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नवदुर्गा*- एक स्त्री के पूरे जीवनचक्र का बिम्ब है नवदुर्गा के नौ स्वरूप !

  1. जन्म ग्रहण करती हुई कन्या “शैलपुत्री” स्वरूप है !
  2. कौमार्य अवस्था तक “ब्रह्मचारिणी” का रूप है !

  3. विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल होने से वह “चंद्रघंटा” समान है !

  4. नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने पर वह “कूष्मांडा” स्वरूप है !

  5. संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री “स्कन्दमाता” हो जाती है !

  6. संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री “कात्यायनी” रूप है !

  7. अपने संकल्प से पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से वह “कालरात्रि” जैसी है !

  8. संसार (कुटुंब ही उसके लिए संसार है) का उपकार करने से “महागौरी” हो जाती है !

9 धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले संसार मे अपनी संतान को सिद्धि (समस्त सुख-संपदा) का आशीर्वाद देने वाली “सिद्धिदात्री” हो जाती है !
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एस एन व्यास

जानिए मां दुर्गा के दिव्यास्त्र किस बात का हैं प्रतीक

शक्ति की अधिष्ठात्री देवी की संरचना तमाम देवीदेवताओं की संचित शक्ति के द्वारा हुई है. जिस तरह तमाम नदियों के संचित जल से समुद्र बनता है, उसी तरह भगवती दुर्गा विभिन्न देवी देवताओं के शक्ति समर्थन से महान बनी हैं. देवताओं ने मां दुर्गा को दिव्यास्त्र प्रदान किये.
इस आद्याशक्ति को शिव ने त्रिशूल, विष्णु ने चक्र, वरुण ने शंख, अग्नि ने शक्ति, वायु ने धनुष बाण, इन्द्र ने वज्र और यमराज ने गदा देकर अजेय बनाया. दूसरे देवताओं ने मां दुर्गा को उपहार स्वरूप हार चूड़ामणि, कुंडल, कंगन, नुपूर, कण्ठहार आदि तमाम आभूषण दिए. हिमालय ने विभिन्न रत्न और वाहन के रूप में सिंह भेंट किया.

1.शंख
दुर्गा मां के हाथ में शंख प्रणव का या रहस्यवादी शब्द ‘ओम’ का प्रतीक है जो स्वयं भगवान को उनके हाथों में ध्वनि के रूप में होने का संकेत करता है.

2.धनुषबाण
धनुष बाण ऊर्जा का प्रतिनिधित्त्व करते हैं दुर्गा मां के एक ही हाथ में इन दोनों का होना इस बात का संकेत है कि मां ने ऊर्जा के सभी पहलुओं एवं गतिज क्षमता पर नियंत्रण प्राप्त किया हुआ है.

3.बिजली और वज्र
ये दोनों दृढ़ता के प्रतीक हैं. और दुर्गा मां के भक्तों को भी वज्र की भांति दृढ़ होना चाहिए जैसे बिजली और वज्र जिस भी वस्तु को छुती है उसे ही नष्ट एवं ध्वस्त कर देती है अपने को बिना क्षति पहुंचाए. इसी तरह माता के भक्तों को भी अपने पर विश्वास करके किसी भी कठिन से कठिन कार्य पर खुद को क्षति पहुंचाए बिना करना चाहिए

4.कमल के फूल
माता के हाथ में जो कमल का फूल है वह पूर्ण रूप से खिला हुआ नहीं है इससे तात्पर्य है कि कमल सफलता का प्रतीक तो है परन्तु सफलता निश्चित नहीं है. कमल का एक पर्यायवाची पंकज भी है अर्थात् संसार में कीचड़ के बीच भक्तों की आध्यात्मिक गुणवत्ता के सतत् विकास के लिए खड़ा है कमल.

5.सुदर्शन चक्र
सुदर्शन चक्र जो दुर्गा मां की तर्जनी के चारों ओर घूम रहा है. बिना उनकी अंगुली को छुए हुए यह प्रतीक है इस बात का कि पूरा संसार मां दुर्गा की इच्छा के अधीन है और उन्हीं के आदेश पर चल रहा है. माता इस तरह के अमोघ अस्त्रशस्त्र इसलिए प्रयोग करती हैं ताकि दुनिया से अधर्म, बुराई और दुष्टों का नाश हो सके और सभी समान रूप से खुशहाली से जी सकें.

