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“हिंदू आज भी बहीं खड़े है


कोई उन्नति नहीं की है”

“हिंदू आज भी बहीं खड़े है

कोई उन्नति नहीं की है”

अकबर के दरबार में एक कट्टर सुन्नी मुस्लिम “अब्द अल कादीर बदायूंनी” था,

उसने हल्दीघाटी के युद्ध का आंखों देखा वर्णन, जिसमें वह स्वयं सम्मिलित था , अपनी पुस्तक ‘मुंतखाब-उल-वारीख’ में किया है,

मूल पुस्तक अरबी में है, जिसका 18वीं सदी में अंग्रेजी में अनुवाद किया गया,

दोनों तरफ की सेनाओं में 90% राजपूत लड़ रहे थे। अकबर की तरफ से सेनापति मानसिंह और राजा लूणकरण थे तो दूसरी तरफ स्वयं महाराणा प्रताप और राजपूत राजा थे,

दोनों तरफ से राजपूतों ने केसरिया साफे पहन रखे थे, इससे अकबर का एक सेना नायक ‘अबुल फजल इब्न मुबारक’ असमंजस में पड़ गया कि कौन हमारी तरफ से लड़ रहा है और कौन शत्रु की तरफ से है ?

फिर अबुल फजल इब्न मुबारक ने अब्द अल कादिर से पूछा दोनों तरफ से राजपूत केसरिया साफा पहनें हैं .. मैं कैसे पहचान करूं कि कौन अपनी तरफ से लड़ रहा है और कौन शत्रु की तरफ से है ?

तब अब्द अल कादिर ने कहा .. “अबुल फजल बस तीर और फरसा चलाते रहो , भाला फेंकते रहो मरने वाले “काफिर” ही होंगे ! चाहे हमारी तरफ के मरे या शत्रु की तरफ के मरे ..किधर भी तीर चलाओ , किसी को भी मारो … जीत “इस्लाम” की ही होगी,

अगर हम युद्ध में विजय हो सके तो ठीक नहीं जीते तो कम से कम खुदा को यह तो कह देंगे कि हमने काफिरों को मारा !”

काश हिन्दू इतिहास पढ़ते और इतिहास से सीख लेते , हिन्दुओं की स्थिति आज भी वैसी ही है.

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इराक का एक पुस्तक है जिसे इराकी सरकार ने खुद छपवाया था। इस किताब में 622 ई से पहले के अरब जगत का जिक्र है। आपको बता दें कि ईस्लाम धर्म की स्थापना इसी साल हुई थी। किताब में बताया गया है कि मक्का में पहले शिवजी का एक विशाल मंदिर था जिसके अंदर एक शिवलिंग थी जो आज भी मक्का के काबा में एक काले पत्थर के रूप में मौजूद है। पुस्तक में लिखा है कि मंदिर में कविता पाठ और भजन हुआ करता था।
प्राचीन अरबी काव्य संग्रह गंथ ‘सेअरूल-ओकुल’ के 257वें पृष्ठ पर हजरतमोहम्मद से 2300 वर्ष पूर्व एवं ईसा मसीह से 1800 वर्ष पूर्व पैदा हुए लबी-बिन-ए-अरव्तब-बिन-ए-तुरफा ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता में भारत भूमि एवं वेदों को जो सम्मान दिया है, वह इस प्रकार है-
“अया मुबारेकल अरज मुशैये नोंहा मिनार हिंदे।
व अरादकल्लाह मज्जोनज्जे जिकरतुन।1।
वह लवज्जलीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जिकरा।
वहाजेही योनज्जेलुर्ररसूल मिनल हिंदतुन।2।
यकूलूनल्लाहः या अहलल अरज आलमीन फुल्लहुम।
फत्तेबेऊ जिकरतुल वेद हुक्कुन मालन योनज्वेलतुन।3।
वहोबा आलमुस्साम वल यजुरमिनल्लाहे तनजीलन।
फऐ नोमा या अरवीयो मुत्तवअन योवसीरीयोनजातुन।4।
जइसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-खुबातुन।
व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।5।”
अर्थात-(1) हे भारत की पुण्य भूमि (मिनार हिंदे) तू धन्य है, क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना। (2) वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश, जो चार प्रकाश स्तम्भों के सदृश्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, यह भारतवर्ष (हिंद तुन) में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुआ। (3) और परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे ज्ञान है, इनकेअनुसार आचरण करो।(4) वह ज्ञान के भण्डार साम और यजुर है, जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए, हे मेरे भाइयों! इनको मानो, क्योंकि ये हमें मोक्ष का मार्ग बताते है।(5) और दो उनमें से रिक्, अतर (ऋग्वेद, अथर्ववेद) जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते है, और जो इनकी शरण में आ गया, वह कभी अन्धकार को प्राप्त नहीं होता।
इस्लाम मजहब के प्रवर्तक मोहम्मद स्वयं भी वैदिक परिवार में हिन्दू के रूप में जन्में थे, और जब उन्होंने अपने हिन्दू परिवार की परम्परा और वंश से संबंध तोड़ने और स्वयं को पैगम्बर घोषित करना निश्चित किया, तब संयुक्त हिन्दू परिवार छिन्न-भिन्न हो गया और काबा में स्थित महाकाय शिवलिंग (संगेअस्वद) के रक्षार्थ हुए युद्ध में पैगम्बर मोहम्मद के चाचाउमर-बिन-ए-हश्शाम को भी अपने प्राण गंवाने पड़े। उमर-बिन-ए-हश्शाम का अरबमें एवं केन्द्र काबा (मक्का) में इतना अधिक सम्मान होता था कि सम्पूर्ण अरबी समाज, जो कि भगवान शिव के भक्त थे एवं वेदों के उत्सुक गायक तथा हिन्दू देवी-देवताओं के अनन्य उपासक थे, उन्हें अबुल हाकम अर्थात ‘ज्ञान का पिता’ कहते थे। बाद में मोहम्मद के नये सम्प्रदाय ने उन्हें ईर्ष्यावश अबुलजिहाल ‘अज्ञान का पिता’ कहकर उनकी निन्दा की।
जब मोहम्मद ने मक्का पर आक्रमण किया, उस समय वहाँ बृहस्पति, मंगल, अश्विनीकुमार, गरूड़, नृसिंह की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थी। साथ ही एक मूर्ति वहाँ विश्वविजेता महाराजा बलि की भी थी, और दानी होने की प्रसिद्धि से उसका एक हाथ सोने का बना था। ‘Holul’ के नाम से अभिहित यह मूर्ति वहां इब्राहम और इस्माइल की मूर्त्तियों के बराबर रखी थी। मोहम्मद ने उन सब मूर्त्तियों को तोड़कर वहां बने कुएं में फेंक दिया, किन्तु तोड़े गये शिवलिंग का एक टुकडा आज भी काबा में सम्मानपूर्वक न केवल प्रतिष्ठित है, वरन् हज करने जाने वाले मुसलमान उस काले (अश्वेत) प्रस्तर खण्ड अर्थात ‘संगे अस्वद’ को आदर मान देते हुए चूमते है।
प्राचीन अरबों ने सिन्ध को सिन्ध ही कहा तथा भारतवर्ष के अन्य प्रदेशों को हिन्द निश्चित किया। सिन्ध से हिन्द होने की बात बहुत ही अवैज्ञानिक है। इस्लाम मत के प्रवर्तक मोहम्मद के पैदा होने से 2300 वर्ष पूर्व यानि लगभग 1800 ईश्वी पूर्व भी अरब में हिंद एवं हिंदू शब्द का व्यवहार ज्यों कात्यों आज ही के अर्थ में प्रयुक्त होता था।
अरब की प्राचीन समृद्ध संस्कृति वैदिक थी तथा उस समय ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, धर्म-संस्कृति आदि में भारत (हिंद) के साथ उसके प्रगाढ़ संबंध थे। हिंद नाम अरबों को इतना प्यारा लगा कि उन्होंने उस देश के नाम पर अपनी स्त्रियों एवं बच्चों के नाम भी हिंद पर रखे।
अरबी काव्य संग्रह ग्रंथ ‘ से अरूल-ओकुल’ के 253वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम की कविता है जिसमें उन्होंने हिन्दे यौमन एवं गबुल हिन्दू का प्रयोग बड़े आदर से किया है। ‘उमर-बिन-ए-हश्शाम’ की कविता नई दिल्ली स्थित मन्दिर मार्ग पर श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बिड़लामन्दिर) की वाटिका में यज्ञशाला के लाल पत्थर के स्तम्भ (खम्बे) पर कालीस्याही से लिखी हुई है, जो इस प्रकार है –
” कफविनक जिकरा मिन उलुमिन तब असेक ।
कलुवन अमातातुल हवा व तजक्करू ।1।
न तज खेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा ।
वलुकएने जातल्लाहे औम असेरू ।2।
व अहालोलहा अजहू अरानीमन महादेव ओ ।
मनोजेल इलमुद्दीन मीनहुम व सयत्तरू ।3।
व सहबी वे याम फीम कामिल हिन्दे यौमन ।
व यकुलून न लातहजन फइन्नक तवज्जरू ।4।
मअस्सयरे अरव्लाकन हसनन कुल्लहूम ।
नजुमुन अजा अत सुम्मा गबुल हिन्दू ।5।
अर्थात् –(1) वह मनुष्य, जिसने सारा जीवन पाप व अधर्म में बिताया हो, काम, क्रोध में अपने यौवन को नष्ट किया हो। (2) यदि अन्त में उसको पश्चाताप हो, और भलाई की ओर लौटना चाहे, तो क्या उसका कल्याण हो सकता है ? (3) एक बार भी सच्चे हृदय से वह महादेव जी की पूजा करे, तो धर्म-मार्ग में उच्च से उच्चपद को पा सकता है। (4) हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर केवल एक दिन भारत (हिंद) के निवास का दे दो, क्योंकि वहां पहुंचकर मनुष्य जीवन-मुक्त हो जाता है। (5) वहां की यात्रा से सारे शुभ कर्मो की प्राप्ति होती है, और आदर्शगुरूजनों (गबुल हिन्दू) का सत्संग मिलता है।

