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कार्तिकपूर्णिमा


#कार्तिकपूर्णिमाविशेष

सृष्टि के प्रारम्भ से ही कार्तिक पूर्णिमा की तिथि बड़ी ही खास रही है। पुराणों में कार्तिक पूर्णिमा को स्नान,व्रत, तप एवं दान को मोक्ष प्रदान करने वाला बताया गया है। इस माह के महत्व के बारे में स्कन्द पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण आदि प्राचीन ग्रंथों में विस्तार से बताया गया है,
जानिए कार्तिक पूर्णिमा, ,कार्तिक पूर्णिमा का महत्व,

भगवान श्रीकृष्ण ने इस मास की व्याख्या करते हुए कहा है,‘पौधों में तुलसी , मासों में कार्तिक , दिवसों में एकादशी और तीर्थों में द्वारका मेरे हृदय के सबसे निकट है।’ इसीलिए इस मास में भगवान श्री नारायण के साथ तुलसी और शालीग्राम के पूजन से भी असीम पुण्य प्राप्त होता है ।

इस पवित्र माह में की पूजा, व्रत दान और नित्य सुबह स्नान से असीम पुण्य की प्राप्ति होती है। कार्तिक पूर्णिमा में किए स्नान का फल, एक हजार बार किए गंगा स्नान के समान, सौ बार माघ स्नान के समान, वैशाख माह में नर्मदा नदी पर करोड़ बार स्नान के समतुल्य होता है। जो फल कुम्भ में प्रयाग में स्नान करने पर मिलता है, वही फल कार्तिक माह की पूर्णिमा में किसी भी पवित्र नदी के तट पर स्नान करने से प्राप्त होता है।

कार्तिक मास की पूर्णिमा का बहुत ही ज्यादा महत्व है। कार्तिक मास की पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा / त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि आज के दिन ही भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का अंत किया था और वे त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए थे, इसीलिए इस पुर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।
ऐसी माना जाता है कि इस दिन कृतिका में शिव शंकर के दर्शन करने से मनुष्य अगले सात जन्म तक ज्ञानी, धनवान और भाग्यशाली होता है।

इस दिन चन्द्र जब आकाश में उदित हो रहा हो उस समय शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का पूर्ण श्रद्धा से पूजन करने से जातक को भगवान शिव जी की अनुकम्पा प्राप्त होती है। इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से भी पूरे वर्ष स्नान करने का फल मिलता है।

इन 6 कृतिकाओं ने ही भगवान शिव और माँ पारवती के पुत्र भगवान कार्तिकेय को जन्म दिया था और उनका पालन पोषण किया था। शास्त्रों के अनुसार कार्तिकेय का जन्म 6 अप्सराओं के 6 अलग-अलग गर्भों से हुआ था और फिर वे 6 अलग-अलग शरीर एक में ही मिल गए थे।
शास्त्रों में कई जगह इन 6 कृतिकाओं को 6 सप्तऋषियों की पत्नियों के रूप में माना गया है। इन्हे भगवान कार्तिकेय के आदेशानुसार ही नक्षत्रमण्डल में स्थान प्राप्त हुआ है ( महाभारत वनपर्व के मार्कण्डेयसमास्यापर्व के अंतर्गत अध्याय 230 में वर्णित। )
प्रमोद कुमार

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ओणम त्यौहार कहानी एवं पूजा विधि | Onam Festival In Kerala History In Hindi  


ओणम त्यौहार कहानी एवं पूजा विधि | Onam Festival In Kerala History In Hindi

http://www.deepawali.co.in/ से साभार

 

भारत में तरह तरह के धर्म के लोग रहते है, ये हम सभी जानते है. यहाँ सभी धर्मों के अपने अपने त्यौहार है, कुछ त्यौहार तो देश के हर कोने में मनाते है, तो कुछ किसी विशेष क्षेत्र या राज्य में मनाये जाते है. भारत के मुख्य त्योहारों की बात करे, तो दीवाली, होली, ईद, बैसाखी, क्रिसमस, दुर्गा पूजा आदि है. दीवाली की बात की जाये तो ये देश का सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है, मुख्यरूप से उत्तरी भारत का तो ये बहुत बड़ा त्यौहार है, इसी तरह कलकत्ता में दुर्गा पूजा, पंजाब में बैसाखी मुख्य है. किसी राज्य विशेष के त्योहारों की बात करें, तो दक्षिण भारत के केरल में ओणम त्यौहार उत्तरी भारत के दीवाली जितना ही महत्वपूर्ण है. ओणम को मुख्य रूप से केरल राज्य में मनाया जाता है, जहाँ इसे बड़ी ही धूमधाम से हिन्दू धर्म के द्वारा मनाया जाता है.

 

ओणम त्यौहार कहानी एवं पूजा विधि  Onam Festival In Kerala History In Hindi

ओणम एक मलयाली त्यौहार है, जो किसानों का फेस्टिवल है, लेकिन सभी लोग ही वहां इसे मनाते है. जिसमें केरल राज्य में लोकल हॉलिडे भी होता है. यहाँ इस दौरान 4 दिन की छुट्टी रहती है.  इस त्यौहार की प्रसिद्धता को देखते हुए, 1961 में इसे केरल का नेशनल फेस्टिवल घोषित कर दिया गया. ओणम का त्यौहार समस्त केरल में 10 दिनों तक मनाया जाता है. भारत सरकार इस रंगबिरंगे त्यौहार को अन्तराष्ट्रीय तौर पर बढ़ावा दे रही है, जिससे ओणम त्यौहार के समय अधिक से अधिक पर्यटक केरल आ सकें. इसका असर देखा भी जा सकता है, भगवान् का देश कहा जाने केरल को देखने के लिए, ओणम के दौरान सबसे अधिक लोग जाते है.

 

कब मनाया जाता है ओणम पर्व? (Onam Festival 2017 Date) –

 

ओणम का त्यौहार मलयालम सोलर कैलेंडर के अनुसार चिंगम महीने में मनाया जाता है. यह मलयालम कैलेंडर का पहला महिना होता है, जो ज्यादातर अगस्त-सितम्बर महीने के समय में ही आता है. दुसरे सोलर कैलेंडर के अनुसार इसे महीने को सिम्हा महिना भी कहते है, जबकि तमिल कैलेंडर के अनुसार इसे अवनी माह कहा जाता है. जब थिरुवोनम नक्षत्र चिंगम महीने में आता है, उस दिन ओणम का त्यौहार मनाया जाता है. थिरुवोनम नक्षत्र को हिन्दू कैलेंडर के अनुसार श्रवना कहते है.

 

इस बार सन 2017 में ओणम 25 अगस्त दिन शुक्रवार से मनाना सुरु होगा. 10 दिन के ओणम त्यौहार में थिरुवोनम दिन सबसे महत्वपूर्ण होता है, जो 6 सितम्बर 2017, दिन बुधवार को ख़त्म  हो जायेगा.

 

थिरुवोनम नक्षत्र तिथि शुरू  सुबह 9:37, 4 सितम्बर 2017  थिरुवोनम नक्षत्र तिथि ख़त्म  सुबह 11:18, 4 सितम्बर 2017

ओणम त्यौहार का महत्व (Significance of Onam festival in Kerala) –

 

ओणम एक प्राचीन त्योहार है, जो अभी भी आधुनिक समय में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. ओणम के साथ साथ चिंगम महीने में केरल में चावल की फसल का त्योहार और वर्षा के फूल का त्योहार मनाया जाता है. ओणम त्यौहार की कहानी असुर राजा महाबली एवं भगवान् विष्णु से जुड़ी हुई है. लोगों का मानना है कि ओणम त्यौहार के दौरान राजा महाबली अपनी प्रजा से मिलने, उनके हाल चाल, खुशहाली जानने के लिए हर साल केरल राज्य में आते है. राजा महाबली के सम्मान में यह त्यौहार यहाँ मनाया जाता है.

 

ओणम त्यौहार के 10 दिन (Onam Ten Days) –

क्रमांक  दिन  महत्व  1.  अथं  पहला दिन होता है, जब राजा महाबली पाताल से केरल जाने की तैयारी करते है.  2.  चिथिरा  फूलों का कालीन जिसे पूक्क्लम कहते है, बनाना शुरू करते है. 3.  चोधी  पूक्क्लम में 4-5 तरह के फूलों से अगली लेयर बनाते है.  4.  विशाकम  इस दिन से तरह तरह की प्रतियोगितायें शुरू हो जाती है.  5.  अनिज्हम  नाव की रेस की तैयारी होती है.  6. थ्रिकेता  छुट्टियाँ शुरू हो जाती है.  7.  मूलम  मंदिरों में स्पेशल पूजा शुरू हो जाती है.  8.  पूरादम  महाबली और वामन की प्रतिमा घर में स्थापित की जाती है.  9.  उठ्रादोम  इस दिन महाबली केरल में प्रवेश करते है.  10.  थिरुवोनम  मुख्य त्यौहार

ओणम पर्व से जुड़ी कथा (Onam Festival Story) –

 

महाबली, पहलाद के पोते थे. पहलाद जो असुर हिरनकश्यप के बेटे थे, लेकिन फिर भी वे विष्णु के भक्त थे. अपने दादा की तरह महाबली भी बचपन से ही विष्णु भक्त थे. समय के साथ महाबली बड़े होते गए और उनका साम्राज्य विशाल होते चला गया. वे एक बहुत अच्छे, पराक्रमी, न्यायप्रिय, दानी, प्रजा का भला सोचने वाले रजा थे. महाबली असुर होने के बाद भी धरती एवं स्वर्ग पर राज्य किया करते थे. धरती पर उनकी प्रजा उनसे अत्याधिक प्रसन्न रहती थी, वे अपने राजा को भगवान् के बराबर दर्जा दिया करते थे. इसके साथ ही महाबली में घमंड भी कहीं न कहीं आने लगा था. ब्रह्मांड में बढ़ती असुरी शक्ति को देख बाकि देवी देवता घबरा गए, उन्होंने इसके लिए विष्णु जी की मदद मांगी. विष्णु जी इसके लिए मान जाते है. हिरनकश्यप और पहलाद की पूरी कहानी को यहाँ पढ़ें.

