Posted in हिन्दू पतन

महाभारत से पहले कृष्ण भी गए थे दुर्योधन के दरबार में. यह प्रस्ताव लेकर, कि हम युद्ध नहीं चाहते….
तुम पूरा राज्य रखो…. पाँडवों को सिर्फ पाँच गाँव दे दो…
वे चैन से रह लेंगे, तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे.

बेटे ने पूछा – “पर इतना unreasonable proposal लेकर कृष्ण गए क्यों थे ?
अगर दुर्योधन प्रोपोजल एक्सेप्ट कर लेता तो..?

पिता :- नहीं करता….!
कृष्ण को पता था कि वह प्रोपोजल एक्सेप्ट नहीं करेगा…

उसके मूल चरित्र के विरुद्ध था.

फिर कृष्ण ऐसा प्रोपोजल लेकर गए ही क्यों थे..?

वे तो सिर्फ यह सिद्ध करने गए थे कि दुर्योधन कितना अनरीजनेबल, कितना अन्यायी था.

वे पाँडवों को सिर्फ यह दिखाने गए थे,
कि देख लो बेटा…
युद्ध तो तुमको लड़ना ही होगा… हर हाल में…
अब भी कोई शंका है तो निकाल दो….मन से.
तुम कितना भी संतोषी हो जाओ,
कितना भी चाहो कि “घर में चैन से बैठूँ “…

दुर्योधन तुमसे हर हाल में लड़ेगा ही.

“लड़ना…. या ना लड़ना” – तुम्हारा ऑप्शन नहीं है…”

फिर भी बेचारे अर्जुन को आखिर तक शंका रही…
“सब अपने ही तो बंधु बांधव हैं….”😞

कृष्ण ने सत्रह अध्याय तक फंडा दिया…फिर भी शंका थी..

ज्यादा अक्ल वालों को ही ज्यादा शंका होती है ना 😄

दुर्योधन को कभी शंका नहीथी
उसे हमेशा पता था कि “उसे युद्ध करना ही है… “उसने गणित लगा रखा था….

हिन्दुओं को भी समझ लेना होगा कि :-
“कन्फ्लिक्ट होगा या नहीं,
यह आपका ऑप्शन नहीं है…

आपने तो पाँच गाँव का प्रोपोजल भी देकर देख लिया…

देश के दो टुकड़े मंजूर कर लिए,

(उस में भी हिंदू ही खदेड़ा गया अपनी जमीन जायदाद ज्यों की त्यों छोड़कर….)

हर बात पर विशेषाधिकार देकर देख लिया….

हज के लिए सबसीडी देकर देख ली,

उनके लिए अलग नियम
कानून (धारा 370) बनवा कर देख लिए…

“आप चाहे जो कर लीजिए, उनकी माँगें नहीं रुकने वाली”

उन्हें सबसे स्वादिष्ट उसी गौमाता का माँस लगेगा जो आपके लिए पवित्र है,
उसके बिना उन्हें भयानक कुपोषण हो रहा है.

उन्हें “सबसे प्यारी” वही मस्जिदें हैं,
जो हजारों साल पुराने “आपके” ऐतिहासिक मंदिरों को तोड़ कर बनी हैं….
उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी उसी आवाज से है
जो मंदिरों की घंटियों और पूजा-पंडालों से है.

ये माँगें गाय को काटने तक नहीं रुकेंगी…
यह समस्या मंदिरों तक नहीं रहने वाली,
यह 15-20 साल में हमारे घर तक आने वाली है…
हमारी बहू-बेटियों और जायदाद तक जाने वाली है…जो पुराने इतिहास में हुआ था
आज का तर्क है:-
तुम्हें गाय इतनी प्यारी है तो सड़कों पर क्यों घूम रही है ?
हम तो काट कर खाएँगे….
हमारे मजहब में लिखा है !

कल कहेंगे,
“तुम्हारी बेटी की इतनी इज्जत है तो वह अपना *खूबसूरत चेहरा ढके बिना घर से निकलती ही क्यों है ?

हम तो उठा कर ले जाएँगे.”

उन्हें समस्या गाय से नहीं है,
हमारे “अस्तित्व” से है.

तुम जब तक हो,
उन्हें कुछ ना कुछ प्रॉब्लम रहेगी.

इसलिए हे अर्जुन,
और डाउट मत पालो
कृष्ण घंटे भर की क्लास बार-बार नहीं लगाते..

25 साल पहले कश्मीरी हिन्दुओं का सब कुछ छिन गया….. वे शरणार्थी कैंपों में रहे, पर फिर भी वे आतंकवादी नहीं बनते….

जबकि कश्मीरी मुस्लिमों को सब कुछ दिया गया….
वे फिर भी आतंकवादी बन कर जन्नत को जहन्नुम बना रहे हैं ।

पिछले साल की बाढ़ में सेना के जवानों ने जिनकी जानें बचाई वो आज उन्हीं जवानों को पत्थरों से कुचल डालने पर आमादा हैं….

इसे ही कहते हैं संस्कार…..
ये अंतर है “धर्म” और “मजहब” में..!!

एक जमाना था जब लोग मामूली चोर के जनाजे में शामिल होना भी शर्मिंदगी समझते थे….

और एक ये गद्दार और देशद्रोही लोग हैं जो खुले आम… पूरी बेशर्मी से एक आतंकवादी के जनाजे में शामिल हैं..!

सन्देश साफ़ है,,,
एक कौम,
देश और तमाम दूसरी कौमों के खिलाफ युद्ध छेड़ चुकी है….
अब भी अगर आपको नहीं दिखता है तो…
यकीनन आप अंधे हैं !
या फिर शत प्रतिशत देश के गद्दार..!!

