Posted in सुभाषित - Subhasit

સુખ અને દુઃખ


એક જોકરે લોકોને એક જોક્સ કીધો,લોકો ખૂબ હસ્યા…


ફરીથી જોકરે એ જ જોક્સ પાછો કીધો,ત્યારે થોડા ઓછા લોકો હસ્યા…


વળી પાછો એ જ જોક્સ કીધો ત્યારે કોઇ પણ ના હસ્યુ…


ત્યારે એ જોકરે ખૂબ સરસ વાત કીધી કે


“જો તમે એક ખૂશીને લીધે વારંવાર હસી સકતાં નથી,તો પછી


તમે એક જ દુઃખને લઇને વારંવાર કેમદુઃખ થાવ છો???

Posted in पुस्तकालय, सुभाषित - Subhasit

યક્ષ અને યુધિષ્ઠિર


મનુષ્યનુ” કર્તવ્ય શું હોઈ શકે એનો ખોધ આપનારા અનેક
ગ્રંથો છે. તેમાંય પાંચમા વેદ તરીકે ઓળખાતા “ મહાભારત’ નુ
સ્થાન વિશ્વના સાહિત્યમાં અનુપમ છે એ સર્વને વિદિત છે. આ
ગ્રંથમાં ઇતિહાસ, તત્વજ્ઞાન, વિજ્ઞાન, ધર્મશાસ્ર અને ચુદ્ધનીતિનાં
દર્શન થાય છે. મહષિ વેદવ્યાસકેર્ણુત આ ગ્રથનાં અઢાર પર્વે-
માંના વનપવ“માં આવેલા .આરણ્યેયપવના અષ્યાય ૩૧૧થી ૩૧૪
એમ ચાર અધ્યાયોમાં યક્ષ તે યુધિછિરિનો પ્રસગ બહુ જ સુંદર્‌ રીતે
ર્વણવવામાં આવ્યો છે.

યક્ષે યુધિષ્રિતે પૃછેલા ૧૨૪ પ્રશ્ચો પહેલી દ્એરષ્ટીએ સામાન્ય
કોટીના જણુય છે, પણુ તે અત્યત ગૂઢ રહસ્થીય થી ભરપૂર છે.
મહાખુદ્ધિમાન અને ધર્મજ્ઞ યુધિષ્ઠિર અતિ વિસક્ષણુતાથી એ પ્રશ્નોના
ઉત્તરો ધીર અને સ્થિર ચિત્તે આપે છે, લૌકિક વ્યવહાર સાથે
સંબંધ ધરાવતા આ પ્રશ્નો અધ્યાત્મ જ્ઞાનનું દર્શન કરાવે છે.
યુધિષિરનાં જ્ઞાન અને ધર્ધમ ની કસોટીરૂપ આ ઉત્તરો સદા મનન
કરવા યોગ્ય છે.

સસ્તું સાહિત્ય નું આ પુસ્તક વાચવા યોગ્ય છે.

यक्ष – युधिष्ठिर संवाद (धर्म ही मानव की रक्षा करता है)

स्थल – अजगरा रानीगंज, प्रतापगढ़, उत्तरप्रदेश, भारत 🇮🇳

कृप्या शांत चित्त हो पूरा पढें और धर्म रक्षा में अग्रसर बने।

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●यक्ष प्रश्न : कौन हूं मैं?

◆युधिष्ठिर उत्तर : तुम न यह शरीर हो, न इन्द्रियां, न मन, न बुद्धि। तुम शुद्ध चेतना हो, वह चेतना जो सर्वसाक्षी है।

■ टिप्पणी : व्यक्ति को खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि मैं कौन हूं। क्या शरीर हूं जो मृत्यु के समय नष्ट हो जाएगा? क्या आंख, नाक, कान आदि पांचों इंद्रियां हूं जो शरीर के साथ ही नष्ट हो जाएंगे? तब क्या में मन या बुद्धि हूं। अर्थात मैं जो सोचता हूं या सोच रहा हूं- क्या वह हूं? जब गहरी सुषुप्ति आती है तब यह भी बंद होने जैसा हो जाता है। तब मैं क्या हूं? व्यक्ति खुद आंख बंद करके इस पर बोध करे तो उसे समझ में आएगा कि मैं शुद्ध आत्मा, चेतना और सर्वसाक्षी हूं। ऐसा एक बार के आंख बंद करने से नहीं होगा।

●यक्ष प्रश्न: जीवन का उद्देश्य क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: जीवन का उद्देश्य उसी चेतना को जानना है जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है। उसे जानना ही मोक्ष है।

■टिप्पणी : बहुत से लोगों का उद्देश्य धन कमाना हो सकता है। धन से बाहर की समृद्धि प्राप्त हो सकती है, लेकिन ध्यान से भीतर की समृद्धि प्राप्त होती है। मरने के बाद बाहर की समृद्धि यहीं रखी रह जाएगी लेकिन भीतर की समृद्धि आपके साथ जाएगी। महर्षि पतंजलि ने मोक्ष तक पहुंचने के लिए सात सीढ़ियां बता रखी है:- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान। ध्यान के बाद समाधी या मोक्ष स्वत: ही प्राप्त होता है।

●यक्ष प्रश्न: जन्म का कारण क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: अतृप्त वासनाएं, कामनाएं और कर्मफल ये ही जन्म का कारण हैं।

■टिप्पणी : जन्म लेना और मरना एक आदत है। इस आदत से छुटकारा पाने का उपाय उपनिषद, योग और गीता में पाया जाता है। वासनाएं और कामनाएं अनंत होती है। जब तक यह रहेगी तब तक कर्मबंधन होता रहेगा और उसका फल भी मिलता रहेगा। इस चक्र को तोड़ने वाला ही जितेंद्रिय कहलाता है।

●यक्ष प्रश्न: जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त कौन है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: जिसने स्वयं को, उस आत्मा को जान लिया वह जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है।

■टिप्पण : मैं कौन हूं और मेरा असली स्वरूप क्या है। इस सत्य को जानने वाला ही जन्म और मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। यह जानने के लिए अष्टांग योग का पालन करना चाहिए।

●यक्ष प्रश्न:- वासना और जन्म का सम्बन्ध क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर:- जैसी वासनाएं वैसा जन्म। यदि वासनाएं पशु जैसी तो पशु योनि में जन्म। यदि वासनाएं मनुष्य जैसी तो मनुष्य योनि में जन्म।

