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👉 ” पहले इन्सान बनो फिर हिन्दू , इंसानियत पहले धर्म बाद में ” 👈

यह तोते की तरह रटा हुआ बोल, धर्म के लक्षण से अपरिचित लोगों को धोखा देने वाला हैं ।

” इंसानियत ” से जो मनुष्योचित गुणावली अभिप्रेत है , शास्त्र में वह गुणावली धर्मलक्षण के अन्तर्गत कही गयी ।

अतः इसकी अंतर्भुक्ति वैदिकधर्म में हो जाने से पहले इंसान और बाद में हिन्दू – यह कहना निरर्थक है ।

अहिंसा आदि गुण , सामान्यधर्म में अन्तर्भुक्त हैं और मनुष्यमात्र के लिए इसका अनुष्ठान करना कर्तव्य है –

धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌।। ~ मनुस्‍मृति ६.९२

।। जय श्री राम ।।

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: 🙏
•२००० square फीट के घर में
सिर्फ २०० फीट में हम रहते है । ….और

•बाकि के १८०० फीट में
हमारा अहंकार रहता है ॥
🙏
“वक्त” और “दौलत” के बीच का
सबसे बड़ा अंतर….

•आपको हर “वक्त” पता होता है कि
आपके पास कितनी “दौलत” है । ….लेकिन

•आप यह बिल्कुल भी नही जानते कि
आपके पास कितना ”वक्त”है ॥

🙏
•पायल हज़ारो रूपये में आती है,
पर पैरो में पहनी जाती है । ….और

•बिंदी 2 रूपये में आती है,
मगर माथे पर सजाई जाती है ॥

•इसलिए कींमत मायने नहीं रखती,
उसका मान मायने रखता हैं ॥

🙏
•एक किताबघर में पड़ी गीता और कुरान आपस में कभी नहीं लड़ते ।

•और जो उनके लिए लड़ते हैं वो
कभी उन दोनों को नहीं पढ़ते ॥

🙏
•नमक की तरह कड़वा ज्ञान देने वाला ही सच्चा मित्र होता है,
मीठी बात करने वाले तो चापलूस भी होते है ।

•इतिहास गवाह है की आज तक कभी नमक में कीड़े नहीं पड़े । ….और
•मिठाई में अक़्सर कीड़े पड जाया करते है ॥
🙏
•विज्ञान कहता है:
“जीभ पर लगी चोट
सबसे जल्दी ठीक होती है ।” ….और

•ज्ञान कहता है:
“जीभ से लगी चोट कभी ठीक नहीं होती … !!”

                       ~हरी ओउःम्🔔

संजय गुप्ता

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🐎🐎🐘🐘🐘🐘🐂🐂

अश्वं स्नातं गजं मत्तं वृषभं काममोहितं |
शूद्रमक्षरसंयुक्तं दूरतः परिवर्जयेत् ||
🌝🌝🌝🌝🌝🌝🌝🌝
नहलाया हुआ घोडा, मदमत्त हाथी, काममोहित सांड तथा
कम पढा लिखा शूद्र, इन सभी से सदैव दूरी बना कर बचना चाहिये (क्यों कि इनके व्यवहार का पूर्वानुमान नहीं किया जा सकता है )|
🌚🌚🌚🌚🌚🌚🌚
One should always keep a safe distance from a bathed horse, a drunken elephant, sexually aroused bull and a lowly person who is educated but mean minded.
(because their behaviour is always unpredictable)*

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।।श्रीमते रामानुजाय नमः।।

मातृ देवो भव

ममतामयी माँ

“मातृ देवो भव।”

–तैत्तिरीयोप0 शिक्षावल्ली, अनुवाक-11

नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया ।।

–महाभारत ,शांतिपर्व, 266/31

माता के तुल्य कोई छाया नहीं है, माता के तुल्य कोई सहारा नहीं है। माता के सदृश कोई रक्षक नहीं है तथा माता के समान कोई प्रिय वस्तु नहीं है।

न च शोचति नाप्येनं स्थाविर्यमपकर्षति ।
श्रिया हीनोऽपि यो गेहमम्बेति प्रतिपद्यते ।।

–महाभारत ,शांतिपर्व,266/27

माता के रहते मनुष्य को कभी चिंता नहीं होती ,बुढापा उसे अपनी और नहीं खींचता । जो अपनी माँ को पुकारता हुआ घर में आता है ,वह निर्धन होने पर भी मानो माता अन्नपूर्णा के पास चला जाता है ।

समर्थ वासमर्थ वां कृशं वाप्यकृशं तथा ।
रक्षत्येव सुतं माता नान्यः पोष्टा विधानतः ॥

–महाभारत ,शांतिपर्व,266/29

पुत्र असमर्थ हो या समर्थ, दुर्बल हो या बलवान माता उसका पालन करती ही है । माता के सिवा कोई दुसरा विधिपूर्वक पुत्र का पालन नहीं कर सकता ।

‘मातृलाभे सनाथत्वमनाथत्वं विपर्यये ।’

– महाभारत ,शांतिपर्व,266/26

जब तक माता जीवित रहती है ,मनुष्य सनाथ रहता है और उसके न रहने परवह अनाथ हो
जाता है ।

–जय श्रीमन्नारायण।

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शेते सुखं कस्तु समाधिनिष्ठो,
जागर्ति को वा सदसद्विवेकी ।
के शत्रव: सन्ति निजेन्द्रियाणि,
तान्येव मित्राणि जितानि यानि ॥

कौन सुख से सोता है?  – वही व्यक्ति जो परमात्मा के स्वरुप में स्थित है ।
कौन जागता है? – जिसको सत् और असत् का ज्ञान है ।शत्रु कौन है? – अपनी इन्द्रियां । परन्तु यदि वश में रक्खी जाय तो वही मित्र का काम करती है ।
॥ॐ॥

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या लोभाद्या परद्रोहात् यः पात्रे यः परार्थके ।
प्रीतिर्लक्ष्मीव्ययः क्लेशः सा किं सा किं स किं स किम् ॥

लोभ से की हो वह क्या प्रीति है ? द्रोह से पायी हो वह क्या लक्ष्मी है ? सत्पात्र के लिए किया हो वह क्या खर्च है ? परार्थ के लिए किया हो वह क्या क्लेश है ?
॥ॐ॥