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Ganesha (गणेश)

Ganesha (गणेश): The elephant god, son of Shankar (भगवान शंकर) and Parvati (देवी पार्वती). He is the God of wisdom and good judgement. He is worshipped as the remover of obstacles (विघ्नहर्ता) that stand in the way of good deeds. He is also known to plants obstacles in the path of evil activities (दुष्टदलन). Though neither human nor animal, Ganesha combines human intelligence with the physical strength of an Elephant. He is considered to be the supreme embodiment of knowledge and divine wisdom (बुद्धी रिद्धि सिद्धि प्रदायक). He is said to have written the Mahabharata from the dictation of sage Vyasa. He is a charming though odd looking deity. He is represented as short, fat and with a protruding belly. His skin has an orangish hue and his appearance reflects prosperity. He has four hands, the head of an elephant (गजानन) and only one tusk (एकदंत). In one hand he holds a shell, in another a discus, a club in the third and a water lily in the fourth. He is shown as riding on a rat. He is said to possess a third eye like his parents. But unlike them, it is not there to display anger. On the contrary, it is a symbol of his wisdom. He is also a dancer, and his dancing is joyous and not destructive.
‪#‎Ganesha‬ ‪#‎Ekadanta‬ ‪#‎Gajanana‬ ‪#‎Lambodara‬ ‪#‎Vighnahartata‬

Kamal Nandlal – http://KamalNandlal.com – +919310203939

Ganesha (गणेश): The elephant god, son of Shankar (भगवान शंकर) and Parvati (देवी पार्वती). He is the God of wisdom and good judgement. He is worshipped as the remover of obstacles (विघ्नहर्ता) that stand in the way of good deeds. He is also known to plants obstacles in the path of evil activities (दुष्टदलन). Though neither human nor animal, Ganesha combines human intelligence with the physical strength of an Elephant. He is considered to be the supreme embodiment of knowledge and divine wisdom (बुद्धी रिद्धि सिद्धि प्रदायक). He is said to have written the Mahabharata from the dictation of sage Vyasa. He is a charming though odd looking deity. He is represented as short, fat and with a protruding belly. His skin has an orangish hue and his appearance reflects prosperity. He has four hands, the head of an elephant (गजानन) and only one tusk (एकदंत). In one hand he holds a shell, in another a discus, a club in the third and a water lily in the fourth. He is shown as riding on a rat. He is said to possess a third eye like his parents. But unlike them, it is not there to display anger. On the contrary, it is a symbol of his wisdom. He is also a dancer, and his dancing is joyous and not destructive. 
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क्यों बना मूषक गणेश की सवारी, क्यों टूटा दांत

क्यों बना मूषक गणेश की सवारी, क्यों टूटा दांत
भगवान गणेश की शारीरिक बनावट के मुकाबले उनका वाहन छोटा सा चूहा है। गणेश जी ने आखिर छोटे से जीव को ही अपना वाहन क्यों चुना? उनकी ध्वजा पर भी मूषक विराजमान है। चूहे का काम किसी भी चीज को कुतर डालना है,जो भी वस्तु चूहे को नजर आती है वह उसकी चीरफाड़ कर उसके अंग प्रत्यंग का विश्लेषण सा कर देता है।
गणेश जी बुद्धि और विद्या के अधिष्ठाता देवता हैं। तर्क-वितर्क में उनका सानी कोई नहीं। एक-एक बात या समस्या की तह में जाना,उसकी मीमांसा करना और उसके निष्कर्ष तक पहुंचना उनका शौक है। मूषक भी तर्क-वितर्क में पीछे नहीं हैं। हर वस्तु को काट-छांट कर रख देता है और उतना ही फुर्तीला भी है। जागरूक रहने का संदेश देता है।
गणेश जी ने कदाचित चूहे के इन्हीं गुणों को देखते हुए उसे अपना वाहन चुना होगा। फिर भी भगवान गणेश के वाहन मूषक के बारे में कई प्राचीन कथाएं प्रचलित हैं।
गजमुखासुर नामक दैत्य ने अपने बाहुबल से देवताओं को बहुत परेशान कर दिया। सभी देवता एकत्रित होकर भगवान गणेश के पास पहुंचे। तब भगवान श्रीगणेश ने उन्हें गजमुखासुर से मुक्ति दिलाने का भरोसा दिलाया।
तब श्रीगणेश का गजमुखासुर दैत्य से भयंकर युद्ध हुआ। युद्ध में श्रीगणेश का एक दांत टूट गया। तब क्रोधित होकर श्रीगणेश ने टूटे दांत से गजमुखासुर पर ऐसा प्रहार किया कि वह घबराकर चूहा बनकर भागा लेकिन गणेशजी ने उसे पकड़ लिया। मृत्यु के भय से वह क्षमायाचना करने लगा। तब श्रीगणेश ने मूषक रूप में ही उसे अपना वाहन बना लिया।

