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रक्षाबंधन के नाम पर सेक्युलर घोटाला


रक्षाबंधन के नाम पर सेक्युलर घोटाला

बचपन में हमें अपने पाठयक्रम में पढ़ाया जाता रहा है कि रक्षाबंधन के त्योहार पर बहने अपने भाई को राखी बांध कर उनकी लम्बी आयु की कामना करती है। रक्षा बंधन का सबसे प्रचलित उदहारण चित्तोड़ की रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ का दिया जाता है। कहा जाता है कि जब गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चित्तोड़ पर हमला किया तब चित्तोड़ की रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को पत्र लिख कर सहायता करने का निवेदन किया। पत्र के साथ रानी ने भाई समझ कर राखी भी भेजी थी। हुमायूँ रानी की रक्षा के लिए आया मगर तब तक देर हो चुकी थी। रानी ने जौहर कर आत्महत्या कर ली थी। इस इतिहास को हिन्दू-मुस्लिम एकता तोर पर पढ़ाया जाता हैं।

अब सेक्युलर खोटाला पढ़िए

हमारे देश का इतिहास सेक्युलर इतिहासकारों ने लिखा है। भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलाम थे। जिन्हें साम्यवादी विचारधारा के नेहरू ने सख्त हिदायत देकर यह कहा था कि जो भी इतिहास पाठयक्रम में शामिल किया जाये। उस इतिहास में यह न पढ़ाया जाये कि मुस्लिम हमलावरों ने हिन्दू मंदिरों को तोड़ा, हिन्दुओं को जबरन धर्मान्तरित किया, उन पर अनेक अत्याचार किये। मौलाना ने नेहरू की सलाह को मानते हुए न केवल सत्य इतिहास को छुपाया अपितु उसे विकृत भी कर दिया।

रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ के किस्से के साथ भी यही अत्याचार हुआ। जब रानी को पता चला की बहादुर शाह उस पर हमला करने वाला है तो उसने हुमायूँ को पत्र तो लिखा। मगर हुमायूँ को पत्र लिखे जाने का बहादुर खान को पता चल गया। बहादुर खान ने हुमायूँ को पत्र लिख कर इस्लाम की दुहाई दी और एक काफिर की सहायता करने से रोका।

मिरात-ए-सिकंदरी में गुजरात विषय से पृष्ठ संख्या 382 पर लिखा मिलता है-

सुल्तान के पत्र का हुमायूँ पर बुरा प्रभाव हुआ। वह आगरे से चित्तोड़ के लिए निकल गया था। अभी वह गवालियर ही पहुंचा था। उसे विचार आया, “सुलतान चित्तोड़ पर हमला करने जा रहा है। अगर मैंने चित्तोड़ की मदद की तो मैं एक प्रकार से एक काफिर की मदद करूँगा। इस्लाम के अनुसार काफिर की मदद करना हराम है। इसलिए देरी करना सबसे सही रहेगा। ” यह विचार कर हुमायूँ गवालियर में ही रुक गया और आगे नहीं सरका।

इधर बहादुर शाह ने जब चित्तोड़ को घेर लिया। रानी ने पूरी वीरता से उसका सामना किया। हुमायूँ का कोई नामोनिशान नहीं था। अंत में जौहर करने का फैसला हुआ। किले के दरवाजे खोल दिए गए। केसरिया बाना पहनकर पुरुष युद्ध के लिए उतर गए। पीछे से राजपूत औरतें जौहर की आग में कूद गई। रानी कर्णावती 13000 स्त्रियों के साथ जौहर में कूद गई। 3000 छोटे बच्चों को कुँए और खाई में फेंक दिया गया। ताकि वे मुसलमानों के हाथ न लगे। कुल मिलकर 32000 निर्दोष लोगों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा।

बहादुर शाह किले में लूटपाट कर वापिस चला गया। हुमायूँ चित्तोड़ आया। मगर पुरे एक वर्ष के बाद आया।परन्तु किसलिए आया? अपने वार्षिक लगान को इकठ्ठा करने आया। ध्यान दीजिये यही हुमायूँ जब शेरशाह सूरी के डर से रेगिस्तान की धूल छानता फिर रहा था। तब उमरकोट सिंध के हिन्दू राजपूत राणा ने हुमायूँ को आश्रय दिया था। यही उमरकोट में अकबर का जन्म हुआ था। एक काफ़िर का आश्रय लेते हुमायूँ को कभी इस्लाम याद नहीं आया। और धिक्कार है ऐसे राणा पर जिसने अपने हिन्दू राजपूत रियासत चित्तोड़ से दगा करने वाले हुमायूँ को आश्रय दिया। अगर हुमायूँ यही रेगिस्तान में मर जाता। तो भारत से मुग़लों का अंत तभी हो जाता। न आगे चलकर अकबर से लेकर औरंगज़ेब के अत्याचार हिन्दुओं को सहने पड़ते।

