Posted in हास्यमेव जयते, ઉત્સવ

[11/08, 9:44 a.m.] ‪+91 88511 97413‬: जब भी मैं भगवान शिव की यह तस्वीर देखता हूं तो मुझे बहुत दुख होता है। दिल रोता है। अपने खुद के नशे की लत के लिए हम और कितना महादेव जी को बदनाम करेंगे ?? भगवान शिव की कृपा से मैंने कुछ समय पहले शिव पुराण पढ़ा था ओर कहीं भी यह वर्णन नहीं आया कि भगवान शिव ने गांजा या चरस फूंकी हो, विपरीत इसके महादेव जी ने संसार की रक्षा के लिए हलाहल विष पिया था, लेकिन इसके बारे में कोई बात तक भी नहीं करता , परंतु हां 80% गंजेडी-चरसी जब गांजा चरस फूंकते है तो वे यही कहते हैं कि फिर क्या हुआ यह तो भोले का प्रसाद है। इन जैसे लोगों ने ना तो कभी भगवान शिव को जाना होता है ना कभी पढ़ा होता है ओर ना कभी जानने की कोशिश करते हैं परन्तु हां फूंकने के समय इनको शिव जी की याद आ जाती है। ऐसे लोगों को मैं कहना चाहूंगा कि ज़रा सोचो जो शिव ब्रह्मांड पिता है ब्रह्मांड रचियता है ब्रह्मांड आत्मा है ,जो कण कण में समाया हुआ है , जो निराकार होके भी साकार है , जो निर्गुण होके भी सगुण है , जिनके आंखे मूंदते ही यह ब्रह्मांड अंधकारमय हो जाता है , क्या ऐसे शिव को किसी भी तरह के नशे की जरूरत है ?? वे भगवान है ना कि हम जैसे तुच्छ इंसान । उनको किसी सहारे की जरूरत नहीं है ,अपने आप में ही संपूर्ण हैं शिव। हां उन्हें भांग के पत्ते अवश्य चढ़ते हैं क्योंकि आयुर्वेद में भांग को एक बहुत ही उपयोगी औषधि माना जाता है और इसे अब पूरा विश्व भी स्वीकार कर रहा है। शिव पुराण के अनुसार समुद्र मंथन सावन के महीने में हुआ था तो जब मंथन में से अमृत निकला था तो उस अमृत को पाने के लिए तो देवता दैत्यों में भगदड़ मच गई थी परंतु ठीक जब अमृत के बाद पृथ्वी को नष्ट कर देने वाला हलाहल विष निकला तो कोई आगे ना आया,तब भगवान शिव आए और उन्होंने उस भयानक विष को अपने कंठ में धारण किया, जिसके कारण वे नीलकंठ व देवों के देव महादेव कहलाए। भगवान शिव के सहस्त्रो नाम में एक नाम है कर्पूरगौरम , जिसका अर्थ है पूर्णतः सफेद । लेकिन उस हलाहल विष के सेवन के बाद उनका शरीर नीला पड़ना शुरू हो गया था , भगवान शिव का शरीर तपने लगा लेकिन शिव फिर भी पूर्णतः शांत थे लेकिन देवताओं ने सेवा भावना से भगवान शिव की तपण शांत करने के लिए उन्हें जल चढ़ाया और विष के प्रभाव कम करने के लिए विजया ( भांग का पौधा )को दूध में मिला कर भगवान शिव को औषधि रूप में पिलाया। बस यही एक प्रमाण है भगवान शिव के भांग सेवन का,ओर हमने उन्हें चरस गांजा फूंकने वाला एक साधारण बना दिया,अब आप ही बताइए कि क्या हम सही न्याय कर रहे हैं उस ब्रह्मांड पिता की छवि के साथ ?? क्या हम उनका नाम बदनाम नहीं कर रहे ??
[11/08, 2:36 p.m.] ‪+91 73891 60409‬: एक सुपर स्टार थे राजेश खन्ना ।
शूटिंग के बाद रात तीन बजे तक स्काच पीते थे चार बजे खाना खाते थे । शूटिंग होती थी सुबह दस बजे पहुंचते थे शाम चार बजे ।। एक दिन एक बहुत स्वाभिमानी निर्माता ने कहा काका घड़ी देख रहो हो । घमंड से चूर काका ने कहा – हम नहीं , घड़ी हमारा टाइम देखती हैं

निर्देशक ने बिना शूटिंग किए पैकअप किया और बोले जो वक्त की इज्ज़त नहीं करता वक्त उन्हें सबक सिखा देता है।

एक समय ऐसा भी आया जब काका के पास वक़्त ही वक़्त था । ना फिल्में थीं, न शूटिंग थी, ना बीवी थी, ना बच्चे थे और न ही पैक अप कहने वाला ।

चमचों के साथ अपनी पुरानी फिल्मों को देख कभी खुश होते तो कभी रोते रहते । सभी साथ छोड़ गए अकेले पीकर और दो कौर खाकर लुढ़क जाना ही उनकी नियति बन गयी थी और बाकी आगे की कहानी आपसभी जानते है ।

ये वक़्त है , जो सबका आता है लेकिन हमेशा के लिऐ नहीं । समय और भाग्य अगर आपके साथ नही हैं तो आपकी कीमत दो कौड़ी की है । जीवन मे कर्म और पुरुषार्थ की महत्ता है , लेकिन कर्म करने के लिए आप जिंदा भी रहेंगे या नहीं ये आपका भाग्य तय करता है आपका पुरुषार्थ नहीं ।

अच्छे समय को भरपूर जियें लेकिन बुरे वक्त के लिए भी तैयार रहें । आपके बुरे वक्त में कोई आपके साथ हो न हो अपने अच्छे समय मे आप किसी को मत दुत्कारिये ।

विनम्रता अच्छे समय की पूंजी है और अहंकार आपके अच्छे समय को असमय ही खत्म कर देने वाला हथियार । भाग्य की सीढ़ी का सहारा लेकर ऊपर चढ़ते समय ये ध्यान जरूर रखें कि नीचे उतरते समय फिर वही लोग आपसे मिलेंगे ।

ये पोस्ट सिर्फ राजनीति या सार्वजनिक जीवन जीने वालों के लिए ही नहीं ये एक शाश्वत सत्य है जो सब पर बराबर लागू होता है.

👌✍
[11/08, 5:27 p.m.] ‪+91 83080 30439‬: मैंने फैसला किया है कि अब खाना खाते समय साउथ की फिल्म नहीं देखुंगा

अभी अभी एक स्कॉर्पियो का टायर मेरी थाली में आते आते बचा

😂😂😜😜😜😜
[12/08, 11:22 a.m.] Vishnu Arodaji: गुलामी के दिन थे। प्रयाग में कुम्भ मेला चल रहा था। एक अंग्रेज़ अपने द्विभाषिये के साथ वहाँ आया। गंगा के किनारे एकत्रित अपार जन समूह को देख अंग्रेज़ चकरा गया।

उसने द्विभाषिये से पूछा, “इतने लोग यहाँ क्यों इकट्टा हुए हैं?”

द्विभाषिया बोला, “गंगा स्नान के लिये आये हैं सर।”

अंग्रेज़ बोला, “गंगा तो यहां रोज ही बहती है फिर आज ही इतनी भीड़ क्यों इकट्ठा है?”

द्विभाषीया: – “सर आज इनका कोई मुख्य स्नान पर्व होगा।”
अंग्रेज़ :- ” पता करो कौन सा पर्व है ?”

द्विभाषिये ने एक आदमी से पूछा तो पता चला कि आज बसंत पंचमी है।

अंग्रेज़:- “इतने सारे लोगों को एक साथ कैसे मालूम हुआ कि आज ही बसंत पंचमी है?”

