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🌿नवरात्र पर्व के दौरान कन्या पूजन 🌿

🌹नवरात्र में कन्या पूजन का बडा महत्व है । लेकिन हम मे से बहुत कम लोगो को ही कन्या पूजन से जुड़ी विशेष बाते पता होगी जैसे की कन्या पूजन विधि क्यों करते हैं ? कन्या पूजन विधि का लाभ और महत्व क्या हैं ? कन्या पूजन विधि के दौरान क्या सावधानियॉ रखने की खास आवश्यकता होती हैं और सबसे मत्वपूर्ण चीज की कन्या पूजन की विधि क्या हैं ? आइये इन सारी बातो को एक-एक करके विश्तार पूर्वक जाने-

🌹ऐसी मान्यता है कि जप और दान से देवी इतनी खुश नहीं होतीं, जितनी कन्या पूजन से । शास्त्रों के अनुसार एक कन्या की पूजा से ऐश्वर्य, दो की पूजा से भोग और मोक्ष, तीन की अर्चना से धर्म, अर्थ व काम, चार की पूजा से राज्यपद, पांच की पूजा से विद्या, छ: की पूजा से छ: प्रकार की सिद्धि, सात की पूजा से राज्य, आठ की पूजा से संपदा और नौ की पूजा से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति होती है।

🌹देवी पुराण के अनुसार, इन्द्र ने जब ब्रह्मा जी से भगवती दुर्गा को प्रसन्न करने की विधि पूछी तो उन्होंने सर्वोत्तम विधि के रूप में कन्या पूजन ही बताया और कहा कि माता दुर्गा जप, ध्यान, पूजन और हवन से भी उतनी प्रसन्न नहीं होती जितना सिर्फ कन्या पूजन से हो जाती हैं |

🌹दूसरी मान्यता है कि माता के भक्त पंडित श्रीधर के कोई संतान नहीं थी। उन्होंने नवरात्र के बाद नौ कन्याओं को पूजन के लिए घर पर बुलवाया। मां दुर्गा उन्हीं कन्याओं के बीच बालरूप धारण कर बैठ गई। बालरूप में आईं मां श्रीधर से बोलीं सभी को भंडारे का निमंत्रण दे दो। श्रीधर से बालरूप कन्या की बात मानकर आसपास के गांवों में भंडारे का निमंत्रण दे दिया। इसके बाद उन्हें संतान सुख मिला।

🌹नवरात्रि में सामान्यतः तीन प्रकार से कन्या पूजन का विधान शास्त्रोक्त है –🌹

🌹1)प्रथम प्रकार- प्रतिदिन एक कन्या का पूजन अर्थात नौ दिनों में नौ कन्याओं का पूजन – इस पूजन को करने से कल्याण और सौभाग्य प्राप्ति होती है |

🌹2)दूसरा प्रकार- प्रतिदिन दिवस के अनुसार संख्या अर्थात प्रथम दिन एक, द्वितीय दिन दो, तृतीया – तीन नवमी – नौ कन्या (बढ़ते क्रम में ) अर्थात नौ दिनों में 45 कन्याओ का पूजन – इस प्रकार से पूजन करने पर सुख, सुविधा और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है |

🌹3) तीसरा प्रकार – नौ कन्या का नौ दिनों तक पूजन अर्थात नौ दिनों में नौ X नौ = 81 कन्याओं का पूजन– इस प्रकार से पूजन करने पर पद, प्रतिष्ठा और भूमि की प्राप्ति होती है |

🌹कन्याओ की उम्र व अवस्था ?शास्त्रों के अनुसार कन्या की अवस्था…🌹

🌹एक वर्ष की कन्या का पूजन नहीं करना चाहिए

🌹दो वर्ष – कुमारी – दुःख-दरिद्रता और शत्रु नाश

🌹तीन वर्ष – त्रिमूर्ति – धर्म-काम की प्राप्ति, आयु वृद्धि

🌹चार वर्ष– कल्याणी – धन-धान्य और सुखों की वृद्धि

🌹पांच वर्ष – रोहिणी – आरोग्यता-सम्मान प्राप्ति

🌹छह वर्ष – कालिका – विद्या व प्रतियोगिता में सफलता

🌹सात वर्ष – चण्डिका – मुकदमा और शत्रु पर विजय

🌹आठ वर्ष – शाम्भवी – राज्य व राजकीय सुख प्राप्ति

🌹नौ वर्ष – दुर्गा – शत्रुओं पर विजय, दुर्भाग्य नाश

🌹दस वर्ष – सुभद्रा – सौभाग्य व मनोकामना पूर्ति

🌹किस दिन करें वैसे तो प्रायः लोग सप्‍तमी से कन्‍या पूजन शुरू कर देते हैं लेकिन जो लोग पूरे नौ दिन का व्रत करते हैं वह तिथि के अनुसार अथवा नवमी और दशमी को कन्‍या पूजन करते हैं । शास्‍त्रों के अनुसार कन्‍या पूजन के लिए दुर्गाष्‍टमी के दिन को सबसे ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण और शुभ माना गया है.

