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आठ अङ्गों सहित प्रणाम – साष्टांग प्रणाम


आठ अङ्गों सहित प्रणाम – साष्टांग प्रणाम
दोर्भ्यां पादाभ्यां जानुभ्यामुरसा शिरसा दृशा।
मनसा वचसा चेति प्रणामोsष्टांग ईरित:।।

हाथों से, चरणों से, घुटनों से, वक्षःस्थल से, सिर से, नेत्रों से, मन से और वाणी से – इन आठ अङ्गों से किया गया प्रणाम साष्टांग प्रणाम कहलाता है।

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સનાતન ધર્મની સ્થાપનાની સાથે જ જીવનમાં વિવિધ સંક્રમણોથી બચવા માટે આપણા ધર્મશાસ્ત્રનાં અચૂક સૂચનો (નિયમો).🙏😊

📿📿📿📿📿📿📿📿📿📿📿📿📿

१ »
लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च ।
लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत् ।।

धर्मसिन्धू ३पू. आह्निक

મીઠું, ઘી, તેલ, અન્ન તથા બધા વ્યજંનો ચમચા વડે જ પીરસવા જોઇએ, હાથથી નહીં.

२ »
अनातुरः स्वानि खानि न स्पृशेदनिमित्ततः ।।

मनुस्मृति ४/१४४

કારણ વિના પોતાની ઇન્દ્રિયોને (આંખ, નાક, કાન વગેરે) ન અડો.

३ »
अपमृज्यान्न च स्न्नातो गात्राण्यम्बरपाणिभिः ।।

मार्कण्डेय पुराण ३४/५२

સ્નાન પછી પોતાના હાથ વડે કે સ્નાન વખતે પહેરેલાં વસ્ત્રો વડે શરીર ન લૂછો.

४ »
हस्तपादे मुखे चैव पञ्चाद्रे भोजनं चरेत् ।।

पद्म०सृष्टि.५१/८८

नाप्रक्षालितपाणिपादो भुञ्जीत ।।

सुश्रुतसंहिता चिकित्सा २४/९८

હાથ, પગ, મોં ધોઈને જ જમવા બેસો.

५ »

स्न्नानाचारविहीनस्य सर्वाः स्युः निष्फलाः क्रियाः ।।

वाघलस्मृति ६९

સ્નાન અને શુદ્ધ આચાર વિના બધા કાર્યો નિષ્ફળ નીવડે છે.

६ »
न धारयेत् परस्यैवं स्न्नानवस्त्रं कदाचन ।।

पद्म०सृष्टि.५१/८६

બીજાએ સ્નાન માટે વાપરેલાં વસ્ત્રો (ટુવાલ વગેરે) ઉપયોગમાં ન લેવાં.

७ »
अन्यदेव भवद्वासः शयनीये नरोत्तम ।
अन्यद् रथ्यासु देवानाम् अर्चायाम् अन्यदेव हि ।।

महाभारत अनु० १०४/८६

સૂતી વખતે, બહાર જતી વખતે, પૂજા કરતી વખતે અલગ અલગ વસ્ત્રો પહેરવાં.

८ »
तथा न अन्यधृतं (वस्त्रं) धार्यम् ।।

महाभारत अनु० १०४/८६

બીજાઓએ પહેરેલાં વસ્ત્રો ન પહેરવાં.

९ »

न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं वसनं बिभृयाद् ।।

विष्णुस्मृति ६४

પહેરેલાં વસ્ત્રોને ધોયા વગર ફરીથી ન પહેરવાં.

१० »
न आद्रं परिदधीत ।।

गोभिसगृह्यसूत्र ३/५/२४

ભીનાં વસ્ત્રો ન પહેરવાં.

