Posted in Bharat ke Nagar

द्मकुण्ड : विशिष्ट स्थापत्य विधान – Shri Krishan Jugnu

द्मकुण्ड : विशिष्ट स्थापत्य विधान

जलस्रोतों में “कुंड” एक विशेष प्रकार की रचना है तो उसमें भी एक निर्माण शैली है पद्मकुंड की। इसे कमल कुंड भी कहा जाता है। इसे कमलखेत के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यह पद्म उत्पन्न करता है।

पुष्करिणी, दीर्घिका, पोखरी, पोखरणी वगैरह भी इसके पर्याय हैं। हालांकि अपराजित, राजवल्लभ आदि शिल्प ग्रंथों में अनेक प्रकार के कुंडों का नामवार विवरण मिल जाता है और पुराणों में मत्स्य और सांबपुराण में इनका सुंदर विवरण है। इससे यह तो लगता ही है –

1. ये कुंड कृत्रिम बनाए जाते थे,
2. कुंडों की रचना पाषाणों से होती है,
3. पुष्पादि रूप में उनका संयोजन होता
4. कोणादि रूपों को भी दिखाया जाता।

भारतीय परंपरा में स्नान और देवालयों में स्नात्र आदि विधानों के लिए बड़े-बड़े कुंड उत्तर से लेकर दक्षिण तक बनाए गए हैं। कई नाम, कई रूप और उनके निर्माण की भी अपनी अपनी कहानियां और इतिहास है।

श्रीलंका तक कुंडों का वैभव देखा जा सकता है। वहां राजधानी के पास ही जेतवनराम परिसर में एक सुंदर कुंड है : पद्मपोखरी ( Lotus pond) यह करीब आठ सौ साल पुराना है। राजा पराक्रमबाहू (1153-86 ई.) के शासनकाल में इसका निर्माण हुआ। इसके प्रारंभिक अवशेष जेतवन की खुदाई में मिले।

इसकी रचना पद्म के आकार की है और नज़र एेसे आता है जैसे भूमिस्थ कमलाकार मंच हो जबकि यह बहुत पवित्र जलस्रोत रहा है। महावंश के उद्योग-निर्देश के मुताबिक इसका निर्माण हुआ। यह जानकर रोचक लगेगा यह पद्मकुंड अष्टकोण की रचना से बना हुआ है।

भूमितल से नीचे तक पांच प्रस्तर की तहें हैं और पुष्प के रूप में कुछ इस तरह गड़े हुए पत्थरों का संयोजन किया गया है वे मुकुलित पंखड़ियों से लेकर आंतरिक रूप तक को दिखाई दे।
इसकी रचना का नियम है :
360 ÷ 8 = 45°
इस तरह पांचों स्तर के पाषाणों को 45-45 डिग्री में सुघड़ बनाकर ऊपर से नीचे तक न्यून करते हुए संयोजित किया गया है। इससे यह वृताकार भी है और उसमें पंखुडी-पंखुड़ी पद्म प्रदर्शित करती है। दरअसल ये सीढ़ियां भी सिद्ध होती है। अंदर ही मोखी रूप में जलभरण और निकास रूप में जल निकालने का उपाय भी प्राचीन स्नानागार की तरह दिखाई देता है।

है न जलस्रोतों का अपना रचना विधान ! आपके आसपास भी तो कुछ एेसा जल कौतुक होगा, बताइयेगा। आदरणीयYogendra Pratap Singhh जी का आभार कि चित्र भेजकर इस स्थापत्य को विश्लेषित करने का अवसर सुलभ करवाया।…. जय जय

– श्रीकृष्ण “जुगनू”

