Posted in हिन्दू पतन

1953 से 1964 तक सऊदी अरब पर शासन करने वाले राजा सऊद इब्न अब्दुल अजीज ने 1954 में हैदराबाद भारत का दौरा किया, केवल हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान से मिलने के लिए, निजाम मीर उस्मान अली खान द्वारा हरमैन शरीफैन के रखरखाव के लिए दी गई महान मौद्रिक मदद के लिए उन्हें धन्यवाद दिया। मक्का मुकर्रमाह और मदीना मुनवराह) 1911 से तक
हज और उमराह के लिए इन पवित्र स्थानों पर जाने वाले तीर्थयात्रियों के लिए निजाम ने मक्का मुकर्रमा में मस्जिद अल-हरम और मदीना मुनवराह में मस्जिद उन-नबी के आसपास तीस भव्य इमारतों का निर्माण किया।
हैदराबाद के निज़ाम 1954 तक हरमेन शरीफिन के रखरखाव के लिए सबसे बड़ा दानदाता था जब तक कि सउदी को पेट्रो-डॉलर नहीं मिला।
सौजन्य मोहन गुरुस्वामी

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मैं दिल्ली से वाराणसी फरवरी 2015 में शिवगंगा एक्सप्रेस ट्रेन से वापस आ रहा था,तब ये आपबीती एक दादी ने मुझे सुनाई थी,और उसे सुनने के पश्चात मैं कई दिन कई रात सो नहीं सका,जब आंख बंद करता उस दादी के गांव के दृश्य सामने दौड़ते।

हुआ कुछ यूँ था,कि एक सज्जन से सहिष्णुता पर बहस हो गयी थी,जिसमें अन्त में हम दोनों अपने अपने पक्ष को लिए ही एक दूसरे से मुँह फेर बैठ गए थे, क्योंकि किसीको को भी समाधान नहीं चाहिए था, बस स्वयं को सही सिद्ध कर विजय का मिथ्याभिमान पाना था।

मेरे पक्ष को सुनकर, हम दो सहयात्रियों के बीच के उस अघोषित शीतयुद्ध के उस सन्नाटे (जिसमें ट्रेन के पहियों व पटरियों के आपसी संवाद से उत्पन्न खट-पट, खट-पट के अतिरिक्त कुछ भी न था) को भङ्ग करते हुए सामने के सीट पर लेटी दादी माँ ने मुझे इंगित करते हुए कहा-
” बेटा! इस सहिष्णुता की परिणति की एक आपबीती कहानी सुनाती हूँ, सुनो!”

वह दादी माँ जिनके केश अभी भी काले थे, जबकि वय कम से कम 75 वर्ष तो रही होगी, बिना मेरी इच्छा जाने ही कहना प्रारम्भ किया।

” मेरा जन्म बंगाल, अबके बांग्लादेश के नोआखली में मेघना व एक चौड़े नाले के बीच के भूभाग पर 1939 ई. के कालबैशाखी के दिन हुआ था।
हमारा गाँव मुख्यतः वैद्य लोगों का गाँव था, जिसमें 25 घर वैद्य रहे होंगे तब। ऐसा नहीं कि केवल वैद्य ही थे, कुछ मुस्लिम, कायस्थ व नाविक भी थे। सभी मिल जुलकर रहते थे। हमारे बीच घरेलू सम्बन्ध थे, एक अटूट भाई-चारा था। फहीम नाम का व्यक्ति तो घर के सदस्य जैसा ही था, जिसे पिताजी फहीम दादा कहकर सम्बोधित करते थे।”

दादी माँ कुछ क्षण रुकीं व मेरे कुछ पूछने से पहले ही पुनः कहना जारी रखा।” मैं, मेरे दादा ( बड़े भाई ) दिलीप, हमारी बहन 6 माह की पाखी, माँ, पिताजी व दादी माँ, हम छः लोग मेरे परिवार में थे।मेरे बड़े पिताजी व बड़ी माँ की मृत्यु मेघना की बाढ़ में नदी पार करते हुए हो गयी थी। उनकी बेटी पारुल व पारुल के पति विशेष दा हमारे घर से ही जुड़े हुए अन्य घर में रहते थे। पारुल दीदी कोई भाई नहीं था।”

” बंगाल में, विशेषकर नोआखली में कालबैशाखी की पूजा बहुत धूमधाम से मनायी जाती थी, क्योंकि वर्ष के उमसभरे चिपचिपे मौसम से, कालबैशाखी के समय बहने वाली ठण्डी समुद्री हवाओं द्वारा निजात मिलती थी, कभी इसी कारण वह समय उत्सव में परिवर्तित हुआ रहा होगा। एक अन्य कारण शीघ्र ही पड़ने वाले लक्ष्मी पूजा का पर्व भी रहा है। जिसकी तैयारी इसी समय प्रारम्भ होती है। इस पर्व के समय जन्म के कारण मेरा नाम लक्ष्मी पड़ा, सभी की दुलारी थी मैं।”दादी बिना रुके कहती ही जा रही थीं, और मैं उनके आयु का सम्मान कर उन्हें टोकना नहीं चाहता था, परन्तु अबतक उनकी सुनाई कथा, उनके परिवार व गाँव के विवरण से ही जुड़ी प्रतीत हो रही थी, अतः मन ऊब रहा था।सहसा एक शब्द सुनकर मस्तिष्क ठिठका, और रुचि का अवधान हुआ।

” बात सन 1946 के 16 अगस्त की है, दो दिन पूर्व ही जिन्ना नें पाकिस्तान की माँग को लेकर डायरेक्ट एक्शन डे की चेतावनी दी थी। नोआखली का शांत परन्तु चहकते रहने वाला वातावरण, एक अजीब से सन्नाटे से भर उठा था। लोगों को विश्वास था कि गाँधी जी के रहते ऐसा कुछ नहीं होगा, और मुस्लिम तो अपने भाई बहन हैं, सदियों से साथ रहते आये थे, साथ खेले बढ़े थे, जिन्ना जैसों के भड़काने से क्या होता है?परन्तु आग लगी! बैशाखी की ठण्डी हवा के स्थान पर ऐसी गर्म हवा का तूफान आया,कि सब झुलस गया।हमारे गाँव से कुछ किलोमीटर दूर एक कॉटन मिल पर 16 अगस्त की दोपहर में, नमाज के ठीक बाद बारिश के स्थान पर सहिष्णुता का परिणाम, भाईचारे का विश्वास बरसा। गुलाम सरवर नाम के कट्टर मुल्ले (जो कि जिन्ना के खास आदमी सुहरावर्दी का पिट्ठू था) के नेतृत्व में जिहादियों के समूह ने कॉटन मिल पर घात लगाया, मुस्लिम कामगारों को एक ओर करके हिन्दू पुरुषों व महिलाओं को अलग अलग कर दिया गया। अबोध, नवजात बच्चों को छीनकर जिहादियों ने ले लिया।
तब गुलाम सरवर सामने आया, उसने कॉटन मिल के मुस्लिम कामगारों से कहा” बिरदराने इस्लाम! अब वक़्त आ गया है, जब हम अपने पैगम्बर के दारुल- इस्लाम के सपने को पूरा करें, अपना खुदका मुल्क़, पाक मुल्क़ पाकिस्तान हासिल करें।पर ये यूँ ही नहीं होगा, ये होगा जिहाद की तलवार को हाथ में लेकर, अल्लाह के नाम पर जिहाद करके। हमारे मार्गदर्शक जिन्ना साहब ने डायरेक्ट एक्शन डे का आह्वान किया है। जो हमारे साथ हो, अल्लाह का नाम लेकर इन काफिरों के रक्त से पाक मुल्क़ की नींव रखने में साथ आये, इनकी औरतें हमारी माले गनीमत हैं, और ये सपोले आने वाले खतरे। तो बिरदराने इस्लाम! आप जानते हैं न कि क्या करना है?”दूसरी ओर से उठे अल्लाहू अकबर के नारे से हिन्दू कामगार काँप उठे, जिन्हें इतने वर्षों से अपना भाई, अपना साथी मानते आए थे, उनमें से एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था,
एक भी मुस्लिम ऐसा नहीं था,
जिसके हाथ मे इस्लाम की तलवार न हो।”

“इसके बाद जो प्रारंभ हुआ, उससे मानवता सदा के लिए घायल हो गयी।उन पिशाचों ने नवजात बच्चों को, अबोध बालकों को हवा में उछाल दिया। जब उनके शरीर नीचे आये तो तलवारों से बिंधे हुए, कोई बीच से कटकर तड़पते हुए छटपटा रहे थे, तो कुछ तलवारों पर तड़प रहे थे।उन अबोध बच्चों की माएँ चीख मारकर बेहोश हो गयीं। उधर 4 वर्ष, 6 वर्ष, 7 वर्ष की बच्चियों को वे वहशी, गुलाम सरवर के साथ आये इस्लाम के झंडाबरदारों ने नोचना आरम्भ किया तो दूसरी ओर मुस्लिम कामगारों नें उन हिन्दू कामगार महिलाओं को निःवस्त्र करना प्रारंभ कर दिया, बेसुध पड़ी उन माँओं को भी नहीं छोड़ा उन्होंने। जो हिन्दू पुरुष बचाने आगे आये,
वहीं काट दिए गए।घण्टे भर भी नहीं बीते होंगे, 100 से अधिक हिन्दू महिला पुरुष, 20 से अधिक अबोध बालक बालिका वीभत्स मृत्यु के ग्रास बने।

कोई स्त्री नहीं थी जो निःवस्त्र न हो, जिसके स्तन अक्षत हों, जिसका कमसेकम 20 पिशाचों ने बलात्कार न किया हो। कोई अबोध बालिका न थी जिसने जीवित ही, बलात्कार के मध्य ही प्राण न त्यागे दिए हों, कोई अबोध बालक न था, जिसका शरीर कम से कम दो खण्डों में बंटा न हो।

उन्होंने जीवित छोड़ा तो एक ही व्यक्ति को,एक वैद्य को,उसके हाथ काटकर। ये कहकर कि वो आगे के गाँव वालों से जाकर बताए कि वो नोआखली छोड़कर चले जायें, नहीं तो इस मिल से भी बुरा हाल होगा उनका। वो वैद्य थे मेरे पिताजी!”

इतना कहते कहते दादी का गला रुद्ध हो गया , आँखों से आँसू पूरे आवेग में बह रहे थे, और मैं अवाक! सुन्न! अबूझ सी अवस्था में विचारहीन हो गया था।दादी ने एक ग्लास में पानी लेकर गला साफ किया। मुझे इतना भी साहस न हो रहा था कि कुछ कह सकूँ।एक ही प्रश्न! क्या ये सत्य है?क्या ये सत्य हो सकता है कि कोई मनुष्य ऐसे स्तर तक जा सकता है? क्योंकि तबतक मेरी दृष्टि में मनुष्य की तरह भासता
हर जीव मनुष्य ही था।5 मिनट के नीरव सन्नाटे के बाद, जिसमे मुझे यह तक अभास नहीं था कि ट्रेन द्रुतगति से दौड़ रही है।

दादी ने स्वयं को संयत कर आगे कहना आरम्भ रखा, क्योंकि मैं कुछ भी पूछने की अवस्था में था ही नहीं, और दादी को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कि दीर्घ काल से हृदय में अटका कोई शूल बाहर निकाल कर तोष पाना चाहती हैं।” मैं और मेरे दादा (बड़े भाई) घर के आगे खेल रहे थे, और मेरी माँ जो कि सुबह से ही पिताजी की बाट जोह रहीं थीं, चावल को साफ करते हुए बीच-बीच में घर के बाहर के मार्ग की ओर देख लेती थीं।घर एक कम ऊंचाई के चहारदीवारी से घिरा था, जिससे कि बरामदे में बैठे ही घर की ओर आने वाला मार्ग कुछ दूर तक स्पष्ट दिखता था।