 

[Image: Onam Festival Essay History]

 

विष्णु जी महाबली को सबक सिखाने के लिए, सभी देवी देवताओं की मदद के लिए माता अदिति के बेटे के रूप में ‘वामन’ बन कर जन्म लेते है. ये विष्णु जी का पांचवां अवतार होते है. एक बार महाबली इंद्र से अपने सबसे ताकतवर शस्त्र को बचाने के लिए, नर्मदा नदी के किनारे अश्व्मेव यज्ञ करते है. इस यज्ञ की सफलता के बाद तीनों लोकों में असुर शक्ति और अधिक ताकतवर हो जाती. महाबली बोलते है, इस यज्ञ के दौरान उनसे जो कोई जो कुछ मांगेगा उसे दे दिया जायेगा. इस बात को सुन वामन इस यज्ञ शाला में आते है. ब्राह्मण के बेटे होने के कारण महाबली उन्हें पूरे सम्मान के साथ अंदर लाता है. महाबली वामन से बोलता है कि वो उनकी किस प्रकार सेवा कर सकता है, उन्हें उपहार में क्या दे सकता है. वामन मुस्कराते हुए कहते है, मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए, बस मुझे तो 3 डग जमीन दे दो.

 

ये बात सुन महाबली के गुरु समझ जाते है कि ये कोई साधारण बालक नहीं है, वे महाबली को उनकी इच्छा पूरी न करने को कहते है. लेकिन महाबली एक अच्छे राजा थे, वे अपने वचनों के पक्के थे, उन्होंने वामन को हाँ कर दिया. महाबली वामन को अपनी इच्छा अनुसार भूमि लेने के लिए बोलते है. ये बात सुन वामन अपने विशाल रूप में आ जाते है. उनके पहले कदम में सारी धरती समां जाती है, उनके दुसरे कदम में स्वर्गलोक आ जाता है. अब उनके तीसरे कदम के लिए राजा के पास कुछ नहीं होता है, तो अपने वचन को पूरा करने के लिए, राजा अपना सर वामन के पैर के नीचे रख देते है. ऐसा करते ही, राजा धरती में पाताललोक में समां जाते है. पाताललोक में जाने से पहले महाबली से एक इच्छा पूछी जाती है. महाबली विष्णु जी से मांगते है कि हर साल धरती में ओणम का त्यौहार उनकी याद में मनाया जाए, और उन्हें इस दिन धरती में आने की अनुमति दी जाये, ताकि वे यहाँ आकर अपनी प्रजा से मिलकर, उनके सुख दुःख को जान सकें.

 

ओणम मनाने का तरीका (Onam festival celebrations Kerala) –

 

  • ओणम त्यौहार की मुख्य धूम कोच्ची के थ्रिक्कारा मंदिर में रहती है. इस मंदिर में ओणम के पर्व पर विशेष आयोजन होता है, जिसे देखने देश विदेश से वहां लोग पहुँचते है. इस मंदिर में पुरे दस दिन एक भव्य आयोजन होता है, नाच गाना, पूजा आरती, मेला, शोपिंग यहाँ की विशेषताएं है. इस जगह पर तरह तरह की प्रतियोगिताएं भी होती है, जिसमें लोग बढचढ कर हिस्सा लेते है.
  • ओणम के दस दिन के त्यौहार में पहले दिन अन्थं होता है, जिस दिन से ओणम की तैयारियां चारों ओर शुरू हो जाती है. ओणम के लिए घर की साफ सफाई चालू हो जाती है, बाजार मुख्य रूप से सज जाते है. चारों तरफ त्यौहार का मौहोल बन जाता है.
  • पूक्कालम फूलों का कालीन विशेष रूप से ओणम में तैयार किया जाता है. इसे कई तरह के फूलों से तैयार किया जाता है. अन्थं से थिरुवोनम दिन तक इसे बनाया जाता है. ओणम के दौरान पूक्कालम बनाने की प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती है.
  • मार्किट में किसानों के लिए विशेष सेल लगाई जाती है, इसके साथ ही कपड़ो, गहनों के भी मार्किट लगाये जाते है.
  • नाव की रेस (Snake boat race) जिसे वल्लाम्काली कहते है, उसकी तैयारी जोरों शोरों से होती है. इस रेस का आयोजन ओणम के बाद होता है. इस नाव की रेस का आयोजन भारत के सिर्फ इस हिस्से में होता है, जो पुरे विश्व में प्रसिध्य है.
  • ओणम त्यौहार के समय छुट्टी भी होती है, जिससे लोग अपने अपने होमटाउन, अपने लोगों के साथ इस त्यौहार को मनाने के लिए जाते है.
  • आठवें दिन, जिसे पूरादम कहते है, महाबली एवं वामन की प्रतिमा को साफ़ करके, अच्छे से सजाकर घर एवं मंदिर में प्रतिष्ठित किया जाता है.
  • आखिरी दसवें थिरुवोनम के दिन चावल के घोल से घर के बाहर सजाया जाता है, जल्दी लोग नहाधोकर तैयार हो जाते है. घर को अच्छे से लाइट के द्वारा सजाया जाता है.
  • ओणम त्यौहार में नए कपड़े खरीदने एवं उसे पहनने का विशेष महत्व होता है. इसे ओनाक्कोदी कहते है.
  • जैसे महाबली दानवीर थे, इसलिए इस त्यौहार में दान का विशेष महत्व होता है. लोग तरह तरह की वस्तुएं गरीबों एवं दानवीरों को दान करते है.
  • ओणम के आखिरी दिन बनाये जाये वाले पकवानों को ओणम सद्या कहते है. इसमें 26 तरह के पकवान बनाये जाती है, जिसे केले के पत्ते पर परोसा जाता है.
  • ओणम के दौरान केरल के लोक नृत्य को भी वहां देखा जा सकता है, इसका आयोजन भी वहां मुख्य होता है. थिरुवातिराकाली, कुम्मात्तिकाली, कत्थककली, पुलिकाली आदि का विशेष आयोजन होता है.
  • वैसे तो ओणम का त्यौहार दसवें दिन ख़त्म हो जाता है, लेकिन कुछ लोग इसे आगे दो दिन और मनाते है. जिसे तीसरा एवं चौथा ओणम कहते है. इस दौरान वामन एवं महाबली की प्रतिमा को पवित्र नदी में विसर्जित किया जाता है. पूक्कालम को भी इस दिन हटाकर, साफ कर देते है.
10-12 दिन का त्यौहार हर्षोल्लास के साथ ख़त्म होता है, जिसे केरल का हर इन्सान बहुत मन से मनाता है.  इस रंगबिरंगे अनौखे त्यौहार में पूरा केरल चमक उठता है. केरल के दार्शनिक स्थल के बारे में यहाँ पढ़ें.
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वीर तेजा दशमी


वीर तेजा दशमी के पावन अवसर पर आप और आपके पूरे परिवार को
हार्दिक शुभकामनाएं !!! II Jai Jat Ki II || जय वीर तेजाजी !!
तेजाजी को भगवान शिव अवतार माना जाता है सर्प के काटे हुआ व्यक्ति तेजाजी कृपा से ठीक हो जाता है तेजाजी के पुजारी को घोडला एव चबूतरे को थान कहा जाता हे | सेंदेरिया तेजाजी कामूल स्थान हे यंही पर नाग ने इन्हें डस लिया था |ब्यावर में तेजा चोक में तेजाजी का एकप्राचीन थान हे | नागौर का खरनाल भी तेजाजी का

तेजा जी का जन्म राजस्थान के नागौर जिले में खरनाल गाँव में माघ शुक्ला, चौदस वार गुरुवार संवत ग्यारह सौ तीस, तदनुसार 29 जनवरी, 1074 को धुलिया गोत्र के जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता चौधरी ताहरजी (थिरराज) राजस्थान के नागौर जिले के खरनाल गाँव के मुखिया थे। तेजाजी के नाना का नाम दुलन सोढी था. उनकी माता का नाम सुगना था. मनसुख रणवा ने उनकी माता का नाम रामकुंवरी लिखा है. तेजाजी का ननिहाल त्यौद गाँव (किशनगढ़) में था. उनके नाना सोडा गोत्र के जाट थे

