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◆ क्या अकबर ने इस्लाम छोड़ दिया था?

कुछ समय से गीतकार जावेद अख्तर बादशाह अकबर का झंडा बुलंद कर रहे हैं। एक ताने जैसा कि अकबर के समय भारत धनी था, इसलिए मुगल-काल को बुरा नहीं कहना चाहिए। उन के पीछे दूसरे सेक्यूलर-वामपंथी भी वही दुहरा रहे हैं। लेकिन क्या वे जानते हैं कि क्या कह रहे हैं? कुछ लोगों को जानकर आश्चर्य होगा कि भारत और पाकिस्तान में अकबर की छवियाँ उलटी है। यहाँ उसे उदार, काबिल बादशाह का आदर मिलता है; मगर पाकिस्तान में अकबर के प्रति घृणा-सी फैलाई गई। क्योंकि उस ने यहाँ इस्लामी शासन का ढ़ाँचा समेट लिया था। स्वतंत्र भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद ने कहा था कि अकबर ने ‘भारत से इस्लाम को खत्म कर दिया’। पाकिस्तानी इतिहासकार आई. एच. कुरैशी भी अकबर को ‘काफिर’ मानते थे। अतः भारत-पाकिस्तान में अकबर की उलटी छवियाँ एक ही सत्य पर खड़ी हैं!

निश्चय ही अकबर पहले जिहादी था। तेरह वर्ष की उम्र में ही उस ने महान हिन्दू नायक हेमचन्द्र को मूर्छित-घायल अवस्था में अपने हाथों कत्ल किया था। अपनी हुकूमत के पहले 24 साल उस ने वही किया जो महमूद गजनवी, मुहम्मद घूरी, अलाउद्दीन खिलजी, आदि ने किया था। बाहरी मुसलमानी फौज के बल पर भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा किया। खुद को ‘गाजी’ और तैमूरी कहने का उसे गर्व था। अकबर ने मेवाड़ और गोंडवाना में जो किया वह घृणित जिहाद ही था।

अकबर लंबे समय तक मोइनुद्दीन चिश्ती का मुरीद रहा, जो हिन्दू धर्म-समाज पर इस्लामी हमले का बड़ा प्रतीक था। 1568 ई. में चित्तौड़गढ़ पर जीत के बाद अकबर ने चिश्ती अड्डे से ही ‘फतहनामा-ए-चित्तौड़’ जारी किया था, जिस के हर वाक्य से जिहादी जुनून टपकता है। उस युद्ध में 8 हजार राजपूत स्त्रियों ने जौहर कर के प्राण दिए। वहाँ अकबर ने राजपूत सैनिकों के अलावा 30 हजार सामान्य नागरिकों का भी कत्ल किया। मारे गए सभी पुरुषों के जनेऊ जमा कर तौला गया, जो साढ़े चौहत्तर मन था। यह केवल एक स्थान पर, एक बार में! वह भयावह घटना हिन्दुओं की स्मृति में रच गई है। आज भी राजस्थान में ‘74½’का तिलक-जैसा चिन्ह किसी वचन पर पवित्र-मुहर समान प्रयोग किया जाता है। कि उस वचन को जो तोड़ेगा, उसे बड़ा पाप लगेगा!

फिर अकबर के अनके सूबेदारों ने उत्तर-पश्चिम भारत में हिन्दू मंदिरों का बेशुमार विध्वंस किया। कांगड़ा, नागरकोट, आदि के प्रसिद्ध मंदिर उन में थे। अकबर ने अपने शासन में शरीयत लागू करने हेतु मुल्लों के विशेष पद भी बनाये। हिन्दुओं की कौन कहे, वह कट्टर-सुन्नी के सिवा अन्य मुस्लिम फिरकों के प्रति भी कठोर था। लेकिन, उसी अकबर में शुरू से एक विचारशील प्रवृत्ति भी थी। इसीलिए जब उस की सत्ता सुदृढ़ हो गई, तब वह मजहबी चिंतन-मनन पर भी समय देने लगा। यह 1574 ई. के लगभग शुरू हुआ, जब अकबर अपनी राजधानी फतेहपुर सीकरी में बाकायदा विमर्श चलाने लगा। उस ने इस्लाम को मजबूत करने के ही इरादे से विभिन्न धर्मों के विद्वान बुलाकर चिश्तियों और सुन्नी मौलानाओं के साथ शास्त्रार्थ-सा कराना शुरू किया। इस के लिए विशेष ‘इबादतखाना’ और उस के सामने ‘अनूप तालाब’ बनवाया। रोचक यह कि अकबर ने यह संस्कृत नामकरण किया था।

‘इबादतखाना’ उन विद्वानों के साथ अकबर के धर्म-विमर्श का स्थान था। वहाँ अकबर के सामने वर्षों जो विमर्श हुए, उन के विवरण अलग-अलग भागीदारों, प्रत्यक्षदर्शियों से उपलब्ध हैं। जैसे, एक पुर्तगाली ईसाई पादरी, गुजरात से आए पारसी विद्वान दस्तूर मेहरजी और अकबर दरबार के मुल्ला बदायूँनी। इन से पता चलता है कि अकबर ने धीरे-धीरे महसूस किया कि जिस इस्लाम पर उसे अंधविश्वास था, वह तो दर्शन और ज्ञान से खाली है! मामूली हिन्दू पंडितों के सामने भी मौलाना टिक नहीं पाते थे। चूँकि अकबर में एक आध्यात्मिक प्यास थी, इसलिए उस ने असलियत समझ ली।

