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संजय गुप्ता

दशहरे के दिन क्यों की जाती है, शमी के वृक्ष की पूजा??????

भारतीय संस्कृति में हर त्योहार का अपना एक अलग खास महत्व होता है। हर त्योहर अपने साथ बेहतर जीवन जीने का एक अलग संदेश देता है। नवरात्रि में मां भगवती के 9 स्वरूपों की पूजा के बाद दशहरे के दिन रावण का दहन किया जाता है। दहन के बाद कई प्रांतों में शमी के पत्ते को सोना समझकर देने का प्रचलन है तो कहीं इस वृक्ष की पूजा की जाती है।

बताया जाता है कि दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। खासकर क्षत्रियों में इस पूजन का महत्व ज्यादा है। इसी तरह मान्यता है कि शमी का वृक्ष घर में लगाने से देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है। शमी के वृक्ष की पूजा करने से घर में शनि का प्रकोप कम होता है। शमी के वृक्ष होने से सभी तंत्र-मंत्र और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत युद्ध में पांडवों ने शमी के वृक्ष पर ही अपने हथियार छुपाए थे। बाद में उन्हीं हथियारों से पांडवों कौरवों को हराकर विजय प्राप्त की थी। एक मान्यता के अनुसार कवि कालिदास को शमी के वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या करने से ही ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। बता दें गुजरात कच्छ के भुज शहर में लगभग 450 साल पुराना एक शमीवृक्ष है।

विजयादशमी के दिन इसकी पूजा करने के पीछे एक वजह यह भी है कि यह वृक्ष कृषि विपदा पर आने वाली समस्याओं के बारे में पहले ही संकेत दे देता है। गुजरात में कई किसान अपने खेतों में शमी का वृक्ष लगाते हैं। जिससे उन्हें लाभ होता है। साथ ही बिहार और झारखंड में यह वृक्ष अधिकतर घरों के दरवाजे के बाहर लगा हुआ मिलता है।

विजयादशमी के संदर्भ में एक पौराणिक कथा भी है। महर्षि वर्तन्तु का शिष्य कौत्स थे। महर्षि ने अपने शिष्य कौत्स से शिक्षा पूरी होने के बाद गुरू दक्षिणा के रूप में 14 करोड़ स्वर्ण मुद्रा की मांग की थी। महर्षि को गुरू दक्षिणा देने के लिए कौत्स महाराज रघु के पास गए। महाराज रघु ने कुछ दिन पहले ही एक महायज्ञ करवाया था, जिसके कारण खजाना खाली हो चुका था।

कौत्स ने राजा से स्वर्ण मुद्रा की मांग की तब उन्होंने तीन दिन का समय मांगा। राजा धन जुटाने के लिए उपाय खोजने लग गया। उसने स्वर्गलोक पर आक्रमण करने का विचार किया। राजा ने सोचा स्वर्गलोक पर आक्रमण करने से उसका शाही खजाना फिर से भर जाएगा। राजा के इस विचार से देवराज इंद्र घबरा गए और कोषाध्याक्ष कुबेर से रघु के राज्य में स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा करने का आदेश दिया।

इंद्र के आदेश पर रघु के राज्य में कुबेर ने शमी वृक्ष के माध्यम से स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा करा दी। माना जाता है कि जिस तिथि को स्वर्ण की वर्षा हुई थी उस दिन विजयादशमी थी। राजा ने शमी वृक्ष से प्राप्त स्वर्ण मुद्राएं कौत्स को दे दीं। इस घटना के बाद विजयादशमी के दिन शमी के वृक्ष के पूजा होने लगी।

