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💐💐💐💐🎂🎂💐💐🌷भगवान🌷शिवजी 🌷ने🌷माता 🌷 पार्वती जी🌷को बताए थे जीवन के ये पाँच रहस्य!!!!!!

🌷भगवान🌷शिवजी 🌷ने🌷देवी🌷 पार्वती जी🌷 को समय-समय पर कई ज्ञान की बातें बताई हैं। जिनमें मनुष्य के सामाजिक जीवन से लेकर पारिवारिक और वैवाहिक जीवन की बातें शामिल हैं। भगवान शिवजी ने देवी पार्वती जी को 5 ऐसी बातें बताई थीं जो हर मनुष्य के लिए उपयोगी हैं, जिन्हें जानकर उनका पालन हर किसी को करना ही चाहिए-

  1. क्या है सबसे बड़ा धर्म और सबसे बड़ा पाप
    देवी पार्वती जी के पूछने पर भगवान शिवजी ने उन्हें मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा धर्म और अधर्म मानी जाने वाली बात के बारे में बताया है। भगवान शंकरजी कहते है-

श्लोक- 🌹नास्ति सत्यात् परो नानृतात् पातकं परम्🌹

अर्थात- मनुष्य के लिए सबसे बड़ा धर्म है सत्य बोलना या सत्य का साथ देना और सबसे बड़ा अधर्म है असत्य बोलना या उसका साथ देना।

इसलिए हर किसी को अपने मन, अपनी बातें और अपने कामों से हमेशा उन्हीं को शामिल करना चाहिए, जिनमें सच्चाई हो, क्योंकि इससे बड़ा कोई धर्म है ही नहीं। असत्य कहना या किसी भी तरह से झूठ का साथ देना मनुष्य की बर्बादी का कारण बन सकता है।

  1. काम करने के साथ इस एक और बात का रखें ध्यान
    श्लोक- 🌹आत्मसाक्षी भवेन्नित्यमात्मनुस्तु शुभाशुभे🌹

अर्थात- मनुष्य को अपने हर काम का साक्षी यानी गवाह खुद ही बनना चाहिए, चाहे फिर वह अच्छा काम करे या बुरा। उसे कभी भी ये नहीं सोचना चाहिए कि उसके कर्मों को कोई नहीं देख रहा है।

कई लोगों के मन में गलत काम करते समय यही भाव मन में होता है कि उन्हें कोई नहीं देख रहा और इसी वजह से वे बिना किसी भी डर के पाप कर्म करते जाते हैं, लेकिन सच्चाई कुछ और ही होती है। मनुष्य अपने सभी कर्मों का साक्षी खुद ही होता है। अगर मनुष्य हमेशा यह एक भाव मन में रखेगा तो वह कोई भी पाप कर्म करने से खुद ही खुद को रोक लेगा।

  1. कभी न करें ये तीन काम करने की इच्छा
    श्लोक-🌺मनसा कर्मणा वाचा न च काड्क्षेत पातकम्🌺

अर्थात- आगे भगवान शिवजी कहते है कि- किसी भी मनुष्य को मन, वाणी और कर्मों से पाप करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि मनुष्य जैसा काम करता है, उसे वैसा फल भोगना ही पड़ता है।

यानि मनुष्य को अपने मन में ऐसी कोई बात नहीं आने देना चाहिए, जो धर्म-ग्रंथों के अनुसार पाप मानी जाए। न अपने मुंह से कोई ऐसी बात निकालनी चाहिए और न ही ऐसा कोई काम करना चाहिए, जिससे दूसरों को कोई परेशानी या दुख पहुंचे। पाप कर्म करने से मनुष्य को न सिर्फ जीवित होते हुए इसके परिणाम भोगना पड़ते हैं बल्कि मारने के बाद नरक में भी यातनाएं झेलना पड़ती हैं।

