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કન્યાદાન નો મતલબ

કન્યાદાન મતલબ દિકરી નું દાન નહીં પરંતું ગોત્રદાન થાય છે.

કન્યા પિતા નું ગોત્ર છોડી પતિ ના ગોત્ર માં પ્રવેશ કરે છે.

એક પિતા પુત્રી ને એના ગોત્ર માંથી વિદાય આપે છે
અને
દિકરી પિતા ના ગોત્ર માંથી વિદાઇ લઇ પતિ ના ગોત્ર માં પ્રવેશ કરે છે…
અને
પિતા પોતાનું ગોત્ર અગ્નિ માં દાન કરે છે …
અને
પતિ અગ્નિ ની શાક્ષી એ એનું ગોત્ર આપી એના ગોત્ર માં સ્વીકારે છે….
આ છે ખરો કન્યાદાન નો મતલબ.

કોઇ મા બાપ માટે પોતાની દિકરી વસ્તું નથી જે દાન આપે
પણ …કન્યાદાન નો સાચો મતલબ આ છે….

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((((((((( इक्यावन शक्तिपीठ )))))))))
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हिन्दू धर्म के पुराणों के अनुसार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आया। ये अत्यंत पावन तीर्थ कहलाये। ये पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर फैले हुए हैं।
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“शक्ति” अर्थात देवी दुर्गा , जिन्हें दाक्षायनी या पार्वती रूप में भी पूजा जाता है।
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“भैरव” अर्थात शिव के अवतार, जो देवी के स्वामी हैं।
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“अंग या आभूषण” अर्थात, सती के शरीर का कोई अंग या आभूषण, जो श्री विष्णु द्वारा सुदर्शन चक्र से काटे जाने पर पृथ्वी के विभिन्न स्थानों पर गिरा, आज वह स्थान पूज्य है और शक्तिपीठ कहलाता है।
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  1. किरीट कात्यायनी
    पश्चिम बंगाल के हुगली नदी के तट लालबाग कोट पर स्थित है किरीट शक्तिपीठ, जहां सती माता का किरीट यानी शिराभूषण या मुकुट गिरा था। यहां की शक्ति विमला अथवा भुवनेश्वरी तथा भैरव संवर्त हैं।
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    2 कात्यायनी कात्यायनी
    वृन्दावन, मथुरा के भूतेश्वर में स्थित है कात्यायनी वृन्दावन शक्तिपीठ जहां सती का केशपाश गिरा था। यहां की शक्ति देवी कात्यायनी हैं।
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    3 करवीर शक्तिपीठ
    महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का त्रिनेत्र गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव क्रोधशिश हैं। यहां महालक्ष्मी का निज निवास माना जाता है।
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    4 श्री पर्वत शक्तिपीठ
    इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतान्तर है कुछ विद्वानों का मानना है कि इस पीठ का मूल स्थल लद्दाख है, जबकि कुछ का मानना है कि यह असम के सिलहट में है जहां माता सती का दक्षिण तल्प यानी कनपटी गिरा था। यहां की शक्ति श्री सुन्दरी एवं भैरव सुन्दरानन्द हैं।
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    5 विशालाक्षी शक्तिपीठ
    उत्तर प्रदेश, वाराणसी के मीरघाट पर स्थित है शक्तिपीठ जहां माता सती के दाहिने कान के मणि गिरे थे। यहां की शक्ति विशालाक्षी तथा भैरव काल भैरव हैं।
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    6 गोदावरी तट शक्तिपीठ
    आंध्रप्रदेश के कब्बूर में गोदावरी तट पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का वामगण्ड यानी बायां कपोल गिरा था। यहां की शक्ति विश्वेश्वरी या रुक्मणी तथा भैरव दण्डपाणि हैं।
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    7 शुचीन्द्रम शक्तिपीठ
    तमिलनाडु, कन्याकुमारी के त्रिासागर संगम स्थल पर स्थित है यह शुची शक्तिपीठ, जहां सती के उफध्र्वदन्त (मतान्तर से पृष्ठ भागद्ध गिरे थे। यहां की शक्ति नारायणी तथा भैरव संहार या संकूर हैं।
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    8 पंच सागर शक्तिपीठ
    इस शक्तिपीठ का कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है लेकिन यहां माता का नीचे के दान्त गिरे थे। यहां की शक्ति वाराही तथा भैरव महारुद्र हैं।
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  2. ज्वालामुखी शक्तिपीठ
    हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां सती का जिह्वा गिरी थी। यहां की शक्ति सिद्धिदा व भैरव उन्मत्त हैं।
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  3. भैरव पर्वत शक्तिपीठ
    इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कुछ गुजरात के गिरिनार के निकट भैरव पर्वत को तो कुछ मध्य प्रदेश के उज्जैन के निकट क्षीप्रा नदी तट पर वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं, जहां माता का उफध्र्व ओष्ठ गिरा है। यहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण हैं।
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  4. अट्टहास शक्तिपीठ
    अट्टहास शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के लाबपुर में स्थित है। जहां माता का अध्रोष्ठ यानी नीचे का होंठ गिरा था। यहां की शक्ति पफुल्लरा तथा भैरव विश्वेश हैं।
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  5. जनस्थान शक्तिपीठ
    महाराष्ट्र नासिक के पंचवटी में स्थित है जन स्थान शक्तिपीठ जहां माता का ठुड्डी गिरी थी। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव विकृताक्ष हैं।
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  6. कश्मीर शक्तिपीठ
    जम्मू-कश्मीर के अमरनाथ में स्थित है यह शक्तिपीठ जहां माता का कण्ठ गिरा था। यहां की शक्ति महामाया तथा भैरव त्रिसंध्येश्वर हैं।
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  7. नन्दीपुर शक्तिपीठ
    पश्चिम बंगाल के सैन्थया में स्थित है यह पीठ, जहां देवी की देह का कण्ठहार गिरा था। यहां कि शक्ति निन्दनी और भैरव निन्दकेश्वर हैं।
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  8. श्री शैल शक्तिपीठ
    आंध्रप्रदेश के कुर्नूल के पास है श्री शैल का शक्तिपीठ, जहां माता का ग्रीवा गिरा था। यहां की शक्ति महालक्ष्मी तथा भैरव संवरानन्द अथव ईश्वरानन्द हैं।
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  9. नलहरी शक्तिपीठ
    पश्चिम बंगाल के बोलपुर में है नलहरी शक्तिपीठ, जहां माता का उदरनली गिरी थी। यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव योगीश हैं।
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  10. मिथिला शक्तिपीठ
    इसका निश्चित स्थान अज्ञात है। स्थान को लेकर मन्तारतर है तीन स्थानों पर मिथिला शक्तिपीठ को माना जाता है, वह है नेपाल के जनकपुर, बिहार के समस्तीपुर और सहरसा, जहां माता का वाम स्कंध् गिरा था। यहां की शक्ति उमा या महादेवी तथा भैरव महोदर हैं।
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  11. रत्नावली शक्तिपीठ
    इसका निश्चित स्थान अज्ञात है, बंगाज पंजिका के अनुसार यह तमिलनाडु के चेन्नई में कहीं स्थित है रत्नावली शक्तिपीठ जहां माता का दक्षिण स्कंध् गिरा था। यहां की शक्ति कुमारी तथा भैरव शिव हैं।
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  12. अम्बाजी शक्तिपीठ,
    प्रभास पीठ गुजरात गूना गढ़ के गिरनार पर्वत के प्रथत शिखर पर देवी अम्बिका का भव्य विशाल मन्दिर है, जहां माता का उदर गिरा था। यहां की शक्ति चन्द्रभागा तथा भैरव वक्रतुण्ड है। ऐसी भी मान्यता है कि गिरिनार पर्वत के निकट ही सती का उध्र्वोष्ठ गिरा था, जहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण है।
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  13. जालंध्र शक्तिपीठ
    पंजाब के जालंध्र में स्थित है माता का जालंध्र शक्तिपीठ जहां माता का वामस्तन गिरा था। यहां की शक्ति त्रिापुरमालिनी तथा भैरव भीषण हैं।
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  14. रामागरि शक्तिपीठ
    इस शक्ति पीठ की स्थिति को लेकर भी विद्वानों में मतान्तर है। कुछ उत्तर प्रदेश के चित्रकूट तो कुछ मध्य प्रदेश के मैहर में मानते हैं, जहां माता का दाहिना स्तन गिरा था। यहा की शक्ति शिवानी तथा भैरव चण्ड हैं।
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  15. वैद्यनाथ का हार्द शक्तिपीठ
    झारखण्ड के गिरिडीह, देवघर स्थित है वैद्यनाथ हार्द शक्तिपीठ, जहां माता का हृदय गिरा था। यहां की शक्ति जयदुर्गा तथा भैरव वैद्यनाथ है। एक मान्यतानुसार यहीं पर सती का दाह-संस्कार भी हुआ था।
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  16. वक्रेश्वर शक्तिपीठ
    माता का यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के सैिन्थया में स्थित है जहां माता का मन गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव वक्त्रानाथ हैं।
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  17. कण्यकाश्रम कन्याकुमारी
    तमिलनाडु के कन्याकुमारी के तीन सागरों हिन्द महासागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ीद्ध के संगम पर स्थित है कण्यकाश्रम शक्तिपीठ, जहां माता का पीठ मतान्तर से उध्र्वदन्त गिरा था। यहां की शक्ति शर्वाणि या नारायणी तथा भैरव निमषि या स्थाणु हैं।
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  18. बहुला शक्तिपीठ
    पश्चिम बंगाल के कटवा जंक्शन के निकट केतुग्राम में स्थित है बहुला शक्तिपीठ, जहां माता का वाम बाहु गिरा था। यहां की शक्ति बहुला तथा भैरव भीरुक हैं।
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  19. उज्जयिनी शक्तिपीठ
    मध्य प्रदेश के उज्जैन के पावन क्षिप्रा के दोनों तटों पर स्थित है उज्जयिनी शक्तिपीठ। जहां माता का कुहनी गिरा था। यहां की शक्ति मंगल चण्डिका तथा भैरव मांगल्य कपिलांबर हैं।
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  20. मणिवेदिका शक्तिपीठ
    राजस्थान के पुष्कर में स्थित है मणिदेविका शक्तिपीठ, जिसे गायत्री मन्दिर के नाम से जाना जाता है यहीं माता की कलाइयां गिरी थीं। यहां की शक्ति गायत्री तथा भैरव शर्वानन्द हैं।
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  21. प्रयाग शक्तिपीठ
    उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में स्थित है। यहां माता की हाथ की अंगुलियां गिरी थी। लेकिन, स्थानों को लेकर मतभेद इसे यहां अक्षयवट, मीरापुर और अलोपी स्थानों गिरा माना जाता है। तीनों शक्तिपीठ की शक्ति ललिता हैं।
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  22. विरजाक्षेत्रा, उत्कल
    उत्कल शक्तिपीठ उड़ीसा के पुरी और याजपुर में माना जाता है जहां माता की नाभि गिरा था। यहां की शक्ति विमला तथा भैरव जगन्नाथ पुरुषोत्तम हैं।
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  23. कांची शक्तिपीठ
    तमिलनाडु के कांचीवरम् में स्थित है माता का कांची शक्तिपीठ, जहां माता का कंकाल गिरा था। यहां की शक्ति देवगर्भा तथा भैरव रुरु हैं।
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  24. कालमाध्व शक्तिपीठ
    इस शक्तिपीठ के बारे कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है। परन्तु, यहां माता का वाम नितम्ब गिरा था। यहां की शक्ति काली तथा भैरव असितांग हैं।
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  25. शोण शक्तिपीठ
    मध्य प्रदेश के अमरकंटक के नर्मदा मन्दिर शोण शक्तिपीठ है। यहां माता का दक्षिण नितम्ब गिरा था। एक दूसरी मान्यता यह है कि बिहार के सासाराम का ताराचण्डी मन्दिर ही शोण तटस्था शक्तिपीठ है। यहां सती का दायां नेत्र गिरा था ऐसा माना जाता है। यहां की शक्ति नर्मदा या शोणाक्षी तथा भैरव भद्रसेन हैं।
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  26. कामरूप कामाख्या शक्तिपीठ कामगिरि असम गुवाहाटी के कामगिरि पर्वत पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का योनि गिरा था। यहां की शक्ति कामाख्या तथा भैरव उमानन्द हैं।
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  27. जयन्ती शक्तिपीठ
    जयन्ती शक्तिपीठ मेघालय के जयन्तिया पहाडी पर स्थित है, जहां माता का वाम जंघा गिरा था। यहां की शक्ति जयन्ती तथा भैरव क्रमदीश्वर हैं।
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  28. मगध् शक्तिपीठ
    बिहार की राजधनी पटना में स्थित पटनेश्वरी देवी को ही शक्तिपीठ माना जाता है जहां माता का दाहिना जंघा गिरा था। यहां की शक्ति सर्वानन्दकरी तथा भैरव व्योमकेश हैं।
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  29. त्रिस्तोता शक्तिपीठ
    पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी के शालवाड़ी गांव में तीस्ता नदी पर स्थित है त्रिस्तोता शक्तिपीठ, जहां माता का वामपाद गिरा था। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव ईश्वर हैं।
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  30. त्रिपुरी सुन्दरी शक्तित्रिपुरी पीठ त्रिपुरा के राध किशोर ग्राम में स्थित है त्रिपुरे सुन्दरी शक्तिपीठ, जहां माता का दक्षिण पाद गिरा था। यहां की शक्ति त्रिापुर सुन्दरी तथा भैरव त्रिपुरेश हैं।
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  31. विभाष शक्तिपीठ
    पश्चिम बंगाल के मिदनापुर के ताम्रलुक ग्रााम में स्थित है विभाष शक्तिपीठ, जहां माता का वाम टखना गिरा था। यहां की शक्ति कापालिनी, भीमरूपा तथा भैरव सर्वानन्द हैं।
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  32. देवीकूप पीठ कुरुक्षेत्र (शक्तिपीठ)
    हरियाणा के कुरुक्षेत्र जंक्शन के निकट द्वैपायन सरोवर के पास स्थित है कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ, जिसे श्रीदेवीकूप भद्रकाली पीठ के नाम से मान्य है। माता का दहिने चरण गुल्पफद्ध गिरे थे। यहां की शक्ति सावित्री तथा भैरव स्थाणु हैं।
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  33. युगाद्या (क्षीरग्राम शक्तिपीठ)
    पश्चिम बंगाल के बर्दमान जिले के क्षीरग्राम में स्थित है युगाद्या शक्तिपीठ, यहां सती के दाहिने चरण का अंगूठा गिरा था।
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  34. विराट का अम्बिका शक्तिपीठ
    राजस्थान के गुलाबी नगरी जयपुर के वैराटग्राम में स्थित है विराट शक्तिपीठ, जहां माता का दक्षिण पादांगुलियां गिरी थीं। यहां की शक्ति अंबिका तथा भैरव अमृत हैं।
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  35. काली शक्तिपीठ
    पश्चिम बंगाल, कोलकाता के कालीघाट में कालीमन्दिर के नाम से प्रसिध यह शक्तिपीठ, जहां माता के दाएं पांव की अंगूठा छोड़ 4 अन्य अंगुलियां गिरी थीं। यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव नकुलेश हैं।
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  36. मानस शक्तिपीठ
    तिब्बत के मानसरोवर तट पर स्थित है मानस शक्तिपीठ, जहां माता का दाहिना हथेली का निपात हुआ था। यहां की शक्ति की दाक्षायणी तथा भैरव अमर हैं।
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  37. लंका शक्तिपीठ
    श्रीलंका में स्थित है लंका शक्तिपीठ, जहां माता का नूपुर गिरा था। यहां की शक्ति इन्द्राक्षी तथा भैरव राक्षसेश्वर हैं। लेकिन, उस स्थान ज्ञात नहीं है कि श्रीलंका के किस स्थान पर गिरे थे।
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  38. गण्डकी शक्तिपीठ
    नेपाल में गण्डकी नदी के उद्गम पर स्थित है गण्डकी शक्तिपीठ, जहां सती के दक्षिणगण्ड (कपोल) गिरा था। यहां शक्ति गण्डकी´ तथा भैरवचक्रपाणि´ हैं।
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  39. गुह्येश्वरी शक्तिपीठ
    नेपाल के काठमाण्डू में पशुपतिनाथ मन्दिर के पास ही स्थित है गुह्येश्वरी शक्तिपीठ है, जहां माता सती के दोनों जानु (घुटने) गिरे थे। यहां की शक्ति महामाया´ और भैरवकपाल´ हैं।
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  40. हिंगलाज शक्तिपीठ
    पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान प्रान्त में स्थित है माता हिंगलाज शक्तिपीठ, जहां माता का ब्रह्मरन्ध्र गिरा था।
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  41. सुगंध शक्तिपीठ
    बांग्लादेश के खुलना में सुगंध नदी के तट पर स्थित है उग्रतारा देवी का शक्तिपीठ, जहां माता का नासिका गिरा था। यहां की देवी सुनन्दा है तथा भैरव त्रयम्बक हैं।
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  42. करतोयाघाट शक्तिपीठ
    बंग्लादेश भवानीपुर के बेगड़ा में करतोया नदी के तट पर स्थित है करतोयाघाट शक्तिपीठ, जहां माता का वाम तल्प गिरा था। यहां देवी अपर्णा रूप में तथा शिव वामन भैरव रूप में वास करते हैं।
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  43. चट्टल शक्तिपीठ
    बंग्लादेश के चटगांव में स्थित है चट्टल का भवानी शक्तिपीठ, जहां माता का दाहिना बाहु यानी भुजा गिरा था। यहां की शक्ति भवानी तथा भेरव चन्द्रशेखर हैं।
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  44. यशोरेश्वरी शक्तिपीठ
    बांग्लादेश के जैसोर खुलना में स्थित है जहां माता का बायीं हथेली गिरा था। यहां शक्ति यशोरेश्वरी तथा भैरव चन्द्र हैं।