इरफ़ान हबीब, रोमिला थापर सरीखे इतिहासकारों ने इतिहास का केवल विकृतिकरण ही नहीं किया अपितु उसका पूरा बलात्कार ही कर दिया। हुमायूँ द्वारा इस्लाम के नाम पर की गई दगाबाजी को हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे और रक्षाबंधन का नाम दे दिया। हमारे पाठयक्रम में पढ़ा पढ़ा कर हिन्दू बच्चों को इतना भ्रमित किया गया कि उन्हें कभी सत्य का ज्ञान ही न हो। इसीलिए आज हिन्दुओं के बच्चे दिल्ली में हुमायूँ के मकबरे के दर्शन करने जाते हैं। जहाँ पर गाइड उन्हें हुमायूँ को हिन्दूमुस्लिम भाईचारे के प्रतीक के रूप में बताते हैं।

इस लेख को आज रक्षाबंधन के दिन इतना फैलाये कि इन सेक्युलर घोटालेबाजों तक यह अवश्य पहुंच जाये।

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विश्वास_और_प्यार_का_एक_पवित्र_वन्धन_रक्षावन्धन_


#विश्वास_और_प्यार_का_एक_पवित्र_वन्धन_रक्षावन्धन_

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श्रावण मास की पूर्णिमा में एक ऐसा पर्व मनाया जाता है जिसमें पूरे देश के भाई-बहनों का आपसी प्यार दिखाई देता है – रक्षा बंधन| वर्ष 2017 में रक्षा बंधन 7अगस्त, वार को मनाया जाएगा| भाई-बहन के प्यार, स्नेह को दर्शाते इस त्योहार की परंपरा आज लगभग हर धर्म में मनाई जाती है| धर्म-मज़हब से परे यह त्योहार भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है|

किसी भी रिश्तें की मजबूती की बुनियाद होता है विश्वास| और यही विश्वास एक बहन अपने भाई पर रखती है जब वह इस पर्व के दिन भाई की कलाई पर एक धागा जिसे राखी कहते है, बांधती है| अपने हाथ में राखी बंधवाकर भाई यह प्रतिज्ञा करता है कि वह अपनी बहन की सदैव रक्षा करेगा चाहे परिस्थिति कितनी ही विषम क्यों ना हो| राखी का धागा केवल रक्षा ही नहीं बल्कि प्रेम और निष्ठा से दिलों को भी जोड़ता है|

इस दिन का महत्त्व इतना अधिक है कि यदि कोई बहन अपने भाई से इस दिन मिल नहीं पाती तो भी डाक द्वारा उन्हें राखी अवश्य भेजती है| रक्षा बंधन से जुड़ीं कईं ऐसी कथाएँ हैं जिनमें राखी बाँधने वाली बहन नहीं बल्कि पत्नी या ब्राह्मण भी हैं| क्योंकि यह सूत्र, यह धागा एक रक्षासूत्र होता है|

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय देवों और असुरों के बीच लम्बे समय से युद्ध चला जा रहा था| इस युद्ध में देवों की निरंतर हार हो रही थी और इस बात से दुखी देवराज इंद्र अपने गुरु बृहस्पति के पास परामर्श लेने गए| वहाँ इंद्र की पत्नी इन्द्राणी भी थी| इंद्र की व्यथा सुनकर इन्द्राणी ने उनसे कहा कि वह श्रावण की शुक्ल पूर्णिमा में विधि-विधानपूर्वक एक रक्षासूत्र तैयार करेंगी| इन्द्राणी ने इंद्र से वह रक्षासूत्र ब्राह्मणों से बंधवाने के लिए कहा और कहा कि उनकी अवश्य ही विजय होगी| और वाकई ऐसा करने पर देवताओं की विजय हुईं| तभी से ब्रहामणों द्वारा रक्षासूत्र बंधवाने की यह प्रथा प्रचलित है|

