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भारत की राजधानी के ऐतिहासिक नगर – –


भारत की राजधानी के ऐतिहासिक नगर – – – –
हापुड़- – – –
हापुड़ शब्द ‘हापर’ से बना है जिसका मतलब बगीचा होता है। यहां गंगा नदी की पूर्वी सीमा पर प्रसिद्ध `गढ़मुक्तेश्वर मंदिर है।
भगवान श्रीराम के पूर्वज महाराज शिव ने अपना चतुर्थ आश्रम गढ़मुक्तेश्वर में ही व्यतीत किया था। भगवान शिव ने भगवान श्री परशुराम द्वारा यहां शिव मंदिर की स्थापना कराई थी। इसलिए इसे शिववल्लभ यानी शिव का प्रिय क्षेत्र कहा जाता है। उस समय गढ़मुक्तेश्वर खाण्डवी वन क्षेत्र के नाम से जाना जाता था।
यह कुरु की राजधानी हस्तिनापुर का भाग था।
प्राचीन समय की बात है क्रोधमूर्ति महर्षि दुर्वासा मंदराचल पर्वत की गुफा में तपस्या कर रहे थे। भगवान शंकर के गण घूमते हुए वहां पहुंच गये। गणों ने तपस्यारत महर्षि का कुछ उपहास कर दिया। उससे कुपित होकर दुर्वासा ने गणों को पिशाच होने का शाप दे दिया। शिवगण व्याकुल होकर महर्षि के चरणों पर गिर पड़े और प्रार्थना करने लगे। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उनसे कहा – हे शिवगणो! तुम हस्तिनापुर के निकट खाण्डव वन में स्थित ‘शिववल्लभ’ क्षेत्र में जाकर तपस्या करो तो तुम भगवान आशुतोष की कृपा से पिशाच योनि से मुक्त हो जाओगे। पिशाच बने शिवगणों ने शिववल्लभ क्षेत्र में आकर कार्तिक पूर्णिमा तक तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन उन्हें दर्शन दिए और पिशाच योनि से मुक्त कर दिया। तब से शिववल्लभ क्षेत्र का नाम ‘गणमुक्तीश्वर’ पड़ गया। बाद में ‘गणमुक्तीश्वर’ का अपभ्रंश ‘गढ़मुक्तेश्वर’ हो गया।
भगवान विष्णु के गण जय और विजय को नारद श्राप के चलते मृत्यु लोक में आना पड़ा था। उन्होंने अपनी मुक्ति के लिए अनेक तीर्थ स्थलों की यात्रा की, लेकिन कहीं भी शाति नहीं मिली। अन्त में वे भी यहां आए और भगवान शकर की उपासना की। भगवान ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए, जिस पर दोनों गणों का उद्धार हुआ।
महाभारत के विनाशकारी युद्ध के बाद धर्मराज युधिष्ठिर, अर्जुन तथा कृष्ण के मन में युद्ध विभीषिका तथा नरसंहार को देखकर भारी ग्लानि पैदा हुई। युद्ध में मारे गये कुटुम्बियों, बंधुओं एवं निर्दोष व्यक्तियों की आत्मा की शाति के लिए देवउत्थान एकादशी से चतुर्दशी तक यज्ञ किया गया तथा चतुदर्शी की संध्या की दीपदान कर श्रद्धाजलि अर्पित की गयी।

इस तीर्थ को काशी से भी पवित्र माना गया है, क्योंकि इस तीर्थ की महिमा के विषय में पुराण में उल्लेख है-

काश्यां मरणात्मुक्ति: मुक्ति: मुक्तीश्वर दर्शनात्

इसी महत्व के कारण यहां प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक एक पखवाडे का विशाल मेला लगता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु आते हैं।

यहां ‘मुक्तीश्वर महादेव’ के सामने पितरों को पिंडदान और तर्पण (जल-दान) करने से गया श्राद्ध करने की जरूरत नहीं रहती।

महाभारत काल में यह गंगा के जल मार्ग से व्यापार का मुख्य केन्द्र था। उन दिनों यहां इमारती लकड़ी, बांस आदि का व्यापार होता था, जिसका आयात दून और गढ़वाल से किया जाता था। इसके साथ ही यहां गुड़ – गल्ले की बड़ी मंडी थी।
हस्तिनापुर से उत्तर दिशा की ओर पुष्पावती जो आज गंगा के किनारे बसा ग्राम पूठ है। वह भी खाण्डवी वन क्षेत्र था। उस समय पुष्पावती नाम का एक मनमोहन भव्य उद्यान था। द्रोपदी यहां स्थित फूलों की घाटी में प्राय: घूमने आया करती थीं।
हस्तिनापुर से पुष्पावती के बीच 35 किलोमीटर तक एक गुप्त मार्ग था, जिसके चिन्ह कुछ वर्ष पहले तक मौजूद थे।
यहां का मूढा़ उद्योग भी अति प्राचीन है। यहां के बने मूढे़ कई देशों में निर्यात किए जाते रहे हैं।
यहाँ नदी द्वारा हिमालय से लाये हुए अवसादों से बनी जलोढ़ मिट्टी है। फसलों के लिए बहुत उपजाऊ इस मिट्टी में विशेष रूप से गेहूं, गन्ना और सब्जियां उगती है।

