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भोजन सम्बन्धी कुछ नियम …

१ – पांच अंगो ( दो हाथ , २ पैर , मुख ) को अच्छी तरह से धो कर ही भोजन करे !

२. गीले पैरों खाने से आयु में वृद्धि होती है !

३. प्रातः और सायं ही भोजन का विधान है !

४. पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुह करके ही खाना चाहिए !

५. दक्षिण दिशा की ओर किया हुआ भोजन प्रेत को प्राप्त होता है !

६ . पश्चिम दिशा की ओर किया हुआ भोजन खाने से रोग की वृद्धि होती है !

७. शैय्या पर , हाथ पर रख कर , टूटे फूटे वर्तनो में भोजन नहीं करना चाहिए !

८. मल मूत्र का वेग होने पर , कलह के माहौल में , अधिक शोर में , पीपल ,वट वृक्ष के नीचे , भोजन नहीं करना चाहिए !

९ परोसे हुए भोजन की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए !

१०. खाने से पूर्व अन्न देवता , अन्नपूर्णा माता की स्तुति कर के ,उनका धन्यवाद देते हुए , तथा सभी भूखो को भोजन प्राप्त हो इस्वर से ऐसी प्राथना करके भोजन करना चाहिए !

११. भोजन बनने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से , मंत्र जप करते हुए ही रसोई में भोजन बनाये और सबसे पहले ३ रोटिया अलग निकाल कर ( गाय , कुत्ता , और कौवे हेतु ) फिर अग्नि देव का भोग लगा कर ही घर
वालो को खिलाये !

१२. इर्षा , भय , क्रोध , लोभ , रोग , दीन भाव , द्वेष भाव , के साथ किया हुआ भोजन कभी पचता नहीं है !

१३. आधा खाया हुआ फल , मिठाईया आदि पुनः नहीं खानी चाहिए !

१४. खाना छोड़ कर उठ जाने पर दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए !

१५. भोजन के समय मौन रहे !

१६. भोजन को बहुत चबा चबा कर खाए !
१७. रात्री में भरपेट न खाए !

१८. गृहस्थ को ३२ ग्रास से ज्यादा न खाना चाहिए !

१९. सबसे पहले मीठा , फिर नमकीन ,अंत में कडुवा खाना चाहिए !

२०. सबसे पहले रस दार , बीच में गरिस्थ , अंत में द्राव्य पदार्थ ग्रहण करे !

२१. थोडा खाने वाले को –आरोग्य ,आयु , बल , सुख, सुन्दर संतान , और सौंदर्य प्राप्त होता है !

२२. जिसने ढिढोरा पीट कर खिलाया हो वहा कभी न खाए !

२३. कुत्ते का छुवा ,रजस्वला स्त्री का परोसा , श्राध का निकाला , बासी , मुह से फूक मरकर ठंडा किया , बाल गिरा हुवा भोजन ,अनादर युक्त , अवहेलना पूर्ण परोसा गया भोजन कभी न करे !

२४. कंजूस का , राजा का , वेश्या के हाथ का , शराब बेचने वाले का दिया भोजन कभी नहीं करना चाहिए !…

संजय गुप्ता

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🌷🌷🌷यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म🌷🌷🌷

यज्ञ के मुख्य चार ऋत्विजों – ब्रह्मा, अध्वर्यु, होता और उद्गाता में एक होता है । प्रचलित अर्थ में यज्ञ कराने वाले पुरोहित को भी होता कहा जाता है । इस मन्त्र के अनुसार होतागण यज्ञ का विस्तार करते हैं । विस्तार से तात्पर्य कार्य आगे बढ़ाने से है, प्रचार-प्रसार करने से है । होतागण यज्ञ का विस्तार करके, यज्ञ-संस्कृति को समृद्ध करते हैं समृद्धि आतंरिक और बाह्य दोनों प्रकार की होती है । दोनों प्रकार से समृद्ध होकर ही व्यक्ति समृद्धिवान बनता है । इसी को धन की देवी लक्ष्मी का श्री रूप में आना कहते हैं । लक्ष्मी यदि केवल संपत्ति रूप में आये, तो वह केवल क्षणिक सुखों की अतिशयता की देने वाली होती है, वाही जब श्री रूप में आती है तो परमपद -प्राप्ति के द्वार भी खुलते हैं, व्यक्ति सद्गुणों से संवलित होकर सत्कर्म, यज्ञकर्म आदि में स्वयं को नियोजित करता है । परिवार से लेकर विश्व-परिवार तक सभी संघटन यज्ञ हैं । केवल अगिहोत्र करना ही यज्ञ नहीं है। परम चैतन्य व उसके अंश रूप मनुष्य की सेवा करना यज्ञ है, धर्म व समाज का उत्थान करना, मानवीय मूल्यों की रक्षा करना यज्ञ है । वेद ने इस सृष्टि को यज्ञमय कहा है ।