फलतः उस ने लगभग 1582 ई. में एक नये धर्म ‘दीन-ए-इलाही’ की घोषणा की। यह इस्लाम से हटने की ही घोषणा थी। इसीलिए वामपंथी, मुस्लिम इतिहासकारों ने इसे लीपने-पोतने की कोशिश की है। आखिर प्रोफेट मुहम्मद, कुरान और हदीस के सिवा किसी भी चीज को महत्व देना इस्लाम-विरुद्ध है। तब अकबर ने तो सीधे-सीधे नये धर्म की ही घोषणा की!इस प्रकार, आध्यात्मिक खोजी स्वभाव के अकबर ने लंबी वैचारिक जाँच-पड़ताल के बाद इस्लाम से छुट्टी कर ली। तब दुनिया में सब से ताकतवर मुस्लिम शासक होने के कारण कोई मुल्ला उस का कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे। मुल्ला बदायूँनी ने अपनी डायरी ‘मुन्तखाबात तवारीख’ में बेहद कटु होकर लिखा है कि,‘‘बादशाह काफिर हो गया है, चाहे कोई कुछ बोल नहीं सकता।’’

पर आजीवन स्वस्थ अकबर की 63 वर्ष की आयु में आकस्मिक मौत हो गई। कुछ विवरणों में उसे जहर देने की बात मिलती है। यदि सच हो, तो तख्त के लिए शहजादे सलीम का षड्यंत्र भी संभव है। लेकिन उलेमा भी अकबर से बेहद रंज थे। सो, अकबर की मौत का कुछ भी कारण रहा हो सकता है।किन्तु यह संयोग नहीं कि जिस इबादतखाना और ‘अनूप तालाब’ के अनेक समकालीन विवरण तथा पेंटिगें मिलती हैं, आज सीकरी मे इन दोनों का नामो-निशान नहीं है! निस्संदेह, उसे ‘कुफ्र’ की निशानी मानकर बाद में उलेमा ने नष्ट करवाया। यह अकबर की विरासत पर कोलतार पोतने का अंग था। संयोगवश वे मुल्ला बदायूँनी की लिखी गोपनीय डायरी की सभी प्रतियाँ नष्ट नहीं कर सके, जो बहुत बाद मिली थी।

उस जमाने के हिसाब से 1579-1605 ई. कोई छोटी अवधि नहीं, जो अकबर के इस्लाम से दूर हो जाने का काल था। उस दौरान अकबर ने जो किया, उस के अध्ययन के बजाए छिपाने का काम अधिक हुआ। ताकि इस पर पर्दा पड़ा रहे कि भारत के तमाम मुस्लिम शासकों में जो सब से प्रसिद्ध हुआ, वह बाद में मुसलमान ही नहीं रहा।कई बार अकबर से मिलने वाले गोवा के पादरी फादर जेवियर ने लिखा है कि अकबर इस्लाम छोड़कर कोई हिन्दू/देशी संप्रदाय (जेन्टाइल सेक्ट) स्वीकार कर चुका था। पुर्तगाली जेसुइटों ने अलग-अलग बातें लिखी हैं। किसी के अनुसार वह ईसाई हो गया था, तो किसी के अनुसार वह हिन्दू बन गया था। किन्तु अकबर के इस्लाम छोड़ने की बात कई विवरणों में एक जैसी मिलती है।

अकबर ने अपने बेटे को लिखे पत्रों में कर्म-फल और आत्मा के पुनर्जन्म सिद्धांत को तर्कपूर्ण और विश्वसनीय बताया था। उस ने शहजादे मुराद को पढ़ने के लिए ‘महाभारत’ का अनुवाद भेजा था। अबुल फजल की अकबरनामा के अनुसार अकबर को अपने जिहादी अतीत पर पश्चाताप भी था।चूँकि अकबर की मृत्यु अस्वभाविक हुई, इसलिए कहना कठिन है कि यदि वह और जीवित रहता तो उस की विरासत क्या होती। पर निस्संदेह वह इस्लाम-विरुद्ध होती। इसीलिए, सारे उलेमा अकबर से चिढ़ते हैं। उन्हें सच अधिक मालूम है, हिन्दुओं को कम। क्योंकि यहाँ सेक्यूलर-वामपंथी प्रचारकों ने अकबर को ‘मुगल शासन’ की उदारता का प्रतीक बनाने की जालसाजी की है।

अतः जावेद अख्तर को समझना चाहिए कि अकबर की महानता हमारे लिए बेमानी है। जैसे पीटर महान या नेपोलियन बोनाप्राट की महानता भारत के लिए प्रसंगहीन है। वे दूसरे देशों के इतिहास के अंग हैं। उसी तरह, अकबर भी किसी विदेशी समाज के इतिहास का हिस्सा है। हमारे लिए यही स्मरणीय है कि चाहे उसे युद्ध-क्षेत्र में हिन्दू पहले नहीं हरा सके, किन्तु यहाँ के मामूली ब्राह्मणों ने उस के मतवाद को उस के सामने ध्वस्त कर दिया था। अकबर की यही विरासत भारतीय मुसलमानों के लिए भी विचारणीय है!

