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वृक्ष का महत्व

तस्मात् तडागे सद्वृक्षा रोप्याः श्रेयोऽर्थिना सदा ।
पुत्रवत् परिपाल्याश्च पुत्रास्ते धर्मतः स्मृताः ॥ ३१ ॥

अर्थ- इसलिये अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको सदा ही उचित है कि वह अपने खोदवाये हुए तालाबके किनारे अच्छे-अच्छे वृक्ष लगाये और उनका पुत्रोंके समान पालन करे; क्योंकि वे वृक्ष धर्मकी दृष्टिसे पुत्र ही माने गये हैं ॥ ३१ ॥

महाभारतम् अनुशासनपर्व ५८

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नीचे जो चित्र भेजा गया है, इसका ध्यान से अवलोकन करिये ………… सात प्रकार की शिक्षा देने वाला है शायद य़ह चित्र….जिन्हें आप ठीक से जान सकते हो……

1. हर अवसर लपक लेने के लिए ही नहीं है, कई बार धोखा भी हो सकता है l

2. दूसरे को तबाह करने के लिए कई बार लोग इतने अंधे हो जाते हैं कि खुद को ही तबाह कर लेते है l

3.हर योद्धा हर मैदान में जंग नहीं जीत सकता l हमें पता होना चाहिए कौन सा मैदान हमारे लिए सबसे उपयुक्त है l यह मैदान कुत्ते का नहीं उस पक्षी का था l

4. हर एक की एक सीमा होती है – अपनी सीमा को पहचानिए l

5. कोई उकसाये तो कई बार उसका उपयुक्त जवाब, उकसावे में न आकर – लड़ाई न करना है l

6. हर काम अकेले नहीं हो सकता, कई बार कुछ हासिल करने के लिए आपके पास एक टीम होनी चाहिए, लेकिन आप टीम के प्रति बफादार भी होने चाहिए स्वार्थी नही…

7.वही करिये जो आप सबसे बेहतर कर सकते है, वो नहीं – जो आपकी जान ही ले ले।

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પ્રયત્ન


શું તમે જાણો છો કે સિંહો તેમના શિકાર કરવાના એક ચતુર્થાંશ પ્રયાસોમાં જ સફળ થાય છે ? – તેનો અર્થ એ છે કે તેઓ તેમના 75% પ્રયાસોમાં નિષ્ફળ જાય છે અને તેમાંથી માત્ર 25%માં જ સફળ થાય છે.

અને મોટાભાગના શિકારી પ્રાણીઓ માટે આ સામાન્ય હકીકત છે છતાં તેઓ તેમના શિકારનો પીછો કરવામાં અને શિકાર કરવાના પ્રયત્નોમાં નિરાશ થતા નથી.

કેટલાક લોકો વિચારે છે તેમ આનું મુખ્ય કારણ ભૂખ છે પરંતુ તેમ નથી, તે “વ્યર્થ પ્રયાસોના કાયદા” (Law of Wasted Efforts ) ની સમજ છે જે સહજ રીતે પ્રાણીઓમાં પ્રવર્તમાન છે , એક કાયદો જેના દ્વારા # પ્રકૃતિ સંચાલિત છે.

માછલીના અડધા ઈંડા ખવાઈ જાય છે…અડધા રીંછબાળ તરુણાવસ્થા પહેલા મરી જાય છે… વિશ્વનો મોટા ભાગનો વરસાદ મહાસાગરોમાં પડે છે… અને મોટાભાગના વૃક્ષોના બીજ પક્ષીઓ ખાઈ જાય છે.

વૈજ્ઞાનિકોએ શોધી કાઢ્યું છે કે પ્રાણીઓ, વૃક્ષો અને પ્રકૃતિની અન્ય શક્તિઓ માટે “વ્યર્થ પ્રયત્નો” (Wasted efforts) નો કાયદો વધુ સ્વીકાર્ય છે.

ફક્ત માણસો જ એમ વિચારે છે કે થોડા પ્રયત્નોમાં સફળતાનો અભાવ એ નિષ્ફળતા છે… પરંતુ સત્ય એ છે કે: આપણે ત્યારે જ નિષ્ફળ જઈએ છીએ જ્યારે આપણે પ્રયત્ન કરવાનું બંધ કરીએ છીએ.