Posted in Bharat ke Nagar

बीकानेर

बीकानेर स्थापना दिवस पर बीकानेर इतिहास की विशेष जानकारी :-
1. बीकाजी का जन्म 5 अगस्त 1438 में जोधपुर में हुवा!  इनके पिता राव जोधा व माता रानी नौरंगदे थी! 
2. आसोज सुदी 10, संवत 1522, सन 1465 को बीकाजी ने जोधपुर से कूच किया तथा पहले मण्डोर पहुंचे  !
3. राव बीका ने दस वर्ष तक भाटियों का मुकाबला किया मगर कुछ लाभ नहीं होता देख संवत 1442 में वर्तमान बीकानेर में आगये! 
4. बीकानेर का पुराना नाम “जांगळ प्रदेश “, तथा “विक्रमाखण्ड”,  “विक्रम नगर” या ” विक्रम पुरी” था !
5. बीकाजी की शादी करणी माता की उपस्थिति में पूगल के राव शेखा भाटी की पुत्री ” रंगकंवर ” के साथ हुई  !
6. बीकाजी ने करणी माता के हाथों विक्रम संवत 1542 में वर्तमान लक्ष्मीनाथ मन्दिर के पास बीकानेर के प्रथम किले की नींव रखी ! जिसका प्रवेशोत्सव संवत 1545, वैशाख सुदी 2, शनिवार को मनाया गया! 
7. बीकाजी की मृत्यु आसोज सुदी 3 संवत 1561, सन् 1504 को हुई! 
8. बीकानेर में राव बीकाजी से लेकर महाराजा नरेन्द्र सिंह तक कुल 24 शासक हुवे! 
9. महाराजा प्रताप सिंह बीकानेर के सबसे कम उम्र के शासक बने,  जब ये शासक बने तब इनकी आयु मात्र 6 वर्ष की थी  !
10. महाराजा दलपत सिंह जी सबसे अधिक आयु के शासक बने,  जब शासक बने तब इनकी आयु 46 वर्ष, 11 माह थी! 
11. बीकानेर पर सबसे कम समय तक राज करने वाले “महाराजा राजसिह ” थे जिन्होंने सिर्फ 21 दिन राज किया! 
12. बीकानेर में सबसे अधिक समय तक राज महाराजा गंगासिंह जी ने किया,  इनका कार्यकाल 55 वर्ष,  5 माह और 2 दिन रहा  !
13.  बीकानेर का जूनागढ़ संवत 1645 में बनना शुरू हुआ और संवत 1650 में बन कर तैयार हुवा,  जिसे महाराजा रायसिंह ने बनवाया था! जिसका जिम्मा महाराजा ने अपने दिवान करमचन्द बच्छावत को सौंपा था! जो बाद में रायसिंह से बगावत कर अकबर के साथ मिल गया था! 
14. जूनागढ़ किले की परिधि 1078 गज है !  परकोटे की दिवारें 14.5 फुट चौड़ी तथा 40 फुट ऊंची है  !
15. बीकानेर में सर्व प्रथम सिक्के ( मुद्रा ) सन् 1446-87 में महाराजा गजसिंह ने ढलवाये! यह कार्य महाराजा डूंगरसिंह जी तक जारी रहा, फिर बन्द होगया! 
16.  बीकानेर में सर्व प्रथम रेल 9 दिसम्बर सन् 1898 को ” चीलो ” से बीकानेर तक चली, जिसकी लम्बाई 47.75 मील थी!
17. बीकानेर में 5 दरवाजे है, 

(1) कोट गेट,  (2) जस्सुसर गेट, (3) नत्थुसर गेट,  (4) गोगा गेट तथा शीतला गेट!  वर्तमान में (6) विश्वकर्मा गेट और बन गया है  !
18. बीकानेर में 6 बारी (छोटे दरवाजे ) है 

(1) ईदगाह बारी (जिसे वर्तमान में “धर्म नगर द्वार ” कहते हैं, (2) बेणीसर बारी,  (3) पाबू बारी,  (4) कसाई बारी,  (5) हमालों की बारी तथा (6) पाबू बारी है!  वर्तमान में कुच्छेक और बन गई है! 
19.  गोगा गेट  रो पहले दिल्ली का दरवाजा कहते थे,  जिसकी स्थापना 12 अगस्त 1738 को हुई  !
20. जस्सुसर गेट को पहले ” यशवंत सागर दरवाजा ” कहते थे,  ( पुरातन विभाग में इसका उल्लेख ” जसवंत गेट” के नाम से मिलता हैं! 
21. नत्थुसर गेट का नाम पहले ” गणेश दरवाजा ” था  !

22. “जंगलधर शाह (जंगलधर बादशाह की उपाधी तत्कालीन राजपूत राजाओं ने बीकानेर के बादशाह करणसिंह को दी थी! 
23. सन् 1896 में पलाना के पास बरसिंहसर गांव में कोयला होने का पता चला!
यह सारी जानकारी जिन पुस्तकों से ली गयी हैं वो निम्न है  :-
तवारीख़ बीकानेर,  बीकानेर राज्य का इतिहास, बीकानेर का इतिहास तथा बीकानेर के शिलालेख

Posted in Bharat ke Nagar

पटना का प्राचीन नाम

पाटलिपुत्र (पटना) का स्वर्णिम अतीत !!!

पटना नाम के संदर्भ में कहा जाता है कि यह
पटनदेवी (एक हिन्दू देवी) से प्रचलित हुआ है।

एक अन्य मत के अनुसार यह नाम संस्कृत
के पत्तन से आया है जिसका अर्थ बन्दरगाह
होता है।

मौर्यकाल के यूनानी इतिहासकार मेगास्थनिज
ने इस शहर को पालिबोथरा तथा चीनीयात्री
फाहियान ने पालिनफू के नाम से संबोधित
किया है।

बिहार की राजधानी पटना को सभी
जानते हैं।

यह दुनिया की एक प्राचीन नगरी रही है।
यही नहीं,बॉलीवुड की कई फिल्मों में इसका नाम भी आ चुका है।
इस शहर को पहले पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था।

पाटलिपुत्र अर्थात वर्तमान पटना का इतिहास काफी प्राचीन है।

यह हजारों साल प्राचीन शहर है।
इस ऐतिहासिक नगरी में कई ऐसे सम्राट हुए,जिन्होंने अपनी राजधानी पटना में
बनाई और पूरे देश की सत्ता पर राज किया।