दादी माँ बरामदे में आरामकुर्सी पर सहजता से लेटी हुई थीं, कि तभी उनकी दृष्टि मार्ग पर पड़ी, उधर माँ के मुख से घुटी घुटी सी चीख निकल गयी, वह आगे न कुछ बोल सकीं न ही तत्काल ही उठने का उपक्रम कर सकीं। दादी तो उठते हुए वहीं गिरकर बेसुध हो गयीं।

मेरे दादा आयु व ऊँचाई में बड़े होने के कारण देख पाए कि बाहर क्या हो रहा है। वह बीच में ही खेल छोड़कर विक्षिप्त से भागे बाहर गए, जब अंदर आये तो पिताजी साथ में थे।परन्तु यह वो पिताजी नहीं थे, जो प्रातः दवा वितरण के लिए गए थे, ये तो खून से लथपथ, मुख पर एक भय का सा भाव लिए, आँखें शून्य को तकती हुई, जीवन का कोई चिन्ह नहीं था मेरे पिताजी के आँखों में। और….और उनके वे हाथ, जिनसे वो मुझे हवा में उछालते थे, जिन्हें पकड़कर मैंने चलना सीखा था, जिनसे वो मुझे उठाकर अपने कांधों पर रखकर घोड़ा-घोड़ा खेलते थे, अब वो हाथ अपने स्थान पर न थे….वो हाथ…वो हाथ एक माला की भाँति उनके ही गले में लटके थे…” दादी का गला पुनः भर आया, आँखों से निर्झर बह उठे, आँखों मे वह पीड़ा पुनः जीवित हो उठी, जैसे अभी वह दृश्य आंखों के सम्मुख ही हो।

कुछ घड़ी व्यतीत हुआ होगा, जब दादी ने पुनः कहना आरम्भ किया, और मैं तो अवाक ही था, क्योंकि इतनी वीभत्सता तो मेरे भी संज्ञान में न थी।” पिताजी का मुख अत्यधिक रक्तस्राव के कारण पीला पड़ गया था, वह घर के चहारदीवारी के अंदर आते ही बेसुध हो गिर पड़े, जैसे घर पहुँचने तक ही साहस बचा रखा हो, दादा पिताजी को सम्भाल नहीं पाए, थे ही कितने वर्ष के? मुझसे 3 वर्ष बड़े ही न!माँ जो अबतक मूर्तिवत हुई पड़ी थीं, अब सहसा अपने साथी को गिरता देख दौड़ पड़ीं और उन्हें अंक में ले वहीं बैठ गईं।

उस दिन ही तो माँ के विवाह की चौदहवीं वर्षगांठ थी, और उसी दिन अपने रक्त से लथपथ बेसुध पति को अपने अंक में लेकर भूमि पर बैठी होश में लाने का प्रयत्न कर रहीं थीं, जिस दिवस उनकी मांग के सिन्दूर को अक्षत होने का आशीष चाहिए था, उसी दिन उनके वैवाहिक दीप की ज्वाला बुझती प्रतीत हो रही थी।वह तो चावल साफ कर रहीं थी कि खीर बनाएंगी, सज के , शृंगार करके पिताजी की ही बाट जोहती बैठी थीं, कि वज्रपात हो गया।वो रोते हुए ही पिताजी को होश में लाने का भरसक प्रयत्न कर रही थीं।

इतने में पारुल दीदी के पति भी भागे आये, उन्होंने नदी के किनारे से दूर से ही देख लिया था। शेष गाँव के महिला व पुरुष भी पीछे से भागते हुए आये।विशेष दा भागे गए व दवा, पट्टी, चोट के रक्तस्राव को बंद करने के लिए घाव पर टाँके चलाने के लिए चिकित्सकीय सुई धागे ले आये। तबतक गाँव वालों ने पिताजी को बरामदे में चौकी पर लेटाया, उनके घावों को कपड़े से दबा कर रखा कि रक्तस्राव पर कुछ नियंत्रण हो, परन्तु निरर्थक!
टाँके लगाने, पट्टी करने के बाद भी रक्तस्राव रुक नहीं रहा था, गति अवश्य धीमी हो गयी थी।

वहाँ उपस्थित जन पिताजी को शीघ्र से शीघ्र कलकत्ता ले चलने की बातें कर रहे थे, परन्तु कैसे? यह समझ नहीं पा रहे थे। सबसे छोटा मार्ग मेघना को पार करते हुए उसपार से जाना था, जो कि उस वर्षा ऋतु में दुष्कर कार्य था। परन्तु शेष कोई उपाय भी न था। लोग नाविकों के छोटी नावों के विषय मे बात कर ही रहे थे कि मूसलाधार वर्षा तेज हवा के साथ प्रारम्भ हो गयी, ऐसे आभास हुआ कि सभी आशाएँ इसी के साथ धुलती जा रही हैं, बहती जा रही हैं, और बहकर मेघना के भँवर में फँसकर सदा के लिए लुप्त होती जा रही हैं।

इतने में एक नाविक दादा, जिनका नाम रमेश था, वह भागते हुए आये, और बिना कुछ कहे वहाँ के अवस्था को देख तत्काल अपनी डोंगी पर पिताजी को उस पार ले जाने को तैयार हो गये।

उन्होंने ही यह भी बताया कि एक व्यक्ति भी भागता हुआ आया था कुछ देर पहले, उसने कई गुना मूल्य चुकाकर उनसे उस पार उतारने को कहा था, बीच नदी में जब डोंगी पहुंची तो उसी व्यक्ति ने पिताजी के साथ घटी दुर्घटना के विषय में रमेश दादा को बताया , यह भी कि वहाँ क्या हुआ था? और यह भी कि गुलाम सरवर नें क्या कहा है! यह पूछने पर कि वह कौन है और कहाँ से वहाँ पहुँचा था व कैसे वह बच गया? उसने यही कहा कि वह कलकत्ता का व्यापारी है, जो थोक व्यापार करने के उद्देश्य से मिल में आया था, उसने कपड़ों के ढेर में छिपकर अपने प्राणों की रक्षा की थी। वह यही कह रहा था कि सभी गाँव वालों को तत्काल गाँव छोड़कर कलकत्ता के लिए प्रस्थान कर देना चाहिए, क्योंकि गुलाम सरवर आएगा अवश्य! और प्रत्येक गाँव के सभी मुस्लिम उसके साथ हैं। जितना शीघ्र हो सके यहाँ से भाग चलें!” परन्तु वहाँ उपस्थित सभी ने एकस्वर में कहा कि वे गाँव छोड़कर नहीं जायेंगे, अपितु वो डटकर सामना करेंगे। पर कैसे? यह किसीको ज्ञात नहीं था।सब्जी व मछली काटने के छोटे चाकुओं के अतिरिक्त था क्या वहाँ?

वहाँ उपस्थित मुस्लिम व्यक्तियों ने, जो पीढ़ियों से साथ रह रहे थे , उन्होंने भरोसा दिलाया कि वे कभी भी गुलाम सरवर के ओर से नहीं जायेंगे, वो सभी को बचाएंगे। फहीम चाचा ने जोर देकर कहा कि कहीं जाने की आवश्यकता नहीं। गुलाम सरवर उनका परिचित है, और वह उसे समझा लेंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि केवल कुछ उन्मादियों के कारण सभी मुस्लिमों को गलत नहीं कहा जा सकता।वहाँ उपस्थित सभी लोग फहीम चाचा से सहमत होते दिखे, सभी ने एक स्वर में कहा कि फहीम सही कह रहा है। पीढियों से एक साथ रहते रहे हैं हम, एक दूजे के सुख दुख में समान सहभागी रहे हैं हम। कोई गाँव छोड़कर नहीं जाएगा।

आज समझ आता है कि उस सहिष्णुता की, भाईचारे की बात के स्थान पर यदि आत्मरक्षा के लिए पलायन ही कर गए होते तो सभी जीवित होते। वैद्यों का वह गाँव बंगाल के नक्शे से लुप्त न होता, जिसका आज किसीको नाम तक ज्ञात नहीं है।इस सारे वार्तालाप के साथ-साथ पिताजी को लेकर लोग नदी के किनारे पहुँच गए थे। पिताजी को जिस खाट पर लिटाया गया था, उसके ऊपर छाते लगाकर उन्हें भीगने से बचाने का हर सम्भव प्रयत्न किया जा रहा था, परन्तु उस तेज हवा व बारिश के झोंकों के सम्मुख सब पस्त।माँ, भैया, मैं, विशेष दा, पारुल दी, सब पीछे पीछे आ रहे थे। पाखी को बिलखती हुई दादी के पास माँ छोड़ आयी थीं। रमेश दादा ने डोंगी पर पिताजी को लिटाया, तबतक फहीम चाचा सबसे आगे बढ़कर डोंगी पर चढ़ गए यह कहते हुए कि वह और रमेश दा उस तेज हवा व बारिश में नाव को एकसाथ संभाल के उस पार पहुँचा सकते हैं।

गाँव के मुस्लिम जन मछली पकड़ने का कार्य भी करते थे, जिसके कारण नाव चलाने का ज्ञान उन्हें था।डोंगी छोटी होने व पिताजी को लेटाकर रखने के कारण उस चार व्यक्तियों की क्षमता वाली डोंगी में अन्य किसीके लिए स्थान नहीं बचा था। अतः यह निश्चित हुआ कि शेष लोग पीछे पीछे दूसरी अन्य डोंगीयों से साथ हो लेंगे, तबतक पिताजी को उस पार भेजा जाए।”

कुछ रुककर, जैसे कुछ सोचते हुए दादी ने पुनः कहना आरम्भ किया-” बारिश की बूंदों के लगातार मुख पर पड़ने के कारण पिताजी की चेतना कुछ वापस आयी, तो उन्होंने माँ को इशारे से पास बुलाकर बस इतना ही कहा -” भाग जाओ!, सब भाग जाओ यहाँ से, वे आते ही होंगे”, और इतना कहते कहते पुनः चेतनाशून्य हो गए।इसी के साथ डोंगी ने नदी में प्रवेश किया। माँ पिताजी को देखे ही जा रही थी। किसीको न पता था कि बस….वे अंतिम पल हैं , जब वह मुख अंतिम बार
दिखेगा।””मूसलाधार वर्षा कारण बनी या कुछ और, ये समझ न आया, परन्तु मध्यधार में ज्यों ही नौका पहुँची वहाँ उपस्थित लोगों के मुँह से चीख निकल गयी।”इतना कहकर दादी पुनः रुक गयीं, क्योंकि उनका गला भर आया था।

कुछ समय में संयत होकर उन्होंने पुनः बताना प्रारम्भ किया।” अचानक वह छोटी नाव(डोंगी) फहीम चाचा की ओर से झुकी और पिताजी एक झटके में उफनाती मेघना में जा गिरे।नाविक चाचा पीछे पीछे कूदे, और ज्ञात नहीं कि फहीम चाचा को क्या सुझा, वह कुछ देर बाद ही पानी में कूदे। उसी समय वर्षा इतनी तीव्र हुई कि कुछ दूर की चीजें भी सूझना बन्द हो गयीं। जब मूसलाधार वर्षा की वह धुँध छटी तो नदी किनारे केवल फहीम चाचा थे, नाविक चाचा व पिताजी का कोई चिन्ह नहीं दिखा।”

दादी पुनः अपने रुंध आये गले को साफ करने के लिए रुकीं, और पुनः संयत हो कहना जारी रखा।”फहीम चाचा ने बाहर आकर बताया कि मझधार में उफनती मेघना ने पिताजी व नाविक चाचा को लील लिया। जैसे कि कोई नरभक्षी हो, जिसे मानव शरीर की भूख हो।मेघना वैसे भी प्रत्येक वर्ष अनेक बालकों को लील जाती है, जो अबोध वहाँ खेल खेल में गहरे जल में या नदी के तीखे ढाल के चँगुल में फँस जाते हैं।”माँ, जो कि अत्यन्त भावुक रही थी उससे पहले के वर्षों में, अचानक से काठ मार गया उन्हें, आँखें सुनी, चेहरा निस्तेज परन्तु अश्रु की एक बूँद नहीं।गाँव वाले माँ को और हम रोते बिलखते भाई बहनों को लेकर घर आये, और आया उसी के साथ वह पिशाच और उसकी वो नरपिशाचों की सेना, जिन्हें हर काफ़िर औरत माले-गनीमत लगती थी और हर काफ़िर पुरुष व बच्चा जन्नत के मार्ग का रोड़ा।”