  1. सफल होने के लिए ध्यान रखें ये एक बात
    संसार में हर मनुष्य को किसी न किसी मनुष्य, वस्तु या परिस्थित से आसक्ति यानि लगाव होता ही है। लगाव और मोह का ऐसा जाल होता है, जिससे छूट पाना बहुत ही मुश्किल होता है। इससे छुटकारा पाए बिना मनुष्य की सफलता मुमकिन नहीं होती, इसलिए भगवान शिव ने इससे बचने का एक उपाय बताया है।

श्लोक-🌹दोषदर्शी भवेत्तत्र यत्र स्नेहः प्रवर्तते🌹अनिष्टेनान्वितं पश्चेद् यथा क्षिप्रं विरज्यते🌹

अर्थात- भगवान शिवजी कहते हैं कि- मनुष्य को जिस भी व्यक्ति या परिस्थित से लगाव हो रहा हो, जो कि उसकी सफलता में रुकावट बन रही हो, मनुष्य को उसमें दोष ढूंढ़ना शुरू कर देना चाहिए। सोचना चाहिए कि यह कुछ पल का लगाव हमारी सफलता का बाधक बन रहा है। ऐसा करने से धीरे-धीरे मनुष्य लगाव और मोह के जाल से छूट जाएगा और अपने सभी कामों में सफलता पाने लगेगा।

  1. यह एक बात समझ लेंगे तो नहीं करना पड़ेगा दुखों का सामना,श्लोक-

🌹नास्ति तृष्णासमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्🌹
🌺सर्वान् कामान् परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते🌺

अर्थात- आगे भगवान शिवजी मनुष्यो को एक चेतावनी देते हुए कहते हैं कि- मनुष्य की तृष्णा यानि इच्छाओं से बड़ा कोई दुःख नहीं होता और इन्हें छोड़ देने से बड़ा कोई सुख नहीं है। मनुष्य का अपने मन पर वश नहीं होता। हर किसी के मन में कई अनावश्यक इच्छाएं होती हैं और यही इच्छाएं मनुष्य के दुःखों का कारण बनती हैं। जरुरी है कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं में अंतर समझे और फिर अनावश्यक इच्छाओं का त्याग करके शांत मन से जीवन बिताएं।
Om shiv parvati putra ganeshay namah Ji

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शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक् छत्रेण सूर्यातपो नागेन्द्रो निशिताङ्कुशेन समदौ दण्डेन गोगर्धभौ ।
व्याधिर्भेषजसंग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगैर्विषं सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम् ॥

अग्नि को जल से बुझाया जा सकता है, तीव्र धुप में छाते द्वारा बचा जा सकता है, जंगली हाथी को भी एक लम्बे डंडे(जिसमे हुक लगा होता है ) की मदद से नियंत्रित किया जा सकता है, गायों और गधों से झुंडों को भी छड़ी से नियंत्रित किया सकता है। अगर कोई असाध्य बीमारी हो तो उसे भी औषधियों से ठीक किया जा सकता है। यहाँ तक की जहर दिए गए व्यक्ति को भी मन्त्रों और औषधियों की मदद से ठीक किया जा सकता है। इस दुनिया में हर बीमारी का इलाज है लेकिन किसी भी शास्त्र या विज्ञान में मूर्खता का कोई इलाज या उपाय नहीं है।

शुभ दिन
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चला लक्ष्मीश्चला: *प्राणाश्चले जीवितमन्दिरे |
चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः||

मानव द्वारा अर्जित धन-संपत्ति अस्थायी और नष्ट होने वाली होती है तथा उसके शरीर रूपी मन्दिर में स्थित प्राण शक्ति जो उसे जीवित रखती है , वह भी अस्थायी है ओर कभी भी नष्ट हो सकती है | यह सारा संसार ही अस्थायी है और अकेला धर्म ( सद् आचरण और तत्सम्बन्धी नियमों का पालन करना ) ही अपरिवर्तनीय है |

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दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते।
यदन्नं भक्षयेन्नित्यं जायते तादृशी प्रजा॥

चाणक्यनीति

दीप lamp, light प्रथमैकवचनान्त:(पु)
→ दीप:

