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संजय गुप्ता

अपने जबरदस्त भाषणों से अटल बिहारी वाजपेयी ने सबको हिला दिया था..
अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के रूप में तीन बार देश का नेतृत्व किया है। इस दौरान उन्होंने अपने भाषणों से सबको हिलाकर रख दिया। वे पहली बार साल 1996 में 16 मई से 1 जून तक, 19 मार्च 1998 से 26 अप्रैल 1999 तक और फिर 13 अक्टूबर 1999 से 22 मई 2004 तक देश के प्रधानमंत्री रहे हैं। एक बार अटल बिहारी वाजपेयी पर विरोधी पार्टियों ने आरोप लगाया था कि उनको सत्ता का लोभ है।
इस पर अटल जी ने लोकसभा में खुलकर बात की और अपने भाषण से सभी को हिलाकर रख दिया था। उन्होंने न सिर्फ विरोधियों को जवाब दिया, बल्कि भगवान राम का दिया हुआ श्लोक पढ़ते हुए कहा था- भगवान राम ने कहा था कि ‘मैं मरने से नहीं डरता, डरता हूं तो सिर्फ बदनामी से डरता हूं.’ जिसके बाद विरोधियों ने कभी उन पर ऐसा आरोप नहीं लगाया। उन्होंने ये भाषण 28 मई 1996 में आत्मविश्वास प्रस्ताव के दौरान दिया था। अटल बिहारी वाजपेयी के भाषणों को सुनने के लिए विपक्ष भी शांत बैठा करता था। उनके भाषण हमेशा ही मजेदार होते थे। लोग तो यहां तक कहते हैं कि अब उन सा भाषण देने वाला कोई नेता रहा ही नहीं।

अटल बिहारी वाजपेयी को लेकर ये भी सुनने को मिलता है कि एक बार अटल जी के भाषण को सुनने के लिए लोग भीषण ठंड और बारिश में भी लंबे समय तक एक ही जगह पर डटी रही। इमरजेंसी के दौरान वाजपेयी जेल में बंद थे। फिर इंदिरा गांधी ने चुनाव की घोषणा कर दी। उसके बाद सब लोग छूट गए। चुनाव प्रचार के लिए कम वक्त मिला था। दिल्ली में जनसभा हो रही थी। जनता पार्टी के नेता आकर स्पीच देते थे। पर सब थके हुए से लगते थे। फिर भी जनता हिल नहीं रही थी। ठंड थी, और बारिश भी हल्की-हल्की होने लगी थी। तभी एक नेता ने बगल वाले से पूछा कि लोग जा क्यों नहीं रहे। बोरिंग स्पीच हो रही है और ठंड भी है। तो जवाब मिला कि अभी अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण होना है, इसीलिए लोग रुके हुए हैं।

अटल जी के भाषण की कुछ ऐसी रहती थी शैली-

बाद मुद्दत के मिले हैं दिवाने, कहने सुनने को बहुत हैं अफसाने।
खुली हवा में जरा सांस तो ले लें, कब तक रहेगी आजादी कौन जाने।

इस तरह की जुगलबंदी में अटल जी माहिर थे, इन पंक्तियों को सुनाने के बाद उन्होंने खुद बताया था कि दूसरी लाइन उन्होंने तुरंत बना दी थी। जिससे जनता मंत्रमुग्ध हो गई थी। याद दिला दें कि इंदिरा गांधी ने एक बार अटल जी की आलोचना की थी कि वो बहुत हाथ हिला-हिलाकर बात करते हैं। इस पर अटल जी ने जवाब में कहा कि वो तो ठीक है, आपने किसी को पैर हिलाकर बात करते देखा है क्या।

1994 में यूएन के एक अधिवेशन में पाकिस्तान ने कश्मीर पर भारत को घेर लिया था। उस दौरान प्रधानमंत्री नरसिंहा राव ने भारत का पक्ष रखने के लिए नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी को भेजा था।वहां पर पाक के नेता ने कहा कि कश्मीर के बगैर पाकिस्तान अधूरा है। तो जवाब में वाजपेयी ने कहा कि पाकिस्तान के बगैर हिंदुस्तान अधूरा है।

पाकिस्तान के ही मुद्दे पर अटल बिहारी की बड़ी आलोचना होती कि ताली दोनों हाथ से बजती है। अटल जी अकेले ही उत्साहित हुए जा रहे हैं। तो वाजपेयी ने जवाब में कहा कि एक हाथ से चुटकी तो बज ही सकती है।
अटल जी सबको हंसाते हुए भाषण शुरू किया करते थे-

अटल बिहारी वाजपेयी जिस वक्त देश के प्रधानमंत्री बने थे, उस समय संसद में विश्वास मत के दौरान उन्होंने बहुत प्रभावी भाषण दिया था। उन्होंने सदन में भारतीय जनता पार्टी को व्यापक समर्थन हासिल नहीं होने के आरोपों को लेकर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने कहा था कि ये कोई आकस्मिक चमत्कार नहीं है कि हमें इतने वोट मिल गए हैं। ये हमारी 40 साल की मेहनत का नतीजा है। हम लोगों के बीच गए हैं और हमने मेहनत की है। हमारी 365 दिन चलने वाली पार्टी है, ये चुनाव में कोई कुकुरमुत्ते की तरह पैदा होने वाली पार्टी नहीं है। उन्होंने कहा था कि आज हमें सिर्फ इसलिए कटघरे में खड़ा कर दिया गया क्योंकि हम थोड़ी ज्यादा सीटें नहीं ला पाए।

15 अगस्त 2003 को लाल किले की प्राचीर से दिया अटल जी का अंतीम भाषण

प्यारे देशवासियो आज देश ऐसे मोड़ पर है जहां से देश एक लंबी छलांग लगा सकत है, भारत को 2020 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के बड़े धेय्य को हासिल करने की तमन्ना सारे देश में बल पकड़ रही है। जरा पीछें मुड़कर देखिए, बड़े बड़े संकटों का सामना करके भारत आगे बढ़ रहा है।
ये बाबरी मस्जिद का विवादास्पद भाषण-

1992 को भाजपा नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बड़ी रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि वहां (अयोध्या) नुकीले पत्थर निकले हैं। उन पर तो कोई नहीं बैठ सकता तो जमीन को समतल करना पड़ेगा, बैठने लायक करना पड़ेगा। यज्ञ का आयोजन होगा तो कुछ निर्माण भी होगा। कम से कम वेदी तो बनेगी। मैं नहीं जानता कल वहां क्या होगा। मेरी अयोध्या जाने की इच्छा है, लेकिन मुझे कहा गया है कि तुम दिल्ली रहो।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिया था ऐतिहासिक भाषण

अटल जी को हिंदी भाषा से काफी लगाव है। इस लगाव का असर उस वक्त भी देखा जा सकता था जब 1977 में जनता सरकार में विदेश मंत्री के तौर पर काम कर रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ में अपना पहला भाषण हिंदी में देकर सभी के दिल में हिंदी भाषा का गहरा प्रभाव छोड़ दिया था।

