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मित्र


मित्र

रामायण के अनुसार मित्र के गुणों का वर्णन

आज मित्रता दिवस होने के कारण मित्र कैसा होना चाहिये यह रामायण में उल्लेख आया है जब सुग्रीव और राम जी की मित्रता अग्नि को साक्षी मानकर हनुमान जी ने कराई थी उसी का विवरण नीचे दिया गया है ।

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी ।
तिन्हहि विलोकत पातक भारी।।
निज दुख गिरि सम रज कर जाना ।
मित्रक दुख रज मेरु समाना।।

अर्थात जो मित्र अपने मित्र के दुख को देख कर दुखी न हो उस मित्र को देखने से भी वड़ा पाप लगता है अपना दुख पर्वत के समान होने पर भी उसे रज (धूल )के समान समझना चाहिऐ,और मित्र का दुख रज (धूल) के समान भी हो तो उसे पर्वत के समान समझना चाहिऐ ।अर्थात मित्र के दुख का निराकरण पहिले करना चाहिऐ।अपने दुख का बाद मे ऐसा नही कि मित्र के सामने अपना दुख लेके बैठ जाऐं।

जिन्ह कें असि मति सहज न आई।
ते सठ कत हठि करत मिताई।।
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा।
गुण प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा।।

अर्थात जिन्हें स्वभाव से ही ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है वह मनुष्य हठ करके मित्रता क्यों करते हैं ऐसे व्यक्ति मित्रता करने के अधिकारी नहीं है ।मित्र का धर्म है कि मित्र को गलत रास्ते पर जाने से रोके और उसे अच्छे मार्ग पर ले जाऐ।सदा ही मित्र के गुणों को प्रकट करे और मित्र में जो अवगुण हो वह दूसरों के सामने छुपाऐ।

देत लेत मन शंक न धरई।
वल अनुमान सदा हित करई।।
बिपति काल कर सतगुन नेहा।
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।।

अर्थात मित्र को देते समय या लेते समय मन में शंका नही आना चाहिऐ।जैसे मित्र की मदद कुछ पैसे से कर दी तो मन में यह विचार नही आना चाहिऐ कि मुझे पैसे वापिस मिलेगे या नही यही शंका है।अपने वल (सामर्थ) का अनुमान लगा कर सदा मित्र का हित ही करना चाहिऐ।
मित्र की विपत्ती के समय तो सदा सौ गुणा स्नेह करना चाहिए। वेद कहते हैं श्रेष्ठ मित्र के यही लक्षण है।

आगें कह मृदु वचन वनाई।
पाछें अनहित मन कुटिलाई।।
जाकर चित्त अहि गति सम भाई।
अस कुमित्र परिहरेहिं मिताई।।

अर्थात जो मित्र के सामने बना बना कर मीठे मीठे वचन कहता है और पीठ पीछे यानि बाद मैं मित्र की बुराई करता है तथा मन में कुटिलता रखता है हे भाई जिसका मन साँप की भाँति टेढा है ऐसे कुमित्र को त्यागने में ही भलाई है।

सेवक सठ नृप कृपन कुनारी।
कपटी मित्र शूल सम चारी।।
सखा सोच त्यागहु बल मोंरे।
सब बिधि घटब काज में तोरे।

अर्थात मूर्ख सेवक,कंजूस राजा, कुलटा(चरित्रहीन) स्त्री, और कपटी मित्र,ये चारों शूल के समान पीड़ा देने वाले है। इन्हें जितनी जल्दी हो इनका त्याग कर देने में ही भलाई है । राम जी कहते हे सखा (मित्र) मेरे बल पर अब तुम चिन्ता छोड़ दो ,मैं सब प्रकार से तुम्हारे काम आऊँगा तुम्हारे दुखों को समाप्त कर दूंगा।

राम जी ने पहिले मित्र के दुख का निवारण किया वाली को मारकर सुग्रीव की पत्नी दिलाई राज दिलाया,मित्रता करें तो राम और सुग्रीव जैसी करें ।
।।जय श्री राम ॥

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பிறரிடமும் தன்னைப் போன்ற குணங்கள் இருப்பதைக் கண்டு மகிழ்பவன் அரிது (9824)