6.तलवार
तलवार जो दुर्गा मां ने अपने हाथों में पकड़ी हुई है वह ज्ञान की प्रतीक है वह ज्ञान जो तलवार की धार की तरह तेज एवं पूर्ण हो. वह ज्ञान जो सभी शंकाओं से मुक्त हो तलवार की चमक का प्रतीक माना जाता है.

  1. त्रिशूल
    मां दुर्गा का त्रिशूल अपने आप में तीन गुण समाए हुए हैं. यह सत्व, रजस एवं तमस गुणों का प्रतीक है. और वह अपने त्रिशुल से तीनों दुखों का निवारण करती हैं चाहे वह शारीरिक हो, चाहे मानसिक हो या फिर चाहे आध्यात्मिक हो.

8.सिंह सवारी
मां दुर्गा शेर पर एक निडर मुद्रा में बैठी हैं जिसे अभयमुद्रा कहा जाता है जो संकेत है डर से स्वतंत्रता का, जगत की मां दुर्गा अपने सभी भक्तों को बस इतना ही कहती हैं, अपने सभी अच्छे बुरे कार्यों एवं कत्र्तव्यों को मुझ पर छोड़ दो और मुक्त हो जाओ अपने डर से अपने भय से.।

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कन्या पूजन क्यों जरूरी है? कन्या पूजन की विधि
नवरात्रि पूजन से जुड़ी कई परंपराएं हैं, जैसे कन्या पूजन. शिवपुराण में एक प्रसंग है कि माता पार्वती जब आठ वर्ष की थीं तो एक बार उनके पिता और पर्वतराज हिमवान साथ लेकर शिवजी की सेवा में प्रस्तुत हुए.

हिमवान को नारदजी ने बता दिया था कि भगवती ने आपके घर में अवतार लिया है और इनका विवाह शिवजी से ही होना है. जब शिवजी ने हिमवान के साथ बालिका गौरी को देखा तो कौतुक किया.

उन्होंने हिमवान से कहा कि आप प्रतिदिन मेरे दर्शन को आ सकते हैं परंतु यह बालिका नहीं आए सकती. माता ने बड़े मृदु स्वरों में शिवजी के साथ तर्कपूर्ण रूप से प्रकृति और पुरूष का संबंध बताया जिससे शिवजी प्रसन्न हुए और माता को सेवा का अवसर प्रदान किया.

कुंआरी कन्याएं माता के समान ही पवित्र और पूजनीय मानी जाती हैं. इसलिए नवरात्रि में जब माता की विशेष आराधना की जाती है उस दौरान कन्या पूजन की विशेष रूप से मान्यता दी गई हैं.

कन्या पूजन की मंत्र सहित संक्षिप्त विधिः

दो वर्ष से लेकर दस वर्ष की कन्याएं साक्षात माता का स्वरूप मानी जाती हैं. यही कारण है कि इसी उम्र की कन्याओं के पैरों का विधिवत पूजन कर भोजन कराया जाता है. माना जाता है कि होम जप और दान से देवी जितनी प्रसन्न होतीं हैं उतनी ही प्रसन्नता माता को कन्या पूजन से होती है.

कन्याओं के विधिवत, सम्मानपूर्वक माता की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति के हृदय से भय दूर हो जाता है. उसके मार्ग में आने वाली सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं. उस पर मां की कृपा से कोई संकट नहीं आता.

नवरात्र में कन्या पूजन के लिए जिन कन्याओं का चयन करें उनकी आयु दो वर्ष से कम न हो और दस वर्ष से ज्यादा भी न हो. एक वर्ष या उससे छोटी कन्याओं की पूजा नहीं करनी चाहिए क्योंकि एक वर्ष से छोटी कन्याएं प्रसाद नहीं खा सकतीं.

उन्हें प्रसाद-पूजन आदि का ज्ञान नहीं होता. इसलिए शास्त्रों में दो से दस वर्ष की आयु की कन्याओं का पूजन करना ही श्रेष्ठ माना गया है. कन्याओँ के साथ एक बालक भी रखना चाहिए. वह भैरव स्वरूप होता है.

नवरात्रि की सभी तिथियों को एक-एक कन्या और नवमी को नौ कन्याओं के विधिवत पूजन का विधान है. यदि नौ नहीं कर पाते तो सात पांच या तीन कन्याओं की पूजा करें. संख्या विषम ही होनी चाहिए.

