Posted in ગુજરાતી પુસ્તકાલય

पुस्तकों के बिना घर ऐसे लगता है जैसे आत्मा के बिना शरीर हो। अपने महान सद्ग्रन्थों का घर में होना बहुत आवश्यक है। उन ग्रन्थों को एक अलमारी में सजा देना मात्र पर्याप्त नहीं होता, उन्हें पढ़ने का अभ्यास भी करना चाहिए। अपने ग्रन्थों का स्वाध्याय करने से मनुष्य को आत्मिक बल मिलता है। उतना समय दुनिया के झमेलों से वह दूर रहता है और कुछ-न-कुछ नया सीखता है। ये पुस्तकें मनुष्य की अभिन्न मित्र होती हैं।
पुस्तक एक प्रकाशमान दीपक की भाँति होती है जो सर्वत्र प्रकाश प्रसरित करती है। जो भी ज्ञान प्राप्ति के उद्देश्य से उसका वाचन करता है, वह कदापि निराश नहीं हो सकता। वह उसे सफलता की सीढ़ी पर चढ़ने की दिशा दिखाती है। उसका अनुसरण करता हुआ मनुष्य कभी ठगा नहीं जाता बल्कि वह अपनी उन्नति के द्वार खोल देता है। वहाँ से आगे बढ़ता हुआ वह सफलता के मीठे फल खाता है।
आजकल हम देखते हैं कि विश्व में सर्वत्र मौत का ताण्डव हो रहा है। लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं। बात-बात पर गोलियाँ चलने लगती है। ऐसा लगता है कि दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी है। इस बारूद के स्थान पर लोगों के हाथ यदि पुस्तक थमा दी जाए तो उनका जीवन नरक बनने से बच सकता है। जो ज्ञान उन्हें उन पुस्तकों से मिलेगा उससे उनका उद्धार हो जाएगा। उनके साथ-साथ उनकी आने वाली पीढ़ियाँ भी तर सकती हैं।
इस पुस्तकीय ज्ञान के अर्जन के विषय में कवि भर्तृहरि ने कहा है-
न चोरहार्यं न च राजहार्यं
न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी ।
व्यये कृते वर्धते एव नित्यं
विद्याधनं सर्वधन प्रधानम् ॥
अर्थात विद्यारुपी धन को कोई चुरा नहीं सकता, राजा उसका हरण नहीं कर सकता, भाइयों में उसका बंटवारा नहीं होता, उसका कोई भार नहीं होता। खर्च करने पर यह बढती रहती है। सचमुच, विद्यारूपी धन सर्वश्रेष्ठ है।
कवि भर्तृहरि ने बड़े सुन्दर शब्दों में समझने का प्रयास किया है कि पुस्तकों में छुपे हुए खजाने को कोई लुटेरा कभी लूट नहीं सकता। अन्य भौतिक धन-सम्पदा की तरह भाइयों में उसका बंटवारा नहीं हो सकता। जिसके पास यह खजाना होता है, केवल वही मालामाल बनता हैं, कोई और नहीं। इस धन की विशेषता है कि जितना इसे लोगों में बाँटो यह उतना ही अधिक बढ़ता रहता है। इसलिए जितना भी हो सके इसे परिश्रमपूर्वक पाने का प्रयास करना चाहिए।
यदि किसी पुस्तक को बार-बार पढने का आनन्द न लिया जाए तो उसे पढने का कोई औचित्य नहीं होता। एक अच्छी पुस्तक पढने का पता तभी चलता हैं, जब आखिरी पृष्ठ पलटते हुए मनुष्य को यह लगे कि वह अपने एक अच्छे दोस्त से दूर हो रहा है। ऐसे व्यक्ति पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए जिसके पास पुस्तकें न हों या जो पुस्तकों से दूर रहता हो।
पुस्तकें नष्ट करने अथवा उन्हें जलाने से भी बड़ा अपराध हैं, न उन्हें स्वयं पढना और न ही किसी अन्य को पढने के लिए देना। प्रयास करना चाहिए कि हमारा सद्साहित्य अधिक-से-अधिक लोग पढें और अपने जीवनमूल्यों को समझकर अपना लोक-परलोक सुधारें। अपनी आत्मिक भूख को शान्त करने के लिए इनका वाचन करना बहुत आवश्यक होता है। इस ज्ञानधन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल इसी जन्म में साथ नहीं निभाता अपितु जन्म-जन्मान्तरों तक हमारा पथपर्दाशन करता है। इसका कारण यह है कि शरीर के नष्ट हो जाने के साथ यह नष्ट नहीं होता। इस जन्म के संचित ज्ञान में आने वाले जन्मों का ज्ञान जुड़ता जाता है।
इस पुस्तकीय ज्ञान को अर्जित करना किसी भी तरह से घाटे का सौदा नहीं है। इससे मनुष्य का लोक और परलोक दोनों ही संवर जाते हैं। इसकी बदौलत वह समाज में एक महत्त्वपूर्ण स्थान बना सकता है। यह मनुष्य को ज्ञान के साथ-साथ अकेलेपन के दंश और अवसाद से भी बचाती हैं। अतः प्रयत्नपूर्वक पुस्तकों को अपना मित्र बनाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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૧) http://www.sivohm.com/2014/12/home.html

૨) http://pustakalay.com/sahitya.htm

૩) https://www.scribd.com/search?content_type=books&page=1&query=%E0%AA%97%E0%AB%81%E0%AA%9C%E0%AA%B0%E0%AA%BE%E0%AA%A4%E0%AB%80

૪) https://issuu.com/search?q=%E0%AA%97%E0%AB%81%E0%AA%9C%E0%AA%B0%E0%AA%BE%E0%AA%A4%E0%AB%80

 

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