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मनुष्य गौरव दिन


19 ऑक्टोबर! प. पू. पांडुरंगशास्त्रींचा तथा पू. दादाजींचा जन्मदिवस. लक्ष्मीपूजनाचा आजचा दिवस ही त्यांची पुण्यतिथी सुद्धा. पू. दादा म्हणजे वैदिक आणि औपनिषदिक तत्त्वज्ञानाचे केवळ अभ्यासकच नव्हे; तर भाष्यकार. वसिष्ठ-याज्ञवल्क्यांसह सर्व ऋषींचं जीवनतीर्थ भावपूर्ण अंतःकरणाने सेवन करणारा आधुनिक ऋषी, वेदोपनिषद, दर्शनशास्त्रं, प्रस्थानत्रयी, न्याय-व्याकरण-मीमांसा इत्यादी शास्त्रग्रंथांचे गाढे अभ्यासक, स्वप्रज्ञा असलेले तत्वचिंतक, शंकराचार्य, मध्वाचार्य यांसह सर्व आचार्य, संत तुकाराम-ज्ञानेश्वर-एकनाथ-नरसी मेहता, तुलसीदास यांच्याप्रमाणेच सेंट निकोलस-सेंट मार्टिन वगैरे जगातील अनेक संत आणि संत साहित्याचे भाष्यकार, कालिदास-शेक्सपीअरसह अनेक देशीविदेशी नाटककारांचे रसग्राहक, भारतीय तत्वज्ञांबरोबरच साॅक्रेटिस, हेगेल, मार्क्स, व्हाइटहेड, रसेल, कांट, ड्यूरंड, देकार्त यांसह जगातील अनेक तत्त्वज्ञ-विचारवंताचे गाढे अभ्यासक आणि भाष्यकार, मार्क्स, एंगल्स, लेनिन इत्यादी साम्यवादी विचारवंतांच्या साहित्याचा-विचारांचा प्रगल्भ भाष्यकार, टेनिसन, मिल्टन, खलील जिब्रान, एच. वेल्स इत्यादी जगातील अनेक कवी-विचारवंत=साहित्यिक यांच्या साहित्याचा रसास्वाद घेणारा रसग्राही, इतिहास-तत्त्वज्ञानाचे राॅयल एशियाटिक लायब्ररीतील सर्व ग्रंथ वाचलेला एकमेव शास्त्री-पंडित-अभ्यासक, जगातील सर्व धर्मग्रंथांचा भाष्यकार, व्हॅटिकन सिटी आणि मध्य आशियातील अनेक चर्च-मशिदींमधून प्रवचन केलेले महापंडित, अमेरिकेचे राष्ट्राध्यक्ष, होली पोप, मध्य आशियातील शेख, इस्रायलचे राष्ट्राध्यक्ष-धर्मगुरू, जर्मनी, जपान, इंग्लंड आदी अनेक राष्ट्रांनी गौरवलेला महापंडित, साम्यवादी-समाजवादी विचारवंतांनी स्वीकारलेला हिंदू शास्त्री, विवेकानंदांप्रमाणे जपानची तत्त्वज्ञान परिषद गाजवलेला एकमेव भारतीय तत्त्वज्ञ, मॅगॅसेसे, टेम्पल्टन, लो.टिळक, गांधी, पद्मभूषण-पद्मविभूषण इत्यादी 100वर राष्ट्रीय-आंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिळालेलं एकमेव भारतीय व्यक्तिमत्व, हाउस आॅफ लाॅर्ड्सनं खास जाहीर सन्मान केलेला एकमेव शास्त्री-पंडित… गतानुगतिक कर्मकांडात आणि ज्ञानकांडात अमूलाग्र परिवर्तन घडवून आणणारा, ऋषिप्रणित मूळ गंगोत्रीचं हजारो तासांच्या प्रवचनांमधून दर्शन घडविणारा दार्शनिक. याशिवाय सर्व धर्माच्या haves and have nots अशा दोन्ही घटकांना निरपेक्ष भावाने एकत्र आणणारा आणि त्यातून एक आचार-एक विचार-एक उपासना पद्धती देऊन सुमारे 3 कोटी स्वाध्यायींचा विशाल परिवार निर्माण करणारा आधुनिक महर्षी! भावभक्तीला कृतिभक्तीची यथार्थ जोड देऊन मूर्तिपूजेचं रहस्य पटवून देणारा महान योगी, सविकल्प आणि निर्विकल्प समाधीचा ऋषिप्रणित शास्त्रोक्त मार्ग दाखविणारे महान गुरू, शंकराचार्यांपासून शंकर अभ्यंकरांपर्यंत आणि पु.ल. देशपांडे यांच्यापासून शिरवाडकरांपर्यंत अनेक अभ्यासक आणि लेखक-विचारवंत ज्यांची आवर्जून भेट घ्यायचे असे आमचे पू. दादाजी! सुमारे दोन लाख गावांमधून स्वाध्याय क्रांती, 10000 वर योगेश्वर कृषी आणि कृतिभक्तीतून उभे राहिलेले हजारो ठिकाणचे इतर प्रयोग, brotherhood under the fatherhood of God हा विचार रुजवून शेवटच्या माणसाला ‘तत्तवमसि’ची अनुभूती देणारा सद्गुरु!

दादा, तुमच्या दैवी कार्याशी आम्ही जोडले गेलो हे आमचं महद्भाग्य! सर्व स्वाध्यायींना पू. दादाजींच्या जन्मदिनाबद्दल अर्थात मनुष्य गौरव दिनाच्या हार्दिक शुभेच्छा आणि जय योगेश्वर. – राजेन्द्र खेर/ सौ. सीमंतिनी खेर

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ज्योति अग्रवाल

20 सितम्बर 2018 वीरवार को पद्मा (जलझूलनी) एकादशी पर होगी श्री विष्णु के वामन रूप की पूजा

जानिए महत्व और पौराणिक व्रतकथा

युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! भाद्रपद शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए।

तब भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब पापों का नाश करने वाली, उत्तम वामन एकादशी का माहात्म्य मैं तुमसे कहता हूं तुम ध्यानपूर्वक सुनो।

यह पद्मा/परिवर्तिनी एकादशी, जयंती और जलझूलनी एकादशी भी कहलाती है। इसका व्रत करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी (वामन रूप की) पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं। अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें।

जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं। जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया। अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं।

भगवान के वचन सुनकर युधिष्ठिर बोले कि भगवान! मुझे अतिसंदेह हो रहा है कि आप किस प्रकार सोते और करवट लेते हैं तथा किस तरह राजा बलि को बांधा और वामन रूप रखकर क्या-क्या लीलाएं कीं? चातुर्मास के व्रत की क्या विधि है तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या कर्तव्य है। सो आप मुझसे विस्तार से बताइए।

श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! अब आप सब पापों को नष्ट करने वाली कथा का श्रवण करें।

त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था। वह मेरा परम भक्त था। विविध प्रकार के वेद सूक्तों से मेरा पूजन किया करता था और नित्य ही ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था, लेकिन इंद्र से द्वेष के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया।

इस कारण सभी देवता एकत्र होकर सोच-विचारकर भगवान के पास गए। बृहस्पति सहित इंद्रादिक देवता प्रभु के निकट जाकर और नतमस्तक होकर वेद मंत्रों द्वारा भगवान का पूजन और स्तुति करने लगे। अत: मैंने वामन रूप धारण करके पांचवां अवतार लिया और फिर अत्यंत तेजस्वी रूप से राजा बलि को जीत लिया।

इतनी वार्ता सुनकर राजा युधिष्ठिर बोले कि हे जनार्दन! आपने वामन रूप धारण करके उस महाबली दैत्य को किस प्रकार जीता?

