Posted in संस्कृत साहित्य

अनजाने में किये हुये पाप का प्रायश्चित कैसे होता है…? 👏🏻

बहुत सुन्दर प्रश्न है ,यदि हमसे अनजाने में कोई पाप हो जाए तो क्या उस पाप से मुक्ती का कोई उपाय है।

श्रीमद्भागवत जी के षष्ठम स्कन्ध में , महाराज राजा परीक्षित जी ने ,श्री शुकदेव जी से ऐसा प्रश्न कर लिए ।

बोले भगवन – आपने पञ्चम स्कन्ध में जो नरको का वर्णन किया ,उसको सुनकर तो गुरुवर रोंगटे खड़े जाते
हैं।
प्रभूवर मैं आपसे ये पूछ रहा हूँ की यदि कुछ पाप हमसे अनजाने में हो जाते हैं ,जैसे चींटी मर गयी,हम लोग स्वास लेते हैं तो कितने जीव श्वासों के माध्यम से मर जाते हैं। भोजन बनाते समय लकड़ी जलाते हैं ,उस लकड़ी में भी कितने जीव मर जाते हैं । और ऐसे कई पाप हैं जो अनजाने हो जाते हैं तो उस पाप से मुक्ती का क्या उपाय है भगवन ।

आचार्य शुकदेव जी ने कहा -राजन ऐसे पाप से मुक्ती के लिए रोज प्रतिदिन पाँच प्रकार के यज्ञ करने
चाहिए ।

महाराज परीक्षित जी ने कहा, भगवन एक यज्ञ यदि कभी करना पड़ता है तो सोंचना पड़ता है ।आप
पाँच यज्ञ रोज कह रहे हैं ।

यहां पर आचार्य शुकदेव जी हम सभी मानव के कल्याणार्थ कितनी सुन्दर बात बता रहे हैं ।

बोले राजन पहली यज्ञ है -जब घर में रोटी बने तो पहली रोटी गऊ ग्रास के लिए निकाल देना चाहिए।

दूसरी यज्ञ है राजन -चींटी को दस पाँच ग्राम आटा रोज वृक्षों की जड़ो के पास डालना चाहिए।

तीसरी यज्ञ है राजन्-पक्षियों को अन्न रोज डालना चाहिए ।

चौथी यज्ञ है राजन् -आँटे की गोली बनाकर रोज जलाशय में मछलियो को डालना चाहिए ।

पांचवीं यज्ञ है राजन्- भोजन बनाकर अग्नि भोजन, रोटी बनाकर उसके टुकड़े करके उसमे घी चीनी
मिलाकर अग्नि को भोग लगाओ।

राजन् अतिथि सत्कार खूब करें, कोई भिखारी आवे तो उसे जूठा अन्न कभी भी भिक्षा में न दे ।

राजन् ऐसा करने से अनजाने में किये हुए पाप से मुक्ती मिल जाती है। हमे उसका दोष नहीं लगता ।उन पापो का फल हमे नहीं भोगना पड़ता।

राजा ने पुनः पूछ लिया ,भगवन यदि
गृहस्त में रहकर ऐसी यज्ञ न हो पावे तो और कोई उपाय हो सकता है क्या।
तब यहां पर श्री शुकदेव जी कहते हैं
राजन्

कर्मणा कर्मनिर्हांरो न ह्यत्यन्तिक इष्यते।
अविद्वदधिकारित्वात् प्रायश्चितं विमर्शनम् ।।

नरक से मुक्ती पाने के लिए हम प्रायश्चित करें। कोई व्यक्ति तपस्या के द्वारा प्रायश्चित करता है। कोई ब्रह्मचर्य पालन करके प्रायश्चित करता है।कोई व्यक्ति यम, नियम, आसन के द्वारा प्रायश्चित करता है।लेकिन मैं तो ऐसा मानता हूँ राजन्!

केचित् केवलया भक्त्या वासुदेव
परायणः ।

राजन् केवल हरी नाम संकीर्तन से ही जाने और अनजाने में किये हुए को नष्ट करने की सामर्थ्य है ।

इस लिए हे राजन् !—– सुनिए

स्वास स्वास पर कृष्ण भजि बृथा स्वास जनि खोय।
न जाने या स्वास की आवन होय न होय। ।

राजन् किसी को पता नही की जो स्वास अंदर जा रही है वो लौट कर वापस आएगी की नही ।
इस लिए सदैव हरी का जपते रहो ।

मैं तो जी माहराज आप सबसे यह निवेदन करना चाहूंगी कि भगवान राम और कृष्ण के नाम को जपने
के लिए कोई भी नियम की जरूरत नही होती है कहीं भी कभी भी किसी भी समय सोते जागते, उठते बैठते गोविन्द का नाम रटते रहो।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

🌹🌿🌹 श्री राधे कृष्ण 🌹🌿🌹
जय श्री सीता राम

Posted in संस्कृत साहित्य

ज़िंदगी में सब से सीख मिली, चाहे वे अध्यापक रहे हों, माता-पिता, या फिर अपने घर के पालतू जानवर! हक़ीक़त में सारी प्रकृति ही गुरु रही है मेरी, तो ये कुछ दोहे उन्हीं के नाम हैं!


यह तन विष की बेल री, गुरु अमृत की खान,
शीश दिए जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान ।।

गीली मिट्टी अनगढ़ी, हमको गुरुवर जान,
ज्ञान प्रकाशित कीजिए, आप समर्थ बलवान।।

गुरु अनंत तक जानिए, गुरु की ओर न छोर,
गुरु प्रकाश का पुंज है, निशा बाद का भोर।।

गुरु अमृत है जगत में, बाकी सब विषबेल,
सतगुरु संत अनंत हैं, प्रभु से कर दें मेल।।

गुरु की कृपा हो शिष्य पर, पूरन हों सब काम,
गुरु की सेवा करत ही, मिले ब्रह्म का धाम।।

गुरु ग्रंथन का सार है, गुरु है प्रभु का नाम,
गुरु अध्यात्म की ज्योति है, गुरु हैं चारों धाम।।

गुरु बिन ज्ञान न होत है, गुरु बिन दिशा अजान,
गुरु बिन इन्द्रिय न सधें, गुरु बिन बढ़े न शान।।

गुरु मन में बैठत सदा, गुरु है भ्रम का काल,
गुरु अवगुण को मेटता, मिटें सभी भ्रमजाल।।

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु अपने गोविन्द दियो बताय।।

गुरु पारस को अन्तरो, जानत हैं सब संत।
वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महंत।।

शिष्य वही जो सीख ले, गुरु का ज्ञान अगाध,
भक्तिभाव मन में रखे, चलता चले अबाध।।

कहै कबीर तजि भरत को, नन्हा है कर पीव।
तजि अहं गुरु चरण गहु, जमसों बाचै जीव॥

कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय।
जनम – जनम का मोरचा, पल में डारे धोया॥

केते पढी गुनि पचि मुए, योग यज्ञ तप लाय।
बिन सतगुरु पावै नहीं, कोटिन करे उपाय॥

गुरु की आज्ञा आवै, गुरु की आज्ञा जाय।
कहैं कबीर सो संत हैं, आवागमन नशाय॥

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।
अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥

गुरु को सिर राखिये, चलिये आज्ञा माहिं।
कहैं कबीर ता दास को, तीन लोकों भय नाहिं॥

गुरु पारस को अन्तरो, जानत हैं सब सन्त।
वह लोहा कंचन करे, ये करि लये महन्त॥

गुरु मूरति आगे खड़ी, दुतिया भेद कुछ नाहिं।
उन्हीं कूं परनाम करि, सकल तिमिर मिटि जाहिं॥

गुरु मूरति गति चन्द्रमा, सेवक नैन चकोर।
आठ पहर निरखत रहे, गुरु मूरति की ओर॥

गुरु समान दाता नहीं, याचक शीष समान।
तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान॥

गुरु सो ज्ञान जु लीजिये, सीस दीजये दान।
बहुतक भोंदू बहि गये, सखि जीव अभिमान॥

गुरु सो प्रीतिनिवाहिये, जेहि तत निबहै संत।
प्रेम बिना ढिग दूर है, प्रेम निकट गुरु कंत॥

जग में युक्ति अनूप है, साधु संग गुरु ज्ञान।
तामें निपट अनूप है, सतगुरु लगा कान॥

जाका गुरु है आँधरा, चेला खरा निरंध।
अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फन्द॥

जेही खोजत ब्रह्मा थके, सुर नर मुनि अरु देव।
कहैं कबीर सुन साधवा, करू सतगुरु की सेवा॥

जो गुरु बसै बनारसी, शीष समुन्दर तीर।
एक पलक बिखरे नहीं, जो गुण होय शारीर॥

ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास।
गुरु सेवा ते पाइए, सद् गुरु चरण निवास॥

तबही गुरु प्रिय बैन कहि, शीष बढ़ी चित प्रीत।
ते कहिये गुरु सनमुखां, कबहूँ न दीजै पीठ॥

पंडित यदि पढि गुनि मुये, गुरु बिना मिलै न ज्ञान।
ज्ञान बिना नहिं मुक्ति है, सत्त शब्द परमान॥

यह सतगुरु उपदेश है, जो माने परतीत।
करम भरम सब त्यागि के, चलै सो भव जलजीत॥

सतगुरु खोजे संत, जीव काज को चाहहु।
मेटो भव के अंक, आवा गवन निवारहु॥

सतगुरु तो सतभाव है, जो अस भेद बताय।
धन्य शिष धन भाग तिहि, जो ऐसी सुधि पाय॥

सतगुरु मिला जु जानिये, ज्ञान उजाला होय।
भ्रम का भाँडा तोड़ी करि, रहै निराला होय॥

सतगुरु सम कोई नहीं, सात दीप नौ खण्ड।
तीन लोक न पाइये, अरु इकइस ब्रह्मणड॥

सब धरती कागज करूँ, लिखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय॥

सोई सोई नाच नचाइये, जेहि निबहे गुरु प्रेम।
कहै कबीर गुरु प्रेम बिन, कितहुं कुशल नहिं क्षेम॥

Posted in संस्कृत साहित्य

एक घटना आपके यहाँ घटित होती है।

हजरत इब्राहीम को सपना आता है उसके बाद वे अपना पुत्र कुर्बान करने को तैयार हो जाते हैं।

दैवीय कृपा से म्रत्यु के द्वार को पंहुचा हुआ वो पुत्र बकरे में बदल जाता है और इसके बाद से पूरी दुनिया के बकरा प्रजाति की शामत आ जाती है।

एक घटना हमारे यहां घटती है, ऋषि वाजश्रवा अपने पुत्र नचिकेता को म्रत्यु अर्थात यमराज को दान में दे देते हैं।

नचिकेता भी म्रत्यु के द्वारे पंहुचता है और जो ज्ञान लेकर वह वापिस लौटता है वो ज्ञान आज भी पूरी दुनिया के दर्शन शास्त्र का आधार बना हुआ है।

उस कठोपनिषद का प्रकाश आज भी मद्धिम न हुआ है।

दोनों घटनाओं में समानता है, दोनों में चमत्कार की कल्पना है पर दोनों घटनाओं से निकलने वाली प्रेरणा सर्वथा भिन्न है।

यह भी विचार मेरे मन में आता है कि यदि यही बालक हमारे किसी पुराण में बकरे से बदला हुआ दिखाया गया होता तो निष्कर्ष यह रहता कि बकरों का संरक्षण होना प्रारम्भ हो जाता क्योंकि ऋषि निष्कर्ष यह निकालते कि बकरे और मनुष्य पुत्र में एक समान ही चेतना है।

ईश्वर ने मनुष्य और बकरे को आपस मे बदल कर यही संदेश दिया है।

Posted in संस्कृत साहित्य

🌞सूर्य और सात घोड़े…..🌞

🌞 अद्भुत है सूर्य रथ के सात घोड़ों से जुड़ा विज्ञान !!