एक अन्य कथा के अनुसार
एक महा बलवान मूषक ने पराशर ऋषि के आश्रम में भयंकर उत्पात मचा दिया, आश्रम के सारे मिट्टी के पात्र तोड़कर सारा अन्न समाप्त कर दिया, आश्रम की वाटिका उजाड़ डाली, ऋषियों के समस्त वल्कल वस्त्र और ग्रंथ कुतर दिए। आश्रम की सभी उपयोगी वस्तुएं नष्ट हो जाने के कारण पराशर ऋषि बहुत दुखी हुए और अपने पूर्व जन्म के कर्मों को कोसने लगे कि किस अपकर्म के फलस्वरूप मेरे आश्रम की शांति भंग हो गई है। अब इस चूहे के आतंक से कैसे निजात मिले?
तब गणेश जी ने पराशर जी को कहा कि मैं अभी इस मूषक को अपना वाहन बना लेता हूं। गणेश जी ने अपना तेजस्वी पाश फेंका, पाश उस मूषक का पीछा करता पाताल तक गया और उसका कंठ बांध लिया और उसे घसीट कर बाहर निकाल गजानन के सम्मुख उपस्थित कर दिया। पाश की पकड़ से मूषक मूर्छित हो गया। मूर्छा खुलते ही मूषक ने गणेश जी की आराधना शुरू कर दी और अपने प्राणों की भीख मांगने लगा।
गणेश जी मूषक की स्तुति से प्रसन्न तो हुए लेकिन उससे कहा कि तूने ब्राह्मणों को बहुत कष्ट दिया है। मैंने दुष्टों के नाश एवं साधु पुरुषों के कल्याण के लिए ही अवतार लिया है, लेकिन शरणागत की रक्षा भी मेरा परम धर्म है, इसलिए जो वरदान चाहो मांग लो।
ऐसा सुनकर उस उत्पाती मूषक का अहंकार जाग उठा, बोला, ‘मुझे आपसे कुछ नहीं मांगना है, आप चाहें तो मुझसे वर की याचना कर सकते हैं।’ मूषक की गर्व भरी वाणी सुनकर गणेश जी मन ही मन मुस्कराए और कहा, ‘यदि तेरा वचन सत्य है तो तू मेरा वाहन बन जा।
मूषक के तथास्तु कहते ही गणेश जी तुरंत उस पर आरूढ़ हो गए। अब भारी भरकम गजानन के भार से दबकर मूषक को प्राणों का संकट बन आया। तब उसने गजानन से प्रार्थना की कि वे अपना भार उसके वहन करने योग्य बना लें। इस तरह मूषक का गर्व चूर कर गणेश जी ने उसे अपना वाहन बना लिया।

क्यों बना मूषक गणेश की सवारी, क्यों टूटा दांत
भगवान गणेश की शारीरिक बनावट के मुकाबले उनका वाहन छोटा सा चूहा है। गणेश जी ने आखिर छोटे से जीव को ही अपना वाहन क्यों चुना? उनकी ध्वजा पर भी मूषक विराजमान है। चूहे का काम किसी भी चीज को कुतर डालना है,जो भी वस्तु चूहे को नजर आती है वह उसकी चीरफाड़ कर उसके अंग प्रत्यंग का विश्लेषण सा कर देता है। 
गणेश जी बुद्धि और विद्या के अधिष्ठाता देवता हैं। तर्क-वितर्क में उनका सानी कोई नहीं। एक-एक बात या समस्या की तह में जाना,उसकी मीमांसा करना और उसके निष्कर्ष तक पहुंचना उनका शौक है। मूषक भी तर्क-वितर्क में पीछे नहीं हैं। हर वस्तु को काट-छांट कर रख देता है और उतना ही फुर्तीला भी है। जागरूक रहने का संदेश देता है। 
गणेश जी ने कदाचित चूहे के इन्हीं गुणों को देखते हुए उसे अपना वाहन चुना होगा। फिर भी भगवान गणेश के वाहन मूषक के बारे में कई प्राचीन कथाएं प्रचलित हैं। 
गजमुखासुर नामक दैत्य ने अपने बाहुबल से देवताओं को बहुत परेशान कर दिया। सभी देवता एकत्रित होकर भगवान गणेश के पास पहुंचे। तब भगवान श्रीगणेश ने उन्हें गजमुखासुर से मुक्ति दिलाने का भरोसा दिलाया। 
तब श्रीगणेश का गजमुखासुर दैत्य से भयंकर युद्ध हुआ। युद्ध में श्रीगणेश का एक दांत टूट गया। तब क्रोधित होकर श्रीगणेश ने टूटे दांत से गजमुखासुर पर ऐसा प्रहार किया कि वह घबराकर चूहा बनकर भागा लेकिन गणेशजी ने उसे पकड़ लिया। मृत्यु के भय से वह क्षमायाचना करने लगा। तब श्रीगणेश ने मूषक रूप में ही उसे अपना वाहन बना लिया।

