Posted in हिन्दू पतन

एक सडी हुई व्यवस्था, मरी हुई कौम, गलीच, स्वार्थी और भ्रष्टाचारी लोगों की वजह से एक जिंदगी कैसे बर्बाद हो रही है। इस दास्ताँ को पढिए..

जबसे मैंने मुंबई की देविका रोटवान के बारे में पढ़ा है …..तबसे सिस्टम और उसके नौकरशाही से नफरत दस गुना बढ़ गयी है …….

आपने नाना प्रकार के नीच समाज के बारे में सुना होगा लेकिन अपने भारतीय समाज ने नीचता में पीएचडी किया है …

देविका रोटवांन वही लड़की है जिसकी गवाही पे कसाब को फांसी हुई थी …..

आपको बता दें की देविका मुंबई हमलों के दौरान महज 9 साल की थी ..उसने अपनी आँखों से कसाब को गोली चलाते देखा था ..

लेकिन जब उसे सरकारी गवाह बनाया गया तो उसे पाकिस्तान से धमकी भरे फोन कॉल आने लगे …..देविका की जगह अगर कोई और होता तो वो गवाही नहीं देता ..लेकिन इस बहादुर लड़की ने ना सिर्फ कसाब के खिलाफ गवाही दी बल्कि सीना तान के बिना किसी सुरक्षा के मुंबई हमले के बाद भी 5 साल तक अपनी उसी झुग्गी झोपडी में रही …

लेकिन इस देश भक्ति के बदले उसे क्या मिला ??….लोगों ने साथ तक नही दिया

आपको बता दें की देविका रोटवान जब सरकारी गवाह बनने को राजी हो गयी तो उसके बाद उसे उसके स्कुल से निकाल दिया गया ..क्यों की स्कूल प्रशासन का कहना था की आपकी लड़की को आतंकियों से धमकी मिलती है ..जिससे हमारे दुसरे स्टूडेंट्स को भी जान का खतरा पैदा हो सकता है ….

देविका के रिश्तेदारों ने उससे दूरी बना ली ..क्यों की उन्हें पाकिस्तानी आतंकियों से डर लगता था जो लगातर देविका को धमकी देते थे ….देविका को सरकारी सम्मान जरुर मिला ..
उसे हर उस समारोह में बुलाया जाता था जहाँ मुंबई हमले के वीरों और शहीदों को सम्मानित किया जाता था ..लेकिन देविका बताती है की सम्मान से पेट नहीं भरता …
मकान मालिक उन्हें तंग करता है उसे लगता है की सरकार ने देविका के परिवार को सम्मान के तौर पे करोडो रूपये दिए हैं ..
जबकि असलियत ये हैं की देविका को अपनी देशभक्ति की बहुत भरी कीमत चुकानी पड़ी है …

देविका का परिवार देविका का नाम अपने घर में होने वाली किसी शादी के कार्ड पे नहीं लिखवाता ..क्यों की उन्हें डर है की इससे वर पक्ष शादी उनके घर में नहीं करेगा ..क्यों की देविका आतंकियों के निशाने पे है ……

देविका के परिवार ने अपनी आर्थिक तंगी की बात कई बार राज्य सरकार और पीएमओ तक भी पहुचाई लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात निकला …
देविका की माँ 2006 में ही गुजर गयी है …

देविका के घर में आप जायेंगे तो उसके साथ कई नेताओं ने फोटो खिचवाई है ..कई मैडल रखे हैं ..लेकिन इन सब से पेट नहीं चलता …देविका बताती है की उसके रिश्तेदारों को लगता है की हमें सरकार से करोडो रूपये इनाम मिले है ..लेकिन असल स्थिति ये हैं की दो रोटी के लिए भी उनका परिवार महंगा है …..
आतंकियों से दुश्मनी के नाम पर देविका के परिवार से उसके आस पास के लोग और उसकी कई दोस्तों ने उससे दूरी बना ली ..की कहीं आतंकी देविका के साथ साथ उन्हें भी ना मार डाले ……..

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और डीएम ऑफिस के कई चक्कर लगाने के बाद उधर से जवाब मिला की हमारे जिम्मे एक ही काम नहीं है …….

देविका के पिता बताते हैं की उन्होंने अधिकारीयों से कहा की cm साहब ने मदद करने की बात कही थी …..सरकारी बाबू का कहना है की रिटन में लिखवा के लाइए ……..
तब आगे कार्यवाही के लिए भेजा जाएगा ……….

अब आप बताइये की क्या ऐसे देश ..ऐसे समाज ..और ऐसी ही भ्रष्ट सरकारी मशीनरी के लिए देविका ने पैर में गोली खायी थी …??
उसे क्या जरूरत थी सरकारी गवाह बनने की ??
उसे स्कुल से निकाल दिया गया ??
क्यों की उसने एक आतंकी के खिलाफ गवाही दी थी …..

आप बताइये अगर देशभक्ति कीमत ऐसे ही चुकाई जाती है तो मै यही कहूँगा की कोई जरूरत नहीं है देशभक्त बनने की …..ऐसे खुद गरज समाज ..सरकार ….और नेताओं के लिए अपनी जान दाव पे लगाने की कोई जरूरत नहीं है …

देविका तुमने बिना मतलब ही अपनी जिन्दगी नरक बना ली ……
सलमान खान एक देशद्रोही संजय दत्त ..और अब एक वैश्या सन्नी लियोन के ऊपर बायोपिक बनाने वाला बॉलीवुड तो देविका के मामले में महा मा**चो निकला …

आपको बता दें की देविका का interview लेने के लिए बॉलीवुड निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने देविका को अपने घर बुलाया लेकिन उसे आर्थिक मदद देना तो दूर उसे ऑटो के किराए के पैसे तक नहीं दिए ….ऐसा संवेदन हीन है अपना समाज …थूकता हूँ मै ऐसे समाज पे ….

शायद कितनो को तो देविका के बारे पता भी नहीं होगा की देविका रोटवान कौन है ……..

थू है ऐसी व्यवस्था पे ..

Posted in हिन्दू पतन

रजनीश के एक अनुयायी ने उनसे प्रश्न किया ।
प्रश्न – कृपया बतायें जेहादियों द्वारा जब मकान और संपत्ति जलाई जा रही हों , हत्याएं की जा रही हों,तब हमें क्या करना चाहिए? हिन्दू मुस्लिम भाई भाई का प्रचार करना चाहिए या सुरक्षा के लिए कोई कदम उठाना चाहिए , कृपया मार्गदर्शन करें।

उत्तर – तुम्हारा प्रश्न ही तुम्हारी मूढ़ता को बता रहा है, इतिहास से तुमने कुछ सीखा हो ऐसा मालूम नहीं पड़ता।

महमूद गजनबी ने जब सोमनाथ के मंदिर पर आक्रमण किया तो सोमनाथ उस समय का भारत का सबसे बड़ा और धनी मंदिर था।

उस मंदिर में पूजा करने वाले 1200 हिन्दू पुजारियों का ख़याल था कि हम तो रातदिन ध्यान ,भक्ति ,पूजापाठ, में लगे रहते हैं।

