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क्या महात्मा बुध्द वैदिक यज्ञ विरोधी थे ?


क्या महात्मा बुध्द वैदिक यज्ञ विरोधी थे ?

मित्रो नमस्ते हमारे इसी पेज पर हमने बुध्द से सम्बन्धित कुछ पोस्ट की थी जैसे-
बुध्द ओर वैदिक वर्णव्यवस्था
बुध्द ओर वेद
बुध्द ओर मासाहार
गौतम बुद्ध ने गायों के महत्व और उपयोगिता की शिक्षा दी
अब इसी कडी मे है महात्मा बुध्द क्या वैदिक यज्ञ विरोधी थे। हम ये पहले सिध्द कर चुके है कि भगवान बुध्द वेद विरोधी नही थे बल्कि वेदो का नाम ले कर हिंसा,पशु बलि देने वालो के विरोधी थे उन्होने जन्मजात वर्ण व्यवस्था ओर यज्ञ मे जीव हत्या का विरोध किया जिसकी उन्हे इतनी बडी कीमत चुकानी पडी कि उस समय के धर्म के ठेकेदारो ने नास्तिक घोषित कर दिया। आज भी कई नास्तिक वादी,अम्बेडकर वादी इसी बात का फ़ायदा उठाकर सनातन धर्म का अपमान कर रहे है।
कई लोगो का मानना है कि बुध्द यज्ञ के घौर विरोधी थे। लेकिन वास्तव मे ऐसा नही है। बुध्द ने अपने चार सत्य ओर आठ अष्टांगिक मार्गो के साथ वैदिक शब्द आर्य का प्रयोग किया है। ओर आर्यो के बतलाए मार्ग पर चलने का उपदेश दिया है । जिस की पुष्टि धम्मपद के इस वाक्य से होती है-

       बुध्द ने आर्य का अर्थ वैदो की तरह श्रेष्ट लिया है।   अब आते है बुध्द के यज्ञ विरोध पर तो आप लोग कुटद्न्त सुत्त को देखे इस मे एक कुटदन्त नाम का एक ब्राह्मण यज्ञ करने के उद्देश्य से महात्मा बुध्द के पास जाता है। इस पर महात्मा बुध्द उसे अपने पूर्व जन्म की एक कथा सुनाते है जिसमे बुध्द ने पुरोहित बनकर महाविजित नाम के एक राजा का यज्ञ किया था। साथ मे बुध्द ने यज्ञ करने वाले पुरोहित के चार गुण बताए -सुजात,त्रेवैद्य(वेद विद्या मे निपुण),शीलवान ओर मैधावी, हो उसी से यज्ञ कार्य करवाने चाहिए।
 साथ ही बुध्द ने यज्ञ मे पशु हत्या न करने को कहा ओर कहा कि प्राचिन काल मे यज्ञ मे पशु हत्या नही होती थी।बल्कि घी,तेल,मख्खन,दही,अनाज,मधु,खांड से यज्ञ होते थे।
 साथ ही यज्ञ समबन्धित अन्य अनुशासन के बारे मे बताया।
 यहा बुध्द का कथन बिल्कुल सत्य है कि बाद मे लालची ब्राह्मणो ने यज्ञ मे बलि प्रथा जैसी कुप्रथा को जोडा था। जिसके लिए बुध्द ने सुत्त निपात 300 मे ब्राह्मणो का लालची हो जाने के बारे मे कहा है।
बुध्द की इस बात की पुष्टि चरक के इस कथन से होती है-
 इस से स्पष्ट होता है कि प्राचिन काल मे पशु बलि नही होती थी लैकिन बाद मे पुरोहितो मे लालच आ गया था।
 इस के अलावा बुध्द ने  सुत्तनिपात 569 मे यज्ञो मे अग्निहोत्र को मुख्य कहा है जो इस तरह है
 अर्थात छंदो मे सावित्री छंद(गायत्री छंद ) मुख्य है ओर यज्ञो मे अग्निहोत्र ।  अत: निम्न बातो से निष्कर्ष निकलता है कि बुध्द वास्तव मे यज्ञ विरोधी नही थे बल्कि यज्ञ मे जीव हत्या करने वाले के विरोधी थे।
जय मा भारती
ओम
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बुध्द ओर मांसाहार


