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भारतीय नस्ल के गोवंश को समाप्त करने के लिए हुई थी “श्वेत क्रांति”

 

 

भारत में अंग्रेजों  के विरुद्ध 1857 का विद्रोह हो चुका था | हिंदुस्तान के कुछ गद्दार राजाओं का समर्थन मिलने की वजह से अंग्रेजों ने इस स्वतंत्रता संग्राम को पूरी तरह कुचल दिया था | राष्ट्र के लिए अंग्रेजो के विरुद्ध हथियार उठाने वालों को चुन-चुन कर अंग्रेजों द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर उल्टा लटका कर जिंदा आग में जला कर भून दिया गया था और कुछ लोगों को सरेआम पेड़ों पर लटका कर फांसी दे दी गई थी | शहीदों की लाशें तब तक लटकती रहीं जब तक उनमें बदबू नहीं आने लगी और उन्हें चील कौए नोंच-नोंच कर नहीं खाने लगे | लोग इन लाशों को कोई उतार न ले इसलिए पुलिस के हिंदुस्तानी सिपाही इन लाशो की हिफाजत में बन्दूक लेकर तैनात थे | 
ब्रिटेन के संसद से भारतीयों को दण्डित व नियंत्रित करने के लिए “भारतीय दंड संहिता 1860”  लागू हो गई थी | साथ ही भारतीयों के हथियार रखने के अधिकार को समाप्त करने के लिए “आर्म्स एक्ट 1878” भी लागू कर दिया गया था | विद्रोह को इस बुरी तरह से कुचला गया था ताकि अब अंग्रेजों के लूट के विरुद्ध आवाज उठाने वाला कोई भी व्यक्ति न बच सके | इसमें बहुत से निर्दोष हिंदुस्तानियों को भी तोप के मुहाने पर बांधकर उड़ा दिया गया था |

 

भारत से लूटी गई संपदा से ब्रिटेन के अंदर बड़ी-बड़ी एलोपैथी दवाओं के निर्माण के लिये प्रयोगशालाएं स्थापित की जाने लगी थी | जिनमें एलोपैथी दवाइयों का निर्माण शुरू हो गया था और इन दवाओं की खपत के लिए भारत के अंदर ब्रिटिश सत्ताधारियों द्वारा तरह-तरह के वायरस छोड़े कर चेचक, प्लीज, हैजा, जैसे गंभीर रोग हिंदुस्तान में फैला कर बड़ी संख्या में हिन्दुस्तानियों की हत्या की जाने लगी थी | किंतु ब्रिटिश डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने देखा के हिंदुस्तान के अंदर यह वायरस उतने प्रभावशाली नहीं थे, जितने अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों में थे | परिणामत: एलोपैथी दवाइयों की खपत अन्य ब्रिटिश उपनिवेश के मुकाबले भारत में काफी कम थी | अब इन वायरसों के भारत में कम प्रभावी होने का कारण ढूंढा जाने लगा |

 

निष्कर्ष यह निकला के भारत के अंदर  भारतीय ऋषियों द्वारा तैयार किया गया जो भारतीय नस्ल का गोवंश था, वह एक विशेष तरह का दूध देता है | जिसके अंदर प्राकृतिक रूप से सुपाच्य स्वर्ण होता है | यही सुपाच्य स्वर्ण भारतीयों के अंदर “रोग प्रतिरोधक क्षमता” विकसित करता है क्योंकि भारतीय ऋषियों द्वारा विकसित किये गये गोवंश की पीठ पर एक विशेष तरह की “सूर्यकेतु नाड़ी” होती है जो सूर्य से ऊर्जा लेकर सुपाच्य स्वर्ण अपने अंदर विकसित करती है | यही सुपाच्य स्वर्ण भारतीयों को रोगी होने से बचाती है | जिसका निरंतर प्रयोग करने के कारण हिंदुस्तानियों के शरीर में एक ऐसी अद्भुत रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई है, जिसके ऊपर ब्रिटिश प्रयोगशालाओं में तैयार किया गया कोई भी घातक से घातक वायरस असर नहीं करता | 
अब एलोपैथी दवाइयों का उत्पादन और व्यवसाय करने वालों के आगे यह समस्या थी कि वह इन भारतीय नस्ल के गौवंशों को कैसे समाप्त करें | इसके लिए अनेक भारतीय  डॉक्टर और वैज्ञानिकों को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश की जाने लगी तथा भारतीय गोवंश की कमियाँ बतलाई जाने लगी | किंतु आस्था और संस्कार के कारण भारतीय डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के प्रयास के बाद भी भारतीय नस्ल के गोवंशों के विरुद्ध ब्रिटिश एलोपैथी व्यवसाइयों का यह षड्यंत्र सफल नहीं हुआ | 