🌞 रोचक तथ्य

हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं तथा उनसे जुड़ी कहानियों का इतिहास काफी बड़ा है या यूं कहें कि कभी ना खत्म होने वाला यह इतिहास आज विश्व में अपनी एक अलग ही पहचान बनाए हुए है। विभिन्न देवी-देवताओं का चित्रण, उनकी वेश-भूषा और यहां तक कि वे किस सवारी पर सवार होते थे यह तथ्य भी काफी रोचक हैं।

🌞 सूर्य रथ

हिन्दू धर्म में विघ्नहर्ता गणेश जी की सवारी काफी प्यारी मानी जाती है। गणेश जी एक मूषक यानि कि चूहे पर सवार होते हैं जिसे देख हर कोई अचंभित होता है कि कैसे महज एक चूहा उनका वजन संभालता है। गणेश जी के बाद यदि किसी देवी या देवता की सवारी सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है तो वे हैं सूर्य भगवान।

🌞 क्यों जुते हैं सात घोड़े

सूर्य भगवान सात घोड़ों द्वारा चलाए जा रहे रथ पर सवार होते हैं। सूर्य भगवान जिन्हें आदित्य, भानु और रवि भी कहा जाता है, वे सात विशाल एवं मजबूत घोड़ों पर सवार होते हैं। इन घोड़ों की लगाम अरुण देव के हाथ होती है और स्वयं सूर्य देवता पीछे रथ पर विराजमान होते हैं।

🌞 सात की खास संख्या

लेकिन सूर्य देव द्वारा सात ही घोड़ों की सवारी क्यों की जाती है? क्या इस सात संख्या का कोई अहम कारण है? या फिर यह ब्रह्मांड, मनुष्य या सृष्टि से जुड़ी कोई खास बात बताती है। इस प्रश्न का उत्तर पौराणिक तथ्यों के साथ कुछ वैज्ञानिक पहलू से भी बंधा हुआ है।

🌞 कश्यप और अदिति की संतानें

सूर्य भगवान से जुड़ी एक और खास बात यह है कि उनके ११ भाई हैं, जिन्हें एकत्रित रूप में आदित्य भी कहा जाता है। यही कारण है कि सूर्य देव को आदित्य के नाम से भी जाना जाता है। सूर्य भगवान के अलावा ११ भाई ( अंश, आर्यमान, भाग, दक्ष, धात्री, मित्र, पुशण, सवित्र, सूर्या, वरुण, वमन, ) सभी कश्यप तथा अदिति की संतान हैं।

🌞 वर्ष के १२ माह के समान

पौराणिक इतिहास के अनुसार कश्यप तथा अदिति की ८ या ९ संतानें बताई जाती हैं लेकिन बाद में यह संख्या १२ बताई गई। इन १२ संतानों की एक बात खास है और वो यह कि सूर्य देव तथा उनके भाई मिलकर वर्ष के १२ माह के समान हैं। यानी कि यह सभी भाई वर्ष के १२ महीनों को दर्शाते हैं।

🌞 सूर्यदेव की दो पत्नियां

सूर्य देव की दो पत्नियां – संज्ञा एवं छाया हैं जिनसे उन्हें संतान प्राप्त हुई थी। इन संतानों में भगवान शनि और यमराज को मनुष्य जाति का न्यायाधिकारी माना जाता है। जहां मानव जीवन का सुख तथा दुख भगवान शनि पर निर्भर करता है वहीं दूसरी ओर शनि के छोटे भाई यमराज द्वारा आत्मा की मुक्ति की जाती है। इसके अलावा यमुना, तप्ति, अश्विनी तथा वैवस्वत मनु भी भगवान सूर्य की संतानें हैं। आगे चलकर मनु ही मानव जाति का पहला पूर्वज बने।

🌞 सूर्य भगवान का रथ

सूर्य भगवान सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होते हैं। इन सात घोड़ों के संदर्भ में पुराणों तथा वास्तव में कई कहानियां प्रचलित हैं। उनसे प्रेरित होकर सूर्य मंदिरों में सूर्य देव की विभिन्न मूर्तियां भी विराजमान हैं लेकिन यह सभी उनके रथ के साथ ही बनाई जाती हैं।

🌞 कोणार्क मंदिर

विशाल रथ और साथ में उसे चलाने वाले सात घोड़े तथा सारथी अरुण देव, यह किसी भी सूर्य मंदिर में विराजमान सूर्य देव की मूर्ति का वर्णन है। भारत में प्रसिद्ध कोणार्क का सूर्य मंदिर भगवान सूर्य तथा उनके रथ को काफी अच्छे से दर्शाता है।

🌞 सात से कम या ज्यादा क्यों नहीं

लेकिन इस सब से हटकर एक सवाल काफी अहम है कि आखिरकार सूर्य भगवान द्वारा सात ही घोड़ों की सवारी क्यों की जाती हैं। यह संख्या सात से कम या ज्यादा क्यों नहीं है। यदि हम अन्य देवों की सवारी देखें तो श्री कृष्ण द्वारा चालए गए अर्जुन के रथ के भी चार ही घोड़े थे, फिर सूर्य भगवान के सात घोड़े क्यों? क्या है इन सात घोड़ों का इतिहास और ऐसा क्या है इस सात संख्या में खास जो सूर्य देव द्वारा इसका ही चुनाव किया गया।

🌞 सात घोड़े और सप्ताह के सात दिन

सूर्य भगवान के रथ को संभालने वाले इन सात घोड़ों के नाम हैं – गायत्री, भ्राति, उस्निक, जगति, त्रिस्तप, अनुस्तप और पंक्ति। कहा जाता है कि यह सात घोड़े एक सप्ताह के सात दिनों को दर्शाते हैं। यह तो महज एक मान्यता है जो वर्षों से सूर्य देव के सात घोड़ों के संदर्भ में प्रचलित है लेकिन क्या इसके अलावा भी कोई कारण है जो सूर्य देव के इन सात घोड़ों की तस्वीर और भी साफ करता है।

🌞 सात घोड़े रोशनी को भी दर्शाते हैं

पौराणिक दिशा से विपरीत जाकर यदि साधारण तौर पर देखा जाए तो यह सात घोड़े एक रोशनी को भी दर्शाते हैं। एक ऐसी रोशनी जो स्वयं सूर्य देवता यानी कि सूरज से ही उत्पन्न होती है। यह तो सभी जानते हैं कि सूर्य के प्रकाश में सात विभिन्न रंग की रोशनी पाई जाती है जो इंद्रधनुष का निर्माण करती है।

🌞 बनता है इंद्रधनुष

यह रोशनी एक धुर से निकलकर फैलती हुई पूरे आकाश में सात रंगों का भव्य इंद्रधनुष बनाती है जिसे देखने का आनंद दुनिया में सबसे बड़ा है।

🌞 प्रत्येक घोड़े का रंग भिन्न

सूर्य भगवान के सात घोड़ों को भी इंद्रधनुष के इन्हीं सात रंगों से जोड़ा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि यदि हम इन घोड़ों को ध्यान से देखें तो प्रत्येक घोड़े का रंग भिन्न है तथा वह एक-दूसरे से मेल नहीं खाता है। केवल यही कारण नहीं बल्कि एक और कारण है जो यह बताता है कि सूर्य भगवान के रथ को चलाने वाले सात घोड़े स्वयं सूरज की रोशनी का ही प्रतीक हैं।

🌞 पौराणिक गाथा से इतर

यदि आप किसी मंदिर या पौराणिक गाथा को दर्शाती किसी तस्वीर को देखेंगे तो आपको एक अंतर दिखाई देगा। कई बार सूर्य भगवान के रथ के साथ बनाई गई तस्वीर या मूर्ति में सात अलग-अलग घोड़े बनाए जाते हैं, ठीक वैसा ही जैसा पौराणिक कहानियों में बताया जाता है लेकिन कई बार मूर्तियां इससे थोड़ी अलग भी बनाई जाती हैं।

🌞 अलग-अलग घोड़ों की उत्पत्ति

कई बार सूर्य भगवान की मूर्ति में रथ के साथ केवल एक घोड़े पर सात सिर बनाकर मूर्ति बनाई जाती है। इसका मतलब है कि केवल एक शरीर से ही सात अलग-अलग घोड़ों की उत्पत्ति होती है। ठीक उसी प्रकार से जैसे सूरज की रोशनी से सात अलग रंगों की रोशनी निकलती है। इन दो कारणों से हम सूर्य भगवान के रथ पर सात ही घोड़े होने का कारण स्पष्ट कर सकते हैं।

🌞 सारथी अरुण

पौराणिक तथ्यों के अनुसार सूर्य भगवान जिस रथ पर सवार हैं उसे अरुण देव द्वारा चलाया जाता है। एक ओर अरुण देव द्वारा रथ की कमान तो संभाली ही जाती है लेकिन रथ चलाते हुए भी वे सूर्य देव की ओर मुख कर के ही बैठते है !

🌞 केवल एक ही पहिया

रथ के नीचे केवल एक ही पहिया लगा है जिसमें १२ तिल्लियां लगी हुई हैं। यह काफी आश्चर्यजनक है कि एक बड़े रथ को चलाने के लिए केवल एक ही पहिया मौजूद है, लेकिन इसे हम भगवान सूर्य का चमत्कार ही कह सकते हैं। कहा जाता है कि रथ में केवल एक ही पहिया होने का भी एक कारण है।

🌞 पहिया एक वर्ष को दर्शाता है !

यह अकेला पहिया एक वर्ष को दर्शाता है और उसकी १२ तिल्लियां एक वर्ष के १२ महीनों का वर्णन करती हैं। एक पौराणिक उल्लेख के अनुसार सूर्य भगवान के रथ के समस्त ६० हजार वल्खिल्या जाति के लोग जिनका आकार केवल मनुष्य के हाथ के अंगूठे जितना ही है, वे सूर्य भगवान को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा करते हैं। इसके साथ ही गांधर्व और पान्नग उनके सामने गाते हैं औरअप्सराएं उन्हें खुश करने के लिए नृत्य प्रस्तुत करती हैं।

🌞 ऋतुओं का विभाजन

कहा जाता है कि इन्हीं प्रतिक्रियाओं पर संसार में ऋतुओं का विभाजन किया जाता है। इस प्रकार से केवल पौराणिक रूप से ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों से भी जुड़ा है भगवान सूर्य का यह विशाल रथ। 🌻 ।। जय श्री कृष्ण ।। 🌻

Posted in संस्कृत साहित्य

ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च । तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च । दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्नयश्य स्वाध्यायप्रवचने च । अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च । अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः । तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः । स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः । तद्धि तपस्तद्धि तपः ॥*


*_📕“तैतरियोपनिषद्”🌼_*

*🌺ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च । तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च । दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्नयश्य स्वाध्यायप्रवचने च । अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च । अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः । तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः । स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः । तद्धि तपस्तद्धि तपः ॥*
शिक्षावल्ली,अनुवाक-९,श्लोक-१

*🌼अर्थ और व्याख्या –🌻*
_”ईश्वर के प्रेम को, हृदय में भरपूर रखने के लिए , स्वाध्याय और प्रवचन की आवश्यकता है । स्वाध्याय दो प्रकार का होता है -“_
*(१) शास्त्रों का नियमपूर्वक अध्ययन और मनन करना ।*

*(२) आत्माध्ययन – आत्म निरीक्षण अर्थात् अपने कृत्यों पर दृष्टि रखते हुए जो बुरे हों उन्हें छोड़ने और जो भले हों उन्हें पुनः करने की दृढ़ इच्छा अपने भीतर उत्पन्न करते रहना ।*