दादी की आँखों में यह बताते हुए उस समय भी भय का एक घृणा मिश्रित भाव था, और थे झर झर झरते अश्रु।

दादी ने आगे कहना जारी रखा, और अश्रुओं ने एक कहानी कहना ।” सैकड़ों जिहादियों के साथ गुलाम सरवर आ धमका, और प्रारम्भ हुआ एक नंगा नाच। नदी किनारे से वापस लौटे दुःखी निहत्थे लोगों पर हाथों में तलवार, कटार, भाले लिए वे पिशाच टूट पड़े।माँ, जो कि अब तक काठवत बनी हुई थी, अचानक से अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए चिंतित हो गयी। जिसे अभी कुछ क्षणों पहले वैधव्य ने आ घेरा था, वह अब अपने बच्चों की सुरक्षा में जुट गई थी।माँ ने मुझे व दादा को अनाज रखने के कोटर में छिपा कर उसके ऊपर से कपड़े रख दिये। पाखी को जब वो हमें देने लगी तो पाखी रोने लगी, उसके रोने से कोई हमारे स्थान को ढूंढ न ले इसलिए पाखी को माँ ने स्वयं ही ले लिया। माँ ने भाई को सौगंध दी कि कुछ भी हो, न वो बाहर आये न मुझे आने दे।

अब समझ आता है कि उसकी दो संतानें सुरक्षित रहें इसलिए एक बच्चे का मोह त्यागना ही उसे उचित लगा होगा।सहसा कमरे के दरवाजे के झटके से खुलने की आवाज ने हम दोनों भाई बहन को भयभीत कर दिया।
माँ को कहते हुए हमने सुना ” फहीम भाई! ये क्या है? तुम और गुलाम सरवर के साथ। तुमने तो अपने दादा से, पाखी के पिताजी से सदैव हमारी रक्षा का वचन दिया था न! तुम इस सरवर के साथ क्यों हो?”

इसके पश्चात हमने जानी पहचानी आवाज सुनी, जो कि गुलाम सरवर को इंगित करके बात कर रही थी।” सरवर भाई! इस साली पर मेरी दृष्टि वर्षों से है, परन्तु क्या करूँ, इस काफ़िर वैद्यों के गाँव में हम ईमानवालों का क्या वश चलता।रोज इसके घर आता था कि इसे देख सकूँ, इसे पाने के बहुत सपने देखे हैं , पर एक वश न चला।”फहीम के मुँह से ये शब्द सुनकर हमें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ये वही फहीम हैं। आगे उसने पुनः कहा-” और सुन तू! तुझपे मेरी नजर उसी दिन से है, जिस दिन तू उस काफ़िर से ब्याह के आयी। तेरे पति से इसीलिए तो साठ-गाँठ की, कि किसी दिन मौका पाकर तुझे भोग सकूँ, पर साला नसीब, मौका ही नहीं मिला। और तू क्या सोचती है, तेरा वो अधमरा पति नदी में अपने से गिर गया? मैंने ही नाव को ऐसे चलाया कि वह झटके से नदी में गिर पड़े। मर गया साला, मेरे रास्ते का काँटा। अब तो तुझे भी भोगूँगा, और तेरी वो लौंडिया है न! उसे रखैल बनाकर रखूँगा। कहाँ है तेरी हमशक्ल वो लौंडिया, बता!”

” सुनो फहीम! तुम्हें जो करना है करो! पर मेरे बच्चों को छोड़ दो।”” करूँगा तो अपने मन का ही। इसीलिए तो गुलाम भाई को बुलाया है यहाँ। क्यों गुलाम भाई?”” हाँ बिरादर! इन काफिरों के लिए तो कहा ही गया है कि जैसे पाओ, वैसे ही कत्ल करो! इनकी बीवियों, बच्चों को बलात अपने संग ले जाओ। ये तो माले गनीमत हैं। तुम्हें जो करना है करो फहीम भाई! मेरे आदमी तुम्हारे साथ रहेंगे। मैं थोड़ा बगल वाले घर के उस लौंडिया से मिल आऊँ, वो जिसके पति और उसे मेरे आदमियों ने पकड़ के रखा हुआ है।”

” अरे! वो पारुल और उसका पति है गुलाम भाई! वो भी लौंडिया मस्त है। जाओ जाओ।”” हाँ बिरादर फहीम! तुम भी अपनी प्यास बुझाओ! मैं भी आता हूँ””सुन! अपनी इस छोटी लौंडिया को बगल रख। जैसा कहता हूँ कर, तो आज के लिए तेरी जान बक्श दूँगा। जब तक मेरा कहा मानेगी, तबतक तेरी और तेरे बच्चों की जान बची रहेगी। और भाग के जाएगी कहाँ? मेरे आदमी इस गाँव को घेरे रहेंगे और दूसरी तरफ तेरे पति को लीलने वाली मेघना उफनाई हुई है ही, कौन बचाएगा तुम्हें? जो कहता हूँ कर!”तभी दूर से पारुल दीदी के चीखने की आवाज नें मुझे डरा दिया। दादा ने मुँह पे हाथ रखकर मुझे चुप कराये रखा। इधर हमारी घर से घुटी घुटी चीखें सुनाई दे रही थीं, उधर पारुल दीदी की दर्द और भय से उठती चीखें मेरे आंखों के सामने छाते अंधकार को और घना करती जा रही थीं। पारुल दीदी की चीखों से ऐसा लगता था जैसे कई भूखे भेड़िये किसीको नोच रहे हों। तभी कुछ मिनटों बाद फहीम की आवाज पुनः सुनाई दी।

” आज तो दिल खुश कर दिया तूने! जा! आज तेरी और तेरे बच्चों की जान बक्श दी। कल फिर आऊँगा। दे अपनी ये लौंडिया दे। ये अमानत रहेगी तेरी। जबतक ये मेरे पास है, तू जाएगी कहाँ?”” नहीं फहीम! मेरी बेटी को मत ले जाओ! हाथ जोड़ती हूँ! ये मेरे बिना नहीं रह पाएगी। तुमने जो कहा मैंने किया।”” नहीं रे! कल आऊँ तो तू जिंदा रहे और भागे भी न, इसलिए इसे मेरे पास रहना जरूरी है। दे इसे!”माँ के प्रतिरोध की आवाज स्पष्ट सुनाई दे रही थी। दरवाजे के झटके से खुलने की आवाज आई। उसके बाद कमरे में बस सन्नाटा था। कुछ समय बाद माँ ने हमें कोटर से बाहर निकाला। उसके कपड़े फटे हुए थे। वह अस्तव्यस्त सी, सुनी आँखों से हमें देख रही थी। आँखों से ऐसे अश्रु बह रहे थे, जैसे किसी चट्टान से पानी रिस रहा हो। माँ ने अपने बच्चों को बचाने के लिए, अपना सबकुछ न्यौछावर कर दिया था।

” माँ! पाखी कहाँ है?” दादा ने चिंतित होते हुए माँ से पूछा,और माँ ने बस उन्हें सीने से लगा लिया।कुछ पलों बाद माँ को जैसे कुछ भान हुआ तो वो हमें लेकर पारुल दीदी के घर की ओर भागीं। घर के बरामदे में दादी माँ की शीश कटी देह पड़ी थी। भाई वहीं दादी से लिपटकर रोने लगे।मैं माँ से लिपटी ठिठक गयी, क्योंकि माँ वहीं ठिठक गयीं, परन्तु मुख वैसे ही भाव विहीन, कुछ घण्टों में मिले दारुण दुःख नें उन्हें बदल के रख दिया था। वहाँ से उठकर जब हम आगे आँगन में पहुँचे तो वहाँ का दृश्य देखकर दादा वहीं गिर पड़े, उनके सहन की क्षमता साथ छोड़ चुकी थी। वो भूमि पर पड़े मांस के लोथड़े की ओर दिखाकर उल्टी करने लगे। मैं भी माँ से लिपट गयी।”
ये बताते हुए दादी थर-थर, थर-थर काँप रहीं थीं। जैसे अभी भी सब आँखों के सामने ही हो।

” वहाँ का दृश्य ऐसा था कि देखकर क्रूरता भी लजा जाए। पूरे आँगन में रक्त ही रक्त था। आँगन के खंभे से विशेष दा नग्न बंधे थे, उनके शिश्न को काटकर फेंक दिया गया था। उनके गले व शरीर पर कई गहरे तलवार के घाव थे। जिनसे अब रक्त नें बहना बंद कर दिया था। रक्त बचा ही कहाँ था अब? और वह भी अब कहाँ शेष थे?और…. और पारुल दीदी उनके सामने ही भूमि पर रक्त से सनी हुई मृत पड़ी थीं। उनके हाथ उनके पीछे की ओर बंधे थे।देह पूर्णतः निर्वस्त्र। उनके स्तनों को जैसे दाँतों से नोच दिया गया था।

उनकी देह ऐसे दिख रही थी, जैसे कई भूखे भेड़ियों ने एक साथ नोच नोच के अपनी रक्त की प्यास बुझाई हो। उबकाई और भय से मैं वहीं बेसुध हो गयी।
ज्ञात नहीं कितने समय बाद जब चेतना लौटी तो मैंने अपने आपको और दादा को एक डोंगी में पाया। जिसे रमेश चाचा के भाई सोमेश चाचा खे रहे थे। उनके शरीर पर कई गहरे घाव थे। जिसपर बंधी कपड़े की पट्टियों से अब भी रक्त रिस रहा था।

दादा ने रोते रोते मुझे बताया कि गुलाम और फहीम के चले जाने के पश्चात सोमेश दादा चुपके से घर के पिछले दरवाजे से आये और माँ से वहाँ से भाग चलने को कहा, उन्होंने नदी पार करा देने की बात कही।माँ नें स्वयं आने से मना कर दिया, परन्तु दादा को सौगंध देकर, समझा बुझाकर मुझे और दादा को सोमेश चाचा के साथ भेज दिया। चारों ओर रात्रि का अँधियारा छाया हुआ था। हम कहाँ जा रहे थे, कुछ समझ नहीं आ रहा था। अँधियारा…जो न जाने कब छँटेगा? “

इसके पश्चात दादी की हिचकियाँ उनके नियंत्रण में न रहीं, इस करुण कथा को सुनाने के साथ ही उनके धैर्य का बन्धा टूट गया। केवल उनके फूट फूट के रोने की आवाज ही उस ट्रेन के डिब्बे में सुनाई दे रही थी और मेरे साथ वहाँ बैठे लोग केवल उन्हें एकटक देखे जा रहे थे। मुझे अबतक ये भान ही नहीं था कि ट्रेन के उस डिब्बे में हमारे अतिरिक्त भी कई लोग थे, जो कि यह कथा सुन रहे थे। कुछ औरतें ऐसी थीं, जो सुबक रहीं थीं।

इस सिसकियों से भरे सन्नाटे को तोड़ा उस व्यक्ति की आवाज नें, जिनसे इस कथानक के प्रारम्भ में मैं तर्क कर रहा था। वो थे उन दादी के बड़े भाई दिलीप दादा! उन्हीने आँसुओं से भरी आँखों को लिए भर्राई आवाज में कहना प्रारम्भ किया” जब मेरी बहन बेसुध हो गयी थी और सोमेश चाचा ने वहाँ से चलने के लिए कहा तो माँ ने मुझे ढाँढस बंधाते हुए कहा था कि वो पाखी को लेकर आयेंगी। उन्होंने सोमेश चाचा को निर्देश दिए कि नदी पार के ब्राह्मणों के गाँव में पिताजी के एक परिचित के साथ हम दोनों को कलकत्ता पहुंचवाने की व्यवस्था कर दें। वहाँ हमारे पिताजी की बहन रहती थीं।