लेकिन,क्या आप जानते हैं कि बिहार की राजधानी रही पटना का निर्माण कैसे हुआ ?
इसका नाम पटना कैसे पड़ा ?
इसके इतिहास को जानने के बाद आप भी एक बार चकित हो सकते हैं।

लोककथाओं के अनुसार,राजा पत्रक को पटना का जनक कहा जाता है।

ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने अपनी रानी
पाटलि के लिये जादू से इस नगर का निर्माण
किया।

इसी कारण नगर का नाम पाटलिग्राम पड़ा।
बाद में इसका नाम पाटलिपुत्र और अब पटना हो गया है।
संस्कृत में पुत्र का अर्थ बेटा तथा ग्राम का अर्थ गांव होता है।
लेकिन,हम आपको बताएंगे कि आखिर कैसे पाटलिपुत्र बना पटना।

यह ऐतिहासिक नगर पिछली दो सहस्त्राब्दियों में कई नाम पा चुका है,जिसमें पाटलिग्राम,
पाटलिपुत्र,पुष्पपुर,कुसुमपुर,अजीमाबाद
और पटना है।

ऐसा समझा जाता है कि वर्तमान नाम शेरशाह सूरी के समय से प्रचलित हुआ।
किन्तु कैसे और किसने किया पटना का नामकरण।

पटना नाम के संदर्भ में कहा जाता है कि यह पटनदेवी (एक हिन्दू देवी) से
प्रचलित हुआ है।

एक अन्य मत के अनुसार यह नाम संस्कृत
के पत्तन से आया है जिसका अर्थ बन्दरगाह होता है।

मौर्यकाल के यूनानी इतिहासकार मेगास्थनिज
ने इस शहर को पालिबोथरा तथा चीनीयात्री फाहियान ने पालिनफू के नाम से संबोधित किया है।

प्राचीन पटना सोन और गंगा नदी के संगम पर स्थित है।
सोन नदी आज से दो हजार वर्ष पूर्व अगमकुंआ से आगे गंगा मे मिलती थी।

अभी फिलहाल इन दोनों नदियों का संगम पाटलिग्राम मे गुलाब (पाटली का फूल)
काफी मात्रा में उपजाया जाता था।

गुलाब के फूल से तरह-तरह के इत्र,दवा
आदि बनाकर उनका व्यापार किया जाता
था इसलिए इसका नाम पाटलिग्राम हो गया।

पुरातात्विक अनुसंधानो के अनुसार पटना
का इतिहास 490 ईसा पूर्व से होता है जब हर्यक वंश के शासक अजातशत्रु ने अपनी राजधानी राजगृह या राजगीर से बदलकर
यहां स्थापित की।

यह स्थान वैशाली के लिच्छवियों से संघर्ष
में उपयुक्त होने के कारण राजगृह की
अपेक्षा सामरिक दृष्टि से अधिक
महत्वपूर्ण था।

उसने गंगा के किनारे यह स्थान चुना और
अपना दुर्ग स्थापित कर लिया।
उस समय से इस नगर का इतिहास लगातार बदलता रहा है।

मौर्य काल के आरंभ में पाटलिपुत्र के अधिकांश राजमहल लकड़ियों से बने थे,पर सम्राट अशोक ने नगर को शिलाओं की संरचना मे तब्दील
किया।

2500 वर्षों से अधिक पुराना शहर होने का
गौरव दुनिया के बहुत कम नगरों को हासिल है।

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध अपने अन्तिम दिनों में यहां से गुजरे थे।

उनकी यह भविष्यवाणी थी कि नगर का भविष्य उज्जवल होगा,बाढ़ या आग के कारण नगर को खतरा बना रहेगा।
मौर्य साम्राज्य के उत्कर्ष के बाद पाटलिपुत्र सत्ता का केन्द्र बन गया।
चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य बंगाल की खाड़ी से अफ़गानिस्तान तक फैल गया था।

पटना गंगा के दक्षिणी तट पर स्थित है।
गंगा नदी नगर के साथ एक लम्बी तट रेखा बनाती है।
पटना का विस्तार उत्तर-दक्षिण की अपेक्षा
पूर्व-पश्चिम में बहुत अधिक है।
नगर तीन ओर से गंगा,सोन नदी और पुनपुन नदी नदियों से घिरा है।
नगर से ठीक उत्तर हाजीपुर के पास गंडक नदी भी गंगा में आ मिलती है।

हाल के दिनों में पटना शहर का विस्तार पश्चिम की ओर अधिक हुआ है और यह दानापुर से
जा मिला है।

पटन देवी का मंदिर सिद्ध शक्ति स्थल है।

महादेव के तांडव के दौरान सती के शरीर के
51 खंड हुए।
ये अंग जहां-जहां गिरे,वहां-वहां शक्तिपीठ स्थापित की गई।
यहां सती की दाहिनी जांघ गिरी थी।

गुलजार बाग इलाके में स्थित बड़ी पटन
देवी मंदिर परिसर में काले पत्थर की बनी
महाकाली,महालक्ष्मी और महासरस्वती की प्रतिमा स्थापित हैं।
इसके अलावा यहां भैरव की प्रतिमा भी है।

