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हत्वासुरं महिषरूपधरं महोग्रं
मातस्त्वया सुरगणः किल रक्षितोऽयम् ।
कां ते स्तुतिं जननि मन्दधियो विदामो
वेदा गतिं तव यथार्थतया न जग्मुः ॥ ३२ ॥

હે માતા! મહિષ(પાડા) નુ રૂપ ધારણ કરેલા અતિ બળવાન અસુરને મારીને દેવોની રક્ષા કરી છે. હે માં, વેદો પણ તમારા સ્વરૂપને યોગ્ય રીતે જાણતા નથી તો અલ્પ બુદ્ધિવાળા અમે તમારી શી સ્તુતિ કરીએ ?

ભુવનેશ્વરી ભાગવત ૫/૧૯/૩૨

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हत्वासुरं महिषरूपधरं महोग्रं
मातस्त्वया सुरगणः किल रक्षितोऽयम् ।
कां ते स्तुतिं जननि मन्दधियो विदामो
वेदा गतिं तव यथार्थतया न जग्मुः ॥ ३२ ॥

હે માતા! મહિષ(પાડા) નુ રૂપ ધારણ કરેલા અતિ બળવાન અસુરને મારીને દેવોની રક્ષા કરી છે. હે માં, વેદો પણ તમારા સ્વરૂપને યોગ્ય રીતે જાણતા નથી તો અલ્પ બુદ્ધિવાળા અમે તમારી શી સ્તુતિ કરીએ ?

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एकैव शक्तिः परमेश्वरस्य भिन्ना चतुर्धा विनियोगकाले । भोगे भवानी पुरुषेषु विष्णुः कोपेषु काली समरेषु दुर्गा ॥ ५२॥

एका शक्तिश्च शम्भोर्विनिमयनविधौ सा चतुर्धा विभिन्ना क्रोधे काली विजाताच समरसमये सा च चण्डी च दुर्गा । भोगे सृष्टौ नियोगे च सकलजगतां सा भवानी च जाता सर्वेषां रक्षणानुग्रहकरणविधौ तस्य विष्णुर्भवेत्सा ॥ ५२॥

॥ श्रीशिवकामसुन्दरीसहस्रनामस्तोत्रम् ॥

व्यवहार में नाना प्रकार की जो कोई शक्ति उपयोग करते है वो सारी शक्ति परमेश्वर की ही है।
उपयोग करने वाली शक्ति भवानी है।
पुरुषार्थ करने वाली शक्ति लक्ष्मी है।
कोपयमान करने वाली शक्ति दुर्गा है।
और
प्रलय करने वाली शक्ति काली है।

વયવહાર માં જુદા જુદા પ્રકારે જે કાંઈ શક્તિ વપરાય છે તેએ બધી. શક્તિ પરમેશ્વર ની જ છે. ઉપભોગ કરતી વખતની શક્તિ ભવાની છે. પરુષાર્થ માટે વપરાતી શક્તિ લક્ષ્મી તરીકે જાણીતી છે. કોપાયમાન થતી વખત ની શક્તિ દુર્ગા છે અને પ્રલય વખત ની શક્તિ કાલી ગણાય છે.

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🤩मजेदार मस्ती भरे दोहे….

बुरे समय को देखकर, गंजे तू क्यों रोए ।
किसी भी हालत में तेरा बाल न बांका होय।।
🤗🤗🤗🤗🤗🤗
कर्ज़ा देता मित्र को, वह मूर्ख कहलाए।
महामूर्ख वह यार है, जो पैसे लौटाए।।
😇😇😇😇😇😇😇😇
दोस्तो खैनी खाइए, इससे खांसी होय।
फिर उस घर में रात को, चोर घुसे न कोय।।
😆😆😆😆😆😆😆😆😆
दोस्त काले रंग पर, रंग चढ़े न कोय।
लक्स लगाकर कांबली, तेंदुलकर न होय।।
😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊
बूढ़ा बोला, वीर रस मुझसे पढ़ा न जाए।
कहीं दांत का सैट ही, नीचे न गिर जाए।।
🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣
बिना जुर्म के पिटेगा, समझाया था तोय।
पंगा लेकर पुलिस से, साबुत बचा न कोय।।
😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜
दोहों को स्वीकारिये, या दीजे ठुकराय।
जैसे मुझसे बन पड़ा, मैंने आगे दिए सरकाय।।