इसलिए भगवान हमारी रक्षा करेगा।
उन्होंने रक्षा का कोई इंतज़ाम नहीं किया उल्टे जो क्षत्रिय अपनी रक्षा कर सकते थे उन्हें भी मना कर दिया

नतीजन महमूद ने उन हज़ारों निहत्थे हिन्दू पुरोहितो की हत्या की, मूर्तियों ओर मंदिर को तोड़ा ओर अकूत धन संपत्ति हीरे जवाहरात सोना -चाँदी लूट कर ले गया
उनका ध्यान भक्ति पूजा पाठ उनकी रक्षा न कर सका।

आज सैकड़ों साल बाद भी वही मूढ़ता जारी है, तुमने अपने महापुरूषों के जीवन से भी कुछ सीखा हो ऐसा मालूम नही पड़ता है।

यदि ध्यान में इतनी शक्ति होती कि वो दुष्टों का ह्रदय परिवर्तन कर सके तो रामचंद्र जी को हमेशा अपने साथ धनुष बाण रखने की जरूरत क्यों होती। ध्यान की शक्ति से ही वो राक्षस और रावण का हदय परिवर्तन कर देते उन्हें सुर-असुर भाई -भाई समझा देते और झगड़ा ख़त्म हो जाता लेकिन राम भी किसी को समझा न पाए और राम रावण युद्ध का फैसला भी अस्र शस्त्र से ही हुआ।

ध्यान में यदि इतनी शक्ति होती कि वो दुसरो के मन को परिवतिर्त कर सके। तो पूर्णावतार श्रीकृष्ण को कंस ओर जरासंघ का वध करने की जरूरत क्यों पड़ती! ध्यान से ही उन्हें बदल देते।

ध्यान में यदि दूसरे के मन को बदलने की शक्ति होती तो महभारत का युद्ध ही नहीं होता, कृष्ण अपनी ध्यान की शक्ति से दुर्योधन को बदल देते ओर युद्ध टल जाता। लेकिन उल्टे कृष्ण ने अर्जुन को जो कि ध्यान में जाना चाहता था रोका और उसे युद्ध में लगाया ।

महाभारत का युद्ध इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध है जिसमें करोड़ों लोगों का नरसंहार हुआ, पिछले 1200 सालों में भारत मे कितने महर्षि संत हुए ,गोरखनाथ से लेकर रैदास ओर कबीर तक गुरुनानक से लेकर गुरु गोविंदसिंह तक इन सबकी ध्यान की शक्ति भी मुस्लिम आक्रान्ताओं और अंग्रेज़ों को न रोक सकी इस दौरान करोड़ों हिन्दुओं का नरसंहार हुआ और ज़बरदस्ती तलवार की नोक पर उनका धर्म परिवर्त्तन करवाया गया।

मार मार कर उन्हें मुसलमान बनाया गया
उन संतों की शिक्षा आक्रान्ताओं को बदल न सकी। गुरुनानक ने तो अपना धर्म दर्शन ही इस प्रकार दिया कि मुस्लमान उसे आसानी से समझ सकें, आत्मसात कर सकें । लेकिन उसी गुरु परंपरा में गुरुगोविंद सिह को हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए, मुसलमानों के खिलाफ़ तलवार उठानी पड़ी निहत्थे सिक्खों को शस्त्र उठाने पड़े।