 

अतः कालांतर में भारतीय नस्ल के गोवंश को समाप्त करने के लिए दूसरा रास्ता अपनाया गया | वह था “श्वेत क्रांति” इस श्वेत क्रांति में यह तय किया गया कि यदि भारत के अंदर भारतीय नस्ल के गोवंश को समाप्त करके फ्रीजियन या जर्सी नस्ल के गोवंश को पालने की आदत भारतीयों में  अधिक दूध प्राप्त करने का लालच देकर पैदा कर दी जाए | तो भारतीय स्वयं ही भारतीय नस्ल का गोवंश छोड़कर फ्रीजियन और जर्सी नस्ल के गोवंश का पालन शुरू कर देंगे | 
इसके लिये भारतीय नस्ल के  “बैल व सांड़” को अनुपयोगी पशु बतला कर खत्म करने के लिए पूरे देश भर में पशु कत्लखानों की स्थापना की जाने लगी | जिसमें भारतीय नस्ल के “बैल व सांड़” खुलेआम लाइसेंस देकर कत्ल किए जाने लगे | जिस कारण से भारतीय नस्ल की गायों को प्रजनन हेतु “बैल व सांड़” मिलने बंद हो गए | अतः मजबूरीवश फ्रीजियन और जर्सी नस्ल के गोवंश से भारतीय नस्ल के गायों का प्रजनन करवाया जाने लगा | इस कार्य के लिए भारत वर्ष में सन् 1937 में पैलेस डेयरी फार्म मैसूर में पहला  “कृतिम गर्भाधान विभाग” का निर्माण किया गया | आज भी का पशुपालन विभाग के अधीन “कृतिम गर्भाधान विभाग” द्वारा फ्रीजियन और जर्सी नस्ल के गोवंश के वीर्य को संग्रह करके भारतीय नस्ल की गायों में प्रजनन हेतु प्रयोग किया जाता है |

 

 और इसके अलावा बैंकों के माध्यम से फ्रीजियन और जर्सी नस्ल की गाय व भैंसों को खरीदने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में किसानों और दुग्ध व्यवसायियों को कर्ज दिया जाने लगा | धन के लालच में लाखों की संख्या में भारतीय किसानों और दुग्ध व्यवसायियों होने फ्रीजियन और जर्सी नस्ल की गाय तथा भैंसों को पालना शुरू कर दिया कालांतर में यह  प्रचार किया जाने लगा कि भारतीय नस्ल का गोवंश कम दूध देता है | अतः आर्थिक दृष्टिकोण से यह उपयोगी नहीं है |
 

यह सारे प्रयास “श्वेत क्रांति” योजना के तहत किये गये | इस तरह “श्वेत क्रांति” के नाम पर भारत में अमृत तुल्य दूध देने वाली भारतीय नस्ल के गोवंश को योजनाबद्ध तरीके से समाप्त कर दिया गया और उसके स्थान पर फ्रीजियन और जर्सी नस्ल का गोवंश एवं भैसों का प्रयोग किया जाने लगा |

 

 

अगर भारत को पुनः स्वस्थ करना है तो “योगा” के नाम पर शारीरिक व्यायाम करने से भारत स्वस्थ नहीं होगा बल्कि भारत के अंदर पुनः भारतीय ऋषि द्वारा विकसित “भारतीय नस्ल का गोवंश” ही  दूध के लिए फ्रीजियन और जर्सी नस्ल का गोवंश या भैंस के स्थान पर स्थापित करना होगा |

 

योगेश कुमार मिश्र 

9451252162

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THE COW IS A WONDERFUL LABORATORY

अमेरिका के कृषि विभाग द्वारा प्रकाशित हुई पुस्तक ”
जरूर पढ़ें और आगे शेयर करें…
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“THE COW IS A WONDERFUL LABORATORY” के अनुसार-
प्रकृति के समस्त जीव-जंतुओं और सभी दुग्धधारी जीवों में केवल गाय ही है जिसे ईश्वर ने 180 फुट (2160 इंच ) लम्बी आँत दी है, जिसके कारण गाय जो भी खाती-पीती है वह अंतिम छोर तक जाता है।

लाभ :-
1) जिस प्रकार दूध से मक्खन निकालने वाली मशीन में जितनी अधिक गरारियां लगायी जाती है उससे उतना ही वसा रहित मक्खन निकलता है, इसी प्रकार गाय की आँत में दूध बनने की प्रक्रिया होती है। इसीलिये गाय का दूध सर्वोत्तम होता है।