भक्ष् to eat, to consume प्रथम पुरुष वर्तमानकालवाचक एकवचनम्
→ भक्षयते

ध्वान्त darkness द्वितीयैकवचनान्त:(न)
→ ध्वान्तम्

कज्जल black soot, lampblack द्वितीयैकवचनान्त:(न)
→ कज्जलम्

च and

प्रसु beget, give birth to, bring forth प्रथम पुरुष वर्तमानकालवाचक एकवचनम्
→ प्रसूयते

यद् that, which द्वितीयैकवचनान्त:(न)
→ यद्

अन्न grain, cereal, food द्वितीयैकवचनान्त:(न)
→ अन्नम्

भक्ष् to eat, to consume प्रथम पुरुष विध्यर्थ एकवचनम्
→ भक्षयेत्

नित्यम् daily

जन् to be born or produced, to come into existence प्रथम पुरुष वर्तमानकालवाचक एकवचनम्
→ जायते

तादृक्ष that kind, that type, that like प्रथमैकवचनान्त:(स्त्री)
→ तादृशी

प्रजा procreation, propagation प्रथमैकवचनान्त:(स्त्री)
→ प्रजा

(जसा) दिवा काळोखाला खातो (नाहीसा करतो) आणि (काळी) काजळी निर्माण करतो, (तसा) (मनुष्य) ज्या प्रकारचे अन्नसेवन करतो त्याच प्रकारची त्याची संतति उपजते.

(Just as) lamp eats (destroys) darkness and produces (black) soot, in the same manner (quality of) food (man) eats daily, has an influence on his offspring’s nature.

जैसे दीप अन्धकार का भक्षण करता हैं और कज्जल उत्पन्न करता हैं, वैसे ही (मनुष्य) जिस प्रकार का अन्नसेवन करता है, उसी प्रकार की उस की संतान जन्म लेती हैं।

इन हिंदी कहावतों के स्थान पर संस्कृत की सूक्ति बोलें।
1. अपनी डफली अपना राग – मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना ।
2. का बरखा जब कृषि सुखाने – पयो गते किं खलु सेतुबन्धनम्।
3. अंधों में काना राजा – निरस्तपादपे देशे एरण्डोपि द्रुमायते।
4. अधजल गगरी छलकत जाए – अर्धोघटो घोषमुपैति शब्दम् ।
5. एक पंथ दो काज – एका क्रिया द्वयर्थकरी प्रसिद्धा।
6. आंख का अंधा नाम नयनसुख – भिक्षार्थं भ्रमते नित्यं नाम किन्तु धनेश्वरः।
7. काल करे सो आज कर, आज करे सो अब – श्वः कर्तव्यानि कार्याणि कुर्यादद्यैव बुद्धिमान्।
8. जैसी करनी वैसी भरनी – यो यद् वपति बीजं लभते तादृशं फलम्।
9. पर उपदेश कुशल बहुतेरे – परोपदेशे पाण्डित्यं सर्वेषां सुकरं नृणाम् ।
10. मुंह में राम बगल में छुरी – विषकुम्भं पयोमुखम्।
11. भूखा क्या नहीं करता – बुभुक्षितः किं न करोति पापम्।

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ગુજરાતી સાહિત્યની રચનાઓ … વાંચવી ગમશે …
બે કે ત્રણ લીટી ઘણું કહી જાય છે …
👍👍

થોડા two લાઇનર્સ

સ્વપ્ન એટલે…
તારા વગર,
તને મળવું …

“એક નફરત છે,”
જે લોકો
“એક પળમાં સમજી” જાય છે,

અને

“એક પ્રેમ છે,”
જેને “સમજવામાં વર્ષો”
નીકળી જાય છે.

ક્યાંક તડકો દેખાય તો કહેજોને…

રૂ જેવી હલકી અને ભીંજાઇ ગયેલી

ગેરસમજોને સૂકવવી છે…

સંબંધોની ક્યારેય પરીક્ષા ન લેશો…

સામેવાળા નાપાસ થશે તો તમે જ દુઃખી થશો.

