Posted in साकाहारी

अध्यात्म और मांसाहार


प्रश्न : गीता में साधकों के लिए सात्विक भोजन पर बल अवश्य दिया गया है लेकिन उसमें कहीं मांसाहार का स्पष्ट निषेध नहीं है,। और आपने मांसाहार को सुपच बताया और यही डाक्टरों का मत भी है। फिर मांसाहार से क्या बाधा आती है? धर्म—साधना के लिए आपने निरामिष भोजन की उपादेयता पर बहुत बल दिया। लेकिन पुस्तकों से पता चलता है कि प्राय: ही सूफी, झेन और तंत्र मार्ग से सिद्ध हुए संतों का भोजन निरामिष नहीं रहा। और अपने ही देश में परमहंस रामकृष्ण सदा आमिष भोजन लेते रहे। इस विरोध का क्या कारण है?

पहली बात, मांसाहार में अपने आप में कोई भी बुराई नहीं है। ध्यान रखना, कह रहा हूं अपने आप में। मेरा मतलब है, अगर वैज्ञानिक सिंथेटिक मांस बना सकें—जो कि जल्दी ही बन सकेगा—कृत्रिम मांस बना सकें, तो वह शाकाहार से भी ज्यादा शाकाहारी होगा। क्योंकि जब तुम फल को वृक्ष से तोड़ते हो, तब भी चोट पहुंचती है। तुम सब्जी काटते हो, तब भी चोट पहुंचती है। कम पहुंचती है।
वृक्षों, सब्जियों के पास उतना ज्यादा विकसित स्नायु—संस्थान नहीं है, जितना पशुओं के पास है। पशुओं के पास उतना विकसित संस्थान नहीं है, जितना मनुष्यों के पास है। इसलिए जो व्यक्ति नर—मांस का आहार करे, उसको तो दुनिया में कोई भी धार्मिक व्यक्ति स्वीकार करने को राजी न होगा, कि यह आदमी का मांस खा रहा है। क्योंकि मनुष्य को मारना बहुत पीड़ादायी है।
जितनी पीड़ा मनुष्य अनुभव करता है मृत्यु में, उतनी पशु नहीं अनुभव करते। क्योंकि मनुष्य के पास सोच—विचार है, मृत्यु का बोध है; मर रहा हूं इसकी समझ है; मारा जा रहा हूं? इसकी समझ है। और चेतना बहुत प्रगाढ़ है। इसलिए मनुष्य को तो कोई धर्म राजी नहीं होगा।
ऐसा लगता है कि हिंदू अतीत में यज्ञ में मनुष्य की बलि चढ़ाते रहे; नरमेध यज्ञ होते रहे। लेकिन धीरे— धीरे उन यज्ञों को करने वालों को भी पता चला कि यह तो अतिशय है। और इस तरह का धर्म तो ज्यादा दिन तक धर्म नहीं समझा जा सकता। इसलिए उन्होंने भी व्याख्या बदल दी। तो उन्होंने भी कहा कि नरमेध सिर्फ नाम के लिए है। मनुष्य का पुतला बना लिया, उसका वध कर दिया।
नरमेध के लिए तो कोई राजी नहीं है। क्यों? क्योंकि मनुष्य से स्वादिष्ट मांस तो और कहीं मिल नहीं सकता। अगर स्वाद ही सवाल है, तो छोटे बच्चों का जैसा मांस स्वादिष्ट होता है, वैसा किसी का भी नहीं होता। और जितना सुपाच्य होता है, वैसा दूसरा मांस नहीं हो सकता। क्योंकि मनुष्य से तालमेल है। तुम्हारे जैसा ही है; जल्दी पच जाता है; समान— धर्मा है।
आदमी वह भी करता है, बच्चे चुराए जाते हैं; होटलों में काटे भी जाते हैं। सारी दुनिया में पता है कि बच्चों का मांस बड़ी होटलों में बिकता है; और लोग बड़े स्वाद से उसका भोजन लेते हैं।
लेकिन इसके लिए तो कोई भी राजी न होगा। क्यों राजी नहीं होते? क्योंकि मनुष्य बहुत ज्यादा संवेदनशील है। उसको मारने में सवाल है। मारना भयंकर हिंसा है। और उस हिंसा को करने को जो राजी है, वह व्यक्ति बहुत तामसी है। भोजन के लिए दूसरे का जीवन छीनने को जो राजी है, उसके तमस का क्या कहना!
नहीं, वह तो कोई नहीं करता। या कभी लोग करते थे, तो बंद हो चुका है। पशुओं का मास चलता है।
लेकिन वे भी काफी संवेदनशील हैं। इसलिए जिनकी धार्मिक संवेदना और भी गहरी है, बुद्ध, महावीर, उन्होंने सिर्फ शाकाहार के लिए कहा। उन्होंने कहा, पशुओं को भी छोड़ दो। क्योंकि तुम मारते’ हो, काटते हो। भला तुम न काटो, कोई और तुम्हारे लिए काटे और मारे; लेकिन किया तो तुम्हारे लिए जा रहा है। तुम जानते तो हो कि भोजन के साधारण से स्वाद के लिए तुम जीवन की इतनी हिंसा कर रहे हो, तो तुम्हारे भीतर तमस बहुत गहरा है, तुम अंधे हो। तुम्हारी संवेदना समुचित नहीं है। तुम मनुष्य होने के योग्य नहीं हो।
इसलिए महावीर ने तो बिलकुल वर्जित किया। बुद्ध ने थोड़ी—सी शर्त रखी। वह शर्त भी बहुत कीमती है। बुद्ध ने कहा कि मरे हुए जानवर का मांस खा लेने में कोई हर्ज नहीं है।
बात तर्कयुक्त है। क्योंकि अगर मारने के कारण ही आदमी तामसी हो जाता है, तो मरे—मराए जानवर का मांस खाने में तो कोई हर्ज नहीं है। इसलिए बौद्ध मरे हुए जानवर का मांस खाने में मांसाहार नहीं मानते। गाय मर ही गई अपने से, हमने मारी ही नहीं, तब इसके मांस को खा लेने में क्या हर्ज है!
लेकिन कृष्ण इससे राजी नहीं हैं। यह मांसाहार बासा है। और बासा भोजन तामसी का है। और मरे हुए जानवर से ज्यादा बासी चीज तो तुम पा ही नहीं सकते दुनिया में। और बासी चीज क्या हो सकती है? जैसे ही जानवर मरता है, उसके सारे मांस और खून का गुणधर्म बदल जाता है। खून तो विलीन ही हो जाता है तत्‍क्षण। और मांस में सड़ने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। क्योंकि मांस तभी तक जीवित था, जब तक प्राण थे। प्राण के हटते ही मास सड़ने लगा; उसमें से दुर्गंध अभी आएगी जल्दी ही। तो वह तो बिलकुल ही बासा भोजन है।
इसलिए सिर्फ शूद्रों ने उसे स्वीकार कर लिया, भारत में चमार ही खाते हैं मरे हुए जानवर का। इसी वजह से जब डाक्टर अंबेदकर ने शूद्रों को आह्वान दिया बौद्ध होने का, तो उन्होंने इसको भी एक दलील बना लिया, कि चमार बौद्ध होने ही चाहिए। क्योंकि बुद्ध भगवान ने आज्ञा दी है मरे हुए जानवर का मांस खाने की और सिर्फ चमार खाते हैं। इससे सिद्ध होता है कि हो न हो, चमार प्राचीन समय में बौद्ध रहे होंगे। वे भूल गए हैं अपना बौद्ध होना।
तर्क बहुत दूर का मालूम पड़ता है। लेकिन सार उसमें हो सकता है। इसकी संभावना हो सकती है कि मांसाहार मरे हुए जानवर का करने के कारण हिंदुओं ने उस पूरे वर्ग को, जिसने ऐसा मांसाहार किया, शूद्र मान लिया हो। क्योंकि शूद्र की और तमस की कृष्ण की व्याख्या यही है।
बुद्ध ने एक कारण से आज्ञा दी, दूसरे कारण का उन्हें खयाल नहीं है। एक कारण से आज्ञा दी कि मरे हुए को मारा नहीं जाता, इसलिए कोई हिंसा नहीं है। लेकिन मरे हुए जानवर का मांस अति बासा हो गया, मुरदा हो गया, उसको खाने से गहन तमस पैदा होगा। उस तरफ बुद्ध की नजर चूक गई।
