Posted in Biography

श्यामा प्रसाद मुखर्जी

राष्ट्रपुत्र एवं भारतीय जनसंघ के संस्थापक
डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की आज
पुण्य तिथि है !

कश्मीर की भूमि पर कश्मीर के लिए उन्होंने अपना बलिदान दिया था,,,,
वह कश्मीर हमारा है !!!!

वीर राष्ट्रपुत्र को पुण्य तिथि के अवसर पर समस्त
राष्ट्र प्रेमियों की ओर से भाव भीनी हार्दिक श्रद्धांजलि, अश्रु पूरित श्रद्धा सुमन अर्पण,

कश्मीर हमारा था,,,,हमारा है,,,,,हमारा रहेगा,,,,,,

— डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी,,,,,

श्यामा प्रसाद मुखर्जी
(जन्म- 6 जुलाई, 1901, कोलकाता;
मृत्यु- 23 जून, 1953)

एक महान शिक्षाविद और चिन्तक होने के
साथ-साथ भारतीय जनसंघ के संस्थापक
भी थे।

उन्हें आज भी एक प्रखर राष्ट्रवादी और
कट्टर देशभक्त के रूप में याद किया जाता है।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सच्चे अर्थों में मानवता
के उपासक और सिद्धांतों के पक्के इंसान थे।

संसद में उन्होंने सदैव राष्ट्रीय एकता की स्थापना
को ही अपना प्रथम लक्ष्य रखा था।
संसद में दिए अपने भाषण में उन्होंने पुरजोर शब्दों
में कहा था कि
“राष्ट्रीय एकता के धरातल पर ही सुनहरे भविष्य
की नींव रखी जा सकती है।”

भारतीय इतिहास में उनकी छवि एक कर्मठ और
जुझारू व्यक्तित्व वाले ऐसे इंसान की है,जो अपनी
मृत्यु के इतने वर्षों बाद भी अनेक भारतवासियों के
आदर्श और पथप्रदर्शक हैं।

—जन्म तथा शिक्षा

डॉ. मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई, 1901 को एक
प्रसिद्ध बंगाली परिवार में हुआ था।
उनकी माता का नाम जोगमाया देवी मुखर्जी था
और पिता आशुतोष मुखर्जी बंगाल के एक जाने-
माने व्यक्ति और कुशल वकील थे।
डॉ. मुखर्जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक
की डिग्री प्रथम श्रेणी में 1921 में प्राप्त की थी।

इसके बाद उन्होंने 1923 में एम.ए. और 1924
में बी.एल. किया।

वे 1923 में ही सीनेट के सदस्य बन गये थे।
उन्होंने अपने पिता की मृत्यु के बाद कलकता
उच्च न्यायालय में एडवोकेट के रूप में अपना
नाम दर्ज कराया।

बाद में वे सन 1926 में ‘लिंकन्स इन’ में
अध्ययन करने के लिए इंग्लैंड चले गए
और 1927 में बैरिस्टर बन गए।

—कुलपति का पद

डॉ. मुखर्जी तैंतीस वर्ष की आयु में कलकत्ता
विश्वविद्यालय में विश्व के सबसे कम आयु के
कुलपति बनाये गए थे।

इस पद को उनके पिता भी सुशोभित कर चुके थे।

1938 तक डॉ. मुखर्जी इस पद को गौरवान्वित
करते रहे।

उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान अनेक
रचनात्मक सुधार कार्य किए तथा ‘कलकत्ता
एशियाटिक सोसायटी’ में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया।

वे ‘इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ़ साइंस’,बंगलौर की
परिषद एवं कोर्ट के सदस्य और इंटर-यूनिवर्सिटी
ऑफ़ बोर्ड के चेयरमैन भी रहे।

—राजनीति में प्रवेश

कलकत्ता विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करते
हुए श्यामा प्रसाद मुखर्जी कांग्रेस उम्मीदवार के
रूप में बंगाल विधान परिषद के सदस्य चुने गए
थे,किंतु उन्होंने अगले वर्ष इस पद से उस समय
त्यागपत्र दे दिया,जब कांग्रेस ने विधान मंडल का
बहिष्कार कर दिया।

बाद में उन्होंने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा और
निर्वाचित हुए।

वर्ष 1937-1941 में ‘कृषक प्रजा पार्टी’ और
मुस्लिम लीग का गठबन्धन सत्ता में आया।

इस समय डॉ. मुखर्जी विरोधी पक्ष के नेता
बन गए।
वे फज़लुल हक़ के नेतृत्व में प्रगतिशील गठबन्धन
मंत्रालय में वित्तमंत्री के रूप में शामिल हुए,लेकिन
उन्होंने एक वर्ष से कम समय में ही इस पद से
त्यागपत्र दे दिया।

वे हिन्दुओं के प्रवक्ता के रूप में उभरे और शीघ्र
ही ‘हिन्दू महासभा’ में शामिल हो गए।

सन 1944 में वे इसके अध्यक्ष नियुक्त किये गए थे।

—हिन्दू महासभा का नेतृत्व

राष्ट्रीय एकात्मता एवं अखण्डता के प्रति आगाध
श्रद्धा ने ही डॉ. मुखर्जी को राजनीति के समर में
झोंक दिया।

अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो व राज करो’ की नीति
ने ‘मुस्लिम लीग’ को स्थापित किया था।

डॉ. मुखर्जी ने ‘हिन्दू महासभा’ का नेतृत्व ग्रहण
कर इस नीति को ललकारा।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उनके हिन्दू महासभा
में शामिल होने का स्वागत किया था,क्योंकि उनका
मत था कि हिन्दू महासभा में मदन मोहन मालवीय
जी के बाद किसी योग्य व्यक्ति के मार्गदर्शन की
जरूरत थी।

कांग्रेस यदि उनकी सलाह को मानती तो हिन्दू
महासभा कांग्रेस की ताकत बनती तथा मुस्लिम
लीग की भारत विभाजन की मनोकामना पूर्ण
नहीं होती।

—भारतीय जनसंघ की स्थापना

महात्मा गांधी की हत्या के बाद डॉ. मुखर्जी चाहते
थे कि हिन्दू महासभा को केवल हिन्दुओं तक ही
सीमित न रखा जाए अथवा यह जनता की सेवा
के लिए एक गैर-राजनीतिक निकाय के रूप में
ही कार्य न करे।

वे 23 नवम्बर,1948 को इस मुद्दे पर इससे
अलग हो गए।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अंतरिम सरकार
में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में सम्मिलित
किया था।

डॉ. मुखर्जी ने लियाकत अली ख़ान के साथ दिल्ली
समझौते के मुद्दे पर 6 अप्रैल,1950 को मंत्रिमंडल
से त्यागपत्र दे दिया।