अध्यापन आदि के द्वारा वेद प्रचार को *”प्रवचन”* कहते हैं । इस अनुवाक में शिक्षा यह दी गई है कि *समस्त कार्य करते हुए भी स्वाध्याय और प्रवचन अर्थात् वेद के विचार और प्रचार को सदैव अपना लक्ष्य बनाए रखना चाहिए ।* कुछ कार्यों का विवरण इस अनुवाक में दिया गया है –
*(१) ऋतम् -* तीनों काल में एक जैसी रहने वाली वेदाज्ञा पर चलना ।
*(२) सत्यम् -* मन, वाणी और कर्म में समता का होना ।

*(३) तपः -* द्वन्द्वों का सहना और नियमित जीवन बनाना ।

*(४) दमः -* इन्द्रियों पर अपना अधिकार रखना ।

*(५) शमः -* अन्तःकरणों का शान्त रखना ।

*(६) अग्नयः -* ब्रह्यचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ सम्बन्धी तीनों प्रकार की अग्नियों को स्थापित करना ।

*(७) अग्निहोत्रम् -* प्रतिदिन हवन करना ।

*(८) अतिथयः -* अतिथियों की सेवा करना ।

*(९) मानुषम् -* मनुष्य ऋण चुकाना ।

*(१०) प्रजा -* सन्तान का पालन और पोषण ।
*(११) प्रजन -* सन्तान पैदा करना ।

*(१२) प्रजाति -* पौत्रादि का उत्पन्न होना ।

*(१) (सत्यम्, इति, सत्यवचा राथीतरः)* सत्य ही (श्रेष्ठतम है) ऐसा , सत्यवादी रथीतर का पुत्र राथीतर मानता था ।
*(२) (तप, इति, तपोनित्यः, पौरूशिष्टिः)* तप ही (प्रधान है) ऐसा, नित्य तपस्वी पुरूशिष्ट का पुत्र पौरूशिष्टि (मानता था) ।
*(३) (स्वाध्यायप्रवचने, एव, इति, नाकः मौद्गल्यः)* स्वाध्याय और प्रवचन ही (मुख्य हैं) ऐसा *मुद्गल का पुत्र ‘नाक’* शिक्षा देता था क्यों कि *(तत्, हि, तपः)* वह (स्वाध्याय) ही तप है *(तत्, हि, तपः)* वह *(प्रवचन)* ही तप है ।

_”यहाँ यह नहीं समझना चाहिए कि इन उपर्युक्त विद्वानों में विचार भेद है क्यों कि इनमें जो जिस बात को मुख्य मानता था उसके सिवा अन्य बातों को गौण रीति से जरूर मानता था, इस प्रकार चारों सत्य, तप, स्वाध्याय और प्रवचन को मानते थे, केवल मुख्यता और गौणता का भेद था । ( *‘प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च’* के बाद ६ वाक्य और हैं)”_
*।। इति नवमोऽनुवाकः ।।*
*💥शम्💥*
🔥
🚩 See less— with गौरव कुमार लूम्ब बागपत.

Posted in संस्कृत साहित्य

AMAZING LANGUAGE

विश्वकीसबसेज्यादासमृद्धभाषाकौनसीहै ?

अंग्रेजी में ‘THE QUICK BROWN FOX JUMPS OVER A LAZY DOG’ एक प्रसिद्ध वाक्य है। जिसमें अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर समाहित कर लिए गए हैं। मज़ेदार बात यह है की अंग्रेज़ी वर्णमाला में कुल 26 अक्षर ही उप्लब्ध हैं जबकि इस वाक्य में 33 अक्षरों का प्रयोग किया गया है। जिसमें चार बार O और A, E, U तथा R अक्षर का प्रयोग क्रमशः 2 बार किया गया है। इसके अलावा इस वाक्य में अक्षरों का क्रम भी सही नहीं है। जहां वाक्य T से शुरु होता है वहीं G से खत्म हो रहा है।

अब ज़रा संस्कृत के इस श्लोक को पढिये।-

क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:।
तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।

अर्थात: पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का, दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन ?? राजा मय ! जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।

श्लोक को ध्यान से पढ़ने पर आप पाते हैं की संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन इस श्लोक में दिखाई दे रहे हैं वो भी क्रमानुसार। यह खूबसूरती केवल और केवल संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा में ही देखने को मिल सकती है!

पूरे विश्व में केवल एक संस्कृत ही ऐसी भाषा है जिसमें केवल एक अक्षर से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है। किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल “न” व्यंजन से अद्भुत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने थोडे में बहुत कहा है-

न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु।
नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥

अर्थात: जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है। वंदेसंस्कृतम्!

एक और उदहारण है।

दाददो दुद्द्दुद्दादि दादादो दुददीददोः।
दुद्दादं दददे दुद्दे ददादददोऽददः।।

अर्थात: दान देने वाले, खलों को उपताप देने वाले, शुद्धि देने वाले, दुष्ट्मर्दक भुजाओं वाले, दानी तथा अदानी दोनों को दान देने वाले, राक्षसों का खंडन करने वाले ने, शत्रु के विरुद्ध शस्त्र को उठाया।

है ना खूबसूरत !! इतना ही नहीं, क्या किसी भाषा में केवल 2 अक्षर से पूरा वाक्य लिखा जा सकता है ?? संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में ये करना असंभव है। माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल “भ” और “र ” दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है। देखिये –

भूरिभिर्भारिभिर्भीराभूभारैरभिरेभिरे
भेरीरे। भिभिरभ्राभैरभीरुभिरिभैरिभा:।।

अर्थात- निर्भय हाथी जो की भूमि पर भार स्वरूप लगता है, अपने वजन के चलते, जिसकी आवाज नगाड़े की तरह है और जो काले बादलों सा है, वह दूसरे दुश्मन हाथी पर आक्रमण कर रहा है।

एक और उदाहरण –

क्रोरारिकारी कोरेककारक कारिकाकर।
कोरकाकारकरक: करीर कर्करोऽकर्रुक॥

अर्थात – क्रूर शत्रुओं को नष्ट करने वाला, भूमि का एक कर्ता, दुष्टों को यातना देने वाला, कमलमुकुलवत, रमणीय हाथ वाला, हाथियों को फेंकने वाला, रण में कर्कश, सूर्य के समान तेजस्वी [था]।

पुनः क्या किसी भाषा मे केवल तीन अक्षर से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है ?? यह भी संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में असंभव है!
उदहारण –

देवानां नन्दनो देवो नोदनो वेदनिंदिनां।
दिवं दुदाव नादेन दाने दानवनंदिनः।।

अर्थात – वह परमात्मा [विष्णु] जो दूसरे देवों को सुख प्रदान करता है और जो वेदों को नहीं मानते उनको कष्ट प्रदान करता है। वह स्वर्ग को उस ध्वनि नाद से भर देता है, जिस तरह के नाद से उसने दानव [हिरण्यकशिपु] को मारा था।

जब हम कहते हैं की संस्कृत इस पूरी दुनिया की सभी प्राचीन भाषाओं की जननी है तो उसके पीछे इसी तरह के खूबसूरत तर्क होते हैं। यह विश्व की अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें “अभिधान-सार्थकता” मिलती है। अर्थात् अमुक वस्तु की अमुक संज्ञा या नाम क्यों है, यह प्रायः सभी शब्दों में मिलता है। जैसे इस विश्व का नाम संसार है तो इसलिये है क्यूँकि वह चलता रहता है, परिवर्तित होता रहता है-
संसरतीति संसारः गच्छतीति जगत् आकर्षयतीति कृष्णः रमन्ते योगिनो यस्मिन् स रामः इत्यादि।

विश्व की अन्य भाषाओं में ऐसी अभिधानसार्थकता नहीं है। Good का अर्थ अच्छा, भला, सुंदर, उत्तम, प्रियदर्शन, स्वस्थ आदि है। किसी अंग्रेजी विद्वान् से पूछो कि ऐसा क्यों है तो वह कहेगा है बस पहले से ही इसके ये अर्थ हैं। क्यों हैं वो ये नहीं बता पायेगा।

ऐसी सरल, तर्कसंगत और समृद्ध भाषा आज अपने ही देश में अपने ही लोगों में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड रही है बेहद चिंताजनक है।
संस्कृत का अध्ययन और अध्यापन इस देश की गौरवमयी संस्कृति के ज्ञान के लिए अत्यंत आवश्यक है ।

जय संस्कृत, जय संस्कृति !

Posted in संस्कृत साहित्य

🛑जन-जन के नायक शिवाजी महाराज🛑
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
स्वामी विवेकानंद ने कहा था- “क्या शिवाजी से बड़ा कोई नायक, कोई बड़ा संत, कोई बड़ा भक्त और कोई बड़ा राजा है? हमारे महान ग्रंथों में मनुष्यों के जन्मजात शासक के जो गुण हैं, शिवाजी उन्हीं के अवतार थे। वह भारत के असली पुत्र की तरह थे जो देश की वास्तविक चेतना का प्रतिनिधित्व करते थे। उन्होंने दिखाया था कि भारत का भविष्य अभी या बाद में क्या होने वाला है। एक छतरी के नीचे स्वतंत्र इकाइयों का एक समूह, जो एक सर्वोच्च अधिराज्य के अधीन हो।”

एक सच्चा राजा जानता है कि कैसे हारे हुए युद्ध को भी जीतना है। एक सच्चा राजा जानता है कि जब उसका जीवन समाप्त हो जाता है, तो भी उसे कैसे जीना चाहिए। शिवाजी महाराज जन-जन के नायक हैं। लेकिन स्वयं शिवाजी का नायक कौन है ?

शिवाजी महाराज ने न कभी विदुर को देखा-पढ़ा था, न चाणक्य को। न उनके दौर में कोई ऐसा शूरवीर था, जो उन्हें प्रेरित कर सकता होता। लेकिन शिवाजी महाराज ने विदुर, कृष्ण, चाणक्य, शुक्राचार्य हनुमान और राम –सभी को आत्मसात किया हुआ था। उनकी पहली नायक उनकी माता जीजाबाई हैं। जिन्होंने बचपन से ही उनको रामायण और महाभारत की शिक्षा दी। महात्मा विदुर कि इस बात को उन्होंने आत्मसात किया-

कृते प्रतिकृतिं कुर्याद्विंसिते प्रतिहिंसितम्।
तत्र दोषं न पश्यामि शठे शाठ्यं समाचरेत्॥
(महाभारत विदुरनीति)

अर्थात् जो (आपके प्रति) जैसा व्यवहार करे उसके साथ वैसा ही व्यवहार करो। जो तुम पर हिंसा करता है, उसके प्रतिकार में तुम भी उस पर हिंसा करो! मैं इसमें कोई दोष नहीं मानता, क्योंकि शठ के साथ शठता ही करना ही उचित है।

भगवान श्रीकृष्ण ने भी ऐसा ही कहा है:-
ये हि धर्मस्य लोप्तारो वध्यास्ते मम पाण्डव।
धर्म संस्थापनार्थ हि प्रतिज्ञैषा ममाव्यया॥

(हे पाण्डव! मेरी निश्चित प्रतिज्ञा है कि धर्म की स्थापना के लिए मैं उन्हें मारता हूं, जो धर्म का लोप (नाश) करने वाले हैं।)

ऋग्वेद में आज्ञा दी गई है (1/11/ 6) कि जो मायावी, छली, कपटी अर्थात् धोखेबाज है, उसे छल, कपट अथवा धोखे से मार देना चाहिए।
मायाभिरिन्द्रमायिनं त्वं शुष्णमवातिरः।
(हे इन्द्र! जो मायावी, पापी, छली तथा जो दूसरों को चूसने वाले हैं, उनको तुम माया से मार दो।)

और जब शिवाजी ने अफजल खां का वध किया, तो जाहिर तौर पर उनकी यही शिक्षा उनकी प्रेरणा थी। जबकि उनके अधिकांश मंत्रियों की समझ से यह सारी बातें परे थीं।
“शिवाजी महाराज ने अपने आप को इस धर्मयुद्ध में सक्षम, समर्थ एवं योग्य बनाने के लिए घुड़सवारी, तलवारबाजी और निशानेबाजी दादोजी कोंडदेव से सीखी थी।”
जय भवानी!!!