कन्याओं पर जल छिड़कर रोली-अक्षत का तिलक लगाएं. फिर आरती उतारें. आरती के बाद भोजन कराना चाहिए फिर पैर छूकर उन्हें यथाशक्ति दान देकर विदा करना चाहिए. पूजन के समय निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करना चाहिए.

मंत्रः
ऊँ मंत्राक्षरमयीं लक्ष्मीं मातृणां रूपधारिणीम्।
नवदुर्गा आत्मिकां साक्षात् कन्याम् आवाह्यम्।।

किस आयु की कन्या में माता का कौन सा रूपः

दो वर्ष की कन्या (कुमारी) के पूजन से प्रसन्न होकर माता दुख और दरिद्रता दूर करती हैं.

तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति का रूप माना जाता है. त्रिमूर्ति कन्या के पूजन से धन-धान्या आता है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है.

चार वर्ष की कन्या को कल्याणी स्वरूप माना जाता है. इसकी पूजा से परिवार में मंगलकार्य निर्विघ्न संपन्न होते हैं और सबका कल्याण होता है.

पांच वर्ष की कन्या को रोहिणी स्वरूप कहा जाता है. रोहिणी को पूजने वाला मनुष्य स्वयं रोगमुक्त रहता है और उसका परिवार भी प्रसन्न रहता है.

छह वर्ष की कन्या को कालिका रूप माना गया है. कालिका रूप से विद्या, विजय, राजयोग की प्राप्ति होती है.

सात वर्ष की कन्या का रूप चंडिका का कहा गया है. चंडिका रूप का पूजन करने से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है.

आठ वर्ष की कन्या शाम्भवी कहलाती हैं. इसका पूजन करने से व्यक्ति में वाक-पटुता आती है और वाद-विवाद में विजय प्राप्त होती है.

नौ वर्ष की कन्या साक्षात दुर्गा कहलाती हैं. इसका पूजन करने से शत्रुओं का नाश होता है तथा उसके असाध्य कार्य पूर्ण होते हैं.

दस वर्ष की कन्या सुभद्रा कहलाती है. सुभद्रा अपने भक्तों के सारे मनोरथ पूर्ण करती हैं. सुभद्रा अपने भक्तों के सारे मनोरथ पूर्ण करती है.

जय माँ दुर्गा …..
जय माता दी ….
हर हर महादेव ….
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संजय गुप्ता

शरद पूर्णिमा की रात को क्यों करते हैं खीर का सेवन, ये है इसका रहस्य

शरद पूर्णिमा हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इस बार शरद पूर्णिमा व कोजागरी पूर्णिमा शनिवार 15 अक्टूबर को मनाई जाएगी।

शरद पूर्णिमा को चंद्रमा पूर्ण सोलह कलाओं से युक्त होता है, इसीलिए श्रीकृष्ण ने महारास लीला के लिए इस रात्रि को चुना था। इस रात चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है और मां लक्ष्मी पृथ्वी पर आती हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह रात्रि स्वास्थ्य व सकारात्मकता प्रदान करने वाली मानी जाती है। हिन्दू धर्मशास्त्र में वर्णित कथाओं के अनुसार देवी-देवताओं के अत्यंत प्रिय पुष्प ब्रह्मकमल भी इसी दिन खिलता है।

कृष्ण भगवान ने की थी महारास लीला

शरद पूर्णिमा को चंद्रमा पूर्ण सोलह कलाओं से युक्त होता है, इसीलिए श्रीकृष्ण ने महारास लीला के लिए इस रात्रि को चुना था। इस रात चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है और मां लक्ष्मी पृथ्वी पर आती हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह रात्रि स्वास्थ्य व सकारात्मकता प्रदान करने वाली मानी जाती है। मन इन्द्रियों का निग्रह कर अपनी शुद्ध अवस्था में आ जाता है। मन निर्मल एवं शांत हो जाता है, तब आत्मसूर्य का प्रकाश मनरूपी चन्द्रमा पर प्रकाशित होने लगता है।

आयुर्वेद में शरद पूर्णिमा इस पूर्णिमा पर दूध और चावल मिश्रित खीर पर चन्द्रमा की किरणों को गिरने के लिए रख देते हैं। चन्द्रमा तत्व एवं दूध पदार्थ समान ऊर्जा धर्म होने के कारण दूध अपने में चन्द्रमा की किरणों को अवशोषित कर लेता है।