2) गो वात्सल्य- देशी गाय बछेरु जनने के 18 घंटे तक अपने बच्चे के साथ रहती है और उसे चाटती है इसीलिए वह लाखों बछेरुओं में भी अपने बच्चे को पहचान लेती है। जबकि भैंस और जरसी गाय अपने बच्चे को नहीं पहचान पाती हैं।
गाय जब तक अपने बच्चे को अपना दूध नहीं पिलाती, तब तक दूध नहीं देती है। जबकि भैस, जर्सी होलिस्टयन के आगे चारा डालकर उनका दूध दुहा जा सकता है।बच्चों में क्रूरता इसीलिए बढ़ रही है क्योंकि आजकल बच्चे जिनका दूध पी रहे हैं, उनके अन्दर ममता नहीं है।

3) चीका/खीस- बच्चा देने के बाद गाय के स्तन से जो दूध निकलता है उसे खीस, चाका, पेवस और कीला भी कहते हैं। इसे तुरंत गर्म करने पर फट जाता है। बच्चा जनने के 15 दिनों तक गाय के दूध में प्रोटीन की अपेक्षा खनिज तत्वों की मात्रा अधिक होती है जैसे लेक्टोज, वसा (फैट) एवं पानी की मात्रा कम होती है। चीके वाले दूध में एल्व्युमिन दो गुनी, ग्लोव्लुलिन 12-15 गुनी तथा एल्युमीनियम की मात्रा 6 गुनी अधिक पायी जाती है। लाभ:- काली गाय के दूध/चीके का एक हफ्ते सेवन करने से वर्षो पुरानी टीबी ख़त्म हो जाती है।

4) सींग- गाय के सींगो का आकर सामान्यतः पिरामिड जैसा होता है, जोकि शक्तिशाली एंटीना की तरह आकाशीय उर्जा (कोस्मिक एनर्जी) को संग्रह करने का कार्य करते हैं।

5) गाय के गले की झालर- गाय के कुकुद्द में सूर्यकेतु नाड़ी होती है जो सूर्य से अल्ट्रावायलेट किरणों को रोकती है , गाये के 40 मन दूध में लगभग 10 ग्राम सोना पाया जाता है जिससे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसीलिए गाय का घी हल्के पीले रंग का होता है।

6) गाय के दूध के अन्दर जल = 87 %, वसा = 4 %, प्रोटीन = 4%, शर्करा = 5 %, तथा अन्य तत्व 1 से 2 % प्रतिशत पाए जाते हैं।
गाय के दूध में 8 प्रकार के प्रोटीन्स, 11 प्रकार के विटामिन्स, गाय के दूध में ‘कैरोटिन‘ नामक पदार्थ भैस के दूध से दस गुना अधिक होता है।
भैस का दूध गर्म करने पर उसके ज्यादातर पोषक-तत्व ख़त्म हो जाते हैं, परन्तु गाय के दूध के पोषक तत्व गर्म करने पर भी सुरक्षित रहते हैं।

7) गोमूत्र- गाय के मूत्र में आयुर्वेद का खजाना होता है। इसके अन्दर कार्बोलिक एसिड होता है जो कीटाणु नाशक है। गौमूत्र चाहे जितने दिनों तक रखें, ख़राब नहीं होता है। इसमें कैसर को रोकने वाली ‘करक्यूमिन‘ पाई जाती है। गौमूत्र- नाइट्रोजन, फास्फेट, यूरिक एसिड, पोटेशियम, सोडियम, लैक्टोज, सल्फर, अमोनिया आदि लवण रहित विटामिन ‘ए’, ‘बी’, ‘सी’, ‘डी’, ‘ई’, तथा स्वास्थ्यप्रद एंजाइम्स आदि तत्व पाए जाते हैं।

8) देसी गाय के गोबर-मूत्र-मिश्रण से “प्रोपिलीन ऑक्साइड” नामक गैस उत्पन्न होती है जो बारिस लाने में सहायक होती है। इसी मिश्रण से “इथिलीन ऑक्साइड” गैस निकलती है जो ऑपरेशन थियटर में काम आता है।
गौ मूत्र में मुख्यतः 16 खनिज तत्व पाए जाते हैं जो शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।

9) गाय के शरीर से पवित्र गुग्गल जैसी सुगंध आती है जो वातावरण को शुद्ध और पवित्र करती है।
*जननी जनकार दूध पिलाती, केवल साल छमाही भर।* *गोमाता पय-सुधा पिलाती, रक्षा करती जीवन भर।*
🙏🙏 🚩 🙏🙏
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प्रणाम!