शीतल दुबे

Posted in संस्कृत साहित्य

कलिवर्ज्य


विवीध हिंदु धर्मग्रंथानुसार चार युगे मानली जातात. कृत-त्रेता-द्वापर-कलि. युगे सर्वोत्तम कृत पासुन सुरु होत क्रमाने ढळत सर्वात खालच्या पातळीला कलि पर्यंत येतात असे मानले जाते. कृतयुग सर्वश्रेष्ठ पुण्यवानांचे युग होते. त्याउलट कलियुगात मानवांचे पतन होते. कलियुगात काय काय होईल ? याची लांबच लांब गंभीर व गंमतीदार वर्णने धर्मग्रंथ करत असतात उदा. यज्ञासाठी /दानासाठी पर्याय शोधले जातील, ब्राह्मण शूद्रांसारखा आचार करतील, शूद्र धनसंचय करतील, ब्राह्मण भक्ष्याअभक्ष्याचे नियम मोडतीलो,म्लेच्छां चे राजे राज्य करतील, स्त्रियांचे चारीत्र्य लोप पावेल त्या अनैसर्गिक संभोगात रत होतील. पती जिवंत असतांना व्याभिचार करतील, लोकांमध्ये खोटारडेपणा बोकाळेल, अत्तरांना पुर्वीसारखा सुगंध राहणार नाही, किटकांची वाढ होइल, गायी कमी दुध देतील, धर्माचा लोप होऊन अधर्म माजेल, आयुमर्यादा घटेल, १६ व्या वर्षीच तरुणांना टक्कल पडेल, ८ वर्षाच्या कुमारी मुली गर्भार होतील, विश्वासाने दिलेल्या ठेवी निर्लज्जतेने नाकारल्या जातील. इ.इ. तर असे निराशेचे युग येईल व त्यानंतर सर्व संपेल. तर जे कायदे नियम पुर्वी सत्ययुगात कृतयुगात लागु होते ते आता या कलियुगात लागु होणार नाहीत. कलियुगात जुने कायदे वर्ज्य आहेत. कलिवर्ज्य आहेत. त्यामुळे जरी एखादा कायदा नियम अतिप्राचीन धर्मग्रंथ, स्मृती सुत्रांत असला तरी तो सध्याच्या कलियुगाच्या काळासाठी बदलतो. हा तर्क देऊन काही जुन्या सुत्र/स्मृतींतील धर्मनियमांना त्यानंतरच्या काळातील तुलनेने आधुनिक पुराणांनी/ धर्मग्रंथांनी कलिवर्ज्याचे कारण देऊन बाद ठरवण्यात आले. ही एक प्रकारची अ‍ॅमन्डमेंट जशी सध्याच्या कायद्यात होत असते तशी एक अ‍ॅमन्डमेंट कलिवर्ज्याने केली. ही युक्ती ही रीत धर्मकारांनी अवलंबुन काही कलिवर्ज्य नमुद केले. हे बघण्यासारखे आहे अत्यंत महत्वाचे आहेत. यांचा समावेश प्रामुख्याने आदित्यपुराण व इतर काही तुलनेने अलिकडच्या काळातील ग्रंथात करण्यात आला. या ग्रंथांचा निर्माण कालावधी प्रा.हाजरा व श्री. काणे इ. नुसार तुलनेने फ़ार अलीकडचा इ.स.च्या ९ ते १० व्या शतकाच्या आसपासचा आहे. (काळाविषयीचे दोघांचे मतभेद जमेस धरुन सर्वसाधारणपणे ) त्यामानाने जुने धर्मसुत्र व स्मृती ज्यातील कायदे रद्द ठरविले गेले वा बदलले गेले ते फ़ारच जुने आहेत त्यांचा कालावधी थेट इ.पु. ४०० ते ६०० पर्यंतही (मतभेदासहीत सर्वसाधारणपणे इथे अचुक काळ सांगणे शक्य नाही ) मागे जातो. म्हणजे जुन्या प्राचीनांचे नियम व कायदे आधुनिक ग्रंथांनी कलिवर्ज्य या आधारावर बदलले. हे महत्वाचे अशासाठी आहेत की सनातन धर्मनियम व कायदे रोज रोज बदलत नाहीत. (मुळात ते बदलु शकतात व आणि त्यामागे मानवी हितसंबंधही असु शकतात हेच त्यांच्या दैवी/ अपरीवर्तनीय असण्याच्या दाव्याला छेद देते ) जेव्हा बदलतात तेव्हा भोवतालची राजकीय सामाजिक आर्थिक परीस्थीतीतही क्रांतिकारक बदल घडलेला असतो ज्याच्या परीणामस्वरुप धर्मनियमात बदल करण्याची गरज निर्माण होते. हा एक संक्रमणाचा काळ आहे म्हणुन बदलाची दिशा कोणती कशी का बघणे रोचक व आवश्यक ठरते. यात प्रामुख्याने वर्गीय हितसंबंध तर असतातच शिवाय समा्जा्ची बदलती मानसिकताही यात प्रतिबिंबीत होते. या कलिवर्ज्यांच्या नियमांची सर्वसाधारण संख्या ५५ आहे. या व्यतिरीक्तही काही नियम/बाबी विखुरलेल्या स्वरुपात कलिवर्ज्यच्या संदर्भात नमुद केलेल्या असु शकतात.

अजुन एक बाब अशी आहे की सर्वसाधारण धार्मिक जनतेवर जुन्या मुळ वैदीक ग्रंथापेक्षा तुलनेने त्यानंतरच्या काळात आलेल्या पुराण /उपपुराण /स्मृतींचा/ भाष्यकारांचा प्रभाव फ़ार मोठा आहे. म्हणजे मुळ वैदीक ग्रंथातील फ़ारच थोडी माहीती व सर्वसाधारण जनतेत असते त्यात रसही नसतो. मात्र त्यामानाने उत्तरकालीन पुराण इ. ग्रंथातील अनेक कथा नितीनियम व्रते वैकल्ये यांचा दैंनंदीन धार्मिक आचरणात जीवनात मोठा प्रभाव दिसतो. उदा. अश्वमेध/एकादशी., रुद्र / दत्तात्रय इ. या कलिवर्ज्यातील अनेक नियम जरी ग्रंथकारांनी मांडले तरी त्यांची अंमलबजावणी साधारण दोन प्रकारे झालेली दिसते. यातील काही नियम उदा. मामाच्या मुलीशी विवाह हा कलिवर्ज्य असला तरी अनेक समाजात मोठ्या प्रमाणात आजही होतांना दिसतो तर एकीकडे असे थेट उल्लंघन मात्र दुसरीकडे उलट काहि नियमांचे कसोशीने पालनही केले जाते. उदा. गोहत्ये संदर्भातील नियम. दोन्ही प्रकार आढळतात मात्र उल्लंघना चे प्रमाण पालनाच्या तुलनेने कमी आहे. व जिथे उल्लंघन आहे तिथेही अपराधबोधाचा पगडा आहे. हे आपण सर्वसाधारण धार्मिक श्रद्धाळु व्यक्ती विषयी बोलतो आहोत हे ध्यानात ठेवावे.ज्याला धर्माशी फ़ारसे देणेघेणेच नाही अशा व्यक्तींना नियमांशी सोयरसुतक नसते.

थोर संशोधक श्री. पांडुरंग वामन काणे आपल्या विख्यात हिस्ट्री ऑफ़ धर्मशास्त्र या ग्रंथाच्या क्रं ३ च्या खंडात” कलिवर्ज्य “या नावाने असलेल्या स्वतंत्र दिर्घ प्रकरणात या नियमांचा सविस्तर आढावा घेतात. प्रस्तुत लेखात याच ग्रंथातील विवेचनाचा प्रामुख्याने आधार घेतलेला आहे. या व्यतिरीक्त या विषयाशी अप्रत्यक्ष संबंधित विवेचन नरहर कुरुंदकर यांच्या मनुस्मृती-काही विचार या ग्रंथात विपुल प्रमाणात येते. त्या विचारसरणीचा आधार या लेखात घेतलेला आहे. या शिवाय इतर काही ग्रंथातुनही माहीती घेतलेली आहे. तर कलिवर्ज्याने नेमका काय बदल केला यासाठी जुना नियम काय होता हे समजणे आवश्यक आहे. एक किंवा अनेक ग्रंथात एखादा नियम थोड्याफ़ार फ़रकाने येत असतो. कधी त्यात थोडा मतभेदही असतोच. तर पहीली पायरी म्हणुन विश्लेषण टाळुन एकदा मुळ नियम/ भुमिका काय होते व बदल काय झाला ते अगोदर नीट समजुन घेऊ. कलिवर्ज्याचा बदल हा सहसा निषेधात्मकच आहे. कलिवर्ज्य नविन पर्याय सहसा न देता केवळ जुना नियम बाद करण्यावर भर देतो. शिवाय स्पष्टीकरण न देता केवळ कलियुगात हे वर्ज्य आहे इतकाच तर्क सहसा दिला जातो. या पहील्या भागात केवळ मुळ नियमांची मांडणी व कलिवर्ज्य (जास्तीत जास्त नियम व थोडक्यात कव्हर करण्याचा प्रयत्न करुन) व बेसीक माहीती घेत जातो. या नियमांचे माझ्या अल्प कुवतीनुसार विश्लेषण व माहीती व मान्यवरांची मते इ. प्रतिसादांत व पुढील भागात देतो. त्याने यावर चर्चेतुन पुर्वग्रहरहीत ताजा दृष्टीकोणही विविध नियमांवर मिळु शकतो व विषयाचे आकलनही वाढेल असे मला एक आपले वाटते. तर अगोदर नियम बघु.


जुना मुळ नियम- स्त्री ला काही विशीष्ट परीस्थीतीत पुनर्विवाह करण्याची परवानगी काही धर्मग्रंथांनी दिलेली होती.उदा. नारद स्मृती (स्त्रीपुंस प्र. ९७) ने पाच आपत्त्तीत जर पती हरवला असेल, मृत झाला, संन्यासी झाला, नपुंसक असेल, पतित झाला असेल तर दुसरा विवाह करण्याची परवानगी दिली होती. तसेच वसिष्ठ धर्मसुत्र स्त्रीचे दोन प्रकार मानतो एक जिचा विवाह झालेला आहे मात्र ती अक्षतयोनि आहे दुसरी जिचा विवाह झालेला आहे मात्र क्षतयोनि आहे. यात केवळ पहील्या प्रकारात स्त्री ला पुनर्विवाहाची परवानगी होती. इतरही काही ग्रंथ घर सोडुन गेलेल्या पतिची कीती काळ वाट पाहुन मग दुसरा विवाह कधी करावा या संदर्भात नियम देतात उदा. ८ वर्ष ४ इ. वर्णानुसार.
कलिवर्ज्य- यानुसार वरील सर्व प्रकारच्या सर्व ग्रंथानी दिलेली सवलत काढुन कुठल्याही परीस्थीतीत पुनर्विवाह हा स्त्री ला या कलियुगात वर्ज्य आहे असे नोंदवतो. स्त्री चा पुनर्विवाहाचा अधिकार पुर्णपणे अमान्य करतो.

जुना मुळ नियम- जुने काही धर्मग्रंथ सर्वसाधारणपणे अनुलोम आंतरवर्णीय विवाहाची परवानगी देत असत व त्यापासुन झालेल्या संततीचे संपत्तीतील अधिकारही मान्य करत असत. प्रतिलोम विवाहांना सर्वच धर्मग्रंथाचा विरोध सर्वसाधारण असे. (अनुलोम- पुरुष वर्ण श्रेष्ठ स्त्री वर्ण कनिष्ठ या उतरंडीनुसार उदा. ब्राह्मण पुरुषाचा विवाह क्षत्रिय/ वैश्य/ शुद्र स्त्री बरोबर.. प्रतिलोम- पुरुष वर्ण कनिष्ठ स्त्री वर्ण श्रेष्ठ या चढत्या क्रमानुसार उदा. शुद्र पुरुष ब्राह्मण स्त्री (यांची संतती- चांडाळ)इ.
कलिवर्ज्य- सर्व प्रकारच्या अनुलोम व प्रतिलोम आंतरवर्णीय विवाहांची परवानगी नाकारतो.