मान्यता के अनुसार उसमें अमृत वर्षा हो जाती है और खीर को खाकर अमृतपान का संस्कार पूर्ण करते हैं। आयुर्वेद में भी शरद ऋतु का वर्णन किया गया है। इसके अनुसार शरद में दिन बहुत गर्म और रात बहुत ठंडी होती हैं। इस ऋतु में पित्त या एसिडिटी का प्रकोप ज्यादा होता है। जिसके लिए ठंडे दूध और चावल को खाना अच्छा माना जाता है।

— आयुर्वेद की परंपरा में शीत ऋतु में गर्म दूध का सेवन अच्छा माना जाता है। ऐसा कह सकते हैं कि इसी दिन से रात में गर्म दूध पीने की शुरुआत की जानी चाहिए। वर्षा ऋतु में दूध का सेवन वर्जित माना जाता है। आध्यात्मिक पक्ष इस प्रकार होता है कि जब मानव अपनी इन्द्रियों को वश में कर लेता है तो उसकी विषय-वासना शांत हो जाती है, मन इन्द्रियों का निग्रह कर अपनी शुद्ध अवस्था में आ जाता है। मन निर्मल एवं शांत हो जाता है, तब आत्मसूर्य का प्रकाश मनरूपी चन्द्रमा पर प्रकाशित होने लगता है।

— पौराणिक मान्यताओ के अनुसार धवल चांदनी में मां लक्ष्मी पृथ्वी भ्रमण के लिए आती हैं। शास्त्रों के अनुसार शरद पूर्णिमा की मध्य रात्रि के बाद मां लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर बैठकर धरती के मनोहर दृश्य का आनंद लेती हैं।

साथ ही माता यह भी देखती हैं कि कौन भक्त रात में जागकर उनकी भक्ति कर रहा है। इसलिए शरद पूर्णिमा की रात को कोजागरा भी कहा जाता है। कोजागरा का शाब्दिक अर्थ है कौन जाग रहा है। मान्यता है कि जो इस रात में जगकर मां लक्ष्मी की उपासना करते हैं मां लक्ष्मी की उन पर कृपा होती है। शरद पूर्णिमा के विषय में ज्योतिषीय मत है कि जो इस रात जगकर लक्ष्मी की उपासना करता है उनकी कुण्डली में धन योग नहीं भी होने पर माता उन्हें धन-धान्य से संपन्न कर देती हैं।

— कार्तिक मास का व्रत भी शरद पूर्णिमा से ही प्रारंभ होता है। पूरे माह पूजा-पाठ और स्नान-परिक्रमा का दौर चलता है।

— पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों संग महारास रचाया था। इसलिए इसे ‘रास पूर्णिमा’ भी कहा जाता है।

— शरद पूर्णिमा को दिन में 10 बजे पीपल के सात परिक्रमा करनी चाहिए इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती है।

— शरद पूर्णिमा को ध्वल चांदनी में जप-तप करने से कई रोगों से छुटकारा मिलता है।

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संजय गुप्ता

🙏🙏🙏जय माता दी 🙏🙏🙏
9 दिन भोग क्या लगाए देवियों को

नौ दिन के इस त्योहार में, नौ देवियों को नौ अलग-अलग भोग लगाएं जाते हैं। आज हम आपको मां के इसी 9 भोग के बारे में बताने जा रहे हैं। आप भी जानिए किस मां को क्या लगाते हैं

  1. घी से होती है शरूआत
    नवरात्र का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित होता है। मान्यता है कि हिमालय राज की पुत्री मां शैलपुत्री को सफेद रंग काफी पसंद होता है। इसी के चलते मां को घी को भोग और घी का ही दिया जलाया जाता है। आप भी नवरात्र के पहले दिन की शुरूआत देशी घी का भोग लगाकर ही करें।

  2. शक्कर सी मीठी ब्रह्मचारिणी
    नवरात्र का दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित होता है। लंबी उम्र की कामना के साथ मां को ब्रह्मचारिणी को शक्कर का भोग लगाया जाता है। आप इस दिन मां को सफेद शक्कर, मिसरी या सफेद मिठाई का भोग लगा सकते हैं।

