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पहली पत्नी :- वानी गनपती (1978-1988)

दुसरी पत्नी :- सारिका ठाकुर (1988-2004)

तीसरी पत्नी :- गौतमी  (2015-2016)

इन 👆👆👆तीन महिलाओं को तलाक देने वाला गिरगिट एवं नमकहराम का नाम है “कमल हसन”।

2013 में रोकर कमल हसन ने कहा था, “मुझे कट्टरपंथी मुस्लिमो से बचाओ, वरना देश छोड़ दूंगा”।

दैनिक भारत इस बात को अच्छे से समझता है कि भारत में हिन्दुओ की याददास्त बहुत ही कमजोर होती है, वो तो ये भी भूल गया है कि वो हिन्दू है या नहीं, अधिकतर हिन्दुओ से पूछो तो वो कहेंगे “आई एम ह्यूमन”, अरे भैया हिन्दू भी ह्यूमन ही होता है, अगर कोई हिन्दू है तो इसका मतलब ये नहीं कि वो एनिमल हो गया है, वो भी ह्यूमन ही होता है, खैर

आज कमल हसन हिन्दुओ को आतंकवादी बता रहे है, असहिष्णु बता रहे है, हिंसक बता रहे है, पर हमे कमल हसन की 2013 वाली शक्ल याद आ गयी, आपकी याददास्त को दुरुस्त करते हुए हम विस्तारपूर्वक बताते है।

बात है साल 2013 की, कमल हसन ने एक फिल्म बनाई थी, जिसके निर्माता भी वही थे, इस फिल्म का नाम था विश्वरूपम, इस फिल्म में आतंकवाद के दृश्य थे, आतंकवाद की कहानी पर ये फिल्म आधारित थी, कमल हसन ने इस फिल्म को बनाने में मार्किट से भी बहुत पैसा उठाया था, काफी खर्चा किया था

विश्वरूपम का विरोध करते मुस्लिम संगठन, फिल्म के बारे में जैसे ही तमिलनाडु और केरल में मुस्लिम संगठनो को पता चला, उन्होंने इसका विरोध शुरू कर दिया, जगह जगह कमल हसन के पुतले जलाये जाने लगे, राजनितिक दबाव बनाया जाने लगा, कांग्रेस और वामपंथी नेता साथ ही PFI, मुस्लिम लीग जैसे जिहादी संगठन कमल हसन का विरोध करने लगे, कमल हसन को जान से मारने की धमकी के अलावा बेटी से बलात्कार की भी धमकियाँ दी जाने लगी

पहले से फिल्म में बहुत पैसा लगा चुके कमल हसन की स्तिथि टाइट होने लगी, कट्टरपंथियों के साथ तो वैसे भी राजनेता होते है, कमल हसन की फिल्म को बैन करने की भी बातें होने लगी, फिल्म के रिलीज से पहले बहुत बुरी स्तिथि हो गयी थी कमल हसन की

और इसी के बाद कमल हसन एक दिन सामने आये और रोते हुए उन्होंने कहा की, मैंने इस फिल्म में अपना सबकुछ लगा दिया है, और मुझे कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनो से बचाओ, वरना मैं देश छोड़ने पर मजबूर हो जाऊंगा, 2013 में रो रो कर कमल हसन ने खुद को कट्टरपंथी मुस्लिमो से बचाने की अपील की थी

जैसे तैसे कमल हसन की फिल्म रिलीज हुई और सभी मुस्लिमो ने उसका बहिष्कार किया, कमल हसन को सुरक्षा तक देना पड़ा, केरल और तमिलनाडु के मुस्लिम बहुल इलाकों में तो उनकी फिल्म कभी रिलीज ही नहीं हो सकी, हिन्दुओ ने कमल हसन की फिल्म देखि और फिल्म हिट हुई, और कमल हसन की की कमाई हुई अन्यथा उनकी आर्थिक स्तिथि टाइट हो गयी थी

और आज वो कमल हसन जो 2013 में कट्टरपंथी मुस्लिमो के कारण रो रहे थे, देश छोड़ने की बात कर रहे थे, वो राजनीती में आने के लिए हिन्दुओ को आतंकी बता रहे है, साफ़ होता है कि 2013 में हिन्दुओ ने जो कमल हसन का साथ दिया था, हिन्दुओ से वो बड़ी भूल हो गयी थी

क्यूंकि जिस शख्स को हम मनोरंजन का चाची 420 समझकर बैठे हुए थे, वो तो अब्दुल 786 निकला.  

ये 👆 कमल हसन एक वामपंथी सेकुलर है जिस थाली में खाता है उसी में छेद करता है।

बालिवुड के 👆ऐसे सेकुलर बहरुपियों से सावधान।

ऐसे 👆👆रंग बदलने वाले गिरगिटों से सावधान।

कॉपी पेस्ट।

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कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, बीते हुए दिन,


कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, बीते हुए दिन,,,वो प्यारे पल छिन, कोई लौटा दे मेरे……. भारतीय सिने जगत के महान पार्श्व गायक किशोर कुमार जी की आज पावन जयंती है,,,,सुरों के उस महान सम्राट को कोटि कोटि नमन,,,वंदन,,,, उनके गीत आज भी गली गली गूंजते हैं,,,, “झुमरू” फिल्म का प्रसिद्द गीत,,,”मैं झुम झुम झुमरू” को कोई भी आज तक नहीं गा सका है,,,उनकी आवाज में गाने वाले बहुत हुए,,,,, कलकत्ता के एक स्टेज शो में (१९६०) ”बम चिक,बम चिक,चिक चिक बम बम,,चिक बम,चिक बम,,” केवल दो शब्दों को विभिन्न सुरों में किशोर दा ने निरंतर लगभग आधे घंटे तक गाकर एक इतिहास रच दिया था,,सुरों का संयोजन भी उन्होंने स्वयं किया था,,,किसी संगीतकार ने नहीं,,,, किशोर कुमार (अंग्रेज़ी: Kishore Kumar, जन्म: 4 अगस्त 1929 – मृत्यु: 13 अक्टूबर, 1987) भारतीय संगीत के इतिहास में अमर गायक, अभिनेता, निर्देशक, निर्माता और गीतकार थे। किशोर कुमार का असली नाम ‘आभास कुमार गांगुली’ था। जीवन परिचय किशोर कुमार का जन्म 4 अगस्त, 1929 ई. को खंडवा, मध्य प्रदेश में एक बंगाली परिवार में हुआ था। किशोर कुमार एक विलक्षण शख़्सियत रहे हैं। हिन्दी सिनेमा की ओर उनका बहुत बड़ा योगदान है। किशोर कुमार के पिता कुंजीलाल खंडवा शहर के जाने माने वक़ील थे। किशोर चार भाई बहनों में सबसे छोटे थे। सबसे छोटा होने के नाते किशोर कुमार को सबका प्‍यार मिला। इसी चाहत ने किशोर को इतना हंसमुख बना दिया था कि हर हाल में मुस्कुराना उनके जीवन का अंदाज बन गया। उनके सबसे बड़े भाई अशोक कुमार मुंबई में एक अभिनेता के रूप में स्थापित हो चुके थे और उनके एक और भाई अनूप कुमार भी फ़िल्मों में काम कर रहे थे। किशोर कुमार बचपन से ही एक संगीतकार बनना चाहते थे, वह अपने पिता की तरह वक़ील नहीं बनना चाहते थे। किशोर कुमार ने 81 फ़िल्मों में अभिनय किया और 18 फ़िल्मों का निर्देशन भी किया। फ़िल्म ‘पड़ोसन’ में उन्होंने जिस मस्त मौला आदमी के किरदार को निभाया वही किरदार वे ज़िंदगी भर अपनी असली ज़िंदगी में निभाते रहे। हिन्दी सिनेमा में इलैक्ट्रिक संगीत लाने का श्रेय किशोर कुमार को जाता है। अभिनेता के रूप में शुरुआत किशोर कुमार के. एल. सहगल के गानों से बहुत प्रभावित थे, और उनकी ही तरह गायक बनना चाहते थे। किशोर कुमार के भाई अशोक कुमार की चाहत थी कि किशोर कुमार नायक के रूप में हिन्दी फ़िल्मों के हीरो के रूप में जाने जाएं, लेकिन किशोर कुमार को अदाकारी की बजाय पा‌र्श्व गायक बनने की चाहत थी। किशोर कुमार ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा कभी किसी से नहीं ली थी। किशोर कुमार की शुरुआत एक अभिनेता के रूप में फ़िल्म ‘शिकारी’ (1946) से हुई। इस फ़िल्म में उनके बड़े भाई अशोक कुमार ने प्रमुख भूमिका की थी। किशोर कुमार ने 1951 में फणी मजूमदार द्वारा निर्मित फ़िल्म ‘आंदोलन’ में हीरो के रूप में काम किया मगर फ़िल्म फ्लॉप हो गई। 1954 में किशोर कुमार ने बिमल राय की ‘नौकरी’ में एक बेरोज़गार युवक की संवेदनशील भूमिका कर अपनी अभिनय प्रतिभा से भी परिचित किया। इसके बाद 1955 में बनी ‘बाप रे बाप’, 1956 में ‘नई दिल्ली’, 1957 में ‘मि. मेरी’ और ‘आशा’, और 1958 में बनी ‘चलती का नाम गाड़ी’ जिस में किशोर कुमार ने अपने दोनों भाईयों अशोक कुमार और अनूप कुमार के साथ काम किया और उनकी अभिनेत्री मधुबाला थी। गायकी की शुरुआत किशोर कुमार को पहली बार गाने का मौक़ा 1948 में बनी फ़िल्म ‘ज़िद्दी’ में मिला। फ़िल्म ‘ज़िद्दी’ में किशोर कुमार ने देव आनंद के लिए गाना गाया था। ‘जिद्दी’ की सफलता के बावज़ूद उन्हें न तो पहचान मिली और न कोई ख़ास काम मिला। किशोर कुमार ने गायकी का एक नया अंदाज बनाया जो उस समय के नामचीन गायक रफ़ी, मुकेश और सहगल से काफ़ी अलग था। किशोर कुमार सन् 1969 में निर्माता निर्देशक शक्ति सामंत की फ़िल्म ‘आराधना’ के ज़रिये गायकी के दुनिया में सबसे सफल गायक बन गये। किशोर कुमार को शुरू में एस डी बर्मन और अन्य संगीतकारों ने अधिक गंभीरता से नहीं लिया और उनसे हल्के स्तर के गीत गवाए गए, लेकिन किशोर कुमार ने 1957 में बनी फ़िल्म “फंटूस” में ‘दुखी मन मेरे’ गीत को गाकर अपनी ऐसी धाक जमाई कि जाने माने संगीतकारों को किशोर कुमार की प्रतिभा का लोहा मानना पड़ा। किशोर कुमार को इसके बाद एस डी बर्मन ने अपने संगीत निर्देशन में कई गीत गाने का मौक़ा दिया। आर डी बर्मन के संगीत निर्देशन में आर डी बर्मन के संगीत निर्देशन में किशोर कुमार ने मुनीम जी, टैक्सी ड्राइवर, फंटूश, नौ दो ग्यारह, पेइंग गेस्ट, गाईड, ज्वेल थीफ़, प्रेमपुजारी, तेरे मेरे सपने जैसी फ़िल्मों में अपनी जादुई आवाज़ से फ़िल्मी संगीत के दीवानों को अपना दीवाना बना लिया। एक अनुमान के मुताबिक किशोर कुमार ने वर्ष 1940 से वर्ष 1980 के बीच के अपने करियर के दौरान क़रीब 574 से अधिक गाने गाए। अन्य भाषाओं में गीत किशोर कुमार ने हिन्दी के साथ ही तमिल, मराठी, असमी, गुजराती, कन्नड़, भोजपुरी, मलयालम और उड़िया फ़िल्मों के लिए भी गीत गाए। फ़िल्म फेयर पुरस्कार किशोर कुमार को आठ फ़िल्म फेयर अवार्ड मिले हैं। किशोर कुमार को पहला फ़िल्म फेयर अवार्ड 1969 में ‘अराधना’ फ़िल्म के गीत ‘रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना’ के लिए दिया गया था। किशोर कुमार की ख़ासियत यह थी कि उन्होंने देव आनंद से लेकर राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन के लिए अपनी आवाज़ दी और इन सभी अभिनेताओं पर उनकी आवाज़ ऐसी रची बसी मानो किशोर ख़ुद उनके अंदर मौजूद हों। वैवाहिक जीवन किशोर कुमार की पहली शादी रुमा देवी के से हुई थी, लेकिन जल्दी ही शादी टूट गई और इस के बाद उन्होंने मधुबाला के साथ विवाह किया। उस दौर में दिलीप कुमार जैसे सफल और शोहरत की बुलंदियों पर पहुँचे अभिनेता जहाँ मधुबाला जैसी रूप सुंदरी का दिल नहीं जीत पाए वही मधुबाला किशोर कुमार की दूसरी पत्नी बनी। 1961 में बनी फ़िल्म ‘झुमरु’ में दोनों एक साथ आए। यह फ़िल्म किशोर कुमार ने ही बनाई थी और उन्होंने ख़ुद ही इसका निर्देशन किया था। इस के बाद दोनों ने 1962 में बनी फ़िल्म ‘हाफ टिकट’ में एक साथ काम किया जिस में किशोर कुमार ने यादगार कॉमेडी कर अपनी एक अलग छवि पेश की। 1976 में उन्होंने योगिता बाली से शादी की मगर इन दोनों का यह साथ मात्र कुछ महीनों का ही रहा। इसके बाद योगिता बाली ने मिथुन चक्रवर्ती से शादी कर ली। 1980 में किशोर कुमार ने चौथी शादी लीना चंद्रावरकर से की जो उम्र में उनके बेटे अमित से दो साल बड़ी थीं। किशोर कुमार की आवाज़ की पुरानी के साथ-साथ नई पीढ़ी भी दीवानी है। किशोर जितने उम्दा कलाकार थे, उतने ही रोचक इंसान भी थे। उनके कई किस्से हिन्दी सिनेमा जगत में प्रचलित हैं। किशोर कुमार को अटपटी बातों को अपने चटपटे अंदाज में कहने का फ़ितूर था। ख़ासकर गीतों की पंक्ति को दाएँ से बाएँ गाने में किशोर कुमार ने महारत हासिल कर ली थी। नाम पूछने पर वह कहते थे- रशोकि रमाकु। किशोर कुमार ने हिन्दी सिनेमा के तीन नायकों को महानायक का दर्जा दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। उनकी आवाज़ के जादू से देव आनंद सदाबहार हीरो कहलाए। राजेश खन्ना को सुपर सितारा कहा जाने लगा और अमिताभ बच्चन महानायक हो गए। किशोर कुमार ने बारह साल की उम्र तक गीत-संगीत में महारत हासिल कर ली थी। किशोर कुमार रेडियो पर गाने सुनकर उनकी धुन पर थिरकते थे। किशोर कुमार फ़िल्मी गानों की किताब जमा कर उन्हें कंठस्थ करके गाते थे। घर आने वाले मेहमानों को किशोर कुमार अभिनय सहित गाने सुनाते तो ‘मनोरंजन-कर’ के रूप में कुछ इनाम भी माँग लेते थे। एक दिन अशोक कुमार के घर अचानक संगीतकार सचिन देव वर्मन पहुँच गए। बैठक में उन्होंने गाने की आवाज़ सुनी तो दादा मुनि से पूछा, ‘कौन गा रहा है?’ अशोक कुमार ने जवाब दिया- ‘मेरा छोटा भाई है’। जब तक गाना नहीं गाता, उसका नहाना पूरा नहीं होता।’ सचिन-दा ने बाद में किशोर कुमार को जीनियस गायक बना दिया। मोहम्मद रफ़ी ने पहली बार किशोर कुमार को अपनी आवाज़ फ़िल्म ‘रागिनी’ में गीत ‘मन मोरा बावरा’ के लिए उधार दी। दूसरी बार शंकर-जयकिशन की फ़िल्म ‘शरारत’ में रफ़ी ने किशोर के लिए- ‘अजब है दास्ताँ तेरी ये ज़िंदगी’ गीत गाया। महमूद ने फ़िल्म ‘प्यार किए जा’ में कॉमेडियन किशोर कुमार, शशि कपूर और ओमप्रकाश से ज़्यादा पैसे वसूले थे। किशोर को यह बात अखर गई। किशोर कुमार ने इसका बदला महमूद से फ़िल्म ‘पड़ोसन’ में दुगुना पैसा लेकर लिया। किशोर कुमार ने जब-जब स्टेज-शो किए, हमेशा हाथ जोड़कर सबसे पहले संबोधन करते थे- ‘मेरे दादा-दादियों।’ मेरे नाना-नानियों। मेरे भाई-बहनों, तुम सबको खंडवे वाले किशोर कुमार का राम-राम। नमस्कार। किशोर कुमार का बचपन तो खंडवा में बीता, लेकिन जब वे किशोर हुए तो इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ने आए। हर सोमवार सुबह खंडवा से मीटरगेज की छुक-छुक रेलगाड़ी में इंदौर आते और शनिवार शाम लौट जाते। सफर में वे हर स्टेशन पर डिब्बा बदल लेते और मुसाफ़िरों को नए-नए गाने सुनाकर मनोरंजन करते थे। किशोर कुमार ज़िंदगीभर कस्बाई चरित्र के भोले मानस बने रहे। मुंबई की भीड़-भाड़, पार्टियाँ और ग्लैमर के चेहरों में वे कभी शामिल नहीं हो पाए। इसलिए उनकी आख़िरी इच्छा थी कि खंडवा में ही उनका अंतिम संस्कार किया जाए। इस इच्छा को पूरा किया गया, वे कहा करते थे- ‘फ़िल्मों से संन्यास लेने के बाद वे खंडवा में ही बस जाएँगे और रोजाना दूध-जलेबी खाएँगे। लता मंगेशकर को किशोर कुमार गायकों में सबसे ज़्यादा अच्छे लगते थे। लता जी ने कहा कि किशोर कुमार हर तरह के गीत गा लेते थे और उन्हें ये मालूम था कि कौन सा गाना किस अंदाज़ में गाना है। किशोर कुमार लता जी की बहन आशा भोंसले के भी सबसे पसंदीदा गायक थे और उनका मानना है कि किशोर अपने गाने दिल और दिमाग़ दोनों से ही गाते थे। आज भी उनकी सुनहरी आवाज़ लाखों संगीत के दीवानों के दिल में बसी हुई है और उसका जादू हमारे दिलों दिमाग़ पर छाया हुआ है। वर्ष 1987 में किशोर कुमार ने मुंबई की भागम-दौड़ वाली ज़िंदगी से उब कर यह फैसला किया कि वह फ़िल्मों से संन्यास लेने के बाद वापस अपने गाँव खंडवा जाकर रहेंगे। लेकिन उनका यह सपना भी अधूरा ही रह गया। 13 अक्टूबर 1987 को उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वह पूरी दुनिया से विदा हो गये।भले ही वो आज हमारे बीच नहीं है। लेकिन अपनी सुरमयी आवाज़ और बेहतरीन अदायगी से वो हमेशा हमारे बीच रहेंगे। किशोर कुमार के प्रसिद्ध गाने कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन….दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना…. अगर तुम न होते…आ चल के तुझे मैं लेके चलूँ…आदमी जो कहता है… आने वाला पल जाने वाला है…ऐ ख़ुदा हर फ़ैसला तेरा मुझे मंज़ूर है… ओ मेरे दिल के चैन…कोई हमदम न रहा…खाईके पान बनारस वाला… ख्वाब हो तुम या कोई हक़ीकत कौन हो तुम बतलाओ…गीत गाता हूँ मैं… घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं…चलते चलते मेरे ये गीत…चिंगारी कोई भड़के… छूकर मेरे मन को…जीवन से भरी तेरी आँखें…तेरी दुनिया से, होके मजबूर चला… दिल आज शायर है…दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा… दीवाना लेके आया है…दुखी मन मेरे, सुन मेरा कहना…प्यार दीवाना होता है… फिर वोही रात है…फूलों का तारों का…माना जनाब ने पुकारा नहीं… मुसाफ़िर हूँ यारो…मेरा जीवन कोरा काग़ज़ कोरा ही रह गया… मेरी भीगी भीगी सी…मेरे नैना सावन भादों… मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू…ये जीवन है…ये दिल न होता बेचारा… ये शाम मसतानी…रिम झिम गिरे सावन…रोते हुए आते हैं सब… सागर जैसी आँखों वाली…हम हैं राही प्यार के…हमें तुमसे प्यार कितना… ज़िंदगी इक सफ़र है सुहाना…ज़िंदगी प्यार का गीत है… श्रोत-#भारत_कोश(साभार) सुरों के इस महान पुरौन्धा को पुनः नमन,,वंदन,,,,,, जय श्री राम,,