एक अन्य कथा के अनुसार
एक महा बलवान मूषक ने पराशर ऋषि के आश्रम में भयंकर उत्पात मचा दिया, आश्रम के सारे मिट्टी के पात्र तोड़कर सारा अन्न समाप्त कर दिया, आश्रम की वाटिका उजाड़ डाली, ऋषियों के समस्त वल्कल वस्त्र और ग्रंथ कुतर दिए। आश्रम की सभी उपयोगी वस्तुएं नष्ट हो जाने के कारण पराशर ऋषि बहुत दुखी हुए और अपने पूर्व जन्म के कर्मों को कोसने लगे कि किस अपकर्म के फलस्वरूप मेरे आश्रम की शांति भंग हो गई है। अब इस चूहे के आतंक से कैसे निजात मिले? 
तब गणेश जी ने पराशर जी को कहा कि मैं अभी इस मूषक को अपना वाहन बना लेता हूं। गणेश जी ने अपना तेजस्वी पाश फेंका, पाश उस मूषक का पीछा करता पाताल तक गया और उसका कंठ बांध लिया और उसे घसीट कर बाहर निकाल गजानन के सम्मुख उपस्थित कर दिया। पाश की पकड़ से मूषक मूर्छित हो गया। मूर्छा खुलते ही मूषक ने गणेश जी की आराधना शुरू कर दी और अपने प्राणों की भीख मांगने लगा। 
गणेश जी मूषक की स्तुति से प्रसन्न तो हुए लेकिन उससे कहा कि तूने ब्राह्मणों को बहुत कष्ट दिया है। मैंने दुष्टों के नाश एवं साधु पुरुषों के कल्याण के लिए ही अवतार लिया है, लेकिन शरणागत की रक्षा भी मेरा परम धर्म है, इसलिए जो वरदान चाहो मांग लो। 
ऐसा सुनकर उस उत्पाती मूषक का अहंकार जाग उठा, बोला, ‘मुझे आपसे कुछ नहीं मांगना है, आप चाहें तो मुझसे वर की याचना कर सकते हैं।’ मूषक की गर्व भरी वाणी सुनकर गणेश जी मन ही मन मुस्कराए और कहा, ‘यदि तेरा वचन सत्य है तो तू मेरा वाहन बन जा। 
मूषक के तथास्तु कहते ही गणेश जी तुरंत उस पर आरूढ़ हो गए। अब भारी भरकम गजानन के भार से दबकर मूषक को प्राणों का संकट बन आया। तब उसने गजानन से प्रार्थना की कि वे अपना भार उसके वहन करने योग्य बना लें। इस तरह मूषक का गर्व चूर कर गणेश जी ने उसे अपना वाहन बना लिया।
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गणेश देवताओं में सबसे अधिक बुद्धिमान हैं।

गणेश देवताओं में सबसे अधिक बुद्धिमान हैं। इसीलिए बच्चों का अध्ययन आरम्भ कराते समय उनसे ‘ऊँ गणेशाय नमः’ लिखवाया जाता है।
गणेश अपनी बुद्धिमानी के कारण ही, देवताओं में सबसे पहले पूजे जाते हैं। असल में इनकी बुद्धि इनके विचित्र सिर के कारण है। हाथी का सिर है इनका। शरीर मनुष्य का है। है न विचित्र बात ? हाथी, सभी जीवों में बुद्धिमान है इसीलिए हाथी के सिर वाले गणेश बुद्धिमान हो गए।
इनके साथ एक दुर्घटना घट गई और इन्हें हाथी का सिर धारण करना पड़ा।
जब ये बालक थे, तभी इनकी माता पार्वती ने अपने दरवाजे पर एक दिन उन्हें प्रहरी के रूप में खड़ा कर दिया। वह अन्दर कुछ कार्य कर रही थी। वह नहीं चाहती थी कि इस बीच कोई अन्दर आए। इसलिए उसने गणेश को आदेश दिया कि वह किसी को अन्दर नहीं आने दे। सबको दरवाजे के पास से वापस कर दे।
गणेश ने कइयों को अन्दर जाने से लौटा दिया। सभी अपना-सा मुँह लिये चले गए।
अब आए साक्षात् शिव। सिर पर जटा, कमर में व्याघ्र-चर्म, एक हाथ में डमरू, दूसरे में त्रिशूल। पूरे शरीर में लिपटा भस्म।
अन्दर जाना चाहा। गणेश ने रोक दिया।
‘‘क्यों ?’’ भोले शंकर क्रोधित हुए।
‘‘माँ का आदेश है, अभी कोई भीतर नहीं जा सकता।’’ गणेश अच्छी तरह दरवाजा रोककर खड़े हो गए।
‘‘छोड़ते हो कि नहीं द्वार ?’’ भगवान आशुतोष का क्रोध बढ़ता जा रहा था।
‘‘नहीं छोड़ता। उतने लोगों के लिए नहीं छोड़ा तो आपके लिए क्यों छोड़ूँगा ? आपमें कौन ऐसी बात है ?’’
‘‘मैं तुम्हारा बाप हूँ। अन्दर माता हैं तो बाहर पिता। पिता को रोकने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं।’’
‘‘यह अधिकार माता ने ही दिया है। अन्दर नहीं जाने का आदेश सबके लिए है। आपको उससे छूट नहीं मिली है। मुक्ति। नियम सब पर समान रूप से लागू है।’’ गणेश अड़ गए।