🌹सर्वप्रथम व्यक्ति को प्रातः स्नान करना चाहिए। उसके पश्चात् कन्याओं के लिए भोजन अर्थात पूरी, हलवा, खीर, चने आदि को तैयार कर लेना चाहिए । कन्याओं के पूजन के साथ बटुक पूजन का भी महत्त्व है, दो बालकों को भी साथ में पूजना चाहिए एक गणेश जी के निमित्य और दूसरे बटुक भैरो के निमित्य कहीं कहीं पर तीन बटुकों का भी पूजन लोग करते हैं और तीसरा स्वरुप हनुमान जी का मानते हैं | एक-दो-तीन कितने भी बटुक पूजें पर कन्या पूजन बिना बटुक पूजन के अधूरी होती है |

🌹कन्याओं को माता का स्वरुप समझ कर पूरी भक्ति-भाव से कन्याओं के हाथ पैर धुला कर उनको साफ़ सुथरे स्थान पर बैठाएं | ऊँ कुमार्यै नम: मंत्र से कन्याओं का पंचोपचार पूजन करें । सभी कन्याओं के मस्तक पर तिलक लगाएं, लाल पुष्प चढ़ाएं, माला पहनाएं, चुनरी अर्पित करें तत्पश्चात भोजन करवाएं | भोजन में मीठा अवश्य हो, इस बात का ध्यान रखें।

🌹भोजन के बाद कन्याओं के विधिवत कुंकुम से तिलक करें तथा दक्षिणा देकर हाथ में पुष्प लेकर यह प्रार्थना करें-

🌹मंत्राक्षरमयीं लक्ष्मीं मातृणां रूपधारिणीम्।

नवदुर्गात्मिकां साक्षात् कन्यामावाहयाम्यहम्।।

जगत्पूज्ये जगद्वन्द्ये सर्वशक्तिस्वरुपिणि।

पूजां गृहाण कौमारि जगन्मातर्नमोस्तु ते।।🌹

तब वह पुष्प कुमारी के चरणों में अर्पण कर उन्हें ससम्मान विदा करें।

🌹नवरात्रि में कन्या पूजन विधि में सावधानियॉ ? कन्याओ की आयु दो वर्ष से कम न हो और दस वर्ष से ज्यादा भी न हो।

🌹💁‍♀एक वर्ष या उससे छोटी कन्याओं की पूजा नहीं करनी चाहिए। कन्या पूजन में ध्यान रखें कि कोई कन्या हीनांगी, अधिकांगी, अंधी, काणी, कूबड़ी, रोगी अथवा दुष्ट स्वाभाव की नहीं होनी चाहिए |एक-दो-तीन कितने भी बटुक पूजें पर कन्या पूजन बिना बटुक पूजन के न करे।