यहाँ के निवासियों ने 1857 की क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इनमें मुख्य क्रांतिकारी थे- चौधरी जबरदस्त खाँ एवं चौधरी उल्फत खाँ। हापुड़ में 1857 में शहीद होने वाले क्रांतिकारियों की याद में 1975 ई. से प्रतिवर्ष शहीद मेले का आयोजन किया जाता है। जो 10 मई से शुरू होकर एक माह तक चलता है। सम्पूर्ण देश में 1857 से सम्बद्ध इस प्रकार के मेले का आयोजन अन्यत्र कहीं नही किया जाता।
सन 1900 के बाद गंगा गढ़मुक्तेश्वर से रूठ कर दूर होती गयीं। गढ़मुक्तेश्वर के निकट नये तीर्थ ब्रजघाट का प्रादुर्भाव हुआ।यह गढ़मुक्तेश्वर से पूर्व की दिशा में लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर गंगा किनारे स्थित हैं। सप्तपुरियों में गिनी जाने वाले हरिद्वार के उत्तराखंड में चले जाने पर उत्तर प्रदेश शासन की हरिद्वार के विकल्प में ब्रज घाट को हरिद्वार जैसा बनाने की योजना है। इसके लिए धन भी स्वीकृत हुआ है तथा योजना के तहत पुराने घाट को तोड़कर नये घाट का निर्माण हुआ है।
घाट पर ही हरिद्वार जैसा ‘घंटाघर’ भी बनवाया गया है।
हरिद्वार की तरह गंगा की आरती भी होने लगी है। हाल ही में योगीजी ने यहां आ कर यह संकल्प दोहराया है।

A whatsapp post of Rashtriya Vichar Abhiyan by Srivastava Anupam.

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द्मकुण्ड : विशिष्ट स्थापत्य विधान – Shri Krishan Jugnu


द्मकुण्ड : विशिष्ट स्थापत्य विधान

जलस्रोतों में “कुंड” एक विशेष प्रकार की रचना है तो उसमें भी एक निर्माण शैली है पद्मकुंड की। इसे कमल कुंड भी कहा जाता है। इसे कमलखेत के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यह पद्म उत्पन्न करता है।

पुष्करिणी, दीर्घिका, पोखरी, पोखरणी वगैरह भी इसके पर्याय हैं। हालांकि अपराजित, राजवल्लभ आदि शिल्प ग्रंथों में अनेक प्रकार के कुंडों का नामवार विवरण मिल जाता है और पुराणों में मत्स्य और सांबपुराण में इनका सुंदर विवरण है। इससे यह तो लगता ही है –

1. ये कुंड कृत्रिम बनाए जाते थे,
2. कुंडों की रचना पाषाणों से होती है,
3. पुष्पादि रूप में उनका संयोजन होता
4. कोणादि रूपों को भी दिखाया जाता।

भारतीय परंपरा में स्नान और देवालयों में स्नात्र आदि विधानों के लिए बड़े-बड़े कुंड उत्तर से लेकर दक्षिण तक बनाए गए हैं। कई नाम, कई रूप और उनके निर्माण की भी अपनी अपनी कहानियां और इतिहास है।

श्रीलंका तक कुंडों का वैभव देखा जा सकता है। वहां राजधानी के पास ही जेतवनराम परिसर में एक सुंदर कुंड है : पद्मपोखरी ( Lotus pond) यह करीब आठ सौ साल पुराना है। राजा पराक्रमबाहू (1153-86 ई.) के शासनकाल में इसका निर्माण हुआ। इसके प्रारंभिक अवशेष जेतवन की खुदाई में मिले।

इसकी रचना पद्म के आकार की है और नज़र एेसे आता है जैसे भूमिस्थ कमलाकार मंच हो जबकि यह बहुत पवित्र जलस्रोत रहा है। महावंश के उद्योग-निर्देश के मुताबिक इसका निर्माण हुआ। यह जानकर रोचक लगेगा यह पद्मकुंड अष्टकोण की रचना से बना हुआ है।

भूमितल से नीचे तक पांच प्रस्तर की तहें हैं और पुष्प के रूप में कुछ इस तरह गड़े हुए पत्थरों का संयोजन किया गया है वे मुकुलित पंखड़ियों से लेकर आंतरिक रूप तक को दिखाई दे।
इसकी रचना का नियम है :
360 ÷ 8 = 45°
इस तरह पांचों स्तर के पाषाणों को 45-45 डिग्री में सुघड़ बनाकर ऊपर से नीचे तक न्यून करते हुए संयोजित किया गया है। इससे यह वृताकार भी है और उसमें पंखुडी-पंखुड़ी पद्म प्रदर्शित करती है। दरअसल ये सीढ़ियां भी सिद्ध होती है। अंदर ही मोखी रूप में जलभरण और निकास रूप में जल निकालने का उपाय भी प्राचीन स्नानागार की तरह दिखाई देता है।