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इस्लाम पूर्व तुर्क और मंगोल समूहों द्वारा पूज्य गणेश प्रतिमा……
विशेष सुचना: वाचको से विनती है की लेख माला से जुड़े चित्र अवश्य खोल के देखे! मैं अपने मित्र विक्रमादित्य दलवी जी का बहुत ही आभार प्रकट करना चाहता हु जिन्होंने हमारे सामने ये अभूतपूर्व जानकारी सामने रखी, | ये तो केवल सनातन धर्म है जो लेता भी है और देता भी है, , ये जानकारी मैं आप सभी के सामने रख रहा हु,
अधिकांश भारत वासीयो का मानना है की मुघलो ने भारत पर १००० वर्ष राज किया! ये धारणा सर्वता असत्य है, जो की नेहरु-गाँधी शासन काल में बड़ी चतुराई से फैलाई गई! (http://www.facebook.com/photo.php…) ये सत्य क्यों नहीं? ऐसा आप प्रश्न करेंगे! ये इसलिए क्यों की १००० वर्ष पूर्व मुघल मुस्लिम नही थे! इतना ही नही किन्तु, आज से १४०० वर्ष पहले सारे पृथ्वी पर मुस्लिम नामक कोई प्राणी ही नहीं था! इस्लाम की स्थापन अरब भूमी में हुई!
आज हम इतिहास के उन पन्नों को पलट कर ऐसी ही एक अमुस्लिम (Non Muslim) राष्ट्र का इतिहास देखेंगे जो आज पूर्णतहा लुप्त हो चूका है! ……………..
इस रोमहर्षक इतिहास का पन्ना हम आज खोल रहे है! इस लिए वाचको से विनती है की इसे ध्यान से पढे!
तुर्क और मंगोल (मुघल) लोगों का इस्लाम्पुर्व इतिहास!
खान यह नाम अमुस्लिम (Non Muslim) है!
आप में से अधिकांश लोगों चौक जाएँगे ये सुनकर की ‘खान’ यह नाम अमुस्लिम (Non Muslim) है! ‘खान’ यह तुर्क-मंगोल नाम इस्लाम पूर्व से ही प्रचलित है! आज भी मंगोलिया (भारत में उसे ‘मुघलिया’ के भ्रष्ट नाम से जानते है) एक बुद्ध धर्म को मानाने वाला राष्ट्र है! यहा पर कोई भी मुस्लिम नही है! आज भी चीन, जापान, कोरिया और मंगोलिया में खान नाम पाया जाता है! उदाहरण जापान के प्रधान मंत्री का ही ले लीजिए, जिनका नाम ‘नाओटो कान’ http://en.wikipedia.org/wiki/Naoto_Kan (जो खान शब्द का जापानी अपभ्रंश है) ये बुद्ध धर्मिय है! चीन का एक मंगोल राजा था जिसका नाम था कुबलाई खान (http://en.wikipedia.org/wiki/Kublai_Khan) जो बुद्ध/वेदिक धर्म का अनुयायी था! कुबलाई खान के एक शिला लेख में ‘ओम नमो भगवते’ इस घोष के अक्षर पाए गए है!
चेंगिज खान – वो वीर था जिसने इस्लाम को लग भग समाप्त कर दिया था! चेंगिज खान और उसकी मंगोल सेना (मुघल सेना) ऐसे अमुस्लिम थे जिन्होंने पहली बार मुस्लिम भूमि में घुस कर खलीफा अल मुस्तासिम बगदाद में घुसकर मारा! इतिहास बताता है की अरब और फारसी मुस्लिमो ने लगातार २५० वर्ष (१०५० से १२५८) मध्य एशिया पर जिहादी आक्रमण करके तुर्क और मंगोल समूहों को छल-बल से मुस्लिम बनाने के लिए उन पर घोर अत्याचार किये (ठीक वैसे ही जैसे मुस्लिम बनाये जाने पर इन मुघल और तुर्को ने भारत और हिन्दुओ पर किये उन्हें मुस्लिम बनाने के लिए)! इस लगातार मुस्लिम के विरोध में मंगोलों ने चेंगिज खान के नितृत्व में एक महा भयंकर प्रति आक्रमण मुस्लिम जगत पर किये! जिस में मंगोल सेना ने ५,०००,०००० मुस्लिमो की कत्तल की! बगदाद की भव्य मस्जिदों को मुघलो ने ध्वस्त कर दिया और कुरान को घोड़े की टाप के नीचे मसल दिया!
मंगोल विजेता चेंगिज खान उर्फ तिमुजिनी की समाधी
ये चेंगिज खान की मूल समाधी है! जो चीन और मंगोलिया के सीमा पर स्थित है! मंगोल और तुर्क उनके इस्लाम पूर्व काल में इंद्र, सूर्य, चंद्र तथा शिव के उपासक थे इस लिए इस समधी पर त्रिशूल हम देस्ख सकते है! इतना ही नहीं मंगोलिया आज भी बुद्ध पंथ को मानता है और वह कोई भी मुस्लिम नही है!
मंगोलिया के दिनों के नाम सारे संस्कृत प्राचुर है जैसे अंगारक अर्थात मंगलवार इत्यादि..
यह गणेश प्रतिमा तुर्क-मंगोल लोक समूहों द्वारा उन्हें बल पूर्वक मुस्लिम बनाये जाने से पहेले पूजी जाती थी!
इस गणेश जी की प्रतिमा को आप मंगोलिया की राजधानी “उलन बतोर” के संग्रहालय में देख सकते है!
इस्लाम पूर्व तुर्क उनके चाँद-तारे के झंडे को लहराते हुए! चाँद-तारा यह तेंग्री का प्रतिक है उसका इस्लाम से कोई संबंध नहीं है!
इस्लाम पूर्व तुर्क –मंगोल ये तेंग्री के उपासक थे! इस लिए उनके ध्वज पर चाँद-तारा अंकित किया था! यह चाँद-तारा वास्तव में तेंग्री का प्रतिक है और इसका इस्लाम से कोई संबंध नही है, किन्तु आज लोग तुर्क और मुघलो को मुस्लिम समझते है और कई मुस्लिम देशो ने अपने लिए चाँद-तारे के झंडे का चयन (चुनाव) किया जैसे की पाकिस्तान!
यह पर ध्यान देने की विशष बात ये है की आप को किसी भी अरब देशो में चाँद-तारे का झंडा कभी नही मिलेगा! चुकी इस्लाम यह अरबो का मजहब है इस से और एक बार यह सिद्ध हो जाता है की चाँद-तारे वाला झंडा अमुस्लिम (Non Mumslim) है!
तुर्क-मंगोल युद्ध देवता के रूप में श्री. गणेश
साभार: उलन बातुन संग्रहालय मंगोलिया
और एक महत्वपूर्ण बात हमे ध्यान में रखनी चाहिए की आज तक किसी भी अरब के नाम में आप को खान नहीं मिलेगा! आप में से जो लोग अरब देशो की यात्रा कर चुके है वो इस सत्य को तुरंत समझ जाएँगे! क्योकि जब कोई इस्लाम को स्वीकारता है तब उसे अपने पूर्वजो का स्वदेशी नाम त्याग कर अरबी नाम धारण करना पड़ता है! अरबी नाम!!! जैसे की महमद, इब्राहीम, अब्दुल्ला, ओमर, उसमान और वो सारे नाम जिसे आप मुस्लिम नाम कहते है, वे वास्तव में सब अरब नाम है!
फिर खान ये नाम मुस्लिमो में कैसे आया?
यह एक रोचक (Interesting) प्रश्न है! इस्लाम में आने पर व्यक्ति को अरब नाम धारण करना पड़ता है, यह इस्लाम का आदेश है! किन्तु १ दिन में २ लाख मुघलो को मुस्लिम बनाया गया! इतनी बड़ी सख्या के चलते उनके नाम पूर्ण रूप से अरबी न बन सके!
ये ठीक वैसा ही है जैसे……..
जाकिर नाईक (ये मुंबई में इस्लाम का प्रचारक है)
महमद चौधरी (पाकिस्तान का सांसद)
रशीद राठौर (लश्कर ए तोईबा के कश्मीर क्षेत्र का प्रमुख)
मेजर राणा आफताब आलम चौहान (पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था ISI का उच्च पदस्थ अधिकारी)
इस्लाम पूर्व तुर्क, ये मध्य एशिया पर अपनी अलग अलग टोलियो में रह कर राज करते थे! वैदिक काल में मध्य आशिय के पामीर पर्वत का उलेख मेरु पर्वत के नाम से किया है! महाभारत के वीर कुरु वंश की सीमा जहा तक थी, वह भी मध्य आशिय के तुर्कमेनिस्तान का प्रदेश है! जिसे महाभारतीय काल में “उत्तर कुरु” कहा जाता था! उस मध्य एशिया में इस्लाम का प्रवेश होने से पहले वैदिक संस्कृती थी! उनके नामो में संस्कृत शब्द “स्थान” इसका जीता जगता उदहारण है! जैसे की तुर्कमेनिस्तान, उझबेकिस्तान, ताजिकिस्तान इत्यादि! इन तुर्को में अलग अलग टोलिया थी! हुण, बुलगर, उघिर, क्वरलाँक और सेल्जुक ये कुछ तुर्को की बड़ी टोलिया थी! ये सब तुर्क टोलिया रंग, वंश में भिन्न थी किन्तु तुर्की भाषा के समान धागे में एक राष्ट्र के भाती बन्धी थी! तुर्क और मंगोल पहचाने जाते थे वो उनकी छोटी आँखों से जिन्हें मंगोल नेत्र भी कहते है! जैसे चीनी और जापानीयो समान छोटी आंखे और चपटी नाक! दिखने में लाल और गौर वर्ण की त्वचा वाले मंगोल और तुर्क अन्य जातियों से भिन्न थे! हिमालय के पार रहने वाले तुर्क और मंगोल ठण्ड से रक्षा करने के लिए चरणों में भालू की खाल के जूते पहनते थे!
इस्लाम पूर्व तुर्क और मंगोल ये वैदिक सभ्यता और बुद्ध भगवन के उपासक थे! इसके अतिरिक्त वे आकाश और ग्रह, नक्षत्रो के भी उपासक थे! तुर्क और मंगोलों में एक शक्तिशाली देवता थी, जो धरनी माँ और आकाश की स्वामी थी! इस देवता का उलेख वे तेंग्री के नाम से करते थे! एक आधा चंद्र और चांदनी ये तेंग्री का प्रतिक माना जाता था! यहा ध्यान देने की बात है की धरती माता की वैदिक सकल्पना इस बात का जीता जगता प्रमाण है की मध्य एशिया में वैदिक संस्कृती थी!
चाँद तारे का झंडा इस्लाम पूर्व तुर्को-मंगोलों का ध्वज है, उसका इस्लाम से कोई संबंध नही!
तुर्क-मंगोल यह तेंग्री के उपासक थे! तेंग्री का चिन्ह है चाँद-तारा! तेंग्री (तन + ग्रह) का अर्थ आकाश पिता (तेंग्री/तेंगर इस्तेग) और धरणी माता (इझे/गझर ऐझ! इतिहास बताता है की मंगोल विजेता चेंगिज खान अपने आदेशपत्र पर सबसे पहले तेग्री की शपथ ले कर विषय आरंभ करता था!
इस ग्रह-तारो से संबंधित तेंग्री की उपासना के कारण तुर्क-मंगोलों के झंडे में चाँद-तारे का चिन्ह था! आज बहुत से मुस्लिम राष्ट्रों ने अपने झंडे में चाँद-तारे को डाला है! जैसे की पाकिस्तान! पर हमें ध्यान देना चाहिए की चाँद-तारा तेंग्री का प्रतिक है और उसका इस्लाम से कोई लेना देना नही है! आज भी इस्लाम के मूलभुत अरब जगत में किसी भी अरब देश के झण्डे में चाँद-तारा नहीं है! आप स्वय अरब ध्वजो के इस चित्र को ऊपर देख सकते है! इस से ये स्पष्ट हो जाता है की चाँद-तारे का झंडा अमुस्लिम ‘तेंग्री’ का प्रतिक है इस्लाम का नही! सबसे महत्वपूर्ण बात तो ये है की आज भी तुर्की भाषा में इश्वर के लिए ‘तेंग्री’ शब्द का उपयोग किया जाता है!
जब हम इतिहास की गहराई में झाक के देखते है, तो तुर्क हो या मुघल इन में से कोई भी मुस्लिम नहीं था, किन्तु ये स्वय इस्लाम के कट्टर शत्रु थे! जिन्होंने जिहाद से अपने आप को बचाने के लिए अरब मुस्लिमो के साथ रक्त रंजित युद्ध लढे!
मंगोल विजेता चेंगिज खान की समाधी का प्रवेश द्वार
यह प्रवेशद्वार चेंगिज खान की समाधी का है! जो आज के एजीन होरो नामक चीनी नगर में स्थित है! http://en.wikipedia.org/wiki/Ejen_Khoruu_Banner हमें ध्यान देना चाहिए की मंगोल और तुर्क छल-बल पूर्वक मुस्लिम बनाये जानेसे पहले वैदिक सभ्यता को मानने वाले थे इसका सबसे बड़ा प्रमाण इस प्रवेशद्वार पर स्थित त्रिशूल से मिलता है!
चीनी और मंगोल उर्फ मुघलो की उपास्य देवत के रूप दुर्गा माता
तुर्क और मुघल छल बल से मुस्लिम बनाये जाने से पहले वैदिक पारंपर को मानने वाले थे! उनके द्वारा उपासना किये जाने वाली इस दुर्गा माता की प्रतिकृति को आप उलन बतुर के संग्रहालय में देख सकते है!
दुर्गा माता की एसी प्रतिकृति को आज भी चीन, थाईलैंड, इंडोनेशिया, जापान और मंगोलिया के अनेक भागो में पूजा जाता है!

