Posted in Ebooks & Blogspot

sardar vallabhbhai patel


mitro aaj mujhe dekhna hai ki sardar Vallabhbhai patel ke liye har Hindustani ko kitna aadar hai kharidiye is pustak ko “India’s Bismarck sardar vallabhbhai patel”
is pustak ke saath do maha karya jude hue hai
1) sardar vallabhbhai ke yogdan ke bare me sab to avgat Karana
2) is pustak ke bechne se hui kamai ka ek hissa garib bacchho ko liye siksha, khana , aur kitabe dilati hui ek sanstha ko Dan ke rup me diya jayega
yadi aap kam se kam apne 100 mitro ko prerit kar sakte hai yeh kharidne ke liye to is page ko like kare
1) is pustak ki kimat hai 300₹
2) pustak ki kimat milne ke 30 se 45 din me pustak aapke suchhit pate par pahoch jayega
3) yeh pustak english or hindi dono bhasa me mil sakti hai
sochiye mat des k bachhon k vikas me yogdan dijiye aur kam se apne 100 mitro ko prerit kijiye yeh pustak kharidne me
is group ke admin se me vinati karta hu ke mere is post ko pinned post kar dijye taki adhik se adhik log is me apna yogdan de sake
Jay Hind

mitro aaj mujhe dekhna hai ki sardar Vallabhbhai patel ke liye har Hindustani ko kitna aadar hai kharidiye is pustak ko "India's Bismarck sardar vallabhbhai patel"
is pustak ke saath do maha karya jude hue hai
1) sardar vallabhbhai ke yogdan ke bare me sab to avgat Karana
2) is pustak ke bechne se hui kamai ka ek hissa garib bacchho ko liye siksha, khana , aur kitabe dilati hui ek sanstha ko Dan ke rup me diya jayega
yadi aap kam se kam apne 100 mitro ko prerit kar sakte hai yeh kharidne ke liye to is page ko like kare
1) is pustak ki kimat hai 300₹
2) pustak ki kimat milne ke 30 se 45 din me pustak aapke suchhit pate par pahoch jayega
3) yeh pustak english or hindi dono bhasa me mil sakti hai
sochiye mat des k bachhon k vikas me yogdan dijiye aur kam se apne 100 mitro ko prerit kijiye yeh pustak kharidne me
is group ke admin se me vinati karta hu ke mere is post ko pinned post kar dijye taki adhik se adhik log is me apna yogdan de sake
Jay Hind
Posted in Ebooks & Blogspot

Free Hindi ebooks


http://freehindibooksforyou.blogspot.com/2014/08/shiv-swarodaya-download-hindi-pdf.html

Posted in Ebooks & Blogspot

किताब की चोरी कैसे होती है?


digital_library_cvria imagesकिताब की चोरी कैसे होती है?