लोकदेवता के रूप में पूजनीय तेजाजी के निर्वाण दिवस भाद्रपद शुक्ल दशमी को प्रतिवर्ष तेजादशमी के रूप में मनाया जाता है। लोग व्रत रखते हैं। प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल 10 (तेजा दशमी) से पूर्णिमा तक तेजाजी के विशाल पशु मेले का आयोजन किया जाता है

राजस्थान में स्थानीय देवता रामदेव जी व गोगाजी के समान एक अन्य देवता ‘तेजाजी’ भी हैं जिनकी राजस्थान मध्यप्रदेश में ‘सर्परूप’ में बड़ी मान्यता है। प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल दशमी के दिन राजस्थान के सभी गांवों, कस्बों एवं शहरों में ‘तेजाजी’ का मेला लगता है। इस अवसर पर हाड़ौती अंचल के तलवास एवं आंतरदा गांव में ‘तेजादशमी’ और ‘अनंत चतुर्दशी’ के मौके पर निकाली जाने वाली ‘सर्प की सवारी’ जहां जन-कौतूहल का केंद्र है, वहीं वर्तमान विज्ञान के युग में भी अखंड धार्मिक विश्वास का जीता-जागता उदाहरण है।

बूंदी जिला के आंतरदा गांव में तेजादशमी (भाद्रपद शुक्ल दशमी) के दिन गांव के लोग (बच्चे-बूढ़ों सहित) एकत्र होकर एक निश्चित दिशा में ध्वज-पताकाएं, अलगोजे, ढोल, ताशे, मजीरों के साथ गाते-बजाते सर्परूपी तेजाजी को तलाशने जंगल में जाते हैं। वहां प्राय: खेजड़े (शमी) के वृक्ष पर उन्हें सफेद रंग का एक सर्प मिलता है, जिसकी लंबाई करीब एक बालिश्ति (बित्ता) यानी आठ से दस इंच एवं मोटाई लगभग आधा इंच होती है। इस विशिष्टï प्रजाति के सर्प के मस्तिष्क पर त्रिशूल एवं गाय के खुर की आकृतियां बनी होती हैं और यही इसके ‘तेजाजी’ के पति रूप होने की निशानी मानी जाती है।
आंतरदा गांव में पिछले 141 वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है। तेजा दशमी के दिन प्रतिवर्ष इस सर्प को खोजकर इसे तेजाजी की ‘देह’ मानकर तलवास और आंतरदा गांव में तेजाजी को ‘दहेलवाल जी’ के नाम से पूजा जाता है। इस सर्प को खोज लेने के उपरांत परंपरा के अनुसार आंतरदा के पूर्व नरेश एवं दहेलवालजी के पुजारी, पेड़ की टहनी पर बैठे इस सर्प की, सबसे पहले पूजा कर दूध का भोग लगाते हैं। इसके साथ ही ढोलक, मजीरों एवं अलगोजों की धुन पर तेजाजी (तेजाजी से संबंधित गीत) गाए जाते हैं। ग्रामीणों की मनुहार पर यह सर्प पेड़ की टहनी से उतरकर पुजारी के हाथ में रखी फूल-पत्तियां की ‘ठांगली’ (डलिया) में आ जाता है और इसी के साथ शुरू हो जाती है दहेलवालजी रूपी इस सर्प देवता की शोभायात्रा। शोभायात्रा के गढ़ चौक में पहुंचने पर आंतरदा ठिकाने की ओर से सर्पदेव की पूजा-अर्चना की जाती है।
पूजा-अर्चना के उपरांत यहां से प्रस्थान कर यह शोभायात्रा दहेलवाल जी के स्थानक (मंदिर) पर पहुंचती है और वहां सर्पदेव को प्रतिष्ठिïत कर दिया जाता है। ठीक ऐसी ही प्रक्रिया अनंत चतुर्दशी के दिन तलवास गांव में अपनाई जाती है। वहां भी यही सर्पदेव आंतरदा रोड स्थित जंगल से लाए जाते हैं तथा सर्परूपी दहेलवालजी की गांव के मुख्य मार्गों से शोभायात्रा निकाली जाती है। मार्ग में स्त्री-पुरुष श्रद्धापूर्वक चढ़ावा भी चढ़ाते हैं।
आंतरदा गांव में यह प्रथा कब से और कैसे प्रारंभ हुई इस संबंध में वहां एक किंवदंती प्रचलित है कि सन् 1871 में आंतरदा के तात्कालिक नरेश देवीसिंह की रानी को किसी सर्प ने डस लिया। तब देवीसिंह ने जूनिया (टोंक) स्थित दहेलवाल जी (तेजाजी) के नाम का एक डोरा (कलावा) अपनी रानी के हाथ पर बांध दिया। उसके बाद वह बिना किसी दवा एवं उपचार के ठीक हो गई।
इस घटना के बाद जब प्रथम बार तेजादशमी आई, तो उस दिन आंतरदा नरेश देवीसिंह अपनी रानी के हाथ पर तेजाजी के नाम का बंधा डोरा तेजाजी के पुजारी से कटवाने जूनिया गए, तो अपने साथ एक संगीत मंडली भी ले गए। इस मंडली का गायक तुलसीराम कीर ‘तेजाजी’ (तेजाजी से संबंधित गीत) गाने में माहिर थे। कहते हैं कि तुलसीराम जब ‘तेजाजी’ गा रहे थे तब जूनिया के दहेलवाल जी ने उनके शरीर में प्रवेश कर उनके श्रीमुख से आंतरदा नरेश को यह आदेश दिया कि यदि वह आंतरदा में मेरा स्थानक (देवालय) बनवा दें, तो मैं हर वर्ष सर्परूप में वहां आऊंगा और लोगों की मनौतियां पूरी करूंगा।
बाद में देवीसिंह ने जूनिया से आंतरदा वापस लौटकर परकोटे के बाहर करवर रोड पर दहेलवालजी का स्थानक बनवा दिया और तेजादशमी को उनके बताए स्थान से उन्हें पहली बार सर्परूप में लाया गया। तभी से यह परंपरा आज तक जारी है।
कालांतर में तलवास गांव में भी यह प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन मान्यता के अनुसार वहां सर्परूप तेजाजी तेजादशमी के चार दिन बाद अर्थात् अनंत चतुर्दशी को आते हैं। कहा जाता है कि चार दिन तक वे आंतरदा में ही निवास कर अपने वादे के मुताबिक लोगों की मनौतियां पूरी करते ह