સફળતા એ નથી કે મુશ્કેલીઓ અને પછડાટથી મુક્ત જીવન જીવવું… પરંતુ સફળતા એ છે કે તમારી ભૂલો પાર પાડી ને આગળ ચાલવું , તમારા પ્રયાસ વ્યર્થ જાય તો દરેક તબક્કે પ્રયાસ ચાલુ રાખવા.

સારાંશ સરળતાથી કહીએ તો ફરીથી પ્રયાસ ચાલુ રાખો.

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આપણા પૂર્વજોનું અણમોલ જ્ઞાન

10, 100, 1,000, 10,000

જેમ જેમ પૈસા વધતા જાય તેમ તેમ શૂન્યતા વધતી જાય છે !!

એટલે જ

આપણા પૂર્વજો એ વ્યવહાર મા

11, 21, 51, 101, 501 , 1,001

આપવાનો રિવાજ બનાવ્યો , જેથી વ્યવહાર મા 1(એકતા) રહે , 0(શૂન્યતા) નહીં !!!!

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કોઈના આંસુ લૂછવાની
મજા કંઈક ઔર છે,

બા ને ઓછું સંભળાય છે,
પણ કેમછો પૂછવાની
મજા કંઈક ઔર છે.

ભલે પડખા ફેરવી ને સુતા હોઇએ વ્યવસ્થિત ઝગડા પછી,
અડધી રાતે ઉઠીને ચાદર ઓઢાડવાની
મજા કંઈક ઔર છે.

હા , વઢસે હજી ને ગુસ્સો પણ કરશે અને કંઈ બોલી પણ નહીં શકો,
પરંતુ કોઈને મનાવાની ઉંમરે પિતાથી રીસાવાની
મજા કંઈક ઔર છે.

બાકી ભલે ભડભાદર થઇ ફરતા હો આખા ગામમાં,
ક્યારેક ભાંગી પડો તો માંના ખોળામાં ડુસકા સાથે રડવાની
મજા કંઈક ઔર છે.

નહીં ગળે મળી શકો હવે કે
નહીં એને વઢેલા શબ્દો પાછા લઇ શકો,
બસ ભીની આંખે બેનની રાખડીને ચૂમવાની
મજા કંઈક ઔર છે.

કાયમ કંઈ ભેગો નથી રહેવાનો, એને પણ એની જવાબદારીઓ છે,
દોસ્ત જયારે પણ મળે, બે ગાળ દઈ દેવાની
મજા કંઈક ઔર છે.

હા, દોસ્તોએ કાયમ મારા આંસુઓને ખભો ધર્યો છે,
આમ તો બધી અંગત વાતો છે પણ કહી દેવાની
મજા કંઈક ઔર છે.

અને છેલ્લે…

ખબરછે ત્યાં મળવાનો પણ નથી,
છતાં મંદિરમાં પથ્થરની મૂર્તિ સ્વરૂપે ભગવાન પાસે જઇ,
પોતાનાં મનની બે વાત કરી,
પ્રાર્થના કરવાની
મજા કંઇ ઔર છે.

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अजातमृत मूर्खाणां वरमाद्यौ न चान्तिमः,
सकृद् दुखकरा वाद्याव अन्तिमस्तु पदे पदे ।।

भावार्थः- किसी को संतान न हो, अथवा संतान होकर मर गयी हो तो बहुत दुःख की बात है। किन्तु यदि संतान होकर वह मूर्ख, नालायक या दुष्ट प्रकृति की हो जाये तो जीवन भर दुःख ही दुःख देता है।

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कन्या- विवाह विचार

तिस्रो भार्या ब्राह्मणस्य द्वे भार्ये क्षत्रियस्य तु ।
वैश्यः स्वजात्यां विन्देत तास्वपत्यं समं भवेत् ॥ ११ ॥

अर्थ -ब्राह्मणके लिये तीन भार्याएँ बतायी गयी हैं (ब्राह्मण-कन्या, क्षत्रिय-कन्या और वैश्य-कन्या), क्षत्रियके लिये दो भार्याएँ कही गयी हैं (क्षत्रिय-कन्या और वैश्य-कन्या) । वैश्य केवल अपनी ही जातिकी कन्याके साथ विवाह करे। इन स्त्रियोंसे जो संतानें उत्पन्न होती हैं वे पिताके समान वर्णवाली होती हैं (माताओंके कुल या वर्णके कारण उनमें कोई तारतम्य नहीं होता) ।
महाभारतम् अनुशासनपर्व ४४

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समय के साथ चलिए वरना ??????