सोमेश चाचा, जिनके परिवार का भी वही हाल हुआ था, जो कि पारुल दीदी और विशेष दा का। उनकी 6 माह की बेटी को उन पिशाचों ने भूमि पर पटक पटक के मार दिया था सोमेश चाचा की आँखों के सामने ही। उनके पत्नी और 7 वर्ष की बेटी को बीसो नरपशुओं नें नोच नोच कर मृत्यु मुख में फेंक दिया था। उनके 8 वर्ष के बेटे को कमर के पास से दो खण्डों में काट दिया था उन पामरों नें। सोमेश चाचा ने नदी में कूदकर अपनी रक्षा की।परन्तु इतने विकट कष्ट भोगने के पश्चात भी उन्होंने अनेक अनाथों को मेघना के पार पहुँचाया था, जो कि किसी भाँति बच गए थे, उनमें एक हम भी थे।हमें भी पिताजी के मित्र के पास पहुँचाकर वह पुनः हमारे गाँव में बचे किसी अन्य असहाय को बचाने वापस चले गए। वह एक अपराधबोध से भरे थे, कि अपने परिवार को अपनी आँखों के सामने मरते, कष्ट भोगते देख कर भी उन्हें बचा न सके।

उन्हें हमने पुनः कभी नहीं देखा, और न ही देखा कभी अपनी माँ को, न ही देखा कभी अपनी बहन पाखी को।”दिलीप जी अपने भर आये गले को संयत करने का प्रयास करते हुए भर्राई आवाज में कह रहे थे- “वर्षों बाद ज्ञात हुआ कि अगले दिन गुलाम सरवर के आदमियों नें हमारे गाँव को जला दिया।और इस प्रकार हमारे गाँव का अस्तित्व राख में बदलकर मेघना में बह गया। और उसी के साथ हमारी आस भी जल गई, आस अपने माँ और पाखी से मिलने की।”इतना कहकर दिलीप जी भी सिसकने लगे।

इसी के साथ उस डिब्बे में सिसकियाँ सिसकियों का साथ दे रहीं थीं। अनेक अन्य औरतें जो उस डिब्बे में ये कथा सुन रही थीं, उनकी हिचकियों से डिब्बे के वातावरण में दुःख का बोझ से बन रहा था, जिससे हम सब दबे जा रहे थे। और…और मेरी आँखों के अश्रुओं के साथ ही बहुत कुछ बहता जा रहा था। मेरी सहिष्णुता, मेरी सेकुलरता, मेरा वह विश्वास कि दोषी मनुष्य होता है, कोई पंथ या मजहब नहीं।

आप सही समझ रहे हैं! उस तर्क में वह व्यक्ति मैं ही था, जिसके मस्तिष्क में सेक्युलेरिज्म का प्रेत पैठा हुआ था, और वह दिलीप जी थे , जो मुझे वामपंथ-जनित छद्म सहिष्णुता का वास्तविक रूप बताना चाह रहे थे।

मुझे आजभी स्मरण नहीं कि कभी रेलगाड़ी की यात्रा में मैं इतना शांत, इतना विचारों के झंझावातों में फंसा कभी इतना चुपचाप रहा होऊँ, जितना उस कथानक के सुनने के बाद शेष यात्रा के घण्टों में रहा।दादी और दिलीप जी से पूरे यात्रा में अन्य बातें भी हुयीं, कि कैसे उनके पिताजी के मित्र के पलायन करते गाँव के लोगों के साथ वे सब कलकत्ता आये, कैसे नोआखली में मानव इतिहास में अबतक का सबसे बड़ा क्रूरता का नंगा नाच हुआ? क्या था गाँधी बाबा का दोष इस घटना में? सब। यह सब फिर कभी।अभी इतना ही कि, जब वाराणसी स्टेशन पर मैं उतरा तो मैने मैकाले-शिक्षा व लहरु के षड़यंत्र जनित सहिष्णुता व सेक्युलेरिस्म का बोझा वहीं ट्रेन में ही छोड़ दिया।

(इस कथानक को जितना मैंने दादी और दिलीप जी से सुना, उसे छोटे से छोटा करके बताने का प्रयास किया है। वह भी इस पटल के कुछ प्रियजनों के कई बार प्रेरित करने पर। उस वीभत्सता को जितना कम से कम वीभत्स करके कह सकता था, कहा।जो बताया, वह इसलिए कि ज्ञात हो कि आजभी ये विश्व जिनसे त्रस्त है , वह सदैव से ऐसे ही क्रूर हैं, ऐसे ही पशु हैं, बर्बर, बलात्कारी, फहीम की तरह छल करने वाले।

अतः सावधान!

आप पर है,साझा करें या स्वयं तक रखें।परन्तु सजग रहें! वह संकट आजभी वैसा ही है। देर है तो उनके इस देश के प्रत्येक क्षेत्र में प्रभाव प्राप्त करने का।सर्वत्र शरिया होगा, सर्वत्र आयतों की कर्कश ध्वनि होगी और सर्वत्र दिखेगा नोआखली! )मेरी प्रत्योक्षकरणक्षमता(विजुअलाइजेशन पॉवर)काफ़ी ज़्यादा है,तो मुझे एक एक दृश्य दिखाई पड़ रहा था, समय,अभी भी वैद्य और उनके पूरे परिवार समेत उनके पड़ोसी की चींखें और खून से लथपथ कटे फटे शरीर सामने दिख रहे हैं।जो उस कालखंड में हुआ,अगर आप सोचते हैं दोहराया नहीं जाएगा तो आप नादान हैं।आपने शस्त्र विद्या लेना हिंसक समझा,आपने अपनों बच्चों को खेल और नृत्य और बॉलीवुड के गानों की धुनों पर नाचना सिखाया,हां वो सिखाना ग़लत नहीं है,पर आत्मरक्षा करना,और जेहादियों पर विश्वास ना करना सबसे आवश्यक है,क्यूंकि अगर वो ना सीखा तो सब बेकार हो जाएगा,आपका धन,आपका वैभव,आपके कॉन्टैक्ट,आपके मंत्रियों और सेलेब्स के साथ चित्र,आपका रसूख,आपका पद किसी भी काम नहीं आएगा। मेरे मित्र विकास सिंह दिल्ली के उस इलाके से आते हैं,जहां दिल्ली दंगे हुए थे,अंकित शर्मा जिसको चाकुओं से गोदा गया था वो उनके मोहल्ले में ही हुआ था,वो बताते हैं सेक्युलरिज्म की कीमत।

कोई आपका साथ देने नहीं आएगा,जब ला इलाहा इल अल्लाह के नारों के साथ वहशी भीड़ आपके बंगले के सामने आएगी,तब आपके पास अगर शस्त्र नहीं हैं,और शस्त्र चलाने का ज्ञान नहीं है तो पुनः डायरेक्ट एक्शन डे होगा,पर इस बार शहर आपका होगा,घर आपका होगा,परिवार आपका होगा।इसलिए अब विनती करता हूं,अब भी अपने मन मस्तिष्क से ये बाहर कर दीजिए कि कोई फरहान कोई हलीमा, कोई फातिमा,कोई अली,कोई इरफान आपके साथ वर्षों से दोस्ती निभा रहा है/रही है तो वो इस समय आपका साथ देगा/देगी।दिल्ली,श्रीनगर,बंगाल,कवर्धा,
कैराना,मेवात,नाम गिनते जाइए जो हाल फिलहाल में घटा है,पीछे जाएंगे तो भारत का लगभग हर शहर घायल हुआ है,और दोबारा हो सकता है,क्यूंकि उनकी मानसिकता नहीं बदली है।वो अपनी आसमानी किताब में रोज़ काफिरों को कत्ल करने की बात दोहराते हैं,वो बार बार लाउडस्पीकर से चिल्लाते हैं,ला इलाहा इल्लल्लाह” जिसका शाब्दिक अर्थ है “अल्लाह के अलावा कोई दूसरा भगवान नहीं है”.इसकी अगली पंक्ति है “मुहम्मदूं रसूल अल्लाह” यानी मुहम्मद अल्लाह के पैगंबर हैं.आप तब भी नहीं समझते,या तो आप बहरे हैं या बहरे होने का ढोंग कर रहे हैं,ढोंग करने वालों को धमाके भी नहीं सुनाई देते,पर सुनें ओ ढोंग करने वालों,अब जो धमाकों की तैयारी वो मस्जिदों और मदरसों में कर रहे हैं वो आपके चीथड़े उड़ा देगा,बॉम्ब बनाने की ट्रेनिंग कितनी बार एक्सपोज़ हुई है यूपी और बिहार में ये मत भूलें आप,आप एक बुलबुले में जी रहे हैं,जिसके अंदर आपको सब अच्छा अच्छा दिख रहा है,पर जब ये बुलबुला फूटेगा तब आप धड़ाम से धरा पर गिरेंगे,इसलिए ये लेख पढ़ने के बाद भी अगर कोई सेक्युलर बना रहना चाहता है,तो मुझसे और मुझ जैसे अनेक भाई बहनों से दूरी बना ले,क्यूंकि अब हमें अपने साथ सेक्युलर दीमकों को नहीं रखना।।

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क्या यह आश्चर्य का विषय नहीं है कि अलग देश बनवाने के बाद भी वे भारत में क्यों रहे ?

इन लोगों की भयावह चाल को कभी भी हम भारतीयों को सफल नहीं होने देना चाहिए।

बॉलीवुड के तथाकथित देशभक्तों के पास वास्तव में अपने पिता, दादा या परदादा के पापों का जवाब देने के लिए केवल झूठ ही है।

शुरुआत हम शबाना आजमी के पिता कैफी आजमी से कर सकते हैं।
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उन्होंने पाकिस्तान के निर्माण का जश्न मनाते हुए कविताएँ लिखीं। कैफ़ी आज़मी विभाजन के समर्थक थे और उन्होंने विभाजन से ठीक पहले एक कविता लिखी थी “अगली आय में” (अगली ईद पाकिस्तान में)।
कैफी आज़मी पाकिस्तान गये और कुछ ही दिनों में वापस आ गया। फिर वे यहीं बस गये I अब उनके बच्चे हमें ज्ञान देते हैं कि उनके माता-पिता भारत से कितना प्यार करते थे।

इप्टा (इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन) कम्युनिस्ट पार्टी का सांस्कृतिक मोर्चा था और आज भी है I
शबाना आज़मी इप्टा की सक्रिय प्रस्तावक हैं। यह कम्युनिस्ट विचारधारा के तहत था कि कैफ़ी और यहां तक कि साहिर लुधियानवी जैसे लेखकों ने पाकिस्तान के निर्माण का समर्थन किया।

साहिर लुधियानवी भी वास्तव में लगभग 6-7 महीने पाकिस्तान में रहा फिर उसने भारत सरकार से वापस आने और यहां रहने की अनुमति देने की गुहार लगाई।

फिर भी कैफ़ी और साहिर और नासर के पिता जैसे लोग ‘न्यू मदीना’
(पाकिस्तान) के पक्ष में लगातार कविताएँ लिख रहे थे और भाषण दे रहे थे।

जावेद अख्तर के परदादा मौलाना फजले हक खैराबादी ने 1855 में अयोध्या में प्रसिद्ध हनुमान गढ़ी मंदिर पर कब्जा करने और उसे गिराने के लिए फतवा दिया था।पर अंग्रेजों ने वास्तव में इन मुस्लिम आक्रांताओं से हनुमान गढ़ी के अयोध्या मंदिर को बचाया।

इसी कारण खैराबादी ने अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद का आह्वान किया, जिसके लिए उन्हें पकड़ लिया गया और काला पानी भेज दिया गया।
वह 1857 के बाद भी अंग्रेजों के प्रति वफादारी की याचना करता रहा I तब अंग्रेज़ो ने दया की I

लेकिन खैराबादी तब भी दूसरे मुसलमानो को जिहाद करने और मरने मारने के लिए उकसाता रहा I जान निसार अख्तर के दादाजी ने विनती की और अंग्रेजों ने उनकी वफादारी के बदले में नरमी बरती।फिर उन्होंने खुद एक भव्य और शानदार जीवन व्यतीत किया I

