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मिलनाडु के प्राचीन पंचवर्णस्वामी मंदिर की दीवाल पर साईकिल पर बैठे एक वयक्ति की मूर्ति उकीर्ण है ।।
जिसमे साफ़ तौर पर युवक सायकल पैडल मारता हुआ दिखाई दे रहा है इस तस्वीर ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है।
ये मूर्ति 2000 साल पुरानी है । लेकिन साईकिल का आविष्कार तो 200 साल पहले यूरोप में हुआ था ।।
एक बात हमेशा दिमाग में घूमती है सारे बड़े बड़े आविष्कार सिर्फ 250 सालो के अंदर ही हुए जब अंग्रेज और फ्रांसीसी पुर्तगाली भारत आये इससे पहले क्यों कोई आविष्कार नही हुआ भारत आने के बाद हजारो आविष्कार कैसे होने लगे ???

विदेशी आक्रमण कारियों ने हमारे धन सम्पति के साथ साथ विज्ञान और तकनीक को भी चुराया है ।और अपने नाम से छापा है।

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So we feel that rain water harvesting and lightning conductivity is a modern thing? Then explain this.

150 year old house in a remote village in East Godavari District. Every house in the village has a structure made of pure #Copper in the middle of the house. It has a #dome open to sky and a hollow #pillar which connects the dome and the earth. The houses were constructed in such a way that every drop of #Rain water falls on the house flows in to the dome and passes to underground water channels through the pillar. The water through underground water channels reaches to garden area and to underground water tanks. And the water conserved in the tanks can be reused for the household purposes. And I was wondered to know that these copper structures also safeguards the houses from #thunderbolts during heavy storms.

We should bow our heads to our #ancestors for devising such complex techniques to conserve the natural resources.

Re-educate yourselves. Learn past traditions and surprise yourselves🍃🍃🍃🍃🍃🍃

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अरुण सुक्ला

इस्लाम में अलग से भूगोल की कोई किताब नहीं है.सिर्फ कुरान में एक जगह लिख दिया कि धरती चपटी इस्लाम में अलग से भूगोल की कोई किताब नहीं है.सिर्फ कुरान में एक जगह लिख दिया कि धरती चपटी है……………बस हो गया भूगोल

जबकि विश्व की पहली भूगोल पुस्तक – श्री विष्णु पुराण है….
विष्णु पुराण के रचयिता है… महान ऋषि पाराशर…
ऋषि पाराशर महर्षि वसिष्ठ के पौत्र, गोत्रप्रवर्तक, वैदिक सूक्तों के द्रष्टा एवं ग्रंथकार थे… राक्षस द्वारा मारे गए वसिष्ठ के पुत्र शक्ति से इनका जन्म हुआ। बड़े होने पर माता अदृश्यंती से पिता की मृत्यु की बात ज्ञात होने पर राक्षसों के नाश के निमित्त इन्होंने राक्षस सत्र नामक यज्ञ शुरू किया जिसमें अनेक निरपराध राक्षस मारे जाने लगे। यह देखकर पुलस्त्य आदि ऋषियों ने उपदेश देकर इनकी राक्षसों के विनाश से निवृत्त किया और पुराण प्रवक्ता होने का वर दिया। इसके पश्चात् इन्होने विष्णु पुराण की रचना की…
यह पुराण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा प्राचीन है। इस पुराण में आकाश आदि भूतों का परिमाण, समुद्र, सूर्य आदि का परिमाण, पर्वत, देवतादि की उत्पत्ति, मन्वन्तर, कल्प-विभाग, सम्पूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियों के चरित्र का विशद वर्णन है। अष्टादश महापुराणों में श्रीविष्णुपुराण का स्थान बहुत ऊँचा है। इसमें अन्य विषयों के साथ भूगोल, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, राजवंश और श्रीकृष्ण-चरित्र आदि कई प्रंसगों का बड़ा ही अनूठा और विशद वर्णन किया गया है।
यहाँ स्वयं भगवान् कृष्ण महादेवजी के साथ अपनी अभिन्नता प्रकट करते हुए श्रीमुखसे कहते हैं-
“त्वया यदभयं दत्तं तद्दत्तमखिलं मया।
मत्तोऽविभिन्नमात्मानं द्रुष्टुमर्हसि शङ्कर।
योऽहं स त्वं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम्।
मत्तो नान्यदशेषं यत्तत्त्वं ज्ञातुमिहार्हसि।
अविद्यामोहितात्मानः पुरुषा भिन्नदर्शिनः।
वन्दति भेदं पश्यन्ति चावयोरन्तरं हर॥”
इस पुराण में इस समय सात हजार श्लोक उपलब्ध हैं। कई ग्रन्थों में इसकी श्लोक संख्या तेईस हजार बताई जाती है। विष्णु पुराण में पुराणों के पांचों लक्षणों अथवा वर्ण्य-विषयों-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित का वर्णन है। सभी विषयों का सानुपातिक उल्लेख किया गया है। बीच-बीच में अध्यात्म-विवेचन, कलिकर्म और सदाचार आदि पर भी प्रकाश डाला गया है।
ये निम्नलिखित भागों मे वर्णित है-
१. पूर्व भाग-प्रथम अंश
२. पूर्व भाग-द्वितीय अंश
३. पूर्व भाग-तीसरा अंश
४. पूर्व भाग-चतुर्थ अंश
५. पूर्व भाग-पंचम अंश
६. पूर्व भाग-छठा अंश
७. उत्तरभाग
यहाँ पर मैं सारे भागों का संछिप्त वर्णन भी नहीं करना चाहता… क्योकिं लेख के अत्याधिक लम्बे हो जाने की सम्भावना है … परन्तु लेख की विषय वस्तु के हिसाब से इसके “पूर्व भाग-द्वितीय अंश” का परिचय देना चाहूँगा …. इस भाग में ऋषि पाराशर ने पृथ्वी के द्वीपों, महाद्वीपों, समुद्रों, पर्वतों, व धरती के समस्त भूभाग का विस्तृत वर्णन किया है…
ये वर्णन विष्णु पुराण में ऋषि पाराशर जी श्री मैत्रेय ऋषि से कर रहे हैं उनके अनुसार इसका वर्णन सहस्त्र वर्षों में भी नहीं हो सकता है। यह केवल अति संक्षेप वर्णन है। हम इससे इसकी महानता तथा व्यापकता का अंदाजा लगा सकते हैं…

जो मनुष्य भक्ति और आदर के साथ विष्णु पुराण को पढते और सुनते है,वे दोनों यहां मनोवांछित भोग भोगकर विष्णुलोक में जाते है।