है न जलस्रोतों का अपना रचना विधान ! आपके आसपास भी तो कुछ एेसा जल कौतुक होगा, बताइयेगा। आदरणीयYogendra Pratap Singhh जी का आभार कि चित्र भेजकर इस स्थापत्य को विश्लेषित करने का अवसर सुलभ करवाया।…. जय जय

– श्रीकृष्ण “जुगनू”

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बीकानेर


बीकानेर स्थापना दिवस पर बीकानेर इतिहास की विशेष जानकारी :-
1. बीकाजी का जन्म 5 अगस्त 1438 में जोधपुर में हुवा!  इनके पिता राव जोधा व माता रानी नौरंगदे थी! 
2. आसोज सुदी 10, संवत 1522, सन 1465 को बीकाजी ने जोधपुर से कूच किया तथा पहले मण्डोर पहुंचे  !
3. राव बीका ने दस वर्ष तक भाटियों का मुकाबला किया मगर कुछ लाभ नहीं होता देख संवत 1442 में वर्तमान बीकानेर में आगये! 
4. बीकानेर का पुराना नाम “जांगळ प्रदेश “, तथा “विक्रमाखण्ड”,  “विक्रम नगर” या ” विक्रम पुरी” था !
5. बीकाजी की शादी करणी माता की उपस्थिति में पूगल के राव शेखा भाटी की पुत्री ” रंगकंवर ” के साथ हुई  !
6. बीकाजी ने करणी माता के हाथों विक्रम संवत 1542 में वर्तमान लक्ष्मीनाथ मन्दिर के पास बीकानेर के प्रथम किले की नींव रखी ! जिसका प्रवेशोत्सव संवत 1545, वैशाख सुदी 2, शनिवार को मनाया गया! 
7. बीकाजी की मृत्यु आसोज सुदी 3 संवत 1561, सन् 1504 को हुई! 
8. बीकानेर में राव बीकाजी से लेकर महाराजा नरेन्द्र सिंह तक कुल 24 शासक हुवे! 
9. महाराजा प्रताप सिंह बीकानेर के सबसे कम उम्र के शासक बने,  जब ये शासक बने तब इनकी आयु मात्र 6 वर्ष की थी  !
10. महाराजा दलपत सिंह जी सबसे अधिक आयु के शासक बने,  जब शासक बने तब इनकी आयु 46 वर्ष, 11 माह थी! 
11. बीकानेर पर सबसे कम समय तक राज करने वाले “महाराजा राजसिह ” थे जिन्होंने सिर्फ 21 दिन राज किया! 
12. बीकानेर में सबसे अधिक समय तक राज महाराजा गंगासिंह जी ने किया,  इनका कार्यकाल 55 वर्ष,  5 माह और 2 दिन रहा  !
13.  बीकानेर का जूनागढ़ संवत 1645 में बनना शुरू हुआ और संवत 1650 में बन कर तैयार हुवा,  जिसे महाराजा रायसिंह ने बनवाया था! जिसका जिम्मा महाराजा ने अपने दिवान करमचन्द बच्छावत को सौंपा था! जो बाद में रायसिंह से बगावत कर अकबर के साथ मिल गया था! 
14. जूनागढ़ किले की परिधि 1078 गज है !  परकोटे की दिवारें 14.5 फुट चौड़ी तथा 40 फुट ऊंची है  !
15. बीकानेर में सर्व प्रथम सिक्के ( मुद्रा ) सन् 1446-87 में महाराजा गजसिंह ने ढलवाये! यह कार्य महाराजा डूंगरसिंह जी तक जारी रहा, फिर बन्द होगया! 
16.  बीकानेर में सर्व प्रथम रेल 9 दिसम्बर सन् 1898 को ” चीलो ” से बीकानेर तक चली, जिसकी लम्बाई 47.75 मील थी!
17. बीकानेर में 5 दरवाजे है, 

(1) कोट गेट,  (2) जस्सुसर गेट, (3) नत्थुसर गेट,  (4) गोगा गेट तथा शीतला गेट!  वर्तमान में (6) विश्वकर्मा गेट और बन गया है  !
18. बीकानेर में 6 बारी (छोटे दरवाजे ) है 

(1) ईदगाह बारी (जिसे वर्तमान में “धर्म नगर द्वार ” कहते हैं, (2) बेणीसर बारी,  (3) पाबू बारी,  (4) कसाई बारी,  (5) हमालों की बारी तथा (6) पाबू बारी है!  वर्तमान में कुच्छेक और बन गई है! 
19.  गोगा गेट  रो पहले दिल्ली का दरवाजा कहते थे,  जिसकी स्थापना 12 अगस्त 1738 को हुई  !
20. जस्सुसर गेट को पहले ” यशवंत सागर दरवाजा ” कहते थे,  ( पुरातन विभाग में इसका उल्लेख ” जसवंत गेट” के नाम से मिलता हैं! 
21. नत्थुसर गेट का नाम पहले ” गणेश दरवाजा ” था  !

