Posted in हिन्दू पतन

કેનેડા સ્થિત પાકિસ્તાની લેખક શ્રી તારિક ફતેહે એ.બી.પી. ન્યૂઝ પર કોંગ્રેસનું સમર્થન કર્તા મૂર્ખ લોકો માટે આપેલા નિવેદનના મુખ્ય મુદ્દા:

  1. કાશ્મીરી પંડિતોને પોતાની જ માતૃભૂમિ પર રહેંસી નાખવામાં આવ્યા અને ત્યાં થી ખદેડી મૂક્યા તો પણ તમે હિન્દુ ઓ એમને એમના વતનમાં વસાવી ન શક્યા, અને તમે બિનસાંપ્રદાયિકતાની વાતો કરો છો. .!
  2. આતંકવાદ માટે પાકિસ્તાન જવાબદાર છે. 5 પાકિસ્તાની આવી ને તમારા દેશમાં બૉમ્બ બ્લાસ્ટ કરી જાય છે ..!!
    અને તમે ટોલરન્સની ચર્ચા કરી રહ્યા છો..!
  3. મસ્જિદોમાં એ લોકો કાફિરોને મારી નાંખવાના સામુહિક નારા લગાવે છે અને તમે હિન્દુઓ લઘુમતિના અધિકારો વિશે વાતો કરો છો. .!!
  4. કેરળ, હૈદરાબાદ, પશ્ચિમ બંગાળ, કાશ્મીરમાં એ લોકો પાકિસ્તાની ધ્વજ ફરકાવે છે….
    અને તમે લોકો એમને ભારતીય મુસ્લિમો કહો છો. .!!
  5. ભારત-પાકિસ્તાન વચ્ચે યુધ્ધ હોય કે ક્રિકેટ મેચ…
    ભારત ના મુસ્લિમ કઈ બાજુ હોય છે તે બધા જ જાણે છે…
    તેમ છતાં પણ તમે એમને દેશભક્ત કહો છો. .!!
  6. તસલીમા નસરીન અને અન્ય લેખકો સાથે હૈદરાબાદમાં મારપીટ કરવામાં આવેલી,
    ઓવૈસી એ 100 કરોડ હિન્દુ ઓને મારી નાખવાની વાત કરેલી. …
    ત્યારે આ અસહિષ્ણુતા મુદ્દે કેમ કોઈએ એવોર્ડ પાછો નહોતો આપ્યો???
  7. પાકિસ્તાન તમારા સૈનિકોની હત્યા કરે છે અને તમારા રાજનેતાઓ સંબંધો સુધારવા અને વેપાર વધારવા માટે પાકિસ્તાન ની મુલાકાતો લે છે…

તમારા હિન્દુ ઓમાં ઝમીર જેવુ કંઈ છે કે નહીં??
તમારો ઉર્દૂ અને બિરયાનીનો મોહ ક્યારે છૂટશે?

  1. તમારા હજારો મંદિર તોડી પાડવામાં આવ્યા, તમે કંઈ જ ન કરી શક્યા.
    અને તમારા પોતાના જ દેશમાં, તમારા સાંસ્કૃતિક કેન્દ્ર એવા અયોધ્યા માં એક મંદિર બનાવવા તમે વર્ષોથી સંઘર્ષ કરી રહ્યા છો. .!!!
    ત્યારે આપણા જ ભારત માથી મુસ્લિમોને હજ કરવા માટે સબસિડીની છુટ હતી અને અમરનાથ યાત્રામાં હિન્દુઓને ટેક્સ ભરવો પડતો હતો
  2. 2002 હોય કે 1991, એ મુસ્લિમો દ્વારા આચરવામાં આવેલી હિંસાનુ રિએક્શન હતું.
    જેહાદ અને ISIS માટેનુ મુસ્લિમોનુ વળગણ જગજાહેર છે.
    શું તમે એમ માનો છો કે ભારતીય મુસ્લિમો ISIS માં નથી જોડાતા? ?
    ડેટા તપાસી જુઓ.
    બ્રિટન અને અન્ય દેશોમાં ગયેલા NRI હજારોની સંખ્યામાં જોડાઈ રહ્યા છે.
  3. છેલ્લે, મારે એટલું જ કહેવું છે કે ઉપર આપેલા મુદ્દાઓ વિશે , કેનેડાથી આવેલો એક પાકિસ્તાની મુસ્લિમ તમને જગાડે નહીં ત્યાં સુધી તમે નઘરોળની માફક ઊંઘતા રહો છો!!!