🌺माताजी आपका और आपके पुरे परिवार का कल्याण करे🌺

आप सभी का दिन मंगलमयी हो।
🙏🌿🌼 जय माता दी 🌼🌿🙏

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🌷 कैसे मनायें होली 🌷
🙏🏻 होली भारतीय संस्कृति की पहचान का एक पुनीत पर्व है, भेदभाव मिटाकर पारस्परिक प्रेम व सदभाव प्रकट करने का एक अवसर है |अपने दुर्गुणों तथा कुसंस्कारों की आहुति देने का एक यज्ञ है तथा परस्पर छुपे हुए प्रभुत्व को, आनंद को, सहजता को, निरहंकारिता और सरल सहजता के सुख को उभारने का उत्सव है |
यह रंगोत्सव हमारे पूर्वजों की दूरदर्शिता है जो अनेक विषमताओं के बीच भी समाज में एकत्व का संचार करता है | होली के रंग-बिरंगे रंगों की बौछार जहाँ मन में एक सुखद अनुभूति प्रकट कराती है वहीं यदि सावधानी, संयम तथा विवेक न रख जाये तो ये ही रंग दुखद भी जाते हैं | अतः इस पर्व पर कुछ सावधानियाँ रखना भी अत्यंत आवश्यक है |
प्राचीन समय में लोग पलाश के फूलों से बने रंग अथवा अबीर-गुलाल, कुमकुम- हल्दी से होली खेलते थे |किन्तु वर्त्तमान समय में रासायनिक तत्त्वों से बने रंगोंका उपयोग किया जाता है | ये रंग त्वचा पे चक्तों के रूप में जम जाते हैं | अतः ऐसे रंगों से बचना चाहिये | यदि किसी ने आप पर ऐसा रंग लगा दिया हो तो तुरन्त ही बेसन, आटा, दूध, हल्दी व तेल के मिश्रण से बना उबटन रंगो हुए अंगों पर लगाकर रंग को धो डालना चाहिये |यदि उबटन करने से पूर्व उस स्थान को निंबु से रगड़कर साफ कर लियाजाए तो रंग छुटने में और अधिक सुगमता आ जाती है |
रंग खेलने से पहले अपने शरीर को नारियल अथवा सरसों के तेल से अच्छी प्रकार लेना चाहिए | ताकि तेलयुक्त त्वचा पर रंग का दुष्प्रभाव न पड़े और साबुन लगाने मात्र से ही शरीर पर से रंग छुट जाये | रंग आंखों में या मुँह में न जाये इसकी विशेष सावधानी रखनी चाहिए | इससे आँखों तथा फेफड़ों को नुकसान हो सकता है |
जो लोग कीचड़ व पशुओं के मलमूत्र से होली खेलते हैं वे स्वयं तो अपवित्र बनते ही हैं दूसरों को भी अपवित्र करने का पाप करते हैं | अतः ऐसे दुष्ट कार्य करने वालों से दूर ही रहें अच्छा |
वर्त्तमान समय में होली के दिन शराब अथवा भंग पीने की कुप्रथा है | नशे से चूर व्यक्ति विवेकहीन होकर घटिया से घटिया कुकृत्य कर बैठते हैं | अतः नशीले पदार्थ से तथा नशा करने वाले व्यक्तियों से सावधान रहना चाहिये |आजकल सर्वत्र उन्न्मुक्तता का दौर चल पड़ा है | पाश्चात्य जगत के अंधानुकरण में भारतीय समाज अपने भले बुरे का विवेक भी खोता चला जा रहा है | जो साधक है, संस्कृति का आदर करने वाले हैं, ईश्वर व गुरु में श्रद्धा रखते हैं ऐसे लोगो में शिष्टता व संयम विशेषरूप से होना चाहिये | पुरुष सिर्फ पुरुषों से तथा स्त्रियाँ सिर्फ स्त्रियों के संग ही होली मनायें | स्त्रियाँ यदि अपने घर में ही होली मनायें तो अच्छा है ताकि दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों कि कुदृष्टि से बच सकें |
होली मात्र लकड़ी के ढ़ेर जलाने त्योहार नहीँ है |यह तो चित्त की दुर्बलताओं को दूर करनेका, मन की मलिन वासनाओं को जलाने कापवित्र दिन है | अपने दुर्गुणों, व्यस्नों व बुराईओं को जलाने का पर्व है होली …….अच्छाईयाँ ग्रहण करने का पर्व है होली ………समाज में स्नेह का संदेश फैलाने का पर्व है होली……….
आज के दिन से विलासी वासनाओं का त्याग करके परमात्म प्रेम, सदभावना, सहानुभूति, इष्टनिष्ठा, जपनिष्ठा, स्मरणनिष्ठा, सत्संगनिष्ठा, स्वधर्म पालन , करुणा दया आदि दैवी गुणों का अपने जीवन में विकास करना चाहिये | भक्त प्रह्लाद जैसी दृढ़ ईश्वर निष्ठा, प्रभुप्रेम, सहनशीलता, व समता का आहावन करना चाहिये |
सत्य, शान्ति, प्रेम, दृढ़ता की विजय होती है इसकी याद दिलाता है आज का दिन | हिरण्यकश्यपु रूपी आसुरी वृत्ति तथा होलिका रूपी कपट की पराजय का दिन है होली, यह पवित्र पर्व परमात्मा में दृढ़ निष्ठावान के आगे प्रकृति द्वारा अपने नियमों को बदल देने की याद दिलाता है | मानव को भक्त प्रह्लाद की तरह विघ्न बाधाओं के बीच भी भगवदनिष्ठा टिकाए रखकर संसार सागर से पार होने का संदेश देने वाला पर्व है ‘होली’ !
🙏🏻 *लोक कल्याण सेतु 🙏