WRITTEN BY S NAGARAJAN Post No. 9824 Date uploaded in London – 7 JULY   2021      Contact – swami_48@yahoo.com Pictures are taken from various sources for spreading knowledge; this is a non- commercial blog. Thanks for your great pictures. tamilandvedas.com, swamiindology.blogspot.com டாக்டர் டி.எஸ்.கௌரிபதி திரிபாதி அவர்கள் தேர்வு செய்து வழங்கிய ஐந்து சுபாஷிதங்கள் கட்டுரை எண் 9774 (வெளியான தேதி: 25-6-2021) தரப்பட்டது. […]

பிறரிடமும் தன்னைப் போன்ற குணங்கள் இருப்பதைக் கண்டு மகிழ்பவன் அரிது (9824)
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🌹ત્રણ સાચી વાતો છે🌹

દેવ, દરિયો, ને દાતાર.
👉🏻એ ત્રણ વિના ધન નહિં.

આધિ, વ્યાધિ, ને ઉપાધિ.
👉🏻એ ત્રણ વિના દુઃખ નહિં.

જ્ઞાન, ભક્તિ, ને વૈરાગ્ય.
👉🏻એ ત્રણ વિના ધર્મ નહિં.

ઉત્પત્તિ, સ્થિતિ, ને પ્રલય.
👉🏻એ ત્રણ વિના જગતનાં ખેલ નહિં.

શિંગ, સરિયો, ને પોપટો.
👉🏻એ ત્રણ વિના ધાન્ય નહિં.

વા, ઘા, ને ઘસરકો.
👉🏻એ ત્રણ વિના સંગીત નહિં.

ધાર, અણી, ને ધબાકો.
👉🏻એ ત્રણ વિના હથિયાર નહિં.

ચાવવું , ચૂસવું, ને સબડકો.
👉🏻એ ત્રણ વિના ભોજન નહિં.

વ્યસન, આળસ, અભીમાન.
👉🏻એ ત્રણ જીવનમા સારાં નહિં.

શ્રવણ, મનન, અભ્યાસ.
👉🏻એ ત્રણ વિના વિદ્યા નહિં.

જૂઠ, કરજ,ને કપટ.
👉🏻એ ત્રણ વિના દુઃખ નહિં.

વાત, પિત્ત, ને કફ.
👉🏻એ ત્રણ વિના રોગ નહિં.

ઇંગલા, પિંગલા, ને સુક્ષમણા.
👉🏻એ ત્રણ વિના નાડી નહિ.

સ્વપ્ન, ચિત્ર, ને સાક્ષાત.
👉🏻એ ત્રણ વિના દર્શન નહિં.

રજો, તમો અને સત્વો.
👉🏻એ ત્રણ વિના ગુણ નહિં.

ભુત, ભવિષ્ય, ને વર્તમાન.
👉🏻એ ત્રણ વિના કાળ નહિ.

સંચિત, ક્રિયમાણ, ને પ્રારબ્ધ.
👉🏻એ ત્રણ વિના ક્રિયા નહિં.

સંયમ, સંતોષ, ને સાદાય.
👉🏻એ ત્રણ વિના સુખ નહિં.

જર, જોરૂ, ને જમીન,
👉🏻એ ત્રણ વિના કજીયો નહિં.

વાંચવું, લખવું, ને શીખવું.
👉🏻એ ત્રણ વિના બુદ્ધિનાં હથિયાર નહિં.

પૂછવું, જોવું, ને દવા દેવી.
👉🏻એ ત્રણ વિના વૈદું નહિં.

ક્રૂરતા, કૃપર્ણતા, ને કૃતઘ્નતા.
👉🏻એ ત્રણ વિના મોટું કષ્ટ નહિં.

વિદ્યા, કળા, ને ધન.
👉🏻એ ત્રણ સ્વેદ વિના મળે નહિં.

દુઃખ, દરિદ્રતા, ને પરઘેર રહેવું.
👉🏻એ ત્રણ વિના મોટું દુઃખ નહિં.

પાન, પટેલ, ને પ્રધાન.
👉🏻ત્રણ કાચાં સારાં નહિં.

વૈદ, વેશ્યા, ને વકીલ.
👉🏻એ ત્રણ વિના રોકડિયા નહિં.

ઘંટી, ઘાણી, ને ઉઘરાણી.
👉🏻એ ત્રણ ફેરા ખાધાં વિના પાકે નહિં.

દુર્ગુણ, સદગુણ, ને વખત.
👉🏻એ ત્રણ સ્થિર રહેવાનાં નહિં.