निवेदक :-
अश्विनी उपाध्याय
अधिवक्ता – सुप्रीम कोर्ट
PIL MAN OF INDIA

भाई प्रीत सिंह
President – Save India Foundation

Posted in हिन्दू पतन

हरअधिकांश सूफी संत या तो इस्लामिक आक्रांताओं की आक्रमणकारी सेनाओं के साथ भारत आए थे, या इस्लाम के सैनिकों द्वारा की गई कुछ व्यापक विजय के बाद। लेकिन इन सबके भारत आने के पीछे सिर्फ एक ही लक्ष्य था और वह था इस्लाम का प्रचार। इसके लिए उलेमाओं के क्रूरतम आदेशों के साथ गाने-बजाने की आड़ में हिन्दुओं की आस्था पर चोट करने वाले ‘संतों’ से बेहतर और क्या हो सकता था?‘शांतिपूर्ण सूफीवाद’ का मिथक, कई सदियों तक इस्लामिक ‘विचारकों’ और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा खूब फैलाया गया है। वास्तविकता इन दावों से कहीं अलग और विपरीत है। वास्तविकता यह है कि इन सूफी संतों को भारत में इस्लामिक जिहाद को बढ़ावा देने, ‘काफिरों’ के धर्मांतरण और इस्लाम को स्थापित करने के उद्देश्य से लाया गया था।इसी में एक सबसे प्रसिद्ध नाम आता है ‘सूफी संत’ मोइनुद्दीन चिश्ती (Khwaja Moinuddin Chishti) का, जिन्हें कि हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ के नाम से भी पुकारा जाता है। सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म ईरान में हुआ था, लेकिन उन्हें राजस्थान के अजमेर में दफनाया गया था।‘काफिरों’ को लेकर सूफीवाद के महानतम विद्वानों का दृष्टिकोण ISIS के दृष्टिकोण से अलग है, यह कहना एकदम गलत है। इसका उदाहरण सूफी विचारधारा के सबसे बड़े प्रतीक माने जाने वाले मोइनुद्दीन चिश्ती और औलिया हैं, जिन्होंने वो काम सदियों पहले कर दिया था, जिसे ISIS और कट्टर इस्लामिक संगठन आज की सदी में कर रहे हैं।इतिहासकार एमए खान ने अपनी पुस्तक ‘इस्लामिक जिहाद: एक जबरन धर्मांतरण, साम्राज्यवाद और दासता की विरासत’ (Islamic Jihad: A Legacy of Forced Conversion, Imperialism, and Slavery) में इस बारे में विस्तार से लिखा है कि मोइनुद्दीन चिश्ती, निज़ामुद्दीन औलिया, नसीरुद्दीन चिराग और शाह जलाल जैसे सूफी संत जब इस्लाम के मुख्य सिद्धांतों की बात करते थे, तो वे वास्तव में रूढ़िवादी और असहिष्णु विचार रखते थे, जो कि मुख्यधारा के जनमत के विपरीत था।उदाहरण के लिए, सूफी संत मोईनुद्दीन चिश्ती और औलिया इस्लाम के कुछ पहलुओं जैसे- नाच (रक़) और संगीत (सामा) को लेकर उदार थे, जो कि उन्होंने रूढ़िवादी उलेमा के धर्मगुरु से अपनाया, लेकिन एक बार भी उन्होंने कभी हिंदुओं के उत्पीड़न के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। औलिया ने अपने शिष्य शाह जलाल को बंगाल के हिंदू राजा के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए 360 अन्य शागिर्दों के साथ बंगाल भेजा था।इस पुस्तक में इस बात का भी जिक्र किया है गया है कि वास्तव में, हिंदुओं के उत्पीड़न का विरोध करने की बात तो दूर, इन सूफी संतों ने बलपूर्वक हिंदुओं के इस्लाम में धर्म परिवर्तन में भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। यही नहीं, ‘सूफी संत’ मोइनुद्दीन चिश्ती के शागिर्दों ने हिंदू रानियों का अपहरण किया और उन्हें मोईनुद्दीन चिश्ती को उपहार के रूप में प्रस्तुत किया।यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि चिश्ती, शाह जलाल और औलिया जैसे सूफी ‘काफिरों’ के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए भारत आए थे। उदाहरण के लिए- मोइनुद्दीन चिश्ती, मुइज़-दीन मुहम्मद ग़ोरी की सेना के साथ भारत आए और गोरी द्वारा अजमेर को जीतने से पहले वहाँ गोरी की तरफ से अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान की जासूसी करने के लिए अजमेर में बस गए थे। यहाँ उन्होंने पुष्कर झील के पास अपने ठिकाने स्थापित किए।प्रतिदिन गाय का वध और मंदिरों को अपवित्र करते थे चिश्ती के शागिर्दमध्ययुगीन लेख ‘जवाहर-ए-फरीदी’ में इस बात का उल्लेख किया गया है कि किस तरह चिश्ती ने अजमेर की आना सागर झील, जो कि हिन्दुओं का एक पवित्र तीर्थ स्थल है, पर बड़ी संख्या में गायों का क़त्ल किया, और इस क्षेत्र में गायों के खून से मंदिरों को अपवित्र करने का काम किया था। मोइनुद्दीन चिश्ती के शागिर्द प्रतिदिन एक गाय का वध करते थे और मंदिर परिसर में बैठकर गोमांस खाते थे।इस अना सागर झील का निर्माण ‘राजा अरणो रा आनाजी’ ने 1135 से 1150 के बीच करवाया था। ‘राजा अरणो रा आनाजी’ सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पिता थे। आज इतिहास की किताबों में अजमेर को हिन्दू-मुस्लिम’ समन्वय के पाठ के रूप में तो पढ़ाया जाता है, लेकिन यह जिक्र नहीं किया जाता है कि यह सूफी संत भारत में जिहाद को बढ़ावा देने और इस्लाम के प्रचार के लिए आए थे, जिसके लिए उन्होंने हिन्दुओं के साथ हर प्रकार का उत्पीड़न स्वीकार किया।यहाँ तक कि आज भी इन सूफी संतों की वास्तविकता से उलट यह बताया जाता है कि ये क़व्वाली, समाख्वानी, और उपन्यासों द्वारा लोगों को ईश्वर के बारे में बताकर उन्हें मुक्ति मार्ग दर्शन करवाते थे। लेकिन तत्कालीन हिन्दू राजाओं के साथ इनकी झड़प और उनके कारणों का जिक्र शायद ही किसी इतिहास की किताब में मिलता हो।पृथ्वीराज चौहान की जासूसी और उन्हें पकड़वाने में चिश्ती की भूमिकाखुद मोइनुद्दीन चिश्ती ने तराइन की लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को पकड़ लिया था और उन्हें ‘इस्लाम की सेना’ को सौंप दिया। लेख में इस बात का प्रमाण है कि चिश्ती ने चेतावनी भी जारी की थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था – “हमने पिथौरा (पृथ्वीराज) को जिंदा पकड़ लिया है और उसे इस्लाम की सेना को सौंप दिया है।”हिन्दू राजा की बेटी ‘बीबी उमिया’ का अपहरण और निकाहमोइनुद्दीन चिश्ती का एक शागिर्द था मलिक ख़ितब। उसने एक हिंदू राजा की बेटी का अपहरण कर लिया और उसे चिश्ती को निकाह के लिए ‘उपहार’ के रूप में प्रस्तुत किया। चिश्ती ने खुशी से ‘उपहार’ स्वीकार किया और उसे ‘बीबी उमिया’ नाम दिया।लेकिन संयोगवश ‘सूफी संत’ मोईनुद्दीन चिश्ती के बारे में इतिहास में दर्ज ये तथ्य बॉलीवुड की फिल्मों, गानों, सूफी संगीत और वामपंथी इतिहास से एकदम अलग हैं।सिर्फ इस्लाम की स्थापना था उलेमा और सूफी संतों का लक्ष्यअपनी पुस्तक ‘भारत में मुस्लिम शासन की विरासत’ (Legacy of Muslim Rule in India) में इतिहासकार केएस लाल ने लिखा है, “मुस्लिम मुशाहिक (सूफी आध्यात्मिक नेता) उलेमाओं की तरह ही धर्मांतरण को लेकर उत्सुक थे, और सूफी ‘संतों’ को लेकर आम धारणा के विपरीत, हिंदुओं के प्रति दयालु होने के स्थान पर, वे चाहते थे कि यदि इस्लाम अपनाने से इनकार करते हैं तो उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक के तौर पर रखा जाए।”‘द सिनिस्टर साइड ऑफ सूफीवाद’ में, लेखक राम ओहरी ने लिखा है, “कोई भी मुसलमान, न ही कोई सूफी, कभी भी हिंदू मंदिर में पूजा करने के लिए सहमत नहीं हुआ है, और न ही हिंदू देवी-देवताओं की छवियों के सामने कोई सम्मानपूर्वक तरीके से पेश आया है।

”https://hindi.opindia.com/miscellaneous/indology/islamic-jihad-india-sufi-khwaja-moinuddin-chisti-garib-nawaz-nizamuddin-khilji-hindus-forced-conversions/

Posted in हिन्दू पतन

यहूदी इजरायली और विश्व के मुसलमान

बहुत कम लोग शायद जानते हैं कि
इस समय विश्व का एकलौता यहूदी देश इजरायल अपना
“50 वाँ विजयी दिवस”
मना रहा है।
मगर 51 साल पहले इसी दिन हुआ क्या था ?

भारत के हिन्दूवादियों और सेक्युलरों की
आँखें खोलने वाला युद्ध है।

जिस तरह 1947 में पाकिस्तान
भारत से अलग हुआ था
उसी तरह से इजरायल
फिलिस्तीन से अलग हुआ था।

बस अन्तर इतना था कि
पाकिस्तान
मुसलमानों के देशद्रोह का नतीजा था, और
इजरायल यहूदियों के अधिकारों का।
क्योंकि
फिलिस्तीन तो क्या पूरा मध्य एशिया
कभी यहूदियों का था
मगर इस्लाम फैलने के साथ साथ
इजरायल सिमटता गया।

1947 में इजरायल बना और
4 जून 1967 को
मिस्र, सीरिया, जॉर्डन, इराक, लेबनॉन, अल्जीरिया, कुवैत, लीबिया, मोरक्को, पाकिस्तान और ट्यूनीशिया

इन सभी मुस्लिम देशों ने मिलकर
इजरायल पर हमला कर दिया।

इजरायल में उस समय 20% मुसलमान थे।
ये 20 सालों से इजरायल को
बहुत प्यार कर रहे थे।

मगर जैसे ही उन्हें पता चला कि
ख़ुदा ने इजरायल को मिटाने के लिये
इराक और कुवैत से फौज भेजी है
इन्होंने इजरायल में
दङ्गे, फसाद शुरू कर दिए और
गृहयुध्द की हालत बना डाली।

