है। गौमूत्र- नाइट्रोजन, फास्फेट, यूरिक एसिड, पोटेशियम, सोडियम, लैक्टोज, सल्फर, अमोनिया आदि लवण रहित विटामिन ‘ए’, ‘बी’, ‘सी’, ‘डी’, ‘ई’, तथा स्वास्थ्यप्रद एंजाइम्स आदि तत्व पाए जाते हैं।

8) देसी गाय के गोबर-मूत्र-मिश्रण से “प्रोपिलीन ऑक्साइड” नामक गैस उत्पन्न होती है जो बारिस लाने में सहायक होती है। इसी मिश्रण से “इथिलीन ऑक्साइड” गैस निकलती है जो ऑपरेशन थियटर में काम आता है।
गौ मूत्र में मुख्यतः 16 खनिज तत्व पाए जाते हैं जो शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।

9) गाय के शरीर से पवित्र गुग्गल जैसी सुगंध आती है जो वातावरण को शुद्ध और पवित्र करती है।
*जननी जनकार दूध पिलाती, केवल साल छमाही भर।* *गोमाता पय-सुधा पिलाती, रक्षा करती जीवन भर।*
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प्रणाम!

– डाक्टर वैद्य पंडित विनय कुमार उपाध्याय