  • डॉ.शंकर शरण (१९ मई २०२०)

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गोपाल गोडसे अक्सर कहा करते थे कि यहूदियों को अपना राष्ट्र पाने के लिये 1600 वर्ष लगे, हर वर्ष वे कसम खाते थे कि “अगले वर्ष यरुशलम हमारा होगा…”

गत कुछ वर्षों से गोड़से की विचारधारा के समर्थन में भारत में लोगों की संख्या बढ़ी है, जैसे-जैसे लोग नाथूराम और गाँधी के बारे में विस्तार से जानते हैं, उनमें गोडसे धीरे-धीरे एक “आइकॉन” बन रहे हैं। वीर सावरकर जो कि गोडसे और आपटे के राजनैतिक गुरु थे, के भतीजे विक्रम सावरकर कहते हैं, कि उस समय भी हम हिन्दू महासभा के आदर्शों को मानते थे, और “हमारा यह स्पष्ट मानना है कि गाँधी का वध किया जाना आवश्यक था…”, समाज का एक हिस्सा भी अब मानने लगा है कि नाथूराम का वह कृत्य सही था। हमारे साथ लोगों की सहानुभूति है, लेकिन अब भी लोग खुलकर सामने आने से डरते हैं…।

डर की वजह भी स्वाभाविक है, गाँधी की हत्या के बाद कांग्रेस के लोगों ने पूना में ब्राह्मणों पर भारी अत्याचार किये थे, कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने संगठित होकर लूट और दंगों को अंजाम दिया था, उस वक्त पूना पहली बार एक सप्ताह तक कर्फ़्यू के साये में रहा। बाद में कई लोगों को आरएसएस और हिन्दू महासभा का सदस्य होने के शक में जेलों में ठूंस दिया गया था (कांग्रेस की यह “महान” परम्परा इंदिरा हत्या के बाद दिल्ली में सिखों के साथ किये गये व्यवहार में भी दिखाई देती है)।

गोपाल गोडसे की पत्नी श्रीमती सिन्धु गोडसे कहती हैं, “वे दिन बहुत बुरे और मुश्किल भरे थे, हमारा मकान लूट लिया गया, हमें अपमानित किया गया और कांग्रेसियों ने सभी ब्राह्मणों के साथ बहुत बुरा सलूक किया… शायद यही उनका गांधीवाद हो…”।

सिन्धु जी से बाद में कई लोगों ने अपना नाम बदल लेने का आग्रह किया, लेकिन उन्होंने दृढ़ता से इन्कार कर दिया। “मैं गोडसे परिवार में ब्याही गई थी, अब मृत्यु पर्यन्त यही मेरा उपनाम होगा, मैं आज भी गर्व से कहती हूँ कि मैं नाथूराम की भाभी हूँ…”।

चम्पूताई आपटे की उम्र सिर्फ़ 14 वर्ष थी, जब उनका विवाह एक स्मार्ट और आकर्षक युवक “नाना” आपटे से हुआ था, 31 वर्ष की उम्र में वे विधवा हो गईं, और एक वर्ष पश्चात ही उनका एकमात्र पुत्र भी चल बसा। आज वे अपने पुश्तैनी मकान में रहती हैं, पति की याद के तौर पर उनके पास आपटे का एक फ़ोटो है और मंगलसूत्र जो वे सतत पहने रहती हैं, क्योंकि नाना आपटे ने जाते वक्त कहा था कि “कभी विधवा की तरह मत रहना…”, वह राजनीति के बारे में कुछ नहीं जानतीं, उन्हें सिर्फ़ इतना ही मालूम है गाँधी की हत्या में शरीक होने के कारण उनके पति को मुम्बई में हिरासत में लिया गया था। वे कहती हैं कि “किस बात का गुस्सा या निराशा? मैं अपना जीवन गर्व से जी रही हूँ, मेरे पति ने देश के लिये बलिदान दिया था।

Cpd

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देवी सिंग तोमर

एक जमाना था कानपुर की कपड़ा मिल विश्व प्रसिद्ध थीं
कानपुर को ईस्ट का मैन्चेस्टर बोला जाता था. लाल इमली जैसी फ़ैक्टरी के कपड़े प्रेस्टीज सिम्बल होते थे. वह सब कुछथा जो एक औ द्योगिक शहर में होना चाहिए. मिल का साइरन बजते ही लाखों मज़दूर साइकिल पर सवार टिफ़िन लेकर फ़ैक्टरी की ड्रेस में मिल जाते.
बच्चे स्कूल जाते. पत्नियाँ घरेलू कार्य करतीं. और इन लाखों मज़दूरों के साथ ही लाखों सेल्स man, मैनेजर, क्लर्क सबकी रोज़ी रोटी चल रही थी.

फ़िर कॉम्युनिस्ट की कुत्सित निगाहें कानपुर पर पड़ीं. आठ घंटे मेहनत मज़दूर करे और गाड़ी से मालिक चले. ढेरों हिंसक घटनाएँ हुईं
मिल मालिकों को मारा पीटा भी गया. नारा दिया गया काम के घंटे चार करो, बेरोज़गारी को दूर करो
. अलाली किसे नहीं अच्छी लगती है. ढेरों मिडल क्लास भी कॉम्युनिस्ट समर्थक हो गया. मज़दूरों को आराम मिलना चाहिए, ये उद्योग खून चूसते हैं.
कानपुर में कॉम्युनिस्ट सांसद बनी सुभाशिनी अली

अंततः वह दिन आ ही गया जब कानपुर के मिल मज़दूरों को मेहनत करने से छुट्टी मिल गई. मिलों पर ताला डाल दिया गया.
मिल मालिक आज पहले से शानदार गाड़ियों में घूमते हैं, उन्होंने अहमदाबाद में कारख़ाने खोल दिए. कानपुर की मिल बंद होकर भी ज़मीन के रूप में उन्हें अरबों देगी.
वो 8 घंटे यूनफ़ॉर्म में काम करने वाला मज़दूर बारह घंटे रिक्शा चलाने पर विवश हुआ. वह स्कूल जाने वाले बच्चे कबाड़ी बीनने लगे.
और वो मध्यम वर्ग जिसकी आँखों में खून उतरता था मज़दूर को काम करता देख, अधिसंख्य को जीवन में दुबारा कोई नौकरी ना मिली.
एक बड़ी जन संख्या ने अपना जीवन बेरोज़गार रहते हुवे डिप्रेसन में काटा.