इजरायल बेचारा बुरी तरह फॅस गया
क्योंकि उसे बने 20 साल भी पूरे नहीं हुए थे
सेना पर्याप्त नहीं थी और
इजरायल के अन्दर बैठे मुसलमान
ज्यादा उत्साहित थे,
इसलिए पुलिस प्रशासन उनसे भिड़ने में व्यस्त था।

बेचारा अकेला इजरायल फिर भी युद्ध में कूदा।
इजरायल के मुसलमानों ने पहले दिन
एक व्यापारिक इमारत में बम धमाका किया।
जवाब में
इजरायल रोया नहीं,
बल्कि उसने सीधे ग्रेनेड फेंक दिए।
अब यहूदियों का सब्र टूट चुका था
उनके नागरिक भी अब इस लड़ाई में कूद पड़े

शुरू के चार दिन
इजरायल सरकार का ध्यान सिर्फ
इजरायल के मुसलमानों पर था।
हालाँकि इस बीच उन्होंने

इराक और लीबिया की सेना को पीछे धकेल दिया।

बाहर सेना लड़ रही थी
और
अन्दर नागरिक।

देशभक्ति और एकता का
ऐसा नज़ारा
इतिहास में कभी नहीं देखा।

4 दिनों में यहूदियों ने
अपने घर के भेदियों को
पूरी तरह कुचलकर
जन्नत की ओर रवाना कर दिया।

अब उनके नागरिक सेना का हाथ बॅटाने
सीमा पर आ गए और
छठवाॅ दिन पूरा होते होते
सारे इस्लामिक देश
पीठ दिखाकर भाग चुके थे।

इजरायल ये युद्ध जीत चुका था।

अब इस युद्ध में
भारत के लिये हज़ारों सबक छुपे हैं

ये युद्ध 6 दिन चला।

इजरायल को 4 दिन
अपने अन्दर के मुसलमानों पर काबू पाने में
लग गये,
जबकि
बाहर वालों को उसने 2 दिन में
कूड़े में फेंक दिया।

इजरायल के युद्ध से 2 साल पहले
1965 में भारत ने पाकिस्तान से युद्ध किया था।

जिसमें भारत के मुस्लिम रेजीमेण्ट के
मुस्लिम सैनिकों ने पाकिस्तान के खिलाफ
युद्ध लड़ने से मना कर दिया था ।

भारत और इजरायल के मुसलमानों की
मानसिकता की तुलना

मगर अन्तर सिर्फ इतना था की
भारत में मुसलमान दङ्गे करने की हिम्मत
ना जुटा सके
क्योंकि उनकी आबादी 1950 में तब
मात्र 6% थी,
जबकि इजरायल में यही आबादी
20% हो गयी थी,
इसीलिए वहाँ दङ्गे कर लिए।

अब भारत में ये आबादी
6% नहीं है,
बल्कि
20% है..!

इस युद्ध का दूसरा सन्देश यहूदी लोग
मुसलमानों का असली रङ्ग समझ गए।

इजरायल ने मुसलमानों पर सीधे
कड़े कानून थोप दिए।

देशद्रोह की सज़ा
उन्हें मौत के रूप में दी थी।

यहूदियों ने यह बताया है कि

युद्ध में विजय
आपकी आबादी की मोहताज नहीं है
बल्कि
बाहर और भीतर से ही
आपकी देशभक्ति की एकता में है।

Posted in हिन्दू पतन

एका ख्रिश्चन धर्म प्रसारकाला आसाम मध्ये पाठवलं होतं.! नाव फादर क्रूज.! त्याला आसाम मधल्या एका प्रभावशाली कुटुंबाच्या मुलाला इंग्रजी शिकवायची संधी मिळाली.!

पाद्री साहेब हळू हळू चौफेर नजर फिरवू लागले. ते म्हणतात ना, ‘हातभर गजरा आणि गावभर नजरा..’ तस..!

त्यांच्या लक्षात आलं की त्या मुलाची आजी ही घरातली सगळ्यात प्रभावशाली व्यक्ती आहे.! तिला जर आपण आकाशातल्या बापाच्या शिकवणुकीत पकडलं तर हे कुटुंब आणि नंतर सगळं गाव आपण ख्रिश्चन बनवू शकतो..!

आनंद कुलकर्णी

मग पाद्री साहेब हळू हळू आजीला सांगायला लागले की कस प्रभू येशू हा कुष्ठरोग बरा करतो, आंधळ्याना कशी दृष्टी देतो.! वगैरे, वगैरे…! ह्यावर त्या आजी त्याला म्हणाल्या, पोरा, आमच्या श्रीराम आणि श्रीकृष्ण ह्यांच्या चमत्कारासमोर हे तर काहीच नाही.! आमच्या प्रभू श्रीरामांनी एका दगडाला नुसता स्पर्श केला तर तो दगड एका जिवंत स्त्री मध्ये बदलला..! आणि त्यांचं नाव नुसतं जर दगडावर लिहिलं तर दगड पाण्यावर तरंगतो..!

पाद्री बाबा गप…! 😷

पण त्याचा प्रयत्न सुरूच होता..!
एक दिवस पाद्री बाबांनी चर्च मधून केक आणला आणि त्या आजींना दिला.! त्याला वाटलं की आजी काहो खाणार नाही, पण आजींनी तो केक खाल्ला..! आता पाद्री बाबांच्या डोळ्यात विजयाच हसू होत.! मोठ्या गर्वान त्यानं आजीला म्हटलं की आजी तुम्ही चर्च चा प्रसाद खाल्लात.! तुम्ही आता ख्रिश्चन झालात.!

आजी त्याला मूर्खांत काढणारं हसू हसल्या आणि म्हटल्या.., अरे बावळटा, मला एक दिवस केक दिलास आणि मी तो एकदाच खाल्ला, तर मी ख्रिश्चन झाले का ? आणि मी जे रोज तुला माझ्या घरचं जेवायला घालते आहे तर तू ते खाऊन हिंदू झालास ना आधी..!

पाद्री बाबांनी तोंड काळं केलं आणि ते परत दिसलेच नाहीत.!

आपल्या धर्माबद्दल एव्हढी निष्ठा असणाऱ्या त्या आजी होत्या, आसामच्या सुप्रसिद्ध क्रांतीकारी #कमलादेवीहजारीका..!

आपल्याला कोणालाच माहीत नाहीत त्या..! आसाम पुरत्याच मर्यादित राहिल्या त्या.!
त्यांच्या सारखा विचार जर प्रत्येक हिंदूनी केला असता तर बळजबरीने बाटवलेले आपले बरेच हिंदू परत घरी येऊ शकले असते.! पण आपण तसा विचार नाही केला.!

माझ्या माहितीप्रमाणे, असा विचार करणारे फक्त दोनच हिंदू होते.! नुसता विचार नाही तर प्रत्यक्ष आपल्या आचरणाने ते त्यांनी दाखवून दिलं..! अत्यन्त तेजस्वी हिंदू धर्माभिमानी आणि प्रखर राष्ट्र निष्ठा असणारे.!

एक म्हणजे श्रीमंत छत्रपती श्री शिवाजी महाराज आणि दुसरे आदरणीय स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर….!

©️ आनंद कुलकर्णी

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir, हिन्दू पतन

જય પાઠક

તમને બધાને ખબર છે ?