जिस प्रकार मैकाले की शिक्षा पद्धति के दुष्प्रभाव से हमने राम को रामा (RAMA)
कृष्ण को कृष्णा (KRISHNA) ब्रह्म को
ब्रह्मा (BRAHMA)शिव को शिवा (SHIVA)
योग को योगा (YOGA) लिखना आरंभ किया ठीक उसी प्रकार अंग्रेजों के शासनकाल
में पटन (PATAN) को पटना (PATANA = PATNA) लिखा जाने लगा।

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,,
जयति पुण्य भूमि भारत,,,

सदा सर्वदा सुमंगल,,,
वंदेमातरम,,,
जय भवानी,,
जय श्री राम

Image may contain: outdoor
Posted in Bharat ke Nagar

इंजीनियरिंग की दुनिया को चुनौती है 1000 साल पुरानी यह बावड़ी

गर्वीलो गुजरात

Godwad Virasat's photo.
Godwad Virasat's photo.
Godwad Virasat's photo.
Godwad Virasat's photo.
Godwad Virasat's photo.
More

इंजीनियरिंग की दुनिया को चुनौती है 1000 साल पुरानी यह बावड़ी
पाटण। ‘कुछ दिन तो गुजारिए गुजरात में’… बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन का यह संवाद तो आपने सुना ही होगा। दरअसल गुजरात है ही ऐसा राज्य, जहां कदम-कदम पर ऐसी खूबसूरत जगहें मौजूद हैं, जो आपका दिल खुश कर देती हैं। कहीं, कच्छ का सूखा रण आपको तपाता तो दूसरे ही पल समुद्र की लहरें भिगो देती हैं। कहीं, आध्यशक्ति के दर्शन होंते हैं तो कहीं यहां के गौरवपूर्ण इतिहास के साक्षात दर्शन।
वैसे तो गुजरात में सैकड़ों दर्शनीय स्थल हैं, लेकिन हेरीटेज वीक (19 से 25 नवंबर) पर आज हम आपको पाटण (गुजरात की प्राचीन राजधानी) में स्थित ‘रानी की वाव’ की यात्रा करवाने ले जा रहे हैं। दरअसल यह प्राचीन (10-11वीं ई.) समय की वास्तुकला का ऐसा बेजोड़ नमूना है, जिसकी तारीफ शब्दों में करना शायद संभव ही नहीं। इसी के चलते इस बावड़ी को (सीढ़ीदार कुआं) को 23 जून, 2014 को यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल में सम्मिलित किया गया है।
‘रानी की वाव’ वास्तुकला का वह बेजोड़ नमूना है, जो आधुनिक इंजीनियरिंग की दुनिया को भी आश्चर्यचकित कर सकता है। इसका निर्माण 10-11वीं सदी में सोलंकी राजवंश की रानी उदयमती ने पति भीमदेव सोलंकी की याद में करवाया था। यह प्रेम का प्रतीक कहलाती है।
राजा भीमदेव ही सोलंकी राजवंश के संस्थापक थे। भीमदेव गुजरात के सोलंकी वंश के शासक थे। उन्होंने वडनगर (गुजरात) पर 1021-1063 ई. तक शासन किया।
करीब 64 मीटर लंबी और 20 मीटर चौड़ी यह बावडी 27 मीटर गहरी है। ज्यादातर सीढ़ी युक्त कुओं में सरस्वती नदी के जल के कारण कीचड़ भर गया है। निर्माण कार्य में नक्काशीदार पत्थरों का प्रयोग किया गया है। अभी भी वाव के खंभे और उन पर उकेरी गईं कलाकृतियां सोलंकी वंश और उनके वास्तुकला के चमत्कार के समय में ले जाते हैं।
वाव की दीवारों और स्तंभों पर अधिकांश नक्काशियां, राम, वामन, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि, आदि जैसे अवतारों के विभिन्न रूपों में भगवान विष्णु को समर्पित हैं। मूल रूप से बावड़ी सात मंजिल की थी, किन्तु इसकी पांच मंजिलों की ही संरक्षित रखा जा सका है
रानी वाव की बनावट विशिष्ट श्रेणी की है। इसकी सीढ़ियां सीधी हैं, लेकिन इस पर बनी कलाकृतियां अपने-आप में अनूठी हैं। सीढ़ियों पर बने आलिए तथा मेहराब हालांकि अब टूट-फूट चुके हैं, लेकिन फिर भी वे तत्कालीन समय की समृद्ध कारीगरी के दर्शन करवाते हैं। वाव की दीवारों पर लगी कलात्मक खूंटियां भी दिलकश हैं।