તમે ક્યારે જાગશો????
|| हिन्दू संगठन संस्था ||
આ દરેક હિન્દુ એ એટલા માટે મૉકલવું જઇએ કે સુતેલા સમાજ ને બ્રાહ્મણો એ હંમેશા જગાડયૉ છે અને કર્મથી બ્રાહ્મણ દરેક વ્યક્તિ બની શકે માટે કર્મથી બ્રાહ્મણ બની ઓછા માં ઓછા સૉ લૉકૉ ને મૉકલો

Posted in हिन्दू पतन

आर्य समाज

मुश्किल कुशा की दरगाह मध्य प्रदेश में कहाँ से आ गई? अवैध अतिक्रमणों की दास्तान
विजय मनोहर तिवारी
नुसरत फतह अली खान की आवाज में सूफियों के कई कलाम हम सबने सुने हैं। अली मौला का नाम भी अनगिनत बार सुना है। उर्दू के कुछ आसान और कुछ मुश्किल कलामों को बार-बार सुनने के बाद यह तो जाहिर हो जाता है कि मौला अली इस्लाम में किसी बहुत पाक और ताकतवर हैसियत की शख्सियत हैं, जिन्हें मुश्किल कुशा भी कहा जाता है। सूफी कलामों में मुश्किल कुशा का नाम भी बार-बार आता है। आम अकीदतमंद उनसे अपनी मुश्किलों को दूर करने की इल्तजा करते हैं। उन्हें उनकी ताकत याद दिलाते हैं।
अचानक मुझे आज मुश्किल कुशा क्यों याद आ गए? मैं अक्सर खाली वक्त में किसी पुराने मंदिर, किले, महल, तालाब या खंडहरों में भटकने पहुँच जाता हूँ। ऐसी उजाड़ जगहें, जो हमारे आसपास हैं, लेकिन हमारी नज़रों में नहीं आतीं।
हमारी बेखबरी के एक सुरक्षित कोने में उदास और उजाड़-सी पुरानी इमारतें, धूल-धक्कड़, झाड़ी-जंगलों में खो रहे अतीत के शानदार स्मारक। हम कई दफा इनके पास से गुज़रते रहते हैं, लेकिन कभी वे हमारा ध्यान नहीं खींचती। मुमकिन है ध्यान जाता भी हो, लेकिन दिलचस्पी की कमी बहुत गहराई से ताक-झाँक करने का मौका नहीं देती।
मैं एक ऐसी ही जगह से होकर आया हूँ, जहाँ थोड़ा भीतर जाने पर एक पुरानी इमारत के ऊपर मुश्किल कुशा का नाम देखकर कान खड़े हो गए। उस पर लिखा था-मुश्किल कुशा की दरगाह! मुश्किल कुशा का नाम पढ़ते ही नुसरत के कलाम याद आ गए।
वह जगह है मध्य प्रदेश में विदिशा जिले की गंजबासौदा तहसील में उदयपुर नाम का गाँव। गाँव बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन आज़ादी के पहले यह एक परगना था, जिसके तहत बासौदा एक गाँव था। आज बासौदा एक तहसील है और उदयपुर उसके अंतर्गत एक गाँव। उदयपुर एक हजार साल पुराने भव्य शिव मंदिर के लिए दूर तक प्रसिद्ध है। उदयपुर परमार वंश के राजा उदयादित्य के नाम पर बसा एक नगर रहा था, जहाँ परमारों ने गजब के निर्माण कार्य कराए थे।
इस शिव मंदिर को भी किसी सदी में काफी नुकसान पहुँचाया गया है। आसान पहुँच में आने वाली मंदिर की हर मूर्ति को खंडित किया गया। गनीमत यही रही कि मंदिर अपने मूल आकार में बचा रह गया।
कारोबारी लिहाज से यह एक बड़ा नगर रहा होगा इसलिए मुस्लिम कालखंड में यहाँ कब्ज़े और धर्मांतरण की वही कहानी दोहराई गई होगी, जो पूरे भारत की है। गांव में एक मस्जिद और मुस्लिम आबादी भी है, जो बताती है कि परमारों के बाद की किसी सदी में यहाँ हुए हमलों में मंदिर को नष्ट करने की कोशिशें हुईं। कारण जो भी रहा हो लेकिन मंदिर ध्वस्त होने से बच गया।
उदयपुर से सटा हुआ एक पहाड़ है। यह किसी विशाल शिवलिंग के आकार में तराशा हुआ मालूम पड़ता है। एक मूल पहाड़ से अलग एक विशाल मंदिर जैसा एक हिस्सा भी है, जो दूर से ऐसा लगता है कि रॉक टेम्पल जैसा कुछ बनाने के लिए इसे तरीके से काटकर अलग किया गया होगा। इस पहाड़ी शिखर के चारों तरफ एक किले की प्राचीर के खंडहर भी तीन तरफ फैले हुए हैं। यह पत्थर की खदानों के लिए मशहूर इलाका है।
मंदिर कई बार जाना हुुआ। पुरानी बस्ती की गलियों में भी खूब घूमा। इतिहास के प्रति हमारी बेखबरी की एक अजीब-सी मिसाल है यह जगह। किसी को कोई लेना-देना नहीं है कि हमारे आसपास हमारी बेशकीमती विरासत का क्या हाल है? हम उसे किस तरह चमकाकर दुनिया को दिखा-बता सकते हैं? चारों तरफ कब्ज़े हो रहे हैं। न पंचायत को कोई सरोकार, न कलेक्टर को यह देखने की फुरसत कि हमारे देखते-देखते कैसे इतिहास पर धूल की परत गहरा रही है।
पहली बार पहाड़ पर चढ़ाई की तो दिमाग हिल गया। सबसे ऊपर पहाड़ी चट्‌टानों पर परमारों के समय किसी बड़े टेम्पल प्रोजेक्ट के लक्षण साफ नज़र आए। वे यहाँ वाकई महाराष्ट्र में एलोरा के कैलाश मंदिर जैसा एक रॉक-टेम्पल बना रहे थे। पहाड़ को काटने के निशान अब तक मौजूद हैं। कटे हुए मंदिरनुमा हिस्से की बाहरी चट्‌टानों पर मूर्तियों काे उभारने का काम भी शुरू हो चुका था। हालाँकि यह बहुत शुरुआती दौर में ही बंद हो गया होगा। इसलिए प्रतिमाओं के अनगढ़ से फ्रेम बन पाए, वही आज तक देखे जा सकते हैं।
पहाड़ी पर ऊपर दो-चार कब्रें हैं, लेकिन उन पर किसी के नाम नहीं हैं। छोटे और पत्थर से ढके हुए कुछ बरामदे हैं। इनमें से ही एक मंडप को दरगाह की शक्ल हाल ही में कभी दी गई साफ नज़र आती है। बाहर दरवाज़े के ऊपर लिखा है- मुश्किल कुशा की दरगाह! मेरा दिमाग ठनका कि ये मुश्किल कुशा कौन हैं, जिनकी दरगाह मध्य प्रदेश के इस गाँव में है? क्या वे यहाँ दफनाए गए थे? क्या वे कोई सूफी संत थे? क्या वे कोई सुलतान या बादशाह या नवाब थे? इस नाम के कौन सज्जन पुरुष यहाँ कभी थे?