‘‘बहुत हठी बालक को। उद्दंड भी।’’ शिव गुर्राए।
‘‘माँ का आदेश-पालक हूँ।’’
‘‘पिता माता से बड़ा होता है।’’ भगवान पशुपति ने तर्क दिया।
‘‘माता की समानता कोई नहीं कर सकता। पिता भी नहीं। मैं आपको किसी मूल्य पर अन्दर जाने की अनुमति नहीं दे सकता।’’
‘‘तो इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा।’’ शिव का क्रोध प्रचण्ड हुआ।
‘‘मैं माँ की आज्ञा के पालन में किसी परिणाम की चिन्ता नहीं करता।’’ गणेश अपनी बात पर अड़े थे।
‘‘मृत्यु को भी नहीं ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘तो मुझे पुत्र-हत्या का भागी बनना पड़ेगा। मैं तुम्हें धक्का देकर अन्दर जा सकता था पर आपने आदेश का अनुपालन नहीं करने के कारण मुझे अन्दर जाने के लिए तुम्हारी गर्दन उतारनी पड़ेगी।’’ शिव और कुपित हुए।
‘‘कोई चिन्ता नहीं।’’ गणेश निर्भीक बोले, ‘‘मातृ-आज्ञा-पालन में प्राणों से भी हाथ धोना पड़े तो यह मेरा सौभाग्य ही होगा।’’
‘‘फिर यही हो।’’ कहकर भगवान शिव ने त्रिशूल से गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया।
कैलास पर चारों ओर हाहाकार मच गया। ‘गणेश मारे गए’, ‘गणेश मारे गए, यह बात जंगल की आग की तरह चारों तरफ फैल गई। पार्वती को भी यह सूचना उनके गणों ने दी। शिव अन्दर पहुँच चुके थे। उनके स्वागत-सत्कार की चिन्ता किए बिना गणेश-माता पार्वती द्वार के बाहर भागी।
गणेश को घेरकर कई शिव-गण, आँखों में आँसू भरे, खड़े थे। पार्वती को देखते ही सबने उनके लिए मार्ग दे दिया।
अपने पुत्र को मृत पाकर माँ की ममता सारे बाँध तोड़कर उमड़ पड़ी। उनकी आँखों से अश्रु की नदियाँ प्रवाहित होने लगीं। वह गणेश के मृत शरीर को गोद में रखकर ज़ोर-ज़ोर से विलाप करने लगीं।
उनके विलाप का स्वर अन्दर बैठे सदा शिव के कानों में भी पड़ा। उनका क्रोध काफूर हो गया और अपने कृत्य पर पश्चाताप करते हुए वह बाहर आए। पार्वती को मनाने का प्रयास किया पर गणेश-माता भगवती पार्वती का रुदन जारी रहा। वह भगवान शंकर के लाख समझाने पर भी समझने को प्रस्तुत नहीं थी।
अन्ततः शिव ने हथियार डाल दिए और पार्वती से पूछा, ‘‘तुम कैसे चुप रहोगी ?’’
पार्वती ने कहा, ‘‘मेरे पुत्र के प्राण ले लिये। इसे जीवित कीजिए तभी मैं यहाँ से उठूँगी और अन्न-जल ग्रहण करूँगी।’’
‘‘यह तुम्हारा लड़का बहुत उद्दंड था, इसने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया। ऐसे भी जो मर गया उसे जीवित कैसे किया जा सकता है ?’’