इस वाव में एक छोटा द्वार भी है, जहां से 30 किलोमीटर लम्बी सुरंग निकलती है। हालांकि अब यह अब पत्थरों व कीचड़ से अवरोधित हो गई है। इसके बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि प्राचीन समय में ही इसे रानी ने बंद करवा दिया था। यह सुरंग पाटण के सिद्धपुर शहर को निकलती है।
इस सुरंग का निर्माण पराजय के दौरान भागने के लिए करवाया गया था। इस सुरंग का निर्माण भी इस तरह किया गया था कि इसकी जानकारी सिर्फ राजा रानी और उनके विश्वस्त सैनिकों को ही थी। यानी की महल पर कब्जा होने के बाद भी दुश्मन उनकी तलाश कर पाने में असमर्थ थे।
गुजरात की प्राचीन राजधानी थी पाटण…
महेसाणा जिले से 25 मील दूर स्थित पाटण प्राचीन समय में गुजरात की राजधानी हुआ करती थी। भीमदेव प्रथम और सिद्धराज जयसिंह जैसे प्रतापी शासकों की वजह से पाटण का न सिर्फ वैभव बढ़ा, बल्कि ऐतिहासिक पुस्तकों में इसका नाम बार-बार आता है। मौजूदा वक्त में पाटण अपनी पटोला साड़ियों, सहस्रलिंग तालाब और रानी की वाव स्मारक की वजह से मशहूर है, जो वास्तुकला का अनूठा नमूना है। इस जिले में कई और ऐतिहासिक स्थान हैं, मसलन सिद्धपुर, जहां मातृ तर्पण के लिए पूरे देश से लोग आते हैं।
पाटण का उल्लेख महाभारत में भी…
पाटण का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। महाभारत के अनुसार भीम ने यहीं पर हिडिंब राक्षस को मारकर उसकी बहन हिडिंबा से विवाह किया था। पाटण में एक सहस्त्रलिंग झील है, जिसके किनारे दर्जनों खंडहर आज भी मौजूद हैं। यहां खुदाई में अब तक कई बहुमूल्य स्मारक मिल चुके हैं। मसलन, पार्श्वनाथ मंदिर, रानी महल और ‘रानी वाव’।
राजा भीमदेव सोलंकी:
राजा भीमदेव ही सोलंकी राजवंश के संस्थापक थे। भीमदेव प्रथम गुजरात के सोलंकी वंश के शासक थे। उन्होंने वडनगर (गुजरात) पर 1021-1063 ई. तक शासन किया। लेकिन 1025-1026 ईं में जब सोमनाथ और उसके आसपास के क्षेत्रों को विदेशी आक्रमणकारी महमूद गजनी ने अपने कब्जे में कर लिया था। गजनी के आक्रमण के प्रभाव के अधीन होकर सोलंकियों ने अपनी शक्ति और वैभव को गंवा दिया था।
सोलंकी साम्राज्य की राजधानी कही जाने वाली ‘अहिलवाड़ पाटण’ भी अपनी महिमा, गौरव और वैभव को गंवाती जा रही थी जिसे बहाल करने के लिए सोलंकी राज परिवार और व्यापारी एकजुट हुए और उन्होंने गुजरात में संयुक्त रूप से भव्य और खंडित मंदिरों के निर्माण के लिए अपना योगदान देना शुरू किया।
भीमदेव सोलंकी ने ही करवाया था सूर्य मंदिर का निर्माण…
मोढ़ेरा के विश्व प्रसिद्ध सूर्य मंदिर, जो अहमदाबाद से तकरीबन सौ किलोमीटर की दूरी पर पुष्पावती नदी के तट पर स्थित है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण सम्राट भीमदेव सोलंकी प्रथम (ईसा पूर्व 1022-1063 में) ने ही करवाया था। इसकी पुष्टि एक शिलालेख से होती है, जो मंदिर के गर्भगृह की दीवार पर लगा है, जिसमें लिखा गया है- ‘विक्रम संवत् 1083 अर्थात् (1025-1026 ईसा पूर्व)।’
सोलंकी ‘सूर्यवंशी’ थे, वे सूर्य को कुलदेवता के रूप में पूजते थे। इसीलिए उन्होंने अपने आद्य देवता की आराधना के लिए एक भव्य सूर्य मंदिर बनाने का निश्चय किया और इस प्रकार मोढ़ेरा के सूर्य मंदिर ने आकार लिया। भारत में तीन सूर्य मंदिर हैं, जिसमें पहला उड़ीसा का कोणार्क मंदिर, दूसरा जम्मू में स्थित मातर्ंड मंदिर और तीसरा गुजरात के मोढ़ेरा का सूर्य मंदिर है।

Posted in Bharat ke Nagar

जैसलमेर

Godwad Virasat's photo.
Godwad Virasat's photo.
Godwad Virasat's photo.
Godwad Virasat's photo.
Godwad Virasat's photo.
More