मुखर्जी जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघचालक गुरू गोलवलकर जी से परामर्श करने के बाद 21
अक्तूबर,1951 को दिल्ली में ‘भारतीय जनसंघ’
की नींव रखी और इसके पहले अध्यक्ष बने।

सन 1952 के चुनावों में भारतीय जनसंघ ने संसद
की तीन सीटों पर विजय प्राप्त की, जिनमें से एक
सीट पर डॉ. मुखर्जी जीतकर आए।

उन्होंने संसद के भीतर ‘राष्ट्रीय जनतांत्रिक पार्टी’
बनायी,जिसमें 32 सदस्य लोक सभा तथा 10
सदस्य राज्य सभा से थे,हालांकि अध्यक्ष द्वारा
एक विपक्षी पार्टी के रूप में इसे मान्यता
नहीं मिली।

—भारत विभाजन के विरोधी

जिस समय अंग्रेज़ अधिकारियों और कांग्रेस के
बीच देश की स्वतंत्रता के प्रश्न पर वार्ताएँ चल
रही थीं और मुस्लिम लीग देश के विभाजन की
अपनी जिद पर अड़ी हुई थी,श्यामा प्रसाद मुखर्जी
ने इस विभाजन का बड़ा ही कड़ा विरोध किया।

कुछ लोगों की मान्यता है कि आधे पंजाब और
आधे बंगाल के भारत में बने रहने के पीछे डॉ.
मुखर्जी के प्रयत्नों का ही सबसे बड़ा हाथ है
अन्यथा सम्पूर्ण पंजाब बंगाल पाकिस्तान का
अंश होता।

—संकल्प

उस समय जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा और अलग
संविधान था।
वहाँ का मुख्यमंत्री भी प्रधानमंत्री कहा जाता था।

लेकिन डॉ. मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का
पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे।

इसके लिए उन्होंने जोरदार नारा भी दिया कि-
एक देश में दो निशान,एक देश में दो प्रधान,
एक देश में दो विधान नहीं चलेंगे,नहीं चलेंगे।

अगस्त,1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने
अपना संकल्प व्यक्त किया था कि
“या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा
या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन
बलिदान कर दूंगा।”

—निधन

जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने पर डॉ. मुखर्जी को
11 मई,1953 में शेख़ अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली
सरकार ने हिरासत में ले लिया,क्योंकि उन दिनों
कश्मीर में प्रवेश करने के लिए भारतीयों को एक
प्रकार से पासपोर्ट के समान एक परमिट लेना
पडता था और डॉ. मुखर्जी बिना परमिट लिए
जम्मू-कश्मीर चले गए थे,जहाँ उन्हें गिरफ्तार
कर नजरबंद कर लिया गया।

वहाँ गिरफ्तार होने के कुछ दिन बाद ही 23 जून,
1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु
हो गई।

उनकी मृत्यु का खुलासा आज तक नहीं हो सका है।

भारत की अखण्डता के लिए आज़ाद भारत में यह
पहला बलिदान था।

नेहरु और उसके सौतेले भाई शेख अब्दुल्ला ने
उनकी हत्या करवा दी,,,

उनकी हत्या का कारण था धारा ३७० का विरोध,,

इसका परिणाम यह हुआ कि शेख़ अब्दुल्ला हटा
दिये गए और अलग संविधान,अलग प्रधान एवं
अलग झण्डे का प्रावधान निरस्त हो गया।

धारा 370 के बावजूद कश्मीर आज भारत का अभिन्न अंग बना हुआ है।
इसका सर्वाधिक श्रेय डॉ. मुखर्जी को ही दिया
जाता है।

—नेतृत्व क्षमता

डॉ. मुखर्जी को देश के प्रखर नेताओं में गिना
जाता था।
संसद में ‘भारतीय जनसंघ’ एक छोटा दल
अवश्य था,किंतु उनकी नेतृत्व क्षमता में संसद
में ‘राष्ट्रीय लोकतांत्रिक दल’ का गठन हुआ था,
जिसमें गणतंत्र परिषद,अकाली दल,हिन्दू महासभा
एवं अनेक निर्दलीय सांसद शामिल थे।

जब संसद में जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय जनसंघ
को कुचलने की बात कही,तब डॉ. मुखर्जी ने कहा-

“हम देश की राजनीति से इस कुचलने वाली मनोवृत्ति को कुचल देंगे।”

डॉ. मुखर्जी की शहादत पर शोक व्यक्त करते
हुए तत्कालीन लोक सभा के अध्यक्ष श्री जी.वी.
मावलंकर ने कहा-

“वे हमारे महान देशभक्तों में से एक थे और राष्ट्र
के लिए उनकी सेवाएँ भी उतनी ही महान थीं।
जिस स्थिति में उनका निधन हुआ,वह स्थिति
बड़ी ही दुःखदायी है।
यही ईश्वर की इच्छा थी।
इसमें कोई क्या कर सकता था ?

उनकी योग्यता,उनकी निष्पक्षता,अपने कार्यभार
को कौशल्यपूर्ण निभाने की दक्षता,उनकी वाक्पटुता
और सबसे अधिक उनकी देशभक्ति एवं अपने
देशवासियों के प्रति उनके लगाव ने उन्हें हमारे
सम्मान का पात्र बना दिया।”

—विश्लेषण

डॉ. मुखर्जी भारत के लिए शहीद हुए और भारत
ने एक ऐसा व्यक्तित्व खो दिया,जो राजनीति को
एक नई दिशा प्रदान कर सकता था।

डॉ मुखर्जी इस धारणा के प्रबल समर्थक थे कि
सांस्कृतिक दृष्टि से ही सब एक हैं,इसलिए धर्म
के आधार पर किसी भी तरह के विभाजन के
वे ख़िलाफ़ थे।

उनका मानना था कि आधारभूत सत्य यह है
कि हम सब एक हैं।
हममें कोई अंतर नहीं है।
हमारी भाषा और संस्कृति एक है।
यही हमारी अमूल्य विरासत है।

उनके इन विचारों और उनकी मंशाओं को अन्य
राजनैतिक दलों के तात्कालिक नेताओं ने अन्यथा
रूप से प्रचारित-प्रसारित किया।

लेकिन इसके बावजूद लोगों के दिलों में उनके
प्रति अथाह प्यार और समर्थन बढ़ता गया।

वीर राष्ट्र पुत्र को पुण्य तिथि के अवसर पर समस्त
राष्ट्र प्रेमियों की ओर से भाव भीनी हार्दिक श्रद्धांजलि, अश्रु पूरित श्रद्धा सुमन अर्पण,