द्विभाषिये ने जब लोगों से पुनः इस बारे में पूछा तो एक ने जेब से एक जंत्री निकाल कर दिया और बोला इसमें हमारे सभी तिथि त्योहारों की जानकारी है।

अंग्रेज़ अपनी आगे की यात्रा स्थगित कर जंत्री लिखने वाले के घर पहुँचा। एक दड़बानुमा अंधेरा कमरा, कंधे पर लाल फटा हुआ गमछा, खुली पीठ, मैली कुचैली धोती पहने एक व्यक्ति दीपक की मद्धिम रोशनी में कुछ लिख रहा था। पूछने पर पता चला कि वो एक गरीब ब्राह्मण था जो जंत्री और पंचांग लिखकर परिवार का पेट भरता था।

अंग्रेज़ ने अपने वायसराय को अगले ही क्षण एक पत्र लिखा :- “इंडिया पर सदा के लिए शासन करना है तो सर्वप्रथम ब्राह्मणों का समूल विनाश करना होगा सर क्योंकि जब एक दरिद्र और भूँख से जर्जर ब्राह्मण इतनी क्षमता रखता है कि दो चार लाख लोगों को कभी भी इकट्टा कर सकता है तो सक्षम ब्राह्मण क्या कर सकते हैं, गहराई से विचार कीजिये सर।”

इसी युक्ति पर आज भी सत्ता की चाह रखने वाले चल रहे हैं, “अबाध शासन करना है तो बुद्धिजीवियों और राष्ट्रभक्तों का समूल उन्मूलन करना ही होगा.”

#साभार 🙏🌹
[12/08, 12:17 p.m.] ‪+91 94137 78285‬: सुपर मेसेज 👌👌👌👌👌

एक मनोवैज्ञानिक स्ट्रेस मैनेजमेंट के बारे में,
अपने दर्शकों के सामने था..

उसने पानी से भरा एक गिलास उठाया…
सभी ने समझा की अब “आधा खाली या आधा भरा है”.. यही पूछा और समझाया जाएगा..

मगर मनोवैज्ञानिक ने पूछा..
कितना वजन होगा इस पानी के गिलास का ?
सभी ने 300 से 400 ग्राम तक अंदाज बताया..

मनोवैज्ञानिक ने कहा..
कुछ भी वजन मान लो..फर्क नहीं पड़ता..
फर्क इस बात का पड़ता है.. कि
मैं कितनी देर तक इस गिलास उठाए रखता हूँ ?

अगर मैं इस गिलास को एक मिनट तक उठाए रखता हूँ.. तो क्या होगा? शायद कुछ भी नहीं…

अगर मैं इस गिलास को एक घंटे तक उठाए रखता हूँ.. तो क्या होगा? मेरे हाथ में दर्द होने लगेगा और शायद अकड़ भी जाए.

अब अगर मैं इस गिलास को एक दिन तक उठाए रखता हूँ.. तो ??

मेरा हाथ… यकीनऩ, बेहद दर्दनाक हालत में होगा, हाथ पैरालाईज भी हो सकता है और मैं हाथ को हिलाने तक में असमर्थ हो जाऊंगा ।

लेकिन… इन तीनों परिस्थितियों में ग्लास के पानी का वजन न कम हुआ.. न ज्यादा.

चिंता और दुःख का भी जीवन में यही परिणाम है।

यदि आप अपने मन में इन्हें एक मिनट के लिए रखेंगे.. आप पर कोई दुष्परिणाम नहीं होगा..

यदि आप अपने मन में इन्हें एक घंटे के लिए रखेंगे आप दर्द और परेशानी महसूस करने लगेंगें..

लेकिन यदि आप अपने मन में इन्हें पूरा पूरा दिन बिठाए रखेंगे..

ये चिंता और दुःख.. हमारा जीना हराम कर देगा.. हमें पैरालाईज कर के कुछ भी सोचने – समझने में असमर्थ कर देगा..

और याद रहे..
इन तीनों परिस्थितियों में चिंता और दुःख.. जितना था, उतना ही रहेगा..

इसलिए.. यदि हो सके तो.. अपने चिंता और दुःख से भरे “ग्लास” को…एक मिनट के बाद.. नीचे रखना न भुलें..
[12/08, 1:51 p.m.] ‪+91 98299 94321‬: एक बोध कथा
|| कर्मो की दौलत ||

एक राजा था जिसने ने अपने राज्य में क्रूरता से बहुत सी दौलत इकट्ठा करके( एकतरह शाही खजाना ) आबादी से बाहर जंगल एक सुनसान जगह पर बनाए तहखाने मे सारे खजाने को खुफिया तौर पर छुपा दिया था खजाने की सिर्फ दो चाबियां थी एक चाबी राजा के पास और एक उसकेएक खास मंत्री के पास थी इन दोनों के अलावा किसी को भी उस खुफिया खजाने का राज मालूम ना था एक रोज़ किसी को बताए बगैर राजा अकेले अपने खजाने को देखने निकला , तहखाने का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हो गया और अपने खजाने को देख देख कर खुश हो रहा था , और खजाने की चमक से सुकून पा रहा था।

उसी वक्त मंत्री भी उस इलाके से निकला और उसने देखा की खजाने का दरवाजा खुला है वो हैरान हो गया और ख्याल किया कि कही कल रात जब मैं खजाना देखने आया तब शायद खजाना का दरवाजा खुला रह गया होगा, उसने जल्दी जल्दी खजाने का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया और वहां से चला गया . उधर खजाने को निहारने के बाद राजा जब संतुष्ट हुआ , और दरवाजे के पास आया तो ये क्या …दरवाजा तो बाहर से बंद हो गया था . उसने जोर जोर से दरवाजा पीटना शुरू किया पर वहां उनकी आवाज सुननेवाला उस जंगल में कोई ना था ।

राजा चिल्लाता रहा , पर अफसोस कोई ना आया वो थक हार के खजाने को देखता रहा अब राजा भूख और पानी की प्यास से बेहाल हो रहा था , पागलो सा हो गया.. वो रेंगता रेंगता हीरो के संदूक के पास गया और बोला ए दुनिया के नायाब हीरो मुझे एक गिलास पानी दे दो.. फिर मोती सोने चांदी के पास गया और बोला ए मोती चांदी सोने के खजाने मुझे एक वक़्त का खाना दे दो..राजा को ऐसा लगा की हीरे मोती उसे बोल रहे हो की तेरे सारी ज़िन्दगी की कमाई तुझे एक गिलास पानी और एक समय का खाना नही दे सकती..राजा भूख से बेहोश हो के गिर गया ।

जब राजा को होश आया तो सारे मोती हीरे बिखेर के दीवार के पास अपना बिस्तर बनाया और उस पर लेट गया , वो दुनिया को एक पैगाम देना चाहता था लेकिन उसके पास कागज़ और कलम नही था ।

राजा ने पत्थर से अपनी उंगली फोड़ी और बहते हुए खून से दीवार पर कुछ लिख दिया . उधर मंत्री और पूरी सेना लापता राजा को ढूंढते रहे पर बहुत दिनों तक राजा ना मिला तो मंत्री राजा के खजाने को देखने आया , उसने देखा कि राजा हीरे जवाहरात के बिस्तर पर मरा पड़ा है , और उसकी लाश को कीड़े मोकड़े खा रहे थे . राजा ने दीवार पर खून से लिखा हुआ था…ये सारी दौलत एक घूंट पानी ओर एक निवाला नही दे सकी…

यही अंतिम सच है |आखिरी समय आपके साथ आपके कर्मो की दौलत जाएगी , चाहे आप कितनी बेईमानी से हीरे पैसा सोना चांदी इकट्ठा कर लो सब यही रह जाएगा |इसीलिए जो जीवन आपको प्रभु ने उपहार स्वरूप दिया है , उसमें अच्छे कर्म लोगों की भलाई के काम कीजिए बिना किसी स्वार्थ के ओर अर्जित कीजिए अच्छे कर्मो की अनमोल दौलत |जो आपके सदैव काम आएगी |
[12/08, 2:13 p.m.] ‪+91 94137 78285‬: बड़े बावरे हिन्दी के मुहावरे
😄😄
हिंदी के मुहावरे, बड़े ही बावरे हैं,
खाने पीने की चीजों से भरे हैं….
कहीं पर फल है तो कहीं आटा-दालें हैं,
कहीं पर मिठाई है, कहीं पर मसाले हैं,
फलों की ही बात ले लो…

