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कान्वेन्ट का अर्थ


🚩🚩🚩कान्वेन्ट का अर्थ- 

सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि ये शब्द कहाँ से आया है तो आइये प्रकाश डालते हैं ।

ब्रिटेन में एक कानून था लिव इन रिलेशनशिप बिना किसी  वैवाहिक संबंध के एक लड़का और एक लड़की का साथ में रहना।

जब साथ में रहते थे तो शारीरिक संबंध भी बन जाते थे तो इस प्रक्रिया के अनुसार संतान भी पैदा हो जाती थी तो उन संतानों को किसी चर्च में छोड़ दिया जाता था।

अब ब्रिटेन की सरकार के सामने यह गम्भीर समस्या हुई कि इन बच्चों का क्या किया जाये तब वहाँ की सरकार ने कान्वेन्ट खोले अर्थात जो बच्चे अनाथ होने के साथ साथ नाजायज हैं उनके लिए कान्वेन्ट बने।

उन अनाथ और नाजायज  बच्चों को रिश्तों का एहसास कराने के लिए  उन्होंने अनाथालयो में एक फादर एक मदर एक सिस्टर होती है क्योंकि ना तो उन बच्चों का कोई जायजा बाप है न माँ है  न बहन है।।

तो कान्वेन्ट बना नाजायज बच्चों के लिए ।

अब अपनी मूर्खता देखिए जिनके जायजा माँ बाप भाई बहन सब हैं वो कान्वेन्ट में जाते है तो क्या हुआ एक बाप घर पर है और दूसरा कान्वेन्ट में जिसे फादर कहते हैं । 

आज जिसे देखो कान्वेन्ट खोल रहा है जैसे बजरंग बली कान्वेन्ट स्कूल,  माँ भगवती कान्वेन्ट स्कूल ।

अब कौन समझाये कि भइया माँ भगवती या बजरंग बली का कान्वेन्ट से क्या लेना देना।

मै सभी महानुभावो से निवेदन करता हूँ कि अपने बच्चों को इसाई बनने से बचाये…………🙏🏻🙏🏻🚩🚩

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भाषा हत्या, किसान हत्या, जवान हत्या, गरीबी से आम नागरिकों की 


​राष्ट्र… ह्त्या की ओर – भाषा हत्या, किसान हत्या, जवान हत्या, गरीबी से आम नागरिकों की आत्महत्या (हत्या), नवजात शीशुओ की इलाज न होने से हत्या , संस्कारो की ह्त्या…..???????, 
UPSC परीक्षाओं में अंग्रेजी क्यों..,

अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रिक देशों में हिन्दी भाषा के वार्ता से से एक सम्मानित सख्श से जाने गए…, व देश के स्वाभिमान से दुनिया के देशों को सन्देश दिया 
ये सब विदेशी भोगवादी भाषा के तलवारों से, हम बर्बाद हो रहे है… , हिग्लीश को हिरण मानकर , धन तृष्णा से युवक, राष्ट्र की राह भटक गया है, अग्रेज़ी, दुनिया के सिर्फ 11 देशों मे प्रमुखता से बोली जाती है , स्वभाषा से चीन , जापान , जर्मनी फ्रांस व अन्य छोटे देश जो नक्शे मे भी दिखाई नही देते है वे शीर्ष देशों मे सुमार है….,
याद रहें चीन में विश्व के भव्यतम ओलंपिक के समापन समारोह के बाद ,चीनी सरकारअंग्रेजी को दूसरी भाषा के रूप में थोपने के प्रयास में चीनी जनता ने सडकों पर उतर कर विरोध किया,तब चीनी सरकार ने एक अध्यादेश लाकर घोषणा कि , चीनी भाषा में कोई अंग्रेजी शब्द उपयोग में नहीं लाया जाएगा, 