आज तक हिंदुओं ने किसी को हज पर जाने से नहीं रोका…
लेकिन हमारी अमरनाथ यात्रा हर साल बाधित होती है !
फिर भी हम ही असहिष्णु हैं…..?
ये तो कमाल की धर्मनिरपेक्षता है भाई

🌹 🙏 🙏 🌹

Posted in हिन्दू पतन

असम में एक ईसाई धर्मप्रचारक भेजे गए थे,
नाम था फादर क्रूज़
इन्हें असम के एक प्रभावशाली परिवार के लड़के को घर आकर अंग्रेजी पढ़ाने का अवसर मिला,
पादरी साहब धीरे-धीरे घर का निरीक्षण करने लगे,
उन्हें पता चल गया कि, बच्चे की दादी इस घर में सबसे प्रभाव वाली हैं,
इसलिए उनको यदि ईसा की शिक्षाओं के जाल में फंसाया जाए तो,
उनके माध्यम से पूरा परिवार
और फिर पूरा गा़व ईसाई बनाया जा सकता है!
पादरी साहब दादी मां को बताने लगे
कैसे ईसा कोढ़ी का कोढ़ ठीक कर देते थे,
कैसे वो नेत्रहीनों को नेत्र ज्योति देते थे, आदि-आदि !
दादी ने कहा, बेटा, हमारे “राम-कृष्ण” के चमत्कारों के आगे तो कुछ भी नहीं ये सब !
तुमने सुना है कि हमारे राम ने एक पत्थर का स्पर्श किया तो
वो जीवित स्त्री में बदल गई
राम जी के नाम के प्रभाव से पत्थर भी तैर जाता था पानी में,आज भी तैर रहे है
पादरी साहब खामोश हो जाते पर प्रयास जारी रखते अपना !
एक दिन पादरी साहब चर्च से केक लेकर आ गए और दादी को खाने को दिया,
पादरी साहब को विश्वास था कि दादी न खायेंगी
पर उसकी आशा के विपरीत दादी ने केक लिया और खा गई !
पादरी साहब आंखों में गर्वोक्त उन्माद भरे अट्टहास कर उठे,
दादी तुमने चर्च का प्रसाद खा लिया !
अब तुम ईसाई हो ,
दादी ने पादरी साहब के कान खींचते हुए कहा,
वाह रे गधे !
मुझे एक दिन केक खिलाया
तो मैं ईसाई हो गई
और मैं जो प्रतिदिन तुमको अपने घर का खिलाती ह़ू ,
तो तू हिन्दू क्यों नहीं हुआ ?
तू तो प्रतिदिन सनातन धर्म की इस आदि भूमि का
वायु ,जल लेता है
फिर तो तेरा रोम-रोम हिन्दू बन जाना चाहिए!

अपने स्वधर्म और
राष्ट्र को पथभ्रष्ट होने और
गलत दिशा में जाने से बचाने वाली
ये दादी मां थी
असम की
सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी “कमला देवी हजारिका

कौन जानता है इनको असम से बाहर ?
क्या हमारा कर्तव्य नहीं है कि, देश इनके बारे में जाने ?

साभार-अभिजीत सिंह

Posted in हिन्दू पतन

From FB Wall of Jitendra singh

गांधी का हिंदुत्व से नफरत

मैं जो यह लिख रहा हूं उस सब का प्रमाणित लिंक साथ ही वीर अर्जुन अखबार का लिंक और पूरा लेख कमेंट बॉक्स में है आप विस्तार से वहां पढियेगा क्योंकि बहुत ज्यादा लिखना यहां संभव नहीं है।

19 वीं सदी की शुरुआत में खिलाफत आंदोलन के साथ-साथ भारत में मुस्लिम कट्टर होते गए तब हिंदू और मुस्लिम में कटुता काफी बढ़ने लगी।

फिर 1920 में अचानक भारत की तमाम मस्जिदों से दो किताबें वितरित की जाने लगी एक किताब का नाम था “कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी” दूसरी किताब का नाम था “उन्नीसवीं सदी का लंपट महर्षि” यह दोनों किताबें अनाम थी इसमें किसी लेखक या प्रकाशक का नाम नहीं था और यह दोनों किताबो में भगवान श्री कृष्ण हिंदू धर्म इत्यादि पर बेहद अश्लील बेहद घिनौनी बातें लिखी गई थी और इन किताबों में तमाम देवी देवताओं के बेहद अश्लील रेखाचित्र भी बनाए गए थे।

और धीरे-धीरे यह दोनों किताबे भारत की हर एक मस्जिदों में वितरित किए जाने लगे।

यह बात जब महात्मा गांधी तक पहुंची तब महात्मा गांधी ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी की बात बता कर खारिज कर दिया और कहा भारत में सब को अपनी बात रखने का हक है लेकिन इन दोनों किताबों से भारत का जनमानस काफी उबल रहा था।

फिर 1923 में लाहौर स्थित राजपाल प्रकाशक के मालिक महाशय राजपाल जी ने एक किताब प्रकाशित की जिसका नाम था “रंगीला रसूल” उस किताब का लेखक का नाम गुप्त रखा गया था और लेखक की जगह लिखा था “दूध का दूध और पानी का पानी” हालांकि उस किताब के असली लेखक पंडित चंपूपति थे जो इस्लाम के जाने-माने विद्वान थे और सबसे अच्छी बात यह थी कि उस किताब में कहीं कोई झूठ नहीं था बल्कि तमाम सबूत के साथ बकायदा आयत नंबर हदीस नंबर इत्यादि देकर कई बातें लिखी गई थी। 1.5 सालों तक रंगीला रसूल बिकता रहा पूरे भारत में कहीं कोई बवाल नहीं हुआ लेकिन एक दिन अचानक 28 मई 1924 को महात्मा गांधी ने अपने अखबार यंग इंडिया में एक लंबा-चौड़ा लेख लिखकर रंगीला रसूल किताब की खूब निंदा की और अंत में 3 लाइन ऐसी लिखी मुसलमानों को खुद ऐसी किताब लिखने वालों को सजा देनी चाहिए

गांधी का या लेख पढ़कर पूरे भारत के मुसलमान भड़क गए और राजपाल प्रकाशक के मालिक महाशय राजपाल जी के ऊपर 3 सालों में 5 बार हमले हुए लेकिन महात्मा गांधी ने एक बार भी हमले की निंदा नहीं की मजे की बात यह कि कुछ मुस्लिम विद्वानों ने उस किताब रंगीला रसूल का मामला लाहौर हाई कोर्ट में दायर किया हाईकोर्ट ने चार इस्लामिक विद्वानों को अदालत में खड़ा करके उनसे पूछा कि इस किताब की कौन सी लाइन गलत है आप वह बता दीजिए चारों इस्लामिक विद्वान इस बात पर सहमत थे कि इस किताब में कोई गलत बात नहीं लिखी गई है फिर लाहौर हाईकोर्ट ने महाशय राजपाल जी के ऊपर मुकदमा खारिज कर दिया और उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया….