ऋषि पाराशर के अनुसार ये पृथ्वी सात महाद्वीपों में बंटी हुई है… (आधुनिक समय में भी ये ७ Continents में विभाजित है यानि – Asia, Africa, North America, South America, Antarctica, Europe, and Australia)
ऋषि पाराशर के अनुसार इन महाद्वीपों के नाम हैं –
१. जम्बूद्वीप
२. प्लक्षद्वीप
३. शाल्मलद्वीप
४. कुशद्वीप
५. क्रौंचद्वीप
६. शाकद्वीप
७. पुष्करद्वीप
ये सातों द्वीप चारों ओर से क्रमशः खारे पानी, नाना प्रकार के द्रव्यों और मीठे जल के समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं, और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं। जम्बुद्वीप इन सब के मध्य में स्थित है।
इनमे से जम्बुद्वीप का सबसे विस्तृत वर्णन मिलता है… इसी में हमारा भारतवर्ष स्थित है…
सभी द्वीपों के मध्य में जम्बुद्वीप स्थित है। इस द्वीप के मध्य में सुवर्णमय सुमेरु पर्वत स्थित है। इसकी ऊंचाई चौरासी हजार योजन है और नीचे कई ओर यह सोलह हजार योजन पृथ्वी के अन्दर घुसा हुआ है। इसका विस्तार, ऊपरी भाग में बत्तीस हजार योजन है, तथा नीचे तलहटी में केवल सोलह हजार योजन है। इस प्रकार यह पर्वत कमल रूपी पृथ्वी की कर्णिका के समान है।
सुमेरु के दक्षिण में हिमवान, हेमकूट तथा निषध नामक वर्ष पर्वत हैं, जो भिन्न भिन्न वर्षों का भाग करते हैं। सुमेरु के उत्तर में नील, श्वेत और शृंगी वर्षपर्वत हैं। इनमें निषध और नील एक एक लाख योजन तक फ़ैले हुए हैं। हेमकूट और श्वेत पर्वत नब्बे नब्बे हजार योजन फ़ैले हुए हैं। हिमवान और शृंगी अस्सी अस्सी हजार योजन फ़ैले हुए हैं।
मेरु पर्वत के दक्षिण में पहला वर्ष भारतवर्ष कहलाता है, दूसरा किम्पुरुषवर्ष तथा तीसरा हरिवर्ष है। इसके दक्षिण में रम्यकवर्ष, हिरण्यमयवर्ष और तीसरा उत्तरकुरुवर्ष है। उत्तरकुरुवर्ष द्वीपमण्डल की सीमा पार होने के कारण भारतवर्ष के समान धनुषाकार है।
इन सबों का विस्तार नौ हजार योजन प्रतिवर्ष है। इन सब के मध्य में इलावृतवर्ष है, जो कि सुमेरु पर्वत के चारों ओर नौ हजार योजन फ़ैला हुआ है। एवं इसके चारों ओर चार पर्वत हैं, जो कि ईश्वरीकृत कीलियां हैं, जो कि सुमेरु को धारण करती हैं,
ये सभी पर्वत इस प्रकार से हैं:-
पूर्व में मंदराचल
दक्षिण में गंधमादन
पश्चिम में विपुल
उत्तर में सुपार्श्व
ये सभी दस दस हजार योजन ऊंचे हैं। इन पर्वतों पर ध्वजाओं समान क्रमश कदम्ब, जम्बु, पीपल और वट वृक्ष हैं। इनमें जम्बु वृक्ष सबसे बड़ा होने के कारण इस द्वीप का नाम जम्बुद्वीप पड़ा है। यहाँ से जम्बु नद नामक नदी बहती है। उसका जल का पान करने से बुढ़ापा अथवा इन्द्रियक्षय नहीं होता। उसके मिनारे की मृत्तिका (मिट्टी) रस से मिल जाने के कारण सूखने पर जम्बुनद नामक सुवर्ण बनकर सिद्धपुरुषों का आभूषण बनती है।
मेरु पर्वत के पूर्व में भद्राश्ववर्ष है, और पश्चिम में केतुमालवर्ष है। इन दोनों के बीच में इलावृतवर्ष है। इस प्रकार उसके पूर्व की ओर चैत्ररथ , दक्षिण की ओर गन्धमादन, पश्चिम की ओर वैभ्राज और उत्तर की ओर नन्दन नामक वन हैं। तथा सदा देवताओं से सेवनीय अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस – ये चार सरोवर हैं।
मेरु के पूर्व में
शीताम्भ,
कुमुद,
कुररी,
माल्यवान,
वैवंक आदि पर्वत हैं।
मेरु के दक्षिण में
त्रिकूट,
शिशिर,
पतंग,
रुचक
और निषाद आदि पर्वत हैं।
मेरु के उत्तर में
शंखकूट,
ऋषभ,
हंस,
नाग
और कालंज पर्वत हैं।
समुद्र के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण में भारतवर्ष स्थित है। इसका विस्तार नौ हजार योजन है। यह स्वर्ग अपवर्ग प्राप्त कराने वाली कर्मभूमि है। इसमें सात कुलपर्वत हैं: महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान, ऋक्ष, विंध्य और पारियात्र ।
भारतवर्ष के नौ भाग हैं:
इन्द्रद्वीप,
कसेरु,
ताम्रपर्ण,
गभस्तिमान,
नागद्वीप,
सौम्य,
गन्धर्व
और वारुण, तथा यह समुद्र से घिरा हुआ द्वीप उनमें नवां है।
यह द्वीप उत्तर से दक्षिण तक सहस्र योजन है। यहाँ चारों वर्णों के लोग मध्य में रहते हैं। शतद्रू और चंद्रभागा आदि नदियां हिमालय से, वेद और स्मृति आदि पारियात्र से, नर्मदा और सुरसा आदि विंध्याचल से, तापी, पयोष्णी और निर्विन्ध्या आदि ऋक्ष्यगिरि से निकली हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, सह्य पर्वत से; कृतमाला और ताम्रपर्णी आदि मलयाचल से, त्रिसामा और आर्यकुल्या आदि महेन्द्रगिरि से तथा ऋषिकुल्या एवंकुमारी आदि नदियां शुक्तिमान पर्वत से निकलीं हैं। इनकी और सहस्रों शाखाएं और उपनदियां हैं।

इन नदियों के तटों पर कुरु, पांचाल, मध्याअदि देशों के; पूर्व देश और कामरूप के; पुण्ड्र, कलिंग, मगध और दक्षिणात्य लोग, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर एवं अर्बुदगण, कारूष, मालव और पारियात्र निवासी; सौवीर, सन्धव, हूण; शाल्व, कोशल देश के निवासी तथा मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण रहते हैं। भारतवर्ष में ही चारों युग हैं, अन्यत्र कहीं नहीं। इस जम्बूद्वीप को बाहर से लाख योजन वाले खारे पानी के वलयाकार समुद्र ने चारों ओर से घेरा हुआ है। जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन है।

प्लक्षद्वीप का वर्णन –
प्लक्षद्वीप का विस्तार जम्बूद्वीप से दुगुना है। यहां बीच में एक विशाल प्लक्ष वृक्ष लगा हुआ है। यहां के स्वामि मेधातिथि के सात पुत्र हुए हैं। ये थे:
शान्तहय,
शिशिर,
सुखोदय,
आनंद,
शिव,
क्षेमक,
ध्रुव ।
यहां इस द्वीप के भी भारतवर्ष की भांति ही सात पुत्रों में सात भाग बांटे गये, जो उन्हीं के नामों पर रखे गये थे: शान्तहयवर्ष, इत्यादि।
इनकी मर्यादा निश्चित करने वाले सात पर्वत हैं:
गोमेद,
चंद्र,
नारद,
दुन्दुभि,
सोमक,
सुमना
और वैभ्राज।
इन वर्षों की सात ही समुद्रगामिनी नदियां हैं अनुतप्ता, शिखि, विपाशा, त्रिदिवा, अक्लमा, अमृता और सुकृता। इनके अलावा सहस्रों छोटे छोटे पर्वत और नदियां हैं। इन लोगों में ना तो वृद्धि ना ही ह्रास होता है। सदा त्रेतायुग समान रहता है। यहां चार जातियां आर्यक, कुरुर, विदिश्य और भावी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। यहीं जम्बू वृक्ष के परिमाण वाला एक प्लक्ष (पाकड़) वृक्ष है। इसी के ऊपर इस द्वीप का नाम पड़ा है।