बुध्द ओर मांसाहार

बुध्द ओर सूअर का मास
मित्रो महाभारत के युध्द के बाद धर्म मे ओर धर्म ग्रंथो कर्मकांडो मे
कई तरह की अशुध्दिया आ गई ओर जो यञ
प्राणी मात्र के जीवन रछा ओर सुख
की कामना के लिए किया जाता था उनमे पशु बलि का प्रचलन
हो गया,,,
ऐसे मै गौतम बुध्द ने कई बार अपने प्राणो की परवाह
किए बिना यञ से पशु को बलि होने से बचाया लेकिन जिन बुध्द ने पशु
रछा मे अपना जीवन दिया आज कल उनके
ही अनुयायी ओर बौध्द देश मास भछण करते
है|
यहा तक नवनिर्मित
अम्बेडकरवादी भी कहते है कि बुध्द
भी मासाहारी थे ओर अम्बेडकर
वादी भी फुल मास भछण करते है|
इसके अलावा विदेशी मत के लोग जैसे इसाई ओर मुस्लिम
भी ये प्रचार करते है कि बुध्द की मृत्यु
सूअर का मास खाने से हुई|
असल मे बोध्द धर्म मे बुध्द के बाद भिछुको ने
अपनी सुविधानुसार परिवर्तन किए थे
इसी तरह एक बौध्द भिछु ने
किसी चील के मुह से गिरे हुए मास
का टुकडा खा लिया ओर ये प्रचार फैला दिया कि पशु को मारना पाप है
जबकि मास खाना नही वास्तव मे बुध्द ने
कभी मासाहार नही किया ओर न
कभी इसका समर्थन किया लेकिन विरोध अवश्य किया है|
अब हम आप को बताते है सूअर के मास के पीछै
का रहस्य-
“चुदस्स भत्त मुजित्वा कम्मारस्साति ये सुतं|
आबाधं सम्फुसो धीरो पबाव्ठे मारणान्तिकं|
भत्तस्स च सूकर मद्दवेन,व्याधि पवाह उदपादि सत्थुनो|
विरेचमानो मगवा आबोच गच्छामहं कुसिनारं नगरंति|{दीर्घ
निकाय}
इसका भावार्थ है कि चुन्नासा भट्ट ने महात्मा बुध्द को सूकर
का मद्दव खिला दिया|उससे उनके पेट मे अति पीडा हुई
और उनहे अतिसार हौ गया|तब उनहोने कहा ,”मै
कुसीनगर को जाउगा ”
यहा सूकर मद्दव को लोग सूअर का मास समझते है विशेषकर
श्रीलंकाई बोध्दो ने इसे सुअर का मास बताया लेकिन ये सच
नही है
वास्तव मै यहा सूकर मद्दव पाली शब्द है जिसे
हिन्दी करे तो होगा सूकर कन्द ओर संस्कृत मे बराह
कन्द यदि आम भाषा मे देखे तो सकरकन्द चुकि ये दो प्रकार
का होता है १ घरेलु मीठा२ जंगली कडवा इस
पर छोटे सूकर जैसे बाल आते है इस लिए इसे बराह कन्द
या शकरकन्द कहते है|ये एक कन्द होता है जिसका साग
बनाया जाता है |इसके गुण यह है कि यह चेपदार मधुर और गरिष्ठ
होता है तथा अतिसार उत्पादक जिस जगह भगवान बुध्द ने यह
खाया ओर उनहे अतिसार हुआ उस गौरखपुर
देवरिया की तराई मे उस समय ओर आज
भी सकर कन्द
की खेती की जाती है|
वास्तव मै उसका अर्थ सूअर का मास
करना मुर्खता ही है
इस तरह अन्य चीजे भी है
जैसे एक औषधी अश्वशाल होती है
जिसका शाब्दिक अर्थ घौडे के बाल लेकिन वास्तव मे यै औषधिय
पौधा होता है
इसी तरह अंग्रेजी मे lady finger
जिसका अर्थ करे तो औरत की उंगली लेकिन
वास्तव मे यह भिंडी के लिए है
इसी तरह कुकरमुत्ता जिसका शाब्दिक अर्थ कुत्ते
का मूत्र लेकिन ये वास्तव मे एक साग होता है
इसी तरह अश्वगंधा जिसका घौडे की गंध
लेकिन वास्तव मे ये औषधिए पौधा होता है|
अत: सूकर मद्दव एक कन्द है न कि सूकर का मास|
इस लिंक को पढे अधिक जानकारी हैतु
https://vedictruth.blogspot.in/2013/12/blog-post_14.html?
m=1