एक समय था जब कोम्पुटर नहीं था। तब भी किताब चोरी होती थी। मुजे बरोबर याद है मई कालेज मे पढ़ता था तब हमारी किताब बड़ी महेंगी आती थी और वो भी कही से बेनामी प्रिंटिंग प्रेस मे छाप कर सस्ते मे बिकती थी। उसके बाद कंप्यूटर का जमाना आया किताब कंप्यूटर मे आने लगी लेकिन इसमे एक दिक्कत थी की पढ़ना मुस्किल था। हम सोफा पे बैठ के या सयन कक्ष मे लेते लेते पढ़ नहीं सकते। जमाना और तेज आ गया की आज १२।२ इंच का tab आ गया। आप drop box नामक app मे १५००० किताब रख सकते है और वो आपकी मोबाइल लाइब्ररी बन जायेगी। है ना मजेकी बात। आप कोई भी देस मे जाओ भारत के कोई भी सहर मे जाओ आप कोई भी किताब पढ़ सकते हो। यदि आप लेखक हो तो ये भी बता दु की कोई एक विषय पे जब लिखना चाहते हो तो word सर्च कर सकते हो। जैसे “भारत “—- tab आप को बता देगा १५००० किताब मे भारत नाम वाली कितनी किताब है। और आप का कीमती समय बच गया। १५००० किताब खरीदी का डेढ़ लाख रुपिया बच गया. इतनी सारी किताब रख ने के लिये २००० वर्ग मीटर की जगह बच गई। कीड़ो से बचाने की महेनत बच गई।
अब रही बात चोरी की। तो वो इस प्रकार होती है।
१) कोई भी किताब का नाम गूगले पे इस तरह लिखे …..भारत का इतिहास download वो किताब आप के नजर के सामने आ जायेगी उसे download कर लो.
२) कई सेवाधारी लोग उसके टॉरेंट बना कर कंप्यूटर मे छोड़ देते है और उसके जरिये आप किताब download कर सकते है। वापस आप गूगले मे लिखिये  भारत का इतिहास torrent उसका torrent आप के सामने आ जायेगा और किताब आप के हाथ मे।
अब प्रश्ना ये है की किताब का torrent बना के लोग इंटरनेट पे रख देते है तो चोर को पकड़ना मुस्किल है। उनका एक ही हल है किताब को एकदम सस्ता कर दो १० रुपिया एक किताब का. पब्लिशर या लेखक को कोई नुकसान नहीं क्योकि हार्ड कॉपी यदि ५००० ५ साल मे बिकेगी तो ये कंप्यूटर वाली pdf ५ लाख एक दिन मे बिकेगी। और १० रुपय की कोई चोरी नहीं करेगा।
आज दुनिया की सब लाइब्ररी सारी किताब की pdf फाइल बना रही है और ये सब आप ऑनलाइन पढ़ सकते है वो भी ५०००० किताबे। अब ये सारी लाइब्ररी एक दूसरे के साथ जुड़ रही है। इसका मतलब ये की एक दिन सारी दुनियाकि लाइब्ररी एक दूसरे के साथ जुड़ जायेगी। स्कूल और collage का हर लड़का १ करोड़ से ज्यादा किताब पसंद कर के पढ़ सकता है। वो भी आपने tab मे मामूली कीमत अदा कर के।
तो प्रशना है की लेखक और पब्लिशर नामसेष हो जायेंगे दिनोसॉर की तरह। बिल्कुल नहीं। वो सारे लेखक आपना ब्लॉग बनायेंगे और उसमे कहानी नवलकता और कई साहित्य हर माह लिखेंगे जिस को वो पढ़ना हो वो उन्हे छोटी सी कीमत नेट बॅंकिंग द्वारा दे कर पढ़ सकता है। 
लेखक को आब पब्लिशर के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। दूसरा वो आप ने ब्लॉग पे अड्वर्टाइज़िंग के पैसे भी बटोर सकता है।
एक नया इतिहास सॅरू होने जा रहा है। 
Posted in Ebooks & Blogspot

भविस्य मे किताबो की दुनिया।


lead-books

आज से ८ साल पहेले कनेडा मे लाइब्ररी का digities करना सॅरू हो गया और उनको उन्होने इंटरनेट पे रख भी दिया. उनके देस का अब हर आदमी घर बैठे किताब पढ़ सकता है वो भी बहुत मामूली कीमत पर। उनके पास ४०,००० से भी ज्यादा किताब अब इंटरनेट पे प्राप्य है। बाद उन्होने अलग अलग राज्यो की लाइब्ररी को भी degitise करना सॅरू किया. अब कोई एक लाइब्ररी का सदस्य होता है तो अन्य लाइब्ररी की लिंक उनको फ्री मे प्राप्त होती है…है ना मजे की बात। google पे सिर्फ online digital library सर्च कीजिये। सदस्य बने और लाखो किताबे पढ़ सकते है। 

दूसरी बात मेरे पास कुल २५०० किताबे मेरे घर पे थी और कुछ दुर्लभ मेग़ेज़ीन. इन सारी किताब और मेगज़ीन को मई scan करके उनकी pdf फाइल बना डाली उसको मैने dropbox मे रख दी। अब मई दुनिया मे कही पे भी जौऊंगा तो वो मई पढ़ सकता हु। क्यो की dropbox की सेर्विस १५ gb तक फ्री है और १५ gb मे आप १०,००० किताब रख सकते है। 

तीसरी बात मेरे जैसे और भी कई भाई है उसके साथ मई किताब exchange कर सकताहु। तो मेरे दस मित्र होंगे तो मेरे पर्सनल library मे २०,००० किताब हो जाएंगी।

अब एक प्रशना होगा की पब्लिशर और लेखको का क्या ? वो कैसे पैसे कमाएंगे ? पब्लिशर online publiketion निकालेगा और लेखक उनमेसे ही पैसे कमायेगा। तो कोई किताब चोरी नहीं करेगा ? नहीं करेगा।..क्योकि जो किताब प्रिंटेड ७०० रुपय की हो वो pdf फॉर्मेट मे ७ रुपय मे मिलेगी तो क्यो चोरी करेगा? प्रिंटिंग के पिसे बच जायेंगे। stock नहीं करना है। और अड्वर्टाइज़िंग भी आसान हो जायेगी। और hard कॉपी जो आपने राज्य मे बिकती होगी वो पूरी दुनिया मे विदाउट पार्सल बिकेगी।