श्रीकृष्ण कहने लगे- मैंने (वामन रूपधारी ब्रह्मचारी) बलि से तीन पग भूमि की याचना करते हुए कहा- ये मुझको तीन लोक के समान है और हे राजन यह तुमको अवश्य ही देनी होगी।

राजा बलि ने इसे तुच्छ याचना समझकर तीन पग भूमि का संकल्प मुझको दे दिया और मैंने अपने त्रिविक्रम रूप को बढ़ाकर यहां तक कि भूलोक में पद, भुवर्लोक में जंघा, स्वर्गलोक में कमर, मह:लोक में पेट, जनलोक में हृदय, यमलोक में कंठ की स्थापना कर सत्यलोक में मुख, उसके ऊपर मस्तक स्थापित किया।

सूर्य, चंद्रमा आदि सब ग्रह गण, योग, नक्षत्र, इंद्रादिक देवता और शेष आदि सब नागगणों ने विविध प्रकार से वेद सूक्तों से प्रार्थना की। तब मैंने राजा बलि का हाथ पकड़कर कहा कि हे राजन! एक पद से पृथ्वी, दूसरे से स्वर्गलोक पूर्ण हो गए। अब तीसरा पग कहां रखूं?

तब बलि ने अपना सिर झुका लिया और मैंने अपना पैर उसके मस्तक पर रख दिया जिससे मेरा वह भक्त पाताल को चला गया। फिर उसकी विनती और नम्रता को देखकर मैंने कहा कि हे बलि! मैं सदैव तुम्हारे निकट ही रहूंगा। विरोचन पुत्र बलि से कहने पर भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन बलि के आश्रम पर मेरी मूर्ति स्थापित हुई।

इसी प्रकार दूसरी क्षीरसागर में शेषनाग के पष्ठ पर हुई! हे राजन! इस एकादशी को भगवान शयन करते हुए करवट लेते हैं, इसलिए तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु का उस दिन पूजन करना चाहिए। इस दिन तांबा, चांदी, चावल और दही का दान करना उचित है। रात्रि को जागरण अवश्य करना चाहिए।

जो विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाकर चंद्रमा के समान प्रकाशित होते हैं और यश पाते हैं। जो पापनाशक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उनको हजार अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

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संजय गुप्ता

मित्रोआज गणेश चतुर्थी है, आपको आपके परिवार को इस पावन पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाएं!!!!!!

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं।
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

भावार्थ :विघ्नेश्वर, वर देनेवाले, देवताओं को प्रिय, लम्बोदर, कलाओंसे परिपूर्ण, जगत् का हित करनेवाले, गजके समान मुखवाले और वेद तथा यज्ञ से विभूषित पार्वतीपुत्र को नमस्कार है , हे गणनाथ ! आपको नमस्कार है ।

एक बार महादेवजी स्नान करने के लिए भोगावती गयें, उनके जाने के पश्चात माता पार्वतीजी ने अपने तन के मैल से एक पुतला बनाया और उसका नाम गणेश रखा, पार्वतीजी ने अपने पुत्र से कहा कि तुम एक मुगदल लेकर द्वार पर बैठ जाओ, मैं भीतर जाकर स्नान कर रही हूँ, जब तक मैं स्नान न कर लूं, तब तक तुम किसी भी पुरुष को भीतर मत आने देना।

भोगावती में स्नान करने के बाद जब भगवान् शिवजी आये तो गणेशजी ने उन्हें द्वार पर रोक लिया, इसे शिवजी ने अपना अपमान समझा और क्रोधित होकर उनका सिर धड़ से अलग करके भीतर चले गयें, पार्वतीजी ने उन्हें नाराज देखकर समझा कि भोजन में विलंब होने के कारण महादेवजी नाराज हैं।

इसलिये उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर शिवजी को बुलाया, तब दूसरा थाल देखकर तनिक आश्चर्यचकित होकर शिवजी ने पूछा देवी! यह दूसरा थाल किसके लिये है? पार्वतीजी बोलीं पुत्र गणेश के लिये है, जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है, यह सुनकर शिवजी और अधिक आश्चर्यचकित हुयें, तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है? हाँ नाथ! क्या आपने उसे देखा नहीं?

शिवजी ने कहाँ- देखा तो था, किन्तु मैंने तो अपने रोके जाने पर उसे कोई उद्दण्ड बालक समझकर उसका सिर काट दिया, यह सुन पार्वतीजी बहुत दुःखी हुईं और वे विलाप करने लगीं, तब पार्वतीजी को प्रसन्न करने के लिये भगवान् शिवजी ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया, पार्वतीजी इस प्रकार पुत्र गणेश को पाकर बहुत प्रसन्न हुई।

उन्होंने पति तथा पुत्र को प्रीतिपूर्वक भोजन कराकर बाद में स्वयं भोजन किया, यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुई थी, इसीलिये यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है, सज्जनों! भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को रात्रि में चन्द्र-दर्शन (चन्द्रमा देखने को) निषिद्ध किया गया है, जो व्यक्ति इस रात्रि को चन्द्रमा को देखते हैं उन्हें झूठा-कलंक प्राप्त होता है।

ऐसा शास्त्रों का निर्देश है, यह अनुभूत भी है, इस गणेश चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन करने वाले व्यक्तियों को उक्त परिणाम अनुभूत होते हैं इसमें संशय नहीं है, यदि जाने-अनजाने में चन्द्रमा दिख भी जाये तो इस मंत्र का पाठ अवश्य कर लेना चाहिये।

सिहः प्रसेनम्‌ अवधीत्‌, सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्वमन्तकः।।

