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घुड़ला

हिन्दुत्व को बचाने के लिये आपके द्वारा इस सत्य से हिन्दुओं को अवगत कराना आवश्यक है नही तो कालांतर मे अर्थ का अनर्थ हो सकता है ! 
मारवाड़ में होली के बाद एक पर्व शुरू होता है ,जिसे घुड़ला पर्व कहते है ।
जिसमें कुँवारी लडकियाँ अपने सर पर एक मटका उठाकर उसके अंदर दीपक जलाकर गांव और मौहल्ले में घूमती है और घर घर घुड़लो जैसा गीत गाती है !
अब यह घुड़ला क्या है ?
कोई नहीं जानता है ,

घुड़ला की पूजा शुरू हो गयी ।
यह भी ऐसा ही घटिया ओर घातक षड्यंत्र है जैसा की अकबर को महान बोल दिया गया !
दरअसल हुआ ये था की घुड़ला खान अकबर का मुग़ल सरदार था और अत्याचारऔर पैशाचिकता मे भी अकबर जैसा ही गंदा पिशाच था ! 

ज़िला नागोर राजस्थान के पीपाड़ गांव के पास एक गांव है कोसाणा !
उस गांव में लगभग 200 कुंवारी कन्याये गणगोर पर्व की पूजा कर रही थी ,

वे व्रत में थी उनको मारवाड़ी भाषा में तीजणियां कहते है ! 
गाँव के बाहर मौजूद तालाब पर पूजन करने के लिये सभी बच्चियाँ गयी हुई थी ।

उधर से ही घुडला खान मुसलमान सरदार अपनी फ़ौज के साथ निकल रहा था ,

उसकी गंदी नज़र उन बच्चियों पर पड़ी तो उसकी वंशानुगत पैशाचिकता जाग उठी ! 

उसने सभी बच्चियों का बलात्कार के उद्देश्य से अपहरण कर लिया , जिस भी गाँव वाले ने विरोध किया उसको उसने मौत के घाट उतार दिया !

 इसकी सूचना घुड़सवारों ने जोधपुर के राव सातल सिंह राठौड़ जी को दी ! 
राव सातल सिंह जी और उनके घुड़सवारों ने घुड़ला खान का पीछा किया और कुछ समय मे ही घुडला खान को रोक लिया ,

 घुडला खान का चेहरा पीला पड़ गया उसने सातल सिंह जी की वीरता के बारे मे सुन रखा था ! 
उसने अपने आपको संयत करते हुये कहा , 
राव तुम मुझे नही दिल्ली के बादशाह अकबर को रोक रहे हो इसका ख़ामियाज़ा तुम्हें और जोधपुर को भुगतना पड़ सकता है ? 
राव सातल सिंह बोले , पापी दुष्ट ये तो बाद की बात है पर अभी तो में तुझे तेरे इस गंदे काम का ख़ामियाज़ा भुगता देता हुँ !
 राजपुतो की तलवारों ने दुष्ट मुग़लों के ख़ून से प्यास बुझाना शुरू कर दिया था , संख्या मे अधिक मुग़ल सैना के पांव उखड़ गये , भागती मुग़ल सैना का पीछा कर ख़ात्मा कर दिया गया ! 
राव सातल सिंह ने तलवार के भरपुर वार से घुडला खान का सिर धड़ से अलग कर दिया ! 

राव सातल सिंह ने सभी बच्चियों को मुक्त करवा उनकी सतीत्व की रक्षा करी ! 
इस युद्दध मे वीर सातल सिंह जी अत्यधिक घाव लगने से वीरगति को प्राप्त हुये ! 
उसी गाँव के तालाब पर सातल सिंह जी का अंतिम संस्कार किया गया, वहाँ मौजूद सातल सिंह जी की समाधि उनकी वीरता ओर त्याग की गाथा सुना रही है !
 गांव वालों ने बच्चियों को उस दुष्ट घुडला खान का सिर सोंप दिया ! 
बच्चियो ने घुडला खान के सिर को घड़े मे रख कर उस घड़े मे जितने घाव घुडला खान के शरीर पर हुये उतने छेद किये और फिर पुरे गाँव मे घुमाया और हर घर मे रोशनी की गयी ! 
यह है घुड़ले की वास्तविक कहानी !

 

जिसके बारे में अधिकाँश लोग अनजान है ।
 लोग हिन्दु राव सातल सिंह जी को तो भूल गए 

और पापी दुष्ट घुड़ला खान को पूजने लग गये ! 
इतिहास से जुडो और सत्य की पूजा करो !
और हर भारतीय को इस बारे में बतायें ।
सातल सिंह जी को याद करो नहीं तो हिन्दुस्तान के ये तथाकथित गद्दार इतिहासकार उस घुड़ला खान को देवता बनाने का कुत्सित प्रयास करते रहेंगे ।

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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

श्रीदत्तात्रय बालकृष्ण कालेलकर
एक का एक ही नया सूरज रोज-रोज उगता है, फिर हर रोज नया प्राण, चैतन्य, नवजीवन अपने साथ ले आता है। यह सोचकर कि सूरज पुराना ही है, पक्षी निरुत्साह नहीं होते। कल का ही सूर्य आज आया है। यह कहकर द्विजगुण भगवान दिनकर का निरादर नहीं करते।

जिस आदमी का जीवन शुष्क हो गया है, जिसकी आँखों का पानी उतर गया है, जिसकी नसों में कुछ नहीं रहा है, उसी के लिए सूरज पुराना है। जिसमें प्राण का कुछ भी अंश है, उसके मन तो भगवान सूर्य नारायण नित्य-नूतन हैं।

जन्माष्टमी भी हर साल आती है प्रतिवर्ष वही की वही कथा सुनते हैं, उसी तरह उपवास करते हैं और प्रायः एक ही ढंग से श्रीकृष्ण जन्म उत्सव मनाते हैं, फिर भी हजारों वर्षों से जन्माष्टमी हमें उस जगद्गुरु का नया ही सन्देश देती आई है। कृष्णपक्ष की अष्टमी के वक्रचंद्र की तरह एक पगपर भार देकर और दूसरा पैर तिरछा रखकर शरीर की कमनीय बांकी अदा के साथ मुरलीधर ने जिस दिन संसार में प्रथम प्राण फूंका, उस दिन से आज तक हर एक निराधार मनुष्य को यह आश्वासन मिला है कि

नहि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति।

भाई! जो आदमी सन्मार्ग पर चलता है, जो धर्म पर डटा रहता है उसकी किसी भी काल में दुर्गति नहीं होती।

लोग खयाल करते हैं कि धर्म दुर्बल लोगों के लिए है। अधिक हुआ तो व्यक्तियों के आपसी संबंध में उसकी कुछ उपयोगिता होगी। पर राजा और सम्राट तो जो करे, वही धर्म है। साम्राज्यशक्ति धर्म से परे है। व्यक्ति का पुण्य क्षय होता होगा। पर साम्राज्य तो अलौकिक वस्तु है। ईश्वर की विभूति से साम्राज्य की विभूति श्रेष्ठतर है। सम्राट जब हाथ में विजय पताका लेकर पर्यटन करता है तो ईश्वर दिन में चंद्रमा की भांति कहीं छिप रहता है।

मथुरा में कंस की भावना ऐसी ही थी, मगध देश में जरासन्ध का ऐसा ही खयाल था, चेदि देश में शिशुपाल की यही मनोदशा थी, जलाशय में रहने वाला कालियानाग यही मानता था, द्वारका पर चढ़ाई करने वाले कालयवन की यही फिलासफी थी, महापापी नरकासुर को यही शिक्षा मिली थी और दिल्ली का सम्राट कौरवेश्वर भी इसी वृत्ति में पलकर बड़ा हुआ था। ये तमाम महापराक्रमी राजा अन्धे या अज्ञानी थे।

उनके दरबार में इतिहासवेत्ता, अर्थशास्त्र विशारद और राजधुरन्धर अनेक विद्वान थे। वे अपने शास्त्रों का मन्थन करके उनका नवनीत निकालते और अपने सम्राटों के सामने रखते थे, परन्तु जरासन्ध कहता-‘ आपके ऐतिहासिक सिद्धांतों को रहने दीजिए, मेरा पुरुषार्थ अपने बुद्धिबल और बाहुबल से आपके इन सिद्धांतों को मिथ्या सिद्ध करने में समर्थ है।’