राज धाकरे

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कन्याकुमारी से अफगानिस्तान तक सम्राट अशोक के शासन काल की लगभग 180 शिला लेख उपलब्ध है। इन सब में एक भी शिलालेख ऐसी नही है,जिसमें यह लिखा हो कि सम्राट अशोक बौद्ध थे।

हर शिलालेख में यह लिखा है कि मैं क्षत्रिय हूँ। उनकी जीवन के अंतिम चार वर्ष की 12 शिलालेख भी मिलती है लेकिन उन शिलालेखों में भी ऐसा कोई जिक्र नही है कि वे बौद्ध थे,हर शिलालेख पर उनके क्षत्रिय होने का उल्लेख मिलता है।

बौद्ध धर्म में शामिल होने के लिए जो धार्मिक क्रिया कर्म किये जाते है। सम्राट अशोक के विषय में ऐसी कोई जानकारी नही मिलती है। उन्हे हिंदू धर्म से बौद्ध धर्म में दिक्षित करने वाले किसी भी व्यक्ति की कोई जानकारी नही मिलती है,ना ऐसा कोई इतिहास ही मिलता है।

ठोस रुप से कभी,कही ऐसा कोई साक्ष्य या सबूत नही मिलता है कि सम्राट अशोक ने हिंदू धर्म का त्याग कर बौद्ध धर्म अपनाया था। तो क्या हमे अब तक गलत इतिहास पढाया जा रहा है। क्या हिदु धर्म को कमजोर करने की बामपंथी इतिहासकारों की कोई सोची समझी चाल है ?

😊जय हिंद 🇮🇳

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Ahmedabad: – Who is Ahmed?
Moradabad: – Who is Murad?
Aurangzeb: – Who is Aurangzeb?
Faizabad: – Who is Faiz?
Farooqabad: – Who is Farooq?
Adilabad: – Who is A dil?
Sahibad: – Who is Sahib?
Hyderabad: – Who is Haider?
Secunderabad: – Who is Sikander?
Firozabad: – Who is Firoz?
Mustafabad: – Who is Mustafa?
Ahmednagar: – Who is Ahmed?
Tughlaqabad: – Who is Tughlaq?
Fathabad: – Who is Fateh?
Usmanabad: – Who is Usman?
Baktiyarpur: – Who is Baktiyar?
Mahmudabad: – Who is Mahmud?
Muzaffarpur and Muzaffar Nagar: – Who is Muzaffar?
Burhanpur: – Who is Burhan?

Who are all these? These are the people who destroyed our culture, destroyed our temples, corrupted our idols and converted Hindus to Islam.

This is their contribution in the history of India. Despite this, why do we remember them by naming cities after them?

These cities should change names.

Time to RESTORE. Be Original. Be Proud.

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*शांतिदूतों के कुकर्मों को छिपाने के लिए देश के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने इतिहास के साथ जबरदस्त छेड़छाड़ किया। उनकी इच्छानुसार पाठ्य पुस्तकों में उल्लेख मिलता है कि संत कबीर मरने के बाद फूल बन गये और हिन्दू और मुस्लिमो ने उन्हें बराबर बाँट लिया।*

जबकि हकीकत यह है कि सिकंदर लोदी ने उन्हें हाथी के पैरो से कुचलवाकर मरवा दिया था, क्योंकि वे सामाजिक कुरीतियों का खंडन करते थे। और उन्होंने मुल्ला बनने से मना कर दिया था।

जब कबीर दास जी ने इस्लाम कबूल करने से मना कर दिया, तो सिकंदर लोदी के आदेश से जंजीरो में जकड़कर कबीर को मगहर लाया गया।

वहाँ लाते ही जब शहंशाह के हुक्म के अनुसार कबीर को मदिरा पिये हुए मस्त हाथी के पैरों तले रौंदे जाने का आदेश हो गया। इतना सुनते ही कबीर की पत्नी लोई पछाड़ खाकर पति के पैरों पर गिर पड़ी। पुत्र कमाल भी पिता से लिपटकर रोने लगा।

लेकिन कबीर तनिक भी विचलित नहीं हुए। आँखों में वही चमक बनी रही। चेहरे पर भय का कोई चिन्ह नहीं उभरा।

एकदम शान्त-गम्भीर वाणी में शहंशाह को सम्बोधित हो कहने लगे…

मुझे तो मरना ही था; आज नहीं मरता तो कल मरता। लेकिन सुलतान कब-तक इस गफलत में भरमाए पड़े रह सकेंगे, कब तक फूले-फूले फिरेंगे कि वह नहीं मरेंगे?
कबीर को जिस समय हाथी के पैरों तले कुचलवाया जा रहा था, उस समय कबीर का एक शिष्य भी वहाँ मौजूद था। कबीर को हाथी के पैरों तले रौंदवाने के बाद भी सुलतान का गुस्सा शांत नहीं हुआ। उसने कबीर की पत्नी लोई का जबरन निकाह अपने एक निम्न श्रेणी के मुस्लिम दरबारी से कराया और कबीर के पुत्र कमाल को एक काजी की सेवा में लगा दिया।

शांतिदूतों के काले अतीत को छिपाकर उसे सेकुलरिज्म का जामा पहनाने का काम पहले नेहरू और मौलाना आजाद ने किया बाद में उनके इसी काम को रोमिला थापर और इरफ़ान हबीब जैसे टुच्चे इतिहासकारों ने आगे बढ़ाया।🤢

#साभार

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अचार


वामपंथियों का एजेंडा देखिए उनके अनुसार भारतीय पिछड़े हुए थे कुछ नहीं जानते थे लेकिन रेगिस्तान से मुगल आए और भारतीयों को सब कुछ सिखाया

अब जरा सच्चाई जानिए

भोजन इतिहासकार केटी आचाया ने लिखा है कि अचार ‘बिना खाना पकाने’ की श्रेणी में आते हैं; हालांकि, आजकल कई अचार तैयारी के दौरान कुछ हद तक हीटिंग या आग का उपयोग करते हैं। भारत में अचारों की एक समृद्ध विरासत है, जो स्पष्ट है कि इतिहासकार आगे कहता है कि ईसा पूर्व 1594 का कन्नड़ कार्य, गुरुुलिंग देसिका के लिंगापुराना में पचास प्रकार के अचार का वर्णन है’!