■टिप्पणी : वासना का अर्थ व्यापक है। यह चित्त की एक दशा है। हम जैसा सोचते हैं वैसे बन जाते हैं। उसी तरह हम जिस तरह की चेतना के स्तर को निर्मित करते हैं अगले जन्म में उसी तरह की चेतना के स्तर को प्राप्त हो जाते है। उदाहरणार्थ एक कुत्ते के होश का स्तर हमारे होश के स्तर से नीचे है लेकिन यदि हम एक बोतल शराब पीले तो हमारे होश का स्तर उस कुत्ते के समान ही हो जाएगा। संभोग के लिए आतुर व्यक्ति के होश का स्तर भी वैसा ही होता है।

●यक्ष प्रश्न: संसार में दुःख क्यों है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: संसार के दुःख का कारण लालच, स्वार्थ और भय हैं।

■टिप्पणी : लालच का कोई अंत नहीं, स्वार्थी का कोई मित्र नहीं और भयभीत व्यक्ति का कोई जीवन नहीं। भय से ही सभी तरह के मानसिक विकारों का जन्म होता है। कई दफे लालच मौत का कारण भी बन जाता है। लालच को बुरी बला कहा गया है। लालची व्यक्ति का लालच बढ़ता ही जाता है और वह अपन लालच के कारण ही दुखी रहता है।

स्वार्थी व्यक्ति तो सर्वत्र पाए जाते हैं। स्वार्थी आदमी स्वयं का उल्लू सीधा करने के लिए किसी की भी जान को भी दांव पर लगा सकते हैं। स्वार्थी के मन में ईर्ष्या प्रधान गुण होता है।

●यक्ष प्रश्न: तो फिर ईश्वर ने दुःख की रचना क्यों की?

◆युधिष्ठिर उत्तर: ईश्वर ने संसार की रचना की और मनुष्य ने अपने विचार और कर्मों से दुःख और सुख की रचना की।

■टिप्पणी : मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है। नकारात्मकता स्वत: ही आती है लेकिन सकारात्मक विचारों को लाना पड़ता है। लाने की मेहनत कोई नहीं करता है इसीलिए वह बुरे विचार सोचकर बुरे कर्मों में फंसता रहता है। बुरे कर्मों का परिणाम भी बुरा ही होता है।

●यक्ष प्रश्न: क्या ईश्वर है? कौन है वह? क्या वह स्त्री है या पुरुष?

◆युधिष्ठिर उत्तर: कारण के बिना कार्य नहीं। यह संसार उस कारण के अस्तित्व का प्रमाण है। तुम हो इसलिए वह भी है उस महान कारण को ही आध्यात्म में ईश्वर कहा गया है।

वह न स्त्री है न पुरुष।

■टिप्पणी : यह जगत या संसार ही इस बात का सबूत है कि ईश्‍वर है। उसके होने के बगैर यह हो नहीं सकता। जैसे शरीर के होने का सबूत ही ये है कि आत्मा है या तुम हो। तुम्हें (पढ़ने और लिखने वाले को) ही तो आत्मा कहा गया है। ईश्‍वर न तो पुरुष है और न स्त्री ‍उसी तरह जैसे कि आत्मा न तो स्त्री है और न पुरुष। स्त्री और पुरुष तो शरीर की भावना है। यदि आत्मा स्त्री जैसे शरीर में होगी तो वैसी भावना करेगी। जिस तरह जल, हवा और आत्मा का कोई आकार प्रकार नहीं होता लेकिन उन्हें जिस भी पात्र में समाहित किया जाता है वह वैसे ही हो जाते हैं।

●यक्ष प्रश्न: उसका (ईश्वर) स्वरूप क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: वह सत्-चित्-आनन्द है, वह निराकार ही सभी रूपों में अपने आप को स्वयं को व्यक्त करता है।

●यक्ष प्रश्न: वह अनाकार (निराकार) स्वयं करता क्या है?

◆युधिष्ठिर: वह ईश्वर संसार की रचना, पालन और संहार करता है।

●यक्ष प्रश्न: यदि ईश्वर ने संसार की रचना की तो फिर ईश्वर की रचना किसने की?

◆युधिष्ठिर उत्तर: वह अजन्मा अमृत और अकारण है।

●यक्ष प्रश्न: भाग्य क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: हर क्रिया, हर कार्य का एक परिणाम है। परिणाम अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है। यह परिणाम ही भाग्य है। आज का प्रयत्न कल का भाग्य है।

■टिप्पणी: बहुत से लोग भाग्यवादी होते हैं उनके लिए यह अच्छा जवाब है। भाग्य के भरोसे रहने वालों के मन में नकारात्मकता का जन्म भी होता है। बहुत से लोग जिंदगी भर इसी का दुख मनाते हैं कि हमारे भाग्य में नहीं था इसलिए यह हमें नहीं मिला। ऐसे लोग कभी सुखी नहीं रहते हैं। भाग्य के होने के बहुत सबूत इसलिए दिए जाते हैं क्योंकि वे लोग कर्म के सिद्धांत को अच्‍छे से समझते नहीं है।

●यक्ष प्रश्न: सुख और शान्ति का रहस्य क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: सत्य, सदाचार, प्रेम और क्षमा सुख का कारण हैं। असत्य, अनाचार, घृणा और क्रोध का त्याग शान्ति का मार्ग है।

■टिप्पणी : असत्य बोलकर व्यक्ति दुख, चिंता या तनाव में रहने लगाता है। बुरा व्यवहार करके भी व्यक्ति सुखी नहीं रह सकता। परिवार या किसी व्यक्ति के प्रति प्रेम नहीं है तो भी सुखी नहीं रह सकता। यदि किसी ने उसके साथ कुछ किया है तो क्षमा न करके उससे बदला लेने की भावना रखने पर भी वह सुखी नहीं रह सकता।

●यक्ष प्रश्न: चित्त पर नियंत्रण कैसे संभव है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: इच्छाएं, कामनाएं चित्त में उद्वेग उत्पन्न करती हैं। इच्छाओं पर विजय चित्त पर विजय है।

■टिप्पणी : इच्छाएं अनंत होती है। जिस तरह भोजन करने के बाद पुन: भूख लगती है उसी तरह एक इच्छा के पूरी होने के बाद दूसरी जाग्रत हो जाती है। वे इच्छाएं दुखदायी होती है जो उद्वेग उत्पन्न करती है। न भोग, न दमन, वरण जागरण। इच्छाओं के प्रति सजग रहकर ही उन पर विजय प्राप्त की जा सकती है।

●यक्ष प्रश्न: सच्चा प्रेम क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: स्वयं को सभी में देखना सच्चा प्रेम है। स्वयं को सर्वव्याप्त देखना सच्चा प्रेम है। स्वयं को सभी के साथ एक देखना सच्चा प्रेम है।