आम के आम और गुठलियों के भी दाम मिलते हैं, कभी अंगूर खट्टे हैं,
कभी खरबूजे, खरबूजे को देख कर रंग बदलते हैं,
कहीं दाल में काला है तो कहीं किसी की दाल ही नहीं गलती,

कोई डेड़ चावल की खिचड़ी पकाता है
तो कोई लोहे के चने चबाता है,
कोई घर बैठा रोटियाँ तोड़ता है,
कोई दाल भात में मूसरचंद बन जाता है,
मुफलिसी में जब आटा गीला होता है
तो आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाता है,

सफलता के लिए बेलने पड़ते है कई पापड़,
आटे में नमक तो जाता है चल,
पर गेंहू के साथ घुन भी पिस जाता है,
अपना हाल तो बेहाल है, ये मुंह और मसूर की दाल है,

गुड़ खाते हैं और गुलगुले से परहेज करते हैं
और कभी गुड़ का गोबर कर बैठते हैं,
कभी तिल का ताड़, कभी राई का पहाड़ बनता है,
कभी ऊँट के मुंह में जीरा है, कभी कोई जले पर नमक छिड़कता है,
किसी के दांत दूध के हैं तो कई दूध के धुले हैं,

कोई जामुन के रंग सी चमड़ी पा के रोई है,
तो किसी की चमड़ी जैसे मैदे की लोई है,
किसी को छटी का दूध याद आ जाता है,
दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक पीता है
और दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है,

शादी बूरे के लड्डू हैं, जिसने खाए वो भी पछताए और जिसने नहीं खाए, वो भी पछताते हैं, पर शादी की बात सुन, मन में लड्डू फूटते है,
और शादी के बाद, दोनों हाथों में लड्डू आते हैं,

कोई जलेबी की तरह सीधा है, कोई टेढ़ी खीर है,
किसी के मुंह में घी शक्कर है, सबकी अपनी अपनी तकदीर है…
कभी कोई चाय-पानी करवाता है, कोई मक्खन लगाता है
और जब छप्पर फाड़ कर कुछ मिलता है,
तो सभी के मुंह में पानी आता है,

भाई साहब अब कुछ भी हो,
घी तो खिचड़ी में ही जाता है,
जितने मुंह है, उतनी बातें हैं,
सब अपनी-अपनी बीन बजाते है,
पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है,
सभी बहरे है, बावरें है
ये सब हिंदी के मुहावरें हैं…

ये गज़ब मुहावरे नहीं बुजुर्गों के अनुभवों की खान हैं…
सच पूछो तो हिन्दी भाषा की जान हैं…😊
[12/08, 3:40 p.m.] ‪+91 98803 03018‬: 👦पति– जब हमारी नई-नई शादी हुई थी,
तब तुम कितना तहजीब से बोलती थी
और अब….???

👩पत्नि — पहले मै रामायण देखती थी,
और
अब क्राईम पेट्रोल देखती हू ।😂😂😂😉😉
[13/08, 7:48 a.m.] ‪+91 80584 98386‬: यूपी ,हरियाणा और राजस्थान की रोडवेज बसें ,

ड्राइवर के बीड़ी पीने से चलती है …..😂😂
[13/08, 7:48 a.m.] ‪+91 80584 98386‬: एक अंग्रेज़, भारतीय रेल के Toilet में Bisleri की बोतल देख के बेहोश हो गया।

Oh my God! हम तो इसे पीते हैं, ……😝😝😝😝😝
[13/08, 10:40 a.m.] ‪+91 94144 62843‬: अब्दुल की फेसबुक पर एक लड़की से दोस्ती हो गयी। अब्दुल ने उसे इम्प्रेस करने के लिये लिखा ..,
“चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो”.. 😍

थोड़ी देर में लड़की का जवाब आ गया, 🤠

आफताब ही हूँ अब्दुल भाई, फेक आईडी बनाई थी, फिर भी आपने पहचान लिया..
😳😬😂

By @sap_saket
[13/08, 10:40 a.m.] ‪+91 94144 62843‬: आदमी हवाई जहाज़ 🛬से उतरा
तो दरवाज़े पर खड़ी एयर होस्टेस बोली,
“उम्मीद है फ्लाइट में घर जैसा माहौल मिला होगा”!
आदमी ~ जी बिल्कुल नहीं, घर में तो मेरी कोई नहीं सुनता पर यहां तो बटन दबाते ही चार चार आ जाती हैं।।😜😂


दुनियादारी का फर्क तब समझ में आया 😉
जब एक कुंवारे के दरवाज़े पर लिखा देखा:
“Sweet Home”
.
और 😎
.
शादी-शुदा के दरवाजे पे : “ॐ शांति ॐ” 😝😀😁😂


ससुर का फ़ोन: दामाद जी, कल तुम्हारे साले के लिये लड़की देखने जाना है , हो सके तो आ जाओ

दामाद: आप लोग देखलो, मेरा तो खुदका डिसीजन गलत हुआ पड़ा है 😉😜


Wife : शादी से पहले तुम बहुत मंदिर जाते थे । अब क्या हो गया ?

HUsband : फिर तुमसे शादी हो गयी …
और भगवान से भरोसा उठ गया…….😜😜😜😜😜


साला आज-कल के साबुन देख कर,

पता ही नहीं चलता की नहाने के लिए है या खाने के लिए!!

मलाई..दूध..केशर..युक्त.😋😜


👼.. Bacha: मम्मी आप तो कहते थे कि परी उड़ती है ……….फिर अपनी पड़ोसन आंटी क्यों नहीं उड़ती????!!!

मम्मी : उस बंदरिया को परी किसने कहा??

बच्चा :डैडी ने . . .
मम्मी: तो फिर ….बेटा आज उड़ेगी ….वो भी और तेरा baap भी….
😄😜😜😜😝😝😂😂
[13/08, 10:40 a.m.] ‪+91 94144 62843‬: 😜😜

😃”….अरे बेटा ये पैर में पट्टी कैसी बांध रखी है क्या हुआ”,
“….कुछ नही अंकल बाइक से गिर गया चोट लग गयी है”
“….ओह हो हो बेटा “दवा-दारु” ले ली”
….”हां अंकल दारू तो गिरने से पहले ही ली थी और दवा गिरने के बाद….”

😇😁

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संजय गुप्ता

नागपंचमी की पौराणिक एवं प्रामाणिक कथा…

नागपंचमी की पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक सेठजी के सात पुत्र थे। सातों के विवाह हो चुके थे। सबसे छोटे पुत्र की पत्नी श्रेष्ठ चरित्र की विदूषी और सुशील थी, परंतु उसके भाई नहीं था।

एक दिन बड़ी बहू ने घर लीपने को पीली मिट्टी लाने के लिए सभी बहुओं को साथ चलने को कहा तो सभी धलिया और खुरपी लेकर मिट्टी खोदने लगी। तभी वहां एक सर्प निकला, जिसे बड़ी बहू खुरपी से मारने लगी। यह देखकर छोटी बहू ने उसे रोकते हुए कहा- ‘मत मारो इसे? यह बेचारा निरपराध है।’

यह सुनकर बड़ी बहू ने उसे नहीं मारा तब सर्प एक ओर जा बैठा। तब छोटी बहू ने उससे कहा-‘हम अभी लौट कर आती हैं तुम यहां से जाना मत। यह कहकर वह सबके साथ मिट्टी लेकर घर चली गई और वहां कामकाज में फँसकर सर्प से जो वादा किया था उसे भूल गई।

उसे दूसरे दिन वह बात याद आई तो सब को साथ लेकर वहां पहुंची और सर्प को उस स्थान पर बैठा देखकर बोली- सर्प भैया नमस्कार! सर्प ने कहा- ‘तू भैया कह चुकी है, इसलिए तुझे छोड़ देता हूं, नहीं तो झूठी बात कहने के कारण तुझे अभी डस लेता।

वह बोली- भैया मुझसे भूल हो गई, उसकी क्षमा माँगती हूँ, तब सर्प बोला- अच्छा, तू आज से मेरी बहिन हुई और मैं तेरा भाई हुआ। तुझे जो माँगना हो, माँग ले। वह बोली- भैया! मेरा कोई नहीं है, अच्छा हुआ जो तू मेरा भाई बन गया।