एक और बाद का उल्लेख 11 वीं शताब्दी में Śivatattvaratnākara, केलादी के राजा बसवराजा के प्राचीन भारतीय अचार प्रेम का एक विश्वकोश है।

भारत में अचार तीन मूल प्रकार हैं: वे सिरका में संरक्षित हैं; नमक में संरक्षित; और तेल में संरक्षित। भारत में, तेल पिकलिंग के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक लोकप्रिय माध्यम है। पिकलिंग की प्रक्रिया खाद्य पदार्थ को संरक्षित करने के सर्वोत्तम तरीकों में से एक है।

मुगलों और इस्लाम की जन्म के पहले उपनिषद और वेद में तथा रामायण और महाभारत में सुश्रुत संहिता में चीजों को संरक्षित करके खाने की विधि का वर्णन है कलयुग तो छोड़िए सतयुग द्वापर और त्रेता युग की किताबों में भी अचार का वर्णन आता है

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पेरियार


पेरियार की कहानी दलित की जुबानी !
लेखक- अरुण लवानिया
चेन्नई की झुग्गी-झोपड़ी में एक दलित परिवार में जन्मे और वहीं पचीस वर्ष बिताने वाले ऐम वेंकटेशन एक आस्थावान हिंदू हैं। उन्होंने चेन्नई के विवेकानन्द महाविद्यालय से दर्शन शास्त्र में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की है। जब वेंकटेशन ने महाविद्यालय में प्रवेश लिया तो उनके कथनानुसार उन्हें प्रतिदिन पेरियारवादियों के एक ही कथन का लगातार सामना करना पड़ा कि पेरियार एक महान दलित उद्धारक थे। चूंकि उन्हें पेरियार दर्शन का कोई ज्ञान नहीं था, उन्होंने पेरियार से संबंधित समस्त उपलब्ध साहित्य के अध्ययन और शोध करने का संकल्प लिया। इसके लिये उन्होंने पेरियार द्वारा स्थापित, संचालित और संपादित सभी पत्रिकाओं , विदुथालाई, कुडियारासु , द्रविड़नाडु, द्रविड़न, उनके समकालीन सभी नेताओं अन्नादुराई, ऐम पी सिवागन, केएपी विश्वनाथन, जीवानंदम आदि के भाषण और लेख तथा ‘पेरियार सुयामरियादि प्रचारनिलयम’ द्वारा प्रकाशित उनके समस्त साहित्य पर गहन शोध किया। एक आस्थावान हिंदू होने के कारण पेरियार द्वारा हिंदू देवी देवताओं पर लगाये गये बेबुनियाद आरोपों से आहत होकर पेरियार का सत्य सामने लाने के लिये वेंकटेशन ने एक पुस्तक तमिल में लिखी, ‘ई.वी. रामास्वामी नायकरिन मरुपक्कम'(पेरियार का दूसरा चेहरा)।
वेंकटेशन के शब्दों में :
” मैं अपने ईष्ट देवी-देवताओं और हिंदू धर्म पर पेरियार के असभ्य और जंगली विचारों को सहन न कर सका। मुझे जिसने जन्म दिया उस प्रिय और पवित्र मां पर यह हमला था। पेरियार के संपूर्ण साहित्य पर शोध के बाद मुझे तीव्र सांस्कृतिक चोट पहुंची और उनकी हिंदू देवी-देवताओं और मेरे धर्म के प्रति घनघोर घृणा देखकर मैं अत्यधिक दुखी हो गया। पेरियार ने दलितों के लिये कुछ भी नहीं किया बल्कि उन्हें दोयम दर्जे का ही बनाये रखा। अगर पेरियार सौ प्रतिशत ब्राह्मण विरोधी थे तो अस्सी प्रतिशत दलित विरोधी भी थे।”
वेंकटेशन की पुस्तक पेरियार का संपूर्ण शव विच्छेदन करती हुई पेरियार वादियों के गले की हड्डी बन गई है। वेंकटेशन का दावा है कि जो भी सत्य का अन्वेषक है वह इस पुस्तक को पढ़ने के बाद पेरियार को त्याग देगा।
इस पुस्तक का तमिल से अंग्रेज़ी और हिंदी में अनुवाद आज तक ना हो पाने के कारण पेरियार का असली चेहरा देश के सामने प्रकट नहीं हो पाया है। परिणाम स्वरूप पेरियार को दलित उध्दारक बताने और अंबेडकर के साथ जोड़ने का कुचक्र आज भी जारी है।
इन्हीं वेंकटेशन के नीचे दिये यूट्यूब वीडियो के लिंक में 24 मिनट के संबोधन को इस लेख द्वारा हिंदी में प्रस्तुत किया जा रहा है। वेंकटेशन ने पेरियार दलित, राष्ट्र और धर्म विरोधी एजेंडे का बेरहमी से तथ्यों का संदर्भ देकर जो पोस्टमार्टम किया है वो आंखें खोलने वाला है। वेंकटेशन कहते हैं:
” अंग्रेजों ने हमपर शासन प्रारंभ करने के साथ ही यह समझने लिया था कि शायद वो भारत पर स्थाई रूप से शासन करने में असमर्थ होंगे। क्योंकि उनके विरुद्ध निरंतर विद्रोह होने लगा था और इन घटनाओं को लेकर वो बहुत चिंतित थे। उन्होंने मंथन किया कि यदि उन्हें भारत पर अपना शासन चलाये रखना है तो किसी भी तरह विरोध की आग को बुझाना ही होगा। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये उन्होंने विदेश से अनेक विद्वानों को भारत बुलाया। इन विद्वानों को यह पता लगाना था कि किन-किन उपायों और कार्यवाहियों से वो अनंत काल तक शासन कर सकते हैं।यही बात समझने के लिये सारे आयातित गोरे विद्वान देश के विभिन्न राज्यों में गये। एक ऐसे ही गोरे विद्वान के अनुसार :
“यदि हम भारत पर स्थाई रूप से शासन करना चाहते हैं तो हमें इस देश को विभाजित और तोड़ना पड़ेगा। भारत एक स्वाभिमानी राष्ट्र है और हमें सर्वप्रथम भारतियों के स्वाभिमान को नष्ट करना होगा। इस राष्ट्र की नींव हिंदू आध्यात्मिकता है जिसे सर्वप्रथम जड़ से उखाड़ फेंकना है। यदि हम ऐसा करने में असफल रहे तो हम भारत पर लंबे समय तक शासन नहीं कर पायेंगे। इसी हिंदू संस्कृति को हमें अपमानित, हीन और पूरी तरह ध्वस्त करना होगा। हिंदू देवी-देवताओं को लोगों की निगाहों से गिराना होगा। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी भाषा को नीचा साबित करना होगा। हमें यह भी पक्का करना होगा कि भारतीय हमारी इन बातों पर विश्वास भी करने लगे जायें कि उनकी संस्कृति नीच है। इसमें कुछ भी अच्छा नहीं है। इसप्रकार भारतियों को मानसिक रूप से अपना गुलाम बना लेना ही उनपर शासन करने का एकमात्र उपाय है। उपर्युक्त सारी संस्तुतियां
आयातित गोरे विद्वानों के शोध से निकल कर सामने आयीं और अंग्रेजों ने तत्परता से इसपर कार्य करना प्रारंभ कर दिया।
सर्वप्रथम काल्डवेल ने ‘ए ग्रामर औफ द्रविड़ियन लैंग्वेजेस’ लिखी। साथ ही यह भी लिखा कि सारी भारतीय भाषायें तमिल से ही उपजी हैं और संस्कृत का तमिल से कोई संबंध नहीं है। इसके तुरंत पश्चात् ऐसे ही लेखों कि बाढ़ आने लगी। इसी समय अंग्रेजों ने निर्णय लिया कि भारत को तोड़ने के लिये उन्हें अपने भारतीय समर्थकों के साथ ही उन कतिपय नेताओं की भी आवश्यकता है जो उनकी साजिश को अंजाम दे सकें। इसलिये अंग्रेजों के इशारे पर तत्कालीन मद्रास प्रांत में टी एम नायर, सर पित्ती तेइगरिया आदि ने जस्टिस पार्टी का गठन किया। प्रारंभ में यह गैर राजनीतिक थी परंतु शनै: शनै: राजनीति में शामिल होने लगी। जस्टिस पार्टी ने ही सर्वप्रथम ब्राह्मण और गैर ब्राह्मण की अवधारणा तमिलनाडु में पैदा की। ऐसी विभाजनकारी अवधारणा तमिलनाडु में इसके पहले अनुपस्थित थी। हमारे अपने ही लोगों के माध्यम से अंग्रेजों ने हमें कदम दर कदम तोड़ना शुरू कर दिया।