नया संदेश जन्माष्टमी हर साल आती है, प्रायः एक ही ढंग से श्रीकृष्ण जन्म उत्सव मनाते हैं, फिर भी हजारों वर्षों से जन्माष्टमी हमें उस जगद्गुरु का नया ही सन्देश देती आई है।
कालयवन कहता-‘ मैं एक ही अर्थशास्त्र जानता हूं, दूसरे देशों को लूटकर उनका धन छीन लेना। यही धनवान बनने का एकमात्र आसान, सीधा और इसी कारण सशास्त्र मार्ग है।’ शिशुपाल कहता- ‘न्याय अन्याय की बात प्रजा के आपसी कलह में चल सकती है। हम तो सम्राट ठहरे। हमारी जाति ही जुदा है। प्रतिष्ठा और पद ही हमारा धर्म है।’ कौरवेश्वर कहता-‘ जितने रत्न हैं, सब हमारी विरासत हैं, वे हमारे ही पास आने चाहिए।’ ‘यतो रत्नभुजो वयम्‌-‘ ( क्योंकि हम रत्नभोगी हैं, रत्न का उपभोग करने के लिए पैदा किए गए हैं)।

दुनिया में जितने सरोवर हों सब हमारे ही विहार के लिए हैं। बगैर लड़े हम किसी को सुई की नोक बराबर भी जमीन न देंगे।पक्षपात शून्य नारद ने कंस को सचेत कर दिया था कि पराए शत्रु के मुकाबले में तू भले सफल हुआ हो, पर तेरे साम्राज्य के अन्दर-अरे तेरे परिवार के अन्दर तेरा शत्रु पैदा होगा। जिस सगी बहन को तूने आश्रित दासी की स्थिति में रखा है। उसी के पुत्र के हाथों तेरा नाश होगा, क्योंकि वह धर्मात्मा होगा।

उसका तेजोवध करने के लिए तू जितने प्रयत्न करेगा, वे सब उसी के अनुकूल हो जाएंगे। कंस ने मन में विचार किया ‘समय से इतने पहले चेतावनी मिली है अब बारिश से पहले यदि बांध न बांधा तो हम इतिहासज्ञ कैसे? हम सम्राट कैसे?’ नारद ने कहा- ये तेरे विनाश काल की विपरीत बुद्धि है। मैं जो कह रहा हूं वह इतिहास का सिद्धांत नहीं है, धर्म का सिद्धांत है, वह सनातन सत्य है।

वसुदेव-देवकी के आठ बालकों में से एक के हाथों अवश्य ही तेरी मृत्यु होगी। तेरे लिए एक ही उपाय है। अब भी पश्चाताप कर, और श्रीहरि की शरण जा।’ अभिमानी कंस ने तिरस्कारयुक्त हास्य से उत्तर दिया-‘समरभूमि में पराजित हुए बिना सम्राट पश्चाताप नहीं करते।’ ‘तथास्तु’ कहकर निराश नारद चले गए। कंस ने सोचा, अब तक के सम्राट सफल नहीं हुए, इसका एक कारण था, उनकी गफलत, वे काफी सावधान रहना नहीं जानते थे। यदि मैं भी गाफिल रहा तो मुझे भी पराजित होना पड़ेगा। परंतु इसकी परवाह नहीं।

जो वीर है, वह हमेशा जय के लिए जी तोड़ प्रयत्न करे और पराजय के लिए तैयार रहे। हार जाने में बदनामी है, परन्तु धर्म के नाम पर शरण जाने में बदनामी है। धर्म का साम्राज्य साधु-सन्त-वैरागी और देव-ब्राह्मणों को मुबारक रहे, मैं तो सम्राट हूं और एक ही शक्ति को पहचानता हूं।

क्रूर बन कर कंस ने वसुदेव के सात निरपराध अर्भकों का खून किया । श्रीकृष्ण जन्म के समय ईश्वरी लीला प्रबल रही और श्रीकृष्ण परमात्मा के बदले कन्या देह धारी शक्ति कंस के हाथ आई। कंस ने उसे जमीन पर पछाड़ा, परंतु कहीं शक्ति शक्ति से मरने वाली थी। वसुदेव ने गुप्त रीति से श्रीकृष्ण को गोकुल में रखा, परन्तु परमात्मा को तो कोई भी बात छिपानी नहीं थी। परमात्मा को कौन विज्ञापन का डर था। शक्ति ने अट्टाहस के साथ दिग्‌मूढ़ बने हुए कंस से कहा-‘ तेरा शत्रु तो गोकुल में दिन दूना और राज चौगुना बढ़ रहा है।’

थुरा से गोकुल-वृन्दावन बहुत दूर नहीं है। शायद चार-पाँच कोस भी नहीं है। कंस ने श्रीकृष्ण को मारने में जितने सूझे, प्रयत्न किए, परन्तु वह यही न समझ सका कि श्रीकृष्ण की मौत किसमें है। श्रीकृष्ण अमर तो थे ही नहीं, पर मरणाधीन भी नहीं थे। धर्मकार्य करने के लिए वे आए थे। जब तक धर्मराज्य स्थापित न हो, वे कैसे विरमते? कंस ने सोचा श्रीकृष्ण को अपने दरबार में बुलाकर मारा जाए, पर यहीं उसने धोखा खाया, क्योंकि प्रजा ने परमात्म-तत्त्व पहचाना और प्रजा परमात्मा के अनुकूल बन गई।

कंस का नाश देखकर जरासन्ध को सावधान हो जाना चाहिए था। पर जरासन्ध ने सोचा, नहीं मैं कंस से अधिक जागरूक हूं, मैंने अनेक भिन्न-भिन्न अवयवों को जोड़कर अपना साम्राज्य सबल बनाया है। मल्लयुद्ध में मेरी जोड़ का कौन है? मेरी नगरी का कोट दुर्भेद्य है। मुझे डर किस बात का है? जरासन्ध की भी दो फांके हुईं। कालियानाग तो अपने जल स्थान को सुरक्षा का नमूना मानता था। उसका विष असह्य था।

एक फुफकार से बड़ी-बड़ी सेनाओं को मार डालता था। उसके विष की भी कुछ न चली। कालयवन चढ़ आया, परन्तु सोए हुए मुचकुन्द की क्रोधाग्नि से वह बीच में जलकर खाक हो गया। नरकासुर एक स्त्री के हाथों भस्म हुआ, कौरवेश्वर दुर्योधन द्रौपदी की क्रोधाग्नि में स्वाहा हुआ और शिशुपाल को उसकी भगवत निन्दा ने ही मार डाला।

षड्रिपु से ये छह सम्राट उन दिनों मर गए। सप्तलोक और सप्तपाताल सुखी हुए और जन्माष्टमी सफल हुई। फिर भी हर साल इतने-इतने वर्षों से हम यह उत्सव क्यों मनाते हैं। इसलिए कि आज भी हमारे हृदयों से षड्रिपुओं का नाश नहीं हुआ है, वे हमें अत्यंत पीड़ा पहुंचाते है, हम प्रायः हिम्मत हार बैठते हैं। ऐसे वक्त हमारे हृदयों में श्रीकृष्णचन्द्र का जन्म होना चाहिए। ‘जहां पाप है वहां पाप-पुंजहारी भी हैं। इस आश्वासन का हमारे हृदय में उदय होना चाहिए। मध्य रात्रि के अन्धकार में कृष्णचंद्र का उदय हो, तभी निराश विश्व आश्वासन पा सकता और धर्म में दृढ़ संकल्प रह सकता है।

(गीता प्रेस से साभार)

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गणगौर त्यौहार

गणगौर त्यौहार

 

भारत रंगों भरा देश है . उसमे रंग भरते है उसके , भिन्न-भिन्न राज्य और उनकी संस्कृति . हर राज्य की संस्कृति झलकती है उसकी, वेश-भूषा से वहा के रित-रिवाजों से और वहा के त्यौहारों से . हर राज्य की अपनी, एक खासियत होती है जिनमे, त्यौहार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है .

 

गणगौर त्यौहार महत्त्व, पूजा विधि कथा , गीत व उद्यापन विधि
भारत का एक राज्य राजस्थान, जो मारवाड़ीयों की नगरी है और, गणगौर मारवाड़ीयों का बहुत बड़ा त्यौहार है जो, बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है ना केवल, राजस्थान बल्कि हर वो प्रदेश जहा मारवाड़ी रहते है, इस त्यौहार को पूरे रीतिरिवाजों से मनाते है . गणगौर दो तरह से मनाया जाता है . जिस तरह मारवाड़ी लोग इसे मनाते है ठीक, उसी तरह मध्यप्रदेश मे, निमाड़ी लोग भी इसे उतने ही उत्साह से मनाते है . त्यौहार एक है परन्तु, दोनों के पूजा के तरीके अलग-अलग है . जहा मारवाड़ी लोग सोलह दिन की पूजा करते है वही, निमाड़ी लोग मुख्य रूप से तीन दिन की गणगौर मनाते है .

 

गणगौर त्यौहार कब मनाया जाता है और शुभ मुहूर्त कब है? (Gangaur festival 2017 date and muhurt)

 

इस वर्ष 2017 में गणगौर का त्यौहार 30 मार्च 2017, दिन गुरुवार के दिन मनाया जायेगा. गणगौर की पूजा का समय 29 मार्च 2017 को शाम 10.16 मिनट से 30 मार्च 2017 को शाम 7.12 मिनट तक है.