देवी भागवत पुराण में 108, कालिकापुराण में छब्बीस, शिवचरित्र में इक्यावन, दुर्गा शप्तसती और तंत्रचूड़ामणि में शक्ति पीठों की संख्या 52 बताई गई है। साधारत: 51 शक्ति पीठ म~~~~~ (((((()))))))))) ~~~~~~

प्रकाश चंद्र शर्मा

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अंग्रेजी में ‘THE QUICK BROWN FOX JUMPS OVER A LAZY DOG’ एक प्रसिद्ध वाक्य है।

कहा जाता है कि इसमें अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर समाहित कर लिए गए , जबकि यदि हम ध्यान से देखे तो आप पायेंगे कि , अंग्रेजी वर्णमाला में कुल 26 अक्षर ही उपलब्ध हैं, जबकि उपरोक्त वाक्य में 33 अक्षर प्रयोग किये गए हैं, जिसमे चार बार O का प्रयोग A, E, U तथा R अक्षर के क्रमशः 2 बार प्रयोग दिख रहे हैं ।अपितु अक्षरों का क्रम भी सही नहीं है। आप किसी भी भाषा को उठा के देखिए, आपको कभी भी संस्कृत जितनी खूबसूरत और समृद्ध भाषा देखने को नहीं मिलेगी । संस्कृत वर्णमाला के सभी अक्षर एक श्लोक में व्यवस्थित क्रम में देखने को मिल जाएगा
क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोऽटौठीडढण:।
तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोऽरिल्वाशिषां सह।।

अनुवाद – पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का, दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सृजन कर्ता कौन? राजा मय कि जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।

संस्कृत भाषा वृहद और समृद्ध भाषा है, इसे ऐसे ही देववाणी नहीं कहा जाता है । आइये कुछ संस्कृत के श्लोकों को देखते हैं –

क्या किसी भाषा मे सिर्फ एक अक्षर से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है ??
जवाब है ,संस्कृत को छोड़कर अन्य किसी भाषा मे ऐसा करना असंभव है ।
उदाहरण –

न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु।
नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥

अनुवाद : हे नाना मुख वाले (नानानन)! वह निश्चित ही (ननु) मनुष्य नहीं है, जो अपने से कमजोर से भी पराजित हो जाऐ। और वह भी मनुष्य नहीं है (ना-अना) जो अपने से कमजोर को मारे (नुन्नोनो)। जिसका नेता पराजित न हुआ हो ,वह हार जाने के बाद भी अपराजित है (नुन्नोऽनुन्नो)। जो पूर्णतः पराजित को भी मार देता है (नुन्ननुन्ननुत्), वह पापरहित नहीं है (नानेना)।

उपरोक्त एक प्रचलित उदाहरण है ।चलिए अन्य को देखते हैं –

दाददो दुद्द्दुद्दादि दादादो दुददीददोः
दुद्दादं दददे दुद्दे ददादददोऽददः

अनुवाद :
दान देने वाले, खलों को उपताप देने वाले, शुद्धि देने वाले,
दुष्ट्मर्दक भुजाओं वाले, दानी तथा अदानी दोनों को दान देने वाले,
राक्षसों का खण्डन करने वाले ने, शत्रु के विरुद्ध शस्त्र को उठाया।

एक अन्य देखिए –
कः कौ के केककेकाकः काककाकाककः ककः।
काकः काकः ककः काकः कुकाकः काककः कुकः ॥
काककाक ककाकाक कुकाकाक ककाक क।
कुककाकाक काकाक कौकाकाक कुकाकक ॥

अनुवाद – परब्रह्म (कः) [श्री राम] पृथ्वी (कौ) और साकेतलोक (के) में [दोनों स्थानों पर] सुशोभित हो रहे हैं। उनसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में आनन्द निःसृत होता है। वह मयूर की केकी (केककेकाकः) एवं काक (काकभुशुण्डि) की काँव-काँव (काककाकाककः) में आनन्द और हर्ष की अनुभूति करते हैं। उनसे समस्त लोकों (ककः) के लिए सुख का प्रादुर्भाव होता है। उनके लिए [वनवास के] दुःख भी सुख (काकः) हैं। उनका काक (काकः) [काकभुशुण्डि] प्रशंसनीय है। उनसे ब्रह्मा (ककः) को भी परमानन्द की प्राप्ति होती है। वह [अपने भक्तों को] पुकारते (काकः) हैं। उनसे कूका अथवा सीता (कुकाकः) को भी आमोद प्राप्त होता है। वह अपने काक [काकभुशुण्डि] को पुकारते (काककः) हैं , और उनसे सांसारिक फलों एवं मुक्ति का आनन्द (कुकः) प्रकट होता है। हे मेरे एकमात्र प्रभु ! आप जिनसे [जयंत] काक के (काककाक) शीश पर दुःख [रूपी दण्ड प्रदान किया गया] था; आप जिनसे समस्त प्राणियों (कका) में आनन्द निर्झरित होता है; कृपया पधारें, कृपया पधारें (आक आक)। हे एकमात्र प्रभु! जिनसे सीता (कुकाक) प्रमुदित हैं; कृपया पधारें (आक)। हे मेरे एकमात्र स्वामी! जिनसे ब्रह्माण्ड (कक) के लिए सुख है; कृपया आ जाइए (आक)। हे भगवन (क)! हे एकमात्र प्रभु ! जो नश्वर संसार (कुकक) में आनन्द खोज रहे व्यक्तियों को स्वयं अपनी ओर आने का आमंत्रण देते हैं; कृपया आ जाएँ, कृपया पधारें (आक आक)। हे मेरे एकमात्र नाथ ! जिनसे ब्रह्मा एवं विष्णु (काक) दोनों को आनन्द है; कृपया आ जाइए (आक)। हे एक ! जिनसे ही भूलोक (कौक) पर सुख है; कृपया पधारें, कृपया पधारें (आक आक)। हे एकमात्र प्रभु ! जो (रक्षा हेतु) दुष्ट काक द्वारा पुकारे जाते हैं (कुकाकक) ।

लोलालालीललालोल लीलालालाललालल।
लेलेलेल ललालील लाल लोलील लालल ॥

अनुवाद – हे एकमात्र प्रभु! जो अपने घुँघराले केशों की लटों की एक पंक्ति के साथ (लोलालालीलल) क्रीड़ारत हैं; जो कदापि परिवर्तित नहीं होते (अलोल); जिनका मुख [बाल] लीलाओं में श्लेष्मा से परिपूर्ण है (लीलालालाललालल); जो [शिव धनुर्भंग] क्रीड़ा में पृथ्वी की सम्पत्ति [सीता] को स्वीकार करते हैं (लेलेलेल); जो मर्त्यजनों की विविध सांसारिक कामनाओं का नाश करते हैं (ललालील), हे बालक रूप राम! जो प्राणियों के चंचल प्रकृति वाले स्वभाव को विनष्ट करते हैं (लोलील); [ऐसे आप सदैव मेरे मानस में] आनन्द करें (लालल)।

क्या किसी भाषा मे सिर्फ दो अक्षरों से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है ??
जवाब है संस्कृत को छोड़कर अन्य किसी भाषा में ऐसा करना असंभव है ।
उदाहरण –
भूरिभिर्भारिभिर्भीराभूभारैरभिरेभिरे
भेरीरे भिभिरभ्राभैरभीरुभिरिभैरिभा: ।

अनुवाद – निर्भय हाथी ;जो की भूमि पर भार स्वरूप लगता है ,अपने वजन के चलते, जिसकी आवाज नगाड़े की टेरेह है और जो काले बादलों सा है ,वह दूसरे दुश्मन हाथी पर आक्रमण कर रहा है।

अन्य उदाहरण –
क्रोरारिकारी कोरेककारक कारिकाकर ।
कोरकाकारकरक: करीर कर्करोऽकर्रुक ॥

अनुवाद – क्रूर शत्रुओं को नष्ट करने वाला, भूमि का एक कर्ता, दुष्टों को यातना देने वाला, कमलमुकुलवत ,रमणीय हाथ वाला, हाथियों को फेंकने वाला , रण में कर्कश, सूर्य के समान तेजस्वी (था) ।

पुनः…..क्या किसी भाषा मे सिर्फ तीन अक्षरों से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है ?
जवाब है संस्कृत को छोड़कर अन्य किसी भाषा मे ऐसा करना असंभव है –

उदाहरण -देवानां नन्दनो देवो नोदनो वेदनिंदिनां
दिवं दुदाव नादेन दाने दानवनंदिनः ।।

वह परमात्मा ( विष्णु) जो दूसरे देवों को सुख प्रदान करता है और जो वेदों को नहीं मानते उनको कष्ट प्रदान करता है। वह स्वर्ग को उस ध्वनि नाद से भर देता है ,जिस तरह के नाद से उसने दानव (हिरण्यकशिपु ) को मारा था।
निम्न छंद में पहला चरण ही चारों चरणों में चार बार आवृत्त हुआ है ,लेकिन अर्थ अलग-अलग हैं, जो यमक अलंकार का लक्षण है। इसीलिए ये महायमक संज्ञा का एक विशिष्ट उदाहरण है –

विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जतीशमार्गणा:।
विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा:॥

अनुवाद – पृथ्वीपति अर्जुन के बाण विस्तार को प्राप्त होने लगे ,जब कि शिव जी के बाण भंग होने लगे। राक्षसों के हंता प्रथम गण विस्मित होने लगे तथा शिव का ध्यान करने वाले देवता एवं ऋषिगण (इसे देखने के लिए) पक्षियों के मार्गवाले आकाश-मंडल में एकत्र होने लगे।

एक अन्य विशिष्ट शब्द संयोजन –
जजौजोजाजिजिज्जाजी तं ततोऽतितताततुत् ।
भाभोऽभीभाभिभूभाभू- रारारिररिरीररः ॥

अनुवाद – महान योद्धा कई युद्धों के विजेता,शुक्र और वृहस्पति के समान तेजस्वी, शत्रुओं के नाशक बलराम, रणक्षेत्र की ओर ऐसे चले ,मानो चतुरंगिणी सेना से युक्त शत्रुओं की गति को अवरुद्ध करता हुआ शेर चला आ रहा हो।

तो मेरे प्रिय बंधु तुलना करने के लिए समकक्ष होने की अनिवार्यता होती है।

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🙋‍♂😎 !!! ज्ञानार्जन !!! *मृत्यु के चौदह प्रकार*

राम-रावण युद्ध चल रहा था, तब अंगद ने रावण से कहा- तू तो मरा हुआ है, मरे हुए को मारने से क्या फायदा?