एक कथा के अनुसार ग्रीक नरेश महान सिकंदर की पत्नी ने सिकंदर के शत्रु पुरुराज की कलाई में राखी बांधी थी ताकि युद्ध में उनके पति की रक्षा हो सके| और ऐसा हुआ भी, युद्ध के दौरान कईं अवसर ऐसे आए जिनमें पुरुराज ने जब भी सिकंदर पर प्राण घातक प्रहार करना चाहा, किन्तु अपनी कलाई पर बंधी राखी देख पुरुराज ने सिकंदर को प्राणदान दिया|

महाभारतकाल में जब श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया था तो उस समय उनकी ऊँगली कट गयी थी| श्रीकृष्ण के ऊँगली से रक्त बहता देख द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्ला फाड़ कर उनकी ऊँगली पर बाँध दिया था| वह साड़ी का एक टुकड़ा किसी रक्षासूत्र से कम नहीं था अतः श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को सदैव उनकी रक्षा करने का वचन दिया| और जब आगे जाकर भरी सभा में दु:शासन द्रपुदी का चीरहरण कर रहा था और पांडव और अन्य सभी उनकी सहायता नहीं कर पा रहे थे तब श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज राखी और अपना वचन पूर्ण किया|

पुराणों में एक और रोचक कथा का वर्णन है| एक समय भगवान विष्णु राजा बलि को दिए गए अपने वचन को पूरा करने के लिए बैकुण्ड छोड़ कर बलि के राज्य चले गए थे और बलि के राज्य की रक्षा करने लगे| माँ लक्ष्मी ने भगवान को वापस लाने के लिए एक दिन एक ब्राह्मणी के रूप में राजा बलि की कलाई पर राखी बाँध कर उसके लिए मंगलकामना की| राजा बलि ने भी ब्राह्मणी रुपी माँ लक्ष्मी को अपनी बहन माना और उनकी रक्षा का वचन दिया| तब माँ लक्ष्मी अपनी असल रूप में आई और राजा बलि से विनती की कि वह श्रीविष्णु जी को अपने वचन से मुक्त कर पुनः बैकुण्ड लौट जाने दे| राजा बलि ने अपनी बहन को दिए वचन की लाज रखी और प्रभु को अपने वचन से मुक्त कर दिया|

रक्षा बंधन के दिन राखी बाँधने के अतिशुभ मुहूर्त अपराह्न का समय होता है| यदि कभी अपराह्न मुहूर्त किन्ही ज्योतिषी कारणों से उपलब्ध ना हो, तो प्रदोष मुहूर्त भी अनुष्ठान के लिए शुभ माना जाता है| भद्रा समय किसी भी प्रकार के शुभ कार्य के लिए अशुभ माना जाता है इसलिए इस समय अनुष्ठान न करे|

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मेघों का मौसम और हरियाली अमावस
मित्रो ! सावनी अमा यानी हरियाली अमावस्या की बधाई।

हमारे इधर, इस पर्व का बड़ा महत्व है। अवकाश रहता है और चित्तौड़गढ़ से लेकर उदयपुर तक, राजसमन्द से लेकर डूंगरपुर बांसवाड़ा तक मेलों या मेलों का माहौल रहता है। श्रावणादि संवत्सर होने से तो इसका महत्व रहा ही, वनभ्रमण, शिव सन्निधि और उल्लास का अवगाहन भी तो इससे जुड़े हैं। यह रबड़ी-मालपूओं की महक वाली अमावस भी है।

उदयपुर में तो बड़ा मेला लगता है। संभाग सबसे बड़ा मेला। एक नहीं दो दिन का। पहले दिन मिलाजुला और दूसरे दिन केवल स्त्री-सहेलियों का। सहेलियों की बाड़ी और फतहसागर पर आमद तो देखिए ! आसमान में मेघ, नीचे जनसैलाब और सागर में उठती लहरों का किल्लोल : मेळा रे थारै मजो बोत आयो, 

