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देवीसिंह तोमर

मनु स्मृति के अनुसार,इन पंद्रह लोगों के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए!!!!!!

ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः।
बालवृद्धातुरैर्वैधैर्ज्ञातिसम्बन्धिबांन्धवैः।।
मातापितृभ्यां यामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया।
दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत्।।

अर्थात् : – यज्ञकरने,वाले,पुरोहित,आचार्य,अतिथियों,माता,पिता,मामा आदि।संबंधियों,भाई,बहन,पुत्र,पुत्री,पत्नी,पुत्रवधू,दामाद तथा,गृह सेवकों यानी नौकरों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

यज्ञ करने वाला : – यज्ञ करने वाला ब्राह्मण सदैव सम्मान करने योग्य होता है। यदि उससे किसी प्रकार की कोई चूक हो जाए तो भी उसके साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि आप ऐसा करेंगे तो इससे आपकी प्रतिष्ठा ही धूमिल होगी। अतः यज्ञ करने वाले वाले ब्राह्मण से वाद-विवाद न करने में ही भलाई है।_

पुरोहित : – यज्ञ, पूजन आदि धार्मिक कार्यों को संपन्न करने के लिए एक योग्य व विद्वान ब्राह्मण को नियुक्त किया जाता है, जिसे पुरोहित कहा जाता है। भूल कर भी कभी पुरोहित से विवाद नहीं करना चाहिए। पुरोहित के माध्यम से ही पूजन आदि शुभ कार्य संपन्न होते हैं, जिसका पुण्य यजमान (यज्ञ करवाने वाला) को प्राप्त होता है। पुरोहित से वाद-विवाद करने पर वह आपका काम बिगाड़ सकता है, जिसका दुष्परिणाम यजमान को भुगतना पड़ सकता है। इसलिए पुरोहित से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

आचार्य : – प्राचीनकाल में उपनयन संस्कार के बाद बच्चों को शिक्षा के लिए गुरुकुल भेजा जाता था, जहां आचार्य उन्हें पढ़ाते थे। वर्तमान में उन आचार्यों का स्थान स्कूल टीचर्स ने ले लिया है। मनु स्मृति के अनुसार आचार्य यानी स्कूल टीचर्स से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। वह यदि दंड भी दें तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। आचार्य (टीचर्स) हमेशा अपने छात्रों का भला ही सोचते हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर विद्यार्थी का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है।

अतिथि : – हिंदू धर्म में अतिथि यानी मेहमान को भगवान की संज्ञा दी गई है इसलिए कहा जाता है मेहमान भगवान के समान होता है। उसका आवभगत ठीक तरीके से करनी चाहिए। भूल से भी कभी अतिथि के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। अगर कोई अनजान व्यक्ति भी भूले-भटके हमारे घर आ जाए तो उसे भी मेहमान ही समझना चाहिए और यथासंभव उसका सत्कार करना चाहिए। अतिथि से वाद-विवाद करने पर आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस लग सकती है।

माता : – माता ही शिशु की सबसे प्रथम शिक्षक होती है। माता 9 महीने शिशु को अपने गर्भ में धारण करती है और जीवन का प्रथम पाठ पढ़ाती है। यदि वृद्धावस्था या इसके अतिरिक्त भी कभी माता से कोई भूल-चूक हो जाए तो उसे प्यार से समझा देना चाहिए न कि उसके साथ वाद-विवाद करना चाहिए। माता का स्थान गुरु व भगवान से ही ऊपर माना गया है। इसलिए माता सदैव पूजनीय होती हैं। अतः माता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

*पिता : – पिता ही जन्म से लेकर युवावस्था तक हमारा पालन-पोषण करते हैं। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पिता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। पिता भी माता के ही समान पूज्यनीय होते हैं। हम जब भी किसी मुसीबत में फंसते हैं, तो सबसे पहले पिता को ही याद करते हैं और पिता हमें उस समस्या का समाधान भी सूझाते हैं। वृद्धावस्था में भी पिता अपने अनुभव के आधार पर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए पिता के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

मामा आदि संबंधी : – मामा आदि संबंधी जैसे- काका-काकी, ताऊ-ताईजी, बुआ-फूफाजी, ये सभी वो लोग होते हैं, जो बचपन से ही हम पर स्नेह रखते हैं। बचपन में कभी न कभी ये भी हमारी जरूरतें पूरी करते हैं। इसलिए ये सभी सम्मान करने योग्य हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर समाज में हमें सभ्य नहीं समझा जाएगा और हमारी प्रतिष्ठा को भी ठेस लग सकती है। इसलिए भूल कर भी कभी मामा आदि सगे-संबंधियों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति बने तो भी समझा-बूझाकर इस मामले को सुलझा लेना चाहिए।_

भाई : – हिंदू धर्म के अनुसार बड़ा भाई पिता के समान तथा छोटा भाई पुत्र के समान होता है। बड़ा भाई सदैव मार्गदर्शक बन कर हमें सही रास्ते पर चलने के प्रेरित करता है और यदि भाई छोटा है तो उसकी गलतियां माफ कर देने में ही बड़प्पन है। विपत्ति आने पर भाई ही भाई की मदद करता है। बड़ा भाई अगर परिवार रूपी वटवृक्ष का तना है तो छोटा भाई उस वृक्ष की शाखाएं। इसलिए भाई छोटा हो या बड़ा उससे किसी भी प्रकार का वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।_