 

मारवाड़ी रूप मे गणगौर –

 

  • पूजन का महत्व
  • पूजन सामग्री
  • पूजन की विधी
  • गणगौर की कथा
  • गणगौर पूजते समय का गीत
  • गणपति जी की कहानी
  • गणगौर अरग के गीत
  • गणगौर को पानी पिलाने का गीत
  • उद्यापन की विधी

गणगौर पूजन का महत्व ( Gangaur festival pooja mahatv)
 

गणगौर एक ऐसा पर्व है जिसे, हर स्त्री के द्वारा मनाया जाता है . इसमें कुवारी कन्या से लेकर, विवाहित स्त्री दोनों ही, पूरी विधी-विधान से गणगौर जिसमे, भगवान शिव व माता पार्वती का पूजन करती है . इस पूजन का महत्व कुवारी कन्या के लिये , अच्छे वर की कामना को लेकर रहता है जबकि,विवाहित स्त्री अपने पति की दीर्घायु के लिये होता है . जिसमे कुवारी कन्या पूरी तरह से तैयार होकर और, विवाहित स्त्री सोलह श्रंगार करके पुरे, सोलह दिन विधी-विधान से पूजन करती है .

 

पूजन सामग्री ( Gangaur festival pooja Samagri)

 

जिस तरह, इस पूजन का बहुत महत्व है उसी तरह,  पूजा सामग्री का भी पूर्ण होना आवश्यक है .

 

  • लकड़ी की चौकी/बाजोट/पाटा
  • ताम्बे का कलश
  • काली मिट्टी/होली की राख़
  • दो मिट्टी के कुंडे/गमले
  • मिट्टी का दीपक
  • कुमकुम, चावल, हल्दी, मेहन्दी, गुलाल, अबीर, काजल
  • घी
  • फूल,दुब,आम के पत्ते
  • पानी से भरा कलश
  • पान के पत्ते
  • नारियल
  • सुपारी
  • गणगौर के कपडे
  • गेहू
  • बॉस की टोकनी
  • चुनरी का कपड़ा

उद्यापन की सामग्री ( Gangaur festival Udyapan Samagri)-

 

उपरोक्त सभी सामग्री, उद्यापन मे भी लगती है परन्तु, उसके अलावा भी कुछ सामग्री है जोकि, आखरी दिन उद्यापन मे आवश्यक होती है .

 

  • सीरा (हलवा)
  • पूड़ी
  • गेहू
  • आटे के गुने (फल)
  • साड़ी
  • सुहाग या सोलह श्रंगार का समान आदि.

गणगौर पूजन की विधी ( Gangaur festival pooja vidhi )

 

मारवाड़ी स्त्रियाँ सोलह दिन की गणगौर पूजती है . जिसमे मुख्य रूप से, विवाहित कन्या शादी के बाद की पहली होली पर, अपने माता-पिता के घर या सुसराल मे, सोलह दिन की गणगौर बिठाती है . यह गणगौर अकेली नही, जोड़े के साथ पूजी जाती है . अपने साथ अन्य सोलह कुवारी कन्याओ को भी, पूजन के लिये पूजा की सुपारी देकर निमंत्रण देती है . सोलह दिन गणगौर धूम-धाम से मनाती है अंत मे, उद्यापन कर गणगौर को विसर्जित कर देती है. फाल्गुन माह की पूर्णिमा, जिस दिन होलिका का दहन होता है उसके दूसरे दिन, पड़वा अर्थात् जिस दिन होली खेली जाती है उस दिन से, गणगौर की पूजा प्रारंभ होती है . ऐसी स्त्री जिसके विवाह के बाद कि, प्रथम होली है उनके घर गणगौर का पाटा/चौकी लगा कर, पूरे सोलह दिन उन्ही के घर गणगौर का पूजन किया जाता है .

 

 

  • सर्वप्रथम चौकी लगा कर, उस पर साथिया बना कर, पूजन किया जाता है . जिसके उपरान्त पानी से भरा कलश, उस पर पान के पाच पत्ते, उस पर नारियल रखते है . ऐसा कलश चौकी के, दाहिनी ओर रखते है.
  • अब चौकी पर सवा रूपया और, सुपारी (गणेशजी स्वरूप) रख कर पूजन करते है .
  • फिर चौकी पर, होली की राख या काली मिट्टी से, सोलह छोटी-छोटी पिंडी बना कर उसे, पाटे/चौकी पर रखा जाता . उसके बाद पानी से, छीटे देकर कुमकुम-चावल से, पूजा की जाती है .
  • दीवार पर एक पेपर लगा कर, कुवारी कन्या आठ-आठ और विवाहिता सोलह-सोलह टिक्की क्रमशः कुमकुम, हल्दी, मेहन्दी, काजल की लगाती है .
  • उसके बाद गणगौर के गीत गाये जाते है, और पानी का कलश साथ रख, हाथ मे दुब लेकर, जोड़े से सोलह बार, गणगौर के गीत के साथ पूजन करती है .
  • तदुपरान्त गणगौर, कहानी गणेश जी की, कहानी कहती है . उसके बाद पाटे के गीत गाकर, उसे प्रणाम कर भगवान सूर्यनारायण को, जल चड़ा कर अर्क देती है .
  • ऐसी पूजन वैसे तो, पूरे सोलह दिन करते है परन्तु, शुरू के सात दिन ऐसे, पूजन के बाद सातवे दिन सीतला सप्तमी के दिन सायंकाल मे, गाजे-बाजे के साथ गणगौर भगवान व दो मिट्टी के, कुंडे कुमार के यहा से लाते है.
  • अष्टमी से गणगौर की तीज तक, हर सुबह बिजोरा जो की फूलो का बनता है . उसकी और जो दो कुंडे है उसमे, गेहू डालकर ज्वारे बोये जाते है . गणगौर की जिसमे ईसर जी (भगवान शिव) – गणगौर माता (पार्वती माता) के , मालन, माली ऐसे दो जोड़े और एक विमलदास जी ऐसी कुल पांच प्रतिमाए होती है . इन सभी का पूजन होता है , प्रतिदिन, और गणगौर की तीज को उद्यापन होता है और सभी चीज़ विसर्जित होती है .

गणगौर माता की कथा / कहानी (Gangaur mata Katha/ Story)
 

राजा का बोया जो-चना, माली ने बोई दुब . राजा का जो-चना बढ़ता जाये पर, माली की दुब घटती जाये . एक दिन, माली हरी-हरी घास मे, कंबल ओढ़ के छुप गया . छोरिया आई दुब लेने, दुब तोड़ कर ले जाने लगी तो, उनका हार खोसे उनका डोर खोसे . छोरिया बोली, क्यों म्हारा हार खोसे, क्यों म्हारा डोर खोसे , सोलह दिन गणगौर के पूरे हो जायेंगे तो, हम पुजापा दे जायेंगे . सोलह दिन पूरे हुए तो, छोरिया आई पुजापा देने माँ से बोली, तेरा बेटा कहा गया . माँ बोली वो तो गाय चराने गयों है, छोरियों ने कहा ये, पुजापा कहा रखे तो माँ ने कहा, ओबरी गली मे रख दो . बेटो आयो गाय चरा कर, और माँ से बोल्यो माँ छोरिया आई थी , माँ बोली आई थी, पुजापा लाई थी हा बेटा लाई थी, कहा रखा ओबरी मे . ओबरी ने एक लात मारी, दो लात मारी ओबरी नही खुली , बेटे ने माँ को आवाज लगाई और बोल्यो कि, माँ-माँ ओबरी तो नही खुले तो, पराई जाई कैसे ढाबेगा . माँ पराई जाई तो ढाब लूँगा, पर ओबरी नी खुले . माँ आई आख मे से काजल, निकाला मांग मे से सिंदुर निकाला , चिटी आंगली मे से मेहन्दी निकाली , और छीटो दियो ,ओबरी खुल

 

गई . उसमे, ईश्वर गणगौर बैठे है ,सारी चीजों से भण्डार भरिया पड़िया है . है गणगौर माता , जैसे माली के बेटे को टूटी वैसे, सबको टूटना . कहता ने , सुनता ने , सारे परिवार ने .

 

गणगौर पूजते समय का गीत (Gangaur Poojan Geet)
 

यह गीत शुरू मे एक बार बोला जाता है और गणगौर पूजना प्रारम्भ किया जाता है –

 

प्रारंभ का गीत –

 

गोर रे, गणगौर माता खोल ये , किवाड़ी

 

बाहर उबी थारी पूजन वाली,

 

पूजो ये, पुजारन माता कायर मांगू

 

अन्न मांगू धन मांगू , लाज मांगू लक्ष्मी मांगू

 

राई सी भोजाई मंगू .

 

कान कुवर सो, बीरो मांगू इतनो परिवार मांगू ..