तेजाजी का जन्म धौलिया या धौल्या गौत्र के जाट परिवार में हुआ।
धौल्या जाट शासकों की वंशावली इस प्रकार है:- 1.महारावल 2.भौमसेन 3.पीलपंजर 4.सारंगदेव 5.शक्तिपाल 6.रायपाल 7.धवलपाल 8.नयनपाल 9.घर्षणपाल 10.तक्कपाल 11.मूलसेन 12.रतनसेन 13.शुण्डल 14.कुण्डल 15.पिप्पल 16.उदयराज 17.नरपाल 18.कामराज 19.बोहितराव 20.ताहड़देव 21.तेजाजी
तेजाजी का जन्म राजस्थान के नागौर जिले में खरनाल गाँव में माघ शुक्ला, चौदस वार गुरुवार संवत ग्यारह सौ तीस, तदनुसार 29 जनवरी, 1074 को धुलिया गोत्र के जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता चौधरी ताहरजी (थिरराज) राजस्थान के नागौर जिले के खरनाल गाँव के मुखिया थे। तेजाजी के नाना का नाम दुलन सोढी था. उनकी माता का नाम सुगना था. मनसुख रणवा ने उनकी माता का नाम रामकुंवरी लिखा है. तेजाजी का ननिहाल त्यौद गाँव (किशनगढ़) में था. उनके नाना सोडा गोत्र के जाट थे
तेजाजी के माता-पिता शंकर भगवान के उपासक थे. शंकर भगवान के वरदान से तेजाजी की प्राप्ति हुई. कलयुग में तेजाजी को शिव का अवतार माना गया है. तेजा जब पैदा हुए तब उनके चेहरे पर विलक्षण तेज था जिसके कारण इनका नाम रखा गया तेजा. उनके जन्म के समय तेजा की माता को एक आवाज सुनाई दी –
“कुंवर तेजा ईश्वर का अवतार है, तुम्हारे साथ अधिक समय तक नहीं रहेगा.”
तेजाजी के जन्म के बारे में मत है-
जाट वीर धौलिया वंश गांव खरनाल के मांय।
आज दिन सुभस भंसे बस्ती फूलां छाय।।
शुभ दिन चौदस वार गुरु, शुक्ल माघ पहचान।
सहस्र एक सौ तीस में प्रकटे अवतारी ज्ञान।।
गाँव के मुखिया को ‘हालोतिया’या हळसौतिया करके बुवाई की शुरुआत करनी है। मुखिया मौजूद नहीं है। उनका बड़ा पुत्र भी गाँव में नहीं है। उस काल में परंपरा थी की वर्षात होने पर गण या कबीले के गणपति सर्वप्रथम खेत में हल जोतने की शुरुआत करता था, तत्पश्चात किसान हल जोतते थे. मुखिया की पत्नी अपने छोटे पुत्र को, जिसका नाम तेजा है, खेतों में जाकर हळसौतिया का शगुन करने के लिए कहती है। तेजा माँ की आज्ञानुसार खेतों में पहुँच कर हल चलाने लगा है। दिन चढ़ आया है। तेजा को जोरों की भूख लग आई है। उसकी भाभी उसके लिए ‘छाक’ यानी भोजन लेकर आएगी। मगर कब? कितनी देर लगाएगी? सचमुच, भाभी बड़ी देर लगाने के बाद ‘छाक’ लेकर पहुँची है। तेजा का गुस्सा सातवें आसमान पर है। वह भाभी को खरी-खोटी सुनाने लगा है। तेजाजी ने कहा कि बैल रात से ही भूके हैं मैंने भी कुछ नहीं खाया है, भाभी इतनी देर कैसे लगादी. भाभी भी भाभी है। तेजाजी के गुस्से को झेल नहीं पाई और काम से भी पीड़ित थी सो पलट कर जवाब देती है, एक मन पीसना पीसने के पश्चात उसकी रोटियां बनाई, घोड़ी की खातिर दाना डाला, फिर बैलों के लिए चारा लाई और तेजाजी के लिए छाक लाई परन्तु छोटे बच्चे को झूले में रोता छोड़ कर आई, फिर भी तेजा को गुस्सा आये तो तुम्हारी जोरू जो पीहर में बैठी है. कुछ शर्म-लाज है, तो लिवा क्यों नहीं लाते? तेजा को भाभी की बात तीर- सी लगती है। वह रास पिराणी फैंकते हैं और ससुराल जाने की कसम खाते हैं. वह तत्क्षण अपनी पत्नी पेमल को लिवाने अपनी ससुराल जाने को तैयार होता है। तेजा खेत से सीधे घर आते हैं और माँ से पूछते हैं कि मेरी शादी कहाँ और किसके साथ हुई. माँ को खरनाल और पनेर की दुश्मनी याद आई और बताती है कि शादी के कुछ ही समय बाद तुम्हारे पिता और पेमल के मामा में कहासुनी हो गयी और तलवार चल गई जिसमें पेमल के मामा की मौत हो गयी. माँ बताती है कि तेजा तुम्हारा ससुराल गढ़ पनेर में रायमल्जी के घर है और पत्नी का नाम पेमल है. सगाई ताउजी बख्शा राम जी ने पीला- पोतडा़ में ही करदी थी. तेजा ससुराल जाने से पहले विदाई देने के लिये भाभी से पूछते हैं. भाभी कहती है -“देवरजी आप दुश्मनी धरती पर मत जाओ. आपका विवाह मेरी छोटी बहिन से करवा दूंगी.”तेजाजी ने दूसरे विवाह से इनकार कर दिया. बहिन के ससुराल में तेजाजी भाभी फिर कहती है कि पहली बार ससुराल को आने वाली अपनी दुल्हन पेमल का ‘बधावा’ यानी स्वागत करने वाली अपनी बहन राजल को तो पहले पीहर लेकर आओ। तेजाजी का ब्याह बचपन में ही पुष्कर में पनेर गाँव के मुखिया रायमल की बेटी पेमल के साथ हो चुका था। विवाह के कुछ समय बाद दोनों परिवारों में खून- खराबा हुआ था। तेजाजी को पता ही नहीं था कि बचपन में उनका विवाह हो चुका था। भाभी की तानाकशी से हकीकत सामने आई है। जब तेजाजी अपनी बहन राजल को लिवाने उसकी ससुराल के गाँव तबीजी के रास्ते में थे, तो एक मीणा सरदार ने उन पर हमला किया। जोरदार लड़ाई हुई। तेजाजी जीत गए। तेजाजी द्वारा गाडा गया भाला जमीन में से कोई नहीं निकाल पाया और सभी दुश्मन भाग गए. तबीजी पहुँचे और अपने बहनोई जोगाजी सियाग के घर का पता पनिहारियों से पूछा. उनके घर पधार कर उनकी अनुमति से राजल को खरनाल ले आए। तेजाजी का पनेर प्रस्थान तेजाजी अपनी माँ से ससुराल पनेर जाने की अनुमति माँगते हैं. माँ को अनहोनी दिखती है और तेजा को ससुराल जाने से मना करती है. भाभी कहती है कि पंडित से मुहूर्त निकलवालो. पंडित तेजा के घर आकर पतड़ा देख कर बताता है कि उसको सफ़ेद देवली दिखाई दे रही है जो सहादत की प्रतीक है. सावन व भादवा माह अशुभ हैं. पंडित ने तेजा को दो माह रुकने की सलाह दी. तेजा ने कहा कि तीज से पहले मुझे पनेर जाना है चाहे धन-दान ब्रह्मण को देना पड़े. वे कहते हैं कि जंगल के शेर को कहीं जाने के लिए मुहूर्त निकलवाने की जरुरत नहीं है. तेजा ने जाने का निर्णय लिया और माँ-भाभी से विदाई ली. अगली सुबह वे अपनी लीलण नामक घोड़ी पर सवार हुए और अपनी पत्नी पेमल को लिवाने निकल पड़े। जोग-संयोगों के मुताबिक तेजा को लकडियों से भरा गाड़ा मिला, कुंवारी कन्या रोती मिली, छाणा चुगती लुगाई ने छींक मारी, बिलाई रास्ता काट गई, कोचरी दाहिने बोली, मोर कुर्लाने लगे. तेजा अन्धविसवासी नहीं थे. सो चलते रहे. बरसात का मौसम था. कितने ही उफान खाते नदी-नाले पार किये. सांय काल होते-होते वर्षात ने जोर पकडा. रस्ते में बनास नदी उफान पर थी. ज्यों ही उतार हुआ तेजाजी ने लीलण को नदी पार करने को कहा जो तैर कर दूसरे किनारे लग गई. तेजाजी बारह कोस अर्थात ३६ किमी का चक्कर लगा कर अपनी ससुराल पनेर आ पहुँचे। तेजाजी का पनेर आगमन शाम का वक्त था। पनेर गढ़ के दरवाजे बंद हो चुके थे. कुंवर तेजाजी जब पनेर के कांकड़ पहुंचे तो एक सुन्दर सा बाग़ दिखाई दिया. तेजाजी भीगे हुए थे. बाग़ के दरवाजे पर माली से दरवाजा खोलने का निवेदन किया. माली ने कहा बाग़ की चाबी पेमल के पास है, मैं उनकी अनुमति बिना दरवाजा नहीं खोल सकता. कुंवर तेजा ने माली को कुछ रुपये दिए तो झट ताला खोल दिया. रातभर तेजा ने बाग़ में विश्राम किया और लीलन ने बाग़ में घूम-घूम कर पेड़-पौधों को तोड़ डाला. बाग़ के माली ने पेमल को परदेशी के बारे में और घोडी द्वारा किये नुकशान के बारे में बताया. पेमल की भाभी बाग़ में आकर पूछती है कि परदेशी कौन है, कहाँ से आया है और कहाँ जायेगा. तेजा ने परिचय दिया कि वह खरनाल का जाट है और रायमल जी के घर जाना है. पेमल की भाभी माफ़ी मांगती है और बताती है कि वह उनकी छोटी सालेली है. सालेली (साले की पत्नि) ने पनेर पहुँच कर पेमल को खबर दी. कुंवर तेजाजी पनेर पहुंचे. पनिहारियाँ सुन्दर घोडी पर सुन्दर जवाई को देखकर हर्षित हुई. तेजा ने रायमल्जी का घर पूछा. सूर्यास्त होने वाला था. उनकी सास गाएँ दूह रही थी। तेजाजी का घोड़ा उनको लेकर धड़धड़ाते हुए पिरोल में आ घुसा। सास ने उन्हें पहचाना नहीं। वह अपनी गायों के डर जाने से उन पर इतनी क्रोधित हुई कि सीधा शाप ही दे डाला, ‘जा, तुझे काला साँप खाए!’ तेजाजी उसके शाप से इतने क्षुब्ध हुए कि बिना पेमल को साथ लिए ही लौट पड़े। तेजाजी ने कहा यह नुगरों की धरती है, यहाँ एक पल भी रहना पाप है. तेजाजी का पेमल से मिलन अपने पति को वापस मुड़ते देख पेमल को झटका लगा. पेमल ने पिता और भाइयों से इशारा किया की वे तेजाजी को रोकें. श्वसुर और सेल तेजाजी को रोकते हैं पर वे मानते नहीं हैं. वे घर से बहार निकल आते हैं. पेमल की सहेली थी लाछां गूजरी। उसने पेमल को तेजाजी से मिलवाने का यत्न किया। वह ऊँटनी पर सवार हुई और रास्ते में मीणा सरदारों से लड़ती- जूझती तेजाजी तक जा पहुँची। उन्हें पेमल का सन्देश दिया। अगर उसे छोड़ कर गए, तो वह जहर खा कर मर जाएगी। उसके मां-बाप उसकी शादी किसी और के साथ तय कर चुके हैं। लाछां बताती है, पेमल तो मरने ही वाली थी, वही उसे तेजाजी से मिलाने का वचन दे कर रोक आई है। लाछन के समझाने पर भी तेजा पर कोई असर नहीं हुआ. पेमल अपनी माँ को खरी खोटी सुनाती है. पेमल कलपती हुई आई और लिलन के सामने कड़ी हो गई. पेमल ने कहा – आपके इंतजार में मैंने इतने वर्ष निकले. मेरे साथ घर वालों ने कैसा वर्ताव किया यह मैं ही जानती हूँ. आज आप चले गए तो मेरा क्या होगा. मुझे भी अपने साथ ले चलो. मैं आपके चरणों में अपना जीवन न्यौछावर कर दूँगी. पेमल की व्यथा देखकर तेजाजी पोल में रुके. सभी ने पेमल के पति को सराहा. शाम के समय सालों के साथ तेजाजी ने भोजन किया. देर रात तक औरतों ने जंवाई गीत गए. पेमल की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था. तेजाजी पेमल से मिले। अत्यन्त रूपवती थी पेमल। दोनों बतरस में डूबे थे कि लाछां की आहट सुनाई दी। लाछां गुजरी की तेजाजी से गुहार लाछां