११ »

चिताधूमसेवने सर्वे वर्णाः स्न्नानम् आचरेयुः ।
वमने श्मश्रुकर्मणि कृते च ।।

विष्णुस्मृति २२

સ્મશાનમાં જઈ આવ્યા પછી, વમન (ઉલટી) થયા પછી, હજામત કર્યા પછી બધા મનુષ્યોએ સ્નાન કરવું જોઈએ.
🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁

આ છે આપણી સનાતન ગાથા. જે યુગો પેહલાથી આજની ઉદ્ભવેલી પરિસ્થિતિ માટે તમને અગાઉથી જ ચેતવી દીધા છે. 🌺🙏🌺

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नवनीतं हृदयं ब्राह्मणस्य वाचि क्षुरो निहितस्तीक्ष्णधारः! तदुभयमेतद्विपरीतं क्षत्रियस्य वाङ्गवनीतं हृदयं तीक्ष्णधारम्!! [ महाभारत १/३/१२३ ] अर्थात् :- ब्राह्मणोंका हृदय मक्खन जैसे कोमल होता है, किन्तु उनकी वाणी तीखी धारवाले छुरी जैसे कठोर होती है! क्षत्रियमें यह दोनों बातें विपरीत होती हैं अर्थात् वाणी मृदु, परन्तु हृदय कठोर होता है ! जबसे ब्राह्मणोंने "अर्थात अध्यात्मविदों एवं सन्तों" समाजमें व्याप्त अधर्मके विषयमें सत्य बतानेका कार्य छोड दिया है ! तबसे यह समाज अनियन्त्रित घोडे समान दिशाहीन होकर भटकने लगता है !!

जय श्री राम !!

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” पश्य देवस्य काव्यम् न ममार न जीर्यति “अथर्ववेद १०-८-३२
इस प्रकृति को देखिये ये देवताओं का काव्य है ये अमूल्य पुस्तक है जो कभी नष्ट नही होती है न पुरानी इसे पढ़िए ।
पुस्तक दिवस की शुभकामनाएं

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शुभकामना मन्त्र:

यह शुभकामना मन्त्र सबके कल्याण की अभिव्यक्ति के लिए है। हमारे मन में किसी के प्रति द्वेष न हो, अशुभ चिन्तन किसी के लिए भी न करें। जिनसे संबंध कटु हो गये हों, उनके लिए भी हमें मङ्गल कामना ही करनी चाहिए। द्वेष-दुर्भाव किसी के लिए भी नहीं करना चाहिए। सबके कल्याण में अपना कल्याण समाया हुआ है। परमार्थ में स्वार्थ जुड़ा हुआ है, यह मान्यता रखते हुए हमें सर्वमङ्गल की व लोककल्याण की आकांक्षा रखनी चाहिए। शुभ कामनाएँ इसी की अभिव्यक्ति के लिए हैं।

सब लोग दोनों हाथ पसारें, इन्हें याचना मुद्रा में मिला हुआ रखें। निम्नलिखित मन्त्रोच्चार के साथ-साथ इन्हीं भावनाओं से मन को भरे रहें।

ॐ स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां, न्याय्येन मार्गेण महीं महीशाः ।
गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं, लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु॥१॥

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखमाप्नुयात्॥२॥

श्रद्धां मेधां यशः प्रज्ञां, विद्यां पुष्टिं श्रियं बलम् ।
तेज आयुष्यमारोग्यं, देहि मे हव्यवाहन॥३॥

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श्रद्धां मेधां यशः प्रज्ञां विद्यां बुद्धिं श्रियं बलम् ।
आयुष्यं तेज आरोग्यं देहि मे हव्यवाहन ॥

Meaning:
Oh! Messenger (Agni) give me faith, wisdom, glory, understanding, ing, intellect, wealth, power, longetivity, lusture, and health.

======================Word meanings:
श्रद्धां = faith; dedication; belief;
मेधां = intellect; intelligence; also Sarasvati the goddess of ing;
यशः = fame; reputation;
प्रज्ञां = conscipusness;
विद्यां = knowledge;
बुद्धिं = intellect; intelligence;
श्रियं = Goddess LakShmi; wealth; prosperity;
बलं = A lad or son;
आयुष्यं = promoting longevity;
तेज = power; strength; body’s lustre or shine; firepower; sharpness;
आरोग्यं = good health;
देहि = Give;
मे = to me or my;
ॐ = same as `OM’ i.e. the praNava or `o.nkAra’ mantra;
नम = mine; my;
इति = thusthus;