भगवान् श्री गणेशजी हिन्दुओं के आदि आराध्य देव है, हिन्दू धर्म में गणेशजी को एक विशष्टि स्थान प्राप्त है, कोई भी धार्मिक उत्सव हो, यज्ञ, पूजन इत्यादि सत्कर्म हो या फिर विवाहोत्सव हो, निर्विध्न कार्य सम्पन्न हो इसलिये शुभ के रूप में गणेशजी की पूजा सबसे पहले की जाती है, यह मनुष्यों के लिये ही नहीं, बल्कि देवताओं के लिये भी जरूरी है।

वक्रतुण्ड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्न कुरुमेदेव सर्वकार्य सर्वदा।।

भाई-बहनों! श्री गणपति बप्पा आज आप सभी के लिए ढेरों खुशीया लेकर आवे, पूरा वर्ष आपका खुशीयों भरा एवम् आनन्दमय हो, श्री गणेश चतुर्थी पर्व एवम् गणेश उत्सव के पावन अवसर पर आप सभी को बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनायें, .विध्न विनाशक गौरीनंदन प्रथमपूज्य श्री गणेशजी रिद्दी-सिद्दी, लाभ-शुभ सहित आपके घर आँगन पधारें और आपके जीवन में आनंद की वृद्धि करें, गणेश उत्सव की आपको और आपके समस्त परिवार को हार्दिक सुभकामनाये।

ॐ गं गणपतये नमः
जय श्री गणेश!

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हरतालिका तीज (गौरी तृतीया) व्रत

ज्योति अग्रवाल
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हरतालिका तीज का व्रत हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा व्रत माना जाता हैं। यह तीज का त्यौहार भाद्रपद मास शुक्ल की तृतीया तिथि को मनाया जाता हैं। खासतौर पर महिलाओं द्वारा यह त्यौहार मनाया जाता हैं। कम उम्र की लड़कियों के लिए भी यह हरतालिका का व्रत श्रेष्ठ समझा गया हैं।
विधि-विधान से हरितालिका तीज का व्रत करने से जहाँ कुंवारी कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है, वहीं विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य मिलता है.

हरतालिका तीज में भगवान शिव, माता गौरी एवम गणेश जी की पूजा का महत्व हैं। यह व्रत निराहार एवं निर्जला किया जाता हैं। शिव जैसा पति पाने के लिए कुँवारी कन्या इस व्रत को विधि विधान से करती हैं।

हरितालिका तीज भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन मनाया जाता है. यह आमतौर पर अगस्त – सितम्बर के महीने में ही आती है. इसे गौरी तृतीया व्रत भी कहते है. इस वर्ष कल 12 सितम्बर 2018, दिन बुधवार को मनाई जाएगी।

महिलाओं में संकल्प शक्ति बढाता है हरितालिका तीज का व्रत
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हरितालिका तीज का व्रत महिला प्रधान है।इस दिन महिलायें बिना कुछ खायें पिये व्रत रखती है।यह व्रत संकल्प शक्ती का एक अनुपम उदाहरण है। संकल्प अर्थात किसी कर्म के लिये मन मे निश्चित करना कर्म का मूल संकल्प है।इस प्रकार संकल्प हमारी अन्तरीक शक्तियोंका सामोहिक निश्चय है।इसका अर्थ है-व्रत संकल्प से ही उत्पन्न होता है।व्रत का संदेश यह है कि हम जीवन मे लक्ष्य प्राप्ति का संकल्प लें ।संकल्प शक्ति के आगे असंम्भव दिखाई देता लक्ष्य संम्भव हो जाता है।माता पार्वती ने जगत को दिखाया की संकल्प शक्ति के सामने ईश्वर भी झुक जाता है।
अच्छे कर्मो का संकल्प सदा सुखद परिणाम देता है। इस व्रत का एक सामाजिक संदेश विषेशतः महिलाओं के संदर्भ मे यह है कि आज समाज मे महिलायें बिते समय की तुलना मे अधिक आत्मनिर्भर व स्वतंत्र है।महिलाओं की भूमिका मे भी बदलाव आये है ।घर से बाहर निकलकर पुरुषों की भाँति सभी कार्य क्षेत्रों मे सक्रिय है।ऎसी स्थिति मे परिवार व समाज इन महिलाओं की भावनाओ एवं इच्छाओं का सम्मान करें,उनका विश्वास बढाएं,ताकि स्त्री व समाज सशक्त बनें।

हरतालिका तीज व्रत विधि और नियम
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हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं। प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय। हरतालिका पूजन के लिए शिव, पार्वती, गणेश एव रिद्धि सिद्धि जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से बनाई जाती हैं।
विविध पुष्पों से सजाकर उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक अष्टदल बनाकर उस पर थाल रखते हैं। उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं। सभी प्रतिमाओ को केले के पत्ते पर रखा जाता हैं। सर्वप्रथम कलश के ऊपर नारियल रखकर लाल कलावा बाँध कर पूजन किया जाता हैं कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प चढ़ाकर विधिवत पूजन होता हैं। कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं।

उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं। तत्पश्चात माता गौरी की पूजा की जाती हैं। उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद अन्य देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है।

इसके बाद हरतालिका व्रत की कथा पढ़ी जाती हैं। इसके पश्चात आरती की जाती हैं जिसमे सर्वप्रथम गणेश जी की पुनः शिव जी की फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं। इस दिन महिलाएं रात्रि जागरण भी करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है। आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है। हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता।

प्रातः अन्तिम पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं। ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं।