पोखरण के परमाणु परीक्षण पर भाषण-

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते हुए भारत ने पोखरण में सफल परमाणु परीक्षण किया था, जिसके बाद पाकिस्तान से लेकर अमेरिका तक की नींद उड़ गई थी। इस परीक्षण को रोकने के लिए अमेरिका ने भारत पर नजर गड़ाए हुई थी, लेकिन सबको मात देते हुए भारत ने यह कर दिखाया। इस पर वाजपेयी का दिया भाषण ऐतिहासिक साबित हुआ था।

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माँ भारती के इस बलिदानी बेटे का जन्म 23 जुलाई 1906 मध्यप्रदेश के गांव भाँवरा में हुआ ।
ये शहीदे आजम भगत सिंह से लगभग 1 वर्ष 2 महीने बड़े थे
भारत माता उस समय परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ी हुई थी अंग्रेजों ने भारतीयों को मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिये,
1857 की क्रांति की पुनरावर्ती से बचने के लिये और भारतीयों के गुस्से को एक मंच के माध्यम से बचने के लिये अंग्रेज अधिकारी ए.ओ.ह्यूम 1885 काँग्रेस की स्थापना कर चुके थे और अब दौर आया क्रान्तिकारियों के जन्म का। अधिकतर क्रांतिकारी 1905 से 1908 के बीच में जन्म लिये थे जिनमें हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के संस्थापक अमर शहीद #चंद्रशेखरआजाद, नौजवान भारत सभा के संस्थापक शहीदे आजम #भगतसिंह, बटुकेश्वर दत्त , राजगुरु , सुखदेव , दुर्गा भाभी , आदि बड़ी संख्या में थे इधर क्रांति जन्म ले रहे थे ,और दूसरी तरफ काँग्रेस को अंग्रेजो के हाथ की कटपुतली बना देख , #लालालाजपतराय , बिपिन चन्द्र पाल , और बाल गंगाधर तिलक ने उस काँग्रेस से किनारा कर लिया और काँग्रेस 2 हिस्सो में बट गई गर्म दल ओर नरम दल। जब -जब जिस जिसको भी अंग्रेजो और काँग्रेस की मिली भगत का पता चलता वो वो कोंग्रेस छोड़ देता जैसे नेता जी सुभाष चन्द्र बोस कोंग्रेस में मगर सत्य का पता चलने पर कोंग्रेस को छोड़ दिया।

ऐसे ही अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद का बचपन भी क
काँग्रेस में बिता और कोंग्रेस के आंदोलन में बालक चंद्रशेखर ने भी बचपन में भाग लिया , चंद्रशेखर की गिरफ्तारी हुई कोड़े लगाए गए , और गिरफ्तार बालक को बना दिया आज़ाद , और जीवन भर आजादी के लिये संघर्ष करने वाले मां भारती के सच्चे सपूत ने इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क (वर्तमान के आज़ाद पार्क) में , #नेतराम_हलवाई (जिसकी दुकान अभी इलहाबाद आज़ाद पार्क के सामने है ) मोती लाल नेहरू (जिनका परिवार आज़ादी दिलाने का दम्भ भरता है) की #मुखबरी से 28 फरवरी 1931 को जब वो शहीदे आजम भगत को जेल से छुड़वाने की योजना बना रहे थे।
अंग्रेजो की पूरी बटालियन ने उन्हें घेर लिया , और माँ भारती के सच्चे सपूत ने अकेले घंटो तक अंग्रेजो का सामना किया अनेक अंग्रेजो को मृत्यु शय्या पर सुला दिया।
अंत में उनके पास 1 गोली बची उस अंतिम शेष बची गोली से और अपनी .32 mm की पिस्टल से खुद को गोली मारकर कभी जीवित अंग्रेजो के हाथ न आने वाली प्रतिज्ञा को पूरा करते हुए माँ भारती के चरणों में राष्ट्र के गौरव इस बेटे ने अपना अमर बलिदान दे दिया ।

माँ भारती के बलिदानी बेटे को आज 23 जुलाई को ,उनकी जयंती पर शत् शत् नमन !

हम #ह्रदयकीगहराईयों से #अश्रुपूर्ण_श्रद्धांजलि देते है।।

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चंद्रशेखर आज़ाद

मुछों पर ताव,
कमर में पिस्टल,
कांधे पर जनेऊ,
शेर सी शख्सियत.......

वो याद थे, वो याद हैं, वो याद ही रहेंगे,
वो आज़ाद थे, आज़ाद है, आज़ाद ही रहेंगे...

पंडित चंद्रशेखर आज़ाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रसिद्ध और महान क्रांतिकारी थे। 17 वर्ष के चंद्रशेखर आज़ाद क्रांतिकारी दल ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ में सम्मिलित हो गए। दल में उनका नाम ‘क्विक सिल्वर’ (पारा) तय पाया गया। पार्टी की ओर से धन एकत्र करने के लिए जितने भी कार्य हुए, चंद्रशेखर उन सबमें आगे रहे। सांडर्स वध, सेण्ट्रल असेम्बली में भगत सिंह द्वारा बम फेंकना, वाइसराय को ट्रेन बम से उड़ाने की चेष्टा, सबके नेता वही थे। इससे पूर्व उन्होंने प्रसिद्ध ‘काकोरी कांड’ में सक्रिय भाग लिया और पुलिस की आंखों में धूल झोंककर फरार हो गए। एक बार दल के लिये धन प्राप्त करने के उद्देश्य से वे गाजीपुर के एक महंत के शिष्य भी बने। इरादा था कि महंत के मरने के बाद मरु की सारी संपत्ति दल को दे देंगे।

जीवन परिचय
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पूरा नाम : पंडित चंद्रशेखर तिवारी
अन्य नाम : आज़ाद
जन्म : 23 जुलाई, 1906
जन्म भूमि : आदिवासी गाँव भावरा, मध्य प्रदेश
मृत्यु : 27 फ़रवरी, 1931
मृत्यु स्थान : इलाहाबाद
अभिभावक : पंडित सीताराम तिवारी
नागरिकता : भारतीय
धर्म : हिन्दू
आंदोलन : भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम
विद्यालय : संस्कृत विद्यापीठ
प्रमुख संगठन : नौज़वान भारत सभा, कीर्ति किसान पार्टी एवं हिन्दुस्तान समाजवादी गणतंत्र संघ

व्यक्तिगत जीवन :

चंद्रशेखर आज़ाद को वेष बदलना बहुत अच्छी तरह आता था।वह रूसी क्रान्तिकारी की कहानियों से बहुत प्रभावित थे। उनके पास हिन्दी में लेनिन की लिखी पुस्तक भी थी। किंतु उनको स्वयं पढ़ने से अधिक दूसरों को पढ़कर सुनाने में अधिक आनंद आता था। चंद्रशेखर आज़ाद सदैव सत्य बोलते थे। चंद्रशेखर आज़ाद ने साहस की नई कहानी लिखी। उनके बलिदान से स्वतंत्रता के लिए आंदोलन तेज़ हो गया। हज़ारों युवक स्‍वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।आज़ाद के शहीद होने के सोलह वर्षों के बाद 15 अगस्त सन् 1947 को भारत की आज़ादी का उनका सपना पूरा हुआ।