22. “जंगलधर शाह (जंगलधर बादशाह की उपाधी तत्कालीन राजपूत राजाओं ने बीकानेर के बादशाह करणसिंह को दी थी! 
23. सन् 1896 में पलाना के पास बरसिंहसर गांव में कोयला होने का पता चला!
यह सारी जानकारी जिन पुस्तकों से ली गयी हैं वो निम्न है  :-
तवारीख़ बीकानेर,  बीकानेर राज्य का इतिहास, बीकानेर का इतिहास तथा बीकानेर के शिलालेख

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पटना का प्राचीन नाम


पाटलिपुत्र (पटना) का स्वर्णिम अतीत !!!

पटना नाम के संदर्भ में कहा जाता है कि यह
पटनदेवी (एक हिन्दू देवी) से प्रचलित हुआ है।

एक अन्य मत के अनुसार यह नाम संस्कृत
के पत्तन से आया है जिसका अर्थ बन्दरगाह
होता है।

मौर्यकाल के यूनानी इतिहासकार मेगास्थनिज
ने इस शहर को पालिबोथरा तथा चीनीयात्री
फाहियान ने पालिनफू के नाम से संबोधित
किया है।

बिहार की राजधानी पटना को सभी
जानते हैं।

यह दुनिया की एक प्राचीन नगरी रही है।
यही नहीं,बॉलीवुड की कई फिल्मों में इसका नाम भी आ चुका है।
इस शहर को पहले पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था।

पाटलिपुत्र अर्थात वर्तमान पटना का इतिहास काफी प्राचीन है।

यह हजारों साल प्राचीन शहर है।
इस ऐतिहासिक नगरी में कई ऐसे सम्राट हुए,जिन्होंने अपनी राजधानी पटना में
बनाई और पूरे देश की सत्ता पर राज किया।

लेकिन,क्या आप जानते हैं कि बिहार की राजधानी रही पटना का निर्माण कैसे हुआ ?
इसका नाम पटना कैसे पड़ा ?
इसके इतिहास को जानने के बाद आप भी एक बार चकित हो सकते हैं।

लोककथाओं के अनुसार,राजा पत्रक को पटना का जनक कहा जाता है।

ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने अपनी रानी
पाटलि के लिये जादू से इस नगर का निर्माण
किया।

इसी कारण नगर का नाम पाटलिग्राम पड़ा।
बाद में इसका नाम पाटलिपुत्र और अब पटना हो गया है।
संस्कृत में पुत्र का अर्थ बेटा तथा ग्राम का अर्थ गांव होता है।
लेकिन,हम आपको बताएंगे कि आखिर कैसे पाटलिपुत्र बना पटना।

यह ऐतिहासिक नगर पिछली दो सहस्त्राब्दियों में कई नाम पा चुका है,जिसमें पाटलिग्राम,
पाटलिपुत्र,पुष्पपुर,कुसुमपुर,अजीमाबाद
और पटना है।

ऐसा समझा जाता है कि वर्तमान नाम शेरशाह सूरी के समय से प्रचलित हुआ।
किन्तु कैसे और किसने किया पटना का नामकरण।

पटना नाम के संदर्भ में कहा जाता है कि यह पटनदेवी (एक हिन्दू देवी) से
प्रचलित हुआ है।

एक अन्य मत के अनुसार यह नाम संस्कृत
के पत्तन से आया है जिसका अर्थ बन्दरगाह होता है।

मौर्यकाल के यूनानी इतिहासकार मेगास्थनिज
ने इस शहर को पालिबोथरा तथा चीनीयात्री फाहियान ने पालिनफू के नाम से संबोधित किया है।

प्राचीन पटना सोन और गंगा नदी के संगम पर स्थित है।
सोन नदी आज से दो हजार वर्ष पूर्व अगमकुंआ से आगे गंगा मे मिलती थी।

अभी फिलहाल इन दोनों नदियों का संगम पाटलिग्राम मे गुलाब (पाटली का फूल)
काफी मात्रा में उपजाया जाता था।

गुलाब के फूल से तरह-तरह के इत्र,दवा
आदि बनाकर उनका व्यापार किया जाता
था इसलिए इसका नाम पाटलिग्राम हो गया।

पुरातात्विक अनुसंधानो के अनुसार पटना
का इतिहास 490 ईसा पूर्व से होता है जब हर्यक वंश के शासक अजातशत्रु ने अपनी राजधानी राजगृह या राजगीर से बदलकर
यहां स्थापित की।

यह स्थान वैशाली के लिच्छवियों से संघर्ष
में उपयुक्त होने के कारण राजगृह की
अपेक्षा सामरिक दृष्टि से अधिक
महत्वपूर्ण था।

उसने गंगा के किनारे यह स्थान चुना और
अपना दुर्ग स्थापित कर लिया।
उस समय से इस नगर का इतिहास लगातार बदलता रहा है।

