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अग्य अकोबिद अंध अभागी।
काई बिषय मुकुर मन लागी।।
लंपट कपटी कुटिल बिसेषी।
सपनेहु सन्त सभा नहि देखी।।
कहहि ते बेद असंमत बानी।
जिन्ह के सूझ लाभु नहिं हानी।।
मुकुर मलिन अरु नयन बिहीना।
राम रूप देखहिं किमि दीना।।
जिन्ह के अगुन न सगुन बिबेका।
जल्पहिं कल्पित बचन अनेका।।
हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं।
तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं।।
बातुल भूत बिबस मतवारे।
ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे।।
जिन्ह कृत महामोह मद माना।
तिन्ह कर कहा करिय नहिं काना।।

ऐसे मनुष्य जो अज्ञानी (धर्म -अधर्म का ज्ञान नही है ) मूर्ख है अंध है(जो आँखे होने का बाद भी विवेकपूर्ण दृष्टि नही रखते है) भाग्यहीन है (जिन ने जीवन मे कभी भी सत्कर्म न किये हो) जिनके हृदय मलिन हो जो व्यभिचारी छली कुटिल हो जिन्होंने कभी भी सज्जनो सत्पुरुषों की संगति न कि हो जो अपने अलाबा कभी परिवार समाज और देश के हानि लाभ की परवाह न करते हो ऐसे मनुष्य मनुष्य होकर भी कीट पतंगों के समान होते है ऐसे लोग ईश्वर के अगुन(निर्गुण) और सगुन रूप और भेद को क्या समझेगे ऐसे लोग ईश्वर को क्या जानेंगे और ईश्वर के बारे में क्या बोलेगे ये तो पशुओं के समान प्रकृति के बसीभूत होकर यहां वहां भटकते है ये कब कहा क्या बोलेगे कैसा आचरण करेगे अर्थात ये कही भी कुछ भी कह सकते है और कुछ भी कर सकते है इनके भाव , भावनाये ,विचार और कर्म स्थिर नही रहते है ये मोह लोभ और मद में हमेशा चूर रहते है इनके मन बचन और कर्म सदा बिना विचार और बिना विवेक के से किये जाते है ऐसे लोग कितने भी ऊंचे पद और प्रतिष्ठा वाले क्यो न हो कभी भी इनके वचन और कर्मो को अनुशरण नही करना चाहिए।

गो श्री तुलसीदास जी
श्री रामचरितमानस-बालकाण्ड
दोहा-114.1 से 114.8
सादर नमस्कार
देव ब्रत चतुर्वेदी-पन्ना(मप्र)

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हिन्दी दिवस पर थोडा़ आनंद लीजिये
मुस्कराइये

हिंदी के मुहावरे, बड़े ही बावरे हैं
खाने पीने की चीजों से भरे हैं
कहीं पर फल है तो कहीं आटा-दालें हैं
कहीं पर मिठाई है, कहीं पर मसाले हैं
चलो, फलों से ही शुरू कर लेते हैं
एक एक कर सबके मजे लेते हैं

आम के आम और गुठलियों के भी दाम मिलते हैं,
कभी अंगूर खट्टे हैं
कभी खरबूजे, खरबूजे को देख कर रंग बदलते हैं
कहीं दाल में काला है
तो कहीं किसी की दाल ही नहीं गलती है

कोई डेड़ चावल की खिचड़ी पकाता है
तो कोई लोहे के चने चबाता है
कोई घर बैठा रोटियां तोड़ता है
कोई दाल भात में मूसरचंद बन जाता है
मुफलिसी में जब आटा गीला होता है
तो आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाता है

सफलता के लिए कई पापड़ बेलने पड़ते है
आटे में नमक तो चल जाता है
पर गेंहू के साथ, घुन भी पिस जाता है
अपना हाल तो बेहाल है, ये मुंह और मसूर की दाल है

गुड़ खाते हैं और गुलगुले से परहेज करते हैं,
और कभी गुड़ का गोबर कर बैठते हैं
कभी तिल का ताड़, कभी राई का पहाड़ बनता है
कभी ऊँट के मुंह में जीरा है
कभी कोई जले पर नमक छिड़कता है,
किसी के दांत दूध के हैं
तो कई दूध के धुले हैं

कोई जामुन के रंग सी चमड़ी पा के रोई है
तो किसी की चमड़ी जैसे मैदे की लोई है
किसी को छटी का दूध याद आ जाता है
दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक पीता है
और दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है

शादी बूरे के लड्डू हैं, जिसने खाए वो भी पछताए
और जिसने नहीं खाए, वो भी पछताते हैं
पर शादी की बात सुन, मन में लड्डू फूटते है
और शादी के बाद, दोनों हाथों में लड्डू आते हैं

कोई जलेबी की तरह सीधा है, कोई टेढ़ी खीर है
किसी के मुंह में घी शक्कर है, सबकी अपनी अपनी तकदीर है
कभी कोई चाय-पानी करवाता है
कोई मख्खन लगाता है
और जब छप्पर फाड़ कर कुछ मिलता है
तो सभी के मुंह में पानी आ जाता है