इसलिए मैं कहता हूं कि मांसाहार खुद में तो कोई पाप नहीं है, न बुरा है, न तमस है। सुपाच्य है; क्योंकि पचा—पचाया भोजन है। इसलिए तो सिंह एक बार भोजन करता है और फिर चौबीस घंटे की चिंता छोड़ देता है; उतना काफी है। काफी कनसनट्रेटेड भोजन है। थोड़ा—सा कर लिया, बहुत है।
किसी दिन अगर वैज्ञानिक सिंथेटिक मांस बना लेंगे—जों कि उन्हें बना लेना चाहिए जल्दी से जल्दी, जैसे शाकाहारी अंडा उपलब्ध है, ऐसे शाकाहारी मांस जल्दी ही उपलब्ध हो जाएगा—तब मांसाहार, मैं तुमसे कहता हूं शाकाहार से भी ज्यादा शाकाहारी होगा। क्योंकि न तो उसमें हिंसा होगी, न वह बासा होगा। इतनी भी हिंसा न होगी, जितनी फल को तोड्ने से होती है। महावीर ने तो अपने लिए यही नियम बना रखा था कि जो फल पककर गिर जाए, वही खाना है। या जो गेहूं पककर गिर जाए बाल से, वही खाना है।
एक बहुत बड़ा प्राचीन ऋषि हुआ, कणाद। उसका नाम ही कणाद इसलिए पड़ गया कि वह खेतों में जो कण अपने आप गिर जाएं पककर, और वह भी जब खेत की फसल काट ली जाए और किसान सब चीजें हटा ले, तो जो कण पीछे पड़े रह जाएं थोड़े—से गेहूं के, उन्हीं को बीनकर खाता था।
परम अहिंसक रहा होगा कणाद। पका हुआ गेहूं, जो अपने से गिर गया। और वह भी किसान से मांगकर नहीं; क्योंकि किसान पर भी क्यों बोझ बनना! जब पक्षी दाने बीनकर जी लेते हैं, तो आदमी भी ऐसे ही जी ले। तो कणाद का असली नाम क्या था, यही लोग भूल गए हैं। उसका नाम ही कणाद हो गया, कण बीनकर जीने वाला।
अगर कृत्रिम मांस बने, तो वह शाकाहार से भी शुद्ध शाकाहार होगा। लेकिन अभी जैसी स्थिति है, ये दो ही उपाय हैं। या तो जिंदा जानवर को मारकर खाया जाए; उस हालत में कृष्ण के साथ वह आहार राजसी होगा। कम से कम ताजा होगा। बुद्ध और महावीर के अनुसार हिंसात्मक होगा और तमस में ले जाएगा। और दोनों ठीक हैं। आधे—आधे ठीक हैं। दोनों एक—एक पहलू से ठीक हैं।
अगर मरे हुए जानवर को खाया जाए, तो कृष्ण के हिसाब से तामसी होगा, क्योंकि बासा और मुरदा हो गया। तंद्रा बढ़ाएगा, निद्रा लाएगा, मूर्च्छा बढ़ाएगा, शद्रता पैदा करेगा जीवन में। ब्राह्मणत्व का सत्व पैदा नहीं हो सकेगा। लेकिन बुद्ध के हिसाब से, कम से कम हिंसा नहीं होगी। तुम किसी को मारोगे नहीं, इतनी सदवृत्ति रहेगी। इतना तो कम से कम सत की तरफ आगमन होगा, सत्य की तरफ ऊर्ध्वगमन होगा।
मेरे हिसाब से, मांसाहार चाहे मुरदे का हो, चाहे मारे गए जानवर का हो, तमस में गिराएगा नब्बे प्रतिशत मौकों पर। दस प्रतिशत या नौ प्रतिशत मौकों पर रजस में दौड़ाएगा। एक ही प्रतिशत मौका है कि उससे कोई सत्व में उठ सके।
इसे थोड़ा समझना होगा। यह साफ है कि रामकृष्ण मांसाहारी थे; विवेकानंद भी। और फिर भी रामकृष्ण परम ज्ञान को उपलब्ध हुए। जैनों के लिए या सभी सांप्रदायिक लोगों के लिए तो बड़ी सुविधा है इन चीजों का उत्तर देने में। असुविधा मुझे है। जैन कह देंगे कि यह हो ही नहीं सकता कि वे ज्ञान को उपलब्ध हुए, बात खत्म हो गई। रामकृष्ण ज्ञान को उपलब्ध हो ही नहीं सकते। क्योंकि मछली खा रहे हैं; मांस खा रहे हैं; और ज्ञान को उपलब्ध हो जाएं?
यह बात ही खत्म हो गई। इसलिए जैनों के लिए कोई उत्तर देने का सवाल नहीं है। इसलिए जहां—जहां मांसाहार है, वहां—वहा ज्ञान की संभावना समाप्त हो गई।
हिंदुओं को भी कोई कष्ट नहीं है। क्योंकि वे कहते हैं, आत्मा मरती थोड़े ही है, काटने से भी थोड़े ही मरती है। तुमने मछली को मार दिया, सिर्फ आत्मा को देह से मुक्त कर दिया। दूसरा शरीर धारण कर लेगी। इसलिए कोई अड़चन नहीं है। रामकृष्ण ज्ञान को उपलब्ध हो सकते हैं।
अड़चन मुझे है, क्योंकि मैं मानता हूं कि रामकृष्ण ज्ञान को उपलब्ध हुए और वे मांसाहारी हैं। होना नहीं चाहिए वह हुआ। साधारण नियम के हिसाब से जो नहीं होना था, वह हुआ है। वे मांसाहार करते हुए परम ज्ञान को उपलब्ध हुए। इसलिए अड़चन मेरी है, तुम्हें समझ में नहीं आएगी।
मेरी अड़चनें बहुत गहरी हैं। सीधे उत्तर मेरे पास नहीं हैं, क्योंकि उत्तर मैं किसी सिद्धात को देखकर नहीं चलता। मैं स्थिति को देखता हूं। देखता हूं रामकृष्ण ज्ञान को उपलब्ध हुए और यह होना तो नहीं चाहिए; लेकिन हुआ है। इसलिए जाल थोड़ा जटिल है।
तब मुझे मेरी जो दृष्टि है, वह यह है कि रामकृष्ण अत्यंत शुद्ध पुरुष हैं। इसलिए इतनी थोड़ी—सी अशुद्धि उन्हें बाधा न डाल पाई। यह तुम्हारे खयाल में न आ सकेगा। अत्यंत शुद्ध पुरुष हैं। अगर तुम मुझे आज्ञा दो, तो मैं कहना चाहूंगा, महावीर से ज्यादा शुद्ध पुरुष हैं। महावीर अगर मांसाहार करते या मछली खाते, परम ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो सकते थे। लेकिन रामकृष्ण हुए हैं।
इसका अर्थ केवल इतना ही है कि यह व्यक्ति इतना शुद्ध है कि इतनी—सी अशुद्धि इस पर कुछ बाधा नहीं डाल पाई। यह उस अशुद्धि के बावजूद भी पार हो गया।
ऐसा ही समझो कि पहाड़ पर तुम चढ़ते हो। तो पहाड़ पर चढ़ने का नियम तो यही है कि जितना कम बोझ हो, उतना ठीक। और अगर तुम मनों बोझ सिर पर लेकर चढ़ रहे हो, तो चढ़ना मुश्किल हो जाएगा। शायद तुम चढ़ने का खयाल ही छोड़ दोगे, या बीच के किसी पड़ाव पर रुक जाओगे।
लेकिन फिर एक बहुत शक्तिशाली मनुष्य, कोई हरक्यूलिस भारी वजन लेकर पहाड़ पर चढ़ रहा है और चढ़ जाता है। यह नियम नहीं है यह आदमी। यह हरक्यूलिस नियम नहीं है। यह इतना ही बता रहा है कि यह इतना शक्तिशाली पुरुष है कि उतना—सा वजन इसे चढ़ने में बाधा नहीं डालता। यह उस वजन के साथ चढ़ जाता है। तुम कमजोर हो, तुम उस वजन के साथ न चढ़ सकोगे। रामकृष्ण अपवाद हैं, नियम मत बनाना। निन्यानबे आदमियों को मांसाहार छोड्कर ही जाना पड़ेगा। महावीर, बुद्ध को जाना पड़ा है मांसाहार छोड्कर, तो तुम अपनी तो फिक्र ही छोड़ देना। तुम अपना तो हिसाब ही मत लगाना। अपनी तो गणना ही मत करना। तुम महावीर और बुद्ध से ज्यादा पवित्र आदमियों की कल्पना भी कैसे कर सकते हो! उनको भी छोड़ देना पडा। उनको भी लगा कि यह बोझ है। और यह बोझ अटकाएगा, यात्रा पूरी न होने देगा। यह गौरीशंकर तक नहीं पहुंचने देगा, बीच में कहीं पड़ाव बनाना पड़ेगा; थककर बैठ जाना पड़ेगा।