👉 ઘણા મંદિરોમાં પૈસાથી પાસે દર્શન કરવા દે છે અને ઓછા પૈસા આપો તો દૂર થી દર્શન કરવા દેવાય છે અથવા પછી પ્રાયોરિટી ઉપર વીઆઈપી પાસ આપી અને વહેલા દર્શન કરવા દેવાય છે અને એવા બધા રૂલ્સ કે જે તમારી આસ્થા ને ઠેસ પહોંચાડે છે.

👉 એ બધા રૂલ્સ સરકારી એડ્મીનીસ્ટ્રેશન HR & CE ( Hindu Religious and Charitable Endowment ) નામનું સરકારી ડિપાર્ટમેન્ટ લાદતું હોય છે જે પૈસા મંદિરને નહીં પણ એના બોન્ડ લેવાય છે 15 વર્ષ માટે.
આ પૈસા ઉપર મંદિરના પુજારીઓ કે ધાર્મિક રખેવાળો નો કોઈ હક હોતો નથી

અને આવા નિર્ણયોમાં પુજારીઓ કે ધાર્મિક કોઈ પણ સંસ્થા કે ધર્મ નો કોઈ હાથ હોતો નથી આ નિર્ણયો તેઓ નથી લેતા

👉 આ IAS અધિકારી કોઈ માર્ક્સિસ્ટ , ખ્રિસ્તી , મુલ્સિમ કે કોઈ ભીમટો કોઈ પણ હોઈ શકે છે જે મંદિરોથી નફરત પણ કરતો હોય.

👉 સેકયુલર માનસિકતા મુજબ તિરુપતિ મંદિરમાં આજે 40 જેટલા કામદારો ખ્રિસ્તી છે અને તેઓને નોકરી ઉપર IAS ઓફિસરો એ રાખ્યા છે.

👉 એક વર્ષ પહેલા કેરળ માં જે ગાય રસ્તા વચ્ચે કાપી એ કાપનાર ત્યાંના સૌથી મોટા મંદિરના ટ્રસ્ટીઓ હતા અને જ્યાં કાપી એ શકરાચાર્ય યુનિવર્સીટી ના પ્રાંગણમાં ત્યાંના એડ્મીનીસ્ટ્રેશનના છોકરાઓ એ કાપી.

👉 આંધ્રપ્રદેશ માં આજે લાખો લોકોં ટુરિઝમ બિઝનેશ થકી રોજીરોટી મેળવે છે અને આંધ્ર પ્રદેશ ભારતમાં સૌથી પહેલા નંબર ઉપર ટુરિસ્ટ સ્પોટ તરીકે આવ્યું છે એનું મુખ્ય કારણ તિરુપતિ મંદિર છે.

જેને લીધે લાખો લોકો રોજીરોટી મેળવે છે.

👉કર્ણાટકનું સૌથી ધનાઢ્ય મંદિર કૂકે સુભ્રમનાઇયમ મંદિર આખું આદિવાસીઓના હસ્તક છે અને એ મંદિરમાં રોજનું 3 ટન અનાજ બનાવાય છે જે લાખો ગરીબો સુધી રોજ કર્ણાટકમાં પહોંચે છે. આ ખોરાક બનાવવા માટે એલપીજી ગેસ નહીં પણ લાકડા નો ઉપયોગ કરાવાય છે.

આ રોજના લાખો રૂપિયાના લાકડા મંદિરની આજુબાજુના જંગલોમાં રહેતા આદિવાસીઓ લાવી આપે છે અને તેમની સામે તેઓને પૈસા મળે છે. તેઓની મુખ્ય રોજીરોટીનો આધાર જ આ મંદિર છે.

આ મંદિર આ બધા લાખો આદિવાસીઓને મંદિર સાથે સાંકળી રાખનાર મુખ્ય સ્થાન છે.

Posted in हिन्दू पतन

◆ क्या अकबर ने इस्लाम छोड़ दिया था?

कुछ समय से गीतकार जावेद अख्तर बादशाह अकबर का झंडा बुलंद कर रहे हैं। एक ताने जैसा कि अकबर के समय भारत धनी था, इसलिए मुगल-काल को बुरा नहीं कहना चाहिए। उन के पीछे दूसरे सेक्यूलर-वामपंथी भी वही दुहरा रहे हैं। लेकिन क्या वे जानते हैं कि क्या कह रहे हैं? कुछ लोगों को जानकर आश्चर्य होगा कि भारत और पाकिस्तान में अकबर की छवियाँ उलटी है। यहाँ उसे उदार, काबिल बादशाह का आदर मिलता है; मगर पाकिस्तान में अकबर के प्रति घृणा-सी फैलाई गई। क्योंकि उस ने यहाँ इस्लामी शासन का ढ़ाँचा समेट लिया था। स्वतंत्र भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद ने कहा था कि अकबर ने ‘भारत से इस्लाम को खत्म कर दिया’। पाकिस्तानी इतिहासकार आई. एच. कुरैशी भी अकबर को ‘काफिर’ मानते थे। अतः भारत-पाकिस्तान में अकबर की उलटी छवियाँ एक ही सत्य पर खड़ी हैं!

निश्चय ही अकबर पहले जिहादी था। तेरह वर्ष की उम्र में ही उस ने महान हिन्दू नायक हेमचन्द्र को मूर्छित-घायल अवस्था में अपने हाथों कत्ल किया था। अपनी हुकूमत के पहले 24 साल उस ने वही किया जो महमूद गजनवी, मुहम्मद घूरी, अलाउद्दीन खिलजी, आदि ने किया था। बाहरी मुसलमानी फौज के बल पर भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा किया। खुद को ‘गाजी’ और तैमूरी कहने का उसे गर्व था। अकबर ने मेवाड़ और गोंडवाना में जो किया वह घृणित जिहाद ही था।

अकबर लंबे समय तक मोइनुद्दीन चिश्ती का मुरीद रहा, जो हिन्दू धर्म-समाज पर इस्लामी हमले का बड़ा प्रतीक था। 1568 ई. में चित्तौड़गढ़ पर जीत के बाद अकबर ने चिश्ती अड्डे से ही ‘फतहनामा-ए-चित्तौड़’ जारी किया था, जिस के हर वाक्य से जिहादी जुनून टपकता है। उस युद्ध में 8 हजार राजपूत स्त्रियों ने जौहर कर के प्राण दिए। वहाँ अकबर ने राजपूत सैनिकों के अलावा 30 हजार सामान्य नागरिकों का भी कत्ल किया। मारे गए सभी पुरुषों के जनेऊ जमा कर तौला गया, जो साढ़े चौहत्तर मन था। यह केवल एक स्थान पर, एक बार में! वह भयावह घटना हिन्दुओं की स्मृति में रच गई है। आज भी राजस्थान में ‘74½’का तिलक-जैसा चिन्ह किसी वचन पर पवित्र-मुहर समान प्रयोग किया जाता है। कि उस वचन को जो तोड़ेगा, उसे बड़ा पाप लगेगा!

