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सिताला दुबे

पूजा से सम्बंधित तीस आवश्यक नियम अवश्य पढ़ें और अनुसरण करें।
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सुखी और समृद्धिशाली जीवन के लिए देवी-देवताओं के पूजन की परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है। आज भी बड़ी संख्या में लोग इस परंपरा को निभाते हैं। पूजन से हमारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, लेकिन पूजा करते समय कुछ खास नियमों का पालन भी किया जाना चाहिए।

अन्यथा पूजन का शुभ फल पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं हो पाता है। यहां 30 ऐसे नियम बताए जा रहे हैं जो सामान्य पूजन में भी ध्यान रखना चाहिए। इन बातों का ध्यान रखने पर बहुत ही जल्द शुभ फल प्राप्त हो सकते हैं।

ये नियम इस प्रकार हैं…
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1👉 सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु, ये पंचदेव कहलाते हैं, इनकी पूजा सभी कार्यों में अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। प्रतिदिन पूजन करते समय इन पंचदेव का ध्यान करना चाहिए। इससे लक्ष्मी कृपा और समृद्धि प्राप्त होती है।

2👉 शिवजी, गणेशजी और भैरवजी को तुलसी नहीं चढ़ानी चाहिए।

3👉 मां दुर्गा को दूर्वा (एक प्रकार की घास) नहीं चढ़ानी चाहिए। यह गणेशजी को विशेष रूप से अर्पित की जाती है।

4👉 सूर्य देव को शंख के जल से अर्घ्य नहीं देना चाहिए।

5👉 तुलसी का पत्ता बिना स्नान किए नहीं तोड़ना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति बिना नहाए ही तुलसी के पत्तों को तोड़ता है तो पूजन में ऐसे पत्ते भगवान द्वारा स्वीकार नहीं किए जाते हैं।

6👉 शास्त्रों के अनुसार देवी-देवताओं का पूजन दिन में पांच बार करना चाहिए। सुबह 5 से 6 बजे तक ब्रह्म मुहूर्त में पूजन और आरती होनी चाहिए। इसके बाद प्रात: 9 से 10 बजे तक दूसरी बार का पूजन। दोपहर में तीसरी बार पूजन करना चाहिए।
इस पूजन के बाद भगवान को शयन करवाना चाहिए। शाम के समय चार-पांच बजे पुन: पूजन और आरती। रात को 8-9 बजे शयन आरती करनी चाहिए। जिन घरों में नियमित रूप से पांच * पूजन किया जाता है, वहां सभी देवी-देवताओं का वास होता है और ऐसे घरों में धन-धान्य की कोई कमी नहीं होती है।

7👉 प्लास्टिक की बोतल में या किसी अपवित्र धातु के बर्तन में गंगाजल नहीं रखना चाहिए। अपवित्र धातु जैसे एल्युमिनियम और लोहे से बने बर्तन। गंगाजल तांबे के बर्तन में रखना शुभ रहता है।

8👉 स्त्रियों को और अपवित्र अवस्था में पुरुषों को शंख नहीं बजाना चाहिए। यह इस नियम का पालन नहीं किया जाता है तो जहां शंख बजाया जाता है, वहां से देवी लक्ष्मी चली जाती हैं।

9👉 मंदिर और देवी-देवताओं की मूर्ति के सामने कभी भी पीठ दिखाकर नहीं बैठना चाहिए।

10👉 केतकी का फूल शिवलिंग पर अर्पित नहीं करना चाहिए।

11👉 किसी भी पूजा में मनोकामना की सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढ़ानी चाहिए। दक्षिणा अर्पित करते समय अपने दोषों को छोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। दोषों को जल्दी से जल्दी छोड़ने पर मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होंगी।

12👉 दूर्वा (एक प्रकार की लंबी गांठ वाली घास) रविवार को नहीं तोडऩी चाहिए।

13👉 मां लक्ष्मी को विशेष रूप से कमल का फूल अर्पित किया जाता है। इस फूल को पांच दिनों तक जल छिड़क कर पुन: चढ़ा सकते हैं।