कुछ दिन व्यतीत होने पर वह सर्प मनुष्य का रूप रखकर उसके घर आया और बोला कि ‘मेरी बहिन को भेज दो।’ सबने कहा कि ‘इसके तो कोई भाई नहीं था, तो वह बोला- मैं दूर के रिश्ते में इसका भाई हूँ, बचपन में ही बाहर चला गया था।

उसके विश्वास दिलाने पर घर के लोगों ने छोटी को उसके साथ भेज दिया। उसने मार्ग में बताया कि ‘मैं वहीं सर्प हूँ, इसलिए तू डरना नहीं और जहां चलने में कठिनाई हो वहां मेरी पूछ पकड़ लेना। उसने कहे अनुसार ही किया और इस प्रकार वह उसके घर पहुंच गई। वहां के धन-ऐश्वर्य को देखकर वह चकित हो गई।

एक दिन सर्प की माता ने उससे कहा- ‘मैं एक काम से बाहर जा रही हूँ, तू अपने भाई को ठंडा दूध पिला देना। उसे यह बात ध्यान न रही और उसने गर्म दूध पिला दिया, जिसमें उसका मुख बेतरह जल गया। यह देखकर सर्प की माता बहुत क्रोधित हुई।

परंतु सर्प के समझाने पर चुप हो गई। तब सर्प ने कहा कि बहिन को अब उसके घर भेज देना चाहिए। तब सर्प और उसके पिता ने उसे बहुत सा सोना, चाँदी, जवाहरात, वस्त्र-भूषण आदि देकर उसके घर पहुंचा दिया।

इतना ढेर सारा धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या से कहा- भाई तो बड़ा धनवान है, तुझे तो उससे और भी धन लाना चाहिए। सर्प ने यह वचन सुना तो सब वस्तुएं सोने की लाकर दे दीं। यह देखकर बड़ी बहू ने कहा- ‘इन्हें झाड़ने की झाड़ू भी सोने की होनी चाहिए’। तब सर्प ने झाडू भी सोने की लाकर रख दी।

सर्प ने छोटी बहू को हीरा-मणियों का एक अद्भुत हार दिया था। उसकी प्रशंसा उस देश की रानी ने भी सुनी और वह राजा से बोली कि- सेठ की छोटी बहू का हार यहां आना चाहिए।’

राजा ने मंत्री को हुक्म दिया कि उससे वह हार लेकर शीघ्र उपस्थित हो मंत्री ने सेठजी से जाकर कहा कि ‘महारानीजी छोटी बहू का हार पहनेंगी, वह उससे लेकर मुझे दे दो’। सेठजी ने डर के कारण छोटी बहू से हार मँगाकर दे दिया।

छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी, उसने अपने सर्प भाई को याद किया और आने पर प्रार्थना की- भैया ! रानी ने हार छीन लिया है, तुम कुछ ऐसा करो कि जब वह हार उसके गले में रहे, तब तक के लिए सर्प बन जाए और जब वह मुझे लौटा दे तब हीरों और मणियों का हो जाए। सर्प ने ठीक वैसा ही किया। जैसे ही रानी ने हार पहना, वैसे ही वह सर्प बन गया। यह देखकर रानी चीख पड़ी और रोने लगी।

यह देख कर राजा ने सेठ के पास खबर भेजी कि छोटी बहू को तुरंत भेजो। सेठजी डर गए कि राजा न जाने क्या करेगा? वे स्वयं छोटी बहू को साथ लेकर उपस्थित हुए।

राजा ने छोटी बहू से पूछा- तुने क्या जादू किया है, मैं तुझे दंड दूँगा। छोटी बहू बोली- राजन ! धृष्टता क्षमा कीजिए, यह हार ही ऐसा है कि मेरे गले में हीरों और मणियों का रहता है और दूसरे के गले में सर्प बन जाता है। यह सुनकर राजा ने वह सर्प बना हार उसे देकर कहा- अभी पहनकर दिखाओ। छोटी बहू ने जैसे ही उसे पहना वैसे ही हीरों-मणियों का हो गया।

यह देखकर राजा को उसकी बात का विश्वास हो गया और उसने प्रसन्न होकर उसे बहुत सी मुद्राएं भी पुरस्कार में दीं। छोटी बहू अपने हार और धन सहित घर लौट आई। उसके धन को देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या के कारण उसके पति को सिखाया कि छोटी बहू के पास कहीं से धन आया है। यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी को बुलाकर कहा- ठीक-ठीक बता कि यह धन तुझे कौन देता है? तब वह सर्प को याद करने लगी।

तब उसी समय सर्प ने प्रकट होकर कहा- यदि मेरी धर्म बहिन के आचरण पर संदेह प्रकट करेगा तो मैं उसे खा लूँगा। यह सुनकर छोटी बहू का पति बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सर्प देवता का बड़ा सत्कार किया। उसी दिन से नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता है और स्त्रियां सर्प को भाई मानकर उसकी पूजा करती हैं।

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संजय गुप्ता

रक्षा बंधन ,,,,

रक्षा बंधन का त्यौहार बहन और भाई के प्रेम का प्रतीक है। इस दिन बहनें अपने भाइयो को राखी बांधती है। तिलक लगाती है और साथ में मिठाई खिलाती है।यह विश्वास प्रतीक रूप में भले ही रेशम की कच्ची डोर से बँधा होता है परंतु दोनों के मन की भावनाएँ प्रेम की एक पक्की डोर से बँधी रहती है, जो रिश्तों की हर डोर से मजबूत डोर होती है।

यही प्रेम रक्षाबंधन के दिन भाई को अपनी लाड़ली बहन के पास खीच लाता है। राखी बाँधने के साथ ये वचन लेती है की भाई , जीवन भर मेरी रक्षा करना। फलस्वरूप, भाई भी अपनी प्यारी बहन को वचन देता है की में तेरी रक्षा करुगा।

जब तुझे जरुरत होगी मैं तेरे साथ रहुगा। और साथ में बहन को उपहार देता है। रुपैये, चॉक्लेट, घडी और ड्रेस इत्यादि! राखी का त्योहार हिंदू कैलेंडर की श्रावण माह की पूर्णिमा के दिन (श्रावण पूर्णिमा) पड़ता है।

रक्षा बंधन हमारे देश में कई कारणों से मनाया जाता है। इसके संदर्भ में कई आध्यात्मिक, सामाजिक पौराणिक, धार्मिक तथा ऐतिहासिक कथाये मिलती है।

द्रोपती ने भगवान श्री कृष्ण को राखी बाँधी थी। भगवान कृष्ण ने शिशुपाल को मारा था। युद्ध के बीच में भगवान की बांये ऊँगली से रक्त बहन रहा था। और जब वो रथ में घोड़ो की रास पकड़ रहे थे तब खून और तेज बहनें लगा।

जब द्रोपती को पता चल की मेरे प्रभु के हाथ से खून बह रहा है। एक पल के लिए भी नही सोचा। झट अपनी साडी का टुकड़ा चीरकर श्री कृष्ण की ऊँगली में बाँध दिया। और खून बहना बंद हो गया। तब भगवान ने वचन दिया की द्रोपती में तेरी आजीवन लाज बचाऊगा।यह भी श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था।

और आप सभी जानते है की जब पांडव जुए में हार गए थे। दुर्योधन ने दुःशाशन को द्रोपती के चीर हरण के लिए कहा। और दुःशाशन द्रोपती को बालो से खीच कर चीर हरण करने के लिए लाया था। द्रोपती ने सभी को पुकारा।

युधिस्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव , भीष्म , धृतराष्ट्र और गुरु द्रोणाचार्ये। लेकिन कोई भी द्रोपती की रक्षा नही कर पाया। अंत में द्रोपती ने भगवान श्री कृष्ण को याद किया। भगवान ने एक पल नही लगाया। और द्रोपती की लाज बचाइए।

सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु पुरूवास को राखी बांध कर अपना मुंहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया। पुरूवास ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी का और अपनी बहन को दिये हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवदान दिया।

ऐतिहासिक युग में भी सिंकदर व पोरस ने युद्ध से पूर्व रक्षा-सूत्र की अदला-बदली की थी। युद्ध के दौरान पोरस ने जब सिकंदर को मारने के लिए हाथ उठाया तो तो रक्षा-सूत्र को देखकर उसके हाथ रूक गए और वह बंदी बना लिया गया। सिकंदर ने भी पोरस के रक्षा-सूत्र की लाज रखते हुए और एक योद्धा की तरह व्यवहार करते हुए उसका राज्य वापस लौटा दिया।

राजा बलि और माँ लक्ष्मी रक्षा बंधन !!!!!!

जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया तो राजा बलि के द्वार पर गए और 3 पग धरती मांगी थी। राजा बलि ने 3 पग धरती दान दी तो भगवान वामन ने तीन पग में आकाश-पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। उसने अपनी भक्ति के बल पर विष्णु जी से हर समय अपने सामने रहने का वचन ले लिया। लक्ष्मी जी इससे चिंतित हो गईं। नारद जी की सलाह पर लक्ष्मी जी बलि के पास गई और रक्षासूत्र बांधकर उसे अपना भाई बना लिया। बदले में वे विष्णु जी को अपने साथ ले आईं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी।

इंद्र इन्द्राणी और रक्षा बंधन कहानी !!!!!

एक बार देवताओ और देत्यो के बीच में युद्ध हुआ। देत्ये विजय की और बढ़ रहे थे। ये देख इंद्र बहुत चिंतित थे। अपने पति को दिन-परेशान देख कर इंद्राणी(शशिकला) ने भगवान की पूजा की। भगवान पूजा से खुश हुए और एक मंत्रसिद्ध धागा दिया। इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर बांध दिया। इस प्रकार इंद्राणी ने पति को विजयी कराने में मदद की। इस धागे को रक्षासूत्र का नाम दिया गया और बाद में यही रक्षा सूत्र रक्षाबंधन हो गया।

चंद्रशेखर आज़ाद और रक्षा बंधन कहानी!!!!

एक बार चंद्रशेखर आज़ाद अंग्रेजो से बचते हुए एक घर में घुसे। घर में एक विधवा और उसकी बेटी थी। उस विधवा औरत ने सोचा की ये कोई चोर या डाकू है। लेकिन बाद में पता चला क्रांतिकारी आज़ाद है।

वो विधवा गरीब थी। आज़ाद को पता चला की इस विधवा को अपनी बेटी की शादी में दिकत आ रही है। तब आज़ाद ने कहा आप मुझे अंग्रेजो को पकड़वा दीजिये और मुझ पर 5000 रुपैये का इनाम है आप वो रख लेना। इससे आपकी बेटी की शादी हो जाएगी।

वो माँ रो पड़ी और बोली,”भैया, तुम देश की आजादी हेतु अपनी जान हथेली पर रखे घूमते हो और न जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है। मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकती।” चाहे मेरी बेटी की शादी हो या न हो। ये बात कहते कहते उसने आज़ाद की कलाई पर रक्षा सूत्र(राखी) बाँध दी। और देश सेवा का वचन भी ले लिया। रात जैसे तैसे बीत गई और आज़ाद चले गए। सुबह जब विधवा की आँखें खुली तो आजाद जा चुके थे और तकिए के नीचे 5000 रूपये पड़े थे। उसके साथ एक पर्ची पर लिखा था- “अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी सी भेंट- आज़ाद

बात उस समय की है जब चंद्रशेखर आज़ाद झांसी में थे। आज़ाद की कोठरी के पास रामदयाल नाम का एक अन्य ड्राइवर सपरिवार रहता था। वैसे तो अच्छा आदमी था लेकिन रोज रात को शराब पीके हंगामा किया करता और अपनी पत्नी से मार पीट। इससे पूरा महोल्ला परेशान था। लेकिन कोई कुछ बोलता नहीं था।

आज़ाद ने अपना नाम बदलकर हरी शंकर रख लिए था आज़ाद जब कारखाने जा रहे थे तो रामदयाल ने पूछा आजकल आप बहुत रात जागकर कुछ ठोंका–पीटी किया करते हैं। आपकी ठुक–ठुक से हमारी नींद हराम हो जाती है। इस बात में एक व्यंग्य था। आज़ाद ने उत्तर देना उचित समझा।

“रामदयाल भाई! मैं तो कल–पुरज़ों की ही ठोंका–पीटी करता हूँ, पर तुम तो शराब के नशे में अपनी गऊ जैसी पत्नी की ही ठोंका–पीटी करके मोहल्ले भर की नींद हराम करते रहते हो।”

रामदयाल को गुस्सा आ गया और बोला,”साले तू हम पति-पत्नी के बीच बोलने वाला होता कोन है?मैं उसे मारूँगा और खूब मारूँगा। देखता हूँ कौन साला बचाएगा।

आज़ाद ने शांत भाव से जवाब दिया-
आज़ाद ने शान्त भाव से उसे उत्तर दिया –
“जब तुमने मुझे साला कहा है, तो तुमने यह स्वीकार कर ही लिया है कि मैं तुम्हारी पत्नी का भाई हूँ।

एक भाई अपनी बहन को पिटते हुए नहीं देख सकता है। अब कभी शराब के नशे में रात को मारा तो ठीक नहीं होगा।”
रामदयाल अपने गुस्से को काबू में नही कर सका। दौड़कर अपने मकान में गया और अपनी पत्नी को बालों से खींचकर भर ले आया।और मारने के लिए हाथ उठाया।

जैसे ही उसने हाथ उठाया तभी आज़ाद ने एकदम से उसका हाथ पकड़ लिया और झटका देकर अपनी और खींचा। उसकी पत्नी इस झटके के कारण उसके हाथ से पत्नी के बाल छूट गए और वह मुक्त हो गई। तब आज़ाद ने एक जोरदार चांटा जड़ दिया रामदयाल के गाल पर।

तमाचा इतना तेज था की उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। और वह अपने दोनों हाथों से अपना सिर थामकर बैठ गया। इतने में पडोसी लोग वहां आ गए और आज़ाद को साइड में ले गए। इस घटना के बाद कुछ दिन तक आज़ाद और रामदयाल की बोलचाल बन्द हो गई, पर आज़ाद ने स्वयं ही पहल करके उससे अपने सम्बन्ध मधुर बना लिए तथा अब उसे “जीजा जी” कहकर पुकारने लगे।

रामदयाल ने अपनी पत्नी को फिर कभी नहीं पीटा। आज़ाद की धाक पूरे मोहल्ले में जम गई। इसी से मिलती–जुलती एक अन्य घटना भी थोड़े ही अन्तराल से हो गई। जिसने पूरे झाँसी में आज़ाद की धाक जमा दी।

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संजय गुप्ता

गुरु पूर्णिमा 2018: जानिए क्या है गुरु पूर्णिमा का महत्व और कैसे करें गुरु की पूजा?

आज 27 जुलाई को आषाढ़ मास की पूर्णिमा है, इसको ही गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। इस दिन सभी को अपने गुरुओं को आसन प्रदान कर के अपनी श्रद्धानुसार उनका पूजन अर्चन करके उनसे आशीर्वाद ग्रहण करना चाहिए।

इस दिन ही वर्ष का सबसे लंबा चंद्रग्रहण भी पड़ रहा है. जो रात्रि 11:54 से प्रारंभ होगा और रात्रि 3:49 तक रहेगा। जिसका सूतक 9 घंटे पूर्व दोपहर 2:54 से प्रारंभ हो जाएगा।

इस दिन आषाढ़ मास की पूर्णिमा है, इसको ही गुरु पूर्णिमा कहते हैं. इस दिन गुरु पूजा का विधान है. गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरंभ में आती है. इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं. ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं. न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं. जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता और फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरु चरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

गुरु पूर्णिमा का यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी. इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है. उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है।

भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे।

‘राम कृष्ण सबसे बड़ा उनहूं तो गुरु कीन्ह।
तीन लोक के वे धनी गुरु आज्ञा आधीन॥’

गुरु तत्व की प्रशंसा तो सभी शास्त्रों ने की है. ईश्वर के अस्तित्व में मतभेद हो सकता है, किंतु गुरु के लिए कोई मतभेद आज तक उत्पन्न नहीं हो सका है। गुरु की महत्ता को सभी धर्मों और संप्रदायों ने माना है. प्रत्येक गुरु ने दूसरे गुरुओं को आदर-प्रशंसा और पूजा सहित पूर्ण सम्मान दिया है. भारत के बहुत से संप्रदाय तो केवल गुरुवाणी के आधार पर ही कायम हैं।

क्या है गुरु का अर्थ?