विजय कृष्णा पांडेय

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जरूर देखे बाहुबली फिल्म 


जरूर देखे बाहुबली फिल्म
#बाहुबली की सफलता के पीछे अगर सब से बड़ी कोई बात है तो वो है, उसमे किया गया हिंदुत्व का सम्मान !
फिल्म शुरू होते ही गणेश जी की पूजा, भगवान श्रीकृष्ण की पूजा और भजन, जय भवानी का नारा, महादेव जी को किया गया रक्ताभिषेक और जलाभिषेक, संस्कृत में किया गया राज्याभिषेक, महिष्मति साम्र्याज्य का संस्कृत में राष्ट्रगान आदि कई प्रकार से हिंदुत्व का सम्मान किया गया है फिल्म में
कृपया बाहुबली हर हिंदू कई कई बार ज़रूर देखो ताकि विश्व रिकार्ड बने और ये सब मुल्ला ख़ान कंपनी  परदे पर बहुत कमज़ोर हो जाय ।
हर हर महादेव का जयकारा और भव्य शिवलिंग, शिव भक्ति , कृष्ण पूजा का पूरा 5 मिनट का सीन , सब अद्भुत हैं । सम्पूर्ण भारतीयता । शुद्ध हिंदी और संस्कृत के संवाद । देखकर लगता है शायद पुराने वीर राजा महाराजा और उनके साम्राज्य ऐसे ही होते होंगे
बाहुबली 2 _लोगों को सिर्फ इसलिए पसंद आ रही है कि