“`1998 में Kodak में 1,70,000 कर्मचारी काम करते थे और वो दुनिया का 85% फ़ोटो पेपर बेचते थे..चंद सालों में ही Digital photography ने उनको बाज़ार से बाहर कर दिया.. Kodak दिवालिया हो गयी और उनके सब कर्मचारी सड़क पे आ गए।

HMT (घडी)
BAJAJ (स्कूटर)
DYNORA (टीवी)
MURPHY (रेडियो)
NOKIA (मोबाइल)
RAJDOOT (बाईक)
AMBASDOR (कार)
Audio /video (रील कैसेट)

मित्रों,
इन सभी की गुणवक्ता में कोई कमी नहीं थी फिर भी बाजार से बाहर हो गए!!
कारण???
उन्होंने समय के साथ बदलाव नहीं किया.!!

आपको अंदाजा है कि आने वाले 10 सालों में दुनिया पूरी तरह बदल जायेगी और आज चलने वाले 70 से 90% उद्योग बंद हो जायेंगे।

चौथी औद्योगिक क्रान्ति में आपका स्वागत है…

Uber सिर्फ एक software है। उनकी अपनी खुद की एक भी Car नहीं इसके बावजूद वो दुनिया की सबसे बड़ी Taxi Company है।

Airbnb दुनिया की सबसे बड़ी Hotel Company है, जब कि उनके पास अपना खुद का एक भी होटल नहीं है।

Paytm, ola cabs , oyo rooms जैसे अनेक उदाहरण हैं।

US में अब युवा वकीलों के लिए कोई काम नहीं बचा है, क्यों कि IBM Watson नामक Software पल भर में ज़्यादा बेहतर Legal Advice दे देता है। अगले 10 साल में US के 90% वकील बेरोजगार हो जायेंगे… जो 10% बचेंगे… वो Super Specialists होंगे।

Watson नामक Software मनुष्य की तुलना में Cancer का Diagnosis 4 गुना ज़्यादा Accuracy से करता है। 2030 तक Computer मनुष्य से ज़्यादा Intelligent हो जाएगा।

अगले 10 सालों में दुनिया भर की सड़कों से 90% cars गायब हो जायेंगी… जो बचेंगी वो या तो Electric Cars होंगी या फिर Hybrid…सडकें खाली होंगी,Petrol की खपत 90% घट जायेगी,सारे अरब देश दिवालिया हो जायेंगे।

आप Uber जैसे एक Software से Car मंगाएंगे और कुछ ही क्षणों में एक Driverless कार आपके दरवाज़े पे खड़ी होगी…उसे यदि आप किसी के साथ शेयर कर लेंगे तो वो ride आपकी Bike से भी सस्ती पड़ेगी।

Cars के Driverless होने के कारण 99% Accidents होने बंद हो जायेंगे.. इस से Car Insurance नामक धन्धा बंद हो जाएगा।

ड्राईवर जैसा कोई रोज़गार धरती पे नहीं बचेगा। जब शहरों और सड़कों से 90% Cars गायब हो जायेंगी, तो Traffic और Parking जैसी समस्याएं स्वतः समाप्त हो जायेंगी… क्योंकि एक कार आज की 20 Cars के बराबर होगी।

आज से 5 या 10 साल पहले ऐसी कोई ऐसी जगह नहीं होती थी जहां PCO न हो। फिर जब सब की जेब में मोबाइल फोन आ गया, तो PCO बंद होने लगे.. फिर उन सब PCO वालों ने फोन का recharge बेचना शुरू कर दिया। अब तो रिचार्ज भी ऑन लाइन होने लगा है।

आपने कभी ध्यान दिया है..?