भारतीय संस्कृति के वाहक शास्त्रों गुरु का अर्थ बताया गया है. गुरु में गु का अर्थ है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का अर्थ है- उसका निरोधक. गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है. अर्थात् अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है। गुरु और देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी है. बल्कि सद्गुरुकी कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

आषाढ़ की पूर्णिमा ही क्यों है गुरु पूर्णिमा????

आषाढ़ की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के पीछे गहरा अर्थ है। अर्थ है कि गुरु तो पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह हैं जो पूर्ण प्रकाशमान हैं और शिष्य आषाढ़ के बादलों की तरह, आषाढ़ में चंद्रमा बादलों से घिरा रहता है जैसे बादलरूपी शिष्यों से गुरु घिरे हों। शिष्य सब तरह के हो सकते हैं, जन्मों के अंधेरे को लेकर आ छाए हैं।

वे अंधेरे बादल की तरह ही हैं. उसमें भी गुरु चांद की तरह चमक सके, उस अंधेरे से घिरे वातावरण में भी प्रकाश जगा सके, तो ही गुरु पद की श्रेष्ठता है. इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा का महत्व है, इसमें गुरु की तरफ भी इशारा है और शिष्य की तरफ भी यह इशारा तो है ही कि दोनों का मिलन जहां हो, वहीं कोई सार्थकता है.

गुरु पूर्णिमा पर्व का महत्व : – जीवन में गुरु और शिक्षक के महत्व को आने वाली पीढ़ी को बताने के लिए यह पर्व आदर्श है। व्यास पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा अंधविश्वास के आधार पर नहीं बल्कि श्रद्धाभाव से मनाना चाहिए।

गुरु का आशीर्वाद सबके लिए कल्याणकारी और ज्ञानवर्द्धक होता है, इसलिए इस दिन गुरु पूजन के उपरांत गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। सिख धर्म में इस पर्व का महत्व अधिक इस कारण है क्योंकि सिख इतिहास में उनके दस गुरुओं का बेहद महत्व रहा है।

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डॉ घनश्याम गर्ग

🌸गुरु पूर्णिमा क्यों मनायी जाती हैं ?
(Guru purnima kyo manayi jati hai ?)

हरि ॐ,
गुरु पूर्णिमा क्यो मनायी जाती हैं ?
गुरु पूर्णिमा का महत्व क्या है ?
आज यहाँ इस पोस्ट के माध्यम से सविस्तार जानिए…

  1. गुरु पूर्णिमा कब आती हैं ?

➖गुरु पूर्णिमा वर्षाऋतु के आरंभ में अषाढ़ मास में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा आती हैं |

  1. क्या है गुरु पूर्णिमा ?

➖गुरु पूर्णिमा यह एक गुरु और शिष्य का पर्व हैं यह एक ऐसा पर्व है जिस दिन हम अपने गुरुजनो , महा पुरुषों , माता-पिता तथा श्रेष्ठ जनो
के लिए कृतग्नता व्यक्त करते हैं | पूरे विश्व में अषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन गुरु
की पूजा करने का विधान है | उस दिन हर शिष्य अपने गुरु की पूजा करता है |

  1. क्यों चूना यही दिन ?

➖गुरु के लिए पूर्णिमा से बढ़कर जो ओर तिथि हो ही नहीं सकती | क्योंकि गुरु और पूर्णत्व दोनो एकदूसरे के समानार्थी हैं |जिस तरह चन्द्रमा पूर्णिमा की रात सर्व कलाओं से परिपूर्ण होता हैं और अपनी शीतल रश्मियां समभाव से सभी को वितरित करता है उसी तरह संपूर्ण ग्यान से गुरु अपने शिष्यों को अपने ज्ञान से आप्लावित करता है |
यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण दृैपायन व्यास का जन्मदिन है |वे संस्कृत के बहुत ही बड़े विद्वान थे |उन्होने वेदो का विस्तार किया और कृष्ण द्वैपायन से ‘वेद व्यास’ कहलाये | यही कारण से इस गुरु पूर्णिमा को ‘व्यास पूर्णिमा ‘ भी कहते हैं | 18 पूराणों और 16 शास्त्रो के रचयिता वेद व्यास जी ने गुरु के सम्मान मे विशेष पर्व मनाने के लिए अषाढ़ मास की पूर्णिमा को चूना | कहा जाता है कि वेद व्यास जी ने अपने शिष्यों एवं मुनियो को सबसे पहले श्री भागवत पूराण का ज्ञान इसी दिन दिया था | वेद व्यास जी के अनेक शिष्यों में से पांच शिष्यों ने गुरु पूजा की परंपरा डाली | पुष्प मंडप में उच्चा आसन पर व्यास जी को बिठाकर पुष्पमाला अर्पित की और आरती की एवं अपने ग्रंथ किए | तब से इस पर्व को गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है |

  1. क्यों मनाते हैं गुरु पूर्णिमा ?

➖शास्त्रो में ‘गुरु’ शब्द का अर्थ बताया गया है कि ‘गु ‘ का अर्थ है अंधकार या मूल अज्ञान और ‘र’ का अर्थ है कि निरोधक | अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जानेवाले को गुरु कहते हैं | देवता एवं गुरु में समानता के लिए एक श्लोक मे बताया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही भक्ति गुरु के लिए भी है | सद् गुरु की कृपा से जीवन में इश्वर का भी
साक्षातकार करना संभव है | सद्गुरु के बिना या अभाव में कुछ भी संभव नहीं है

🙏🏻ॐ🙏🏻🚩

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देव शर्मा

गुरुपूर्णिमा विशेष
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आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

इस वर्ष गुरू पूर्णिमा आज 27 जुलाई 2018, को मनाई जाएगी. गुरू पूर्णिमा अर्थात गुरू के ज्ञान एवं उनके स्नेह का स्वरुप है. हिंदु परंपरा में गुरू को ईश्वर से भी आगे का स्थान प्राप्त है तभी तो कहा गया है कि हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर. इस दिन के शुभ अवसर पर गुरु पूजा का विधान है. गुरु के सानिध्य में पहुंचकर साधक को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त होती है.

गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी होता है. वेद व्यास जी प्रकांड विद्वान थे उन्होंने वेदों की भी रचना की थी इस कारण उन्हें वेद व्यास के नाम से पुकारा जाने लगा.

ज्ञान का मार्ग गुरू पूर्णिमा
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शास्त्रों में गुरू के अर्थ के अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश देने वाला कहा गया है. गुरु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले होते हैं. गुरु की भक्ति में कई श्लोक रचे गए हैं जो गुरू की सार्थकता को व्यक्त करने में सहायक होते हैं. गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार संभव हो पाता है और गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं हो पाता.

भारत में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है. प्राचीन काल से चली आ रही यह परंपरा हमारे भीतर गुरू के महत्व को परिलक्षित करती है. पहले विद्यार्थी आश्रम में निवास करके गुरू से शिक्षा ग्रहण करते थे तथा गुरू के समक्ष अपना समस्त बलिदान करने की भावना भी रखते थे, तभी तो एकलव्य जैसे शिष्य का उदाहरण गुरू के प्रति आदर भाव एवं अगाध श्रद्धा का प्रतीक बना जिसने गुरू को अपना अंगुठा देने में क्षण भर की भी देर नहीं की.