कश्मीर हमारा था,,,,
हमारा है,,,,,हमारा रहेगा,,,,,,

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,
जयति पुण्य भूमि भारत,,

सदा सर्वदा सुमंगल..
वंदेमातरम,,
जय भवानी,,
जय श्री राम

Image may contain: 1 person, close-up
Posted in Biography

संक्षिप्त जानकारी :-
🙏 23 जून/बलिदान-दिवस 🙏
*डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का बलिदान*
👉छह जुलाई, 1901 को कोलकाता में श्री आशुतोष मुखर्जी एवं योगमाया देवी के घर में जन्मे डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को दो कारणों से सदा याद किया जाता है।

 👉पहला तो यह कि वे योग्य पिता के योग्य पुत्र थे। श्री आशुतोष मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के संस्थापक उपकुलपति थे।1924 में उनके देहान्त के बाद केवल 23 वर्ष की अवस्था में ही श्यामाप्रसाद को विश्वविद्यालय की प्रबन्ध समिति में ले लिया गया। 33 वर्ष की छोटी अवस्था में ही उन्हें कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति की उस कुर्सी पर बैठने का गौरव मिला, जिसे किसी समय उनके पिता ने विभूषित किया था। चार वर्ष के अपने कार्यकाल में उन्होंने विश्वविद्यालय को चहुँमुखी प्रगति के पथ पर अग्रसर किया।
👉दूसरे जिस कारण से डा. मुखर्जी को याद किया जाता है, वह है जम्मू कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय की माँग को लेकर उनके द्वारा किया गया सत्याग्रह एवं बलिदान। 1947 में भारत की स्वतन्त्रता के बाद गृहमन्त्री सरदार पटेल के प्रयास से सभी देसी रियासतों का भारत में पूर्ण विलय हो गया; पर प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तिगत हस्तक्षेप के कारण जम्मू कश्मीर का विलय पूर्ण नहीं हो पाया। उन्होंने वहाँ के शासक राजा हरिसिंह को हटाकर शेख अब्दुल्ला को सत्ता सौंप दी। शेख जम्मू कश्मीर को स्वतन्त्र बनाये रखने या पाकिस्तान में मिलाने के षड्यन्त्र में लगा था।
👉शेख ने जम्मू कश्मीर में आने वाले हर भारतीय को अनुमति पत्र लेना अनिवार्य कर दिया। 1953 में प्रजा परिषद तथा भारतीय जनसंघ ने इसके विरोध में सत्याग्रह किया। नेहरू तथा शेख ने पूरी ताकत से इस आन्दोलन को कुचलना चाहा; पर वे विफल रहे। पूरे देश में यह नारा गूँज उठा – एक देश में दो प्रधान, दो विधान, दो निशान: नहीं चलेंगे।
👉डा. मुखर्जी जनसंघ के अध्यक्ष थे। वे सत्याग्रह करते हुए बिना अनुमति जम्मू कश्मीर में गये। इस पर शेख अब्दुल्ला ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। 20 जून को उनकी तबियत खराब होने पर उन्हें कुछ ऐसी दवाएँ दी गयीं, जिससे उनका स्वास्थ्य और बिगड़ गया। 22 जून को उन्हें अस्पताल में भरती किया गया। उनके साथ जो लोग थे, उन्हें भी साथ नहीं जाने दिया गया। रात में ही अस्पताल में ढाई बजे रहस्यमयी परिस्थिति में उनका देहान्त हुआ।

मृत्यु के बाद भी शासन ने उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया। उनके शव को वायुसेना के विमान से दिल्ली ले जाने की योजना बनी; पर दिल्ली का वातावरण गरम देखकर शासन ने विमान को अम्बाला और जालन्धर होते हुए कोलकाता भेज दिया। कोलकाता में दमदम हवाई अड्डे से रात्रि 9.30 बजे चलकर पन्द्रह कि.मी दूर उनके घर तक पहुँचने में सुबह के पाँच बज गये। 24 जून को दिन में ग्यारह बजे शुरू हुई शवयात्रा तीन बजे शमशान पहुँची। हजारों  लोगों ने उनके अन्तिम दर्शन किये।

आश्चर्य की बात तो यह है कि डा. मुखर्जी तथा उनके साथी शिक्षित तथा अनुभवी लोग थे; पर पूछने पर भी उन्हें दवाओं के बारे में नहीं बताया गया। उनकी मृत्यु जिन सन्देहास्पद स्थितियों में हुई तथा बाद में उसकी जाँच न करते हुए मामले पर लीपापोती की गयी, उससे इस आशंका की पुष्टि होती है कि यह नेहरू और शेख अब्दुल्ला द्वारा करायी गयी चिकित्सकीय हत्या थी।
👉डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने अपने बलिदान से जम्मू-कश्मीर को बचा लिया। अन्यथा शेख अब्दुल्ला उसे पाकिस्तान में मिला देता।🙏🙏
जगवीर जैन【 I.T & MEDIA 】प्रमुख, भाजपा गोहाना, 