 

उसके बाद सोलह बार गणगौर के गीत से गणगौर पूजी जाती है .

 

सोलह बार पूजन का गीत –

 

गौर-गौर गणपति ईसर पूजे, पार्वती

 

पार्वती का आला टीला, गोर का सोना का टीला .

 

टीला दे, टमका दे, राजा रानी बरत करे .

 

करता करता, आस आयो मास

 

आयो, खेरे खांडे लाडू लायो,

 

लाडू ले बीरा ने दियो, बीरों ले गटकायों .

 

साडी मे सिंगोड़ा, बाड़ी मे बिजोरा,

 

सान मान सोला, ईसर गोरजा .

 

दोनों को जोड़ा ,रानी पूजे राज मे,

 

दोनों का सुहाग मे .

 

रानी को राज घटतो जाय, म्हारों सुहाग बढ़तों जाय

 

किडी किडी किडो दे,

 

किडी थारी जात दे,

 

जात पड़ी गुजरात दे,

 

गुजरात थारो पानी आयो,

 

दे दे खंबा पानी आयो,

 

आखा फूल कमल की डाली,

 

मालीजी दुब दो, दुब की डाल दो

 

डाल की किरण, दो किरण मन्जे

 

एक,दो,तीन,चार,पांच,छ:,सात,आठ,नौ,दस,ग्यारह,बारह,

 

तेरह, चौदह,पंद्रह,सोलह .

 

सोलह बार पूरी गणगौर पूजने के बाद पाटे के गीत गाते है

 

पाटा धोने का गीत –

 

पाटो धोय पाटो धोय, बीरा की बहन पाटो धो,

 

पाटो ऊपर पीलो पान, म्हे जास्या बीरा की जान .

 

जान जास्या, पान जास्या, बीरा ने परवान जास्या

 

अली गली मे, साप जाये, भाभी तेरो बाप जाये .

 

अली गली गाय जाये, भाभी तेरी माय जाये .

 

दूध मे डोरों , म्हारों भाई गोरो

 

खाट पे खाजा , म्हारों भाई राजा

 

थाली मे जीरा म्हारों भाई हीरा

 

थाली मे है, पताशा बीरा करे तमाशा

 

ओखली मे धानी छोरिया की सासु कानी ..

 

ओडो खोडो का गीत –

 

ओडो छे खोडो छे घुघराए , रानियारे माथे मोर .

 

ईसरदास जी, गोरा छे घुघराए रानियारे माथे मोर ..

 

(इसी तरह अपने घर वालो के नाम लेना है )

 

गणपति जी की कहानी
 

एक मेढ़क था, और एक मेंढकी थी . दोनों जनसरोवर की पाल पर रहते थे . मेंढक दिन भर टर्र टर्र करता रहता था . इसलिए मेंढकी को, गुस्सा आता और मेंढक से बोलती, दिन भर टू टर्र टर्र क्यों करता है . जे विनायक, जे विनायक करा कर . एक दिन राजा की दासी आई, और दोनों जना को बर्तन मे, डालकर ले

 

गई और, चूल्हे पर चढ़ा दिया . अब दोनों खदबद खदबद सीजने लगे, तब मेंढक बोला मेढ़की, अब हम मार जायेंगे . मेंढकी गुस्से मे, बोली की मरया मे तो पहले ही थाने बोली कि ,दिन भर टर्र टर्र करना छोड़

 

दे . मेढको बोल्यो अपना उपर संकट आयो, अब तेरे विनायक जी को, सुमर नही किया तो, अपन दोनों मर जायेंगे . मेढकी ने जैसे ही सटक विनायक ,सटक विनायक का सुमिरन किया इतना मे, डंडो टूटयों हांड़ी फुट गई . मेढक व मेढकी को, संकट टूटयों दोनों जन ख़ुशी ख़ुशी सरोवर की, पाल पर चले गये . हे विनायकजी महाराज, जैसे मेढ़क मेढ़की का संकट मिटा वैसे सबका संकट मिटे . अधूरी हो तो, पूरी कर जो,पूरी हो तो मान राखजो .

 

गणगौर अरग के गीत

 

पूजन के बाद, सुरजनारायण भगवान को जल चड़ा कर गीत गाया जाता है .

 

अरक का गीत –

 

अलखल-अलखल नदिया बहे छे

 

यो पानी कहा जायेगो

 

आधा ईसर न्हायेगो

 

सात की सुई पचास का धागा

 

सीदे रे दरजी का बेटा

 

ईसरजी का बागा

 

सिमता सिमता दस दिन लग्या

 

ईसरजी थे घरा पधारों गोरा जायो,

 

बेटो अरदा तानु परदा

 

हरिया गोबर की गोली देसु

 

मोतिया चौक पुरासू

 

एक,दो,तीन,चार,पांच,छ:,सात,आठ,नौ,दस,ग्यारह,बारह,

 

तेरह, चौदह,पंद्रह,सोलह .

 

गणगौर को पानी पिलाने का गीत

 

सप्तमी से, गणगौर आने के बाद प्रतिदिन तीज तक (अमावस्या छोड़ कर) शाम मे, गणगौर घुमाने ले जाते

 

है . पानी पिलाते और गीत गाते हुए, मुहावरे व दोहे सुनाते है .

 

पानी पिलाने का गीत –

 

म्हारी गोर तिसाई ओ राज घाटारी मुकुट करो

 

बिरमादासजी राइसरदास ओ राज घाटारी मुकुट करो

 

म्हारी गोर तिसाई ओर राज

 

बिरमादासजी रा कानीरामजी ओ राज घाटारी

 

मुकुट करो म्हारी गोर तिसाई ओ राज

 

म्हारी गोर ने ठंडो सो पानी तो प्यावो ओ राज घाटारी मुकुट करो ..

 

(इसमें परिवार के पुरुषो के नाम क्रमशः लेते जायेंगे . )

 

गणगौर उद्यापन की विधी (Gangaur Udyapan vidhi )
 

सोलह दिन की गणगौर के बाद, अंतिम दिन जो विवाहिता की गणगौर पूजी जाती है उसका उद्यापन किया जाता है .

 

विधी –

 

  • आखरी दिन गुने(फल) सीरा , पूड़ी, गेहू गणगौर को चढ़ाये जाते है .
  • आठ गुने चढा कर चार वापस लिये जाते है .
  • गणगौर वाले दिन कवारी लड़किया और ब्यावली लड़किया दो बार गणगौर का पूजन करती है एक तो प्रतिदिन वाली और दूसरी बार मे अपने-अपने घर की परम्परा के अनुसार चढ़ावा चढ़ा कर पुनः पूजन किया जाता है उस दिन ऐसे दो बार पूजन होता है .
  • दूसरी बार के पूजन से पहले ब्यावाली स्त्रिया चोलिया रखती है ,जिसमे पपड़ी या गुने(फल) रखे जाते है . उसमे सोलह फल खुद के,सोलह फल भाई के,सोलह जवाई की और सोलह फल सास के रहते है .
  • चोले के उपर साड़ी व सुहाग का समान रखे . पूजा करने के बाद चोले पर हाथ फिराते है .
  • शाम मे सूरज ढलने से पूर्व गाजे-बाजे से गणगौर को विसर्जित करने जाते है और जितना चढ़ावा आता है उसे कथानुसार माली को दे दिया जाता है.
  • गणगौर विसर्जित करने के बाद घर आकर पांच बधावे के गीत गाते है .

नोट – गणगौर के बहुत से, गीत और दोहे होते है . हर जगह अपनी परम्परानुसार, पूजन और गीत जाये जाते है . जो प्रचलित है उसे, हम अपने अनुसार डाल रहे है . निमाड़ी गणगौर सिर्फ तीन दिन ही पूजी जाती है . जबकि राजस्थान मे, मारवाड़ी गणगौर प्रचलित है जो, झाकियों के साथ निकलती है .