जुना मुळ नियम- नियम म्हणण्यापेक्षा इथे परंपरा म्हणू या की पुर्वापारपासुन मामाच्या मुलीशी विवाह करण्याची म्हणजे सपिंड असलेल्या मुलीशी ( आईकडुन) विवाहाची रीत मोठ्या प्रमाणात प्रचलित होती.( जुन्या धर्मग्रंथांनी परवानगी दिली होती की नव्हती हे मला माहीत नाही )
कलिवर्ज्य- या परंपरेवर बंदी घालत अशा सर्व प्रकारच्या आईकडुन सपिंड मुलीशी केलेल्या विवाहावर तसेच सगोत्र विवाहावर बंदी घालतो. या प्रकारचे विवाह कलियुगात वर्ज्य आहे असे नोंदवतो.

जुना मुळ नियम – जर एखाद्या पुरुषाने इतर वर्णाच्या स्त्रीशी व्याभिचार केला तर त्याला सशर्त काही प्रायश्चित्त घेतल्यानंतर पुन्हा समाजप्रवाहात मिसळण्याची अनुमती होती. उदा. ब्राह्मणाने जर चांडाळ वा श्वपक स्त्रीशी संभोग केला तर पराशर स्मृती नुसार तो तीन दिवस उपवास, मुंडण (शिखासहीत) करुन तीन प्राजपत्य, ब्राह्मण भोजन घालुन, गायत्रीमंत्र पठण व दोन गायी दान करुन तो पुन्हा पुर्वीप्रमाणेच पवित्र झाला असे मानले जात असे. शुद्राने असे केल्यास दोन महीने केवळ गोमुत्र प्राशन करुन जगुन,इ. पुन्हा समाजप्रवाहत येऊ शकत असे. काही धर्मग्रंथ उदा. गौतमधर्मसुत्र मात्र शुद्र पुरुषाने उच्च वर्णीय स्त्रीशी केलेल्या व्याभिचारास मृत्युदंडाची शिक्षा नमुद करतात. तर मुद्दा असा की अशा दोषीने ठरवुन दिलेले प्रायश्चित्त घेतल्यावर तो पुन्हा पुर्वीसारखा पवित्र मानला जाऊन समाजप्रवाहात त्याला सामील करुन घेतले जात असे.
कलिवर्ज्य- वरील बाबतीत कडक धोरण अवलंबत अशा व्याभिचारी पुरुषाने कुठलेही प्रायश्चित्त घेतले तरी तो पुन्हा समाजप्रवाहात सामील करुन घेतला जाणार नाही असे नोंदवतो.मात्र हा कलिवर्ज्याचा नविन नियम केवळ शुद्राला लागु आहे की सर्वच वर्णांना हे त्रोटक विवेचनामुळे स्पष्ट होत नाही. काणे धर्मसिंधु ग्रंथाचा जो एक दाखला देतात त्यावरुन तरी हा कलिवर्ज्य नियम शुद्रापुरता मर्यादीत आहे असे प्रथमदर्शनी वाटते.

जुना मुळ नियम- याज्ञवल्क्यस्मृती १-७२ नुसार एखाद्या स्त्रीने व्याभिचार केला असेल तर आणि त्यानंतर तिला मासिक पाळी आली तर अशी स्त्री व्याभिचाराच्या कलंकातुन सहज मुक्त होते. मात्र अशी स्त्री जर या व्याभिचाराच्या योगाने गर्भवती झाली तर मात्र अशा स्त्रीच्या पुत्राने (मातेचा) वा भावाने (बहीणीचा) त्याग केला पाहीजे. त्यांना टाकुन दिले पाहीजे. वसिष्ठ धर्मसुत्रही असाच आदेश तिन वरीष्ठ वर्णीय स्त्रीयांनी शुद्र पुरुषाशी केलेल्या व्याभिचारासंदर्भात देतो. तिथेही नियम गर्भवती होणे न होणेवर अवलंबुन आहे. याज्ञवल्क्यस्मृतीवरील मिताक्षरा या टीकेत याचा अर्थनिर्णय करतांना विज्ञानेश्वर म्हणतो त्यागाचा अर्थ घराबाहेर काढणे असा नसुन अशा स्त्रीला धार्मिक कार्यक्रम व लैगिंक संबंध नाकारणे इतकाच आहे. वसिष्ठ पुन्हा चारच स्त्रीयांचा त्याग करावा असे म्हणतो त्यात पतीच्या गुरु वा शिष्याशी व्याभिचार करणारी, पतीच्या हत्येचा प्रयत्न, वा खालच्या वर्णाच्या पुरुषाशी व्याभिचार करणारी.
कलिवर्ज्य- नविन नियम कुठल्याही परीस्थीतीत मातेचा वा भगिनीचा त्यांनी जरी व्याभिचार केला असेल व त्यायोगे त्या गर्भवती झाल्या असल्या तरी त्यांचा त्याग करण्यास प्रतिबंध लावतो.

जुना मुळ नियम- वसिष्ठ धर्मसुत्राचा नियम होता २८-२-३ जर एखाद्या स्त्रीवर बलात्कार झाला किंवा तिचे चोराकडुन अपहरण झाले तरी तिचा त्याग न करता तिच्या मासिक पाळी येईपर्यंत वाट बघितली पाहीजे त्यानंतर ती शुद्ध होते. ( तोपर्यंत तिला करण्यासाठी काही प्रायश्चित्ते नेमुन दिलेली होती) या दोन्ही नंतर ती पुन्हा पुर्वीप्रमाणे पवित्र होते व त्यानंतर तिला समाजात वावरण्याची पुर्ण परवानगी असे. मत्स्यपुराण २२७-१२६ अशा घटनेतील बलात्कारी पुरुषाला मृत्युदंडाची शिक्षा नमुद करतो व बलात्कारीत स्त्रीचा यात काहीच दोष नाही असे म्हणतो. अगदी अलीकडच्या काळातील देवलस्मृती्नुसार एखाद्या स्त्रीवर म्लेच्छाने बलात्कार केला व त्यानी जरी ती गर्भवती झाली तरी “सान्तपन” हे प्रायश्चित्त घेऊन ती पुन्हा पुर्वीप्रमाणे पवित्र होते व समाजात मिसळण्यास पात्र होते.
कलिवर्ज्य- वरील सर्वप्रकारच्या सवलती नाकारुन कुठल्याही परीस्थीतीत अशी बलात्कारीत स्त्री जरी तिने कुठलेही प्रायश्चित्त घेतले वा तिला मासिक पाळी आली तरी तीला पुर्वीप्रमाणे पवित्र न मानता तिच्या सर्वप्रकारच्या सामाजिक स्वातंत्र्यावर बंधन आणतो.

जुना नियम- गौतम व विष्णुधर्मसुत्र व याज्ञवल्क्य आणि पाराशर स्मृती नुसार ब्राह्मण चार प्रकारच्या शुद्रांच्या घरी अन्न ग्रहण करु शकत असे. ते असे होते एक त्याचा दास, त्याचा गुराखी, त्याचा कुलमित्र ( हेरीडिशीयरी फ़ॅमिली फ़्रेंड हा शब्द काणे वापरतात) आणि ब्राह्मणाचे शेत बटाईने राखणारा सालदार (हिस्सा घेऊन हा मुद्दा महत्वाचा मराठी प्रतिशब्द कोणताही असो) जरी यापैकी हे चारी शुद्रवर्णीय असले तरी यानुसार ब्राह्मणाला यांच्या केवळ यांच्या घरी यांच्या हातचे अन्न खाण्याची परवानगी दिलेली होती. शिवाय यात पाचवा ब्राह्मणाचा न्हावी जो असेल त्यालाही काही धर्मग्रंथ यात घेत. म्हणजे त्याच्या शुद्र न्हाव्याकडेही ब्राह्मण जेऊ शकत असे.
कलिवर्ज्य- वरील चारही व पाचव्या प्रकारच्या शुद्रा कडे ब्राह्मणाने भोजन करण्याच्या परवानगीला पुर्णपणे नाकारतो. कुठल्याही परीस्थीतीत शुद्राकडे भोजन करु नये असा प्रतिबंध घालतो.
टीप- दासप्रथेचे स्वतंत्र अस्तित्व भारतात होते. दासांचे बाजार भरत मनु सात प्रकारचे दास नोंदवतो गर्भदास, भुक्तदास, दंडदास इ. कुरुंदकर शुद्र व दास यातील फ़रक एकेका व्यक्तीचे गुलाम हे दास व ब्राह्मण व क्षत्रिय समुहाचे सामाजिकरीत्या गुलाम असणारे समुह शुद्र असे मांडतात. शरद पाटील त्यांच्या एका ग्रंथाचे शीर्षक दासा-शुद्रा स्लॅव्हरी असे फ़रक करुन देतात.
इंग्रजांनी कायदा पास करुन १९ व्या शतकात भारतातुन दासप्रथा नष्ट केली.(सध्या स्लॅव्हरी इंडेक्स मध्ये भारत प्रथम क्रमांकावर आला आहे अशी परवाचीच बातमी होती मात्र त्यांचे निकष वेगळे होते)