फिर उसके बाद 3 अगस्त 1924 को महात्मा गांधी ने यंग इंडिया खबर में एक और भड़काने वाला लेख लिखा और इस लेख में उन्होंने इशारों इशारों में ऐसा लिखा था कि जब व्यक्ति को अदालतों से न्याय नहीं मिले तब उसे खुद प्रयास करके न्याय ले लेना चाहिए

उसके बाद महाशय राजपाल जी के ऊपर दो बार और हमले की कोशिश हुआ और अंत में 6 अप्रैल 1929 का हमला जानलेवा साबित हुआ जिसमें मोहम्मद इल्म दीन नामक एक युवक गढ़ासे से महाशय राजपाल जी के ऊपर कई वार किया जिससे उनकी जान चली गई।

जिस दिन उनकी हत्या हुई उसके 4 दिन के बाद महात्मा गांधी लाहौर में थे लेकिन महात्मा गांधी महाशय राजपाल जी के घर पर शोक प्रकट करने नहीं गए और ना ही अपने किसी संपादकीय में महाशय राजपाल जी की हत्या की निंदा की।

उसके बाद अंग्रेजों ने मुकदमा चलाकर मात्र 6 महीने में महाशय राजपाल जी के हत्यारे इल्म दीन को फांसी की सजा सुना दिया क्योंकि इस देश में पूरा हिंदू समाज उबल उठा था और अंग्रेजो को लगा कि यदि उन्होंने जल्दी फांसी नहीं दिया तब अंग्रेजी शासन को भी खतरा हो सकता है।

उसके बाद 4 जून 1929 को महात्मा गांधी ने अंग्रेज वायसराय को चिट्ठी लिखकर महाशय राजपाल जी के हत्यारे की फांसी की सजा को माफ करने का अनुरोध किया था। और उसके अगले दिन अपने अखबार यंग इंडिया में एक लेख लिखा था जिसमें गांधी जी ने यह साबित करने की कोशिश की थी यह हत्यारा तो निर्दोष है नादान है क्योंकि उसे अपने धर्म का अपमान सहन नहीं हुआ और उसने गुस्से में आकर यह निर्णय लिया।

दूसरी तरफ तब के जाने-माने बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना ने भी लाहौर हाई कोर्ट में बकायदा एक बैरिस्टर की हैसियत से इस मुकदमे में पैरवी करते हुए जब से यह कहा क्योंकि अपराधी मात्र 19 साल का लड़का है लेकिन इसने जघन्य अपराध किया है इसकी अपराध को कम नहीं समझा जा सकता लेकिन इसके उम्र को देखते हुए इसकी फांसी की सजा को उम्र कैद में बदल दी जाए या फिर इसे काले पानी जेल में भेज दिया जाए।

लेकिन अंग्रेजों ने 31 अक्टूबर 1929 को महाशय राजपाल जी के हत्यारे मोहम्मद इल्म दीन को लाहौर जेल में फांसी पर चढ़ा दिया

2 नवंबर 1929 में महात्मा गांधी ने यंग इंडिया में इल्म दीन को फांसी देने को इतिहास का काला दिन लिखा

बाकी का मैं आपके विवेक पर छोड़ता हूं आप खुद सोचिए महात्मा गांधी का क्या हिंदुत्व था

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, हिन्दू पतन

कैसे गांधी जी ने एक श्लोक और एक भजन को बदला देखें‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬

भारत में महाभारत का एक श्लोक अधूरा पढाया जाता है क्यों ??
शायद गांधी जी की वजह से।
“अहिंसा परमो धर्मः”
जबकि पूर्ण श्लोक इस तरह से है:-

“अहिंसा परमो धर्मः,धर्महिंसा तदैव च l

अर्थात – अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है
और धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना उस से भी श्रेष्ठ है..🕉

#गांधी #जी ने सिर्फ इस ☝☝#श्लोक को ही नही बल्कि उसके अलावा भी उन्होंने एक प्रशिद्ध भजन को बदल दिया

-‘रघुपति राघव राजा राम’ इस प्रसिद्ध-भजन का नाम है.
.”राम-धुन” .
जो कि बेहद लोकप्रिय भजन था.. गाँधी ने बड़ी चालाकी से इसमें परिवर्तन करते हुए
अल्लाह
शब्द जोड़ दिया..
आप भी नीचे देख लीजिए..
असली भजन और गाँधी द्वारा बेहद चालाकी से किया गया परिवर्तन..
गाँधी का भजन
रघुपति राघव राजाराम,
पतित पावन सीताराम
सीताराम सीताराम,
भज प्यारे तू सीताराम
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम,
सब को सन्मति दे भगवान…

** असली राम धुन भजन **
रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम
सुंदर विग्रह मेघश्याम
गंगा तुलसी शालग्राम
भद्रगिरीश्वर सीताराम
भगत-जनप्रिय सीताराम
जानकीरमणा सीताराम
जयजय राघव सीताराम
और बड़े-बड़े पंडित तथा वक्ता भी सब जगह गाते हैं यहां तक कि मंदिरो में भी उन्हें रोके कौन?
-अब सवाल ये उठता है कि गाँधी जी को ये अधिकार किसने दिया की,.. हमारे ‘श्रीराम को सुमिरन’ करने के भजन में ही अल्लाह को घुसा दे..
(अल्लाह का हमसे क्या संबंध?)
-इस भजन को जिन्होंने बनाया था उनका नाम था लक्ष्मणाचार्य
ये भजन
“श्री नमः रामनायनम”
नामक हिन्दू-ग्रन्थ से लिया गयाहै
परन्तु
मोहनदास-गाँधी ने इसमें किसकी आज्ञा से मिलावट की,
क्या उसने ‘लक्ष्मणाचार्यजी’ से अनुमति ली!
कोई भी हमारे धर्मग्रंथोंऔर पूजा पद्धिति भजनों में मिलावट करने का अधिकार रखता है?

