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वीर सावरकर

एक

कल्पना कीजिए… तीस वर्ष का पति जेल की सलाखों के भीतर खड़ा है और बाहर उसकी वह युवा पत्नी खड़ी है, जिसका बच्चा हाल ही में मृत हुआ है…

इस बात की पूरी संभावना है कि अब शायद इस जन्म में इन पति-पत्नी की भेंट न हो. ऐसे कठिन समय पर इन दोनों ने क्या बातचीत की होगी. कल्पना मात्र से आप सिहर उठे ना??

जी हाँ!!! मैं बात कर रहा हूँ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चमकते सितारे विनायक दामोदर सावरकर की।

यह परिस्थिति सावरकर के जीवन में आई थी, जब अंग्रेजों ने उन्हें कालापानी (Andaman Cellular Jail) की कठोरतम सजा के लिए अंडमान जेल भेजने का निर्णय लिया और उनकी पत्नी उनसे मिलने जेल में आईं.

मजबूत ह्रदय वाले वीर सावरकर (Vinayak Damodar Savarkar) ने अपनी पत्नी से एक ही बात कही… – “तिनके-तीलियाँ बीनना और बटोरना तथा उससे एक घर बनाकर उसमें बाल-बच्चों का पालन-पोषण करना… यदि इसी को परिवार और कर्तव्य कहते हैं तो ऐसा संसार तो कौए और चिड़िया भी बसाते हैं. अपने घर-परिवार-बच्चों के लिए तो सभी काम करते हैं. मैंने अपने देश को अपना परिवार माना है, इसका गर्व कीजिए. इस दुनिया में कुछ भी बोए बिना कुछ उगता नहीं है. धरती से ज्वार की फसल उगानी हो तो उसके कुछ दानों को जमीन में गड़ना ही होता है. वह बीच जमीन में, खेत में जाकर मिलते हैं तभी अगली ज्वार की फसल आती है.

यदि हिन्दुस्तान में अच्छे घर निर्माण करना है तो हमें अपना घर कुर्बान करना चाहिए. कोई न कोई मकान ध्वस्त होकर मिट्टी में न मिलेगा, तब तक नए मकान का नवनिर्माण कैसे होगा…”. कल्पना करो कि हमने अपने ही हाथों अपने घर के चूल्हे फोड़ दिए हैं, अपने घर में आग लगा दी है. परन्तु आज का यही धुआँ कल भारत के प्रत्येक घर से स्वर्ण का धुआँ बनकर निकलेगा.

यमुनाबाई, बुरा न मानें, मैंने तुम्हें एक ही जन्म में इतना कष्ट दिया है कि “यही पति मुझे जन्म-जन्मांतर तक मिले” ऐसा कैसे कह सकती हो…” यदि अगला जन्म मिला, तो हमारी भेंट होगी… अन्यथा यहीं से विदा लेता हूँ…. (उन दिनों यही माना जाता था, कि जिसे कालापानी की भयंकर सजा मिली वह वहाँ से जीवित वापस नहीं आएगा).

अब सोचिये, इस भीषण परिस्थिति में मात्र 25-26 वर्ष की उस युवा स्त्री ने अपने पति यानी वीर सावरकर से क्या कहा होगा?? यमुनाबाई (अर्थात भाऊराव चिपलूनकर की पुत्री) धीरे से नीचे बैठीं, और जाली में से अपने हाथ अंदर करके उन्होंने सावरकर के पैरों को स्पर्श किया. उन चरणों की धूल अपने मस्तक पर लगाई. सावरकर भी चौंक गए, अंदर से हिल गए… उन्होंने पूछा…. ये क्या करती हो?? अमर क्रांतिकारी की पत्नी ने कहा… “मैं यह चरण अपनी आँखों में बसा लेना चाहती हूँ, ताकि अगले जन्म में कहीं मुझसे चूक न हो जाए. अपने परिवार का पोषण और चिंता करने वाले मैंने बहुत देखे हैं, लेकिन समूचे भारतवर्ष को अपना परिवार मानने वाला व्यक्ति मेरा पति है… इसमें बुरा मानने वाली बात ही क्या है. यदि आप सत्यवान हैं, तो मैं सावित्री हूँ. मेरी तपस्या में इतना बल है, कि मैं यमराज से आपको वापस छीन लाऊँगी. आप चिंता न करें… अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें… हम इसी स्थान पर आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं…”.

क्या जबरदस्त ताकत है… उस युवावस्था में पति को कालापानी की सजा पर ले जाते समय, कितना हिम्मत भरा वार्तालाप है… सचमुच, क्रान्ति की भावना कुछ स्वर्ग से तय होती है, कुछ संस्कारों से. यह हर किसी को नहीं मिलती.