मैंने ये सवाल यहाँ कई मुसलमानों से पूछा, जो ज्यादातर मजदूर या छोटे-मोटे कारोबारी हैं। ज्यादातर किसी मदरसे में पढ़े हुए। मुझे हैरत हुई इनमें से किसी को नहीं पता कि यहाँ दफन मुश्किल कुशा कौन थे? क्या वे कोई स्थानीय शख्सियत थे? थे तो कब थे? किसी को कुछ नहीं पता।
लेकिन पत्थर के स्तंभों पर खड़े एक बहुत पुराने छोटे-से कमरे के फर्श पर आधुनिक चमचमाते टाइल लगाकर एक कोने में दरगाह जैसी शक्ल दे दी गई थी। यह भी कोई आदमकद नहीं, मुश्किल से तीन फुट आकार में। बाहर दो-चार हरे झंडे यह एलान करने के लिए लगा दिए गए हैं कि यह मिल्कियत मुसलमानों की है। बहुत मुमकिन है कि आने वाले सालों में एक विशाल दरगाह यहाँ नज़र आने लगे और पूरा पुराना उजाड़ पहाड़ी किला अवैध कब्जे में चला जाए, क्योंकि स्थानीय प्रशासन, पंचायत और आम लोग पूरी तरह बेखबर हैं।
आइए अब पता करते हैं कि मुश्किल कुशा कौन थे? दरअसल इस्लाम के पैगंबर हजरत मोहम्मद के दामाद थे अली। वे चाैथे खलीफा भी हैं। उनकी बीवी का नाम था फातिमा। पिता अबू तालिक। शिया मुसलमान उन्हें अपना पहला इमाम मानते हैं। उनकी सादगी और समझदारी के कई किस्से हैं।
उनके कुछ कथन बड़े मशहूर हैं-
कभी भी किसी के पतन को देखकर खुश मत होना, क्योंकि तुम्हें पता नहीं है, भविष्य में तुम्हारे साथ क्या होने वाला है।
महान व्यक्ति का सबसे अच्छा काम होता है, माफ कर देना और भुला देना।
जिसको तुमसे सच्चा प्रेम होगा, वह तुमको व्यर्थ और नाजायज़ कामों से रोकेगा।
मैंने कहीं पढ़ा कि नमाज़ के दौरान अली को कत्ल किया गया था। यह घटना सिंध में भी इस्लाम के कब्ज़े (712 ईस्वी) से पहले की मक्का-मदीना की है। जब इस्लाम का ही भारत में दूर-दूर तक अता-पता नहीं था। कोई मुसलमान नहीं था तो मुश्किल कुशा यहाँ कैसे दफन हो गए?
मौला अली या मुश्किल कुशा को याद रखने का यह क्या तरीका हुआ? किसी पुरानी उजाड़ इमारत पर बाहर यह लिखकर टांग दो कि यह मुश्किल कुशा की दरगाह है। अपने इतिहास से अज्ञानी समाज कैसे धोखों में पड़ा रहकर गाफिल होता है और बड़े गड्‌ढों में गिरता है, यह इसके नमूने हैं।
मध्य प्रदेश के ही ओरछा शहर में दो साल पहले एक पहाड़ी पर ऐसे ही एक कब्ज़े की कहानी मुझे एक स्थानीय गाइड ने बताई थी। वह ओरछा के प्राचीन राजघराने के किसी सदस्य की हवेली या महल का हिस्सा था, जिसे स्थानीय मुसलमानों ने अपना अड्‌डा बनाकर एक दरगाह घोषित कर दिया गया था। पहाड़ी के नीचे बाकायदा एक साइनबोर्ड भी लगा दिया गया था, जो ऊपर एक दरगाह की घोषणा थी।
जबकि बुंदेलखंड के स्थानीय हिंदू राजाओं की राजधानी रही ओरछा में ऐसे किसी सूफी या सुलतान के दफनाए जााने के कोई ब्यौरे इतिहास में कहीं दर्ज नहीं हैं। यह विशुद्ध रूप से राजा राम के ऐतिहासिक मंदिर के लिए प्रसिद्ध बेतवा किनारे बसा एक शानदार शहर है, जहाँ भारतीय स्थापत्य के कई बेमिसाल नमूने हैं।
मध्य प्रदेश के ही रतलाम जिले में जावरा एक मुस्लिम नवाब की रियासत रही है। वहाँ एक दरगाह है, जो मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों के इलाज के लिए जानी जाती है। यह एक भीड़भाड़ वाली जगह है। लेकिन आप कभी मध्य प्रदेश से राजस्थान में चित्तौड़ की तरफ जाएँगे तो आपकी निगाहों में साफ आएगा कि जावरा के आसपास के इलाके में भी अचानक हाल के सालों या महीनों में बनी दरगाहें उग रही हैं।
कोई नहीं जानता कि वहाँ कौन साहब दफनाए गए हैं। लेकिन अचानक ही किसी जगह पर आपको पत्थरों के चौकोर ढेर पर हरी चादरें बिछी दिखाई देने लगेंगी। हरे झंडे फहराते नज़र आएँगे। कुछ दिन बाद वहाँ एक साइनबोर्ड टंग जाएगा। उनके नाम भी ऐसे होंगे, जो आसपास रहने वाले सभी समुदायों के बहुसंख्यक लोगाें के लिए एकदम अपरिचित होंगे।
खुद मुसलमान भी उनके बारे में कुछ नहीं बता पाएँगे। एक रटा-रटाया सा जवाब होगा- पीर साहब की दरगाह है! होशंगाबाद जिले के एक छोटे-से कस्बे में कुछ साल पहले एक दरगाह ऐसी चर्चा में आई थी, जो अजमेर से लाई गई ईंटों को दफनाकर ही बना दी गई थी। एक बार कारोबार जमने के बाद हिंदू-मुस्लिम एकता की गंगा-जमनी कहानियां, चंदों से उर्स के आयोजन, कव्वालियाँ, नेताओं की धूमधाम, ऐसे कब्जों की हकीकत है।
उदयपुर में मुश्किल कुशा की दरगाह क्या इशारे करती है? ये कौन लोग हैं, जो अपने आसपास पड़ी उपेक्षित और वीरान ऐतिहासिक विरासत पर कब्ज़े के लिए मजहबी आड़ ले रहे हैं? क्या उनकी ऐसी कोशिशों से मुश्किल कुशा या गरीब नवाज़ या औलिया या पीर साहब (जो असल में कहीं और दफन हैं। यहाँ उनका कुछ है ही नहीं। सिर्फ उनके नाम से एक अतिक्रमण। एक गैरकानूनी हरकत।) खुश होंगे? उनकी मन्नतें पूरी करेंगे? जन्नत में उनकी जगह आरक्षित करने में मददगार बनेंगे?
या इलाही ये माजरा क्या है?