कृष्ण ने 1 तीर से इस किले में खोद डाला था कुआं, बुझाई थी अर्जुन की प्यास
जैसलमेर. यूनेस्को के विश्व धरोहरों में शामिल जैसलमेर का किला कई विशेषताओं के लिए फेमस है। इस किले में 99 बुर्ज हैं जिन पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए तोप रखे जाते थे। आज भी ये तोप देखे जा सकते हैं। इसे रेगिस्तान की बालू रेत से मिलते-जुलते गहरे पीले रंग के पत्थरों को बिना चूने की सहायता के आश्चर्यजनक ढंग से जोड़कर बनाया गया है। यह अपने आप में मौलिक और अनूठी विशेषता है। यह किला चारों ओर से रेत (मरुस्थल) से घिरा हुआ है। 858 साल से रेगिस्तान में खड़ा है यह किला, इस किले में 1200 से ज्यादा घर हैं।
इस किले से जुड़ी है महाभारत काल की कहानी। कहते हैं एक बार भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन यहां 80 मीटर ऊंची त्रिकुट पहाड़ी पर आये तब अर्जुन को बहुत तेज की प्यास लगी चारों तरफ पानी का नामोनिशान भी नहीं था तब भगवान श्रीकृष्ण ने तीर का प्रहार कर यहां पाताल तोड़ कुआं खोद दिया जिसके पानी से अर्जुन ने अपनी प्यास बुझाई आज भी यह कृष्ण कुण्ड के नाम से विख्यात है
क्यों कहते हैं गोल्डन फोर्ट…?
जैसलमेर की शान के रूप में माना जाने वाला यह किला ‘सोनार किला’ और ‘गोल्डन फोर्ट’ के नाम से जाना जाता है। यह किला पीले बलुआ पत्थर का किला सूर्यास्त के समय सोने की तरह चमकता है। इसे 1156 ई. में एक भाटी राजपूत शासक जैसल द्वारा त्रिकुट पहाड़ी के शीर्ष पर निर्मित किया गया था।
बॉलीवुड के लिए बना प्राइम लोकेशन
जैसलमेर के पर्यटन स्थल और यहां की विरासत बॉलीवुड के लिए प्राइम लोकेशन है। अब तक जैसलमेर में कई बॉलीवुड फिल्मों, एड, रीजनल फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। अभी तक यहां मुख्य रूप से कच्चे धागे, कृष्णा, सरफरोश, टशन, रुदाली और कोका कोला, बोरो प्लस, पेप्सी व हीरो होंडा जैसी कंपनियों की एड भी यहां शूट हो चुके हैं। उदयपुर स्थित लीला पैलेस यहां के सबसे बेहतरीन होटलों में शुमार होता है।
अकाल के समय चरणों में रख दी थी तलवार फिर हुई थी बारिश
किले में भगवान श्रीकृष्ण का एक मंदिर भी बना हुआ है जिनमें भगवान लक्ष्मीनाथ जी विराजे हुए हैं। संगमरमर की मूर्ति इतनी मोहक है कि दर्शन को आने वाले सैलानी भी एक बार टकटकी लगाये देखते रह जाते हैं। शांति समृद्धि के लिए भगवान को यहां एक विषेष प्रकार का पेड़ा प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है। कहते हैं जैसलमेर में जब भीषण अकाल पड़ा और जीवन त्रस्त हो गया तब यहां के महाराजा ने अपनी तलवार भगवान लक्ष्मीनाथ जी के चरणों में रख दी थी और यह प्रण लिया था कि जब तक बारिश नहीं होगी तब तक वे तलवार नहीं उठायेंगे। भगवान ने उनकी सुन ली और उस साल बारिश हुई।
आज भी मिलता है राजसी ठाठ का आनंद
यह किला धार्मिक महत्व भी रखता है। किले में प्राचीन काल के जैन मंदिर भी बने हुए हैं जो अपनी स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना पेष करते हैं। पत्थर के बाद पर्यटन ही यहां का मुख्य व्यवसाय है। कई लोगों ने अपने पुराने हवेलीनुमा घरों को भले ही पर्यटन के लिए खोल दिया हो लेकिन उन्होंने उसके मूल स्वरूप को नहीं बदला है। यहां आज भी पर्यटक राजसी अहसास का आनंद ले सकते हैं।
शहर की आबादी का एक चौथाई हिस्सा रहता है यहां
इस किले में कई खूबसूरत हवेलियां या मकान, मंदिर और सैनिकों तथा व्यापारियों के आवासीय परिसर हैं। वर्तमान में, यह शहर की आबादी के एक चौथाई के लिए एक आवासीय स्थान है। इस किले में 1200 से ज्यादा घर हैं। कभी अकाल झेल चुके इस किले में आज कई कुएं हैं जो यहां के लोगों के लिए पानी का स्रोत बने हुए हैं।
यहां के पत्थर हैं ‘अनमोल’
यहां पीले रंग का एक बेहद बेषकीमती पत्थर पाया जाता है जो यहां का मुख्य व्यवसास भी है। इस पत्थर से जुड़ा रोचक तथ्य यह है कि इसका पीला रंग सूर्य के प्रकाष में दोगुना हो जाता है। इससे यह सोने के रंग सा अहसास कराता है और कारीगरी के लिए यह पत्थर बेहद अच्छा है। कई हवेलियों और किले की स्थापत्य कला अपने आप में अनूठी बन पड़ी है। यह यहां की जालीदार नक्काषी, झरोखों के लिए भी जाना जाता है।

Posted in Bharat ke Nagar

भीटा इलाहाबाद

भीटा इलाहाबाद

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति

भीटा, इलाहाबाद
Bhita, Allahabad

प्रयाग से लगभग बारह मील दक्षिण-पश्चिम की ओर यमुना के तट पर कई विस्तृत खण्डहर हैं, जो एक प्राचीन समृद्धशाली नगर के अवशेष हैं। इन खण्डहरों से प्राप्त अभिलेखों में इस स्थान का प्राचीन नाम सहजाति है। भीटा, सहजाति इलाहाबाद से दस मील पर स्थित है।