– डाक्टर वैद्य पंडित विनय कुमार उपाध्याय

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आश्चर्य इस बात का नहीं है कि कांग्रेसी कौमी दोगलों ने गाय को केरल में सरेआम सरेशाम काटा

आश्चर्य इस बात का भी नहीं है कि एनडीटीवी जैसे दोगले मीडिया संस्थानों ने तुरंत ही गाय की जगह भैंस ( Cow slaughter को Buffalo slaughter) के कत्ल से बदल दिया।

हैरानी इस बात की भी नहीं है कि इस मुल्क का नपुंसक हिंदू चुप रहा। यदि हिंदुओं का ऐसा हाल नहीं रहता, तो यह मुल्क शायद ही 1200 वर्षों तक गुलाम रहता।

….मालदा से लेकर टोंक तक, कैराणा से लेकर दिल्ली तक, हिंदुओं का यही हाल है। इनको दीवार से सटाए जाने पर भी बुद्धि नहीं खुलती है, लेकिन जात पांत के रंग में ज़रूर दुनिया की हरेक चीज रंगी नज़र आती है।

….केरल से पहले महाराष्ट्र में जैन मंदिरों के सामने भी कुछ दोगलों ने मांस पकाया और खाया था, उसके पहले बंगाल में भी। आश्चर्य इस बात का भी नहीं है कि मोदी सरकार ने कोई नया कानून नहीं बनाया है। भारतीय संविधान (जो भीमराव अंबेडकर ने सहेजा था) में उल्लिखित कानून को ही बस अमली जामा पहनाया है।

—-मोहम्मडन पेंटर हुसैन ने सरस्वती की नंगी तस्वीर बनायी, कल परसों कुछ हरामज़ादों ने हनुमानजी की तस्वीर पर जूते चप्पल चलाए। इस देश का कानून सो रहा है।

अगर अब भी समझ नहीं आ रहा है, तो जान लीजिए। हम युद्धक्षेत्र में हैं और चौतरफा घिरे हुए। दुश्मन हमारे बीच भी हैं और चारों ओर भी। कुल मिलाकर यह एक युद्ध है

….नरेंद्र दामोदर दास मोदी हों या योगी आदित्यनाथ, इनको घेरने के लिए हिंजड़ों की फौज इकट्ठा हो गयी है। यह वक्त बिना किसी प्रश्न के, बिना किसी आशंका के इन दोनों और सभी राष्ट्रवादियों के अथक और निरंतर समर्थन का है। सहारनपुर को आग में झुलसाना हो या रामपुर में 10 ‘निरीह’ मोहम्मडन लड़कों द्वारा सरेशाम छेड़खानी, ये सब एक लोकतांत्रिक सरकार से विश्वास हिलाने और किसी भी तरह एक राष्ट्रवादी सरकार को उखाड़ फेंकने की है।

आश्चर्य यह है कि हम जैसे समर्थक भी मोदी सरकार को तीन साल के आधार पर जांचने आंकने लगते हैं।

…यह समय आकलन का नहीं, समर्थन का है, तर्क का नहीं, समर्पण का है, कथनी का नहीं, करनी का है और युद्ध की तैयारी का है।

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✍🏽सहस्त्रबाहु जमदग्नि की गायों का अपहरण कर ले गया 

भगवान श्री परशुराम ने उसके सम्पूर्ण वंश का नाश कर दिया 
✍🏽भूखे शेर ने जब गाय को मारकर खाना चाहा 

तो सम्राट  दिलीप ने  गाय को बचाने लिए स्वयं को सिंह के आगे कर दिया
✍🏽मोहम्मद गौरी ने गायों को आगे कर आक्रमण किया 

प्रथ्वीराज ने तीर चलाने की इजाजत नहीं दी कि गायों को न लगे 
✍🏽मुगलिया शासन में खुलेआम गौ-ह्त्या हुई 

शिवाजी और छत्रसाल ने कसाइयों के हाथ काट दिए 
✍🏽अंग्रेजों ने भारत पर कब्जा किया, लोगों को गुलाम बनाया 

लेकिन जब कारतूसों पर गाय की चर्बी लगाईं, तो क्रान्ति हो गई 
✍🏽अंग्रेजी राज में अंग्रेजों और मुसलमानों ने गायों की ह्त्या की 

तो पंजाब में गायों की रक्षा के लिए, सैकड़ों कूके (नामधारी) शहीद हो गये  
✍🏽इतिहास गवाह है भारतीयों ने अपने ऊपर अत्याचार सह लिया 