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बुध्द ओर वेद


बुध्द ओर वेद

प्रायः यह माना जाता है बुद्ध वेदोँ के घोर विरोधी थे किन्तु
निष्पक्षपात दृष्टि से इस विषय का अनुशीलन करने पर
इसमेँ यथार्थता नहीँ प्रतीत
होती।
सुत्त निपात के सभिय सुत्त मेँ महात्मा बुद्ध ने वेदज्ञ का लक्षण
इस प्रकार बताया है-
वेदानि विचेग्य केवलानि समणानं यानि पर अत्थि ब्राह्मणानं।
सब्बा वेदनासु वीतरागो सब्बं वेदमनिच्च वेदगू सो।।
(सुत्त निपात 529)
श्री जगत्मोहन वर्मा ने अपनी ‘बुद्ध देव’
नामक पुस्तक के पृष्ठ 243 पर इसे उद्धत करके अनुवाद दिया है-
“जिसने सब वेदोँ और कैवल्य वा मोक्ष-विधायक उपनिषदोँ का अवगाहन
कर लिया है और जो सब वेदनाओँ से वीतराग होकर
सबको अनित्य जानता है वही वेदज्ञ है”।
श्री वियोगी हरि ने अपनी ‘बुद्ध
वाणी’ के पृ॰72 मेँ इसे निम्न अर्थ के साथ उद्धत
किया है- “श्रमण और ब्राह्मणोँ के जितने वेद हैँ उन
सबको जानकर और उन्हेँ पार करके जो सब वेदनाओँ के विषय मेँ
वीतराग हो जाता है, वह वेद पारग कहलाता
श्रोत्रिय का लक्षण-
प्रश्न- किन गुणोँ को प्राप्त करके मनुष्य श्रोत्रिय होता है?
बुद्ध का उत्तर-
“सुत्वा सब्ब धम्मं अभिञ्ञाय लोके सावज्जानवज्जं यदत्थि किँचि।
अभिभुं अकथं कथिँ विमुत्त अनिघंसब्बधिम् आहु ‘सोत्तियोति”।।
लार्ड चैमर्स G.C.B.D.Litt ने Buddha’s teaching सुत्त निपात
के अनुवाद मेँ इसका अर्थ योँ दिया है-
“जितने भी निन्दित और अनिन्दित धर्म हैँ उन
सबको सुनकर और जानकर जो मनुष्य उनपर विजय प्राप्त करके
निश्शंक, विमुक्त, और सर्वथा निर्दःख हो जाता है, उसे श्रोत्रिय
कहते हैँ”।
संस्कृत साहित्य मेँ श्रोत्रिय शब्द का प्रयोग ‘श्रोत्रियछश्न्
दोऽधीते’ इस अष्टाध्यायी के सूत्र के
अनुसार वेद पढ़नेवाले के लिए होता है। वेदज्ञ और श्रोत्रिय के
महात्मा बुद्ध ने सभिय के प्रश्न के उत्तर मेँ जो लक्षण किये हैँ
उनसे उनका वेदोँ के विषय मेँ आदर भाव ही प्रकट
होता है न कि अनादर, यह बात सर्वथा स्पष्ट है। दरअसल
जहां भी निन्दासूचक शब्द आये हैँ वे उन ब्राह्मणोँ के
लिए आये जो केवल वेद का अध्ययन करते हैँ पर तदनुसार आचरण
नहीँ करते हैँ। इसको वेद की निन्दा समझ
लेना बड़ी भूल है।
मित्रोँ, सब वैदिकधर्मी विद्वान इस बात को जानते हैँ
कि गायत्री मन्त्र ‘सवितुर्वरेण्य भर्गो देवस्य
धीमहि। धियो यो नः प्रयोदयात्।’ वेद माता तथा गुरूमंत्र के
रूप मेँ आदृत किया जाता है। महर्षि मनु अपनी स्मृति मेँ
गायत्री को सावित्री मंत्र के नाम से
भी पुकारते हैँ क्योँकि इसमेँ परमेश्वर को ‘सविता’ के नाम
से स्मरण किया गया है।
(मनुस्मृति 2/78)
इसी आर्ष परम्परा का अनुसरण करते हुए
महात्मा बुद्ध ने सुत्तनिपात महावग्ग सेलसुत्त श्लो॰21 मेँ
कहा है-
अग्गिहुत्तमुखा यज्ञाः सावित्री छन्दसो मुखम्।
अग्रिहोत्र मुखा यज्ञा, सावित्री छन्दसो मुखम्।।
इसका अनुवाद प्रायः लेखको ने छन्दोँ मेँ सावित्री छन्द
प्रधान है ऐसा किया है। किन्तु वह अशुद्ध है।
सावित्री किसी छन्द का नाम
नहीँ। छन्द का नाम तो गायत्री है। छन्द
का अर्थ वेद तो सुप्रसिद्ध है
ही अतः उसी अर्थ को लेने से
ही महात्मा बुद्ध की उक्ति अधिक सुसंगत
प्रतीत होती है। इसमेँ
उनकी सावित्री मन्त्र(गायत्री)
तथा अग्रिहोत्र विषयक श्रद्धा का भी आभास मिलता है।
क्या एक वेद विरोधी नास्तिक के मुख से
कभी इस प्रकार के शब्द निकल सकते हैँ?
सुत्तनिपात श्लो॰322 मेँ महात्मा बुद्ध ने कहा है-
एवं पि यो वेदगू भावितत्तो, बहुस्सुतो होति अवेध धम्मो।
सोखो परे निज्झपये पजानं सोतावधानूपनिसूपपत्रे।।
अर्थात् जो वेद जाननेवाला है, जिसने अपने को सधा रखा है,
जो बहुश्रुत है और धर्म का निश्चय पूर्वक जाननेवाला है वह
निश्चय से स्वयं ज्ञान बनकर अन्योँ को जो श्रोता सीखने
के अधिकारी हैँ ज्ञान दे सकता है।
लार्ड चैमर्स के अनुवाद मेँ ‘वेदगु’ का अर्थ वेद को जाननेवाला न देकर
केवल He who knows यह दे दिया है जो अपूर्ण है, शेष भाग
का अनुवाद ठीक है। वस्तुतः He who knows के
स्थान पर ‘He who knows the Vedas’ होना चाहिए।
सुन्दरिक भारद्वाज सुत्त मेँ कथा है कि सुन्दरिक भारद्वाज जब यज्ञ
समाप्त कर चुका तो वह किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण
को यज्ञ शेष देना चाहता था। उसने संन्यासी बुद्ध
को देखा। उसने उनकी जाति पूछी उन्होनेँ
कहा कि मैँ ब्राह्मण हूं और उसे सत्य उपदेश देते हुए कहा-
“यदन्तगु वेदगु यञ्ञ काले। यस्साहुतिँल ले तस्स इज्झेति ब्रूमि।।”
अर्थात् वेद को जाननेवाला जिसकी आहुति को प्राप्त करे
उसका यज्ञ सफल होता है ऐसा मैँ कहता हूं। इसमेँ
जन्मना जाति का कोई मतलब नहीँ है। इस प्रकरण से
भी स्पष्ट ज्ञात होता है कि महात्मा बुद्ध सच्चे
वेदज्ञोँ के लिए बड़ा आदरभाव रखते थे।
यहां भी लार्ड चैमर्स नेँ अशुद्धि की है
और ‘वेदगु’ का अर्थ Saint किया है।
सुत्तनिपात श्लोक 1059 मेँ महात्मा बुद्ध की निम्न
उक्ति पाई जाती है-
यं ब्राह्मणं वेदगुं अभिजञ्ञा अकिँचनं कामभवे असत्तम्।
अद्धाहि सो ओघमिमम् अतारि तिण्णो च पारम् अखिलो अडंखो।।
अर्थात् जिसने उस वेदज्ञ ब्राह्मण को जान लिया जिसके पास कुछ
धन नहीँ और जो सांसरिक कामनाओँ मेँ आसक्त
नहीँ वह आकांक्षारहित सचमुच इस संसार सागर के पार
पहुंच जाता है। यहां भी लार्ड चैमर्स ने ‘वेदगु’
का अर्थ Rich in lore किया है जो ठीक
नहीँ, इसका अर्थ Rich in Vedic lore होना चाहिए।
उपसंहार- मित्रोँ, तो हमने पाया कि महात्मा बुद्ध न सिर्फ
वेदो का सम्मान करते थे बल्कि सच्चे वेदज्ञोँ के
भी प्रेमी थे। बुद्ध गया के महन्त
स्वामी महाराज योगिराज ने अपने “बुद्ध
मीमांसा” नामक उत्तम अंग्रेजी ग्रन्थ मेँ
लिखा है कि- “त्विश्य जातक मेँ वेदोँ के अध्ययन को बौद्ध
गृहस्थोँ के आवश्यक कर्त्तव्य के रूप मेँ बताया गया है। इसके लिए
उन्होनेँ श्री शरत्चन्द्र दास कृत Indian Pandits in
the Land of snow P.87 का प्रतीक दिया है।
(Buddha  meemansa P.60)
बौद्धमत पर अनेक ग्रंथोँ के लेखक श्री राइसडेविड्स ने
अपनी ‘Buddhism’ नामक पुस्तक मेँ लिखा है कि-
बुद्ध के विषय मेँ यह एक अशुद्ध फैला हुआ है कि वह हिन्दू
धर्म का शत्रु है। बुद्ध भारतीय के रूप मेँ
ही उत्पन्न हुए, पालित हुए उसी रूप मेँ
जिये। उस समय प्रचलित धर्म से उनका कुछ ही विवाद
था। पर उनका उद्देश्य धर्म को सम्पुष्ट करना तथा प्रबल बनाना था,
उसका नाश करना नहीँ।
Buddhism by Rhys Davids P.182)
सुप्रसिद्ध पाश्चात्य विद्वान श्री मोनियर विलियम्म ने
अपनी Buddhism नामक किताब के P.206 पर
लिखा है कि-
बुद्ध का उद्देश्य हिन्दू धर्म का नाश करना नहीँ अपितु
अशुद्धियोँ से पवित्र करके प्राचीन शुद्ध रूप मेँ पुनरूद्धार
करना था।
मित्रोँ, इतने प्रमाणो के बाद अब अधिक कहने
की आवश्यकता नहीँ है। ईश्वर
सबको सद्बुद्धि प्रदान करेँ।