प्लक्षद्वीप अपने ही परिमाण वाले इक्षुरस के सागर से घिरा हुआ है।

शाल्मल द्वीप का वर्णन
इस द्वीप के स्वामि वीरवर वपुष्मान थे। इनके सात पुत्रों :
श्वेत,
हरित,
जीमूत,
रोहित,
वैद्युत,
मानस
और सुप्रभ के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। इक्षुरस सागर अपने से दूने विस्तार वाले शाल्मल द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
इसमें महाद्वीप में
कुमुद,
उन्नत,
बलाहक,
द्रोणाचल,
कंक,
महिष,
ककुद्मान नामक सात पर्वत हैं।
इस महाद्वीप में –
योनि,
तोया,
वितृष्णा,
चंद्रा,
विमुक्ता,
विमोचनी
एवं निवृत्ति नामक सात नदियां हैं।
यहाँ –
श्वेत,
हरित,
जीमूत,
रोहित,
वैद्युत,
मानस
और सुप्रभ नामक सात वर्ष हैं।
यहां –
कपिल,
अरुण,
पीत
और कृष्ण नामक चार वर्ण हैं।

यहां शाल्मल (सेमल) का अति विशाल वृक्ष है। यह महाद्वीप अपने से दुगुने विस्तार वाले सुरासमुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

कुश द्वीप का वर्णन
इस द्वीप के स्वामि वीरवर ज्योतिष्मान थे।
इनके सात पुत्रों :
उद्भिद,
वेणुमान,
वैरथ,
लम्बन,
धृति,
प्रभाकर,
कपिल
इनके नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। मदिरा सागर अपने से दूने विस्तार वाले कुश द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
पर्वत –
विद्रुम,
हेमशौल,
द्युतिमान,
पुष्पवान,
कुशेशय,
हरि
और मन्दराचल नामक सात पर्वत हैं।
नदियां –
धूतपापा,
शिवा,
पवित्रा,
सम्मति,
विद्युत,
अम्भा
और मही नामक सात नदियां हैं।
सात वर्ष –
उद्भिद,
वेणुमान,
वैरथ,
लम्बन,
धृति,
प्रभाकर,
कपिल नामक सात वर्ष हैं।
वर्ण –
दमी,
शुष्मी,
स्नेह
और मन्देह नामक चार वर्ण हैं।

यहां कुश का अति विशाल वृक्ष है। यह महाद्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

क्रौंच द्वीप का वर्णन –
इस द्वीप के स्वामि वीरवर द्युतिमान थे।
इनके सात पुत्रों :
कुशल,
मन्दग,
उष्ण,
पीवर,
अन्धकारक,
मुनि
और दुन्दुभि के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
पर्वत –
क्रौंच,
वामन,
अन्धकारक,
घोड़ी के मुख समान रत्नमय स्वाहिनी पर्वत,
दिवावृत,
पुण्डरीकवान,
महापर्वत
दुन्दुभि नामक सात पर्वत हैं।
नदियां –
गौरी,
कुमुद्वती,
सन्ध्या,
रात्रि,
मनिजवा,
क्षांति
और पुण्डरीका नामक सात नदियां हैं।
सात वर्ष –
कुशल,
मन्दग,
उष्ण,
पीवर,
अन्धकारक,
मुनि और
दुन्दुभि ।
वर्ण –
पुष्कर,
पुष्कल,
धन्य
और तिष्य नामक चार वर्ण हैं।

यह द्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले शाक द्वीप से घिरा है।

शाकद्वीप का वर्णन –
इस द्वीप के स्वामि भव्य वीरवर थे।
इनके सात पुत्रों :
जलद,
कुमार,
सुकुमार,
मरीचक,
कुसुमोद,
मौदाकि
और महाद्रुम के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं।
यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
पर्वत –
उदयाचल,
जलाधार,
रैवतक,
श्याम,
अस्ताचल,
आम्बिकेय
और अतिसुरम्य गिरिराज केसरी नामक सात पर्वत हैं।
नदियां –
सुमुमरी,
कुमारी,
नलिनी,
धेनुका,
इक्षु,
वेणुका
और गभस्ती नामक सात नदियां हैं।
सात वर्ष –
जलद,
कुमार,
सुकुमार,
मरीचक,
कुसुमोद,
मौदाकि
और महाद्रुम ।
वर्ण –
वंग,
मागध,
मानस
और मंगद नामक चार वर्ण हैं।

यहां अति महान शाक वृक्ष है, जिसके वायु के स्पर्श करने से हृदय में परम आह्लाद उत्पन्न होता है। यह द्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले पुष्कर द्वीप से घिरा है।

पुष्करद्वीप का वर्णन –
इस द्वीप के स्वामि सवन थे।
इनके दो पुत्र थे:
महावीर
और धातकि।
यहां एक ही पर्वत और दो ही वर्ष हैं।
पर्वत –
मानसोत्तर नामक एक ही वर्ष पर्वत है। यह वर्ष के मध्य में स्थित है । यह पचास हजार योजन ऊंचा और इतना ही सब ओर से गोलाकार फ़ैला हुआ है। इससे दोनों वर्ष विभक्त होते हैं, और वलयाकार ही रहते हैं।
नदियां –
यहां कोई नदियां या छोटे पर्वत नहीं हैं।
वर्ष –
महवीर खण्ड
और धातकि खण्ड।
महावीरखण्ड वर्ष पर्वत के बाहर की ओर है, और बीच में धातकिवर्ष है ।
वर्ण –
वंग,
मागध,
मानस
और मंगद नामक चार वर्ण हैं।

यहां अति महान न्यग्रोध (वट) वृक्ष है, जो ब्रह्मा जी का निवासस्थान है यह द्वीप अपने ही बराबर के मीठे पानी से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

समुद्रो का वर्णन –
यह सभी सागर सदा समान जल राशि से भरे रहते हैं, इनमें कभी कम या अधिक नही होता। हां चंद्रमा की कलाओं के साथ साथ जल बढ़्ता या घटता है। (ज्वार-भाटा) यह जल वृद्धि और क्षय 510 अंगुल तक देखे गये हैं।

पुष्कर द्वीप को घेरे मीठे जल के सागर के पार उससे दूनी सुवर्णमयी भूमि दिल्खायी देती है। वहां दस सहस्र योजन वाले लोक-आलोक पर्वत हैं। यह पर्वत ऊंचाई में भी उतने ही सहस्र योजन है। उसके आगे पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए घोर अन्धकार छाया हुआ है। यह अन्धकार चारों ओर से ब्रह्माण्ड कटाह से आवृत्त है। (अन्तरिक्ष) अण्ड-कटाह सहित सभी द्वीपों को मिलाकर समस्त भू-मण्डल का परिमाण पचास करोड़ योजन है। (सम्पूर्ण व्यास)

आधुनिक नामों की दृष्टी से विष्णु पुराण का सन्दर्भ देंखे तो… हमें कई समानताएं सिर्फ विश्व का नक्शा देखने भर से मिल जायेंगी…
१. विष्णु पुराण में पारसीक – ईरान को कहा गया है,
२. गांधार वर्तमान अफगानिस्तान था,
३. महामेरु की सीमा चीन तथा रशिया को घेरे है.
४. निषध को आज अलास्का कहा जाता है.
५. प्लाक्ष्द्वीप को आज यूरोप के नाम से जाना जाता है.
६. हरिवर्ष की सीमा आज के जापान को घेरे थी.
७. उत्तरा कुरव की स्तिथि को देंखे तो ये फ़िनलैंड प्रतीत होता है.