लेकिन गायों के ऊपर अत्याचार कभी नहीं सहा.
✍🏽इन गौ-हत्यारों को भी कीमत चुकानी होगी

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गोमांस आदि के प्रचार के लिए लोगों ने जानबूझकर पुस्तकों के गलत अर्थ किये हैं। गोमांस का भोजन दिखाने के लिये पुणे के भण्डारकर शोध संस्थान द्वारा प्रकाशित उत्तर रामचरित की टीका में गलत अर्थ किया गया है। दशरथ जी के पास वसिष्ठ जी किसी चर्चा के लिए आये। अतिथि के लिए वत्सतरी दी गई। उसे वसिष्ठ ने ग्रहण किया तो मड़मड़ का शब्द हुआ-वत्सतरी  मडमडायते। वत्सतरी का अर्थ किया है 2 वर्ष का गाय का वत्स। उसे देखते ही वसिष्ठ ने बछड़े को चबाना शुरू किया। उसकी हड़डियों के टूटने से मडमड का शब्द हुआ। व्याकरण में  कुछ भी व्याख्या करें, मगरमच्छ भी गाय का 2 वर्ष का बछड़ा या तुरंत पैदा हुआ बछड़ा भी अपने मुंह में नहीं ले सकता। 2 वर्ष के बछड़े का प्रायः वयस्क जैसा आकार हो जाता है। मगरमच्छ बकरे को भी बहुत कठिनाई से मुंह में ले पाता है।

वत्सतरी लेने के बाद दशरथ ने कहा कि आपने मधुपर्क ले लिया, अब प्रसंग पर चर्चा करें। इससे स्पष्ट है कि वत्सतरी का अर्थ मधुपर्क है।

कोई भी अतिथि आता है तो थका होता है तथा उसके शरीर में पानी की कमी होती है। अतः उसे पानी तथा ग्लूकोज  (मीठा) किसी रूप में दिया जाता है-यह मधुपर्क हुआ। पेट की सूखी आंत में पानी पहुंचने पर आंत की गति से मडमड शब्द होता है। कुछ लोग मुंह से भी जोर से शब्द निकालते हैं। पानी में चीनी या थोड़ा नमक (गुजराती में इसे भी मीठू कहते हैं) मिलाने पर उससे 1 दिन का बच्चा भी तृप्त हो जाता है। वस्तुतः उनका पेट खराब होने पर यही दवा देते हैं जिसे  ORH कहा जाता है। इसलिए मधुपर्क को ही वत्सतरी कहा है।

इसी प्रकार राहुल सांकृत्यायन ने भी श्वेताश्वतर उपनिषद् के नाम से निष्कर्ष निकाला कि ऋषि केवल घोड़े की हड्डी का सूप पीते थे। अश्व = घोड़ा, उसका श्वेत भाग हड्डी, तर = सूप। कई लोगों को मैंने कहा कि इस उपनिषद् में घोड़ा का कोई शब्द दिखा दें। पर घोड़ा या गाय के मांस का किसी प्रकार अर्थ निकालते ही उनके जीवन का उद्देश्य पूरा हो जाता है, उसके बाद कुछ सुनते या समझते नहीं हैं। 

आकाश में सूर्य अश्व या ऊर्जा का स्रोत है। उसका प्रकाशित क्षेत्र श्वेत अश्व है। उसके परे ब्रह्माण्ड आदि श्वेताश्वतर हैं जिनकी चर्चा इसमें है।

अरुण उपाध्याय

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BUT IT’S HARD TRUTH – दही ले लो, दही। मीठा और ताज़ा दही। पेट को ठंडक पहुंचाने वाला दही