■टिप्पणी : किसी के प्रति संवेदना और करुणा का भाव रखना सच्चा प्रेम है। यदि आप अपने साथी की जगह खुद को रखकर सोचेंगे तो इसका अहसास होगा कि वह क्या सोच और समझ रहा है। वह भी आप ही की तरह एक निर्दोष आत्मा ही है। उसकी भी इच्‍छाएं, भावनाएं और जीवन है। वह भी अच्छा जीवन जीना चाहता है लेकिन लोग उसे जीने नहीं दे रहे हैं। कभी किसी के लिए त्याग करें। सभी को खुद के जैसा समझना या सभी को खुद ही समझने से ही प्रेम की भावना विकसित होगी। खुद से प्रेम करना सीखें।

●यक्ष प्रश्न: तो फिर मनुष्य सभी से प्रेम क्यों नहीं करता?

◆युधिष्ठिर उत्तर:. जो स्वयं को सभी में नहीं देख सकता वह सभी से प्रेम नहीं कर सकता।

●यक्ष प्रश्न: आसक्ति क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: प्रेम में मांग, अपेक्षा, अधिकार आसक्ति है।

●यक्ष प्रश्न: नशा क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: आसक्ति।

●यक्ष प्रश्न: मुक्ति क्या है?

◆युधिष्ठिर – अनासक्ति (आसक्ति के विपरित) ही मुक्ति है।

●यक्ष प्रश्न: बुद्धिमान कौन है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: जिसके पास विवेक है।

●यक्ष प्रश्न: चोर कौन है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: इन्द्रियों के आकर्षण, जो इन्द्रियों को हर लेते हैं चोर हैं।

●यक्ष प्रश्न: नरक क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: इन्द्रियों की दासता नरक है।

●यक्ष प्रश्न: जागते हुए भी कौन सोया हुआ है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: जो आत्मा को नहीं जानता वह जागते हुए भी सोया है।

●यक्ष प्रश्न: कमल के पत्ते में पड़े जल की तरह अस्थायी क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: यौवन, धन और जीवन।

●यक्ष प्रश्न: दुर्भाग्य का कारण क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: मद और अहंकार।

●यक्ष प्रश्न: सौभाग्य का कारण क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: सत्संग और सबके प्रति मैत्री भाव।

●यक्ष प्रश्न: सारे दुःखों का नाश कौन कर सकता है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: जो सब छोड़ने को तैयार हो।

●यक्ष प्रश्न: मृत्यु पर्यंत यातना कौन देता है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: गुप्त रूप से किया गया अपराध।

●यक्ष प्रश्न: दिन-रात किस बात का विचार करना चाहिए?

◆युधिष्ठिर उत्तर: सांसारिक सुखों की क्षण-भंगुरता का।

●यक्ष प्रश्न: संसार को कौन जीतता है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: जिसमें सत्य और श्रद्धा है।

●यक्ष प्रश्न: भय से मुक्ति कैसे संभव है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: वैराग्य से।

●यक्ष प्रश्न: मुक्त कौन है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: जो अज्ञान से परे है।

●यक्ष प्रश्न: अज्ञान क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: आत्मज्ञान का अभाव अज्ञान है।

●यक्ष प्रश्न: दुःखों से मुक्त कौन है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: जो कभी क्रोध नहीं करता।

●यक्ष प्रश्न: वह क्या है जो अस्तित्व में है और नहीं भी?

◆युधिष्ठिर उत्तर: माया।

●यक्ष प्रश्न: माया क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: नाम और रूपधारी नाशवान जगत।

●यक्ष प्रश्न: परम सत्य क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: ब्रह्म।…!

●यक्ष प्रश्नः सूर्य किसकी आज्ञा से उदय होता है?

◆युधिष्ठिर उत्तरः परमात्मा यानी ब्रह्म की आज्ञा से।

■टिप्पणी : हिन्दू धर्म में ईश्वर को ‘ब्रह्म’ (ब्रह्मा नहीं) कहा गया है। ब्रह्म ही सत्य है ऐसा वेद, उपनिषद और गीता में लिखा है। सूर्य को वेदों में जगत की आत्मा माना गया है। अरबों सूर्य है। ब्रह्मांड में जितने भी तारे हैं वे सभी सूर्य ही हैं। सूर्य के बगैर जगत में जीवन नहीं हो सकता।

●यक्ष प्रश्नः किसी का ब्राह्मण होना किस बात पर निर्भर करता है? उसके जन्म पर या शील स्वभाव पर?

◆युधिष्ठिर उत्तरः कुल या विद्या के कारण ब्राह्मणत्व प्राप्त नहीं हो जाता। ब्राह्मणत्व शील और स्वभाव पर ही निर्भर है। जिसमें शील न हो ब्राह्मण नहीं हो सकता। जिसमें बुरे व्यसन हों वह चाहे कितना ही पढ़ा लिखा क्यों न हो, ब्राह्मण नहीं होता।

●यक्ष प्रश्नः मनुष्य का साथ कौन देता है?

◆युधिष्ठिर उत्तरः धैर्य ही मनुष्य का साथी होता है।

■टिप्पणी : अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना ही धैर्य है। कुछ लोग बगैर विचार किए हुए बोलते, सोचते, कार्य करते, भोजन करते या व्यवहार करते हैं। उतावलापन यह दर्शाता है कि आप बुद्धि नहीं भावना और भावुकता के अधिन हैं। ऐसे लोग ‍जीवन में नुकसान ही उठाते हैं। किसी भी मामले में तुरंत प्रतिक्रिया देने के बदले में धैर्यपूर्वक उसे समझना जरूरी है।

●यक्ष प्रश्न: यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा कि स्थायित्व किसे कहते हैं? धैर्य क्या है? स्नान किसे कहते हैं? और दान का वास्तविक अर्थ क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: ‘अपने धर्म में स्थिर रहना ही स्थायित्व है। अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना ही धैर्य है। मनोमालिन्य का त्याग करना ही स्नान है और प्राणीमात्र की रक्षा का भाव ही वास्तव में दान है।’

●यक्ष प्रश्नः कौन सा शास्त्र है, जिसका अध्ययन करके मनुष्य बुद्धिमान बनता है?