गुजरी ने तेजाजी को बताया कि मीणा चोर उसकी गायों को चुरा कर ले गए हैं…. अब उनके सिवाय उसका कोई मददगार नहीं। लाछां गुजारी ने तेजाजी से कहा कि आप मेरी सहायता कर अपने क्षत्रिय धर्म की रक्षा करो अन्यथा गायों के बछडे भूखे मर जायेंगे. तेजा ने कहा राजा व भौमिया को शिकायत करो. लाछां ने कहा राजा कहीं गया हुआ है और भौमिया से दश्मनी है. तेजाजी ने कहा कि पनेर में एक भी मर्द नहीं है जो लड़ाई के लिए चढाई करे. तुम्हारी गायें मैं लाऊंगा. तेजाजी फिर अपनी लीलण घोड़ी पर सवार हुए। पंचों हथियार साथ लिए. पेमल ने घोडी कि लगाम पकड़ कर कहा कि मैं साथ चलूंगी. लड़ाई में घोडी थम लूंगी. तेजा ने कहा पेमल जिद मत करो. मैं क्षत्रिय धर्म का पालक हूँ. मैं अकेला ही मीणों को हराकर गायें वापिस ले आऊंगा. तेजाजी के आदेश के सामने पेमल चुप हो गई. पेमल अन्दर ही अन्दर कंप भी रही थी और बद्बदाने लगी – डूंगर पर डांडी नहीं, मेहां अँधेरी रात पग-पग कालो नाग, मति सिधारो नाथ अर्थात पहाडों पर रास्ता नहीं है, वर्षात की अँधेरी रात है और पग- पग पर काला नाग दुश्मन है ऐसी स्थिति में मत जाओ. तेजाजी धर्म के पक्के थे सो पेमल की बात नहीं मानी और पेमल से विदाई ली. पेमल ने तेजाजी को भाला सौंपा. वर्तमान सुरसुरा नामक स्थान पर उस समय घना जंगल था. वहां पर बालू नाग , जिसे लोक संगीत में बासक नाग बताया गया है, घात लगा कर बैठे थे. रात्रि को जब तेजाजी मीणों से गायें छुड़ाने जा रहे थे कि षड़यंत्र के तहत बालू नाग ने रास्ता रोका. बालू नाग बोला कि आप हमें मार कर ही जा सकते हो. तेजाजी ने विश्वास दिलाया कि मैं धर्म से बंधा हूँ. गायें लाने के पश्चात् वापस आऊंगा. मेरा वचन पूरा नहीं करुँ तो समझना मैंने मेरी माँ का दूध नहीं पिया है. वहां से तेजाजी ने भाला, धनुष, तीर लेकर लीलन पर चढ़ उन्होंने चोरों का पीछा किया. सुरसुरा से १५-१६ किमी दूर मंडावारियों की पहाडियों में मीणा दिखाई दिए. तेजाजी ने मीणों को ललकारा. तेजाजी ने बाणों से हमला किया. मीने ढेर हो गए, कुछ भाग गए और कुछ मीणों ने आत्मसमर्पण कर दिया. तेजा का पूरा शारीर घायल हो गया और तेजा सारी गायों को लेकर पनेर पहुंचे और लाछां गूजरी को सौंप दी . लाछां गूजरी को सारी गायें दिखाई दी पर गायों के समूह के मालिक काणां केरडा नहीं दिखा तो वह उदास हो गई और तेजा को वापिस जाकर लाने के लिए बोला. तेजाजी वापस गए. पहाड़ी में छुपे मीणों पर हमला बोल दिया व बछड़े को ले आये. इस लड़ाई में तेजाजी का शारीर छलनी हो गया. बताते हैं कि लड़ाई में १५० मीणा लोग मारे गए जिनकी देवली मंदावारिया की पहाड़ी में बनी हैं. सबको मार कर तेजाजी विजयी रहे एवं वापस पनेर पधारे. तेजाजी की वचन बद्धता लाछां गूजरी को काणां केरडा सौंप कर लीलण घोडी से बोले कि तुम वापस उस जगह चलो जहाँ मैं वचन देकर आया हूँ. तेजाजी सीधे बालू नाग के इन्तजार स्थल पर आते हैं. बालू नाग से बोलते हैं की मैं मेरा वचन पूरा करके आया हूँ तुम अब अपना वचन पूरा करो. बालू नाग का ह्रदय काँप उठा. वह बोला -“मैं तुम्हारी इमानदारी और बहादुरी पर प्रसन्न हूँ. मैंने पीढी पीढी का बैर चुकता कर लिया. अब तुम जाओ मैं तुम्हें जीवन दान देता हूँ. तुम अपने कुल के एक मात्र देवता कहलाओगे. यह मेरा वरदान है.”तेजाजी ने कहा कि मैं अपने वचनों से पीछे नहीं हटता वह अपने प्राण को हर हाल में पूरा करेगा. बालू नाग ने अपना प्रण पूरा करने के लिए तेजाजी की जीभ पर हमला किया. तेजाजी लीलन से नीचे गिरे और वीर गति को प्राप्त हो गए. वे कलयुग के अवतारी बन गए. लोक परम्परा में तेजाजी को काले नाग द्वारा डसना बताया गया है. कहते हैं की लाछां गूजरी जब तेजाजी के पास आयी और गायों को ले जाने का समाचार सुनाया तब रास्ते में वे जब चोरों का पीछा कर रहे थे, उसी दौरान उन्हें एक काला नाग आग में घिरा नजर आया। उन्होंने नाग को आग से बाहर निकाला। बासग नाग ने उन्हें वरदान की बजाय यह कह कर शाप दिया कि वे उसकी नाग की योनी से मुक्ति में बाधक बने। बासग नाग ने फटकार कर कहा – मेरा बुढापा बड़ा दुखदाई होता है. मुझे मरने से बचाने पर तुम्हें क्या मिला. तेजाजी ने कहा – मरते, डूबते व जलते को बचाना मानव का धर्म है. मैंने तुम्हारा जीवन बचाया है, कोई बुरा काम नहीं किया. भलाई का बदला बुराई से क्यों लेना चाहते हो. नागराज लीलन के पैरों से दूर खिसक जाओ वरना कुचले जाओगे. नाग ने प्रायश्चित स्वरूप उन्हें डसने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने नाग को वचन दिया कि लाछां गूजरी की गायें चोरों से छुड़ा कर उसके सुपुर्द करने के बाद नाग के पास लौट आएँगे। तेजाजी ने पाया कि लाछां की गायें ले जाने वाले उसी मीणा सरदार के आदमी थे, जिसे उन्होंने पराजित करके खदेड़ भगाया था। उनसे लड़ते हुए तेजाजी बुरी तरह लहुलूहान हो गए। गायें छुड़ा कर लौटते हुए अपना वचन निभाने वे नाग के सामने प्रस्तुत हो गए। नागराज ने कहा – तेजा नागराज कुंवारी जगह बिना नहीं डसता. तुम्हारे रोम- रोम से खून टपक रहा है. मैं कहाँ डसूं? तेजाजी ने कहा अपने वचन को पूरा करो. मेरे हाथ की हथेली व जीभ कुंवारी हैं, मुझे डसलो. नागराज ने कहा -“तेजा तुम शूरवीर हो. मैं प्रसन्न होकर तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम तुम्हारे कुल के देवता के रूप में पूजे जावोगे. आज के बाद काला सर्प का काटा हुआ कोई व्यक्ति यदि तुम्हारे नाम की तांती बांध लेगा तो उसका पान उतर जायेगा. किसान खेत में हलोतिया करने से पहले तुम्हारे नाम की पूजा करेगा और तुम कलयुग के अवतारी माने जावोगे. यही मेरा अमर आशीष है.”नाग को उनके क्षत्-विक्षत् शरीर पर दंश रखने भर को भी जगह नजर नहीं आई और अन्तत: तेजाजी ने अपनी जीभ पर सर्प-दंश झेल कर और प्राण दे कर अपने वचन की रक्षा की। तेजाजी ने नजदीक ही ऊँट चराते रैबारी आसू देवासी को बुलाया और कहा,”भाई आसू देवासी ! मुसीबत में काम आने वाला ही घर का होता है, तू मेरा एक काम पूरा करना. मेरी इहलीला समाप्त होने के पश्चात् मेरा रुमाल व एक समाचार रायमल्जी मेहता के घर लेजाना और मेरे सास ससुर को पांवा धोक कहना. पेमल को मेरे प्यार का रुमाल दे देना, सारे गाँव वालों को मेरा राम-राम कहना और जो कुछ यहाँ देख रहे हो पेमल को बतादेना और कहना कि तेजाजी कुछ पल के मेहमान हैं.”लीलन घोडी की आँखों से आंसू टपकते देख तेजाजी ने कहा -“लीलन तू धन्य है. आज तक तूने सुख- दुःख में मेरा साथ निभाया. मैं आज हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हारा साथ छोड़ रहा हूँ. तू खरनाल जाकर मेरे परिवार जनों को आँखों से समझा देना.”आसू देवासी सीधे पनेर में रायमल्जी के घर गया और पेमल को कहा -“राम बुरी करी पेमल तुम्हारा सूरज छुप गया. तेजाजी बलिदान को प्राप्त हुए. मैं उनका मेमद मोलिया लेकर आया हूँ.”तेजाजी के बलिदान का समाचार सुनकर पेमल के आँखों के आगे अँधेरा छा गया. उसने मां से सत का नारियल माँगा, सौलह श्रृंगार किये, परिवार जनों से विदाई ली और सुरसुरा जाकर तेजाजी के साथ सती हो गई. पेमल जब चिता पर बैठी है तो लिलन घोडी को सन्देश देती है कि सत्य समाचार खरनाल जाकर सबको बतला देना. कहते हैं कि अग्नि स्वतः ही प्रज्वलित हो गई और पेमल सती हो गई. लोगों ने पूछा कि सती माता तुम्हारी पूजा कब करें तो पेमल ने बताया कि -“भादवा सुदी नवमी की रात्रि को तेजाजी धाम पर जागरण करना और दसमी को तेजाजी के धाम पर उनकी देवली को धौक लगाना, कच्चे दूध का भोग लगाना. इससे मनपसंद कार्य पूर्ण होंगे. यही मेरा अमर आशीष है”लीलन घोड़ी सतीमाता के हवाले अपने मालिक को छोड़ अंतिम दर्शन पाकर सीधी खरनाल की तरफ रवाना हुई. परबतसर के खारिया तालाब पर कुछ देर रुकी और वहां से खरनाल पहुंची. खरनाल गाँव में खाली पीठ पहुंची तो तेजाजी की भाभी को अनहोनी की शंका हुई. लीलन की शक्ल देख पता लग गया की तेजाजी संसार छोड़ चुके हैं. तेजाजी की बहिन राजल बेहोश होकर गिर पड़ी, फिर खड़ी हुई और माता-पिता, भाई-भोजाई से अनुमति लेकर माँ से सत का नारियल लिया और खरनाल के पास ही पूर्वी जोहड़ में चिता चिन्वाकर भाई की मौत पर सती हो गई. भाई के पीछे सती होने का यह अनूठा उदहारण है. राजल बाई को बाघल बाई भी कहते हैं राजल बाई का मंदिर खरनाल में गाँव के पूर्वी जोहड़ में हैं. तेजाजी की प्रिय घोड़ी लीलण भी दुःख नहीं झेल सकी और अपना शारीर छोड़ दिया. लीलण घोड़ी का मंदिर आज भी खरनाल के तालाब के किनारे पर बना है. इतिहासकारों ने तेजाजी के निधन की तिथि दर्ज की: २८ अगस्त, ११०३ ईस्वी। तेजाजी की चमत्कारी शक्तियां आज के विज्ञान के इस युग में चमत्कारों की बात करना पिछड़ापन माना जाता है और विज्ञान चमत्कारों को स्वीकार नहीं करता. परन्तु तेजाजी के साथ कुछ चमत्कारों की घटनाएँ जुडी हुई हैं जिन पर नास्तिक व्यक्तियों को भी बरबस विस्वास करना पड़ता ह
राजस्थान और मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में तेजाजी के गीत सुरीली आवाज और मस्ती भरे अंदाज में गाये जाते हैं. जेठ के महीने में वर्षा होने पर किसान तेजाजी का नाम ले खेतों में हल जोतते हैं. बच्चे बूढे सभी लम्बी टेर में तेजा गीत गाते हैं. जन मानस द्वारा गाये इन गीतों के माध्यम से ही जाट संस्कृति और इतिहास जिन्दा रहा.
तेजाजी कि चालीसा नीचे दी गयी है
-बोलिए सत्यवादी झूँझार वीर तेजाजी महाराज की जय हो..