पार्वती ने सिसकते हुए कहा, ‘‘यह केवल मेरा लड़का नहीं आपका भी पुत्र था। यह उद्दंड भी नहीं था, मात्र मेरी आज्ञा का पालन कर रहा था। जहाँ तक मृत को जीवित करने के प्रश्न है, आप देवाधिदेव महादेव के लिए यह कौन-सा कठिन कार्य है? मुझे भुलवाने का प्रयास नहीं कीजिए। आप चाहें तो गणेश क्षण मात्र में जीवित हो सकता है। यदि आप तत्काल जीवित नहीं करते हैं तो फिर जिस त्रिशूल से इसका सिर काटा है उसी से मेरा भी काट दीजिए।
भगवान भोले शंकर विवश हो गए और उन्होंने अपने एक प्रमुख गण को कहा, ‘‘उत्तर दिशा की ओर जाओ और जो सबसे पहला प्राणी मिले उसका सिर काट लाओ।’’
गण जब उत्तर दिशा में बढ़ा तो सबसे पहले उसे एक हाथी का बच्चा दिखाई पड़ा। उसने उसका सिर काट लिया।
सिर को लाकर उसने शिव के हाथों में पकड़ा दिया। भोले शंकर ने इस सिर को गणेश की, सिर-हीन गर्दन से जोड़ दिया और गणेश जीवित हो उठ बैठे।
पार्वती बहुत प्रसन्न हुई और इस विचित्र शिशु को उठाकर उन्होंने अपने कलेजे से लगा लिया। सभी उपस्थित गण प्रसन्नता से भरकर नृत्य करने लगे।

गणेश देवताओं में सबसे अधिक बुद्धिमान हैं। इसीलिए बच्चों का अध्ययन आरम्भ कराते समय उनसे ‘ऊँ गणेशाय नमः’ लिखवाया जाता है।
गणेश अपनी बुद्धिमानी के कारण ही, देवताओं में सबसे पहले पूजे जाते हैं। असल में इनकी बुद्धि इनके विचित्र सिर के कारण है। हाथी का सिर है इनका। शरीर मनुष्य का है। है न विचित्र बात ? हाथी, सभी जीवों में बुद्धिमान है इसीलिए हाथी के सिर वाले गणेश बुद्धिमान हो गए।
इनके साथ एक दुर्घटना घट गई और इन्हें हाथी का सिर धारण करना पड़ा।
जब ये बालक थे, तभी इनकी माता पार्वती ने अपने दरवाजे पर एक दिन उन्हें प्रहरी के रूप में खड़ा कर दिया। वह अन्दर कुछ कार्य कर रही थी। वह नहीं चाहती थी कि इस बीच कोई अन्दर आए। इसलिए उसने गणेश को आदेश दिया कि वह किसी को अन्दर नहीं आने दे। सबको दरवाजे के पास से वापस कर दे।
गणेश ने कइयों को अन्दर जाने से लौटा दिया। सभी अपना-सा मुँह लिये चले गए।
अब आए साक्षात् शिव। सिर पर जटा, कमर में व्याघ्र-चर्म, एक हाथ में डमरू, दूसरे में त्रिशूल। पूरे शरीर में लिपटा भस्म।
अन्दर जाना चाहा। गणेश ने रोक दिया।
‘‘क्यों ?’’ भोले शंकर क्रोधित हुए।
‘‘माँ का आदेश है, अभी कोई भीतर नहीं जा सकता।’’ गणेश अच्छी तरह दरवाजा रोककर खड़े हो गए।
‘‘छोड़ते हो कि नहीं द्वार ?’’ भगवान आशुतोष का क्रोध बढ़ता जा रहा था।
‘‘नहीं छोड़ता। उतने लोगों के लिए नहीं छोड़ा तो आपके लिए क्यों छोड़ूँगा ? आपमें कौन ऐसी बात है ?’’
‘‘मैं तुम्हारा बाप हूँ। अन्दर माता हैं तो बाहर पिता। पिता को रोकने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं।’’
‘‘यह अधिकार माता ने ही दिया है। अन्दर नहीं जाने का आदेश सबके लिए है। आपको उससे छूट नहीं मिली है। मुक्ति। नियम सब पर समान रूप से लागू है।’’ गणेश अड़ गए।