मांगां टपक्यो हींगळू जी कांई 

गालां पर छायो,

रंग गालां पर छायो।

मेळा रे थारे मालपूओ खायो,

वासुंदी मजेदार पायो,

मूंछा पै चढ चढ़ गयो हबड़को,

चाट-चाट खायो, मेळा रे थारै बोत आयो…
सन् 1899 में जब फतहसागर बनकर तैयार हुआ तो महाराणा फतहसिंह महारानी चावड़ी के और लवाज़मे के साथ मुआयने को निकले, तब हरियाली अमावस ही थी। महलों के कोठार-भंडार की ओर से ही मेला लगाया गया। जुलूस में लोग उमड़े तो इतने कि तिल रखने का ठौर नहीं। दर्शन में नई दोआनी सिक्कों की कोथलियां खाली होती जाती थी। महिलाएं सबसे कम दीखीं तो चावड़ी ने एक दिन का मेला महिलाओं के नाम मांग लिया। हां करने की देर थी, आधी दुनिया के लिए मेला शुरू। आज 118 बरस पुराना मेला हो गया। हर साल रौनक रहती है और यह जीवन को रसपूरित करता है, हालांकि अब कई मायने बदल गए मगर ये मेले हैं, मेले फिर भी लगते रहेंगे क्योंकि ये हमारे-तुम्हारे नहीं हम सबके हैं 🙂
मित्रो ! जीवन की रोजाना तपती रेत पर हरिताभ वाली खुशहाली और जबां पर दूधिया पूओं की मिठास हो… और मेघमालाओं के मंडन से मानसूनी बूंदनियां आपकी आशाओं का अभिषेक, अभिनंदन करती रहे। 

🙏🏼

शत-शत शुभकामनाएं। 

श्रीकृष्ण ‘ जुगनू’

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ननद ने अपनी भाभी को फोन किया और पूंछा : भाभी मैंने राखी भेजी थी मिल गयी क्या आप लोगों को ???

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भाभी : नहीं दीदी अभी नहीं मिली

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ननद : भाभी कल तक देख लो अगर नहीं मिली तो मैं खुद आऊंगी राखी लेकर

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अगले दिन भाभी ने खुद फोन किया : हाँ दीदी आपकी राखी मिल गयी है, बहुत अच्छी हे *Thank you Didi*

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ननद ने फोन रखा और आँखों में आंसू लेकर सोचने लगी “लेकिन भाभी मैंने तो अभी राखी भेजी ही नहीं और आपको मिल भी गयी !!!”

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“””यह बहुत पुरानी कहानी कई जगह अब सच होने लगीं हैं दोस्तों कृपया अपने *पवित्र रिश्तों* को सिमटने और फिर टूटने से बचाएं क्योंकि रिश्ते हमारे जीवन के फूल हैं जिन्हें ईश्वर ने खुद हमारे लिए खिलाया है…

रिश्ते काफी अनमोल होते है इनकी रक्षा करे

*बहन बेटी पर किये गए खर्च*

*से हमेशा फ़ायदा ही होता है*

*बहने हमसे चंद पैसे लेने नही बल्कि हमे बेसकिमति दुआएं देने आती है, हमारी बलाओं को टालने आती है, अपने भाई भाभी व परिवार को मोहब्बत भरी नज़र से देखने आती है*

*रक्षाबंधन की अग्रिम शुभकामनाये*

अनुज चौधरी

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गुरु महिमा !!

गुरु पूर्णिमा पर्व क्यों !!
“गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।

गुरू साक्षात् परंब्रह्म तस्मै श्री गुरूवे नमः॥”
हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा

के दिन गुरु की पूजा करने की परंपरा को

गुरु पूर्णिमा पर्व के रूप में मनाया जाता है।
यह पर्व आत्मस्वरूप का ज्ञान

पाने के अपने कर्तव्य की याद

दिलाने वाला,मन में दैवी गुणों

से विभूषित करनेवाला,सद्गुरु के

प्रेम और ज्ञान की गंगा में बारम्बार

डूबकी लगाने हेतु प्रोत्साहन देने

वाला है।
गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा

जाता है,क्योंकि मान्यता है कि भगवान

वेद व्यास ने पंचम वेद महाभारत की

रचना इसी पूर्णिमा के दिन की और

विश्व के सुप्रसिद्ध आर्य ग्रन्थ ब्रह्मसूत्र

का लेखन इसी दिन आरम्भ किया।
तब देवताओं ने वेद व्यास जी का

पूजन किया और तभी से व्यास

पूर्णिमा मनाई जा रही है।
कहा जाता है प्राचीन काल में गुरु

शिष्य परम्परा के अनुसार शिक्षा

ग्रहण की जाती थी।

इस दिन शिष्यगण अपने घर से गुरु

आश्रम जाकर गुरु की प्रसन्नता के

लिए अन्न,वस्त्र और द्रव्य से उनका

पूजन करते थे।
उसके उपरान्त ही उन्हें धर्म ग्रन्थ,

वेद,शास्त्र तथा अन्य विद्याओं की

जानकारी और शिक्षण का प्रशिक्षण

मिल पाता था।
गुरु को समर्पित इस पर्व से हमें भी

शिक्षा लेते हुए हमें उनकी पूजा करनी

चाहिए और उनके प्रति ह्रदय से श्रद्धा

रखनी चाहिए।
ओम विश्वाणी देव

सवित दुरीतानी परासुव

यत भद्रम तन्नो आसुव ll

हरि ओम…..
ओम दुर्जनो सज्जनो भुर्यात

सज्जनो शांति माप्नुयात

शांतों मुच्येत बन्ध्येभ्यों

मुक्तश्च अन्य विमूक्तए ll
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरूवे नमः।।