………….✍विकास खुराना ( ज्योतिष विशेषज्ञ & अध्यक्ष, हिन्दू समूह )👳‍♂🤺🔱🚩

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मित्रोआज मंगलवार है, हमेशा की तरह आज भी पवन पुत्र हनुमानजी महाराज की भक्ति करेगे,,,,,

यत्र-यत्र रघुनाथ कीर्तनम, तत्र-तत्र कृत मस्तकाण्जलिम।
वाष्पवारि परिपूर्ण लोचनम, मारूतिं नमत राक्षसान्तकाम।।

जहाँ-जहाँ प्रभु की भक्ति, कथा या भजन-कीर्तन, वहाँ भगवन् भक्त हमेशा हाजिर रहते हैं, प्रभु माने जो भी भगवान् हो चाहे भगवान् राम हो, भगवान् कृष्णजी हो चाहे भगवान् भोलेनाथ हो चाहे भगवान् श्री हरि हो, हनुमानजी की रूचि है जहाँ-जहाँ भगवान् की कथा होती है, कीर्तन होता है वहाँ-वहाँ श्री हनुमानजी बैठकर सुनते हैं, हमारे पास सत (सत्य) नहीं है अतः पहचान नहीं पाते।

हमने सुना है कि एक बार श्रीमदबल्लभाचार्य महाराजजी चित्रकूट आए श्रीमद्भागवत सप्ताह परायण करने के लिए तो हनुमानजी का आह्वान किया और हनुमानजी को यजमान बनाया और वहाँ हनुमानजी प्रकट हो गये, हनुमानजी ने कहा मैं आपके श्रीमुख से एक बार श्रीरामकथा सुनना चाहता हूँ, बल्लभाचार्यजी ने बैठकर हनुमानजी को श्रीराम-कथा सुनाई, हनुमानजी ने कहा आपने इतनी सुन्दर कथा सुनाई।

मैं यजमान बना हूँ और जब तक यजमान कथावाचक को दक्षिणा न दे उसे कथा का पुण्य भी नहीं मिलता, बोलिए आपको क्या दक्षिणा दूँ? महाराज ने कहा एक ही दक्षिणा दे दीजिये, बोले क्या? मन्दाकिनी के तट पर बैठकर आप एक बार मेरे मुख से श्रीमद्भागवत कथा सुन लीजिए बस मेरी यही दक्षिणा है, फिर हनुमानजी ने श्रीमद्भागवत सुनी।

देखो कथा जरूर सुनो, कथा कही भी हो मैं हमेशा कथा सुनने के लिए तत्पर रहता हूँ, मैं आपको भी कथा सुनने का आग्रह करता हूँ चूंकि जो हम सुनते हैं वह हमारी सम्पदा बन जाती है, जो हम सुनते हैं वह हमारे भीतर बैठ जाता है और जब तक आप किसी के बारे में सुनोगे नहीं, तब तक आप उनके बारे में जानोगे नहीं तो आप उनसे मिलोगे कैसे? हम सब भगवान् से मिलना चाहते हैं लेकिन भगवान् को जाने, तब न मिले अपरिचित से कैसे मिले? भगवान् को यदि जानना है तो भगवान् की कथा सुने।

जानें बिनु न होई परतीती, बिनु परतीती होइ नहिं प्रीती।
प्रीति बिना नहिं भगति दृढाई, जिमि खगपति जल कै चिकनाई।।

पहले सुनो “श्रवणम कीर्तनम” श्रीमद्भागवत की नवधा भक्ति में श्रवण को पहला स्थान दिया है, वाल्मीकिजी ने भी कहा है कि भगवान् की कथा सुनना प्रभु मिलन का साधन है, जिनको भी भगवान् का साक्षात्कार हुआ है कथा के द्वारा ही हुआ है, गोस्वामीजी को प्रभु मिले हैं तो कथा से ही मिले हैं, हमको और आपको भी मिलेंगे तो कथा से ही मिलेंगे।

जिन्ह के श्रवण समुद्र समाना, कथा तुम्हारी सुभग सरि नाना।
हरहिं निरन्तर होहिं न पूरे, तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।।

विभीषण इसके उदाहरण हैं, विभीषणजी जब भगवान के पास गये तो भगवान ने पूछा कि मेरे पास आना तो इतना सरल नहीं है तुम यहाँ तक आ कैसे गए तो विभीषणजी बोले कि प्रभु आपकी मंगलमय मधुर कथा को सुनकर, कथा किसने सुनायीं? बोले तब “हनुमंत कही सब रामकथा” जब हनुमंत आए थे न, तभी उन्होंने आपकी कथा सुनायीं, ठीक है कथा तो सुनायीं थी लेकिन कथा यहाँ तक कैसे ले आयी आपको।

विभीषणजी ने कहा, महाराज इतनी सुन्दर आपकी कथा सुनाई थी कि कथा सुनकर मेरे मन में भाव आ गया कि जिनकी कथा इतनी सुन्दर है वह स्वयं कितने सुन्दर होंगे, जरा चलकर एकबार प्रभु के दर्शन कर लें, कथा मुझे आपके चरणों तक ले आयी इसलिये गोस्वामीजी ने कहा है “जानें बिनु न होय परतीति, बिनु परतीति होय नहिं प्रीति” कथा का श्रवण करें और मैने कई बार आपको यह सिद्धांत आर्टिकल के द्वारा सोशल नेटवर्क के माध्यम से पढ़ाया है।