‘‘बहुत हठी बालक को। उद्दंड भी।’’ शिव गुर्राए।
‘‘माँ का आदेश-पालक हूँ।’’
‘‘पिता माता से बड़ा होता है।’’ भगवान पशुपति ने तर्क दिया।
‘‘माता की समानता कोई नहीं कर सकता। पिता भी नहीं। मैं आपको किसी मूल्य पर अन्दर जाने की अनुमति नहीं दे सकता।’’
‘‘तो इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा।’’ शिव का क्रोध प्रचण्ड हुआ।
‘‘मैं माँ की आज्ञा के पालन में किसी परिणाम की चिन्ता नहीं करता।’’ गणेश अपनी बात पर अड़े थे।
‘‘मृत्यु को भी नहीं ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘तो मुझे पुत्र-हत्या का भागी बनना पड़ेगा। मैं तुम्हें धक्का देकर अन्दर जा सकता था पर आपने आदेश का अनुपालन नहीं करने के कारण मुझे अन्दर जाने के लिए तुम्हारी गर्दन उतारनी पड़ेगी।’’ शिव और कुपित हुए।
‘‘कोई चिन्ता नहीं।’’ गणेश निर्भीक बोले, ‘‘मातृ-आज्ञा-पालन में प्राणों से भी हाथ धोना पड़े तो यह मेरा सौभाग्य ही होगा।’’
‘‘फिर यही हो।’’ कहकर भगवान शिव ने त्रिशूल से गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया।
कैलास पर चारों ओर हाहाकार मच गया। ‘गणेश मारे गए’, ‘गणेश मारे गए, यह बात जंगल की आग की तरह चारों तरफ फैल गई। पार्वती को भी यह सूचना उनके गणों ने दी। शिव अन्दर पहुँच चुके थे। उनके स्वागत-सत्कार की चिन्ता किए बिना गणेश-माता पार्वती द्वार के बाहर भागी।
गणेश को घेरकर कई शिव-गण, आँखों में आँसू भरे, खड़े थे। पार्वती को देखते ही सबने उनके लिए मार्ग दे दिया।
अपने पुत्र को मृत पाकर माँ की ममता सारे बाँध तोड़कर उमड़ पड़ी। उनकी आँखों से अश्रु की नदियाँ प्रवाहित होने लगीं। वह गणेश के मृत शरीर को गोद में रखकर ज़ोर-ज़ोर से विलाप करने लगीं।
उनके विलाप का स्वर अन्दर बैठे सदा शिव के कानों में भी पड़ा। उनका क्रोध काफूर हो गया और अपने कृत्य पर पश्चाताप करते हुए वह बाहर आए। पार्वती को मनाने का प्रयास किया पर गणेश-माता भगवती पार्वती का रुदन जारी रहा। वह भगवान शंकर के लाख समझाने पर भी समझने को प्रस्तुत नहीं थी।
अन्ततः शिव ने हथियार डाल दिए और पार्वती से पूछा, ‘‘तुम कैसे चुप रहोगी ?’’
पार्वती ने कहा, ‘‘मेरे पुत्र के प्राण ले लिये। इसे जीवित कीजिए तभी मैं यहाँ से उठूँगी और अन्न-जल ग्रहण करूँगी।’’
‘‘यह तुम्हारा लड़का बहुत उद्दंड था, इसने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया। ऐसे भी जो मर गया उसे जीवित कैसे किया जा सकता है ?’’

पार्वती ने सिसकते हुए कहा, ‘‘यह केवल मेरा लड़का नहीं आपका भी पुत्र था। यह उद्दंड भी नहीं था, मात्र मेरी आज्ञा का पालन कर रहा था। जहाँ तक मृत को जीवित करने के प्रश्न है, आप देवाधिदेव महादेव के लिए यह कौन-सा कठिन कार्य है? मुझे भुलवाने का प्रयास नहीं कीजिए। आप चाहें तो गणेश क्षण मात्र में जीवित हो सकता है। यदि आप तत्काल जीवित नहीं करते हैं तो फिर जिस त्रिशूल से इसका सिर काटा है उसी से मेरा भी काट दीजिए।
भगवान भोले शंकर विवश हो गए और उन्होंने अपने एक प्रमुख गण को कहा, ‘‘उत्तर दिशा की ओर जाओ और जो सबसे पहला प्राणी मिले उसका सिर काट लाओ।’’
गण जब उत्तर दिशा में बढ़ा तो सबसे पहले उसे एक हाथी का बच्चा दिखाई पड़ा। उसने उसका सिर काट लिया।
सिर को लाकर उसने शिव के हाथों में पकड़ा दिया। भोले शंकर ने इस सिर को गणेश की, सिर-हीन गर्दन से जोड़ दिया और गणेश जीवित हो उठ बैठे।
पार्वती बहुत प्रसन्न हुई और इस विचित्र शिशु को उठाकर उन्होंने अपने कलेजे से लगा लिया। सभी उपस्थित गण प्रसन्नता से भरकर नृत्य करने लगे।
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ये हैं गणेशजी की सूंड, लंबे कान और बड़ा पेट का रहस्य! – See more at: http://www.patrika.com/article/three-sacred-secrets-of-lord-ganesha/50273#sthash.q6sfHkbI.dpuf

Three Sacred Secrets of Lord Ganesha
11/11/2014 6:16:06 PM
भगवान श्री गणेश जी का व्यक्तित्व बेहद आकर्षक माना गया है। उनका मस्तक हाथी का है और वाहन मूषक है। उनकी दो पत्नियां ऋद्धि और सिद्धि हैं। सभी गणों के स्वामी होने के कारण इनका नाम गणोश है। परंपरा में हर कार्य के प्रारंभ में इनका स्मरण आवश्यक है। उन्हें विघ्नहर्ता कहते हैं। गणेश में ऎसी क्या विशेषताएं हैं कि उनकी पूजा 33 कोटि देवी-देवताओं में सर्वप्रथम होती है।
जानिए, गणेश जी विशिष्टता के बारे में-