શિયાળો એટલે
સતત કોઇની “હુંફ” ઇચ્છતી
એક પાગલ ઋતુ !

મળીએ ત્યારે,
આંખમાં હરખ

અને

અલગ પડતી વેળાએ
આંખમાં થોડી ઝાકળ..

અમુક રાતે
તમને ઊંઘ નથી આવતી

અને

અમુક રાતે
તમે સુવા નથી માંગતા.

વેદના અને આનંદ વચ્ચે
આ ફેર છે.

ક્યાંક અઢળક પણ ઓછું પડે,

અને

ક્યાંક એક સ્મિત અઢળક થઈ પડે….

સાંભળ્યું છે કે પ્લે સ્ટોરમાં બધું જ મળે છે…

ચાલો, વિખરાયેલા સંબંધો સર્ચ કરીએ…

પ્રેમ અને મોતની પસંદગી તો જોવો,

એકને હૃદય જોઈએ
તો બીજાને ધબકારા..

મેડીક્લેઈમ તો આખા શરીરનો હતો,

પણ ખાલી દિલ તુટ્યું હતું

એટલે ક્લેઈમ પાસ ન થયો ..!

ગરમ ચા જેવા મગજને ઠંડું કરવાનો ઉપાય ?

પ્રેમની પહોળી રકાબીમાં એને રેડી દેવો.

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देवीसिंह तोमर

मनु स्मृति के अनुसार,इन पंद्रह लोगों के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए!!!!!!

ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः।
बालवृद्धातुरैर्वैधैर्ज्ञातिसम्बन्धिबांन्धवैः।।
मातापितृभ्यां यामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया।
दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत्।।

अर्थात् : – यज्ञकरने,वाले,पुरोहित,आचार्य,अतिथियों,माता,पिता,मामा आदि।संबंधियों,भाई,बहन,पुत्र,पुत्री,पत्नी,पुत्रवधू,दामाद तथा,गृह सेवकों यानी नौकरों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

यज्ञ करने वाला : – यज्ञ करने वाला ब्राह्मण सदैव सम्मान करने योग्य होता है। यदि उससे किसी प्रकार की कोई चूक हो जाए तो भी उसके साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि आप ऐसा करेंगे तो इससे आपकी प्रतिष्ठा ही धूमिल होगी। अतः यज्ञ करने वाले वाले ब्राह्मण से वाद-विवाद न करने में ही भलाई है।_

पुरोहित : – यज्ञ, पूजन आदि धार्मिक कार्यों को संपन्न करने के लिए एक योग्य व विद्वान ब्राह्मण को नियुक्त किया जाता है, जिसे पुरोहित कहा जाता है। भूल कर भी कभी पुरोहित से विवाद नहीं करना चाहिए। पुरोहित के माध्यम से ही पूजन आदि शुभ कार्य संपन्न होते हैं, जिसका पुण्य यजमान (यज्ञ करवाने वाला) को प्राप्त होता है। पुरोहित से वाद-विवाद करने पर वह आपका काम बिगाड़ सकता है, जिसका दुष्परिणाम यजमान को भुगतना पड़ सकता है। इसलिए पुरोहित से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

आचार्य : – प्राचीनकाल में उपनयन संस्कार के बाद बच्चों को शिक्षा के लिए गुरुकुल भेजा जाता था, जहां आचार्य उन्हें पढ़ाते थे। वर्तमान में उन आचार्यों का स्थान स्कूल टीचर्स ने ले लिया है। मनु स्मृति के अनुसार आचार्य यानी स्कूल टीचर्स से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। वह यदि दंड भी दें तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। आचार्य (टीचर्स) हमेशा अपने छात्रों का भला ही सोचते हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर विद्यार्थी का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है।