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  • “चरन् वै मधु बिन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम् । सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरन् ।। चरैवेति।”
  • “An opportunity to work is good luck for me. I put my soul into it. Each such opportunity opens the gates for the next one.”
  • “जो सतत चलते रहते हैं वे ही मधुर फल पाते हैं…सूर्य को देखिए – निरंतर पुरुषार्थ, निरंतर कर्मयोगऔर निरंतर गतिशील……अत: चलते रहे.
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वक्ता

सुलभाः पुरुषा रजन्! सततं प्रियवादिनः । अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥

श्रीमद्वाल्मीकिरामयणे अरण्यकाण्डे सप्तत्रिंशस्सर्गः (२ श्लोक)

अर्थः—अप्रिय अर्थात् कठोर बोलने वाला, किन्तु पथ्य अर्थात् सही मार्ग बताने वाला, हितकारी बोलने वाला वक्ता इस संसार में दुर्लभ होते हैं और साथ ही ऐसी वाणी सुनने वाले श्रोता भी दुर्लभ होते हैं ।
ऐसे बोलने वालों में महात्मा विदुर, श्रीकृष्ण सम्मिलित थे । यथासमय यथावत् बोलना इनका धर्म था । श्रीकृष्ण तो बोलने के साथ कार्यान्वित भी करते थे ।
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विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष :

#अरण्यानी_सूक्त

अरण्यान्यरण्यान्यसौ या प्रेव नश्यसि
कथाग्रामं न पृछसि न त्वा भीरिव विन्दतीऽऽऽन्
हे अरण्य देवते! वन में जो तू देखते-देखते ही अन्तर्धान हो जाती है, वह तू नगर-ग्राम की कुछ विचारणा कैसे नहीं करती? निर्जन अरण्य में ही क्यों जाती हो? तुझे डर भी नहीं लगता?

वृषारवाय वदते यदुपावति चिच्चिकः
आघाटिभिरिवधावयन्नरण्यानिर्महीयते
ओर से बड़ी आवाज़ से शब्द करनेवाले प्राणी के समीप जब ची-ची शब्द करनेवाले प्राणी प्राप्त होता है, उस समय मानो वीणा के स्वरों के समान स्वरोच्चारण करके अरण्य देवता का यशोगान करता है।

उत गाव इवादन्त्युत वेश्मेव दृश्यते
उतो अरण्यानिःसायं शकटीरिव सर्जति
और गौवों के समान अन्य प्राणि भी इस अरण्य में रहते हैं और लता-गुल्म आदि गृह के समान दिखाई देते हैं। और सायंकाल के समय वन से विपुल गाड़ियाँ चारा, लकड़ी आदि लेकर निकलती हैं- मानो अरण्यदेवता उन्हें अपने घर भेज रहे हैं।

गामङ्गैष आ ह्वयति दार्वङ्गैषो अपावधीत्
वसन्नरण्यान्यां सायमक्रुक्षदिति मन्यते
हे अरण्य देवता! यह एक पुरुष गाय को बुला रहा है और दूसरा काष्ठ काट रहा है। रात्रि में अरण्य में रहनेवाला मनुष्य नानाविध शब्द सुनकर कोई भयभीत होकर पुकारता है, ऐसे मानता है।

न वा अरण्यानिर्हन्त्यन्यश्चेन्नाभिगछति
स्वादोःफलस्य जग्ध्वाय यथाकामं नि पद्यते
अरण्यानि किसी की हिंसा नहीं करती। और दूसरा भी कोई उस पर आक्रमण नहीं करता। वह मधुर फलों का आहार करके अपनी इच्छा के अनुसार सुख से रहता है।

आञ्जनगन्धिं सुरभिं बह्वन्नामकृषीवलाम्
प्राहम्मृगाणां मातरमरण्यानिमशंसिषम्
कस्तूरी आदि उत्तम सुवास से युक्त, सुगंधी, विपुल फल-मूलादि भक्ष्य अन्न से पूर्ण, कृषिवलों से रहित और मृगों की माता- ऐसी अरण्यानि की मैं स्तुति करता हूँ।
—#ऋग्वेद, 10.146.1-6