पंडित चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म एक आदिवासी ग्राम भावरा में 23 जुलाई, 1906 को हुआ था। उनके पितापंडित सीताराम तिवारी उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के बदर गाँव के रहने वाले थे। भीषण अकाल पड़ने के कारण वे अपने एक रिश्तेदार का सहारा लेकर 'अलीराजपुर रियासत' के ग्राम भावरा में जा बसे थे। इस समय भावरा मध्य प्रदेश के झाबुआ ज़िले का एक गाँव है। चन्द्रशेखर जब बड़े हुए तो वह अपने माता–पिता को छोड़कर भाग गये और बनारस जा पहुँचे। उनके फूफा जी पंडित शिवविनायक मिश्र बनारस में ही रहते थे। कुछ उनका सहारा लिया और कुछ खुद भी जुगाड़ बिठाया तथा 'संस्कृत विद्यापीठ' में भर्ती होकर संस्कृत का अध्ययन करने लगे। उन दिनों बनारस में असहयोग आंदोलन की लहर चल रही थी। विदेशी माल न बेचा जाए, इसके लिए लोग दुकानों के सामने लेटकर धरना देते थे। 1919 में हुए जलियाँवाला बाग़ नरसंहार ने उन्हें काफ़ी व्यथित किया।

बचपन का दृढ़निश्चय
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एक आदिवासी ग्राम भावरा के अधनंगे आदिवासी बालक मिलकर दीपावली की खुशियाँ मना रहे थे। किसी बालक के पास फुलझड़ियाँ थीं, किसी के पास पटाखे थे और किसी के पास मेहताब की माचिस। बालक चन्द्रशेखर के पास इनमें से कुछ भी नहीं था। वह खड़ा–खड़ा अपने साथियों को खुशियाँ मनाते हुए देख रहा था। जिस बालक के पास मेहताब की माचिस थी, वह उसमें से एक तीली निकालता और उसके छोर को पकड़कर डरते–डरते उसे माचिस से रगड़ता और जब रंगीन रौशनी निकलती तो डरकर उस तीली को ज़मीन पर फेंक देता था।
बालक चन्द्रशेखर से यह देखा नहीं गया, वह बोले-
“तुम डर के मारे एक तीली जलाकर भी अपने हाथ में पकड़े नहीं रह सकते। मैं सारी तीलियाँ एक साथ जलाकर उन्हें हाथ में पकड़े रह सकता हूँ।”
जिस बालक के पास मेहताब की माचिस थी, उसने वह चन्द्रशेखर के हाथ में दे दी और कहा-
“जो कुछ भी कहा है, वह करके दिखाओ तब जानूँ।”
बालक चन्द्रशेखर ने माचिस की सारी तीलियाँ निकालकर अपने हाथ में ले लीं। वे तीलियाँ उल्टी–सीधी रखी हुई थीं, अर्थात् कुछ तीलियों का रोगन चन्द्रशेखर की हथेली की तरफ़ भी था। उसने तीलियों की गड्डी माचिस से रगड़ दी। भक्क करके सारी तीलियाँ जल उठीं। जिन तीलियों का रोगन चन्द्रशेखर की हथेली की ओर था, वे भी जलकर चन्द्रशेखर की हथेली को जलाने लगीं। असह्य जलन होने पर भी चन्द्रशेखर ने तीलियों को उस समय तक नहीं छोड़ा, जब तक की उनकी रंगीन रौशनी समाप्त नहीं हो गई। जब उन्होंने तीलियाँ फेंक दीं तो साथियों से बोले-
“देखो हथेली जल जाने पर भी मैंने तीलियाँ नहीं छोड़ीं।”
उनके साथियों ने देखा कि चन्द्रशेखर की हथेली काफ़ी जल गई थी और बड़े–बड़े फफोले उठ आए थे। कुछ लड़के दौड़ते हुए उनकी माँ के पास घटना की ख़बर देने के लिए जा पहुँचे। उनकी माँ घर के अन्दर कुछ काम कर रही थीं। चन्द्रशेखर के पिता पंडित सीताराम तिवारी बाहर के कमरे में थे। उन्होंने बालकों से घटना का ब्योरा सुना और वे घटनास्थल की ओर लपके। बालक चन्द्रशेखर ने अपने पिताजी को आते हुए देखा तो वह जंगल की तरफ़ भाग गये। सोचा कि पिताजी अब उनकी पिटाई करेंगे। तीन दिन तक वह जंगल में ही रहे। एक दिन खोजती हुई उनकी माँ उन्हें घर ले आईं। उन्होंने यह आश्वासन दिया था कि तेरे पिताजी तेरे से कुछ भी नहीं कहेंगे।

1921 में जब महात्‍मा गाँधी के असहयोग आन्दोलनप्रारंभ किया तो उन्होंने उसमे सक्रिय योगदान किया। चन्द्रशेखर भी एक दिन धरना देते हुए पकड़े गये। उन्हें पारसी मजिस्ट्रेट मि. खरेघाट के अदालत में पेश किया गया। मि. खरेघाट बहुत कड़ी सजाएँ देते थे। उन्होंने बालक चन्द्रशेखर से उसकी व्यक्तिगत जानकारियों के बारे में पूछना शुरू किया –

“तुम्हारा नाम क्या है?”….
“मेरा नाम आज़ाद है।”
“तुम्हारे पिता का क्या नाम है?”….
“मेरे पिता का नाम स्वाधीन है।”
“तुम्हारा घर कहाँ पर है?”….
“मेरा घर जेलखाना है।”

मजिस्ट्रेट मि. खरेघाट इन उत्तरों से चिढ़ गए। उन्होंने चन्द्रशेखर को पन्द्रह बेंतों की सज़ा सुना दी। उस समय चन्द्रशेखर की उम्र केवल चौदह वर्ष की थी। जल्लाद ने अपनी पूरी शक्ति के साथ बालक चन्द्रशेखर की निर्वसन देह पर बेंतों के प्रहार किए। प्रत्येक बेंत के साथ कुछ खाल उधड़कर बाहर आ जाती थी। पीड़ा सहन कर लेने का अभ्यास चन्द्रशेखर को बचपन से ही था। वह हर बेंत के साथ “भारत माता की जय” बोलते जाते थे। जब पूरे बेंत लगाए जा चुके तो जेल के नियमानुसार जेलर ने उसकी हथेली पर तीन आने पैसे रख दिए। बालक चन्द्रशेखर ने वे पैसे जेलर के मुँह पर दे मारे और भागकर जेल के बाहर हो गया। इस पहली अग्नि परीक्षा में सम्मानरहित उत्तीर्ण होने के फलस्वरूप बालक चन्द्रशेखर का बनारस के ज्ञानवापी मोहल्ले में नागरिक अभिनन्दन किया गया। अब वह चन्द्रशेखर आज़ाद कहलाने लगा। बालक चन्द्रशेखर आज़ाद का मन अब देश को आज़ाद कराने के अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रान्ति की ओर मुड़ गया। उस समय बनारस क्रान्तिकारियों का गढ़ था। वह मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के सम्पर्क में आये और क्रान्तिकारी दल के सदस्य बन गये। क्रान्तिकारियों का वह दल “हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ” के नाम से जाना जाता था।