हम आप लोगों से निवेदन करेंगे कि, गाँधी के इस मिलावट वाले भजन को तुरंत हटाएं और असली-भजन को गाएँ

आप इस मूव रामधुन भजन का अपमान बिलकुल भी न करें,
पोस्ट शेयर जरूर करें ताकि लोग जागरूक हो सकें। धन्यवाद

Posted in हिन्दू पतन

विचारणीय लेख

संजय द्विवेदी

अखण्ड सनातन समिति🚩🇮🇳

1951 में कांग्रेस सरकार ने हिंदू धर्म दान एक्ट पास किया था, इस एक्ट के जरिए कांग्रेस ने राज्यों को अधिकार दे दिया कि वो किसी भी मंदिर को सरकार के अधीन कर सकते हैं।

इस एक्ट के बनने के बाद से आंध्र प्रदेश सरकार नें लगभग 34,000 मंदिर को अपने अधीन ले लिया था, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, तमिलनाडु ने भी मंदिरों को अपने अधीन कर दिया था, इसके बाद शुरू हुआ मंदिरों के चढ़ावे में भ्रष्टाचार का खेल।

उदाहरण के लिए तिरुपति बालाजी मंदिर की सालाना कमाई लगभग 3500 करोड़ रूपए है, मंदिर में रोज बैंक से दो गाड़ियां आती हैं और मंदिर को मिले चढ़ावे की रकम को ले जाती हैं।

इतना फंड मिलने के बाद भी तिरुपति मंदिर को सिर्फ 7% फंड वापस मिलता है, रखरखाव के लिए।

आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री YSR रेड्डी ने तिरुपति की 7 पहाड़ियों में से 5 को सरकार को देने का आदेश दिया था, इन पहाड़ियों पर चर्च का निर्माण किया जाना था।

मंदिर को मिलने वाली चढ़ावे की रकम में से 80% गैर हिंदू कामों के लिए किया जाता है।

तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक हर राज्य़ में यही हो रहा है, मंदिर से मिलने वाली रकम का इस्तेमाल मस्जिदों और चर्चों के निर्माण में किया जा रहा है।

मंदिरों के फंड में भ्रष्टाचार का आलम ये है कि कर्नाटक के 2 लाख मंदिरों में लगभग 50,000 मंदिर रख-रखाव के अभाव के कारण बंद हो गए हैं।

दुनिया के किसी भी लोकतंत्रिक देश में धार्मिक संस्थानों को सरकारों द्वारा कंट्रोल नहीं किया जाता है, ताकि लोगों की धार्मिक आजादी का हनन न होने पाए, लेकिन भारत में ऐसा हो रहा है, सरकारों ने मंदिरों को अपने कब्जे में इसलिए किया क्योंकि उन्हें पता है कि मंदिरों के चढ़ावे से सरकार को काफी फायदा हो सकता है।

लेकिन, सिर्फ मंदिरों को ही कब्जे में लिया जा रहा है, मस्जिदों और चर्च पर सरकार का कंट्रोल नहीं है।

इतना ही नहीं, मंदिरों से मिलने वाले फंड का इस्तेमाल मस्जिद और चर्च के लिए किया जा रहा है।

इन सबका कारण अगर खोजे तो 1951 में पास किया हुआ कॉंग्रेस का वो बिल है, हिन्दू मंदिर एक्ट की पुरजोर मांग करनी चाहिए जिससे हिन्दुओं के मंदिरों का प्रबंध हिन्दू करें।

गुरुद्वारा एक्ट की तर्ज पर हिन्दू मंदिर एक्ट बनाया जाए ....

Posted in हिन्दू पतन

ઈસ્લામિક આતંક: વો કત્લ ભી કરતે હૈ તો ચર્ચા નહીં હોતી, હમ આહ ભી ભરતે હૈ તો હો જાતે હે બદનામ!

12 જૂન, શુક્રવાર.
સ્થળ: શ્રીનગર.
નમાજ બાદનો સમય.

નોહટ્ટા વિસ્તારની જામિયા મસ્જિદમાંથી માસ્ક પહેરેલા યુવાનોનું ટોળું બહાર આવે છે. કેટલાકના હાથમાં પાકિસ્તાનના તો કેટલાકના હાથમાં વિશ્વના કુખ્યાત આતંકવાદી સંગઠન ISISના ઝંડા છે. તેઓ રેલી કાઢીને ભારતવિરોધી અને પાકિસ્તાન તરફી નારા પણ લગાવે છે.

ટોળું ભલે મસ્જિદમાંથી નીકળ્યું હોય, યુવાનો ભલે મુસ્લિમ હોય, ભારતની ભૂમિ પર તેઓ વિશ્વના ક્રૂરત્તમ આતંકવાદી સંગઠન ઈસ્લામિક સ્ટેટના ઝંડા પણ ફરકાવે છતાં, સેંકડો વર્ષ સુધી ઈસ્લામિક આક્રમણો અને ગુલામી સહન કરી ચૂકેલા હે અહિંસક ભારતીયો, યાદ રાખો કે, આતંકનો કોઈ ધર્મ નથી હોતો!

વિશ્વનો નવ્વાણુ ટકા આતંકનો કારોબાર ભલે બોકોહરામ, અલ શબાબ, તાલિબાન, અલ કાયદા, લશ્કર-એ-તોઈબા, હરકત ઉલ મુજાહિદ્દીન, તહરિક-એ-તાલિબાન, જૈશ-એ-મુહંમદ, ISIS (ઈસ્લામિક સ્ટેટ ઓફ ઈરાક એન્ડ સિરિયા), ઈન્ડિયન મુજાહિદ્દીન, જમાત-ઉદ-દાવા સહિતના મુસ્લિમ આતંકવાદી સંગઠનો જ ચલાવતા હોય ને વિશ્વમાં ઈસ્લામિક કાનૂન શરિયત લાગુ કરવાથી માંડી હિન્દુસ્તાનને તબાહ કરવા સુધીના મનસુબા ધરાવતા હોય આમ છતાં હે પ્રજ્ઞ ભારતીયો, યાદ રાખજો કે, આતંકવાદનો કોઈ ધર્મ નથી હોતો!