Posted in Ebooks & Blogspot

‘राजस्‍थान का माटी शिल्‍प’


‘राजस्‍थान का माटी शिल्‍प’

वरिष्‍ठ लेखक डॉ. देवदत्‍त शर्मा की कृति ‘राजस्‍थान का माटी शिल्‍प’ पढकर यह ताज्‍जुब हुआ कि राजस्‍थान का मृण शिल्‍प बहुत पुराने काल से विकसित रहा है। हडप्‍पा लेकर कालीबंगा, गणेश्‍वर, बागोर, आहाड आदि जहां कहीं खुदाई हुई है, माटीशिल्‍पों के नमूनों ने सिद्ध किया है कि यहां कुम्‍हारों गतिविधियां संस्‍कृति के उष:काल से ही रही है। यह शिल्‍प आज प्रचलन में है। मेवाड में मोलेला, मारवाड में पोकरण, मेवात में रामगढ और ढूंढाड में हाडौता के माटीशिल्‍प ख्‍यात रहे हैं। ‘राजस्‍थान का माटी शिल्‍प’ में 7 अध्‍यायों में इन शिल्‍पों पर प्रामाणिक जानकारियां दी गई हैं। यह कृति राजस्‍थान हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्‍जयपुर ने प्रकाशित की है। इसमें माटीशिल्‍प का उद़भव और विकास, राजस्‍थान में माटीशिल्‍प के प्राचीन प्रमाण, संग्रहालयों में प्रदर्शित माटीशिल्‍प और माटी शिल्‍प के प्रमुख केंद्रों के साथ ही माटी शिल्‍पकारों की समस्‍याएं, राजस्‍थान की मिट्टी तथा प्रमुख माटी शिल्‍पी और माटी से जुडे मुहावरों को संजोया गया है। राजस्‍थान के हस्‍तशिल्‍प के अध्‍ययन, अनुसंधान के क्षेत्र में यह कृति स्‍वागत योग्‍य है।

'राजस्‍थान का माटी शिल्‍प'

वरिष्‍ठ लेखक डॉ. देवदत्‍त शर्मा की कृति  'राजस्‍थान का माटी शिल्‍प' पढकर यह ताज्‍जुब हुआ कि राजस्‍थान का मृण शिल्‍प बहुत पुराने काल से विकसित रहा है। हडप्‍पा लेकर कालीबंगा, गणेश्‍वर, बागोर, आहाड आदि जहां कहीं खुदाई हुई है, माटीशिल्‍पों के नमूनों ने सिद्ध किया है कि यहां कुम्‍हारों गतिविधियां संस्‍कृति के उष:काल से ही रही है। यह शिल्‍प आज प्रचलन में है। मेवाड में मोलेला, मारवाड में पोकरण, मेवात में रामगढ और ढूंढाड में हाडौता के माटीशिल्‍प ख्‍यात रहे हैं। 'राजस्‍थान का माटी शिल्‍प' में 7 अध्‍यायों में इन शिल्‍पों पर प्रामाणिक जानकारियां दी गई हैं। यह कृति राजस्‍थान हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्‍जयपुर ने प्रकाशित की है। इसमें माटीशिल्‍प का उद़भव और विकास, राजस्‍थान में माटीशिल्‍प के प्राचीन प्रमाण, संग्रहालयों में प्रदर्शित माटीशिल्‍प और माटी शिल्‍प के प्रमुख केंद्रों के साथ ही माटी शिल्‍पकारों की समस्‍याएं, राजस्‍थान की मिट्टी तथा प्रमुख माटी शिल्‍पी और माटी से जुडे मुहावरों को संजोया गया है। राजस्‍थान के हस्‍तशिल्‍प के अध्‍ययन, अनुसंधान के क्षेत्र में यह कृति स्‍वागत योग्‍य है।
Posted in Ebooks & Blogspot