वीर सावरकर को 50 साल की सजा देकर भी अंग्रेज नहीं मिटा सके, लेकिन कांग्रेस व मार्क्सहवादियों ने उन्हें मिटाने की पूरी कोशिश की.. 26 फरवरी 1966 को वह इस दुनिया से प्रस्थाान कर गए। लेकिन इससे केवल 56 वर्ष व दो दिन पहले 24 फरवरी 1910 को उन्हें ब्रिटिश सरकार ने एक नहीं, बल्कि दो-दो जन्मों के कारावास की सजा सुनाई थी। उन्हें 50 वर्ष की सजा सुनाई गई थी।

वीर सावरकर भारतीय इतिहास में प्रथम क्रांतिकारी हैं, जिन पर हेग स्थित अंतरराष्ट्री य न्या्यालय में मुकदमा चलाया गया था। उन्हें काले पानी की सजा मिली। कागज व लेखनी से वंचित कर दिए जाने पर उन्हों ने अंडमान जेल की दीवारों को ही कागज और अपने नाखूनों, कीलों व कांटों को अपना पेन बना लिया था, जिसके कारण वह सच्चा ई दबने से बच गई, जिसे न केवल ब्रिटिश, बल्कि आजादी के बाद तथाकथित इतिहासकारों ने भी दबाने का प्रयास किया। पहले ब्रिटिश ने और बाद में कांग्रेसी-वामपंथी इतिहासकारों ने हमारे इतिहास के साथ जो खिलवाड़ किया, उससे पूरे इतिहास में वीर सावरकर अकेले मुठभेड़ करते नजर आते हैं।

भारत का दुर्भाग्यय देखिए, भारत की युवा पीढ़ी यह तक नहीं जानती कि वीर सावरकर को आखिर दो जन्मों के कालापानी की सजा क्यों मिली थी, जबकि हमारे इतिहास की पुस्तकों में तो आजादी की पूरी लड़ाई गांधी-नेहरू के नाम कर दी गई है। तो फिर आपने कभी सोचा कि जब देश को आजाद कराने की पूरी लड़ाई गांधी-नेहरू ने लड़ी तो विनायक दामोदर सावरकर को कालेपानी की सजा क्यों दी गई। उन्होंलने तो भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और उनके अन्यग क्रांतिकारी साथियों की तरह बम-बंदूक से भी अंग्रेजों पर हमला नहीं किया था तो फिर क्यों उन्हें 50 वर्ष की सजा सुनाई गई थी।

वीर सावरकर की गलती यह थी कि उन्होंंने कलम उठा लिया था और अंग्रेजों के उस झूठ का पर्दाफाश कर दिया, जिसे दबाए रखने में न केवल अंग्रेजों का, बल्कि केवल गांधी-नेहरू को ही असली स्वजतंत्रता सेनानी मानने वालों का भी भला हो रहा था। अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति को केवल एक सैनिक विद्रोह करार दिया था, जिसे आज तक वामपंथी इतिहासकार ढो रहे हैं।

1857 की क्रांति की सच्चा्ई को दबाने और फिर कभी ऐसी क्रांति उत्पकन्ना न हो इसके लिए ही अंग्रेजों ने अपने एक अधिकारी ए.ओ.हयूम से 1885 में कांग्रेस की स्थांपना करवाई थी। 1857 की क्रांति को कुचलने की जयंती उस वक्तस ब्रिटेन में हर साल मनाई जाती थी और क्रांतिकारी नाना साहब, रानी लक्ष्मीतबाई, तात्याज टोपे आदि को हत्याथरा व उपद्रवी बताया जाता था। 1857 की 50 वीं वर्षगांठ 1907 ईस्वीो में भी ब्रिटेन में विजय दिवस के रूप मे मनाया जा रहा था, जहां वीर सावरकर 1906 में वकालत की पढ़ाई करने के लिए पहुंचे थे।

सावरकर को रानी लक्ष्मीक बाई, नाना साहब, तात्याा टोपे का अपमान करता नाटक इतना चुभ गया कि उन्होंकने उस क्रांति की सच्चासई तक पहुंचने के लिए भारत संबंधी ब्रिटिश दस्ताोवेजों के भंडार ‘इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी’ और ‘ब्रिटिश म्यूतजियम लाइब्रेरी’ में प्रवेश पा लिया और लगातार डेढ़ वर्ष तक ब्रिटिश दस्ता वेज व लेखन की खाक छानते रहे। उन दस्तारवेजों के खंघालने के बाद उन्हें पता चला कि 1857 का विद्रोह एक सैनिक विद्रोह नहीं, बल्कि देश का पहला स्वलतंत्रता संग्राम था। इसे उन्हों ने मराठी भाषा में लिखना शुरू किया।

10 मई 1908 को जब फिर से ब्रिटिश 1857 की क्रांति की वर्षगांठ पर लंदन में विजय दिवस मना रहे थे तो वीर सावरकर ने वहां चार पन्ने1 का एक पंपलेट बंटवाया, जिसका शीर्षक था ‘ओ मार्टर्स’ अर्थात ‘ऐ शहीदों’। आपने पंपलेट द्वारा सावरकर ने 1857 को मामूली सैनिक क्रांति बताने वाले अंग्रेजों के उस झूठ से पर्दा हटा दिया, जिसे लगातार 50 वर्षों से जारी रखा गया था। अंग्रेजों की कोशिश थी कि भारतीयों को कभी 1857 की पूरी सच्चारई का पता नहीं चले, अन्यशथा उनमें खुद के लिए गर्व और अंग्रेजों के प्रति घृणा का भाव जग जाएगा।