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।

चक्षुरून्मीलितं येन तस्मै श्री गुरूवे नमः॥
गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।

गुरू साक्षात परंब्रह्म तस्मै श्री गुरवेनमः॥
स्थावरं जंगमं व्याप्तं

यत्किञ्चित् सचराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै

श्री गुरवे नमः॥
चिन्मयं व्यापितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥
सर्वश्रुति शिरोरत्न विराजित पदाम्बुजः।

वेदान्ताम्बुज सूर्याय तस्मै श्री गुरवे नमः॥
चैतन्य शाश्वतं शान्तं व्योमातीतं निञ्जनः।

बिन्दु नाद कलातीतःतस्मै श्री गुरवे नमः॥
ज्ञानशक्ति समारूढःतत्त्वमाला विभूषितम्।

भुक्ति मुक्ति प्रदाता च तस्मै श्री गुरवे नमः॥
अनेक जन्म सम्प्राप्त कर्म बन्ध विदाहिने।

आत्मज्ञान प्रदानेन तस्मै श्री गुरवे नमः॥
शोषणं भव सिन्धोश्च ज्ञापनं सार संपदः।

गुरोर्पादोदकं सम्यक् तस्मै श्री गुरवे नमः॥
न गुरोरधिकं त्तत्वं न गुरोरधिकं तपः।

तत्त्व ज्ञानात् परं नास्ति तस्मै श्री गुरवे नमः॥
ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोर्पदम्।

मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोर्कृपा॥
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं।

द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्षयम्॥
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं।

भावातीतं त्रिगुणरहितं सद् गुरूं तन्नमामि॥
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥
ध्यानं सत्यं पूजा सत्यं सत्यं देवो निरञ्जनम्।

गुरिर्वाक्यं सदा सत्यं सत्यं देव उमापतिः॥”
इस गुरू वंदना में गुरू के स्वरूप,

शक्ति,सृजन और महत्व का सूक्ष्म

रहस्य छिपा हैं।
गुरू,ब्रह्मा है,गुरू विष्णु है,गुरूदेव

महेश्वर है।

गुरू साक्षात परम ब्रह्म है,उनको

नमस्कार है।
गुरू ब्रह्मा क्यों है ?