વિદ્યા, હોશિયારી, ને અક્કલ.
👉🏻એ ત્રણ આળસું પાસે જાય નહિં.

વટ, વચન, ને વિવેક.
👉🏻એ ત્રણ વિના શુરવિર નહિં.

નોર, ખરી, ને ડાબલા.
👉🏻એ ત્રણ વિના પશું નહિં.
🟢🔵🟣⚫🟢🟡.

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महाभारत
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ |
समेत्य च व्यपेयातां तद्वद् भूतसमागम: ||

जैसे लकडी के दो टुकडे विशाल सागर में मिलते है तथा एक ही लहर से अलग हो जाते है, उसी तरह दो व्य्क्ति कुछ क्षणों के लिए सहवास में आते है फिर कालचक्र की गती से अलग हो जाते है.

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पंडित कौन है?


पंडित कौन है?

(महाभारत उद्योग पर्व, विदुर प्रजागर, अध्याय 32 से)

आत्म ज्ञान समारम्भस्तितिज्ञा धर्म नित्यता।

यमर्था नापकर्षन्ति सवै पण्डित उच्यते॥

जिसने आत्मज्ञान का अच्छी तरह आरम्भ किया है, जो निकम्मा आलसी कभी न रहे। सुख, दुख, हानि, लाभ, निन्दा, स्तुति, हर्ष शोक न करे, धर्म में ही निश्चिन्त रहे, लुभावनी विषय वासनाओं में आकर्षित न हो वही पण्डित कहलाता है।

निषेवते प्रशन्तानि, निन्दितानि न सेवते।

अनास्तिकः श्रद्वधान, एतत्पण्डित लक्षणम्॥

सदा धर्म युक्त कर्मों में प्रवृत्त रहे, अधर्म युक्त कर्मों का त्याग करें, ईश्वर, वेद और सदाचार पर निष्ठा रखे, एवं श्रद्धालु हो, यह पण्डितों के लक्ष्य है।

क्षिप्रं विजानाति चिरंश्रणोति,

विज्ञायचार्थ भजते न कामात्।

नासम्पृष्टा पयुँक्ते परार्थे,

सत्प्रज्ञानं प्रथम पण्डितस्य॥

जो कठिन विषय को भी शीर्ष जान सके, बहुत समय तक शास्त्रों का पठन, श्रवण और मनन करे, जितना ज्ञान हो उसे परोपकार में लगावे, स्वार्थ भावनाओं का परित्याग करे, अनावश्यक स्थान पर मौन रहे, वह प्रज्ञान पंडित होता है।

नाप्राप्यमभिवाच्छन्ति, नष्ट नेच्छन्ति शोच्तुम्।

आपत्सुच न मुहान्ति, नराः पण्डित बुद्वय॥

जो अयोग्य वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छा न करे, नष्ट हुए पदार्थों के लिये शोक न करे, आपत्ति काल में मोहित होकर कर्तव्य न छोड़े वही बुद्धिमान पण्डित है।

प्रवृत्त वाक् चित्र कथ ऊहवान् प्रतिभान वान्।

आशु प्रथस्य वक्ता चयः स पण्डित उच्यते॥

जिसने विद्याओं का अध्ययन किया है, जो शंकाओं का समाधान करने में समर्थ है, शास्त्रों की व्याख्या कर सकता है, तर्क शील और कुशल वक्ता है वही पण्डित कहला सकता है।

पण्डित कौन है।

(ले.- पं. तुलसीराम शर्मा वृन्दावन)

‘पण्डा आत्मविषया बुद्धिः येषातेहि पण्डिताः’

(गीता. 2।11 शाँकर भाष्त)

आत्म विषयक बुद्धि का नाम पण्डा है और वह बुद्धि जिनमें होवे पण्डित है।

सत्यं तपोज्ञान महिंसताच विद्वत्प्रणाँम च सुशीलताच एतानि। योधारयते सविद्वान न केवलयः पूठतेस विद्वान॥

– सुभाषितरत्न भाण्डागार

सत्य, तप, ज्ञान, अहिंसा, विद्वानों का सत्कार और शीलता ये गुण जिसमें है वह विद्वान (पण्डित) है केवल शास्त्र पढ़ने वाला नहीं।

निषेवते प्रशस्तामि निन्दितानिन सेवते।

अनास्तिकः श्रद्वधान एतत्पंडितलक्षणाम्॥ 21॥

-विदुर नीति अ01

जो सुन्दर कर्मों को करता है निन्दित कर्म नहीं करता, जो नास्तिक नहीं है और श्रद्धावान वह पंडित है।