सूत्रधार मण्‍डन का राजवल्‍लभ वास्‍तुशास्‍त्रम़


सूत्रधार मण्‍डन का राजवल्‍लभ वास्‍तुशास्‍त्रम़

आज मेरे संपादन में ”राजवल्‍लभ वास्‍तुशास्‍त्रम़” का अंग्रे‍जी अनुवाद प्रकाशित होकर मेरे हाथ तक पहुंचा है। अनुवाद आदरणीय प्रो. भंवर शर्मा ने किया है। यह ग्रंथ सूत्रधार मंडन द्वारा लिखा गया हे जिसको कुंभलगढ जैसे अजेय दुर्ग के स्‍थापत्‍य शास्‍त्री होने का गौरव रहा है। महाराणा कुंभा के दरबार के इस सूत्रधार के कुल ने मेवाड में सोमपुरा स्‍थापत्‍य की नींव डाली और उस दौर में जबकि भारतीय कला और स्‍थापत्‍य पर विदेशी प्रभाव पड रहा था, भारतीय शिल्‍प ग्रंथों की रचना कर लक्षणों को अद्भुत ढंग से बचाने में पूरी ताकत लगा दी। राजवल्‍लभ के अतिरिक्‍त् उसकी देवता मूर्तिप्रकरणम्, प्रासादमण्‍डनम्, रूपमण्‍डनम्, वास्‍तुमण्‍डनम्, वास्‍तुशास्‍त्रम्, वास्‍तुसार मण्‍डनम़, आयतत्‍वम् आदि ग्रंथ हैं। इन सभी का अनुवाद मैंने 2003 में प्रारंभकर प्रकाशित करवाए हैं।

राजवल्‍लभ वास्‍तुशास्‍त्रम़ ग्रंथ मूलत: कुंभलगढ में लिखा गया है। मंडन की मौलिक रचना है। चौदह अध्‍यायों में कुल 1472 श्‍लोक हैं। इसमें वास्‍तु के तमान अंगों सहित ज्‍योतिष, शकुन, गणित आदि पर पर्याप्‍त विचार मिलता है। यह ग्रंथ भारत में पहली बार 1854 में प्रकाशित हुआ था। इसका आमूल आलोचना पाठ सहित उचित हिंदी अनुवाद 2005 में मैंने परिमल पब्लिकेशंस के लिए किया था। उसमें मेरी करीब 210 पेज की गंभीर भूमिका थी। इस ग्रंथ की यह विशेषता रही कि देश में अनेक स्‍थानों पर वास्‍तु विज्ञान के अध्‍येताओं ने उसको पाठयक्रम में शामिल कर लिया। विदेशी मित्रों और देश के अन्‍य भाषाभाषियों की लगातार मांग के कारण इसका पहली बार अंग्रेजी अनुवाद किया गया। परिमल पब्लिकेशंस (27-28 शक्तिनगर, दिल्‍ली11007, order@parimalpublication.com) ने ही इसका प्रकाशन किया है। परिमल जोशी (01123845456) को आभार कि इसका युगानुरूप अच्‍छा प्रकाशन किया है। कुल 216 पेज और 450 रुपए मूल्‍य के इस ग्रंथ में विषयोपयोगी अनेक रंगीन चित्र व रेखाचित्र दिए गए हैं।

— at Fateh Sagar lake Udaipur

Shri Krishan Jugnu's photo.
Shri Krishan Jugnu's photo.
Shri Krishan Jugnu's photo.
Posted in Ebooks & Blogspot

भारत का प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन भौगालिक कोश


राष्‍ट्र की पहचान कराने वाला कोश

प्राचीन ग्रंथों को पढ़ते समय जब कभी स्‍थानवाची नाम या उसका पर्याय आता है तो जिज्ञासा होती है कि वह कहां पर है? उसकी क्‍या विशेषता है? उसके बारे में और कहां-कहां जानकारी मिल सकती है ? यह जिज्ञासा भारतीय पुरातत्‍व विभाग के जनरल अलेक्‍जेंडर कनिंघम को हुई और उन्‍होंने 1886 के आसपास एक कोश तैयार किया, मगर उसकी कमियों को जानकर तत्‍काल बंगाल के स्‍वनामधन्‍य श्री नन्‍दुलाल डे ने भूगोल कोश तैयार किया : एंशियंट ज्‍योग्राफी ऑफ इंडिया। उन्‍हें लगा कि कोश प्राचीन स्‍थानों का ही होकर रह गया है तो उन्‍होंने संशोधित और परिवर्धित कोश खड़ा किया : एंशियंट एंड मिडाइवल ज्‍योग्राफी ऑफ इण्डिया। पिछली सदी के प्रारंभिक वर्षों में इसका विदेश से प्रकाशन हुआ। इसके बाद हालांकि इसका पुनर्मुद्रण भी हुआ और इसी आधार पर अन्‍य जनों ने अपने कोश तैयार किए मगर यदि इसका हिंदी अनुवाद हो जाता तो यह सबके प्रयासों पर भारी पड़ता।