Posted in हिन्दू पतन

Did you know? Two congress politicians constructed Jinnah Tower in India!
This was AFTER Jinnah partitioned India and created Pakistan!
The tower seen in this picture is “Jinnah Tower”. No, it is NOT in Pakistan. It is in Guntur, India.
Jinnah was the man who broke India into three pieces. Why? Because he believed that Muslims should get a country in India at any cost, including the lives of hundreds of thousands of Hindus. His idea of Pakistan led to killings of hundreds of thousands. Around 10 million people were displaced. For Sindhis, Punjabis and Bengalis, Jinnah was directly responsible for the permanent loss of their land. As such, he is to Indians and Hindus what Hitler is to Jews.
It is unimaginable to see Hitler Tower in Germany. But we have a Jinnah tower right inside India.
And here is the most shameful thing. Two Congress Secularist politicians named Nadimpally Narasimha Rao and Tellakula Jalayya constructed it AFTER partition of India and creation of Pakistan!
TrueIndology
Posted in हिन्दू पतन

महाभारत से पहले कृष्ण भी गए थे दुर्योधन के दरबार में. यह प्रस्ताव लेकर, कि हम युद्ध नहीं चाहते….
तुम पूरा राज्य रखो…. पाँडवों को सिर्फ पाँच गाँव दे दो…
वे चैन से रह लेंगे, तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे.