रावण बोला– मैं जीवित हूँ, मरा हुआ कैसे?

अंगद बोले, सिर्फ साँस लेने वालों को जीवित नहीं कहते – साँस तो लुहार का धौंकनी भी लेती है!

तब अंगद ने मृत्यु के 14 प्रकार बताए-

अंगद द्वारा रावण को बताई गई ये बातें सर्वकालिक हैं! यदि किसी व्यक्ति में इन 14 दुर्गुणों में से एक दुर्गुण भी मौजूद है, तो वह मृतक समान माना जाता है! रामचरितमानस के लंका काण्ड का यह प्रसंग अत्यंत सारगर्भित और शिक्षणीय है :

कौल कामबस कृपिन विमूढ़ा।
अतिदरिद्र अजसि अतिबूढ़ा।।
सदारोगबस संतत क्रोधी।
विष्णु विमुख श्रुति संत विरोधी।।
तनुपोषक निंदक अघखानी।
जीवत शव सम चौदह प्रानी।।

1. कामवश: जो व्यक्ति अत्यंत भोगी हो, कामवासना में लिप्त रहता हो, जो संसार के भोगों में उलझा हुआ हो, वह मृत समान है। जिसके मन की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं और जो प्राणी सिर्फ अपनी इच्छाओं के अधीन होकर ही जीता है, वह मृत समान है। वह अध्यात्म का सेवन नहीं करता है, सदैव वासना में लीन रहता है।

2. वाम मार्गी: जो व्यक्ति पूरी दुनिया से उल्टा चले, जो संसार की हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजता हो; नियमों, परंपराओं और लोक व्यवहार के खिलाफ चलता हो, वह वाम मार्गी कहलाता है। ऐसे काम करने वाले लोग मृत समान माने गए हैं।

3. कंजूस: अति कंजूस व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जो व्यक्ति धर्म कार्य करने में, आर्थिक रूप से किसी कल्याणकारी कार्य में हिस्सा लेने में हिचकता हो, दान करने से बचता हो, ऐसा आदमी भी मृतक समान ही है।

4. अति दरिद्र: गरीबी सबसे बड़ा श्राप है। जो व्यक्ति धन, आत्म-विश्वास, सम्मान और साहस से हीन हो, वह भी मृत ही है। अत्यंत दरिद्र भी मरा हुआ है। गरीब आदमी को दुत्कारना नहीं चाहिए, क्योंकि वह पहले ही मरा हुआ होता है। दरिद्र-नारायण मानकर उनकी मदद करनी चाहिए।

5. विमूढ़: अत्यंत मूढ़ यानी मूर्ख व्यक्ति भी मरा हुआ ही होता है। जिसके पास बुद्धि-विवेक न हो, जो खुद निर्णय न ले सके, यानि हर काम को समझने या निर्णय लेने में किसी अन्य पर आश्रित हो, ऐसा व्यक्ति भी जीवित होते हुए मृतक समान ही है, मूढ़ अध्यात्म को नहीं समझता।

6. अजसि: जिस व्यक्ति को संसार में बदनामी मिली हुई है, वह भी मरा हुआ है। जो घर-परिवार, कुटुंब-समाज, नगर-राष्ट्र, किसी भी ईकाई में सम्मान नहीं पाता, वह व्यक्ति भी मृत समान ही होता है।

7. सदा रोगवश: जो व्यक्ति निरंतर रोगी रहता है, वह भी मरा हुआ है। स्वस्थ शरीर के अभाव में मन विचलित रहता है। नकारात्मकता हावी हो जाती है। व्यक्ति मृत्यु की कामना में लग जाता है। जीवित होते हुए भी रोगी व्यक्ति जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है।

8. अति बूढ़ा: अत्यंत वृद्ध व्यक्ति भी मृत समान होता है, क्योंकि वह अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है। शरीर और बुद्धि, दोनों अक्षम हो जाते हैं। ऐसे में कई बार वह स्वयं और उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं, ताकि उसे इन कष्टों से मुक्ति मिल सके।

9. सतत क्रोधी: 24 घंटे क्रोध में रहने वाला व्यक्ति भी मृतक समान ही है। ऐसा व्यक्ति हर छोटी-बड़ी बात पर क्रोध करता है। क्रोध के कारण मन और बुद्धि दोनों ही उसके नियंत्रण से बाहर होते हैं। जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता। पूर्व जन्म के संस्कार लेकर यह जीव क्रोधी होता है। क्रोधी अनेक जीवों का घात करता है और नरकगामी होता है।

10. अघ खानी: जो व्यक्ति पाप कर्मों से अर्जित धन से अपना और परिवार का पालन-पोषण करता है, वह व्यक्ति भी मृत समान ही है। उसके साथ रहने वाले लोग भी उसी के समान हो जाते हैं। हमेशा मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके ही धन प्राप्त करना चाहिए। पाप की कमाई पाप में ही जाती है और पाप की कमाई से नीच गोत्र, निगोद की प्राप्ति होती है।

11. तनु पोषक: ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से आत्म संतुष्टि और खुद के स्वार्थों के लिए ही जीता है, संसार के किसी अन्य प्राणी के लिए उसके मन में कोई संवेदना न हो, ऐसा व्यक्ति भी मृतक समान ही है। जो लोग खाने-पीने में, वाहनों में स्थान के लिए, हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले हमें ही मिल जाएं, बाकी किसी अन्य को मिलें न मिलें, वे मृत समान होते हैं। ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिए अनुपयोगी होते हैं। शरीर को अपना मानकर उसमें रत रहना मूर्खता है, क्योंकि यह शरीर विनाशी है, नष्ट होने वाला है।

12. निंदक: अकारण निंदा करने वाला व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जिसे दूसरों में सिर्फ कमियाँ ही नजर आती हैं, जो व्यक्ति किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता है, ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे, तो सिर्फ किसी न किसी की बुराई ही करे, वह व्यक्ति भी मृत समान होता है। परनिंदा करने से नीच गोत्र का बंध होता है।

13. परमात्म विमुख: जो व्यक्ति ईश्वर यानि परमात्मा का विरोधी है, वह भी मृत समान है। जो व्यक्ति यह सोच लेता है कि कोई परमतत्व है ही नहीं; हम जो करते हैं, वही होता है, संसार हम ही चला रहे हैं, जो परमशक्ति में आस्था नहीं रखता, ऐसा व्यक्ति भी मृत माना जाता है।

14. श्रुति, संत विरोधी: जो संत, ग्रंथ, पुराणों का विरोधी है, वह भी मृत समान है। श्रुत और संत, समाज में अनाचार पर नियंत्रण (ब्रेक) का काम करते हैं। अगर गाड़ी में ब्रेक न हो, तो कहीं भी गिरकर एक्सीडेंट हो सकता है। वैसे ही समाज को संतों की जरूरत होती है, वरना समाज में अनाचार पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाएगा।

अतः मनुष्य को उपरोक्त चौदह दुर्गुणों से यथासंभव दूर रहकर स्वयं को मृतक समान जीवित रहने से बचाना चाहिए।
🙋‍♂ हरि ॐ

🙏🌹🙋‍♂ !! जय श्रीकृष्ण !! ❣️🌹🙋‍♂🙏

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शंख कितने प्रकार के होते है और उसके फायदे

शंख के नाम
1समुद्रज,
2 कंबु,
3 सुनाद,
4 पावनध्वनि,
5कंबु
6कंबोज,
7अब्ज,
8 त्रिरेख,
9जलज,
10 अर्णोभव,
11 महानाद,
12 मुखर,
13दीर्घनाद,
14बहुनाद,
15हरिप्रिय,
16सुरचर,
17जलोद्भव,
18 विष्णुप्रिय,
19धवल,
20 स्त्रीविभूषण,
21पाञ्चजन्य,
22अर्णवभव

आदि नामों से भी जाना जाता है। स्वस्थ काया के साथ माया देते हैं शंख। शंख दैवीय के साथ-साथ मायावी भी होते हैं। शंखों का हिन्दू धर्म में पवित्र स्थान है। घर या मंदिर में शंख कितने और कौन से रखें जाएं इसके बारे में शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके घर में युद्ध से संबंधित शंख रखा हो जबकि आपको जरूरत है शांति और समृद्धि की। शिवलिंग और शालिग्राम की तरह शंख भी कई प्रकार के होते हैं सभी तरह के शंखों का महत्व और कार्य अलग-अलग होता है। समुद्र मंथन के समय देव- दानव संघर्ष के दौरान समुद्र से 14 अनमोल रत्नों की प्राप्ति हुई। जिनमें आठवें रत्न के रूप में शंखों का जन्म हुआ। शंख नाद का प्रतीक है। शंख ध्वनि शुभ मानी गई है। प्रत्येक शंख का गुण अलग अलग माना गया है। कोई शंख विजय दिलाता है, तो कोई धन और समृद्धि। किसी शंख में सुख और शांति देने की शक्ति है तो किसी में यश और कीर्ति।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार शंख चंद्रमा और सूर्य के समान ही देवस्वरूप है।
इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती का निवास है।

शंख की प्रसिद्ध….

आपके हाथों की अंगुलियों के प्रथम पोर पर भी शंखाकृति बनी होती है और अंगुलियों के नीचे भी।

शंख के नाम से कई बातें विख्यात है जैसे योग में शंख प्रक्षालन और शंख मुद्रा होती है, तो आयुर्वेद में शंख पुष्पी और शंख भस्म का प्रयोग किया जाता है।

प्राचीनकाल में शंख नाम से एक लिपि भी हुआ करती थी। विज्ञान के अनुसार शंख समुद्र में पाए जाने वाले एक प्रकार के घोंघे का खोल है जिसे वह अपनी सुरक्षा के लिए बनाता है।

विश्व का सबसे बड़ा शंख केरल राज्य के गुरुवयूर के श्रीकृष्ण मंदिर में सुशोभित है, जिसकी लंबाई लगभग आधा मीटर है तथा वजन दो किलोग्राम है।

ध्यान रहे कि आप यदि अपने घर में इनमें से किसी भी प्रकार का शंख रखना चाहते हैं ‍तो किसी जानकार से पूछकर ही रखे। कितने शंख रखना है और कौन कौन से यह वही बता सकता है।

द्विधासदक्षिणावर्तिर्वामावत्तिर्स्तुभेदत: दक्षिणावर्तशंकरवस्तु पुण्ययोगादवाप्यते यद्गृहे तिष्ठति सोवै लक्ष्म्याभाजनं भवेत्

हालांकि प्राकृतिक रूप से शंख कई प्रकार के होते हैं।

इनके 3 प्रमुख प्रकार हैं-

वामावर्ती,
दक्षिणावर्ती
तथा गणेश शंख
या मध्यवर्ती शंख।

इन तीनों ही प्रकार के शंखों में कई तो चमत्कारिक हैं, तो कई दुर्लभ और बहुत से सुलभ हैं। सभी तरह के शंखों के अलग-अलग नाम हैं।
अथर्ववेद के अनुसार, शंख से राक्षसों का नाश होता है- शंखेन हत्वा रक्षांसि।

भागवत पुराण में भी शंख का उल्लेख हुआ है। यजुर्वेद के अनुसार युद्ध में शत्रुओं का हृदय दहलाने के लिए शंख फूंकने वाला व्यक्ति अपेक्षित है। अद्भुत शौर्य और शक्ति का संबल शंखनाद से होने के कारण ही योद्धाओं द्वारा इसका प्रयोग किया जाता था।

दक्षिणावर्ती शंख :

इस शंख को दक्षिणावर्ती इसलिए कहा जाता है, क्योंकि जहां सभी शंखों का पेट बाईं ओर खुलता है वहीं इसका पेट विपरीत दाईं और खुलता है। इस शंख को देवस्वरूप माना गया है।

दक्षिणावर्ती शंख

के पूजन से खुशहाली आती है और लक्ष्मी प्राप्ति के साथ-साथ संपत्ति भी बढ़ती है। इस शंख की उपस्थिति ही कई रोगों का नाश कर देती है। दक्षिणावर्ती शंख में रात में जल भरकर रख दिया जाए और सुबह उठकर खाली पेट उस जल को पिया जाए तो पेट के रोग जल्दी समाप्त हो जाते हैं। नेत्र रोगों में भी यह लाभदायक है।

  • दक्षिणावर्ती शंख के प्रकार : दक्षिणावर्ती शंख 2 प्रकार के होते हैं नर और मादा।

जिसकी परत मोटी हो और भारी हो वह नर और जिसकी परत पतली हो और हल्का हो, वह मादा शंख होता है।

वामवर्ती शंख :

वामवर्ती शंख का पेट बाईं ओर खुला होता है। इसके बजाने के लिए एक छिद्र होता है। इसकी ध्वनि से रोगोत्पादक कीटाणु कमजोर पड़ जाते हैं।

यह शंख आसानी से मिल जाता है, क्योंकि यह बहुतायत में पैदा होता है। यह शंख घर से नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालने में सक्षम है। इसके घर में रखे होने से ही आसपास का वातावरण शुद्ध होता रहता है। गणेश शंख : समुद्र मंथन के दौरान 8वें रत्न के रूप में

सर्वप्रथम गणेश शंख की ही उत्पत्ति हुई थी।

इसे गणेश शंख इसलिए कहते हैं कि इसकी आकृति हू-ब-हू गणेशजी जैसी है। शंख में निहित सूंड का रंग अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्ययुक्त है।