◆युधिष्ठिर उत्तरः कोई भी ऐसा शास्त्र नहीं है। महान लोगों की संगति से ही मनुष्य बुद्धिमान बनता है।

टिप्पणी : ज्ञान शास्त्रों में नहीं होता- योगी, ध्यानी और गुरु के सानिध्य में होता है। शास्त्र पढ़ने वाले बहुत है, लेकिन समझने वाले बहुत कम। शास्त्रों को अनुभव से या अनुभवी से ही समझा जा सकता है। इसीलिए हमेशा आचार्यों, शिक्षकों, संतों की संगत या सत्संग में रहना चाहिए।

●यक्ष प्रश्नः भूमि से भारी चीज क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तरः संतान को कोख़ में धरने वाली मां, भूमि से भी भारी होती है।

■टिप्पणी : मां का कर्ज कभी ‍चुकाया नहीं जा सकता। हमें इस संसार में लाने वाली माता ही होती है। माता के प्रति किसी भी प्रकार से कटु वचन बोलने वाला कभी सुखी नहीं रहता। माता को हिन्दू धर्म में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।

●यक्ष प्रश्नः आकाश से भी ऊंचा कौन है?

◆युधिष्ठिर उत्तरः पिता।

■टिप्पणी : आकाश से भी ऊंचा पिता इसलिए होता है क्योंकि वह आपके लिए एक छत्र की भूमिका निभाता है। उसकी देखरेख और उसके होने के अहसास से ही आप खिलते हैं। आपके आकाश में खिलने में पिता की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

पिता क्या होता है और पिता क्या सोचता है यह पिता बनकर ही ज्ञात होता है। जो व्यक्ति अपने पिता की भावना को नहीं समझता है उसका पुत्र भी इसका अनुसरण करता है। पिता के वचनों की सत्यता और उनके प्रेम को व्यक्ति पिता बनने के बाद ही जान पाता है। वह पिता महान है जो अपने पुत्र-पुत्री के समक्ष आदर्श प्रस्तुत करता हो और उनके भीतर अपना संपूर्ण अनुभव डालता हो। पिता की सीख जिंदगी में हमेशा काम आती है लेकिन पिता सीख देने वाला भी होना चाहिए। आपकी जिंदगी में यदि पिता का कोई महत्व नहीं है तो आप ऊंचाइयों के सपने देखना छोड़ दें।

●यक्ष प्रश्नः हवा से भी तेज चलने वाला कौन है?

◆युधिष्ठिर उत्तरः मन।

■टिप्पणी : मन की गति निरंतर जारी है। इसकी गति को समझ पाना मुश्किल है। मन की गति से कहीं भी पहुंचे वाले देवी और देवताओं के बारे में हमने पढ़ा है। सिर्फ किसी स्थान के बारे में सोचकर ही वहां पहुंच जाते थे। हमारा मन भी यहां बैठे बैठे संपूर्ण धरती का एक क्षम में चक्कर लगा सकता है। मानव मन में 24 घंटे में लगभग साठ हजार विचार आते हैं।

●यक्ष प्रश्नः घास से भी तुच्छ चीज क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तरः चिंता।

●यक्ष प्रश्न : विदेश जाने वाले का साथी कौन होता है?

◆युधिष्ठिर उत्तरः विद्या।

●यक्ष प्रश्न : घर में रहने वाले का साथी कौन होता है?

◆युधिष्ठिर उत्तरः पत्नी।

●यक्ष प्रश्न : मरणासन्न वृद्ध का मित्र कौन होता है?

◆युधिष्ठिर उत्तरः दान, क्योंकि वही मृत्यु के बाद अकेले चलने वाले जीव के साथ-साथ चलता है।

●यक्ष प्रश्न : बर्तनों में सबसे बड़ा कौन-सा है?

◆युधिष्ठिर उत्तरः भूमि ही सबसे बड़ा बर्तन है जिसमें सब कुछ समा सकता है।

●यक्ष प्रश्न : सुख क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तरः सुख वह चीज है जो शील और सच्चरित्रता पर आधारित है।

●यक्ष प्रश्न : किसके छूट जाने पर मनुष्य सर्वप्रिय बनता है ?

◆युधिष्ठिर युधिष्ठिर उत्तरः अहंभाव के छूट जाने पर मनुष्य सर्वप्रिय बनता है।

●यक्ष प्रश्न : किस चीज के खो जाने पर दुःख होता है ?

◆युधिष्ठिर उत्तरः क्रोध।

●यक्ष प्रश्न : किस चीज को गंवाकर मनुष्य धनी बनता है?

◆युधिष्ठिर उत्तरः लालच को खोकर।

●यक्ष प्रश्न : काजल से भी काला क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: कलंक

●यक्ष प्रश्न : धरती पर अमृत क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तर: गौ दुग्ध (गाय का दूध)

■टिप्पणी : दूध जैसा पौष्टिक और अत्यन्त गुण वाला ऐसा अन्य कोई पदार्थ नहीं है। दूध जो मृत्युलोक का अमृत है। सभी दूधों में अपनी माँ का दूध श्रेष्ठ है और माँ का दूध कम पडा। वहाँ से गाय का दूध श्रेष्ठ सिद्ध हुआ है।

गाय का दूध धरती पर सर्वोत्तम आहार है।

गोदुग्ध मृत्युलोक का अमृत है। मनुष्यों के लिए शक्तिवर्धक, गोदुग्ध जैसा अमृत पदार्थ त्रिभुवन में भी अजन्मा है। गोदूध अत्यन्त स्वादिष्ट, स्निग्ध, कोमल, मधुर, शीतल,वाला, ओज प्रदान करने वाला, देहकांति बढाने वाला, सर्वरोग नाशक अमृत के समान है।

●यक्ष प्रश्न : संसार में सबसे बड़े आश्चर्य की बात क्या है?

◆युधिष्ठिर उत्तरः हर रोज आंखों के सामने कितने ही प्राणियों की मृत्यु हो जाती है यह देखते हुए भी इंसान अमरता के सपने देखता है। यही महान आश्चर्य है ।

जब युद्धिष्ठिर ने सारे प्रश्नों के उत्तर सही दिए तो फिर यक्ष ने क्या कहा…

युधिष्ठिर ने सारे प्रश्नों के उत्तर सही दिए अंत में यक्ष बोला, ‘युधिष्ठिर में तुम्हारे एक भाई को जीवित करूंगा। तब युधिष्ठिर ने अपने छोटे भाई नकुल को जिंदा करने के लिए कहा। लेकिन यक्ष हैरान था उसने कहा तुमने भीम और अर्जुन जैसे वीरों को जिंदा करने के बारे में क्यों नहीं सोचा।’

युधिष्ठिर बोले, मनुष्य की रक्षा धर्म से होती है। मेरे पिता की दो पत्नियां थीं। कुंती का एक पुत्र मैं तो बचा हूं। मैं चाहता हूं कि माता माद्री का भी एक पुत्र जीवित रहे। यक्ष उत्तर सुनकर काफी खुश हुए और सभी को जीवित कर महाभारत की जीत का वरदान देकर वह अपने धाम लौट गए।

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સંસ્કારી યુવાનો અને યુવતીઓએ આ મેસેજ વાંચી ને ખોટું લગાડવું નહી 😗

*( પણ જે લોકોમાં નીચે લખેલા અપલક્ષણો હોય તે લોકો માટે આ મેસેજ છે ) 😗

⁉️
આજનો યુવાન બુઢ્ઢો છે .
બુદ્ધિનો બુઠ્ઠો છે ..