☎- 9468152681

Posted in Biography

*See what Mr. PM Nair IAS, former Secretary to the late President of India, has to say about Dr. APJ Abdul Kalam.*
DD Podhigai telecast an interview with Mr P M Nair, retired IAS officer, who was the Secretary to Dr Kalam Sir when he was the President. I summarise the points he spoke in a voice choked with emotion. Mr Nair authored a book titled *”Kalam Effect”*
1. Dr Kalam used to receive costly gifts whenever he went abroad as it is customary for many nations to give gifts to the visiting Heads of State. Refusing the gift would become an insult to the nation and an embarrassment for India. So, he received them and on his return, Dr Kalam asked the gifts to be photographed and then catalogued and handed over to the archives. Afterwards, he never even looked at them. He did not take even a pencil from the gifts received when he left Rashtrapathi Bhavan.
2.  In 2002, the year Dr Kalam took over, the Ramadan month came in July-August. it was a regular practice for the President to host an iftar party. Dr Kalam asked Mr Nair why he should host a party to people who are already well fed and asked him to find out how much would be the cost. Mr Nair told it would cost around Rs. 22 lakhs. Dr Kalam asked him to donate that amount to a few selected orphanages in the form of food, dresses and blankets. The selection of orphanages was left to a team in Rashtrapathi Bhavan and Dr Kalam had no role in it. After the selection was made, Dr Kalam asked Mr Nair to come inside his room and gave him a cheque for Rs 1 lakh. He said that he was giving some amount from his personal savings and this should not be informed to anyone. Mr Nair was so shocked that he said “Sir, I will go outside and tell everyone . People should know that here is a man who not only donated what he should have spent but he is giving his own money also”. Dr Kalam though he was a devout Muslim did not have Iftar parties in the years in which he was the President. 
3. Dr Kalam did not like “Yes Sir” type of people. Once when the Chief Justice of India had come and on some point Dr Kalam expressed his view and asked Mr Nair, “Do you agree?” Mr Nair said “No Sir, I do not agree with you”. 
The Chief Justice was shocked and could not believe his ears. It was impossible for a civil servant to disagree with the President and that too so openly. Mr Nair told him that the President would question him afterwards why he disagreed and if the reason was logical 99% he would change his mind.
4. Dr Kalam invited 50 of his relatives to come to Delhi and they all stayed in Rashtrapathi Bhavan. He organised a bus for them to go around the city which was paid for by him. No official car was used. All their stay and food was calculated as per the instructions of Dr Kalam and the bill came to Rs 2 lakhs which he paid. In the history of this country no one has done it. 
Now, wait for the climax, Dr Kalam’s elder brother stayed with him in his room for the entire one week as Dr Kalam wanted his brother to stay with him. When they left, Dr Kalam wanted to pay rent for that room also. Imagine the President of a country paying rent for the room in which he is staying. This was any way not agreed to by the staff who thought the honesty was getting too much to handle!!!.
5.  When Kalam Sir was to leave Rashtrapathi Bhavan at the end of his tenure, every staff member went and met him and paid their respects. Mr Nair went to him alone as his wife had fractured her leg and was confined to bed. Dr Kalam asked why his wife did not come. He replied that she was in bed due to an accident. Next day, Mr.Nair saw lot of policemen around his house and asked what had happened. They said that the President of India was coming to visit him in his house. He came and met his wife and chatted for some time. Mr Nair says that no president of any country would visit a civil servant’s house and that too on such a simple pretext.
I thought I should give the details as many of you may not have seen the telecast and so it may be useful.
The younger brother of AJP Abdul Kalam runs an umbrella repairing shop. When Mr. Nair met him during Kalam’s funeral,  he touched his feet, in token of respect for both Mr. Nair and Brother.
Such information should be widely shared on social media as mainstream media will not show this because it doesn’t carry the so-called TRP value.
*Do forward it to whomever you know and Let the world know it*.Salute to this greatest President of India.🙏👍👍👍👌👌👌🙏🌹💐

Posted in Biography

पूर्ण आस्तिक भगत सिंह एतिहासिक तथ्य

पूर्ण आस्तिक भगत सिंह एतिहासिक तथ्य
===============================
भगत सिंह की फांसी के बाद भारत के लोगों के लिए भगत सिंह हीरो बन गए थे जगह जगह उनके नाम के साथ लोग अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हो रहे थे और अंग्रेजी सत्ता हिलने लगी थी तब अंग्रेजों ने इस ज्वाला को रोकने के लिए एक षणयंत्र रचा ,उन्होंने भगत सिंह के नाम का झूठा निबंध एक अंग्रेजी पत्रिका The People में 27 सितंबर 1931 को “Why I am an Atheist” ( मैं नास्तिक क्यों हूँ ) छपा ये निबंध उनकी फांसी के लगभग छः माह बाद छापा गया इस निबंध में एक बात विशेष थी कि ये अंग्रेजों का लिखा हुआ और अंग्रेजी पत्रिका The People में ही छापा गया था जिसमें ईश्वर की आस्था को नकारने के साथ ईश्वर के अस्तित्व पर कई प्रश्न खड़े किये गए थे जिससे सामान्य हिन्दू और सिखों में भगत के प्रति नफ़रत भर जाए और भगत सिंह को अपना हीरो मानना बंद कर दें और इतिहास साक्षी है कि इस लेख के बाद ही भगत सिंह की चर्चा कम होती गयी और जो आन्दोलन अंगेजों के विरुद्ध खडा हो रहा था वह बंद हो गया अंग्रेजों ने अपनी बात को सही सिद्ध करने के लिए भगत सिंह को वामपंथ ,साम्यवाद और समाजवाद से भी जोड़ दिया तथा अन्य कई जगह भी इसी प्रयोग को दोहराया. The People में छपने वाले इस लेख को भगत सिंह ने कब लिखा और ये किसको दिया इस बात का कोई प्रमाण नहीं है,इसी तरह चंद्रशेखर को भी समाजवाद,वामपंथ और नास्तिकवाद से जोड़ते हैं जबकि वे कट्टर धार्मिक व्यक्ति थे उन्होंने जीवन भर जनेऊ का त्याग नहीं किया जो उनके वास्तविक चित्र में भी देखा जा सकता है जबकि NCERT में छपे एक चित्र में उनके जनेऊ को ही हटा दिया गया था क्योंकि वामपंथियों को भगत सिंह और चंद्रशेखर को वामपंथी और नास्तिक घोषित करना है और हम आँखें बंद करके उनके द्वारा प्रचारित झूठ को स्वीकार कर लेते हैं
भगत सिंह पूर्ण आस्तिक और वैदिक थे तथा आर्य समाज को अपना गुरु मानते थे,सत्यार्थ प्रकाश उनकी प्रिय पुस्तक थी
जय श्रीराम
विवेकानंद आर्य

Posted in Biography

रामप्रसाद बिस्मिल

मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर देने वाले वीरों में पंडित रामप्रसाद बिस्मिल का एक विशिष्ट स्थान है। जीवन के समस्त सुखों को त्यागकर महानतम उद्देश्य के लिए क्रांति पथ का वरण करनेवाली ऐसी विभूतियां कम ही जन्म लेती हैं। बिस्मिल सदृश क्रांतिकारी वीरों के बलिदान का भी इस देश को स्वतन्त्रता दिलाने में विशेष योगदान है।
यद्यपि आज क्रांतिकारियों के बलिदान को हम विस्तृत-सा कर बैठे हैं, तथापि इससे उनके त्याग का महत्त्व किसी प्रकार कम नहीं होता। स्वतंत्र भारत का प्रत्येक व्यक्ति, इस देश की मिट्टी का कण-कण सदा-सदा के लिए पंडित रामप्रसाद बिस्मिल तथा उनके साथी क्रांतिकारियों का ऋणी रहेगा।
स्वतंत्रता संग्राम क्रांतिकारियों का संदर्भ आते ही, जो वीर हमारी स्मृति में कौंध जाते हैं, उनमें रामप्रसाद बिस्मिल का नाम अग्रणी है। मध्य प्रदेश ग्वालियर के माता-पिता की संतान के रूप में बिस्मिल मैनपुरी उत्तर प्रदेश में जन्मे जो संभवत: उनकी ननिहाल था, वह पिता के कठोर अनुशासन में पले बढ़े और उन्होंने अनेकों विद्वानों और साधुजन की संगति पाई, लेकिन अंग्रेज सरकार के प्रति विद्रोह की आग जो उनके सीने में एक बार बैठी, वह दिनों दिन धधकती चली गई। इस आग ने उनके देश प्रेम से ओत-प्रोत कवि को जगाया और उत्तरोत्तर देश के अतिरिक्त शेष सब प्रसंगों से विरक्त होते चले गए। यहां तक कि उनके उद्वेग ने उनके प्राणों के प्रति मोह को भी पीछे छोड़ दिया।
 यह सब जानते हैं कि उन्होंने हंसते हुए फांसी का फंदा गले में यह कहते हुए डाल लिया कि अंग्रेज साम्राज्य का विनाश उनकी अंतिम इच्छा है, लेकिन उनका पूरा जीवन वृत्तांत भी सब जानें और विस्मृत न हो, यह भी बहुत जरूरी है क्योंकि देश हर एक युग में रामप्रसाद बिस्मिल मांग सकता है।