उत्खनन

19091910 में भीटा में भारतीय पुरातत्त्व विभाग की ओर से मार्शल ने उत्खनन किया था। विभाग के प्रतिवेदन में कहा गया है कि खुदाई में एक सुन्दर, मिट्टी का बना हुआ वर्तुल पट्ट प्राप्त हुआ था, जिस पर सम्भवतः शकुन्तलादुष्यन्त की आख्यायिका का एक दृश्य अंकित है। इसमें दुष्यन्त और उनका सारथी कण्व के आश्रम में प्रवेश करते हुए प्रदर्शित हैं और आश्रमवासी उनसे आश्रम के हिरण को न मारने के लिए प्रार्थना कर रहा है। पास ही एक कुटी भी है, जिसके सामने एक कन्या आश्रम के वृक्षों को सींच रही है। यह मृत्खंड शुगकालीन है[1] और इस पर अंकित चित्र यदि वास्तव में दुष्यन्त व शकुन्तला की कथा [2] से सम्बन्धित हैं, तो महाकवि कालिदास का समय इस तथ्य के आधार पर, गुप्तकाल [3] के बजाए पहली या दूसरी शती से भी काफ़ी पूर्व मानना होगा। किन्तु पुरातत्त्व विभाग के प्रतिवेदन में इस दृश्य की समानता कालिदास द्वारा वर्णित दृश्य से आवश्यक नहीं मानी गई है।

भीटा से, खुदाई में मौर्यकालीन विशाल ईंटें, परवर्तिकाल की मूर्तियाँ, मिट्टी की मुद्राएँ तथा अनेक अभिलेख प्राप्त हुए हैं। जिनसे सिद्ध होता है कि मौर्यकाल से लेकर गुप्त काल तक यह नगर काफ़ी समृद्धशाली था। यहाँ से प्राप्त सामग्री लखनऊ के संग्रहालय में है। भीटा के समीप ही मानकुँवर ग्राम से एक सुन्दर बुद्ध प्रतिमा मिली थी, जिस पर महाराजाधिराज कुमारगुप्त के समय का एक अभिलेख उत्कीर्ण है. [4]

व्यापारिक नगर

सहजाति या भीटा, गुप्त और शुंग काल के पूर्व एक व्यस्त व्यापारिक नगर के रूप में भी प्रख्यात था क्योंकि एक मिट्टी की मुद्रा पर सहजातिये निगमस यह पाली शब्द तीसरी शती ई. पू. की ब्राह्मीलिपि में अंकित पाए गए हैं। इससे प्रमाणित होता है कि इतने प्राचीन काल में भी यह स्थान व्यापारियों के निगम या व्यापारिक संगठन का केन्द्र था। वास्तव में यह नगर मौर्यकाल में भी काफ़ी समुन्नत रहा होगा, जैसा कि उस समय के अवशेषों से सूचित होता है।

Posted in Bharat ke Nagar

देवगढ़, उत्तर प्रदेश

देवगढ़, उत्तर प्रदेश

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
Disamb2.jpg देवगढ़ एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- देवगढ़

दशावतार मन्दिर, देवगढ़

देवगढ़ उत्तर प्रदेश राज्य के ललितपुर ज़िले से लगभग 37 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह मध्य रेलवे के जाखलौन से 9 मील (लगभग 14.4 कि.मी.) की दूरी पर पड़ता है। यहाँ के प्राचीन स्मारक बहुत ही उल्लेखनीय हैं। देवगढ़ में दशावतार विष्णु भगवान का मध्ययुगीन मन्दिर है, जो स्थापत्य कला की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।

इतिहास

देवगढ़ का इतिहास में बहुत ही ख़ास स्थान रहा है। यह ऐतिहासिक दृष्टि से भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसके अन्य दर्शनीय स्थलों में मुख्य हैं- सैपुरा ग्राम से 3 मील (लगभग 4.8 कि.मी.) पश्चिम की ओर पहाड़ी पर एक चतुष्कोण कोट, नीचे मैदान में एक भव्य विष्णु का मंदिर, यहाँ से एक फलांग पर वराह मंदिर, पास ही एक विशाल दुर्ग के खंडहर, इसके पश्चात दो और दुर्गों के भग्नावशेष, एक दुर्ग के विशाल घेरे में 31 जैन मंदिरों और अनेक भवनों के खंडहर।