કહેવાનો મતલબ એવો હરગિઝ નથી કે વૈશ્વિક આતંકવાદ માટે આખી મુસ્લિમ કૌમ જવાબદાર છે કે તેનું સમર્થન કરે છે. વિરોધ માત્ર એક જ પોઈન્ટ પર છે કે આ દેશમાં એકલ દોકલ અપવાદરૂપ કેસના કારણે જો ‘ભગવો આતંકવાદ’ શબ્દપ્રયોગ(એ પણ ગૃહમંત્રી કક્ષાના વ્યક્તિ દ્વારા) થઈ શકતો હોય તો અહીં ઈસ્લામિક આતંકવાદ સામે ખુલીને સ્ટેન્ડ લેતા કેમ બધાની ફેં ફાટે છે? માલેગાંવ બ્લાસ્ટ બાદ દેશની બહુમતી નિર્દોષ હિન્દુ પ્રજાની લાગણીની જરા પણ પરવાહ કર્યા વિના મહિનાઓ સુધી ‘હિન્દુ આતંક’ કે ‘ભગવો આતંક’ શબ્દપ્રયોગ કરનારા રાજકારણીઓ કે ચેનલીયાઓએ મુંબઈ હૂમલા બાદ એકેય વાર ‘ઈસ્લામિક ટેરર’ કે ‘મુસ્લિમ ટેરરિસ્ટ’ જેવા શબ્દો વાપર્યા? ઈવન ખુલ્લેઆમ આઈએસઆઈએસ અને પાકિસ્તાનના ઝંડા ફરકાવી ભારતને ભાંડનારાઓ માટે પણ કોઈ ધર્મસૂચક શબ્દો પ્રયોજે છે? નહીં ને? હિન્દુઓમાં જ પોચુ ભાળી ગયા છે. ઈસ્લામિક આતંકવાદનો સ્વીકાર પણ કરવાનો આવે તો એમના ધોતીયા ઢીલા અને પોતીયા પીળા થઈ જાય છે.

ઈસ્લામિક ટેરરિઝમનો મામલો હોય ત્યારે ખબર નહીં કેમ અને ક્યાંથી ‘આતંકનો કોઈ ધર્મ નથી હોતો’ની ફિલસુફીઓ ફૂટીને ફાટી નીકળે છે! જેને મુસ્લિમ આતંકવાદી ગઝની અનેકાનેક વાર લૂંટી ગયો એવા હિન્દુઓના શ્રધ્ધેય સોમનાથમાં બિનહિન્દુઓના પ્રવેશ માટે મંજૂરી ફરજિયાત બનાવાય કે દલાલ સાથેના ઝઘડાના કારણે મુંબઈમાં ફ્લેટમાંથી હાંકી કઢાયેલી કોઈ મુસ્લિમ યુવતી પોતે મુસ્લિમ હોવાથી પોતાની સાથે ભેદભાવ થયો હોવાની બુમરાણ મચાવે ત્યારે એક શીખને વડાપ્રધાન અને એકથી વધુ મુસલમાનોને રાષ્ટ્રપતિ બનાવનારી આ દેશની બહુમતી સહિષ્ણુ પ્રજાની બિનસાંપ્રદાયીકતા સામે આંગળી ઉઠાવી ભાંડનારા કહેવાતા બુધ્ધીજીવીઓની લલૂડીને ઈસ્લામિક આતંક નામની વરવી વાસ્તવિકતાનો સ્વીકાર પણ કરવાનો થાય ત્યારે કેમ લકવો મારી જાય છે? એજન્ડા ગદ્દરના સન્ની દેઓલ જેટલો ક્લિયર છે. ‘અગર તુમ્હારા પાકિસ્તાન ઝીંદાબાદ હે તો હમારા હિન્દુસ્તાન ભી ઝીંદાબાદ થા, હે ઓર રહેગા’ – એ ડાયલોગની જેમ જો મુસ્લિમ કટ્ટરવાદી વિચારધારા આતંક ફેલાવે ત્યારે ‘આંતકનો કોઈ ધર્મ નથી હોતો’ કહેવાય તો સાધ્વી પ્રજ્ઞા-કર્નલ પુરોહિત જેવા કેસમાં પણ એ જ માપદંડ લાગુ થવો જોઈએ. અને જો અપવાદ કેસમાં ‘ભગવો આતંકવાદ’ જેવા શબ્દપ્રયોગો થતા હોય તો ‘ઈસ્લામિક આતંક’ના અસ્તિત્વનો પણ છેડેચોક સ્વીકાર થવો જોઈએ.

કોઈ એક નાટક કે ફિલ્મમાં જોયેલુ કે, એક પાત્રને માથામાં દુખાવો થતો હોય છે. તેને બીજો સલાહ આપે છે કે, મારુ માથું નથી દુખતુ…મારું માથું નથી દુખતુ… એમ વિચારવાથી મટી જશે. પેલાએ પૂછ્યું કે એમ કરવા છતાં ન મટે તો? સલાહ આપનાર જવાબ આપે છે કે તો એમ વિચારવાનુ કે, જે દુખે છે તે મારું માથું નથી…જે દુખે છે તે મારું માથું નથી…મતલબ કે આડાતેડા ગતકડા કરવાના પણ દુખાવાની ગંભીરતા અને કારણ પારખીને દવા નહીં લેવાની. ઈસ્લામિક ટેરરિઝમનું પણ કંઈક આવું જ છે. ‘આતંકવાદનો કોઈ ધર્મ નથી હોતો’ની ફિલોસોફીઓ ડહોળનારાઓ પહેલા આતંકવાદ ઈસ્લામિક હોવાનું નિદાન સ્વીકારે તો કંઈક ઇલાજ થાય ને?

થોડા સમય પહેલા ગુજરાતમાં બે-ત્રણ મોકડ્રિલ દરમિયાન પોલીસે આતંકવાદીઓને ટોપી પહેરેલા મુસ્લિમ શું બતાવી દીધા, હોબાળો મચી ગયો. વિરોધ ફાટી નીકળ્યો. ‘આતંકનો કોઈ ધર્મ નથી હોતો’ના કોરસગાન શરૂ થઈ ગયા. પોલીસ પર બરાબરના માછલા ધોવાયા. અંતે પોલીસે પણ માફામાફી ને ખુલાસા કરવા પડ્યા. ઠીક છે. ભારતના બંધારણ મુજબ જે થયુ તે બરાબર છે લેકિન…કિન્તુ…પરંતુ…બંધુ… આવો વિરોધ કરવાથી અને મોકડ્રિલના નકલી આતંકવાદીઓની ટોપીઓ ઉતરાવવાથી નગ્ન હકિકત થોડી બદલાઈ જવાની છે? અને મોકડ્રિલના આતંકીઓ પર ક્યાં ‘ભારતીય મુસ્લિમ’ એવો થપ્પો મારેલો હતો વળી તે આવા બખેડા કરવા પડે!