क्रोधो हषश्च दर्पण ही स्तम्भो मान्यमानिता।

यमर्थान्नाप कर्षन्ति सवै पंडित उच्चते॥22॥

जिस पुरुष को क्रोध, हर्ष, घमण्ड, भय, संकोच एवं बड़प्पन की भावना- अपने कर्तव्य कर्म से लज्जा नहीं हटा सकती है वही पंडित है।

आर्य कर्मणि रज्यन्ते भूति कर्मणि कुर्बते।

हितं च नाभ्यसूयन्ति पंडिता भरतर्पभः ॥30॥

हे धृतराष्ट्र! पण्डित लोग शास्त्रानुकूल मार्ग पर चलते हैं और जिन कर्मों को करने से कल्याण प्राप्त होता है उनको करते हैं हितकारी वाक्यों को प्रेम से सुनते हैं और हितोपदेष्टा का सत्कार करते हैं।

पठकाः पाठ का श्वैव येचान्ये शास्त्र चिन्तकाः।

सर्वे व्यसनिनो मूर्खा वः क्रियावान स पंडितः॥

-म.मा.वन. 313। 110

पढ़ने वाले, पढ़ाने वाले और शास्त्र के चिन्तक ये सब एक प्रकार से व्यसनी हैं परन्तु जो शास्त्र में लिखे पर चलने वाला है वह पण्डित है।

मातृ वतपरदाराणि पर द्वव्याणिलोष्ठवत।

आत्मवत सर्वभूतानि यः पश्यति स पण्डितः॥

-सुभाषितरत्वभाँडागार

पराई स्त्रियों को माता के समान मानता हो, पराये धन को मिट्टी समझता हो, सारे प्राणियों को अपने समान अर्थात् उनके दुख में दुख सुख में सुख मानता हो, वह पंडित है।

नंपडित मतोराम बहु पुस्तक धारणात।

पर लोक भयं यस्यतमाहु पंडित बुधाः॥

-विष्णु धमोत्तर पु0 2।51।13

हे राम! बहुत पुस्तक पढ़ने से पंडित नहीं होता, जिसको परलोक का भय है अर्थात् पाप कर्म से बचा हुआ है उसी को बुद्धिमान पंडित कहते हैं।

आत्मार्थ जीवन लोके अस्मिन्कोन जीवति मानवाः।

परं परोपकार्थच यो जीवति स पंडितः॥

अपने लिए तो इस संसार में कौन नहीं जीता अर्थात् सभी जीते है। परन्तु जो परोपकार के लिए जीवित रहता है वह पंडित है।

युध्यन्ते पक्षि पशवः पठन्ति शुक सारिकाः।

दातु शक्नोति यो दानं स शूरः स च पंडितः॥

लड़ते तो पशु पक्षी भी हैं और पढ़ते तो तोता मैना भी हैं, इसलिए केवल शास्त्रार्थ या पठन पाठन की योग्यता से कोई शूर वीर नहीं होता जो दान दे सकता है अपनी शक्तियों को परमार्थ में लगा सकता है वही शूर है और वही पंडित है।

सर्वनाश समुत्पन्नेह्रार्घत्यजति पंडितः।

अर्धन कुरुते कार्यसर्व नाशो न जायते॥

सर्वनाश सामने आने पर पंडित लोग आधार त्याग देते हैं और आधे से कार्य करते हैं जिससे सर्वनाश नहीं होता।

संत कबीर ने पंडित की बड़ी अच्छी परिभाषा की है-

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय।

ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय॥

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આનંદમ્ પરમ સુખમ્ 👌🏼👌🏼👌🏼એક સાહિત્યપ્રેમી ગ્રુપ દર મહિનાના પહેલા શનિવારે મળે, સાહિત્યની વાતો કરે. પછી એક વિષય નકી કરે અને આવતી બેઠકમાં બધા એ વિષય પર પોતાના વિચારો લખીને લાવે અંતે રજૂ કરે. આ વખતની બેઠકમાં માઈકોફિકશનની વાત થઈ. બને એટલા ઓછા શબ્દોમાં પોતાની વાત ચોટદાર રીતે કહેવી. આવતા વખતનો વિષય નક્કી થયો *આનંદમ્ પરમ સુખમ.*

બધા આ વિષય પર ઓછામાં ઓછા શબ્દોમાં સમજાવવું.
એક મહિનો વીતી ગયો અને સાહિત્યપ્રેમી ગ્રુપની બેઠકમાં આજે ‘આનંદમ પરમ સુખમ’ પર બધાએ પોતાના વિચારો રજૂ કરવાનું શરૂ કર્યું. આનંદમ પરમ સુખમ એટલે?