दशावतार विष्णु मंदिर

देवगढ़ में सब मिला कर 300 के लगभग अभिलेख मिले हैं, जो 8वीं शती से लेकर 18वीं शती तक के हैं। इनमें ऋषभदेव की पुत्री ब्राह्मी द्वारा अंकित अठारह लिपियों का अभिलेख तो अद्वितीय ही है। चंदेल नरेशों के अभिलेख भी महत्त्वपूर्ण हैं। देवगढ़ बेतवा नदी के तट पर स्थित है। तट के निकट पहाड़ी पर 24 मंदिरों के अवशेष हैं, जो 7वीं शती ई. से 12वीं शती ई. तक बने थे। देवगढ़ का शायद सर्वोत्कृष्ट स्मारक ‘दशावतार का विष्णु मंदिर’ है, जो अपनी रमणीय कला के लिए भारत भर के उच्च कोटि के मंदिरों में गिना जाता है। इसका समय छठी शती ई. माना जाता है, जब गुप्त वास्तु कला अपने पूर्ण विकास पर थी। मंदिर का समय भग्नप्राय अवस्था में है, किन्तु यह निश्चित है कि प्रारम्भ में इसमें अन्य गुप्त कालीन देवालयों की भांति ही गर्भगृह के चतुर्दिक पटा हुआ प्रदक्षिणा पथ रहा होगा। इस मंदिर के एक के बजाए चार प्रवेश द्वार थे और उन सबके सामने छोटे-छोटे मंडप तथा सीढ़ियां थीं। चारों कोनों में चार छोटे मंदिर थे। इनके शिखर आमलकों से अलंकृत थे, क्योंकि खंडहरों से अनेक आमलक प्राप्त हुए हैं। प्रत्येक सीढ़ियों की पंक्ति के पास एक गोखा था। मुख्य मंदिर के चतुर्दिक कई छोटे मंदिर थे, जिनकी कुर्सियाँ मुख्य मंदिर की कुर्सी से नीची हैं। ये मुख्य मंदिर के बाद में बने थे। इनमें से एक पर पुष्पावलियों तथा अधोशीर्ष स्तूप का अलंकरण अंकित है। यह अलंकरण देवगढ़ की पहाड़ी की चोटी पर स्थित मध्ययुगीन जैन मंदिरों में भी प्रचुरता से प्रयुक्त है।

गुप्त वास्तुकला का प्रभाव

दशावतार मंदिर में गुप्त वास्तु कला के प्रारूपिक उदाहरण मिलते हैं, जैसे, विशाल स्तम्भ, जिनके दंड पर अर्ध अथवा तीन चौथाई भाग में अलंकृत गोल पट्टक बने हैं। ऐसे एक स्तम्भ पर छठी शती के अंतिम भाग की गुप्त लिपि में एक अभिलेख पाया गया है, जिससे उपर्युक्त अलंकरण का गुप्त कालीन होना सिद्ध होता है। इस मंदिर की वास्तु कला की दूसरी विशेषता चैत्य वातायनों के घेरों में कई प्रकार के उत्कीर्ण चित्र हैं। इन चित्रों में प्रवेश द्वार या मूर्ति रखने के अवकाश भी प्रदर्शित हैं। इनके अतिरिक्त सारनाथ की मूर्तिकला का विशिष्ट अभिप्राय स्वस्तिकाकार शीर्ष सहित स्तम्भयुग्म भी इस मंदिर के चैत्यवातायनों के घेरों में उत्कीर्ण है। दशावतार मंदिर का शिखर ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण संरचना है। पूर्व गुप्त कालीन मंदिरों में शिखरों का अभाव है।

देवगढ़ के मंदिर का शिखर भी अधिक ऊँचा नहीं है, वरन् इसमें क्रमिक घुमाव बनाए गए हैं। इस समय शिखर के निचले भाग की गोलाई ही शेष है, किन्तु इससे पूर्ण शिखर का आभास मिल जाता है। शिखर के आधार के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ की सपाट छत थी, जिसके किनारे पर बड़ी व छोटी दैत्य खिड़कियाँ थीं, जैसा कि महाबलीपुरम के रथों के किनारों पर हैं। द्वार मंडप दो विशाल स्तम्भों पर आधृत था। प्रवेश द्वार पर पत्थर की चौखट है, जिस पर अनेक देवताओं तथा गंगा और यमुना की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। मंदिर की बहिर्भित्तियों के अनेक विशाल पट्टों पर गजेन्द्रमोक्ष, शेषशायी विष्णु आदि के कलात्मक मूर्ति चित्र अंकित हैं। मंदिर की कुर्सी के चारों ओर भी गुप्त कालीन मूर्तिकारी का वैभव अवलोकनीय है। रामायण और कुष्ण लीला से संबंधित दृश्यों का चित्रण बहुत ही कलापूर्ण शैली में प्रदर्शित है।

अन्य स्थल

देवगढ़ के अन्य मंदिरों में गोमटेश्वर, भरत, चक्रेश्वरी, पद्मावती, ज्वालाभालिनी, श्री, ह्री, तथा पंच परमेष्ठी आदि जैन तथा तांत्रिक मूर्तियों का सुंदर प्रदर्शन है। दूसरे दुर्ग से पहाड़ी में नदी तक काटकर बनाई हुई सीढ़ियों द्वारा नाहरघाटी व राजघाटी तक पहुँचा जा सकता है। मार्ग में पांच पांडवों की मूर्तियां, जिन प्रतिमाएं, शैलकृत सिद्ध गुहा तथा गुप्त कालीन अभिलेख मिलते हैं।