આ વિરોધ થયો એ જ સમયગાળામાં નોઈડાથી બે આતંકવાદી ઝડપાયા. તેમજ વાઈબ્રન્ટ-પ્રવાસી ભારતીય દિવસ પર હૂમલો કરી શકે તેવી શક્યતા ધરાવતા મધ્યપ્રદેશના ખંડવાની જેલમાંથી ભાગેલા આતંકીઓના પોસ્ટર્સ ગાંધીનગરમાં લાગ્યા. આ બંન્ને ઘટનાઓમાં સંડોવાયેલા શખ્સોના માથે ઈસ્લામિક ટોપી હતી. આ ચિત્ર કેવી રીતે બદલાશે વારું?

ગુજરાત પોલીસે નકલી આતંકીઓને પહેરાવેલી મુસ્લિમ ટોપી, ઈસ્લામિક ટેરરનો ખોફનાક ચહેરો દર્શાવતી કમલ હાસનની ફિલ્મ ‘વિશ્વરૂપમ’, વિદેશમાં બનેલી પયગંબર પરની ફિલ્મ કે ગાઝા પટ્ટી પર થયેલા હૂમલાનો વિરોધ કરવા ઉમટી પડેલા ટોળાં ત્યારે ક્યાં હતા જ્યારે અલ કાયદાના આકા અલ ઝવાહિરીની ટેપ આવેલી. એ ટેપમાં ઝવાહિરી કહે છે કે, ‘અમે ભારતીય ઉપ મહાદ્વિપમાં ઈસ્લામનું શાસન સ્થાપવામાં માંગીએ છીએ. તે બર્મા, કાશ્મીર, ગુજરાત, બાંગ્લાદેશ, અમદાવાદ અને આસામમાં મુસ્લિમોની સેવા કરશે.’ ઝવાહિરીના આ મતલબના નિવેદનને ભારતના મુસ્લિમ સંગઠનો, મુસ્લિમ ધર્મગુરૂઓ, મુસ્લિમ યુવાનો, મુસ્લિમ પક્ષો(અને મુસ્લિમોના નામે મુસ્લિમો માટે રાજનિતી કરતા કહેવાતા સાંપ્રદાયીક પક્ષો) સહિત ભારતમાં વસતા તમામ મુસ્લિમોએ એકી શ્વાસે વખોડી કાઢવું નહોતુ જોઈતુ?

અલ કાયદાને સણસણાવીને ચોખ્ખુ સંભળાવી દેવાની જરૂર હતી કે, ભારતના મુસ્લિમોની તમારે ચિંતા કરવાની જરૂર નથી. તમે વિશ્વભરના મુસ્લિમોનો ઠેકો નથી લઈ રાખ્યો. કાશ્મીર કે અમદાવાદના મુસ્લિમોને તમારી ‘સેવા’ની જરૂર નથી. ભારતના મુસ્લિમો પાકિસ્તાન સહિતના વિશ્વના અનેક દેશો કરતા અનેકગણા વધુ સુખી છે. ભારત વિશ્વનું એકમાત્ર રાષ્ટ્ર છે જે મુસ્લિમોને હજ કરવા માટે સબસિડી આપે છે. જેની રાજધાનીનું નામ ‘ઈસ્લામાબાદ’ છે તેવું પાકિસ્તાન પણ હજ માટે સબસિડી આપતુ નથી. ખુદ પાકિસ્તાનની સુપ્રીમ કોર્ટ હજ માટેની સબસિડીને ગૈર ઈસ્લામિક ગણાવી ચૂકી છે. પરંતુ આવું સ્ટેન્ડ લેવા ભારતમાં કોઈ ઈસ્લામિક સંગઠન આગળ ન આવ્યું. મુસ્લિમોને સંડોવતા કે ઈસ્લામને લગતા વિશ્વભરના ઈસ્યુઝ પર ભારતમાં બહાર આવી દેખાવો કરતા મુસ્લિમોએ અલ કાયદાની ટેપ મામલે પણ આગળ આવી સ્ટેન્ડ લેવાની જરૂર નહોતી? એ જ રીતે કાશ્મીરમાં આઈએસઆઈએસના ઝંડા ફરકાવનારા અને કાશ્મીરમાં આઈસીસનું સ્વાગત કરતા સુત્રો લખનારા તત્વોના વિરોધમાં દેશભરના મુસ્લિમોએ સ્ટેન્ડ ન લેવું જોઈએ?

આવા ઈસ્યુઝ પર કોઈ સમાજ દ્વારા લેવાતા સિલેક્ટીવ સ્ટેન્ડના કેવા ગંભીર પરિણામો આવી શકે તેનો ચિતાર ગોધરાકાંડ બાદના તોફાનોના કારણોના મૂળમાં મળે છે. સિનિયર પત્રકાર પ્રશાંત દયાળે ગોધરાકાંડ અને તોફાનો પર ‘9166 UP – 2002 રમખાણોનું અધૂરું સત્ય’ નામની બુક લખી છે. આ કિતાબ કોઈ ક્રાઈમ જર્નાલિસ્ટની નજરે ને કલમે લખાયેલી કોઈ સાધારણ ક્રાઈમ ડાયરી નહીં પણ 2002ના અરસાના આખા ગુજરાતની માનસિકતાનો ડીએનએ ટેસ્ટ કરવાનો પ્રયાસ કરતો એક ઐતિહાસિક દસ્તાવેજ છે. ગોધરાકાંડ બાદ મોટાપાયે થયેલી મુસ્લિમોની(ખુવારી બંન્ને પક્ષે હતી પણ મુસ્લિમોએ વધુ ભોગવવું પડેલુ) કત્લેઆમના કારણોના મૂળમાં જવાનો પ્રયાસ કરતા પત્રકાર અનેક લોકોને સવાલો પૂછીને રમખાણોના સામાજિક-મનોવૈજ્ઞાનિક કારણો તારવવાનો પ્રયાસ કરે છે. લેખક પ્રશાંત દયાળે ભાજપના સિનિયર નેતા સુરેન્દ્ર પટેલ(સુરેન્દ્ર કાકા)ને પૂછ્યું, ‘આવું કેમ બન્યુ?’ જવાબનો એક અંશ જાણવા જેવો છે – ‘હિન્દુઓએ જે કર્યુ તેની પાછળ એક જ કારણ હતું કે 58 વ્યક્તિને જીવતી સળગાવી દેવામાં આવી ત્યારે એક પણ મુસ્લિમ કે તેમની તરફેણ કરનાર કોંગ્રેસ અને અન્ય પાર્ટીઓએ ઘટનાને વખોડી નહોતી, નહિતર આટલી મોટી સંખ્યામાં તોફાનો થતાં નહીં. કોઈ હિન્દુ ગુંડો લોકો પર અત્યાચાર કરે તો ખુદ હિન્દુઓ જ તેનો વિરોધ કરે છે પણ મુસ્લિમોમાં તેવું બનતું નથી, કારણ કે મુસ્લિમોનું નેતૃત્વ મોટાભાગે અસામાજિક તત્વોના હાથમાં જ હોય છે.(લેટેસ્ટ ઉદાહરણ ઓવૈસી બ્રધર્સ) જેના કારણે બહુમતી મુસ્લિમો સારા હોવા છતાં થોડાક મુસ્લિમ ગુંડાઓને કારણે આખી કૌમને સહન કરવું પડે છે.’