बेटे ने पूछा – “पर इतना unreasonable proposal लेकर कृष्ण गए क्यों थे ?
अगर दुर्योधन प्रोपोजल एक्सेप्ट कर लेता तो..?

पिता :- नहीं करता….!
कृष्ण को पता था कि वह प्रोपोजल एक्सेप्ट नहीं करेगा…

उसके मूल चरित्र के विरुद्ध था.

फिर कृष्ण ऐसा प्रोपोजल लेकर गए ही क्यों थे..?

वे तो सिर्फ यह सिद्ध करने गए थे कि दुर्योधन कितना अनरीजनेबल, कितना अन्यायी था.

वे पाँडवों को सिर्फ यह दिखाने गए थे,
कि देख लो बेटा…
युद्ध तो तुमको लड़ना ही होगा… हर हाल में…
अब भी कोई शंका है तो निकाल दो….मन से.
तुम कितना भी संतोषी हो जाओ,
कितना भी चाहो कि “घर में चैन से बैठूँ “…

दुर्योधन तुमसे हर हाल में लड़ेगा ही.

“लड़ना…. या ना लड़ना” – तुम्हारा ऑप्शन नहीं है…”

फिर भी बेचारे अर्जुन को आखिर तक शंका रही…
“सब अपने ही तो बंधु बांधव हैं….”😞

कृष्ण ने सत्रह अध्याय तक फंडा दिया…फिर भी शंका थी..

ज्यादा अक्ल वालों को ही ज्यादा शंका होती है ना 😄

दुर्योधन को कभी शंका नहीथी
उसे हमेशा पता था कि “उसे युद्ध करना ही है… “उसने गणित लगा रखा था….

हिन्दुओं को भी समझ लेना होगा कि :-
“कन्फ्लिक्ट होगा या नहीं,
यह आपका ऑप्शन नहीं है…

आपने तो पाँच गाँव का प्रोपोजल भी देकर देख लिया…

देश के दो टुकड़े मंजूर कर लिए,

(उस में भी हिंदू ही खदेड़ा गया अपनी जमीन जायदाद ज्यों की त्यों छोड़कर….)

हर बात पर विशेषाधिकार देकर देख लिया….

हज के लिए सबसीडी देकर देख ली,

उनके लिए अलग नियम
कानून (धारा 370) बनवा कर देख लिए…

“आप चाहे जो कर लीजिए, उनकी माँगें नहीं रुकने वाली”

उन्हें सबसे स्वादिष्ट उसी गौमाता का माँस लगेगा जो आपके लिए पवित्र है,
उसके बिना उन्हें भयानक कुपोषण हो रहा है.

उन्हें “सबसे प्यारी” वही मस्जिदें हैं,
जो हजारों साल पुराने “आपके” ऐतिहासिक मंदिरों को तोड़ कर बनी हैं….
उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी उसी आवाज से है
जो मंदिरों की घंटियों और पूजा-पंडालों से है.

ये माँगें गाय को काटने तक नहीं रुकेंगी…
यह समस्या मंदिरों तक नहीं रहने वाली,
यह 15-20 साल में हमारे घर तक आने वाली है…
हमारी बहू-बेटियों और जायदाद तक जाने वाली है…जो पुराने इतिहास में हुआ था
आज का तर्क है:-
तुम्हें गाय इतनी प्यारी है तो सड़कों पर क्यों घूम रही है ?
हम तो काट कर खाएँगे….
हमारे मजहब में लिखा है !

कल कहेंगे,
“तुम्हारी बेटी की इतनी इज्जत है तो वह अपना *खूबसूरत चेहरा ढके बिना घर से निकलती ही क्यों है ?

हम तो उठा कर ले जाएँगे.”

उन्हें समस्या गाय से नहीं है,
हमारे “अस्तित्व” से है.

तुम जब तक हो,
उन्हें कुछ ना कुछ प्रॉब्लम रहेगी.

इसलिए हे अर्जुन,
और डाउट मत पालो
कृष्ण घंटे भर की क्लास बार-बार नहीं लगाते..

25 साल पहले कश्मीरी हिन्दुओं का सब कुछ छिन गया….. वे शरणार्थी कैंपों में रहे, पर फिर भी वे आतंकवादी नहीं बनते….