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हरतालिका तीज व्रत


🌷🌷🕉🌷🎋✨💲🌷🕉🌷🌷 हरतालिका तीज व्रत, कथा एवं पूजा विधी 🕉हरतालिका तीज का नाम सुनते ही महिलाओं एवम लड़कियों को एक अजीब सी घबराहट होने लगती हैं | वर्ष के प्रारम्भ से ही जब कैलेंडर घर लाया जाता हैं, कई महिलायें उसमे हरतालिका की तिथी देखती हैं | यूँ तो हरतालिक तीज बहुत उत्साह से मनाया जाता हैं, लेकिन उसके व्रत एवं पूजा विधी को जानने के बाद आपको समझ आ जायेगा कि क्यूँ हरतालिका का व्रत सर्वोच्च समझा जाता हैं और क्यूँ वर्ष के प्रारंभ से महिलायें तीज के इस व्रत को लेकर चिंता में दिखाई देती हैं | हरतालिका तीज व्रत, कथा एवं पूजा विधी ((हरतालिका तीज महत्व)) ↪हरतालिका तीज का व्रत हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा व्रत माना जाता हैं | यह तीज का त्यौहार भादो की शुक्ल तीज को मनाया जाता हैं | खासतौर पर महिलाओं द्वारा यह त्यौहार मनाया जाता हैं | कम उम्र की लड़कियों के लिए भी यह हरतालिका का व्रत क्ष्रेष्ठ समझा गया हैं | हरतालिका तीज में भगवान शिव, माता गौरी एवम गणेश जी की पूजा का महत्व हैं | यह व्रत निराहार एवं निर्जला किया जाता हैं | रत जगा कर नाच गाने के साथ इस व्रत को किया जाता हैं | हरतालिका नाम क्यूँ पड़ा ? 🕉माता गौरी के पार्वती रूप में वे शिव जी को पति रूप में चाहती थी जिस हेतु उन्होंने काठी तपस्या की थी उस वक्त पार्वती की सहेलियों ने उन्हें अगवा कर लिया था | इस करण इस व्रत को हरतालिका कहा गया हैं क्यूंकि हरत मतलब अगवा करना एवम आलिका मतलब सहेली अर्थात सहेलियों द्वारा अपहरण करना हरतालिका कहलाता हैं | ((शिव जैसा पति पाने के लिए कुँवारी कन्या इस व्रत को विधी विधान से करती हैं |)) हरतालिका तीज कब मनाई जाती है और मुहूर्त क्या है? 2017 ↪हरितालिका तीज भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन मनाया जाता है. यह आमतौर पर अगस्त – सितम्बर के महीने में ही आती है. इसे गौरी तृतीया व्रत भी कहते है. यह इस वर्ष 24 अगस्त 2017, दिन गुरुवार को मनाई जाएगी. प्रातः काल हरितालिका पूजा मुहूर्त 05:58 से 08:32 2 घंटा 35 मिनट प्रदोषकाल हरितालिका पूजा मुहूर्त 18:47 से 20:27 1 घंटा 39 मिनट हरतालिका तीज नियम हरतालिका व्रत निर्जला किया जाता हैं, अर्थात पूरा दिन एवं रात अगले सूर्योदय तक जल ग्रहण नहीं किया जाता | हरतालिका व्रत कुवांरी कन्या, सौभाग्यवती महिलाओं द्वारा किया जाता हैं |इसे विधवा महिलायें भी कर सकती हैं | हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता | इसे प्रति वर्ष पुरे नियमो के साथ किया जाता हैं| हरतालिका व्रत के दिन रतजगा किया जाता हैं | पूरी रात महिलायें एकत्र होकर नाच गाना एवम भजन करती हैं | नये वस्त्र पहनकर पूरा श्रृंगार करती हैं | हरतालिका व्रत जिस घर में भी होता हैं | वहाँ इस पूजा का खंडन नहीं किया जा सकता अर्थात इसे एक परम्परा के रूप में प्रति वर्ष किया जाता हैं | सामान्यतह महिलायें यह हरतालिका पूजन मंदिर में करती हैं | 🕉हरतालिका के व्रत से जुड़ी कई मान्यता हैं, जिनमे इस व्रत के दौरान जो सोती हैं, वो अगले जन्म में अजगर बनती हैं, जो दूध पीती हैं, वो सर्पिनी बनती हैं, जो व्रत नही करती वो विधवा बनती हैं, जो शक्कर खाती हैं मक्खी बनती हैं, जो मांस खाती शेरनी बनती हैं, जो जल पीती हैं वो मछली बनती हैं, जो अन्न खाती हैं वो सुअरी बनती हैं जो फल खाती है वो बकरी बनती हैं | इस प्रकार के कई मत सुनने को मिलते हैं | हरतालिका पूजन सामग्री फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता | गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत केले का पत्ता सभी प्रकार के फल एवं फूल पत्ते बैल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, अकाँव का फूल, तुलसी, मंजरी | जनैव, नाडा, वस्त्र, ↪माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामान जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, माहौर, मेहँदी आदि मान्यतानुसार एकत्र की जाती हैं | इसके अलावा बाजारों में सुहाग पुड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं | घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, श्री फल, कलश | पञ्चअमृत- घी, दही, शक्कर, दूध, शहद | हरतालिका तीज पूजन विधी हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं | प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय | हरतालिका पूजन के लिए शिव, पार्वती एवं गणेश जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से हाथों से बनाई जाती हैं | 🕉फुलेरा बनाकर उसे सजाया जाता हैं |उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर पटा अथवा चौकी रखी जाती हैं | चौकी पर एक सातिया बनाकर उस पर थाल रखते हैं | उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं | तीनो प्रतिमा को केले के पत्ते पर आसीत किया जाता हैं | ↪सर्वप्रथम कलश बनाया जाता हैं जिसमे एक लौटा अथवा घड़ा लेते हैं | उसके उपर श्रीफल रखते हैं | अथवा एक दीपक जलाकर रखते हैं | घड़े के मुंह पर लाल नाडा बाँधते हैं | घड़े पर सातिया बनाकर उर पर अक्षत चढ़ाया जाता हैं | कलश का पूजन किया जाता हैं | सबसे पहले जल चढ़ाते हैं, नाडा बाँधते हैं | कुमकुम, हल्दी चावल चढ़ाते हैं फिर पुष्प चढ़ाते हैं | कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं | उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं | इसकी विधी विस्तार से पढ़े उसके बाद माता गौरी की पूजा की जाती हैं | उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं | इसके बाद हरतालिका की कथा पढ़ी जाती हैं | फिर सभी मिलकर आरती की जाती हैं जिसमे सर्प्रथम गणेश जी कि आरती फिर शिव जी की आरती फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं | पूजा के बाद भगवान् की परिक्रमा की जाती हैं | रात भर जागकर पांच पूजा एवं आरती की जाती हैं | सुबह आखरी पूजा के बाद माता गौरा को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं | उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं | ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं | उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं | अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं | ((हरतालिका तीज व्रत कथा)) यह व्रत अच्छे पति की कामना से एवं पति की लम्बी उम्र के लिए किया जाता हैं | 🕉शिव जी ने माता पार्वती को विस्तार से इस व्रत का महत्व समझाया – माता गौरा ने सती के बाद हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया | बचपन से ही पार्वती भगवान शिव को वर के रूप में चाहती थी | जिसके लिए पार्वती जी ने कठोर ताप किया उन्होंने कड़कती ठण्ड में पानी में खड़े रहकर, गर्मी में यज्ञ के सामने बैठकर यज्ञ किया | बारिश में जल में रहकर कठोर तपस्या की | बारह वर्षो तक निराहार पत्तो को खाकर पार्वती जी ने व्रत किया | उनकी इस निष्ठा से प्रभावित होकर भगवान् विष्णु ने हिमालय से पार्वती जी का हाथ विवाह हेतु माँगा | जिससे हिमालय बहुत प्रसन्न हुए | और पार्वती को विवाह की बात बताई | जिससे पार्वती दुखी हो गई | और अपनी व्यथा सखी से कही और जीवन त्याग देने की बात कहने लगी | जिस पर सखी ने कहा यह वक्त ऐसी सोच का नहीं हैं और सखी पार्वती को हर कर वन में ले गई | जहाँ पार्वती ने छिपकर तपस्या की | जहाँ पार्वती को शिव ने आशीवाद दिया और पति रूप में मिलने का वर दिया | ↪हिमालय ने बहुत खोजा पर पार्वती ना मिली | बहुत वक्त बाद जब पार्वती मिली तब हिमालय ने इस दुःख एवं तपस्या का कारण पूछा तब पार्वती ने अपने दिल की बात पिता से कही | इसके बाद पुत्री हठ के करण पिता हिमालय ने पार्वती का विवाह शिव जी से तय किया | 🕉इस प्रकार हरतालिक व्रत अवम पूजन प्रति वर्ष भादो की शुक्ल तृतीया को किया जाता हैं | 🌷🌷🕉🌷🎋✨💲🌷🕉🌷🌷