मौर्य काल के आरंभ में पाटलिपुत्र के अधिकांश राजमहल लकड़ियों से बने थे,पर सम्राट अशोक ने नगर को शिलाओं की संरचना मे तब्दील
किया।

2500 वर्षों से अधिक पुराना शहर होने का
गौरव दुनिया के बहुत कम नगरों को हासिल है।

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध अपने अन्तिम दिनों में यहां से गुजरे थे।

उनकी यह भविष्यवाणी थी कि नगर का भविष्य उज्जवल होगा,बाढ़ या आग के कारण नगर को खतरा बना रहेगा।
मौर्य साम्राज्य के उत्कर्ष के बाद पाटलिपुत्र सत्ता का केन्द्र बन गया।
चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य बंगाल की खाड़ी से अफ़गानिस्तान तक फैल गया था।

पटना गंगा के दक्षिणी तट पर स्थित है।
गंगा नदी नगर के साथ एक लम्बी तट रेखा बनाती है।
पटना का विस्तार उत्तर-दक्षिण की अपेक्षा
पूर्व-पश्चिम में बहुत अधिक है।
नगर तीन ओर से गंगा,सोन नदी और पुनपुन नदी नदियों से घिरा है।
नगर से ठीक उत्तर हाजीपुर के पास गंडक नदी भी गंगा में आ मिलती है।

हाल के दिनों में पटना शहर का विस्तार पश्चिम की ओर अधिक हुआ है और यह दानापुर से
जा मिला है।

पटन देवी का मंदिर सिद्ध शक्ति स्थल है।

महादेव के तांडव के दौरान सती के शरीर के
51 खंड हुए।
ये अंग जहां-जहां गिरे,वहां-वहां शक्तिपीठ स्थापित की गई।
यहां सती की दाहिनी जांघ गिरी थी।

गुलजार बाग इलाके में स्थित बड़ी पटन
देवी मंदिर परिसर में काले पत्थर की बनी
महाकाली,महालक्ष्मी और महासरस्वती की प्रतिमा स्थापित हैं।
इसके अलावा यहां भैरव की प्रतिमा भी है।

जिस प्रकार मैकाले की शिक्षा पद्धति के दुष्प्रभाव से हमने राम को रामा (RAMA)
कृष्ण को कृष्णा (KRISHNA) ब्रह्म को
ब्रह्मा (BRAHMA)शिव को शिवा (SHIVA)
योग को योगा (YOGA) लिखना आरंभ किया ठीक उसी प्रकार अंग्रेजों के शासनकाल
में पटन (PATAN) को पटना (PATANA = PATNA) लिखा जाने लगा।

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,,
जयति पुण्य भूमि भारत,,,

सदा सर्वदा सुमंगल,,,
वंदेमातरम,,,
जय भवानी,,
जय श्री राम

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इंजीनियरिंग की दुनिया को चुनौती है 1000 साल पुरानी यह बावड़ी