जबकि कश्मीरी मुस्लिमों को सब कुछ दिया गया….
वे फिर भी आतंकवादी बन कर जन्नत को जहन्नुम बना रहे हैं ।

पिछले साल की बाढ़ में सेना के जवानों ने जिनकी जानें बचाई वो आज उन्हीं जवानों को पत्थरों से कुचल डालने पर आमादा हैं….

इसे ही कहते हैं संस्कार…..
ये अंतर है “धर्म” और “मजहब” में..!!

एक जमाना था जब लोग मामूली चोर के जनाजे में शामिल होना भी शर्मिंदगी समझते थे….

और एक ये गद्दार और देशद्रोही लोग हैं जो खुले आम… पूरी बेशर्मी से एक आतंकवादी के जनाजे में शामिल हैं..!

सन्देश साफ़ है,,,
एक कौम,
देश और तमाम दूसरी कौमों के खिलाफ युद्ध छेड़ चुकी है….
अब भी अगर आपको नहीं दिखता है तो…
यकीनन आप अंधे हैं !
या फिर शत प्रतिशत देश के गद्दार..!!

आज तक हिंदुओं ने किसी को हज पर जाने से नहीं रोका…
लेकिन हमारी अमरनाथ यात्रा हर साल बाधित होती है !
फिर भी हम ही असहिष्णु हैं…..?
ये तो कमाल की धर्मनिरपेक्षता है भाई

🌹 🙏 🙏 🌹

Posted in हिन्दू पतन

असम में एक ईसाई धर्मप्रचारक भेजे गए थे,
नाम था फादर क्रूज़
इन्हें असम के एक प्रभावशाली परिवार के लड़के को घर आकर अंग्रेजी पढ़ाने का अवसर मिला,
पादरी साहब धीरे-धीरे घर का निरीक्षण करने लगे,
उन्हें पता चल गया कि, बच्चे की दादी इस घर में सबसे प्रभाव वाली हैं,
इसलिए उनको यदि ईसा की शिक्षाओं के जाल में फंसाया जाए तो,
उनके माध्यम से पूरा परिवार
और फिर पूरा गा़व ईसाई बनाया जा सकता है!
पादरी साहब दादी मां को बताने लगे
कैसे ईसा कोढ़ी का कोढ़ ठीक कर देते थे,
कैसे वो नेत्रहीनों को नेत्र ज्योति देते थे, आदि-आदि !
दादी ने कहा, बेटा, हमारे “राम-कृष्ण” के चमत्कारों के आगे तो कुछ भी नहीं ये सब !
तुमने सुना है कि हमारे राम ने एक पत्थर का स्पर्श किया तो
वो जीवित स्त्री में बदल गई
राम जी के नाम के प्रभाव से पत्थर भी तैर जाता था पानी में,आज भी तैर रहे है
पादरी साहब खामोश हो जाते पर प्रयास जारी रखते अपना !
एक दिन पादरी साहब चर्च से केक लेकर आ गए और दादी को खाने को दिया,
पादरी साहब को विश्वास था कि दादी न खायेंगी
पर उसकी आशा के विपरीत दादी ने केक लिया और खा गई !
पादरी साहब आंखों में गर्वोक्त उन्माद भरे अट्टहास कर उठे,
दादी तुमने चर्च का प्रसाद खा लिया !
अब तुम ईसाई हो ,
दादी ने पादरी साहब के कान खींचते हुए कहा,
वाह रे गधे !
मुझे एक दिन केक खिलाया
तो मैं ईसाई हो गई
और मैं जो प्रतिदिन तुमको अपने घर का खिलाती ह़ू ,
तो तू हिन्दू क्यों नहीं हुआ ?
तू तो प्रतिदिन सनातन धर्म की इस आदि भूमि का
वायु ,जल लेता है
फिर तो तेरा रोम-रोम हिन्दू बन जाना चाहिए!

अपने स्वधर्म और
राष्ट्र को पथभ्रष्ट होने और
गलत दिशा में जाने से बचाने वाली
ये दादी मां थी
असम की
सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी “कमला देवी हजारिका

कौन जानता है इनको असम से बाहर ?
क्या हमारा कर्तव्य नहीं है कि, देश इनके बारे में जाने ?