 

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भगवान श्री परशुराम

विजय कृष्ण पांडेय
निति धर्म का पाठ पढ़ाया,,
सत्य मार्ग पर चलना सिखाया !
शस्त्र और शास्त्र दोनों हैं उपयोगी,,

हमें बता गए महान योगी !
भगवान विष्णु के आवेशावतार – 

“भगवान श्री परशुराम” जी की

पावन जयंती के शुभ अवसर पर

अनंत शुभकामनायें,,
निहित स्वार्थ के कारण सनातन समाज में मिथ्या धारणा प्रतिपादित हुई है

कि श्री परशु राम ने २१ बार क्षत्रियों का संहार किया था जबकि सत्य यह है कि

सहस्त्रार्जुनएक आततायी शासक था,,,

इसके शासन में सनातन धर्म का लोप हो रहा था,इसके एवं इनके वंशजों का

आचरण दानव कुल की भांति ही था,,,

इसके अत्याचार से पावन सनातन भूमि को मुक्त कराने के लिए श्री परशुराम

को सहस्त्रार्जुन एवं इसके वंशजों से २१ बार भयंकर युद्ध करना पड़ा था,,

तदुपरांत पुनः सत्य सनातन धर्म की अवधारणा स्थापित हो सकी।

सम्पूर्ण तथ्यों एवं साक्ष्यों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि श्री परशुराम क्षत्रिय

वर्ण विरोधी नहीं थे,,

क्षात्र धर्म को वे महान सनातन धर्म रक्षक मानते थे,,,

सहस्त्रार्जुन एवं उसके वंशजों के धर्मच्युत आचरण के कारण ही श्री परशुराम को

योगी होते हुए भी शस्त्र उठाकर धर्म की रक्षा करनी पड़ी थी।

प्राचीन काल में ”क्षत्रिय” शब्द का प्रयोग राजा के लिए होता था,किन्तु कालांतर में

इस शब्द का प्रयोग क्षत्रिय वर्ण के लिए होने लगा,,

यही इस भ्रम का कारण है।

”क्षत्रिय” शब्द के अर्थ संकुचन के कारण ही ब्राह्मण एवं क्षत्रियों के संबंधों में

गहरी खाई उत्पन्न हो गयी है जो कि सर्वथा अनुचित है,,,

यह सनातन धर्म के लिए अहितकारी सिद्ध हुआ है।

क्षत्रियों का एक वर्ग है जिसे हैहयवंशी समाज कहा जाता है यह समाज आज भी है।

इसी समाज में एक राजा हुए थे सहस्त्रार्जुन।

परशुराम ने इसी राजा और इनके पुत्र और पौत्रों का वध किया था और उन्हें इसके

लिए 21 बार युद्ध करना पड़ा था।

परशुरामजी का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराण,और कल्कि पुराण

इत्यादि अनेक ग्रन्थों में किया गया है।

वे अहंकारी और धृष्ट हैहय वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से संहार करने के लिए प्रसिद्ध हैं।

वे धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे।

कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये।

वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी सन्तानों में से एक थे, जो सदैव अपने गुरुजनों

और माता पिता की आज्ञा का पालन करते थे।

वे सदा बड़ों का सम्मान करते थे और कभी भी उनकी अवहेलना नहीं करते थे।

उनका भाव इस जीव सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवन्त बनाये

रखना था।

वे चाहते थे कि यह सारी सृष्टि पशु पक्षियों, वृक्षों, फल फूल औए समूची प्रकृति के

लिए जीवन्त रहे।

उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है नाकि अपनी

प्रजा से आज्ञापालन करवाना।

वे एक ब्राह्मण के रूप में जन्में अवश्य थे लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय थे।

उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है।

यह भी ज्ञात है कि परशुराम ने अधिकांश विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही

अपनी माता की शिक्षाओं से सीख ली थीँ (वह शिक्षा जो ८ वर्ष से कम आयु

वाले बालकोको दी जाती है)।

वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे बात कर सकते थे।

यहाँ तक कि कई खूँख्वार वनैले पशु भी उनके स्पर्श मात्र से ही उनके मित्र बन

जाते थे।

उन्होंने सैन्यशिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही दी।

लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं जैसे भीष्म और कर्ण।

उनके जाने-माने शिष्य थे –

भीष्म,द्रोण,कौरव-पाण्डवों के गुरु व अश्वत्थामा के पिता एवं कर्ण।

कर्ण को यह ज्ञात नहीं था कि वह जन्म से क्षत्रिय है।

वह सदैव ही स्वयं को क्षूद्र समझता रहा लेकिन उसका सामर्थ्य छुपा न रह सका।

जब परशुराम को इसका ज्ञान हुआ तो उन्होंने कर्ण को यह श्राप दिया की उनका

सिखाया हुआ सारा ज्ञान उसके किसी काम नहीं आएगा जब उसे उसकी सर्वाधिक

आवश्यकता होगी।

इसलिए जब कुरुक्षेत्र के युद्ध में कर्ण और अर्जुन आमने सामने होते है तब वह

अर्जुन द्वारा मार दिया जाता है क्योंकि उस समय कर्ण को ब्रह्मास्त्र चलाने का

ज्ञान ध्यान में ही नहीं रहा।

प्राचीन काल में कन्नौज में गाधि नाम के एक राजा राज्य करते थे।

उनकी सत्यवती नाम की एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी।

राजा गाधि ने सत्यवती का विवाह भृगुनन्दन ऋषीक के साथ कर दिया।

सत्यवती के विवाह के पश्चात् वहाँ भृगु ऋषि ने आकर अपनी पुत्रवधू को

आशीर्वाद दिया और उससे वर माँगने के लिये कहा।

इस पर सत्यवती ने श्वसुर को प्रसन्न देखकर उनसे अपनी माता के लिये एक

पुत्रकी याचना की।

सत्यवती की याचना पर भृगु ऋषि ने उसे दो चरु पात्र देते हुये कहा कि जब तुम

और तुम्हारी माता ऋतु स्नान कर चुकी हो तब तुम्हारी माँ पुत्र की इच्छा लेकर

पीपल का आलिंगन करे और तुम उसी कामना को लेकर गूलर का आलिंगन

करना।

फिर मेरे द्वारा दिये गये इन चरुओं का सावधानी के साथ अलग अलग सेवन

कर लेना।

इधर जब सत्यवती की माँ ने देखा कि भृगु ने अपने पुत्रवधू को उत्तम सन्तान

होने का चरु दिया है तो उसने अपने चरु को अपनी पुत्री के चरु के साथ बदल

दिया।

इस प्रकार सत्यवती ने अपनी माता वाले चरु का सेवन कर लिया।

योगशक्ति से भृगु को इस बात का ज्ञान हो गया और वे अपनी पुत्रवधू के पास

आकर बोले,

”पुत्री तुम्हारी माता ने तुम्हारे साथ छल करके तुम्हारे चरु का सेवन कर लिया है।

इसलिये अब तुम्हारी सन्तान ब्राह्मण होते हुये भी क्षत्रिय जैसा आचरण करेगी

और तुम्हारी माता की सन्तान क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण जैसा आचरण करेगी।”

इस पर सत्यवती ने भृगु से विनती की कि आप आशीर्वाद दें कि मेरा पुत्र ब्राह्मण

का ही आचरण करे,भले ही मेरा पौत्र क्षत्रिय जैसा आचरण करे।

भृगु ने प्रसन्न होकर उसकी विनती स्वीकार कर ली।

समय आने पर सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि का जन्म हुआ।

जमदग्नि अत्यन्त तेजस्वी थे। बड़े होने पर उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या

रेणुका से हुआ।

रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुए जिनके नाम थे – रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्वानस

और परशुराम।

श्रीमद्भागवत में दृष्टान्त है कि गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार

करता देख हवन हेतु गंगा तट पर जल लेने गई रेणुका आसक्त हो गयी और कुछ

देर तक वहीं रुक गयीं।

हवन काल व्यतीत हो जाने से क्रुद्ध मुनि जमदग्नि ने अपनी पत्नी के आर्य मर्यादा

विरोधी आचरण एवं मानसिक व्यभिचार करने के दण्डस्वरूप सभी पुत्रों को माता

रेणुका का वध करने की आज्ञा दी।

अन्य भाइयों द्वारा ऐसा दुस्साहस न कर पाने पर पिता के तपोबल से प्रभावित

परशुराम ने उनकी आज्ञानुसार माता का शिरोच्छेद एवं उन्हें बचाने हेतु आगे

आये अपने समस्त भाइयों का वध कर डाला।

उनके इस कार्य से प्रसन्न जमदग्नि ने जब उनसे वर माँगने का आग्रह किया

तो परशुराम ने सभी के पुनर्जीवित होने एवं उनके द्वारा वध किए जाने सम्बन्धी

स्मृति नष्ट हो जाने का ही वर माँगा।

कथानक है कि हैहय वंशाधिपति कार्त्तवीर्यअर्जुन (सहस्त्रार्जुन) ने घोर तप द्वारा

भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न कर एक सहस्त्र भुजाएँ तथा युद्ध में किसी से परास्त

न होने का वर पाया था।

संयोगवश वन में आखेट करते वह जमदग्निमुनि के आश्रम जा पहुँचा और देवराज

इन्द्र द्वारा उन्हें प्रदत्त कपिला कामधेनु की सहायता से हुए समस्त सैन्यदल के

अद्भुत आतिथ्य सत्कार पर लोभवश जमदग्नि की अवज्ञा करते हुए कामधेनु को

बलपूर्वक छीनकर ले गया।

कुपित परशुराम ने फरसे के प्रहार से उसकी समस्त भुजाएँ काट डालीं व सिर को

धड़ से पृथक कर दिया।

तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोध स्वरूप परशुराम की अनुपस्थिति में उनके