BUT IT’S HARD TRUTH

मेरे गांव में एक महिला सिर पर मटका ले कर घूमती थी और कहती, “दही ले लो, दही। मीठा और ताज़ा दही। पेट को ठंडक पहुंचाने वाला दही।”
मैं मां से पूछता था कि मां, ये दही सिर पर लेकर क्यों घूमती है? मां कहती कि ये दही बेच रही है, बेटा।
“मां, ये दही क्यों बेच रही है?”
“इसके पास गाय है। गाय दूध देती है। हमारे घऱ जो दूध आता है, वो भी यही बेचती है। तुमने देखा होगा, सुबह दूधवाला आता है बाल्टी में दूध लेकर। वो इस दही वाली का पति है। जब दूध बच जाता है, तो उसका दही बना देते हैं और फिर दही बेचते हैं।”
“और दही बच जाए तो?”
“तो उसका घी बना देते हैं। फिर घी बेचते हैं। यही बिजनेस है।”
मेरी मां ने अर्थशास्त्र की पढ़ाई नहीं की थी। पांच साल के . को बिजनेस का मतलब नहीं पता था। लेकिन उस साल गांव जाकर पहली बार मैं बिजनेस का मतलब समझ रहा था। मैं समझ रहा था कि जिसके पास गाय होती है, वो पहले दूध बेचता है। दूध से मुनाफा कम हो तो दही बेचता है और अधिक पैसे चाहिए तो वही घी भी बेचता है।
जैसे-जैसे थोड़ा बड़ा होता गया मैंने सुना कि दूधवाला दूध में अब पानी मिला कर दूध बेचने लगा है। इससे कम दूध ज़्यादा बन जाता है। वाह! क्या बिजनेस है।
यहां तक तो ठीक था। पर बहुत बाद में मैंने सुना कि दूध वाला दूध में यूरिया और पता नहीं क्या-क्या दूध में मिलाने लगा है, जिससे दूध की मात्रा और बढ़ने लगी थी।
मैंने मां से पूछा था कि “मां, क्या ये भी बिजनेस है?”
मां कहती कि नहीं बेटा, “ये चोरी है, बेईमानी है। अपराध है। दूध, दही, घी बेचना बिजनेस है, लेकिन झूठ बोल कर या उसमें मिलावट करके बेचना अपराध है।“
पहली बार मैंने अपराध का मतलब समझा था।
मां की पाठशाला में पढ़ते-पढ़ते ज़िंदगी के पाठ को समझ रहे थे।
“पर मां, दूधवाले का घर तो बहुत बड़ा हो गया है। उसने कई और गाय पाल ली हैं। अब वो दूध की मिठाई भी बनाने लगा है। उसका बिजनेस बढ़ गया है।”
मां कहती थी कि जिस पैसे को बेइमानी से कमाया जाता है, वो पैसा अच्छा नहीं होता। मां ये भी कहती थी कि अधिक की कोई सीमा नहीं होती है, संतोष की सीमा होती है। आदमी को संतोष के साथ जीना चाहिए। दूसरों को धोखा देकर कमाया गया पैसा कभी फलता नहीं।
वो मां थी। उसकी अपनी समझ थी। पर मां के दिए एक-एक ज्ञान को मैंने ज़िंदगी में आत्मसात कर लिया था। मैं गांव से शहर चला आया था। मुझे नहीं पता कि उस दूधवाले का क्या हुआ? बेइमानी से कमाया उसका पैसा उसे फला या उसे ले डूबा, ये भी मुझे नहीं पता।
पर कल मैं दफ्तर में बैठा था और मेरे पास एक रिपोर्ट आई जिसमें लिखा था कि भारत में स्वास्थ्य सेवा अगले सात वर्षों में करीब चार सौ अरब डॉलर का कारोबार हो जाएगा।
चार सौ अरब डॉलर कितने रूपए होते हैं, इसे आप अपने कैलकुलेटर पर कैलकुलेट करते रहिए, मैं तो नहीं कर पाऊंगा, लेकिन मैं इतना कह सकता हूं कि इस ख़बर को पढ़ने के बाद मैं सिहर उठा था।
मुझे नहीं पता कि ऐसे आंकड़े कौन जुटाता है, पर जिन लोगों को इस तरह के आंकड़े जुटाने की ज़िम्मेदारी दी गई है, उन लोगों के मुताबिक अगले तीन वर्षों में भारत में करीब तेरह करोड़ बूढ़े लोगों की संख्या ब़ढ़ जाएगी और तीस करोड़ से अधिक लोगों पर नई बीमारियों से मरने का खतरा मंडराने लगेगा। अस्पताल की मांग खूब बढ़ेगी और मेडिकल बीमा का कारोबार खूब फलेगा-फूलेगा।
मेडिकल क्षेत्र में ढेर सारी नौकरियों की गुंजाइश बढ़ेगी। भारत के पास ढेर सारी विदेशी मुद्रा भी आने लगेगी।
कोई भी इस रिपोर्ट को पढ़ेगा तो खुश होगा कि भारत मेडिकल के क्षेत्र में बहुत तरक्करी करने जा रहा है। पर मैं दुखी हो गया।
मैं मन मे सोचने लगा कि पहले एक आदमी डॉक्टर बना होगा। फिर उसने दवा की दुकान खोली होगी। फिर अस्पताल भी उसी ने खोला होगा। बहुत दिनों के बाद मुमकिन है कि दवा की फैक्ट्री भी उसी ने खोली होगी। बीमा का धंधा भी उसी ने शुरु किया होगा।