काकोरी काण्ड
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किसी बड़े अभियान में चन्द्रशेखर आज़ाद सबसे पहले "काकोरी डक़ैती" में सम्मिलित हुए। इस अभियान के नेता रामप्रसाद बिस्मिल थे। उस समय चन्द्रशेखर आज़ाद की आयु कम थी और उनका स्वभाव भी बहुत चंचल था। इसलिए रामप्रसाद बिस्मिल उसे क्विक सिल्वर (पारा) कहकर पुकारते थे। 9 अगस्त, 1925को क्रान्तिकारियों ने लखनऊ के निकट काकोरी नामक स्थान पर सहारनपुर – लखनऊ सवारी गाड़ी को रोककर उसमें रखा अंगेज़ी ख़ज़ाना लूट लिया। बाद में एक–एक करके सभी क्रान्तिकारी पकड़े गए; पर चन्द्रशेखर आज़ाद कभी भी पुलिस के हाथ में नहीं आए। यद्यपि वे झाँसी में पुलिस थाने पर जाकर पुलिस वालों से गपशप लड़ाते थे, पर पुलिस वालों को कभी भी उन पर संदेह नहीं हुआ कि वह व्यक्ति महान् क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद हो सकता है। काकोरी कांड के बाद उन्होंने दल का नये सिरे से संगठन किया। अब उसका नाम ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन एण्ड आर्मी’ रखा गया। चंद्रशेखर इस नये दल के कमांडर थे। वे घूम-घूम कर गुप्त रूप से दल का कार्य बढ़ाते रहे। फरारी के दिनों में झाँसी के पास एक नदी के किनारे साधु के रूप में भी उन्होंने कुछ समय बिताया।

झांसी प्रवास

काकोरी काण्ड के कई क्रान्तिकारियों को फाँसी के दंड और कई को लम्बे–लम्बे कारावास की सज़ाएँ मिलीं। चन्द्रशेखर आज़ाद ने खिसककर झाँसी में अपना अड्डा जमा लिया। झाँसी में चन्द्रशेखर आज़ाद को एक क्रान्तिकारी साथी मास्टर रुद्रनारायण सिंह का अच्छा संरक्षण मिला। झाँसी में ही सदाशिव राव मलकापुरकर, भगवानदास माहौर और विश्वनाथ वैशंपायन के रूप में उन्हें अच्छे साथी मिल गए। झाँसी की 'बुंदेलखण्ड मोटर कम्पनी' में कुछ दिन उन्होंने मोटर मैकेनिक के रूप में काम किया, मोटर चलाना सीखा और पुलिस अधीक्षक की कार चलाकर उनसे मोटर चलाने का लाइसेंस भी ले आए। बुंदेलखण्ड मोटर कम्पनी के एक ड्राइवर रामानन्द ने चन्द्रशेखर आज़ाद के रहने के लिए अपने ही मोहल्ले में एक कोठरी किराए पर दिला दी। सब काम ठीक–ठीक चल रहा था; पर कभी–कभी कुछ घटनाएँ मोहल्ले की शान्ति भंग कर देती थीं। आज़ाद की कोठरी के पास रामदयाल नाम का एक अन्य ड्राइवर सपरिवार रहता था। वैसे तो रामदयाल भला आदमी था, पर रात को जब वह शराब पीकर पहुँचता तो बहुत हंगामा करता और अपनी पत्नी को बहुत पीटता था। उस महिला का रुदन सुनकर मोहल्ले वालों को बहुत ही बुरा लगता था; पर वे किसी के घरेलू मामले में दख़ल देना उचित नहीं समझते थे। एक दिन सुबह–सुबह चन्द्रशेखर आज़ाद कारख़ाने जाने के लिए अपनी कोठरी से बाहर निकले तो रामदयाल से उनकी भेंट हो गई। रामदयाल ने ही बात छेड़ी-

"क्यों हरीशंकर जी ! (आज़ाद ने अपना नाम हरिशंकर घोषित कर रखा था) आजकल आप बहुत रात जागकर कुछ ठोंका–पीटी किया करते हैं। आपकी ठुक–ठुक से हमारी नींद हराम हो जाती है। 
वैसे तो आज़ाद स्थिति को टाल देना चाहते थे, पर रामदयाल ने जिस ढंग से बात कही थी, वह उत्तर देने के लिए बहुत अच्छी लगी और आज़ाद ने ईंट का जवाब पत्थर से दिया -
"रामदयाल भाई! मैं तो कल–पुरज़ों की ही ठोंका–पीटी करता हूँ, पर तुम तो शराब के नशे में अपनी गऊ जैसी पत्नी की ही ठोंका–पीटी करके मोहल्ले भर की नींद हराम करते रहते हो।" 
यह उत्तर रामदयाल को बहुत ही तीखा लगा। उसे इस बात का बुरा लगा कि कोई उसके घरेलू मामले में क्यों हस्तक्षेप करे। उसका मनुष्यत्व तिरोहित हो गया और पशुत्व ऊपर आ गया। क्रोध से भनभनाता हुआ वह उबल पड़ा .....
"क्यों बे! मेरी पत्नी का तू कौन होता है, जो तू उसका इस तरह से पक्ष ले रहा है? मैं उसे मारूँगा और खूब मारूँगा। देखता हूँ, कौन साला उसे बचाता है।"
आज़ाद ने शान्त भाव से उसे उत्तर दिया -
"जब तुमने मुझे साला कहा है, तो तुमने यह स्वीकार कर ही लिया है कि मैं तुम्हारी पत्नी का भाई हूँ। एक भाई अपनी बहन को पिटते हुए नहीं देख सकता है। अब कभी शराब के नशे में रात को मारा तो ठीक नहीं होगा।"
रामदयाल को चुनौती असह्य हो गई। वह आपा खोकर चिल्ला उठा -
"ऐसी की तैसी रात की और नशे की। मैं बिना नशा किए ही उसे दिन के उजाले में सड़क पर लाकर मारता हूँ। देखें, कौन साला आगे आता है उसे बचाने को।"

यह कहता हुआ रामदयाल आवेश के साथ अपने मकान में घुसा और अपनी पत्नी की चोटी पकड़कर घसीटता हुआ उसे बाहर ले आया और मारने के लिए हाथ उठाया। वह अपनी पत्नी पर हाथ का प्रहार कर भी नहीं पाया था कि आज़ाद ने उसका हाथ थाम लिया और झटका देकर उसे अपनी ओर खींचा। इस झटके के कारण उसके हाथ से पत्नी के बाल छूट गए और वह मुक्त हो गई। अब आज़ाद ने एक भरपूर हाथ उसके गाल पर दे मारा। रामदयाल के गाल पर इतने ज़ोर का तमाचा पड़ा कि उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया और वह अपने दोनों हाथों से अपना सिर थामकर बैठ गया। इस बीच आसपास के लोग दौड़े और कुछ लोग आज़ाद को समझाते हुए उसे कोठरी के अन्दर ले गए। इस घटना के बाद कुछ दिन तक आज़ाद और रामदयाल की बोलचाल बन्द हो गई, पर आज़ाद ने स्वयं ही पहल करके उससे अपने सम्बन्ध मधुर बना लिए तथा अब उसे "जीजा जी" कहकर पुकारने लगे। रामदयाल ने अपनी पत्नी को फिर कभी नहीं पीटा। आज़ाद की धाक पूरे मोहल्ले में जम गई। इसी से मिलती–जुलती एक अन्य घटना भी थोड़े ही अन्तराल से हो गई। जिसने पूरे झाँसी में आज़ाद की धाक जमा दी।