कॉम्युनिस्ट अफ़ीम बहुत घातक होती है
उन्हें ही सबसे पहले मारती है, जो इसके चक्कर में पड़ते हैं
. दो क्लास के बीच पहले अंतर दिखाना, फ़िर इस अंतर की वजह से झगड़ा करवाना और फ़िर दोनों ही क्लास को ख़त्म कर देना कॉम्युनिज़म का बेसिक प्रिन्सिपल है

इन दिनों मज़दूर पलायन विषय पर ढेरों कुतर्क सुन रहा हूँ
प्रायः यह कुतर्क दसकों से चली आ रही सोसलिस्ट व्यवस्था की थिंकिंग की वजह से हैं
यदि आप द्रवित हैं तो उनकी मदद करें, यह मानवता है. बाक़ी जब तक दुनिया चलेगी सदैव क्लासेज़ ओफ़ पीपल रहेगा ही
. वो वामपंथी अजेंडा में फँस हवाई जहाज़ में चलने वाले बनाम कार में चलने वाले बनाम सूटकेस में चलने वाले जैसी बातों के सूतियापे में ना फँसे. यह आप ही के लिए घातक है

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बेनी हिन्


देवी सिंह तोमर

हमने लिखने में 35 मिनट खर्च किया है उम्मीद है आप पढ़ने में 3 मिनट जरूर दे सकते हैं।

आप में से शायद कई लोगों ने #बेनी_हिन् का नाम पहले कभी नहीं सुना होगा, क्यूँकि हम अधिकतर वही सुनना और देखना पसंद करते हैं जो हमें दिखाया जाता है..
उसके आगे न हम देखना चाहते हैं और
न हमें उससे कुछ मतलब है…अपनी जिन्दगी चलती रहे, भाड़ में जाए दुनियादारी…
हमें PK दिखाई गई, हमें ‘ओह माय गॉड’ दिखाई गईं, हम खुश रहें और हमने इन पिक्चरों को सुपरहिट बना दिया…

1995-1996 के समय भारत में #Faith_Healing के नाम पर दो बड़े शहर दिल्ली और बेंगलोर में एक अनूठे शो का आयोजन किया गया ;
आयोजन भी कोई छोटा-मोटा नहीं, बेंगलोर सहित कर्नाटक में तत्कालीन मुख्यमंत्री #देवेगोड़ा की सरकार ने तथा दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री #नरसिम्हा राव की सरकार ने इसका जबरदस्त प्रचार-प्रसार किया…

शो में Faith-Healer के रूप में जीसस के दूत-
बेनी हिन् आया और मंच पर कई-कई गंभीर बीमारियों वाले मरीजों को बेनी हिन् ने हाथ रखते से ही एकदम ठीक कर दिया…

● बंगलोर के शो में तो कर्नाटक का मुख्यमंत्री देवगोडा बेनी हिन् के पैरों में गिर गया था ।

कई मरीज स्टेज पर आये, किसी को ब्लड कैंसर था, किसी को आर्थराइटिस था, कोई जन्म से ही विकलांग था तो कोई ब्रेन-ट्यूमर के कारण परेशान था…यह सारे मरीज बेनी हिन् द्वारा अमेरिका से इम्पोर्ट किये गये थें…
और जैसे ही बेनी हिन् का हाथ लगता है, चमत्कार होता है और विकलांग चलने लगता है, जिसे आर्थराइटिस थी उसके पैरों का दर्द गायब हो जाता है, ट्यूमर वाले को अपना सिर कुछ हल्का सा लगने लगता है…
सारा जनसमूह बेनी हिन् के चमत्कारों ( दिखावे ) से अचम्भित हो जाता है और लगातार तालियों से उसका उत्साहवर्धन करता है… बेनी-हिन् अंतिम समय में लोगों से कहता है कि आपको कोई डाउट या समस्या हो तो आप पूछ सकते हैं…तभी…
भीड़ में से एक व्यक्ति खड़ा होता है और सवाल पूछने की अनुमति चाहता है…

बेनी हिन् – आपका नाम क्या है #Jesus_boy…?
व्यक्ति – मेरा नाम “#राजीव_दीक्षित” है और मैं कोई Jesus-boy नहीं, मैं एक सनातनी #हिन्दू हूँ…
बेनी हिन् – अपना सवाल पूछिए, क्या आपको भी कोई बीमारी अथवा समस्या है…?
व्यक्ति – जी नहीं, मुझे कोई बीमारी नहीं है…
पर आपके #ईसाई धर्म ( तथाकथित ) का जो दुनिया का सबसे बड़ा अधिकारी है पॉप, उसे दुनिया की सबसे खतरनाक बीमारी है #पार्किन्सन, तो मेरी आपसे प्रार्थना है कि उसकी बीमारी दुनिया के बड़े से बड़े डॉक्टर ठीक नहीं कर पा रहे हैं तो आप अगली फ्लाइट पकड़ कर सीधा #वैटिकन सिटी जाइए और सबसे पहले अपने पॉप पर हाथ रखकर उसे ठीक कीजिये…
बेनी हिन् – This is an Absurd question, यह एक बेहूदा सवाल है…
व्यक्ति – हाँ, यह बेहूदा सवाल है, पर मेरे लिए नहीं आपके लिए…
यदि आप किसी को भी केवल हाथ लगाकर ठीक कर सकते हो तो सबसे पहले पॉप को ठीक करो जिससे आपको अपने ईसाई धर्म ( तथाकथित ) को फ़ैलाने और आगे बढाने में मदद मिलेगी…।।