भगवती-उमा की पूजा के लिए ये मंत्र बोलना चाहिए 👇

ऊं उमायै नम:
ऊं पार्वत्यै नम:
ऊं जगद्धात्र्यै नम:
ऊं जगत्प्रतिष्ठयै नम:
ऊं शांतिरूपिण्यै नम:
ऊं शिवायै नम:

भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करनी चाहिए 👇

ऊं हराय नम:
ऊं महेश्वराय नम:
ऊं शम्भवे नम:
ऊं शूलपाणये नम:
ऊं पिनाकवृषे नम:
ऊं शिवाय नम:
ऊं पशुपतये नम:
ऊं महादेवाय नम:

निम्न नामो का उच्चारण कर बाद में पंचोपचार या सामर्थ्य हो तो षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है। पूजा दूसरे दिन सुबह समाप्त होती है, तब महिलाएं द्वारा अपना व्रत तोडा जाता है और अन्न ग्रहण किया जाता है।

हरतालिका व्रत पूजन की सामग्री
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1 फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता है।

2- गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत।

3- केले का पत्ता।

4- विविध प्रकार के फल एवं फूल पत्ते।

5- बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, तुलसी मंजरी।

6- जनेऊ , नाडा, वस्त्र,।

7- माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामग्री, जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहँदी आदि एकत्र की जाती हैं। इसके अलावा बाजारों में सुहाग पूड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं।

8- घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, नारियल, कलश।

9- पञ्चामृत – घी, दही, शक्कर, दूध, शहद।

हरतालिका तीज व्रत कथा
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भगवान शिव ने पार्वतीजी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी।

श्री भोलेशंकर बोले- हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इतनी अवधि तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबा कर व्यतीत किए। माघ की विक्राल शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश करके तप किया। वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए समय व्यतीत किया।

तुम्हारे पिता तुम्हारी कष्ट साध्य तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। उन्हें बड़ा क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने हृदय से अतिथि सत्कार करके उनके आने का कारण पूछा।

नारदजी ने कहा- गिरिराज! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी राय जानना चाहता हूं।

नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्‍गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश ही दूर हो गए। प्रसन्नचित होकर वे बोले- श्रीमान्‌! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात ब्रह्म हैं। हे महर्षि! यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे।

तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार सुनाया। मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा।

तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया – मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिवशंकर का वरण किया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं। अब क्या करूं? प्राण छोड़ देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं बचा है। तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी।

उसने कहा- सखी! प्राण त्यागने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के मौके पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है। मैं तुम्हें घनघोर जंगल में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे।

तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर पर न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गई। मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।

इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन थीं। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया। रात भर मेरी स्तुति के गीत गाकर जागीं। तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई। मैं तुरंत तुम्हारे समक्ष जा पहुंचा और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुमसे वर मांगने के लिए कहा।

तब अपनी तपस्या के फलस्वरूप मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा – मैं हृदय से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर आप यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए।

तब मैं ‘तथास्तु’ कह कर कैलाश पर्वत पर लौट आया। प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारणा किया। उसी समय अपने मित्र-बंधु व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे और तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या का कारण तथा उद्देश्य पूछा। उस समय तुम्हारी दशा को देखकर गिरिराज अत्यधिक दुखी हुए और पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए थे।

तुमने उनके आंसू पोंछते हुए विनम्र स्वर में कहा- पिताजी! मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का उद्देश्य केवल यही था कि मैं महादेव को पति के रूप में पाना चाहती थी। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं। आप क्योंकि विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निर्णय ले चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर छोड़कर चली आई। अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घर जाऊंगी कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से न करके महादेवजी से करेंगे।

गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए। कुछ समय के पश्चात शास्त्रोक्त विधि-विधानपूर्वक उन्होंने हम दोनों को विवाह सूत्र में बांध दिया।

हे पार्वती! भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका। इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली कुंआरियों को मनोवांछित फल देता हूं। इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी एकनिष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए।

हरितालका तीज पूजा मुहूर्त
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11 सितम्बर की शाम 6 बजकर 4 मिनट से तीज लग जाएगी इसलिए व्रत रखने वाली महिलाएं और लड़कियां इससे पहले ही सरगी कर लें। यह निर्जला उपवास रखा जाता है।

तृतीया तिथि प्रारंभ: 11 सितंबर 2018 को शाम 6 बजकर 4 मिनट.

तृतीया तिथि समाप्‍त: 12 सितंबर 2018 को शाम 4 बजकर 7 मिनट.

प्रात: काल हरतालिका पूजा मुहूर्त: 12
सितंबर 2018 की सुबह 6 बजकर 15 मिनट से सुबह 8 बजकर 42 मिनट तक।

वैसे तो हरितालिका पूजन प्रदोष काल मे किया जाता है लेकिन इस वर्ष तृतीया तिथि प्रदोषकाल में व्याप्त ना होने और पूजा आदि का महत्त्व व्याप्त तिथि में ही होने के कारण पूजन प्रातःकाल में ही किया जाएगा। प्रात काल मे सुविधा ना होने पर सायं 4 बजकर 7 मिनट से पहले ही समाप्त कर लें पारण अगले दिन प्रातः काल ही होगा।

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ऋषि पञ्चमी सितम्बर 14 विशेष

ज्योति अग्रवाल

“भाद्रपद शुक्ल ऋषि पंचमी अनुष्ठान”

(पुरुषों की तरह- ‘ऋषि पंचमी व्रत’
स्त्रियों को भी करना चाहिए)

“ऋषि पञ्चमी” व्रत भाद्रपद शुक्ल
पंचमी को सम्पादित होता है।

“ऋषि पंचमी”
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व्रत जाने अन्जाने मे हुये पापों के
प्रक्षालन के लिये किया जाता है। यदि
पंचमी तिथि चतुर्थी एवं षष्टी से संयुक्त
हो तो ऋषि पंचमी का व्रत चतुर्थी से
संयुक्त पंचमी को किया जाता है,
न कि षष्ठीयुक्त पंचमी को। कई समाज इस दिन “रक्षाबंधन” भी करतें हैं।

“ऋषि पंचमी महामहोत्सव” के पावन पर्व पर- ॐसप्तर्षि एवं अरुंधतिॐ को-
एवं “श्रीगर्ग अंगीराऋषि जयन्ती” पर-
श्रद्धा पूर्वक समस्त ऋषियों को-
“सादर नमन” करते हुए, आप सभी को- “हार्दिक शुभकामनाएं”!!!