यह सिद्धान्त समझिए हमारे मुख से जो अन्दर जाता है वह हमारे मलद्वार से बाहर निकल जाता है और जो हमारे कानों और आँखों के द्वारा भीतर जाता है वह हमारे मुख के द्वारा बाहर निकलता है, कान में औषधि डाली तो मुख में आ जाती है, अगर कान के द्वारा क्रोध की बातें भीतर ले जाओगे तो मुख दिन भर गाली-गलौच करेगा, कान के द्वारा आप विषय भोगो की चर्चा भीतर ले जाओगे तो मुख दिनभर विषय भोगो की चर्चा करेगा।

और कान और आँखों के द्वारा आप भगवान् की मंगलमय कथा भीतर ले जाओगे तो मुख दिनभर भगवान् की भक्ति की भजन की, कथा की चर्चा करेगा, निर्णय हम करे कि कानो और आँखों से कथा ले जानी है या कचरा ले जाना है, अनुभव यह कह रहा है कि कथा कम जाती है, सामान्यत: कचरा ही जाता है, मुख दिनभर कचरे में ही लगा रहता है, तो जहाँ कचरा होता है वहाँ गन्दगी, मक्खी, मच्छर व सुअर जमा हो जाते हैं, वहाँ कोई खडा होना पसन्द नहीं करता है।

लोग नाक बंद करके वहाँ से दौडते है, कचरे घर के पास कोई खडा होना पसन्द नहीं करता, जीवन को कचराघर मत बनाइयें, भगवान् के सत्संग की कथा का भवन बनाइयें जहाँ नित्य नियमित कथा गायीं जायें ऐसा हमारा मन-मन्दिर चाहिये, सत्संग-भवन हमारे भीतर चाहिये, दूसरा सिद्धान्त जो कुछ हम सुनते हैं वह हमारे मन में बैठ जाता है और जो हमारे मन में बैठा होता फिर माथे की आँखे हमेशा उन्हीं की खोज करती है।

इसलिये श्री हनुमानजी महाराज को अपना गुरु बनाईयें, अच्छा दोस्त बनाईयें, हनुमानजी हमेशा आपको आगे बढ़ने में मदद करेंगे, अगर गुरु सक्षम है तो शिष्य को भी सक्षम बनने में देर नहीं लगती, हनुमानजी बल, बुद्धि और विधा के सागर है, साथ ही हनुमानजी भक्तों के परम हितेशी है, अतः भाई-बहनों, श्री रामजी के भक्त श्री हनुमानजी आप सभी का भला करें।

 

Sanjay Gupta

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सोमवार ही शिव का दिन क्यों?
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सनातन धर्म में हर दिवस का संबंध किसी न किसी देवता से है। रविवार को भगवान
भास्कर की उपासना की जाती है। मंगलवार को भगवान् मारूतिनन्दन का दिन माना जाता
है। कहीं कहीं इसे मंगलमूर्ति गणपति का भी दिवस मानते हैं। बुधवार को बुध की पूजा का विधान है क्योंकि यह शांति का दिवस है। बृहस्पतिवार को कदली वृक्ष में गुरु की पूजा की जाती है। शुक्रवार भगवती संतोषी का दिवस प्रसिद्ध है तो शनिवार को महाकाल रूप भैरव एवं महाकाली की सपर्या संपन्न की जाती है।

ठीक ऐसे ही भगवान् शंकर सोमवार को सबसे ज्यादा पूजे जाते हैं। हर सनातनधर्मी का आग्रह
होता है कि और किसी दिन शिव मंदिर जाएँ या न जाएँ लेकिन सोमवार को दर्शन अवश्य
करेंगे। आखिर ऐसा क्यों? शिव के लिए सोमवार का आग्रह ही क्यों? आईए! इस पर कुछ विचार करें।

सबसे पहले दिनों की उत्पत्ति के सन्दर्भ में विचार करते हैं। वास्तव में ये सारे दिवस भगवान् शंकर से ही प्रकट माने जाते हैं।

शिव-महापुराण के अनुसार प्राणियों की आयु का निर्धारण करने के लिए भगवान् शंकर ने काल की कल्पना की। उसी से ही ब्रह्मा से लेकर अत्यन्त छोटे जीवों तक की आयुष्य का अनुमान लगाया जाता है। उस काल को ही व्यवस्थित करने के लिए महाकाल ने सप्तवारों की कल्पना की। सबसे पहले ज्योतिस्वरूप सूर्य के रूप में प्रकट होकर आरोग्य के लिए
प्रथमवार की कल्पना की-

संसारवैद्यः सर्वज्ञः सर्वभेषजभेषजम्।
आय्वारोग्यदं वारं स्ववारं कृतवान्प्रभुः॥
अपनी सर्वसौभाग्यदात्री शक्ति के लिए द्वितीयवार की कल्पना की। उसके बाद अपने
ज्येष्ठ पुत्र कुमार के लिए अत्यन्त सुन्दर तृतीयवार की कल्पना की।

तदनन्तर सर्वलोकों की रक्षा का भार वहन करने वाले परम मित्र मुरारी के लिए चतुर्थवार
की कल्पना की। देवगुरु के नाम से पञ्चमवार की कल्पना कर उसका स्वामी यम को बना
दिया।
असुरगुरु के नाम से छठे वार की कल्पना करके उसका स्वामी ब्रह्मा को बना दिया एवं सप्तमवार की कल्पना कर उसका स्वामी इंद्र को बना दिया।

नक्षत्र चक्र में सात मूल ग्रह ही दृष्टिगोचर होते हैं, इसलिए भगवान् ने सूर्य से लेकर शनि
तक के लिए सातवारों की कल्पना की। राहु और केतु छाया ग्रह होने के कारण दृष्टिगत न होने से उनके वार की कल्पना नहीं की गई।

ऐसे तो भगवान् शंकर की उपासना हर वार को अलग फल प्रदान करती है। पुराणशिरोमणि
शिवमहापुराण के अनुसार-
आरोग्यंसंपद चैव व्याधीनांशांतिरेव च।
पुष्टिरायुस्तथाभोगोमृतेर्हानिर्यथाक्रमम्॥

अर्थात स्वास्थ्य, संपत्ति, रोग-नाश, पुष्टि, आयु, भोग तथा मृत्यु की हानि के लिए रविवार से लेकर शनिवार तक भगवान् शङ्कर की आराधना करनी चाहिए। सभी वारों
में जब शिव फलप्रद हैं तो फिर सोमवार का आग्रह क्यों? ऐसा लगता है की मनुष्य
मात्र को सम्पत्ति से अत्यधिक प्रेम होता है, इसलिए उसने शिव के लिए सोमवार का
चयन किया।

पुराणों के अनुसार सोम का अर्थ चंद्रमा होता है और चंद्रमा भगवान् शङ्कर के शीश पर मुकुटायमान होकर अत्यन्त सुशोभित होता है। लगता है कि भगवान् शङ्कर ने जैसे कुटिल, कलंकी, कामी, वक्री एवं क्षीण चंद्रमा को उसके अपराधी होते हुए भीक्षमा कर अपने शीश पर स्थान दिया वैसे ही भगवान् हमें भी सिर पर नहीं तो चरणों में जगह अवश्य देंगे। यह याद दिलाने के लिए सोमवार को ही लोगों ने शिव का वार बना दिया।

अथवा सोम का अर्थ सौम्य होता है। भगवान् शङ्कर अत्यन्त शांत समाधिस्थ देवता
हैं। इस सौम्य भाव को देखकर ही भक्तों ने इन्हें सोमवार का देवता मान लिया।