इसमें या अल्लाह या मौला

जुम्मे की रात चुम्मे की बात

ऐसे शब्द सुनने को नहीं मिल रहा है
इसमे केवल हमारी संस्कृती हमारी विरासत ,

और हमारे मे कितना बाहुबल था_ और अब भी है वो दिखाया है
जाईये देखिये , और ये तीनो खानो के_ ये लात मारने जैसा अनुभव रहेगा।।
बाहुबली की सफलता अच्छा संकेत हैं

भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा और ऊर्जा दे रही है और ये दक्षिण भारतीय सिनेमा का वो शंखनाद है जो पूरे बॉलीवुड के तमाम निकृष्ट लोगों की नींद हराम कर रहा है..!
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दाऊद के इशारे पर बॉलीवुड में घुसाये जा रहे पाकिस्तानी,

निकाले जा रहे हिन्दू कलाकार
कुमार शानू ,उदित नारायण, अभिजीत, शान, सुखविंदर सिंह, सोनू निगम, अरजीत सिहं ।
आपने कभी ध्यान दिया है कि फ़िल्मों मे 92 के बाद से गायकों का करियर ग्राफ़ कैसा रहा है ??
याद है कुमार शानू जो करियर में पीक पर चढ़कर अचानक ही धुँध में खो गये ।
फिर आये अभिजीत, जिन्हे टाप पर पहुँचकर अचानक

ही काम मिलना बद हो गया
उदित नारायण भी उदय होकर समय से पहले अस्त हो गये।
उसके बाद सुखविंदर अपनी धमाकेदार आवाज से फलक पर छा गये और फिर अचानक ही ग्रहण लग गया
उसके बाद आये शान,और बुलंदियों को छूने के अचानक बाद ही कब नीचे आये पता ही नही लगा।
फिर सोनू निगम कब काम मिलना बंद हुआ, लोग समझ ही नही पाये ।
उसके बाद अरजीत सिंह जिनकी मखमली आवाज ने दिलो मे जगह बनानी शुरू ही

की थी कि सलमान ने उनहे पब्लिकली माफ़ी माँगने के बाद भी फिल्म सुलतान में उनके द्वारा गाया हुआ ‘जग घूमया’ जैसा गाना बाहर निकलवा दिया अौर उसी गाने को पाकिस्तानी गायक राहत फतेह अली खान से गवाया, अौर सिर्फ़ यही नहीं बाद में धीरे धीरे उसका करियर

खतम करने की साज़िश चल रही है।
सारे ही गायकों को असमय बाहर का रास्ता दिखा दिया गया ।
इसके उल्टा पहले चीख़ कर गाने वाले, क़व्वाली

गायक नुसरत फ़तेह अली खान क़व्वाली गाने के

लिये बुलाया जाता है, और पाकिस्तानी गायकों के लिये दरवाज़े खोल दिये जाते हैं। उसके बाद राहत फ़तेह अली खान आते हैं और बॉलीवुड में उन्हे लगातार काम मिलने लगता है और बॉलीवुड की वजह से सुपरहिट हो जाते है।
फिर नये स्टाईल के नाम पर आतिफ़ असलम आते हैं जिनको एक के बाद एक अच्छे गाने मिलने लगते हैं।
अली जाफ़र जैसे औसत गायक को भी काम मिलने में कोई दिक़्क़त नही आती ।
धीरे धीरे पाकिस्तानी हीरो

हीरोइन को भी बॉलीवुड मे लाकर स्थापित किया जाने लगा और भारतियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाने लगा
उरी हमले के बाद बैक डोर से चुपके से उन्हे लाने की चाल, कुछ भारतियों की नज़र मे आ गया और उन्होंने निंदा करने की माँग करने की, हिमाक़त कर डाली जो उन्हे नागवार गुज़री और वो पाकिस्तान वापस चले गये
क्या आपको लगता है कि यह महज इत्तिफ़ाक़ है तो आप से बडा भोला कोइ नही
पूरा बॉलीवुड डी-कंपनी या पी-कंपनी (पाकिस्तान) के इशारों पर चलता है, और👆👆 इसका इलाज है टोटल बॉयकाट
सिर्फ़ देशभक्त कलाकारों का 💪💪💪💪💪समर्थन करें
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पहली बार फिल्मकार #S_S_राजामौली साहब ने समूची दुनिया को बताया है कि अपने सांस्कृतिक मूल्यों में लोकप्रिय होने की कितनी ताकत है…फिल्म की शुरुवात समंदर में तैरती बिकनी वाली हीरोइन से नहीं…झरने में आदी योगी शिव की आराधना करने वाले हीरो से भी शूरु हो सकती है..हिट करने के लिए बादशाह और हनी सिंह का फूहड़ रैप की जरूरत नहीं…वैदिक मंत्रोंच्चारण पर भी लोग मन्त्र मुग्ध हो सकतें हैं…क्लीवेज नचाती सनी लियोनी का आइटम साँग जबरदस्ती घुसाना जरुरी नहीं..नादस्वरम और मृदंगम के साथ भरतनाट्यम करती लड़कियां भी दर्शकों में रोमांच पैदा कर सकतीं हैं ..
आज निकलिए घर से बाहर..जाइये अपने घर-परिवार के साथ… क्योंकि आप फिल्म देखने नहीं जा रहें हैं..आप भारतीय सिनेमा का बदलता इतिहास देखने जा रहें हैं..आप भारतीय सिनेमा में पहली बार भारत को देखने जा रहें हैं..बाहुबली मात्र एक फिल्म नहीं…ये अश्लीलता और फूहड़ता के पश्चिमी शोर में अकेले गूंजता हुआ भारतीय शँखनाद है …

#बाहुबली

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अंडरवर्ल्ड के आतंकवादियों की कृपा से चल रहा बालीवुड के कुछ तथाकथित सुपर स्टार, फिल्म रिलीज करने के लिए ईद और क्रिसमस की छुट्टियों का इंतजार करते हैं और “बाहुबली” एक आम सप्ताह में release होकर super-duper हिट साबित होती है …..चलो कोई आश्चर्य नही
जब देश में क्रिकेट का वार्षिक मेला IPL लगा हो, आता है और पहले दिन ही 120 करोड़ कमाती है ….चलो कोई आश्चर्य नही
जब एक आम हिंदुस्तानी परिवार फिल्मो से मुंह फेर रहा हो ….उन्हें फ़िल्म देखने के लिए मजबूर कर रही है ये फ़िल्म ……चलो कोई आश्चर्य नही
पर आश्चर्य की बात ये है कि, इस फ़िल्म ने उन तथाकथित फ़िल्म निर्माताओ और खान बंधुओ को सरे बाजार नंगा कर दिया कि, हिन्दू देवी देवताओं के अपमान से फिल्मे हिट हो जाती है …..जहाँ PK में शिवजी को toilet में छुपते हुवे दिखाया ….वही बाहुबली में शिव लिंग का अभिषेक नायक अपने रक्त से करता है …..शिव लिंग को अपने सर पे उठाता है साथ ही ये फ़िल्म भाषाओ की सीमाओं को भी लांघ रही है
धन्यवाद के पात्र है हमारे दक्षिण के निर्माता-निर्देशक जिन्होंने दिखा दिया कि हिन्दू रीति रिवाजों , हिन्दू पद्धतियों को अगर बारीकी से दिखाए तो जनता सर आंखों पे बिठा लेगी…..
वन्दे मातरम् 💪💪💪
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बाहुबली बेहद जबरदस्त मुवी बिना किसी महिला के अंगो कि नुमाइश के फिल्म बनी और सारे रिकार्ड तोड दिये ……
सोच रहा हु फिर बाॅलीवुड वाली इतनी जांघे दिखाती हे, कभी-कभी टाॅपलेस सीन भी हो जाता है,
अच्छा स्पेश्यली महिलाओं के उपर लेट कर पलंग हिलने वाला सीन और आह! आह! कि ध्वनि ,कामुक दृश्य इत्यादि महिलाओं के गौरवमयी सम्मान को मटियामेट करने वाली रंडियो कि फिल्मे इतनी कोशिशो के बावजूद कभी इतनी कमाई ना कर पाई ।
ना कोई मौला मौला वाला संगीत , ना किसी मस्जिद मजार मे माथा टेकते हिरो हिरोइन का दृश्य।
फ़िल्मी खानों और कटुओं में _और दुबई प्रेमी गैंग में भगदड़ !
जय महाकाल ! हर हर महादेव ! हर हर महादेव !