आज, हम विश्व गुरू हिंदुस्थान का तमगा लेकर दुनिया में ढोल पीट रहें है.., 
लेकिन आज देश…, विदेशी संस्कार, विचार, शिक्षा प्रणाली से कठपुतली बनकर विदेशी देशों की अंगलियों पर नाच रहा है , डॉलर , रूपये को डोल रहा है , 
देशवासियों विदेशी नशा छोड़ो , हिन्दुस्थानियों अपने देश को पहचानों, जागो…जागो…जागो… अभी भी समय है… विदेशी इशारों से डूबते देश को बचाओ 

साभार:

www. meradeshdoooba डॉट com (a mirror of india) स्थापना २६ दिसम्बर २०११ कृपया वेबसाइट की ५७०  प्रवाष्ठियों की यात्रा करें व E MAIL द्वारा नई पोस्ट के लिए SUBSCRIBE करें – 

भ्रष्टाचारीयों के महाकुंभ की महान-डायरी

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कई बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लगता। पढ़ाई के लिए उन्हें कितना ही समझाया जाए लेकिन कोई फायदा नहीं होता। कई बार स्टूडेंट के बहुत मेहनत करने पर भी उसे सफलता नहीं मिलती। ऐसे में बच्चे की असफलता का कारण उसका स्टडी रूम और उससे जुड़े वास्तु दोष भी हो सकते हैं। अगर बच्चे के स्टडी रूम से जुड़ी इन बातों का ध्यान रखा जाए तो पढ़ाई में अच्छी सफलता मिल सकती है।

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ग़ुलामी की निशानी अंग्रेजी भाषा।


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राजेश हिन्दूस्तानी

ग़ुलामी की निशानी अंग्रेजी भाषा।

जब भारत अंग्रेजों का ग़ुलाम था तब अंग्रेजी सीखना अंग्रेजी बोलना भारतियों की मज़बूरी थी
लेकिन आज तो हम आज़ाद हैं। अब कौन सी मज़बूरी है हमारी की हम इस ग़ुलामी की निशानी को ढोएं । आजकल ब्होत से पढ़े लिखे भारतीय इस झूठन को चाटना अपना स्टेट्स समझते हैं।
शायद ये भी इस भृम में जी रहे हैं की इंग्लिश एक वैज्ञानिक भाषा है, या इंग्लिश अंतरास्ट्रीय भाषा ,इसके बिना वो तरक्की नही कर सकते । जबकि ये सारे ही तर्क खोखले और झूठे हैं। ये पढ़े लिखे मुर्ख इतना भी नही जानते की ये भाषा उनके पूर्वजों की ग़ुलामी की निशानी है उनके स्वाभिमान पर एक बदनुमा दाग है जो आज तक नही मिटा
भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में अंग्रेजी भाषा का अनिवार्य होना इस बात का सबूत है की हम शारीरिक रूप से तो आज़ाद हो चुके हैं किन्तु मानसिक रूप से हम आज भी ग़ुलाम हैं । और भारत कोई आज़ाद देश नही बल्कि एक ग़ुलाम देश है जो अपनी ग़ुलामी की निशानी को आज तक ढो रहा है। कोई भी आज़ाद देश अपनी ग़ुलामी की निशानी को साथ लेकर नही चलता दुनिया में ब्होत से देश ब्रिटेन के ग़ुलाम रहे हैं। किन्तु आज़ाद होते ही सबसे पहले उन्होंने अपनी मातृभाषा को अपनाया और ग़ुलामी की निशानियों को मिटाया।

यदि आप जानना चाहते हैं की इस गरीब , लाचार और अवैज्ञानिक भाषा का सच क्या है । तो आज ही youtube पर राजीव दीक्षित जी के व्याख्यान सुने आपको पता चल जाएगा की इस भाषा में कितना दम है।

भाई राजीव दीक्षित अमर रहें। वन्देमातरम।

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मेकोले ने भारत मे जो शिक्षा व्यवस्था लागू की उसके पीछे मेकोले का तर्क था