प्रकृति के रहस्य की अनोखी झलक गणेश शंख के दर्शन से मिलती है। यह शंख दरिद्रतानाशक और धन प्राप्ति का कारक है।

श्रीगणेश शंख का पूजन जीवन के सभी क्षेत्रों की उन्नति और विघ्न बाधा की शांति हेतु किया जाता है।

इसकी पूजा से सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं। गणेश शंख आसानी से नहीं मिलने के कारण दुर्लभ होता है। आर्थिक, व्यापारिक, कर्ज और पारिवारिक समस्याओं से मुक्ति पाने का श्रेष्ठ उपाय श्री गणेश शंख है।

कृष्ण का पाञ्चजन्य शंख :

महाभारत में लगभग सभी योद्धाओं के पास शंख होते थे। उनमें से कुछ योद्धाओं के पास तो चमत्कारिक शंख होते थे, जैसे भगवान कृष्ण के पास पाञ्चजन्य शंख था जिसकी ध्वनि कई किलोमीटर तक पहुंच जाती थी।

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय:।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदर:।।

-महाभारत भगवान श्रीकृष्ण के पास पाञ्चजन्य शंख था। कहते हैं कि यह शंख आज भी कहीं मौजूद है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के बाद अपना पाञ्चजन्य शंख पराशर ऋषि के तीर्थ में रखा था।

हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि श्रीकृष्ण का यह शंख आदि बद्री में सुरक्षित रखा है।

महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण अपने पाञ्चजन्य शंख से पांडव सेना में उत्साह का संचार ही नहीं करते थे बल्कि इससे कौरवों की सेना में भय व्याप्त हो जाता था।

इसकी ध्वनि सिंह गर्जना से भी कहीं ज्यादा भयानक थी। इस शंख को विजय व यश का प्रतीक माना जाता है।

इसमें 5 अंगुलियों की आकृति होती है। हालांकि पाञ्चजन्य शंख अब भी मिलते हैं लेकिन वे सभी चमत्कारिक नहीं हैं। इन्हें घर को वास्तुदोषों से मुक्त रखने के लिए स्थापित किया जाता है। यह राहु और केतु के दुष्प्रभावों को भी कम करता है।

देवदत्त शंख :

यह शंख महाभारत में अर्जुन के पास था। वरुणदेव ने उन्हें यह दिया था। इसका उपयोग दुर्भाग्यनाशक माना गया है।

माना जाता है कि इस शंख का उपयोग न्याय क्षेत्र में विजय दिलवाता है। न्यायिक क्षेत्र से जुड़े लोग इसकी पूजा कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इस शंख को शक्ति का प्रतीक भी माना गया है।

महालक्ष्मी शंख :

इस शंख को प्राकृतिक रूप से निर्मित श्रीयंत्र भी कहा जाता है इसीलिए इसका नाम महालक्ष्मी शंख है।

माना जाता है कि यह महालक्ष्मी का प्रतीक है। इसकी आवाज सुरीली होती है। माना जाता है कि इस शंख की जिस भी घर में पूजा-अर्चना होती है, वहां देवी लक्ष्मी का स्वयं वास होता है। किसी भी शंख की पूजा इस मंत्र से करना चाहिए-

त्वंपुरा सागरोत्पन्न विष्णुनाविघृतःकरे देवैश्चपूजितः सर्वथौपाच्चजन्यमनोस्तुते।

पौण्ड्र शंख :

पोंड्रिक या पौण्ड्र शंख महाभारत में ‍भीष्म के पास था।

जिस व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी हो उन्हें यह पौण्‍ड्र शंख रखना चाहिए। इसके घर में रखे होने से मनोबल बढ़ता है। अधिकतर इसका उपयोग विद्यार्थियों के लिए उत्तम माना गया है। इसे विद्यार्थियों के अध्ययन कक्ष में पूर्व की ओर रखना चाहिए।

कामधेनु शंख :

ये शंख भी प्रमुख रूप से दो प्रकार के हैं।
एक गोमुखी शंख और दूसरा कामधेनु शंख।

यह शंख कामधेनु गाय के मुख जैसी रूपाकृति का होने से इसे गोमुखी कामधेनु शंख के नाम से जाना जाता है।

कहते हैं कि कामधेनु शंख की पूजा-अर्चना करने से तर्कशक्ति प्रबल होती है और सभी तरह की मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं। इस शंख को कल्पना पूरी करने वाला भी कहा गया है।

कलियुग में मानव की मनोकामना पूर्ति का एकमात्र साधन है। यह शंख वैसे बहुत दुर्लभ है। कामधेनु शंख हर तरह की मनोकामना पूर्ण करने में सक्षम है।

महर्षि पुलस्त्य ने लक्ष्मी प्राप्ति के लिए इस शंख का उपयोग किया था। पौराणिक शास्त्रों में इसके प्रयोग द्वारा धन और समृद्धि स्थायी रूप से बढ़ाई जा सकती है।

कौरी शंख

कौरी शंख अत्यंत ही दुर्लभ शंख है। माना जाता है कि यह जिसके भी घर में होता है उसका भाग्य खुला जाता है और समृद्धि बढ़ती जाती है। प्राचीनकाल से ही इस शंख का उपयोग गहने, मुद्रा और पांसे बनाने में किया जाता रहा है। कौरी को कई जगह कौड़ी भी कहा जाता है। पीली कौड़िया घर में रखने से धन में वृद्धि होती है।

हीरा शंख :

इसे पहाड़ी शंख भी कहा जाता है। इसका इस्तेमाल तांत्रिक लोग विशेष रूप से देवी लक्ष्मी की पूजा के लिए करते हैं। यह दक्षिणावर्ती शंख की तरह खुलता है। यह पहाड़ों में पाया जाता है। इसकी खोल पर ऐसा पदार्थ लगा होता है, जो स्पार्कलिंग क्रिस्टल के समान होता है इसीलिए इसे हीरा शंख भी कहते हैं। यह बहुत ही बहूमुल्य माना गया है।

मोती शंख :

यदि आपको घर में सुख और शांति चाहिए तो मोती शंख स्थापित करें। सुख और शांति होगी तभी समृद्धि बढ़ेगी। मोती शंख हृदय रोगनाशक भी माना गया है।

मोती शंख को सफेद कपड़े पर विराजमान करके पूजाघर में इसकी स्थापना करें और प्रतिदिन पूजन करें।

यदि मोती शंख को कारखाने में स्था‍पित किया जाए तो कारखाने में तेजी से आर्थिक उन्नति होती है। यदि व्यापार में घाटा हो रहा है, दुकान से आय नहीं हो रही हो तो एक मोती शंख दुकान के गल्ले में रखा जाए तो इससे व्यापार में वृद्धि होती है।

यदि मोती शंख को मंत्र सिद्ध व प्राण-प्रतिष्ठा पूजा कर स्थापित किया जाए तो उसमें जल भरकर लक्ष्मी के चित्र के साथ रखा जाए तो लक्ष्मी प्रसन्न होती है और आर्थिक उन्नति होती है।

मोती शंख को घर में स्थापित कर रोज ‘ॐ श्री महालक्ष्मै नम:’ 11 बार बोलकर 1-1 चावल का दाना शंख में भरते रहें। इस प्रकार 11 दिन तक प्रयोग करें। यह प्रयोग करने से आर्थिक तंगी समाप्त हो जाती है।

अनंतविजय शंख :

युधिष्ठिर के शंख का नाम अनंतविजय था। अनंत विजय अर्थात अंतहीन जीत। इस शंख के होने से हर कार्य में विजय मिलती जाती है। प्रत्येक क्षेत्र में विजय प्राप्त के लिए अनंतविजय नामक शंख मिलना दुर्लभ है।

मणि पुष्पक और सुघोषमणि शंख :

नकुल के पास सुघोष और सहदेव के पास मणि पुष्पक शंख था। मणि पुष्पक शंख की पूजा-अर्चना से यश कीर्ति, मान-सम्मान प्राप्त होता है। उच्च पद की प्राप्ति के लिए भी इसका पूजन उत्तम है।

वीणा शंख :

विद्या की देवी सरस्वती भी शंख धारण करती है। यह शंख वीणा समान आकृति का होता है इसीलिए इसे वीणा शंख कहा जाता है। माना जाता है कि इसके जल को पीने से मंदबुद्धि व्‍यक्ति भी ज्ञानी हो जाता है। अगर वाणी में कोई दोष है या बोल नहीं पाते हैं तो इस शंख का जल पीने के साथ-साथ इसे बजाएं भी।

अन्नपूर्णा शंख :

अन्नपूर्णा का अर्थ होता है अन्न की पूर्ति करने वाला या वाली। इस शंख को रखने से हमेशा बरकत बनी रहती है। यह धन और समृद्धि बढ़ाता है। गृहस्थ जीवन-यापन करने वालों को प्रतिदिन इसके दर्शन करने चाहिए।

ऐरावत शंख :

इंद्र के हाथी का नाम ऐरावत है। यह शंख उसी के समान दिखाई देता है इसीलिए इसका नाम ऐरावत है। यह शंख मूलत: सिद्ध और साधना प्राप्ति के लिए माना गया है। माना जाता है कि रंग और रूप को निखारने के लिए भी इस शंख का उपयोग किया जाता है। इस शंख में 24 से 28 घंटे जल भर करके रखें और फिर उसको ग्रहण करेंगे तो चेहरा कांतिमय बन जाएगा। ऐसा प्रतिदिन कुछ दिनों तक करना चाहिए।

विष्णु शंख :

इस शंख का उपयोग लगातार प्रगति के लिए और असाध्य रोगों में शिथिलता के लिए किया जाता है। इसे घर में रखने भर से घर रोगमुक्त हो जाता है। प्रतिदिन इस शंख के जल का सेवन करने से कई तरह के असाध्य रोग भी मिट जाते हैं।

गरूड़ शंख :

गरूड़ की मुखाकृति समान होने के कारण इसे गरूड़ शंख कहा गया है। यह शंख भी अत्यंत दुर्लभ है। यह शंख भी सुख और समृद्धि देने वाला है। माना जाता है कि इस शंख के घर में होने से किसी भी प्रकार की विपत्ति नहीं आती है।

शंख के अन्य प्रकार :
9
1देव शंख,
2चक्र शंख,
3राक्षस शंख,
5शनि शंख,
6राहु शंख,
7 पंचमुखी शंख,
8वालमपुरी शंख,
9 बुद्ध शंख,
10केतु शंख,
11शेषनाग शंख,
12कच्छप शंख,
13शेर शंख,
14कुबार गदा शंख,
15सुदर्शन शंक आदि।

उपरोक्त सभी तरह के शंख किसी न किसी विशेष कार्य और लाभ के लिए घर में रखे जाते हैं। इनमें से अधिकतर तो दुर्लभ है जिनके यहां मात्र नाम दिए जा रहे हैं। भगवान शंकर रुद्र शंख को बजाते थे जबकि उन्होंने त्रिपुरासुर के संहार के समय त्रिपुर शंख बजाया था।

नादब्रह्म :

शंख को नादब्रह्म और दिव्य मंत्र की संज्ञा दी गई है। शंख की ध्वनि को ‘ॐ’ की ध्वनि के समकक्ष माना गया है। शंखनाद से आपके आसपास की नकारात्मक ऊर्जा का नाश तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

शंख से निकलने वाली ध्वनि जहां तक जाती है, वहां तक बीमारियों के कीटाणुओं का नाश हो जाता है।

सेहत में फायदेमंद शंख : शंखनाद से सकारात्मक ऊर्जा का सर्जन होता है जिससे आत्मबल में वृद्धि होती है। शंख में प्राकृतिक कैल्शियम, गंधक और फॉस्फोरस की भरपूर मात्रा होती है। प्रतिदिन शंख फूंकने वाले को गले और फेफड़ों के रोग नहीं होते।

शंख बजाने से चेहरे, श्वसन तंत्र, श्रवण तंत्र तथा फेफड़ों का व्यायाम होता है। शंखवादन से स्मरण शक्ति बढ़ती है। शंख से मुख के तमाम रोगों का नाश होता है।

गोरक्षा संहिता, विश्वामित्र संहिता, पुलस्त्य संहिता आदि ग्रंथों में दक्षिणावर्ती शंख को आयुर्वर्द्धक और समृद्धिदायक कहा गया है।

पेट में दर्द रहता हो, आंतों में सूजन हो अल्सर या घाव हो तो दक्षिणावर्ती शंख में रात में जल भरकर रख दिया जाए और सुबह उठकर खाली पेट उस जल को पिया जाए तो पेट के रोग जल्दी समाप्त हो जाते हैं।

नेत्र रोगों में भी यह लाभदायक है। यही नहीं, कालसर्प योग में भी यह रामबाण का काम करता है।

श्रेष्ठ शंख के लक्षण…..

शंखस्तुविमल: श्रेष्ठश्चन्द्रकांतिसमप्रभ: अशुद्धोगुणदोषैवशुद्धस्तु सुगुणप्रद:

अर्थात निर्मल व चन्द्रमा की कांति के समान वाला शंख श्रेष्ठ होता है जबकि अशुद्ध अर्थात मग्न शंख गुणदायक नहीं होता। गुणों वाला शंख ही प्रयोग में लाना चाहिए।

क्षीरसागर में शयन करने वाले सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु के एक हाथ में शंख अत्यधिक पावन माना जाता है। इसका प्रयोग धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष रूप से किया जाता है।

शंख से वास्तुदोष का निदान : शंख से वास्तुदोष भी मिटाया जा सकता है। शंख को किसी भी दिन लाकर पूजा स्थान पर पवित्र करके रख लें और प्रतिदिन शुभ मुहूर्त में इसकी धूप-दीप से पूजा की जाए तो घर में वास्तुदोष का प्रभाव कम हो जाता है।

शंख में गाय का दूध रखकर इसका छिड़काव घर में किया जाए तो इससे भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

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संस्कृत भाषा का कोई सानी नहीं है।

अंग्रेजी में
A QUICK BROWN FOX JUMPS OVER THE LAZY DOG
एक प्रसिद्ध वाक्य है।
अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर उसमें समाहित हैं। किन्तु कुछ कमियाँ भी हैं, या यों कहिए,
कुछ कलकारियाँ किसी अंग्रेजी वाक्य से हो नहीं सकतीं।

1) अंग्रेजी अक्षर 26 हैं और यहां जबरन 33 का उपयोग करना पड़ा है।
चार O हैं और A,E,U,R दो-दो हैं।

2) अक्षरों का ABCD.. यह स्थापित क्रम नहीं दिख रहा। सब अस्तव्यस्त है।

अब संस्कृत में चमत्कार देखिये!