गुरु पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह उच्चवल और प्रकाशमान होते हैं उनके तेज के समक्ष तो ईश्वर भी नतमस्तक हुए बिना नहीं रह पाते. गुरू पूर्णिमा का स्वरुप बनकर आषाढ़ रुपी शिष्य के अंधकार को दूर करने का प्रयास करता है. शिष्य अंधेरे रुपी बादलों से घिरा होता है जिसमें पूर्णिमा रूपी गुरू प्रकाश का विस्तार करता है. जिस प्रकार आषाढ़ का मौसम बादलों से घिरा होता है उसमें गुरु अपने ज्ञान रुपी पुंज की चमक से सार्थकता से पूर्ण ज्ञान का का आगमन होता है.

गुरू आत्मा – परमात्मा के मध्य का संबंध होता है. गुरू से जुड़कर ही जीव अपनी जिज्ञासाओं को समाप्त करने में सक्षम होता है तथा उसका साक्षात्कार प्रभु से होता है. हम तो साध्य हैं किंतु गुरू वह शक्ति है जो हमारे भितर भक्ति के भाव को आलौकिक करके उसमे शक्ति के संचार का अर्थ अनुभव कराती है और ईश्वर से हमारा मिलन संभव हो पाता है. परमात्मा को देख पाना गुरू के द्वारा संभव हो पाता है. इसीलिए तो कहा है , गुरु गोविंददोऊ खड़े काके लागूं पाय. बलिहारी गुरु आपके जिन गोविंद दियो बताय.

गुरु पूर्णिमा पौराणिक महत्व
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गुरु को ब्रह्मा कहा गया है. गुरु अपने शिष्य को नया जन्म देता है. गुरु ही साक्षात महादेव है, क्योकि वह अपने शिष्यों के सभी दोषों को माफ करता है. गुरु का महत्व सभी दृष्टि से सार्थक है. आध्यात्मिक शांति, धार्मिक ज्ञान और सांसारिक निर्वाह सभी के लिए गुरू का दिशा निर्देश बहुत महत्वपूर्ण होता है. गुरु केवल एक शिक्षक ही नहीं है, अपितु वह व्यक्ति को जीवन के हर संकट से बाहर निकलने का मार्ग बताने वाला मार्गदर्शक भी है.

गुरु व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश में ले जाने का कार्य करता है, सरल शब्दों में गुरु को ज्ञान का पुंज कहा जा सकता है. आज भी इस तथ्य का महत्व कम नहीं है. विद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों द्वारा आज भी इस दिन गुरू को सम्मानित किया जाता है. मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेलों का आयोजन किया जाता है.

वास्तव में हम जिस भी व्यक्ति से कुछ भी सीखते हैं , वह हमारा गुरु हो जाता है और हमें उसका सम्मान अवश्य करना चाहिए. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा ‘गुरु पूर्णिमा’ अथवा ‘व्यास पूर्णिमा’ है. लोग अपने गुरु का सम्मान करते हैं उन्हें माल्यापर्ण करते हैं तथा फल, वस्त्र इत्यादि वस्तुएं गुरु को अर्पित करते हैं. यह गुरु पूजन का दिन होता है जो पौराणिक काल से चला आ रहा है।

शास्त्रोक्त श्री गुरु पूजन विधि
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इस साधना के लिए प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर, स्नानादि करके, पीले या सफ़ेद आसन पर पूर्वाभिमुखी होकर बैठें बाजोट पर पीला कपड़ा बिछा कर उसपर केसर से “ॐ” लिखी ताम्बे या स्टील की प्लेट रखें। उस पर पंचामृत से स्नान कराके “गुरु यन्त्र” व “कुण्डलिनी जागरण यन्त्र” रखें। सामने गुरु चित्र भी रख लें। अब पूजन प्रारंभ करें।

पवित्रीकरण
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बायें हाथ में जल लेकर दायें हाथ की उंगलियों से स्वतः पर छिड़कें।

ॐ अपवित्रः पवित्रो व सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।

आचमन
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निम्न मंत्रों को पढ़ आचमनी से तीन बार जल पियें।

ॐ आत्म तत्त्वं शोधयामि स्वाहा।
ॐ ज्ञान तत्त्वं शोधयामि स्वाहा।
ॐ विद्या तत्त्वं शोधयामि स्वाहा।

१ माला जाप करे अनुभव करे हमरे पाप दोस समाप्त हो रहे है। .

ॐ ह्रौं मम समस्त दोषान निवारय ह्रौं फट
संकल्प ले फिर पूजन आरम्भ करे ।

सूर्य पूजन
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कुंकुम और पुष्प से सूर्य पूजन करें।

ॐ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्येन सविता रथेन याति भुनानि पश्यन ।।

ॐ पश्येन शरदः शतं श्रृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतं। जीवेम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात।।

ध्यान
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अचिन्त्य नादा मम देह दासं, मम पूर्ण आशं देहस्वरूपं।न जानामि पूजां न जानामि ध्यानं, गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।

ममोत्थवातं तव वत्सरूपं, आवाहयामि गुरुरूप नित्यं। स्थायेद सदा पूर्ण जीवं सदैव, गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं ।।

आवाहन
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ॐ स्वरुप निरूपण हेतवे श्री निखिलेश्वरानन्दाय गुरुवे नमः आवाहयामि स्थापयामि।

ॐ स्वच्छ प्रकाश विमर्श हेतवे श्री सच्चिदानंद परम गुरुवे नमः आवाहयामि स्थापयामि।

ॐ स्वात्माराम पिंजर विलीन तेजसे श्री ब्रह्मणे पारमेष्ठि गुरुवे नमः आवाहयामि स्थापयामि।

स्थापन
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गुरुदेव को अपने षट्चक्रों में स्थापित करें।

श्री शिवानन्दनाथ पराशक्त्यम्बा मूलाधार चक्रे स्थापयामि नमः।

श्री सदाशिवानन्दनाथ चिच्छक्त्यम्बा स्वाधिष्ठान चक्रे स्थापयामि नमः।

श्री ईश्वरानन्दनाथ आनंद शक्त्यम्बा मणिपुर चक्रे स्थापयामि नमः।

श्री रुद्रदेवानन्दनाथ इच्छा शक्त्यम्बा अनाहत चक्रे स्थापयामि नमः।

श्री विष्णुदेवानन्दनाथ क्रिया शक्त्यम्बा सहस्त्रार चक्रे स्थापयामि नमः।

पाद्य
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मम प्राण स्वरूपं, देह स्वरूपं समस्त रूप रूपं गुरुम् आवाहयामि पाद्यं समर्पयामि नमः।

अर्घ्य
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ॐ देवो तवा वई सर्वां प्रणतवं परी संयुक्त्वाः सकृत्वं सहेवाः। अर्घ्यं समर्पयामि नमः।

गन्ध
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ॐ श्री उन्मनाकाशानन्दनाथ – जलं समर्पयामि।

ॐ श्री समनाकाशानन्दनाथ – स्नानं समर्पयामि।

ॐ श्री व्यापकानन्दनाथ – सिद्धयोगा जलं समर्पयामि।

ॐ श्री शक्त्याकाशानन्दनाथ – चन्दनं समर्पयामि।

ॐ श्री ध्वन्याकाशानन्दनाथ – कुंकुमं समर्पयामि।

ॐ श्री ध्वनिमात्रकाशानन्दनाथ – केशरं समर्पयामि।

ॐ श्री अनाहताकाशानन्दनाथ – अष्टगंधं समर्पयामि।

ॐ श्री विन्द्वाकाशानन्दनाथ – अक्षतां समर्पयामि।

ॐ श्री द्वन्द्वाकाशानन्दनाथ – सर्वोपचारां समर्पयामि।

पुष्प, बिल्व पत्र
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तमो स पूर्वां एतोस्मानं सकृते कल्याण त्वां कमलया सशुद्ध बुद्ध प्रबुद्ध स चिन्त्य अचिन्त्य वैराग्यं नमितांपूर्ण त्वां गुरुपाद पूजनार्थंबिल्व पत्रं पुष्पहारं च समर्पयामि नमः।

दीप
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श्री महादर्पनाम्बा सिद्ध ज्योतिं समर्पयामि।