ओरछा प्रवास

जब झाँसी में पुलिस की हलचल बढ़ने लगी तो चन्द्रशेखर आज़ाद ओरछा राज्य में खिसक गए और सातार नदी के किनारे एक कुटिया बनाकर ब्रह्मचारी के रूप में रहने लगे। आज़ाद के न पकड़े जाने का एक रहस्य यह भी था कि संकट के समय वे शहर छोड़कर गाँवों की ओर खिसक जाते थे और स्वयं को सुरक्षित कर लेते थे।

हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र सेना
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क्रान्ति सूत्रों को जोड़कर चन्द्रशेखर आज़ाद ने अब एक सुदृढ़ क्रान्तिकारी संगठन बना डाला। अब उनकी पार्टी का नाम “हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र सेना” था। उनके साथियों ने उनको ही इस सेना का “कमाण्डर आफ चीफ” बनाया। अब भगतसिंह जैसा क्रान्तिकारी भी उनका साथी था। उत्तर प्रदेश और पंजाब तक इस पार्टी का कार्यक्षेत्र बढ़ गया।

साइमन कमीशन का विरोध
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उन दिनों भारतवर्ष को कुछ राजनीतिक अधिकार देने की पुष्टि से अंग्रेज़ी हुकूमत ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक आयोग की नियुक्ति की, जो "साइमन कमीशन" कहलाया। समस्त भारत में साइनमन कमीशन का ज़ोरदार विरोध हुआ और स्थान–स्थान पर उसे काले झण्डे दिखाए गए। जब लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध किया गया तो पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर बेरहमी से लाठियाँ बरसाईं। पंजाब के लोकप्रिय नेता लाला लाजपतराय को इतनी लाठियाँ लगीं की कुछ दिन के बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। चन्द्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह और पार्टी के अन्य सदस्यों ने लाला जी पर लाठियाँ चलाने वाले पुलिस अधीक्षक सांडर्स को मृत्युदण्ड देने का निश्चय कर लिया।

लाला लाजपतराय का बदला
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17 दिसम्बर, 1928 को चन्द्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह और राजगुरु ने संध्या के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ़्तर को जा घेरा। ज्यों ही जे. पी. सांडर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर निकला, पहली गोली राजगुरु ने दाग़ दी, जो साडंर्स के मस्तक पर लगी और वह मोटर साइकिल से नीचे गिर पड़ा। भगतसिंह ने आगे बढ़कर चार–छह गोलियाँ और दागकर उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया। जब सांडर्स के अंगरक्षक ने पीछा किया तो चन्द्रशेखर आज़ाद ने अपनी गोली से उसे भी समाप्त कर दिया। लाहौर नगर में जगह–जगह परचे चिपका दिए गए कि लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया। समस्त भारत में क्रान्तिकारियों के इस क़दम को सराहा गया।

केन्द्रीय असेंबली में बम

चन्द्रशेखर आज़ाद के ही सफल नेतृत्व में भगतसिंहऔर बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली की केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट किया। यह विस्फोट किसी को भी नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं किया गया था। विस्फोट अंग्रेज़ सरकार द्वारा बनाए गए काले क़ानूनों के विरोध में किया गया था। इस काण्ड के फलस्वरूप भी क्रान्तिकारी बहुत जनप्रिय हो गए। केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट करने के पश्चात् भगतिसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने स्वयं को गिरफ्तार करा लिया। वे न्यायालय को अपना प्रचार–मंच बनाना चाहते थे।

अल्फ़्रेड पार्क की घटना

चन्द्रशेखर आज़ाद घूम–घूमकर क्रान्ति प्रयासों को गति देने में लगे हुए थे। आख़िर वह दिन भी आ गया, जब किसी मुखबिर ने पुलिस को यह सूचना दी कि चन्द्रशेखर आज़ाद ‘अल्फ़्रेड पार्क’ में अपने एक साथी के साथ बैठे हुए हैं। वह 27 फ़रवरी, 1931 का दिन था। चन्द्रशेखर आज़ाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर विचार–विमर्श कर रहे थे। मुखबिर की सूचना पर पुलिस अधीक्षक ‘नाटबाबर’ ने आज़ाद को इलाहाबादके अल्फ़्रेड पार्क में घेर लिया। “तुम कौन हो” कहने के साथ ही उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना नाटबाबर ने अपनी गोली आज़ाद पर छोड़ दी। नाटबाबर की गोली चन्द्रशेखर आज़ाद की जाँघ में जा लगी। आज़ाद ने घिसटकर एक जामुन के वृक्ष की ओट लेकर अपनी गोली दूसरे वृक्ष की ओट में छिपे हुए नाटबाबर के ऊपर दाग़ दी। आज़ाद का निशाना सही लगा और उनकी गोली ने नाटबाबर की कलाई तोड़ दी। एक घनी झाड़ी के पीछे सी.आई.डी. इंस्पेक्टर विश्वेश्वर सिंह छिपा हुआ था, उसने स्वयं को सुरक्षित समझकर आज़ाद को एक गाली दे दी। गाली को सुनकर आज़ाद को क्रोध आया। जिस दिशा से गाली की आवाज़ आई थी, उस दिशा में आज़ाद ने अपनी गोली छोड़ दी। निशाना इतना सही लगा कि आज़ाद की गोली ने विश्वेश्वरसिंह का जबड़ा तोड़ दिया।

शहादत
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बहुत देर तक आज़ाद ने जमकर अकेले ही मुक़ाबला किया। उन्होंने अपने साथी सुखदेवराज को पहले ही भगा दिया था। आख़िर पुलिस की कई गोलियाँ आज़ाद के शरीर में समा गईं। उनके माउज़र में केवल एक आख़िरी गोली बची थी। उन्होंने सोचा कि यदि मैं यह गोली भी चला दूँगा तो जीवित गिरफ्तार होने का भय है। अपनी कनपटी से माउज़र की नली लगाकर उन्होंने आख़िरी गोली स्वयं पर ही चला दी। गोली घातक सिद्ध हुई और उनका प्राणांत हो गया। इस घटना में चंद्रशेखर आज़ाद की मृत्यु हो गई और उन्हें पोस्टमार्टम के लिए ले जाया गया। उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उन्हें तीन या चार गोलियाँ लगी थीं।

"तू शहीद हुआ …..
ना जाने कैसे तेरी माँ सोयी होगी,
पर ये तो तय हैं ……
तुझे लगने वाली वो गोली भी,
सौ बार रोई होगी।"

अल्फ़्रेड पार्क में आज़ाद के बलिदान का समाचार जब देशभक्तों को पता चला तो उन्होंने श्मशान घाट से आज़ाद की अस्थियाँ लेकर एक जुलूस निकला। इलाहाबाद की मुख्य सड़कें अवरुद्ध हो गयीं, ऐसा लग रहा था मानो सारा देश अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ पड़ा है। जलूस के बाद एक सभा हुई। सभा को शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी ने सन्बोधित करते हुए कहा –

"जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की शहादत के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया, वैसे ही आज़ाद को भी ये सम्मान मिलेगा।"

श्रद्धांजलि :
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27 फ़रवरी, 1931 को चन्द्रशेखर आज़ाद के रूप में देश का एक महान् क्रान्तिकारी योद्धा देश की आज़ादी के लिए अपना बलिदान दे गया, शहीद हो गया। देश के “स्वतंत्रता आंदोलन” में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले “चंद्रशेखर आज़ाद जी” का “त्याग”और “बलिदान” हम सभी देशवासियों को “देशसेवा” की हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।

“भारत के देशभक्तों को सदा याद रहूँगा…..
मैं आज़ाद था, आज़ाद हूँ, आज़ाद रहूँगा ।।”

अमर शहीद, महान क्रांतिकारी “चंद्रशेखर आज़ाद जी” की जयन्ती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन करती हूँ मैं ……..
…………. विजेता मलिक

via MyNt

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बात 1947 से पहले की है…..यह कहानी है एक जर्मन महिला की नाम था #Emilie_Schenkl ……

मुझे नहीं पता आपमें से कितनों ने ये नाम सुना है….और अगर नहीं सुना है तो आप दोषी नहीं इस नाम को इतिहास से खुरच कर निकाल फैंका गया…..