सारे शो में उथल-पुथल मच गई, लोग बेनी हिन् को फर्जी-फर्जी चिल्लाकर इधर उधर भागने लगें और उस दिन उस राजीव दीक्षित नाम के व्यक्ति ने कई हज़ार हिन्दुओं को एक झटके में ईसाई बनने से बचा लिया…
उस शो के बाद भी बेनी हिन् के कई शो हुए, पर हर जगह राजीव दीक्षित जैसे व्यक्ति का होना मुश्किल होता है, उस शो के बाद बेनी हिन् के बहकावे में आकर कई लोग अपना धर्म छोड़ Faith-Healing के नाम पर ईसाई बन गएं…हमारे भारत में कई अंधश्रद्धा-निर्मूलन संस्थाएं चलती हैं जिनका एक ही उद्देश्य रहता है कि हिन्दू धर्म के संत, हिन्दू धर्म के शंकराचार्य, हिन्दू धर्म के पंडित जो कुछ करें उसे अंधश्रद्धा घोषित कर उसका विरोध करो… और दूसरे धर्म के प्रचारक कितनी भी अंधश्रद्धा फैलाएं, कितने भी Faith-Healing जैसे शो करें पर उनका कोई भी विरोध, उनके Rules के खिलाफ रहता है…
हिन्दू धर्म के कर्मकांडों का मजाक उड़ाने भारत में PK जैसी फिल्में बनाई जाती हैं और दुर्भाग्यवश हम सब के कारण वो भारत की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन जाती है…
हम मूर्खता में आकर इतने अंधे हो जाते हैं कि हमें गौमाता को घास खिलाना तक ‘Wrong Number’ दिखाई देने लगता है…
बेनी हिन् आज हार्ट की बीमारी के चलते कई अस्पतालों से इलाज करवा रहा है और 1995 के उस शो से लेकर आज तक जितने
लोग भारत में उसके Faith-Healing नामक झांसे का शिकार बन उसके द्वारा ईसाई बने, वो आज अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे हैं।
इसीलिए मैं आप सभी बन्धुओं से ये निवेदन करता हूँ कि अपना धर्म कभी न त्यागें।
और सदैव अपने साधु-संतों की इज़्ज़त करें।।

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કેનેડા સ્થિત પાકિસ્તાની લેખક શ્રી તારિક ફતેહે એ.બી.પી. ન્યૂઝ પર કોંગ્રેસનું સમર્થન કર્તા મૂર્ખ લોકો માટે આપેલા નિવેદનના મુખ્ય મુદ્દા:

  1. કાશ્મીરી પંડિતોને પોતાની જ માતૃભૂમિ પર રહેંસી નાખવામાં આવ્યા અને ત્યાં થી ખદેડી મૂક્યા તો પણ તમે હિન્દુ ઓ એમને એમના વતનમાં વસાવી ન શક્યા, અને તમે બિનસાંપ્રદાયિકતાની વાતો કરો છો. .!
  2. આતંકવાદ માટે પાકિસ્તાન જવાબદાર છે. 5 પાકિસ્તાની આવી ને તમારા દેશમાં બૉમ્બ બ્લાસ્ટ કરી જાય છે ..!!
    અને તમે ટોલરન્સની ચર્ચા કરી રહ્યા છો..!
  3. મસ્જિદોમાં એ લોકો કાફિરોને મારી નાંખવાના સામુહિક નારા લગાવે છે અને તમે હિન્દુઓ લઘુમતિના અધિકારો વિશે વાતો કરો છો. .!!
  4. કેરળ, હૈદરાબાદ, પશ્ચિમ બંગાળ, કાશ્મીરમાં એ લોકો પાકિસ્તાની ધ્વજ ફરકાવે છે….
    અને તમે લોકો એમને ભારતીય મુસ્લિમો કહો છો. .!!
  5. ભારત-પાકિસ્તાન વચ્ચે યુધ્ધ હોય કે ક્રિકેટ મેચ…
    ભારત ના મુસ્લિમ કઈ બાજુ હોય છે તે બધા જ જાણે છે…
    તેમ છતાં પણ તમે એમને દેશભક્ત કહો છો. .!!
  6. તસલીમા નસરીન અને અન્ય લેખકો સાથે હૈદરાબાદમાં મારપીટ કરવામાં આવેલી,
    ઓવૈસી એ 100 કરોડ હિન્દુ ઓને મારી નાખવાની વાત કરેલી. …
    ત્યારે આ અસહિષ્ણુતા મુદ્દે કેમ કોઈએ એવોર્ડ પાછો નહોતો આપ્યો???
  7. પાકિસ્તાન તમારા સૈનિકોની હત્યા કરે છે અને તમારા રાજનેતાઓ સંબંધો સુધારવા અને વેપાર વધારવા માટે પાકિસ્તાન ની મુલાકાતો લે છે…

તમારા હિન્દુ ઓમાં ઝમીર જેવુ કંઈ છે કે નહીં??
તમારો ઉર્દૂ અને બિરયાનીનો મોહ ક્યારે છૂટશે?