सहजता और सरलता के कारण ही इन्हें भोलेनाथ कहा जाता है। अथवा सोम का अर्थ होता है उमा के सहित शिव। केवल कल्याणरी शिव की उपासना न करके साधक भगवती शक्ति की भी साथ में उपासना करना चाहता है क्योंकि बिना शक्ति के शिव के रहस्य को समझना अत्यन्त कठिन है। इसलिए भक्तों ने सोमवार को शिव का वार स्वीकृत किया।

अथवा सोम में ॐ समाया हुआ है। भगवान् शंकर ॐकार स्वरूप हैं। ॐकार की उपासना के द्वारा हीं साधक अद्वय स्थिति में पहुँच सकता है। इसलिए इस अर्थ के विचार के
लिए भगवान् सदाशिव को सोमवार का देव कहा जाता है।

अथवा वेदों ने सोम का जहाँ अर्थ किया है वहाँ सोमवल्ली का ग्रहण किया जाता है।
जैसे सोमवल्ली में सोमरस आरोग्य और आयुष्यवर्धक है वैसे ही शिव हमारे लिए
कल्याणकारी हों, इसलिए सोमवार को महादेव की उपासना की जाती है।

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विदेशो में एक महिला 2 या तीन शादी करती है और पुरुष भी। इसलिए उनकी संताने 14 – 15 साल के होने के बाद अलग रहने लगते है।
और उनके जैविक माता पिता अपनी अपनी अलग अलग जिंदगी जीते है।
इसलिए बच्चे साल में एक बार अपने माता या पिता से मिलने जाते है।
लेकिन उनके माता पिता तो साथ रहते नहीं है।
इसलिए माता को मिलने का अलग दिन निर्धरित किया है और *उसी तरह पिता से मिलने का अलग दिन।
जो मदर्स डे और फादर्स डे के नाम से जाने जाते है।
भारत में हमारे बच्चे अपने माता और पिता के साथ ही रहते है और वो दोनों भी पूरी जिंदगी अपने बच्चों के साथ रहते है। इसलिये यहाँ हर दिन माता पिता का है।

उन्हें साल के एक दिन की जरुरत नहीं है।
माता पिता को याद करने के लिए किसी “मदर डे” / “फादर्स डे” की जरुरत नहीं , हिन्दू धर्म में तो माता पिता के कदमो में ही स्वर्ग बताया गया है।
यह मदर डे / फादर्स डे के चोचले तो उनके लिए है जो साल में एक बार अपने माता पिता को याद करने का बहाना ढूंढते है, हमारी संस्कृति में सुबह घर से निकलते वक्त पहले माता पिता के पाँव छूने की परम्परा है।

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प्राचीन भारत के दस दैवीय प्राणी, !!!!!!

भगवान श्रीराम और उनके पूर्व का काल प्राणियों की विचित्रताओं और भिन्नताओं का काल था। इस काल में धरती पर विचित्र किस्म के लोग और प्रजातियां रहती थीं, लेकिन प्राकृतिक आपदा या अन्य कारणों से ये प्रजातियां अब लुप्त हो गई हैं।

आज यह समझ पाना मुश्‍किल है कि कोई पक्षी कैसे बोल सकता है, जबकि वैज्ञानिक अब पक्षियों की भाषा समझने में सक्षम हो रहे हैं। आज यह भी समझ से परे है कि कोई विचित्र प्राणी या पशु कैसे बोल सकता है और किस तरह मानव समूह के साथ रहकर अपना जीवन-यापन कर सकता है?

प्राचीनकाल में बंदर, भालू आदि की आकृति के मानव होते थे। इसी तरह अन्य कई प्रजातियां थीं, जो मानवों के संपर्क में थीं। आओ जानते हैं ऐसे ही 10 पौराणिक प्राणियों के बारे में जिनके बारे में जानकर आप रह जाएंगे हैरान।

पहला रहस्यमयी प्राणी कामधेनु गाय : – विष के बाद मथे जाते हुए समुद्र के चारों ओर बड़े जोर की आवाज उत्पन्न हुई। देव और असुरों ने जब सिर उठाकर देखा तो पता चला कि यह साक्षात सुरभि कामधेनु गाय थी। इस गाय को काले, श्वेत, पीले, हरे तथा लाल रंग की सैकड़ों गौएं घेरे हुई थीं।

कामधेनु गाय की उत्पत्ति भी समुद्र मंथन से हुई थी। यह एक चमत्कारी गाय होती थी जिसके दर्शन मात्र से ही सभी तरह के दु:ख-दर्द दूर हो जाते थे। दैवीय शक्तियों से संपन्न यह गाय जिसके भी पास होती थी उससे चमत्कारिक लाभ मिलता था। इस गाय का दूध अमृत के समान माना जाता था। श्रीराम के पूर्व परशुराम के समकालीन ऋषि वशिष्ठ के पास कामधेनु गाय थी।

हिन्दू धर्म में गाय को क्यों पवित्र माना जाता है?

यह कामधेनु गाय सबसे पहले वरुणदेव के पास थी। कश्यप ने वरुण से कामधेनु मांगी थी, लेकिन बाद में लौटाई नहीं। अत: वरुण के शाप से वे अगले जन्म में ग्वाले हुए। यह कामधेनु गाय अंत में ऋषि वशिष्ठ के पास थी।

कामधेनु के लिए गुरु वशिष्ठ से विश्वामित्र सहित कई अन्य राजाओं ने कई बार युद्ध किया, लेकिन उन्होंने कामधेनु गाय को किसी को भी नहीं दिया। गाय के इस झगड़े में गुरु वशिष्ठ के 100 पुत्र मारे गए थे। अंत में यह गाय ऋषि परशुराम ने ले ली थी।

गाय हिन्दुओं के लिए सबसे पवित्र पशु है। इस धरती पर पहले गायों की कुछ ही प्रजातियां होती थीं। उससे भी प्रारंभिक काल में एक ही प्रजाति थी। माना जाता है कि आज से लगभग 9,500 वर्ष पूर्व गुरु वशिष्ठ ने गाय के कुल का विस्तार किया और उन्होंने गाय की नई प्रजातियों को भी बनाया, तब गाय की 8 या 10 नस्लें ही थीं जिनका नाम कामधेनु, कपिला, देवनी, नंदनी, भौमा आदि था। कहते हैं कि सभी गायों की पीठ पर सिर से लेकर पूंछ तक एक ऐसी नाड़ी होती है जिससे स्वर्ण का उत्पादन होता रहता है। उसमें भी काली गाय की नाड़ी को सूर्यकेतु कहते हैं जिस पर प्रतिदिन हाथ फेरने से हृदयरोग नहीं होता है।

भारत में आजकल गाय की प्रमुख 28 नस्लें पाई जाती हैं। गायों की यूं तो कई नस्लें होती हैं, लेकिन भारत में मुख्‍यत: साहीवाल (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, बिहार), गिर (दक्षिण काठियावाड़), थारपारकर (जोधपुर, जैसलमेर, कच्छ), करन फ्राइ (राजस्थान) आदि हैं। विदेशी नस्लों में जर्सी गाय सर्वाधिक लोकप्रिय है। यह गाय दूध भी ‍अधिक देती है। गाय कई रंगों जैसे सफेद, काली, लाल, बादामी तथा चितकबरी होती है। भारतीय गाय छोटी होती है, जबकि विदेशी गाय का शरीर थोड़ा भारी होता है।

दूसरा रहस्यमयी प्राणी गरूड़ : – माना जाता है कि गिद्धों (गरूड़) की एक ऐसी प्रजाति थी, जो बुद्धिमान मानी जाती थी। भगवान विष्णु का वाहन है गरूड़। गरूड़ एक शक्तिशाली, चमत्कारिक और रहस्यमयी पक्षी था। प्रजापति कश्यप की पत्नी विनता के दो पुत्र हुए- गरूड़ और अरुण। गरूड़जी विष्णु की शरण में चले गए और अरुणजी सूर्य के सारथी हुए। भगवान गरूड़ के नाम पर एक पुराण भी है जिसे ‘गरूड़ ‍पुराण’ कहते हैं। पुराणों में गरूड़ की शक्ति और महिमा का वर्णन मिलता है।