वेदों के मुताबिक, गणेश जी की पूजा के बिना कोई भी कार्य प्रारंभ नहीं किया जाता है। गणेश जी को वैदिक देवता की उपाधि दी गई है। ॐ के उच्चारण से वेद पाठ प्रारंभ होता है। गणेश आदिदेव है। वैदिक ऋचाओं में उनका अस्तित्व हमेशा रहा है। गणेश पुराण में ब्रहा, विष्णु एवं शिव के द्वारा उनकी पूजा किए जाने का तक उल्लेख मिलता है।

गणेश जी का वाहन मूषक क्यों : भगवान गणेश की शारीरिक बनावट के मुकाबले उनका वाहन चूहा काफी छोटा है। चूहे का काम किसी चीज को कुतर डालना है। वह चीर-फाड़ कर उसके प्रत्येक अंग-प्रत्यंग का विश्लेषण करता है। गणेश बुद्धि और विद्या के अधिष्ठाता हैं। तर्क-वितर्क में वे बेजोड़ हैं। इसी प्रकार मूषक भी तर्क-वितर्क में पीछे नहीं हैं। काट छांट में उसका कोई सानी नहीं है। मूषक के इन्हीं गुणों को देखकर उन्होंने इसे वाहन चुना है।

गणेश जी की सूंड का रहस्य- : गजानन की सूंड हमेशा हिलती डुलती रहती है जो उनके सचेत होने का संकेत है। इसके संचालन से दु:ख-दारिद्रय समाप्त हो जाते हैं। अनिष्टकारी शक्तियां डरकर भाग जाती हैं। यह सूंड जहां बड़े-बड़े दिग्पालों को भयभीत करती है, वहीं देवताओं का मनोरजंन भी करती है। इस सूंड से गणोश, ब्रहाजी पर पानी एवं फूल बरसाते है। सूंड के दायीं और बायीं ओर होने का अपना महत्व है।

बड़ा पेट : गणेश जी का पेट बहुत बड़ा है। इसी कारण उन्हें लंबोदर भी कहा जाता है। लंबोदर होने का कारण यह है कि वे हर अच्छी और बुरी बात को पचा जाते हैं और किसी भी बात का निर्णय सूझबूझ के साथ लेते हैं। वे संपूर्ण वेदों के ज्ञाता है। संगीत और नृत्य आदि विभिन्न कलाओं के भी जानकार हैं। ऎसा माना जाता है कि उनका पेट विभिन्न विद्याओं का कोष है।

लंबे कान : श्री गणेश लंबे कान वाले हैं। इसलिए उन्हें गजकर्ण भी कहा जाता है। लंबे कान वाले भाग्यशाली होते हैं। लंबे कानों का एक रहस्य यह भी है कि वह सबकी सुनते हैं और अपनी बुद्धि और विवेक से ही किसी कार्य का क्रियान्वयन करते हैं। बड़े कान हमेशा चौकन्ना रहने के भी संकेत देते हैं।

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गणेश चतुर्थी कथा

 

गणेश चतुर्थी कथा

एक बार भगवान् श्री शंकर स्नान करने के लिये कैलाश पर्वत से भोगावती नामक स्थान पर गए l उनके जाने के बाद पार्वती ने स्नान करते समय शरीर के मैल से एक पुतला बनाया तथा उसमें प्राण डाल दिए l उसका नाम उन्होंने गणेश रखा l
फिर पार्वती जी ने गणेश जी से इस मुद्गर लेकर दरवाजे पर जाकर तब तक पहरा देने के लिये कहा जब तक वह स्नान ना कर लें l
कुछ समय बाद भगवान् श्री शंकर स्नान करके वापिस आये और घर के भीतर प्रवेश करना चाहा तो गणेश जे ने उन्हें दरवाजे पर ही रोक दिया l इस पर भगवान् श्री शंकर बहुत क्रोधित हो उठे और उन्होंने गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया और भीतर चले गए l माता पार्वती ने जब भगवान् श्री शंकर को क्रोधित अन्दर आते देखा तो उन्हें लगा कि भोजन में विलम्ब होने के कारण शिव जी नाराज़ हैं l इसलिये उन्होंने तुरन्त ही भोजन परोस कर भगवान् शंकर को खाने के लिये बुलाया l
दो थालियों में भोजन लगा देखकर भगवान् श्री शंकर ने माता पार्वती जी से दूसरी थाली किसके के लिये है पूछा l इस पर माता पार्वती ने कहा यह हमारे पुत्र गणेश के लिये है, जो बाहर दरवाजे पर पहरा दे रहा है l
यह सुनकर शिवजी आश्चर्यचकित हुए l तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है ? हाँ नाथ ! क्या आपने उसे देखा नहीं ? देखा तो था, किन्तु मैंने तो अपने रोके जाने पर उसे कोई उद्दण्ड बालक समझकर उसका सिर काट दिया l यह सुनकर पार्वती जी बहुत दुखी हुई l वे विलाप करने लगी l तब पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिये भगवान् शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया l पार्वती जी इस प्रकार पुत्र गणेश को पाकर बहुत प्रसन्न दुई l उन्होंने पति तथा पुत्र को प्रीति पूर्वक भोजन कराकर बाद में स्वयं भोजन किया l
यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुई थी l इसलिये यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है l