માનવામાં નથી આવતું 😕

સવારે મોડું ઉઠવાનું..!
ઉઠતા વેંત જ હાથ માં-બાપના પૈસે ખરીદેલો મોબાઈલ લઇ પોતાના મિત્ર મંડળ સાથે Whats App માં ચોવટ કરવાની …

ન દાંત સાફ કરવા ..
ન નહાવા જવું ..
ન માતા પિતા સાથે વાત કરવી ..
અને આખો સમય મનમાં ખાંડ ખાવ છીએ કે અમે યુવાનો સ્માર્ટ છીએ …

પણ ભઈલા તારો મોબાઈલ સ્માર્ટ છે .
તું તો નથી જ …

તું તો ડોબો જ છે .
નથી તને દેશ- દુનિયાની ખબર ,
કે નથી પારિવારીક સમ્બંધોની ખબર ,
તું શાનો સ્માર્ટ છે બકા ?

અલ્યા મૂરખા ,
કાનમાં ઘોંઘાટ વાળું સંગીત સાંભળી સાંભળી ને તું માત્ર કાનથી નહિ ,
દિમાગથી પણ તું બેરો થઇ ગયો છે …

અલ્યા આખો દાડો મોબાઈલમાં ડાચું નાખી શું જોયા કરે છે .
તારા મા બાપ સામે તો જો કોઈ વાર!
બિચારા બાપે આખી જુવાની તને જુવાન કરવામાં ખર્ચી નાખી …

અલ્યા ડફોળ ,
તારો બાપ જાત ઘસતો અને તને હસતો જોઈ રાજી થતો ..
તારી મા:! જેણે જુવાનીમાં કદીયે કોઈ મોજ શોખ નથી કર્યા ,
કારણ એને તારા માટે રમકડા ખરીદવા હતા …

લાટ સાહેબ ,
21×3=63 થાય તે કહેવા તારે મોબાઈલનું કેલ્ક્યુલેટર વાપરવું પડે છે …

તું જેને પછાત સમજે છે ,
તે તારા મા બાપ સમય આવ્યે મોબાઈલ અને કોમ્પ્યુટર શીખવા પડે તો એ પણ શીખી લેશે …

ઘેલસાંગરા,
કસ્તુરબાને તું ગાંધીજીના બા સમજે છે અને ઈન્દીરા ગાંધીને ગાંધીજીના દીકરી છતાંય તને કોઈ વડીલ સલાહ આપે તો તારી કમાન છટકે છે …

પણ બકા ,
મેથી અને કોથમીર કોને કહેવાય:?
એ તું સાત વાર શાક લેવા જાય તો પણ શીખી નહિ શકે …

મકોડી પહેલવાન ,
બે માઈલ ચાલવામાં તને આળસ આવતું હતું અને પોકમોન ગો રમવામાં આખું ગામ મોબાઈલમાં મોં ઘાલીને ઘુમ્યે જાય છે …

અક્કલના બારદાન ,
માતૃભાષામાં “ઘ” અને “ધ” લખવાનો તફાવત તને ખબર નથી ..
“ઘર ને બદલે “ધર”
અને
“ધજા” ને બદલે “ઘજા” લખે છે ,
અને માં-બાપને અંગ્રેજી આવડતું નથી તેની ફરિયાદ કરે છે …

અલ્યા ગુગલીયા ,
“પાટલા સાસુ” કોને કહેવાય તેવું ગૂગલને પૂછવા કરતા કોઈ વડીલને પૂછ બધા સબંધ વાચક નામ તને તુરંતમાં સમજાવશે …

તારા મા બાપનો ફોન ભલે સ્માર્ટ નહિ હોય ,
પણ માબાપ પોતે ખૂબજ સ્માર્ટ છે ..

અને તારો ફોન સ્માર્ટ છે ,
પણ તું સ્માર્ટ નથી …

એટલે બકા ,
તોફાન કરવા રે’વા દે; અને છાનો માનો મા બાપ કહે એમ કર …

વાતવાતમાં માબાપને ઉતારી પાડવાથી તું ઉંચો નહિ આવે ભઈલા …

ઘરમાં જે સગવડો મળે છે એના માટે મા બાપનો આભાર માન ..
કારણ કે તને તારી લાયકાતથી વધારે તેઓ સુખ આપે છે …

અલ્યા ડફોળ ,
જરા સ્માર્ટ ફોન માંથી ડાચું બહાર કાઢ ,
અને જો તારા મા બાપ દિવસ રાત તારા માટે કેટલું લોહીનું પાણી કરે છે ..
તને જનમ આપ્યાની સજા પળે પળે તું એમને આપે છે …

બકા ,
કોઈ પણ મા બાપને કારમી સજા કરવી હોય તો ,
એક જ રીત છે મા બાપની ઈચ્છા વિરુદ્ધ જવુ …

ભઈલા ,
મા બાપ તને સુખી જોવા કદાચ તારી મુર્ખ વાતોને પણ માની જશે ,
પણ એની આંતરડી અંદરથી બળતી રહે …

‘જન્મદાતા’ , ‘અન્નદાતા’ , ‘જીવનદાતા’ ને દુભાવનાર કોઈ દિ ઠરતો નથી …

બકા જા ,
અને તારા સ્માર્ટ ફોનને બાજુમાં મૂકી થોડો વખત મા બાપ સાથ વાતો કર ..
કારણ કે કાલ કોણે જોઈ છે ??

(ડાયરા ની મોજ માં થી)

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ગુજરાતી સાહિત્યની રચનાઓ . . . વાંચવી ગમશે . . .
બે કે ત્રણ લીટી ઘણું કહી જાય છે . . .

૧. સ્વપ્ન એટલે . . .
તારા વગર , , ,
તને મળવું . . . !!