जुना नियम- आपस्तंब धर्मसुत्र या प्राचीन ग्रंथात “वैश्वादेवासाठी” जे ब्राह्मणाच्या घरात अन्न शिजवले जात असे ते अन्न शिजवण्याची परवानगी शुद्रालाही होती. शुद्राच्या हातचे शिजवलेले अन्न ब्राह्मणसहीत इतर तीन वर्णांना खाण्याची परवानगी होती. मात्र काही अटी होत्या जसे प्रथम तीन वर्णाच्या देखरेखीखाली हे अन्न त्याने शिजवले पाहीजे, त्याने नखे केस नियमीत कापलेले असावेत इ.इ.यात ही परवानगी या विशीष्ट समारंभापुरती असावी असे वाटते ही ब्राह्मणाच्या स्वयंपाकघरात रोजच्या अन्न शिजवण्यासाठी वाटत नाही. ही एका विशीष्ट उत्सवप्रसंगी जिथे अनेक लोकांचे अन्न शिजवण्याची गरज आहे तिथे केवळ आहे असे वाटते.कारण देखरेख इ. बाबी त्याला अनुकुल वाटतात. मुळात वैश्वादेवाचे अन्न म्हणजे नेमके कोणाचे कोणत्या सणवार प्रसंगी हे त्रोटक विवेचनामुळे स्पष्ट होत नाही व हे कुठे सापडेल तिथे अधिक शोध घ्यावा लागेल.
कलिवर्ज्य- वरील किमान एकमात्र ठीकाणी शुद्राला दिलेली इतर वर्णासाठी अन्न शिजवण्याची परवानगी पुर्णपणे नाकारण्यात येते. शुद्राला असे अन्न शिजवण्यास व इतर वर्णांनी असे अन्न खाण्यास मनाई करण्यात येते.
९-
जुना नियम- काठक ब्राह्मणानुसार जो यति/संन्यासी आहे असा माणुस मग तो सर्व वर्णाच्या लोकांकडुन शुद्र असो वा इतर भिक्षा घेऊ शकतो पोट भरण्याकरीता अन्न मागु शकतो. बौधायन धर्मसुत्र देखील ही परवानगी देते. साधारणत: धर्मग्रंथांनुसार संन्यासी हा वर्णाश्रमापलीकडे आहे असे मानले जात असे. अद्वैत वगैरे साध्य झाल्यावर वर्ण काय लिंग काय अशा अर्थाने त्या तात्विक आधारावर ही सुट कदाचित पुर्वी दिलेली असावी. वसिष्ठ सात घरांतुन अगोदर न ठरवता (कोणाचेही घर असो) घरातुन भिक्षा घेण्याची परवानगी यतिला देतो.
कलिवर्ज्य- यानुसार यतिनेही वा सन्यासी जरी असला तरी अशा पुरुषाने जातीबंधनाचे वर्णाश्रमाचे नियम पाळले पाहीजेत. शुद्राकडुन अन्न भिक्षा म्हणुन घेण्यास कलिवर्ज्यानुसार प्रतिबंध लावला गेला..
१०
जुना नियम- “आततायिन ” व्यक्तीने (डेस्परेट/व्हायोलंट) युद्धाच्या पवित्र्यात जर हल्ला केला तर आणि त्याला स्वत:चा बचाव करण्याच्या हेतुने मारले तर त्यात काहीही गैर नाही असे अनेक जुन्या धर्मशास्त्रांचे मत होते. आततायिन च्या व्याख्येत हिंसक पुरुष जो शस्त्रसज्ज आहे/दरोडेखोर आहे/आग लावण्याच्या हेतुने/ एखाद्याची पत्नी पळवण्याच्या हेतुने / जर आक्रमण करत आहे अशांचा समावेश होता. तर अशा “आततायिन” व्यक्तीवर प्रतिहल्ला करुन त्याला ठार मारणे धर्मसंमत होते. मात्र यात असा “आततायिन” ब्राह्मण असेल तर मात्र त्याला मारावे की नाही याविषयी अनेक धर्मसुत्रांत अगोदरपासुनच मतभेद होते. प्रातिनिधीक म्हणुन वसिष्ठ धर्मसुत्र म्हणतो जर ब्राह्मण हा आततायिन म्हणुन हल्ला करण्यास आला व इजा पोहोचवण्याचा प्रयत्न केला तर जरी तो वेदाधिकारी असला तरी त्याच्या प्रतिकारात केलेल्या हत्येने ब्रह्महत्येचे पातक लागत नाही. दुसरीकडे कात्यायन स्मृती म्हणते ब्राह्मण हा जरी आततायिन असेल व हल्ला करत असेल तरी त्याला (स्वत:च्या जीवाच्या रक्षणासाठी देखील मारु नये) भृगु म्हणतो आततयिन शुद्र असेल तर मारायला हरकत नाही मात्र ब्राह्मणाला मारु नये. (आततायिन बाकी तीन वर्णापैकी असेल तर त्याला मारण्याच्या बाबतीत सर्वाचे एकमत आहे. वाद केवळ ब्राह्मणसंदर्भात होता)
कलिवर्ज्य- वरील एक बाजु पुर्णपणे नाकारुन ब्राह्मण कुठल्याही परीस्थीतीत आततायिन असला. ठार मारण्याच्या हेतुने जरी आला, शस्त्रसज्ज जरी असला इ. तरी त्याला मारणे गैर आहे.स्व-बचावासाठी जरी केली तरी ती ब्रह्महत्याच मानली जाईल.
टीप-कात्यायन या प्राचीन स्मृतीच्या मुळ प्रतीचा अजुन शोध लागलेला नाही काणेंनी विवीध ठीकाणचे उल्लेख असलेले तुकडे जमवुन तिची पुनर्बांधणी केलेली आहे असे ते नमुद करतात.
११
जुना नियम- जर ब्राह्मण हा सलग सहा वेळचा उपाशी असेल (सलग तीन दिवस- दोन वेळ) जर त्याला काही कारणाने अन्न मिळु शकले नाही किंवा तो त्याला नेमुन दिलेल्या कार्यांनी कमाई करु न शकल्याने वरील काळापर्यंत जर उपाशी राहीला तर.मनुस्मृती व याज्ञवल्क्यस्मृतीनुसार या आपातकाळात तो शुद्राचे अन्न ही चोरुन/बळकावुन खाऊ शकतो. शुद्राच्या शेतातही चोरी वा बळजबरीने धान्य नेऊ शकतो. या चोरी/बळजोरीची परवानगी या स्मृतींनी ब्राह्मणाला दिलेली होती. तीन दिवसानंतर ही कालमर्यादा मात्र होती. (वरील प्रकारची चोरीची मुभा अन्य तीनवर्णीयांना कीतीही दिवसांचे उपाशी असले तरी मनुने दिली नव्हती.)
कलिवर्ज्य- ब्राह्मण जरी तीन दिवस सहा वेळ चा उपाशी असला तरी त्याने अशा प्रकारची अन्नाची चोरी शुद्राच्या इथे करु नये. असा नविन नियम करण्यात आला. ( हा प्रतिबंध बहुधा कलियुगातील गब्बरसिंग यांचा संभाव्य प्रभाव लक्षात घेऊन टाकला असावा)
१२
जुना नियम- सर्वच धर्मसुत्रांत ब्राह्मणाच्या समुद्रगमनाचा/उल्लंघनाचा निषेध नोंदवलेला आहे. बौधायन धर्मसुत्र याला महापातकाच्या यादीत सर्वात वरचे स्थान देतो. याला ब्राह्मणाची संपत्ती ठेव म्हणुन घेउन तिचा अपहार करणे या तोडीचे महापातक मानतो. ब्राह्मणाने समुद्रगमन केल्यास मनु त्याचा श्राद्धाला बोलावण्याचा अधिकार काढुन घेतो मात्र त्याची जात समुद्रगमनाने संपत नाही असे मानतो.शुद्र व इतरांना मात्र समुद्रगमनाची परवानगी होती. तर काही ठराविक प्रायश्चित्त घेऊन समुद्रगमन केलेला ब्राह्मण पुन्हा समाजाच्या मुख्य प्रवाहात सामील होऊ शकत असे.
कलिवर्ज्य- कितीही आणि कुठलेही प्रायश्चित्त घेतले तरी समुद्रगमन केलेला ब्राह्मण पुन्हा समाजात सामील होऊ शकत नाही. त्याची जात जाते. तो कायमचा वाळीत टाकण्यात येईल असा नविन दंडक टाकण्यात आला.
टीप -या वरील विषया संदर्भात सावरकरांनी “जात्युच्छेदक निबंध” या ग्रंथात नोंदवलेला किस्सा देण्याचा मोह आवरत नाही. “एक हिंदु राघोबादादांचा वकील कोठे एकदाच विलायतेस जाऊन आला तो त्याच्या त्या भयंकर जात गेल्याचे प्रायश्चित्त त्याला ” योनिप्रवेश” प्रायश्चित्त करवुन आणि पर्वतावरील पहाडांच्या कडेलोटालगतच्या योनिसारख्या आकृतीतुन बाहेर येताच तो पुनीत झालासे मानुन परत घेण्यात आले. पाप एकपट मुर्ख आणि त्याचे प्रायश्चित्त शतपटीने मुर्खतर!. काळे बर्वे ,हिंगणे असले पट्टीचे हिंदु राजदुत जर लंडन,पॅरीस, लिस्बन ला राहते तर काय आमच्या यादवीचा जसा त्यांनी लाभ घेतला तसा त्यांच्या यादवीचा आम्हांस घेता आला नसता ?
१३
जुना नियम-
गोसव नावाच्या जुन्या यज्ञात “अनुबंध्या” गायीचा बळी (“बॅरन काऊ” असा अर्थ काणे सांगतात) अग्निस्तोमाच्या शेवटी एका विशीष्ट विधीनंतर दिला जात असे. मान्यवर पाहुण्याला देण्यासाठी बनवलेल्या मधुपर्क या विशेष पदार्थातही मुख्य घटक म्हणुन गायीचे मास वापरण्यात येत असे. गोभिल गृह्यसुत्रानुसार अष्टकश्राध्द्दातही गायीचा बळी दिला जात असे.. आपस्तंब धर्मसुत्र सांगतो की गायीचे मांस जर श्राद्धभोजनात पितरांना अर्पण केले तर पितर एक वर्षाच्या कालावधीसाठी तृप्त राहतात. गोमेध या यज्ञातही गायीचीच बळी दिली जात असे हा यज्ञ केवळ वैश्य करु शकत असे.
कलिवर्ज्य- वरील सर्व जुने नियम रद्द करत कुठल्याही कारणासाठी कुठल्याही यज्ञात गायीच्या बळीचा निषेध करतो. गोवध कलिवर्ज्य ठरवतो.
१४
सौत्रामणी यज्ञात सुरा (सोम नव्हे सोम वेगळा सुरा वेगळी) सुरा/दारु सुरापात्रांतुन दिली जात असे.गौतमधर्मसुत्र सात प्रकारच्या हविर्यज्ञात याचा समावेश करतो. विशेष म्हणजे अतीसोमपानावर अजीर्ण झाल्यास उतारा म्हणुन सुरा प्यायली जात असे शतपथ ब्राह्मणग्रंथ भातापासुन बार्लीपासुन सुरा कशी बनवावी याची विस्तृत पाककृती देतो एकुण तीन प्रकाराची सुरा वापरली जात असे भातापासुन व अन्य दोन फ़ळ इ..
कलिवर्ज्य- या सुरा/दारु प्राशनावर पुर्णपणे बंदी घालतो.
१५
जुना नियम- वरील नियमाचाच एक भाग म्हणून मधुपर्क हे पुर्वी क्वचित येणारा विशेष अतिथी, स्नातक,आचार्य, सासरा, यज्ञात सहभागी ब्राह्मण रुत्विक, मामा, नवरदेव इ.चा यांना सन्मानाने आदर सत्काराचा भाग म्हणुन दिले जात असे. यासाठी मुख्यत्वेकरुन गायीचे मास वापरले जात असे.
कलिवर्ज्य- वरीलप्रमाणेच मधुपर्कासाठी गाय मारण्यावर बंदी घालतो. त्यानंतर गायीच्या मांसाएवजी दुध दही मध इ.ने मधुपर्क बनवला जाऊ लागला.
१६
जुना नियम- विवीध स्मृती व धर्मसुत्रांनुसार काही विशिष्ट पापांना एकमताने अतिपातक वा महापातक मानले गेले होते. यात प्रामुख्याने स्वमातेशी केलेले गमन, किंवा स्वकन्येशी वा सुनेबरोबर केलेले गमन, ब्राह्मणाची हत्या, सोन्याची चोरी व इतर काही. (उदा. विष्णुधर्मसुत्र नुसार यांना अतिपातक मानले गेले होते.) अशा प्रकारच्या महापातकांसाठी केवळ दोन प्रायश्चित्ते दिलेली होती. एक म्हणजे उंच कड्याच्या टोकावरुन स्वत:ला झोकुन देणे दुसरा मार्ग अग्निप्रवेश करुन जीवन संपवणे. हे केवळ दोनच मार्ग या महापातकांसाठी होते. थोडक्यात मृत्यु फ़क्त.
कलिवर्ज्य- हा नियम ब्राह्मणासाठी केवळ रद्द ठरवण्यात आला. ब्राह्मणाने जरी वरीलपैकी कुठलेही महापातक केले तरी त्याने ही दोन प्रायश्चित्ते घेऊन जीवन संपवु नये हा नविन नियम करण्यात आला. हा नियम इतर तीन वर्णांसाठी जुनाच होता त्यांनी महापातक केल्यास वरीलप्रमाणेच प्रायश्चित्त घेणे भाग होते