ध्यानस्थ पिता जमदग्नि की हत्या कर दी।

रेणुका पति की चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं।

इस काण्ड से कुपित परशुराम ने पूरे वेग से महिष्मती नगरी पर आक्रमण कर

दिया और उस पर अपना अधिकार कर लिया।

इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक पूरे इक्कीस बार युद्ध किया।

इसके पश्चात उन्होंने अश्वमेघ महायज्ञ किया और सप्तद्वीप युक्त पृथ्वी महर्षि

कश्यप को दान कर दी।

केवल इतना ही नहीं,उन्होंने देवराज इन्द्र के समक्ष अपने शस्त्र त्याग दिये और

सागर द्वारा उच्छिष्ट भूभाग महेन्द्र पर्वत पर आश्रम बनाकर रहने लगे।

सहस्त्रार्जुन एक चन्द्रवंशी राजा था जिसके पूर्वज थे महिष्मन्त।

महिष्मन्त ने ही नर्मदा के किनारे महिष्मती नामक नगर बसाया था।

इन्हीं के कुल में आगे चलकर दुर्दुम के उपरान्त कनक के चार पुत्रों में सबसे बड़े

कृतवीर्य ने महिष्मती के सिंहासन को सम्हाला।

भार्गव वंशी ब्राह्मण इनके राज पुरोहित थे।

भार्गव प्रमुख जमदग्नि ॠषि (परशुराम के पिता) से कृतवीर्य के मधुर सम्बन्ध थे।

कृतवीर्य के पुत्र का नाम भी अर्जुन था।

कृतवीर्य का पुत्र होने के कारण ही उन्हें कार्त्तवीर्यार्जुन भी कहा जाता है।

कार्त्तवीर्यार्जुन ने अपनी अराधना से भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न किया था।

भगवान दत्तात्रेय ने युद्ध के समय कार्त्तवीर्याजुन को हजार हाथों का बल प्राप्त

करने का वरदान दिया था,जिसके कारण उन्हें सहस्त्रार्जुन या सहस्रबाहु कहा

जाने लगा।

सहस्त्रार्जुन के पराक्रम से रावण भी घबराता था।

ऋषि वशिष्ठ से शाप का भाजन बनने के कारण सहस्त्रार्जुन की मति मारी गई थी।

सहस्त्रार्जुन ने परशुराम के पिता जमदग्नि के आश्रम में एक कपिला कामधेनु गाय

को देखा और उसे पाने की लालसा से वह कामधेनु को बलपूर्वक आश्रम से ले गया।

जब परशुराम को यह बात पता चली तो उन्होंने पिता के सम्मान के खातिर कामधेनु

वापस लाने की सोची और सहस्त्रार्जुन से उन्होंने युद्ध किया।

युद्ध में सहस्त्रार्जुन की सभी भुजाएँ कट गईं और वह मारा गया।

तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोधवश परशुराम की अनुपस्थिति में उनके पिता

जमदग्नि को मार डाला।

परशुराम की माँ रेणुका पति की हत्या से विचलित होकर उनकी चिताग्नि में प्रविष्ट

हो सती हो गयीं।

इस घोर घटना ने परशुराम को क्रोधित कर दिया और उन्होंने संकल्प लिया-

“मैं हैहय वंश के सभी क्षत्रियों का नाश करके ही दम लूँगा”।

उसके बाद उन्होंने अहंकारी और दुष्ट प्रकृति के हैहयवंशी क्षत्रियों से 21 बार युद्ध

किया।

क्रोधाग्नि में जलते हुए परशुराम ने सर्वप्रथम हैहयवंशियों की महिष्मती नगरी

पर अधिकार किया तदुपरान्त कार्त्तवीर्यार्जुन का वध।

कार्त्तवीर्यार्जुन के दिवंगत होने के बाद उनके पाँच पुत्र जयध्वज,शूरसेन,शूर,वृष

और कृष्ण अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते रहे।

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रामायण काल;-

उन्होंने त्रेतायुग में रामावतार के समय शिवजी का धनुष भंग होने पर आकाश-मार्ग

द्वारा मिथिलापुरी पहुँच कर क्रोधान्ध हो कर कहा,

“सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा, सहसबाहु सम सो रिपु मोरा”।

तदुपरान्त अपनी शक्ति का संशय मिटते ही वैष्णव धनुष श्रीराम को सौंप दिया और

क्षमा याचना करते हुए कहा,

“अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता, क्षमहु क्षमामन्दिर दोउ भ्राता” और तपस्या के निमित्त

वन को लौट गये।

रामचरित मानस की ये पंक्तियाँ साक्षी हैं-

“कह जय जय जय रघुकुलकेतू, भृगुपति गये वनहिं तप हेतू”।

वाल्मीकि रामायण में वर्णित कथा के अनुसार दशरथनन्दन श्रीराम ने जमदग्नि

कुमार परशुराम का पूजन किया और परशुराम ने रामचन्द्र की परिक्रमा कर

आश्रम की ओर प्रस्थान किया।

जाते जाते भी उन्होंने श्रीराम से उनके भक्तों का सतत सान्निध्य एवं चरणारविन्दों

के प्रति सुदृढ भक्ति की ही याचना की थी।

महाभारत काल;-

भीष्म द्वारा स्वीकार न किये जाने के कारण अंबा प्रतिशोध वश सहायता माँगने के

लिये परशुराम के पास आयी।

तब सहायता का आश्वासन देते हुए उन्होंने भीष्म को युद्ध के लिये ललकारा।

उन दोनों के बीच २३ दिनों तक घमासान युद्ध चला।

किन्तु अपने पिता द्वारा इच्छा मृत्यु के वरदान स्वरुप परशुराम उन्हें हरा न सके।

परशुराम अपने जीवन भर की कमाई ब्राह्मणों को दान कर रहे थे,तब द्रोणाचार्य

उनके पास पहुँचे।

किन्तु दुर्भाग्यवश वे तब तक सब कुछ दान कर चुके थे।

तब परशुराम ने दयाभाव से द्रोणचार्य से कोई भी अस्त्र-शस्त्र चुनने के लिये कहा।

तब चतुर द्रोणाचार्य ने कहा कि मैं आपके सभी अस्त्र शस्त्र उनके मन्त्रों सहित

चाहता हूँ ताकि जब भी उनकी आवश्यकता हो,प्रयोग किया जा सके।

परशुरामजी ने कहा-“एवमस्तु!” अर्थात् ऐसा ही हो।

इससे द्रोणाचार्य शस्त्र विद्या में निपुण हो गये।

परशुराम कर्ण के भी गुरु थे।

उन्होने कर्ण को भी विभिन्न प्रकार कि अस्त्र शिक्षा दी थी और ब्रह्मास्त्र चलाना भी

सिखाया था।

लेकिन कर्ण एक सूत का पुत्र था,फिर भी यह जानते हुए कि परशुराम केवल

ब्राह्मणों को ही अपनी विधा दान करते हैं, कर्ण ने छल करके परशुराम से

विद्या लेने का प्रयास किया।

परशुराम ने उसे ब्राह्मण समझ कर बहुत सी विद्यायें सिखायीं,लेकिन एक दिन

जब परशुराम एक वृक्ष के नीचे कर्ण की गोदी में सर रखके सो रहे थे,तब एक भौंरा

आकर कर्ण के पैर पर काटने लगा,अपने गुरुजी की नींद मे कोई अवरोध न आये

इसलिये कर्ण भौंरे को सेहता रहा,भौंरा कर्ण के पैर को बुरी तरह काटे जा रहा था,

भौरे के काटने के कारण कर्ण का खून बहने लगा।

वो खून बहता हुआ परशुराम के पैरों तक जा पहुँचा।

परशुराम की नींद खुल गयी और वे इस खून को तुरन्त पहचान गये कि यह खून

तो किसी क्षत्रिय का ही हो सकता है जो इतनी देर तक बगैर उफ़ किये बहता रहा।

इस घटना के कारण कर्ण को अपनी अस्त्र विद्या का लाभ नहीं मिल पाया।

एक अन्य कथा के अनुसार एक बार गुरु परशुराम कर्ण की एक जंघा पर सिर

रखकर सो रहे थे।

तभी एक बिच्छू कहीं से आया और कर्ण की जंघा पर घाव बनाने लगा।

किन्तु गुरु का विश्राम भंग ना हो,इसलिये कर्ण बिच्छू के दंश को सहता रहा।

अचानक परशुराम की निद्रा टूटी,और ये जानकर की एक शूद्र पुत्र में इतनी

सहनशीलता नहीं हो सकती कि वो बिच्छू के दंश को सहन कर ले।

कर्ण के मिथ्याभाषण पर उन्होंने उसे ये श्राप दे दिया कि जब उसे अपनी विद्या

की सर्वाधिक आवश्यकता होगी,तब वह उसके काम नहीं आयेगी।

भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र

के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को विश्ववन्द्य

महाबाहु परशुराम का जन्म हुआ था।

वे भगवान विष्णु के आवेशावतार थे।

भगवान परशुराम शस्त्र विद्या के श्रेष्ठ जानकार थे।

परशुराम केरल के मार्शल आर्ट कलरीपायट्टु की उत्तरी शैली वदक्कन कलरी के

संस्थापक आचार्य एवं आदि गुरु हैं।

वदक्कन कलरी अस्त्र-शस्त्रों की प्रमुखता वाली शैली है।

कल्कि पुराण के अनुसार परशुराम, भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि के