गौरीशंकर तक चढ़ते—चढ़ते तो सभी बोझ छोड़ देना होता है। सत्य की आखिरी ऊंचाई पर तो सब चला जाना चाहिए। यह नियम है। लेकिन कभी कोई जीसस, कभी कोई मोहम्मद और कभी कोई रामकृष्ण मांसाहार करते हुए भी वहा पहुंचे हैं। वे हरक्यूलिस हैं। उनका तुम ज्यादा विचार मत करो। उनसे तुम्हें कोई लाभ न होगा। तुम उनको अपवाद समझो।
और अपवाद सिर्फ नियम को सिद्ध करते हैं। अपवाद से अपवाद सिद्ध नहीं होता, सिर्फ नियम सिद्ध होता है। उससे केवल इतना ही पता चलता है कि यह भी संभव है अपवाद क्षणों में, कि कोई व्यक्ति इतना परम शुद्ध हो जाए कि मांसाहार कोई अशुद्धि पैदा न करता हो।
ऐसे शुद्ध पुरुष हुए हैं। जैसे कृष्ण हैं, कृष्ण ने ब्रह्मचर्य साधा, इसकी कोई खबर नहीं है। नहीं साधा, ऐसा लगता है। हजारों स्त्रियों के साथ राग—रंग चलता रहा। और कृष्ण फिर भी खंडित न हुए, नीचे न गिरे। उनके ऊर्ध्वगमन में कोई बाधा न आई। वे गौरीशंकर के शिखर पर पहुंच गए।
लेकिन इससे तुम मत सोचना कि यह नियम है। यह अपवाद है। तुम्हारे लिए तो ब्रह्मचर्य उपयोगी होगा। तुम्हारे पास तो शक्ति इतनी कम है कि तुम उसे ब्रह्मचर्य में न बचाओगे, तो तुम्हारे पास ऊर्ध्वगमन के लिए ऊर्जा न बचेगी।
कृष्ण के पास रही होगी बहुत ऊर्जा। कोई अड़चन न आई। सोलह हजार रानियों के साथ नाचते रहे। हजार—हजार प्रेम चलते रहे, कोई अड़चन न आई। यह सिर्फ अपवाद है।
और मेरी अड़चन तुम खयाल में रखो। क्योंकि मैं इन सब विपरीत लोगों में देखता हूं कि ये सब पहुंच गए। इसलिए मैं कहता हूं सिद्धात आदमियों से बड़ा नहीं है। और सिद्धात से आदमियों को कभी मत कसना। पहले आदमी को सीधा—सीधा देखना और फिर सिद्धात को उस पर कसना।
महावीर जो कहते हैं, वह निन्यानबे के लिए सही है। और निन्यानबे प्रतिशत लोग ही असली लोग हैं। रामकृष्ण अनुकरणीय नहीं हैं। उनका अनुकरण करोगे, तो तुम भटकोगे। अनुकरणीय तो बुद्ध और महावीर हैं। वे तुम्हें ज्यादा निकट तक गौरीशंकर के पहुंचा देंगे।
रामकृष्ण को मानकर तुम चलोगे, तो तुम मछली तो खाते रहोगे, मांसाहार तो करते रहोगे, रामकृष्ण कभी न हो पाओगे। और रामकृष्ण के मानने वाले वहीं भटक रहे हैं। रामकृष्ण के बाद एक भी रामकृष्ण की स्थिति में उपलब्ध नहीं हुआ, विवेकानंद भी नहीं। और सैकड़ों संन्यासी हैं रामकृष्ण के—कचरा, कूड़ा—कर्कट। क्योंकि वह रामकृष्ण अपवाद हैं। वह झंझट की बात है।
रामकृष्ण जैसे लोगों का धर्म नहीं बन सकता, बनना नहीं चाहिए। ये धर्म के बाहर हैं। ये सीमा के बाहर हैं। ये ट्रेसपासर्स हैं। ये ऐसे लोग हैं, जो पीछे के दरवाजे से बागुड़ तोड़कर न मालूम कहां—कहां से घुसते हैं, सीधे दरवाजे से नहीं। तुम्हें तो सीधे दरवाजे से ही जाना पड़ेगा।
इसलिए रामकृष्ण जैसे लोगों का कोई धर्म नहीं बनना चाहिए, कोई संघ नहीं बनना चाहिए। इनके पीछे रामकृष्ण मिशन जैसा कोई प्रचार नहीं होना चाहिए। क्योंकि ये आदमी अपवाद हैं, इनको अनूठा रहने दो। ये कोहिनूर हीरे जैसे हैं। इनकी भीड़ मत लगाओ। धर्म तो बनना चाहिए बुद्ध और महावीर जैसे लोगों का। उनका !, महासंघ होना चाहिए। करोड़—करोड़ उनके अनुयायी हों। जितने हों, उतने कम। क्योंकि उनसे निन्यानबे प्रतिशत को मार्ग मिलेगा। जीसस से लाभ नहीं हुआ ईसाइयों को। हो नहीं सकता। क्योंकि जीसस सभी कुछ स्वीकार करके जीते हैं। शराब भी पीते हैं; न केवल पीते हैं, बल्कि उसे उत्सव मानते हैं, धार्मिक उत्सव मानते हैं। जीसस जिस घर में मेहमान होते हैं, वहा बोतलें खुलती हैं, खाना—पीना चलता है। क्योंकि यह महोत्सव है जीवन का।
तो जीसस ने रास्ता खोल दिया जैसे सबको शराब पीने का। तो पश्चिम में किसी को समझाओ कि शराब गलत है, लोग हसेंगे कि पागल हो गए हैं! जीसस को गलत नहीं, तो हमें कैसे गलत? और कुछ न मानें जीसस में, कम से कम इतना तो मानते ही हैं। और बातें कठिन हों, मगर यह तो सरल है। इसका तो हम अनुगमन कर लेते हैं।
जीसस जैसे लोगों के पीछे धर्म नहीं होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य कि जीसस के पीछे दुनिया का सबसे बड़ा धर्म है। दुनिया में सबसे ज्यादा संख्या ईसाइयों की है। और सबसे कम संख्या जैनियों की है, महावीर के पीछे। कारण है इसमें भी। क्योंकि महावीर तुम्हारी कमजोरियों को जरा भी मौका नहीं देते। उनके साथ तुम्हें यात्रा ऊपर की करनी ही पड़ेगी। करनी हो, तो ही साथ चल सकते हो; न करनी हो, तो बहाना नहीं खोज सकते महावीर में। लेकिन जीसस के साथ न भी यात्रा करनी हो, तो भी तुम ईसाई रह सकते हो। मांसाहार करो, शराब पीओ, सब कर सकते हो और ईसाई भी हो सकते हो। सुविधा है। इसलिए ईसाइयत फैलकर बड़ा वृक्ष बन गई। महावीर तो खजूर के वृक्ष हैं; उनके नीचे छाया भी, छाया भी मुश्किल है।
मेरी कठिनाई यह है कि मैं पाता हूं इन सभी लोगों ने पा लिया। इसलिए तुम बड़ा सोच—समझकर चलना। तुम अपने पर ध्यान रखना। इसकी फिक्र छोड़ देना कि रामकृष्ण ने मछली खाकर पा लिया, तो हम भी पा लेंगे, मछली क्यों त्यागें? मछली और मोक्ष अगर साथ—साथ सधता हो, तो साथ ही साथ साध लें।
मछली ही सधेगी, मोक्ष न सधेगा। कभी—कभी अपवाद घटित होते हैं। वे इसलिए घटित होते हैं कि व्यक्ति की क्षमता पर निर्भर होता है, कैसी उसकी क्षमता है। कोई वेश्याघर में रहकर भी परम ज्ञान को उपलब्ध हो सकता है। तुम्हें तो मंदिर में रहकर भी उपलब्ध होगा, यह भी संदिग्ध है।
तुम अपना ही सोचना और अपने को ही देखकर विचार करना। और ध्यान रखना; क्योंकि मन बहुत चालाक है। वह रास्ते खोजता है गलत को करने के, और सही को करने से बचने के उपाय, तर्क खोजता है। उसी मन के कारण तो तुम भटक रहे हो जन्मों—जन्मों से। खूब भटक लिए; अब वक्त है और जाग जाना चाहिए।
ओशो
गीता दर्शन, भाग – 8