इसके अलावा सुत्तनिपात मे बुध्द के वेदो के सम्बन्ध मे अन्य कथन
(अ) “विद्वा च वेदेहि समेच्च धम्मम्|
न उच्चावचं गच्छति भूरिपञ्ञो|(सुत्तनिपात २९२)
बुध्द कहते है- जो विद्वान वेदो से धर्म का ज्ञान प्राप्त करता है,वह कभी विचलित नही होता है|
(आ) “विद्वा च सो वेदगू नरो इध, भवाभवे संगं इमं विसज्जा|
सो वीतवण्हो अनिघो निरासो,आतारि सो जाति जंराति ब्रमीति||(सुत्तनिपात१०६०)
वेद को जानने वाला विद्वान इस संसार मे जन्म ओर मृत्यु की आसक्ति का त्याग करके ओक इच्छा ,तृष्णा तथा पाप से रहित होकर जन्म मृत्यु से छुट जाता है|
इन सभी तर्को से यही स्पष्ट होता है कि बुध्द वेदो के विरोधी नही थे बल्कि तथाकथित ब्रह्माणो द्वारा वेदो के नाम पर जो पाखंड चलाया था उसके विरोधी थे|

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क्या भगवान बुद्ध 1887-1807 ई॰पू॰ में हुए थे ?



क्या भगवान बुद्ध 1887-1807 ई॰पू॰ में हुए थे ?

वर्ष 2009 में प्रयाग से प्रकाशित भारतीय ऐतिहासिक कालक्रम (क्रोनोलॉजी) पर मेरे शोध-ग्रन्थ “भगवान बुद्ध और उनकी इतिहास सम्मत तिथि” का देशभर में स्वागत हुआ था. आज बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर उस पुस्तक का सारांश प्रस्तुत कर रहा हूँ.

भगवान् बुद्ध के काल के संबंध में 60 से अधिक तिथियाँ हैं जो 270 ई॰पू॰ से 2422 ई॰पू॰ तक फैली हुई हैं। इनमें से अधिकांश तिथियाँ See More

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जापान जैसा शिक्षित देश हो ,थाईलैंड जैसा no.1 वेश्यालय हो,भूटान जैसा कट्टरपंथी बोद्धिस्त देश हो , तिब्बत जैसा तंत्र-मंत्रवाला वाममार्गी देश , उत्तर और दक्षिण कोरिया जैसे आपसी जानी दुश्मन,कंबोडिया जैसे no.1 मानव तस्कर हो l


जापान जैसा शिक्षित देश हो ,थाईलैंड जैसा no.1 वेश्यालय हो,भूटान जैसा कट्टरपंथी बोद्धिस्त देश हो , तिब्बत जैसा तंत्र-मंत्रवाला वाममार्गी देश , उत्तर और दक्षिण कोरिया जैसे आपसी जानी दुश्मन,कंबोडिया जैसे no.1 मानव तस्कर हो l

गूगल इमेज पर PENIS टाइप कर आगे किसी भी बौद्ध देश का नाम जोड़ दो जैसे JAPAN PENIS,CHINA PENIS,KOREA PENIS,BHUTAN PENIS आदि l सारे रहस्य खुद सामने आ जायेंगे l

आप मेरी पुरानी पोस्ट्स पढ़े जहाँ विस्तार से सब कुछ बताया गया है l

कोई भी बुद्धिस्त देश हो हर जगह बुद्ध के लिंग का बेहद महत्वपूर्ण स्थान है l थाईलैंड में चाओ-मे-तुप्तिम मठ-विहार में मनोकामना पूर्ण करने हेतु बुद्ध को सोने-चांदी,लड़के,रबर के लिंग चढ़ाये जाते हैं l (शायद बुद्धा को अलग अलग धातु के लिंग बहोत पसंद है और वो पर्सनल यूज़ के लिए अपने पास रखते होंगे l )

भूटान में घरों के दरवाजे,key-chain,soda opener,ballpen, और हर चीजों को बुद्ध के लिंग जिसे Phallu कहते है इस्तेमाल किया जाता है l ट्रक की नंबर प्लेट से लगा कर घर की दीवारों तक बुद्धा के लिंग के चित्र रखे जाते है l

कोरिया में बुद्धा के लिंग की याद में PENIS PARK (लिंग-बाग़) बना हुआ है और कई होटल बनी है जिसमे हर व्यंजन बुद्ध लिंग के आकार के होते हैं l चाइना में अभी PENIS आकार की बिल्डिंग का काम चल रहा है l

जापान में बुद्ध लिंग के लिए त्यौहार मनाये जाते है l लड़कियाँ बड़े बड़े लिंग की सवारी करती है और लिंग के आकार की चॉकलेट , ice-cream , candy चूसती है l