आता काही नियम एकत्र करुन थोडक्यात घेतो

१७-१८-१९
जुने नियम- अतिप्राचीन तैत्तीरीय ब्राह्मण एका विशिष्ट यज्ञात पुरुषाचा बळी कसा द्यावा कोणत्या लक्षणांचा पुरुष निवडावा इ.चे या प्रोसीजरचे विस्ताराने विवरण करते. वाजसनेयी संहीतेत तैत्तिरीय प्रमाणेच याचे उल्लेख येतात. त्यानुसार वैश्याचा बळी मारुत ला, ब्राह्मण पुरुषाचा बळी ब्रह्मा या देवतेला इ. यात अकरा बलीवेंदींवर अकरा प्राणी बळी दिले जात इ. इ.. या यज्ञाच्या समाप्तीनंतर यजमान वनात संन्यासी बनुन निघुन जात असे. हा एक भाग. तसेच दुसरा एक मोठा महत्वपुर्ण यज्ञ होता अश्वमेध, हा एक अनेक गुंतागुंतीच्या विधींचा समावेश असलेला. अतीविचीत्र विधी रीती समाविष्ट असलेला अतीप्राचीन यज्ञ होता .इ.पु. २ ते अगदी १८ व्या शतकातल्या जयसिंग अशा अनेक ऐतिहासीक राजांनीही हा यज्ञ केल्याची नोंद आहे असे काणे म्हणतात. आणि एक असाच राजसुय नावाचा यज्ञ होता हा अतीदीर्घकाळ दोन वर्षांपर्यंतही चालत असे. कलिंग सम्राट खारवेला तसेच नयनिका राणीने हा यज्ञ केल्याची नोंद असलेले ऐतिहासिक शिलालेख आढळतात.
कलिवर्ज्य- याने वरील तीनही प्रकारच्या यज्ञांवर बंदी घातली. व पुरुषबळीचा, अश्वमेध आणि राजसुय हे यज्ञ कलियुगात करण्यास मनाई केली. या तिघांचा एकेक कलिवर्ज्य नियम आहे.
२०-२१
जुने नियम- जुन्या नियमांनुसार वैदिक विद्यार्थ्यांचे दोन प्रकार होते. एक जो गुरुगृही शिक्षण पुर्ण झाल्यावर परत जातांना गुरुदक्षिणा देऊन जातो. दुसरा जो मरेपर्यंत विद्यार्थीच (नैष्ठीक) ब्रह्मचारी असतो व गुरुगृहीच राहतो. अशा विद्यार्थ्याने गुरुच्या मृत्युनंतरही त्याच्या पुत्राकडे वा पत्नी कडे राहीले पाहीजे. असे मनु वसिष्ठ इ. सांगतात.
तसेच जुन्या धर्मग्रंथानुसार एक वेद शिकण्याचा कालावधी १२ वर्षे मानला जात असे. चार वेदांचा ४८ ( आता हा चार पुरुषार्थ २५-२५ मिळुन १०० वर्ष आयुष्याच्या विरोधात आहे वरील नियमही तसाच पण अशा विसंगती प्रत्येक पावलावर आढळतात) यात जुने धर्मग्रंथ ही निरनिराळी सुट अगोदरपासुन देतच होते. जशी याज्ञवल्क्यस्मृती ने काळ एका वेदाचा १२ वर्षे किंवा किमान ५ वर्षे सांगितला होता त्यात एखाद्याने एकच वेद शिकावा ठरवले तर तो ५ वर्षात मोकळा होऊ शकत असे. मनुही तीन वेदांसांठी अधिकतम ३६ वर्ष शिका किंवा त्याच्या अर्धा १८ किंवा पाव ९ वर्षे द्या नाहीतर साध्य झाला वेद त्याअगोदर तर तसेही ठीक अशी सुविधा देतच होता.
कलिवर्ज्य- वरील दोन्ही नियम कलिवर्ज्य ठरवले म्हणजे नैष्ठीक ब्रह्मचारी आजन्म विद्यार्थ्याची पुन्हा घरी रवानगी केली त्यासाठी दामोदरा चा ” कलिवर्ज्यनिर्णय” ग्रंथ नैष्ठीकं ब्रह्मचर्यंम ऐवजी दिर्घकालम ब्रह्मचर्यम ही व्याख्या आधार म्हणुन घेतो. अशा आजन्म गुरुगृही राहण्यावर शिकण्यावर बंदी घातली गेली. तसेच दुसरा जो दिर्घकाळ वेद शिकण्यावर ४८-३६-२४ इ.वर्षे वर ही कलिवर्ज्य नियमानुसार बंदी टाकण्यात आली. बहुधा वरील चार पुरुषार्थाचा नियम मॅच केला असावा. तसेही अगोदर पासुन अनेक स्मृतींचा याला पाठींबा होताच कलिवर्ज्याने केवळ शिक्कामोर्तब केले. ( मात्र हे कलिवर्ज्य मानावे की नाही यावरही धर्ममार्तंडांमध्ये मोठे मतभेद होते हा एक वेगळा मुद्दा.)
२२-२३
जुने नियम- मनुस्मृतीने वानप्रस्थी ब्राह्मणासाठी जो आत्मज्ञानासाठी श्रुतीचा अभ्यास करतो, वनात राहतो इ., त्याला जर दुर्देवाने काही असाध्य व्याधी जडली रोग झाला तर त्याने वायु भक्षण करत ईशान्य दिशेला महाप्रस्थान करावे व शरीरान्त होईपर्यंत चालत राहावे असा उपाय देतो.(६-३०-३१) याला महाभारतात पांडवांनी केलेल्या महाप्रस्थानाची पार्श्वभुमी प्रेरणा असावी. अपरार्कही आदिपुराणाचा हवाला देऊन जर एखादा माणुस असाध्य व्याधीने ग्रस्त झाला असेल व त्याने हिमालयाच्या दिशेने अशा रीतीने चालत जाण्यास सुरुवात केली, किंवा जलसमाधी वा अग्निप्रवेश घेऊन जीवनयात्रा संपवली तर तो मृत्युपश्चात स्वर्गलोकात जातो असे नमुद केलेले आहे.
यासारखाच एक दुसरा जुना नियम होता अत्रि म्हणतो जर एखादा माणुस वृद्ध झाला असेल आणि इतका आजारी झालेला असेल की कुठलीही वैद्यकीय मदत त्याला सुधारु शकत नाही, त्याला स्वत:च्या शरीराची स्वत:ला किमान शुद्धी ठेवता येत नाही तर अशा वृद्ध व्यक्तीने अग्निप्रवेश वा जलसमाधी घेऊन वा मरेपर्यंत उपवास करुन स्वत:ची जीवनयात्रा संपवणे हेच श्रेयस्कर आहे. अपरार्क अनेक स्मृतींचे हवाले देऊन अशा गंभीर असाध्य व्याधीग्रस्त व्यक्तीला ज्याने जीवनाची सर्व कर्मे करुन झालेली आहेत त्याला वरील प्रमाणे व कड्यावरुन झोकुन देण्याचा आणखी एक अधिकचा पर्याय सुचवुन आयुष्य संपवण्याची परवानगी देतो. काणे याचा संबंध ब्रह्महत्येचे महापातक केलेल्यला देखील याच शिक्षा होत्या हे निदर्शनास आणुन देतात.
कलिवर्ज्य- कलिवर्ज्य नुसार अशा प्रकारे महाप्रस्थान व आत्महत्या करण्यास बंदी टाकण्यात आली. मात्र अशा प्रकारची आत्महत्या ही केवळ शुद्राला करण्याची परवानगी आहे ब्राह्मण व इतर वर्ण यांनी वरील दोन प्रकारांनी आपले जीवन संपवु नये असा नियम करण्यात आला. ( यात महापातकाच्या प्रायश्चित्ताचा संबंध विलक्षण आहे व शुद्राला यातुन वगळणंही विलक्षणच आहे.) मात्र त्रोटक विवेचनाने मुद्दा पुरेसा कळत नाही.
टीप- ब्रह्महत्येच्या महापातकासाठी त्या माणसाने स्वत:ला धनुर्धारीच्या समोर सादर करावे असा एक उल्लेख काणेंच्या पुस्तकात येतो. याचा संबंध कृष्णाच्या महाभारतातील अंताशी आहे का ?
२४-२५-२६
जुने नियम-
अनेक जुन्या सुत्र-स्मृतीनुसार ज्येष्ठ पुत्राला वडिलोपार्जित संप्पत्तीमध्ये विशेष वाटा /पुर्ण वाटा देण्याची तरतुद होती. मनु-९-१०५-१०७ नुसार वडिलांच्या मृत्यु नंतर संपुर्ण संपत्ती ही ज्येष्ठ पुत्रालाच द्यायला हवी व त्याच्या लहान भावांनी त्याच्या नियंत्रणात उपजिवीकेसाठी त्यावर अवलंबुन राहावे. कारण परंपरेनुसार ज्येष्ठ पुत्र आपल्या केवळ जन्माने पित्याची पितरांच्या रुणातुंन मुक्ती करतो म्हणुन त्यालाच सर्वात जास्त हिस्सा मिळाला पाहीजे. याला “उद्धारविभाग” असे नाव होते. यात मात्र एका पुरुषाला विविध वर्णाच्या स्त्रीयांपासुन संतती झाली असेल तर त्याच्या स्व-वर्णाची संततीच ज्येष्ठ मानली जाईल (जरी खालच्या वर्णाच्या स्त्रीपासुन झालेला पुत्र वयाने ज्येष्ठ असला तरी) असाही नियम होता. विष्णु/बौधायनधर्मसुत्रे या प्रमाणेच मत देतात जिथे पुर्ण नाही तिथे अधिकाधिक वाटा( एक पंचमांश विशेष वाटा इ.) हा ज्येष्ठ पुत्राला मिळावा अशा तरतुदी सर्वसाधारण जुन्या धर्मसुत्रांमध्ये होत्या.
दुसरा नियम असा होता की पिता व पुत्र यांच्या वादामध्ये भांडणामध्ये जो माणुस शपथेवर साक्ष देईल (सामोपचाराने अशी भांडणे न सोडवता) अशा साक्षीदाराला आर्थिक दंड ठोठावला जात असे. याज्ञवल्क्यस्मृती या दंडासाठी २०० पण दंडाची तरतुद करते. पितापुत्र वादाला फ़ार वाईट मानले जात असे. राजा केवळ स्वत:हुन अशा केसेस ची दखल घेऊ शकत असे.
तिसरा नियम असा होता की ज्या स्त्रीला पुत्रप्राप्ती झाली नाही अशा स्त्रीला पुत्र प्राप्ती करुन देण्यासाठी तिच्या पतीच्या भावाची वा सगोत्र व्यक्तीची संभोगासाठी नेमणुक करावी व याने हा प्रश्न सोडवावा ही नियोग नावाची रीत होती. कलिवर्ज्यनिर्णय या ग्रंथात मृत पतिचा ज्येष्ठ बंधु की कनिष्ठ बंधु कोणाची संभोगासाठी नेमणूक करावी याची चर्चा होते. त्यात मिताक्षरेचा आधार (देवर-कनियन भ्राता) घेउन यासाठी कनिष्ठ बंधुची नेमणुक करावी असा निर्णय देण्यात येतो. (इरावती कर्वे युगांत मध्ये या संदर्भात विवेचन करतात असे आठवते ) तर ही एक भावाचा प्रजननासाठी वापर करण्याची रीत होती
कलिवर्ज्य- वरील तिन प्रकारचे नियम कलियुगात अपात्र ठरवतो. व ज्येष्ठ बंधुस संपत्तीत विशेष वाटा नाकारतो. तसेच पितापुत्रातील वादात साक्षीदाराला कुठलाही दंड लावु नये असे म्हणतो. त्याच बरोबर नियोगा चा निषेध करत ज्येष्ठ वा कनिष्ठ वा सगोत्र कुणाच्याही संभोगा/नियोगा द्वारे अशा प्रकारे संततीला जन्म देण्याचा विरोध करतो.
आता अजुन थोडक्यात उरलेले नियम आवरतो गरज भासल्यास एखाद्या नियमावर प्रतिसादातुन विस्तार करता येईल