इसी प्रकार विष्णु पुराण को पढ़कर विश्व का एक सनातनी मानचित्र तैयार किया जा सकता है… ये थी हमारे ऋषियों की महानता

अब एक महत्त्वपूर्ण बात –
महाभारत में पृथ्वी का पूरा मानचित्र हजारों वर्ष पूर्व ही दे दिया गया था।
महाभारत में कहा गया है कि – यह पृथ्वी चन्द्रमंडल में देखने पर दो अंशों मे खरगोश तथा अन्य दो अंशों में पिप्पल (पत्तों) के रुप में दिखायी देती है-
उक्त मानचित्र ११वीं शताब्दी में रामानुजचार्य द्वारा महाभारत के निम्नलिखित श्लोक को पढ्ने के बाद बनाया गया था-
“सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन।
परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥
यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः।
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।
“अर्थात हे कुरुनन्दन ! सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भाँति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखायी देता है। इसके दो अंशो मे पिप्पल और दो अंशो मे महान शश(खरगोश) दिखायी देता है।”
अब यदि उपरोक्त संरचना को कागज पर बनाकर व्यवस्थित करे तो हमारी पृथ्वी का मानचित्र बन जाता है, जो हमारी पृथ्वी के वास्तविक मानचित्र से शत प्रतिशत समानता दिखाता है।है……………बस हो गया भूगोल

जबकि विश्व की पहली भूगोल पुस्तक – श्री विष्णु पुराण है….
विष्णु पुराण के रचयिता है… महान ऋषि पाराशर…
ऋषि पाराशर महर्षि वसिष्ठ के पौत्र, गोत्रप्रवर्तक, वैदिक सूक्तों के द्रष्टा एवं ग्रंथकार थे… राक्षस द्वारा मारे गए वसिष्ठ के पुत्र शक्ति से इनका जन्म हुआ। बड़े होने पर माता अदृश्यंती से पिता की मृत्यु की बात ज्ञात होने पर राक्षसों के नाश के निमित्त इन्होंने राक्षस सत्र नामक यज्ञ शुरू किया जिसमें अनेक निरपराध राक्षस मारे जाने लगे। यह देखकर पुलस्त्य आदि ऋषियों ने उपदेश देकर इनकी राक्षसों के विनाश से निवृत्त किया और पुराण प्रवक्ता होने का वर दिया। इसके पश्चात् इन्होने विष्णु पुराण की रचना की…
यह पुराण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा प्राचीन है। इस पुराण में आकाश आदि भूतों का परिमाण, समुद्र, सूर्य आदि का परिमाण, पर्वत, देवतादि की उत्पत्ति, मन्वन्तर, कल्प-विभाग, सम्पूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियों के चरित्र का विशद वर्णन है। अष्टादश महापुराणों में श्रीविष्णुपुराण का स्थान बहुत ऊँचा है। इसमें अन्य विषयों के साथ भूगोल, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, राजवंश और श्रीकृष्ण-चरित्र आदि कई प्रंसगों का बड़ा ही अनूठा और विशद वर्णन किया गया है।
यहाँ स्वयं भगवान् कृष्ण महादेवजी के साथ अपनी अभिन्नता प्रकट करते हुए श्रीमुखसे कहते हैं-
“त्वया यदभयं दत्तं तद्दत्तमखिलं मया।
मत्तोऽविभिन्नमात्मानं द्रुष्टुमर्हसि शङ्कर।
योऽहं स त्वं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम्।
मत्तो नान्यदशेषं यत्तत्त्वं ज्ञातुमिहार्हसि।
अविद्यामोहितात्मानः पुरुषा भिन्नदर्शिनः।
वन्दति भेदं पश्यन्ति चावयोरन्तरं हर॥”
इस पुराण में इस समय सात हजार श्लोक उपलब्ध हैं। कई ग्रन्थों में इसकी श्लोक संख्या तेईस हजार बताई जाती है। विष्णु पुराण में पुराणों के पांचों लक्षणों अथवा वर्ण्य-विषयों-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित का वर्णन है। सभी विषयों का सानुपातिक उल्लेख किया गया है। बीच-बीच में अध्यात्म-विवेचन, कलिकर्म और सदाचार आदि पर भी प्रकाश डाला गया है।
ये निम्नलिखित भागों मे वर्णित है-
१. पूर्व भाग-प्रथम अंश
२. पूर्व भाग-द्वितीय अंश
३. पूर्व भाग-तीसरा अंश
४. पूर्व भाग-चतुर्थ अंश
५. पूर्व भाग-पंचम अंश
६. पूर्व भाग-छठा अंश
७. उत्तरभाग
यहाँ पर मैं सारे भागों का संछिप्त वर्णन भी नहीं करना चाहता… क्योकिं लेख के अत्याधिक लम्बे हो जाने की सम्भावना है … परन्तु लेख की विषय वस्तु के हिसाब से इसके “पूर्व भाग-द्वितीय अंश” का परिचय देना चाहूँगा …. इस भाग में ऋषि पाराशर ने पृथ्वी के द्वीपों, महाद्वीपों, समुद्रों, पर्वतों, व धरती के समस्त भूभाग का विस्तृत वर्णन किया है…
ये वर्णन विष्णु पुराण में ऋषि पाराशर जी श्री मैत्रेय ऋषि से कर रहे हैं उनके अनुसार इसका वर्णन सहस्त्र वर्षों में भी नहीं हो सकता है। यह केवल अति संक्षेप वर्णन है। हम इससे इसकी महानता तथा व्यापकता का अंदाजा लगा सकते हैं…

जो मनुष्य भक्ति और आदर के साथ विष्णु पुराण को पढते और सुनते है,वे दोनों यहां मनोवांछित भोग भोगकर विष्णुलोक में जाते है।