1910 में सावरकर को लंदन में ही गिरफतार कर लिया गया। सावरकर ने समुद्री सफर से बीच ही भागने की कोशिश की, लेकिन फ्रांस की सीमा में पकड़े गए। इसके कारण उन पर हेग स्थित अंतरराष्ट्रींय अदालत में मुकदमा चला। ब्रिटिश सरकार ने उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया और कई झूठे आरोप उन पर लाद दिए गए, लेकिन सजा देते वक्त न्यायाधीश ने उनके पंपलेट ‘ए शहीदों’ का जिक्र भी किया था, जिससे यह साबित होता है कि अंग्रेजों ने उन्हेंन असली सजा उनकी लेखनी के कारण ही दिया था। देशद्रोह के अन्ये आरोप केवल मुकदमे को मजबूत करने के लिए वीर सावरकर पर लादे गए थे।

वीर सावरकर की पुस्ततक ‘1857 का स्वायतंत्र समर’ छपने से पहले की 1909 में प्रतिबंधित कर दी गई। पूरी दुनिया के इतिहास में यह पहली बार था कि कोई पुस्तबक छपने से पहले की बैन कर दी गई हो। पूरी ब्रिटिश खुफिया एजेंसी इसे भारत में पहुंचने से रोकने में जुट गई, लेकिन उसे सफलता नहीं मिल रही थी। इसका पहला संस्केरण हॉलैंड में छपा और वहां से पेरिस होता हुए भारत पहुंचा। इस पुस्ताक से प्रतिबंध 1947 में हटा, लेकिन 1909 में प्रतिबंधित होने से लेकर 1947 में भारत की आजादी मिलने तक अधिकांश भाषाओं में इस पुस्तुक के इतने गुप्ते संस्कदरण निकले कि अंग्रेज थर्रा उठे।

भारत, ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, जापान, जर्मनी, पूरा यूरोप अचानक से इस पुस्ताकों के गुप्त, संस्कंरण से जैसे पट गया। एक फ्रांसीसी पत्रकार ई.पिरियोन ने लिखा, ”यह एक महाकाव्यक है, दैवी मंत्रोच्चांर है, देशभक्ति का दिशाबोध है। यह पुस्त क हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश देती है, क्योंचकि महमूद गजनवी के बाद 1857 में ही हिंदुओं और मुसलमानों ने मिलकर समान शत्रु के विरुद्ध युद्ध लड़ा।

यह सही अर्थों में राष्ट्रीाय क्रांति थी। इसने सिद्ध कर दिया कि यूरोप के महान राष्ट्रोंद के समान भारत भी राष्ट्रीरय चेतना प्रकट कर सकता है।”

आपको आश्च र्य होगा कि इस पुस्तक पर लेखक का नाम नहीं था..। –साभार

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जिस शख्स ने 1965 में पाक से युद्ध के दौरान खाना भी छोड़ दिया था ओर वेतन भी नही लिया ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री जी को उनकी जयंती पर शत शत नमन🙏🙏

दो घंटे युद्ध और चलता ! तो भारत की सेना ने लाहौर तक कब्जा कर लिया होता !!
लेकिन तभी पाकिस्तान को लगा कि जिस रफ्तार से भारत की सेना आगे बढ़ रही
हमारा तो पूरा अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा !

( भारत और पाकिस्तान के बीच १९६५ का युद्ध
भारत पाक युद्ध का भाग
तिथि – अगस्त – सितम्बर 23, 1965
स्थान -भारतीय उपमहाद्वीप
परिणाम-संयुक्त राष्ट्र के घोषनापत्र के द्वारा युद्धविराम .)

तभी पाकिस्तान ने अमेरिका से कहा कि वो किसी तरह से युद्ध रुकवा दे !!
अमेरिका जानता था कि शास्त्री जी इतनी जल्दी नहीं मानने वाले !! क्यूँ कि वो
पहले भी दो -तीन बार भारत को धमका चुका था !!

धमका कैसे चुका था ??

अमेरिका से गेहूं आता था भारत के लिए PL 48 स्कीम के अंडर ! ! PL मतलब
Public Law 48 ! जैसे भारत मे सविधान मे धाराएँ होती है,ऐसे अमेरिका मे PL
होता है ! तो बिलकुल लाल रंग का सड़ा हुआ गेंहू अमेरिका से भारत मे आता था !
और ये समझोता पंडित नेहरू ने किया था !!