२७- एकाच देवतेची अनेक वर्षे विवीध मार्गांनी पुजा करण्यास कलिवर्ज्यानुसार बंदी घालण्यात आली किंवा बंदीपेक्षा हे चुक आहे अशी भुमिका कलिवर्ज्याने घेतली.
२८- समित्र हा यज्ञातील प्राण्याला बळी देण्याचे काम करत असे. तर हा समित्र पुर्वी ब्राह्मण असे आता कलिवर्ज्याने ब्राह्मणाने यज्ञात हे समित्र चे काम करणे बंद करावे असा नियम देतो.
२९- ब्राह्मणाने सतत प्रवास करत राहावा यावर कलिवर्ज्य बंदी घालतो.
३०- ब्राह्मणाने दुरदेशीच्या दुर अंतरावरच्या तीर्थयात्रांना जाण्यास कलिवर्ज्य बंदी घालतो.
३१- सोमाची विक्री ब्राह्मणाने करण्यावर कलिवर्ज्यानुसार बंदी घालण्यात आली.
३२- अन्य वर्णाच्या स्त्री बरोबर संभोग करण्यासाठी दोषीने जरी प्रायश्चित्त घेतले तो पुन्हा समाजात मिसळण्यास पात्र नाही असा नियम कलिवर्ज्य देतो.
३३- कमंडलु सतत बाळगण्यावर कलिवर्ज्य बंदी आणतो.
३४- पावसाचे ताजे पडलेले पाणी किमान दहा दिवस वापरु नये त्यानंतर वापरावयास घ्यावे या जुन्या नियमावर कलिवर्ज्य बंदी घालतो.
३५- श्रौताग्निला तोंडाने फ़ुंकर मारुन प्रज्वलित करणे (आप. धर्मसुत्राचा मुळ नियम) कलिवर्ज्य चुकीचे ठरवतो.
३६- अग्निहोत्राचे (श्रौत) पालन करण्यास कलिवर्ज्य बंदी घालतो.
३७- दिर्घकालीन ब्रह्मचर्याचे पालन करण्यावर कलिवर्ज्य बंदी घालतो.
३८- एकदंडी व त्रिदंडी सर्व प्रकारच्या संन्यासा वर कलिवर्ज्य बंदी घालतो. कलियुगात संन्यासच नको अशी भुमिका घेतो.(काया-वाचा-मना वर नियंत्रण असणे त्रिदंडी संन्यास)
३९- एकाने खाल्यानंतर उरलेले उष्टे अन्न इतरांना देण्यास कलिवर्ज्य बंदी घालतो.
४०- दुसर्‍यासाठी जीवनत्याग करण्याच्या कृतीचा कलिवर्ज्य निषेध करतो.
४१- ब्राह्मणाने धनसंचय करु नये उद्यासाठी धान्य साठा करु नये दारीद्र्यात राहावे. या नियमाला (मनु-४-७ याज्ञ-१-१२८) कलिवर्ज्य चुकीचे ठरवतो.
४२- औरस व दत्तक व्यतिरीक्त इतर सर्व प्रकारच्या पुत्रांना कलिवर्ज्य अमान्य करतो. त्यांचे पुर्वग्रंथांनी दिलेले अधिकार नाकारतो.
४३- “पतित” व्यक्तीशी बोलण्याने वा तो दृष्टीस पडणे हे पाप आहे असे कलिवर्ज्य अमान्य करतो. याचा संसर्ग कलियुगात होत नाही असे म्हणतो.
४४- भुमीवर पडलेले पाणी ( जर ते गायीची तहान भागवण्याइतक्या किमान प्रमाणात असेल) तर असे जमिनीवर पडलेले पाणी “आचमन” करण्यासाठी वापरता येते याचा कलिवर्ज्य निषेध करतो. असे पाणी वापरुन “आचमन” करण्यास विरोध करतो.
४५- विविध प्रकारच्या, बली देण्याचा विधी समाविष्ट असलेल्या, केवळ ब्राह्मणांना करण्याचा अधिकार असलेल्या, कमी ते दिर्घ कालावधीच्या सर्वच “सत्रा”वर कलिवर्ज्य बंदी घालतो. ुअशा प्रकारची “सत्रे” ही कलियुगात वर्ज्य आहेत.

वरील लेखात चुका असु शकतात सुधारुन दिल्यास आभारी राहील, शिवाय वरील प्रत्येक मुळ नियम व त्यातील बदलाचे अचुक कारण याचे परीपुर्ण आकलन झालेले आहे असा माझा कुठलाही दावा नाही व अशा प्रकारची ठाम भुमिका नाही. या विषयावर शोधु गेल्यास मुळात फ़ार कमी माहीती आढळते. व माझी व्यक्तीगत मर्यादाही आहेच. काही आवर्जुन “टाळलेल्या” विषयांपैकी हा एक आहे असे मात्र मला वाटते. म्हणुनच अधिक जाणुन घ्यावेसे वाटते. मी संस्कृत व इतर कुठल्याही विषयाचा तज्ञ नाही. इथे मला या विषयातील धार्मिक कायदा व त्यातील बदल व त्यावरील विवीध घटकांचा प्रभाव हा विषय महत्वाचा जिव्हाळ्याचा वाटतो, भाषा इ. नव्हे. व त्या अनुषंगाने चर्चा झाली तर बरे वाटेल.

https://aisiakshare.com/node/5294

Posted in संस्कृत साहित्य

🕉हिन्दू संस्कार🕉
4 पैसे क्यों ज़रूरी हैं ?❓

बचपन में बुजुर्गों से एक कहानी सुनते थे कि... इंसान 4 पैसे कमाने के लिए मेहनत करता है या...
बेटा कुछ काम करोगे तो 4 पैसे घर में आएँगे या... आज चार पैसे होते तो कोई ऐसे ना बोलता,

आख़िर क्यों चाहिए ये चार पैसे और चार ही क्यों तीन या पाँच क्यों नहीं?❓

तीन पैसों में क्या कमी हो जायेगी या पांच से क्या बढ़ जायेगा?❓

आइये… समझते हैं कि इन चार पैसों का क्या करना है?

पहला पैसा भोजन है,

दूसरे पैसे से पिछला कर्ज़ उतारना है,

तीसरे पैसे का
आगे क़र्ज़ देना है और

चौथे पैसे को कुएं में डालना है।

4 पैसों का रहस्य

1) भोजन:-
अर्थात अपना तथा अपने परिवार पत्नी, बच्चों का भरण-पोषण करना, पेट भरने के लिए।

2) पिछला क़र्ज़ उतारना:-
अपने माता-पिता की सेवा के लिए उनके द्वारा किए गये हमारे पालन-पोषण कर्ज़ उतारने के लिए।

3) आगे कर्ज़ देना:-
सन्तान को पढ़ा-लिखा कर क़ाबिल बनाने के लिए ताकि आगे वृद्धावस्था में वे आपका ख़्याल रख सकें।

4) कुएं में डालने के लिए:-
अर्थात शुभ कार्य करने के लिए दान, सन्त सेवा, असहायों की सहायता करने के लिए, यानि निष्काम सेवा करना, क्योंकि हमारे द्वारा किए गये इन्हीं शुभ कर्मों का फल हमें इस जीवन के बाद मिलने वाला है।

इन कार्यों के लिए हमें चार पैसों की ज़रूरत पड़ती है,
यदि तीन पैसे रह गए तो कार्य पूरे नहीं होंगे और पाँचवे पैसे की ज़रूरत ही नहीं है।
🙏🙏*यही है 4 पैसों का गणित*

🙏
अपने धर्म और संस्कृति की हमेशा रक्षा करें

प्रेषित
🙏🏼गौड़🙏🏼

Posted in संस्कृत साहित्य

लगभग 80 साल पहले भारत के साधुओं के बारे में एक बात सुनकर लंदन की पूरी पार्लियामेंट ( संसद ) सन्न रह गई थी …..

आपके गांव-शहर के नजदीक जो भी यूनिवर्सिटी है , समय निकाल कर उसमें जाएं । यूँ तो आप पूरे संसार की किसी भी यूनिवर्सिटी में चले जाइये , आपकी मर्जी है । वहां जाकर आप किसी भी विभाग में चले जाइये , यहां विभाग के चयन में भी आपकी मर्जी है । उस विभाग के पुस्तकालय की कोई भी पुस्तक ले लीजिए , यहां भी पुस्तक के चयन में आपकी मर्जी है । उस पुस्तक का कोई भी टॉपिक वाला अध्याय खोलिए , यहां टॉपिक चयन में भी आपकी मर्जी है ।

उस टॉपिक ( विषय ) पर आपको विभिन्न प्रसिद्ध विद्वानों के विचार मिलेंगे । कहीं समानता नहीं मिलेगी विचारों में । आपस में जबरदस्त वैचारिक मतभेद मिलेगा हर विषय पर । लड़ते मिलेंगे । एक दूसरे के सिद्धांत की आलोचना करेंगे । भविष्य के नए विशेषज्ञ पुराने विद्वानों की सारी थ्यूरी को नकार देंगे । आश्चर्य है कि अंत में सबके विचारों को सुनने के बाद मजबूर होकर पुस्तक का लेखक उस खास टॉपिक पर एक सर्वसम्मति वाली परिभाषा निश्चित करेगा । यह हास्यास्पद भी है क्योंकि अंत में पुस्तक लेखक के निर्णय को पढ़कर ऐसा लगता है कि राइटर उन सब विद्वानों से श्रेष्ठ है ।

उधर पौने दो अरब सालों से इस पृथ्वी पर अरबों ऋषि हुए हैं । हर विषय पर मोटे-मोटे शास्त्रों का एक पूरा व्यवस्थित ढांचा है , शाखाएं और उपशाखाएँ हैं । हजारों व्यवस्थित शास्त्र हैं , उसके बावजूद भी अरबों ऋषियों में से एक भी ऋषि ऐसा न हुआ जिसने किसी दूसरे ऋषि से भिन्न व्याख्या की हो किसी एक विषय पर । कहीं रत्तीभर भी मतभेद नहीं । कोई मतभेद का प्रश्न ही नहीं । किसी भी शास्त्र की कोई पंक्ति, कोई शब्द, और कहीं कोमा या फुलस्टॉप का भी अंतर नहीं ( जर्मन से मंगवाए वेदों में से ऋग्वेद में दो शब्दों में व सामवेद के एक शब्द में किसी ने लिखते समय छपाई में कोई मात्रा में गलती कर दी थी जिसे विद्वानों ने तुरंत पहचान कर ठीक कर दिया था अभी कुछ साल पहले ) यह भी ध्यान रहे कि यह सार्वभौमिक सत्य है कि अरबों ऋषियों में कोई डील , कोई कोम्प्रोमाईज़ सम्भव नहीं हो सकता फिर भी विचारों में साम्यता है । कल्पना कीजिये कोई ऋषि दूर गंगोत्री की किसी गुफा में साधनारत है और कन्द-मूल खाकर रहता है , क्या उसे कोई खरीद सकता है ? क्या उसे कोई रिश्वत दे सकता है ?

अंग्रेजी राज के खिलाफ जब भारत में असहयोग आंदोलन चल रहे थे तो भारत के किसी बड़े अधिकारी को लंदन की पार्लियामेंट में यह टिप्स दिया गया कि आंदोलन के नेताओं को बड़ा लालच देकर खरीद लो तो उस अधिकारी ने महाऋषि अरविंद घोष के बारे में बताया कि वे एक लंगोटी मात्र में रहते हैं और दो रोटी खाते हैं , उन्हें पूरी पृथ्वी का राज्य भी दे दो तो भी वे एक लंगोटी में ही रहेंगे और दो रोटी ही खाएंगे , ऐसे अजीब लोगों को संसार में कोई नहीं खरीद सकता और ऐसे लोग केवल भारत में ही पाए जाते हैं ।

हमारे विश्वविद्यालयों में जिन पश्चमी विद्वानों की पुस्तकें , सिद्धांत और थ्यूरी पढाई जाती है वे विद्वान वास्तव में भारतीय सन्दर्भों में देखा जाए तो इसमें से कई तो विद्यार्थी होने की योग्यता भी नहीं रखते ।

साभार – विवेक समानिया, प्रशिक्षक,अन्तर्राष्ट्रीय वुशु टीम, भारत