ऋषि पाराशर के अनुसार ये पृथ्वी सात महाद्वीपों में बंटी हुई है… (आधुनिक समय में भी ये ७ Continents में विभाजित है यानि – Asia, Africa, North America, South America, Antarctica, Europe, and Australia)
ऋषि पाराशर के अनुसार इन महाद्वीपों के नाम हैं –
१. जम्बूद्वीप
२. प्लक्षद्वीप
३. शाल्मलद्वीप
४. कुशद्वीप
५. क्रौंचद्वीप
६. शाकद्वीप
७. पुष्करद्वीप
ये सातों द्वीप चारों ओर से क्रमशः खारे पानी, नाना प्रकार के द्रव्यों और मीठे जल के समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं, और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं। जम्बुद्वीप इन सब के मध्य में स्थित है।
इनमे से जम्बुद्वीप का सबसे विस्तृत वर्णन मिलता है… इसी में हमारा भारतवर्ष स्थित है…
सभी द्वीपों के मध्य में जम्बुद्वीप स्थित है। इस द्वीप के मध्य में सुवर्णमय सुमेरु पर्वत स्थित है। इसकी ऊंचाई चौरासी हजार योजन है और नीचे कई ओर यह सोलह हजार योजन पृथ्वी के अन्दर घुसा हुआ है। इसका विस्तार, ऊपरी भाग में बत्तीस हजार योजन है, तथा नीचे तलहटी में केवल सोलह हजार योजन है। इस प्रकार यह पर्वत कमल रूपी पृथ्वी की कर्णिका के समान है।
सुमेरु के दक्षिण में हिमवान, हेमकूट तथा निषध नामक वर्ष पर्वत हैं, जो भिन्न भिन्न वर्षों का भाग करते हैं। सुमेरु के उत्तर में नील, श्वेत और शृंगी वर्षपर्वत हैं। इनमें निषध और नील एक एक लाख योजन तक फ़ैले हुए हैं। हेमकूट और श्वेत पर्वत नब्बे नब्बे हजार योजन फ़ैले हुए हैं। हिमवान और शृंगी अस्सी अस्सी हजार योजन फ़ैले हुए हैं।
मेरु पर्वत के दक्षिण में पहला वर्ष भारतवर्ष कहलाता है, दूसरा किम्पुरुषवर्ष तथा तीसरा हरिवर्ष है। इसके दक्षिण में रम्यकवर्ष, हिरण्यमयवर्ष और तीसरा उत्तरकुरुवर्ष है। उत्तरकुरुवर्ष द्वीपमण्डल की सीमा पार होने के कारण भारतवर्ष के समान धनुषाकार है।
इन सबों का विस्तार नौ हजार योजन प्रतिवर्ष है। इन सब के मध्य में इलावृतवर्ष है, जो कि सुमेरु पर्वत के चारों ओर नौ हजार योजन फ़ैला हुआ है। एवं इसके चारों ओर चार पर्वत हैं, जो कि ईश्वरीकृत कीलियां हैं, जो कि सुमेरु को धारण करती हैं,
ये सभी पर्वत इस प्रकार से हैं:-
पूर्व में मंदराचल
दक्षिण में गंधमादन
पश्चिम में विपुल
उत्तर में सुपार्श्व
ये सभी दस दस हजार योजन ऊंचे हैं। इन पर्वतों पर ध्वजाओं समान क्रमश कदम्ब, जम्बु, पीपल और वट वृक्ष हैं। इनमें जम्बु वृक्ष सबसे बड़ा होने के कारण इस द्वीप का नाम जम्बुद्वीप पड़ा है। यहाँ से जम्बु नद नामक नदी बहती है। उसका जल का पान करने से बुढ़ापा अथवा इन्द्रियक्षय नहीं होता। उसके मिनारे की मृत्तिका (मिट्टी) रस से मिल जाने के कारण सूखने पर जम्बुनद नामक सुवर्ण बनकर सिद्धपुरुषों का आभूषण बनती है।
मेरु पर्वत के पूर्व में भद्राश्ववर्ष है, और पश्चिम में केतुमालवर्ष है। इन दोनों के बीच में इलावृतवर्ष है। इस प्रकार उसके पूर्व की ओर चैत्ररथ , दक्षिण की ओर गन्धमादन, पश्चिम की ओर वैभ्राज और उत्तर की ओर नन्दन नामक वन हैं। तथा सदा देवताओं से सेवनीय अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस – ये चार सरोवर हैं।
मेरु के पूर्व में
शीताम्भ,
कुमुद,
कुररी,
माल्यवान,
वैवंक आदि पर्वत हैं।
मेरु के दक्षिण में
त्रिकूट,
शिशिर,
पतंग,
रुचक
और निषाद आदि पर्वत हैं।
मेरु के उत्तर में
शंखकूट,
ऋषभ,
हंस,
नाग
और कालंज पर्वत हैं।
समुद्र के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण में भारतवर्ष स्थित है। इसका विस्तार नौ हजार योजन है। यह स्वर्ग अपवर्ग प्राप्त कराने वाली कर्मभूमि है। इसमें सात कुलपर्वत हैं: महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान, ऋक्ष, विंध्य और पारियात्र ।
भारतवर्ष के नौ भाग हैं:
इन्द्रद्वीप,
कसेरु,
ताम्रपर्ण,
गभस्तिमान,
नागद्वीप,
सौम्य,
गन्धर्व
और वारुण, तथा यह समुद्र से घिरा हुआ द्वीप उनमें नवां है।
यह द्वीप उत्तर से दक्षिण तक सहस्र योजन है। यहाँ चारों वर्णों के लोग मध्य में रहते हैं। शतद्रू और चंद्रभागा आदि नदियां हिमालय से, वेद और स्मृति आदि पारियात्र से, नर्मदा और सुरसा आदि विंध्याचल से, तापी, पयोष्णी और निर्विन्ध्या आदि ऋक्ष्यगिरि से निकली हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, सह्य पर्वत से; कृतमाला और ताम्रपर्णी आदि मलयाचल से, त्रिसामा और आर्यकुल्या आदि महेन्द्रगिरि से तथा ऋषिकुल्या एवंकुमारी आदि नदियां शुक्तिमान पर्वत से निकलीं हैं। इनकी और सहस्रों शाखाएं और उपनदियां हैं।

इन नदियों के तटों पर कुरु, पांचाल, मध्याअदि देशों के; पूर्व देश और कामरूप के; पुण्ड्र, कलिंग, मगध और दक्षिणात्य लोग, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर एवं अर्बुदगण, कारूष, मालव और पारियात्र निवासी; सौवीर, सन्धव, हूण; शाल्व, कोशल देश के निवासी तथा मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण रहते हैं। भारतवर्ष में ही चारों युग हैं, अन्यत्र कहीं नहीं। इस जम्बूद्वीप को बाहर से लाख योजन वाले खारे पानी के वलयाकार समुद्र ने चारों ओर से घेरा हुआ है। जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन है।

प्लक्षद्वीप का वर्णन –
प्लक्षद्वीप का विस्तार जम्बूद्वीप से दुगुना है। यहां बीच में एक विशाल प्लक्ष वृक्ष लगा हुआ है। यहां के स्वामि मेधातिथि के सात पुत्र हुए हैं। ये थे:
शान्तहय,
शिशिर,
सुखोदय,
आनंद,
शिव,
क्षेमक,
ध्रुव ।
यहां इस द्वीप के भी भारतवर्ष की भांति ही सात पुत्रों में सात भाग बांटे गये, जो उन्हीं के नामों पर रखे गये थे: शान्तहयवर्ष, इत्यादि।
इनकी मर्यादा निश्चित करने वाले सात पर्वत हैं:
गोमेद,
चंद्र,
नारद,
दुन्दुभि,
सोमक,
सुमना
और वैभ्राज।
इन वर्षों की सात ही समुद्रगामिनी नदियां हैं अनुतप्ता, शिखि, विपाशा, त्रिदिवा, अक्लमा, अमृता और सुकृता। इनके अलावा सहस्रों छोटे छोटे पर्वत और नदियां हैं। इन लोगों में ना तो वृद्धि ना ही ह्रास होता है। सदा त्रेतायुग समान रहता है। यहां चार जातियां आर्यक, कुरुर, विदिश्य और भावी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। यहीं जम्बू वृक्ष के परिमाण वाला एक प्लक्ष (पाकड़) वृक्ष है। इसी के ऊपर इस द्वीप का नाम पड़ा है।

प्लक्षद्वीप अपने ही परिमाण वाले इक्षुरस के सागर से घिरा हुआ है।

शाल्मल द्वीप का वर्णन
इस द्वीप के स्वामि वीरवर वपुष्मान थे। इनके सात पुत्रों :
श्वेत,
हरित,
जीमूत,
रोहित,
वैद्युत,
मानस
और सुप्रभ के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। इक्षुरस सागर अपने से दूने विस्तार वाले शाल्मल द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
इसमें महाद्वीप में
कुमुद,
उन्नत,
बलाहक,
द्रोणाचल,
कंक,
महिष,
ककुद्मान नामक सात पर्वत हैं।
इस महाद्वीप में –
योनि,
तोया,
वितृष्णा,
चंद्रा,
विमुक्ता,
विमोचनी
एवं निवृत्ति नामक सात नदियां हैं।
यहाँ –
श्वेत,
हरित,
जीमूत,
रोहित,
वैद्युत,
मानस
और सुप्रभ नामक सात वर्ष हैं।
यहां –
कपिल,
अरुण,
पीत
और कृष्ण नामक चार वर्ण हैं।

यहां शाल्मल (सेमल) का अति विशाल वृक्ष है। यह महाद्वीप अपने से दुगुने विस्तार वाले सुरासमुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

कुश द्वीप का वर्णन
इस द्वीप के स्वामि वीरवर ज्योतिष्मान थे।
इनके सात पुत्रों :
उद्भिद,
वेणुमान,
वैरथ,
लम्बन,
धृति,
प्रभाकर,
कपिल
इनके नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। मदिरा सागर अपने से दूने विस्तार वाले कुश द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
पर्वत –
विद्रुम,
हेमशौल,
द्युतिमान,
पुष्पवान,
कुशेशय,
हरि
और मन्दराचल नामक सात पर्वत हैं।
नदियां –
धूतपापा,
शिवा,
पवित्रा,
सम्मति,
विद्युत,
अम्भा
और मही नामक सात नदियां हैं।
सात वर्ष –
उद्भिद,
वेणुमान,
वैरथ,
लम्बन,
धृति,
प्रभाकर,
कपिल नामक सात वर्ष हैं।
वर्ण –
दमी,
शुष्मी,
स्नेह
और मन्देह नामक चार वर्ण हैं।