भाई साहब अब कुछ भी हो
घी तो खिचड़ी में ही जाता है, जितने मुंह है उतनी बातें हैं
सब अपनी-अपनी बीन बजाते हैं
पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है,
सभी बहरे है
बावरें है ये सब हिंदी के मुहावरें हैं

ये गज़ब मुहावरे नहीं बुजुर्गों के अनुभवों की खान है
सच पूछो तो हिन्दी भाषा की जान हैं

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सुप्रभात्

सुकराण्यसाधूनि आत्मनोऽहितानि च ।
यद्वै हितं च साधु च वद्वै परमदुष्करम् ।।

‘‘अपने लिये हानिप्रद और बुरे काम कर डालना बहुत सरल है किन्तु अपने लिए हितकर और अच्छे काम करना अतिशय कठिन है ।‘‘

जय श्री कृष्ण

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कोलाहले काककुलस्य जाते विराजते कोकिलकूजितं किम्।
परस्परं संवदतां खलानां मौनं विधेयं सततं सुधीभिः॥

सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

कौवों के झुंड द्वारा बनाए गए जोरदार शोर के बीच, क्या एक कोयल की मधुर बोली कभी सुनाई दे सकती हैं? दुष्ट व्यक्तियों के आपसी बातचीत के दौरान अक्लमंद व्यक्तियों का शांत रहना उचित हैं।

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કાફિર હૈ જો બંદે નહીં ઇસ્લામ કે


પંડિત વ્રજનારાયણ ‘ચક્બસ્ત’ ઉર્દુના વિખ્યાત કવિ છે. એમને એક પંક્તિની પૂર્તિ કરવા આપી.

‘કાફિર હૈ જો બંદે નહીં ઇસ્લામ કે’

આમ તો એનો અર્થ થાય કે જે ઇસ્લામમાં નથી માનતા એ નાસ્તિક છે. પંડિત વ્રજનારાયણે ‘લામ’ શબ્દને અલગ તારવ્યો. ‘લામ’ એટલે ઘુઘરી. એમણે લખ્યું –

‘લામ જૈસે ગેસુ હૈ ઘનશ્યામ કે
કાફિર હૈ જો બંદે નહિ ઇસ લામ કે’

આ ઘુઘરિયાળા કેશનો જે ભક્ત નથી એ નાસ્તિક છે.

~ હરીન્દ્ર દવે

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न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन। इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ।। ५।। हन्तं त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम्। यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम।। ६।।


यमाचार्य कहते हैं कि देह में रहनेवाले जिस चैतन्य तत्त्व के निकल जाने पर देह मृत हो जाता है अर्थात् जड एवं निश्चेष्ट हो जाता है, वही तो चैतन्य स्वरूप ब्रह्म है।

 

न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन।

 

इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ।। ५।।

 

हन्तं त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम्।

 

यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम।। ६।।

 

शब्दार्थ : कश्चन = कोई भी; मर्त्य: न प्राणेन न अपानेन जीवति = मरणशील प्राणी न प्राण से, न अपान से जीवित रहता है; तु = किन्तु; यस्मिन् एतौ उपाश्रितौ = जिसमें ये दोनों (वास्तव में पाँचों प्राणवायु) उपाश्रित हैं; इतरेण जीवन्ति = अन्य से ही जीवित रहते हैं;

 

गौतम = हे गौतमवंशीय नचिकेता; गुह्यम् सनातनम् = (वह) रहस्यमय सनातन; ब्रह्म = ब्रह्म; च आत्मा मरणम् प्राप्य = और जीवात्मा मरण को प्राप्त करक्; यथा भवति = जैसे होता है; इदम् ते हन्त प्रवक्ष्यामि = यह तुम्हें निश्चय ही बताऊँगा।

 

वचनामृत : कोई भी प्राणी न प्राण से, न अपान से जीवित रहता है, किन्तु जिसमें ये दोनों (अर्थात् पाँचों प्राणवायु) आश्रित हैं, उस अन्य से ही (प्राणी) जीवित रहते हैं। हे गौतमवंशीय नचिकेता, (मैं) उस गुह्य सनातन ब्रह्म का और मरने का जीवात्मा की जो अवस्था होती है, उसका अवश्य कथन करूँगा।

 

सन्दर्भ : यमाचार्य नचिकेता को देह में स्थित जीवात्मा की महिमा बताकर ब्रह्मतत्त्व के कथन का आश्वासन देते हैं।

 