  3. चंद्रघंटा को पसंद है दूध
    नवरात्र के तीसरे दिन हम मां के जिस रूप की पूजा करते हैं उसे चंद्रघंटा कहा जाता है। मां चंद्रघंटा को दूध पसंद है। यही कारण है कि नवरात्र के तीसरे दिन आपको मां चंद्रघंटा को दूध का भोग लगाना चाहिए। आप चाहें तो दूध से बनी मिठाइयां या व्यंजन मां को भोग में लगा सकते हैं।

  4. मालपुआ से खुश हो जाएगी मां कुष्मांडा
    नवरात्र का चौथा दिन मां कुष्मांडा को समर्पित होता है। इस दिन मां से मानसिक क्षमता में वृद्धि और निर्णय लेने की प्रर्थना की जाती है। मां कुष्मांडा को मालपुआ काफी पसंद है। यही वजह है कि इस दिन मां को मालपुए का भोग लगाया जाता है। आप भी इस दिन मालपुआ का भोग मां को लगाकर उन्हें प्रसन्न कर सकते हैं।

  5. स्कंदमाता को केले का भोग
    नवरात्र के पांचवे दिन यानी पंचमी को स्कंदमाता के स्वरूप को पूजा जाता है। इस दिन माता को केले का भोग लगाना शुभ माना जाता है। मान्यता ये भी है कि केले का भोग लगाने से मां की कृपा होती है और सभी शारीरिक कष्ट दूर होते हैं।

  6. कात्यानी देवी होंगी शहद से खुश
    नवरात्र के छठे दिन मां कात्यानी की पूजा होती है। इस दिन मां कात्यानी को शहद का भोग लगाया जाता है। इस दिन मां के स्वरूप को शहद का भोग लगाया जाता है। अगर आपके पास शहद नहीं है तो इस दिन शुद्ध घी या मीठी दही का भी भोग लगा सकते हैं।

  7. गुड़ दिलाएंगा मां कालरात्रि का आशिर्वाद
    नवरात्र के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। इस दिन मां को गुड़ का भोग लगाया जाता है। इसके साथ ही पान के पत्ते पर कपूर, लौंग का भोग भी आप कालरात्रि मां को लगा सकते हैं।

  8. आठवें दिन नारियल
    नवरात्र के आठवें यानी अष्टमी को नारियल का भोग लगाया जाता है। ध्यान रखिए कि इस नारियल में पानी होना चाहिए। ब्राह्मणों में भी इस दिन नारियल चढ़ाने की खास परंपरा होती है।

  9. सिद्धदात्रि के दिन अनार
    वैसे तो आप मां को फल चढ़ा सकते हैं लेकिन नवराक्ष के आखिरी दिन यानी सिद्धदात्रि के दिन मां को अनार का भोग लगाना चाहिए। इसके अलवा आप इस दिन सफेद तिल के लड्डू का भोग भी लगा सकते हैं। आप चाहें तो चावल की खीर भी भोग के रूप में बना सकते हैं।

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हजारों वर्ष पुराना पृथ्वी का #मानचित्र विज्ञान


साधारणतया देखने पर प्रतीत होता है पीपल का पत्र और खरगोश….
किन्तु ये साधारण नहीं अपितु असाधारण विज्ञान है…
जो हमारे ऋषियों के पास था….

आज से पाँच हजार वर्ष से पूर्व ही #महर्षि_वेदव्यास जी ने सम्पूर्ण पृथ्वी का भौगोलिक मानचित्र पूरी दुनिया के समक्ष रख दिया…

#महाभारत मे कहा “यह पृथ्वी चन्द्रमण्डल से देखने पर दो अंशों मे खरगोश जैसी और दो अंशों मे पिप्पल (पत्तों) के रूप मे दिखाई देती है…”

महाभारत के #भीष्म_पर्व मे वेदव्यास जी कहते हैं…

” सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन |
परिमण्डलो महाराज द्वीपोअसौ चक्रसंस्थित: ||
यथा हि पुरुष: पश्येदादर्शे मुखमात्मन:
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान ||

अर्थात् – हे #कुरुनन्दन सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भांति गोलाकार स्थित है….
जैसे पुरुष दर्पण मे अपना मुख देखता है उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल से दिखाई देता है..

इसके दो अंशों मे पिप्पल और दो अंशों मे महान खरगोश दिखाई देता है…

महाभारत मे कहे गये इस मानचित्र को ११वीं सदी मे #रामानुजाचार्य जी ने पढ़ने के पश्चात बनाया था….