यहां कुश का अति विशाल वृक्ष है। यह महाद्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

क्रौंच द्वीप का वर्णन –
इस द्वीप के स्वामि वीरवर द्युतिमान थे।
इनके सात पुत्रों :
कुशल,
मन्दग,
उष्ण,
पीवर,
अन्धकारक,
मुनि
और दुन्दुभि के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
पर्वत –
क्रौंच,
वामन,
अन्धकारक,
घोड़ी के मुख समान रत्नमय स्वाहिनी पर्वत,
दिवावृत,
पुण्डरीकवान,
महापर्वत
दुन्दुभि नामक सात पर्वत हैं।
नदियां –
गौरी,
कुमुद्वती,
सन्ध्या,
रात्रि,
मनिजवा,
क्षांति
और पुण्डरीका नामक सात नदियां हैं।
सात वर्ष –
कुशल,
मन्दग,
उष्ण,
पीवर,
अन्धकारक,
मुनि और
दुन्दुभि ।
वर्ण –
पुष्कर,
पुष्कल,
धन्य
और तिष्य नामक चार वर्ण हैं।

यह द्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले शाक द्वीप से घिरा है।

शाकद्वीप का वर्णन –
इस द्वीप के स्वामि भव्य वीरवर थे।
इनके सात पुत्रों :
जलद,
कुमार,
सुकुमार,
मरीचक,
कुसुमोद,
मौदाकि
और महाद्रुम के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं।
यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
पर्वत –
उदयाचल,
जलाधार,
रैवतक,
श्याम,
अस्ताचल,
आम्बिकेय
और अतिसुरम्य गिरिराज केसरी नामक सात पर्वत हैं।
नदियां –
सुमुमरी,
कुमारी,
नलिनी,
धेनुका,
इक्षु,
वेणुका
और गभस्ती नामक सात नदियां हैं।
सात वर्ष –
जलद,
कुमार,
सुकुमार,
मरीचक,
कुसुमोद,
मौदाकि
और महाद्रुम ।
वर्ण –
वंग,
मागध,
मानस
और मंगद नामक चार वर्ण हैं।

यहां अति महान शाक वृक्ष है, जिसके वायु के स्पर्श करने से हृदय में परम आह्लाद उत्पन्न होता है। यह द्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले पुष्कर द्वीप से घिरा है।

पुष्करद्वीप का वर्णन –
इस द्वीप के स्वामि सवन थे।
इनके दो पुत्र थे:
महावीर
और धातकि।
यहां एक ही पर्वत और दो ही वर्ष हैं।
पर्वत –
मानसोत्तर नामक एक ही वर्ष पर्वत है। यह वर्ष के मध्य में स्थित है । यह पचास हजार योजन ऊंचा और इतना ही सब ओर से गोलाकार फ़ैला हुआ है। इससे दोनों वर्ष विभक्त होते हैं, और वलयाकार ही रहते हैं।
नदियां –
यहां कोई नदियां या छोटे पर्वत नहीं हैं।
वर्ष –
महवीर खण्ड
और धातकि खण्ड।
महावीरखण्ड वर्ष पर्वत के बाहर की ओर है, और बीच में धातकिवर्ष है ।
वर्ण –
वंग,
मागध,
मानस
और मंगद नामक चार वर्ण हैं।

यहां अति महान न्यग्रोध (वट) वृक्ष है, जो ब्रह्मा जी का निवासस्थान है यह द्वीप अपने ही बराबर के मीठे पानी से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

समुद्रो का वर्णन –
यह सभी सागर सदा समान जल राशि से भरे रहते हैं, इनमें कभी कम या अधिक नही होता। हां चंद्रमा की कलाओं के साथ साथ जल बढ़्ता या घटता है। (ज्वार-भाटा) यह जल वृद्धि और क्षय 510 अंगुल तक देखे गये हैं।

पुष्कर द्वीप को घेरे मीठे जल के सागर के पार उससे दूनी सुवर्णमयी भूमि दिल्खायी देती है। वहां दस सहस्र योजन वाले लोक-आलोक पर्वत हैं। यह पर्वत ऊंचाई में भी उतने ही सहस्र योजन है। उसके आगे पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए घोर अन्धकार छाया हुआ है। यह अन्धकार चारों ओर से ब्रह्माण्ड कटाह से आवृत्त है। (अन्तरिक्ष) अण्ड-कटाह सहित सभी द्वीपों को मिलाकर समस्त भू-मण्डल का परिमाण पचास करोड़ योजन है। (सम्पूर्ण व्यास)

आधुनिक नामों की दृष्टी से विष्णु पुराण का सन्दर्भ देंखे तो… हमें कई समानताएं सिर्फ विश्व का नक्शा देखने भर से मिल जायेंगी…
१. विष्णु पुराण में पारसीक – ईरान को कहा गया है,
२. गांधार वर्तमान अफगानिस्तान था,
३. महामेरु की सीमा चीन तथा रशिया को घेरे है.
४. निषध को आज अलास्का कहा जाता है.
५. प्लाक्ष्द्वीप को आज यूरोप के नाम से जाना जाता है.
६. हरिवर्ष की सीमा आज के जापान को घेरे थी.
७. उत्तरा कुरव की स्तिथि को देंखे तो ये फ़िनलैंड प्रतीत होता है.

इसी प्रकार विष्णु पुराण को पढ़कर विश्व का एक सनातनी मानचित्र तैयार किया जा सकता है… ये थी हमारे ऋषियों की महानता

अब एक महत्त्वपूर्ण बात –
महाभारत में पृथ्वी का पूरा मानचित्र हजारों वर्ष पूर्व ही दे दिया गया था।
महाभारत में कहा गया है कि – यह पृथ्वी चन्द्रमंडल में देखने पर दो अंशों मे खरगोश तथा अन्य दो अंशों में पिप्पल (पत्तों) के रुप में दिखायी देती है-
उक्त मानचित्र ११वीं शताब्दी में रामानुजचार्य द्वारा महाभारत के निम्नलिखित श्लोक को पढ्ने के बाद बनाया गया था-
“सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन।
परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥
यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः।
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।
“अर्थात हे कुरुनन्दन ! सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भाँति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखायी देता है। इसके दो अंशो मे पिप्पल और दो अंशो मे महान शश(खरगोश) दिखायी देता है।”
अब यदि उपरोक्त संरचना को कागज पर बनाकर व्यवस्थित करे तो हमारी पृथ्वी का मानचित्र बन जाता है, जो हमारी पृथ्वी के वास्तविक मानचित्र से शत प्रतिशत समानता दिखाता है।

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जय श्री कृष्ण ।

हम लोग हवेली में या मंदिर में दर्शन करने जाते हैं,। दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पैड़ी पर या ओटले पर थोड़ी देर बैठते हैं। इस परंपरा का कारण क्या है ?
अभी तो लोग वहां बैठकर अपने घर की, व्यापार की, राजनीति की चर्चा करते हैं। परंतु यह परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई है।

वास्तव में वहां मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर के और एक श्लोक बोलना चाहिए ।यह श्लोक हम भूल गए हैं। इस श्लोक को सुने और याद करें ।और आने वाली पीढ़ी को भी इसे बता कर जाएं ।
श्लोक इस प्रकार है