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क्रियासिद्धिस्सत्वे भवति महतां नोपकरणे ।
सेवादीक्षित ! चिरप्रतिज्ञ ! मा विस्मर भोस्सृक्तिम् ॥

न धनं न बलं नापि सम्पदा न स्याज्जनानुकम्पा
सिद्धा न स्यात् कार्यभूमिका न स्यादपि प्रोत्साहः
आवृणोतु वा विघ्नवारिधिस्त्वं मा विस्मर सूक्तिम् । क्रियासिद्धि: ॥

आत्मबलं स्मर बाहुबलं धर परमुखप्रेक्षी मा भू:
क्वचिदपि मा भूदात्मविस्मृतिः न स्याल्लक्ष्याच्च्यवनम् ।
आसादय जनमानसतप्रीतिं सुचिरं संस्मर सूक्तिम्। क्रियासिद्धिः ॥

अरुणसारथिं विकलसाधनं सूर्यं संस्मर नित्यम्
शूरपूरुषान् दृढानजेयान् पदात्पदं स्मर गच्छन्
सामान्येतरदृग्भ्यस्सोदर, सिध्यति कार्यमपूर्वम्। क्रियासिद्धिः ॥

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हिंदू धर्म में हजारों सालों से संक्रमण से बचने के लिए कुछ सूत्र जो अब पूरी दुनिया अपना रही है-

घ्राणास्ये वाससाच्छाद्य मलमूत्रं त्यजेत् बुध:।(वाधूलस्मृति 9)
नियम्य प्रयतो वाचं संवीताङ्गोऽवगुण्ठित:।(मनुस्मृति 4/49))
नाक, मुंह तथा सिर को ढ़ककर, मौन रहकर मल मूत्र का त्याग करना चाहिए।

तथा न अन्यधृतं धार्यम् (महाभारत अनु.104/86)
दुसरों के पहने कपड़े नहीं पहनने चाहिए।

स्नानाचारविहीनस्य सर्वा:स्यु: निष्फला: क्रिया:(वाधूलस्मृति 69)
स्नान और शुद्ध आचार के बिना सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं, अतः: सभी कार्य स्नान करके शुद्ध होकर करने चाहिए।

लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च। लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत्।
(धर्मसिंधु 3 पू.आह्निक)
नमक, घी, तैल, कोई भी व्यंजन, चाटने योग्य एवं पेय पदार्थ यदि हाथ से परोसे गए हों तो न खायें, चम्मच आदि से परोसने पर ही ग्राह्य हैं।

न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं वसनं बिभृयात्।(विष्णुस्मृति 64)
पहने हुए वस्त्र को बिना धोए पुनः न पहनें। पहना हुआ वस्त्र धोकर ही पुनः पहनें।

न चैव आर्द्राणि वासांसि नित्यं सेवेत मानव:।(महाभारत अनु.104/52)
न आर्द्रं परिदधीत(गोभिलगृह्यसूत्र 3/5/24)
गीले कपड़े नहीं पहनने चाहिए।
ABC

चिताधूमसेवने सर्वे वर्णा: स्नानम् आचरेयु:। वमने श्मश्रुकर्मणि कृते च(विष्णुस्मृति 22)
श्मशान में जाने पर, वमन होने/करने पर, हजामत बनवाने पर स्नान करके शुद्ध होना चाहिए।

हस्तपादे मुखे चैव पञ्चार्द्रो भोजनं चरेत्।(पद्मपुराण सृष्टि 51/88)
नाप्रक्षालित पाणिपादौ भुञ्जीत।(सु.चि.24/98)
हाथ, पैर और मुंह धोकर भोजन करना चाहिए।

अपमृज्यान्न च स्नातो गात्राण्यम्बरपाणिभि:।(मार्कण्डेय पुराण 34/52)
स्नान करने के बाद अपने हाथों से या स्नान के समय पहने भीगे कपड़ों से शरीर को नहीं पोंछना चाहिए, अर्थात् किसी सूखे कपड़े (तौलिए) से ही पोंछना चाहिए।

न वार्यञ्जलिना पिबेत्।( मनुस्मृति 4/63)
नाञ्जलिपुटेनाप: पिबेत्।(सु.चि.24/98)
अंजलि से जल नहीं पीना चाहिए, किसी पात्र(गिलास) से जल पीयें।