1916 में जस्टिस पार्टी की स्थापना हुयी और 1919 में पेरियार राजनीति में आये। इससे पहले इन्हें राजनीति में कोई नहीं जानता था। राजनीति के प्रारंभिक दिनों में वो राष्ट्रभक्त और आध्यात्मिक थे। उन्होंने आर्य और द्रविड़ के विभाजन की अवधारणा को सिरे से नकारा भी। 1919 में एक पत्रिका ‘नेशनलिस्ट’ में लेख लिखकर आर्य-द्रविड़ विभाजन के सिद्धांत सिरे से नकारते हुये पेरियार ने इसे धोखा बताया। यहां तक कि जब उन्होंने अपनी प्रथम पत्रिका निकाली तो ये लिखा कि वो यह कार्य ईश्वर के दिव्य आशीर्वाद से कर रहे हैं। उन्होंने एक हिंदू संत से अपनी पत्रिका के कार्यालय का उद्घाटन भी करवाया। पेरियार ने जस्टिस पार्टी का विरोध सैद्धांतिक रूप से भी किया और अपने कार्यों से भी। पेरियार और थिरू वी के ने एक संगठन बनाकर जस्टिस पार्टी का तमिलनाडु में विरोध भी किया। फिर अचानक पेरियार ने जस्टिस पार्टी से संबंध बनाने शुरू किये जिसके सभी सदस्य अंग्रेजों के पिट्ठू थे। सच्चाई यह थी कि जस्टिस पार्टी बनाने में अंग्रेजों का ही हाथ था। जस्टिस पार्टी के कारण पेरियार की प्रसिद्धि और प्रचार बढ़ने लगा।
पेरियार तमिलनाडु के सर्वाधिक धनी व्यक्ति थे। उन दिनों जितने भी राष्ट्रीय नेता तमिलनाडु आते थे वो पेरियार के व्यक्तिगत् अतिथि हुआ करते थे। उनका रहना, खाना-पीना सब पेरियार के घर पर ही होता था। पेरियार का परिवार इरोड का एक सम्मानित और संपन्न परिवार था। उनकी नेतृत्व क्षमता का आकलन कर अंग्रेजों ने उन्हें जस्टिस पार्टी में शामिल करने की योजना पर कार्य करना शुरू कर दिया। अंग्रेजों के इशारे पर जस्टिस पार्टी के कर्णधारों ने पेरियार से मिलना जुलना और उनसे संबंध बनाना चालू कर दिया। पेरियार ने भी उनका गर्मजोशी से स्वागत किया और थोड़े ही समय में दोनों के मध्य नज़दीकी संबंध भी बन गये।
तभी कतिपय आर्थिक अनियमितताओं को लेकर पेरियार और कांग्रेस में गहरी दरार पड़ गयी। अधिकतर लोगों को इस बात की जानकारी आज भी नहीं है। दरअसल आंध्रप्रदेश के संस्थानम ने चेरन मां देवी गुरुकुलम को पांच हजार का दान दिया था। पेरियार पर आरोप था कि उसने कांग्रेस के पैसे का दुरपयोग किया। पेरियार ने अपने बचाव में कहा कि यह पैसा उसकी अनुमति लिये बिना दिया गया। इसी आरोप के साथ पेरियार का कांग्रेस के साथ मतभेद गहराता चला गया और उसने ‘सेल्फ रिस्पेक्ट मूवमेंट’ की शुरुआत कर दी। इस मूवमेंट के पीछे अंग्रेजों की गहरी साज़िश थी और उनके और जस्टिस पार्टी के अतिरिक्त और किसी ने भी इसका समर्थन तमिलनाडु में नहीं किया। शनै: शनै: पेरियार अंग्रेजों के बौद्धिक प्यादा हो गये। अंग्रेजों के दृष्टिकोण का उन्होंने समर्थन करना शुरु कर दिया।
यदि हम 1927 के पश्चात् पेरियार के दिये हुये भाषणों के देखें तो सब राष्ट्र और हिंदू विरोधी थे। यदि इन भाषणों को गहराई से देखें तो आश्चर्यजनक रूप से ये दलित विरोधी थे। इसका कारण यह है कि गांधी दलितों को मंदिरों में प्रवेश दिलाने के लिये उस समय सत्याग्रह आंदोलन कर रहे थे। गांधी ने अपील की चूंकि आगम नियमों के मुताबिक शूद्र मंदिर के मंडप तक जा सकते हैं, दलितों को भी मंडप तक जाने का अधिकार है। उनको भी यह अनुमति मिलनी चाहिये पेरियार ने तुरंत इस बात का प्रतिवाद किया कि शूद्र और दलित समान हैं। उस काल में शूद्रों मंडप तक जा सकते थे। पेरियार ने कभी यह नहीं कहा कि मंदिर प्रवेश के लिये सभी वर्णों को समान अधिकार है। वो शूद्रों को चौथा वर्ण मानते थे और दलित को पांचवां जो मंदिर प्रवेश के अधिकारी नहीं है। उन्होंने मरते दम तक यह माना कि शूद्र और दलित अलग-अलग है। इस बात को उन्होंने सार्वजनिक मंचों से कई बार बिना किसी शर्म के कहा भी।
तभी चेतन मां देवी गुरुकुलम में हुयी एक घटना ने पूरे तमिलनाडु को झकझोर दिया। हुआ यह कि वी वी एस अय्यर ने विशेष रूप से पकाये भोजन को गुरुकुल के दो ब्राह्मण विद्यार्थियों को ही दिया। यह घटना तमिलनाडु में बड़ा मुद्दा बन गयी। तुरंत इसका बहाना खड़ा कर सर्वप्रथम पेरियार ने ब्राह्मण और गैर ब्राह्मण का हौआ राज्य में खड़ा करना शुरू किया। यहीं से उसकी ब्राह्मण और गैर ब्राह्मण की राजनीति की नींव पड़ी। इस मुद्दे के समाधान और सभी को समान अधिकार देने के लिये एक राष्ट्रवादी कांग्रेसी गावियकंद गणपथि सास्त्रुगल अय्यर सामने आये। उन्होंने कहा कि यद्यपि गुरुकुल में एक भी दलित विद्यार्थी नहीं है फिर भी एक दलित को गुरुकुल का बावर्ची नियुक्त किया जाये। जिसके हाथों से पकाया भोजन सभी विद्यार्थी खायें। यही सामाजिक न्याय का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण होगा। अय्यर संस्कृत के उत्कृष्ट विद्वान भी थे। लेकिन सामाजिक न्याय के योद्धा पेरियार ने कहा कि वो इस सुझाव को कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने प्रश्न खड़े किये कि कैसे दलित का पकाया भोजन शूद्रों खा सकता है। यह उनकी दलित विरोधी मानसिकता थी जिसका पालन उन्होंने आजीवन किया। हास्यास्पद रूप से आज भी पेरियार को दलितों का मसीहा बताकर लोगों को बरगलाया जाता है। यह झूठ का पुलिंदा मात्र है।
अपने दलित विरोधी विचारों के साथ ही उन्हें अब यह लगा कि हिंदुत्व का विनाश कर ही राष्ट्र को तोड़ा जा सकता है। इसके लिये जो रणनीति उसने बनायी उसमें प्रथम था रामायण को गालियां देना। रामायण को नीचा साबित करने के लिये अनेक पुस्तकें लिखी गयीं। महाभारत को भी नहीं बख्शा गया। हम सभी महान संत और कवि कंब से परिचित हैं जिन्होंने कंब रामायण लिखी थी। पेरियार ने एक पुस्तक ‘कंब रस्म’ लिखकर रामायण को बेहद अश्लील तरीके से प्रस्तुत किया। नीचता की पराकाष्ठा कर उसने संत कवि कंब, भगवान राम और देवी सीता को जी भर गालियां दीं।
पेरियार के इस कदम का शैव मतावलंबियों ने तालियां बजाकर स्वागत् और समर्थन किया क्योंकि पेरियार वैष्णव मत वालों पर हमला कर रहा था। शैव मठों के प्रमुख महंतों ने, जिसमे कुंद्राकुडी अडिगल भी सम्मिलित थे, इसी कारण पेरियार का समर्थन किया। यही स्थिति थी उस समय तमिलनाडु में। लेकिन कुछ समय पश्चात् जब पेरियार ने तमिल शैव ‘पेरिया पुराणम्’ पर भी हमला बोला तब शैवों को पेरियार की असल साजिश का एहसास हुआ। फलस्वरूप सभी मतावलंबी एकजुट होकर पेरियार के विरोध में आ गये। एक-एक कर सभी हिंदू ग्रंथ पेरियार के निशाने पर आने लगे। यहां तक कि उसने तिरुक्कुरल को भी हर संभव गालियां देनी प्रारंभ कर दी। पेरियार के शब्दों में तिरुक्कुरल “सोने की थाली में परोसी गयी मानव विष्ठा है।”