Posted in साकाहारी

माँसाहारी या शाकाहारी
कैसे पहचानेंगे??

असम में एक शिशु मन्दिर में जाना हुआ तो बच्चों में बड़ा उत्साह था जैसे किसी जादूगर के आने पर होता है,,

बात शुरू हुई तो मैंने बच्चों से पूछा – आप लोग कहीं जा रहे हैं, सामने से कोई कीड़ा मकोड़ा या कोई साँप छिपकली या कोई गाय भैंस या अन्य कोई ऐसा विचित्र जीव दिख गया जो आपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा, तो प्रश्न यह है कि आप कैसे पहचानेंगे कि वह जीव अंडे देता है या बच्चे? क्या पहचान है उसकी?

बच्चे मौन रहे बस आंतरिक खुसर फुसर चलती रही…..

मिनट दो मिनट बाद मैंने ही बताया कि बहुत आसान है,, जिनके भी कान बाहर दिखाई देते हैं वे सब बच्चे देते हैं और जिन जीवों के कान बाहर नहीं दिखाई देते वे अंडे देते हैं….

फिर दूसरा प्रश्न पूछा – ये बताइए आप लोगों के सामने एकदम कोई प्राणी आ गया,, आप कैसे पहचानेंगे की यह शाकाहारी है या मांसाहारी? क्योंकि आपने तो उसे भोजन करते देखा नहीं है, बच्चों में फिर वही कौतूहल और खुसर फ़ुसर की आवाजें…..

मैंने कहा – देखो भाई बहुत आसान है,, जिन जीवों की आँखों की बाहर की यानी ऊपरी संरचना गोल है वे सब माँसाहारी हैं जैसे कुत्ता, बिल्ली, बाज, चिड़िया, शेर, भेड़िया, चील,, या अन्य कोई भी आपके आस पास का जीव जंतु जिसकी आँखे गोल हैं वह माँसाहारी है,, ठीक उसी तरह जिसकी आँखों की बाहरी संरचना लंबाई लिए हुए है, वे सब शाकाहारी हैं जैसे हिरन,, गाय, हाथी, बैल, भैंस, बकरी,, इनकी आँखे बाहर की बनावट में लंबाई लिए होती है ….

अब ये बताओ कि मनुष्य की आँखें गोल हैं या लंबाई वाली,,, सब बच्चों ने कहा कि लंबाई वाली,, मैंने फिर पूछा कि यह बताओ इस हिसाब से मनुष्य शाकाहारी जीव हुआ या माँसाहारी??सबका उत्तर था #शाकाहारी,,

फिर दूसरी बात यह बताई कि जिन भी जीवों के नाखून तीखे नुकीले होते हैं वे सब माँसाहारी होते हैं जैसे शेर बिल्ली, कुत्ता बाज गिद्ध या अन्य कोई तीखे नुकीले नाखूनों वाला जीव….

जिनके नाखून चौड़े चपटे होते हैं वे सब शाकाहारी होते हैं जैसे गाय, घोड़ा, गधा, बैल, हाथी, ऊँट, बकरी…..

अब ये बताओ बालकों कि मनुष्य के नाखून तीखे नुकीले हैं या चौड़े चपटे??

बालकों ने कहा कि चौड़े चपटे,, अब ये बताओ इस हिसाब से मनुष्य कौनसे जीवों की श्रेणी में हुआ??सब बालकों ने कहा कि शाकाहारी,,,

फिर तीसरी बात बताई,, जिन भी जीवों पशु प्राणियों को पसीना आता है वे सब शाकाहारी होते हैं जैसे घोड़ा बैल गाय भैंस खच्चर आदि अनेकों प्राणी…

माँसाहारी जीवों को पसीना नहीं आता है, इसलिए कुदरती तौर पर वे जीव अपनी #जीभ निकालकर लार टपकाते हुए हाँफते रहते हैं इस प्रकार वे अपनी शरीर की गर्मी को नियंत्रित करते हैं….

तो प्रश्न यह है कि मनुष्य को पसीना आता है या जीभ से एडजस्ट करता है??

बालकों ने कहा कि पसीना आता है,अच्छा यह बताओ कि इस बात से मनुष्य कौनसा जीव सिद्ध हुआ, सबने एकसाथ कहा – शाकाहारी…

ऐसे ही अनेकों विषयों पर बच्चों से बात की, आनंद आ गया….

#सभी लोग विशेषकर अध्यापन से जुड़े भाई बहन चाहें तो बच्चों को सीखने पढ़ाने के लिए इस तरह बातचीत की शैली विकसित कर सकते हैं, इससे जो वे समझेंगे सीखेंगे वह उन्हें जीवनभर काम आएगा याद रहेगा, पढ़ते वक्त बोर भी नहीं होंगे….

Posted in साकाहारी

माँसाहारी बन कर अपनी धार्मिक उर्जा खो मत देना।

आदमी को, स्वाभाविक रूप से, एक शाकाहारी होना चाहिए, क्यों कि पूरा शरीर शाकाहारी भोजन के लिए बना है।

वैज्ञानिक इस तथ्य को मानते हैं, कि मानव शरीर का संपूर्ण ढांचा दिखाता है, कि आदमी गैर-शाका-हारी नहीं होना चाहिए।

अब जांचने के तरीके हैं, कि जानवरों की एक निश्चित प्रजाति शाकाहारी है, या मांसाहारी, यह आंत पर निर्भर करता है, आंतों की लंबाई पर, मांसाहारी पशुओं के पास बहुत छोटी आंत होती है।

बाघ, शेर इन के पास बहुत ही छोटी आंत है, क्यों कि मांस पहले से ही एक पचा हुआ भोजन है। इसे पचाने के लिये लंबी आंत की जरूरत नहीं है।

पाचन का काम जानवर द्वारा कर दिया गया है।

अब तुम पशु का मांस खा रहे हो। यह पहले से ही पचा हुआ है, लंबी आंत की कोई जरूरत नहीं है।

आदमी की आंत सब से लंबी है, इस का मतलब है, कि आदमी शाकाहारी है। एक लंबी पाचनक्रिया की जरूरत है, और वहां बहुत मल-मूत्र होगा, जिसे बाहर निकालना होगा।

अगर आदमी मांसाहारी नहीं है, और वह मांस खाता चला जाता है, तो शरीर पर बोझ पड़ता है।

पूरब में, सभी महान ध्यानियों ने, बुद्ध, महावीर, ने इस तथ्य पर बल दिया है। अहिंसा की किसी अवधारणा की वजह से नहीं, वह गौण बात है, पर अगर तुम यथार्थत् गहरे ध्यान में जाना चाहते हो तो तुम्हारे शरीर को हल्का होने की जरूरत है।

प्राकृतिक, निर्भार, प्रवाहित। तुम्हारे शरीर को बोझ हटाने की जरूरत है, और एक मांसाहारी का शरीर बहुत बोझिल होता है।

जरा देखो, क्या होता है, जब तुम मांस खाते हो : –

जब तुम एक पशु को मारते हो, क्या होता है, पशु को, जब वह मारा जाता है ?

बेशक, कोई भी मारा जाना नहीं चाहता। जीवन स्वयं को लंबाना चाहता है, पशु स्वेच्छा से नहीं मर रहा है।

अगर कोई तुम्हें मारता है, तुम स्वेच्छा से नहीं मरोगे। अगर एक शेर तुम पर कूदता है, और तुम को मारता है, तुम्हारे मन पर क्या बीतेगी ?

वही होता है, जब तुम एक शेर को मारते हो। वेदना, भय, मृत्यु, पीड़ा, चिंता, क्रोध, हिंसा, उदासी ये सब चीजें पशु को होती हैं।

उस के पूरे शरीर पर हिंसा, वेदना, पीड़ा फैल जाती है।

पूरा शरीर विष से भर जाता है, शरीर की सब ग्रंथियां जहर छोड़ती हैं, क्यों कि जानवर न चाहते हुए भी मर रहा है। और फिर तुम मांस खाते हो, वह मांस सारा विष वहन करता है, जो कि पशु द्वारा छोड़ा गया है।

पूरी ऊर्जा जहरीली है। फिर वे जहर तुम्हारे शरीर में चले जाते हैं।

वह मांस जो तुम खा रहे हो एक पशु के शरीर से संबं-धित था। उस का वहां एक विशेष उद्देश्य था। चेतना का एक विशिष्ट प्रकार पशु-शरीर में बसता था।

तुम जानवरों की चेतना की तुलना में एक उच्च स्तर पर हो, और जब तुम पशु का मांस खाते हो, तुम्हारा शरीर सब से निम्न स्तर को चला जाता है, जानवर के निचले स्तर को।

तब तुम्हारी चेतना और तुम्हारे शरीर के बीच एक अंतर मौजूद होता है, और एक तनाव पैदा होता है और चिंता पैदा होती है।

व्यक्ति को वही चीज़ें खानी चाहिए जो प्राकृतिक हैं, तुम्हारे लिए प्राकृतिक….