अतिथि : – हिंदू धर्म में अतिथि यानी मेहमान को भगवान की संज्ञा दी गई है इसलिए कहा जाता है मेहमान भगवान के समान होता है। उसका आवभगत ठीक तरीके से करनी चाहिए। भूल से भी कभी अतिथि के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। अगर कोई अनजान व्यक्ति भी भूले-भटके हमारे घर आ जाए तो उसे भी मेहमान ही समझना चाहिए और यथासंभव उसका सत्कार करना चाहिए। अतिथि से वाद-विवाद करने पर आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस लग सकती है।

माता : – माता ही शिशु की सबसे प्रथम शिक्षक होती है। माता 9 महीने शिशु को अपने गर्भ में धारण करती है और जीवन का प्रथम पाठ पढ़ाती है। यदि वृद्धावस्था या इसके अतिरिक्त भी कभी माता से कोई भूल-चूक हो जाए तो उसे प्यार से समझा देना चाहिए न कि उसके साथ वाद-विवाद करना चाहिए। माता का स्थान गुरु व भगवान से ही ऊपर माना गया है। इसलिए माता सदैव पूजनीय होती हैं। अतः माता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

*पिता : – पिता ही जन्म से लेकर युवावस्था तक हमारा पालन-पोषण करते हैं। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पिता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। पिता भी माता के ही समान पूज्यनीय होते हैं। हम जब भी किसी मुसीबत में फंसते हैं, तो सबसे पहले पिता को ही याद करते हैं और पिता हमें उस समस्या का समाधान भी सूझाते हैं। वृद्धावस्था में भी पिता अपने अनुभव के आधार पर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए पिता के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

मामा आदि संबंधी : – मामा आदि संबंधी जैसे- काका-काकी, ताऊ-ताईजी, बुआ-फूफाजी, ये सभी वो लोग होते हैं, जो बचपन से ही हम पर स्नेह रखते हैं। बचपन में कभी न कभी ये भी हमारी जरूरतें पूरी करते हैं। इसलिए ये सभी सम्मान करने योग्य हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर समाज में हमें सभ्य नहीं समझा जाएगा और हमारी प्रतिष्ठा को भी ठेस लग सकती है। इसलिए भूल कर भी कभी मामा आदि सगे-संबंधियों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति बने तो भी समझा-बूझाकर इस मामले को सुलझा लेना चाहिए।_

भाई : – हिंदू धर्म के अनुसार बड़ा भाई पिता के समान तथा छोटा भाई पुत्र के समान होता है। बड़ा भाई सदैव मार्गदर्शक बन कर हमें सही रास्ते पर चलने के प्रेरित करता है और यदि भाई छोटा है तो उसकी गलतियां माफ कर देने में ही बड़प्पन है। विपत्ति आने पर भाई ही भाई की मदद करता है। बड़ा भाई अगर परिवार रूपी वटवृक्ष का तना है तो छोटा भाई उस वृक्ष की शाखाएं। इसलिए भाई छोटा हो या बड़ा उससे किसी भी प्रकार का वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।_

बहन : – भारतीय सभ्यता में बड़ी बहन को माता तथा छोटी बह न को पुत्री माना गया है। बड़ी बहन अपने छोटे भाई-बहनों को माता के समान ही स्नेह करती है। संकट के समय सही रास्ता बताती है। छोटे भाई-बहनों पर जब भी विपत्ति आती है, बड़ी बहन हर कदम पर उनका साथ देती है।

छोटी बहन पुत्री के समान होती है। परिवार में जब भी कोई शुभ प्रसंग आता है, छोटी बहन ही उसे खास बनाती है। छोटी बहन जब घर में होती है तो घर का वातावरण सुखमय हो जाता है। इसलिए मनु स्मृति में कहा गया है कि बहन के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

पुत्र : – हिंदू धर्म ग्रंथों में पुत्र को पिता का स्वरूप माना गया है यानी पुत्र ही पिता के रूप में पुनः जन्म लेता है। शास्त्रों के अनुसार पुत्र ही पिता को पुं नामक नरक से मुक्ति दिलाता है। इसलिए उसे पुत्र कहते हैं।