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रक्षाबंधन के नाम पर सेक्युलर घोटाला


रक्षाबंधन के नाम पर सेक्युलर घोटाला

बचपन में हमें अपने पाठयक्रम में पढ़ाया जाता रहा है कि रक्षाबंधन के त्योहार पर बहने अपने भाई को राखी बांध कर उनकी लम्बी आयु की कामना करती है। रक्षा बंधन का सबसे प्रचलित उदहारण चित्तोड़ की रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ का दिया जाता है। कहा जाता है कि जब गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चित्तोड़ पर हमला किया तब चित्तोड़ की रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को पत्र लिख कर सहायता करने का निवेदन किया। पत्र के साथ रानी ने भाई समझ कर राखी भी भेजी थी। हुमायूँ रानी की रक्षा के लिए आया मगर तब तक देर हो चुकी थी। रानी ने जौहर कर आत्महत्या कर ली थी। इस इतिहास को हिन्दू-मुस्लिम एकता तोर पर पढ़ाया जाता हैं।

अब सेक्युलर खोटाला पढ़िए

हमारे देश का इतिहास सेक्युलर इतिहासकारों ने लिखा है। भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलाम थे। जिन्हें साम्यवादी विचारधारा के नेहरू ने सख्त हिदायत देकर यह कहा था कि जो भी इतिहास पाठयक्रम में शामिल किया जाये। उस इतिहास में यह न पढ़ाया जाये कि मुस्लिम हमलावरों ने हिन्दू मंदिरों को तोड़ा, हिन्दुओं को जबरन धर्मान्तरित किया, उन पर अनेक अत्याचार किये। मौलाना ने नेहरू की सलाह को मानते हुए न केवल सत्य इतिहास को छुपाया अपितु उसे विकृत भी कर दिया।

रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ के किस्से के साथ भी यही अत्याचार हुआ। जब रानी को पता चला की बहादुर शाह उस पर हमला करने वाला है तो उसने हुमायूँ को पत्र तो लिखा। मगर हुमायूँ को पत्र लिखे जाने का बहादुर खान को पता चल गया। बहादुर खान ने हुमायूँ को पत्र लिख कर इस्लाम की दुहाई दी और एक काफिर की सहायता करने से रोका।

मिरात-ए-सिकंदरी में गुजरात विषय से पृष्ठ संख्या 382 पर लिखा मिलता है-

सुल्तान के पत्र का हुमायूँ पर बुरा प्रभाव हुआ। वह आगरे से चित्तोड़ के लिए निकल गया था। अभी वह गवालियर ही पहुंचा था। उसे विचार आया, “सुलतान चित्तोड़ पर हमला करने जा रहा है। अगर मैंने चित्तोड़ की मदद की तो मैं एक प्रकार से एक काफिर की मदद करूँगा। इस्लाम के अनुसार काफिर की मदद करना हराम है। इसलिए देरी करना सबसे सही रहेगा। ” यह विचार कर हुमायूँ गवालियर में ही रुक गया और आगे नहीं सरका।

इधर बहादुर शाह ने जब चित्तोड़ को घेर लिया। रानी ने पूरी वीरता से उसका सामना किया। हुमायूँ का कोई नामोनिशान नहीं था। अंत में जौहर करने का फैसला हुआ। किले के दरवाजे खोल दिए गए। केसरिया बाना पहनकर पुरुष युद्ध के लिए उतर गए। पीछे से राजपूत औरतें जौहर की आग में कूद गई। रानी कर्णावती 13000 स्त्रियों के साथ जौहर में कूद गई। 3000 छोटे बच्चों को कुँए और खाई में फेंक दिया गया। ताकि वे मुसलमानों के हाथ न लगे। कुल मिलकर 32000 निर्दोष लोगों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा।

बहादुर शाह किले में लूटपाट कर वापिस चला गया। हुमायूँ चित्तोड़ आया। मगर पुरे एक वर्ष के बाद आया।परन्तु किसलिए आया? अपने वार्षिक लगान को इकठ्ठा करने आया। ध्यान दीजिये यही हुमायूँ जब शेरशाह सूरी के डर से रेगिस्तान की धूल छानता फिर रहा था। तब उमरकोट सिंध के हिन्दू राजपूत राणा ने हुमायूँ को आश्रय दिया था। यही उमरकोट में अकबर का जन्म हुआ था। एक काफ़िर का आश्रय लेते हुमायूँ को कभी इस्लाम याद नहीं आया। और धिक्कार है ऐसे राणा पर जिसने अपने हिन्दू राजपूत रियासत चित्तोड़ से दगा करने वाले हुमायूँ को आश्रय दिया। अगर हुमायूँ यही रेगिस्तान में मर जाता। तो भारत से मुग़लों का अंत तभी हो जाता। न आगे चलकर अकबर से लेकर औरंगज़ेब के अत्याचार हिन्दुओं को सहने पड़ते।