कुछ लोग बीमार पड़ते होंगे तो डॉक्टर के पास जाते होंगे। डॉक्टर उन्हें दवा देता होगा। धीरे-धीरे उसने अपने अस्पताल में मरीज़ों की भर्ती शुरू कर दी होगी। यहां तक तो सब ठीक रहा होगा।
पर एक ऐसा वक्त भी आ गया जब उसे लगा कि और पैसे कमाने चाहिए तो वो बीमारी बेचने लगा। ।
लोग पेट खराब होने पर उस डॉक्टर के पास गए, उसने कहा कि कैंसर हो गया है। गैस से छाती में दर्द की शिकायत लेकर गए तो कहने लगा कि हार्ट फेल होने वाला है।
आप सोच रहे होंगे कि -सुबह उठ कर गप मारने लगे हैं। बिल्कुल नहीं। मैंने आपको कालरा साहब की कहानी सुनाई है। वही कालरा साहब जिन्होंने पंद्रह साल पहले दिल्ली के एक नामी अस्पताल से मुझे फोन किया था कि उनकी बाईपास सर्जरी होने वाली है। मै चौंका था कि ऐसा क्या हो गया, तो कहने लगे कि रात में छाती में दर्द हुआ था, डॉक्टर के पास आया था। उन्होंने पूरी जांच की है और कहा है कि धमनियों में वसा जम गया है। ऑपरेशन होना ही एकमात्र उपाय है।
मैंने उन्हें उस दिन अस्पताल से बुला लिया था। कहा था कि जल्दी मत कीजिए। अगली सुबह उसी अस्पताल में उन्हें दुबारा भेजा था, कहा था कि अपना नाम कुछ और बताइएगा और कहिएगा कि इंश्योंरेंस नहीं है। ऑपरेशन के लिए पैसे नहीं हैं। उनकी रिपोर्ट तब बिल्कुल ठीक आई थी। पंद्रह साल बीत गए हैं। कालरा साहब एकदम मस्त हैं। न छाती में दर्द हुआ, न दिल का ऑपरेशन।
मेरी साली को ऐसे ही एक सुबह पेट में दर्द हुआ था तो दिल्ली के एक पांच सितारा अस्पताल ने कहा था कि अपेंडिसाइटिस हो गया है। तुरंत ऑपरेशन नहीं होने पर जान को खतरा है। वो अस्पताल में ही थी कि मैं वहां पहुंच गया। सेकेंड ओपिनियन के लिए मैं उसे वहां से अपने एक मित्र डॉक्टर के पास ले गया। उसने सारा चेकअप किया और कहा कि कुछ नहीं है, अपच की वज़ह से पेट में दर्द हुआ था। इस घटना को भी सत्रह साल बीत चुके हैं। मेरी साली भी एकदम मस्त है।
परसों मेरे घर एक परिचित आई थीं। बताने लगीं कि उनके एक जानने वाले के शरीर में कई गांठ बन गए थे, डॉक्टर ने कहा कि कैंसर हो गया है। वो इतना डरा रहे थे मरीज़ को कि कोई भी घबरा जाए। पर मरीज़ ने कहीं और पूरा चेकअप कराया तो पता चला कि वो ऐसे ही गांठ बन गए हैं, उनसे कोई खतरा नहीं।
इन बातों को सुन कर, देख कर, समझ कर और रिपोर्ट पर पढ़ कर मां की बहुत याद आती है।
जिस डॉक्टर ने ये रिपोर्ट तैयार की है कि भारत में मेडिकल का कारोबार चार सौ अरब डॉलर का हो जाएगा, लाखों लोगों को रोज़गार मिलेगा, विदेशी मुद्रा का फायदा होने लगेगा, उस पर मुमकिन है कि कोई तालियां बजाए, मैं तो नहीं बजाने वाला। मेरी निगाह में मेडिकल का कारोबार बढ़ना ही मानवता के लिए अपराध है। मेडिलक प्रोफेशन की कामयाबी इसमें है कि लोगों को असल में डॉक्टरों की ज़रूरत कम पड़ने लगे। पर ऐसा नहीं हो सकता है।
मुझे तो लगता है कि गांव में दूध बेचने वाले ने पहले दूध में पानी मिलाया। फिर गंदा पानी मिलाया। फिर यूरिया मिलाया। उसके दूध को पीकर हम बीमार पड़े तो उसने अपने एक बेटे को डॉक्टर बना दिया कि वो इलाज़ करेगा।
केवल डॉक्टर बनने से क्या होता है? उस दूध वाले ने घी में चर्बी मिलानी शुरू कर दी। इससे उसके घी का कारोबार बढ़ा और इधर उसके बेटे की डॉक्टरी का। अब उसी ने दवा भी बनानी शुरू कर दी। मरीज़ अधिक हो गए तो उसने अस्पताल भी खोल दिया। बीमा का धंधा भी उसी ने शुरु किया।
मुझे यकीन है कि ये चार सौ अरब डॉलर का कारोबार हज़ार अरब डॉलर के कारोबार में भी बदल जाएगा। आप खुश होइएगा कि भारत तरक्की कर रहा है, लेकिन मैं खुश नहीं होऊंगा। मै तो इस सत्य को जानता हूं कि ऐसे कमाया गया पैसा चोरी का पैसा होता है, अपराध का पैसा होता है। ऐसा पैसा कभी फलता नहीं।
इस रिपोर्ट को पढ़ कर कोई और खुश हो सकता है, में कल से आवाज़ गूंज रही है, “बीमारी ले लो, बीमारी। जानलेवा बीमारी।”