ऋषि मन्त्र द्रष्टा, मन्त्र स्रष्टा और
युग सृजेता होते हैं। समाज में जो
भी उत्तम प्रचलन, प्रथा-परम्पराएं हैं,
उनके प्रेरणा स्रोत ऋषिगण ही हैं।
इन्होंने विभिन्न विषयों पर महत्त्वपूर्ण
शोध किए हैं।
यथा-व्यासजी ने गहन वेद ज्ञान को
सुबोध्य पुराण ज्ञान के रूप में रूपान्तरित
कर ज्ञानार्जन का मार्ग प्रशस्त किया।
चरक, सुश्रुतादि आयुर्विज्ञान पर
अनुसन्धान किए।
जमदग्रि-याज्ञबल्क्य यज्ञ विज्ञान पर
शोध प्रयोग किये। वशिष्ठ ने ब्रह्मविद्या
व राजनीति विज्ञान तथा विश्वामित्र ने
गायत्री महाविद्या का रहस्योद्घाटन
किया। नारद जी ने भक्ति साधना के
अनमोल सूत्र दिए। पर्शुराम ने
ऊंच-नीचादि जातिगत भेद-वैमनष्य
का निराकरण किया। भगीरथ ने
जल विज्ञान की महत्ता को समझकर
धरती पर गंगावतरण का पुनीत
पुरुषार्थ किया। पतंजलि ने योग
विज्ञान की विविध साधना मार्ग
प्रस्तुत किए। अन्य ऋषियों ने भी
व्यापक समाज हित के कार्य किए
हैं जिनका मानव जाति सदा ऋणी
रहेगी। ये सभी ऋषि भारतीय
संस्कृति के उन्नायक, युग सृजेता,
मुक्तिमार्ग का पथ प्रदर्शक, राष्ट्रधर्म
के संरक्षक, व्यष्टि-समष्टि की
समस्त गति, प्रगति और सद्गति के
उद्गाता हैं। संसार के तमाम रहस्यमय
विद्याओं की खोज, उन पर प्रयोग,
समाज में सत्पात्रों को उनकी
शिक्षा दीक्षा, उनकी सहायता से
अभिनव समाज निर्माण जैसे
महत्त्वपूर्ण कार्य सब इन महान
ऋषियों की ही देन हैं।

“भाद्रपद शुक्ल ऋषि पंचमी अनुष्ठान”
व्रत के दिन व्रत करने वाले को गंगा,
नर्मदा या किसी अन्य नदी अथवा सरोवर
तालाब में स्नान करना चाहिये, यदि यह
सम्भव न हो तो घर के पानी में गंगाजल
मिलाकर स्नान करना चाहिये। ‘तर्पण’
तथा आह्लिक कृत्य करने के उपरान्त
अग्निहोत्र शाला में जाना चाहिए,
तत्पश्चात पुजाघर या घर में पूर्व की
ओर एक साफ-सुथरे स्थान को गोबर
से लीपकर तांबे का जल भरा कलश
रखकर वेदी बनाकर उस पर विविध
रंगों से अष्टदल कमल का चित्रण बनाएँ।
पूजा स्थान में आकर पंचगव्य ग्रहण
करें। चोकी पर नवीन वस्त्र बिछाकर
गणेश, गौरी, षोडश मातृका, नवग्रह
मंडल, सर्वतोभद्र मंडल बनाकर ताम्र,
स्वर्ण या मिट्टी का कलश स्थापित करें।
कलश के पास ही अष्टदल कमल पर
“सप्त ऋषि”- गौतम, भारद्वाज, विश्वामित्र, जमदग्नि, वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि।
इन सप्तर्षियों सहित देवी अरुंधती की
स्थापना करें। चोकी पर एक ओर पूजा
के निमित्त यज्ञोपवीत को भी स्थापित
करें। देवताओं सहित सप्तर्षियों,
अरुंधती आदि का षोडशोपचार
पूजन करें। सबसे महान कार्य होता है।
प्रत्येक जीव-जंतु और मानव की रक्षा
करना। अरुंधति महान तपस्वीनी थी।
अरुंधति ऋषि वसिष्ठ की पत्नी थी।
आज भी अरुंधति सप्तर्षि मंडल में
स्थित वसिष्ठ के पास ही दिखाई
देती हैं।उसके बाद सप्त ऋषियों
की प्रतिमाओं को पंचामृत में
नहलाना चाहिए, उन पर चन्दन लेप,
कपूर लगाना चाहिए, पुष्पों, सुगन्धित
पदार्थों, धूप, दीप, श्वेत वस्त्रों,
यज्ञोपवीतों, अधिक मात्रा में नैवेद्य
से पूजन करना चाहिए। और मन्त्रों
के साथ अर्ध्य चढ़ाना चाहिए।

“अर्घ्यमन्त्र”
“कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो
विश्वामित्रोय गौतम:।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च
सप्तैते ऋषय: स्मृता:॥
गृह्णन्त्वर्ध्य मया दत्तं
तुष्टा भवत मे सदा॥”