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मीना कुमारी


मीना कुमारी …. फिल्मो में ट्रेजेडी रोल करते करते खुद की जिन्दगी भी ट्रेजेडी बना ली ….. मीना कुमारी की नानी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के छोटे भाई की बेटी थी, जो जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही प्यारेलाल नामक युवक के साथ भाग गई थीं। विधवा हो जाने पर उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया। दो बेटे और एक बेटी को लेकर बम्बई आ गईं। नाचने-गाने की कला में माहिर थीं इसलिए बेटी प्रभावती के साथ पारसी थिएटर में भरती हो गईं। प्रभावती की मुलाकात थिएटर के हारमोनियम वादक मास्टर अली बख्श से हुई। उन्होंने प्रभावती से निकाह कर उसे इकबाल बानो बना दिया। अली बख्श से इकबाल को तीन संतान हुईं। खुर्शीद, महजबीं बानों (मीना कुमारी) और तीसरी महलका (माधुरी)। अली बख्श रंगीन मिजाज के व्यक्ति थे। घर की नौकरानी से नजरें चार हुईं और खुले आम रोमांस चलने लगा। और मीना कुमारी का बाप अपनी नौकरानी से भी निकाह कर लिया | मीना कुमारी को कई लोगो से प्यार हुआ .. लेकिन सबने उन्हें इस्तेमाल करके उन्हें छोड़ दिया … धर्मेंद्र, सम्पूरन सिंह उर्फ़ गुलजार, महेश भट्ट, और शौहर कमाल अमरोही … सबने मीना कुमारी का खूब इस्तेमाल किया .. यहाँ तक की मीना कुमारी का बाप भी अपनी बेटी को सिर्फ पैसे कमाने की मशीन ही समझता था और पुरे परिवार का खर्चा मीना कुमारी से ही लेता था .. यहाँ तक की उनकी सभी बहने भी मीना कुमारी से हमेशा पैसे लेती रहती थी | कमाल अमरोही मीना कुमारी से २७ साल बड़े थे | मीना कुमारी का पूना में एक्सीडेंट हुआ और वो अस्पताल में भर्ती थी ..कमाल अमरोही ने उनकी खूब सेवा की जिससे मीना कुमारी का दिल उस पर आ गया .. और दोनों ने निकाह कर लिया … मजे की बात ये की कमाल अमरोही की पहले से ही दो बेगमे थी ..एक उनके साथ मुंबई में और दूसरी उनके शहर यूपी के अमरोहा में रहती थी .और कमाल के आठ बच्चे थे | मीना कुमारी मुंबई की जिन्दगी से तंग आ गयी थी और कमाल अमरोही से बार बार कहती थी की कमाल तुम मुझे अपने गाँव अमरोहा ले चलो .मै वही रहना चाहती हूँ .. एक बार कमाल उन्हें साथ लेकर गये तो कमाल के घर वालो ने मीना कुमारी से बहुत दुर्व्यवहार किया और कहा कमाल तुमने तो किसी वेश्या से निकाह किया है | बाद में उनका कमाल अमरोही से तलाक हो गया … फिर उन्होने कमाल से दुबारा निकाह किया …. इस्लामिक नियमो के अनुसार यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी को तलाक देता है तो वो दुबारा उस महिला से निकाह नही कर सकता ..पहले उस महिला को किसी अन्य पुरुष से निकाह करना होगा फिर वो पुरुष उसे तलाक देगा फिर वो महिला अपने पूर्व पति से दुबारा निकाह कर सकती है .. मीना कुमारी ने जीनत अमान के पिता के साथ निकाह किया फिर उनसे तलाक लेकर कमाल अमरोही से दुबारा निकाह किया …लेकिन कमाल निकाह के बाद अपनी जिन्दगी में चला गया | लेकिन बाद में उन्होंने अपने आपको शराब में डुबो लिया था .. वो हर वक्त शराब पीती रहती थी .. शराब ने उनके लीवर को खत्म कर दिया था और वो मानसिक रूप से एकदम टूट गयी थी ..उन्हें कैंसर हो गया और उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा | अस्पताल में ही उनकी मौत हो गयी .. और किसी ने भी उनके ईलाज पर १ रूपये भी नही खर्च किया .. इसी सभ्य समाज में मशहूर फिल्म अभिनेत्री मीना कुमारी की लाश को लावारिश घोषित करने की नौबत आ गयी थी …उन्हें कैंसर हो गया था कई अंतिम समय में कई महीनों तक अस्पताल में रहना पड़ा था ..और उनकी अस्पताल में ही मौत हो गयी थी मीना कुमारी के पति कमाल अमरोही ने अस्पताल में कहा की मैंने तो उन्हें तलाक दे दिया था … उसने सौतेले पुत्र ताजदार अमरोही ने कहा की मेरा उनसे कोई वास्ता नही है … उनके छोटी बहन के पति मशहूर कामेडियन महमूद ने कहा की मै क्यों ८०००० दूँ ? और तो और जिस धर्मेन्द्र को फगवाडा से मुंबई बुलाकर स्टार बनाया वो भी बिल का नाम सुनते ही खिसक गया | फिर जिस सम्पूरन सिंह कालरा को मीना कुमारी ने झेलम की गलियों से मुंबई बुलाकर “गुलज़ार” बनाया उस गुलज़ार ने कहा की मै तो कवि हूँ और कवि के पास इतना पैसा कहा …जबकि उसी गुलज़ार ने एक मुशायरे में जिसमे मीना कुमारी भी थी कहा था “ये तेरा अक्स है तो पड़ रहा है मेरे चेहरे पर ..वरना अंधेरो में कौन पहचानता मुझे ” हर टीवी चैनेल पर आकर मुस्लिम हितों पर बड़ी बड़ी बाते करने वाला महेश भट्ट बोला मै पैसे क्यों दूँ ? . जिससे अस्पताल वालो को कहना पड़ा की अब हमे मीना कुमारी जी की लाश को लावारिश घोषित करके बीएमसी वालो को देना पडेगा … जब ये खबर अखबारों में छपी तबएक अनजान पारसी व्यक्ति अस्पताल आया और बिल चुकाकर मीना कुमारी के शव को सम्मान के साथ इस्लामिक विधि से कब्रिस्तान में दफन करवाया. संजय द्विवेदी

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सज्जाद जहीर


सारी गंदगी की जड़-कांग्रेस के बसाये ये गद्दार

एक था कम्युनिस्ट………नाम था कामरेड सज्जाद जहीर ……लखनऊ में पैदा हुए .