जिस गेंहू को अमेरिका मे जानवर भी नहीं खाते थे उसे भारत के लोगो के लिए
आयात करवाया जाता था ! आपके घर मे कोई बुजुर्ग हो आप उनसे पूछ सकते हैं
कितना घटिया गेहूं होता था वो !! तो अमेरिका ने भारत को धमकी दी कि हम भारत को गेहूं देना बंद कर देंगे !
तो शास्त्री जी ने कहा हाँ कर दो ! फिर कुछ दिन बाद अमेरिका का ब्यान आया
कि अगर भारत को हमने गेंहू देना बंद कर दिया,तो भारत के लोग भूखे मर जाएँगे !!

शास्त्री जी ने कहा हम बिना गेंहू के भूखे मारे या बहुत अधिक खा के मरे !
तुम्हें क्या तकलीफ है ??
हमे भूखे मारना पसंद होगा बशर्ते तुम्हारे देश का सड़ा हुआ गेंहू खाके !! एक तो हम
पैसे भी पूरे दे,ऊपर से सड़ा हुआ गेहूं खाये ! नहीं चाहिए तुम्हारा गेंहू !!

फिर शास्त्री ने दिल्ली मे एक रामलीला मैदान मे लाखो लोगो से निवेदन किया कि
एक तरफ पाकिस्तान से युद्ध चल रहा है ! ऐसे हालातो मे देश को पैसे कि बहुत जरूरत पड़ती है ! सब लोग अपने फालतू खर्चे बंद करे ! ताकि वो domestic saving से देश
के काम आए ! या आप सीधे सेना के लिए दान दे ! और हर व्यति सप्ताह से एक दिन
सोमवार का वर्त जरूर रखे !!

तो शास्त्री जी के कहने पर देश के लाखो लोगो ने सोमवार को व्रत रखना शुरू कर दिया !

हुआ ये कि हमारे देश मे ही गेहूं बढ्ने लगा ! और शास्त्री जी भी खुद सोमवार का व्रत
रखा रखते थे !!शास्त्री जी ने जो लोगो से कहा पहले उसका पालन खुद किया ! उनके घर मे बाई आती थी !! जो साफ सफाई और कपड़े धोती थी ! तो शास्त्री जी उसको हटा दिया और बोला ! देश हित के लिए मैं इतना खर्चा नहीं कर सकता ! मैं खुद ही घर की सारी सफाई करूंगा ! क्यूंकि पत्नी ललिता देवी बीमार रहा करती थी !
और शास्त्री अपने कपड़े भी खुद धोते थे ! उनके पास सिर्फ दो जोड़ी धोती कुरता ही थी !!

उनके घर मे एक ट्यूटर भी आया करता था जो उनके बच्चो को अँग्रेजी पढ़ाया करता
था ! तो शास्त्री जी ने उसे भी हटा दिया ! तो उसने शास्त्री जी ने कहा कि आपका अँग्रेजी
मे फेल हो जाएगा ! तब शास्त्री जी ने कहा होने दो ! देश के हजारो बच्चे अँग्रेजी मे ही
फेल होते है तो इसी भी होने दो ! अगर अंग्रेज़ हिन्दी मे फेल हो सकते है तो भारतीय
अँग्रेजी मे फेल हो सकते हैं ! ये तो स्व्भविक है क्यूंकि अपनी भाषा ही नहीं है ये !!

एक दिन शास्त्री जी पत्नी ने कहा कि आपकी धोती फट गई है ! आप नई धोती ले
आईये ! शास्त्री जी ने कहा बेहतर होगा ! कि सुई धागा लेकर तुम इसको सिल दो !
मैं नई धोती लाने की कल्पना भी नहीं कर सकता ! मैंने सब कुछ छोड़ दिया है पगार
लेना भी बंद कर दिया है !! और जितना हो सके कम से कम खर्चे मे घर का खर्च चलाओ !!अंत मे शास्त्री जी युद्ध के बाद समझोता करने ताशकंद गए ! और फिर जिंदा कभी वापिस
नहीं लौट पाये !! पूरे देश को बताया गया की उनकी मृत्यु हो गई ! जब कि उनकी ह्त्या
कि गई थी !!

भारत मे शास्त्री जी जैसा सिर्फ एक मात्र प्रधानमंत्री हुआ ! जिसने अपना पूरा जीवन
आम आदमी की तरह व्तीत किया ! और पूरी ईमानदारी से देश के लिए अपना फर्ज
अदा किया !!
जिसने जय जवान और जय किसान का नारा दिया !!

क्यूंकि उनका मानना था देश के लिए अनाज पैदा करने वाला किसान और सीमा कि
रक्षा करने वाला जवान बहुत दोनों देश ले लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है !!

स्वदेशी की राह पर उन्होने देश को आगे बढ़ाया ! विदेशी कंपनियो को देश मे घुसने
नहीं दिया ! अमेरिका का सड़ा गेंहू बंद करवाया !!

ऐसा प्रधानमंत्री भारत को शायद ही कभी मिले ! अंत मे जब उनकी पासबुक चेक की गई तो सिर्फ 365 रुपए 35 पैसे थे उनके बैंक एकाउंट मे ! !