फिर अकबर के अनके सूबेदारों ने उत्तर-पश्चिम भारत में हिन्दू मंदिरों का बेशुमार विध्वंस किया। कांगड़ा, नागरकोट, आदि के प्रसिद्ध मंदिर उन में थे। अकबर ने अपने शासन में शरीयत लागू करने हेतु मुल्लों के विशेष पद भी बनाये। हिन्दुओं की कौन कहे, वह कट्टर-सुन्नी के सिवा अन्य मुस्लिम फिरकों के प्रति भी कठोर था। लेकिन, उसी अकबर में शुरू से एक विचारशील प्रवृत्ति भी थी। इसीलिए जब उस की सत्ता सुदृढ़ हो गई, तब वह मजहबी चिंतन-मनन पर भी समय देने लगा। यह 1574 ई. के लगभग शुरू हुआ, जब अकबर अपनी राजधानी फतेहपुर सीकरी में बाकायदा विमर्श चलाने लगा। उस ने इस्लाम को मजबूत करने के ही इरादे से विभिन्न धर्मों के विद्वान बुलाकर चिश्तियों और सुन्नी मौलानाओं के साथ शास्त्रार्थ-सा कराना शुरू किया। इस के लिए विशेष ‘इबादतखाना’ और उस के सामने ‘अनूप तालाब’ बनवाया। रोचक यह कि अकबर ने यह संस्कृत नामकरण किया था।

‘इबादतखाना’ उन विद्वानों के साथ अकबर के धर्म-विमर्श का स्थान था। वहाँ अकबर के सामने वर्षों जो विमर्श हुए, उन के विवरण अलग-अलग भागीदारों, प्रत्यक्षदर्शियों से उपलब्ध हैं। जैसे, एक पुर्तगाली ईसाई पादरी, गुजरात से आए पारसी विद्वान दस्तूर मेहरजी और अकबर दरबार के मुल्ला बदायूँनी। इन से पता चलता है कि अकबर ने धीरे-धीरे महसूस किया कि जिस इस्लाम पर उसे अंधविश्वास था, वह तो दर्शन और ज्ञान से खाली है! मामूली हिन्दू पंडितों के सामने भी मौलाना टिक नहीं पाते थे। चूँकि अकबर में एक आध्यात्मिक प्यास थी, इसलिए उस ने असलियत समझ ली।

फलतः उस ने लगभग 1582 ई. में एक नये धर्म ‘दीन-ए-इलाही’ की घोषणा की। यह इस्लाम से हटने की ही घोषणा थी। इसीलिए वामपंथी, मुस्लिम इतिहासकारों ने इसे लीपने-पोतने की कोशिश की है। आखिर प्रोफेट मुहम्मद, कुरान और हदीस के सिवा किसी भी चीज को महत्व देना इस्लाम-विरुद्ध है। तब अकबर ने तो सीधे-सीधे नये धर्म की ही घोषणा की!इस प्रकार, आध्यात्मिक खोजी स्वभाव के अकबर ने लंबी वैचारिक जाँच-पड़ताल के बाद इस्लाम से छुट्टी कर ली। तब दुनिया में सब से ताकतवर मुस्लिम शासक होने के कारण कोई मुल्ला उस का कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे। मुल्ला बदायूँनी ने अपनी डायरी ‘मुन्तखाबात तवारीख’ में बेहद कटु होकर लिखा है कि,‘‘बादशाह काफिर हो गया है, चाहे कोई कुछ बोल नहीं सकता।’’

पर आजीवन स्वस्थ अकबर की 63 वर्ष की आयु में आकस्मिक मौत हो गई। कुछ विवरणों में उसे जहर देने की बात मिलती है। यदि सच हो, तो तख्त के लिए शहजादे सलीम का षड्यंत्र भी संभव है। लेकिन उलेमा भी अकबर से बेहद रंज थे। सो, अकबर की मौत का कुछ भी कारण रहा हो सकता है।किन्तु यह संयोग नहीं कि जिस इबादतखाना और ‘अनूप तालाब’ के अनेक समकालीन विवरण तथा पेंटिगें मिलती हैं, आज सीकरी मे इन दोनों का नामो-निशान नहीं है! निस्संदेह, उसे ‘कुफ्र’ की निशानी मानकर बाद में उलेमा ने नष्ट करवाया। यह अकबर की विरासत पर कोलतार पोतने का अंग था। संयोगवश वे मुल्ला बदायूँनी की लिखी गोपनीय डायरी की सभी प्रतियाँ नष्ट नहीं कर सके, जो बहुत बाद मिली थी।

उस जमाने के हिसाब से 1579-1605 ई. कोई छोटी अवधि नहीं, जो अकबर के इस्लाम से दूर हो जाने का काल था। उस दौरान अकबर ने जो किया, उस के अध्ययन के बजाए छिपाने का काम अधिक हुआ। ताकि इस पर पर्दा पड़ा रहे कि भारत के तमाम मुस्लिम शासकों में जो सब से प्रसिद्ध हुआ, वह बाद में मुसलमान ही नहीं रहा।कई बार अकबर से मिलने वाले गोवा के पादरी फादर जेवियर ने लिखा है कि अकबर इस्लाम छोड़कर कोई हिन्दू/देशी संप्रदाय (जेन्टाइल सेक्ट) स्वीकार कर चुका था। पुर्तगाली जेसुइटों ने अलग-अलग बातें लिखी हैं। किसी के अनुसार वह ईसाई हो गया था, तो किसी के अनुसार वह हिन्दू बन गया था। किन्तु अकबर के इस्लाम छोड़ने की बात कई विवरणों में एक जैसी मिलती है।

अकबर ने अपने बेटे को लिखे पत्रों में कर्म-फल और आत्मा के पुनर्जन्म सिद्धांत को तर्कपूर्ण और विश्वसनीय बताया था। उस ने शहजादे मुराद को पढ़ने के लिए ‘महाभारत’ का अनुवाद भेजा था। अबुल फजल की अकबरनामा के अनुसार अकबर को अपने जिहादी अतीत पर पश्चाताप भी था।चूँकि अकबर की मृत्यु अस्वभाविक हुई, इसलिए कहना कठिन है कि यदि वह और जीवित रहता तो उस की विरासत क्या होती। पर निस्संदेह वह इस्लाम-विरुद्ध होती। इसीलिए, सारे उलेमा अकबर से चिढ़ते हैं। उन्हें सच अधिक मालूम है, हिन्दुओं को कम। क्योंकि यहाँ सेक्यूलर-वामपंथी प्रचारकों ने अकबर को ‘मुगल शासन’ की उदारता का प्रतीक बनाने की जालसाजी की है।

अतः जावेद अख्तर को समझना चाहिए कि अकबर की महानता हमारे लिए बेमानी है। जैसे पीटर महान या नेपोलियन बोनाप्राट की महानता भारत के लिए प्रसंगहीन है। वे दूसरे देशों के इतिहास के अंग हैं। उसी तरह, अकबर भी किसी विदेशी समाज के इतिहास का हिस्सा है। हमारे लिए यही स्मरणीय है कि चाहे उसे युद्ध-क्षेत्र में हिन्दू पहले नहीं हरा सके, किन्तु यहाँ के मामूली ब्राह्मणों ने उस के मतवाद को उस के सामने ध्वस्त कर दिया था। अकबर की यही विरासत भारतीय मुसलमानों के लिए भी विचारणीय है!