आजकल बाज़ार में हर तीसरी दुकान आजकल मोबाइल फोन की है।
sale, service, recharge , accessories, repair, maintenance की।

अब सब Paytm से हो जाता है.. अब तो लोग रेल का टिकट भी अपने फोन से ही बुक कराने लगे हैं.. अब पैसे का लेनदेन भी बदल रहा है.. Currency Note की जगह पहले Plastic Money ने ली और अब Digital हो गया है लेनदेन।

दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है.. आँख कान नाक खुले रखिये वरना आप पीछे छूट जायेंगे..।

समय के साथ बदलने की तैयारी करें।

इसलिए…
व्यक्ति को समयानुसार अपने व्यापार एवं अपने स्वभाव में भी बदलाव करते रहना चाहिये।

“Time to Time Update & Upgrade”
समय के साथ चलिये और सफलता पाईये ।` समय के साथ चलने का एकमात्र उपाय है…..Vision, Trend, Technology.

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ब्राह्मण निंदा


परिवादं च ये कुर्युर्ब्राह्मणानामचेतसः ।
सत्यं ब्रवीमि ते राजन् विनश्येयुर्न संशयः ॥ १८ ॥

अर्थ – राजन्! मैं तुमसे यह सच्ची बात बता रहा हूँ कि जो मूढ़ मानव ब्राह्मणोंकी निन्दा करते हैं वे नष्ट हो जाते हैं- इसमें संशय नहीं है ।

महाभारतम् अनुशासनपर्व ३३

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महाकवि भवभूति


महाकवि भवभूति :: एको रसः करुण एव ::लोकाराधन

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भवभूति चिन्तक- कवि तो थे ही |,

भवभूति ही थे , जिन्होंने एक मौलिक बात कही थी कि >>

एको रसः करुण एव निमित्तभेदाद्भिन्न: पृथक पृथगिव श्रयते विवर्तान् ।

आवर्त बुदबुदतरंगमयान्विकारान्नंभो यथा सलिलमेव हि तत्समग्रम् ।।

रस कितने हैं और प्रधान रस कौन सा है ,इसे लेकर अनेक आचार्यों ने अनेक बातें कहीं किन्तु महाकवि भवभूति ने बडे स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिस प्रकार आवर्त- भंवर, बुदबुद्, तरंग आदि में परिवर्तित जल, एक जल ही तो है ,उसी प्रकार रस तो केवल एक ही है और वह है >करुण , प्रकारान्तर से वह करुण ही भिन्न-भिन्न रूपों मे प्रकट होता है या यों कहें कि चित्त द्रवीभूत होता है और वह निमित्त भेद से भिन्न-भिन्न मनोविकारों में परिवर्तित हो जाता है ।

लोकाराधन

महाकवि भवभूति ने लोकाराधन को इतना महत्व दिया कि उत्तररामचरित मेँ राम से कहलाया कि लोकाराधन में यदि मेरा व्यक्तिगत स्नेह ,मित्रता या दया या स्वयं सीता भी बाधा बनती है तो सीता को भी त्यागने में मुझे संकोच नहीं होगा >>>

स्नेहं दयां च सख्यं च यदि वा जानकीमपि ।

आराधनाय लोकानां मुंचतो नास्ति मेँ व्यथा।

कालो ह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी

किन्तु भवभूति ने तिरस्कार भी बहुत सहा था ,जब उनकी अवज्ञा की गयी थी

तब उन्होंने कहा कि >>>

ये नाम केचिदिह न: प्रथयन्त्यवज्ञां , जानन्ति ते किमपि तान्प्रति नैष यत्न :।

उत्पत्स्यते मम तु कोपि समानधर्मा कालो ह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी ।

~ [मालतीमाधव १-६]

वे तिरस्कार करने वाले कितना जानते हैं ?

किमपि !

ठीक है , मेरा लेखन उनके लिये नहीं है !

यह धरती बहुत बडी है , काल भी असीम है , कभी तो कोई मेरा समानधर्मा उत्पन्न होगा ,जो संवेदना से मेरी बात समझ सकेगा , जो मेरे विचार को आत्मसात कर सकेगा !