क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोटौठीडढण:।
तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।

अर्थात्-
पक्षियों का प्रेम,
शुद्ध बुद्धि का ,
दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत,
शत्रु-संहारकों में अग्रणी,
मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन?
राजा मय कि जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।

आप देख सकते हैं कि संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन इस पद्य में आ जाते हैं। इतना ही नहीं, उनका क्रम भी यथायोग्य है।

एक ही अक्षर का अद्भुत अर्थ विस्तार

माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल “भ” और “र”, दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है-

भूरिभिर्भारिभिर्भीभीराभूभारैरभिरेभिरे।
भेरीरेभिभिरभ्राभैरूभीरूभिरिभैरिभा:।।

अर्थात् धरा को भी वजन लगे ऐसे वजनदार,
वाद्य यंत्र जैसी आवाज निकालने वाले और मेघ जैसे काले निडर हाथी ने अपने दुश्मन हाथी पर हमला किया।

किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल “न” व्यंजन से अद्भुत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने कहा है।

न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नाना नना ननु।
नुन्नोSनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नन्नुनन्नुनुत्।।

अर्थ-
जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है।घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है।

संस्कृत भाषा सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक भाषा यूँ ही नहीं कही जाती !!!

आपके हमारे मन की गहराईयों में बचपन से
जो संस्कृत के लिए
तिरस्कार हास्य भर दिया गया है, यह उसी का परिणाम है कि हम संस्कृत पर गर्व ही नही कर पाते हैं

PART -2
↓↓↓

अब हम एक ऐसा उदहारण देखेंगे जिसमे महायमक अलंकार का प्रयोग किया गया है।

इस श्लोक में चार पद हैं,
बिलकुल एक जैसे, किन्तु सबके अर्थ अलग-अलग।

विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणाः ।
विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणाः ॥

अर्थात्
अर्जुन के असंख्य बाण सर्वत्र व्याप्त हो गए जिससे शंकर के बाण खण्डित कर दिए गए। इस प्रकार अर्जुन के रण कौशल को देखकर दानवों को मरने वाले शंकर के गैन आश्चर्य में पड़ गए। शंकर और तपस्वी अर्जुन के युद्ध को देखने के लिए शंकर के भक्त आकाश में आ पहुँचे।

संस्कृत की विशेषता है कि संधि की सहायता से
इसमें कितने भी लम्बे शब्द बनाये जा सकते हैं।

ऐसा ही एक शब्द इस👇🏻 चित्र में है,
जिसमे योजक की सहायता से
अलग अलग शब्दों को जोड़कर 431 अक्षरों का एक ही शब्द बनाया गया है।

यह न केवल संस्कृत अपितु किसी भी साहित्य का सबसे लम्बा शब्द है।

संस्कृत में यह श्लोक पाई (π) का मान दशमलव के 31 स्थानों तक शुद्ध कर देता है।

गोपीभाग्यमधुव्रात-श्रुग्ङिशोदधिसन्धिग।
खलजीवितखाताव गलहालारसंधर।।

π pi = 3.1415926535897932384626433832792

श्रृंखला समाप्त करने से पहले भगवन श्री कृष्णा की महिमा का गान करने वाला एक श्लोक जिसकी रचना भी एक ही अक्षर से की गयी है।

दाददो दुद्ददुद्दादी दाददो दूददीददोः।
दुद्दादं दददे दुद्दे दादाददददोऽददः॥

यहाँ पर बहुत ही कम उदाहरण लिए हैं,
किन्तु ऐसे और इनसे भी कहीं प्रभावशाली उल्लेख संस्कृत साहित्य में असंख्य बार आते हैं।

कभी इस बहस में न पड़ें कि संस्कृत अमुक भाषा जैसा कर सकती है कि नहीं,

बस यह जान लें,

जो संस्कृत कर सकती है, वह कहीं और नहीं हो सकता।

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एकलव्य और बर्बरीक


महाभारत को काल्पनिक कहने वाले कभी एकलव्य को काल्पनिक नहीं कहते हैं। वैसे सनातनी आस्था वाले लोग तो महाभारत को भी वास्तविक ही मानते हैं और महाभारत की घटनाओं को भी, जो कि सर्वथा उचित भी है। महर्षि वेदव्यास प्रणीत सर्वलोकोपकारी, इस विशाल महाग्रंथ में सभी कर्तव्य, धर्म और तत्वों का सार निहित है। हम आज इस बात पर चर्चा करेंगे कि क्या एकलव्य और बर्बरीक पर कोई अत्याचार हुआ था ? क्या एकलव्य का अंगूठा कटवाना अथवा महाभारत युद्ध से पूर्व ही बर्बरीक का मस्तक काटना, अत्याचार या शोषण नहीं था ? महाभारत स्वयं तो एकलव्य एवं बर्बरीक का कोई विस्तृत वर्णन नहीं करता, अपितु सांकेतिक वर्णन करता है, किन्तु उसके खिलभाग हरिवंशम् में अथवा वेदव्यास कृत अन्य ग्रंथों में इनका व्यापक वर्णन मिलता है।

सर्वप्रथम हम बर्बरीक पर चर्चा करेंगे। बर्बरीक अत्यंत पराक्रमी राक्षस थे। ये भीम और हिडिम्बा के संयोग से उत्पन्न राक्षसराज घटोत्कच, जो कामाख्या के निकट में मायांग (मायोंग) के राजा थे, के पुत्र थे। इनके भाई का नाम अञ्जनपर्वा एवं माता का नाम कामकटंकटा था। मतांतर से कामकटंकटा का नाम मौर्वी भी था क्योंकि यह मुर दैत्य की पुत्री थी। मुर दैत्य प्राग्ज्योतिषपुर (लगभग आज का पूरा असम) के राजा नरकासुर का दुर्गप्रहरी था। घटोत्कच का नाम उनसे केशहीन होने के कारण पड़ा तो बर्बरीक का नाम उनके विशाल एवं कठोर केशों के ही कारण था, जैसा कि स्कन्दपुराण के कौमारिकाखण्ड का वचन है

बर्बराकारकेशत्वाद्बर्बरीकाभिधो भवान्॥

बर्बरीक राक्षसकुल में जन्म लेने के बाद भी अत्यंत संस्कारी एवं धर्मपरायण थे। ये कभी अपने सामर्थ्य का प्रयोग संसार को पीड़ा देने के लिये नहीं करते थे। भगवान् श्रीकृष्ण ने इन्हें धर्मशास्त्रों के तत्व की विशेष शिक्षा दी थी एवं चारों वर्णों के कर्तव्य का बोध कराकर देवी की तपस्या करने के लिए गुह्यतीर्थ (कामाख्या) में भेज दिया। वैसे भी बर्बरीक के पिता का राज्य वहां से दो योजन (लगभग 25 किमी) की दूरी पर ही था।

उस गुह्यतीर्थ में विजय नाम के एक तपस्वी ब्राह्मण अपनी साधना कर रहे थे। उनकी तपस्या में विघ्न उत्पन्न करने के लिए अनेकों हिंस्र जंतु, पिशाच एवं राक्षसों के झुंड आते थे। बर्बरीक ने उन सबका संहार करके विजय मुनि की रक्षा की। अपनी तपस्या पूर्ण होने पर विजय ने हवन का भस्म एवं देवी का सिन्दूर दिया। उसमें त्रिलोक का संहार करने की क्षमता थी। बाद में बर्बरीक ने भी देवी की आराधना करके उनसे दिव्य बाण आदि की प्राप्ति की।

एक बार वनवास के मध्य भीमसेन ने किसी जलस्रोत को प्रदूषित कर दिया था तो बर्बरीक ने उन्हें ऐसा करने से रोका। उस समय तक बर्बरीक ने पांडवों को देखा नहीं था। अपने बल के अभिमान में भीमसेन ने बर्बरीक का अपमान किया तो बर्बरीक उन्हें उठाकर समुद्र में फेंकने के लिए चल पड़े। बाद में आकाशवाणी हुई कि ये तुम्हारे पितामह भीमसेन हैं, तब बर्बरीक ने उन्हें छोड़ा। भीमसेन ने भी प्रकृति को प्रमादवश प्रदूषित करने के लिए क्षमा मांगी थी। यह सब कथाएं स्कन्दपुराण आदि में विस्तार से वर्णित हैं। अब हम उस प्रसङ्ग पर आते हैं जहां महाभारत के युद्ध से पूर्व सभी योद्धागण अपने अपने दिव्यास्त्रों की सीमा और क्षमता का आंकलन कर रहे थे। पाण्डवों के पक्ष से युद्ध में सम्मिलित हुए बर्बरीक ने कहा कि मैं क्षणमात्र में ही उपस्थित दोनों सेनाओं के संहार कर सकता हूँ। इस बात को अविश्वसनीय मानकर सभी वीरों ने उपहास किया। भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा कि जिस सेना को जीतना देवतागण के लिए भी दुष्कर है उसे तुम अकेले ही क्षणमात्र में कैसे संहार कर सकते हो, इसका प्रमाण दो। भगवान् की बात को सुनकर बर्बरीक ने कहा कि यदि मर्म का बोध हो तो एक ही प्रहार से शत्रु को मारा जा सकता है (इसी विचारधारा का प्रयोग मार्शल आर्ट्स वाले करते हैं)

बर्बरीक ने अपने दिव्य तीन बाणों इन से एक बाण को विप्रदत्त सिन्दूर से अभिमंत्रित किया और मर्मनिरीक्षण किया। उनके द्वारा चलाए गए बाण से जो सिन्दूर निकला वह विस्तृत होकर दोनों सेनाओं में गिरा। द्रोण, द्रुपद एवं विराट के कंठ पर सिन्दूर गिरा। दुर्योधन की जंघा, भगदत्त की नासिका भाग एवं शल्य की छाती पर सिन्दूर लगा। भीष्म पितामह के सभी रोमकूपों में सिन्दूर व्याप्त हो गया और भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में भी लगा। कृपाचार्य और अश्वत्थामा को चिरंजीवी होने से सिन्दूर नहीं लगा एवं पाण्डवों को भी नहीं लगा। आप ध्यान देंगे तो उन वीरों का जिस जिस अंग में सिन्दूर लगा था, महाभारत के युद्ध में उसी अंग पर प्रहार होने से उनकी मृत्यु हुई थी। कालांतर में जब श्रीकृष्ण भी धराधाम को त्याग रहे थे तो जरा नामक व्याध के द्वारा पैरों में ही बाण लगने का निमित्त बनाया था।

इस प्रकार सबों के मर्म का निरीक्षण करके बर्बरीक ने उन सबों को मारने की इच्छा से दूसरे बाण का सन्धान किया। इसी मध्य भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने चक्र से बर्बरीक का मस्तक काट दिया। इस अप्रत्याशित घटना से सभी लोग हतप्रभ रह गए। घटोत्कच तो अपने पुत्र की मृत्यु पर मूर्छित सा हो गया एवं पाण्डव भी शोकाकुल हो गए, सभी लोग श्रीकृष्ण को दोषी कहने लगे। उसी समय चण्डिका, वाराही आदि चौदह देवियां प्रकट हुईं एवं एक रहस्य बताया।

देवियों ने कहा – पूर्वकाल में यह बर्बरीक सूर्यवर्चा नामक यक्ष था जो चौरासी करोड़ यक्षों (अथवा मुद्राओं) का स्वामी था। जब स्वर्गलोक में देवताओं की सभा हो रही थी कि पृथ्वी के भारहरण के लिए भगवान् विष्णु का अवतार होना चाहिए एवं उनके साथ ही अन्य देवताओं को भी जाना चाहिए, उस समय एक घटना घटी।

एतस्मिन्नन्तरे बाहुमुद्धृत्योच्चैरभाषत।
सूर्यवर्चेति यक्षेन्द्रश्चतुराशीतिकोटिपः।
किमर्थं मानुषे लोके भवद्भिर्जन्म कार्यते॥
मयि तिष्ठति दोषाणामनेकानां महास्पदे।
सर्वे भवन्तो मोदन्तु स्वर्गेषु सह विष्णुना॥
(स्कन्दपुराण, माहेश्वरखण्ड-कौमारिकाखण्ड, अध्याय – ६६, श्लोक – ५८-६०)

इसी बीच चौरासी करोड़ के स्वामी सूर्यवर्चा नामक यक्ष ने अपनी भुजाएं उठाकर उच्चस्वर से यह उद्घोष-लोग व्यर्थ में ही मनुष्य योनि में जन्म लेना चाहते हैं। पृथ्वी के भार हरण के लिए तो मैं ही पर्याप्त हूँ, मेरे रहते हुए आपलोग क्यों कष्ट करेंगे। युद्ध में बहुत अधिक दोष होते हैं (अतएव बिना सामूहिक युद्ध के अकेले ही सबको मार दूंगा) आप सभी देवगण स्वर्गादि दिव्यलोकों में विष्णु के साथ आनन्दित रहें।