गुरु होंगे और उन्हें युद्ध की शिक्षा देंगे।

वे ही कल्कि को भगवान शिव की तपस्या करके उनके दिव्यास्त्र को प्राप्त करने

के लिये कहेंगे।

पिता जी ऋषि यमदग्नि के नाम पर ही जौनपुर कभी यमदाग्निपुरम से जौनपुर

हो गया. आज भी इनकी माता जी का मंदिर यहाँ विराजमान है।

हिंदू धर्म ग्रंथों में कुछ महापुरुषों का वर्णन है जिन्हें आज भी अमर माना जाता है।

इन्हें अष्टचिरंजीवी भी कहा जाता है।

इनमें से एक भगवान विष्णु के आवेशावतार परशुराम भी हैं-

अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण।

कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन।।

सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।

जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

इस श्लोक के अनुसार अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि वेदव्यास, हनुमान,विभीषण,

कृपाचार्य, भगवान परशुराम तथा ऋषि मार्कण्डेय अमर हैं।

ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम वर्तमान समय में भी कहीं तपस्या में लीन हैं।

भगवान परशुराम का वर्णन अनेक धर्म ग्रंथों में मिलता है जैसे रामायण,महाभारत, श्रीरामचरितमानस आदि।

रामायण तथा श्रीरामचरितमानस में भगवान परशुराम का श्रीराम व लक्ष्मण से

विवाद का वर्णन मिलता है वहीं महाभारत में भीष्म के साथ युद्ध का वर्णन है।

—- प्रत्यंचा सनातन संस्कृति

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सनातन धर्म द्रोहियों,गऊ हत्यारों एवं उनके समर्थकों तथा धर्म निरपेक्ष सनातन

धर्म की निंदा करने वालों को ”जय श्री परशुराम” उद्घोष का कोई अधिकार नही है।

ऐसे लोग क्षुद्र एवं क्षणिक स्वार्थ के लोभ में ”जय श्री परशुराम” का उद्घोष करते हैं,,

इनका महिमामंडन करते हैं।

ऐसे सभी द्रोही जनों का पूर्णतया बहिष्कार करें।

प्रभु श्री परशुराम हमारे आदर्श हैं एवं प्रभु श्री राम हमारे आदर्श होने के साथ साथ

पावन भूमि भारत के जन जन के आराध्य भी हैं।

दोनों ही अवतार थे,,हमारे लिए दोनों वन्दनीय हैं।

सनातन धर्म के संरक्षक सर्व प्रिय आचार्य श्री परशुराम की जय,,,

ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि !

तन्न: परशुराम: प्रचोदयात !

‘ॐ रां रां ॐ रां रां ॐ परशुहस्ताय नम:

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हम धर्म सापेक्ष है,,,

आस्तिक हैं,,,सनातन धर्मी हैं,,

हिंदू हैं,,,राष्ट्रवादी हैं,,,,,,
धर्म निरपेक्ष नहीं है,,,

नास्तिक नहीं हैं,,

सेकुलर नहीं हैं,,,
जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,,

जयति पुण्य भूमि भारत,,,
सेकुलर मुक्त भारत,,,

धर्मनिष्ठ भारत,,,

सशक्त भारत,,,

समृद्ध भारत,,,

संस्कारित भारत,,,

अखंड भारत,,,
सदासुमंगल,,,

हर हर महादेव,,

जय श्री परशुराम,,

जयश्रीराम

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मां की कृपा पाने के लिए ऐसे करें कन्या-पूजन : Prasad Davrani

मां की कृपा पाने के लिए ऐसे करें कन्या-पूजन :
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नवरात्रि यानी सौंदर्य के मुखरित होने का उत्सव। नवरात्रि यानी उमंग से खिल-खिल जाने का पर्व। कहते हैं, कि नौ दिनों तक दैवीय शक्ति मनुष्य लोक के भ्रमण के लिए आती है। इन दिनों की गई उपासना-आराधना से देवी मां भक्तों पर प्रसन्न होती है। लेकिन पुराणों में वर्णित है कि मात्र श्लोक-मंत्र-उपवास और हवनसे देवी मां को प्रसन्न नहीं किया जा सकता।
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इन दिनों 2 से लेकर 5 वर्ष तक की नन्ही कन्याओं के पूजन का विशेष महत्व है। नौ दिनों तक इन नन्ही कन्याओं को सुंदर उपहार देकर इनका दिल जीता जा सकता है। इनके माध्यम से नवदुर्गा को भी प्रसन्न किया जा सकता है। पुराणों की दृष्टि से नौ दिनों तक कन्याओं को एक विशेष प्रकार की भेंट देना शुभ होता है।
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1. प्रथम दिन इन्हें फूल की भेंट देना शुभ होता है। साथ में कोई एक श्रृंगार सामग्री अवश्य दें। अगर आप मां सरस्वती को प्रसन्न करना चाहते है तो श्वेत फूल अर्पित करें। अगर आपके दिल में कोई भौतिक कामना है तो लाल पुष्प देकर इन्हें खुश करें। (उदाहरण के लिए : गुलाब, चंपा, मोगरा, गेंदा, गुड़हल)
2. दूसरे दिन फल देकर इनका श्रद्धा के साथ पूजन करें। इसके बाद कन्या को फल भेंट करें। यह फल भी सांसारिक कामना के लिए लाल अथवा पीला और वैराग्य की प्राप्ति के लिए केला या श्रीफल हो सकता है।
यह भेंट कन्या को कुमकुम का तिलक लगाने के बाद दें और याद रखें कि देवी कन्याओं को मीठे फल ही दें, फल खट्टे ना हो।
3. तीसरे दिन मिठाई का महत्व होता है। इस दिन अगर कन्या को हाथ की बनी खीर, हलवा या केशरिया चावल बना कर खिलाए जाएं तो देवी प्रसन्न होती है।
4. चौथे दिन इन्हें वस्त्र देने का महत्व है लेकिन सामर्थ्य अनुसार रूमाल या रंगबिरंगे रीबन भी दिए जा सकते हैं।
5. पांचवे दिन देवी से सौभाग्य और संतान प्राप्ति की मनोकामना की जाती है। अत: कन्याओं को पांच प्रकार की श्रृंगार सामग्री देना अत्यंत शुभ होता है।
इनमें बिंदिया, चूड़ी, मेहंदी, बालों के लिए क्लिप्स, सुगंधित साबुन, काजल, नेलपॉलिश, टैल्कम पावडर इत्यादि हो सकते हैं।
6. छठे दिन बच्चियों को खेल-सामग्री देना चाहिए। आजकल बाजार में खेल सामग्री की अनेक वैरायटी उपलब्ध है। पहले यह रिवाज पांचे, रस्सी और छोटे-मोटे खिलौनों तक सीमित था। अब तो ढेर सारे विकल्प मौजूद है।
7. सातवां दिन मां सरस्वती के आह्वान का होता है। अत: इस दिन कन्याओं को शिक्षण सामग्री दी जानी चाहिए। आजकल स्टेशनरी बाजार में विभिन्न प्रकार के पेन, स्केच पेन, पेंसिल, कॉपी, ड्रॉईंग बुक्स, कंपास, वाटर बॉटल, कलर बॉक्स, लंच बॉक्स उपलब्ध है।
8. आठवां दिन नवरात्रि का सबसे पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन अगर कन्या का अपने हाथों से श्रृंगार किया जाए तो देवी विशेष आशीर्वाद देती है। इस दिन कन्या के दूध से पैर पूजने चाहिए। पैरों पर अक्षत, फूल और कुंकुम लगाना चाहिए। इस दिन कन्या को भोजन कराना चाहिए और यथासामर्थ्य कोई भी भेंट देनी चाहिए। हर दिन कन्या-पूजन में दक्षिणा अवश्य दें।
9. नौवें दिन खीर, ग्वारफली और दूध में गूंथी पूरियां कन्या को खिलानी चाहिए। उसके पैरों में महावर और हाथों में मेहंदी लगाने से देवी पूजा संपूर्ण होती है।
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अगर आपने घर पर हवन का अयोजन किया है तो उसके नन्हे हाथों से उसमें समिधा अवश्य डलवाएं। उसे इलायची और पान का सेवन कराएं।
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इस परंपरा के पीछे मान्यता है कि देवी जब अपने लोक जाती है तो उसे घर की कन्या की तरह ही बिदा किया जाना चाहिए। अगर सामर्थ्य हो तो नौवें दिन लाल चुनर कन्याओं को भेंट में दें। उन्हें दुर्गा चालीसा की छोटी पुस्तकें भेंट करें। गरबा के डांडिए और चणिया-चोली दिए जा सकते हैं।
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इन सारी रीतियों के अनुसार पूजन करने से देवी प्रसन्न होकर वर्ष भर के लिए सुख, समृद्धि, यश, वैभव, कीर्ति और सौभाग्य का वरदान देती है।