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Story of Gajamugasura

Story of Gajamugasura

There was an asura called Gajamugasura. He did deep penance and worshipped Lord Siva, who granted him several boons, by which he became extremely powerful. He put the Devas and rishis to great trouble. He forced the Devas to do 1008 Thoppukaranams in the morning, 1008 in the afternoon and 1008 in the evening.
( “Thoppu Karanam” – is a Tamil (a South Indian Language) word, which means to hold the ears, squat down and up. From ancient times this practice has been evident in the Indian Culture, where people practice this in front of the deity of the Lord Ganapathy (a symbolic representation of supreme energy in the form of an elephant which actually signifies wisdom. Thus also connected with the brain. “Ga” representing Intelligence, “Na” representing Wisdom and “Pathy” representing – Master, so ideally meaning the Master of Wisdom and Intelligence). It is said that this practice is a request to stimulate the wisdom and intelligence. It is also said that the practice has been evident in the ancient Gurukula Systems, where the seers asked their pupils to practice this technique in order to stimulate and energize the brain and its functions. The practice of ear piercing too has its real reasons being the stimulation of the pituitary and pineal glands, due to the effect of the pressure in the ear lobes.).

The Devas prayed to Lord Siva to rescue them from this evil asura. Lord Siva sent Lord Vinayaga to overcome Gajamugasura. Vinayaga went with several weapons such as bow & arrow, sword, axe, etc. However, since Gajamugasura had been granted the boon that he be destroyed by no weapon, none of these weapons used by Lord Vinayaga were effective. Vinayaga broke off his right tusk and used it to kill Gajamugasura. Gajamugasura rushed at Vinayaga in the form of a mooshika (small mouse). Vinayaga crushed the ego and vanity of Gajamugasura and sat on the mooshika. The humbled Gajamugasura bowed before Vinayaga, who accepted the mooshika as his vahana. Lord Vinayaka is the source of everlasting wisdom. He crushed ego and vanity and reduced it to the size of a mooshika and used it as his vahana. Lord Vinayaga can be pleased by doing Thoppukarana.

Story of Gajamugasura

There was an asura called Gajamugasura. He did deep penance and worshipped Lord Siva, who granted him several boons, by which he became extremely powerful. He put the Devas and rishis to great trouble. He forced the Devas to do 1008 Thoppukaranams in the morning, 1008 in the afternoon and 1008 in the evening.
( "Thoppu Karanam" - is a Tamil (a South Indian Language) word, which means to hold the ears, squat down and up. From ancient times this practice has been evident in the Indian Culture, where people practice this in front of the deity of the Lord Ganapathy (a symbolic representation of supreme energy in the form of an elephant which actually signifies wisdom. Thus also connected with the brain. "Ga"  representing Intelligence, "Na" representing Wisdom and "Pathy" representing - Master, so ideally meaning the Master of Wisdom and Intelligence). It is said that this practice is a request to stimulate the wisdom and intelligence. It is also said that the practice has been evident in the ancient Gurukula Systems, where the seers asked their pupils to practice this technique in order to stimulate and energize the brain and its functions. The practice of ear piercing too has its real reasons being the stimulation of the pituitary and pineal glands, due to the effect of the pressure in the ear lobes.). 

The Devas prayed to Lord Siva to rescue them from this evil asura. Lord Siva sent Lord Vinayaga to overcome Gajamugasura. Vinayaga went with several weapons such as bow & arrow, sword, axe, etc. However, since Gajamugasura had been granted the boon that he be destroyed by no weapon, none of these weapons used by Lord Vinayaga were effective. Vinayaga broke off his right tusk and used it to kill Gajamugasura. Gajamugasura rushed at Vinayaga in the form of a mooshika (small mouse). Vinayaga crushed the ego and vanity of Gajamugasura and sat on the mooshika. The humbled Gajamugasura bowed before Vinayaga, who accepted the mooshika as his vahana. Lord Vinayaka is the source of everlasting wisdom. He crushed ego and vanity and reduced it to the size of a mooshika and used it as his vahana. Lord Vinayaga can be pleased by doing Thoppukarana.
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चीन और जापान में सदियों से पूजे जाने वाले गणेश जी = ** कांगीतेन ***
Kangiten – Wikipedia, the free encyclopedia
en.wikipedia.org/wiki/Kangiten
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Kangi-ten (Japanese: 歓喜天, “God of Bliss”) is a god (deva or ten) in Shingon and Tendai schools of Japanese Buddhism. He is generally considered the …
Names – Iconography and depictions – Origins and texts – Legends

Raj Gurjar's photo.
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