कारण कई जन्मों के बुरे संस्कारों से

हमारे अन्दर बहुत सा विकार पैदा हो

गया है।
हम दैविक मार्ग पर चलेंगे,क्या उसके

लिए हमारा शरीर,मन,बुद्धि तैयार है

या नहीं।
हम उस रास्ते चलेंगे जो सुनने में

आसान लगता है लेकिन जब उस

पर चलेंगे तो  ऐसा प्रतीत होगा कि

बहुत ही कठिन एवं दुर्गम रास्ता है।
इस कारण से गुरू को भी ब्रह्मा के

जैसे ही हमारे अंदर के विकार और

गन्दगी को हटाकर बुद्धि को शुद्ध कर

हमारे बिगड़े संस्कार को ठीक करना

पड़ता है।
अर्थात साधना,संयम,योग,जप द्वारा

गुरू हमे चलने लायक बना देते है।
गुरू विष्णु के जैसे हमारा पालन

करेंगे अन्यथा हम भौतिक कष्ट

से मर्माहत होकर साधना क्या

कर पायेंगे।
कोइ भी साधक या संत हो भले

ही वो त्यागी हो फिर भी जरूरत

की चीज मिल जाये और किसी के

सामने शर्म से सिर झुकाकर भिक्षा

या दान न मांगना पड़े।
इसके लिए गुरू बिष्णु जैसा बनकर

साधना,मंत्र,तंत्र द्वारा या वर,आशिर्वाद

देकर उस योग्य बना देते है कि सब कुछ

स्वतः प्राप्त होता रहे।
गुरू विष्णु के समान है जब चाहे

भक्त,साधक को पुष्ट बना दें ताकि

उसे साधना मार्ग में कभी भी भौतिक

विघ्न न सताये।
गुरू महेश्वर यानि शिव है जिनके पास

सारी शक्तियां विद्यमान है परन्तु दाता

होते हुए भी कोई दिखावा नहीं है।
वो सबका स्वामी है।
गुरू का यह रूप सदाशिव सदगुरू

बनकर साधक और भक्त को दिव्य

शक्ति प्रदान करवाते है।

यहाँ जो भी करते हैं,गुरू ही करते है।
कारण कैसी साधना,कौन सा मंत्र

या क्या करना है यह गुरू कृपा से

ही सुलभ होती है।

ये अपने शिष्य को जगत के सारे

रहस्य से परिचित कराके स्वयं और

शक्ति की लीला का साक्षात्कार कराने

के साथ ही आत्म दर्शन द्वारा साकार

परमात्मा के परम ब्रह्म का ज्ञान कराते है।
साकार,निराकार सब कुछ समझ में

आ जाता हैं और अंत में जो बचता है

वह “एकोहम द्वितीयो नास्ति “।

#साभार_संकलित;

(#चित्र_महर्षि_वेदव्यास)
जयति पुण्य सनातन संस्कृति,

जयति पुण्य भूमि भारत,,
समस्त मानव जाति पर समस्त

गुरुओं की कृपा सदा बरसती रहे !!!
सदा सर्वदा सुमंगल,

ॐ गुरवे नमः,

हर हर महादेव,

ॐ विष्णवे नम:,

जय भवानी,

जय श्रीराम,

विजय कृष्णा पांडेय

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गुरुपूर्णिमा पर्व पर विशेष लेख


गुरुपूर्णिमा पर्व पर विशेष लेख
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समाजोद्धार व ब्रह्म-प्राप्ति मार्ग के पथ-प्रदर्शक होते हैं , तेजपुंज “गुरु”
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पर्वों, त्योहारों और संस्कारों की भारतभूमि पर गुरु का परम महत्व माना गया है। गुरु ही शिष्य की ऊर्जा को पहचानकर उसके संपूर्ण सामर्थ्य को विकसित करने में सहायक होता है। गुरु नश्वर सत्ता का नहीं, अपितु चैतन्य विचारों का प्रतिरूप होता है। अत: रा. स्व. संघ के आरम्भ काल से ही “भगवाध्वज” को “गुरु” के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है ।—पूनम नेगी ( पाञ्चजन्य , आषाढ़ पूर्णिमा अंक ९-जूलाई से साभार )
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भारतभूमि के कण-कण में चैतन्य स्पंदन विद्यमान है। पर्वों, त्योहारों और संस्कारों की जीवंत परम्पराएं इसको प्राणवान बनाती हैं। तत्वदर्शी ऋषियों की इस जागृत धरा का ऐसा ही एक पावन पर्व है “गुरु पूर्णिमा” का ।

हमारे यहां ‘अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरं…तस्मै श्री गुरुवे नम:’ कह कर गुरु की अभ्यर्थना एक चिरंतन सत्ता के रूप में की गई है। भारत की सनातन संस्कृति में गुरु को परम भाव माना गया है जो कभी नष्ट नहीं हो सकता; इसीलिए गुरु को व्यक्ति नहीं अपितु विचार की संज्ञा दी गई है। इसी दिव्य भाव ने हमारे राष्ट्र को जगद्गुरु की पदवी से विभूषित किया। गुरु को नमन का ही पावन पर्व है गुरु पूर्णिमा (आषाढ़ पूर्णिमा)।

ज्ञान दीप है सद्गुरु :—
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गुरु’ स्वयं में पूर्ण है और जो खुद पूरा है वही तो दूसरों को पूर्णता का बोध करवा सकता है। हमारे अंतस में संस्कारों का परिशोधन, गुणों का संवर्द्धन एवं दुर्भावनाओं का विनाश करके गुरु हमारे जीवन को सन्मार्ग पर ले जाता है।

गुरु कौन व कैसा हो,
इस विषय में श्रुति बहुत सुंदर व्याख्या करती है-‘विशारदं ब्रह्मनिष्ठं श्रोत्रियं…’ अर्थात् जो ज्ञानी हो, शब्द ब्रह्म का ज्ञाता हो, आचरण से श्रेष्ठ ब्राह्मण जैसा और ब्रह्म में निवास करने वाला हो तथा अपनी शरण में आये शिष्य को स्वयं के समान सामर्थ्यवान बनाने की क्षमता रखता हो। वही गुरु है।

जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य की ‘श्तश्लोकी’ के पहले श्लोक में सद्गुरु की परिभाषा है:-तीनों लोकों में सद्गुरु की उपमा किसी से नहीं दी जा सकती।

वहीं बौद्ध ग्रंथों के अनुसार भगवान बुद्ध ने सारनाथ में आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही अपने प्रथम पांच शिष्यों को उपदेश दिया था। इसीलिए बौद्ध धर्म के अनुयायी भी पूरी श्रद्धा से “गुरु पूर्णिमा उत्सव” मनाते हैं। सिख इतिहास में गुरुओं का विशेष स्थान रहा है।

यह आवश्यक नहीं कि किसी देहधारी को ही गुरु माना जाये। मन में सच्ची लगन एवं श्रद्धा हो तो गुरु को किसी भी रूप में पाया जा सकता है। एकलव्य ने मिट्टी की प्रतिमा में गुरु को ढूंढा और महान धनुर्धर बना। तो वहीं श्री दत्तात्रेय महाराज ने 24 गुरु बनाये थे।

भगवा ध्वज है भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक :—
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चाणक्य जैसे गुरु ने चन्द्रगुप्त को चक्रवर्ती सम्राट बनाया और समर्थ गुरु रामदास ने छत्रपति शिवाजी के भीतर , बर्बर मुस्लिम आक्रमणकारियों से राष्ट्र रक्षा की सामर्थ्य विकसित की। मगर इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि बीती सदी में हमारी गौरवशाली “गुरु-शिष्य” परंपरा में कई विसंगतियां आ गयीं।

इस परिवर्तन को लक्षित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के समय भगवाध्वज को संघ में “गुरु” के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसके पीछे मूल भाव यह था कि व्यक्ति पतित हो सकता है पर विचार और पावन प्रतीक नहीं।

इस कारण से विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन “गुरु” रूप में इसी भगवाध्वज को नमन करता है।

” गुरु पूर्णिमा के दिन संघ के स्वयंसेवक गुरु दक्षिणा के रूप में इसी भगवाध्वज के समक्ष राष्ट्र के प्रति अपना समर्पण व श्रद्धा निवेदित करते हैं।

यहाँ उल्लेखनीय यह है कि इस भगवाध्वज को “गुरु” की मान्यता यूं ही नहीं मिली है। यह ध्वज तपोमय व ज्ञाननिष्ठ भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक सशक्त व पुरातन प्रतीक है। उगते हुये सूर्य के समान इसका भगवा रंग भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक ऊर्जा, पराक्रमी परंपरा एवं विजय भाव का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है। संघ ने उसी परम पवित्र भगवा ध्वज को गुरु के प्रतीक रूप में स्वीकार किया है जो कि हजारों वर्षों से हमारे राष्ट्रीय संस्कृति और धर्मध्वजा का सर्वज्ञात स्वरुप रहा था।

“गुरु” शब्द का महत्व इसके अक्षरों में ही निहित है। देववाणी संस्कृत में ‘गु’ का अर्थ होता है अंधकार (अज्ञान) और ‘रु’ का अर्थ, हटाने वाला। यानी जो अज्ञान के अंधकार से मुक्ति दिलाये वह ही गुरु है।
माता-पिता हमारे जीवन के प्रथम गुरु होते हैं। प्राचीनकाल में शिक्षा प्राप्ति के लिए गुरुकुलों की व्यवस्था थी। जहाँ गुरु-शिष्य परम्परा से युवा शिष्य जीवन के मूलमंत्रों को सहजीवन में ग्रहण करते थे , आज उनके स्थान पर स्कूल-कॉलेज हैं।
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॰०॥ तस्मै: श्री गुरुवै नम: ॥०॰

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गुरु पूर्णिमा


सबसे बड़ा गुरु कौन

(आज गुरु पूर्णिमा पर विशेष)

आज गुरु पूर्णिमा हैं। हिन्दू समाज में आज के दिन तथाकथित गुरु लोगों की लॉटरी लग जाती हैं। सभी तथाकथित गुरुओं के चेले अपने अपने गुरुओं के मठों, आश्रमों, गद्दियों पर पहुँच कर उनके दर्शन करने की हौड़ में लग जाते हैं। खूब दान, मान एकत्र हो जाता हैं। ऐसा लगता हैं की यह दिन गुरुओं ने अपनी प्रतिष्ठा के लिए प्रसिद्द किया हैं। भक्तों को यह विश्वास हैं की इस दिन गुरु के दर्शन करने से उनके जीवन का कल्याण होगा। अगर ऐसा हैं तब तो इस जगत के सबसे बड़े गुरु के दर्शन करने से सबसे अधिक लाभ होना चाहिए। मगर शायद ही किसी भक्त ने यह सोचा होगा की इस जगत का सबसे बड़ा गुरु कौन हैं? इस प्रश्न का उत्तर हमें योग दर्शन में मिलता हैं।