विश्वास है यह पुस्तक उस आग को जिलाए रखने में भरपूर समर्थ होगी। 

रामप्रसाद बिस्मिल पारिवारिक पृष्ठभूमि व प्रारम्भिक जीवन वर्तमान मध्य प्रदेश में अंग्रेजों के शासन में एक देशी रियासत थी, ‘ग्वालियर’। यहीं चम्बल नदी के तट पर दो गांव हैं। इन दोनों गांवों के निवासी उस समय बड़े ही उद्दंड स्वभाव के थे। यहां के लोगों पर राज्य के कानूनों का कोई प्रभाव नहीं था। जमींदार लोग जब चाहें, अपनी इच्छा से भूमिकर देते थे, जब इच्छा नहीं होती, नहीं देते थे। इस संबंध में जब कभी कोई राज्य का अधिकारी इन गांवों में पहुंचता, तो जमींदार लोग अपनी समस्त सम्पत्ति को लेकर अपने पशुओं आदि के साथ चम्बल के बीहड़ों में निकल जाते। राज्य के कानूनों एवं आदेशों की खुलेआम अवहेलना करना इनके लिए एक सामान्य बात थी। इनके इस प्रकार के व्यवहार पर भी यदा-कदा तत्त्कालीन शासन ने इन पर अपनी उदारता दिखाई थी। इसे उदारता कहा जाए अथवा सनक कि इसी व्यवहार के कारण एक जमींदार को भूमिकर से मुक्ति मिल गई थी। इस घटना का वर्णन करते हुए पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-
‘‘एक जमींदार के संबंध में एक कथा प्रचलित है कि मालगुजारी न देने के कारण ही उनको कुछ भूमि माफी में मिल गई। पहले तो कई साल तक भागे रहे। एक बार धोखे से पकड़ लिए गए तो तहसील के अधिकारियों ने उन्हें खूब सताया। कई दिन तक बिना खाना पानी बंधा रहने दिया। अन्त में जलाने की धमकी दे पैरों पर सूखी घास डालकर आग लगवा दी। किन्तु उन जमींदार महोदय ने भूमिकर देना स्वीकार नहीं किया और यही उत्तर दिया कि ग्वालियर महाराज के कोष में मेरे कर न देने से घाटा न पड़ जाएगा। संसार क्या जानेगा कि अमुक व्यक्ति उद्दण्डता के कारण ही अपना समय व्यतीत करता है। राज्य को लिखा गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि उतनी भूमि उन महोदय को माफी में दे दी गई।’’
इस प्रकार की उद्दण्डता करना यहां के निवासी अपने लिए बड़े गौरव की बात समझते थे। एक बार इन लोगों ने राज्य के ऊंटों की चोरी की और इस पर भी राजकोप से बच गए। इस घटना का वर्णन शहीद बिस्मिल ने निम्नलिखित शब्दों में किया है-
‘‘…….एक समय इन ग्रामों के निवासियों को एक अद्भुत खेल सूझा। उन्होंने महाराज के रिसाले के साठ ऊंट चुराकर बीहड़ों में छिपा दिए। राज्य को लिखा गया, जिस पर राज्य की ओर से आज्ञा हुई कि दोनों ग्राम तोप लगाकर उड़वा दिए जाएं। न जाने किस प्रकार समझाने-बुझाने से ऊंट वापस कर दिए गए और अधिकारियों को समझाया गया कि इतने बड़े राज्य में थोड़े से वीर लोगों का निवास है, इनका विध्वंस न करना ही उचित होगा। तब तोपें लौटाई गईं और ग्राम उड़ाए जाने से बचे।’’
देसी रियासतें आन्तरिक प्रशासन के लिए उसके शासन के अधीन थीं। इस रियासत के निवासी लूट-पाट आदि की घटनाएं प्राय: अपनी रियासत में नहीं करते थे। इस प्रकार की घटनाओं के लिए इन लोगों का कार्यक्षेत्र समीप का अंग्रेजी राज्य होता था। ये लोग अंग्रेजी राज्य के समीपवर्ती क्षेत्र के धनवान लोगों के घरों में डकैतियां डाल रातों-रात चम्बल के बीहड़ों में जा छिपते और इस प्रकार पुलिस इनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाती। ये दोनों गाँव अंग्रेजी राज्य की सीमा से प्राय: पन्द्रह मील की दूरी पर हैं। यहीं एक गाँव में पण्डित श्री नारायण लाल रहते थे। पण्डितजी की पारिवारिक परिस्थिति अत्यन्त सामान्य स्तर की थी। घर में उनकी भाभी का एकाधिकार चलता था, जो एक स्वार्थी प्रवृत्ति की महिला थी। पण्डित नारायण लाल के लिए धीरे-धीरे भाभी का दुर्व्यवहार असहनीय हो गया। इसलिए उन्होंने घर छोड़ देने का निर्णय लिया और अपनी धर्मपत्नी तथा दो अबोध पुत्रों को साथ लेकर घर से निकल पड़े। इस समय उनके बड़े पुत्र मुरलीधर की अवस्था आठ वर्ष तथा छोटे पुत्र कल्याणमल की केवल छ: वर्ष थी। 
घर छोड़ने के बाद पण्डित नारायण लाल कई दिनों तक अजीविका की तलाश में इधर-उधर भटकते रहे। तथा अन्त में शाहजहांपुर में उत्तर प्रदेश में पहुँचे और यहीं अहरिया नामक गांव में रहने लगे। इस समय देश में भयंकर आकाल पड़ रहा था। अत्याधिक प्रयत्न करने पर शाहजहांपुर में एक अतार महोदय के यहां पण्डित नारायण लाल को एक मामूली सी नौकरी मिली, जिसमें नाममात्र के लिए तीन रुपए प्रतिमास वेतन मिलता था। भयंकर अकाल में परिवार के चार प्राणियों का भरण-पोषण कर पाना अत्यधिक कठिन कार्य था। दादीजी एक समय, वह भी केवल आधा पेट भोजन करतीं, तब भी परिवार का निर्वाह न हो पाता ! अत्यधिक निर्धनता एवं कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। इसका उल्लेख करते हुए पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल ने लिखा है- 
‘‘दादीजी ने बहुत प्रयत्न किया कि अपने आप केवल एक समय आधे पेट भोजन करके बच्चों का पेट पाला जाए, किन्तु फिर भी निर्वाह न हो सका। बाजरा, कुकनी, सामा, ज्वार इत्यादि खाकर दिन काटने चाहे, किन्तु फिर भी गुजारा न हुआ। तब आधा बथुआ, चना या कोई दूसरा साग, जो सबसे सस्ता हो उसे लेकर, सबसे सस्ता अनाज उसमें आधा मिलाकर थोड़ा सा नमक डालकर उसे स्वयं खाती, लड़को को चना या जौ की रोटी देती और इस तरह दादाजी भी समय व्यतीत करते थे। बड़ी कठिनता से आधा पेट खाकर दिन तो कट जाता, किन्तु पेट में घोटूं दबाकर रात काटना कठिन हो जाता।’’
भोजन के साथ ही वस्त्र एवं रहने के लिए मकान की समस्या भी विकट थी। अत: दादीजी ने कुछ घरों में कुटाई-पिसाई का काम करने का विचार किया, परन्तु इस अकाल के समय में यह काम मिलना भी सरल नहीं था। बड़ी ही कठिनाई के साथ कुछ घरों में इस तरह का काम मिल पाया, परन्तु इसे भी उन्हीं लोगों के घर में करना पड़ता था, जो लोग काम देते थे। यह काम भी बहुत ही कम मिल पाता था-मुश्किल से दिन में पाँच-छ: सेर जिसका पारिश्रमिक उन दिनों एक पैसा प्रति पसेरी मिलता था। अपनी पारिवारिक विवशताओं के कारण उन्हें उन्हीं एक डेढ़ पैसों के लिए तीन-चार घण्टे काम करना पड़ता था। इसके बाद ही घर आकर बच्चों के भोजन की व्यवस्था करनी पड़ती। फिर भी दादीजी संतोष और धैर्य के साथ विपत्ति का सामना करतीं। वह बड़ी ही साहसी महिला थीं। पण्डित नारायण लाल कभी-कभी पत्नी एवं बच्चों के कष्टों को देखकर दु:खी हो जाते और अपनी पत्नी से पुन: अपने मूल निवास स्थान ग्वालियर चल पड़ने को कहते, किन्तु दादी बड़ी स्वाभिमानी महिला थीं। ऐसे अवसरों पर वे अपने पति का साहस बढ़ाती और कहतीं कि जिन लोगों के कारण घर छोड़ना पड़ा, फिर उन्हीं की शरण में जाना एक स्वाभिमानी व्यक्ति को शोभा नहीं देता। स्वाभिमान की रक्षा करते हुए प्राणों का परित्याग कर देना अच्छा है; किन्तु स्वाभिमान का परित्याग मृत्यु से भी बढ़कर है। दु:ख-सुख सदा लगे रहते हैं। दु:ख के बाद सुख भी प्राप्त होता है। ये दिन भी सदा नहीं रहेंगे। अत: दादीजी फिर कभी लौटकर ग्वालियर राज्य नहीं गईं। 
धीरे-धीरे चार-पांच वर्ष बीत गए। पण्डित नारायण लाल का कुछ स्थानीय लोगों से परिचय भी बढ़ गया। अकाल भी बीत गया। पण्डित जी के परिवार पर लोगों का विश्वास एवं स्नेह भी बढ़ गया। ब्राह्मण होने के कारण लोग भी सम्मान भी देने लगे। दादीजी को कभी-कभी कुछ लोग अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित करने लगे। पहले की तुलना में काम भी अधिक मिलने लगा। कभी कुछ दान दक्षिणा भी मिल जाती। इस प्रकार धीरे-धीरे कठिनाइयां कुछ कम होने लगीं।