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काल भैरव जयंती


Kaal bhairav jayanti 2018: काल भैरव जयंती अगहन मास की अष्टमी तिथि को मनायी जाती है। इसको काल भैरव अष्टमी भी कहते हैं। इस वर्ष यह जयंती दिनांक 29 नवम्बर 2018 को है। इस अष्टमी को तंत्र के देवता काल भैरव की विधिवत उपासना की जाती है।

भैरव के कई रूप हैं। प्रमुखतया 3 रूपों बटुक भैरव, महाकाल भैरव तथा स्वर्णाकर्षण भैरव की ही प्रधानता है। इसमें बटुक भैरव की उपासना ज्यादा प्रचलन में है। तांत्रिक सिद्धियों के लिए भी बटुक भैरव की ही उपासना करते हैं।

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भैरव के इन 8 नामों का उच्चारण करने से मनोवांछित मनोकामना की पूर्ति होती है

1-अतिसांग भैरव
2-चंड भैरव
3-रुरु भैरव
4-क्रोध भैरव
5-उन्मत्त भैरव
6-कपाल भैरव
7-संहार भैरव
8-भीषण भैरव

माता वैष्णो देवी की पूजा तो बिना भैरव दर्शन के अपूर्ण मानी जाती है। शत्रु विनाश तथा रोगों से बचने के लिए यह पूजा आवश्यक है। राहु की महादशा में भैरो पूजा अति आवश्यक है। मंगलवार तथा बुधवार को इस उपासना का बहुत महत्व है। भैरव जयंती के दिन इनकी उपासना करने से रोगों से मुक्ति मिलती है।

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जो लोग सिर दर्द या माइग्रेन से पीड़ित हैं उनको आज के दिन भैरव उपासना अवश्य करनी चाहिए। शत्रु विनाश के लिए भी तथा अंतः मन के विकारों को दूर करने के लिए भी यह पूजा जरूरी है। यदि राहु जन्मकुंडली के पंचम भाव में बैठकर संतान प्राप्ति में बाधा उत्पन्न कर रहा है तो भैरो पूजा से राहु का दोष समाप्त होता है। यदि कुंडली में गुरु के साथ राहु बैठा है तो गुरू चांडाल नामक नकारात्मक परिणाम देता है, ऐसी स्थिति में भैरो पूजा नितांत आवश्यक हो जाती है।

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व्योमेश कुमार

महाशिवरात्रि आज 21 फरवरी 20 को है। ऐसी मान्यता है कि आज ही के दिन भगवान शिव और देवी पार्वती की शादी हुई थी। जिस कारण महाशिवरात्रि का धार्मिक महत्व बहुत ज्य़ादा माना जाता है।

शिव रहते हैं #शिवलिंग में
धर्म के जानकारों के हिसाब से फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष के एकादशी, यानी फरवरी-मार्च के महीने में पड़ने वाला ये त्यौहार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि आज के दिन भगवान शिव का अंश प्रत्येक शिवलिंग में पूरे दिन और रात मौजूद रहता है। महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में शिव अपने रूद्र रूप में प्रकट हुए थे।

महाशिवरात्रि बहुत महत्वपूर्ण है।

धर्मशास्त्रियों के मुताबिक महाशिवरात्रि के दिन ग्रहों की दशा कुछ ऐसी होती है कि मानव शरीर में प्राकृतिक रूप से ऊर्जा ऊपर की ओर चढ़ती है. वे लोग जो अध्यात्म मार्ग पर हैं उनके लिए महाशिवरात्रि बहुत महत्वपूर्ण है। और तो और योग परंपरा में शिव की पूजा ईश्वर के रूप में नहीं बल्कि उन्हें आदि गुरु मानकर की जाती है।

महाशिवरात्रि पूजन विधि

शिवपुराण की कोटि रुद्र संहिता में बताया गया है कि शिवरात्रि व्रत करने से व्यक्ति को भोग एवं मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा पार्वती के पूछने पर भगवान सदाशिव ने बताया कि शिवरात्रि व्रत करने से महान पुण्य की प्राप्ति होती है। मोक्ष की प्राप्ति कराने वाले चार संकल्प पर नियमपूर्वक पालन करना चाहिए।