बस यही विचार लेकर एक दिन मैंने वयोवृद्ध भूगोलविद् आदरणीय श्रीनारायणलाल शर्मा से निवेदन किया कि डे साहब के कोश का अनुवाद क‍ीजिएगा। यह बात तीर की तरह लगी और उन्‍होंने दिन रात परिश्रम कर इस कोश का बेहतरीन अनुवाद आवश्‍यक मानचित्रों, नक्‍शों सहित किया। मैंने भी एक-एक पंक्ति को देखा, उस काल के प्रकाशित ग्रंथों के संदर्भों को खोजा। सच कहूं तो यह कार्य इतना अधिक था कि नाक पर चढ़ा चश्‍मा खुद भी उतरकर विश्राम लेने की प्रार्थना करने लगा मगर मन उसको इजाजत देने पर राजी नहीं था। कहता था कि तुम खरीदे गए हो, काम में लगे रहना पड़ेगा...।

खैर, पुस्‍तक तैयार हुई तो श्री नारायणजी इस बात पर अड़ गए कि आपको भूमिका लिखनी पड़ेगी। मैं अपनी सीमाएं जानता था। फिर, यह भी जानता था कि डे साहब जैसे भारतविद् की पुस्‍तक पर मुझ जैसा अल्‍पज्ञ क्‍या भूमिका लिखेगा। आग्रह इतना ज्‍यादा हो गया कि... वरना ये कोश छपने नहीं जाएगा। दो साल की उहापोह के बाद आखिरकार भूमिका लिखी गई। यह सब देख मित्रवर श्रीगोविंदलाल सिंह इतने मुग्‍ध हुए कि पुस्‍तक को उठा ले गए और प्रकाशित कर दी : भारत का प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन भौगालिक कोश।
 कुल 432 पन्‍ने और दीर्घाकार नक्‍शे।*

फ्लेप पर लिखा गया -

''भारतीय भूगोलविदों में श्री नंदलाल डे का नाम बहुत सममान के साथ लिया जाता है। भारत के प्राचीन महत्‍व के स्‍थानों को उनके माहात्‍म्‍य सहित वर्णित करने में उन्‍होंने अपनी पूरी ताकत और क्षमता का जो संकल्‍प किया, उसे प्रस्‍तुत कृति 'भारत का प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन भौगालिक कोश' में साकार देखा जा सकता है। उन्‍होंने बंगाल में राष्‍ट्रीय चेतना के उदयकाल में भारतीय महत्‍व के तीर्थों, ऐतिहासिक स्‍थानों, नगरों व ग्रामों, पर्वतों, नदियों, गुफाओं, मंदिरों, मठों इत्‍यादि का शास्‍त्र सम्‍मत भूगोल तैयार कर जन्‍मभूमि को नमस्‍कार किया है। यह कृति न केवल भूगोल बल्कि अध्‍यात्‍मप्राण भारत वर्ष को रूपायित करने का जीवन्‍त स्‍मारक है। प्रो. डे को उनकी इस कृति ने यशकीर्ति प्रदान की है। नि:सन्‍देह यह कृति कालजयी और सार्वकालिक महत्‍व की है।''
------------------------------------------
* नाम कृति : भारत का प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन भौगालिक कोश
प्रकाशक : आर्यावर्त संस्‍कृति संस्‍थान, 
डी 48, गली नंबर 3, दयालपुर, करावलनगर रोड, दिल्‍ली 110094 
प्रथम संस्‍करण : 2014
मूल्‍य : 900 रुपए।