मेकोले ने भारत मे जो शिक्षा व्यवस्था लागू की उसके पीछे मेकोले का तर्क था कि इस शिक्षा व्यवस्था मे से पढकर निकले हुये मूर्खो ओर गधो जेसी बुद्दि के होँगे ओर अपनी पूर्वजो के ग्यान को भूलकर हमारे पश्चिमी ग्यान के दास बन जायेंगे ,
भारतीय सँस्क्रति को भूलकर पश्चिम सँस्क्रति मे धँसते चले जायेंगे
ओर विदेशी कभी भी इनको मूर्ख बना सकते है लूट सकते है, गुरुकुलीय शिक्षा व्यवस्था अगर आज हमारे देश मे होती तो, भ्रष्टाचार, हत्याचार,बलात्कार,लूटमार जेसे घ्रणित दुष्कर्म नही पनपते ना अश्लीलता ओर नँगेपन की ओर हमारी युवा पीढी अग्रसर होती ।
गुरुकुलीय शिक्षा व्यवस्था जब तक हमारे यहाँ चलती थी तब तक हमारा देश विद्वानों का देश हुआ करता था, ग्यान ओर विग्यान मे परिपूर्ण था ।
अँग्रेजी शिक्षा व्यवस्था के चलते आज देश के समस्त युवाओं का बोध्दिक स्तर देखिये ।
कुछ अच्छा सोच ही नही सकते सिवाय अपने स्वार्थ के ।
जयतु जयतु हिन्दुराष्ट्रम

बुध्दिप्रकाश गुर्जर's photo.
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जैसी शिक्षा दी जाती है, समाज वैसा ही हो जाता है।


जैसी शिक्षा दी जाती है, समाज वैसा ही हो जाता है। भारतीय शास्त्रों में जो भी लिखा है, उसका ठीक उलटा अंग्रेजों ने पढ़ाया। इन्द्र पूर्व दिशा के लोकपाल हैं, पूर्व भारत में पूर्वी वायु से वर्षा होती है अतः कुएं को भी इन्द्र (इनार) कहते हैं। पर पढ़ाया गया कि आर्य पश्चिम एसिया से आये थे जिनका मुख्य देवता इन्द्र था। हेरोडोटस, मेगास्थनीज आदि सभी लेखकों ने लिखा कि उनके १५००० वर्ष पूर्व से भारत में कोई बाहर से नहीं आया अतः जनमेजय द्वारा श्मशान बनाये गये दो नगरों (मोइन्-जो-दरो = मुर्दों का स्थान, हड़प्पा = हड्डियों का ढेर) में खुदाई कर उसका मनमाना अर्थ अभी तक निकाल रहे हैं। पिछले ५००० वर्षों से भागवत प्रवचन का आरम्भ होता है कि ज्ञान और वैराग्य का आरम्भ द्रविड़ से हुआ वृद्धि कर्णाटक में हुयी और विस्तार महाराष्ट्र तक हुआ (इसीलिये इन क्षेत्रों के ये नाम हैं), अतः उलटा पढ़ाते हैं कि उत्तर के आर्यों ने द्रविड़ों पर वैदिक सभ्यता थोप दी। इसी प्रकार १६००० ई.पू. में समुद्र मन्थन में सहयोग के लिये असुर आये थे, जिसका समन्वय वासुकि (देवघर के पास वासुकिनाथ) ने किया था। उसी असुर क्षेत्र के लोग बाद में ग्रीस में बसे इसलिये आज भी उनकी उपाधि वही है जो ग्रीक भाषा में इन खनिजों के नाम हैं-ओराम (औरम = सोना, खालको = चालकोपाइराईट = ताम्बा, टोप्पो = टोपाज, सिंकू = स्टैनिक = टिन, हेम्ब्रम = पारा आदि)। पर इनको मूलनिवासी कह कर बाकी को आक्रमणकारी कहते हैं। विदेशी आक्रमण के कारण कई जातियों का व्यवसाय नष्ट होने से वे दलित हो गये, पर उसका दोष सवर्णों पर डालकर बाकी के लियॆ आरक्षण किया जाता है। उन लोगों के लिये भी आरक्षण किया गया जो पिछले ५००० वर्षों से शासक रहे हैं और सबसे शक्तिशाली और धनी हैं-जाट, यादव, पटेल आदि।
अतः समाज, आर्य-द्रविड़, मूल निवासी-बाहरी आर्य, सवर्ण-पिछड़ा में बंटा हुआ है। बड़े अपराध डकैती, अपहरण आदि को बहादुरी मानते हैं क्योंकि विदेशी आक्रमणकारियों की प्रशंसा की जाती है जिन्होंने १२०० वर्षों तक केवल हत्या, लूट और बलात्कार किया। ओड़िशा में स्वाधीनता के बाद उत्कल विश्वविद्यालय में प्रायः ६० शोधपत्रों का निष्कर्ष है कि वीर ओडिया जाति को कायर बनाने के लिये चैतन्य ने धर्म प्रचार किया था। सभी आधुनिक विचारक तुलसीदास को पथभ्रष्टक तथा कबीर को सुधारक मानते हैं जबकि दोनों रामानन्द सम्प्रदाय के थे। अतः चोर और भ्रष्ट लोगों को चतुर तथा अपहरण हत्याकारियों को बहादुर मान कर उनको वोट देते हैं। कृत्रिम भेद के कारण केवल जाति समीकरण पर राजनीति चल रही है।