श्रीमती एमिली शेंकल ने 1937 में भारत मां के सबसे लाडले बेटे से विवाह किया और एक ऐसे देश को ससुराल के रूप में चुना जिसने कभी इस बहू का स्वागत नहीं किया….न बहू के आगमन में किसीने मंगल गीत गाये और न उसकी बेटी के जन्म पर कोई सोहर गायी गयी…….कभी कहीं जनमानस में चर्चा तक नहीं हुई के वो कैसे जीवन गुजार रही है…….

सात साल के कुल वैवाहिक जीवन में सिर्फ 3 साल ही उन्हें अपने पति के साथ रहने का अवसर मिला फिर उन्ह और नन्हीं सी बेटी को छोड़ पति देश के लिए लड़ने चला आया इस वादे के साथ के पहले देश को आज़ाद करा लूं फिर तो सारा जीवन तुम्हारे साथ वहां बिताना ही है…..

पर ऐसा हुआ नहीं औऱ 1945 में एक कथित विमान दुर्घटना में वो लापता हो गए……!

उस समय एमिली शेंकल बेहद युवा थीं चाहतीं तो यूरोपीय संस्कृति के हिसाब से दूसरा विवाह कर सकतीं थीं पर उन्हों ने ऐसा नहीं किया और सारा जीवन बेहद कड़ा संघर्ष करते हुए बिताया….एक तारघर की मामूली क्लर्क की नौकरी और बेहद कम वेतन के साथ वो अपनी बेटी को पालतीं रहीं न किसी से शिकायत की न कुछ मांगा…….

भारत भी तब तक आज़ाद हो चुका था और वे चाहतीं थीं कम से कम एक बार उस देश में आएं जिसकी आजादी के लिए उनके पति ने जीवन दिया …..

भारत का एक अन्य राजनीतिक परिवार इतना भयभीत था इस एक महिला से के जिसे सम्मान सहित यहां बुला देश की नागरिकता देनी चाहिए थी उसे कभी भारत का वीज़ा तक नहीं दिया गया…….

आखिरकार बेहद कठिनाइयों भरा, और किसी भी तरह की चकाचोंध से दूर रह बेहद साधारण जीवन गुजार श्रीमती एमिली शेंकल ने मार्च 1996 में गुमनामी में ही जीवन त्याग दिया……

श्रीमती एमिली शेंकल का पूरा नाम था “श्रीमती एमिली शेंकल बोस”

जो इस देश के सबसे लोकप्रिय जननेता नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की धर्मपत्नी थीं और जिन्हें गांधी कुनबे ने कभी इस देश में पैर नहीं रखने दिया…..सायद नेहरू और उसका कुनबा जानता था ये देश इस विदेशी बहू को सर आंखों पर बिठा लेगा उन्हें एमिली बोस का इस देश में पैर रखना अपनी सत्ता के लिए चुनोती लगा……और सायद था भी

कांग्रेसी और उनके जन्मजात अंध चाटुकार, कुछ पत्रकार, और इतिहासकार(?) अक्सर विदेशी मूल की राजीव की बीवी मतलब पप्पूआ की अम्मा को देश की बहू का ख़िताब दे डालते है…..उसकी कुर्बानियों(घंटा) का बखान बेहिसाब कर डालते है……

क्या एंटोनिया(सोनिया) माइनो कभी भी श्रीमती एमिली बोस के पैरों की चप्पल के बराबर भी हो सकती है, या उनकी मौन कुर्बानियों के सामने कहीं भी ठहर सकती है……..!!!!

नवीन हैंगआउट

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, भारतीय क्रांतिकारी

“2009 में उसने मुझे प्रपोज़ किया था. 2011 में हमारी शादी हुई, मैं पुणे आ गयी. दो साल बाद नैना का जन्म हुआ. उसे लम्बे समय तक काम के सिलसिले में बाहर रहना पड़ता था. हमारी बच्ची छोटी थी, इसलिए हमारे परिवारों ने कहा कि मैं बेंगलुरु आ जाऊं. मैंने फिर भी वहीं रहना चुना जहां अक्षय था. मैं हमारी उस छोटी सी दुनिया से दूर नहीं जाना चाहती थी, जो हमने मिल कर बनायी थी.

उसके साथ ज़िंदगी हंसती-खेलती थी. उससे मिलने नैना को लेकर 2011 फ़ीट पर जाना, स्काईडाइविंग करना, हमने सबकुछ किया.
2016 में उसे नगरोटा भेजा गया. हमें अभी वहां घर नहीं मिला था, इसलिए हम ऑफ़िसर्स मेस में रह रहे थे. 29 नवम्बर की सुबह 5:30 बजे अचानक गोलियों की आवाज़ से हमारी आंख खुली. हमें लगा कि ट्रेनिंग चल रही है, तभी ग्रेनेड की आवाज़ भी आने लगी. 5:45 पर अक्षय के एक जूनियर ने आकर बताया कि आतंकियों ने तोपखाने की रेजिमेंट को बंधक बना लिया है. उसके मुझसे आखरी शब्द थे “तुम्हें इसके बारे में लिखना चाहिए”.

सभी बच्चों और महिलाओं को एक कमरे में रखा गया था. संतरियों को कमरे के बाहर तैनात किया गया था, हमें लगातार फ़ायरिंग की आवाज़ आ रही थी. मैंने अपनी सास और ननद से इस बीच बात की. 8:09 पर उसने ग्रुप चैट में मेसेज किया कि वो लड़ाई में है.

8:30 बजे सबको सुरक्षित जगह ले जाया गया. अभी भी हम सब पजामों और चप्पलों में ही थे. दिन चढ़ता रहा, लेकिन कोई ख़बर नहीं आ रही थी. मेरा दिल बैठा जा रहा था. मुझसे रहा नहीं गया, मैंने 11:30 बजे उसे फ़ोन किया. किसी और ने फ़ोन उठा कर कहा कि मेजर अक्षय को दूसरी लोकेशन पर भेजा गया है.