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*शोभा डे नाम की एक प्रख्यात लेखिका की टिप्पणी* –

*शोभा डे नाम की एक प्रख्यात लेखिका की टिप्पणी* –

 

*”मांस तो मांस ही होता है,*

*चाहे गाय का हो,*

*या बकरे का,*

*या किसी अन्य जानवर* *का……।*

 

*फिर,*

*हिन्दू लोग जानवरों के प्रति* *अलग-अलग व्यवहार कर के*

*क्यों ढोंग करते है कि बकरा* *काटो,*

*पर, गाय मत काटो ।*

*ये उनकी मूर्खता है कि नहीं……?”*

.

*जवाब -1.*

बिल्कुल ठीक कहा शोभा जी आप ने ।

मर्द तो मर्द ही होता है,

चाहे वो भाई हो,

या

पति,

या

बाप,

या

बेटा ।

फिर, *तीनो के साथ आप अलग-अलग व्यवहार क्यों करती हैं ?*

 

*क्या सन्तान पैदा करने,

या यौन-सुख पाने के लिए पति जरुरी है ?*

 

भाई, बेटा, या बाप के साथ भी वही व्यवहार किया जा सकता है,

जो आप अपने पति के साथ करती हैं ।

 

*ये आप की मूर्खता और आप का ढोंग है कि नहीं…..?*

 

*जवाब-2.*

घर में आप अपने बच्चों और अपने पति को खाने-नाश्ते में दूध तो देती ही होंगी, या चाय-कॉफी तो बनाती ही होंगी…!

जाहिर है, वो दूध गाय, या भैंस का ही होगा ।

 

तो, क्या आप कुतिया  का भी दूध उनको पिला सकती हैं, या कुतिया के दूध की भी चाय-कॉफी बना सकती हैं..?

 

क्यों नही ? दूध तो दूध है , चाहे वो किसी का भी हो..!

 

*ये आप की मूर्खता और आप का ढोंग है कि नहीं……?*

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*प्रश्न मांस का नहीं, आस्था और भावना का*

*है ।*

 

जिस तरह, भाई, पति, बेटा, बेटी, बहन, माँ, आदि रिश्तों के पुरुषों-महिलाओं से हमारे सम्बन्ध मात्र एक पुरुष, या मात्र एक स्त्री होने के आधार पर न चल कर भावना और आस्था के आधार पर संचालित होते हैं,

 

उसी प्रकार गाय, बकरे, या अन्य पशु भी हमारी भावना के आधार पर व्यवहृत होते

हैं ।

 

*जवाब – 3.*

एक अंग्रेज ने स्वामी विवेकानन्द से पूछा –

“सब से अच्छा दूध किस जानवर का होता है ?”

 

स्वामी विवेकानंद –

“भैँस का ।”

 

अंग्रेज –

“परन्तु आप भारतीय तो गाय को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं न…..?”

 

स्वामी विवेकानन्द कहा –

“आप ने “दूध” के बारे मे पुछा है जनाब, “अमृत” के बारे में नहीं,

और दूसरी बात,

आप ने जानवर के बारे मेँ पूछा था ।

*गाय तो हमारी ‘माता’ है,*

*कोई जानवर नहीं ।”*

 

*इसी विषय में एक सवाल :-*

“Save tiger” कहने वाले समाज सेवी होते हैं

और

“Save Dogs” कहने वाले पशु प्रेमी होते हैं ।

तब,

*”Save Cow” कहने वाले कट्टरपन्थी कैसे हो गये…..?*

 

इसका जवाब अगर किसी के पास हो, तो बताने की ज़रूर कृपा करे ।

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