स एष पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् || ( योगदर्शन : 1-26 )
वह परमेश्वर कालद्वारा नष्ट न होने के कारण पूर्व ऋषि-महर्षियों का भी गुरु है ।
अर्थात ईश्वर गुरुओं का भी गुरु हैं। अब दूसरी शंका यह आती हैं की क्या सबसे बड़े गुरु को केवल गुरु पूर्णिमा के दिन स्मरण करना चाहिए। इसका स्पष्ट उत्तर हैं की नहीं ईश्वर को सदैव स्मरण रखना चाहिए और स्मरण रखते हुए ही सभी कर्म करने चाहिए। अगर हर व्यक्ति सर्वव्यापक एवं निराकार ईश्वर को मानने लगे तो कोई भी व्यक्ति पापकर्म में लिप्त न होगा। इसलिए धर्म शास्त्रों में ईश्वर को अपने हृदय में मानने एवं उनकी उपासना करने का विधान हैं।

ईश्वर और मानवीय गुरु में सम्बन्ध को लेकर कबीर दास के दोहे को प्रसिद्द किया जा रहा हैं।

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय । बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥

गुरुडम कि दुकान चलाने वाले कुछ अज्ञानी लोगों ने कबीर के इस दोहे का नाम लेकर यह कहना आरम्भ कर दिया हैं कि ईश्वर से बड़ा गुरु हैं क्यूंकि गुरु ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बताता हैं। एक सरल से उदहारण को लेकर इस शंका को समझने का प्रयास करते हैं। मान लीजिये कि मैं भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से मिलने के लिये राष्ट्रपति भवन गया। राष्ट्रपति भवन का एक कर्मचारी मुझे उनके पास मिलवाने के लिए ले गया। अब यह बताओ कि राष्ट्रपति बड़ा या उनसे मिलवाने वाला कर्मचारी बड़ा हैं?आप कहेगे कि निश्चित रूप से राष्ट्रपति कर्मचारी से कही बड़ा हैं, राष्ट्रपति के समक्ष तो उस कर्मचारी कि कोई बिसात ही नहीं हैं। यही अंतर उस गुरुओं कि भी गुरु ईश्वर और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बताने वाले गुरु में हैं। हिन्दू समाज के विभिन्न मतों में गुरुडम कि दुकान को बढ़ावा देने के लिए गुरु कि महिमा को ईश्वर से अधिक बताना अज्ञानता का बोधक हैं। इससे अंध विश्वास और पाखंड को बढ़ावा मिलता हैं।

पाया गुरु मन्त्र बृहस्पति से, फिर अन्य गुरु से करना क्या।
की माँग विश्वपति अधिपति से, फिर और किसी से करना क्या।।
वरणीय वरुण प्रभु वरुपति हों, अर्य्यमा न्याय के अधिपति हों।
हमको परमेश ईशता दो, तुम इन्द्र हमारे धनपति हों।।
की याचना इन्द्र‌ धनपति से, फिर दर दर हमें भटकना क्या।
की माँग विश्वपति अधिपति से, फिर और किसी से करना क्या।।
अत्यन्त पराक्रम बलपति हो, तुम वेद बृहस्पति श्रुतिपति हो।
तन मानस का बल हमको दो, तुम विष्णु व्याप्त जग वसुपति हो।।
की सन्धि शौर्य के सतपति से, फिर हमें शत्रु से डरना क्या।
की माँग विश्वपति अधिपति से, फिर और किसी से करना क्या।।
प्रिय सखा सुमंगल उन्नति हो, हर सम‌य तुम्हारी संगति हो।
बन मित्र मधुरता अपनी दो, सुख वैभव बल की सम्पति दो।।
मित्रता विष्णु प्रिय जगपति से, फिर पलपल हमें तरसना क्या।
की माँग विश्वपति अधिपति से, फिर और किसी से करना क्या।।

(पं. देवनारायण भारद्वाज रचित गीत स्तुति का प्रथम प्रकाश)