  1. તમારા હજારો મંદિર તોડી પાડવામાં આવ્યા, તમે કંઈ જ ન કરી શક્યા.
    અને તમારા પોતાના જ દેશમાં, તમારા સાંસ્કૃતિક કેન્દ્ર એવા અયોધ્યા માં એક મંદિર બનાવવા તમે વર્ષોથી સંઘર્ષ કરી રહ્યા છો. .!!!
    ત્યારે આપણા જ ભારત માથી મુસ્લિમોને હજ કરવા માટે સબસિડીની છુટ હતી અને અમરનાથ યાત્રામાં હિન્દુઓને ટેક્સ ભરવો પડતો હતો
  2. 2002 હોય કે 1991, એ મુસ્લિમો દ્વારા આચરવામાં આવેલી હિંસાનુ રિએક્શન હતું.
    જેહાદ અને ISIS માટેનુ મુસ્લિમોનુ વળગણ જગજાહેર છે.
    શું તમે એમ માનો છો કે ભારતીય મુસ્લિમો ISIS માં નથી જોડાતા? ?
    ડેટા તપાસી જુઓ.
    બ્રિટન અને અન્ય દેશોમાં ગયેલા NRI હજારોની સંખ્યામાં જોડાઈ રહ્યા છે.
  3. છેલ્લે, મારે એટલું જ કહેવું છે કે ઉપર આપેલા મુદ્દાઓ વિશે , કેનેડાથી આવેલો એક પાકિસ્તાની મુસ્લિમ તમને જગાડે નહીં ત્યાં સુધી તમે નઘરોળની માફક ઊંઘતા રહો છો!!!

તમે ક્યારે જાગશો????
|| हिन्दू संगठन संस्था ||
આ દરેક હિન્દુ એ એટલા માટે મૉકલવું જઇએ કે સુતેલા સમાજ ને બ્રાહ્મણો એ હંમેશા જગાડયૉ છે અને કર્મથી બ્રાહ્મણ દરેક વ્યક્તિ બની શકે માટે કર્મથી બ્રાહ્મણ બની ઓછા માં ઓછા સૉ લૉકૉ ને મૉકલો