गर्वीलो गुजरात

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इंजीनियरिंग की दुनिया को चुनौती है 1000 साल पुरानी यह बावड़ी
पाटण। ‘कुछ दिन तो गुजारिए गुजरात में’… बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन का यह संवाद तो आपने सुना ही होगा। दरअसल गुजरात है ही ऐसा राज्य, जहां कदम-कदम पर ऐसी खूबसूरत जगहें मौजूद हैं, जो आपका दिल खुश कर देती हैं। कहीं, कच्छ का सूखा रण आपको तपाता तो दूसरे ही पल समुद्र की लहरें भिगो देती हैं। कहीं, आध्यशक्ति के दर्शन होंते हैं तो कहीं यहां के गौरवपूर्ण इतिहास के साक्षात दर्शन।
वैसे तो गुजरात में सैकड़ों दर्शनीय स्थल हैं, लेकिन हेरीटेज वीक (19 से 25 नवंबर) पर आज हम आपको पाटण (गुजरात की प्राचीन राजधानी) में स्थित ‘रानी की वाव’ की यात्रा करवाने ले जा रहे हैं। दरअसल यह प्राचीन (10-11वीं ई.) समय की वास्तुकला का ऐसा बेजोड़ नमूना है, जिसकी तारीफ शब्दों में करना शायद संभव ही नहीं। इसी के चलते इस बावड़ी को (सीढ़ीदार कुआं) को 23 जून, 2014 को यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल में सम्मिलित किया गया है।
‘रानी की वाव’ वास्तुकला का वह बेजोड़ नमूना है, जो आधुनिक इंजीनियरिंग की दुनिया को भी आश्चर्यचकित कर सकता है। इसका निर्माण 10-11वीं सदी में सोलंकी राजवंश की रानी उदयमती ने पति भीमदेव सोलंकी की याद में करवाया था। यह प्रेम का प्रतीक कहलाती है।
राजा भीमदेव ही सोलंकी राजवंश के संस्थापक थे। भीमदेव गुजरात के सोलंकी वंश के शासक थे। उन्होंने वडनगर (गुजरात) पर 1021-1063 ई. तक शासन किया।
करीब 64 मीटर लंबी और 20 मीटर चौड़ी यह बावडी 27 मीटर गहरी है। ज्यादातर सीढ़ी युक्त कुओं में सरस्वती नदी के जल के कारण कीचड़ भर गया है। निर्माण कार्य में नक्काशीदार पत्थरों का प्रयोग किया गया है। अभी भी वाव के खंभे और उन पर उकेरी गईं कलाकृतियां सोलंकी वंश और उनके वास्तुकला के चमत्कार के समय में ले जाते हैं।
वाव की दीवारों और स्तंभों पर अधिकांश नक्काशियां, राम, वामन, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि, आदि जैसे अवतारों के विभिन्न रूपों में भगवान विष्णु को समर्पित हैं। मूल रूप से बावड़ी सात मंजिल की थी, किन्तु इसकी पांच मंजिलों की ही संरक्षित रखा जा सका है
रानी वाव की बनावट विशिष्ट श्रेणी की है। इसकी सीढ़ियां सीधी हैं, लेकिन इस पर बनी कलाकृतियां अपने-आप में अनूठी हैं। सीढ़ियों पर बने आलिए तथा मेहराब हालांकि अब टूट-फूट चुके हैं, लेकिन फिर भी वे तत्कालीन समय की समृद्ध कारीगरी के दर्शन करवाते हैं। वाव की दीवारों पर लगी कलात्मक खूंटियां भी दिलकश हैं।
इस वाव में एक छोटा द्वार भी है, जहां से 30 किलोमीटर लम्बी सुरंग निकलती है। हालांकि अब यह अब पत्थरों व कीचड़ से अवरोधित हो गई है। इसके बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि प्राचीन समय में ही इसे रानी ने बंद करवा दिया था। यह सुरंग पाटण के सिद्धपुर शहर को निकलती है।
इस सुरंग का निर्माण पराजय के दौरान भागने के लिए करवाया गया था। इस सुरंग का निर्माण भी इस तरह किया गया था कि इसकी जानकारी सिर्फ राजा रानी और उनके विश्वस्त सैनिकों को ही थी। यानी की महल पर कब्जा होने के बाद भी दुश्मन उनकी तलाश कर पाने में असमर्थ थे।
गुजरात की प्राचीन राजधानी थी पाटण…
महेसाणा जिले से 25 मील दूर स्थित पाटण प्राचीन समय में गुजरात की राजधानी हुआ करती थी। भीमदेव प्रथम और सिद्धराज जयसिंह जैसे प्रतापी शासकों की वजह से पाटण का न सिर्फ वैभव बढ़ा, बल्कि ऐतिहासिक पुस्तकों में इसका नाम बार-बार आता है। मौजूदा वक्त में पाटण अपनी पटोला साड़ियों, सहस्रलिंग तालाब और रानी की वाव स्मारक की वजह से मशहूर है, जो वास्तुकला का अनूठा नमूना है। इस जिले में कई और ऐतिहासिक स्थान हैं, मसलन सिद्धपुर, जहां मातृ तर्पण के लिए पूरे देश से लोग आते हैं।
पाटण का उल्लेख महाभारत में भी…
पाटण का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। महाभारत के अनुसार भीम ने यहीं पर हिडिंब राक्षस को मारकर उसकी बहन हिडिंबा से विवाह किया था। पाटण में एक सहस्त्रलिंग झील है, जिसके किनारे दर्जनों खंडहर आज भी मौजूद हैं। यहां खुदाई में अब तक कई बहुमूल्य स्मारक मिल चुके हैं। मसलन, पार्श्वनाथ मंदिर, रानी महल और ‘रानी वाव’।
राजा भीमदेव सोलंकी:
राजा भीमदेव ही सोलंकी राजवंश के संस्थापक थे। भीमदेव प्रथम गुजरात के सोलंकी वंश के शासक थे। उन्होंने वडनगर (गुजरात) पर 1021-1063 ई. तक शासन किया। लेकिन 1025-1026 ईं में जब सोमनाथ और उसके आसपास के क्षेत्रों को विदेशी आक्रमणकारी महमूद गजनी ने अपने कब्जे में कर लिया था। गजनी के आक्रमण के प्रभाव के अधीन होकर सोलंकियों ने अपनी शक्ति और वैभव को गंवा दिया था।
सोलंकी साम्राज्य की राजधानी कही जाने वाली ‘अहिलवाड़ पाटण’ भी अपनी महिमा, गौरव और वैभव को गंवाती जा रही थी जिसे बहाल करने के लिए सोलंकी राज परिवार और व्यापारी एकजुट हुए और उन्होंने गुजरात में संयुक्त रूप से भव्य और खंडित मंदिरों के निर्माण के लिए अपना योगदान देना शुरू किया।
भीमदेव सोलंकी ने ही करवाया था सूर्य मंदिर का निर्माण…
मोढ़ेरा के विश्व प्रसिद्ध सूर्य मंदिर, जो अहमदाबाद से तकरीबन सौ किलोमीटर की दूरी पर पुष्पावती नदी के तट पर स्थित है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण सम्राट भीमदेव सोलंकी प्रथम (ईसा पूर्व 1022-1063 में) ने ही करवाया था। इसकी पुष्टि एक शिलालेख से होती है, जो मंदिर के गर्भगृह की दीवार पर लगा है, जिसमें लिखा गया है- ‘विक्रम संवत् 1083 अर्थात् (1025-1026 ईसा पूर्व)।’
सोलंकी ‘सूर्यवंशी’ थे, वे सूर्य को कुलदेवता के रूप में पूजते थे। इसीलिए उन्होंने अपने आद्य देवता की आराधना के लिए एक भव्य सूर्य मंदिर बनाने का निश्चय किया और इस प्रकार मोढ़ेरा के सूर्य मंदिर ने आकार लिया। भारत में तीन सूर्य मंदिर हैं, जिसमें पहला उड़ीसा का कोणार्क मंदिर, दूसरा जम्मू में स्थित मातर्ंड मंदिर और तीसरा गुजरात के मोढ़ेरा का सूर्य मंदिर है।