बहन : – भारतीय सभ्यता में बड़ी बहन को माता तथा छोटी बह न को पुत्री माना गया है। बड़ी बहन अपने छोटे भाई-बहनों को माता के समान ही स्नेह करती है। संकट के समय सही रास्ता बताती है। छोटे भाई-बहनों पर जब भी विपत्ति आती है, बड़ी बहन हर कदम पर उनका साथ देती है।

छोटी बहन पुत्री के समान होती है। परिवार में जब भी कोई शुभ प्रसंग आता है, छोटी बहन ही उसे खास बनाती है। छोटी बहन जब घर में होती है तो घर का वातावरण सुखमय हो जाता है। इसलिए मनु स्मृति में कहा गया है कि बहन के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

पुत्र : – हिंदू धर्म ग्रंथों में पुत्र को पिता का स्वरूप माना गया है यानी पुत्र ही पिता के रूप में पुनः जन्म लेता है। शास्त्रों के अनुसार पुत्र ही पिता को पुं नामक नरक से मुक्ति दिलाता है। इसलिए उसे पुत्र कहते हैं।

पुं नाम नरक त्रायेताति इति पुत्र : – पुत्र द्वारा पिंडदान, तर्पण आदि करने पर ही पिता की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। पुत्र यदि धर्म के मार्ग पर चलने वाला हो तो वृद्धावस्था में माता-पिता का सहारा बनता है और पूरे परिवार का मार्गदर्शन करता है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पुत्र से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

पुत्री : – भारतीय संस्कृति में पुत्री को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। कहते हैं कि भगवान जिस पर प्रसन्न होता है, उसे ही पुत्री प्रदान करता है। संभव है कि पुत्र वृद्धावस्था में माता-पिता का पालन-पोषण न करे, लेकिन पुत्री सदैव अपने माता-पिता का साथ निभाती है। परिवार में होने वाले हर मांगलिक कार्यक्रम की रौनक पुत्रियों से ही होती है। विवाह के बाद भी पुत्री अपने माता-पिता के करीब ही होती है। इसलिए पुत्री से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।_

पत्नी : – हिंदू धर्म में पत्नी को अर्धांगिनी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पति के शरीर का आधा अंग। किसी भी शुभ कार्य व पूजन आदि में पत्नी का साथ में होना अनिवार्य माना गया है, उसके बिना पूजा अधूरी ही मानी जाती है। पत्नी ही हर सुख-दुख में पति का साथ निभाती है। वृद्धावस्था में यदि पुत्र आदि रिश्तेदार साथ न हो तो भी पत्नी कदम-कदम पर साथ चलती है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पत्नी से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

पुत्रवधू* : – पुत्र की पत्नी को पुत्रवधू कहते हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार पुत्रवधू को भी पुत्री के समान ही समझना चाहिए। पुत्रियों के अभाव में पुत्रवधू से ही घर में रौनक रहती है। कुल की मान-मर्यादा भी पुत्रवधू के ही हाथों में होती है। परिवार के सदस्यों व अतिथियों की सेवा भी पुत्रवधू ही करती है। पुत्रवधू से ही वंश आगे बढ़ता है। इसलिए यदि पुत्रवधू से कभी कोई चूक भी हो जाए तो भी उसके साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।_

गृह सेवक यानी नौकर : – मनु स्मृति के अनुसार गृह सेवक यानी नौकर से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि पुराने सेवक आपकी व आपके परिवार की कई गुप्त बातें जानता है। वाद-विवाद करने पर वह गुप्त बातें सार्वजनिक कर सकता है। जिससे आपके परिवार की प्रतिष्ठा खराब हो सकती है। इसलिए नौकर से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।_

दामाद : – पुत्री के पति को दामाद यानी जमाई कहते हैं। धर्म ग्रंथों में पुत्री के पुत्र (धेवते) को पोत्र समान माना गया है। पुत्र पोत्र के न होने पर धेवता ही उससे संबंधित सभी जिम्मेदारी निभाता है तथा नाना के उत्तर कार्य (पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध आदि) करने का अधिकारी भी होता है। दामाद से इसलिए भी विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका असर आपकी पुत्री के दांपत्य जीवन पर भी पढ़ सकता है।

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हत्वासुरं महिषरूपधरं महोग्रं
मातस्त्वया सुरगणः किल रक्षितोऽयम् ।
कां ते स्तुतिं जननि मन्दधियो विदामो
वेदा गतिं तव यथार्थतया न जग्मुः ॥ ३२ ॥

હે માતા! મહિષ(પાડા) નુ રૂપ ધારણ કરેલા અતિ બળવાન અસુરને મારીને દેવોની રક્ષા કરી છે. હે માં, વેદો પણ તમારા સ્વરૂપને યોગ્ય રીતે જાણતા નથી તો અલ્પ બુદ્ધિવાળા અમે તમારી શી સ્તુતિ કરીએ ?