अब नसीरुद्दीन शाह के परिवार पर आते हैं। उनके परदादा जन-फिशन खान ने 1857 में अंग्रेजों का समर्थन किया, सरधना में एक जागीर और एक हज़ार रुपये की पेंशन प्राप्त की।उनके पिता, अली मोहम्मद शाह, एक मुस्लिम लीग सदस्य, बहराइच, यूपी से थे। उन्होंने पाकिस्तान को वोट दिया, इंग्लैंड में रेस्टोरेंट खोलना चाहता था I पर कहीं नहीं जा पाया और यहीं रुके रहे I इसी तरह यूपी/महाराष्ट्र/तमिलनाडु/केरल/बिहार के मुसलमानों ने पाकिस्तान को वोट दिया पर वे भी पाकिस्तान नहीं गए।

अब नसीर खान हमें ज्ञान देते हैं कि उनके परिवार का भारत के प्रति गहरा प्रेम है।

अब मजरूह सुल्तानपुरी का एक और मामला लें। उन्होंने भी पाकिस्तान की महानता पर कविताएँ लिखीं पर कुछ दिनो में भारत लौट आये फिर यहीं रुके रहे I

मुस्लिमों में से बहुत शातिर क़िस्म के लोग भी जिनमें उनका नेतृत्व भी शामिल है, पाकिस्तान के लिए रवाना हुए पर उन्होंने भारत में परिवार का एक हिस्सा आबाद रखा I राजा महमूदाबाद जैसे कुछ लोग यूपी में संपत्ति का दावा करने के लिए बुढ़ापे में वापस आए (मामला चल रहा है)।

उन्होंने जिन्ना (उनके मामा) को वित्त पोषित किया। इस मामले को आखिरकार सुलझा लिया गया और @narendramodi सरकार ने संपत्ति को बचाने के लिए शत्रु संपत्ति अधिनियम में संशोधन किया। कांग्रेस उन्हें संपत्ति देने के लिए पूरी तरह तैयार थी।

“पाकिस्तान की विचारधारा” शब्द का इस्तेमाल पहली बार 1971 में याह्या खान के सूचना मंत्री मेजर जनरल शेर अली खान पटुआदी द्वारा किया गया था। क्या आप जानते हैं कौन है ये पटौदी? जी हां, सैफ अली खान पटुआदी के अंकल। सैफ के दादा यहां क्यों रुके थे? क्योंकि यहां उनकी संपत्ति बहुत ज्यादा थी।

सैफ के बड़े चाचा मज्र. जनरल इसफंदयार अली खान पटौदी आईएसआई के उप निदेशक थे। एक और परदादा मामा एम.जे.आर. जनरल शेर अली पटौदी पाक सेना में जनरल स्टाफ के प्रमुख थे, एक और महान चाचा शहरयार अली पटौदी पीसीबी के अध्यक्ष थे।

यह सब बहुत सोचा समझा प्लान था। इनका विचार भारत की राजनीति में घुसपैठ करना और पाकिस्तान के लिए अनुकूल परिवर्तन करवाते रहना सरकारी शासन तन्त्र पर कब्जा करना था I

जो लोग पाकिस्तान चाहते थे, वे योजना अनुसार नहीं गए और जो पंजाब और एनडब्ल्यूएफपी (पठानों) को नहीं चाहते थे, उन्हें मिल गया।

हैदराबाद के मुसलमानों ने वैसे भी सोचा था कि उनका एक अलग देश होगा I नवाब ने रु 1947 में पाकिस्तान को मदद के लिए 150 करोड़ ओवैसी के पिता (जो रजाकार थे) को दिये पर वह रक़म उन्होंने लंदन के एक बैंक में जमा करवा दिया। ओवैसी अब ज्ञान बाँट रहे हैं कि वे भारत से कितना प्यार करते हैं I

पाकिस्तान से वापस आने वालों की लिस्ट लम्बी है I बिहार से सैय्यद हुसैन इमाम, एम. मो. मद्रास से इस्माइल, आदि, मुस्लिम लीग के कुछ नेता भी भारत में वापस आ गए थे।

इन सभी मुस्लिमों ने पाकिस्तान को भारतीय मुसलमानों की मातृभूमि के रूप में बनाया था I ख़ुद ऐसे नेता वापस रहने की अनुमति लेकर भारत में बस गये I मेरी राय में उन्हें भारत आने देने का कोई औचित्य नहीं था।
महमूदाबाद के राजा, बेगम एजाज रसूल, पीरपुर के राजा, मौलाना हसरत मोहानी आदि पाकिस्तान के बड़े पैरोकार पाकिस्तान नहीं गए I उनके वंशज यहां ज्ञान देते हैं।

विडंबना यह है कि लतीफ़ी, जो पाकिस्तान के वास्तुकारों में से एक थे और पाकिस्तान के निर्माण के एक उत्साही समर्थक थे, नए देश में नहीं गए। लतीफी 1950 के दशक में खुशवंत सिंह के पिता द्वारा दिए गए फ्लैट में रहते थे और फिर उन्हें अपना ठिकाना मिल गया। दिल्ली में मरे, बनवाकर भी पाकिस्तान नहीं गए।

इसके अलावा, आजम खान की प्रसिद्धि के रामपुर ने, रामपुर राज्य को पाकिस्तान में शामिल करने की मांग करते हुए, सरकारी भवनों को आग लगाकर एक आंदोलन शुरू किया।

आप उस सबसे बड़े बदमाश को जानते हैं जिसने मुस्लिम लीग (1945-46 में जिन्ना द्वारा इस्तेमाल किया गया) का घोषणापत्र लिखा था, पाकिस्तान के विचारक, बॉम्बे हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करते रहे और कभी पाकिस्तान नहीं गए। उन्हें इस देश में रहने और अभ्यास करने की इजाजत कैसे दी गई। पाकिस्तान के लिए उनका योगदान इकबाल से भी बड़ा है, फिर भी वे कभी नहीं गए। यदि आप पाकिस्तान में मुसलमानों के लिए एक मातृभूमि बनाने में इतने निवेशित थे और घोषणापत्र, वैचारिक कारणों को लिखा और इसे इकबाल के आध्यात्मिक संदेशों के साथ मिला दिया, तो भी वह नहीं गए, लेकिन उस भूमि पर रहे जिससे वे नफरत करते थे और छुटकारा पाना चाहते थे।

मुझे इस सब में संयोग नहीं दिखता, मुझे एक भयावह मकसद दिखाई देता है।

जैसा कि सरदार पटेल ने कोलकाता 1949 में कहा था, “कल तक आप पाकिस्तान चाहते थे, उसे वोट दिया और अब आप भारत से प्यार करने का दावा करते हैं, मैं आप पर कैसे विश्वास करूं ?
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“आओ बच्चों सैर कराएँ तुमको पाकिस्तान की, इसकी खातिर हमने दी कुर्बानी लाखों जान की….पाकिस्तान जिंदाबाद-पाकिस्तान जिंदाबाद”

हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में पचास के शुरुआती दशक के सुप्रसिद्ध बाल कलाकार रतन कुमार, जिनका असली नाम सैयद नज़ीर अली रिज़वी था. जिन्होंने उस दौर में दो बीघा जमीन (१९५३) बूट पॉलिश (१९५४) और जागृति (१९५४) में बतौर बाल कलाकार यादगार भूमिकाएँ निभाई थीं, जिसने उन्हें खूब नाम और शोहरत दी.

वहीं जागृति फिल्म का, कवि पंडित प्रदीप द्वारा लिखा गया अमर गीत “आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की, इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की” कौन भूल सकता है, तब से लेकर आज तक की पीढ़ियाँ इसे गाती हैं, सराहती हैं.

१९५६ में रतन कुमार उर्फ़ सैयद नज़ीर अली रिज़वी भारत से पाकिस्तान चले जाते हैं. वहाँ वे रतन कुमार नाम को ही नहीं भारत के नाम और पहचान को भी दफ़न कर देते हैं,

पाकिस्तान में उनके अन्दर का मुसलमान न केवल जाग जाता है, बल्कि उन पर हावी हो जाता है, जो बच्चा दो साल पहले ‘जागृति’ फिल्म में भारत की मिट्टी को तिलक कर रहा था, वन्देमातरम के नारे लगा रहा था, वह पाकिस्तान पहुँचते ही १९५७ में ‘बेदरी’ नाम से ‘जागृति’ फिल्म का रीमेक बनाता है, और इसमें वो गाता है “आओ बच्चों सैर कराएँ तुमको पाकिस्तान की, इसकी खातिर हमने दी कुर्बानी लाखों जान की….पाकिस्तान जिंदाबाद-पाकिस्तान जिंदाबाद”

जो सैयद नजीर, दो साल पहले शिवाजी और महाराणा प्रताप की जय कर रहा था, वह पाकिस्तान पहुँचते ही गाता है “यह है देखो सिंध यहाँ जालिम दाहिर का टोला था, यहीं मोहम्मद बिन कासिम अल्लाह हो अकबर बोला था”

आगे उन्होंने और भी फ़िल्में की वहाँ, पर वह सफलता नहीं मिली, जिसका स्वाद उन्होंने भारत में चखा था और जिस इरादे से वो पाकिस्तान गए थे. अस्सी के दशक में वो अमरीका जाकर बस गए और २०१६ में चल बसे.

यहाँ दो बातें हैं, एक तो यह कि जमातियों के लिए राष्ट्र, मिट्टी और धरती कुछ नहीं होता, वे मजहब की खातिर चाँद पर भी बस जाएँगे तो धरती को गाली देंगे, धरती के खिलाफ षड्यंत्र करेंगे, मजहब के लिए गिरोहबंदी से लेकर फिदायीन हो जाने के इतर उनका कोई जीवन दर्शन नहीं है.

और दूसरा यह कि तस्वीरें भी रंग बदलती हैं, हमें तस्वीरों पर भी नजर रखनी चाहिए, उनका फॉलो अप लेना चाहिए. आपको प्रिंस याद है ! बोरवेल में गड्ढे में गिर जाने के बाद, इस लाइन का पहला सेलेब्रिटी, जिसे उस समय काफी नाम और पैसा भी मिला और अभी कहाँ है, किसी को नहीं पता. मैराथन बॉय बुधिया, जिसमें हम भारत के लिए ओलम्पिक गोल्ड मेडलिस्ट खोज रहे थे, अब कहाँ है वो?

सूटकेस के पहियों से कितने किलोमीटर की यात्रा हो सकती है ? वो बच्चा, जिसकी बाँह पकड़कर ट्रक में चढ़ाया जा रहा है, उसे चढ़ाने में कितना वक्त लगा होगा, क्या अब वो कहीं पहुंचा नहीं होगा, क्या हम उसे अपनी स्मृतियों में ऐसे ही लटकाए रहेंगे?

जो कहीं से चलता है, वो कहीं पहुँचता भी है, कोई भी यात्रा अनंत नहीं हो सकती.

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वही कहानी, वही तरीका केवल नाम भेद: हिन्दुओं तुम कब सीखोगे

#डॉ_विवेक_आर्य

स्थान-हज़रत सैयद अली मीरा दातार दरगाह, उनावा ग्राम, जिला मेहसाणा, गुजरात
पात्र- सय्यद अली उर्फ़ हज़रत सैयद अली मीरा दातार
पूर्वज- बुखारा से दादा और पिता भारत इस्लाम का प्रचार करने आये थे
जन्म- रमजान महीने की 29 तारीख,अहमदाबाद
कार्य- गुजरात के सुलतान अहमद की सेना में सिपाहसालार
मृत्यु- हिन्दू राजा मेहंदी ने जो मांडगाव की छोटी से रियासत जिसके अंतर्गत 12 ग्राम थे से युद्ध में सय्यद अली का सर अपनी तलवार से काट दिया था।
मृत्यु के पश्चात गुजरात के सुल्तान ने इस स्थान पर उसकी दरगाह बनवा दी।
चमत्कारों की सूची-

१. सय्यद अली की माँ की अकाल मृत्यु हो गई। उसकी दूसरी माता को दूध नहीं था। सैयद अली ने चमत्कार किया। उससे दूध आने लगा।

२. हिन्दू राजा के सर काटने के बाद भी उसका धड़ बिना सर के तलवार चलाता रहा और उसने राजा का काम तमाम कर दिया।

३. इसकी दरगाह में मन्नत मांगने वालों को संतान पैदा हो जाती है। दूर दूर से लोग अपने पारिवारिक मनोरोगी सदस्यों को दरगाह में लाते हैं। इसे भूत भगाने वाली दरगाह के नाम से भी जाना जाता है। दरगाह के चमत्कार से अनेकों के मनोरोग, पथरी, कोढ़ आदि बीमारियां दूर हो गई।

दरगाह में मन्नत मांगने वाले अधिकांश हिन्दू है जो गुजरात के अनेक जिलों से प्रतिदिन आते हैं। साबरकांठा आदि जिलों से हिन्दू भील समुदाय के लोग भी आते हैं। दरगाह का संचालन मुस्लिम खादिमों द्वारा होता है। जिनके परिवार इसी ग्राम में रहते हैं।

वही यक्ष प्रश्न-

कुछ सामान्य से 10 प्रश्न हम पाठकों से पूछना चाहेंगे?