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जैसलमेर


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कृष्ण ने 1 तीर से इस किले में खोद डाला था कुआं, बुझाई थी अर्जुन की प्यास
जैसलमेर. यूनेस्को के विश्व धरोहरों में शामिल जैसलमेर का किला कई विशेषताओं के लिए फेमस है। इस किले में 99 बुर्ज हैं जिन पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए तोप रखे जाते थे। आज भी ये तोप देखे जा सकते हैं। इसे रेगिस्तान की बालू रेत से मिलते-जुलते गहरे पीले रंग के पत्थरों को बिना चूने की सहायता के आश्चर्यजनक ढंग से जोड़कर बनाया गया है। यह अपने आप में मौलिक और अनूठी विशेषता है। यह किला चारों ओर से रेत (मरुस्थल) से घिरा हुआ है। 858 साल से रेगिस्तान में खड़ा है यह किला, इस किले में 1200 से ज्यादा घर हैं।
इस किले से जुड़ी है महाभारत काल की कहानी। कहते हैं एक बार भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन यहां 80 मीटर ऊंची त्रिकुट पहाड़ी पर आये तब अर्जुन को बहुत तेज की प्यास लगी चारों तरफ पानी का नामोनिशान भी नहीं था तब भगवान श्रीकृष्ण ने तीर का प्रहार कर यहां पाताल तोड़ कुआं खोद दिया जिसके पानी से अर्जुन ने अपनी प्यास बुझाई आज भी यह कृष्ण कुण्ड के नाम से विख्यात है
क्यों कहते हैं गोल्डन फोर्ट…?
जैसलमेर की शान के रूप में माना जाने वाला यह किला ‘सोनार किला’ और ‘गोल्डन फोर्ट’ के नाम से जाना जाता है। यह किला पीले बलुआ पत्थर का किला सूर्यास्त के समय सोने की तरह चमकता है। इसे 1156 ई. में एक भाटी राजपूत शासक जैसल द्वारा त्रिकुट पहाड़ी के शीर्ष पर निर्मित किया गया था।
बॉलीवुड के लिए बना प्राइम लोकेशन
जैसलमेर के पर्यटन स्थल और यहां की विरासत बॉलीवुड के लिए प्राइम लोकेशन है। अब तक जैसलमेर में कई बॉलीवुड फिल्मों, एड, रीजनल फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। अभी तक यहां मुख्य रूप से कच्चे धागे, कृष्णा, सरफरोश, टशन, रुदाली और कोका कोला, बोरो प्लस, पेप्सी व हीरो होंडा जैसी कंपनियों की एड भी यहां शूट हो चुके हैं। उदयपुर स्थित लीला पैलेस यहां के सबसे बेहतरीन होटलों में शुमार होता है।
अकाल के समय चरणों में रख दी थी तलवार फिर हुई थी बारिश
किले में भगवान श्रीकृष्ण का एक मंदिर भी बना हुआ है जिनमें भगवान लक्ष्मीनाथ जी विराजे हुए हैं। संगमरमर की मूर्ति इतनी मोहक है कि दर्शन को आने वाले सैलानी भी एक बार टकटकी लगाये देखते रह जाते हैं। शांति समृद्धि के लिए भगवान को यहां एक विषेष प्रकार का पेड़ा प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है। कहते हैं जैसलमेर में जब भीषण अकाल पड़ा और जीवन त्रस्त हो गया तब यहां के महाराजा ने अपनी तलवार भगवान लक्ष्मीनाथ जी के चरणों में रख दी थी और यह प्रण लिया था कि जब तक बारिश नहीं होगी तब तक वे तलवार नहीं उठायेंगे। भगवान ने उनकी सुन ली और उस साल बारिश हुई।
आज भी मिलता है राजसी ठाठ का आनंद
यह किला धार्मिक महत्व भी रखता है। किले में प्राचीन काल के जैन मंदिर भी बने हुए हैं जो अपनी स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना पेष करते हैं। पत्थर के बाद पर्यटन ही यहां का मुख्य व्यवसाय है। कई लोगों ने अपने पुराने हवेलीनुमा घरों को भले ही पर्यटन के लिए खोल दिया हो लेकिन उन्होंने उसके मूल स्वरूप को नहीं बदला है। यहां आज भी पर्यटक राजसी अहसास का आनंद ले सकते हैं।
शहर की आबादी का एक चौथाई हिस्सा रहता है यहां
इस किले में कई खूबसूरत हवेलियां या मकान, मंदिर और सैनिकों तथा व्यापारियों के आवासीय परिसर हैं। वर्तमान में, यह शहर की आबादी के एक चौथाई के लिए एक आवासीय स्थान है। इस किले में 1200 से ज्यादा घर हैं। कभी अकाल झेल चुके इस किले में आज कई कुएं हैं जो यहां के लोगों के लिए पानी का स्रोत बने हुए हैं।
यहां के पत्थर हैं ‘अनमोल’
यहां पीले रंग का एक बेहद बेषकीमती पत्थर पाया जाता है जो यहां का मुख्य व्यवसास भी है। इस पत्थर से जुड़ा रोचक तथ्य यह है कि इसका पीला रंग सूर्य के प्रकाष में दोगुना हो जाता है। इससे यह सोने के रंग सा अहसास कराता है और कारीगरी के लिए यह पत्थर बेहद अच्छा है। कई हवेलियों और किले की स्थापत्य कला अपने आप में अनूठी बन पड़ी है। यह यहां की जालीदार नक्काषी, झरोखों के लिए भी जाना जाता है।