सूर्यवर्चा यक्ष के ऐसा कहने से सभी देवताओं को अपमान का अनुभव हुआ। भगवान् के अवतार का उद्देश्य मात्र संसार के अधर्मियों के नाश करना नहीं होता है, वे लोकमर्यादा की शिक्षा एवं धर्म की स्थापना के लिए भी आते हैं। नानाविध प्रकार से उनके लीलाभाव में सम्मिलित होने की इच्छा वाले भक्तों की कामनापूर्ति भी करते हैं, यद्यपि भगवान् भृकुटिविलासमात्र से सृष्टि संहार में समर्थ हैं फिर भी अवतार लेते हैं। अवतारभेद के उद्देश्य का ज्ञान न रखने वाले उस बलाभिमानी यक्ष को उस सभा में ब्रह्मदेव ने श्राप दिया – तुम पृथ्वी पर राक्षसकुल में जाओगे, अत्यन्त पराक्रमी भी बनोगे किन्तु जब मुख्य युद्ध का अवसर आएगा तब तुम्हारा मस्तक श्रीकृष्ण के द्वारा काट लिया जाएगा।

देवी के द्वारा इस रहस्य का उद्घाटन होने से वहां उपस्थित सभी लोगों ने इस घटना को पूर्वनिर्धारित जानकर भगवान् श्रीकृष्ण को निर्दोष माना। इसके बाद देवी ने बर्बरीक के मस्तक भाग को पुनर्जीवित कर दिया।

इत्युक्ते चण्डिका देवी तदा भक्तशिरस्त्विदम्।
अभ्युक्ष्य सुधया शीघ्रमजरं चामरं व्यधात्॥
यथा राहुशिरस्तद्वत्तच्छिरः प्रणनाम तान्।
उवाच च दिदृक्षामि युद्धं तदनुमन्यताम्॥
ततः कृष्णो वचः प्राह मेघगंभीरवाक्प्रभुः।
यावन्मही सनक्षत्रा यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
तावत्त्वं सर्वलोकानां वत्स पूज्यो भविष्यसि।
देवीलोकेषु सर्वेषु देवीवद्विचरिष्यसि॥
(स्कन्दपुराण, माहेश्वरखण्ड-कौमारिकाखण्ड, अध्याय ६६, श्लोक – ७३-७६)

चण्डिका देवी ने अपने भक्त के मस्तक को अमृत के द्वारा पुनर्जीवित करके उसे अजर अमर बना दिया। जैसे राहु का शिरमात्र ही है वैसे ही बर्बरीक भी हो गया और उसने सबको प्रणाम दिया और कहा कि आपसबों की सम्मति से मैं अब इस युद्ध का मात्र दर्शन करूँगा। उस समय मेघ के समान गंभीर वाणी में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा – जबतक यह पृथ्वी सभी नक्षत्रों के साथ विद्यमान है, जब तक सूर्य एवं चन्द्र हैं, तब तक हे वत्स ! तुम पूरे संसार के लिए पूजनीय रहोगे। जैसे इस संसार में, तथा अपने लोकों में देवी (इच्छानुसार) विहार करती हैं, वैसे ही तुम भी करोगे। इस प्रकार भगवान् ने बर्बरीक को देवतुल्य बनाकर लोकपूज्य स्थान में वास दे दिया तभी से बर्बरीक ने श्रीकृष्णतुल्यता के साथ संसार में भक्तों का, विशेषकर रोगनाश, बालारिष्ट शमन आदि के माध्यम से कल्याण करना प्रारम्भ किया।

अब हम एकलव्य की चर्चा करते हैं। लोक में प्रसिद्ध है कि एकलव्य हिरण्यधनु नामक निषादराज का पुत्र था किन्तु ग्रंथों के विशेषज्ञ जानते हैं कि वह हिरण्यधनु का औरस नहीं, पालित पुत्र था। वास्तव में एकलव्य का नाम शत्रुघ्न था एवं वह यदुवंशी देवश्रवा (श्रुतदेव) का पुत्र था। उसे लोकसंहारक गतिविधियों के कारण राज्य से निकाल दिया गया था, क्योंकि वह कंस का पक्षधर था। बाद में उसे निषादराज हिरण्यधनु ने पाला और एकलव्य कंस के श्वसुर जरासन्ध आदि के दल में सम्मिलित हो गया।

निवृत्तशत्रुं शत्रुघ्नं श्रुतदेव त्वजायत।
श्रुतदेवात्मजास्ते तु नैषादिर्यः परिश्रुतः॥
एकलव्यो मुनिश्रेष्ठा निषादैः परिवर्द्धितः।
ब्रह्मपुराण, अध्याय – १४, श्लोक – २७)

निवृत्तशत्रुं शत्रुघ्नं देवश्रवा व्यजायत।
देवश्रवाः प्रजातस्तु नैषादिर्यः प्रतिश्रुतः।
एकलव्यो महाराज निषादैः परिवर्धितः॥

(हरिवंशपुराण, हरिवंशपर्व, अध्याय – ३४, श्लोक – ३३)

इसी का समर्थन वायुपुराण आदि भी करते हैं। इधर द्रोणाचार्य कौन थे ? वे हस्तिनापुर के राजगुरु थे। हस्तिनापुर के राजकुमारों को शिक्षित करने के लिए ही उन्हें विशेष नियुक्ति मिली थी, जबकि एकलव्य जरासन्ध के पक्ष का था। हस्तिनापुर उस समय ऐसा राज्य था जो भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य आदि से सुरक्षित होने के कारण किसी की अधीनता स्वीकार नहीं करता था। इसके अतिरिक्त पूरा संसार दो ही राजाओं के सामने झुका हुआ था, एक तो मगधनरेश जरासन्ध एवं दूसरे प्राग्ज्योतिषपुर के राजा नरकासुर। नरकासुर ने हजारों राजाओं की पुत्रियों को विवाह हेतु बन्दी बना रखा था तो उन हज़ारों राजाओं को तामसी यज्ञ में नरबलि देने हेतु जरासन्ध ने बन्दी बना रखा था। नरकासुर की बाणासुर एवं कंस से मित्रता थी और जरासन्ध का दामाद कंस था। साथ ही कंस बाणासुर का मित्र भी था। तो इस प्रकार जरासन्ध एवं नरकासुर में भी मित्रता थी। जरासन्ध के साथ पांचालनरेश द्रुपद एवं मत्स्यनरेश विराट भी थे। अब एकलव्य जरासन्ध का सहयोगी था तो हस्तिनापुर का शत्रु हुआ। साथ ही जरासन्ध के मित्र द्रुपद की द्रोणाचार्य से शत्रुता भी थी तो इस प्रकार एकलव्य, हस्तिनापुर राज्य का परम शत्रु हुआ।

एकलव्य अपनी प्रतिभा का प्रयोग संसार को कष्ट देने के लिए करता था, साथ ही आसुरी शक्तियों के साथ उसकी मित्रता थी, अतएव द्रोणाचार्य ने उसे शस्त्र की अतिरिक्त शिक्षा नहीं दी थी। द्रोणाचार्य के मन में एकलव्य के प्रति कोई निजी दुर्भावना नहीं थी। द्रोणाचार्य अत्यन्त उदार थे, उन्होंने इस घटना के बाद, स्वयं को मारने के लिए उत्पन्न द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न को स्वयं ही शस्त्र की शिक्षा दी थी, क्योंकि उससे शेष संसार को कोई कष्ट नहीं था। तो यदि एकलव्य निजी शत्रु होता, साथ ही संसार को उससे कोई कष्ट नहीं होता तो भी द्रोणाचार्य उसे सिखा देते किन्तु वह राज्यशत्रु भी था और लोकसंहार की प्रवृत्ति से युक्त भी था। यदि चीन या पाकिस्तान का कोई ऐसा व्यक्ति, जिसका अतीत संसार के प्रति आतंकवाद का हो, यहां आए तो भारत का कोई सैन्य प्रशिक्षक उसे प्रशिक्षण दे सकता है क्या ?

एकलव्यं हि साङ्गुष्ठमशक्ता देवदानवाः।
सराक्षसोरगाः पार्थ विजेतुं युधि कर्हिचित्॥

(महाभारत, द्रोणपर्व, अध्याय – १८२, श्लोक – १९)

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन ! यदि एकलव्य अंगूठे से युक्त होता तो देवता, दानव, राक्षस, नाग आदि भी उसे शायद ही युद्ध में जीत पाते।

अतः द्रोणाचार्य ने लोक को उसके प्रकोप से बचाने के लिए उसके अंगूठे को मांग लिया और उसकी प्रतिभा पूर्णतया समाप्त न हो जाए, इसके लिए उसे बिना अंगूठे के ही तर्जनी एवं मध्यमा के सहयोग से तीर चलाने की विधि बता दी थी, जिसका प्रयोग आजतक ओलम्पिक आदि में भी होता है। यहां महाभारत का प्रसङ्ग देखें –

ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुषः सुतः।
एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह॥
न स तं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तयन्।
शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षया॥
(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय – १४२, श्लोक – ४०-४१)

निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र एकलव्य द्रोण के पास गया किन्तु धर्मज्ञ द्रोणाचार्य ने उसे निषादपुत्र समझकर धनुर्विद्या नहीं दी।

यहां द्रोणाचार्य के लिए धर्मज्ञ शब्द आया है, और साथ ही समझकर, ऐसा संकेत है। क्या समझकर ? निषादपुत्र समझकर। द्रोणाचार्य जानते थे कि यह निषादपुत्र तो है नहीं, यह तो मथुरा के राजवंश का क्षत्रिय है, जिसे असामाजिक गतिविधियों के कारण निकाल दिया गया तब निषादों ने इसे अपना लिया, ऐसा समझकर, ऐसा उसके पूर्व चरित्र को जानकर, धर्म का विचार करके द्रोणाचार्य ने उसे मना कर दिया।

द्रोणाचार्य जैसे त्रिलोकविजेता ज्ञानी इतने सरल थे कि उनके यहां उनके शिवावतार चिरंजीवी पुत्र को पीने के लिए दूध तक नहीं होता था। क्या उनकी इस दरिद्रता पर सामाजिक न्याय वाले कभी चर्चा करेंगे ? जब द्रोणाचार्य अपने पूर्व सहपाठी राजा द्रुपद के पास गए तो द्रुपद ने उनका अपमान करते हुए कहा –

न दरिद्रो वसुमतो नाविद्वान्विदुषः सखा।
न शूरस्य सखा क्लीबः सखिपूर्वं किमिष्यते॥
ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं श्रुतम्।
तयोर्विवाहः सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयोः॥
नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा।
नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते॥
(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय – १४१, श्लोक – ०९-११)

द्रुपद ने कहा – जो निर्धन है, वह भूमिपति का मित्र नहीं होता। मूर्ख व्यक्ति विद्वान् का, नपुंसक व्यक्ति वीर का सखा नहीं होता, फिर हम दोनों में पूर्वकाल में कैसे मित्रता सम्भव हो सकती है ? जिनका आर्थिक स्तर एवं प्रसिद्धि समान होती है, उनके मध्य ही वैवाहिक सम्बन्ध अथवा मित्रता होती है, असमानों में नहीं। जो वेदज्ञ नहीं है, उसका वेदज्ञ से, जो रथी नहीं है, उसका रथी से, जो राजा नहीं है, उसका राजा से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध नहीं होता है। फिर हम दोनों में कैसी मित्रता ?

राजा द्रुपद के इस प्रकार कहने पर द्रोणाचार्य अपमान का घूंट पीकर रह गए और समर्थ होने पर भी द्रुपद को उस समय दण्डित नहीं किया। बाद में भीष्म पितामह ने उन्हें ससम्मान अपने राज्य में गुरुपद प्रदान किया।

एकलव्य वाली इस घटना के कुछ वर्षों के बाद कंस मारा गया और भगवान् मथुरा में वास करने लगे। अपने जामाता के मरने पर जरासन्ध ने सत्रह बार तेईस अक्षौहिणी सेना के साथ मथुरा पर आक्रमण किया किन्तु प्रत्येक बार उसे पराजित होना पड़ा। अठारहवीं बार कालयवन के एक करोड़ सैनिकों के साथ तथा अपनी भी विशाल सेना को सम्मिलित करने के बाद जरासन्ध ने विशाल आक्रमण किया जिससे प्रजा को बचाने के लिए भगवान् ने रातोंरात विश्वकर्मा के सहयोग से द्वारिका का निर्माण करवाकर वहां प्रजा को स्थानांतरित कराया था।

अब चूंकि जरासन्ध इतना पराक्रमी सम्राट था कि कोई भी उसके विरुद्ध खड़ा नहीं होता था इसीलिए जब उसने अठारहवीं बार मथुरा पर आक्रमण किया तो उसके साथ अनेकों प्रसिद्ध राजा भी आये, किन्तु मथुरा के पक्ष से कोई नहीं आया। जब भगवान् श्रीकृष्ण ने नीति का पालन करते हुए समय को टालने की इच्छा से एवं प्रजा को कालयवन तथा जरासन्ध के दोतरफा आक्रमण से बचाने के लिये, शत्रुओं को भ्रमित करते हुए युद्धभूमि से भागने की लीला की और बाद में बलरामजी के साथ प्रवर्षण पर्वत पर छिप गए तो जरासन्ध ने चिढ़ कर उस पूरे पर्वत को आग लगाने की आज्ञा दे दी थी। उस समय जरासन्ध की सेना में निम्न वीर सम्मिलित थे –

मद्रः कलिङ्गाधिपतिश्चेकितानश्च बाह्लिकः।
काश्मीरराजो गोनर्दः करूषाधिपतिस्तथा॥
द्रुमः किंपुरुषश्चैव पर्वतीयाश्च मानवाः।
पर्वतस्यापरं पार्श्वं क्षिप्रमारोहयन्त्वमी॥
पौरवो वेणुदारिश्च वैदर्भः सोमकस्तथा।
रुक्मी च भोजाधिपतिः सूर्याक्षश्चैव मालवः॥
पाञ्चालाधिपतिश्चैव द्रुपदश्च नराधिपः।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ दन्तवक्त्रश्च वीर्यवान्॥
छागलिः पुरमित्रश्च विराटश्च महीपतिः।
कौशाम्ब्यो मालवश्चैव शतधन्वा विदूरथः॥
भूरिश्रवास्त्रिगर्तश्च बाणः पञ्चनदस्तथा।
उत्तरं पर्वतोद्देशमेते दुर्गसहा नृपाः॥
आरोहन्तु विमर्दन्तो वज्रप्रतिमगौरवाः।
उलूकः कैतवेयश्च वीरश्चांशुमतः सुतः॥
एकलव्यो दृढाश्वश्च क्षत्रधर्मा जयद्रथः॥
उत्तमौजास्तथा शाल्वः कैरलेयश्च कैशिकः।
वैदिशो वामदेवश्च सुकेतुश्चापि वीर्यवान्॥
पूर्वपर्वतनिर्व्युहमेतेष्वायतमस्तु नः ।
विदारयन्तो धावन्तो वाता इत बलाहकान्॥
हरिवंशपुराण, विष्णुपर्व, अध्याय – ४२, श्लोक – २८-३६)