૨. ” એક નફરત છે ” , , ,
જે લોકો
” એક પળમાં સમજી ” જાય છે , , ,
અને
” એક પ્રેમ છે ” , , ,
જેને ” સમજવામાં વર્ષો “
નીકળી જાય છે . . . !!

૩. ક્યાંક તડકો દેખાય તો કહેજોને . . .
રૂ જેવી હલકી અને ભીંજાઇ ગયેલી
ગેરસમજોને સૂકવવી છે . . . !!

૪. સંબંધોની ક્યારેય પરીક્ષા ન લેશો , , ,
સામેવાળા નાપાસ થશે તો તમે જ દુઃખી થશો . . . !!

૫. શિયાળો એટલે
સતત કોઇની “હુંફ ” ઇચ્છતી
એક પાગલ ઋતુ . . . !!

૬. મળીએ ત્યારે , , ,
આંખમાં હરખ . . .
અને
અલગ પડતી વેળાએ
આંખમાં થોડી ઝાકળ . . . !!

૭. અમુક રાતે
તમને ઊંઘ નથી આવતી , , ,
અને
અમુક રાતે
તમે સુવા નથી માંગતા . . . !!

૮. વેદના અને આનંદ વચ્ચે
આ ફેર છે , , ,

ક્યાંક અઢળક પણ ઓછું પડે , , ,
અને
ક્યાંક એક સ્મિત અઢળક થઈ પડે . . . !!

૯. સાંભળ્યું છે કે પ્લે સ્ટોરમાં બધું જ મળે છે , , ,

ચાલો, વિખરાયેલા સંબંધો સર્ચ કરીએ . . . !!

૧૦. પ્રેમ અને મોતની પસંદગી તો જુઓ , , ,

એકને હૃદય જોઈએ , , ,
તો
બીજાને ધબકારા . . . !!

૧૧. મેડીક્લેઈમ તો આખા શરીરનો હતો , , ,
પણ
ખાલી દિલ તુટ્યું હતું , , ,
એટલે
ક્લેઈમ પાસ ન થયો . . . !!

૧૨. ગરમ ચા જેવા મગજને ઠંડું કરવાનો ઉપાય . . .?

પ્રેમની પહોળી રકાબીમાં એને રેડી દેવો . . . !!

🌷🌹 🌷🌹🌷 🌹🌷

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રોતલ રખવાળાં કરે, ભેંસ માંદળે નહાય;
નકટી આભૂષણ ધરે, એ ત્રણે અલેખે જાય.
.
દંભીજન ટીલાં કરે, હલક હામી થાય;
મેલો મંતર ભણે, એ ત્રણે એલેખે જાય.
.
માનુનિ મહિયર વસે, પરનારીનો પ્રેમ;
વેશ્યા વિઠ્ઠલને ભજે, એ ત્રણે અલેખે જાય.
.
રખડેલ રખવાળી કરે, વ્યંઢળ કરે વિવાહ;
ભોગી જોગી વેશ ધરે, એ ત્રણે અલેખે જાય.
.
સમુદ્રમાં વર્ષા પડે, રણમાં રોપે રોપ;
સ્વપ્નમાં સોનું મળે, એ ત્રણે અલેખે જાય.
.
અંધ ખરીદે આરસી, બહેરો વખાણે બોધ;
લલના લૂલી નાચ કરે, એ ત્રણે અલેખે જાય.
.
ભાવ વગર ભોજન કરે, પાત્ર વિનાનું દાન;
શ્રદ્ધાહીણ જે શ્રાદ્ધ કરે, એ ત્રણે અલેખે જાય.
.
તકરારીને વખત મળે, ઢાઢી કરે વખાણ;
ગરજવાન ગુસ્સો કરે, એ ત્રણે અલેખે જાય.
.
મુરખથી મસલત કરે, બીકણનો સંગાથ;
શત્રુ સાથે સરળતા, એ ત્રણે અલેખે જાય.
.
દેવ દરિયો ને દરબાર એ ત્રણ વિના પૈસો નહીં.
આધિ વ્યાધિ ને ઉપાધિ એ ત્રણ વિના દુખ નહીં.
જ્ઞાન, ભક્તિ ને વૈરાગ્ય એ ત્રણ વિના શાંતિ નહીં.
ઉત્ત્પત્તિ, સ્થિતિ અને પ્રલય એ ત્રણ વિના જગતના ખેલ નહીં.
.
સેગ, સરિયો ને પોપટો એ ત્રણ વિના ધાન્ય નહીં.
વા, ઘા ને ગહરકો એ ત્રણ વિના વાજું નહીં.
અણી, ધાર ને ધબાકો એ ત્રણ વિના હથિયાર નહીં.
ચાવવું, ચૂસવું નેસબડકો એ ત્રણ વિના ખાવાનું નહીં.
.
તાવ, તામસ ને તલાટી એ ત્રણ ગયા વિના સારા નહીં
વા’ણ, વિવાહ ને વરસાદ એ ત્રણ આવ્યા વિના સારા નહીં
ખંત, મહેનત ને બુદ્ધિ એ ત્રણ વિના વિધા નહીં.
જૂઠ, કરજ ને કપટ એ ત્રણ વિના દુઃખ નહીં.
.
બ્રહ્મા, વિષ્ણુ ને મહેશ એ ત્રણ વિના દેવ નહીં
વાત, પિત્ત ને કફ એ ત્રણ વિના રોગ નહીં
આદિ મધ્ય ને અંત એ ત્રણ વિના નાડી નહીં
જય, સમાધાની ને નાશ એ ત્રણ વિના અવધિ નહીં.
.
ગીધ, ગધેડો ને ઘૂવડ એ ત્રણ વિના અપશુકન નહીં
સ્વપ્ન, ચિત્ર ને સાક્ષાત્‌ એ ત્રણ વિના દર્શન નહીં
રજો, તમો અને સતો એ ત્રણ વિના ગુણ નહીં.
રાગ નાચ ને પૈસો એ ત્રણ વિના ગરજ નહીં.
.
ભૂત ભવિષ્ય અને વર્તમાન એ ત્રણ વિના કાળ નહીં
કુંવારી, સધવા ને વિધવા એ ત્રણ વિના સ્ત્રી નહીં.
સંતતિ, ક્રિયમાણ ને પ્રારબ્ધ એ ત્રણ વિના ક્રિયા નહીં
શ્વાસ, જ્ઞાન કે કામ એ ત્રણ જીવના આધાર વિના નહીં.
.
સુખ, જિંદગી ને માન એ ત્રણ વિના સંતોષ નહીં.
જર, જોરૂ ને જમીન એ ત્રણ વિના વઢવાડ નહીં.
અક્કલ, અમલ અને ડોળદમામ એ ત્રણ વિના કારભારુ નહીં.
વાચવું, લખવું ને શીખવું એ ત્રણ વિના બુદ્ધિના હથિયાર નહીં.
.
આળસ, રોગ ને સ્ત્રીની સેવા એ ત્રણ વિના મોટાઈ જાય નહીં.
કરજ, અગ્નિ ને રોગ એ ત્રણ વિના ખરાબી નહીં.
પૂછવું, જોવું ને દવા દેવી એ ત્રણ વિના વૈધું નહીં.
ક્રૂરતા, કૃપણતા ને કૃતજ્ઞતા એ ત્રણ વિના મોટું કષ્ટ નહીં.
.
માલ, ખજાનો ને જિંદગી એ ત્રણે રહેવાના નહીં.
અક્કલ, યકીન અને પ્રભુતા એ ત્રણ પૂરતા હોય નહીં.
વિધા, કળા ને ધન એ ત્રણ સ્વેદ વિના મળવાના નહીં
દુઃખ, દરિદ્રતા ને પરઘેર રહેવું એ ત્રણ વિના મોટું દુઃખ નહીં.
.
પાન, પટેલ ને પ્રધાન ત્રણ કાચા સારા નહીં.
નાર, ચાર ને ચાકરૂ એ ત્રણ પાકા સારા નહીં.
ડોશી, જોષી ને વટેમાર્ગુ એ ત્રણ વિના ફોગટિયા નહીં.
વૈધ, વેશ્યા ને વકીલ એ ત્રણ વિના રોકડિયા નહીં.
.
ઘંટી, ઘાણી ને ઉઘરાણી એ ત્રણ ફેરા ખાધા વિના પાકે નહીં.
દુર્ગુણ, સદગુણ ને વખત એ ત્રણ સ્થિર રહેવાના નહીં.
વિધા, હોશિયારી ને અક્કલ એ ત્રણ આળસુ પાસે જાય નહીં.
દેવનું વચન, વિધા ને ધરમ એ ત્રણ દરિદ્રી પાસે રહે નહીં.