बुद्ध की हर मूर्ति पर पेनिस जैसा आकार बना हुआ है l पेनिस को जीवन का हर रहस्य बोद्धिस्म में माना गया है l

बुद्ध अपने सर पर पेनिस धारण करते थे l सर पर पेनिस धारण करना का अर्थ है कि पेनिस का स्थान सबसे ऊँचा है l हर शुरुआत बुद्ध पेनिस से करते थे l इसलिए बुद्धिज़्म में सब कुछ पेनिस से शुरू होता है और पेनिस पर ख़त्म होता है l

जापान जैसा शिक्षित देश हो ,थाईलैंड जैसा no.1 वेश्यालय हो,भूटान जैसा कट्टरपंथी बोद्धिस्त देश हो , तिब्बत जैसा तंत्र-मंत्रवाला वाममार्गी देश , उत्तर और दक्षिण कोरिया जैसे आपसी जानी दुश्मन,कंबोडिया जैसे no.1 मानव तस्कर हो l

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कोई भी बुद्धिस्त देश हो हर जगह बुद्ध के लिंग का बेहद महत्वपूर्ण स्थान है l थाईलैंड में चाओ-मे-तुप्तिम मठ-विहार में मनोकामना पूर्ण करने हेतु बुद्ध को सोने-चांदी,लड़के,रबर के लिंग चढ़ाये जाते हैं l (शायद बुद्धा को अलग अलग धातु के लिंग बहोत पसंद है और वो पर्सनल यूज़ के लिए अपने पास रखते होंगे l )

भूटान में घरों के दरवाजे,key-chain,soda opener,ballpen, और हर चीजों को बुद्ध के लिंग जिसे Phallu कहते है इस्तेमाल किया जाता है l ट्रक की नंबर प्लेट से लगा कर घर की दीवारों तक बुद्धा के लिंग के चित्र रखे जाते है l

कोरिया में बुद्धा के लिंग की याद में PENIS PARK (लिंग-बाग़) बना हुआ है और कई होटल बनी है जिसमे हर व्यंजन बुद्ध लिंग के आकार के होते हैं l चाइना में अभी PENIS आकार की बिल्डिंग का काम चल रहा है l

जापान में बुद्ध लिंग के लिए त्यौहार मनाये जाते है l लड़कियाँ बड़े बड़े लिंग की सवारी करती है और लिंग के आकार की चॉकलेट , ice-cream , candy चूसती है l

बुद्ध की हर मूर्ति पर पेनिस जैसा आकार बना हुआ है l पेनिस को जीवन का हर रहस्य बोद्धिस्म में माना गया है l

बुद्ध अपने सर पर पेनिस धारण करते थे l सर पर पेनिस धारण करना का अर्थ है कि पेनिस का स्थान सबसे ऊँचा है l हर शुरुआत बुद्ध पेनिस से करते थे l इसलिए बुद्धिज़्म में सब कुछ पेनिस से शुरू होता है और पेनिस पर ख़त्म होता है l

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क्या भगवान बुद्ध 1887-1807 ई॰पू॰ में हुए थे ?



क्या भगवान बुद्ध 1887-1807 ई॰पू॰ में हुए थे ?

वर्ष 2009 में प्रयाग से प्रकाशित भारतीय ऐतिहासिक कालक्रम (क्रोनोलॉजी) पर मेरे शोध-ग्रन्थ “भगवान बुद्ध और उनकी इतिहास सम्मत तिथि” का देशभर में स्वागत हुआ था. आज बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर उस पुस्तक का सारांश प्रस्तुत कर रहा हूँ.