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आर्य समाज

मुश्किल कुशा की दरगाह मध्य प्रदेश में कहाँ से आ गई? अवैध अतिक्रमणों की दास्तान
विजय मनोहर तिवारी
नुसरत फतह अली खान की आवाज में सूफियों के कई कलाम हम सबने सुने हैं। अली मौला का नाम भी अनगिनत बार सुना है। उर्दू के कुछ आसान और कुछ मुश्किल कलामों को बार-बार सुनने के बाद यह तो जाहिर हो जाता है कि मौला अली इस्लाम में किसी बहुत पाक और ताकतवर हैसियत की शख्सियत हैं, जिन्हें मुश्किल कुशा भी कहा जाता है। सूफी कलामों में मुश्किल कुशा का नाम भी बार-बार आता है। आम अकीदतमंद उनसे अपनी मुश्किलों को दूर करने की इल्तजा करते हैं। उन्हें उनकी ताकत याद दिलाते हैं।
अचानक मुझे आज मुश्किल कुशा क्यों याद आ गए? मैं अक्सर खाली वक्त में किसी पुराने मंदिर, किले, महल, तालाब या खंडहरों में भटकने पहुँच जाता हूँ। ऐसी उजाड़ जगहें, जो हमारे आसपास हैं, लेकिन हमारी नज़रों में नहीं आतीं।
हमारी बेखबरी के एक सुरक्षित कोने में उदास और उजाड़-सी पुरानी इमारतें, धूल-धक्कड़, झाड़ी-जंगलों में खो रहे अतीत के शानदार स्मारक। हम कई दफा इनके पास से गुज़रते रहते हैं, लेकिन कभी वे हमारा ध्यान नहीं खींचती। मुमकिन है ध्यान जाता भी हो, लेकिन दिलचस्पी की कमी बहुत गहराई से ताक-झाँक करने का मौका नहीं देती।
मैं एक ऐसी ही जगह से होकर आया हूँ, जहाँ थोड़ा भीतर जाने पर एक पुरानी इमारत के ऊपर मुश्किल कुशा का नाम देखकर कान खड़े हो गए। उस पर लिखा था-मुश्किल कुशा की दरगाह! मुश्किल कुशा का नाम पढ़ते ही नुसरत के कलाम याद आ गए।
वह जगह है मध्य प्रदेश में विदिशा जिले की गंजबासौदा तहसील में उदयपुर नाम का गाँव। गाँव बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन आज़ादी के पहले यह एक परगना था, जिसके तहत बासौदा एक गाँव था। आज बासौदा एक तहसील है और उदयपुर उसके अंतर्गत एक गाँव। उदयपुर एक हजार साल पुराने भव्य शिव मंदिर के लिए दूर तक प्रसिद्ध है। उदयपुर परमार वंश के राजा उदयादित्य के नाम पर बसा एक नगर रहा था, जहाँ परमारों ने गजब के निर्माण कार्य कराए थे।
इस शिव मंदिर को भी किसी सदी में काफी नुकसान पहुँचाया गया है। आसान पहुँच में आने वाली मंदिर की हर मूर्ति को खंडित किया गया। गनीमत यही रही कि मंदिर अपने मूल आकार में बचा रह गया।
कारोबारी लिहाज से यह एक बड़ा नगर रहा होगा इसलिए मुस्लिम कालखंड में यहाँ कब्ज़े और धर्मांतरण की वही कहानी दोहराई गई होगी, जो पूरे भारत की है। गांव में एक मस्जिद और मुस्लिम आबादी भी है, जो बताती है कि परमारों के बाद की किसी सदी में यहाँ हुए हमलों में मंदिर को नष्ट करने की कोशिशें हुईं। कारण जो भी रहा हो लेकिन मंदिर ध्वस्त होने से बच गया।
उदयपुर से सटा हुआ एक पहाड़ है। यह किसी विशाल शिवलिंग के आकार में तराशा हुआ मालूम पड़ता है। एक मूल पहाड़ से अलग एक विशाल मंदिर जैसा एक हिस्सा भी है, जो दूर से ऐसा लगता है कि रॉक टेम्पल जैसा कुछ बनाने के लिए इसे तरीके से काटकर अलग किया गया होगा। इस पहाड़ी शिखर के चारों तरफ एक किले की प्राचीर के खंडहर भी तीन तरफ फैले हुए हैं। यह पत्थर की खदानों के लिए मशहूर इलाका है।
मंदिर कई बार जाना हुुआ। पुरानी बस्ती की गलियों में भी खूब घूमा। इतिहास के प्रति हमारी बेखबरी की एक अजीब-सी मिसाल है यह जगह। किसी को कोई लेना-देना नहीं है कि हमारे आसपास हमारी बेशकीमती विरासत का क्या हाल है? हम उसे किस तरह चमकाकर दुनिया को दिखा-बता सकते हैं? चारों तरफ कब्ज़े हो रहे हैं। न पंचायत को कोई सरोकार, न कलेक्टर को यह देखने की फुरसत कि हमारे देखते-देखते कैसे इतिहास पर धूल की परत गहरा रही है।
पहली बार पहाड़ पर चढ़ाई की तो दिमाग हिल गया। सबसे ऊपर पहाड़ी चट्‌टानों पर परमारों के समय किसी बड़े टेम्पल प्रोजेक्ट के लक्षण साफ नज़र आए। वे यहाँ वाकई महाराष्ट्र में एलोरा के कैलाश मंदिर जैसा एक रॉक-टेम्पल बना रहे थे। पहाड़ को काटने के निशान अब तक मौजूद हैं। कटे हुए मंदिरनुमा हिस्से की बाहरी चट्‌टानों पर मूर्तियों काे उभारने का काम भी शुरू हो चुका था। हालाँकि यह बहुत शुरुआती दौर में ही बंद हो गया होगा। इसलिए प्रतिमाओं के अनगढ़ से फ्रेम बन पाए, वही आज तक देखे जा सकते हैं।
पहाड़ी पर ऊपर दो-चार कब्रें हैं, लेकिन उन पर किसी के नाम नहीं हैं। छोटे और पत्थर से ढके हुए कुछ बरामदे हैं। इनमें से ही एक मंडप को दरगाह की शक्ल हाल ही में कभी दी गई साफ नज़र आती है। बाहर दरवाज़े के ऊपर लिखा है- मुश्किल कुशा की दरगाह! मेरा दिमाग ठनका कि ये मुश्किल कुशा कौन हैं, जिनकी दरगाह मध्य प्रदेश के इस गाँव में है? क्या वे यहाँ दफनाए गए थे? क्या वे कोई सूफी संत थे? क्या वे कोई सुलतान या बादशाह या नवाब थे? इस नाम के कौन सज्जन पुरुष यहाँ कभी थे?
मैंने ये सवाल यहाँ कई मुसलमानों से पूछा, जो ज्यादातर मजदूर या छोटे-मोटे कारोबारी हैं। ज्यादातर किसी मदरसे में पढ़े हुए। मुझे हैरत हुई इनमें से किसी को नहीं पता कि यहाँ दफन मुश्किल कुशा कौन थे? क्या वे कोई स्थानीय शख्सियत थे? थे तो कब थे? किसी को कुछ नहीं पता।