ये मियाँ साहब ,पहले तो progressive writers association यानि अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के रहनुमा बनकर उभरे ,और अपनी किताब अंगारे से इन्होने अपने लेखक होने का दावा पेश किया ………… बाद मे ये जनाब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वेसर्वा बने , मगर बाबू साहब की रूह मे तो इस्लाम बसता था , इसीलिए 1947 मे नये इस्लामी देश बने ,पाकिस्तान मे जाकर बस गये ,इनकी बेगम रजिया सज्जाद जहीर भी उर्दू की लेखिका थी …….
सज्जाद जहीर , 1948 मे कलकत्ता के कम्युनिस्ट पार्टी के सम्मेलन मे भाग लेने कलकत्ता पहुँचे ,और वहाँ कुछ मुसलमानो ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया से अलग होकर CPP यानि कम्युनिस्ट पार्टी आफ पाकिस्तान का गठन कर लिया , जो बांग्लादेश मे तो फली – फूली ……

मगर पाकिस्तान मे , सज्जाद जहीर , मशहूर शायर लेखक फैज अहमद फैज , शायर अहमद फराज , रजिया सज्जाद जहीर ,और कुछ पाकिस्तानी जनरलो ने मिलकर रावलपिंडी षडयंत्र केस मे पाकिस्तान मे सैन्य तख्ता पलट का प्रयास किया और पकडे जाने पर जेल मे डाल दिये गये । सज्जाद जहीर, अहमद फराज और फैज अहमद फैज को लंबी सजाऐ सुनाई गई …….
जेल से रिहा होने के बाद सज्जाद जहीर भारत आया और खुद को शरणार्थी घोषित करके कांग्रेस सरकार से भारतीय नागरिता मांगी ..और कांग्रेस सरकार ने सज्जाद को भारतीय नागरिकता दे दिया … वो भी फटाफट ..

अब आगे की कथा सुनिये , इन मियाँ साहब, सज्जाद जहीर और रजिया जहीर की चार बेटियाँ थी .

1- नजमा जहीर बाकर , पाकिस्तानी सज्जाद जहीर की सबसे बडी बेटी , जो कि नेहरू के मदरसे ,JNU मे biochemistry की प्रोफेसर है ……..

2- दूसरी बेटी नसीम भाटिया है …………

3- सज्जाद जहीर की तीसरी बेटी है ,नादिरा बब्बर जिसने फिल्म एक्टर और कांग्रेस सांसद राज बब्बर से शादी की है, इनके दो बच्चे है , आर्य बब्बर और जूही बब्बर ……………..

4- सज्जाद जहीर की चौथी और सबसे छोटी बेटी का नाम है नूर जहीर , ये मोहतरमा भी लेखिका है , और JNU से जुडी है ..
नूर जहीर ने शादी नही की और जीवन भर अविवाहित रहने के अपने फैसले पर आज भी कायम है । चूँकि नूर जहीर ने शादी ही नही की , तो बच्चो का तो सवाल ही पैदा नही होता ….. मगर रूकिये , यहाँ आपको निराश होना पडेगा . अविवाहित होने के बावजूद , नूर जहीर के चार बच्चे है , वो भी चार अलग – अलग पुरूषो से ………………..
इन्ही नूर जहीर और ए. दासगुप्ता की दूसरी संतान है पंखुडी जहीर ,अरे नही चौंकिये मत ………
ये वही पंखुडी जहीर है ,जिसने कुछ ही वर्षो पहले दिल्ली मे संघऑफिस केशव कुञ्ज के सामने खुलेआम चूमा- चाटी के लिए , किस आफ लव ( kiss of love ) के नाम से इवेंट आयोजित किया था । जी हाँ , ये वही है जो कन्हैयाकुमार वाले मामले मे सबसे ज्यादा उछल कूद मचा रही थी । इसे JNU मे कन्हैयाकुमार की सबसे विश्वश्त सहयोगी माना जाता है । खुले आम सिगरेट , शराब , और अनेको व्यसनो की शौकीन ,इन जैसी लडकियाँ जब महिला अधिकारो के नाम पर बवंडर मचाती है। तो सच मे पूछ लेने को दिल करता है ,कि तुम्हारा खानदान क्या है ??????????

और क्या है तुम्हारे संस्कार ???????

बिन ब्याही माँ की ,दो अलग अलग पुरूषो से उत्पन्न चार संतानो मे से एक पंखुडी जहीर जैसी औरते , खुद औरतो के नाम पे जिल्लत का दाग है ………..

शायद मेरी ये पोस्ट पाकिस्तान , इस्लामियत , कम्युनिस्टो का सडन भरा अतीत , इनकी मानसिकता , इनका खानदान , और इनके संस्कार बयां करने को काफी है ……….

इन्ही जैसे लोगो ने JNU की इज्जत मे चार चाँद लगा रखे है ………………..

पाकिस्तान मे कम्युनिस्ट पार्टी आज तक 01% वोट भी नही जुटा पाये , कुल 176 वोट मिलते है इन्हे ………

और पाकिस्तानी सज्जाद जहीर की औलादे , कम्युनिस्टो का चोला पहनकर भारत की बर्बादी के नारे लगा रहे है …..

समझ मे आया ???? JNU के कामरेडो का पाकिस्तान प्रेम और कश्मीर के मुद्दे पर नौटंकी करने का असली उद्देश्य ………………….

क्या कारण है कि ये पंखुडी दासगुप्ता ना लिखकर खुद को पंखुडी जहीर लिखती है ……..?????

और हाँ , इसकी सगी मौसी के लडके , नादिरा बब्बर और राज बब्बर की संतान ,फिल्म एक्टर आर्य बब्बर का घर का नाम सज्जाद है ………..

।। जय हिन्द ।।

वंदेमातरम
साभार: गोपाल राजपूत

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भारत को आखिर बॉलीवुड ने दिया क्या है ?


भारत को आखिर बॉलीवुड ने दिया क्या है ?
निवेदन एक बार जरूर पढे
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बॉलीवुड ने भारत को इतना सब कुछ दिया है, तभी तो आज देश यहाँ है …