ભુવનેશ્વરી ભાગવત ૫/૧૯/૩૨

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हत्वासुरं महिषरूपधरं महोग्रं
मातस्त्वया सुरगणः किल रक्षितोऽयम् ।
कां ते स्तुतिं जननि मन्दधियो विदामो
वेदा गतिं तव यथार्थतया न जग्मुः ॥ ३२ ॥

હે માતા! મહિષ(પાડા) નુ રૂપ ધારણ કરેલા અતિ બળવાન અસુરને મારીને દેવોની રક્ષા કરી છે. હે માં, વેદો પણ તમારા સ્વરૂપને યોગ્ય રીતે જાણતા નથી તો અલ્પ બુદ્ધિવાળા અમે તમારી શી સ્તુતિ કરીએ ?

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एकैव शक्तिः परमेश्वरस्य भिन्ना चतुर्धा विनियोगकाले । भोगे भवानी पुरुषेषु विष्णुः कोपेषु काली समरेषु दुर्गा ॥ ५२॥

एका शक्तिश्च शम्भोर्विनिमयनविधौ सा चतुर्धा विभिन्ना क्रोधे काली विजाताच समरसमये सा च चण्डी च दुर्गा । भोगे सृष्टौ नियोगे च सकलजगतां सा भवानी च जाता सर्वेषां रक्षणानुग्रहकरणविधौ तस्य विष्णुर्भवेत्सा ॥ ५२॥

॥ श्रीशिवकामसुन्दरीसहस्रनामस्तोत्रम् ॥

व्यवहार में नाना प्रकार की जो कोई शक्ति उपयोग करते है वो सारी शक्ति परमेश्वर की ही है।
उपयोग करने वाली शक्ति भवानी है।
पुरुषार्थ करने वाली शक्ति लक्ष्मी है।
कोपयमान करने वाली शक्ति दुर्गा है।
और
प्रलय करने वाली शक्ति काली है।

વયવહાર માં જુદા જુદા પ્રકારે જે કાંઈ શક્તિ વપરાય છે તેએ બધી. શક્તિ પરમેશ્વર ની જ છે. ઉપભોગ કરતી વખતની શક્તિ ભવાની છે. પરુષાર્થ માટે વપરાતી શક્તિ લક્ષ્મી તરીકે જાણીતી છે. કોપાયમાન થતી વખત ની શક્તિ દુર્ગા છે અને પ્રલય વખત ની શક્તિ કાલી ગણાય છે.

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🤩मजेदार मस्ती भरे दोहे….

बुरे समय को देखकर, गंजे तू क्यों रोए ।
किसी भी हालत में तेरा बाल न बांका होय।।
🤗🤗🤗🤗🤗🤗
कर्ज़ा देता मित्र को, वह मूर्ख कहलाए।
महामूर्ख वह यार है, जो पैसे लौटाए।।
😇😇😇😇😇😇😇😇
दोस्तो खैनी खाइए, इससे खांसी होय।
फिर उस घर में रात को, चोर घुसे न कोय।।
😆😆😆😆😆😆😆😆😆
दोस्त काले रंग पर, रंग चढ़े न कोय।
लक्स लगाकर कांबली, तेंदुलकर न होय।।
😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊
बूढ़ा बोला, वीर रस मुझसे पढ़ा न जाए।
कहीं दांत का सैट ही, नीचे न गिर जाए।।
🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣
बिना जुर्म के पिटेगा, समझाया था तोय।
पंगा लेकर पुलिस से, साबुत बचा न कोय।।
😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜
दोहों को स्वीकारिये, या दीजे ठुकराय।
जैसे मुझसे बन पड़ा, मैंने आगे दिए सरकाय।।

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  • “चरन् वै मधु बिन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम् । सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरन् ।। चरैवेति।”
  • “An opportunity to work is good luck for me. I put my soul into it. Each such opportunity opens the gates for the next one.”
  • “जो सतत चलते रहते हैं वे ही मधुर फल पाते हैं…सूर्य को देखिए – निरंतर पुरुषार्थ, निरंतर कर्मयोगऔर निरंतर गतिशील……अत: चलते रहे.
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वक्ता

सुलभाः पुरुषा रजन्! सततं प्रियवादिनः । अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥

श्रीमद्वाल्मीकिरामयणे अरण्यकाण्डे सप्तत्रिंशस्सर्गः (२ श्लोक)

अर्थः—अप्रिय अर्थात् कठोर बोलने वाला, किन्तु पथ्य अर्थात् सही मार्ग बताने वाला, हितकारी बोलने वाला वक्ता इस संसार में दुर्लभ होते हैं और साथ ही ऐसी वाणी सुनने वाले श्रोता भी दुर्लभ होते हैं ।
ऐसे बोलने वालों में महात्मा विदुर, श्रीकृष्ण सम्मिलित थे । यथासमय यथावत् बोलना इनका धर्म था । श्रीकृष्ण तो बोलने के साथ कार्यान्वित भी करते थे ।