मासिक धर्म के समय लगे पाप से
छुटकारा पाने के लिए यह व्रत स्त्रियों
द्वारा भी किया जाना चाहिए।
इस व्रत में ब्रह्मचर्य का पालन किया
जाता है। इसके करने से सभी पापों एवं
तीनों प्रकार के दु:खों से छुटकारा मिलता
है तथा सौभाग्य की वृद्धि होती है। जब
नारी इसे सम्पादित करती है तो उसे
आनन्द, सुख, शान्ति एवं सौन्दर्य, तथा
पुत्रों एवं पौत्रों की प्राप्ति होती है।।

व्रतार्क, व्रतराज आदि ने भविष्योत्तर
से उद्धृत कर बहुत-सी बातें लिखी हैं !!
जहाँ कृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनायी
गयी एक कथा भी है। जब इन्द्र ने
त्वष्टा के पुत्र वृत्र का हनन किया तो
उन्हें ब्रह्महत्या का अपराध लगा। उस
पाप को चार स्थानों में बाँटा गया, यथा
*अग्नि (धूम से मिश्रित प्रथम ज्वाला में),
*नदियाँ (वर्षाकाल के पंकिल जल में),
*पर्वत (जहाँ गोंद वाले वृक्ष उगते हैं)
में तथा *स्त्रियों को (रजस्वला) में।
अत: मासिक धर्म के समय लगे
पाप से छुटकारा पाने के लिए यह
व्रत स्त्रियों द्वारा किया जाना चाहिए।

इसका संकल्प यह है-
“अहं ज्ञानतोऽज्ञानतो वा
रजस्वलावस्यायां
कृतसंपर्कजनितदोष
परिहारार्थमृषिपञ्चमी
व्रतं करिष्ये।”

ऐसा संकल्प करके अरून्धती
के साथ सप्तर्षियों की पूजा
करनी चाहिए।

इस दिन प्रायः दही और साठी का
चावल खाने का विधान है। नमक का
प्रयोग सर्वथा वर्जित है। हल से जुते
हुए खेत का अन्न खाना वज्र्य है।
दिन में केवल एक ही बार भोजन
करना चाहिए। कलश आदि पूजन
सामग्री को ब्राह्मण को दान कर देना
चाहिए। पूजन के पश्चात् ब्राह्मण भोजन कराकर ही स्वयं प्रसाद पाना चाहिए।
ऋषियों की वंशावली एवं ‘कथा’ श्रवण
करने का भी विधान है। सप्तर्षियों
की प्रसन्नता हेतु ब्राह्मणों को विभिन्न
प्रकार के दान-दक्षिणा देकर संतुष्ट
करना चाहिए।

व्रत कथा
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एक साहूकार साहुकारनी थे। साहुकारनी रजस्वला होकर रसोई के सब काम करती थी। कुछ समय बाद उसके एक पुत्र हुआ। पुत्र का विवाह हो गया। साहूकार ने अपने घर एक ऋषि महाराज को भोजन पर बुलाया। ऋषि महाराज ने कहा मैं बारह वर्ष में एक बार खाना खाता हूँ। पर साहूकार ने महाराज को मना लिया। साहूकार ने पत्नी से कहा आज ऋषि महाराज भोजन पर आयेंगे। उस समय स्त्री रजस्वला थी उसने भोजन बनाया और ऋषि को भोजन परोसते ही भोजन कीड़ो में बदल गया यह देख ऋषि ने साहूकार साहुकारनी को श्राप दे दिया , की तू अगले जन्म में कुतिया बनेगी और तू बैल बनेगा। साहूकार ने ऋषि के पांव पकड़ बहुत विनती की तब ऋषि ने कहा तेरे घर में ऐसी कोई वस्तु हैं क्या जिस को तेरी पत्नी की नजर नहीं पड़ी , नहीं छुआ। तब साहूकार ने छिके पर दही पड़ा था ऋषि को पिलाया।

ऋषि हिमालय पर तपस्या के लिए चले गये ।साहूकार साहुकरनी की मृत्यु हो गई श्राप वश साहूकार बैल बन गया और साहुकारनी कुतिया बन गई। दोनों अपने बेटे के घर पर रहने लगे। साहूकार का बेटा बैल से बहुत काम लेता खेत जोतता , खेत की सिचाई करता। कुतिया घर की चौकीदारी करती।

एक वर्ष बीत गया उस लडके के पिता का श्राद्ध आया। श्राद्ध के दिन अनेक पकवान बनाये खीर भी बनाई थी। एक उडती हुई चील के मुहं का सर्प उस खीर में गिर गया यह वहाँ बैठी कुतिया ने देख लिया। कुतिया ने सोचा यदि इस खीर को लोग खायेगे तो मर जायेंगे जब उसकी बहूँ देख रही थी कुतिया ने खीर में मुंह डाल दिया क्रोध में आकर बेटे बहूँ ने बहुत मारा।