फल, सब्जियां, मेवे आदि, खाओ जितना ज्यादा तुम खा सको। खूबसूरती यह है, कि तुम इन चीजों को जरूरत से अधिक नहीं खा सकते।

जो कुछ भी प्राकृतिक है, हमेशा तुम्हें संतुष्टि देता है, क्यों कि यह तुम्हारे शरीर को तृप्त करता है, तुम्हें भर देता है। तुम परिपूर्ण महसूस करते हो।

अगर कुछ चीज अप्रा-कृतिक है, वह तुम्हें कभी पूर्णता का एहसास नहीं देती। आइसक्रीम खाते जाओ, तुम को कभी नहीं लगता है, कि तुम तृप्त हो।

वास्तव में जितना अधिक तुम खाते हो, उतना अधिक तुम्हें खाते रहने का मन करता है। यह खाना नहीं है। तुम्हारे मन को धोखा दिया जा रहा है।

अब तुम शरीर की जरूरत के हिसाब से नहीं खा रहे हो, तुम केवल इसे स्वाद के लिए खा रहे हो। जीभ नियंत्रक बन गई है।

जीभ नियंत्रक नहीं होनी चाहिए, यह पेट के बारे में कुछ नहीं जानती। यह शरीर के बारे में कुछ भी नहीं जानती।

जीभ का एक विशेष उद्देश्य है, खाने का स्वाद लेना। स्वाभाविक रूप से, जीभ को परखना होता है, केवल यही चीज है, कौन सा खाना शरीर के लिए है, मेरे शरीर के लिए और कौन सा खाना मेरे शरीर के लिए नहीं है।

यह सिर्फ दरवाजे पर चौकीदार है, यह स्वामी नहीं है, और अगर दरवाजे पर चौकीदार स्वामी बन जाता है, तो सब कुछ अस्तव्यस्त हो जाएगा।

अब विज्ञापनदाता अच्छी तरह जानते हैं, कि जीभ को बरगलाया जा सकता है, नाक को बरगलाया जा सकता है। और वे स्वामी नहीं हैं। हो सकता है, तुम अवगत नहीं हो: भोजन पर दुनिया में अनुसंधान चलता रहता है, और वे कहते हैं, कि अगर तुम्हारी नाक पूरी तरह से बंद कर दी जाए, और तुम्हारी आंखें बंद हों, और फिर तुम्हें खाने के लिए एक प्याज दिया जाए, तुम नहीं बता सकते कि तुम क्या खा रहे हो।

तुम सेब और प्याज में अंतर नहीं कर सकते, अगर नाक पूरी तरह से बंद हो, क्यों कि आधा स्वाद गंध से आता है, नाक द्वारा तय किया जाता है, और आधा जीभ द्वारा तय किया जाता है।

ये दोनों नियंत्रक हो गए हैं। अब वे जानते हैं, कि आइसक्रीम पौष्टिक है, या नहीं यह बात नहीं है।

उस में स्वाद हो सकता है, उस में कुछ रसायन हो सकते हैं, जो जीभ को परितृप्त भले ही करें, मगर शरीर के लिए आवश्यक नहीं होते।

आदमी उलझन में है, भैंसों से भी अधिक उलझन में। तुम भैंसों को आइसक्रीम खाने के लिए राजी नहीं कर सकते। कोशिश करो !

एक प्राकृतिक खाना…और जब मैं प्राकृतिक कहता हूं, मेरा मतलब है, जो कि तुम्हारे शरीर की जरूरत है।

एक बाघ की जरूरत अलग है, उसे बहुत ही हिंसक होना होता है। यदि तुम एक बाघ का मांस खाओ तो तुम हिंसक हो जाओगे, लेकिन तुम्हारी हिंसा कहां व्यक्त होगी ?

तुम को मानव समाज में जीना है, एक जंगल में नहीं। फिर तुम को हिंसा को दबाना होगा। फिर एक दुष्चक्र शुरू होता है।

जब तुम हिंसा को दबाते हो, तब क्या होता है? जब तुम क्रोधित, हिंसक मह-सूस करते हो, एक तरह की जहरीली ऊर्जा निकलती है, क्यों कि वह जहर एक स्थिति उत्पन्न करता है, जहां तुम वास्तव में हिंसक हो सकते हो और किसी को मार सकते हो।

वह ऊर्जा तुम्हारे हाथ की ओर बहती है; वह ऊर्जा तुम्हारे दांतों की ओर बहती है। यही वे दो स्थान हैं जहां से जानवर हिंसक होते हैं। आदमी जानवरों के साम्राज्य का हिस्सा है।

जब तुम गुस्सा होते हो, तो ऊर्जा निकलती है, और यह हाथ और दांत तक आती है, जबड़े तक आती है, लेकिन तुम मानव समाज में जी रहे हो, और क्रोधित होना हमेशा लाभदायक नहीं है।

तुम एक सभ्य दुनिया में रहते हो और तुम एक जानवर की तरह बर्ताव नहीं कर सकते। यदि तुम एक जानवर की तरह व्यवहार करते हो, तो तुम्हें इसके लिए बहुत अधिक भुगतान करना पड़ेगा, और तुम उतना देने को तैयार नहीं हो।

तो फिर तुम क्या करते हो ?

तुम हाथ में क्रोध को दबा देते हो, तुम दांत में क्रोध को दबा देते हो, तुम एक झूठी मुस्कान चिपका लेते हो, और तुम्हारे दांत क्रोध को इकट्ठा करते जाते हैं।

मैंने शायद ही कभी प्राकृतिक जबड़े के साथ लोगों को देखा है।

वह प्राकृतिक नहीं होता, अवरुद्ध, कठोर क्यों कि उस में बहुत ज्यादा गुस्सा है। यदि तुम किसी व्यक्ति के जबड़े को दबाओ, क्रोध निकाला जा सकता है। हाथ बदसूरत हो जाते हैं।

वे मनोहरता खो देते हैं, वे लचीलापन खो देते हैं, क्यों कि बहुत अधिक गुस्सा वहां दबा है।

जो लोग गहरी मालिश पर काम कर रहे हैं, उन्हें पता चला है, कि जब तुम हाथ को गहराई से छूते हो, हाथ की मालिश करते हो, व्यक्ति क्रोधित होना शुरू होता है।

कोई कारण नहीं है। तुम आदमी की मालिश कर रहे हो और अचानक वह गुस्से का अनुभव करने लगता है।

यदि तुम जबड़े को दबाओ, व्यक्ति फिर गुस्सा हो जाता हैं। वे इकट्ठे किए हुए क्रोध को ढोते हैं। ये शरीर की अशुद्धताएं हैं, उन्हें निकालना ही है।

अगर तुम उन्हें नहीं निकालोगे तो, शरीर भारी रहेगा। हरे कृष्णा🙏

Posted in रामायण - Ramayan, साकाहारी

संजय कुमार

रामायण में एक घास के तिनके का भी रहस्य है, जो हर किसी को नहीं मालूम क्योंकि आज तक हमने हमारे ग्रंथो को
सिर्फ पढ़ा, समझने की कोशिश नहीं की।