1 .क्या एक कब्र जिसमें मुर्दे की लाश मिट्टी में बदल चूंकि है वो किसी की मनोकामना पूरी कर सकती है?

2. सभी कब्र उन मुसलमानों की है जो हमारे पूर्वजों से लड़ते हुए मारे गए थे, उनकी कब्रों पर जाकर मन्नत मांगना क्या उन वीर पूर्वजों का अपमान नहीं है जिन्होंने अपने प्राण धर्म रक्षा करते की बलि वेदी पर समर्पित कर दिये थे?

3. क्या हिन्दुओं के राम, कृष्ण अथवा 33 कोटि देवी देवता शक्तिहीन हो चुकें है जो मुसलमानों की कब्रों पर सर पटकने के लिए जाना आवश्यक है?

4. जब गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहाँ हैं की कर्म करने से ही सफलता प्राप्त होती हैं तो मजारों में दुआ मांगने से क्या हासिल होगा?

5. भला किसी मुस्लिम देश में वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, हरी सिंह नलवा आदि वीरों की स्मृति में कोई स्मारक आदि बनाकर उन्हें पूजा जाता है तो भला हमारे ही देश पर आक्रमण करने वालों की कब्र पर हम क्यों शीश झुकाते है?

6. क्या संसार में इससे बड़ी मूर्खता का प्रमाण आपको मिल सकता है?

7.. हिन्दू जाति कौन सी ऐसी अध्यात्मिक प्रगति मुसलमानों की कब्रों की पूजा कर प्राप्त कर रहीं है जिसका वर्णन पहले से ही हमारे वेदों- उपनिषदों आदि में नहीं है?

8. कब्र पूजा को हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल और सेकुलरता की निशानी बताना हिन्दुओं को अँधेरे में रखना नहीं तो ओर क्या है?

9. इतिहास की पुस्तकों में गौरी – गजनी का नाम तो आता हैं जिन्होंने हिन्दुओं को हरा दिया था पर मुसलमानों को हराने वाले राजा सोहेल देव पासी का नाम तक न मिलना क्या हिन्दुओं की सदा पराजय हुई थी ऐसी मानसिकता को बना कर उनमें आत्मविश्वास और स्वाभिमान की भावना को कम करने के समान नहीं है?

10. इस्लामिक देशों में पैदा हुए प्रचारकों का भारत की धरती पर आने का प्रयोजन समझने में हिन्दुओं को कितना समय लगेगा?

हिन्दुओं यह आपके लिए आत्मचिंतन का समय है। जागो।

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एक बार वाल्मीकि बस्ती के मंदिर में मोहनदास गाँधी कुरान का पाठ कर रहे थे

तभी भीड़ में से एक औरत ने उठकर गाँधी से ऐसा करने को मना किया

गाँधी ने पूछा : क्यूँ ?

तब उस औरत ने कहा कि ये हमारे धर्म के विरुद्ध है

गाँधी ने कहा . मैं तो ऐसा नहीं मानता . ..

औरत ने जवाब दिया कि हम आपको धर्म में व्यवस्था देने योग्य नहीं मानते ..

गाँधी ने कहा कि इसमें यहाँ उपस्थित लोगों का मत ले लिया जाये

औरत ने जवाब दिया कि क्या धर्म के विषय में वोटों से निर्णय लिया जा सकता है ?

गाँधी बोले कि आप मेरे धर्म में बाधा डाल रही हैं ..

औरत ने जवाब दिया कि आप तो करोड़ों हिंदुओं के धर्म में नाजायज दखल दे रहे हैं ..

गाँधी बोले : मैं तो कुरान सुनूँगा ..

औरत बोली : और मै इसका विरोध करूँगी .

और तब औरत के पक्ष में सैकड़ो वाल्मीकि युवक खड़े हो गये और कहने लगे कि मंदिर में कुरान पढ़वाने से पहले किसी मस्जिद में गीता या रामायण का पाठ करके दिखाओ तो जानें ..

विरोध बढ़ते देखकर गाँधी ने पुलिस को बुला ली . पुलिस आयी और विरोध करने वालों को पकड़ ले गयी और उनके विरुद्ध दफा 107 का मुकदमा दर्ज करा दिया गया , और इसके पश्चात गाँधी ने पुलिस सुरक्षा में उसी मंदिर में कुरान पढ़ी ..

* ( देश के बँटवारे पर लिखी पुस्तक ‘ विश्वासघात ‘ से ) ** लेखक- गुरुदत्त
अब आप जिसे राष्ट्रपिता समझते हो उसकी सोच हिन्दुओ के प्रति क्या थी आप अंदाजा लगा सकते हो

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यहज़हरकहांसेआता_है ???

इतिहास में सैकड़ों ऐसी घटनाएं दर्ज हैं जहां हिंदू से नये नये मुसलमान बने लोगों ने हिंदुओं पर अवर्णनीय अत्याचार किया या अगर अत्याचार करने की स्थिति में नहीं थे तो हिन्दू-द्रोह और देश-द्रोह में कोई कसर नहीं छोड़ी । समय और स्थान की बाध्यता का ध्यान रखते हुए मैं सिर्फ पांच ऐसे उदाहरण लूंगा जो अपने आप में क्लासिकल है और जिसके विषय में आप लोगों में से अधिकतर लोग थोड़ा-बहुत जानते हैं।

  1. #सुहा_भट्ट कश्मीर का एक सम्मानित और प्रसिद्ध ब्राह्मण था और सिकन्दर बुतसिकन का समकालीन । 1389 से 1413 के दौरान सिकन्दर (बुतसिकन) की बादशाहत थी । सिकन्दर हिन्दू धर्म और मूर्तियों का इतना बड़ा दुश्मन था कि उसे “बुतशिकन” यानि “मूर्तिभंजन” की उपाधि मिली थी/है। इस दौरान कश्मीर में हिंदुओं के ऊपर बहुत अत्याचार हो रहा था । सुहा भट्ट को भी मुसलमान बनाने के लिए सताया गया। प्रारंभ में उसने उसका विरोध किया लेकिन बाद में उसने इस्लाम स्वीकार कर लिया। इस्लाम स्वीकार करने के बाद उसे सिकन्दर बुतसिकन ने अपना प्रधानमंत्री बना दिया और सुहा भट्ट “#सैफुद्दीन” के नये नाम से प्रसिद्ध हुआ । कश्मीर के सुल्तान का प्रधानमंत्री होने के कारण उसके पास बहुत शक्तियां थी। सुल्तान स्वयं एक कट्टरपंथी मुस्लिम था । लेकिन मैं अभी सुल्तान के अत्याचारों की बात नहीं करूंगा।

सुहा भट्ट यानि सैफुद्दीन ने जो किया उसका संक्षिप्त वर्णन कर रहा हूं । सुहा भट्ट यानी नए धर्म परिवर्तित सैफुद्दीन ने अनंतनाग जिले में ही लगभग 300 मंदिरों का विनाश किया । उसी के समय विश्व प्रसिद्ध मार्तंड मंदिर को तोड़ा गया । यह मंदिर इतना मजबूत था कि इसे तोड़ने में एक वर्ष के बाद भी जब सफलता नहीं मिली तो इसकी नींव को खुदवा कर इसे पूरी तरह नष्ट करने का प्रयास किया। बाद में इसमें आग लगा दी गई। कश्मीर के अनंतनाग जिले में यह स्थान अब मट्टन (मार्तंड का तद्भव “मट्टन”) के नाम से जाना जाता है ।

सुहा भट्ट का आदेश था जितने भी मंदिर हैं उनमें जो भी मूर्तियां सोने, चांदी या कीमती धातुओं की मिले उन्हें उठाकर पिघला दिया जाए और राजकोष में जमा कर दिया जाए। जिन्हें तोड़ा जा सकता है उन्हें तोड़ दिया जाए और जिसे तोड़ा नहीं जा सकता उनमें मानव मल से प्रतिदिन स्नान कराया जाए। कश्मीरी पंडितों का इस दौरान सामूहिक धर्मांतरण हुआ। जिन्होंने धर्मांतरण नहीं किया या तो मार डाले गये या कश्मीर से भगा दिए गए। उनकी भूमि, सम्पत्ति छीन ली गई। यह सब कुछ इतिहास में दर्ज है।

कश्मीर से अधिक बेहतर लिखित इतिहास भारत के किसी अन्य राज्य या क्षेत्र का नहीं है। आप सभी को पता है कि भारत का पहला इतिहासकार कल्हण (बारहवीं शताब्दी) कश्मीरी पंडित था जिसने “राजतरंगिणी” (1148-49) में कश्मीर सहित भारत के अन्य राजाओं के इतिहास का भी वर्णन किया है। कल्हण के बाद उस परंपरा को जारी रखते हुए दूसरे कश्मीरी पंडित “जोनाराजा” (चौदहवीं शताब्दी) ने “द्वितीय राजतरंगिणी” की रचना की और उनके शिष्य “श्रीवर” ने तृतीय राजतरंगिणी की रचना की।

उपरोक्त विवरण द्वितीय राजतरंगिणी में लिपिबद्ध हैं। जोनाराजा लिखते हैं कि सुहाभट्ट यानी सैफुद्दीन के समय में कश्मीर घाटी में अभी भी हिंदू बहुसंख्यक थे। सुहाभट्ट यानी (इस्लाम में नया नाम प्राप्त किया हुआ) सैफुद्दीन ने कल के अपने ही पंडित भाइयों के ऊपर बहुत अत्याचार किए। अब सवाल यह आता है कि कल का कश्मीरी ब्राह्मण आज इतना बड़ा कट्टरपंथी मुसलमान बनकर इतने अत्याचार क्यों करता है ? मुसलमान बनने के बाद उसने ऐसा क्या सीखा, क्या समझा जिसकी वजह से वह अपने ही भाइयों का और संपूर्ण कश्मीरी संस्कृत का दुश्मन हो गया। कलमा पढ़ा, आसमानी किताब पढ़ी और मौलवियों से दीक्षा ली बस। तैयार हो गया मानवता और मानव संस्कृति को नष्ट करने वाला ज़हर।

२. #अल्लामा_इक़बाल

अल्लामा मोहम्मद इकबाल के पूर्वज, अधिकतर कश्मीरी मुस्लिमों की तरह ब्राह्मण थे। इनका गोत्र सप्रू था और ये शैव मत का अनुयायी था। उनके पिता भी जन्म से हिन्दू थे और उनका नाम रतन लाल सप्रू था। वे लोग शोपियां से कुलगाम जाने वाली सड़क पर स्थित सपरैन नामक गांव में रहते थे, इसी कारण उन्हें सप्रू कहा जाता था। कुछ लोग इन्हें आज के “सोपोर” का रहने वाला बताते हैं जिससे ये “सोपोरू” (सप्रू) कहलाया। बाद में यह परिवार श्रीनगर चला गया और श्रीनगर से सियालकोट (अब पाकिस्तान) जो भारत के पठानकोट से बहुत निकट ही सीमा पार है।
लेकिन मुसलमान बनने के बाद यह कितना जहरीला हो गया इसका अनुमान आप इस बात से लगाइये कि इक़बाल को पाकिस्तान का मानस पिता (ideological father) कहा जाता है। 29 दिसंबर 1930 को इलाहाबाद में जब “अल्लामा इकबाल” की अध्यक्षता में मुस्लिम लीग का 25 वां सम्मलेन हुआ तब इकबाल ने अपने भाषण के दौरान यह कहा था:

हो जाये अगर शाहे-खुरासां का इशारा ,
सिजदा न करूँ हिन्द की नापाक जमीं पर।

यानी

“अगर तुर्की (खुरासान, अब यह ईरान का उत्तरी राज्य है) का खलीफा इशारा भी कर दे तो भारत की नापाक (अपवित्र) जमीन पर नमाज भी नहीं पढूंगा।”

चूँकि नापाक का अर्थ अपवित्र होता है, और उसका विलोम शब्द “पाक” यानि पवित्र होता है| यही शब्द पाकिस्तान की नींव बनी। पाकिस्तान एक विचार था जो अल्लामा इकबाल के दिमाग की उपज थी।

जब 1913 में रवींद्र नाथ टैगोर को बांग्ला भाषा में उनकी कृति “गीतांजलि” पर नोबल पुरस्कार मिला तो अल्लामा इक़बाल बहुत व्यथित था। रवींद्र नाथ टैगोर पहले एशियाई थे जिन्हें नोबल पुरस्कार मिला था। इसके पूर्व एशियाई मूल के किसी भी व्यक्ति को किसी भी विषय में नोबल नहीं मिला था। इक़बाल को इस बात का बहुत दुःख था फारसी की बजाय बांग्ला को पुरस्कार कैसे मिला और किसी मुसलमान (उसे स्वयं को) की बजाय टैगोर ( एक हिंदू ब्राह्मण) को कैसे मिला। इक़बाल ने तुर्की के खलीफा को पत्र लिखकर प्रार्थना की कि वह नोबल कमीटी से यह पुरस्कार निरस्त करायें।

सवाल वही है कि बस एक पीढ़ी बाद ही अपने देश जाति, धर्म, समाज और गैर-मुस्लिमों से इतनी धृणा?

तो ये ज़हर कहां से आता है?

३. #मोहम्मदअलीजिन्ना: (25 दिसंबर 1876 -11 सितंबर 1948)

जिन्नाह, मिठीबाई और जिन्नाहभाई पुँजा की सात सन्तानों में सबसे बड़ा था। उनके पिता जिन्नाभाई एक सम्पन्न गुजराती व्यापारी थे, लेकिन जिन्ना के जन्म के पूर्व वे काठियावाड़ छोड़ सिन्ध में जाकर बस गये। जिन्नाह के पूर्वज हिन्दू राजपूत थे, जिन्होंने इस्लाम क़बूल कर लिया।
बताने की आवश्यकता नहीं कि उसने भारत और उसकी संस्कृति को कैसे तार तार किया। वह लगभग बीस लाख लोगों की मौत कि कारण बना और उसके कारण डेढ़ करोड़ बेघर हुए। हजारों महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। पीढ़ियां नष्ट हो गयी और पाकिस्तान नाम का नासूर जाने कितने वर्षों तक हमें खाता रहेगा। आज पाकिस्तान आतंकवाद की नर्सरी है। एक क्षत्रिय राजपूत व्यापारी से मुसलमान और बैरिस्टर फिर इस्लाम का अलम्बरदार। आखीर में मानवता का दरिन्दा।

तो ये ज़हर कहां से आता है?

४. #शेख #और #फारूक_अब्दुल्ला:

फारूक़ के पिता शेख़ अब्दुल्ला कश्मीर के बड़े राजनीतिज्ञ थे। राजनीतिक दल ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस’ की स्थापना उन्होंने की थी जिसे पहले ‘मुस्लिम कॉन्फ्रेंस’ कहा जाता था। शेख़ कश्मीर के भारत में विलय से पहले उसे मुस्लिम देश बनाना चाहते थे।

अपनी आत्मकथा (ऑटोबायोग्राफी) ‘आतिश-ए- चिनार’ में इसका ज़िक्र किया है कि उसके पूर्वज हिंदू और कश्मीरी पंडित थे। इस पुस्तक में उसने बताया है कि उसके परदादा का नाम #बालमुकुंदकौल था। उसके पूर्वज मूल रूप से #सप्रू गोत्र के #कश्मीरीब्राह्मण थे।

तीन पीढ़ियों की इनकी करतूतों और इनके विषय में अभी कुछ बताने की आवश्यकता है क्या?

शेख अब्दुल्ला देश द्रोह के आरोप में अपने ही भाई “नेहरू” द्वारा जेल में डाला गया था। फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला अभी देशद्रोह के कारण ही preventive detention में हैं।

५. #ओवैसी

तुलसीराम_दास एक तैलंग हिन्दू था। अपनी योग्यता के कारण निज़ाम के यहां अच्छे पद पर नौकरी मिल गयी। फिर निज़ाम के प्रभाव में आकर कलमा पढ़ा। फिर रजाकार बन गया। भारत विभाजन के समय तेलंगाना के हिन्दुओं पर तमाम अत्याचार किया।

अब उसका एक परपोता संसद से हैदराबाद तक हिन्दू-द्रोह का नेता है। वह CAA विरोध के अग्रणी नेताओं में है। उसका छोटा भाई सामाजिक वैमनस्य फैलाने के लिए जेल जा चुका है। उसने भाषण में कहा था “बस पंद्रह मिनट के लिए पुलिस हटा लो हम बता देगे हम कौन हैं।”

तो ये ज़हर कहां से आता है?

आज पूरी दुनिया में आसमानी किताब की शिक्षा आतंकवाद का दूसरा नाम है।

निदा फ़ाज़ली तक के मुंह से निकल गया:

उठ-उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गए,
दहशत गरों के हाथ में इस्लाम रह गया।

रवि कांत

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वेटिकन


मीडिया के एक उच्च अधिकारी का प्रश्न:
साधू-संतो के पास करोड़ो की संपत्ति है । साधू-संतो को इतनी संपत्ति की क्या आवश्यकता है? साधू को तो अपरिग्रही होना चाहिए ?

उत्तर :
रोमन केथोलिक चर्च का एक छोटा राज्य है, वेटिकन।
अपने धर्म के प्रचार के लिए वे हर साल 171,600,000,000 डॉलर खर्च करते है ।
तो उनके पास कुल कितनी संपत्ति होगी ?

रोम में 33% इलेक्ट्रोनिक, प्लास्टिक, एअर लाइन, केमिकल और इंजीनियरिंग बिजनेस वेटिकन के हाथ में है।
दुनिया में सबसे बड़े shares वेटिकन के पास है।
इटालियन बैंकिंग में उनकी बड़ी संपत्ति है और अमेरिका एवं स्विस बेंको में उनकी बड़ी भारी deposits है।
ज्यादा जानकारी के लिए पुस्तक पढ़ें जिसका नाम है VATICAN EMPIRE

उनकी संपत्ति के आगे भारत के साधुओं के करोड़ों ₹ कुछ भी नहीं है।
एक आम व्यक्ति भारत में इसाई मिश्नरी स्कूल में अपने बच्चे को भेजने के लिए २-४ लाख रुपये सलाना देता है।
एक हिन्दू कभी ये सोचे की जितना रुपया वह वेटिकन को मजबूत करने में लगा रहा है, क्या उसका 5% या 2०००० रुपये मंदिर में देता है ?
ऐसी बहुत सारी चीजें हैं जहां हिन्दू अपना पैसा ईसाइयत और इस्लाम को मजबुत करने में बिना संकोच या शर्म के लुटाता रहता है प्रतिदिन।
वे लोग उस धन को विश्व में धर्मान्तरण करके लोगों को अपनी संस्कृति, और धर्म से भ्रष्ट करने में खर्च करते हैं।और भारत के संत खर्च करते है लोगों को शान्ति देने में, उनकी स्वास्थ्य सेवाओं में, आदिवासियों और गरीबों की सेवा में, प्राकृतिक आपदा के समय पीडितों की सेवा में और अन्य लोकसेवा के कार्यों में।

मीडिया अधिकारी: ना आप वेटिकन को नहीं घसीट सकते हो पूरा चैनल नेटवर्क बन्द करवा दोगे।
हां जी…15℃ ऐ सी वाले बन्द कमरे में हमने उनके माथे पर पसीना देखा।
ये है वेटिकन की धौंस।

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NCERT


मोदीजी क्यों बदल रहे है किताबो का इतिहास….

एक फिजिक्स के प्रोफेसर ने कक्षा 6 से 12 NCERT की हिस्ट्री बुक्स के अध्ययन का निश्चय किया और उसने पाया कि लगभग 110 बातें ऐसी हैं जो संदिग्ध हैं…

NCERT की Book में लिखा है कि दो सुल्तान, कुतुबुद्दीन ऐबक और इल्लतुतमिश ने वो मीनार बनवाया था, जिसे आज कुतुबमीनार कहा जाता है।
इस पर प्रोफेसर साहब ने RTI लगाया कि NCERT ने इस तथ्य को कहाँ से सत्यापित किया है ? सत्यापित करने वाले लोग कौन थे ?

इस पर NCERT की तरफ से उत्तर आया है कि…

1. विभाग के पास कोई सत्यापित प्रति उपलब्ध नही है।
2. इस पुस्तक को प्रोफेसर मृणाल मीरी ने मंजूर किया था, जो राष्ट्रीय निगरानी समिति का हेड था।

मृणाल मीरी शिलांग का एक ईसाई है जिसे काँग्रेस ने 12 सालों तक राज्यसभा में नॉमिनेट किया था। काँग्रेस राज के दौरान यह कई मलाईदार पदों पर था और कम्युनिस्ट चर्च के गठजोड़ से इसने भारतीय इतिहास में कई झूठे तथ्य जोड़ें जो आज भी बच्चों को पढ़ाए जाते है जिसका कोई सुबूत किसी के पास नहीं है।

जैसे कक्षा 6, सामाजिक विज्ञान के पृष्ठ 46 पर ऋग्वेद के आधार पर भारत के बारे में लिखा है कि “आर्यों द्वारा कुछ लड़ाइयाँ मवेशी और जलस्रोतों की प्राप्ति के लिए लड़ी जाती थी। कुछ लड़ाइयाँ मनुष्यों को बंदी बनाकर बेचने खरीदने के लिए भी लड़ी जाती थी।”

स्पष्ट है कि किताब लिखने वाला यह साबित करना चाहता है कि भारत में भी गुलाम प्रथा थी और मनुष्यों को खरीदने बेचने की जो बातें बाइबल और कुरान में हैं वे कोई नई नहीं हैं, बल्कि वैसा ही अमानवीय व्यवहार भारत में भी होता था।

ऐसे ही वे आगे लिखते हैं “युद्ध में जीते गये धन का एक बड़ा हिस्सा सरदार और पुरोहित रख लेते थे, शेष जनता में बाँट दिया जाता था।” यहाँ भी मुहम्मद के गजवों को जस्टिफाई करने की भूमिका बनाई गई है।

आगे एक जगह लिखा है “पुरोहित यज्ञ करते थे और अग्नि में घी अन्न के साथ कभी कभी जानवरों की भी आहुति दी जाती थी।”

आगे पृष्ठ 60 पर लिखा है “खेती की कमरतोड़ मेहनत के लिए दास और दासी को उपयोग में लाया जाता था।”

तब उस प्रोफेसर ने पहले तो स्वयं अध्ययन किया, मेगस्थनीज की इंडिका आदि के आधार पर यह सिद्ध हुआ कि ये सब मनगढ़ंत लिखा जा रहा है, तब उन्होंने NCERT में RTI डाली कि इन बातों का आधार क्या है ?
आप हिस्ट्री लिख रहे हैं, रेफरेंस कहाँ हैं ? ऋग्वेद की सम्बंधित ऋचाएं, अनुवाद बताया जाए और यदि नहीं है तो खंडन या सुधार किया जाए।

जानकर आश्चर्य होगा कि NCERT ने सभी 110 प्रश्नों का एक ही जवाब दिया कि हमारे पास इसका कोई प्रूफ नहीं है। इसके अलावा जवाब टालने और लटकाने का रवैया रखा। कई वर्ष ऐसे ही बीत गए। हारकर वे पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में गये कि NCERT हमें इनका जवाब नहीं दे रही।

कोर्ट ने पिटीशन स्वीकार कर लिया और NCERT को जवाब देने के लिए कहा। तब NCERT ने कहा कि हमारी सभी पुस्तकों का लेखन जेएनयू के हिस्ट्री के प्रोफेसर ने किया है और हमने उन्हें जवाब के लिए कह दिया है। लगभग एक वर्ष बाद जेएनयू के लेखकों ने जवाब दिया कि हमने इन बातों के लिए ऋग्वेद के अनुवाद का सहारा लिया है।

ऋग्वेद में इंद्र को एक योद्धा बताया गया है और उसमें आये नरजित शब्द से यह साबित होता है कि वे लूटपाट करते थे और मनुष्यों को गुलाम बनाते थे।

इस पर इस प्रोफेसर ने संस्कृत के जानकारों को वे मंत्र बताए कि क्या इनका यही अर्थ होता है जो जेएनयू के प्रोफेसर ने किया है…

संस्कृत के विद्वानों ने एक स्वर में कहा कि जेएनयू वालों का अर्थ मनमाना, कहीं कहीं तो मूल कथ्य से बिल्कुल उलटा है। इस पर कोर्ट ने इन्हें पूछा कि क्या आप संस्कृत जानते हैं ? आपने यह अनुवाद कहाँ से उठाया ?