  • डॉ.शंकर शरण (१९ मई २०२०)

http://www.nayaindia.com

Posted in हिन्दू पतन

गोपाल गोडसे अक्सर कहा करते थे कि यहूदियों को अपना राष्ट्र पाने के लिये 1600 वर्ष लगे, हर वर्ष वे कसम खाते थे कि “अगले वर्ष यरुशलम हमारा होगा…”

गत कुछ वर्षों से गोड़से की विचारधारा के समर्थन में भारत में लोगों की संख्या बढ़ी है, जैसे-जैसे लोग नाथूराम और गाँधी के बारे में विस्तार से जानते हैं, उनमें गोडसे धीरे-धीरे एक “आइकॉन” बन रहे हैं। वीर सावरकर जो कि गोडसे और आपटे के राजनैतिक गुरु थे, के भतीजे विक्रम सावरकर कहते हैं, कि उस समय भी हम हिन्दू महासभा के आदर्शों को मानते थे, और “हमारा यह स्पष्ट मानना है कि गाँधी का वध किया जाना आवश्यक था…”, समाज का एक हिस्सा भी अब मानने लगा है कि नाथूराम का वह कृत्य सही था। हमारे साथ लोगों की सहानुभूति है, लेकिन अब भी लोग खुलकर सामने आने से डरते हैं…।

डर की वजह भी स्वाभाविक है, गाँधी की हत्या के बाद कांग्रेस के लोगों ने पूना में ब्राह्मणों पर भारी अत्याचार किये थे, कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने संगठित होकर लूट और दंगों को अंजाम दिया था, उस वक्त पूना पहली बार एक सप्ताह तक कर्फ़्यू के साये में रहा। बाद में कई लोगों को आरएसएस और हिन्दू महासभा का सदस्य होने के शक में जेलों में ठूंस दिया गया था (कांग्रेस की यह “महान” परम्परा इंदिरा हत्या के बाद दिल्ली में सिखों के साथ किये गये व्यवहार में भी दिखाई देती है)।

गोपाल गोडसे की पत्नी श्रीमती सिन्धु गोडसे कहती हैं, “वे दिन बहुत बुरे और मुश्किल भरे थे, हमारा मकान लूट लिया गया, हमें अपमानित किया गया और कांग्रेसियों ने सभी ब्राह्मणों के साथ बहुत बुरा सलूक किया… शायद यही उनका गांधीवाद हो…”।

सिन्धु जी से बाद में कई लोगों ने अपना नाम बदल लेने का आग्रह किया, लेकिन उन्होंने दृढ़ता से इन्कार कर दिया। “मैं गोडसे परिवार में ब्याही गई थी, अब मृत्यु पर्यन्त यही मेरा उपनाम होगा, मैं आज भी गर्व से कहती हूँ कि मैं नाथूराम की भाभी हूँ…”।

चम्पूताई आपटे की उम्र सिर्फ़ 14 वर्ष थी, जब उनका विवाह एक स्मार्ट और आकर्षक युवक “नाना” आपटे से हुआ था, 31 वर्ष की उम्र में वे विधवा हो गईं, और एक वर्ष पश्चात ही उनका एकमात्र पुत्र भी चल बसा। आज वे अपने पुश्तैनी मकान में रहती हैं, पति की याद के तौर पर उनके पास आपटे का एक फ़ोटो है और मंगलसूत्र जो वे सतत पहने रहती हैं, क्योंकि नाना आपटे ने जाते वक्त कहा था कि “कभी विधवा की तरह मत रहना…”, वह राजनीति के बारे में कुछ नहीं जानतीं, उन्हें सिर्फ़ इतना ही मालूम है गाँधी की हत्या में शरीक होने के कारण उनके पति को मुम्बई में हिरासत में लिया गया था। वे कहती हैं कि “किस बात का गुस्सा या निराशा? मैं अपना जीवन गर्व से जी रही हूँ, मेरे पति ने देश के लिये बलिदान दिया था।

Cpd

Posted in हिन्दू पतन

देवी सिंग तोमर

एक जमाना था कानपुर की कपड़ा मिल विश्व प्रसिद्ध थीं
कानपुर को ईस्ट का मैन्चेस्टर बोला जाता था. लाल इमली जैसी फ़ैक्टरी के कपड़े प्रेस्टीज सिम्बल होते थे. वह सब कुछथा जो एक औ द्योगिक शहर में होना चाहिए. मिल का साइरन बजते ही लाखों मज़दूर साइकिल पर सवार टिफ़िन लेकर फ़ैक्टरी की ड्रेस में मिल जाते.
बच्चे स्कूल जाते. पत्नियाँ घरेलू कार्य करतीं. और इन लाखों मज़दूरों के साथ ही लाखों सेल्स man, मैनेजर, क्लर्क सबकी रोज़ी रोटी चल रही थी.

फ़िर कॉम्युनिस्ट की कुत्सित निगाहें कानपुर पर पड़ीं. आठ घंटे मेहनत मज़दूर करे और गाड़ी से मालिक चले. ढेरों हिंसक घटनाएँ हुईं
मिल मालिकों को मारा पीटा भी गया. नारा दिया गया काम के घंटे चार करो, बेरोज़गारी को दूर करो
. अलाली किसे नहीं अच्छी लगती है. ढेरों मिडल क्लास भी कॉम्युनिस्ट समर्थक हो गया. मज़दूरों को आराम मिलना चाहिए, ये उद्योग खून चूसते हैं.
कानपुर में कॉम्युनिस्ट सांसद बनी सुभाशिनी अली

अंततः वह दिन आ ही गया जब कानपुर के मिल मज़दूरों को मेहनत करने से छुट्टी मिल गई. मिलों पर ताला डाल दिया गया.
मिल मालिक आज पहले से शानदार गाड़ियों में घूमते हैं, उन्होंने अहमदाबाद में कारख़ाने खोल दिए. कानपुर की मिल बंद होकर भी ज़मीन के रूप में उन्हें अरबों देगी.
वो 8 घंटे यूनफ़ॉर्म में काम करने वाला मज़दूर बारह घंटे रिक्शा चलाने पर विवश हुआ. वह स्कूल जाने वाले बच्चे कबाड़ी बीनने लगे.
और वो मध्यम वर्ग जिसकी आँखों में खून उतरता था मज़दूर को काम करता देख, अधिसंख्य को जीवन में दुबारा कोई नौकरी ना मिली.
एक बड़ी जन संख्या ने अपना जीवन बेरोज़गार रहते हुवे डिप्रेसन में काटा.