भगवान् बुद्ध के काल के संबंध में 60 से अधिक तिथियाँ हैं जो 270 ई॰पू॰ से 2422 ई॰पू॰ तक फैली हुई हैं। इनमें से अधिकांश तिथियाँ पाश्चात्य विद्वानों द्वारा प्रतिपादित हैं। और किसी भी मान्यता पर पाश्चात्य विद्वान् एकमत नहीं हैं। तथापि, बुद्ध के निर्वाण की दो भिन्न तिथियों— 544 ई॰पू॰ और 483 ई॰पू॰ की घोषणा कर दी गई है और प्राचीन परम्परावाले बौद्ध-देश भी इन्हीं तिथियों को मानने के लिए बाध्य हो गए हैं। इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों में भी यही तिथियाँ पढ़ाई जा रही हैं और इसी आधार पर अन्य तिथियों की भी संयोजना की जा रही है।
भारतीय-इतिहास-परिशोध की दृष्टि से यह एक अत्यन्त भयंकर भूल है, क्योंकि भारतीय-स्रोतों में यह सिद्ध करने के लिए अत्यन्त प्रबल प्रमाण हैं कि भगवान् बुद्ध का जन्म 1887 ई॰पू॰ में और निर्वाण 1807 ई॰पू॰ में हुआ था। इसका अर्थ यह है कि भगवान् बुद्ध के मान्य काल में 1,300 वर्षों से अधिक की भूल है।
भगवान् बुद्ध को 1887-1807 ई॰पू॰ में मानने का सर्वप्रथम आधार पुराणों में प्राप्त राजवंशावलियाँ हैं। भगवान् बुद्ध कोसल के इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न हुए थे, जिसका श्रीराम के स्वर्गारोहण के पश्चात् कई भागों में विभाजन हुआ। फलस्वरूप श्रीराम के अनुज लक्ष्मण के पुत्रों— अंगद और चन्द्रकेतु को वर्तमान नेपाल का भू-भाग प्राप्त हुआ था। नेपाल पर शासन करनेवाले लक्ष्मण के पुत्रों का वंश ‘लिच्छवि’ कहलाया। भगवान् बुद्ध का जन्म इसी लिच्छवि शाखा में हुआ था। कुशस्थली को राजधानी बनाकर राज्य करनेवाला कुशवंश (मूल इक्ष्वाकु-वंश) का 112वाँ राजा बृहद्बल महाभारत-युद्ध (3039-‘38 ई॰पू॰) में अभिमन्यु के हाथों मारा गया था। युद्ध के पश्चात् बृहद्बल के पुत्र बृहत्क्षत्र कुशस्थली के राजा बने। बृहत्क्षत्र की वंश-परम्परा में 30 राजा हुए, जिन्होंने 1,504 वर्षों तक राज्य किया। 23वें वंशज शाक्य हुए, जो कपिलवस्तु को राजधानी बनाकर नेपाल के सान्निध्य में हिमालय की तराई के उत्तरी-पश्चिमी भाग के राजा बने। 24वें वंशज शुद्धोधन एवं 25वें गौतम बुद्ध थे। 31वें एवं अन्तिम वंशज (30वें राजा) सुमित्र के साथ इक्ष्वाकु-वंश का अन्त हो गया । यह वंश-परम्परा ब्रह्माण्डमहापुराण (उपोद्घात, अध्याय 4), भागवतमहापुराण (स्कन्ध 9, अध्याय 12) एवं विष्णुमहापुराण (अंश 4, अध्याय 22) में दी हुई है । इस प्रकार (3139-’38-1504=) 1634 ई॰पू॰ में सुमित्र पर यह वंश-परम्परा समाप्त हो चुकी थी और 24वें वंशज गौतम बुद्ध का काल 1634 ई॰पू॰ से पूर्व प्रमाणित होता है। प्रायः सभी इतिहासकार एकमत हैं कि गौतम बुद्ध मगध-नरेश बिम्बिसार एवं अजातशत्रु के समकालीन थे और अजातशत्रु के शासनकाल में ही बुद्ध का निर्वाण हुआ था। हम मगध के राजवंशों की कालगणना करते आ रहे हैं। 1994 ई॰पू॰ से प्रारम्भ शिशुनाग-वंश के 5वें राजा बिम्बिसार ने 38 वर्ष (1852-1814 ई॰पू॰) एवं छठे राजा अजातशत्रु ने 27 वर्ष (1814-1787 ई॰पू॰) शासन किया था । श्रीलंका से प्राप्त बौद्ध-ग्रन्थ ‘महावंश’ के अनुसार अजातशत्रु के राज्यारोहण के 8वें वर्ष बुद्ध का निर्वाण हुआ था। अतः 1807 ई॰पू॰ बुद्ध का निर्वाण-काल आता है ।
बुद्ध को 19वीं शती ई॰पू॰ में मानने का दूसरा आधार इस अवधारणा में है कि सर विलियम ज़ोन्स के वक्तव्य को आधार बनाकर डा॰ राधाकुमुद मुखर्जी-जैसे अनेक प्रमुख इतिहासकारों ने सिकन्दर के भारत पर आक्रमण की यूनानी-तिथि को ‘भारतीय-इतिहास का मूलाधार’ मान लिया है। फलस्वरूप सिकन्दर के समकालीन ‘चन्द्रगुप्त’ नामक राजा को मौर्यवंशीय चन्द्रगुप्त मौर्य से जोड़कर भारत के इतिहास को 1,300 वर्ष पीछे ढकेल दिया गया है । वास्तविकता यह है कि सिकन्दर का समकालीन चन्द्रगुप्त, गुप्तवंश से संबंध रखता था जो 327-320 ई॰पू॰ में हुआ।
तीसरा आधार है आद्य शंकराचार्य की तिथि । यह सर्वमान्य तथ्य है कि भगवान् बुद्ध और आद्य शंकराचार्य के मध्य लगभग 1,300 वर्षों का अन्तर था और बुद्ध, शंकराचार्य से पूर्ववर्ती थे । आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित 5 मठों, विशेषकर काँची-कामकोटि मठ, द्वारका शारदा मठ और पुरी गोवर्द्धन-मठ की आचार्य-परम्परा छठी शताब्दी ई॰पू॰ से प्रारम्भ होती है और स्वयं आद्य शंकराचार्य की तिथि भी 509-477 ई॰पू॰ प्रमाणित है । इससे 1,300 वर्ष पूर्व, अर्थात् 1887-1807 ई॰पू॰ में बुद्ध का काल निश्चित होता है ।
चौथा आधार बुद्ध की परम्परागत जन्म-कुण्डली है। बुद्ध की परम्परागत जन्म-कुण्डली में प्रदर्शित ग्रहों की स्थिति का अध्ययन करने के उपरान्त गवर्नमेंट आर्ट्स कालेज़, राजमुन्द्रि (चेन्नई) के भूतपूर्व गणित-विभागाध्यक्ष एवं प्रख्यात ज्योतिषाचार्य प्रो. ह्वी. तिरुवेंकटाचार्य ने यह निष्कर्ष निकाला है कि भगवान् बुद्ध का निर्वाण वैशाख शुक्ल पूर्णिमा, विशाखा नक्षत्र, तदनुसार 27 मार्च, 1807 ई॰पू॰, मंगलवार की ब्राह्मवेला में हुआ था।
ज्योतिषाचार्य शाक्यानन्द ने खगोलीय गणना करके भगवान् बुद्ध का समय कृत्तिका नक्षत्र में, अर्थात् 2621-1661 ई॰पू॰ के बीच निर्धारित किया है । इस दृष्टि से भी भगवान् बुद्ध का समय 19वीं शताब्दी ई॰पू॰ में रखा जा सकता है । भूटान के 16वीं शताब्दी के एक बौद्ध-लामा पद्मकारपो ने भगवान् बुद्ध का निर्वाण-काल 1858 ई॰पू॰ घोषित किया है । प्रो॰ के॰ श्रीनिवासराघवन का मानना है कि भगवान् बुद्ध का समय महाभारत-युद्ध के 1,259 वर्ष बाद आता है । इस दृष्टि से भी भगवान् बुद्ध का समय 1880 ई॰पू॰ सिद्ध होता है । डा॰ देवसहाय त्रिवेद ने पौराणिक-गणना के आधार पर बुद्ध-निर्वाण-काल 1793 ई॰पू॰ में निर्धारित किया है । स्वामी राघवाचार्य ने पौराणिक-गणना के आधार पर घोषित किया है कि भगवान् बुद्ध 1825 ई॰पू॰ के आस-पास जीवित थे । विजयवाड़ा के पं॰ कोटा वेंकटचलम् और उनके पुत्र कोटा नित्यानन्द शास्त्री, पुणे के पुरुषोत्तम नागेश ओक, हैदराबाद के राम साठे, दिल्ली के रघुनन्दन प्रसाद शर्मा, पाण्डिचेरी के देवदत्त तथा वृन पार्कर ने पौराणिक-गणना के आधार पर बुद्ध-निर्वाण-काल 1807 ई॰पू॰ निर्धारित किया है ।