तो जेएनयू के कथित इतिहासकारों ने कहा कि वे संस्कृत का स भी नहीं जानते, उन्होंने एक बहुत पुराने अंग्रेज लेखक के ऋग्वेद के अनुवाद का इस्तेमाल किया है।

कोर्ट:- “और, जो आपने लिखा है कि लूट के माल को ब्राह्मण आदि आपस में बाँट लेते थे, उसका आधार क्या है ?”
जेएनयू:- “चूंकि ऋग्वेद में अग्नि का वर्णन है और अग्नि को पुरोहित कहा गया है तो इसका अर्थ यही है कि जो जो अग्नि को समर्पित किया जा रहा है मतलब पुरोहित आपस में बाँट रहे हैं।”

अब जेएनयू के इतिहासकारों और NCERT के इन तर्कों पर माथा पीटने के सिवाय कोई चारा नहीं है और वे शायद यही चाहते हैं कि हम माथा पीटते रहें…

NCERT आगे कक्षा 11 की हिस्ट्री में लिखती हैं “गुलामी प्रथा यूरोप की एक सच्चाई थी और ईसा की चतुर्थ शताब्दी में जबकि रोमन साम्राज्य का राजधर्म भी ईसाई था, गुलामों के सुधार पर कुछ खास नहीं कर सका।”

यहाँ NCERT के लिखने के तरीके से छात्र यह समझते होंगे कि ईसाई धर्म गुलामी के खिलाफ है। जबकि सच्चाई यह है कि एक चौथाई बाइबल इन्हीं बातों से भरी हुई है कि गुलाम कैसे बनाने, उनके साथ कितना यौन व्यवहार करना, उन्हें कब कब मार सकते हैं, वगैरह वगैरह।

सच्चाई यह है कि NCERT के 2006 के पाठ्यक्रम का एक मात्र उद्देश्य था हिन्दू धर्म को जबरदस्ती बदनाम करना, यानि जो नहीं है उसे भी हिंदुओं से जोड़कर प्रस्तुत करना और ईसाइयों की बुराइयों पर पर्दा डालकर भारत में उसके प्रचार के अनुकूल वातावरण बनाना।

सोनिया गाँधी की तत्कालीन मंडली ने पूरी साजिश कर उक्त पाठ्यक्रम की रचना की थी और आज विगत 16 वर्ष से वही पुस्तकें चल रही हैं, एक अक्षर तक नहीं बदला गया।

और हाँ, उन प्रोफेसर का नाम आदरणीय नीरज अत्रि (Neeraj Atri) है, जिन्होंने कोर्ट में यह पिटीशन डाली थी, वे यूट्यूब पर हैं।

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NCERT


एक फिजिक्स के प्रोफेसर ने कक्षा 6 से 12 NCERT की हिस्ट्री बुक्स के अध्ययन का निश्चय किया और उसने पाया कि लगभग 110 बातें ऐसी हैं जो संदिग्ध हैं…

NCERT की Book में लिखा है कि दो सुल्तान, कुतुबुद्दीन ऐबक और इल्लतुतमिश ने वो मीनार बनवाया था, जिसे आज कुतुबमीनार कहा जाता है।

इस पर प्रोफेसर साहब ने RTI लगाया कि NCERT ने इस तथ्य को कहाँ से सत्यापित किया है? सत्यापित करने वाले लोग कौन थे?

इस पर NCERT की तरफ से उत्तर आया है कि…

  1. विभाग के पास कोई सत्यापित प्रति उपलब्ध नही है।
  2. इस पुस्तक को प्रोफेसर मृणाल मीरी ने मंजूर किया था, जो राष्ट्रीय निगरानी समिति का हेड था।

मृणाल मीरी शिलांग का एक ईसाई है जिसे काँग्रेस ने 12 सालों तक राज्यसभा में नॉमिनेट किया था। काँग्रेस राज के दौरान यह कई मलाईदार पदों पर था और कम्युनिस्ट चर्च के गठजोड़ से इसने भारतीय इतिहास में कई झूठे तथ्य जोड़ें जो आज भी बच्चों को पढ़ाए जाते है जिसका कोई सुबूत किसी के पास नहीं है।

जैसे कक्षा 6, सामाजिक विज्ञान के पृष्ठ 46 पर ऋग्वेद के आधार पर भारत के बारे में लिखा है कि “आर्यों द्वारा कुछ लड़ाइयाँ मवेशी और जलस्रोतों की प्राप्ति के लिए लड़ी जाती थी। कुछ लड़ाइयाँ मनुष्यों को बंदी बनाकर बेचने खरीदने के लिए भी लड़ी जाती थी।”

स्पष्ट है कि किताब लिखने वाला यह साबित करना चाहता है कि भारत में भी गुलाम प्रथा थी और मनुष्यों को खरीदने बेचने की जो बातें बाइबल और कुरान में हैं वे कोई नई नहीं हैं, बल्कि वैसा ही अमानवीय व्यवहार भारत में भी होता था।

ऐसे ही वे आगे लिखते हैं “युद्ध में जीते गये धन का एक बड़ा हिस्सा सरदार और पुरोहित रख लेते थे, शेष जनता में बाँट दिया जाता था।” यहाँ भी मुहम्मद के गजवों को जस्टिफाई करने की भूमिका बनाई गई है।

आगे एक जगह लिखा है “पुरोहित यज्ञ करते थे और अग्नि में घी अन्न के साथ कभी कभी जानवरों की भी आहुति दी जाती थी।”

आगे पृष्ठ 60 पर लिखा है “खेती की कमरतोड़ मेहनत के लिए दास और दासी को उपयोग में लाया जाता था।”

तब उस प्रोफेसर ने पहले तो स्वयं अध्ययन किया, मेगस्थनीज की इंडिका आदि के आधार पर यह सिद्ध हुआ कि ये सब मनगढ़ंत लिखा जा रहा है, तब उन्होंने NCERT में RTI डाली कि इन बातों का आधार क्या है? आप हिस्ट्री लिख रहे हैं, रेफरेंस कहाँ हैं? ऋग्वेद की सम्बंधित ऋचाएं, अनुवाद बताया जाए और यदि नहीं है तो खंडन या सुधार किया जाए।

जानकर आश्चर्य होगा कि NCERT ने सभी 110 प्रश्नों का एक ही जवाब दिया कि हमारे पास इसका कोई प्रूफ नहीं है। इसके अलावा जवाब टालने और लटकाने का रवैया रखा। कई वर्ष ऐसे ही बीत गए। हारकर वे पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में गये कि NCERT हमें इनका जवाब नहीं दे रही।

कोर्ट ने पिटीशन स्वीकार कर लिया और NCERT को जवाब देने के लिए कहा। तब NCERT ने कहा कि हमारी सभी पुस्तकों का लेखन जेएनयू के हिस्ट्री के प्रोफेसर ने किया है और हमने उन्हें जवाब के लिए कह दिया है। लगभग एक वर्ष बाद जेएनयू के लेखकों ने जवाब दिया कि हमने इन बातों के लिए ऋग्वेद के अनुवाद का सहारा लिया है।

ऋग्वेद में इंद्र को एक योद्धा बताया गया है और उसमें आये नरजित शब्द से यह साबित होता है कि वे लूटपाट करते थे और मनुष्यों को गुलाम बनाते थे।

इस पर इस प्रोफेसर ने संस्कृत के जानकारों को वे मंत्र बताए कि क्या इनका यही अर्थ होता है जो जेएनयू के प्रोफेसर ने किया है…

संस्कृत के विद्वानों ने एक स्वर में कहा कि जेएनयू वालों का अर्थ मनमाना, कहीं कहीं तो मूल कथ्य से बिल्कुल उलटा है। इस पर कोर्ट ने इन्हें पूछा कि क्या आप संस्कृत जानते हैं? आपने यह अनुवाद कहाँ से उठाया?

तो जेएनयू के कथित इतिहासकारों ने कहा कि वे संस्कृत का स भी नहीं जानते, उन्होंने एक बहुत पुराने अंग्रेज लेखक के ऋग्वेद के अनुवाद का इस्तेमाल किया है।

कोर्ट:- “और, जो आपने लिखा है कि लूट के माल को ब्राह्मण आदि आपस में बाँट लेते थे, उसका आधार क्या है?”
जेएनयू:- “चूंकि ऋग्वेद में अग्नि का वर्णन है और अग्नि को पुरोहित कहा गया है तो इसका अर्थ यही है कि जो जो अग्नि को समर्पित किया जा रहा है मतलब पुरोहित आपस में बाँट रहे हैं।”

अब जेएनयू के इतिहासकारों और NCERT के इन तर्कों पर माथा पीटने के सिवाय कोई चारा नहीं है और वे शायद यही चाहते हैं कि हम माथा पीटते रहें…

NCERT आगे कक्षा 11 की हिस्ट्री में लिखती हैं “गुलामी प्रथा यूरोप की एक सच्चाई थी और ईसा की चतुर्थ शताब्दी में जबकि रोमन साम्राज्य का राजधर्म भी ईसाई था, गुलामों के सुधार पर कुछ खास नहीं कर सका।”

यहाँ NCERT के लिखने के तरीके से छात्र यह समझते होंगे कि ईसाई धर्म गुलामी के खिलाफ है। जबकि सच्चाई यह है कि एक चौथाई बाइबल इन्हीं बातों से भरी हुई है कि गुलाम कैसे बनाने, उनके साथ कितना यौन व्यवहार करना, उन्हें कब कब मार सकते हैं, वगैरह वगैरह।

सच्चाई यह है कि NCERT के 2006 के पाठ्यक्रम का एक मात्र उद्देश्य था हिन्दू धर्म को जबरदस्ती बदनाम करना, यानि जो नहीं है उसे भी हिंदुओं से जोड़कर प्रस्तुत करना और ईसाइयों की बुराइयों पर पर्दा डालकर भारत में उसके प्रचार के अनुकूल वातावरण बनाना।

सोनिया गाँधी की तत्कालीन मंडली ने पूरी साजिश कर उक्त पाठ्यक्रम की रचना की थी और आज विगत 16 वर्ष से वही पुस्तकें चल रही हैं, एक अक्षर तक नहीं बदला गया।

और हाँ, उन प्रोफेसर का नाम आदरणीय नीरज अत्रि (Neeraj Atri) है, जिन्होंने कोर्ट में यह पिटीशन डाली थी, वे यूट्यूब पर हैं।