पुं नाम नरक त्रायेताति इति पुत्र : – पुत्र द्वारा पिंडदान, तर्पण आदि करने पर ही पिता की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। पुत्र यदि धर्म के मार्ग पर चलने वाला हो तो वृद्धावस्था में माता-पिता का सहारा बनता है और पूरे परिवार का मार्गदर्शन करता है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पुत्र से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

पुत्री : – भारतीय संस्कृति में पुत्री को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। कहते हैं कि भगवान जिस पर प्रसन्न होता है, उसे ही पुत्री प्रदान करता है। संभव है कि पुत्र वृद्धावस्था में माता-पिता का पालन-पोषण न करे, लेकिन पुत्री सदैव अपने माता-पिता का साथ निभाती है। परिवार में होने वाले हर मांगलिक कार्यक्रम की रौनक पुत्रियों से ही होती है। विवाह के बाद भी पुत्री अपने माता-पिता के करीब ही होती है। इसलिए पुत्री से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।_

पत्नी : – हिंदू धर्म में पत्नी को अर्धांगिनी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पति के शरीर का आधा अंग। किसी भी शुभ कार्य व पूजन आदि में पत्नी का साथ में होना अनिवार्य माना गया है, उसके बिना पूजा अधूरी ही मानी जाती है। पत्नी ही हर सुख-दुख में पति का साथ निभाती है। वृद्धावस्था में यदि पुत्र आदि रिश्तेदार साथ न हो तो भी पत्नी कदम-कदम पर साथ चलती है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पत्नी से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

पुत्रवधू* : – पुत्र की पत्नी को पुत्रवधू कहते हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार पुत्रवधू को भी पुत्री के समान ही समझना चाहिए। पुत्रियों के अभाव में पुत्रवधू से ही घर में रौनक रहती है। कुल की मान-मर्यादा भी पुत्रवधू के ही हाथों में होती है। परिवार के सदस्यों व अतिथियों की सेवा भी पुत्रवधू ही करती है। पुत्रवधू से ही वंश आगे बढ़ता है। इसलिए यदि पुत्रवधू से कभी कोई चूक भी हो जाए तो भी उसके साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।_

गृह सेवक यानी नौकर : – मनु स्मृति के अनुसार गृह सेवक यानी नौकर से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि पुराने सेवक आपकी व आपके परिवार की कई गुप्त बातें जानता है। वाद-विवाद करने पर वह गुप्त बातें सार्वजनिक कर सकता है। जिससे आपके परिवार की प्रतिष्ठा खराब हो सकती है। इसलिए नौकर से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।_

दामाद : – पुत्री के पति को दामाद यानी जमाई कहते हैं। धर्म ग्रंथों में पुत्री के पुत्र (धेवते) को पोत्र समान माना गया है। पुत्र पोत्र के न होने पर धेवता ही उससे संबंधित सभी जिम्मेदारी निभाता है तथा नाना के उत्तर कार्य (पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध आदि) करने का अधिकारी भी होता है। दामाद से इसलिए भी विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका असर आपकी पुत्री के दांपत्य जीवन पर भी पढ़ सकता है।

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हत्वासुरं महिषरूपधरं महोग्रं
मातस्त्वया सुरगणः किल रक्षितोऽयम् ।
कां ते स्तुतिं जननि मन्दधियो विदामो
वेदा गतिं तव यथार्थतया न जग्मुः ॥ ३२ ॥

હે માતા! મહિષ(પાડા) નુ રૂપ ધારણ કરેલા અતિ બળવાન અસુરને મારીને દેવોની રક્ષા કરી છે. હે માં, વેદો પણ તમારા સ્વરૂપને યોગ્ય રીતે જાણતા નથી તો અલ્પ બુદ્ધિવાળા અમે તમારી શી સ્તુતિ કરીએ ?

ભુવનેશ્વરી ભાગવત ૫/૧૯/૩૨