महाशिवरात्रि पूजन विधि
ये चार संकल्प हैं- शिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा, रुद्रमंत्र का जप, शिवमंदिर में उपवास तथा काशी में देहत्याग। शिवपुराण में मोक्ष के चार सनातन मार्ग बताए गए हैं। इन चारों में भी शिवरात्रि व्रत का विशेष महत्व है।

उपवास में रात्रि जागरण क्यों?
‘विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देनिहः’ के अनुसार आध्यात्मिक साधना के लिए उपवास करना सबसे ज़रूरी है। संतों का यह कथन अत्यंत प्रसिद्ध है – ‘या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।’ उपासना से इन्द्रियों और मन पर नियंत्रण करने वाला संयमी व्यक्ति ही रात्रि में जागकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हो सकता है।
इन्हीं सब कारणों से शिवरात्रि में व्रती जन उपवास के साथ रात में जागकर शिव पूजा करते हैं। इसलिए महाशिवरात्रि को रात के चारों पहरों में विशेष पूजा की जाती है। सुबह आरती के बाद यह पूजा पूरी होती है।

शिव की महिमा विधि
देवों के देव देवाधिदेव महादेव ही एक मात्र ऐसे भगवान हैं, जिनकी भक्ति हर कोई करता है। चाहे वह इंसान हो, राक्षस हो, भूत-प्रेत हो अथवा देवता हो। यहां तक कि पशु-पक्षी, जलचर, नभचर, पाताललोक वासी हो अथवा बैकुण्ठवासी हो। शिव की भक्ति हर जगह हुई और जब तक दुनिया कायम है, शिव की महिमा गाई जाती रहेगी।

शिव को प्रसन्न करना है आसान
शिव पुराण कथा के अनुसार शिव ही ऐसे भगवान हैं, जो शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों को मनचाहा वर दे देते हैं। वे सिर्फ अपने भक्तों का कल्याण करना चाहते हैं। वे यह नहीं देखते कि उनकी भक्ति करने वाला इंसान है, राक्षस है, भूत-प्रेत है या फिर किसी और योनि का जीव है। शिव को प्रसन्न करना सबसे आसान है।

शिवलिंग की महिमा:- शिवलिंग में मात्र जल चढ़ाकर या बेलपत्र अर्पित करके भी शिव को प्रसन्न किया जा सकता है। इसके लिए किसी विशेष पूजन विधि की आवश्यकता नहीं है।

भारतीय त्रिमूर्ति के अनुसार भगवान शिव प्रलय के प्रतीक हैं। त्रिर्मूति के दो और भगवान हैं, विष्णु तथा ब्रह्मा। शिव का चित्रांकन एक क्रुद्ध भाव द्वारा किया जाता है। ऐसा प्रतीकात्मक व्यक्ति भाव, जिसके मस्तक पर तीसरी आंख है; जो जैसे ही खुलती है, अग्नि का प्रवाह बहना प्रारम्भ हो जाता है।

महाशिवरात्रि से संबंधित तीन कथाएँ
महाशिवरात्रि के महत्त्व से संबंधित तीन कथाएँ इस पर्व से जुड़ी हैं….

प्रथम कथा – महाशिवरात्रि
एक बार मां पार्वती ने शिव से पूछा कि कौन-सा व्रत उनको सर्वोत्तम भक्ति व पुण्य प्रदान कर सकता है? तब शिव ने स्वयं इस शुभ दिन के विषय में बताया था कि फाल्गुन कृष्ण पक्ष के चतुर्दशी की रात्रि को जो उपवास करता है, वह मुझे प्रसन्न कर लेता है। मैं अभिषेक, वस्त्र, धूप, अर्ध्य तथा पुष्प आदि समर्पण से उतना प्रसन्न नहीं होता, जितना कि व्रत-उपवास से।