ભીમા કેશવલાલ

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सोलह सुख


🐙 सोलह सुखों के बारे में सुना था तो जानिये क्या हैं वो सोलह सुख 🐙
**
1.पहला सुख निरोगी काया।
2.दूजा सुख घर में हो माया।
3.तीजा सुख कुलवंती नारी।
4.चौथा सुख सुत आज्ञाकारी।

5.पाँचवा सुख सदन हो अपना।
6.छट्ठा सुख सिर कोई ऋण ना।
7.सातवाँ सुख चले व्यापारा।
8.आठवाँ सुख हो सबका प्यारा।

9.नौवाँ सुख भाई और बहन हो ।
10.दसवाँ सुख न बैरी स्वजन हो।
11.ग्यारहवाँ मित्र हितैषी सच्चा।
12.बारहवाँ सुख पड़ौसी अच्छा।

13.तेरहवां सुख उत्तम हो शिक्षा।
14.चौदहवाँ सुख सद्गुरु से दीक्षा।
15.पंद्रहवाँ सुख हो साधु समागम।
16.सोलहवां सुख संतोष बसे मन।

सोलह सुख ये होते भाविक जन।
जो पावैं सोइ धन्य हो जीवन।। 🐙

हालांकि आज के समय में ये सभी सुख
हर किसी को मिलना मुश्किल है।
लेकिन इनमें से जितने भी सुख मिलें
उनसे खुश रहने की कोशिश करनी चाहिए।

जय जय श्री राम


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मित्र


मित्र

रामायण के अनुसार मित्र के गुणों का वर्णन

आज मित्रता दिवस होने के कारण मित्र कैसा होना चाहिये यह रामायण में उल्लेख आया है जब सुग्रीव और राम जी की मित्रता अग्नि को साक्षी मानकर हनुमान जी ने कराई थी उसी का विवरण नीचे दिया गया है ।

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी ।
तिन्हहि विलोकत पातक भारी।।
निज दुख गिरि सम रज कर जाना ।
मित्रक दुख रज मेरु समाना।।

अर्थात जो मित्र अपने मित्र के दुख को देख कर दुखी न हो उस मित्र को देखने से भी वड़ा पाप लगता है अपना दुख पर्वत के समान होने पर भी उसे रज (धूल )के समान समझना चाहिऐ,और मित्र का दुख रज (धूल) के समान भी हो तो उसे पर्वत के समान समझना चाहिऐ ।अर्थात मित्र के दुख का निराकरण पहिले करना चाहिऐ।अपने दुख का बाद मे ऐसा नही कि मित्र के सामने अपना दुख लेके बैठ जाऐं।

जिन्ह कें असि मति सहज न आई।
ते सठ कत हठि करत मिताई।।
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा।
गुण प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा।।

अर्थात जिन्हें स्वभाव से ही ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है वह मनुष्य हठ करके मित्रता क्यों करते हैं ऐसे व्यक्ति मित्रता करने के अधिकारी नहीं है ।मित्र का धर्म है कि मित्र को गलत रास्ते पर जाने से रोके और उसे अच्छे मार्ग पर ले जाऐ।सदा ही मित्र के गुणों को प्रकट करे और मित्र में जो अवगुण हो वह दूसरों के सामने छुपाऐ।

देत लेत मन शंक न धरई।
वल अनुमान सदा हित करई।।
बिपति काल कर सतगुन नेहा।
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।।

अर्थात मित्र को देते समय या लेते समय मन में शंका नही आना चाहिऐ।जैसे मित्र की मदद कुछ पैसे से कर दी तो मन में यह विचार नही आना चाहिऐ कि मुझे पैसे वापिस मिलेगे या नही यही शंका है।अपने वल (सामर्थ) का अनुमान लगा कर सदा मित्र का हित ही करना चाहिऐ।
मित्र की विपत्ती के समय तो सदा सौ गुणा स्नेह करना चाहिए। वेद कहते हैं श्रेष्ठ मित्र के यही लक्षण है।

आगें कह मृदु वचन वनाई।
पाछें अनहित मन कुटिलाई।।
जाकर चित्त अहि गति सम भाई।
अस कुमित्र परिहरेहिं मिताई।।

अर्थात जो मित्र के सामने बना बना कर मीठे मीठे वचन कहता है और पीठ पीछे यानि बाद मैं मित्र की बुराई करता है तथा मन में कुटिलता रखता है हे भाई जिसका मन साँप की भाँति टेढा है ऐसे कुमित्र को त्यागने में ही भलाई है।