साभार-अभिजीत सिंह

Posted in हिन्दू पतन

From FB Wall of Jitendra singh

गांधी का हिंदुत्व से नफरत

मैं जो यह लिख रहा हूं उस सब का प्रमाणित लिंक साथ ही वीर अर्जुन अखबार का लिंक और पूरा लेख कमेंट बॉक्स में है आप विस्तार से वहां पढियेगा क्योंकि बहुत ज्यादा लिखना यहां संभव नहीं है।

19 वीं सदी की शुरुआत में खिलाफत आंदोलन के साथ-साथ भारत में मुस्लिम कट्टर होते गए तब हिंदू और मुस्लिम में कटुता काफी बढ़ने लगी।

फिर 1920 में अचानक भारत की तमाम मस्जिदों से दो किताबें वितरित की जाने लगी एक किताब का नाम था “कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी” दूसरी किताब का नाम था “उन्नीसवीं सदी का लंपट महर्षि” यह दोनों किताबें अनाम थी इसमें किसी लेखक या प्रकाशक का नाम नहीं था और यह दोनों किताबो में भगवान श्री कृष्ण हिंदू धर्म इत्यादि पर बेहद अश्लील बेहद घिनौनी बातें लिखी गई थी और इन किताबों में तमाम देवी देवताओं के बेहद अश्लील रेखाचित्र भी बनाए गए थे।

और धीरे-धीरे यह दोनों किताबे भारत की हर एक मस्जिदों में वितरित किए जाने लगे।

यह बात जब महात्मा गांधी तक पहुंची तब महात्मा गांधी ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी की बात बता कर खारिज कर दिया और कहा भारत में सब को अपनी बात रखने का हक है लेकिन इन दोनों किताबों से भारत का जनमानस काफी उबल रहा था।

फिर 1923 में लाहौर स्थित राजपाल प्रकाशक के मालिक महाशय राजपाल जी ने एक किताब प्रकाशित की जिसका नाम था “रंगीला रसूल” उस किताब का लेखक का नाम गुप्त रखा गया था और लेखक की जगह लिखा था “दूध का दूध और पानी का पानी” हालांकि उस किताब के असली लेखक पंडित चंपूपति थे जो इस्लाम के जाने-माने विद्वान थे और सबसे अच्छी बात यह थी कि उस किताब में कहीं कोई झूठ नहीं था बल्कि तमाम सबूत के साथ बकायदा आयत नंबर हदीस नंबर इत्यादि देकर कई बातें लिखी गई थी। 1.5 सालों तक रंगीला रसूल बिकता रहा पूरे भारत में कहीं कोई बवाल नहीं हुआ लेकिन एक दिन अचानक 28 मई 1924 को महात्मा गांधी ने अपने अखबार यंग इंडिया में एक लंबा-चौड़ा लेख लिखकर रंगीला रसूल किताब की खूब निंदा की और अंत में 3 लाइन ऐसी लिखी मुसलमानों को खुद ऐसी किताब लिखने वालों को सजा देनी चाहिए

गांधी का या लेख पढ़कर पूरे भारत के मुसलमान भड़क गए और राजपाल प्रकाशक के मालिक महाशय राजपाल जी के ऊपर 3 सालों में 5 बार हमले हुए लेकिन महात्मा गांधी ने एक बार भी हमले की निंदा नहीं की मजे की बात यह कि कुछ मुस्लिम विद्वानों ने उस किताब रंगीला रसूल का मामला लाहौर हाई कोर्ट में दायर किया हाईकोर्ट ने चार इस्लामिक विद्वानों को अदालत में खड़ा करके उनसे पूछा कि इस किताब की कौन सी लाइन गलत है आप वह बता दीजिए चारों इस्लामिक विद्वान इस बात पर सहमत थे कि इस किताब में कोई गलत बात नहीं लिखी गई है फिर लाहौर हाईकोर्ट ने महाशय राजपाल जी के ऊपर मुकदमा खारिज कर दिया और उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया….

फिर उसके बाद 3 अगस्त 1924 को महात्मा गांधी ने यंग इंडिया खबर में एक और भड़काने वाला लेख लिखा और इस लेख में उन्होंने इशारों इशारों में ऐसा लिखा था कि जब व्यक्ति को अदालतों से न्याय नहीं मिले तब उसे खुद प्रयास करके न्याय ले लेना चाहिए

उसके बाद महाशय राजपाल जी के ऊपर दो बार और हमले की कोशिश हुआ और अंत में 6 अप्रैल 1929 का हमला जानलेवा साबित हुआ जिसमें मोहम्मद इल्म दीन नामक एक युवक गढ़ासे से महाशय राजपाल जी के ऊपर कई वार किया जिससे उनकी जान चली गई।

जिस दिन उनकी हत्या हुई उसके 4 दिन के बाद महात्मा गांधी लाहौर में थे लेकिन महात्मा गांधी महाशय राजपाल जी के घर पर शोक प्रकट करने नहीं गए और ना ही अपने किसी संपादकीय में महाशय राजपाल जी की हत्या की निंदा की।

उसके बाद अंग्रेजों ने मुकदमा चलाकर मात्र 6 महीने में महाशय राजपाल जी के हत्यारे इल्म दीन को फांसी की सजा सुना दिया क्योंकि इस देश में पूरा हिंदू समाज उबल उठा था और अंग्रेजो को लगा कि यदि उन्होंने जल्दी फांसी नहीं दिया तब अंग्रेजी शासन को भी खतरा हो सकता है।