रावण ने जब माँ सीता जी का हरण करके लंका ले गया तब लंका मे सीता जी वट वृक्ष के नीचे बैठ कर चिंतन करने लगी। रावण बार बार आकर माँ सीता जी को धमकाता था, लेकिन माँ सीता जी कुछ नहीं बोलती थी। यहाँ तक की रावण ने श्री राम जी के वेश भूषा मे आकर माँ सीता जी को
भ्रमित करने की भी कोशिश की लेकिन फिर भी सफल नहीं हुआ,
रावण थक हार कर जब अपने शयन कक्ष मे गया तो मंदोदरी ने उससे कहा आप तो राम का वेश धर कर गये थे, फिर क्या हुआ?
रावण बोला- जब मैं राम का रूप लेकर सीता के समक्ष गया तो सीता मुझे नजर ही नहीं आ रही थी ।
रावण अपनी समस्त ताकत लगा चुका था लेकिन जिस जगत जननी माँ को आज तक कोई नहीं समझ सका, उन्हें रावण भी कैसे समझ पाता !
रावण एक बार फिर आया और बोला मैं तुमसे सीधे सीधे संवाद करता हूँ लेकिन तुम कैसी नारी हो कि मेरे आते ही घास का तिनका उठाकर उसे ही घूर-घूर कर देखने लगती हो,
क्या घास का तिनका तुम्हें राम से भी ज्यादा प्यारा है? रावण के
इस प्रश्न को सुनकर माँ सीता जी बिलकुल चुप हो गयी और उनकी
आँखों से आसुओं की धार बह पड़ी।
इसकी सबसे बड़ी वजह थी कि
जब श्री राम जी का विवाह माँ सीता जी के साथ हुआ,तब सीता जी का बड़े आदर सत्कार के साथ गृह प्रवेश भी हुआ। बहुत उत्सव मनाया गया। प्रथानुसार नव वधू विवाह पश्चात जब ससुराल आती है तो उसके हाथ से कुछ मीठा पकवान बनवाया जाता है, ताकि जीवन भर घर में मिठास बनी रहे।
इसलिए माँ सीता जी ने उस दिन अपने हाथों से घर पर खीर बनाई और समस्त परिवार, राजा दशरथ एवं तीनों रानियों सहित चारों भाईयों और ऋषि संत भी भोजन पर आमंत्रित थे।
माँ सीता ने सभी को खीर परोसना शुरू किया, और भोजन शुरू होने ही वाला था की ज़ोर से एक हवा का झोका आया। सभी ने अपनी अपनी पत्तलें सम्भाली,सीता जी बड़े गौर से सब देख रही थी।
ठीक उसी समय राजा दशरथ जी की खीर पर एक छोटा सा घास का तिनका गिर गया, जिसे माँ सीता जी ने देख लिया। लेकिन अब खीर मे हाथ कैसे डालें? ये प्रश्न आ गया। माँ सीता जी ने दूर से ही उस तिनके को घूर कर देखा वो जल कर राख की एक छोटी सी बिंदु बनकर रह गया। सीता जी ने सोचा ‘अच्छा हुआ किसी ने नहीं देखा’।
लेकिन राजा दशरथ माँ सीता जी
के इस चमत्कार को देख रहे थे। फिर भी दशरथ जी चुप रहे और अपने कक्ष पहुचकर माँ सीता जी को बुलवाया ।
फिर उन्होंने सीताजी से कहा कि मैंने आज भोजन के समय आप के चमत्कार को देख लिया था ।
आप साक्षात जगत जननी स्वरूपा हैं, लेकिन एक बात आप मेरी जरूर याद रखना।
आपने जिस नजर से आज उस तिनके को देखा था उस नजर से आप अपने शत्रु को भी कभी मत देखना।
इसीलिए माँ सीता जी के सामने जब भी रावण आता था तो वो उस घास के तिनके को उठाकर राजा दशरथ जी की बात याद कर लेती थी।
तृण धर ओट कहत वैदेही
सुमिरि अवधपति परम् सनेही

यही है उस तिनके का रहस्य !
इसलिये माता सीता जी चाहती तो रावण को उस जगह पर ही राख़ कर
सकती थी, लेकिन राजा दशरथ जी को दिये वचन एवं भगवान श्रीराम को रावण-वध का श्रेय दिलाने हेतु वो शांत रही !
ऐसी विशलहृदया थीं हमारी जानकी माता !

🌺🙏🌺जय श्री राम 🌺🙏🌺

Posted in साकाहारी

जनपदोद्ध्वंस : महामारी
📝 श्रीकृष्ण “जुगनू”
कोरोना के बहाने कुछ बातें कहने का मन है जो भारतीय मनीषा ने लगभग ढाई हजार साल पहले भोगकर आत्मसात् कीं और उसके अनुभवों को संसार के सामने आचरण के उद्देश्य से रखा। महामारी का समय सामान्य काल नहीं होता, यह मज़ाक का दौर भी नहीं बल्कि चिंता की वेला है जिसे चरक ने सबसे पहले जनपदोद्ध्वंस नाम दिया है। इसका सामान्य आशय वही है जो हम अभी – अभी चीन और इटली के अर्थ में लेे रहे हैं। देशध्वंस का मतलब उस काल में बहुत भयानक व्याधि का परिणाम था जिसे बाद में अपिडेमिक भी कहा गया।

गंगा के तटवर्ती वनों में घूमते हुए पुनर्वसु ने शिष्यों से जो कहा, चरक ने उसे बहुत उपयोगी माना क्योंकि कांपिल्य में महामारी को लेकर एक समय बड़ी संगति रखी गई थी और उसमें महामारी पर सर्व दृष्टि विमर्श किया गया। संसार में किसी महामारी पर यह कदाचित पहला और महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। यकीन नहीं होगा कि पुनर्वसु ने साफ कह दिया था कि एक एक औषधि को परख कर सुरक्षित कर दिया जाए क्योंकि महामारी के समय दवा से उसके रस, गुण, शक्ति सब गुम हो जाते हैं यानि कि दवा तब दवा नहीं रहती!

स्मरण रखना चाहिए कि महामारी के समय सब असामान्य हो जाता है : नक्षत्र, ग्रह, चन्द्र, सूर्य की स्थितियां…दिशाओं में प्रकृति और ऋतुओं में विकार, दवाइयों में प्रभाव शून्यता, जन आतंक और अधिकांश लोग रोगग्रस्त, रोग भी ऐसे कि जिनका उपचार संभव नहीं हो। सब कुछ अस्वाभाविक होता है। (विमानस्थान, 3, 4)

चरक ने इसे राज्य के नष्ट होने का भाव अनेक विशेषणों से दिया है और वराह ने “मरकी” नाम दिया। वराह को मालूम था कि परिधावी नामक संवत्सर का उत्तरार्ध नाशकारी प्रवृत्ति लेकर आता है और व्यवस्था का संकट खड़ा हो जाता है : देशनाशो नृपहानि। हालांकि अब बीत गया है। दशम युग के संवत्सरों में अधिकतर कलह, रोग, मरक (मरी) और नाश काल के रूप में रेखांकित किया है। प्रभव, राक्षस भी न्यारे नहीं। चरक इस अर्थ में पहले से ही उपचार की व्यवस्था करके रखने की बात कहते हैं : भैषज्येषु सम्यग्विहितेषु सम्यक् चावचारितेषु जनपदोद्ध्वंसकराणां विकाराणां…।

वायरस वाले रोगों के प्रसंग में यह बहुत आश्चर्यकारक है कि महामारी की उत्पत्ति और प्रसार के चार कारण हैं : विकृत वायु, विकृत जल, विकृत देश और विकृत काल। चरक ने जिस तरह इनके भेद, लक्षण और सर्वेक्षण आधारित चरण दिए हैं, वे आज के विज्ञान के अनुसार है।

आत्रेय से अग्निवेश संवाद के अन्तर्गत यह भी कहा है कि क्यों मनुष्य भिन्न-भिन्न प्रकृति, आहार, शरीर, बल, सात्मय, सत्व और आयु के होते हैं तो फिर एक ही साथ, एक ही समय में उनका देशव्यापी महामारी से क्योंकर विनाश होता है? महामारी इति से बढ़कर है और महा अकाल है जिसे “गर्गसंहिता” में उपसर्ग के लक्षणों सहित बताया गया है। इसके शांति उपायों पर मध्य काल तक पूरी ताकत लगी।

चरक ने क्यों खुलकर कहा कि स्पर्श, वायु और खाद्य पदार्थों के दोषपूर्ण होने से उपजी महामारी से देश नष्ट होते हैं : तत उद्ध्वंसन्ते जनपदा: स्पृश्याभ्यवहार्य दोषात्। यह सब बहुत लंबा विषय है। लेकिन, हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि मानवता की सुरक्षा के लिए सात्विक आहार, विहार, आचरण हो, हितकर स्थान पर रहें, महर्षियों की चर्चा हो और उन उपायों में ही जीवन लगाएं जिनसे जीवन रक्षा के प्रयास तय हों और परस्पर विश्वास का भाव बढ़े। अपनी रक्षा स्वयं करें। वाग्भट्ट और चरक का मत है :
इत्येतद् भेषजं प्रोक्तमायुष: परिपालनम्।
येषामनियतो मृत्युस्तस्मिन्काले सुदारुणे।।
🌄
सभी के लिए स्वास्थ्य की कोटि कोटि मंगल कामनाएं : सर्वे संतु निरामया।
(शिल्पशास्त्र में आयुर्वेद)
चित्र : DrSatyanarayan Suthar