प्राचीन तमिल महाकाव्य सिलापथिकरम के रचनाकार इलांगो अडिगल, तोल्कापियर आदि जितने महापुरुष, जिनको तमिल हिंदू हृदय से पूजते थे, उन सभी को पेरियार अपमानित करने लगा। पेरियार की इस साज़िश के पीछे एकमात्र कारण यह था कि इन महापुरुषों और इनके द्वारा रचित सभी ग्रंथों से हिंदू, जिन्हें वो पवित्र मानते हैं, गुमराह होकर इनसे घृणा करने लगें और इनसे विमुख हो जायें। पेरियार का शातिर दिमाग यह जानता था किसी भी व्यक्ति को उसकी संस्कृति से काट कर ही उसे किसी विदेशी संस्कृति को अपनाने के लिये सहजता से तैयार किया जा सकता है। यही उसका एकमात्र ध्येय भी था।
इसके बाद उसने राम के पुतले का दहन किया। विनयागर (गणेश) मूर्ति को सलेम जिले में जनता के मध्य तोड़ा।पेरियार की कहने पर उसके गुंडों ने हर तरह के अत्याचार हिंदू मान्यताओं पर करना शुरू किया। किसी ने भी उसका विरोध नहीं किया। विनयागर मूर्ति तोड़ने के मामले पर सलेम जिले में हिंदुओं की धार्मिक आस्था आहत करने का मुकदमा पेरियार के संगठन द्रविड़ कड़गम पर दर्ज भी हुआ। अदालत में न्यायाधीश की टिप्पणी थी कि यदि मूर्ति तोड़ने से वास्तव में किसी की भावना आहत हुयी है तो कम से कम किसी एक ने तो इसपर मौके पर या बाद में अपनी प्रतिक्रया दी होती। चूंकि किसी ने भी विरोध नहीं किया तो इसका अर्थ है कि किसी को भी इससे कोई परेशानी नहीं थी और सबने इस कार्य को स्वीकार किया।
उस समय सभी मौन थे। पेरियार की सभी हरकतों को हमने अपनी नियति मान ली थी। किसी ने भी विरोध में चूं तक नहीं की। एक ओर हमारा हिंदू धर्म था और दूसरी ओर हमारी भाषा जिसे हम देवी के रूप में पूजते थे। उसने संस्कृत और तमिल को बांट दिया। दलितों के दिमाग में यह बात ठूंस दी कि संस्कृत विदेशी भाषा है और दलितों और संस्कृत का कोई नाता नहीं है। लेकिन भला ऐसा कैसे संभव है ? दलितों और संस्कृत के मध्य सदा से गहरा और निकट का नाता रहा है। वाल्मीकि जी और व्यास ने संस्कृत में लिखा। किसने उन्हें संस्कृत पढ़ाई ? संस्कृत ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी जाता रहा। दलितों की एक उपजाति है वल्लुवर जो आज की तारीख तक हिंदू पंचांग संस्कृत में लिखते हैं। क्या कोई बिना संस्कृत ज्ञान के पंचांग लिख सकता है ? ध्यान देने की बात है कि आज भी वल्लुवरों को कोई ब्राह्मण संस्कृत नहीं पढ़ाता है। डा. अंबेडकर ने कहा था कि यदि कोई भाषा संपूर्ण राष्ट्र की साझा भाषा हो सकती है तो वो केवल संस्कृत ही है। ऐसा उन्होंने संविधान सभा की चर्चा के मध्य संसद में कहा था। सिलापथिकरम कोवलन संस्कृत के विद्वान थे। वो संस्कृत सहजता से बोला भी करते थे। एकबार किसी राहगीर ने उनसे संस्कृत भाषा में लिखा कोई पता पूछा तो उन्होंने संस्कृत पढ़कर उसे उत्तर दिया। कोवलन वनिबा चेट्टियार थे जो एक वैश्य उपजाति है। यह इस बात का प्रमाण है कि संस्कृत आमजन की भाषा भी थी। हर व्यक्ति के हृदय में संस्कृत के लिये भक्तिभाव था। अत: पेरियार के लिये यह आवश्यक था कि अपने कुटिल उद्देश्य की पूर्ति हेतु संस्कृत के प्रति आम जनता के भक्तिभाव को कैसे भी हो तोड़ा और नष्ट किया जाये।
तमिलनाडु में दलित और अन्य जातियां सदा से मिलजुल कर रहा करती थीं। पेरियार इसी आपसी सद्भाव को तोड़कर समाज को दलित और गैर दलित में बांटने की साज़िश रच रहा था। इस साज़िश के तहत उसने योजनाबद्ध तरीके से यह घोषणा की कि समस्त जातिगत् झगड़े ब्राह्मणों के कारण ही हैं। तमिलनाडु के अनेक गांवों में जहां एक भी ब्राह्मण नहीं आबाद था वहां जातिगत् झगड़े और हिंसा हुआ करते थे। पेरियार ने इन सभी के लिये ब्राह्मणों को जिम्मेदार ठहराता था। आज भी तमिलनाडु में ऐसा ही होता है। मुडुकुलथुर दंगे तमिलनाडु की मझोली जातियों के समूह मुक्कलदोर और देवेन्द्र कुला वेल्लार दलितों के बीच ही हुये थे। इस दंगे में दो व्यक्ति मारे गये थे। एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर इन दंगों को लेकर कहा :
” तुम जातियों का विनाश चाहते हो या नहीं ! मन बना लो। फांसी की रस्सी के लिये तैयार रहो। सभी युवा खून से हस्ताक्षर कर इस बारे में घोषणा करें कि वो गांधी की मूर्तियों तोड़ेंगे और ब्राह्मणों को मारेंगे।”
जबकि मुडुकुलथुर और ब्राह्मणों के बीच कोई संबंध ही नहीं था। साथ ही पेरियार ने यह भी कहा कि सभी प्रकार की जातिगत् झगड़े ब्राह्मणों के कारण हैं।
पेरियार ने एक हजार से भी अधिक निबंध और लेख लिखे हैं। अस्सी प्रतिशत से अधिक अपने लेखों में उसने सभी स्थानों में सभी प्रकार की समस्याओं का कारण केवल ब्राह्मणों को ही बताया है।
वर्ष 1962 में किलवेनमनि दंगों में नायडू जाति वालों ने 44 दलितों को जिंदा जला कर मार डाला था। इस पूरे क्षेत्र में एक भी ब्राह्मण नहीं रहता था। यहां भी पेरियार ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दंगों के लिये ब्राह्मणों को दोषी मानते हुये मांग की:
” जातियों को तोड़ने के लिये ब्राह्मणों का समूल नाश कर दिया जाये। “
भारत का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। जो भी इस दिव्य राष्ट्र और हिंदुत्व की रक्षा करता है उसे हम उच्च पायदान पर रख कर उसको एक संत के समान पूजते हैं। यदि कोई भगवान वस्त्र धारण करता है तो हम उसका सम्मान करते हैं। हमारे हृदय में ब्राह्मणों के लिये सदा से सम्मान इसलिये रहा है क्योंकि वो भौतिक जीवन का त्याग कर राष्ट्रीय के लिये ही जीते रहे हैं। कुंज वृत्ति ! अर्थात् ब्राह्मणों द्वारा खेतों में गिरे अन्य के दानों को चुनकर उन्हें पकाकर खाना। यही वो ब्राह्मण थे जिनका तमिलनाडु में सभी समुदाय सदा से सम्मान करते थे। ब्राह्मणों की यही प्रतिष्ठा धूमिल और नष्ट करना पेरियार के जीवन का एक बड़ा लक्ष्य था। इसके लिये पेरियार ने समाज की सभी समस्याओं के लिये ब्राह्मणों को दोषी ठहराना प्रारंभ किया। वह और उसके लोग बहुत धूर्तता से इस साज़िश को मूर्तरूप देने लगे। अंततोगत्वा तमिलनाडु के निर्दोष ब्राह्मण पेरियार की कुटिल चाल की भेंट चढ़ ही गये। वह अपनी चाल में सफल हो गया।
तत्पश्चात् पेरियार ने वर्ष 1944 में एक प्रस्ताव पारित किया:
” अंग्रेजों को भारत छोड़कर वापस नहीं जाना चाहिये। लेकिन यदि ऐसा करना ही पड़े तो वो भारत के सभी राज्यों को आजादी दे दें। बस तमिलनाडु ही अंग्रेजों के राज्य के अधीन रहे।”
इस प्रस्ताव के सामने आते ही तमिलनाडु की जनता की आंखें खुलीं और उन्हें एहसास हुआ कि पेरियार और उसके संगठन द्रविड़ कड़गम और जस्टिस पार्टी के समस्त कार्यकलापों के पीछे अंग्रेजी राज का ही हाथ है। ये दोनों संगठन ब्रिटिश राज की ही उपज थे।”