जरासन्ध ने आदेश दिया – मद्र के राजा (शल्य), कलिंग के राजा, चेकितान, बाह्लीक (भीष्म पितामह के चाचा), काश्मीर के राजा गोनर्द (इन्हीं के नामपर कश्मीर का उत्तरी भाग, जो चीन से लगता है, बसाया गया था), करूष देश के राजा (पौंड्रक) महाराज द्रुम, किम्पुरुष (सुग्रीव के मन्त्री द्विविद आदि) पर्वतों पर रहने वाले मनुष्य, ये सब इस पर्वत के दूसरी ओर से शीघ्र चढ़ें। पुरुवंश का वेणुदारि, विदर्भ के राजा सोमक, भोजकट के स्वामी रुक्मी, मालवा के स्वामी सूर्याक्ष, पाञ्चाल के राजा द्रुपद, अवन्ती के राजा विन्द एवं उनके भाई अनुविन्द, प्रतापी दन्तवक्त्र, पुरमित्र, मत्स्यदेश के राजा विराट, कौशाम्बी के शतधन्वा और मालव के विदूरथ, भूरिश्रवा, त्रिगर्तनरेश (सुशर्मा), पञ्चनद के स्वामी बाण, ये सब इस पर्वत के उत्तरी भाग से शत्रु को रौंदते हुए चढ़ाई करें। छल करने में कुशल शकुनि का पुत्र उलूक, अंशुमान् का वीर पुत्र, दृढ़ाश्व, एकलव्य, क्षत्रधर्मा, जयद्रथ, उत्तमौजा, शाल्व, केरल के राजा कैशिक, विदिशा के स्वामी वामदेव, प्रतापी सुकेतु, ये सब पूर्वदिशा से पर्वत को वैसे ही विदीर्ण करते हुए आक्रमण करें जैसे वायु के प्रहार से बादलों के समूह बिखर जाते हैं।

इस समूह में जरासन्ध की ओर से जो राजा मित्रभाव से प्रसन्न होकर लड़ने आये थे उनमें उलूक, एकलव्य, शाल्व, रुक्मी, पौंड्रक, सुशर्मा, बाण, शतधन्वा, आदि सम्मिलित हैं। जो राजा एवं वीर जरासन्ध के भय से उसके साथ आ गए थे उनमें शल्य, विराट, द्रुपद, चेकितान, आदि थे।

बाद में चेकितान ने भगवान् श्रीकृष्ण की नारायणी सेना में नियुक्ति पा ली थी। जब महाभारत के युद्ध में नारायणी सेना दुर्योधन के पक्ष में चली गयी तो चेकितान ने सात्यकि के साथ पांडवों का पक्ष लिया था। ऐसे भी जरासन्ध के मरने के बाद उत्तमौजा, द्रुपद, विराट, आदि ने श्रीकृष्ण एवं पाण्डवों का पक्ष ही लिया था। जब युधिष्ठिर इस भूमण्डल का सम्राट बनने की इच्छा से राजसूय यज्ञ करना चाहते थे तो भगवान् श्रीकृष्ण ने निम्न बात कही –

क्षत्रे सम्राजमात्मानं कर्तुमर्हसि भारत।
दुर्योधनं शान्तनवं द्रोणं द्रौणायनिं कृपम्॥
कर्णं च शिशुपालं च रुक्मिणं च धनुर्धरम्।
एकलव्यं द्रुमं श्वेतं शैब्यं शकुनिमेव च॥
एतानजित्वा सङ्ग्रामे कथं शक्नोषि तं क्रतुम्।
तथैते गौरवेणैव न योत्स्यन्ति नराधिपाः॥
एकस्तत्र बलोन्मत्तः कर्णो वैकर्तनो वृषा।
योत्स्यते स परामर्षी दिव्यास्त्रबलगर्वितः॥
न तु शक्यं जरासन्धे जीवमाने महाबल।
राजसूयस्त्वयाऽवाप्तुमेषा राजन्मतिर्मम॥
(महाभारत, सभापर्व, अध्याय – १४ श्लोक – ६८-७२)

श्रीकृष्ण ने कहा – हे भरतवंशी युधिष्ठिर ! यदि आप पृथ्वी पर सम्राट बनना चाहते हैं तो दुर्योधन, शान्तनुपुत्र भीष्म, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कर्ण, शिशुपाल, धनुर्धर रुक्मी, एकलव्य, द्रुम, विराटपुत्र श्वेत, शैब्य, शकुनि आदि को बिना जीते ही राजसूय यज्ञ कैसे कर सकते हैं ? हम मानते हैं कि (भीष्म, द्रोण, कृप आदि) आपके प्रति स्नेह और सम्मान का भाव रखने से आपसे युद्ध नहीं करेंगे किन्तु आपसे ईर्ष्या करने वाला कर्ण तो अपने दिव्यास्त्र के बल पर अभिमान करने के कारण आपसे युद्ध करेगा ही। यदि वह भी युद्ध न करे तो भी जरासन्ध के जीवित रहते आप यह राजसूय यज्ञ नहीं कर सकते, ऐसा मैं समझता हूँ।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण ने एकलव्य को वीरों की श्रेणी में अति सम्माननीय बताया है। इतना ही नहीं, जब राजसूय यज्ञ के समय किसकी अग्रपूजा हो, इस संशय में माद्रीतनय सहदेव ने कहा कि निश्चय ही, अग्रपूजा के अधिकारी भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं, तो शिशुपाल ने वहां सभा में उपस्थित अन्य गणमान्य लोगों के नाम भी गिनाए थे।

भीष्मकं च महावीर्यं दन्तवक्त्रं च भूमिपम्।
भगदत्तं यूपकेतुं जयत्सेनं च मागधम्॥
विराटद्रुपदौ चोभौ शकुनिं च बहद्बलम्।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पाण्ड्यं श्वेतमथोत्तमम्॥
शङ्खं च सुमहाभागं वृषसेनं च मानिनम्।
एकलव्यं च विक्रान्तं कालिङ्गं च महारथम्॥
अतिक्रम्य महावीर्यं किं प्रशंसति केशवम्।
(महाभारत, सभापर्व, अध्याय – ६७, श्लोक – १९-२२)

शिशुपाल ने कहा – (रुक्मिणी के पिता) अत्यंत पराक्रमी भीष्मक, राजा दन्तवक्त्र, कामरूप के स्वामी भगदत्त, यूपकेतु, मगध के वीर जयत्सेन, विराट एवं द्रुपद ये दोनों, गान्धारनरेश शकुनि, बृहद्बल/ बहद्वल, अवन्ती के विन्द एवं अनुविन्द, पाण्ड्य के राजा, उत्तम आचरण वाले श्वेत, महाभाग शङ्ख, स्वाभिमानी वृषसेन, पराक्रमी एकलव्य, महारथी कलिंगनरेश, इन सभी महाबलशालियों को छोड़कर तुम केशव की प्रशंसा क्यों करते हो ?

भले ही यह बात शिशुपाल ने श्रीकृष्ण के प्रति द्वेषभाव से कही थी किन्तु उपर्युक्त वीरों का समाज में अत्यंत श्रेष्ठ स्थान था, इसमें सन्देह नहीं है। एकलव्य ने बाद में भी कोई समाजसेवा का कार्य नहीं किया। अपने दल के अधर्मियों के साथ उसने द्वारिका पर आक्रमण कर दिया था। उस आक्रमण में दन्तवक्त्र का पुत्र सुवक्त्र भी था जो इन्द्र के समान पराक्रमी एवं सैकड़ों प्रकार के मायायुद्ध में निपुण था। उसमें स्वयं को भगवान् वासुदेव कहने वाले पौंड्रक का पुत्र सुदेव, पाण्ड्य एवं कलिंग के राजकुमार, तथा एकलव्य के पुत्र आदि निम्न वीर सम्मिलित थे –

दन्तवक्त्रस्य तनयं सुवक्त्रममितौजसम्।
सहस्राक्षसमं युद्धे मायाशतविशारदम्॥
पौण्ड्रस्य वासुदेवस्य तथा पुत्रं महाबलम्।
सुदेवं वीर्यसम्पन्नं पृथगक्षौहिणीपतिम्॥
एकलव्यस्य पुत्रं च वीर्यवन्तं महाबलम्।
पुत्रं च पाण्ड्यराजस्य कलिङ्गाधिपतिं तथा॥
(हरिवंशपुराण, विष्णुपर्व, अध्याय, ५९, श्लोक – ०३-०५)

आप सबों को करूष देश के मूर्ख राजा पौंड्रक का स्मरण तो होगा ही, जिसने स्वयं को ही विष्णु का अवतार वासुदेव घोषित कर दिया था एवं भगवान् श्रीकृष्ण को निम्न सन्देश भिजवाया था –

वासुदेवोऽवतीर्णोहमेक एव न चापरः।
भूतानामनुकम्पार्थं त्वं तु मिथ्याभिधां त्यज॥

(श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध – १०, अध्याय – ६६, श्लोक – ०५)

हे कृष्ण ! मैं ही वास्तविक वासुदेव हूँ, मेरे अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है। मैंने ही प्राणियों पर कृपा करने के लिए अवतार लिया है इसीलिए तुम अपना यह झूठ का आवरण छोड़ दो।

यह पौंड्रक बाद में सात्यकि के हाथों पराजित होता हुआ, अन्त में श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया था, किन्तु यहां ध्यातव्य है कि इसके पक्ष से लड़ने के लिए एकलव्य भी आया हुआ था एवं बलराम जी मे उस युद्ध में एकलव्य को मानो रौंद ही डाला था। उस विशाल युद्ध की एक झलक देखें –

ततः शक्तिं समादाय घण्टामालाकुलां नृपः।
निषादो बलदेवाय प्रेषयित्वा महाबलः॥
सिंहनादं महाघोरमकरोत् स निषादपः।
सा शक्तिः सर्वकल्याणी बलदेवमुपागमत्॥
उत्पतन्तीं महाघोरां बलभद्रः प्रतापवान्।
आदायाथ निषादेशं सर्वान् विस्मापयन्निव॥
तयैव तं जघानाशु वक्षोदेशे च माधवः।
स तया ताडितो वीरः स्वशक्त्याथ निषादपः॥
विह्वलः सर्वगात्रेषु निपपात महीतले।
प्राणसंशयमापन्नो निषादो रामताडितः॥

(हरिवंशपुराण, भविष्यपर्व, अध्याय -९८, श्लोक – ११-१५)

तब महाबली निषादराज एकलव्य ने घण्टियों से सुशोभित, एक शक्ति (विशेष प्रक्षेपास्त्र) बलराम जी की ओर चलाकर घोर अट्टहास किया। वह शक्ति ज बलरामजी के पास आयी तो अपने ऊपर गिरती हुई उस महाघोर शक्ति को प्रतापी बलभद्र जी ने पकड़ लिया और उसे वापस निषादराज की ओर ही चला दिया, इस बात से सभी आश्चर्यचकित हो गए। उस शक्ति से माधव बलराम जी ने एकलव्य की छाती पर प्रहार किया। अपनी ही चलाई हुई उस शक्ति के प्रहार से निषादराज के सभी अंग व्याकुल हो गए और बलराम जी के द्वारा मारे जाने पर वह मरणासन्न होकर भूमि पर गिर पड़ा।

युद्धकला को सीखने के लिए मात्र प्रतिभाशाली ही होना आवश्यक नहीं है अपितु पवित्र उद्देश्य, धैर्य, लोकोपकार की भावना, आदि भी आवश्यक है। यह सभी गुण अर्जुन में थे, इसीलिए उन्हें स्वर्ग से भी निमंत्रण मिला। साथ ही शिवजी की कृपा से अनेकों दुर्लभ दिव्यास्त्र मिले। एकलव्य में प्रतिभा तो थी किन्तु सद्भावना नहीं थी। आज भी बहुत से कुशाग्र बुद्धि वाले डॉक्टर, इंजीनियर, वकील एवं वैज्ञानिक अपनी दुर्भावना के कारण आतंकवादी बन जा रहे हैं तो क्या उनकी प्रतिभा के कारण उनका सम्मान किया जाएगा ? द्रोणाचार्य तो इतने अधिक संवेदनशील गुरु थे कि धैर्य आदि गुणों से रहित होने के कारण उन्होंने अपने सगे पुत्र अश्वत्थामा को भी बारम्बार मांगने पर भी ब्रह्मशिर जैसा दिव्य अस्त्र नहीं दिया, ब्रह्मास्त्र को केवल चलाने की विधि बताई, उसे लौटाने की नहीं, किन्तु अर्जुन को उन्होंने ब्रह्मशिर भी दिया और ब्रह्मास्त्र लौटाने की विधि भी बताई, क्योंकि अर्जुन उचित पात्र थे। इस प्रकार हम देखते हैं कि द्रोणाचार्य ने जब अपने पुत्र के साथ भी योग्यता की इतनी गम्भीर विवेचना करते हुए निर्णय लिया तो जिसका पूर्व का आचरण ही संदिग्ध रहा हो उस एकलव्य को कैसे अपनी विद्या दे देते, अतएव हम समझते हैं कि एकलव्य पर कोई अत्याचार नहीं हुआ था।

श्रीमन्महामहिम विद्यामार्तण्ड श्रीभागवतानंद गुरु
His Holiness Shri Bhagavatananda Guru

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प्राचीन भारतीय सृष्टि विज्ञान एवं दर्शन को रुपायित करती यह घड़ी बहुत अच्छी लगी।
हम सभी को यह स्मरण दिलाती है कि

जब 1 बजे तो स्मरण हो कि ब्रम्ह एक है…!