दूसरी कथा – महाशिवरात्रि
इसी दिन, भगवान विष्णु व ब्रह्मा के समक्ष सबसे पहले शिव का अत्यंत प्रकाशवान आकार प्रकट हुआ था। श्रीब्रह्मा व श्रीविष्णु को अपने अच्छे कर्मों का अभिमान हो गया। श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए दोनों आमादा हो उठे। तब शिव ने हस्तक्षेप करने का निश्चय किया, चूंकि वे इन दोनों देवताओं को यह आभास दिलाना चाहते थे कि जीवन भौतिक आकार-प्रकार से कहीं अधिक है।
शिव एक अग्नि स्तम्भ के रूप में प्रकट हुए। इस स्तम्भ का आदि या अंत दिखाई नहीं दे रहा था। विष्णु और ब्रह्मा ने इस स्तम्भ के ओर-छोर को जानने का निश्चय किया। विष्णु नीचे पाताल की ओर इसे जानने गए और ब्रह्मा अपने हंस वाहन पर बैठ ऊपर गए। वर्षों यात्रा के बाद भी वे इसका आरंभ या अंत न जान सके।
वे वापस आए, अब तक उनक क्रोध भी शांत हो चुका था तथा उन्हें भौतिक आकार की सीमाओं का ज्ञान मिल गया था। जब उन्होंने अपने अहम् को समर्पित कर दिया, तब शिव प्रकट हुए तथा सभी विषय वस्तुओं को पुनर्स्थापित किया। शिव का यह प्राकट्य फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को ही हुआ था। इसलिए इस रात्रि को महाशिवरात्रि कहते हैं।
शिव एक अग्नि स्तम्भ के रूप में प्रकट हुए। इस स्तम्भ का आदि या अंत दिखाई नहीं दे रहा था। विष्णु और ब्रह्मा ने इस स्तम्भ के ओर-छोर को जानने का निश्चय किया। विष्णु नीचे पाताल की ओर इसे जानने गए और ब्रह्मा अपने हंस वाहन पर बैठ ऊपर गए। वर्षों यात्रा के बाद भी वे इसका आरंभ या अंत न जान सके।

तीसरी कथा – महाशिवरात्रि
इसी दिन भगवान शिव और आदि शक्ति का विवाह हुआ था। भगवान शिव का ताण्डव और भगवती का लास्यनृत्य दोनों के समन्वय से ही सृष्टि में संतुलन बना हुआ है, अन्यथा ताण्डव नृत्य से सृष्टि खण्ड- खण्ड हो जाये। इसलिए यह महत्त्वपूर्ण दिन है।

महाशिवरात्रि के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निपट कर समीप स्थित किसी शिव मंदिर में जाएं और भगवान शिव का जल से अभिषेक करें और उन्हें काले तिल अर्पण करें। इसके बाद मंदिर में कुछ देर बैठकर मन ही मन में ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जप करें।

महाशिवरात्रि इस दिन सुबह किसी नदी या तालाब जाकर आटे की गोलियां मछलियों को खिलाएं। जब तक यह काम करें मन ही मन में भगवान शिव का ध्यान करते रहें। यह धन प्राप्ति का बहुत ही सरल उपाय है।

महाशिवरात्रि यदि आपके विवाह में अड़चन आ रही है तो महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर केसर मिला हुआ दूध चढ़ाएं। इससे जल्दी ही आपके विवाह के योग बनने लगेंगे।

महाशिवरात्रि के दिन नंदी (बैल) को हरा चारा खिलाएं। इससे जीवन में सुख-समृद्धि आएगी और मन प्रसन्न रहेगा।

महाशिवरात्रि के दिन 21 बिल्वपत्रों पर चंदन से (ऊँ नम: शिवाय) लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाएं साथ ही रुद्राक्ष माला भी अर्पण करें। इससे सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाएंगी।

शिवमहिमा:-

भगवान शिव का निवास स्थान कैलाश पर्वत माना जाता है, लेकिन शिव समस्त जगत् में विचरण करते रहते हैं। अगर वे कैलाश पर्वत पर विचरण करते हैं, तो श्मशान में भी धूनी रमाते हैं। हिमालय पर उनके विचरण करने की मान्यता के कारण ही उत्तराखंड के नगरों और गाँवों में शिव के हज़ारों मंदिर हैं। धार्मिक मान्यता है कि शिवरात्रि को शिव जगत् में विचरण करते हैं।
शिवरात्रि के दिन शिव का दर्शन करने से हज़ारों जन्मों का पाप मिट जाता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह महाशिवरात्रि के पर्व का महत्व ही है कि सभी आयु वर्ग के लोग इस पर्व में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। इस दिन शिवभक्त काँवड़ में गंगाजी का जल भरकर शिवजी को जल चढ़ाते हैं। और उनकी पूजा-अर्चना करते हैं।