शायद आज कल्पना भी नहीं कर सकते ऐसा नेता भारत मे हुआ !!

मेरे आदर्श लालबहादुर शास्त्री ।।

शत शत नमन शास्त्री जी 🙏🙏

Devilal Boran

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बलिदान दिवस #

क्रान्तिवीरभंगीगंगूमेहतर गंगू मेहतर को कई नामों से पुकारा जाता है । भंगी जाति के होने से गंगू मेहतर, पहलवानी का शौक होने से गंगू पहलवान, सती चौरा गांव में इनका पहलवानी का अखाड़ा था, कुश्ती के दांव पेच एक मुस्लिम उस्ताद से सीखने के कारण गंगूदीन और लोग इन्हें श्रद्धा प्रकट करने के लिए गंगू बाबा कहकर भी पुकारते हैं । गंगू मेहतर के पुरखे जिले कानपुर के अकबरपुरा गांव के रहने वाले थे । उच्चवर्णों की बेगार, शोषण और अमानवीय व्यवहार से दुखी होकर इनके पुरखे कानपुर शहर के चुन्नी गंज इलाके में आकर रहने लगे थे । कानपुर में जन्मे ग़दर के जाबांज गंगादीन मेहतर जिन्हें गंगू बाबा के नाम से भी जाना जाता है । गंगू बाबा एक उच्च कोटि के पहलवान भी थे । वह 1857 में अंग्रेज़ों के विरुद्ध सतीचौरा के करीब वीरता से लड़े । 1857 की लडा़ई में इन्होने 200 अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा था । और 200 अंग्रेजो की मौत के कारण अंग्रेजी सरकार बहुत सहम सी गई थी । अंग्रेजी कुत्तों ने गंगू मेहतर जी को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया । और अंग्रेज़ कुत्ते की तरह इनके पीछे लग गए और वीर गंगू मेहतर जी अंग्रेजों से घोड़े पर सवार होकर वीरता से लड़ते रहे । अंत में गिरफ्तार कर लिए गए । जब वे गिरफ्तार हुए उनको हथकड़ियाँ और पैरों में बेड़ियाँ पहनाकर जेल की काल कोठरी में रखा गया था और कड़ा पहरा लगा दिया गया था । उसके बाद कानपुर में इन्है बिच चौराहा पर #8सितंबर_1859 फाँसी दे दी गई । लेकिन दुर्भाग्यवश भारत के इतिहास में इनका नामो निशान नही है । यह नाम जातिवाद के कारण इतिहास के पन्नों में कहीं सिमट सा गया है । अंतिम सांस तक अंग्रेजों को ललकारते रहे,, “भारत की माटी में हमारे पूर्वजों का खून व कुर्बानी कि गंध है, एक दिन यह मुल्क आजाद होगा ।” ~शहीद सिरोमणी गंगू मेहतर जी ऐसा कहकर उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को क्रान्ति का संदेश दिया और देश के लिए शहीद हो गए । कानपुर के चुन्नी गंज में इनकी प्रतिमा लगाई गई है । वहां इनकी स्मृति में हर वर्ष मेला लगता है । लोग श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं ।। इंकलाब जिन्दाबाद ।। इस तस्वीर कानपुर के सिविल सर्जन जॉन निकोलस का जिन्होंने गंगू मेहतर को फांसी देने के पहले ये तस्वीर लिया था । ~आजाद

via MyNt

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1957, दूसरी लोक सभा में अटल जी 33 साल की उम्र में पहली बार साँसद बने. उस समय लोक सभा में बैठने के लिए आज जैसी कुर्सियाँ नहीं होती थी और न ही संबोधन के लिए public adress system थे.
सदन में विदेश नीति पर चर्चा शुरू हुयी, अटल जी को भी बोलने का मौका मिला 472 सांसदों के सदन में आखिरी लाइन पर थे अटल जी .. और ज्योही उनका भाषण चालू हुआ, सदन में सन्नाटा, सिर्फ और सिर्फ अटल जी की आवाज !

भाषण ख़तम हुआ और प्रधानमंत्री नेहरू प्रथम पंक्ति से चल कर उनके पास आये, अटल जी के कंधे पर हाथ रख कर शाबाशी दी, क्यों की विदेश नीति पर बेहतरीन भाषण था उनका…
प्रधानमंत्री नेहरू ने पूछा “आप कौन सी रियासत के राज कुमार हो ?”

अटल जी ने सादगी से जवाब दिया, “मै राजकुमार नहीं हूँ, मै एक गरीब स्कूल मास्टर का बेटा हूँ!”

नेहरू ने पूछा “विदेश में पढ़े हो?”

अटल जी ने कहा “विदेश तो क्या, मै तो कभी झुमरितलैय्या भी नहीं गया !”

नेहरू ने आश्चर्यचकित होकर कहा “तुम कैसे जानते हो इतना सब कुछ विदेश नीति के बारे में?”