श्री सुन्दर्यम्बा सिद्ध प्रकाशम् समर्पयामि।

श्री करालाम्बिका सिद्ध दीपं समर्पयामि।

श्री त्रिबाणाम्बा सिद्ध ज्ञान दीपं समर्पयामि।

श्री भीमाम्बा सिद्ध ह्रदय दीपं समर्पयामि।

श्री कराल्याम्बा सिद्ध सिद्ध दीपं समर्पयामि।

श्री खराननाम्बा सिद्ध तिमिरनाश दीपं समर्पयामि।

श्री विधीशालीनाम्बा पूर्ण दीपं समर्पयामि।

नीराजन
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ताम्रपात्र में जल, कुंकुम, अक्षत अवं पुष्प लेकर यंत्रों पर समर्पित करें।

श्री सोममण्डल नीराजनं समर्पयामि।

श्री सूर्यमण्डल नीराजनं समर्पयामि।

श्री अग्निमण्डल नीराजनं समर्पयामि।

श्री ज्ञानमण्डल नीराजनं समर्पयामि।

श्री ब्रह्ममण्डल नीराजनं समर्पयामि।

पञ्च पंचिका
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अपने दोनों हाथों में पुष्प लेकर निम्न पञ्च पंचिकाओं का उच्चारण करते हुए इन दिव्य महाविद्याओं की प्राप्ति हेतु गुरुदेव से निवेदन करें।

पञ्चलक्ष्मी
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श्री विद्या लक्ष्म्यम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री एकाकार लक्ष्मी लक्ष्म्यम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री महालक्ष्मी लक्ष्म्यम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री त्रिशक्तिलक्ष्मी लक्ष्म्यम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री सर्वसाम्राज्यलक्ष्मी लक्ष्म्यम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

पञ्चकोश
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श्री विद्या कोशाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री परज्योति कोशाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री परिनिष्कल शाम्भवी कोशाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री अजपा कोशाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री मातृका कोशाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

पञ्चकल्पलता
〰️🌼🌼🌼〰️
श्री विद्या कल्पलताम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री त्वरिता कल्पलताम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री पारिजातेश्वरी कल्पलताम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री त्रिपुटा कल्पलताम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री पञ्च बाणेश्वरी कल्पलताम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

पञ्चकामदुघा
〰️🌼〰️🌼〰️
श्री विद्या कामदुघाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री अमृत पीठेश्वरी कामदुघाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

तदोपरांत गुरुदेव की आरती करें

आरती
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आरती करूँ आरती सद्गुरु की
प्यारे गुरुवर की आरती, आरती करूँ गुरुवर की।

जय गुरुदेव अमल अविनाशी, ज्ञानरूप अन्तर के वासी,
पग पग पर देते प्रकाश, जैसे किरणें दिनकर कीं।
आरती करूँ गुरुवर की॥

जब से शरण तुम्हारी आए, अमृत से मीठे फल पाए,
शरण तुम्हारी क्या है छाया,
कल्पवृक्ष तरुवर की।
आरती करूँ गुरुवर की॥

ब्रह्मज्ञान के पूर्ण प्रकाशक, योगज्ञान के अटल प्रवर्तक।
जय गुरु चरण-सरोज मिटा दी, व्यथा हमारे उर की। आरती करूँ गुरुवर की।

अंधकार से हमें निकाला, दिखलाया है अमर उजाला,
कब से जाने छान रहे थे, खाक सुनो दर-दर की।
आरती करूँ गुरुवर की॥

संशय मिटा विवेक कराया, भवसागर से पार लंघाया,
अमर प्रदीप जलाकर कर दी, निशा दूर इस तन की।
आरती करूँ गुरुवर की॥

भेदों बीच अभेद बताया,… आवागमन विमुक्त कराया,
धन्य हुए हम पाकर धारा, ब्रह्मज्ञान निर्झर की।
आरती करूँ गुरुवर की॥

करो कृपा सद्गुरु जग-तारन,
सत्पथ-दर्शक भ्रान्ति-निवारन,
जय हो नित्य ज्योति दिखलाने वाले लीलाधर की।
आरती करूँ आरती सद्गुरु की
प्यारे गुरुवर की आरती, आरती करूँ गुरुवर की।
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नीरज वर्मा

सद्गुरु – “मनगढ़ंत” और “प्रतिस्पर्धा” (Competition) से जन्मा शब्द !!!
गुरु – “संपूर्ण” शब्द !!!

आप शास्त्र में और किसी भी शब्दकोष में शब्द “सद्गुरु” नहीं पाएँगे। गुरू का विलोम शब्द है – शिष्य। यदि आप सद्गुरु का विलोम शब्द ढुँढने का प्रयास करें तो कुछ भी समझ नहीं आएगा क्योंकि शब्द “सद्गुरु” तो प्रचार, प्रसार और व्यवहार में आ गया किंतु, उसके विलोम शब्द की किसी को आवश्यकता नहीं है। यदि सद्गुरु है तो असद्गुरु भी अवश्य होना चाहिए। असद्गुरु का क्या अर्थ होगा – स्वयं विचार करें।

वर्तमान में तथाकथित गुरुओं की बाढ़ सी आ गई है। उन गुरुओं में उत्कृष्ट गुरु चयन करने की प्रक्रिया या स्वयं को उत्कृष्ट घोषित करने के क्रम में ही यानी प्रतिस्पर्धा (Competition) के फलस्वरूप ही शब्द “सद्गुरु” स्थापित हो गया। वास्तव में, गुरु उत्कृष्ट और निकृष्ट होता ही नहीं है। जो हमें मोक्ष/कैवल्य प्राप्त करने में सहयोग कर सकता है केवल उसी का नाम गुरु है !

कहते हैं, “कृष्णं वंदे जगद्गुरुं” – भगवान् श्रीकृष्ण के लिए भी “गुरु” शब्द ही कहा जाता है, सद्गुरु नहीं!

शास्त्र के अनुसार, “गु” का अर्थ है – अंधकार या मूल अज्ञान/अविद्या और “रु” का अर्थ है उसका निरोधक। अर्थात् अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले का नाम “गुरु” है।सत् बुद्धि से युक्त और गुणातीत (सत्व, रज और तम के परे) जो निरंतर भगवान् में मन वाले और जिन्होंने भगवान् में ही प्राणों को अर्पण कर दिया है। जिनके द्वारा चेतनतत्त्व सिद्ध है। जिनका भगवान् पर विश्वास नहीं है बल्कि, जिनके द्वारा भगवान् सिद्ध है। अनन्यदर्शी (न अन्य) तथा जो अपने लिए योगक्षेम (अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति का नाम योग है और प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम क्षेम है) सम्बन्धी चेष्टा भी नहीं करते क्योंकि वे जीने और मरने में भी अपनी वासना नहीं रखते, केवल भगवान् ही जिनके अवलम्बन हैं तथा जो भगवान् के प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित भगवान् का कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट रहते हैं और वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं। जो संपूर्ण भक्ति और ज्ञान दोनों से युक्त हैं। इस लोक में रमण करनेवाले केवल ऐसे व्यक्तित्व का नाम “गुरु” है।

“आषाढ़ मास” की “पूर्णिमा” का नाम “गुरु पूर्णिमा” है, “सद्गुरु पूर्णिमा” नहीं है। इस दिन से चार महीने तक साधु संत ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने जाते हैं।

क्या वर्तमान काल के ये तथाकथित धर्म गुरु ऐसा करते हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं बल्कि वे तो बड़े-बड़े और महंगे मंच पर कीमती वस्त्रों में सुसज्जित होकर अपने तथाकथित शिष्यों से गुरु पूजा के बहाने स्वयं की पूजा करवाने में भी तनिक भी नहीं हिचकिचाते हैं। उन्हें तो संभवतः उपरोक्त चार महीने के महत्व का ज्ञान भी न हो।

इसी दिन “महाभारत” के रचयिता “कृष्ण द्वापायन व्यास” का जन्मदिन है। कृष्ण द्वापायन व्यास जी भी गुरु के रूप में जाने जाते हैं, सद्गुरु के रूप में नहीं!

गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ!

जय श्री कृष्ण !!