એક આધેડ ઉમરના કાકા બોલ્યા, ઘરે પહોંચું તો ઓછું જોઈ શકતી મારી વૃદ્ધ મા મારી આહટ ઓળખીને કહે આવી ગયો દીકરા…. એટલે ‘આનંદમ પરમ સુખમ.’એક યુવાન બોલ્યો, *કંઈ વાંધો નહિ, બીજી નોકરી મળી જશે કહેતો...પત્નીનો હિંમત આપતો અવાજ એટલે 'આનંદમ પરમ સુખમ'.*

એક પિતાએ કહ્યું, કંઈ જ કહ્યા વિના બધું સમજી જતું સંતાન એટલે ‘આનંદમ પરમ સુખમ.’

એક ભાઈએ કહ્યું, રોજ ઈશ્વર સમક્ષ કોઈ માગણી વિનાની પ્રાર્થના એટલે ‘આનંદમ પરમ સુખમ.’એક કાકીએ કહ્યું, *રોજ જમતી વખતે આ પ્રભુકૃપા જ છે એનો અહેસાસ એટલે 'આનંદમ પરમ સુખમ્'.* એક કાકા બોલ્યા, *વહેલી સવારે મૉર્નિંગ વૉક પર પાછળથી ધબ્બો મારી... અલ્યા રસીકયા.... કહી વર્ષો પછી મળનાર જૂનો મિત્ર એટલે 'આનંદમ પરમ સુખમ.'* એક દાદા બોલ્યા, *પૌત્રના સ્વરૂપમાં મળી જતો એક નવો મિત્ર એટલે 'આનંદમ્ પરમ સુખમ. '*

બીજા કાકામે કહ્યું, સાસરે ગયેલી દીકરીની ખોટ પૂરી દેતી વહુનો મીઠો રણકો એટલે ‘આનંદમ પરમ સુખમ.’એક યુવતી બોલી, *ઓફિસેથી ઘરે પહોંચતાં સાસુમાએ આપેલો પાણીનો ગ્લાસ એટલે 'આનંદમ પરમ સુખમ'.*

એક મહિલાએ કહ્યું, થાકી ગયાં હોઈએ. ત્યારે વહાલથી પતિનું કહેવું કોઈ એક વસ્તુ બનાવ ચાલશે એટલે ‘આનંદમ પરમ સુખમ.’એક ભાઈએ કહ્યું, *પથારીમાં પડતાંવેત આંખ ક્યારે મીચાઈ જાય એ ખબર પણ ન પડે એટલે 'આનંદમ પરમ સુખમ'.*

આ બધાં ‘આનંદમ પરમ સુખમ’ ની વાતોમાં ક્યાંય પૈસા, મોંઘાં વસ્ત્રો કે દાગીના કે અન્ય ચીજો નથી એ ધ્યાનથી જોજો અને આવી કેટલીયે ‘આનંદમ પરમ સુખમ’ ની ક્ષણો તમારી પાસે છે એ તપાસી ઈશ્વરનો આભાર ચોક્કસ માનજો..
👍🏼🙏🏼

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ભગવાન પાસે બેસ, શાંતિથી.
જરૂરી નથી કે મંદિરમાં,
ઘરના જ કોઈ ખૂણે,
સોફા પર,
ગાર્ડનમાં –
જગ્યા કોઈ પણ હોય,
પણ ત્યાં થોડી શાંતિ હોય.
ભગવાન સાથે તાદાત્મ્ય કેળવવની અનુકૂળતા હોય. બસ તે જ તારા માટે મંદિર છે.

ભગવાન પાસે બેસ,
જેમ એક દીકરો પોતાની માં પાસે બેસે.
કોઈ માંગણી નહિ,
ફરિયાદ નહિ,
વાયદાઓ નહિ,
ઈચ્છાઓ નહિ,
અપેક્ષાઓ નહિ.

ભગવાન પાસે બેસ.
તેને પૂછ.
તમે ખુશ છો,
મારુ જીવન જોઈને ?
શું હું તમને ગમે તેવું જીવન જીવું છું ?
હોંશિયાર નહિ,
સહજ બનો.
ચતુર નહિ,
શરળ બનો.