अटल जी ने कहा “किताबो के अध्यन से”…

नेहरू ने कहा “तुम जरुर एक दिन भारत के “प्रधानमंत्री” बनोगे. !”
मेरी विनम्र श्रद्धांजलि हे महामानव आप अमर रहे
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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स्वर्गीय अटल जी के 2 किस्से,जिसे पढ़कर आप जानेंगे क्यों विरोधी भी मुरीद थे उनके…..

1•
वर्ष 1957 का चुनाव था। अटल बिहारी वाजपेयी जी लखनऊ से चुनाव लड़ रहे थे। उनके सामने थे कांग्रेस से पुलिन बिहारी बनर्जी ‘दादा’। बनर्जी चुनाव जीते और अटलजी हार गए। जनसंघ के कार्यालय पर मौजूद लोग हार-जीत का विश्लेषण कर रहे थे, अटल जी उठे और कुछ लोगों के साथ पहुंच गए बनर्जी के घर।

अटल जी को घर के सामने देख दादा के घर मौजूद लोग हड़बड़ा गए। अटल जी बोले, ‘दादा जीत की बधाई। चुनाव में तो बहुत कंजूसी की लेकिन अब न करो; कुछ लड्डू-वड्डू तो खिलाओ।’


2•

श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान की बात है। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा था। अटल बिहारी वाजपेयी जी मीराबाई मार्ग स्थित स्टेट गेस्ट हाउस में भोजन कर रहे थे। रात में उन्हें दिल्ली लौटना था।

इतने में लखनऊ के जिलाधिकारी और तत्कालीन राज्यपाल के सलाहकार अचानक कमरे में आ गए। लालजी टंडन बोले अटलजी अभी भोजन कर रहे हैं।तत्कालीन जिलाधिकारी ने हाथ जोड़ते हुए कहा कि अमौसी हवाई अड्डे पर एक लड़का दिल्ली जाने वाले हवाई जहाज में चढ़ गया है। उसके हाथ में हथगोला जैसी कोई वस्तु है।

कह रहा है कि अटल बिहारी वाजपेयी को बुलाओ नहीं तो इस जहाज को उड़ा दूंगा। लालजी टंडन बोले – इस तरह अटलजी कैसे वहां जांएगे। इन्हें भी तो खतरा हो सकता है। पर, इसी बीच अटलजी खाना बीच में छोड़कर खड़े हो गए और बोले कि चलो चलते हैं। आखिर कइयों के जीवन का सवाल है।

अटल जी एयरपोर्ट पहुंचे और लगभग हट करते हुए खुद को हवाई जहाज के पास ले चलने को कहा। सबकी हालत खराब। जैसे-तैसे डीएम के साथ सब लोग जहाज के पास पहुंचे। लड़के ने अटलजी को अंदर बुलाया। वह अटलजी के पैर छूने झुका कि सुरक्षा बलों ने उसे दबोच लिया।

लड़के ने हाथ में ली वस्तु को फेंकते हुए कहा कि यह कुछ नहीं, सिर्फ सुतली का गोला है। अटलजी ने भाजपा के लोगों से कहा कि इसने नादानी में इस तरह की घटना को अंजाम दे दिया। इसकी जमानत जरूर करा देना जिससे इसका भविष्य न खराब हो।

हवाई जहाज में अंदर कांग्रेस के बड़े नेता और लंबे समय तक कोषाध्यक्ष रहे सीताराम केसरी भी बैठे हुए थे। अटलजी को देखकर बोले, ‘जब हमें मालूम हुआ कि आप लखनऊ में हैं तो मेरी जान में जान आ गई थी कि आप जरूर आ जाएंगे। हम लोग बच जाएंगे।’

साभार – रूद्र दुबे भाई

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संजय गुप्ता

अपने जबरदस्त भाषणों से अटल बिहारी वाजपेयी ने सबको हिला दिया था..
अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के रूप में तीन बार देश का नेतृत्व किया है। इस दौरान उन्होंने अपने भाषणों से सबको हिलाकर रख दिया। वे पहली बार साल 1996 में 16 मई से 1 जून तक, 19 मार्च 1998 से 26 अप्रैल 1999 तक और फिर 13 अक्टूबर 1999 से 22 मई 2004 तक देश के प्रधानमंत्री रहे हैं। एक बार अटल बिहारी वाजपेयी पर विरोधी पार्टियों ने आरोप लगाया था कि उनको सत्ता का लोभ है।
इस पर अटल जी ने लोकसभा में खुलकर बात की और अपने भाषण से सभी को हिलाकर रख दिया था। उन्होंने न सिर्फ विरोधियों को जवाब दिया, बल्कि भगवान राम का दिया हुआ श्लोक पढ़ते हुए कहा था- भगवान राम ने कहा था कि ‘मैं मरने से नहीं डरता, डरता हूं तो सिर्फ बदनामी से डरता हूं.’ जिसके बाद विरोधियों ने कभी उन पर ऐसा आरोप नहीं लगाया। उन्होंने ये भाषण 28 मई 1996 में आत्मविश्वास प्रस्ताव के दौरान दिया था। अटल बिहारी वाजपेयी के भाषणों को सुनने के लिए विपक्ष भी शांत बैठा करता था। उनके भाषण हमेशा ही मजेदार होते थे। लोग तो यहां तक कहते हैं कि अब उन सा भाषण देने वाला कोई नेता रहा ही नहीं।