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भीटा इलाहाबाद


भीटा इलाहाबाद

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति

भीटा, इलाहाबाद
Bhita, Allahabad

प्रयाग से लगभग बारह मील दक्षिण-पश्चिम की ओर यमुना के तट पर कई विस्तृत खण्डहर हैं, जो एक प्राचीन समृद्धशाली नगर के अवशेष हैं। इन खण्डहरों से प्राप्त अभिलेखों में इस स्थान का प्राचीन नाम सहजाति है। भीटा, सहजाति इलाहाबाद से दस मील पर स्थित है।

उत्खनन

19091910 में भीटा में भारतीय पुरातत्त्व विभाग की ओर से मार्शल ने उत्खनन किया था। विभाग के प्रतिवेदन में कहा गया है कि खुदाई में एक सुन्दर, मिट्टी का बना हुआ वर्तुल पट्ट प्राप्त हुआ था, जिस पर सम्भवतः शकुन्तलादुष्यन्त की आख्यायिका का एक दृश्य अंकित है। इसमें दुष्यन्त और उनका सारथी कण्व के आश्रम में प्रवेश करते हुए प्रदर्शित हैं और आश्रमवासी उनसे आश्रम के हिरण को न मारने के लिए प्रार्थना कर रहा है। पास ही एक कुटी भी है, जिसके सामने एक कन्या आश्रम के वृक्षों को सींच रही है। यह मृत्खंड शुगकालीन है[1] और इस पर अंकित चित्र यदि वास्तव में दुष्यन्त व शकुन्तला की कथा [2] से सम्बन्धित हैं, तो महाकवि कालिदास का समय इस तथ्य के आधार पर, गुप्तकाल [3] के बजाए पहली या दूसरी शती से भी काफ़ी पूर्व मानना होगा। किन्तु पुरातत्त्व विभाग के प्रतिवेदन में इस दृश्य की समानता कालिदास द्वारा वर्णित दृश्य से आवश्यक नहीं मानी गई है।

भीटा से, खुदाई में मौर्यकालीन विशाल ईंटें, परवर्तिकाल की मूर्तियाँ, मिट्टी की मुद्राएँ तथा अनेक अभिलेख प्राप्त हुए हैं। जिनसे सिद्ध होता है कि मौर्यकाल से लेकर गुप्त काल तक यह नगर काफ़ी समृद्धशाली था। यहाँ से प्राप्त सामग्री लखनऊ के संग्रहालय में है। भीटा के समीप ही मानकुँवर ग्राम से एक सुन्दर बुद्ध प्रतिमा मिली थी, जिस पर महाराजाधिराज कुमारगुप्त के समय का एक अभिलेख उत्कीर्ण है. [4]

व्यापारिक नगर

सहजाति या भीटा, गुप्त और शुंग काल के पूर्व एक व्यस्त व्यापारिक नगर के रूप में भी प्रख्यात था क्योंकि एक मिट्टी की मुद्रा पर सहजातिये निगमस यह पाली शब्द तीसरी शती ई. पू. की ब्राह्मीलिपि में अंकित पाए गए हैं। इससे प्रमाणित होता है कि इतने प्राचीन काल में भी यह स्थान व्यापारियों के निगम या व्यापारिक संगठन का केन्द्र था। वास्तव में यह नगर मौर्यकाल में भी काफ़ी समुन्नत रहा होगा, जैसा कि उस समय के अवशेषों से सूचित होता है।