1. बलात्कार गैंग रेप करने के तरीके।
2. विवाह किये बिना लड़का लड़की का शारीरिक सम्बन्ध बनाना।
3. विवाह के दौरान लड़की को मंडप से भगाना
4. चोरी डकैती करने के तरीके।
5. भारतीय संस्कारो का उपहास उडाना।
6. लड़कियो को छोटे कपडे पहने की सीख देना….
जिसे फैशन का नाम देना।
7. दारू सिगरेट चरस गांजा कैसे पिया और लाया जाये।
8. गुंडागर्दी कर के हफ्ता वसूली करना।
9. भगवान का मजाक बनाना और अपमानित करना।
10. पूजा पाठ यज्ञ करना पाखण्ड है व नमाज पढ़ना ईश्वर की सच्ची पूजा है।
11. भारतीयों को अंग्रेज बनाना।
12. भारतीय संस्कृति को मूर्खता पूर्ण बताना और पश्चिमी संस्कृति को श्रेष्ठ बताना।
13. माँ बाप को वृध्दाश्रम छोड़ के आना।
14. गाय पालन को मज़ाक बनाना और कुत्तों को उनसे श्रेष्ठ बताना और पालना सिखाना।
15. रोटी हरी सब्ज़ी खाना गलत बल्कि रेस्टोरेंट में पिज़्ज़ा बर्गर कोल्ड ड्रिंक और नॉन वेज खाना श्रेष्ठ है।
16. पंडितों को जोकर के रूप में दिखाना, चोटी रखना या यज्ञोपवीत पहनना मूर्खता है मगर बालो के अजीबो गरीब स्टाइल (गजनी) रखना व क्रॉस पहनना श्रेष्ठ है उससे आप सभ्य लगते है।
17. शुद्ध हिन्दी या संस्कृत बोलना हास्य वाली बात है और उर्दू या अंग्रेजी बोलना सभ्य पढ़ा-लिखा और अमीरी वाली बात…
हमारे देश की युवा पीढ़ी बॉलीवुड को और उसके अभिनेता और अभिनेत्रियों का अपना आदर्श मानती है…..
अगर यही बॉलीवुड देश की संस्कृति सभ्यता दिखाए ..
तो सत्य मानिये हमारी युवा पीढ़ी अपने रास्ते से कभी नही भटकेगी…
समझिये ..जानिए और आगे बढिए…

ये संदेश उन हिन्दू ,लौंडो के लिए है
जो फिल्म देखने के बाद
गले में क्रोस मुल्ले जैसी छोटी सी दाड़ी रख कर
खुद को मॉडर्न समझते हैं
हिन्दू नौजवानौं के रगो में धीमा जहर भरा जा रहा है
फिल्म जेहाद
*****
सलीम – जावेद की जोड़ी की लिखी हुई फिल्मो को देखे, तो उसमे आपको अक्सर बहुत ही चालाकी से हिन्दू धर्म का मजाक तथा मुस्लिम / इसाई / साईं बाबा को महान दिखाया जाता मिलेगा. इनकी लगभग हर फिल्म में एक महान मुस्लिम चरित्र अवश्य होता है और हिन्दू मंदिर का मजाक तथा संत के रूप में पाखंडी ठग देखने को मिलते है.

फिल्म “शोले” में धर्मेन्द्र भगवान् शिव की आड़ लेकर “हेमामालिनी” को प्रेमजाल में फंसाना चाहता है जो यह साबित करता है कि – मंदिर में लोग लडकियां छेड़ने जाते है. इसी फिल्म में ए. के. हंगल इतना पक्का नमाजी है कि – बेटे की लाश को छोड़कर, यह कहकर नमाज पढने चल देता है.कि- उसे और बेटे क्यों नहीं दिए कुर्बान होने के लिए.

“दीवार” का अमिताभ बच्चन नास्तिक है और वो भगवान् का प्रसाद तक नहीं खाना चाहता है, लेकिन 786 लिखे हुए बिल्ले को हमेशा अपनी जेब में रखता है और वो बिल्ला भी बार बार अमिताभ बच्चन की जान बचाता है. “जंजीर” में भी अमिताभ नास्तिक है और जया भगवान से नाराज होकर गाना गाती है लेकिन शेरखान एक सच्चा इंसान है.

फिल्म ‘शान” में अमिताभ बच्चन और शशिकपूर साधू के वेश में जनता को ठगते है लेकिन इसी फिल्म में “अब्दुल” जैसा सच्चा इंसान है जो सच्चाई के लिए जान दे देता है. फिल्म “क्रान्ति” में माता का भजन करने वाला राजा (प्रदीप कुमार) गद्दार है और करीमखान (शत्रुघ्न सिन्हा) एक महान देशभक्त, जो देश के लिए अपनी जान दे देता है.

अमर-अकबर-अन्थोनी में तीनो बच्चो का बाप किशनलाल एक खूनी स्मग्लर है लेकिन उनके बच्चों अकबर और अन्थोनी को पालने वाले मुस्लिम और ईसाई महान इंसान है. साईं बाबा का महिमामंडन भी इसी फिल्म के बाद शुरू हुआ था. फिल्म “हाथ की सफाई” में चोरी – ठगी को महिमामंडित करने वाली प्रार्थना भी आपको याद ही होगी.

कुल मिलाकर आपको इनकी फिल्म में हिन्दू नास्तिक मिलेगा या धर्म का उपहास करता हुआ कोई कारनामा दिखेगा और इसके साथ साथ आपको शेरखान पठान, DSP डिसूजा, अब्दुल, पादरी, माइकल, डेबिड, आदि जैसे आदर्श चरित्र देखने को मिलेंगे. हो सकता है आपने पहले कभी इस पर ध्यान न दिया हो लेकिन अबकी बार ज़रा ध्यान से देखना.

केवल सलीम / जावेद की ही नहीं बल्कि कादर खान, कैफ़ी आजमी, महेश भट्ट, आदि की फिल्मो का भी यही हाल है. फिल्म इंडस्ट्री पर दाउद जैसों का नियंत्रण रहा है. इसमें अक्सर अपराधियों का महिमामंडन किया जाता है और पंडित को धूर्त, ठाकुर को जालिम, बनिए को सूदखोर, सरदार को मूर्ख कामेडियन, आदि ही दिखाया जाता है.

“फरहान अख्तर” की फिल्म “भाग मिल्खा भाग” में “हवन करेंगे” का आखिर क्या मतलब था ? pk में भगवान् का रोंग नंबर बताने वाले आमिर खान क्या कभी अल्ला के रोंग नंबर 786 पर भी कोई फिल्म बनायेंगे ? मेरा मानना है कि – यह सब महज इत्तेफाक नहीं है बल्कि सोची समझी साजिश है एक चाल है ।