ભગવાન પાસે બેસ.
દિલ ખોલીને બેસ.
સમાજને ભલે છેતર પણ ભગવાનને છેતરાવાનું છોડ. પોતાના દુર્ગુણો સમાજ પાસે ભલે છુપાવ,
પણ ભગવાન પાસે ના છુપાવ.
જેવો છો તેવો જ બનીને બેસ.

ભગવાન પાસે બેસ.
રોવું આવે તો રડી લે.
હસવું આવે તો હસી લે.
કઈ ના સમજાય તો ચૂપ-ચાપ, છાનો-છપનો બેસ, પણ એકવાર ભગવાન પાસે બેસ.

આપણે મંદિરે જઈને, તીર્થસ્થળે જઈને
પણ ક્યાં ભગવાન પાસે બેસીએ છીએ ?
આપણે મંદિર અને તીર્થસ્થળે પણ પતિ, પત્ની, ભાઈ, કાકા, કાકી, ફુઈ, માસા કે મિત્ર પાસે જ બેસીએ છીએ.
બહુ થયું હવે કોઈ નહિ,
હવે બસ ભગવાન પાસે બેસ.

ખુબ દોડ્યા,
હવે જરા અમથું થોભીએ. ખુબ જોયું બહાર હવે થોડું ભીંતર ડોકિયું કરીએ.

જેને ચાર ધામોમાં,
વૈકુંઠમાં,
વેટિકનમાં અને મક્કામાં શોધ્યો તે તારી ભીંતર,
તારી સાથે, તારામાં જ છે.

તું જ તારું મંદિર ને તું જ તારો ભગવાન. હવે થોડો સમય તું તારી સાથે બેસ. ભગવાન પાસે બેસ.

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₹. ૪ પૈસા.. એટલે શું .? 🛃 ₹.

છોકરો કાંઈક કમાશે તો, 4 પૈસા ઘર માં આવશે.
4 પૈસા કમાશો તો, પાંચ માં પુછાશો ..
અથવા,
4 પૈસા કમાવા માટે, માણસ રાત દિવસ કામ કરે છે..

તો સવાલ છે કે,
આ કહેવાતો માં 4 પૈસા જ કેમ 3 પૈસા નહીં 5 પૈસા નહીં ..❓❓

🙏🏻 તો 4 પૈસા કમાવાની કહેવતને વડીલો પાસેથી માર્મિક વિગતો જાણી તેને સમજીએ..

👉🏻 પહેલો પૈસો કૂવા માં નાંખવાનો.
👉🏻 બીજા પૈસા થી પાછળનું દેવું (કરજ) ઉતારવાનું.
👉🏻 ત્રીજા પૈસા થી આગળનું દેવું ચૂકવવાનું.
👉🏻 ચોથો પૈસો આગળ માટે જમા કરવાનો….

👍🏻 હજુ વાતની ગુઢતા વિગતે સમજીએ.

1. એક પૈસો કૂવા માં નાંખવાનો.
એટલે કે,
પોતાના પરિવાર અને સંતાનનો પેટ રૂપી ખાડો(કુવો) પુરવા માટે વાપરવાનો.

2. બીજો પૈસો પાછળ (પિતૃઓ)નું દેવું (કરજ) ઉતારવા માટે વાપરવો.
પોતાના માતા પિતાની સેવા માટે..,
તેમણે આપણું જતન કર્યું, પાલન પોષણ કરી મોટા કર્યા તો, તે કરજ ઉતારવા માટે.

3. ત્રીજો પૈસો આગળ (સંતાનો)નું દેવું ચૂકવવા માટે વાપરવાનો
પોતાના સંતાનને ભણાવી, ગણાવીને આગળ ઉચ્ચ અભ્યાસ માટે.
(એટલે કે ભવિષ્યનું દેવું)

4. ચોથા પૈસાને આગળ (પુણ્ય) જમા કરવા માટે વાપરવાનો.
એટલે કે, શુભ પ્રસંગ અશુભ પ્રસંગ, દાન અર્થે, સંતોની સેવા અર્થે અને અસહાયની મદદ માટે ..!