Posted in साकाहारी

🔥🔥आर्य विचार 🔥🔥

नीरज आर्य

विधर्मी मुसलमानों और ईसाईयो के साथ साथ मांसाहारी हिन्दूओ तुम भी सुन लो,
महर्षि मनु लिखते है:-

अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चैति घातकाः
मनु० 5.51
अर्थ:-पशु-हत्या की अनुमति देने वाला(जिसकी सम्मति के बिना ऐसी हत्या नहीं हो सकती अर्थात् सरकार) , शस्त्र से मांस काटने वाला, मारने वाला,खरीदने वाला,बेचने वाला,पकाने वाला,परोसने वाला और खाने वाला, ये सब घातक हैं,कसाई हैं,पापी हैं।

http://aryamantavya.in/manu-smriti/

ध्यान रहे, विधि-निषेध या धर्माधर्म के विषय में श्री राम भी मनुस्मृति को ही प्रमाण मानते थे। बालिवध के प्रसंग में जब बालि की आपत्तियों का राम से अन्यथा उत्तर न बन पडा तो उन्होंने मनु की ( जो उन्हीं के पूर्वजों में थे ) शरण ली और कहा —
श्रयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्रवत्सलौ ।
गृहितौ धर्मकुशलैस्तत्तथा चरितं मया ।। कि○ 18/30-31
अर्थ:-सदाचार कें प्रसंग में मनु ने दो श्लोक लिखे हैं । धर्मात्मा लोग उनके अनुसार आचरण करते हैं । मैंने वही किया है ।

आर्य समाज दे रहा आवाज,
जागो हिन्दूओ आज के आज।

आओ मिलकर चले वेदो की ओर

Posted in साकाहारी

🚩🚩🙏….आपत्ति जनक भाषा का प्रयोग कर रहा हूँ माफ़ कीजियेगा….प्रश्न मांस का नहीं आस्था-भावना का है,
….एक महिला-लेखिका ( शोभा डे ) की टिपण्णी “मांस तो मांस होता है ,चाहे गाय का हो या बकरे का… फिर हिन्दू जानवरों के प्रति अलग अलग व्यवहार करके क्यों ढोंग करते है कि बकरा काटो पर गाय मत काटो ,ये मुर्खता है की नहीं ”
मेरा उनके लिए जवाब –
….मर्द तो मर्द होता है ,चाहे भाई हो या पति या बेटा फिर तीनो के साथ आप अलग अलग व्यवहार क्यों करती है ,क्या संतान पैदा करने के लिए पति जरुरी है ?
भाई के साथ भी वही व्यवहार लिया जा सकता है जो आप पति के साथ करती है,ये आप की मुर्खता है की नहीं ?
….आपने अपने बच्चों और घर में पति को नाश्ते में दूध तो देती होंगी?
जाहिर हैं वो गौमाता या भैस का ही होगा । तो क्या आप कुतिया का दूध उनको पिला सकती हैं क्या ? नहीं न ?
प्रश्न मांस का नहीं आस्था और भावना का है जिस तरह भाई पति,और बेटा का सम्बन्ध भावना और आस्था के आधार पर चलता है उसी प्रकार गाय ,बकरे या यानी पशु भी हमारे भावना का आधार पर व्यवहृत होता है।
……कृपया शेयर करे ताकि ऐसे सवाल करने वाले की बोलती बन्द हो…🙏🚩🚩

Posted in साकाहारी

मांसाहार और शाकाहार


ओशो ने मांसाहार और शाकाहार पर बहुत सटीक बातें कही हैं। उन्होंने कहा है कि फल और सब्जियाँ रंगदार और खुशबूदार होती हैं, वो आपको मोहक लगती हैं जबकि मांस देखने में भद्दा और बदबूदार होता है। किसी फल के बगीचे में चले जायें तो मन खिल जाता है। एक दो फल तोड़ कर खाने का मन करता है, वहीं किसी कत्लगाह में चले जाएँ तो अच्छा खासा स्वस्थ मन भी खराब हो जाए। फल या सब्ज़ी तोड़ने या काटने पर आपको कोई ग्लानि नहीं होती, उनकी पीड़ा, उनका रोना और चीखना आपको सुनाई या दिखाई नहीं देता, वहीं किसी पशु की हत्या करना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। इसलिए देखा जाए तो प्रकृति ने आपकी इंद्रियों को ऐसा बनाया है कि जिव्हा के अलावा बाकी सभी इन्द्रियाँ मांसाहार के ख़िलाफ़ हैं। इससे आपको समझना चाहिए कि प्रकृति आपको क्या इशारा कर रही है। इस इशारे के समझकर ही अपना भोजन चुनें। चुनाव आपका है। 🙏

( copied)

Posted in साकाहारी

आयुर्वेद अनुसार भोजन के तीन प्रकार


आयुर्वेद अनुसार भोजन के तीन प्रकार

हर व्यक्ति का खान-पान उसके संस्कार और संस्कृति के अनुसार होता है। खान-पान में युगों से जो पदार्थ प्रयोग किए जाते रहे हैं, आज भी उन्हीं पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। यह अवश्य है कि इन विभिन्न खाद्य पदार्थों में कुछ ऐसे हैं जो बहुत फायदेमंद होते हैं, तो कुछ ऐसे जो बेहद नुकसानदायक होते हैं। इसी आधार पर प्राचीनकाल में वैद्यों ने आहार को मुख्य रूप से तीन प्रकारों में बाँटा था-

सात्विक भोजन
यह ताजा, रसयुक्त, हल्की चिकनाईयुक्त और पौष्टिक होना चाहिए। इसमें अन्ना, दूध, मक्खन, घी, मट्ठा, दही, हरी-पत्तेदार सब्जियाँ, फल-मेवा आदि शामिल हैं। सात्विक भोजन शीघ्र पचने वाला होता है। इन्हीं के साथ नींबू, नारंगी और मिश्री का शरबत, लस्सी जैसे तरल पदार्थ बहुत लाभप्रद हैं। इनसे चित्त एकाग्र तथा पित्त शांत रहता है। भोजन में ये पदार्थ शामिल होने पर विभिन्न रोग एवं स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से काफी बचाव रहता है।

राजसी भोजन
इसमें सभी प्रकार के पकवान, व्यंजन, मिठाइयाँ, अधिक मिर्च-मसालेदार वस्तुएँ, नाश्ते में शामिल आधुनिक सभी पदार्थ, शक्तिवर्धक दवाएँ, चाय, कॉफी, कोको, सोडा, पान, तंबाकू, मदिरा एवं व्यसन की सभी वस्तुएँ शामिल हैं। राजसी भोज्य पदार्थों के गलत या अधिक इस्तेमाल से कब, क्या तकलीफें हो जाएँ या कोई बीमारी हो जाए, कहा नहीं जा सकता।
इनसे हालाँकि पूरी तरह बचना तो किसी के लिए भी संभव नहीं, किंतु इनका जितना कम से कम प्रयोग किया जाए, यह किसी भी उम्र और स्थिति के व्यक्ति के लिए लाभदायक रहेगा। वर्तमान में होनेवाली अनेक बीमारियों का कारण इसी तरह का खानपान है, इसलिए बीमार होने से पहले इनसे बचा जाए, वही बेहतर है।

तामसी भोजन
इसमें प्रमुख मांसाहार माना जाता है, लेकिन बासी एवं विषम आहार भी इसमें शामिल हैं। तामसी भोजन व्यक्ति को क्रोधी एवं आलसी बनाता है, साथ ही कई प्रकार से तन और मन दोनों के लिए प्रतिकूल होता है।

●◆● खान-पान की खास बात ●◆●

* जब जल्दी में हों, तनाव में हों, अशांत हों, क्रोध में हों तो ऐसी स्थिति में भोजन न किया जाए, यही बेहतर है।
* आयुर्वेद के अनुसार जो मनुष्य खाना खाता है, शरीर के प्रति उसका कर्तव्य है कि वह व्यायाम अवश्य करें।
* बुजुर्गों के लिए टहलना ही पाचन के लिए पर्याप्त व्यायाम है।
* भोजन ऋतु, स्थान और समय के अनुसार ही करें। बार-बार न खाएँ। यदि समय अधिक निकल जाए तो भोजन न करना ज्यादा अच्छा है।
* भोजन के साथ पानी न पीएँ। आधे घंटे पहले और एक घंटे बाद पीएँ।
* भूख को टालना ठीक नहीं। यह शरीर के लिए नुकसानदायक है।
* दिनभर में इतना काम अवश्य करें कि शाम को थकावट महसूस हो। इससे भूख लगेगी और नींद भी अच्छी आएगी।