हमारे ऋषि सम्पूर्ण सृष्टि विज्ञान से अवगत थे…
इसमे कोई संशय नहीं….

किन्तु हमने ऋषियों और वेदों को समझना छोड़कर पश्चिम की ओर भागने लगे….
जो कि समस्त विज्ञान #भारत से ही लेकर
सबको अपनी खोज बता रहे है….

हमें झूठ पढ़ाया जाता है कि ग्रहों की गति का पता सबसे पहले #कैपलर ने आज से ५५० वर्ष पूर्व बताया, ..गुरूत्व शक्ति का पता #न्यूटन ने सबसे पहले बताया…

तो फिर महर्षि #कणाद ने वेद मन्त्रों से लेकर ईसा के जन्म से हजारों वर्ष पहले #संयोगाभावे #गुरूत्वात्पतनम् ओर #संस्काराभावे #गुरूत्वात्पतनम्! कब बताया???

वैशैषिक दर्शन में तब से लिख रखा है जब इन तथाकथित सभ्य #देशों का अस्तित्व भी न था।

हमने तब यह सब आधुनिक #आविष्कार क्यों न किये???

क्योंकि #ऋषियों को मालूम था परिणाम,और आवश्यकता नहीं थी इन प्रकृति #विनाशकारी विज्ञान #साधनों की,

जो उन्हें आवश्यक होता था वह #प्रकृति रक्षा के साथ ही आविष्कार कर लेते थे।

तेन त्यक्तेन भुंजीथा.. विलासिता नहीं चाहिए थी
#शान्ति आनन्द #निर्भयता व स्वतन्त्रता लक्ष्य था उनका..भोगवाद नहीं…

आज आवश्यकता है पुनः अपने महापुरुषों के #विज्ञान को समझने की और वेदों की ओर लौटने की ..

फिर सम्पूर्ण #विज्ञान व #अध्यात्म के रहस्य हमारे पास होंगे….
और भारत बनेगा पुनः महा शक्तिशाली,परम वैभवशाली #विश्वगुरू…

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राजा विक्रमादित्य के नवरत्न 


राजा विक्रमादित्य के नवरत्न

राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों के विषय में बहुत कुछ पढ़ा-देखा जाता है। लेकिन बहुत ही कम लोग ये जानते हैं कि आखिर ये नवरत्न थे कौन-कौन।

राजा विक्रमादित्य के दरबार में मौजूद नवरत्नों में उच्च कोटि के कवि, विद्वान, गायक और गणित के प्रकांड पंडित शामिल थे, जिनकी योग्यता का डंका देश-विदेश में बजता था। चलिए जानते हैं कौन थे।

ये हैं नवरत्न –

1–धन्वन्तरि-
नवरत्नों में इनका स्थान गिनाया गया है। इनके रचित नौ ग्रंथ पाये जाते हैं। वे सभी आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र से सम्बन्धित हैं। चिकित्सा में ये बड़े सिद्धहस्त थे। आज भी किसी वैद्य की प्रशंसा करनी हो तो उसकी ‘धन्वन्तरि’ से उपमा दी जाती है।

2–क्षपणक-
जैसा कि इनके नाम से प्रतीत होता है, ये बौद्ध संन्यासी थे।
इससे एक बात यह भी सिद्ध होती है कि प्राचीन काल में मन्त्रित्व आजीविका का साधन नहीं था अपितु जनकल्याण की भावना से मन्त्रिपरिषद का गठन किया जाता था। यही कारण है कि संन्यासी भी मन्त्रिमण्डल के सदस्य होते थे।
इन्होंने कुछ ग्रंथ लिखे जिनमें ‘भिक्षाटन’ और ‘नानार्थकोश’ ही उपलब्ध बताये जाते हैं।

3–अमरसिंह-
ये प्रकाण्ड विद्वान थे। बोध-गया के वर्तमान बुद्ध-मन्दिर से प्राप्य एक शिलालेख के आधार पर इनको उस मन्दिर का निर्माता कहा जाता है। उनके अनेक ग्रन्थों में एक मात्र ‘अमरकोश’ ग्रन्थ ऐसा है कि उसके आधार पर उनका यश अखण्ड है। संस्कृतज्ञों में एक उक्ति चरितार्थ है जिसका अर्थ है ‘अष्टाध्यायी’ पण्डितों की माता है और ‘अमरकोश’ पण्डितों का पिता। अर्थात् यदि कोई इन दोनों ग्रंथों को पढ़ ले तो वह महान् पण्डित बन जाता है।