कॉम्युनिस्ट अफ़ीम बहुत घातक होती है
उन्हें ही सबसे पहले मारती है, जो इसके चक्कर में पड़ते हैं
. दो क्लास के बीच पहले अंतर दिखाना, फ़िर इस अंतर की वजह से झगड़ा करवाना और फ़िर दोनों ही क्लास को ख़त्म कर देना कॉम्युनिज़म का बेसिक प्रिन्सिपल है

इन दिनों मज़दूर पलायन विषय पर ढेरों कुतर्क सुन रहा हूँ
प्रायः यह कुतर्क दसकों से चली आ रही सोसलिस्ट व्यवस्था की थिंकिंग की वजह से हैं
यदि आप द्रवित हैं तो उनकी मदद करें, यह मानवता है. बाक़ी जब तक दुनिया चलेगी सदैव क्लासेज़ ओफ़ पीपल रहेगा ही
. वो वामपंथी अजेंडा में फँस हवाई जहाज़ में चलने वाले बनाम कार में चलने वाले बनाम सूटकेस में चलने वाले जैसी बातों के सूतियापे में ना फँसे. यह आप ही के लिए घातक है

Posted in हिन्दू पतन

बेनी हिन्


देवी सिंह तोमर

हमने लिखने में 35 मिनट खर्च किया है उम्मीद है आप पढ़ने में 3 मिनट जरूर दे सकते हैं।

आप में से शायद कई लोगों ने #बेनी_हिन् का नाम पहले कभी नहीं सुना होगा, क्यूँकि हम अधिकतर वही सुनना और देखना पसंद करते हैं जो हमें दिखाया जाता है..
उसके आगे न हम देखना चाहते हैं और
न हमें उससे कुछ मतलब है…अपनी जिन्दगी चलती रहे, भाड़ में जाए दुनियादारी…
हमें PK दिखाई गई, हमें ‘ओह माय गॉड’ दिखाई गईं, हम खुश रहें और हमने इन पिक्चरों को सुपरहिट बना दिया…

1995-1996 के समय भारत में #Faith_Healing के नाम पर दो बड़े शहर दिल्ली और बेंगलोर में एक अनूठे शो का आयोजन किया गया ;
आयोजन भी कोई छोटा-मोटा नहीं, बेंगलोर सहित कर्नाटक में तत्कालीन मुख्यमंत्री #देवेगोड़ा की सरकार ने तथा दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री #नरसिम्हा राव की सरकार ने इसका जबरदस्त प्रचार-प्रसार किया…

शो में Faith-Healer के रूप में जीसस के दूत-
बेनी हिन् आया और मंच पर कई-कई गंभीर बीमारियों वाले मरीजों को बेनी हिन् ने हाथ रखते से ही एकदम ठीक कर दिया…

● बंगलोर के शो में तो कर्नाटक का मुख्यमंत्री देवगोडा बेनी हिन् के पैरों में गिर गया था ।

कई मरीज स्टेज पर आये, किसी को ब्लड कैंसर था, किसी को आर्थराइटिस था, कोई जन्म से ही विकलांग था तो कोई ब्रेन-ट्यूमर के कारण परेशान था…यह सारे मरीज बेनी हिन् द्वारा अमेरिका से इम्पोर्ट किये गये थें…
और जैसे ही बेनी हिन् का हाथ लगता है, चमत्कार होता है और विकलांग चलने लगता है, जिसे आर्थराइटिस थी उसके पैरों का दर्द गायब हो जाता है, ट्यूमर वाले को अपना सिर कुछ हल्का सा लगने लगता है…
सारा जनसमूह बेनी हिन् के चमत्कारों ( दिखावे ) से अचम्भित हो जाता है और लगातार तालियों से उसका उत्साहवर्धन करता है… बेनी-हिन् अंतिम समय में लोगों से कहता है कि आपको कोई डाउट या समस्या हो तो आप पूछ सकते हैं…तभी…
भीड़ में से एक व्यक्ति खड़ा होता है और सवाल पूछने की अनुमति चाहता है…

बेनी हिन् – आपका नाम क्या है #Jesus_boy…?
व्यक्ति – मेरा नाम “#राजीव_दीक्षित” है और मैं कोई Jesus-boy नहीं, मैं एक सनातनी #हिन्दू हूँ…
बेनी हिन् – अपना सवाल पूछिए, क्या आपको भी कोई बीमारी अथवा समस्या है…?
व्यक्ति – जी नहीं, मुझे कोई बीमारी नहीं है…
पर आपके #ईसाई धर्म ( तथाकथित ) का जो दुनिया का सबसे बड़ा अधिकारी है पॉप, उसे दुनिया की सबसे खतरनाक बीमारी है #पार्किन्सन, तो मेरी आपसे प्रार्थना है कि उसकी बीमारी दुनिया के बड़े से बड़े डॉक्टर ठीक नहीं कर पा रहे हैं तो आप अगली फ्लाइट पकड़ कर सीधा #वैटिकन सिटी जाइए और सबसे पहले अपने पॉप पर हाथ रखकर उसे ठीक कीजिये…
बेनी हिन् – This is an Absurd question, यह एक बेहूदा सवाल है…
व्यक्ति – हाँ, यह बेहूदा सवाल है, पर मेरे लिए नहीं आपके लिए…
यदि आप किसी को भी केवल हाथ लगाकर ठीक कर सकते हो तो सबसे पहले पॉप को ठीक करो जिससे आपको अपने ईसाई धर्म ( तथाकथित ) को फ़ैलाने और आगे बढाने में मदद मिलेगी…।।

सारे शो में उथल-पुथल मच गई, लोग बेनी हिन् को फर्जी-फर्जी चिल्लाकर इधर उधर भागने लगें और उस दिन उस राजीव दीक्षित नाम के व्यक्ति ने कई हज़ार हिन्दुओं को एक झटके में ईसाई बनने से बचा लिया…
उस शो के बाद भी बेनी हिन् के कई शो हुए, पर हर जगह राजीव दीक्षित जैसे व्यक्ति का होना मुश्किल होता है, उस शो के बाद बेनी हिन् के बहकावे में आकर कई लोग अपना धर्म छोड़ Faith-Healing के नाम पर ईसाई बन गएं…हमारे भारत में कई अंधश्रद्धा-निर्मूलन संस्थाएं चलती हैं जिनका एक ही उद्देश्य रहता है कि हिन्दू धर्म के संत, हिन्दू धर्म के शंकराचार्य, हिन्दू धर्म के पंडित जो कुछ करें उसे अंधश्रद्धा घोषित कर उसका विरोध करो… और दूसरे धर्म के प्रचारक कितनी भी अंधश्रद्धा फैलाएं, कितने भी Faith-Healing जैसे शो करें पर उनका कोई भी विरोध, उनके Rules के खिलाफ रहता है…
हिन्दू धर्म के कर्मकांडों का मजाक उड़ाने भारत में PK जैसी फिल्में बनाई जाती हैं और दुर्भाग्यवश हम सब के कारण वो भारत की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन जाती है…
हम मूर्खता में आकर इतने अंधे हो जाते हैं कि हमें गौमाता को घास खिलाना तक ‘Wrong Number’ दिखाई देने लगता है…
बेनी हिन् आज हार्ट की बीमारी के चलते कई अस्पतालों से इलाज करवा रहा है और 1995 के उस शो से लेकर आज तक जितने
लोग भारत में उसके Faith-Healing नामक झांसे का शिकार बन उसके द्वारा ईसाई बने, वो आज अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे हैं।
इसीलिए मैं आप सभी बन्धुओं से ये निवेदन करता हूँ कि अपना धर्म कभी न त्यागें।
और सदैव अपने साधु-संतों की इज़्ज़त करें।।

1 शेयर कर दें तो लिखना सार्थक हो जाये🙏