अनायासेन मरणम ,बिना दैन्येन जीवनम ।
देहान्ते तव सानिध्यम ,देहिमे परमेश्वरम।।

जब हम मंदिर में दर्शन करने जाएं तो खुली आंखों से ठाकुर जी का दर्शन करें । कुछ लोग वहां नेत्र बंद करके खड़े रहते हैं ।आंखें बंद क्यों करना ।हम तो दर्शन करने आए हैं ।ठाकुर जी के स्वरूप का ,श्री चरणों, का मुखारविंद का ,श्रंगार का संपूर्ण आनंद लें । आंखों में भर लें इस स्वरूप को । दर्शन करें और दर्शन करने के बाद जब बाहर आकर बैठें तब नेत्र बंद करके ,जो दर्शन किए हैं, उस स्वरूप का ध्यान करें ।मंदिर में नैत्र नहीं बंद करना, बाहर आने के बाद पैड़ी पर बैठकर जब ठाकुर जी का ध्यान करें तब नेत्र बंद करें, और अगर ठाकुर जी का स्वरूप ध्यान में नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं ।

यह प्रार्थना है याचना नहीं है। याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है, घर ,व्यापार ,नौकरी ,पुत्र पुत्री, दुकान ,सांसारिक सुख या अन्य बातों के लिए जो मांग की जाती है, वह याचना है ।वह भीख है ।

हम प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना का विशेष अर्थ है ।
प्र अर्थात विशिष्ट, श्रेष्ठ ।अर्थना अर्थात निवेदन ।ठाकुर जी से प्रार्थना करें ,और प्रार्थना क्या करना है ,यह श्लोक बोलना है ।

श्लोक का अर्थ है

“अनायासेना मरणम” अर्थात बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो, बीमार होकर बिस्तर पर पड़े पड़े ,कष्ट उठाकर मृत्यु नहीं चाहिए ।चलते चलते ही श्री जी शरण हो जाएं।

” बिना दैन्येन जीवनम ” अर्थात परवशता का जीवन न हो। किसी के सहारे न रहना पड़े ,।जैसे लकवा हो जाता है ,और व्यक्ति पर आश्रित हो जाता है ।वैसे परवश, बेबस न हों। ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख मांगे जीवन बसर हो सके।

” देहान्ते तव सानिध्यम ” अर्थात जब मृत्यु हो तब ठाकुर जी सन्मुख खड़े हो। जब प्राण तन से निकले , आप सामने खड़े हों। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर जी उनके सम्मुख जाकर खड़े हो गए । उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले।

यह प्रार्थना करें । गाड़ी ,लाड़ी ,लड़का, लड़की पति, पत्नी ,घर ,धन यह मांगना नहीं ।यह तो ठाकुर जी आपकी पात्रता के हिसाब से खुद आपको दे देते हैं ।तो दर्शन करने के बाद बाहर बैठकर यह प्रार्थना अवश्य पढ़ें ।

जय श्री कृष्ण

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🙏🏽जय श्री कृष्ण

हम लोग हवेली में या मंदिर में दर्शन करने जाते हैं,। दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पैड़ी पर या चोकी पर थोड़ी देर बैठते हैं। इस परंपरा का कारण क्या है ?

अभी तो हमलोग वहां बैठकर अपने घर की, व्यापार की, राजनीति की चर्चा करते हैं। परंतु यह परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई है।

वास्तव में वहां मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर के और एक श्लोक बोलना चाहिए ।यह श्लोक हम भूल गए हैं। इस श्लोक को सुने और याद करें ।और आने वाली पीढ़ी को भी इसे बता कर जाएं।

श्लोक इस प्रकार है

अनायासेन मरणम ,बिना दैन्येन जीवनम ।
देहान्ते तव सानिध्यम ,देहिमे परमेश्वरम।।
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

जब हम मंदिर में दर्शन करने जाएं तो खुली आंखों से ठाकुर जी का दर्शन करें । कुछ लोग वहां नेत्र बंद करके खड़े रहते हैं ।आंखें बंद क्यों करना ।हम तो दर्शन करने आए हैं ।ठाकुर जी के स्वरूप का ,श्री चरणों, का मुखारविंद का ,श्रंगार का संपूर्ण आनंद लें । आंखों में भर लें इस स्वरूप को । दर्शन करें और दर्शन करने के बाद जब बाहर आकर बैठें तब नेत्र बंद करके ,जो दर्शन किए हैं,उस स्वरूप का ध्यान करें!मंदिर में नैत्र बन्द नही करना, बाहर आने के बाद पैड़ी पर बैठकर जब ठाकुर जी का ध्यान करें तब नेत्र बंद करें, और अगर ठाकुर जी का स्वरूप ध्यान में नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और दुबारा श्री ठाकुर जी
के दर्शन करे🙏🏽

हम प्रार्थना करते हैं।
प्रार्थना का विशेष अर्थ है ।
प्र अर्थात विशिष्ट, श्रेष्ठ!
अर्थना अर्थात निवेदन।
ठाकुर जी से प्रार्थना करें!
और प्रार्थना क्या करनी है|

उपरोक्त श्लोक बोलना है।

श्लोक का अर्थ है

“अनायासेना मरणम” अर्थात बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो, बीमार होकर बिस्तर पर पड़े पड़े ,कष्ट उठाकर मृत्यु नहीं चाहिए ।चलते चलते ही श्री जी शरण हो जाएं।

” बिना दैन्येन जीवनम “ अर्थात परवशता का जीवन न हो। किसी के सहारे न रहना पड़े ,।जैसे लकवा हो जाता है ,और दूसरे व्यक्ति पर आश्रित हो जाता है ।वैसे परवश, बेबस न हों। ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख मांगे जीवन बसर हो सके।

” देहान्ते तव सानिध्यम “ अर्थात जब मृत्यु हो तब ठाकुर जी सन्मुख खड़े हो। जब प्राण तन से निकले , आप सामने खड़े हों। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर जी उनके सम्मुख जाकर खड़े हो गए । उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले।

यह प्रार्थना करें । गाड़ी ,लाड़ी ,लड़का, लड़की पति, पत्नी ,घर ,धन यह मांगना नहीं ।यह तो ठाकुर जी आपकी पात्रता के हिसाब से खुद आपको दे देते हैं ।
तो दर्शन करने के बाद बाहर बैठकर यह प्रार्थना अवश्य पढ़ें ।

🙏🏽जय श्री कृष्ण

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व्रत का सही अर्थ

व्रत का अर्थ यजुर्वेद में बहुत स्पष्ट रुप में बताया गया है। देखिए―

अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्।
इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि।।
―(यजु० 1/5)
भावार्थ―हे ज्ञानस्वरुप प्रभो! आप व्रतों के पालक और रक्षक हैं। मैं भी व्रत का अनुष्ठान करुँगा। मुझे ऐसी शक्ति और सामर्थ्य प्रदान कीजिए कि मैं अपने व्रत का पालन कर सकूँ। मेरा व्रत यह है कि मैं असत्य-भाषण को छोड़कर सत्य को जीवन में धारण करता हूँ।

इस मन्त्र के अनुसार व्रत का अर्थ हुआ किसी एक दुर्गुण, बुराई को छोड़कर किसी उत्तम गुण को जीवन में धारण करना।

उपवास का भी ऐसा ही अर्थ है―
उप समीपे यो वासो जीवात्मपरमात्मयोः।
उपवासः स विज्ञेयो न तु कायस्य शोषणम्।।
―(वराहोपनिषद् 2/39)
भावार्थ―जीवात्मा का परमात्मा के समीप होना, परमात्मा की उपासना करना, परमात्मा के गुणों को जीवन में धारण करना, इसी का नाम उपवास है। शरीर को सुखाने का नाम उपवास नहीं है।

प्राचीन साहित्य में विद्वानों, सन्तों और ऋषि-महर्षियों ने भूखे–मरनेरुपी व्रत का खण्डन किया है। प्राचीन ग्रन्थों में न तो ‘सन्तोषी’ के व्रत का वर्णन है और न एकादशी आदि व्रतों का विधान है।