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एथीस्ट


कुछ दिन पहले जावेद अख्तर बड़े फकर से कह रहे थे कि वे एथीस्ट हैं, एथीस्ट मने नास्तिक……. बतला रहे थे कि जवान होते होते वे एथीस्ट हो गए थे, वे किसी अल्लाह को नहीं मानते, कभी रोज़ा नहीं रखा, मस्जिद नहीं गए नमाज़ नहीं पढ़े…… टोटल एथीस्ट….,,., लेकिन जब भी मैं इनकी दीवार फ़िल्म देखता हूँ तो चक्कर खा जाता हूँ, शक होता है कि ये एथीस्ट झूठ तो नहीं बोल रहा कहीं……. फ़िल्म देखिये, फ़िल्म में क्या दिखाया है कि वर्मा जी का लौंडा विजय (अमिताभ बच्चन) बचपन से ही भगवान से रूठ जाता है, मंदिर नहीं जाता, अपनी माँ सुमित्रा (निरुपमा रॉय) के कहने पर भी मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ता…… जोर जबरदस्ती करने पर मंदिर का पुजारी टोक देता है, नहीं बहन भगवान् की पूजा जोर जबरदस्ती से नहीं होती श्रद्धा से होती जब इसके दिल में श्रद्धा जागेगी तब ये खुद ही मंदिर आ जाएगा……. वाह कितनी प्यारी बात कहीं पुजारी ने, खैर अच्छा था कि जगह मंदिर थी और सामने पुजारी था, कहीं मस्जिद होती और सामने मौलवी साहब होते तो पक्का फतवा जारी हो जाता…… ला हॉल विला कूवत इल्ला बिल्ला अल्लाह की तौहीन की है इस लौंडे ने, दीन को मानने से मना किया है इसने, ये काफ़िर हो चुका है, काफिरों के लिए मुताबिक ए दीन बस एक ही सजा है….. मुरतीद मुरतीद….. मने सर कलम कर फुटबॉल खेली जाए…….. हुक्म की तालीम हो…… हेहेहे….. खैर छोड़िये, पिछली बात पे वापस आते हैं, तो मामला ये है कि पूरी फ़िल्म में विजय भगवान से छत्तीस का आंकड़ा बना कर चलता है, जताया कुछ यूँ गया है कि फ़िल्म का नायक भगवान् को नहीं मानता और मंदिर नहीं जाता……… मने एथीस्ट हो चुका है पर जब डॉकयार्ड पर काम करने वाले रहीम चच्चा विजय को उसकी बांह पर बंधे 786 नंबर के लॉकेट के बारे में इल्म देते हैं कि बेटा 786 का मतलब होता है बिस्मिल्लाह, इसे हम लोगों में बड़ा मुबारक समझा जाता है……… सामन्त के आदमी की चलाई गोली जब विजय को लगती है, और बिल्ले की वजह से विजय बच जाता है तब विजय को इल्हाम होता है कि 786 नंबर तो बड़ा पावरफुल है तब वो बिल्ले को बार बार चूमता है और हमेशा अपने पास सीने से लगा कर रखता है और चूमता रहता है मने एक एथीस्ट को बिस्मिल्लाह में तो विश्वास है लेकिन भगवान में नहीं…………. सियापे की हद तो देखिये जब विजय की माँ बीमार होती है, जिंदगी और मौत से जूझ रही होती है तब विजय को मंदिर की याद आती है अल्लाह मियाँ फ्रेम से ग़ायब हो जाते हैं…… मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ विजय भगवान् के सामने खड़ा है और कहता है- मैं आज तक तेरी सीढ़ियाँ नहीं चढ़ा…… अब कोई पूछे कि bc अब क्यों चढ़ा बे…….. मैंने आज तक तुझसे कुछ नहीं माँगा……. तो अब क्यों मांग रहा है भो%* के………… बताओ भला अब ये क्या बात हुयी यार, वैसे एथीस्ट हैं, मंदिर की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ेंगे पर बिस्मिल्लाह (786) को चूमेंगे दिन में दस बार, छाती से चिपका कर रखेंगे और कहीं कुछ गलत हो जाए तो भगवान् की ऐसी-तैसी करेंगे, शुरू हो जाएंगे भगवन को हूल-पट्टी देने……..

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जावेद अख्तर साहब कहते हैं कि वे शुरू से एथीस्ट रहे हैं लेकिन फ़िल्म की कहानी लिखते समय इस्लाम की ओर झुक जाते हैं, उनका नायक एथीस्ट है, भगवान को नहीं मानता लेकिन अल्लाह और 786 को पूरी शिद्दत से मानता है, ये कैसा एथिस्टपना हुआ…….. ये तो बिलकुल वैसा ही हुआ जैसे उमर खालिद की बहन कहती है कि उसका भाई किसी इस्लाम को नहीं मानता लेकिन नारे वो JNU में इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह के लगवाता है और पूरी शिद्दत से अपनी कौम के प्रति पूरी निष्ठा निभाते हुए हर मुस्लिम की तरह दूसरे मुस्लिम (अफज़ल गुरु) के प्रति पूरी वफादारी रखता है………… पिताजी जब ज़िंदा थे तो वे बताते थे कि जब ये फ़िल्म दीवार आई थी तब बहुत से लौंडे खुद को अमिताभ बच्चन समझकर मंदिर की सीढ़ियों पर मुंह फुलाये बैठे देखे जाते थे, मेले ठेलों से 786 के लॉकेट और बिल्ले खरीदकर अपनी चौड़े कॉलर की नीली शर्ट की ऊपरी जेब जो दिल के पास होती है उसमें खूब रखते देखे जाते थे……… खैर मैं फ़िल्में बहुत देखता हूँ और फिल्मों में अक्सर देखता है कि फ़िल्म का हिन्दू नायक भगवान में विश्वास नहीं रखता, मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ता, प्रसाद नहीं खाता वगैरह वगैरह लेकिन आज तक किसी मुस्लिम या ईसाई नायक को अल्लाह या गॉड की खिलाफत करते नहीं देखा……… मस्जिद या गिरजे की सीढ़ियों पर बैठे नहीं देखा…… अल्लाह या गॉड से मुंह फुलाये नहीं बल्कि अपने मजहब के प्रति पूरी निष्ठा रखते जरूर देखा है……. दिखाया जाता है कि फ़िल्म के मुस्लिम या ईसाई नायक का अपने रिलिजन में पूरा पूरा फेथ रखता है बस असली गड़बड़ तो हीरो को भगवान् से है…….. ये फिल्मों का ही असर है कि जब मैंने कई सुतियों को खुद को किसी फ़िल्मी नायक की तरह आज भी भगवान से मुंह फुलाये मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे देखा है……. एथीस्ट होना तो जैसे आजकल फैशन हो गया है वैसे ही जैसे JNU में हो गया है….. मैं फ़िल्मी एथीस्ट और JNU छाप एथीस्ट में बहुत समानता पाता हूँ…….. फ़िल्मी एथीस्ट की लड़ाई सिर्फ भगवान से है बाकी अल्लाह और गॉड से उसे कोई दिक्कत नहीं, ठीक ऐसे ही JNU छाप एथीस्ट भी भगवान् के पीछे लठ्ठ लिए फिरते हैं……. देवी दुर्गा एक हिन्दू मिथक है लेकिन महिषासुर वास्तविकता है, माँ दुर्गा की पूजा करना अन्धविश्वास है लेकिन महिषासुर को पूजना आधुनिकता है……… राम राम बोलना कट्टरता है लेकिन इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह बोलना धार्मिकता है, दिवाली होली मनाना बुजुरुआ बोडमता का प्रतीक है लेकिन ईद और क्रिसमस मनाना साम्यवादिता का लोगो है, JNU कम्युनिस्ट कहते हैं कि वे एथीस्ट हैं धर्म उनके लिए अफीम है लेकिन उनका एथीसिस्म इस्लाम और ईसाईयत को रसगुल्ला समझता है और हिंदुत्व को अफीम, गांजा, चरस, कोकीन, हेरोइन……… सारी हूल-पट्टी भगवान् के लिए रख जोड़ी हैं बाकी अल्लाह या गॉड के लिए चूमा चाटी का इल्हाम है, बड़ा अजीब एथीसिस्म है यार इनका……..

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मैंने दुनिया में कई एथीस्ट ऐसे देखे हैं जिनका एथीस्टपना सभी मजहब के लिए बराबर होता है, वे जिनती ईमानदारी से दूसरे धर्म की कमियां निकालते हैं उससे अधिक ईमानदारी दिखाते हुए वे अपने धर्म की बखिया उधेड़ देते हैं लेकिन JNU में एथीस्ट होने के मायने थोड़ा अलग है बिकुल दीवार फ़िल्म के नायक के जैसे……….. भगवान् से रूठकर मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ जाइए लेकिन जैसे ही 786 का बिल्ला मिले तो उसको चुमिये, माथे से लगाइये……….

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दरअसल JNU ही नहीं पूरे देश में एथीस्ट होने का मतलब है सिर्फ और सिर्फ हिन्दुज्म का आलोचक होना है गोया हिन्दुज्म न हुआ एथीस्टों की प्रेक्टिस के लिए पंचिंग बेग हो गया……….