ए॰वी॰ त्यागराज अय्यर ने लिखा है: ‘एथेन्स में अभी हाल ही में मिली एक समाधि में एक अभिलेख है, जिसपर उत्कीर्ण है कि यहाँ बोधगया से आए एक भारतीय-श्रमणाचार्य चिर-निद्रा में लेटे हैं । इन शाक्य मुनि को उनके यूनानी-शिष्यों द्वारा एथेन्स लाया गया था । लगभग 1000 ई॰पू॰ में हुई उनकी मृत्यु के समय यह समाधि बनाई गई थी ।’ इस वर्णन से स्पष्ट है कि जब 1000 ई॰पू॰ में कोई बौद्ध-भिक्षु एथेन्स गए थे, तो बौद्ध-सम्प्रदाय के प्रवर्तक भगवान् बुद्ध तो निश्चित ही उससे पूर्व हुए होंगे । और वह समय 1887-1807 ई॰पू॰ के आस-पास ही होगा, जो कि हमारी खोज है ।
इसी प्रकार दिनांक 07 अक्टूबर, 1966 ई॰ को ‘टाइम्स आफ़ इण्डिया’ सहित भारत के सभी प्रमुख दैनिक समाचार-पत्रों में अहमदाबाद से प्रेस ट्रस्ट आफ़ इण्डिया द्वारा भेजा गया समाचार प्रकाशित हुआ था जिसमें ‘ईसा से 2,000 वर्ष पूर्व की सात बौद्ध-गुफाओं की उपलब्धि’ की सूचना दी गई थी । प्रमुख हिंदी-दैनिक समाचार-पत्र ‘नवभारत टाइम्स’ ने शनिवार, 08 अक्टूबर, 1966 के अंक में पृ॰ 3 पर अपने ‘विचार-प्रवाह’ स्तम्भ के अंतर्गत इस उपलब्धि की महत्ता का वर्णन करते हुए लिखा था कि भड़ौच जि़ले के भगडि़या तालुका में झाजीपुर गाँव के पास कडि़या पहाडि़यों में एक गुफा की खोज की गयी है, जो ईसा से 2000 वर्ष पूर्व की है । गुजरात के तत्कालीन उप-शिक्षामंत्री डा॰ भानु प्रसाद पाण्डेय के अनुसार इस गुफा में एक सिंहयुक्त स्तम्भ मिला है । गुफा में कई कक्ष, बरामदे आदि भी मिले हैं । यह गुफा और यहाँ मिली वस्तुओं से पता चलता है कि इसे बौद्ध-भिक्षुओं ने अपना स्थल बनाया होगा । कडि़या पहाडि़यों में मिली गुफा की उपलब्धि भी हमारी इस मान्यता को बल प्रदान करती है कि बुद्ध छठी शताब्दी ई॰पू॰ के व्यक्ति नहीं थे । यही नहीं, यह खोज हमारी इस धारणा को पुष्ट करती है कि बुद्ध 2000 ई॰पू॰ जीवित थे; यदि यथार्थ वर्णन किया जाए तो कहा जाएगा कि वे 1887-1807 ई॰पू॰ तक विद्यमान थेI
एम्॰ कृष्णमाचार्य ने भी लिखा है: ‘भारत का अपना भली-भाँति लिखा इतिहास है और पुराण उस इतिहास तथा तिथिक्रम का दिग्दर्शन करते हैं । पुराण पवित्र धोखापट्टी नहीं हैं। पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं: ‘भारतीय-पुराणों को ढोंग की संज्ञा देना या ऐसा समझते हुए एथेन्स, कैण्डी, लन्दन या टोक्यो से प्राचीन भारतीय-ऐतिहासिक कालक्रम को निश्चित करने का यत्न करना, अधिक-से-अधिक भारतीय-इतिहास के प्रति भैंगापन ही कहा जा सकता है ।’ यूरोपीय-इतिहासकार विंसेन्ट आर्थर स्मिथ को भी स्वीकार करना पड़ा है कि ‘पुराणों में दी गई राजवंशावलियों की आधारभूतता को आधुनिक यूरोपीय-लेखकों ने अकारण ही निन्दित किया है; इनके सूक्ष्म अनुशीलन से ज्ञात होता है कि इनमें अत्यधिक मौलिक व मूल्यवान् ऐतिहासिक परम्परा प्राप्त होती है ।’ एडवर्ड पोक़ाक़ ने लिखा है: ‘पुराणों में वर्णित तथ्य, परम्पराएँ और संस्थाएँ क्या किसी दिन स्थापित हो सकती हैं ? अरे भाई, ईसवी सन् से तीन सौ वर्ष पूर्व भी उनका अस्तित्व पाया जाता है, जिससे वह बहुत प्राचीन लगते हैं, इतने प्राचीन कि उनकी बराबरी अन्य कोई भी प्रणाली कर ही नहीं सकती ।’
संसार, इतना नूतन नहीं हो सकता । इतिहासकार के लिए आवश्यक है कि वह भूगर्भ, ज्योर्तिगणना तथा पुरातत्त्व को भी ध्यान में रखकर सभी गुत्थियों को सुलझाने का यत्न करे । विज्ञान का अध्ययन एकांगी नहीं हो सकता । सिकन्दर ने अपने भूतपूर्व सभी ग्रन्थों और अभिलेखों का विनाश उसी प्रकार किया जिस प्रकार चीन के सम्राट् किन शी हुआंगदी (247-210 ई॰पू॰) ने । वह चाहता था कि भविष्य में लोग जानें कि संसार तथा यूनान की सभ्यता पूर्णरूपेण उसी के राज्यकाल में फली और फूली । अतः ग्रीक और रोम का प्राचीन इतिहास पूरी तरह नष्ट हो गया । कालान्तर में लोगों ने स्मरण-मात्र से इतिहास रचने की चेष्टा की अतः वे कदापि विश्वसनीय नहीं हो सकते ।
सोमयाजुलु ने लिखा है: ‘सभी जैन और हिंदू एकमत हैं कि 527 ई॰पू॰ में वर्धमान महावीर की मृत्यु हुई, कुमारिल भट्ट सम्पूर्ण भारत में जैनियों पर प्रबल शास्त्र-प्रहार कर रहे थे और इसका अनुसरण किया शंकराचार्य ने। शंकराचार्य और बुद्ध के मध्य लगभग 1,400 वर्षों का अन्तर था । अतः यह निश्चित है कि बुद्ध छठी शताब्दी ई॰पू॰ के व्यक्ति नहीं थे । श्रीलंका-निवासियों के पास उपलब्ध थोथे वर्णन बुद्ध का काल-निर्धारण करने के लिए किसी भी प्रकार आधिकारिक नहीं हैं । जापानियों ने बौद्ध मत को 7वीं शताब्दी के पश्चात् अंगीकार किया; अतः जापानी-पंचांग भी बुद्ध की तिथि निश्चित करने के लिए कोई आधिकारिक वस्तु नहीं हैं । पाश्चात्य विद्वानों ने अपनी बुद्धि और धुन के अनुसार अटकलें लगाई हैं । भारतीय-विद्यालयों में अब पढ़ाया जा रहा इतिहास ऐसी ग़लत धरणाओं और आधारहीन उहापोहों का बोझा मात्र है ।’
इस संदर्भ में डा॰ देवसहाय त्रिवेद ने ठीक ही लिखा है: ‘यह आश्चर्य और दुर्भाग्य की बात है कि भारतीय-इतिहास की रचना आधुनिक इतिहासकारों ने विदेशी स्रोत के आधार पर की है तथा भारतीय स्रोतों से उसकी पूर्ति करने की चेष्टा की है । किन्तु अच्छा तो यह होता कि स्थानीय स्रोतों के आधार पर इतिहास की रचना की जाती तथा सभी उपलब्ध स्रोतों से उस इतिहास की पूर्ति होती ।’ प्रो॰ शिवशंकर दूबे ने कहा है कि ‘भारतीय-इतिहास को ठीक से लिखने के लिए तथा तिथिक्रम को ठीक करने के लिए पुरानी भित्तियों को गिराना आवश्यक है । वर्तमान प्रचलित धारणाएँ निराधार और निर्मूल हैं तथा हमारी परम्पराएँ बहुत प्राचीन हैं ।’
इस प्रकार भारतीय-इतिहासकारों को अपना बहुप्रचारित कालक्रम ठीक कर लेना चाहिए और भगवान् बुद्ध का जन्म 1887 ई॰पू॰ तथा उनका निर्वाण 1807 ई॰पू॰ रखना चाहिए । बुद्ध पर अनुसन्धान करते समय ठीक की गई प्राचीन भारतीय-इतिहास की अन्य महत्त्वपूर्ण घटनाएँ भी इसी प्रकार भारतीय-इतिहास-ग्रन्थों में शुद्ध कर लेनी चाहिए, क्योंकि वे प्राचीन भारतीय इतिहास के समांग वर्णन से ठीक बैठती हैं ।