जब रात हुई तो कुतिया बैल के पास जाकर रोने लगी बोली आज तुम्हारा श्राद्ध था बहुत पकवान मिले होंगे तब बैल ने कहा आज खेत पर बहुत काम था और खाना भी नही मिला कुतिया ने भी अपनी आप बीती बता दी और कहा आज बेटे बहूँ ने बहुत मारा यह सारी बाते बेटे ने सुन ली बेटे ने बहुत बड़े बड़े ऋषि मुनियों को बुलाया ऋषि मुनियों को सारी बात बताई तब ऋषि मुनियों ने कहा “ तुम्हारे यहाँ जो कुतिया हैं वह तुम्हारी माँ हैं और बैल रूप में तुम्हारे पिता हैं। तब लडके ने माता पिता को इस योनी से किस प्रकार मुक्ति मिलेगी इसका उपाय पूछा तब ऋषियों ने कहा ! ऋषि पंचमी को ऋषियों का पूजन कर उस ब्राह्मण भोज का पूण्य इन्हें मिले तथा ऋषिगण अपना आशीर्वाद दे। व्रत के पुण्य से तुम्हारे माता पिता इस योनी से मुक्त होकर स्वर्ग में स्थान प्राप्त करेंगे। उसने ऐसा ही किया और स्वर्ग से विमान आया और उस लडके के माता पिता को मोक्ष प्राप्त हुआ।

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आज है ऋषि पंचमी – जानिए पूजन का शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व –

संजय गुप्ता
भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी ऋषि पंचमी के रुप में मनाई जाती है. इस व्रष ऋषि पंचमी व्रत 14 सितंबर 2018, यानि आज है. ऋषि पंचमी का व्रत सभी के लिए फल दायक होता है. इस व्रत को श्रद्धा व भक्ति के साथ मनाया जाता है. आज के दिन ऋषियों का पूर्ण विधि-विधान से पूजन कर कथा श्रवण करने का बहुत महत्व होता है. यह व्रत पापों का नाश करने वाला व श्रेष्ठ फलदायी है. यह व्रत और ऋषियों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता, समर्पण एवं सम्मान की भावना को प्रदर्शित करने का महत्वपूर्ण आधार बनता है.

★ऋषि पंचमी पूजन | Rishi Panchami Puja Rituals :
पूर्वकाल में यह व्रत समस्त वर्णों के पुरुषों के लिए बताया गया था, किन्तु समय के साथ साथ अब यह अधिकांशत: स्त्रियों द्वारा किया जाता है. इस दिन पवित्र नदीयों में स्नान का भी बहुत महत्व होता है. सप्तऋषियों की प्रतिमाओं को स्थापित करके उन्हें पंचामृत में स्नान करना चाहिए. तत्पश्चात उन पर चन्दन का लेप लगाना चाहिए, फूलों एवं सुगन्धित पदार्थों, धूप, दीप, इत्यादि अर्पण करने चाहिए तथा श्वेत वस्त्रों, यज्ञोपवीतों और नैवेद्य से पूजा और मन्त्र जाप करना चाहिए.

★ऋषि पंचमी पूजन का शुभ मुहूर्त :
*दिन: 14 सितंबर, शुक्रवार।
*सुबह 11:09 से दोपहर 1 बजकर 35 मिनट तक
*सप्त ऋषियों पूजन के लिए 2 घंटे 24 मिनट तक ही पूजा का मुहूर्त होने से इस समय पूजन करना अति शुभ है।

★ऋषि पंचमी कथा प्रथम | Rishi Panchami Katha :
एक समय विदर्भ देश में उत्तक नाम का ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी के साथ निवास करता था. उसके परिवार में एक पुत्र व एक पुत्री थी. ब्राह्मण ने अपनी पुत्री का विवाह अच्छे ब्राह्मण कुल में कर देता है परंतु काल के प्रभाव स्वरुप कन्या का पति अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है, और वह विधवा हो जाती है तथा अपने पिता के घर लौट आती है. एक दिन आधी रात में लड़की के शरीर में कीड़े उत्पन्न होने लगते है़

अपनी कन्या के शरीर पर कीड़े देखकर माता पिता दुख से व्यथित हो जाते हैं और पुत्री को उत्तक ॠषि के पास ले जाते हैं. अपनी पुत्री की इस हालत के विषय में जानने की प्रयास करते हैं. उत्तक ऋषि अपने ज्ञान से उस कन्या के पूर्व जन्म का पूर्ण विवरण उसके माता पिता को बताते हैं और कहते हैं कि कन्या पूर्व जन्म में ब्राह्मणी थी और इसने एक बार रजस्वला होने पर भी घर बर्तन इत्यादि छू लिये थे और काम करने लगी बस इसी पाप के कारण इसके शरीर पर कीड़े पड़ गये हैं.

शास्त्रों के अनुसार रजस्वला स्त्री का कार्य करना निषेध है परंतु इसने इस बात पर ध्यान नहीं दिया और इसे इसका दण्ड भोगना पड़ रहा है. ऋषि कहते हैं कि यदि यह कन्या ऋषि पंचमी का व्रत करे और श्रद्धा भाव के साथ पूजा तथा क्षमा प्रार्थना करे तो उसे अपने पापों से मुक्ति प्राप्त हो जाएगी. इस प्रकार कन्या द्वारा ऋषि पंचमी का व्रत करने से उसे अपने पाप से मुक्ति प्राप्त होती है.

एक अन्य कथा के अनुसार यह कथा श्री कृष्ण ने युधिष्ठर को सुनाई थी. कथा अनुसार जब वृजासुर का वध करने के कारण इन्द्र को ब्रह्म हत्या का महान पाप लगा तो उसने इस पाप से मुक्ति पाने के लिए ब्रह्मा जी से प्रार्थना की. ब्रह्मा जी ने उस पर कृपा करके उस पाप को चार बांट दिया था जिसमें प्रथम भाग अग्नि की ज्वाला में, दूसरा नदियों के लिए वर्ष के जल में, तीसरे पर्वतों में और चौथे भाग को स्त्री के रज में विभाजित करके इंद्र को शाप से मुक्ति प्रदान करवाई थी. इसलिए उस पाप को शुद्धि के लिए ही हर स्त्री को ॠषि पंचमी का व्रत करना चाहिए.
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