जब रावण के पुत्र मेघनाथ ने श्रीराम से युद्ध करते हुए श्रीराम को नागपाश से बांध दिया था, तब देवर्षि नारद के कहने पर गिद्धराज गरूड़ ने नागपाश के समस्त नागों को खाकर श्रीराम को नागपाश के बंधन से मुक्त कर दिया था। भगवान राम के इस तरह नागपाश में बंध जाने पर श्रीराम के भगवान होने पर गरूड़ को संदेह हो गया।

गरूड़ का संदेह दूर करने के लिए देवर्षि नारद उन्हें ब्रह्माजी के पास भेज देते हैं। ब्रह्माजी उनको शंकरजी के पास भेज देते हैं। भगवान शंकर ने भी गरूड़ को उनका संदेह मिटाने के लिए काकभुशुण्डिजी नाम के एक कौवे के पास भेज दिया। अंत में काकभुशुण्डिजी ने राम के चरित्र की पवित्र कथा सुनाकर गरूड़ के संदेह को दूर किया।

लोमश ऋषि के शाप के चलते काकभुशुण्डि कौवा बन गए थे। लोमश ऋषि ने शाप से मु‍क्त होने के लिए उन्हें राम मंत्र और इच्छामृत्यु का वरदान दिया। कौवे के रूप में ही उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया। वाल्मीकि से पहले ही काकभुशुण्डि ने रामायण गिद्धराज गरूड़ को सुना दी थी। इससे पूर्व हनुमानजी ने संपूर्ण रामायण पाठ लिखकर समुद्र में फेंक दी थी। वाल्मीकि श्रीराम के समकालीन थे और उन्होंने रामायण तब लिखी, जब रावण-वध के बाद राम का राज्याभिषेक हो चुका था।

तीसरे चमत्कारिक और रहस्यमयी प्राणी : – सम्पाती और जटायु :ये दोनों पक्षी राम के काल में थे। प्रजापति कश्यप की पत्नी विनता के 2 पुत्र हुए- गरूड़ और अरुण। गरूड़जी विष्णु की शरण में चले गए और अरुणजी सूर्य के सारथी हुए। सम्पाती और जटायु इन्हीं अरुण के पुत्र थे।

पुराणों के अनुसार सम्पाती बड़ा था और जटायु छोटा। ये दोनों विंध्याचल पर्वत की तलहटी में रहने वाले निशाकर ऋषि की सेवा करते थे। सम्पाती और जटायु ये दोनों भी दंडकारण्य क्षेत्र में रहते थे, खासकर मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में इनकी जाति के पक्षियों की संख्या अधिक थी। छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य में गिद्धराज जटायु का मंदिर है। स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे इसीलिए यहां एक मंदिर है।

दूसरी ओर मध्यप्रदेश के देवास जिले की बागली तहसील में ‘जटाशंकर’ नाम का एक स्थान है जिसके बारे में कहा जाता है कि गिद्धराज जटायु वहां तपस्या करते थे। जटायु पहला ऐसा पक्षी था, जो राम के लिए शहीद हो गया था। जटायु का जन्म कहां हुआ, यह पता नहीं, लेकिन उनकी मृत्यु दंडकारण्य में हुई। खैर…!

कहते हैं कि बचपन में सम्पाती और जटायु ने सूर्य-मंडल को स्पर्श करने के उद्देश्य से लंबी उड़ान भरी। सूर्य के असह्य तेज से व्याकुल होकर जटायु तो बीच से लौट आए, किंतु सम्पाती उड़ते ही गए। सूर्य के निकट पहुंचने पर सूर्य के ताप से सम्पाती के पंख जल गए और वे समुद्र तट पर गिरकर चेतनाशून्य हो गए। चन्द्रमा नामक मुनि ने उन पर दया करके उनका उपचार किया और त्रेता में श्री सीताजी की खोज करने वाले वानरों के दर्शन से पुन: उनके पंख जमने का आशीर्वाद दिया। खैर…!

जब जटायु नासिक के पंचवटी में रहते थे तब एक दिन आखेट के समय महाराज दशरथ से उनकी मुलाकात हुई और तभी से वे और दशरथ-मित्र बन गए। वनवास के समय जब भगवान श्रीराम पंचवटी में पर्णकुटी बनाकर रहने लगे, तब पहली बार जटायु से उनका परिचय हुआ।

जटायु के बाद रास्ते में सम्पाती के पुत्र सुपार्श्व ने सीता को ले जा रहे रावण को रोका और उससे युद्ध के लिए तैयार हो गया। किंतु रावण उसके सामने गिड़गिड़ाने लगा और इस तरह वह वहां से बचकर निकल आया। बाद में जब अंगद आदि सीता की खोज करते हुए सम्पाती से मिले तो उन्होंने जटायु की मृत्यु का समाचार दिया। सम्पाती ने तब अंगद को रावण द्वारा सीताहरण की पुष्टि की और अपनी दूरदृष्टि से देखकर बताया कि वे अशोक वाटिका में सुरक्षित बैठी हैं। इस प्रकार रामकथा में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गिद्ध-बंधु सम्पाती और जटायु अमर हो गए।

चौथा रहस्यमयी प्राणी : – उच्चैःश्रवा घोड़ा :घोड़े तो कई हुए लेकिन श्वेत रंग का उच्चैःश्रवा घोड़ा सबसे तेज और उड़ने वाला घोड़ा माना जाता था। अब इसकी कोई भी प्रजाति धरती पर नहीं बची। यह इंद्र के पास था। उच्चै:श्रवा का पोषण अमृत से होता है। यह अश्वों का राजा है। उच्चै:श्रवा के कई अर्थ हैं, जैसे जिसका यश ऊंचा हो, जिसके कान ऊंचे हों अथवा जो ऊंचा सुनता हो।

समुद्र मंथन के दौरान निकले उच्चै:श्रवा घोड़े को दैत्यराज बलि ने ले रख लिया था।

पांचवां रहस्यमयी प्राणी : – ऐरावत हाथी :हाथी तो सभी अच्‍छे और सुंदर नजर आते हैं लेकिन सफेद हाथी को देखना अद्भुत है। ऐरावत सफेद हाथियों का राजा था। ‘इरा’ का अर्थ जल है अत: ‘इरावत’ (समुद्र) से उत्पन्न हाथी को ‘ऐरावत’ नाम दिया गया है। हालांकि इरावती का पुत्र होने के कारण ही उनको ‘ऐरावत’ कहा गया है।

यह हाथी देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के दौरान निकली 14 मूल्यवान वस्तुओं में से एक था। मंथन से प्राप्त रत्नों के बंटवारे के समय ऐरावत को इन्द्र को दे दिया गया था। 4 दांतों वाला सफेद हाथी मिलना अब मुश्किल है।

महाभारत, भीष्म पर्व के अष्टम अध्याय में भारतवर्ष से उत्तर के भू-भाग को उत्तर कुरु के बदले ‘ऐरावत’ कहा गया है। जैन साहित्य में भी यही नाम आया है। उत्तर का भू-भाग अर्थात तिब्बत, मंगोलिया और रूस के साइबेरिया तक का हिस्सा। हालांकि उत्तर कुरु भू-भाग उत्तरी ध्रुव के पास था संभवत: इसी क्षेत्र में यह हाथी पाया जाता रहा होगा।

छठा प्राणी :- शेषनाग :भारत में पाई जाने वाली नाग प्रजातियों और नाग के बारे में बहुत ज्यादा विरोधाभास नहीं है। सभी कश्यप ऋषि की संतानें हैं। पुराणों के अनुसार कश्मीर में कश्यप ऋषि का राज था। आज भी कश्मीर में अनंतनाग, शेषनाग आदि नाम से स्थान हैं। शेषनाग ने भगवान विष्णु की शैया बनना स्वीकार किया था।