રમખાણોના સત્યની શોધમાં નીકળેલા પત્રકારે ડબ્બો સળગ્યાના પડઘા શક્ય એટલા ઓછા પડે તે માટે પ્રયાસો પણ કરેલા. પ્રશાંત દયાળ લખે છે, ‘ગોધરાની ઘટના પછી જ્યારે હું ગોધરામાં જ હતો ત્યારે મેં મારા એક મુસ્લિમ પ્રોફેસર મિત્રને ફોન કરી જણાવ્યું હતું કે તે પરિચિત મૌલવીઓને મળી એક પ્રેસનોટ દ્વારા આ ઘટનાને વખોડતી જાહેરાત કરાવે, જેથી હિન્દુઓ ગોધરાકાંડ માટે તમામ મુસ્લિમોને જવાબદાર ગણે નહીં, પરંતુ તેમાં મને અને મારા મિત્રને નિરાશા મળી હતી. કારણ કે અનેક મૌલવીઓ એ વાતનો સ્વીકાર કરતા હતા કે ગોધરાની ઘટના શૈતાની કૃત્ય છે પણ તેને પ્રેસનોટ દ્વારા વખોડવા તૈયાર નહોતા. જો મુસ્લિમોએ ડહાપણનું પગલું ભર્યુ હોત તો નિર્દોષ મુસ્લિમોએ તેની કિંમત ચૂકવવી પડી ન હોત.’ કાશ…પેશાવરના હૂમલા બાદ જુહાપુરામાં જે રીતે ‘પેશાવર કે દર્દ મેં રો રહા હૈ જુહાપુરા’ના બેનર્સ સાથે રેલી નીકળી એવી એકાદી રેલી ગોધરામા સળગી ગયેલા ડબ્બા માટે પણ નીકળી હોત તો ગુજરાતનો ઈતિહાસ કદાચ ઓછો લોહિયાળ હોત. (લખ્યા તા.14 જૂન 2015, રવિવાર)

ફ્રિ હિટ:

કાશ્મીરમાં આઈએસઆઈએસના ઝંડા ફરકાવનારા અને ત્યાં આઈએસઆઈએસને આવકારતા સુત્રો લખનારા મુસ્લિમ કટ્ટરપંથી તત્વોએ યાદ રાખવું જોઈએ કે, જેલમની સપાટી વધી રહી છે અને કાશ્મીરમાં પુર જેવી હોનારત વખતે ભારતીય સેના જ કામમાં આવે છે, ઈસ્લામિક સ્ટેટના આતંકવાદીઓ નહીં.

Posted in हिन्दू पतन

जिन्ना का दोष यही था कि उसने मुसलमानों को सीधे क़त्ले आम कर के पाकिस्तान लेने का निर्देश दिया ! वह चाहता तो यह क़त्ले आम रुक सकता था लेकिन उसे मुसलमानों की ताक़त दर्शानी थी