उसके बाद 4 जून 1929 को महात्मा गांधी ने अंग्रेज वायसराय को चिट्ठी लिखकर महाशय राजपाल जी के हत्यारे की फांसी की सजा को माफ करने का अनुरोध किया था। और उसके अगले दिन अपने अखबार यंग इंडिया में एक लेख लिखा था जिसमें गांधी जी ने यह साबित करने की कोशिश की थी यह हत्यारा तो निर्दोष है नादान है क्योंकि उसे अपने धर्म का अपमान सहन नहीं हुआ और उसने गुस्से में आकर यह निर्णय लिया।

दूसरी तरफ तब के जाने-माने बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना ने भी लाहौर हाई कोर्ट में बकायदा एक बैरिस्टर की हैसियत से इस मुकदमे में पैरवी करते हुए जब से यह कहा क्योंकि अपराधी मात्र 19 साल का लड़का है लेकिन इसने जघन्य अपराध किया है इसकी अपराध को कम नहीं समझा जा सकता लेकिन इसके उम्र को देखते हुए इसकी फांसी की सजा को उम्र कैद में बदल दी जाए या फिर इसे काले पानी जेल में भेज दिया जाए।

लेकिन अंग्रेजों ने 31 अक्टूबर 1929 को महाशय राजपाल जी के हत्यारे मोहम्मद इल्म दीन को लाहौर जेल में फांसी पर चढ़ा दिया

2 नवंबर 1929 में महात्मा गांधी ने यंग इंडिया में इल्म दीन को फांसी देने को इतिहास का काला दिन लिखा

बाकी का मैं आपके विवेक पर छोड़ता हूं आप खुद सोचिए महात्मा गांधी का क्या हिंदुत्व था

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, हिन्दू पतन

कैसे गांधी जी ने एक श्लोक और एक भजन को बदला देखें‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬

भारत में महाभारत का एक श्लोक अधूरा पढाया जाता है क्यों ??
शायद गांधी जी की वजह से।
“अहिंसा परमो धर्मः”
जबकि पूर्ण श्लोक इस तरह से है:-

“अहिंसा परमो धर्मः,धर्महिंसा तदैव च l

अर्थात – अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है
और धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना उस से भी श्रेष्ठ है..🕉

#गांधी #जी ने सिर्फ इस ☝☝#श्लोक को ही नही बल्कि उसके अलावा भी उन्होंने एक प्रशिद्ध भजन को बदल दिया

-‘रघुपति राघव राजा राम’ इस प्रसिद्ध-भजन का नाम है.
.”राम-धुन” .
जो कि बेहद लोकप्रिय भजन था.. गाँधी ने बड़ी चालाकी से इसमें परिवर्तन करते हुए
अल्लाह
शब्द जोड़ दिया..
आप भी नीचे देख लीजिए..
असली भजन और गाँधी द्वारा बेहद चालाकी से किया गया परिवर्तन..
गाँधी का भजन
रघुपति राघव राजाराम,
पतित पावन सीताराम
सीताराम सीताराम,
भज प्यारे तू सीताराम
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम,
सब को सन्मति दे भगवान…

** असली राम धुन भजन **
रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम
सुंदर विग्रह मेघश्याम
गंगा तुलसी शालग्राम
भद्रगिरीश्वर सीताराम
भगत-जनप्रिय सीताराम
जानकीरमणा सीताराम
जयजय राघव सीताराम
और बड़े-बड़े पंडित तथा वक्ता भी सब जगह गाते हैं यहां तक कि मंदिरो में भी उन्हें रोके कौन?
-अब सवाल ये उठता है कि गाँधी जी को ये अधिकार किसने दिया की,.. हमारे ‘श्रीराम को सुमिरन’ करने के भजन में ही अल्लाह को घुसा दे..
(अल्लाह का हमसे क्या संबंध?)
-इस भजन को जिन्होंने बनाया था उनका नाम था लक्ष्मणाचार्य
ये भजन
“श्री नमः रामनायनम”
नामक हिन्दू-ग्रन्थ से लिया गयाहै
परन्तु
मोहनदास-गाँधी ने इसमें किसकी आज्ञा से मिलावट की,
क्या उसने ‘लक्ष्मणाचार्यजी’ से अनुमति ली!
कोई भी हमारे धर्मग्रंथोंऔर पूजा पद्धिति भजनों में मिलावट करने का अधिकार रखता है?

हम आप लोगों से निवेदन करेंगे कि, गाँधी के इस मिलावट वाले भजन को तुरंत हटाएं और असली-भजन को गाएँ

आप इस मूव रामधुन भजन का अपमान बिलकुल भी न करें,
पोस्ट शेयर जरूर करें ताकि लोग जागरूक हो सकें। धन्यवाद