विवेक आर्य

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साल 1914 में यूएन मुखर्जी ने एक छोटी सी पुस्तक लिखी ‘हिन्दू – एक मरती हुई नस्ल’
****************

1911 की जनगणना को देखकर ही 1914 में मुखर्जी ने पाकिस्तान बनने की भविष्यवाणी कर दी।
उस समय संघ नहीं था
सावरकर नहीं थे
हिन्दू महासभा नहीं थी

तब भी मुखर्जी ने वो देख लिया जो पिछले 100 सालों में एक दर्जन नरसंहार और एक तिहाई भूमि से हिन्दू विलुप्त करा देने के बाद भी कांग्रेसी,सपाई, रालोदी, एनसीपी, तृणमूल वाले सेक्युलर हिन्दू नहीं देख पा रहे।

इस किताब के छपते ही सुप्तावस्था से कुछ हिन्दू जगे।
अगले साल 1915 में पं मदन मोहन मालवीय जी के नेतृत्व में हिन्दू महासभा का गठन हुआ।
आर्य समाज ने शुद्धि आंदोलन शुरू किया जो एक मुस्लिम द्वारा स्वामी श्रद्धानंद की हत्या के साथ समाप्त हो गया।
1925 में हिन्दुओं को संगठित करने के उद्देश्य से संघ बना।

लेकिन ये सारे मिलकर भी वो नहीं रोक पाए जो यूएन मुखर्जी 1915 में ही देख लिया था। गांधीवादी अहिंसा ने इस्लामिक कट्टरवाद के साथ मिलकर मानव इतिहास के सबसे बड़े नरसंहार को जन्म दिया और काबुल से लेकर ढाका तक हिन्दू शरीयत के राज में समाप्त हो गए।

जो बची भूमि हिन्दुओं को मिली वो हिन्दुओं के लिए मॉडर्न संविधान के आधार पर थी और मुसलमानों के लिए शरीयत की छूट। धर्मांतरण की छूट, चार शादी की छूट, अलग पर्सनल लॉ की छूट, हिन्दू तीर्थों पर कब्जे की छूट सब कुछ स्टैंड बाय में है। हिन्दू एक बच्चे पर आ गए है वहां आज भी आबादी बढ़ाना शरीयत है।

जो लोग इसे केवल भाजपा कांग्रेस की राजनीति समझते हैं
उन्हें एक बार इस स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाना चाहिए 2015 में 1915 से क्या बदला है?

आज भी साल के अंत में वो अपना नफा गिनते हैं
हम अपना नुकसान

हमें आज भी अपने भविष्य के संदर्भ में कोई जानकारी नहीं है।

आज भी संयुक्त इस्लामिक जगत हम पर दबाव बनाए हुए हैं कि हम अपने तीर्थों पर कब्जा सहन करें लेकिन उपहास और अपमान की स्थिति में उसी भाषा में पलटकर जवाब भी न दें।

मराठों ने बीच में आकर 100-200 साल के लिए स्थिति को रोक दिया जिससे हमें थोड़ा और समय मिल गया है लेकिन ये संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है।

अपने बच्चों को देखिए आप उन्हें कैसा भविष्य देना चाहते हैं
मरती हुई हिन्दू नस्ल जैसा कि 1915 में यूएन मुखर्जी लिख गए थे।

अपने समय का एक समय
अपनी कमाई का एक हिस्सा
बिना किसी स्वार्थ के हिन्दू जनजागरण में लगाइये अगर ये कोई भी दूसरा नहीं कर रहा तो खुद करीए।

नहीं तो आपके बच्चे अरबी मानसिकता के गुलाम, चौथी बीवी या फिदायन हमलावर बनेंगे और इसके लिए सिर्फ आप जिम्मेदार होंगे।

Hindu dying race नहीं है
हम सनातन है

और
*ये आखिरी सदी है जब हम लड़ सकते हैं*

इसके बाद हमारे पास भागने के लिए
*कोई जगह नहीं है*
🔥💥⚔️🚩⚔️💥🔥

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મલ્ટિનેશનલ કંપનીઓએ આપણને કહ્યું કે, વાળને સિલ્કી બનાવવા અમારું શેમ્પુ ઈસ્તેમાલ કરો અને *અરિઠા , શિકાકાઈ છોડો!!*

આજે હવે એ જ કંપનીઓ *અરિઠા અને આમળા અને શિકાકાઈયુક્ત શેમ્પુની કરોડોના ખર્ચે જાહેરાતો ટેલિવિઝન પર આપે છે.!!!*

પ્રદીપભાઈ ખીમાણી ઉમેરે છે કે, આપણે જ્યારે દાંત સાફ કરવા કોલસા કે નમકનો કે દાતણનો ઉપયોગ કરતા ત્યારે તોસ્તાન કંપનીઓ ભારતીયોની ઠઠ્ઠા – મશ્કરી કરતી હતી.