सेवक सठ नृप कृपन कुनारी।
कपटी मित्र शूल सम चारी।।
सखा सोच त्यागहु बल मोंरे।
सब बिधि घटब काज में तोरे।

अर्थात मूर्ख सेवक,कंजूस राजा, कुलटा(चरित्रहीन) स्त्री, और कपटी मित्र,ये चारों शूल के समान पीड़ा देने वाले है। इन्हें जितनी जल्दी हो इनका त्याग कर देने में ही भलाई है । राम जी कहते हे सखा (मित्र) मेरे बल पर अब तुम चिन्ता छोड़ दो ,मैं सब प्रकार से तुम्हारे काम आऊँगा तुम्हारे दुखों को समाप्त कर दूंगा।

राम जी ने पहिले मित्र के दुख का निवारण किया वाली को मारकर सुग्रीव की पत्नी दिलाई राज दिलाया,मित्रता करें तो राम और सुग्रीव जैसी करें ।
।।जय श्री राम ॥

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பிறரிடமும் தன்னைப் போன்ற குணங்கள் இருப்பதைக் கண்டு மகிழ்பவன் அரிது (9824)


WRITTEN BY S NAGARAJAN Post No. 9824 Date uploaded in London – 7 JULY   2021      Contact – swami_48@yahoo.com Pictures are taken from various sources for spreading knowledge; this is a non- commercial blog. Thanks for your great pictures. tamilandvedas.com, swamiindology.blogspot.com டாக்டர் டி.எஸ்.கௌரிபதி திரிபாதி அவர்கள் தேர்வு செய்து வழங்கிய ஐந்து சுபாஷிதங்கள் கட்டுரை எண் 9774 (வெளியான தேதி: 25-6-2021) தரப்பட்டது. […]

பிறரிடமும் தன்னைப் போன்ற குணங்கள் இருப்பதைக் கண்டு மகிழ்பவன் அரிது (9824)
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🌹ત્રણ સાચી વાતો છે🌹

દેવ, દરિયો, ને દાતાર.
👉🏻એ ત્રણ વિના ધન નહિં.

આધિ, વ્યાધિ, ને ઉપાધિ.
👉🏻એ ત્રણ વિના દુઃખ નહિં.

જ્ઞાન, ભક્તિ, ને વૈરાગ્ય.
👉🏻એ ત્રણ વિના ધર્મ નહિં.

ઉત્પત્તિ, સ્થિતિ, ને પ્રલય.
👉🏻એ ત્રણ વિના જગતનાં ખેલ નહિં.

શિંગ, સરિયો, ને પોપટો.
👉🏻એ ત્રણ વિના ધાન્ય નહિં.

વા, ઘા, ને ઘસરકો.
👉🏻એ ત્રણ વિના સંગીત નહિં.

ધાર, અણી, ને ધબાકો.
👉🏻એ ત્રણ વિના હથિયાર નહિં.

ચાવવું , ચૂસવું, ને સબડકો.
👉🏻એ ત્રણ વિના ભોજન નહિં.

વ્યસન, આળસ, અભીમાન.
👉🏻એ ત્રણ જીવનમા સારાં નહિં.

શ્રવણ, મનન, અભ્યાસ.
👉🏻એ ત્રણ વિના વિદ્યા નહિં.

જૂઠ, કરજ,ને કપટ.
👉🏻એ ત્રણ વિના દુઃખ નહિં.

વાત, પિત્ત, ને કફ.
👉🏻એ ત્રણ વિના રોગ નહિં.

ઇંગલા, પિંગલા, ને સુક્ષમણા.
👉🏻એ ત્રણ વિના નાડી નહિ.

સ્વપ્ન, ચિત્ર, ને સાક્ષાત.
👉🏻એ ત્રણ વિના દર્શન નહિં.

રજો, તમો અને સત્વો.
👉🏻એ ત્રણ વિના ગુણ નહિં.

ભુત, ભવિષ્ય, ને વર્તમાન.
👉🏻એ ત્રણ વિના કાળ નહિ.

સંચિત, ક્રિયમાણ, ને પ્રારબ્ધ.
👉🏻એ ત્રણ વિના ક્રિયા નહિં.

સંયમ, સંતોષ, ને સાદાય.
👉🏻એ ત્રણ વિના સુખ નહિં.

જર, જોરૂ, ને જમીન,
👉🏻એ ત્રણ વિના કજીયો નહિં.

વાંચવું, લખવું, ને શીખવું.
👉🏻એ ત્રણ વિના બુદ્ધિનાં હથિયાર નહિં.

પૂછવું, જોવું, ને દવા દેવી.
👉🏻એ ત્રણ વિના વૈદું નહિં.

ક્રૂરતા, કૃપર્ણતા, ને કૃતઘ્નતા.
👉🏻એ ત્રણ વિના મોટું કષ્ટ નહિં.

વિદ્યા, કળા, ને ધન.
👉🏻એ ત્રણ સ્વેદ વિના મળે નહિં.

દુઃખ, દરિદ્રતા, ને પરઘેર રહેવું.
👉🏻એ ત્રણ વિના મોટું દુઃખ નહિં.

પાન, પટેલ, ને પ્રધાન.
👉🏻ત્રણ કાચાં સારાં નહિં.

વૈદ, વેશ્યા, ને વકીલ.
👉🏻એ ત્રણ વિના રોકડિયા નહિં.

ઘંટી, ઘાણી, ને ઉઘરાણી.
👉🏻એ ત્રણ ફેરા ખાધાં વિના પાકે નહિં.

દુર્ગુણ, સદગુણ, ને વખત.
👉🏻એ ત્રણ સ્થિર રહેવાનાં નહિં.

વિદ્યા, હોશિયારી, ને અક્કલ.
👉🏻એ ત્રણ આળસું પાસે જાય નહિં.

વટ, વચન, ને વિવેક.
👉🏻એ ત્રણ વિના શુરવિર નહિં.

નોર, ખરી, ને ડાબલા.
👉🏻એ ત્રણ વિના પશું નહિં.
🟢🔵🟣⚫🟢🟡.

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महाभारत
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ |
समेत्य च व्यपेयातां तद्वद् भूतसमागम: ||

जैसे लकडी के दो टुकडे विशाल सागर में मिलते है तथा एक ही लहर से अलग हो जाते है, उसी तरह दो व्य्क्ति कुछ क्षणों के लिए सहवास में आते है फिर कालचक्र की गती से अलग हो जाते है.