पण्डित नारायण लाल भी ब्राह्मणवृत्ति करने लगे। कठिन परिश्रम से घर की स्थिति में कुछ सुधार हुआ। धीरे-धीरे बच्चे भी बड़े हो गए थे। बढ़ा पुत्र पाठशाला में पढ़ने जाने लगा। पण्डितजी के कठिन परिश्रम से अब उनका वेतन भी बढ़कर सात रूपए प्रतिमाह हो गया था। परिवार की स्थिति को सुधारने में दादीजी के परिश्रम की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। ऐसे दुर्दिनों में उन्होंने जिस साहस का परिचय दिया, एक सामान्य ग्रामीण महिला से ऐसी अपेक्षा प्राय: कम ही की जाती है।
सरफ़रोशी की तमन्ना (गीत)

रामप्रसाद ‘बिस्मिल’
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है ज़ोर कितना बाजुए-क़ातिल में है
है लिए हथियार दुश्मन ताक़ में बैठा उधर

और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर

ख़ून से खेलेंगे होली ग़र वतन मुश्क़िल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हाथ जिनमें हो जुनूं कटते नहीं तलवार से

सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से

और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पर क़फ़न

जां हथेली में लिए लो बढ़ चले हैं ये क़दम

ज़िन्दगी तो अपनी मेहमां मौत की महफ़िल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्क़लाब

होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज

दूर रह पाए जो हमसे, दम कहाँ मन्ज़िल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
रामप्रसाद ‘बिस्मिल’
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है ज़ोर कितना बाजुए-क़ातिल में है
क्यों नहीं करता कोई भी दूसरा कुछ बातचीत

देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तिरी महफ़िल में है
ऐ शहीदे-मुल्क़ो-मिल्लत मैं तिरे ऊपर निसार

अब तिरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है
वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां

हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है
खींच कर लाई है सबको क़त्ल होने की उमीद

आशिक़ों का आज जमघट कूँचा-ए-क़ातिल में है
यूँ खड़ा मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार

क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है
अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़

एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है….!.