न धारयेत् परस्यैवं स्नानवस्त्रं कदाचन।(पद्मपुराण सृष्टि 51/86)
दुसरों के स्नान के वस्त्र (तौलिए इत्यादि) प्रयोग में न लें।

अब देख लीजिएआधुनिक अस्पताल और मेडिकल साइंस धराशाई हो चुके हैं और समस्त विश्व हजारों साल पुराने बचाव के उपाय अपना रहा है।

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हिंदू धर्म में हजारों सालों से संक्रमण से बचने के लिए कुछ सूत्र जो अब पूरी दुनिया अपना रही है-

घ्राणास्ये वाससाच्छाद्य मलमूत्रं त्यजेत् बुध:।(वाधूलस्मृति 9)
नियम्य प्रयतो वाचं संवीताङ्गोऽवगुण्ठित:।(मनुस्मृति 4/49))
नाक, मुंह तथा सिर को ढ़ककर, मौन रहकर मल मूत्र का त्याग करना चाहिए।

तथा न अन्यधृतं धार्यम् (महाभारत अनु.104/86)
दुसरों के पहने कपड़े नहीं पहनने चाहिए।

स्नानाचारविहीनस्य सर्वा:स्यु: निष्फला: क्रिया:(वाधूलस्मृति 69)
स्नान और शुद्ध आचार के बिना सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं, अतः: सभी कार्य स्नान करके शुद्ध होकर करने चाहिए।

लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च। लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत्।(धर्मसिंधु 3 पू.आह्निक)
नमक, घी, तैल, कोई भी व्यंजन, चाटने योग्य एवं पेय पदार्थ यदि हाथ से परोसे गए हों तो न खायें, चम्मच आदि से परोसने पर ही ग्राह्य हैं।

न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं वसनं बिभृयात्।(विष्णुस्मृति 64)
पहने हुए वस्त्र को बिना धोए पुनः न पहनें। पहना हुआ वस्त्र धोकर ही पुनः पहनें।

न चैव आर्द्राणि वासांसि नित्यं सेवेत मानव:।(महाभारत अनु.104/52)
न आर्द्रं परिदधीत(गोभिलगृह्यसूत्र 3/5/24)
गीले कपड़े नहीं पहनने चाहिए।
ABC
चिताधूमसेवने सर्वे वर्णा: स्नानम् आचरेयु:। वमने श्मश्रुकर्मणि कृते च(विष्णुस्मृति 22)
श्मशान में जाने पर, वमन होने/करने पर, हजामत बनवाने पर स्नान करके शुद्ध होना चाहिए।

हस्तपादे मुखे चैव पञ्चार्द्रो भोजनं चरेत्।(पद्मपुराण सृष्टि 51/88)
नाप्रक्षालित पाणिपादौ भुञ्जीत।(सु.चि.24/98)
हाथ, पैर और मुंह धोकर भोजन करना चाहिए।

अपमृज्यान्न च स्नातो गात्राण्यम्बरपाणिभि:।(मार्कण्डेय पुराण 34/52)
स्नान करने के बाद अपने हाथों से या स्नान के समय पहने भीगे कपड़ों से शरीर को नहीं पोंछना चाहिए, अर्थात् किसी सूखे कपड़े (तौलिए) से ही पोंछना चाहिए।

न वार्यञ्जलिना पिबेत्।( मनुस्मृति 4/63)
नाञ्जलिपुटेनाप: पिबेत्।(सु.चि.24/98)
अंजलि से जल नहीं पीना चाहिए, किसी पात्र(गिलास) से जल पीयें।

न धारयेत् परस्यैवं स्नानवस्त्रं कदाचन।(पद्मपुराण सृष्टि 51/86)
दुसरों के स्नान के वस्त्र (तौलिए इत्यादि) प्रयोग में न लें।

अब देख लीजिएआधुनिक अस्पताल और मेडिकल साइंस धराशाई हो चुके हैं और समस्त विश्व हजारों साल पुराने बचाव के उपाय अपना रहा है।

साभार नित्य नूतन चिर पुरातन भारतीय साहित्य।