2 बजने पर सृष्टि विकास में युगल देवों अर्थात अश्विनी और कुमार (रात दिन,पृथ्वी स्वर्ग,विद्युत चुम्बक,इडा पिंगला,दोनों नासापुट,सूर्य चंद्र, दान पुण्य,वैद्य यौवन प्रदाता,आदि) का स्मरण।

3 अर्थात तीन गुण – सत्व, रज और तम।

4 अर्थात चारों वेद – ऋ क, यजु:,साम,और अथर्व।

5 अर्थात पांच प्राण – प्राण,अपान, उदान, व्यान और समान।

6 अर्थात छ रस – अम्ल,नमकीन,कटु, तिक्त,कषाय और मधुर।

7 अर्थात सात ऋषि प्राण – अत्रि,कश्यप,वशिष्ठ,विश्वामित्र,भारद्वाज,गौतम और जमदग्नि।

8 अर्थात आठ सिद्धियां – अनिमा,लघिमा,गरिमा,महिमा,प्राप्ति,प्राकाम्य,इशित्व और वशीकरण।

9 अर्थात नौ द्रव्य – पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु,आकाश,दिक – काल, मन और आत्मा।

10 अर्थात दस दिशाएं – पूर्व,आग्नेय,दक्षिण, नैरित्य,पश्चिम,वायव्य,उत्तर,ईशान,ऊपर और नीचे।

11 अर्थात ग्यारह रुद्र – कपाली,पिंगल,भीम,विरूपाक्ष,विलोहित,शास्ता,अजपाद, अहिर्बुधन्य,शंभू,चंड,और भव।

12 बजने पर स्मरण हो कि बारह आदित्य (जो कि 12 मास के रूप में सृष्टि चक्र को संचालित करते हैं ) – अंशुमान, भग, पूषा,धाता,मित्र,अर्यमा,वरुण, विवस्वान,सविता,शुक्र,त्वष्टा और विष्णु।

सभी भारतीय इस अद्भुत सृष्टि विज्ञान का चिंतन स्मरण इस घड़ी के माध्यम से करने का आनंद लें।

साभार
-डॉ रामेश्वर आमेटा

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सुनील त्रिवेदी

यज्ञादि कर्मों में अग्नि के नाम एवं वेदों में अग्नि की महत्ता :-


अग्नि की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पौराणिक गाथा इस प्रकार है-सर्वप्रथम धर्म की वसु नामक पत्नी से अग्नि उत्पन्न हुआ। उसकी पत्नी स्वाहा से उसके तीन पुत्र हुए-

पावक
पवमान
शुचि

छठे मन्वन्तर में वसु की वसुधारा नामक पत्नी से द्रविणक आदि पुत्र हुए, जिनमें 45 अग्नि-संतान उत्पन्न हुए। इस प्रकार सब मिलाकर 49 अग्नि हैं। विभिन्न कर्मों में अग्नि के भिन्न-भिन्न नाम हैं। लौकिक कर्म में अग्नि का प्रथम नाम पावक है। गृहप्रवेश आदि में निम्नांकित अन्य नाम प्रसिद्ध हैं-

अग्नेस्तु मारुतो नाम गर्भाधाने विधीयते।
पुंसवने चन्द्रनामा शुगांकर्मणि शोभन:।।
सीमन्ते मंगलो नाम प्रगल्भो जातकर्मणि।
नाग्नि स्यात्पार्थिवी ह्यग्नि: प्राशने च शुचिस्तथा।।
सत्यनामाथ चूडायां व्रतादेशे समुद्भव:।
गोदाने सूर्यनामा च केशान्ते ह्यग्निरुच्यते।।
वैश्वानरो विसर्गे तु विवाहे योजक: स्मृत:।
चतुर्थ्यान्तु शिखी नाम धृतिरग्निस्तथा परे।।
प्रायश्चित्ते विधुश्चैव पाकयज्ञे तु साहस:।
लक्षहोमे तु वह्नि:स्यात कोटिहोमे हुताश्न:।।
पूर्णाहुत्यां मृडो नाम शान्तिके वरदस्तथा।
पौष्टिके बलदश्चैव क्रोधाग्निश्चाभिचारिके।।
वश्यर्थे शमनी नाम वरदानेऽभिदूषक:।
कोष्ठे तु जठरी नाम क्रव्यादो मृतभक्षणे।।

अर्थात

गर्भाधान में अग्नि को “मारुत” कहते हैं।
पुंसवन में “चन्द्रमा
शुगांकर्म में “शोभन
सीमान्त में “मंगल
जातकर्म में ‘प्रगल्भ
नामकरण में “पार्थिव
अन्नप्राशन में ‘शुचि
चूड़ाकर्म में “सत्य
व्रतबन्ध (उपनयन) में “समुद्भव
गोदान में “सूर्य
केशान्त (समावर्तन) में “अग्नि
विसर्ग (अर्थात् अग्निहोत्रादिक्रियाकलाप) में “वैश्वानर
विवाह में “योजक
चतुर्थी में “शिखी
धृति में “अग्नि
प्रायश्चित (अर्थात् प्रायश्चित्तात्मक महाव्याहृतिहोम) में “विधु
पाकयज्ञ (अर्थात् पाकांग होम, वृषोत्सर्ग, गृहप्रतिष्ठा आदि में) ‘साहस
लक्षहोम में “वह्नि
कोटि होम में “हुताशन
पूर्णाहुति में “मृड
शान्ति में “वरद
पौष्टिक में “बलद
आभिचारिक में “क्रोधाग्नि
वशीकरण में “शमन
वरदान में “अभिदूषक
कोष्ठ में “जठर
और मृत भक्षण में “क्रव्याद” कहा गया है।

ऋग्वेद के अनुसार:-


हिन्दू देवमण्डल का प्राचीनतम सदस्य, वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। अग्नि के तीन स्थान और तीन मुख्य रूप हैं-

व्योम से सूर्य
अन्तरिक्ष (मध्याकाश) में विद्युत
पृथ्वी पर साधारण अग्नि

अग्नि की तुलना बृहस्पति और ब्रह्मणस्पति से भी की गई है। वह मंत्र, धी (बुद्धि) और ब्रह्म का उत्पादक है। इस प्रकार का अभेद सूक्ष्मतम तत्त्व से दर्शाया गया है। वैदिक साहित्य में अग्नि के जिस रूप का वर्णन है, उससे विश्व के वैज्ञानिक और दार्शनिक तत्त्वों पर काफ़ी प्रकाश पड़ता है। जैमिनी ने मीमांसासूत्र के “हवि:प्रक्षेपणाधिकरण” में अग्नि के छ: प्रकार बताये हैं-

गार्हपत्य
आहवनीय
दक्षिणाग्नि
सभ्य
आवसथ्य
औपासन

‘अग्नि शब्द का व्युत्पत्त्यर्थ इस प्रकार है : जो ऊपर की ओर जाता है'(अगि गतौ, अंगेनलोपश्च, अंग्+नि और नकार का लोप)।

वैदिक धर्म के अनुसार:-
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अवेस्ता में अग्नि को पाँच प्रकार का माना गया है। परन्तु अग्नि की जितनी उदात्त तथा विशद कल्पना वैदिक धर्म में है, उतनी अन्यंत्र कहीं पर भी नहीं है। वैदिक कर्मकाण्ड का श्रौत भाग और गृह्य का मुख्य केन्द्र अग्निपूजन ही है। वैदिक देवमण्डल में इन्द्र के अनन्तर अग्नि का ही दूसरा स्थान है। जिसकी स्तुति लगभग दो सौ सूक्तों में वर्णित है। अग्नि के वर्णन में उसका पार्थिव रूप ज्वाला, प्रकाश आदि वैदिक ऋषियों के सामने सदा विद्यमान रहता है। अग्नि की तुलना अनेक पशुओं से की गई है। प्रज्वलित अग्नि गर्जनशील वृषभ के समान है। उसकी ज्वाला सौर किरणों के तुल्य, उषा की प्रभा तथा विद्युत की चमक के समान है। उसकी आवाज़ आकाश की गर्जन जैसी गम्भीर है। अग्नि के लिए विशेष गुणों को लक्ष्य कर अनेक अभिधान प्रयुक्त करके किए जाते हैं। अग्नि शब्द का सम्बन्ध लातोनी ‘इग्निस्’ और लिथुएनियाई ‘उग्निस्’ के साथ कुछ अनिश्चित सा है, यद्यपि प्रेरणार्थक अज् धातु के साथ भाषा शास्त्रीय दृष्टि से असम्भव नहीं है। प्रज्वलित होने पर धूमशिखा के निकलने के कारण धूमकेतु इस विशिष्टिता का द्योतक एक प्रख्यात अभिधान है। अग्नि का ज्ञान सर्वव्यापी है और वह उत्पन्न होने वाले समस्त प्राणियों को जानता है। इसलिए वह ‘जातवेदा:’ के नाम से विख्यात है। अग्नि कभी द्यावापृथिवी का पुत्र और कभी द्यौ: का सूनु (पुत्र) कहा गया है। उसके तीन जन्मों का वर्णन वेदों में मिलता है। जिनके स्थान हैं-स्वर्ग, पृथ्वी तथा जल। स्वर्ग, वायु तथा पृथ्वी अग्नि के तीन सिर, तीन जीभ तथा तीन स्थानों का बहुत निर्देश वेद में उपलब्ध होता है। अग्नि के दो जन्मों का भी उल्लेख मिलता है-भूमि तथा स्वर्ग। अग्नि के आनयन की एक प्रख्यात वैदिक कथा ग्रीक कहानी से साम्य रखती है। अग्नि का जन्म स्वर्ग में ही मुख्यत: हुआ, जहाँ से मातरिश्वा ने मनुष्यों के कल्याणार्थ उसका इस भूतल पर आनयन किया। अग्नि प्रसंगत: अन्य समस्त वैदिक देवों में प्रमुख माना गया है। अग्नि का पूजन भारतीय संस्कृति का प्रमुख चिह्न है और वह गृहदेवता के रूप में उपासना और पूजा का एक प्रधान विषय है। इसलिए अग्नि ‘गृहा’, ‘गृहपति’ (घर का स्वामी) तथा ‘विश्वपति’ (जन का रक्षक) कहलाता है।

रूप का वर्णन:-
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अग्नि के रूप का वर्णन इस प्रकार है-

पिंगभ्रूश्मश्रुकेशाक्ष: पीनांगजठरोऽरुण:।
छागस्थ: साक्षसूत्रोऽग्नि: सप्तार्चि: शक्तिधारक:।।

भौहें, दाढ़ी, केश और आँखें पीली हैं। अंग स्थूल हैं और उदर लाल है। बकरे पर आरूढ़ हैं, अक्षमाला लिये है। इसकी सात ज्वालाएँ हैं और शक्ति को धारण करता है।

शुभ लक्षण:-


होम योग्य अग्नि के शुभ लक्षण निम्नांकित हैं-
अर्चिष्मान् पिण्डितशिख: सर्पि:काञ्चनसन्निभ:।
स्निग्ध: प्रदक्षिणश्चैव वह्नि: स्यात् कार्यसिद्धये।।

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मृत्यु भय


देवी सिंग तोमर

।।श्रीगणेशाय नमः।।

शरीर को वस्त्र मानने से मृत्यु के भय का विनाश ?

मैनें अपने क्षेत्र
में वृद्ध लोगों के मुँह से नाग और नागिन के कामदेव के वश में होने की एक किवदन्ती सुनी है।
बुजुर्गों का कहना है कि जब नाग और नागिन काम वश होकर आपस में एक दूसरे से प्रेम करते हैं उस अवस्था में उन्हें यदि कोई देख ले तो सर्प उस व्यक्ति के पीछे उसे डसने के लिए भागता है सर्प को 84 लाख योनियों में सबसे ज्यादा क्रोधी स्वभाव का माना गया है।ऐसी अवस्था में तो और भी उसका क्रोध बढ़ जाता है उस समय उससे बचने का केवल एक ही उपाय है भागता हुआ व्यक्ति अपने उत्तरीय वस्त्र अर्थात् शरीर से कोई कपड़ा उतार कर फेंक दे तो सर्प उस वस्त्र को व्यक्ति समझकर उससे लिपटकर बार-बार काटता है, तबतक मनुष्य भाग जाता है। ये बात उन लोगों ने मुझे बताई जिनके साथ ऐसा हुआ। अब ये भले ही मिथ्या क्यों न हो परन्तु इस दृष्टांत से वेदान्त-दर्शन का सिद्धान्त बहुत ज्यादा सिद्ध होता है क्योंकि काल की हमारे ग्रन्थों ने सर्प से तुलना की है।
रामचरितमानस में–

काल व्याल कर भक्षक जोई

श्रीमद्भागवत महापुराण में–

काल व्याल मुख ग्रास त्रास निर्णास हेतवे

इस प्रकार अन्य शास्त्रों में भी काल को भयंकर ब्याल बताया है। अब असली सिद्धान्त पर विचार करें। काल रूपी सर्प हर प्राणी के पीछे भाग रहा है। उससे बचने का क्या उपाय किया जाये बस यही उपाय सर्वश्रेष्ठ है जैसे भागते हुए व्यक्ति ने वस्त्र उतार के पीछे फेंक दिया उसी प्रकार आप भी अपने शरीर रूपी वस्त्र को अनित्य, असत्य, मरणधर्मा समझकर काल को समर्पित कर दो तो आपका आत्मा जो कभी मरता नहीं बेदाग बच जायेगा। जो हमें मरने का भय लगा है वह सदा के लिए समाप्त हो जाएगा।
यही वेदान्त का अटल सिद्धान्त है।