👌🏻
તો.. આ છે, 4 પૈસા કમાવાની વાત ..!
✍🏼 🙏🏻।। जय श्री हरि ।।

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त्वमेव माता च पिता त्वमेव,



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त्वमेव माता च पिता त्वमेव,
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव
त्वमेव विद्या च द्रविणं त्वमेव,
त्वमेव सर्वम् मम देवदेवं।।
सरल-सा अर्थ है- ‘हे भगवान! तुम्हीं माता हो, तुम्हीं पिता, तुम्हीं बंधु, तुम्हीं सखा हो। तुम्हीं विद्या हो, तुम्हीं द्रव्य, तुम्हीं सब कुछ हो। तुम ही मेरे देवता हो।’

बचपन से प्रायः यह प्रार्थना सबने पढ़ी है।

मैंने ‘अपने रटे हुए’ कम से कम 50 मित्रों से पूछा होगा, ‘द्रविणं’ का क्या अर्थ है? संयोग देखिए एक भी न बता पाया। अच्छे खासे पढ़े-लिखे भी। एक ही शब्द ‘द्रविणं’ पर सोच में पड़ गए।

द्रविणं पर चकराते हैं और अर्थ जानकर चौंक पड़ते हैं। द्रविणं जिसका अर्थ है द्रव्य, धन-संपत्ति। द्रव्य जो तरल है, निरंतर प्रवाहमान। यानी वह जो कभी स्थिर नहीं रहता। आखिर ‘लक्ष्मी’ भी कहीं टिकती है क्या!

कितनी सुंदर प्रार्थना है और उतना ही प्रेरक उसका ‘वरीयता क्रम’। ज़रा देखिए तो! समझिए तो!

सबसे पहले माता क्योंकि वह है तो फिर संसार में किसी की जरूरत ही नहीं। इसलिए हे प्रभु! तुम माता हो!

फिर पिता, अतः हे ईश्वर! तुम पिता हो! दोनों नहीं हैं तो फिर भाई ही काम आएंगे। इसलिए तीसरे क्रम पर भगवान से भाई का रिश्ता जोड़ा है।

जिसकी न माता रही, न पिता, न भाई तब सखा काम आ सकते हैं, अतः सखा त्वमेवं!

वे भी नहीं तो आपकी विद्या ही काम आना है। यदि जीवन के संघर्ष में नियति ने आपको निपट अकेला छोड़ दिया है तब आपका ज्ञान ही आपका भगवान बन सकेगा। यही इसका संकेत है।

और सबसे अंत में ‘द्रविणं’ अर्थात धन। जब कोई पास न हो तब हे देवता तुम्हीं धन हो।

रह-रहकर सोचता हूं कि प्रार्थनाकार ने वरीयता क्रम में जो धन-द्रविणं को सबसे पीछे अर्थात सबसे नीचे रखा है , आजकल हमारे आचरण में वह सबसे ऊपर क्यों आ जाता है ? 😧😧इतना कि उसे ऊपर लाने के लिए माता से पिता तक, बंधु से सखा तक सब नीचे चले जाते हैं, पीछे छूट जाते हैं।
वह कीमती है, पर उससे ज्यादा कीमती और भी बहुत कुछ हैं। “उससे बहुत ऊँचे आपके अपने” है ।
बार-बार ख्याल आता है, द्रविणं सबसे पीछे बाकी रिश्ते ऊपर। बाकी लगातार ऊपर से ऊपर, धन क्रमश: नीचे से नीचे!
याद रखिये दुनिया में झगड़ा रोटी का नहीं थाली का है! वरना वह रोटी तो सबको देता ही है!
चांदी की थाली यदि कभी आपके वरीयता क्रम को पलटने लगे, तो इस प्रार्थना को जरूर याद कर लीजिये

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यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते


यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुंजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ।।

यज्ञ से बचे हुए अन्न को खानेवाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपना शरीर-पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं !

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।

यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्।।9.27।।

।।9.27।। हे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो।।

प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्‌ ॥

भावार्थ : मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाला प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर अग्नि रूप होकर चार (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य, ऐसे चार प्रकार के अन्न होते हैं, उनमें जो चबाकर खाया जाता है, वह ‘भक्ष्य’ है- जैसे रोटी आदि। जो निगला जाता है, वह ‘भोज्य’ है- जैसे दूध आदि तथा जो चाटा जाता है, वह ‘लेह्य’ है- जैसे चटनी आदि और जो चूसा जाता है, वह ‘चोष्य’ है- जैसे ईख आदि) प्रकार के अन्न को पचाता हूँ॥14॥