दिव्यामृत : मुख्य प्राण ही विभिन्न कार्यों के अनुसार पाँच वायुओं के रूप मे विभक्त है जिनमे प्राण और अपान प्रमुख है। मनुष्य के जीवन का आधार प्राण और अपान से लक्षित केवल पांच वायु (प्राण अपान् व्यान उदान्) ही नही है। श्वास प्रश्वास का जीवन धारण के लिए असाधारण महत्व है कितु प्राणी के जीवन का आधार उनसे भिन्न उसका जीवात्मा होता है जिस पर प्राण अपान आदि पञ्चवायु रहते है। समस्त इन्द्रियां भी जीवात्मा पर ही आश्रित होती है। जीवात्मा के होने से ही जीवन होता है। जीवात्मा के रहने से ही मन बुद्धि और इन्द्रियां अपने कार्य करते है।
देह की मृत्यु का विशुद्ध चेतना अथवा आत्मा पर कोई प्रभाव नही होता ब्रह्म आत्मा अथवा परमात्मा शाश्वत नित्य शुद्ध और मुक्त है। यमाचार्य ब्रह्मतत्व के कथन का आश्वासन देते है। उतम गुरू अनावश्यक आश्वासन देकर जिज्ञासु शिष्य के धैर्य को टूटने नही देते।
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खुशवंत सिंह के लिखे ज़िंदगी के दस सूत्र ।
इन दसों सूत्रों को पढ़ने के बाद पता चला कि सचमुच खुशहाल ज़िंदगी और शानदार मौत के लिए ये सूत्र बहुत ज़रूरी हैं।

  1. अच्छा स्वास्थ्य – अगर आप पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं, तो आप कभी खुश नहीं रह सकते। बीमारी छोटी हो या बड़ी, ये आपकी खुशियां छीन लेती हैं।
  2. ठीक ठाक बैंक बैलेंस – अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए 55 साल तक काम करना चाहिए और बहुत अमीर होना ज़रूरी नहीं। पर इतना पैसा बैंक में हो कि आप आप जब चाहे बाहर खाना खा पाएं, सिनेमा देख पाएं, समंदर और पहाड़ घूमने जा पाएं, तो आप खुश रह सकते हैं। उधारी में जीना आदमी को खुद की निगाहों में गिरा देता है।

  3. अपना मकान – मकान चाहे छोटा हो या बड़ा, वो आपका अपना होना चाहिए। अगर उसमें छोटा सा बगीचा हो तो आपकी ज़िंदगी बेहद खुशहाल हो सकती है।

  4. समझदार जीवन साथी – जिनकी ज़िंदगी में समझदार जीवन साथी होते हैं, जो एक-दूसरे को ठीक से समझते हैं, उनकी ज़िंदगी बेहद खुशहाल होती है, वर्ना ज़िंदगी में सबकुछ धरा का धरा रह जाता है, सारी खुशियां काफूर हो जाती हैं। हर वक्त कुढ़ते रहने से बेहतर है अपना अलग रास्ता चुन लेना।

  5. दूसरों की उपलब्धियों से न जलना – कोई आपसे आगे निकल जाए, किसी के पास आपसे ज़्यादा पैसा हो जाए, तो उससे जले नहीं। दूसरों से खुद की तुलना करने से आपकी खुशियां खत्म होने लगती हैं।

  6. गप से बचना – लोगों को गपशप के ज़रिए अपने पर हावी मत होने दीजिए। जब तक आप उनसे छुटकारा पाएंगे, आप बहुत थक चुके होंगे और दूसरों की चुगली-निंदा से आपके दिमाग में कहीं न कहीं ज़हर भर चुका होगा।

  7. अच्छी आदत – कोई न कोई ऐसी हॉबी विकसित करें, जिसे करने में आपको मज़ा आता हो, मसलन गार्डेनिंग, पढ़ना, लिखना। फालतू बातों में समय बर्बाद करना ज़िंदगी के साथ किया जाने वाला सबसे बड़ा अपराध है। कुछ न कुछ ऐसा करना चाहिए, जिससे आपको खुशी मिले और उसे आप अपनी आदत में शुमार करके नियमित रूप से करें।

  8. ध्यान – रोज सुबह कम से कम दस मिनट ध्यान करना चाहिए। ये दस मिनट आपको अपने ऊपर खर्च करने चाहिए। इसी तरह शाम को भी कुछ वक्त अपने साथ गुजारें। इस तरह आप खुद को जान पाएंगे।

  9. क्रोध से बचना – कभी अपना गुस्सा ज़ाहिर न करें। जब कभी आपको लगे कि आपका दोस्त आपके साथ तल्ख हो रहा है, तो आप उस वक्त उससे दूर हो जाएं, बजाय इसके कि वहीं उसका हिसाब-किताब करने पर आमदा हो जाएं।

  10. अंतिम समय – जब यमराज दस्तक दें, तो बिना किसी दुख, शोक या अफसोस के साथ उनके साथ निकल पड़ना चाहिए अंतिम यात्रा पर, खुशी-खुशी। शोक, मोह के बंधन से मुक्त हो कर जो यहां से निकलता है, उसी का जीवन सफल होता है।

मुझे नहीं पता कि खुशवंत सिंह ने पीएचडी की थी या नहीं। पर इन्हें पढ़ने के बाद मुझे लगने लगा है कि ज़िंदगी के डॉक्टर भी होते हैं। ऐसे डॉक्टर ज़िंदगी बेहतर बनाने का फॉर्मूला देते हैं । ये ज़िंदगी के डॉक्टर की ओर से ज़िंदगी जीने के लिए दिए गए नुस्खे है।