महाशिवरात्रि:- जल, दूध, दही के साथ ही शिवलिंग पर कौन-कौन सी चीजें चढ़ानी चाहिए।

इस बार महाशिवरात्रि पर सुबह-सुबह पूजा करना ज्यादा शुभ रहेगा। शास्त्रों के अनुसार शिवजी की कृपा से सभी इच्छाएं पूरी हो सकती हैं। जानिए शिव कृपा पाने के लिए शिवलिंग पर कौन-कौन सी चीजें चढ़ानी चाहिए…

शिवलिंग पर चढ़ाएं ये 10 चीजें।

  1. जल, 2. दूध, 3. दही, 4. शहद, 5. घी, 6. शकर, 7. ईत्र, 8. चंदन, 9. केशर, 10. भांग (विजया औषधि)

इन सभी चीजों को एक साथ मिलाकर या एक-एक चीज शिवलिंग पर चढ़ा सकते हैं। #शिवपुराण में बताया गया है कि इन चीजों से शिवलिंग को स्नान कराने पर भक्त की सभी इच्छाएं पूरी हो सकती हैं। स्नान करवाते समय ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप करना चाहिए।

शिव पूजन की सामान्य विधि:-

शिवरात्रि पर सुबह जल्दी उठें और स्नान आदि नित्य कर्मों के बाद घर के मंदिर में ही पूजा की व्यवस्था करें या किसी शिव मंदिर जाएं।

#भरत कुमार विनोद परिहार भगवा राज

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कुंडल कंकन पहिरे ब्याला।
तन बिभूति पट केहरि छाला।
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा।
नयन तीनि उपबीत भुजंगा।।
गरल कंठ उर नर सिर माला।
असिव बेष सिवधाम कृपाला।।
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा।
चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा।।
देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं।
वर लायक दुलहिनि जग नाहीं।।
बर अनुहारि बारात न भाई।
हँसी करैहहु पर पुर जाई।।
कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू।
बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू।।
बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना।
रिष्ट पुष्ट कोउ अति तनखीना।।
जस दूलहु तसि बनी बराता।
कौतुक बिबिध होहिं मग जाता।।
बिकट बेष रुद्रहि जब देखा।
अबलन्ह उर भय भयउ बिशेखा।।
मैना हृदय भयउ दुख भारी।
लीन्ही बोलि गोद बैठारी।।
जेहि बिधि तुम्हहि रूप अस दीन्हा।
तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा।।
असि बिचारि सोचहि मति माता।
सो न टरइ जो रचइ बिधाता।।
करम लिखा जो बाउर नाहू।
तौ कत दोष लगाइअ काहू।।

भगवान विष्णु और सप्तर्षियों की अनुनय विनय और देवी पार्वती की कठोर तपश्या से प्रसन्न हो देवताओ और जगत के कल्याण हेतु सर्वशक्तिमान विचित्र देव भगवान शिव देवी पार्वती के साथ विवाह के लिए तैयार हो गए विवाह की तैयारी धूमधाम से शुरु हो गई बारात के लिए भगवान शिव जी के गण दूल्हा के रूप में उन्हें सजाने सवारने लगे तथा उनका शृंगार करने लगे भगवान के जटाओं को उनके शरीर मे लिपटे सर्पों को विवाह के मुकुट के रूप में संवारा और सजाया गया कंकन और कुंडल के रूप में सर्पो को धारण कराया गया तन में भस्म लगाई गई भगवान नरसिंघ की छाल वस्त्र के रूप में लपेटी गयी ललाट पर बाल चंद्रमा को धारण किया गया शिर में देवी गंगा धारित की गई विशाल त्रिनेत्रधारी शिव जी को तीन भुजंग (काले नागों )का जनेऊ धारण किया गया कंठ में कालकूट बिष धारण किया गया गले मे नरमुंडों को माला धारण की गई हाथ मे त्रिसूल और डमरू ले सज धज कर बैल पर सवार हो अपने गणों के साथ जब भगवान शिव अपने भवन से बाहर आये तो दूल्हा का और उनके गणों का विचित्र रूप देखकर देवता और देवपत्नियाँ अपनी हँसी न रोक पाये हस्ते हुए सब ने कहा ऐसे दूल्हे के लायक तो इस संसार मे कोई दुलहिन मिलना असंभव है बाराती शिवगण विचित्र रूप और अपनी विचित्र सवारी के साथ कोई बहुत हाथों बाला कोई बहुत पैरों वाला तो कोई बिना हाथ और कोई बिना पैर बाला कोई बहुत शिर और बहुत मुख बाला तो कोई बिना शिर और बिना मुख बाला किसी के बहुत से नेत्र तो कई बिना नेत्रो के कोई बहुत मोटा तगड़ा तो कोई अत्यंत दुबला पतला भगवान शिव के साथ उनके गणों को विचित्र वेष भूषा के साथ खुस और प्रसन्न हो झूमते नाचते गाते देख कर भगवान श्री हरि विष्णु ने देवताओं से कहा कि सब लोग अलग अलग होकर चलो दूल्हा शिव जी की और उनकी टोली के साथ बारात में हम उनके अनुरूप नही है दूसरे के यहां जाकर हँसी मत करना ऐसे कहते सब अलग अलग अपने अपने दलों के साथ हसते हुए बारात में चले दरवाजे पर बारात आने पर मैन रानी ने दूल्हे की आरती की दूल्हा को देखकर वहां आई नगर की सब स्त्रियां डर कर भाग गई मैना रानी देवी पार्वती को गोद मे वैठा कर रो रो कर देवी पार्वती के रूप की प्रसंसा कर भाग को कोशती हुए बिधि को दोष देने लगी ऐसी रूपवान बेटी को ऐसा ऐसा विचित्र और अटपटा वर दिया इस पर देवी पार्वती ने अपनी माता को सांत्वना और दिलाशा देते हुए कहा की जिसके भाग्य में जो लिखा होता है वही मिलता है भाग्य से किसी का बस नही है इसलिए ईश्वर जो करता है उसे ही अच्छा और उचित मानकर उसे खुसी खुसी स्वीकार कर लेना चाहिए जब देवी देवता भाग्य में लिखे को भोगने को वाध्य होते है तो हम मनुष्य अपना भाग
कैसे बदल सकते है अतः कर्तव्य कर्मो का पालन करते हुए जो मिले उसी में संतोष कर प्रसन्न और खुस रहना ही सच्चा सुख है।