राष्‍ट्र की पहचान कराने वाला कोश

प्राचीन ग्रंथों को पढ़ते समय जब कभी स्‍थानवाची नाम या उसका पर्याय आता है तो जिज्ञासा होती है कि वह कहां पर है? उसकी क्‍या विशेषता है? उसके बारे में और कहां-कहां जानकारी मिल सकती है ? यह जिज्ञासा भारतीय पुरातत्‍व विभाग के जनरल अलेक्‍जेंडर कनिंघम को हुई और उन्‍होंने 1886 के आसपास एक कोश तैयार किया, मगर उसकी कमियों को जानकर तत्‍काल बंगाल के स्‍वनामधन्‍य श्री नन्‍दुलाल डे ने भूगोल कोश तैयार किया : एंशियंट ज्‍योग्राफी ऑफ इंडिया। उन्‍हें लगा कि कोश प्राचीन स्‍थानों का ही होकर रह गया है तो उन्‍होंने संशोधित और परिवर्धित कोश खड़ा किया : एंशियंट एंड मिडाइवल ज्‍योग्राफी ऑफ इण्डिया। पिछली सदी के प्रारंभिक वर्षों में इसका विदेश से प्रकाशन हुआ। इसके बाद हालांकि इसका पुनर्मुद्रण भी हुआ और इसी आधार पर अन्‍य जनों ने अपने कोश तैयार किए मगर यदि इसका हिंदी अनुवाद हो जाता तो यह सबके प्रयासों पर भारी पड़ता।

बस यही विचार लेकर एक दिन मैंने वयोवृद्ध भूगोलविद् आदरणीय श्रीनारायणलाल शर्मा से निवेदन किया कि डे साहब के कोश का अनुवाद क‍ीजिएगा। यह बात तीर की तरह लगी और उन्‍होंने दिन रात परिश्रम कर इस कोश का बेहतरीन अनुवाद आवश्‍यक मानचित्रों, नक्‍शों सहित किया। मैंने भी एक-एक पंक्ति को देखा, उस काल के प्रकाशित ग्रंथों के संदर्भों को खोजा। सच कहूं तो यह कार्य इतना अधिक था कि नाक पर चढ़ा चश्‍मा खुद भी उतरकर विश्राम लेने की प्रार्थना करने लगा मगर मन उसको इजाजत देने पर राजी नहीं था। कहता था कि तुम खरीदे गए हो, काम में लगे रहना पड़ेगा…।

खैर, पुस्‍तक तैयार हुई तो श्री नारायणजी इस बात पर अड़ गए कि आपको भूमिका लिखनी पड़ेगी। मैं अपनी सीमाएं जानता था। फिर, यह भी जानता था कि डे साहब जैसे भारतविद् की पुस्‍तक पर मुझ जैसा अल्‍पज्ञ क्‍या भूमिका लिखेगा। आग्रह इतना ज्‍यादा हो गया कि… वरना ये कोश छपने नहीं जाएगा। दो साल की उहापोह के बाद आखिरकार भूमिका लिखी गई। यह सब देख मित्रवर श्रीगोविंदलाल सिंह इतने मुग्‍ध हुए कि पुस्‍तक को उठा ले गए और प्रकाशित कर दी : भारत का प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन भौगालिक कोश।
कुल 432 पन्‍ने और दीर्घाकार नक्‍शे।*

फ्लेप पर लिखा गया –

”भारतीय भूगोलविदों में श्री नंदलाल डे का नाम बहुत सममान के साथ लिया जाता है। भारत के प्राचीन महत्‍व के स्‍थानों को उनके माहात्‍म्‍य सहित वर्णित करने में उन्‍होंने अपनी पूरी ताकत और क्षमता का जो संकल्‍प किया, उसे प्रस्‍तुत कृति ‘भारत का प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन भौगालिक कोश’ में साकार देखा जा सकता है। उन्‍होंने बंगाल में राष्‍ट्रीय चेतना के उदयकाल में भारतीय महत्‍व के तीर्थों, ऐतिहासिक स्‍थानों, नगरों व ग्रामों, पर्वतों, नदियों, गुफाओं, मंदिरों, मठों इत्‍यादि का शास्‍त्र सम्‍मत भूगोल तैयार कर जन्‍मभूमि को नमस्‍कार किया है। यह कृति न केवल भूगोल बल्कि अध्‍यात्‍मप्राण भारत वर्ष को रूपायित करने का जीवन्‍त स्‍मारक है। प्रो. डे को उनकी इस कृति ने यशकीर्ति प्रदान की है। नि:सन्‍देह यह कृति कालजयी और सार्वकालिक महत्‍व की है।”
——————————————
* नाम कृति : भारत का प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन भौगालिक कोश
प्रकाशक : आर्यावर्त संस्‍कृति संस्‍थान,
डी 48, गली नंबर 3, दयालपुर, करावलनगर रोड, दिल्‍ली 110094
प्रथम संस्‍करण : 2014
मूल्‍य : 900 रुपए।

Posted in Ebooks & Blogspot

http://www.vedicresearchfoundation.org/category/pdf/


http://www.vedicresearchfoundation.org/category/pdf/