*હવે …* દરેક મલ્ટિનેશનલ કંપનીઓ કરંજ, બાવળ, લવિંગ વગેરેનો અર્ક નાંખીને ટુથપેસ્ટ બનાવે છે !

તેઓ કોલસાવાળી પેસ્ટ પણ બનાવે છે અને દરરોજ આપણને પૂછે છે કે , *” આપ કે ટુથપેસ્ટ મેં નમક હૈ ” ?*

હમણાં એક નવું તૂત નીકળ્યું છે : વ્હિટ બેલી .

કોઈ એક ઘનચક્કર સંશોધકે તારણ આપ્યું કે ઘઉંને કારણે પેટ વધે છે, તેમાં રહેલા ગ્લુટેનને કારણે ફાંદ વધે છે.

*કહેતા ભી દિવાના, સુનતા ડબલ દિવાના .*

કોઈ ધાનથી એમ પેટ વધતું નથી. માપમાં લો ત્યાં સુધી કશું જ ઝેર નથી.

બેશક , બાજરો , જુવાર , મકાઈ જેવા જાડા ધાનનો મહિમા અપરંપાર છે. પણ .. તેનો મતલબ એ નથી કે , ઘઉં નકરું નુકસાન કરે છે.

*સાવધાન રહો*, આવા કુપ્રચારથી બચો.

આપણી ફુલકા રોટલી જેવી સુપાચ્ય અને પોષક બ્રેડ આખી દુનિયામાં બીજી એકપણ નથી.

આવો જ એક ટ્રેન્ડ ચાલ્યો છે : વિગન બનવાનો.

*વિગન એટલે દરેક ડેરી પ્રોડક્ટનો નિષેધ.* દૂધ , દહીં , છાસ, માખણ, ઘી, ચીઝ, પનીર…. કશું જ નહિ લેવાનું .

*ભારતીયો માટે આ કોન્સેપ્ટ બેવકુફીથી વિશેષ કશું જ નથી.*
કારણ કે,
*પશ્ચિમમાં આ આઈડિયા પશુઓ પર અત્યાચાર રોકવાની ચળવળના ભાગરૂપે છે.*

ભારતનું ગોપાલન ક્રુરતાથી જોજનો દૂર છે. અહીં તો ગોપાલક જે – તે ગાયને નામથી ઓળખે છે, ગાય અથવા ભેંસ તેની સખી હોય છે.

અહીં ક્રુરતા જેવી કોઈ વાત જ નથી.

બીજું, દૂધ – દહીં, ઘી અને પનીરનું આપણી ડિશમાં આગવું સ્થાન છે. એનો મહિમા અને મહત્વ આપણે જાણીએ છીએ.

*યાદ રાખજો*, આજથી પાંચ-દસ વર્ષ પછી આપણે લોકોને વિગનમાંથી ફરી વેજિટેરિયન બનવા ઝુંબેશ કરતા હોઈશું.

અગાઉ અનેક બાબતોમાં આવું જ બન્યું છે. મૂર્ખ ન બનો, વેજિટેરિયન બનો, *વિગન બનવું એ મુર્ખતા છે.*

દેશી અને વેસ્ટર્ન કંપનીઓએ આપણને ઉપદેશ આપ્યો કે, *નમકમાં આયોડિન અનિવાર્ય છે.*

તેમણે શેરીમાં નમક વેચવા આવતા ફેરિયાઓની લારીઓ બંધ કરાવી. ફેરિયાઓ ભંગારની સામે નજીક જોખી આપતાં

કંપનીઓએ તગડો ભાવ નક્કી કર્યો.

મારો સવાલ તો એ છે કે, *દરિયાઈ મીઠું – સી સૉલ્ટ ખાવાની જરૂર જ શી છે ?*

આયુર્વેદમાં પણ *સિંધાલૂણ* નો મહિમા છે, હિમાલયન પિન્ક સોલ્ટ તરીકે ઓળખાતું ગુલાબી નમક પણ ગુણમાં બેજોડ છે.

મેં તો સગી આંખે યુરોપિયનોને ત્યાંના સુપરસ્ટોરમાં સો-બસો ગ્રામની ડબ્બી માટે ત્રણ-ચાર યુરો ( ” ત્રણસો – ચારસો રૂપિયા ” ) હસતાં – હસતાં ચૂકવતાં જોયા છે.

અહીં એ પહાડી નમક એકસો રૂપિયાનું કિલો મળે છે અને સિંધવ નમક પચાસ-સાંઠ આસપાસનું.

પણ આપણને તબિયત સારી રાખતા આપણા આવા દેશી નમકમાં રસ નથી, *બ્લડપ્રેશર હાઈ કરી નાંખતા* બ્રાન્ડેડ દરિયાઈ નમક આપણે હોંશે-હોંશે ખરીદીએ છીએ.

*ઉદાહરણોની અછત નથી , એક શોધશો તો હજાર મળશે.*

ચોખાના પૌઆ છોડ્યા આપણે અને કૉર્નફ્લેક્સ ઝાલ્યા.
*પૌઆ જેવો હળવો અને નિર્દોષ એકેય નાસ્તો નથી.*

પણ આપણને કહેવામાં આવ્યું કે, બાળકો જો આ કૉર્નફ્લેક્સ ખાશે તો અરબી ઘોડાં જેવા તંદુરસ્ત બની જશે. જાણે પૌઆ – મમરા ખાઈને આપણાં બાળકો લુલાં – લંગડા બની ગયા હોય!

આપણને કહેવાયું છે કે, *‘ ઈન્ડિયન કરી ઈઝ ટુ સ્પાઈસી…’*

હવે .. જગત આખું એ જ ભારતીય હર્બ્સ પાછળ ઘેલું છે. એ જ તજ – લવિંગ, મરી – મસાલા, હળદર, મરચું, અજમો, જાયફળ અને જાવંત્રીનો ઔષધિય મહિમા હવે બધા જ સ્વીકારે છે.!!!

*કોરોના કાળમાં પણ આ જ આપણાં મસાલા હવે ઔષધ તરીકે કારગત નિવડી રહ્યાં છે.*

આપણે સદીઓથી રસોઈમાં *હળદર* નો ઉપયોગ કરીએ છીએ,

હવે આપણને કહેવામાં આવે છે કે, હળદર ખાઈએ તો અલ્ઝાઈમરથી મહદ અંશે બચી શકીએ. વૈજ્ઞાનિક પરીક્ષણો નહોતા થયા ત્યારે પણ આપણે હળદરનો ઔષધ તરીકે ઉપયોગ કરતા હતા.

હવે મેડિકલ સાયન્સ કહે છે કે, *તેમાં કરક્યુમિન નામનું એક ચમત્કારિક તત્ત્વ છે – જે મોટાભાગના વાઈરસ, બેક્ટેરિયા અને ફંગસ સામે જબરજસ્ત પરિણામ આપે છે.*

અમારા જુનાગઢમાં વર્ષો પહેલાં અઠવાડિયે એક વખત એક વૈદ્યરાજ આવતા.

ટોકન ચાર્જ લઈને તેઓ નાની – મોટી બીમારીનો ઈલાજ સૂચવે. એમની સારવાર પણ એકદમ યુનિક. આપણા રસોડામાં ઉપલબ્ધ હોય તેવી વસ્તુઓ જ દવા તરીકે સૂચવે.

કોઈને અજમો લેવાનું કહે,
કોઈને મેથી તો
કોઈને વરિયાળી , તજ – લવિંગ , એલચી, જાયફળ કે ધાણાજિરુ.