माहाशिवरात्रि की हार्दिक बधाई और शुभकामनाओ सहित सादर नमस्कार

श्री रामचरितमानस-बालकाण्ड
दोहा-91.2 से 96.7(खण्ड क्रम)
सादर नमस्कार
देव ब्रत चतुर्वेदी-पन्ना(मप्र)

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आयरलैंड में एक जगह है तारा हिल्स यानि तारा की पहाड़ियाँ, जहाँ ये शिवलिंग स्थापित है। वैज्ञानिक इसे 4000 वर्ष प्राचीन बताते हैं, ये शिवलिंग यहाँ के Pre – Christian युग का है जब यहाँ मूर्ति पूजक रहते थे। आज से 2500 वर्ष पहले तक आयरलैंड के सभी राजाओं का राज्याभिषेक यहीं इन्हीं के आशीर्वाद से होता था, फिर 500 AD में ये परम्परा बंद कर दी गई। अभी 7-8 साल पहले वहाँ के कुछ Radical ग़्रुप ने इस शिवलिंग को नुक़सान पहुँचाने की कोशिश भी की थी।

इसमें तो कोई शक नहीं कि ये शिवलिंग है क्यूँकि जिस देवी तारा के नाम पर ये पर्वत स्थित है हमारे शास्त्रों में तारा माता पार्वती को भी कहते हैं।

ये तथ्य सिर्फ़ इस बात के लिए नहीं बताया गया कि हम शिव की या अपने धर्म की व्यापकता को समझें और मानें, ये बताने के पीछे मुख्य मक़सद ये है कि अगर हम अब भी नहीं समझे और ऐसी ही सहृदयता दिखाते रहे, मूर्ख बनते रहे तो एक दिन हम और हमारा धर्म ऐसे ही अवशेषों में खोजा जाएगा और तब वो हमें अच्छे और समझदार के रूप में नहीं बल्कि आत्मघाती मूर्ख सभ्यता के रूप में याद करेंगे।
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1940, archaeologist M.S. Vats discovered three Shiva Lingas at Harappa, dating more than 5,000 years old. This rare archival photo shows that ancient Shiva Linga as it was being excavated from the Harappa site. Lingam, grey sandstone in situ, Harappa, Trench Ai, Mound F, Pl. X (c) (After Vats). “In an earthenware jar, No. 12414, recovered from Mound F, Trench IV, Square I… in this jar, six lingams were found along with some tiny pieces of shell, a unicorn seal, an oblong grey sandstone block with polished surface, five stone pestles, a stone palette, and a block of chalcedony…” (Vats,MS, Excavations at Harappa, p. 370)87427900_10158833641234625_8117037548586401792_n