ऋषि कश्यप का कुल : – कश्यप ऋषि की पत्नी कद्रू से उन्हें 8 पुत्र मिले जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार हैं- 1. अनंत (शेष), 2. वासुकि, 3. तक्षक, 4. कर्कोटक, 5. पद्म, 6. महापद्म, 7. शंख और 8. कुलिक। कश्मीर का अनंतनाग इलाका अनंतनाग समुदायों का गढ़ था उसी तरह कश्मीर के बहुत सारे अन्य इलाके भी दूसरे पुत्रों के अधीन थे।

शेषनाग सारी सृष्टि के विनाश के पश्चात भी बचे रहते हैं इसीलिए इनका नाम ‘शेष’ हैं। शेषनाग के हजार मस्तक हैं और वे स्वर्ण पर्वत पर रहते हैं। वे नील वस्त्र धारण करते हैं। लक्ष्मण और बलराम को शेषनाग का ही अवतार माना जाता है। विष्णु की तरह शेषनाग के भी कई अवतार हैं। पुराणों में इन्हें सहस्रशीर्ष या 100 फन वाला कहा गया है।

पौराणिक कथा के अनुसार कद्रू के बेटों में सबसे पराक्रमी शेषनाग थे लेकिन वे अपनी माता और भाइयों के व्यवहार से रुष्ट रहते थे, क्योंकि उनका शरीर नाग के समान था। वे सभी को छोड़कर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करने चले गए थे। उनकी इच्छा थी कि वे इस शरीर का त्याग कर दें। मां, भाइयों तथा सौतेले भाइयों अरुण और गरुड़ के प्रति द्वेषभाव ही उनकी सांसारिक विरक्ति का कारण था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें वरदान दिया कि उनकी बुद्धि सदैव धर्म में लगी रहे। साथ ही ब्रह्मा ने उन्हें आदेश दिया कि वे पृथ्वी को अपने फन पर संभालकर धारण करें जिससे कि वह हिलना बंद कर दे तथा स्थिर रह सके। शेषनाग के पृथ्वी के नीचे जाते ही नागों ने उसके छोटे भाई वासुकि का राज्यतिलक कर दिया था।

दस फन वाला सांप :सभी जीव-जंतुओं में गाय के बाद सांप ही एक ऐसा जीव है जिसका हिन्दू धर्म में ऊंचा स्थान है। सांप एक रहस्यमय प्राणी है। देशभर के गांवों में आज भी लोगों के शरीर में नागदेवता की सवारी आती है। भारत में नागों की पूजा के प्रचलन के पीछे कई रहस्य छिपे हुए हैं। माना जाता है कि नागों की एक सिद्ध और चमत्कारिक प्रजाति हुआ करती थी, जो मानवों की सभी मनोकामना पूर्ण कर देती थी। उल्लेखनीय है कि नाग और सर्प में फर्क है। सभी नाग कद्रू के पुत्र थे जबकि सर्प क्रोधवशा के।

पौराणिक कथाओं के अनुसार पाताल लोक में कहीं एक जगह नागलोक था, जहां मानव आकृति में नाग रहते थे। कहते हैं कि 7 तरह के पाताल में से एक महातल में ही नागलोक बसा था, जहां कश्यप की पत्नी कद्रू और क्रोधवशा से उत्पन्न हुए अनेक सिरों वाले नाग और सर्पों का एक समुदाय रहता था। उनमें कहुक, तक्षक, कालिया और सुषेण आदि प्रधान नाग थे।

नागकन्या :कुंती पुत्र अर्जुन ने पाताल लोक की एक नागकन्या से विवाह किया था जिसका नाम उलूपी था। वह विधवा थी। अर्जुन से विवाह करने के पहले उलूपी का विवाह एक बाग से हुआ था जिसको गरूड़ ने खा लिया था। अर्जुन और नागकन्या उलूपी के पुत्र थे अरावन जिनका दक्षिण भारत में मंदिर है और हिजड़े लोग उनको अपना पति मानते हैं। भीम के पुत्र घटोत्कच का विवाह भी एक नागकन्या से ही हुआ था जिसका नाम अहिलवती था ‍और जिसका पुत्र वीर योद्धा बर्बरीक था। वर्तमान में इच्छाधारी नाग और नागिन की कहानियां प्रचलन में हैं।

प्राचीनकाल में नागों पर आधारित नाग प्रजाति के मानव कश्मीर में निवास करते थे। आज भी कश्मीर के बहुत से स्थानों के नाम नागकुल के नामों पर ही आधारित हैं, जैसे अनंतनाग शहर, शेषनाग झील। बाद में ये सभी नागकुल के लोग झारखंड और छत्तीसगढ़ में आकर बस गए थे, जो उस काल में दंडकारण्य कहलाता था।

वर्तमान में 2 और 5 फन वाले नाग पाए जाते हैं, लेकिन 10 फनों के नागों की प्रजाति अब लुप्त हो गई है। कुछ वर्षों पूर्व झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के चांडिल प्रखंड में 10 फन वाले शेषनाग देखे जाने की चर्चा जोरों पर थी। बताया जा रहा है कि इस शेषनाग को बीते कुछ दिनों में कई ग्रामीणों ने देखा था। इस तरह हैदराबाद में एक 5 फन वाला नाग देखा गया जिसका लोगों ने चित्र खींच लिया था।

उड़ने वाला और इच्छाधारी नाग :माना जाता है कि 100 वर्ष से ज्यादा उम्र होने के बाद सर्प में उड़ने की शक्ति आ जाती है। सर्प कई प्रकार के होते हैं- मणिधारी, इच्‍छाधारी, उड़ने वाले, एकफनी से लेकर दसफनी तक के सांप जिसे शेषनाग कहते हैं। नीलमणिधारी सांप को सबसे उत्तम माना जाता है। इच्छाधारी नाग के बारे में कहा जाता है कि वह अपनी इच्छा से मानव, पशु या अन्य किसी भी जीव के समान रूप धारण कर सकता है।

हालांकि वैज्ञानिक अब अपने शोध के आधार पर कहने लगे हैं कि सांप विश्व का सबसे रहस्यमय प्राणी है और दक्षिण एशिया के वर्षा वनों में उड़ने वाले सांप पाए जाते हैं। उड़ने में सक्षम इन सांपों को क्रोसोपेलिया जाति से संबंधित माना जाता है। वैज्ञानिकों ने 2 और 5 फन वाले सांपों के होने की पुष्‍टि की है लेकिन 10 फन वाले सांप अभी तक नहीं देखे गए हैं।

सातवां प्राणी : – मत्स्य कन्या :मत्स्य कन्या अर्थात जलपरी। भारतीय रामायण के थाई व कम्बोडियाई संस्करणों में रावण की बेटी सुवर्णमछा (सोने की जलपरी) का उल्लेख किया गया है। वह हनुमान का लंका तक सेतु बनाने का प्रयास विफल करने की कोशिश करती है, पर अंततः उनसे प्यार करने लगती है।

भारतीय दंतकथाओं में भगवान विष्णु के मत्स्यावतार का उल्लेख है जिसके शरीर का ऊपरी भाग मानव व निचला भाग मछली का है। इसी तरह चीन, अरब और ग्रीक की लोककथाओं में भी जलपरियों के सैकड़ों किस्से पढ़ने को मिलते हैं।

आठवां प्राणी : – वानर मानव :क्या हनुमानजी बंदर प्रजाति के थे? हनुमानजी का जन्म कपि नामक वानर जाति में हुआ था। नए शोधानुसार प्रभु श्रीराम का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व अयोध्या में हुआ था। श्रीराम के जन्म के पूर्व हनुमानजी का जन्म हुआ था अर्थात आज से लगभग 7129 वर्ष पूर्व हनुमानजी का जन्म हुआ था। शोधकर्ता कहते हैं कि आज से 9 लाख वर्ष पूर्व एक ऐसी विलक्षण वानर जाति भारतवर्ष में विद्यमान थी, जो आज से 15 से 12 हजार वर्ष पूर्व लुप्त होने लगी थी और अंतत: लुप्त हो गई। इस जाति का नाम ‘कपि’ था।