महर्षि मनु ने लिखा है―
पत्यौ जीवति या तु स्त्री उपवासव्रतं चरेत्।
आयुष्यं हरते भर्तुर्नरकं चैव गच्छति।।
भावार्थ―जो स्त्री पति के जीवित रहते हुए भूखे-मरनारुप व्रत या उपवास करती है, वह पति की आयु को कम करती है और मरने पर स्वयं नरक को जाती है।
[मनुस्मृति में से अनेक श्लोकों को निकाला गया है। अनेक श्लोक पीछे से मिलाये गये हैं। यह श्लोक पाँचवें अध्याय में १५५ श्लोक के पश्चात् था। अब भी अनेक संस्करणों में यह श्लोक है। कुछ संस्करणों में से निकाल दिया गया है।]

इस प्रकार भूखा-मरनेवाले व्रत का भी सन्तों, ऋषि-मुनियों ने खण्डन किया है, आयुर्वेद की दृष्टि से भी आज जिस रुप में इन व्रतों को किया जाता है, उस रुप में ये व्रत शरीर को हानि पहुँचाते हैं। क्योंकि आजकल के व्रत ऐसे हैं कि दिन भर अन्न को छोड़कर कुछ न कुछ खाते रहो। इस प्रकार आयुर्वेद की दृष्टि से जो उपवास का लाभ पूरे दिन निराहार रहकर या अल्पाहार करके मिलना चाहिये था, वह नहीं मिल पाता (साप्ताहिक या पाक्षिक उपवास)।
व्रत के बहाने हर समय मुँह में कुछ-न-कुछ ठूँसते जाने का नाम व्रत नहीं है।

मैं व्रतों का खण्डन नहीं करता, आर्यसमाज भी व्रतों का खण्डन नहीं करता। आप एकादशी का व्रत लीजिए और खूब कीजिए, परन्तु एकादशी क्या है, इसे समझ लीजिए। पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय तथा एक मन―ये ग्यारह हैं। इन सबको अपने वश में रखना, आँखों से शुभ देखना, कानों से शुभ सुनना, नासिका से ओ३म् का जप करना, वाणी से मधुर बोलना, जिह्वा से शरीर को बल और शक्ति देने वाले पदार्थों का ही सेवन करना, हाथों से उत्तम कर्म करना, पाँवों से उत्तम सत्सङ्ग में जाना, जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन करना―यह है सच्चा एकादशी-व्रत। इस व्रत के करने से आपके जीवन का कल्याण हो जाएगा। शरीर को गलाने और सुखाने से तो यह लोक भी बर्बाद हो जाएगा, मुक्ति मिलना तो दूर की बात है।

सत्यनारायणव्रत का अर्थ है कि मनुष्य अपने हृदय में विद्यमान सत्यस्वरुप परमात्मा के गुणों को अपने जीवन में धारण करे। जीवन में सत्यवादी बने। मन, वचन और कर्म से सत्य का पालन करें ।

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धर्म एव हतो हन्ति
धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो
मा नो धर्मो हतोऽवधीत्।

धर्म उसका नाश करता है जो
धर्म का नाश करता है।
धर्म उसका रक्षण करता है जो
उसके रक्षणार्थ प्रयास करता है।
अतः धर्म का नाश नहीं करना
चाहिए। ध्यान रहे धर्म का नाश करने वाले का नाश,अवश्यंभावी है। मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित किया हुआ धर्म रक्षक की रक्षा करता है इसलिए धर्म का हनन कभी न करना,इस डर से कि मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले। जो पुरूष धर्म का नाश करता है, उसी का नाश धर्म कर देता है, और जो धर्म की रक्षा करता है,उसकी धर्म भी रक्षा करता है। इसलिए मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले,इस भय से धर्म का हनन अर्थात् त्याग कभी नही करना चाहिए।
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स्वयम्भू मनु ने धर्म के दस
लक्षण बताये हैं:

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं
शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो
दशकं धर्म लक्षणम्॥

धृति (धैर्य),क्षमा(दूसरों के द्वारा
किये गये अपराध को क्षमा कर
देना,क्षमाशील होना),दम(अपनी
वासनाओं पर नियन्त्रण करना),
अस्तेय (चोरी न करना),शौच
(अन्तरङ्ग और बाह्य शुचिता),
इन्द्रिय निग्रहः(इन्द्रियों को वश
मे रखना),धी(बुद्धिमत्ता का
प्रयोग),विद्या(अधिक से अधिक
ज्ञान की पिपासा),सत्य (मन
वचन कर्म से सत्य का पालन)
और अक्रोध (क्रोध न करना);
ये दस धर्म के लक्षण हैं। जो अपने अनुकूल न हो वैसा व्यवहार दूसरे के साथ न करना चाहिये – यह धर्म की कसौटी है।
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श्रूयतां धर्म सर्वस्वं
श्रुत्वा चैव अनुवर्त्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि,
परेषां न समाचरेत्॥

धर्म का सर्वस्व क्या है,सुनो
और सुनकर उस पर चलो !
अपने को जो अच्छा न लगे,
वैसा आचरण दूसरे के साथ
नही करना चाहिये।
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धर्म एव हतो हन्ति
धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यः
मानो धर्मो हतोवाधीत् ॥

धर्म उसका नाश करता है जो
उसका(धर्म का)नाश करता है।
धर्म उसका रक्षण करता है जो
उसके रक्षणार्थ प्रयास करता है।
अतः धर्मका नाश नहीं करना
चाहिए। ध्यान रहे धर्मका नाश करने वाले का नाश,अवश्यंभावी है।
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यत्र धर्मो ह्यधर्मेण
सत्यं यत्रानृतेन च।
हन्यते प्रेक्षमाणानां
हतास्तत्र सभासदः।

जिस सभा में बैठे हुए
सभासदों के सामने अधर्म
से धर्म और झूठ से सत्य का
हनन होता है उस सभा में सब
सभासद् मरे से ही हैं।
‘‘जिस सभा में अधर्म से धर्म,
असत्य से सत्य,सब सभासदों
के देखते हुए मारा जाता है,उस
सभा में सब मृतक के समान
हैं,जानों उनमें कोई भी नहीं
जीता।’’
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धर्मो विद्धस्त्वधर्मेण
सभां यत्रोपतिष्ठते।
शल्यं चास्य न कृन्तन्ति
विद्धास्तत्र सभासदः।।

जिस सभा में अधर्म से घायल
होकर धर्म उपस्थित होता है जो
उसका शल्य अर्थात् तीरवत् धर्म
के कलंक को निकालना और
अधर्म का छेदन नहीं करते
अर्थात् धर्मों का मान,अधर्मी
को दण्ड नहीं मिलता उस सभा
में जितने सभासद् हैं वे सब
घायल के समान समझे जाते हैं।
‘‘अधर्म से धर्म घायल होकर
जिस सभा में प्राप्त होवे उसके
घाव को यदि सभासद् न पूर देवें
तो निश्चय जानो कि उस सभा में
सब सभासद् ही घायल पड़े हैं।’’
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ऋग्वेदविद्यजुर्विच्च
सामवेदविदेव च।
त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया
धर्मसंशयनिर्णये।।

ऋग्वेदवित्,यजुर्वेदवित् और
सामवेदवित् इन तीनों विद्वानों
की भी सभा धर्मसंशय अर्थात्
सब व्यवहारों के निर्णय के लिए
होनी चाहिए। ’और जिस सभा में ऋग्वेद,यजुर्वेद और सामवेद के
जानने वाले तीन सभासद
होके व्यवस्था करें,उस सभा
की,की हुई व्यवस्था का भी
कोई उल्लंघन न करे ।’
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