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गुरुकुल कैसे खत्म हो गये ?


[23/06 16:24] Ajay Patel Rb: Please read this
[23/06 16:24] Ajay Patel Rb: Where we are?
[23/06 16:24] Ajay Patel Rb: भारतवर्ष में गुरुकुल कैसे खत्म हो गये ?

कॉन्वेंट स्कूलों ने किया बर्बाद 1858 में Indian Education Act बनाया गया।
इसकी ड्राफ्टिंग ‘लोर्ड मैकोले’ ने की थी। लेकिन उसके पहले उसने यहाँ (भारत) के
शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था, उसके पहले भी कई अंग्रेजों ने भारत के शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट दी थी। अंग्रेजों का एक अधिकारी था G.W. Litnar और दूसरा था Thomas Munro, दोनों ने अलग अलग इलाकों का अलग-अलग समय सर्वे किया था। 1823 के आसपास की बात है ये Litnar , जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था,
उसने लिखा है कि यहाँ 97% साक्षरता है और Munro, जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा कि यहाँ तो 100 % साक्षरता है, और उस समय जब भारत में इतनी साक्षरता है और मैकोले
का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी “देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था” को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह “अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था” लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे और मैकोले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा है:   “कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे
जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी।”
इसलिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया, जब गुरुकुल
गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज के तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी, फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया और इस देश के
गुरुकुलों को घूम घूम कर ख़त्म कर दिया उनमे आग लगा दी, उसमें पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा- पीटा, जेल में डाला।
1850 तक इस देश में ’7 लाख 32 हजार’ गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गाँव थे ’7 लाख 50
हजार’, मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल और ये जो गुरुकुल होते थे वो सब के सब आज की भाषा में ‘Higher Learning Institute’ हुआ करते थे उन सबमे 18 विषय पढाया जाता था और ये गुरुकुल समाज के लोग मिल के चलाते थे न कि राजा, महाराजा, और इन गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी।
इस तरह से सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे ‘फ्री स्कूल’ कहा जाता था, इसी कानू न के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं और मैकोले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है वो, उसमें वो लिखता है कि:
“इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।” उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब पड़ेगा, अरे हम तो खुद में हीन हो गए हैं जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा।
लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे।
ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी। संयुक्त राष्ट संघ जो अमेरिका में है वहां की भाषा अंग्रेजी नहीं है, वहां का सारा काम फ्रेंच में होता है।
जो समाज अपनी मातृभाषा से कट जाता है उसका कभी भला नहीं होता और यही मैकोले की रणनीति थी।

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👆यह मेसेज जरुर पढे हम कहा पीछे रहे