लेकिन पत्थर के स्तंभों पर खड़े एक बहुत पुराने छोटे-से कमरे के फर्श पर आधुनिक चमचमाते टाइल लगाकर एक कोने में दरगाह जैसी शक्ल दे दी गई थी। यह भी कोई आदमकद नहीं, मुश्किल से तीन फुट आकार में। बाहर दो-चार हरे झंडे यह एलान करने के लिए लगा दिए गए हैं कि यह मिल्कियत मुसलमानों की है। बहुत मुमकिन है कि आने वाले सालों में एक विशाल दरगाह यहाँ नज़र आने लगे और पूरा पुराना उजाड़ पहाड़ी किला अवैध कब्जे में चला जाए, क्योंकि स्थानीय प्रशासन, पंचायत और आम लोग पूरी तरह बेखबर हैं।
आइए अब पता करते हैं कि मुश्किल कुशा कौन थे? दरअसल इस्लाम के पैगंबर हजरत मोहम्मद के दामाद थे अली। वे चाैथे खलीफा भी हैं। उनकी बीवी का नाम था फातिमा। पिता अबू तालिक। शिया मुसलमान उन्हें अपना पहला इमाम मानते हैं। उनकी सादगी और समझदारी के कई किस्से हैं।
उनके कुछ कथन बड़े मशहूर हैं-
कभी भी किसी के पतन को देखकर खुश मत होना, क्योंकि तुम्हें पता नहीं है, भविष्य में तुम्हारे साथ क्या होने वाला है।
महान व्यक्ति का सबसे अच्छा काम होता है, माफ कर देना और भुला देना।
जिसको तुमसे सच्चा प्रेम होगा, वह तुमको व्यर्थ और नाजायज़ कामों से रोकेगा।
मैंने कहीं पढ़ा कि नमाज़ के दौरान अली को कत्ल किया गया था। यह घटना सिंध में भी इस्लाम के कब्ज़े (712 ईस्वी) से पहले की मक्का-मदीना की है। जब इस्लाम का ही भारत में दूर-दूर तक अता-पता नहीं था। कोई मुसलमान नहीं था तो मुश्किल कुशा यहाँ कैसे दफन हो गए?
मौला अली या मुश्किल कुशा को याद रखने का यह क्या तरीका हुआ? किसी पुरानी उजाड़ इमारत पर बाहर यह लिखकर टांग दो कि यह मुश्किल कुशा की दरगाह है। अपने इतिहास से अज्ञानी समाज कैसे धोखों में पड़ा रहकर गाफिल होता है और बड़े गड्‌ढों में गिरता है, यह इसके नमूने हैं।
मध्य प्रदेश के ही ओरछा शहर में दो साल पहले एक पहाड़ी पर ऐसे ही एक कब्ज़े की कहानी मुझे एक स्थानीय गाइड ने बताई थी। वह ओरछा के प्राचीन राजघराने के किसी सदस्य की हवेली या महल का हिस्सा था, जिसे स्थानीय मुसलमानों ने अपना अड्‌डा बनाकर एक दरगाह घोषित कर दिया गया था। पहाड़ी के नीचे बाकायदा एक साइनबोर्ड भी लगा दिया गया था, जो ऊपर एक दरगाह की घोषणा थी।
जबकि बुंदेलखंड के स्थानीय हिंदू राजाओं की राजधानी रही ओरछा में ऐसे किसी सूफी या सुलतान के दफनाए जााने के कोई ब्यौरे इतिहास में कहीं दर्ज नहीं हैं। यह विशुद्ध रूप से राजा राम के ऐतिहासिक मंदिर के लिए प्रसिद्ध बेतवा किनारे बसा एक शानदार शहर है, जहाँ भारतीय स्थापत्य के कई बेमिसाल नमूने हैं।
मध्य प्रदेश के ही रतलाम जिले में जावरा एक मुस्लिम नवाब की रियासत रही है। वहाँ एक दरगाह है, जो मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों के इलाज के लिए जानी जाती है। यह एक भीड़भाड़ वाली जगह है। लेकिन आप कभी मध्य प्रदेश से राजस्थान में चित्तौड़ की तरफ जाएँगे तो आपकी निगाहों में साफ आएगा कि जावरा के आसपास के इलाके में भी अचानक हाल के सालों या महीनों में बनी दरगाहें उग रही हैं।
कोई नहीं जानता कि वहाँ कौन साहब दफनाए गए हैं। लेकिन अचानक ही किसी जगह पर आपको पत्थरों के चौकोर ढेर पर हरी चादरें बिछी दिखाई देने लगेंगी। हरे झंडे फहराते नज़र आएँगे। कुछ दिन बाद वहाँ एक साइनबोर्ड टंग जाएगा। उनके नाम भी ऐसे होंगे, जो आसपास रहने वाले सभी समुदायों के बहुसंख्यक लोगाें के लिए एकदम अपरिचित होंगे।
खुद मुसलमान भी उनके बारे में कुछ नहीं बता पाएँगे। एक रटा-रटाया सा जवाब होगा- पीर साहब की दरगाह है! होशंगाबाद जिले के एक छोटे-से कस्बे में कुछ साल पहले एक दरगाह ऐसी चर्चा में आई थी, जो अजमेर से लाई गई ईंटों को दफनाकर ही बना दी गई थी। एक बार कारोबार जमने के बाद हिंदू-मुस्लिम एकता की गंगा-जमनी कहानियां, चंदों से उर्स के आयोजन, कव्वालियाँ, नेताओं की धूमधाम, ऐसे कब्जों की हकीकत है।
उदयपुर में मुश्किल कुशा की दरगाह क्या इशारे करती है? ये कौन लोग हैं, जो अपने आसपास पड़ी उपेक्षित और वीरान ऐतिहासिक विरासत पर कब्ज़े के लिए मजहबी आड़ ले रहे हैं? क्या उनकी ऐसी कोशिशों से मुश्किल कुशा या गरीब नवाज़ या औलिया या पीर साहब (जो असल में कहीं और दफन हैं। यहाँ उनका कुछ है ही नहीं। सिर्फ उनके नाम से एक अतिक्रमण। एक गैरकानूनी हरकत।) खुश होंगे? उनकी मन्नतें पूरी करेंगे? जन्नत में उनकी जगह आरक्षित करने में मददगार बनेंगे?
या इलाही ये माजरा क्या है?



Posted in हिन्दू पतन

Did you know? Two congress politicians constructed Jinnah Tower in India!
This was AFTER Jinnah partitioned India and created Pakistan!
The tower seen in this picture is “Jinnah Tower”. No, it is NOT in Pakistan. It is in Guntur, India.
Jinnah was the man who broke India into three pieces. Why? Because he believed that Muslims should get a country in India at any cost, including the lives of hundreds of thousands of Hindus. His idea of Pakistan led to killings of hundreds of thousands. Around 10 million people were displaced. For Sindhis, Punjabis and Bengalis, Jinnah was directly responsible for the permanent loss of their land. As such, he is to Indians and Hindus what Hitler is to Jews.
It is unimaginable to see Hitler Tower in Germany. But we have a Jinnah tower right inside India.
And here is the most shameful thing. Two Congress Secularist politicians named Nadimpally Narasimha Rao and Tellakula Jalayya constructed it AFTER partition of India and creation of Pakistan!
TrueIndology