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बुध्द


क्या बुध्द मत को महात्मा बुध्द ने जैन मुनियो या तीर्थंकरो से चुराया था-
दिंगम्बर जैन के एक ग्रंथ धर्म परीक्षा अमितगत (जैन हितेषी पुस्तकालय कर्नाटक द्वारा प्रसारित) के पेज नं २५९ की पंत्ति नं २४ पर आया है-
६रूष्ठश्रावारनाथस्य तपस्वीमोगलायन:|
शिष्य:श्रीपार्श्वनाथस्य विदधेबुध्ददर्शनम्||
अर्थात् पार्श्वनाथ के तपस्वी चैले वीरनाथ ने रूष्ट हो कर बुध्द मत प्रकट किया…
इस बात से कुछ संदेह उत्पन्न होते है कि क्या बुध्द मत जैनियो से बौध्दो ने चुराया है ?
क्या महात्मा बुध्द काल्पनिक पात्र है..
क्युकि जैनियो ओर बुध्द की कुछ बाते समान है-
जैसे बुध्द ने खीर खा कर समाधी पाई इसी तरह महावीर ने भी..
महावीर के शरीर मे चक्रवर्ती के चिन्ह थे गौतम के शरीर मे भी यही बताया जाता है|
महावीर को सांप ने काटा तो दुध निकला गौतम को सांप ने काटा तो दूध निकला..
गौतम बिम्बसार के बाग मे ठहरा महावीर भी बिम्बसार के बाग मे ठहरा…
महावीर का सबसे बडा चैला अग्निहोत्र ब्राह्मण था गौत्तम का भी यही बतलाया है..
चंदन वाली नामी स्त्री ने मंगावती साध्वी को इसलिए बूरा कहा कि वो महावीर के साथ अकेली सारी रात रही…
बुध्द ग्रंथ ललितविस्तार मे भी ऐसी ही कहानी है नामी ने मंगावती को इसलिए डाटा कि वो बुध्द के साथ सारी रात रही..इसलिए यहा कहा जा सकता है बुध्द धम्म नकल मात्र है..