नीरज आर्य अँधेड़ी

Posted in Biography

तमिलनाडु की रानी वेलु नचियार की पहली शासक थी जिसने अँग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की और अपनी स्वतंत्रता को बचाने में सफल रहीं। अंग्रेजी सेना के हथियार और बारूद को नष्ट करने के लिये उन्होंने विश्व के पहले मानव बम का प्रयोग भी किया था, जब उनका एक विश्वासपात्र सेवक स्वयं को तेल में डुबोकर आग लगाकर अँग्रेजों के अस्त्र और बारूद के जखीरे में कूद गया था। उन्होंने एक महिला सैन्य दल भी बनाया जिसका नाम “उडैयाल” था…

Posted in Biography

पूज्य महंत योगी आदित्यनाथ जी महाराज

पूज्य महंत योगी आदित्यनाथ जी महाराज

(मुख्य मंत्री (उत्तर प्रदेश),गोरक्षपीठाधीश्वर, गोरक्षपीठ, लोक सभा सदस्य गोरखपुर, उत्तर प्रदेश)

http://www.yogiadityanath.in/About.aspx

जब सम्पूर्ण पूर्वी उत्तर प्रदेश जेहाद, धर्मान्तरण, नक्सली व माओवादी हिंसा, भ्रष्टाचार तथा अपराध की अराजकता में जकड़ा था उसी समय नाथपंथ के विश्व प्रसिद्ध मठ श्री गोरक्षनाथ मंदिर गोरखपुर के पावन परिसर में शिव गोरक्ष महायोगी गोरखनाथ जी के अनुग्रह स्वरूप माघ शुक्ल 5 संवत् 2050 तदनुसार 15 फरवरी सन् 1994 की शुभ तिथि पर गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने अपने उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ जी का दीक्षाभिषेक सम्पन्न किया।

योगीजी का जन्म देवाधिदेव भगवान् महादेव की उपत्यका में स्थित देव-भूमि उत्तराखण्ड में 5 जून सन् 1972 को हुआ। शिव अंश की उपस्थिति ने छात्ररूपी योगी जी को शिक्षा के साथ-साथ सनातन हिन्दू धर्म की विकृतियों एवं उस पर हो रहे प्रहार से व्यथित कर दिया। प्रारब्ध की प्राप्ति से प्रेरित होकर आपने 22 वर्ष की अवस्था में सांसारिक जीवन त्यागकर संन्यास ग्रहण कर लिया। आपने विज्ञान वर्ग से स्नातक तक शिक्षा ग्रहण की तथा छात्र जीवन में विभिन्न राष्ट्रवादी आन्दोलनों से जुड़े रहे।

आपने संन्यासियों के प्रचलित मिथक को तोड़ा। धर्मस्थल में बैठकर आराध्य की उपासना करने के स्थान पर आराध्य के द्वारा प्रतिस्थापित सत्य एवं उनकी सन्तानों के उत्थान हेतु एक योगी की भाँति गाँव-गाँव और गली-गली निकल पड़े। सत्य के आग्रह पर देखते ही देखते शिव के उपासक की सेना चलती रही और शिव भक्तों की एक लम्बी कतार आपके साथ जुड़ती चली गयी। इस अभियान ने एक आन्दोलन का स्वरूप ग्रहण किया और हिन्दू पुनर्जागरण का इतिहास सृजित हुआ।

अपनी पीठ की परम्परा के अनुसार आपने पूर्वी उत्तर प्रदेश में व्यापक जनजागरण का अभियान चलाया। सहभोज के माध्यम से छुआछूत और अस्पृश्यता की भेदभावकारी रूढ़ियों पर जमकर प्रहार किया। वृहद् हिन्दू समाज को संगठित कर राष्ट्रवादी शक्ति के माध्यम से हजारों मतान्तरित हिन्दुओं की ससम्मान घर वापसी का कार्य किया। गोरक्षा के लिए आम जनमानस को जागरूक करके गोवंशों का संरक्षण एवं सम्वर्धन करवाया। पूर्वी उत्तर प्रदेश में सक्रिय समाज विरोधी एवं राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर भी प्रभावी अंकुश लगाने में आपने सफलता प्राप्त की। आपके हिन्दू पुनर्जागरण अभियान से प्रभावित होकर गाँव, देहात, शहर एवं अट्टालिकाओं में बैठे युवाओं ने इस अभियान में स्वयं को पूर्णतया समर्पित कर दिया। बहुआयामी प्रतिभा के धनी योगी जी, धर्म के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से राष्ट्र की सेवा में रत हो गये।

अपने पूज्य गुरुदेव के आदेश एवं गोरखपुर संसदीय क्षेत्र की जनता की मांग पर आपने वर्ष 1998 में लोकसभा चुनाव लड़ा और मात्र 26 वर्ष की आयु में भारतीय संसद के सबसे युवा सांसद बने। जनता के बीच दैनिक उपस्थिति, संसदीय क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले लगभग 1500 ग्रामसभाओं में प्रतिवर्ष भ्रमण तथा हिन्दुत्व और विकास के कार्यक्रमों के कारण गोरखपुर संसदीय क्षेत्र की जनता ने आपको वर्ष 1999, 2004 और 2009 के चुनाव में निरन्तर बढ़ते हुए मतों के अन्तर से विजयी बनाकर चार बार लोकसभा का सदस्य बनाया।

संसद में सक्रिय उपस्थिति एवं संसदीय कार्य में रुचि लेने के कारण आपको केन्द्र सरकार ने खाद्य एवं प्रसंस्करण उद्योग और वितरण मंत्रालय, चीनी और खाद्य तेल वितरण, ग्रामीण विकास मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी, सड़क परिवहन, पोत, नागरिक विमानन, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालयों के स्थायी समिति के सदस्य तथा गृह मंत्रालय की सलाहकार समिति, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और अलीगढ़ विश्वविद्यालय की समितियों में सदस्य के रूप में समय-समय पर नामित किया।

व्यवहार कुशलता, दृढ़ता और कर्मठता से उपजी आपकी प्रबन्धन शैली शोध का विषय है। इसी अलौकिक प्रबन्धकीय शैली के कारण आप लगभग 36 शैक्षणिक एवं चिकित्सकीय संस्थाओं के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मंत्री, प्रबन्धक या संयुक्त सचिव हैं।

हिन्दुत्व के प्रति अगाध प्रेम तथा मन, वचन और कर्म से हिन्दुत्व के प्रहरी योगीजी को विश्व हिन्दु महासंघ जैसी हिन्दुओं की अन्तर्राष्ट्रीय संस्था ने अन्तर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तथा भारत इकाई के अध्यक्ष का महत्त्वपूर्ण दायित्व दिया, जिसका सफलतापूर्वक निर्वहन करते हुए आपने वर्ष 1997, 2003, 2006 में गोरखपुर में और 2008 में तुलसीपुर (बलरामपुर) में विश्व हिन्दु महासंघ के अन्तर्राष्ट्रीय अधिवेशन को सम्पन्न कराया। सम्प्रति आपके प्रभामण्डल से सम्पूर्ण विश्व परिचित हुआ।

आपकी बहुमुखी प्रतिभा का एक आयाम लेखक का है। अपने दैनिक वृत्त पर विज्ञप्ति लिखने जैसे श्रमसाध्य कार्य के साथ-साथ आप समय-समय पर अपने विचार को स्तम्भ के रूप में समाचार-पत्रों में भेजते रहते हैं। अत्यल्प अवधि में ही ‘यौगिक षटकर्म’, ‘हठयोग: स्वरूप एवं साधना’, ‘राजयोग: स्वरूप एवं साधना’ तथा ‘हिन्दू राष्ट्र नेपाल’ नामक पुस्तकें लिखीं। श्री गोरखनाथ मन्दिर से प्रकाशित होने वाली वार्षिक पुस्तक ‘योगवाणी’ के आप प्रधान सम्पादक हैं तथा ‘हिन्दवी’ साप्ताहिक समाचार पत्र के प्रधान सम्पादक रहे। आपका कुशल नेतृत्व युगान्तकारी है और एक नया इतिहास रच रहा है।