Posted in साकाहारी

आजकल मुझे यह देख कर अत्यंत खेद और आश्चर्य होता है की अंडा शाकाहार का पर्याय बन चुका है


आजकल मुझे यह देख कर अत्यंत खेद और आश्चर्य होता है की अंडा शाकाहार का पर्याय बन चुका है ,…खैर मै ज्यादा भूमिका और प्रकथन में न जाता हुआ सीधे तथ्य पर आ रहा हूँ

मादा स्तनपाईयों (बन्दर बिल्ली गाय मनुष्य) में एक निश्चित समय के बाद अंडोत्सर्जन एक चक्र के रूप में होता है उदारहरणतः मनुष्यों में यह महीने में एक बार,.. चार दिन तक होता है जिसे माहवारी या मासिक धर्म कहते है ..उन दिनों में स्त्रियों को पूजा

पाठ चूल्हा रसोईघर आदि से दूर रखा जाता है ..यहाँ तक की स्नान से पहले किसी को छूना भी वर्जित है कई परिवारों में …शास्त्रों में भी इन नियमों का वर्णन है

इसका वैज्ञानिक विश्लेषण करना चाहूँगा ..मासिक स्राव के दौरान स्त्रियों में मादा हार्मोन (estrogen) की अत्यधिक मात्रा उत्सर्जित होती है और सारे शारीर से यह निकलता रहता है ..

इसकी पुष्टि के लिए एक छोटा सा प्रयोग करिये ..एक गमले में फूल या कोई भी पौधा है तो उस पर रजस्वला स्त्री से दो चार दिन तक पानी से सिंचाई कराइये ..वह पौधा सूख जाएगा ,

अब आते है मुर्गी के अण्डे की ओर

१) पक्षियों (मुर्गियों) में भी अंडोत्सर्जन एक चक्र के रूप में होता है अंतर केवल इतना है की वह तरल रूप में ना हो कर ठोस (अण्डे) के रूप में बाहर आता है ,

२) सीधे तौर पर कहा जाए तो अंडा मुर्गी की माहवारी या मासिक धर्म है और मादा हार्मोन (estrogen) से भरपूर है और बहुत ही हानिकारक है

३) ज्यादा पैसे कमाने के लिए आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर आजकल मुर्गियों को भारत में निषेधित ड्रग ओक्सिटोसिन(oxyt ocin) का इंजेक्शन लगाया जाता है जिससे के मुर्गियाँ लगातार अनिषेचित (unfertilized) अण्डे देती है

४) इन भ्रूणों (अन्डो) को खाने से पुरुषों में (estrogen) हार्मोन के बढ़ने के कारण कई रोग उत्पन्न हो रहे है जैसे के वीर्य में शुक्राणुओ की कमी (oligozoospermi a, azoospermia) , नपुंसकता और स्तनों का उगना (gynacomastia), हार्मोन असंतुलन के कारण डिप्रेशन आदि …
वहीँ स्त्रियों में अनियमित मासिक, बन्ध्यत्व , (PCO poly cystic oveary) गर्भाशय कैंसर आदि रोग हो रहे है

५) अन्डो में पोषक पदार्थो के लाभ से ज्यादा इन रोगों से हांनी का पलड़ा ही भारी है .

६) अन्डो के अंदर का पीला भाग लगभग ७० % कोलेस्ट्रोल है जो की ह्रदय रोग (heart attack) का मुख्य कारण है

7) पक्षियों की माहवारी (अन्डो) को खाना धर्म और शास्त्रों के विरुद्ध , अप्राकृतिक , और अपवित्र और चंडाल कर्म है

8) अन्डो में से चूजा ( मुर्गी-मुर्गा ) बहार आता है ,एक निश्चित समय पर

और चूजो में रक्त-मांस-हड्डी -मज्जा-वीर्य-रस आदि होता है,चाहे उसे कही से भी काँटों,

अन्डो में से घ्रणित द्रव्य निकलता है,जब उसे तोड़ते हो,दोनों परिस्तिथियों में वह रक्त ( जीवन ) का प्रतिक है- मतलब अंडा खाना मासांहार ही है..

इसकी जगह पर आप दूध पीजिए जो के पोषक , पवित्र और शास्त्र सम्मत भी है

आजकल मुझे यह देख कर अत्यंत खेद और आश्चर्य होता है की अंडा शाकाहार का पर्याय बन चुका है ,...खैर मै ज्यादा भूमिका और प्रकथन में न जाता हुआ सीधे तथ्य पर आ रहा हूँ मादा स्तनपाईयों (बन्दर बिल्ली गाय मनुष्य) में एक निश्चित समय के बाद अंडोत्सर्जन एक चक्र के रूप में होता है उदारहरणतः मनुष्यों में यह महीने में एक बार,.. चार दिन तक होता है जिसे माहवारी या मासिक धर्म कहते है ..उन दिनों में स्त्रियों को पूजा पाठ चूल्हा रसोईघर आदि से दूर रखा जाता है ..यहाँ तक की स्नान से पहले किसी को छूना भी वर्जित है कई परिवारों में ...शास्त्रों में भी इन नियमों का वर्णन है इसका वैज्ञानिक विश्लेषण करना चाहूँगा ..मासिक स्राव के दौरान स्त्रियों में मादा हार्मोन (estrogen) की अत्यधिक मात्रा उत्सर्जित होती है और सारे शारीर से यह निकलता रहता है .. इसकी पुष्टि के लिए एक छोटा सा प्रयोग करिये ..एक गमले में फूल या कोई भी पौधा है तो उस पर रजस्वला स्त्री से दो चार दिन तक पानी से सिंचाई कराइये ..वह पौधा सूख जाएगा , अब आते है मुर्गी के अण्डे की ओर १) पक्षियों (मुर्गियों) में भी अंडोत्सर्जन एक चक्र के रूप में होता है अंतर केवल इतना है की वह तरल रूप में ना हो कर ठोस (अण्डे) के रूप में बाहर आता है , २) सीधे तौर पर कहा जाए तो अंडा मुर्गी की माहवारी या मासिक धर्म है और मादा हार्मोन (estrogen) से भरपूर है और बहुत ही हानिकारक है ३) ज्यादा पैसे कमाने के लिए आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर आजकल मुर्गियों को भारत में निषेधित ड्रग ओक्सिटोसिन(oxyt ocin) का इंजेक्शन लगाया जाता है जिससे के मुर्गियाँ लगातार अनिषेचित (unfertilized) अण्डे देती है ४) इन भ्रूणों (अन्डो) को खाने से पुरुषों में (estrogen) हार्मोन के बढ़ने के कारण कई रोग उत्पन्न हो रहे है जैसे के वीर्य में शुक्राणुओ की कमी (oligozoospermi a, azoospermia) , नपुंसकता और स्तनों का उगना (gynacomastia), हार्मोन असंतुलन के कारण डिप्रेशन आदि ... वहीँ स्त्रियों में अनियमित मासिक, बन्ध्यत्व , (PCO poly cystic oveary) गर्भाशय कैंसर आदि रोग हो रहे है ५) अन्डो में पोषक पदार्थो के लाभ से ज्यादा इन रोगों से हांनी का पलड़ा ही भारी है . ६) अन्डो के अंदर का पीला भाग लगभग ७० % कोलेस्ट्रोल है जो की ह्रदय रोग (heart attack) का मुख्य कारण है 7) पक्षियों की माहवारी (अन्डो) को खाना धर्म और शास्त्रों के विरुद्ध , अप्राकृतिक , और अपवित्र और चंडाल कर्म है 8) अन्डो में से चूजा ( मुर्गी-मुर्गा ) बहार आता है ,एक निश्चित समय पर और चूजो में रक्त-मांस-हड्डी -मज्जा-वीर्य-रस आदि होता है,चाहे उसे कही से भी काँटों, अन्डो में से घ्रणित द्रव्य निकलता है,जब उसे तोड़ते हो,दोनों परिस्तिथियों में वह रक्त ( जीवन ) का प्रतिक है- मतलब अंडा खाना मासांहार ही है.. इसकी जगह पर आप दूध पीजिए जो के पोषक , पवित्र और शास्त्र सम्मत भी है