हनुमानजी के संबंध में यह प्रश्न प्राय: सर्वत्र उठता है कि ‘क्या हनुमानजी बंदर थे?’ इसके लिए कुछ लोग रामायणादि ग्रंथों में लिखे हनुमानजी और उनके सजातीय बांधव सुग्रीव अंगदादि के नाम के साथ ‘वानर, कपि, शाखामृग, प्लवंगम’ आदि विशेषण पढ़कर उनके बंदर प्रजाति का होने का उदाहरण देते हैं। वे यह भी कहते हैं कि उनकी पुच्छ, लांगूल, बाल्धी और लाम से लंकादहन का प्रत्यक्ष चमत्कार इसका प्रमाण है। यह ‍भी कि उनकी सभी जगह सपुच्छ प्रतिमाएं देखकर उनके पशु या बंदर जैसा होना सिद्ध होता है। रामायण में वाल्मीकिजी ने जहां उन्हें विशिष्ट पंडित, राजनीति में धुरंधर और वीर-शिरोमणि प्रकट किया है, वहीं उनको लोमेश ओर पुच्छधारी भी शतश: प्रमाणों में व्यक्त किया है।

दरअसल, आज से 9 लाख वर्ष पूर्व मानवों की एक ऐसी जाति थी, जो मुख और पूंछ से वानर समान नजर आती थी, लेकिन उस जाति की बुद्धिमत्ता और शक्ति मानवों से कहीं ज्यादा थी। अब वह जाति भारत में तो दुर्भाग्यवश विनष्ट हो गई, परंतु बाली द्वीप में अब भी पुच्छधारी जंगली मनुष्यों का अस्तित्व विद्यमान है जिनकी पूंछ प्राय: 6 इंच के लगभग अवशिष्ट रह गई है। ये सभी पुरातत्ववेत्ता अनुसंधायक एकमत से स्वीकार करते हैं कि पुराकालीन बहुत से प्राणियों की नस्ल अब सर्वथा समाप्त हो चुकी है।

नौवां रहस्यमयी प्राणी : – रीछ मानव :रामायणकाल में रीछनुमा मानव भी होते थे। जाम्बवंतजी इसका उदाहरण हैं। जाम्बवंत भी देवकुल से थे। भालू या रीछ उरसीडे (Ursidae) परिवार का एक स्तनधारी जानवर है। हालांकि इसकी अब सिर्फ 8 जातियां ही शेष बची हैं। संस्कृत में भालू को ‘ऋक्ष’ कहते हैं जिससे ‘रीछ’ शब्द उत्पन्न हुआ है। निश्चित ही अब जाम्बवंत की जाति लुप्त हो गई है। हालांकि यह शोध का विषय है।

जाम्बवंत को आज रीछ की संज्ञा दी जाती है, लेकिन वे एक राजा होने के साथ-साथ इंजीनियर भी थे। समुद्र के तटों पर वे एक मचान को निर्मित करने की तकनीक जानते थे, जहां यंत्र लगाकर समुद्री मार्गों और पदार्थों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता था। मान्यता है कि उन्होंने एक ऐसे यंत्र का निर्माण किया था, जो सभी तरह के विषैले परमाणुओं को निगल जाता था। रावण ने इस सभी रीछों के राज्य को अपने अधीन कर लिया था। जाम्बवंत ने युद्ध में राम की सहायता की थी और उन्होंने ही हनुमानजी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया था।

जब युद्ध में राम-लक्ष्मण मेघनाद के ब्रह्मास्त्र से घायल हो गए थे, तब किसी को भी उस संकट से बाहर निकलने का उपाय नहीं सूझ रहा था। तब विभीषण और हनुमान जाम्बवंतजी के पास गए, तब उन्होंने हनुमानजी से हिमालय जाकर ऋषभ और कैलाश नामक पर्वत से ‘संजीवनी’ नामक औषधि लाने को कहा था।

माना जाता है कि रीछ या भालू इन्हीं के वंशज हैं। जाम्बवंत की उम्र बहुत लंबी थी। 5,000 वर्ष बाद उन्होंने श्रीकृष्ण के साथ एक गुफा में स्मयंतक मणि के लिए युद्ध किया था। भारत में जम्मू-कश्मीर में जाम्बवंत गुफा मंदिर है। जाम्बवंत की बेटी के साथ कृष्ण ने विवाह किया था।

अब सवाल उठता है कि क्या इंसानों के समान कोई पशु हो सकता है? जैसे रीछ प्रजाति। रामायण में जाम्बवंत को एक रीछ मानव की तरह दर्शाया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह अर्सिडी कुल का मांसाहारी, स्तनी, झबरे बालों वाला बड़ा जानवर है। यह लगभग पूरी दुनिया में कई प्रजातियों में पाया जाता है। मुख्‍यतया इसकी 5 प्रजातियां हैं- काला, श्वेत, ध्रुवीय, भूरा और स्लोथ भालू।

अमेरिका और रशिया में आज भी भालू मानव के किस्से प्रचलित हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि कभी इस तरह की प्रजाति जरूर अस्तित्व में रही होगी। कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि भूरे रंग का एक विशेष प्रकार का भालू है जिसे नेपाल में ‘येति’ कहते हैं। एक ब्रिटिश वैज्ञानिक शोध में पता चला है कि हिमालय के मिथकीय हिम मानव ‘येति’ भूरे भालुओं की ही एक उपप्रजाति हो सकती है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ब्रायन स्काइज द्वारा किए गए बालों के डीएनए परीक्षणों से पता चला है कि ये ध्रुवीय भालुओं से काफी कुछ मिलते-जुलते हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में भूरे भालुओं की उपप्रजातियां हो सकती हैं।

संस्कृत में भालू को ‘ऋक्ष’ कहते हैं। अग्निपुत्र जाम्बवंत को ऋक्षपति कहा जाता है। यह ऋक्ष बिगड़कर रीछ हो गया जिसका अर्थ होता है भालू अर्थात भालू के राजा। लेकिन क्या वे सचमुच भालू मानव थे? रामायण आदि ग्रंथों में तो उनका चित्रण ऐसा ही किया गया है। ऋक्ष शब्द संस्कृत के अंतरिक्ष शब्द से निकला है। जामवंतजी को अजर अमर होने का वरदान प्राप्त है।

प्राचीनकाल में इंद्र पुत्र, सूर्य पुत्र, चंद्र पुत्र, पवन पुत्र, वरुण पुत्र, ‍अग्नि पुत्र आदि देवताओं के पुत्रों का अधिक वर्णन मिलता है। उक्त देवताओं को स्वर्ग का निवासी कहा गया है। एक ओर जहां हनुमानजी और भीम को पवन पुत्र माना गया है, वहीं जाम्बवंतजी को अग्नि पुत्र कहा गया है। जाम्बवंत की माता एक गंधर्व कन्या थी। जब पिता देव और माता गंधर्व थीं, तो वे कैसे रीछ मानव हो सकते हैं?

एक दूसरी मान्यता के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने एक ऐसा रीछ मानव बनाया था, जो दो पैरों से चल सकता था और जो मानवों से संवाद कर सकता था। पुराणों के अनुसार वानर और मानवों की तुलना में अधिक विकसित रीछ जनजाति का उल्लेख मिलता है। वानर और किंपुरुष के बीच की यह जनजाति अधिक विकसित थी। हालांक‍ि इस संबंध में अधिक शोध किए जाने की आवश्यकता है।

दसवां रहस्यमयी प्राणी : – येति मानव :बिगफुट को पूरे विश्व में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। तिब्बत और नेपाल में इन्हें ‘येती’ का नाम दिया जाता है, तो ऑस्ट्रेलिया में ‘योवी’ के नाम से जाना जाता है। भारत में इसे ‘यति’ कहते हैं।

 

Sanjay Gupta