व्यक्तित्व के विभिन्न आयाम


भगवामय बेदाग जीवन- योगी आदित्यनाथ जी महाराज एक खुली किताब हैं जिसे कोई भी कभी भी पढ़ सकता है। उनका जीवन एक योगी का जीवन है, सन्त का जीवन है। पीड़ित, गरीब, असहाय के प्रति करुणा, किसी के भी प्रति अन्याय एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध तनकर खड़ा हो जाने का निर्भीक मन, विचारधारा एवं सिद्धान्त के प्रति अटल, लाभ-हानि, मान-सम्मान की चिन्ता किये बगैर साहस के साथ किसी भी सीमा तक जाकर धर्म एवं संस्कृति की रक्षा का प्रयास उनकी पहचान है।

 

पीड़ित मानवता को समर्पित जीवन – वैभवपूर्ण ऐश्वर्य का त्यागकर कंटकाकीर्ण पगडंडियों का मार्ग उन्होंने स्वीकार किया है। उनके जीवन का उद्देश्य है – ‘न त्वं कामये राज्यं, न स्वर्ग ना पुनर्भवम्। कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामर्तिनाशनम्।। अर्थात् ‘‘हे प्रभो! मैं लोक जीवन में राजपाट पाने की कामना नहीं करता हूँ। मैं लोकोत्तर जीवन में स्वर्ग और मोक्ष पाने की भी कामना नहीं करता। मैं अपने लिये इन तमाम सुखों के बदले केवल प्राणिमात्र के कष्टों का निवारण ही चाहता हूँ।’’ पूज्य योगी आदित्यनाथ जी महाराज को निकट से जानने वाला हर कोई यह जानता है कि वे उपर्युक्त अवधारणा को साक्षात् जीते हैं। वरना जहाँ सुबह से शाम तक हजारों सिर उनके चरणों में झुकते हों, जहाँ भौतिक सुख और वैभव के सभी साधन एक इशारे पर उपलब्ध हो जायं, जहाँ मोक्ष प्राप्त करने के सभी साधन एवं साधना उपलब्ध हों, ऐसे जीवन का प्रशस्त मार्ग तजकर मान-सम्मान की चिंता किये बगैर, यदा-कदा अपमान का हलाहल पीते हुए इस कंटकाकीर्ण मार्ग का वे अनुसरण क्यों करते?

 

सामाजिक समरसता के अग्रदूत- ‘जाति-पाँति पूछे नहिं कोई-हरि को भजै सो हरि का होई’ गोरक्षपीठ का मंत्र रहा है। गोरक्षनाथ ने भारत की जातिवादी-रूढ़िवादिता के विरुद्ध जो उद्घोष किया, उसे इस पीठ ने अनवरत जारी रखा। गोरक्षपीठाधीश्वर परमपूज्य महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज के पद-चिह्नों पर चलते हुए पूज्य योगी आदित्यनाथ जी महाराज ने भी हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों, जातिवाद, क्षेत्रवाद, नारी-पुरुष, अमीर-गरीब आदि विषमताओं, भेदभाव एवं छुआछूत पर कठोर प्रहार करते हुए, इसके विरुद्ध अनवरत अभियान जारी रखा है। गाँव-गाँव में सहभोज के माध्यम से ‘एक साथ बैठें-एक साथ खाएँं’ मंत्र का उन्होंने उद्घोष किया।

 

भ्रष्टाचार-आतंकवाद-अपराध विरोधी संघर्ष के नायक – योगी जी के भ्रष्टाचार-विरोधी तेवर के हम सभी साक्षी हैं। अस्सी के दशक में गुटीय संघर्ष एवं अपराधियों की शरणगाह होने की गोरखपुर की छवि योगी जी के कारण बदली है। अपराधियों के विरुद्ध आम जनता एवं व्यापारियों के साथ खड़ा होने के कारण आज पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपराधियों के मनोबल टूटे हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में योगी जी के संघर्षों का ही प्रभाव है कि माओवादी-जेहादी आतंकवादी इस क्षेत्र में अपने पॉव नही पसार पाए। नेपाल सीमा पर राष्ट्र विरोधी शक्तियों की प्रतिरोधक शक्ति के रुप में हिन्दु युवा वाहिनी सफल रही है।

 

शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा के पुजारी- सेवा के क्षेत्र में शिक्षा एवं स्वास्थ्य क्षेत्र को प्राथमिकता दिये जाने के गोरक्षपीठ द्वारा जारी अभियान को पूज्य योगी आदित्यनाथ जी महाराज ने भी और सशक्त ढंग से आगे बढ़ाया है। योगी जी के नेतृत्व में महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् द्वारा आज तीन दर्जन से अधिक शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थाएँ गोरखपुर एवं महाराजगंज जनपद में कुष्ठरोगियों एवं वनटांगियों के बच्चों की निःशुल्क शिक्षा से लेकर बी0एड0 एवं पालिटेक्निक जैसे रोजगारपरक सस्ती एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने का भगीरथ प्रयास जारी है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में गुरु श्री गोरक्षनाथ चिकित्सालय ने अमीर-गरीब सभी के लिये एक समान उच्च कोटि की स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध करायी है। निःशुल्क स्वास्थ्य शिविरों ने जनता के घर तक स्वास्थ्य सुविधाएँ पहुचायी हैं।

 

विकास के पथ पर अनवरत गतिशील – योगी आदित्यनाथ जी महाराज के व्यक्तित्व में सन्त और जननेता के गुणों का अद्भुत समन्वय है। ऐसा व्यक्तित्व विरला ही होता है। यही कारण है कि एक तरफ जहॉ वे धर्म-संस्कृति के रक्षक के रूप में दिखते हैं तो दूसरी तरफ वे जनसमस्याओं के समाधान हेतु अनवरत संघर्ष करते रहते है; सड़क, बिजली, पानी, खेती आवास, दवाई और पढ़ाई आदि की समस्याओं से प्रतिदिन जुझती जनता के दर्द को सड़क से संसद तक योगी जी संघर्षमय स्वर प्रदान करते रहे हैं। इसी का परिणाम है कि केन्द्र और प्रदेश में विपक्षी पार्टियों की सरकार होने के बावजूद गोरखपुर विकास के पथ पर अनवरत गतिमान है।