अटल बिहारी वाजपेयी को लेकर ये भी सुनने को मिलता है कि एक बार अटल जी के भाषण को सुनने के लिए लोग भीषण ठंड और बारिश में भी लंबे समय तक एक ही जगह पर डटी रही। इमरजेंसी के दौरान वाजपेयी जेल में बंद थे। फिर इंदिरा गांधी ने चुनाव की घोषणा कर दी। उसके बाद सब लोग छूट गए। चुनाव प्रचार के लिए कम वक्त मिला था। दिल्ली में जनसभा हो रही थी। जनता पार्टी के नेता आकर स्पीच देते थे। पर सब थके हुए से लगते थे। फिर भी जनता हिल नहीं रही थी। ठंड थी, और बारिश भी हल्की-हल्की होने लगी थी। तभी एक नेता ने बगल वाले से पूछा कि लोग जा क्यों नहीं रहे। बोरिंग स्पीच हो रही है और ठंड भी है। तो जवाब मिला कि अभी अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण होना है, इसीलिए लोग रुके हुए हैं।

अटल जी के भाषण की कुछ ऐसी रहती थी शैली-

बाद मुद्दत के मिले हैं दिवाने, कहने सुनने को बहुत हैं अफसाने।
खुली हवा में जरा सांस तो ले लें, कब तक रहेगी आजादी कौन जाने।

इस तरह की जुगलबंदी में अटल जी माहिर थे, इन पंक्तियों को सुनाने के बाद उन्होंने खुद बताया था कि दूसरी लाइन उन्होंने तुरंत बना दी थी। जिससे जनता मंत्रमुग्ध हो गई थी। याद दिला दें कि इंदिरा गांधी ने एक बार अटल जी की आलोचना की थी कि वो बहुत हाथ हिला-हिलाकर बात करते हैं। इस पर अटल जी ने जवाब में कहा कि वो तो ठीक है, आपने किसी को पैर हिलाकर बात करते देखा है क्या।

1994 में यूएन के एक अधिवेशन में पाकिस्तान ने कश्मीर पर भारत को घेर लिया था। उस दौरान प्रधानमंत्री नरसिंहा राव ने भारत का पक्ष रखने के लिए नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी को भेजा था।वहां पर पाक के नेता ने कहा कि कश्मीर के बगैर पाकिस्तान अधूरा है। तो जवाब में वाजपेयी ने कहा कि पाकिस्तान के बगैर हिंदुस्तान अधूरा है।

पाकिस्तान के ही मुद्दे पर अटल बिहारी की बड़ी आलोचना होती कि ताली दोनों हाथ से बजती है। अटल जी अकेले ही उत्साहित हुए जा रहे हैं। तो वाजपेयी ने जवाब में कहा कि एक हाथ से चुटकी तो बज ही सकती है।
अटल जी सबको हंसाते हुए भाषण शुरू किया करते थे-

अटल बिहारी वाजपेयी जिस वक्त देश के प्रधानमंत्री बने थे, उस समय संसद में विश्वास मत के दौरान उन्होंने बहुत प्रभावी भाषण दिया था। उन्होंने सदन में भारतीय जनता पार्टी को व्यापक समर्थन हासिल नहीं होने के आरोपों को लेकर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने कहा था कि ये कोई आकस्मिक चमत्कार नहीं है कि हमें इतने वोट मिल गए हैं। ये हमारी 40 साल की मेहनत का नतीजा है। हम लोगों के बीच गए हैं और हमने मेहनत की है। हमारी 365 दिन चलने वाली पार्टी है, ये चुनाव में कोई कुकुरमुत्ते की तरह पैदा होने वाली पार्टी नहीं है। उन्होंने कहा था कि आज हमें सिर्फ इसलिए कटघरे में खड़ा कर दिया गया क्योंकि हम थोड़ी ज्यादा सीटें नहीं ला पाए।

15 अगस्त 2003 को लाल किले की प्राचीर से दिया अटल जी का अंतीम भाषण

प्यारे देशवासियो आज देश ऐसे मोड़ पर है जहां से देश एक लंबी छलांग लगा सकत है, भारत को 2020 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के बड़े धेय्य को हासिल करने की तमन्ना सारे देश में बल पकड़ रही है। जरा पीछें मुड़कर देखिए, बड़े बड़े संकटों का सामना करके भारत आगे बढ़ रहा है।
ये बाबरी मस्जिद का विवादास्पद भाषण-