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सरहुल जोहर

सारहुल वसंत के मौसम के दौरान मनाया जाता है और साल के पेड़ अपनी शाखाओं पर नए फूलों मिलता है. यह जनजातियों की रक्षक माना जाता है, जो गांव देवता की पूजा है. लोग गाते हैं और नए फूल दिखाई देते हैं जब एक बहुत नृत्य. देवताओं साल फूलों के साथ पूजा की जाती है. गांव पुजारी या पहन कुछ दिनों के लिए व्रत रखती है. सवेरे वह एक स्नान लेता है और कुंवारी कपास (कच्चा धागा) से बना नया एक धोती पर डालता है. पिछली शाम, पहन तीन नए मिट्टी के बर्तन ले जाता है और ताजा पानी के साथ उन्हें भरता है; अगली सुबह वह इन मिट्टी के बर्तन और अंदर पानी का स्तर देखने को मिलती है. जल स्तर कम हो जाती है, तो वह अकाल या कम बारिश होगी भविष्यवाणी की है कि, और जल स्तर सामान्य है, तो वह एक अच्छी बारिश का संकेत है. पूजा शुरू होने से पहले, पहन की पत्नी अपने पैर धोता है और उसके पास से आशीर्वाद हो जाता है. पूजा में पहन मुंडा, हो और ओरओंस क्रमशः उसे पता, सर्वशक्तिमान ईश्वर सिंगबोंगा या धर्मेश के लिए एक करने के लिए अलग अलग रंग के तीन जवान मुर्गों प्रदान करता है; गांव देवताओं के लिए एक और; और पूर्वजों के लिए तृतीय. इस पूजा के दौरान ग्रामीणों सरना जगह घेर.

 

Sarhul

 

पारंपरिक ड्रम “ढोल, नागरा और तुरही” खिलाड़ियों ढोल और पहन देवताओं की पूजा जप के साथ खेल रही. पूजा समाप्त होने पर, लड़कों को उनके कंधे और उसकी पत्नी अपने पैर धोने से उसे स्वागत करता है जहां उसे अपने घर ले आगे नाच लड़कियों पर पहन ले. फिर पहन उसकी पत्नी और ग्रामीणों को साल फूल प्रदान करता है. इन फूलों को ग्रामीणों के बीच भाईचारा और दोस्ती का प्रतिनिधित्व करते हैं और पुजारी पहन, हर ग्रामीण को साल फूल वितरित करता है. उन्होंने यह भी कहा, “फूल खोंसि” कहा जाता है जो हर घर की छत पर साल्स फूल डालता है. एक ही समय प्रसाद, हंडिया नामक चावल बनाया बियर में, ग्रामीणों के बीच वितरित किया जाता है. और पूरे गांव गायन और सारहुल के इस त्योहार नृत्य के साथ मनाता है. यह छोटानागपुर के इस क्षेत्र में सप्ताह के लिए चला जाता है. कोलहन क्षेत्र में यह फूल महोत्सव अर्थ “बा पोरोब” कहा जाता है. यह ग्रेसट खुशी का त्योहार है.

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वीरता का प्रतीक समझा जाता था गणगौर लूटना

वीरता का प्रतीक समझा जाता था गणगौर लूटना

http://www.gyandarpan.com/2017/03/blog-post_29.html

राजस्थान में गणगौर पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता रहा है| रियासत काल में गणगौर रियासत व शासक की प्रतिष्ठा से जुड़ी रही है, तो दूसरे की गणगौर को लूट लाना वीरों का शगल रहा है| वीर गणगौर को लूट कर लाने में अपनी आन, बान, शान व वीरता का प्रतीक समझते थे और जिसकी लूटी जाती थी उसकी प्रतिष्ठा को आघात लगता था| जोबनेर के सिंघपुरी का रामसिंह खंगारोत मेड़ता की गणगौर उठा लाया था, तो बलुन्दा ठिकाने के स्वामी राव चांदा बूंदी की गणगौर लूट लाये थे| उस काल में छोटे-मोटे ठिकाने की गणगौर लूटने की घटना होना आम बात थी, इसलिए 16 दिन चलने वाले गणगौर पूजन कार्यक्रम उपरांत गणगौर को कड़ी सुरक्षा के मध्य रखा जाता था|

गणगौर ही नहीं सोलह दिन तक गणगौर पूजने के लिए —-लाने के लिए खेतों में जाने वाली स्त्रियों की रक्षा का भी ख्याल रखना होता था| मालाणी के शासक जगमाल के समय उसकी अनुपस्थिति में अहमदाबाद का सूबेदार गणगौर पूजने गई स्त्रियों को उठा ले गया था| अगले वर्ष गणगौर के समय ही जगमाल के आदमी बदले की कार्यवाही करते हुए अहमदाबाद के बादशाह की पुत्री गिंदोली को उठा लाये| गणगौर पर्व के एक दिन पहले जब जगमाल स्त्रियों की सुरक्षा में तैनात था तभी उसके आदमियों ने आकर उसे गिंदोली भेंट की, जिसे जगमाल ने पत्नी के रूप में स्वीकार किया और उसके स्वागत में उपस्थित महिलाओं ने गीत गाये जो आज भी पर्व के एक दिन पहले गाकर महिलाएं गिंदोली को याद करती है|

एक बार बूंदी के राव जो मेड़ता के जवाई थे, सुसराल आये तो उन्होंने वहां बलुन्दा के राव चांदा की बहादुरी के किस्से सुने, जो उन्हें रास नहीं और अपने हाडा वंश पर घमंड करते हुए कह दिया कि राव चांदा जैसे तो मेरे दरबार में कई है, यदि चांदा ऐसा ही बहादुर है राव चांदा तो बूंदी की गणगौर लूट के दिखाए|”

राव चांदा को जब ये बात पता चली तो उन्होंने वेश बदलकर अपने अपने 24 घुड़सवारों के साथ गणगौर पर्व पर गणगौर की सवारी से पहले बूंदी में आ कर छुप गए, अपने साथियों से गणगौर की सवारी निकलने वाले मार्ग की अच्छे से छान- बीन कर योजना लूटने की बनाई|

नियत समय पर गणगौर की सवारी निकली, गणगौर माता को सोने के गहनों से सजाया हुआ था| सुरक्षा के लिए भारी भरकम सैन्य दल साथ था| सो चांदा ने भांप लिया कि रास्ते में गणगौर लूटना आसान नहीं है| चूँकि चांदा को पहले ही पता चल गया था कि गणगौर की सवारी को शहर के दूसरे हिस्से में ले जाने के लिए नाव के जरिये नदी पार कर ले जाया जायेगा| अत: राव चांदा अपने चुनिन्दा साथियों के साथ नदी में छुप कर बैठ गए और गणगौर की सवारी का इंतजार करने लगे|
जैसे ही गणगौर की नाव बीच नदी में आई, नदी में पहले से तैनात चांदा ने नाव पर हमला कर गणगौर लूट ली, और तैर कर नदी के अगले पड़ाव पर तैयार खड़े अपने घोड़ो पर सवार हो कर बूंदी से निकल लिए| इस तरह बूंदी के शासक द्वारा अपने ही एक वीर रिश्तेदार पर व्यंग्य कसना भारी पड़ा| एक व्यंग्य ने बूंदी के शासक की प्रतिष्ठा धूल में मिला दी और बलुन्दा के राव चांदा ने बूंदी के शक्तिशाली हाडाओं की गणगौर लूटकर अपनी वीरता का प्रदर्शन कर साबित कर दिया कि वह एक श्रेष्ठ वीर है|

बूंदी से लूटी वह गणगौर आज भी बलुन्दा ठिकाने में है| राव चंदाजी द्वारा बूंदी राज्य की गणगौर लूट लेने के प्रसंग पर आज भी एक कहावत प्रचलन में है- “हाडा ले डूब्या गणगौर”
इस घटना के बाद बूँदी से जुड़े सभी ठिकानों मे पूरी गणगौर न बनाकर केवल माता जी का चेहरा प्रतिक बनाकर पूजन किया जाता हैं क्योंकि बूँदी की गणगौर तो राव चांदा के महलों में पहुँच गई| ये राव चांदा का समय 1516 to 1585 AD रहा है, इस घटना का सही समय तो उपलब्ध नहीं है पर ये इसी समय के मध्य की घटना है, उस वक़्त बूंदी के शासक राव राजा सुरजन सिंह थे|