बहुत कठोर पोस्ट है पर जानना जरूरी है, “जिन्ना” को।😡
.16 अगस्त 1946 से दो दिन पूर्व ही
जिन्ना नें “सीधी कार्यवाही” की धमकी दी थी. गांधीजी को अब भी उम्मीद थी कि जिन्ना सिर्फ बोल रहा है, देश के मुश्लिम इतने बुरे नहीं कि ‘पाकिस्तान’ के लिए हिंदुओं का कत्लेआम करने लगेंगे। पर गांधी यहीं अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल कर रहे हैं, सम्प्रदायों का नशा शराब से भी ज्यादा घातक होता है।
बंगाल और बिहार में मुस्लिमो की संख्या अधिक है, और लीग की पकड़ भी यहाँ मजबूत है।
बंगाल का मुख्यमंत्री शाहिद सोहरावर्दी जिन्ना का वैचारिक गुलाम है, जिन्ना का आदेश उसके लिए खुदा का आदेश है।
पूर्वी बंगाल का मुस्लिम बहुल्य नोआखाली जिला! यहाँ अधिकांश दो ही जाति के लोग हैं, गरीब हिन्दू और मुस्लिम। हिंदुओं में पंचानवे फीसदी पिछड़ी जाति के लोग हैं, गुलामी के दिनों में किसी भी तरह पेट पालने वाले।
लगभग सभी जानते हैं कि जिन्ना का “डायरेक्ट एक्शन” यहाँ लागू होगा, पर हिन्दुओं में शांति है। आत्मरक्षा की भी कोई तैयारी नहीं। कुछ गाँधी जी के भरोसे बैठे हैं। कुछ को मुस्लिम अपने भाई लगते हैं, उन्हें भरोसा है कि मुस्लिम उनका अहित नहीं करेंगे।
सुबह के दस बज रहे हैं, पर सड़क पर नमाजियों की भीड़ अब से ही इकट्ठी हो गयी है। बारह बजते बजते यह भीड़ तीस हजार की हो गयी, सभी हाथों में तलवारें हैं।
मौलाना मुसलमानों को बार बार जिन्ना साहब का हुक्म पढ़ कर सुना रहा है- “बिरदराने इस्लाम! हिंदुओं पर दस गुनी तेजी से हमला करो…”
मात्र पचास वर्ष पूर्व ही हिन्दू से मुसलमान बने इन मुसलमानों में घोर साम्प्रदायिक जहर भर दिया गया है, इन्हें अपना पाकिस्तान किसी भी कीमत पर चाहिए।
एक बज गया। नमाज हो गयी। अब जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन का समय है। इस्लाम के तीस हजार सिपाही एक साथ हिन्दू बस्तियों पर हमला शुरू करते हैं। एक ओर से, पूरी तैयारी के साथ, जैसे किसान एक ओर से अपनी फसल काटता है। जबतक एक जगह की फसल पूरी तरह कट नहीं जाती, तबतक आगे नहीं बढ़ता।
जिन्ना की सेना पूरे व्यवस्थित तरीके से काम कर रही है। पुरुष, बूढ़े और बच्चे काटे जा रहे हैं, स्त्रियों-लड़कियों का …. किया जा रहा है।
हाथ जोड़ कर घिसटता हुआ पीछे बढ़ता कोई बुजुर्ग, और छप से उसकी गर्दन उड़ाती तलवार…
माँ माँ कर रोते छोटे छोटे बच्चे, और उनकी गर्दन उड़ा कर मुस्कुरा उठती तलवारें…
अपने हाथों से शरीर को ढंकने का असफल प्रयास करती बिलखती हुई एक स्त्री, और राक्षसी अट्टहास करते बीस बीस मुसलमान… उन्हें याद नहीं कि वे मनुष्य भी हैं। उन्हें सिर्फ जिन्ना याद है, उन्हें बस पाकिस्तान याद है।
शाम हो आई है। एक ही दिन में लगभग 15000 हिन्दू काट दिए गए हैं, और लगभग दस हजार स्त्रियों का….. हुआ है।
जिन्ना खुश है, उसके “डायरेक्ट एक्शन” की सफल शुरुआत हुई है।
अगला दिन, सत्रह अगस्त….
मटियाबुर्ज का केसोराम कॉटन मिल! जिन्ना की विजयी सेना आज यहाँ हाथ लगाती है। मिल के मजदूर और आस पास के स्थान के दरिद्र हिन्दू….
आज सुबह से ही तलवारें निकली हैं। उत्साह कल से ज्यादा है। मिल के ग्यारह सौ मजदूरों, जिनमें तीन सौ उड़िया हैं को ग्यारह बजे के पहले ही पूरी तरह काट डाला गया है। मोहम्मद अली जिन्ना जिन्दाबाद के नारों से गगन गूंज रहा है…
पड़ोस के इलाके में बाद में काम लगाया जाएगा, अभी मजदूरों की स्त्रियों के साथ….का समय है।
कलम कांप रही है, नहीं लिख पाऊंगा। बस इतना जानिए, हजार स्त्रियाँ…
अगले एक सप्ताह में रायपुर, रामगंज, बेगमपुर, लक्ष्मीपुर…. लगभग एक लाख लाशें गिरी हैं। तीस हजार स्त्रियों का…. हुआ है। जिन्ना ने अपनी ताकत दिखा दी है….
हिन्दू महासभा “निग्रह मोर्चा” बना कर बंगाल में उतरी , और सेना भी लगा दी। कत्लेआम रुक गया .
बंगाल विधान सभा के प्रतिनिधि हारान चौधरी घोष कह रहे हैं,” यह दंगा नहीं,मुसलमानों की एक सुनियोजित कार्यवाही है, एक कत्लेआम है।
गांधीजी का घमंड टूटा, पर भरम बाकी रहा। वे वायसराय माउंटबेटन से कहते हैं, “अंग्रेजी शासन की फूट डालो और राज करो की नीति ने ऐसा दिन ला दिया है कि अब लगता है या तो देश रक्त स्नान करे या अंग्रेजी राज चलता रहे”।
सच यही है कि गांधी अब हार गए थे. जिन्ना जीत गया था।
कत्लेआम कुछ दिन के लिए ठहरा भर था। या शायद अधिक धार के लिए कुछ दिनों तक रोक दिया गया था.
6 सितम्बर 1946…

गुलाम सरवर हुसैनी लीग का अध्यक्ष बनता है, और सात को शाहपुर में कत्लेआम दुबारा शुरू…
10 अक्टूबर 1946
कोजागरी लक्ष्मीपूजा के दिन ही कत्लेआम की तैयारी है। नोआखाली के जिला मजिस्ट्रेट M J Roy रिटायरमेंट के दो दिन पूर्व ही जिला छोड़ कर भाग गए हैं। वे जानते हैं कि जिन्ना ने दस अक्टूबर का दिन तय किया है, और वे हिन्दू हैं।
जो लोग भाग सके हैं वे पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और आसाम के हिस्सों में भाग गए हैं, जो नहीं भाग पाए उनपर कहर बरसी है। नोआखाली फिर जल उठा है।
लगभग दस हजार लोग दो दिनों में काटे गए हैं। इस बार नियम बदल गए हैं। पुरुषों के सामने उनकी स्त्रियों का…. हो रहा है, फिर पुरुषों और बच्चों को काट दिया जाता है। अब वह ….. स्त्री उसी राक्षस की हुई जिसने उसके पति और बच्चों को काटा है।
एक लाख हिन्दू बंधक बनाए गए हैं। उनके लिए मुक्ति का मार्ग निर्धारित है, “गोमांस खा कर इस्लाम स्वीकार करो और जान बचा लो”।
एक सप्ताह में लगभग पचास हजार हिंदुओं का धर्म परिवर्तन हुआ है।
जिन्ना का “डायरेक्ट एक्शन” सफल हुआ है, नेहरू गांधी को मन ही मन भारत विभाजन को स्वीकार करा चुका था ।
सत्तर साल बाद……

“जिन्ना सेकुलर था।”ऐसा कहने वाला
अय्यर हो या सर्वेश तिवारी हो या सिद्धू हो या शत्रुघ्न सिन्हा हो या कोई अन्य हो, भारत की धरती पर खड़े हो कर जिन्ना की बड़ाई करने वाले से बड़ा गद्दार इस विश्व में दूसरा कोई नहीं हो सकता.।
शेअर कीजिए इस पोस्ट को ताकि सेक्युलर हिन्दुओ को पता तो चले कि कौन था जिन्नाह😡