इरफ़ान हबीब, रोमिला थापर सरीखे इतिहासकारों ने इतिहास का केवल विकृतिकरण ही नहीं किया अपितु उसका पूरा बलात्कार ही कर दिया। हुमायूँ द्वारा इस्लाम के नाम पर की गई दगाबाजी को हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे और रक्षाबंधन का नाम दे दिया। हमारे पाठयक्रम में पढ़ा पढ़ा कर हिन्दू बच्चों को इतना भ्रमित किया गया कि उन्हें कभी सत्य का ज्ञान ही न हो। इसीलिए आज हिन्दुओं के बच्चे दिल्ली में हुमायूँ के मकबरे के दर्शन करने जाते हैं। जहाँ पर गाइड उन्हें हुमायूँ को हिन्दूमुस्लिम भाईचारे के प्रतीक के रूप में बताते हैं।

इस लेख को आज रक्षाबंधन के दिन इतना फैलाये कि इन सेक्युलर घोटालेबाजों तक यह अवश्य पहुंच जाये।

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विश्वास_और_प्यार_का_एक_पवित्र_वन्धन_रक्षावन्धन_


#विश्वास_और_प्यार_का_एक_पवित्र_वन्धन_रक्षावन्धन_

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श्रावण मास की पूर्णिमा में एक ऐसा पर्व मनाया जाता है जिसमें पूरे देश के भाई-बहनों का आपसी प्यार दिखाई देता है – रक्षा बंधन| वर्ष 2017 में रक्षा बंधन 7अगस्त, वार को मनाया जाएगा| भाई-बहन के प्यार, स्नेह को दर्शाते इस त्योहार की परंपरा आज लगभग हर धर्म में मनाई जाती है| धर्म-मज़हब से परे यह त्योहार भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है|

किसी भी रिश्तें की मजबूती की बुनियाद होता है विश्वास| और यही विश्वास एक बहन अपने भाई पर रखती है जब वह इस पर्व के दिन भाई की कलाई पर एक धागा जिसे राखी कहते है, बांधती है| अपने हाथ में राखी बंधवाकर भाई यह प्रतिज्ञा करता है कि वह अपनी बहन की सदैव रक्षा करेगा चाहे परिस्थिति कितनी ही विषम क्यों ना हो| राखी का धागा केवल रक्षा ही नहीं बल्कि प्रेम और निष्ठा से दिलों को भी जोड़ता है|

इस दिन का महत्त्व इतना अधिक है कि यदि कोई बहन अपने भाई से इस दिन मिल नहीं पाती तो भी डाक द्वारा उन्हें राखी अवश्य भेजती है| रक्षा बंधन से जुड़ीं कईं ऐसी कथाएँ हैं जिनमें राखी बाँधने वाली बहन नहीं बल्कि पत्नी या ब्राह्मण भी हैं| क्योंकि यह सूत्र, यह धागा एक रक्षासूत्र होता है|

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय देवों और असुरों के बीच लम्बे समय से युद्ध चला जा रहा था| इस युद्ध में देवों की निरंतर हार हो रही थी और इस बात से दुखी देवराज इंद्र अपने गुरु बृहस्पति के पास परामर्श लेने गए| वहाँ इंद्र की पत्नी इन्द्राणी भी थी| इंद्र की व्यथा सुनकर इन्द्राणी ने उनसे कहा कि वह श्रावण की शुक्ल पूर्णिमा में विधि-विधानपूर्वक एक रक्षासूत्र तैयार करेंगी| इन्द्राणी ने इंद्र से वह रक्षासूत्र ब्राह्मणों से बंधवाने के लिए कहा और कहा कि उनकी अवश्य ही विजय होगी| और वाकई ऐसा करने पर देवताओं की विजय हुईं| तभी से ब्रहामणों द्वारा रक्षासूत्र बंधवाने की यह प्रथा प्रचलित है|

एक कथा के अनुसार ग्रीक नरेश महान सिकंदर की पत्नी ने सिकंदर के शत्रु पुरुराज की कलाई में राखी बांधी थी ताकि युद्ध में उनके पति की रक्षा हो सके| और ऐसा हुआ भी, युद्ध के दौरान कईं अवसर ऐसे आए जिनमें पुरुराज ने जब भी सिकंदर पर प्राण घातक प्रहार करना चाहा, किन्तु अपनी कलाई पर बंधी राखी देख पुरुराज ने सिकंदर को प्राणदान दिया|

महाभारतकाल में जब श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया था तो उस समय उनकी ऊँगली कट गयी थी| श्रीकृष्ण के ऊँगली से रक्त बहता देख द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्ला फाड़ कर उनकी ऊँगली पर बाँध दिया था| वह साड़ी का एक टुकड़ा किसी रक्षासूत्र से कम नहीं था अतः श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को सदैव उनकी रक्षा करने का वचन दिया| और जब आगे जाकर भरी सभा में दु:शासन द्रपुदी का चीरहरण कर रहा था और पांडव और अन्य सभी उनकी सहायता नहीं कर पा रहे थे तब श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज राखी और अपना वचन पूर्ण किया|

पुराणों में एक और रोचक कथा का वर्णन है| एक समय भगवान विष्णु राजा बलि को दिए गए अपने वचन को पूरा करने के लिए बैकुण्ड छोड़ कर बलि के राज्य चले गए थे और बलि के राज्य की रक्षा करने लगे| माँ लक्ष्मी ने भगवान को वापस लाने के लिए एक दिन एक ब्राह्मणी के रूप में राजा बलि की कलाई पर राखी बाँध कर उसके लिए मंगलकामना की| राजा बलि ने भी ब्राह्मणी रुपी माँ लक्ष्मी को अपनी बहन माना और उनकी रक्षा का वचन दिया| तब माँ लक्ष्मी अपनी असल रूप में आई और राजा बलि से विनती की कि वह श्रीविष्णु जी को अपने वचन से मुक्त कर पुनः बैकुण्ड लौट जाने दे| राजा बलि ने अपनी बहन को दिए वचन की लाज रखी और प्रभु को अपने वचन से मुक्त कर दिया|

रक्षा बंधन के दिन राखी बाँधने के अतिशुभ मुहूर्त अपराह्न का समय होता है| यदि कभी अपराह्न मुहूर्त किन्ही ज्योतिषी कारणों से उपलब्ध ना हो, तो प्रदोष मुहूर्त भी अनुष्ठान के लिए शुभ माना जाता है| भद्रा समय किसी भी प्रकार के शुभ कार्य के लिए अशुभ माना जाता है इसलिए इस समय अनुष्ठान न करे|

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मेघों का मौसम और हरियाली अमावस
मित्रो ! सावनी अमा यानी हरियाली अमावस्या की बधाई।

हमारे इधर, इस पर्व का बड़ा महत्व है। अवकाश रहता है और चित्तौड़गढ़ से लेकर उदयपुर तक, राजसमन्द से लेकर डूंगरपुर बांसवाड़ा तक मेलों या मेलों का माहौल रहता है। श्रावणादि संवत्सर होने से तो इसका महत्व रहा ही, वनभ्रमण, शिव सन्निधि और उल्लास का अवगाहन भी तो इससे जुड़े हैं। यह रबड़ी-मालपूओं की महक वाली अमावस भी है।

उदयपुर में तो बड़ा मेला लगता है। संभाग सबसे बड़ा मेला। एक नहीं दो दिन का। पहले दिन मिलाजुला और दूसरे दिन केवल स्त्री-सहेलियों का। सहेलियों की बाड़ी और फतहसागर पर आमद तो देखिए ! आसमान में मेघ, नीचे जनसैलाब और सागर में उठती लहरों का किल्लोल : मेळा रे थारै मजो बोत आयो, 

मांगां टपक्यो हींगळू जी कांई 

गालां पर छायो,

रंग गालां पर छायो।

मेळा रे थारे मालपूओ खायो,

वासुंदी मजेदार पायो,

मूंछा पै चढ चढ़ गयो हबड़को,

चाट-चाट खायो, मेळा रे थारै बोत आयो…
सन् 1899 में जब फतहसागर बनकर तैयार हुआ तो महाराणा फतहसिंह महारानी चावड़ी के और लवाज़मे के साथ मुआयने को निकले, तब हरियाली अमावस ही थी। महलों के कोठार-भंडार की ओर से ही मेला लगाया गया। जुलूस में लोग उमड़े तो इतने कि तिल रखने का ठौर नहीं। दर्शन में नई दोआनी सिक्कों की कोथलियां खाली होती जाती थी। महिलाएं सबसे कम दीखीं तो चावड़ी ने एक दिन का मेला महिलाओं के नाम मांग लिया। हां करने की देर थी, आधी दुनिया के लिए मेला शुरू। आज 118 बरस पुराना मेला हो गया। हर साल रौनक रहती है और यह जीवन को रसपूरित करता है, हालांकि अब कई मायने बदल गए मगर ये मेले हैं, मेले फिर भी लगते रहेंगे क्योंकि ये हमारे-तुम्हारे नहीं हम सबके हैं 🙂
मित्रो ! जीवन की रोजाना तपती रेत पर हरिताभ वाली खुशहाली और जबां पर दूधिया पूओं की मिठास हो… और मेघमालाओं के मंडन से मानसूनी बूंदनियां आपकी आशाओं का अभिषेक, अभिनंदन करती रहे। 

🙏🏼

शत-शत शुभकामनाएं। 

श्रीकृष्ण ‘ जुगनू’