લોકો તેમને *‘રસોડાં વૈદ્ય’* તરીકે જ ઓળખતા.

*આપણું રસોડું સ્વયં એક ઔષધ કેન્દ્ર હતું,* આપણે તેને રોગોનું ઘર બનાવી દીધું. ફ્રોઝન ફૂડ, પ્રિઝર્વેટિવ ધરાવતા ખાદ્યપદાર્થો અને જાતજાતનાં ફાલતૂ સૉસ આપણાં ભોજનનો હિસ્સો બન્યા.

અસલી વસ્તુઓ વિસરાતી ગઈ અને સિન્થેટિક પદાર્થો ઘૂસતા ગયા.

*જરા વિચાર કરો,*

કહેવાતી ચાઈનીઝ ડિશમાં ચિલી સોસ, ટોમેટો સોસ, ગાર્લિક સોસ વગેરે ઠલવાય છે.

સવાલ એ છે કે, *શું આપણી ચટણીઓ એ ફ્રેશ સોસ જ ન ગણાય ?*

આપણે લસણની, મરચાંની, આદુની, કોથમીર – ફુદીનાની ફ્રેશ ચટણીઓ બનાવી જાણીએ છીએ.

આ બધી ચટણીઓ એક પ્રકારે એપેટાઈઝરનું કામ પણ કરે છે અને ઔષધનું પણ કરે છે. એમ જણાવાતા પ્રદીપભાઈ ઉમેરે છે કે આપણને આવા છ-બાર મહિના પહેલા બનેલા અને ભરપૂર કેમિકલ્સ ધરાવતા હાનિકારક સોસની કોઈ જ આવશ્યકતા નથી. પણ, હૈસો હૈસો ચાલ્યા કરે છે.

બદામ – પિસ્તાવાળું દૂધ બાળકોને આપવાને *બદલે* હવે આપણે ટીનપેક ફૂડ સપ્લીમેન્ટ આપીએ છીએ,

ચિક્કાર ફળો ઉપલબ્ધ હોવા છતાં *માત્ર ૨૫ ટકા ફળોનો રસ ધરાવતા ટેટ્રા પેક ખરીદીએ છીએ. !!!*

આપણા ગામના પાદરે *સરગવો* સાવ રેઢો ઊભો હતો,

વડવાઓ તેનાં પાનમાંથી થેપલાં, મુઠિયાં અને સબ્જી બનાવતાં.

એ બંધ કર્યું.

આજે એ જ પાંદડાનો પાવડર બે-ત્રણ હજાર રૂપિયે કિલો ખરીદીને ગળચીએ છીએ. કારણ કે, હવે તો નિષ્ણાતો તેનાં ગુણગાન ગાય છે !

*યાદ રાખજો,*

આપણાં વડવાઓ કરતાં મોટા નિષ્ણાતો બીજા કોઈ નહોતા, કોઈ નથી.
*જરૂર થી વાંચજો*.
*આગળ ગ્રુપ માં મોકલો*

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Sita Ram Goel on Sufism

Pankaj Saxena

1. The obsession of Hindus with Ajmer, Chishtiya Silsila and Sufis in general is very unhealthy. Some professors (from JNU & other universities) have built their career by whitewashing the history of Sufis in India & continue to do so.
2. Sita Ram Goel had warned in 1985 that this fatal love of Hindus for Sufis will be their ruin. It is Hindus who have kept the Sufi tradition alive in India by visiting and donating to Ajmer as well as most other dargahs. A tradition which has always wanted to convert them.
3. He has also warned about the absurdity of Hindu professors and academicians sitting in India’s top universities and singing paeans about Ajmer and other Sufi orders in India. They are doing a great disservice by confusing Hindus about the real nature of Sufism.
4. Sita Ram Goel says in ‘Muslim Separatism’: “Many Hindus have been misled, mostly by their own ‘soft-headed scholars’ to cherish the fond belief that the Sufis were spiritual seekers, and that unlike the Mullahs, they loved Hindu religious lore and liked their Hindu neighbors.”
5. “The Chishtiyya Sufis in particular have been chosen for such fulsome praise.” He says. We can see this deplorable trend even now when professors from JNU keep whitewashing the fanatic and barbaric record of the Sufi orders, particularly the Chishtiya order.
6. These Sufi orders were fanatic since the beginning. An Islamic scholar Aziz Ahmad says: “In Indian sufism anti-Hindu polemics began with Muin al-din Chishti. Early Sufis in the Punjab and early Chishtis devoted themselves to the task of conversion on a large scale.”
7. Nizamuddin Auliya is championed as a great spiritual figure. He actually thought that Hindus could not get Allah’s grace and could not be easily converted until they were in the company of some Muslim fakirs and saints for a long time and only then conversion would follow.
8. This is very crucial. Sufism is a front to convert Hindus who are given to reverence for anything which even remotely sounds spiritual. It is their strength, but also their weakness. The early attacks of Islam in India established that defeating and converting Hindus is not easy.
9. Thus Islamic scholars came up with a plan. They started imitating and mimicking Hindu sadhus. Muslim fakirs and Sufis started imitating the guru parampara of Hindus and copied Vedantic philosophy, imitating it in songs and popular literature.
10. However, the core of Islamic fundamentalism was never changed. Sufism was a cover for military Islam. Nothing else. This can be traced from their ideology and their practice. They existed to fool Hindus about a spiritual core in Islam and thus convert them.
11. Amir Khusrau and Ziauddin Barani were disciples of Auliya but were deeply fanatic. “Both of them express a great hatred for Hindus, and regret that the Hanafi school of Islamic Law had come in the way of wiping out completely the curse of infidelism from the face Hindustan.”
12. Chishtiya order in Ajmer is not the only Sufi order which was Islamic fundamentalist in nature. Ahmad Sirhindi (1564-1624) was another Sufi who had great influence on India. He wrote many letters to powerful courtiers in the reign of Akbar and Jehangir.
13. In letter No. 163 he wrote: “The honour of Islam lies in insulting kufr and kafirs. One who respects the kafirs dishonours the Muslims.” It is brought to us by Islamic scholar S A A Rizvi. Similarly Sirhindi writes the real reason of implementing Jizyah on Hindu:
14. “The real purpose of levying jiziya on them is to humiliate them to such an extent that they may not be able to dress well and to live in grandeur. They should constantly remain terrified. It is intended to hold them under contempt and to uphold the honour and might of Islam.”
15. It was Sufi Ahmad Sirhindi who reinvigorated the fundamentalist Islam in India after it had been softened by Akbar during his rule. Abul Kalam Azad wrote that it was Sirhindi who wrote letters to all Muslim nobles in India to keep following orthodox Islam.
16. Sirhindi taught them not to believe the soft agenda of Akbar. He instructed that to hate Hindus, to sacrifice cows, is the noble duty of a true Muslim. Without this new life given to fundamentalist Islam in India, Aurangzeb wouldn’t have found curry with Muslim nobles.
17. Sufis in India have always been the covert soldiers of fundamentalist Islam. ALL Sufi orders trace their spiritual lineage to the Prophet. Just like the Shariat, the Islamic law, the source of all Sufism is once again the deeds and words of the Prophet.
18. This proves that all the claim of Sufi being the ‘spiritual’ sect of Islam is completely wrong. They have learned to imitate Vedanta in lofty poetry. But the loftiness never goes to any higher place because any higher philosophy is blasphemy for orthodox Islam.
19. The point here is: all the four Sufi Silsilas (Chishtiya, Suhrawardy, Qadiri, Naqsbandi) have an agenda against non-Muslims, similar to any Islamic invader. They consider Hindu way of life and worship as Kufr and want to convert all Hindus to Islam.
20. The Sufis have managed to attain some small siddhis and that is how they are able to fool and attract Hindu devotees, but that’s the story for another thread. For now beware of ‘soft-headed professors’ whitewashing the seamier side of Sufi history.