लगभग शाम 6:15 बजे कुछ अफ़सर मुझसे मिलने आये और कहा, “मैम हमने अक्षय को खो दिया है, सुबह 8:30 बजे वो शहीद हो गए.” मेरी दुनिया वहीं थम गयी. जाने क्या-क्या ख़याल मेरे मन में आते रहे. कभी लगता कि काश मैंने उसे कोई मेसेज कर दिया होता, काश जाने से पहले एक बार उसे गले लगा लिया होता, काश एक आखिरी बार उससे कहा होता कि मैं उससे प्यार करती हूं.

चीज़ें वैसी नहीं होतीं, जैसा हमने सोचा होता है. मैं बच्चों की तरह बिलखती रही, जैसे मेरी आत्मा के किसी ने टुकड़े कर दिए हों. दो और सिपाही भी उस दिन शहीद हो गए थे. मुझे उसकी वर्दी और कपड़े मिले. एक ट्रक में वो सब था जो इन सालों में हमने जोड़ा था. लाख नाकाम कोशिशें कीं अपने आंसुओं को रोकने की.

आज तक उसकी वर्दी मैंने धोयी नहीं है. जब उसकी बहुत याद आती है, तो उनकी जैकेट पहन लेती हूं. उसमें उसे महसूस कर पाती हूं.
शुरू में नैना को समझाना मुश्किल था कि उसके पापा को क्या हो गया, लेकिन फिर उससे कह दिया कि अब उसके पापा आसमान में एक तारा बन गए हैं. आज हमारी जमायी चीज़ों से ही मैंने एक दुनिया बना ली है, जहां वो जीता है, मेरी यादों में, हमारी तस्वीरों में. आंखों में आंसू हों, फिर भी मुस्कुराती हूं. जानती हूं कि वो होता तो मुझे मुस्कुराते हुए ही देखना चाहता.

कहते हैं न, अगर आपने अपनी आत्मा को चीर देने का दर्द नहीं सहा, तो क्या प्यार किया. दर्द तो बहुत होता है पर हां, मैं उससे हमेशा इसी तरह प्यार करूंगी.”

शहीदों के परिवारों को वो सब सहना पड़ता है, जिसके बारे में सोच कर भी शायद आप कांप उठेंगे. उनके अपने क़ुर्बान हो जाते हैं हमारी रक्षा करते-करते. हम सलाम करते हैं इन लोगों को जो ये सब सहते हैं, ताकि हम सुरक्षित रह सकें.. 🙏

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मित्रो आज महान गणितज्ञ आर्यभट्ट की जयंती है,भारत के प्रथम उपग्रह आर्यभट्ट जिन महान गणितज्ञ के नाम पर रखा गया था उनको अब भारतवासी याद नहीं रखना चाहते हैं तभी तो उनकी जयंती पर आज कोई सूचना या उल्लास नहीं है,

आर्यभट्ट प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलशास्त्री रहे हैं। उनका जन्म 476 ईस्वी में बिहार में हुआ था। उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय से पढाई की। उनके मुख्य कार्यो में से एक “आर्यभटीय” 499 ईस्वी में लिखा गया था।

इसमें बहुत सारे विषयो जैसे खगोल विज्ञान, गोलीय त्रिकोणमिति, अंकगणित, बीजगणित और सरल त्रिकोणमिति का वर्णन है। उन्होंने गणित और खगोलविज्ञान के अपने सारे अविष्कारों को श्लोको के रूप में लिखा। इस किताब का अनुवाद लैटिन में 13वीं शताब्दी में किया गया। आर्यभटीय के लैटिन संस्करण की सहायता से यूरोपीय गणितज्ञों ने त्रिभुजो का क्षेत्रफल, गोलीय आयतन की गणना के साथ साथ कैसे वर्गमूल और घनमूल की गणना की जाती है, ये सब सीखा।

खगोल विज्ञानं के क्षेत्र में, सर्वप्रथम आर्यभट ने ही अनुमान लगाया था कि पृथ्वी गोलाकार है और ये अपनी ही अक्ष पर घूमती है जिसके फलस्वरूप दिन और रात होते हैं। उन्होंने यह भी निष्कर्ष निकाला था कि चन्द्रमा काला है और वो सूर्य की रोशनी वजह से चमकता है। उन्होंने सूर्य व चंद्र ग्रहण के सिद्धान्तों के विषय में तार्किक स्पष्टीकरण दिये थे। उन्होंने बताया था कि ग्रहणों की मुख्य वजह पृथ्वी और चन्द्रमा द्वारा निर्मित परछाई है।

उन्होंने सौर प्रणाली के भूकेंद्रीय मॉडल को प्रस्तुत किया जिसमे उन्होंने बताया कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड के केंद्र में है और उन्होंने गुरुत्वाकर्षण की अवधारणा की नींव भी रखी थी। उन्होंने अपने आर्यभटीय सिघ्रोका में, जो पंचांग ( हिन्दू कैलेंडर ) बनाने में प्रयोग किया जाता था, खगोलीय गणनाओ के तरीको को प्रतिपादित किया था। जो सिद्धान्त कोपर्निकस और गैलीलियो ने प्रतिपादित किये थे उनका सुझाव आर्यभट्ट ने 1500 वर्षो पूर्व ही दे दिया था।

गणित के क्षेत्र में आर्यभट्ट के योगदान अद्वितीय है। उन्होंने त्रिकोण और वृत्त के क्षेत्रफलों को निकलने के लिए सूत्र का सुझाव दिया था जो सही साबित हुए। गुप्ता शासक, बुद्धगुप्त, ने उन्हें उनके असाधारण कार्यों के लिए विश्वविद्यालय का प्रमुख नियुक्त किया था। उन्होंने पाई की अपरिमित मान दिया। उन्होंने पाई का मान जो 62832/20000 = 3.1416 के बराबर था, निकाला जो बिल्कुल सन्निकट था।

वो पहले गणितिज्ञ थे जिन्होंने “ज्या ( sine) तालिका” दी, जो तुकांत वाले एक छंद के रूप में थी जहाँ प्रत्येक इकाई वृत्तचाप के 225 मिनट्स या 3 डिग्री 45 मिनट्स के अंतराल पर बढ़ती थी। वृद्धि संग्रह को परिभाषित करने के लिए वर्णमाला कोड का प्रयोग किया। अगर हम आर्यभट्ट की तालिका का प्रयोग करें और ज्या 30 (Sine 30, हस्झ के अनुरूप ) के मान की गणना करें, जोकि 1719/3438 = 0.5 है , एकदम सही निकलती है। उनके वर्णमाला कोड को सामान्यतः आर्यभट्ट सिफर के रूप में जाना जाता है