4–शंकु –
इनका पूरा नाम ‘शङ्कुक’ है। इनका एक ही काव्य-ग्रन्थ ‘भुवनाभ्युदयम्’ बहुत प्रसिद्ध रहा है। किन्तु आज वह भी पुरातत्व का विषय बना हुआ है। इनको संस्कृत का प्रकाण्ड विद्वान् माना गया है।

5–वेतालभट्ट –
विक्रम और वेताल की कहानी जगतप्रसिद्ध है। ‘वेताल पंचविंशति’ के रचयिता यही थे, किन्तु कहीं भी इनका नाम देखने सुनने को अब नहीं मिलता। ‘वेताल-पच्चीसी’ से ही यह सिद्ध होता है कि सम्राट विक्रम के वर्चस्व से वेतालभट्ट कितने प्रभावित थे। यही इनकी एक मात्र रचना उपलब्ध है।

6–घटखर्पर –
जो संस्कृत जानते हैं वे समझ सकते हैं कि ‘घटखर्पर’ किसी व्यक्ति का नाम नहीं हो सकता। इनका भी वास्तविक नाम यह नहीं है। मान्यता है कि इनकी प्रतिज्ञा थी कि जो कवि अनुप्रास और यमक में इनको पराजित कर देगा उनके यहां वे फूटे घड़े से पानी भरेंगे। बस तब से ही इनका नाम ‘घटखर्पर’ प्रसिद्ध हो गया और वास्तविक नाम लुप्त हो गया।

इनकी रचना का नाम भी ‘घटखर्पर काव्यम्’ ही है। यमक और अनुप्रास का वह अनुपमेय ग्रन्थ है।
इनका एक अन्य ग्रन्थ ‘नीतिसार’ के नाम से भी प्राप्त होता है।

7–कालिदास –
ऐसा माना जाता है कि कालिदास सम्राट विक्रमादित्य के प्राणप्रिय कवि थे। उन्होंने भी अपने ग्रन्थों में विक्रम के व्यक्तित्व का उज्जवल स्वरूप निरूपित किया है। कालिदास की कथा विचित्र है। कहा जाता है कि उनको देवी ‘काली’ की कृपा से विद्या प्राप्त हुई थी। इसीलिए इनका नाम ‘कालिदास’ पड़ गया। संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से यह कालीदास होना चाहिए था किन्तु अपवाद रूप में कालिदास की प्रतिभा को देखकर इसमें उसी प्रकार परिवर्तन नहीं किया गया जिस प्रकार कि ‘विश्वामित्र’ को उसी रूप में रखा गया।

जो हो, कालिदास की विद्वता और काव्य प्रतिभा के विषय में अब दो मत नहीं है। वे न केवल अपने समय के अप्रितम साहित्यकार थे अपितु आज तक भी कोई उन जैसा अप्रितम साहित्यकार उत्पन्न नहीं हुआ है। उनके चार काव्य और तीन नाटक प्रसिद्ध हैं। शकुन्तला उनकी अन्यतम कृति मानी जाती है।

8–वराहमिहिर –
भारतीय ज्योतिष-शास्त्र इनसे गौरवास्पद हो गया है। इन्होंने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया है। इनमें-‘बृहज्जातक‘, ‘बृहस्पति संहिता’, ‘पंचसिद्धान्ती’ मुख्य हैं। गणक तरंगिणी’, ‘लघु-जातक’, ‘समास संहिता’, ‘विवाह पटल’, ‘योग यात्रा’, आदि-आदि का भी इनके नाम से उल्लेख पाया जाता है।

9–वररुचि-
कालिदास की भांति ही वररुचि भी अन्यतम काव्यकर्ताओं में गिने जाते हैं। ‘सदुक्तिकर्णामृत’, ‘सुभाषितावलि’ तथा ‘शार्ङ्धर संहिता’, इनकी रचनाओं में गिनी जाती हैं।
इनके नाम पर मतभेद है। क्योंकि इस नाम के तीन व्यक्ति हुए हैं उनमें से-
1.पाणिनीय व्याकरण के वार्तिककार-वररुचि कात्यायन,
2.‘प्राकृत प्रकाश के प्रणेता-वररुचि
3.सूक्ति ग्रन्थों में प्राप्त कवि-वररुचि

राजा विक्रमादित्य के नवरत्न

रा