1992 को भाजपा नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बड़ी रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि वहां (अयोध्या) नुकीले पत्थर निकले हैं। उन पर तो कोई नहीं बैठ सकता तो जमीन को समतल करना पड़ेगा, बैठने लायक करना पड़ेगा। यज्ञ का आयोजन होगा तो कुछ निर्माण भी होगा। कम से कम वेदी तो बनेगी। मैं नहीं जानता कल वहां क्या होगा। मेरी अयोध्या जाने की इच्छा है, लेकिन मुझे कहा गया है कि तुम दिल्ली रहो।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिया था ऐतिहासिक भाषण

अटल जी को हिंदी भाषा से काफी लगाव है। इस लगाव का असर उस वक्त भी देखा जा सकता था जब 1977 में जनता सरकार में विदेश मंत्री के तौर पर काम कर रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ में अपना पहला भाषण हिंदी में देकर सभी के दिल में हिंदी भाषा का गहरा प्रभाव छोड़ दिया था।

पोखरण के परमाणु परीक्षण पर भाषण-

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते हुए भारत ने पोखरण में सफल परमाणु परीक्षण किया था, जिसके बाद पाकिस्तान से लेकर अमेरिका तक की नींद उड़ गई थी। इस परीक्षण को रोकने के लिए अमेरिका ने भारत पर नजर गड़ाए हुई थी, लेकिन सबको मात देते हुए भारत ने यह कर दिखाया। इस पर वाजपेयी का दिया भाषण ऐतिहासिक साबित हुआ था।

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माँ भारती के इस बलिदानी बेटे का जन्म 23 जुलाई 1906 मध्यप्रदेश के गांव भाँवरा में हुआ ।
ये शहीदे आजम भगत सिंह से लगभग 1 वर्ष 2 महीने बड़े थे
भारत माता उस समय परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ी हुई थी अंग्रेजों ने भारतीयों को मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिये,
1857 की क्रांति की पुनरावर्ती से बचने के लिये और भारतीयों के गुस्से को एक मंच के माध्यम से बचने के लिये अंग्रेज अधिकारी ए.ओ.ह्यूम 1885 काँग्रेस की स्थापना कर चुके थे और अब दौर आया क्रान्तिकारियों के जन्म का। अधिकतर क्रांतिकारी 1905 से 1908 के बीच में जन्म लिये थे जिनमें हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के संस्थापक अमर शहीद #चंद्रशेखरआजाद, नौजवान भारत सभा के संस्थापक शहीदे आजम #भगतसिंह, बटुकेश्वर दत्त , राजगुरु , सुखदेव , दुर्गा भाभी , आदि बड़ी संख्या में थे इधर क्रांति जन्म ले रहे थे ,और दूसरी तरफ काँग्रेस को अंग्रेजो के हाथ की कटपुतली बना देख , #लालालाजपतराय , बिपिन चन्द्र पाल , और बाल गंगाधर तिलक ने उस काँग्रेस से किनारा कर लिया और काँग्रेस 2 हिस्सो में बट गई गर्म दल ओर नरम दल। जब -जब जिस जिसको भी अंग्रेजो और काँग्रेस की मिली भगत का पता चलता वो वो कोंग्रेस छोड़ देता जैसे नेता जी सुभाष चन्द्र बोस कोंग्रेस में मगर सत्य का पता चलने पर कोंग्रेस को छोड़ दिया।

ऐसे ही अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद का बचपन भी क
काँग्रेस में बिता और कोंग्रेस के आंदोलन में बालक चंद्रशेखर ने भी बचपन में भाग लिया , चंद्रशेखर की गिरफ्तारी हुई कोड़े लगाए गए , और गिरफ्तार बालक को बना दिया आज़ाद , और जीवन भर आजादी के लिये संघर्ष करने वाले मां भारती के सच्चे सपूत ने इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क (वर्तमान के आज़ाद पार्क) में , #नेतराम_हलवाई (जिसकी दुकान अभी इलहाबाद आज़ाद पार्क के सामने है ) मोती लाल नेहरू (जिनका परिवार आज़ादी दिलाने का दम्भ भरता है) की #मुखबरी से 28 फरवरी 1931 को जब वो शहीदे आजम भगत को जेल से छुड़वाने की योजना बना रहे थे।
अंग्रेजो की पूरी बटालियन ने उन्हें घेर लिया , और माँ भारती के सच्चे सपूत ने अकेले घंटो तक अंग्रेजो का सामना किया अनेक अंग्रेजो को मृत्यु शय्या पर सुला दिया।
अंत में उनके पास 1 गोली बची उस अंतिम शेष बची गोली से और अपनी .32 mm की पिस्टल से खुद को गोली मारकर कभी जीवित अंग्रेजो के हाथ न आने वाली प्रतिज्ञा को पूरा करते हुए माँ भारती के चरणों में राष्ट्र के गौरव इस बेटे ने अपना अमर बलिदान दे दिया ।

माँ भारती के बलिदानी बेटे को आज 23 जुलाई को ,उनकी जयंती पर शत् शत् नमन !

हम #ह्रदयकीगहराईयों से #अश्रुपूर्ण_श्रद्धांजलि देते है।।