संजय गुप्ता

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वीर सावरकर कौन थे


*वीर सावरकर कौन थे..?* जिन्हें आज कांग्रेसी और वामपंथी कोस रहे हैं और क्यों..?? ये 25 बातें पढ़कर आपका सीना गर्व से चौड़ा हो उठेगा। इसको पढ़े बिना आज़ादी का ज्ञान अधूरा है! आइए जानते हैं एक ऐसे महान क्रांतिकारी के बारे में जिनका नाम इतिहास के पन्नों से मिटा दिया गया। जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के द्वारा इतनी यातनाएं झेलीं की उसके बारे में कल्पना करके ही इस देश के करोड़ों भारत माँ के कायर पुत्रों में सिहरन पैदा हो जायेगी। जिनका नाम लेने मात्र से आज भी हमारे देश के राजनेता भयभीत होते हैं क्योंकि उन्होंने माँ भारती की निस्वार्थ सेवा की थी। वो थे हमारे परमवीर सावरकर। 1. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी देशभक्त थे जिन्होंने 1901 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में शोक सभा का विरोध किया और कहा कि वो हमारे शत्रु देश की रानी थी, हम शोक क्यूँ करें? क्या किसी भारतीय महापुरुष के निधन पर ब्रिटेन में शोक सभा हुई है.? 2. वीर सावरकर पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बकेश्वर में बड़े बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि गुलामी का उत्सव मत मनाओ..! 3. विदेशी वस्त्रों की पहली होली पूना में 7 अक्तूबर 1905 को वीर सावरकर ने जलाई थी…! 4. वीर सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने विदेशी वस्त्रों का दहन किया, तब बाल गंगाधर तिलक ने अपने पत्र केसरी में उनको शिवाजी के समान बताकर उनकी प्रशंसा की थी *जबकि इस घटना की दक्षिण अफ्रीका के अपने पत्र ‘इन्डियन ओपीनियन’ में गाँधी ने निंदा की थी…!* *5. सावरकर द्वारा विदेशी वस्त्र दहन की इस प्रथम घटना के 16 वर्ष बाद गाँधी उनके मार्ग पर चले और 11 जुलाई 1921 को मुंबई के परेल में विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया…!* 6. सावरकर पहले भारतीय थे जिनको 1905 में विदेशी वस्त्र दहन के कारण पुणे के फर्म्युसन कॉलेज से निकाल दिया गया और दस रूपये जुरमाना किया… इसके विरोध में हड़ताल हुई… स्वयं तिलक जी ने ‘केसरी’ पत्र में सावरकर के पक्ष में सम्पादकीय लिखा…! 7. वीर सावरकर ऐसे पहले बैरिस्टर थे जिन्होंने 1909 में ब्रिटेन में ग्रेज-इन परीक्षा पास करने के बाद *ब्रिटेन के राजा के प्रति वफ़ादार होने की शपथ नहीं ली…* इस कारण उन्हें *बैरिस्टर होने की उपाधि का पत्र कभी नहीं दिया गया…!* 8. वीर सावरकर पहले ऐसे लेखक थे जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा ग़दर कहे जाने वाले संघर्ष को ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ नामक ग्रन्थ लिखकर सिद्ध कर दिया…! 9. सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी लेखक थे जिनके लिखे ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक पर ब्रिटिश संसद ने प्रकाशित होने से पहले प्रतिबन्ध लगाया था…। 10. *‘1857 का स्वातंत्र्य समर’* विदेशों में छापा गया और भारत में भगत सिंह ने इसे छपवाया था जिसकी एक एक प्रति तीन-तीन सौ रूपये में बिकी थी…! भारतीय क्रांतिकारियों के लिए यह पवित्र गीता थी… पुलिस छापों में देशभक्तों के घरों में यही पुस्तक मिलती थी…! 11. वीर सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय आठ जुलाई 1910 को समुद्र में कूद पड़े थे और तैरकर फ्रांस पहुँच गए थे…! 12. सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जिनका मुकद्दमा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में चला, मगर ब्रिटेन और फ्रांस की मिलीभगत के कारण उनको न्याय नहीं मिला और बंदी बनाकर भारत लाया गया…! 13. वीर सावरकर विश्व के पहले क्रांतिकारी और भारत के पहले राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सरकार ने दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई थी…! 14. सावरकर पहले ऐसे देशभक्त थे जो दो जन्म कारावास की सजा सुनते ही हंसकर बोले – *“चलो, ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान लिया”…!* 15. वीर सावरकर पहले राजनैतिक बंदी थे जिन्होंने काला पानी की सज़ा के समय 10 साल से भी अधिक समय तक आज़ादी के लिए कोल्हू चलाकर 30 पोंड तेल प्रतिदिन निकाला…! 16. वीर सावरकर काला पानी में पहले ऐसे कैदी थे जिन्होंने काल कोठरी की दीवारों पर कंकर कोयले से कवितायें लिखीं और 6000 पंक्तियाँ याद रखी..! 17. वीर सावरकर पहले देशभक्त लेखक थे, जिनकी लिखी हुई पुस्तकों पर आज़ादी के बाद कई वर्षों तक प्रतिबन्ध लगा रहा…! 18. वीर सावरकर पहले विद्वान लेखक थे जिन्होंने हिन्दू को परिभाषित करते हुए लिखा कि : *‘आसिन्धु सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारत भूमिका,* *पितृभू: पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरितीस्मृतः।* अर्थात समुद्र से हिमालय तक भारत भूमि जिसकी पितृभूमि है, जिसके पूर्वज यहीं पैदा हुए हैं व यही पुण्य भूमि है, जिसके तीर्थ भारत भूमि में ही हैं, वही हिन्दू है..! *19.वीर सावरकर प्रथम राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सत्ता ने 30 वर्षों तक जेलों में रखा तथा आजादी के बाद 1948 में नेहरु सरकार ने गाँधी हत्या की आड़ में लाल किले में बंद रखा पर न्यायालय द्वारा आरोप झूठे पाए जाने के बाद ससम्मान रिहा कर दिया… देशी-विदेशी दोनों सरकारों को उनके राष्ट्रवादी विचारों से डर लगता था…। 20. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जब उनका 26 फरवरी 1966 को उनका स्वर्गारोहण हुआ तब भारतीय संसद में कुछ सांसदों ने शोक प्रस्ताव रखा तो यह कहकर रोक दिया गया कि वे संसद सदस्य नही थे जबकि चर्चिल की मौत पर शोक मनाया गया था…। 21. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी राष्ट्रभक्त स्वातंत्र्य वीर थे जिनके मरणोपरांत 26 फरवरी 2003 को उसी संसद में मूर्ति लगी जिसमे कभी उनके निधन पर शोक प्रस्ताव भी रोका गया था…। 22. वीर सावरकर ऐसे पहले राष्ट्रवादी विचारक थे जिनके चित्र को संसद भवन में लगाने से रोकने के लिए कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा लेकिन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने सुझाव पत्र नकार दिया और वीर सावरकर के चित्र अनावरण राष्ट्रपति ने अपने कर-कमलों से किया…। 23. वीर सावरकर पहले ऐसे राष्ट्रभक्त हुए जिनके शिलालेख को अंडमान द्वीप की सेल्युलर जेल के कीर्ति स्तम्भ से UPA सरकार के मंत्री मणिशंकर अय्यर ने हटवा दिया था और उसकी जगह गांधी का शिलालेख लगवा दिया..। 24. वीर सावरकर ने दस साल आजादी के लिए काला पानी में कोल्हू चलाया था जबकि गाँधी ने काला पानी की उस जेल में कभी दस मिनट चरखा नही चलाया..? 25. वीर सावरकर माँ भारती के पहले सपूत थे जिन्हें जीते जी और मरने के बाद भी आगे बढ़ने से रोका गया… पर आश्चर्य की बात यह है कि इन सभी विरोधियों के घोर अँधेरे को चीरकर आज वीर सावरकर सभी मे लोकप्रिय और युवाओं के आदर्श बन रहे है।। वन्दे मातरम्॥