14👉 शास्त्रों के अनुसार शिवजी को प्रिय बिल्व पत्र छह माह तक बासी नहीं माने जाते हैं। अत: इन्हें जल छिड़क कर पुन: शिवलिंग पर अर्पित किया जा सकता है।

15👉 तुलसी के पत्तों को 11 दिनों तक बासी नहीं माना जाता है। इसकी पत्तियों पर हर रोज जल छिड़कर पुन: भगवान को अर्पित किया जा सकता है।

16👉 आमतौर पर फूलों को हाथों में रखकर हाथों से भगवान को अर्पित किया जाता है। ऐसा नहीं करना चाहिए। फूल चढ़ाने के लिए फूलों को किसी पवित्र पात्र में रखना चाहिए और इसी पात्र में से लेकर देवी-देवताओं को अर्पित करना चाहिए।

17👉 तांबे के बर्तन में चंदन, घिसा हुआ चंदन या चंदन का पानी नहीं रखना चाहिए।

18👉 हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि कभी भी दीपक से दीपक नहीं जलाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति दीपक से दीपक जलते हैं, वे रोगी होते हैं।

19👉 बुधवार और रविवार को पीपल के वृक्ष में जल अर्पित नहीं करना चाहिए।

20👉 पूजा हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख रखकर करनी चाहिए। यदि संभव हो सके तो सुबह 6 से 8 बजे के बीच में पूजा अवश्य करें।

21👉 पूजा करते समय आसन के लिए ध्यान रखें कि बैठने का आसन ऊनी होगा तो श्रेष्ठ रहेगा।

22👉 घर के मंदिर में सुबह एवं शाम को दीपक अवश्य जलाएं। एक दीपक घी का और एक दीपक तेल का जलाना चाहिए।

23👉 पूजन-कर्म और आरती पूर्ण होने के बाद उसी स्थान पर खड़े होकर 3 परिक्रमाएं अवश्य करनी चाहिए।

24👉 रविवार, एकादशी, द्वादशी, संक्रान्ति तथा संध्या काल में तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ना चाहिए।

25👉 भगवान की आरती करते समय ध्यान रखें ये बातें- भगवान के चरणों की चार बार आरती करें, नाभि की दो बार और मुख की एक या तीन बार आरती करें। इस प्रकार भगवान के समस्त अंगों की कम से कम सात बार आरती करनी चाहिए।

26👉 पूजाघर में मूर्तियाँ 1 ,3 , 5 , 7 , 9 ,11 इंच तक की होनी चाहिए, इससे बड़ी नहीं तथा खड़े हुए गणेश जी,सरस्वतीजी, लक्ष्मीजी, की मूर्तियाँ घर में नहीं होनी चाहिए।

27👉 गणेश या देवी की प्रतिमा तीन तीन, शिवलिंग दो,शालिग्राम दो,सूर्य प्रतिमा दो,गोमती चक्र दो की संख्या में कदापि न रखें।

28👉 अपने मंदिर में सिर्फ प्रतिष्ठित मूर्ति ही रखें उपहार,काँच, लकड़ी एवं फायबर की मूर्तियां न रखें एवं खण्डित, जलीकटी फोटो और टूटा काँच तुरंत हटा दें। शास्त्रों के अनुसार खंडित मूर्तियों की पूजा वर्जित की गई है।

जो भी मूर्ति खंडित हो जाती है, उसे पूजा के स्थल से हटा देना चाहिए और किसी पवित्र बहती नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए। खंडित मूर्तियों की पूजा अशुभ मानी गई है। इस संबंध में यह बात ध्यान रखने योग्य है कि सिर्फ शिवलिंग कभी भी, किसी भी अवस्था में खंडित नहीं माना जाता है।

29👉 मंदिर के ऊपर भगवान के वस्त्र, पुस्तकें एवं आभूषण आदि भी न रखें मंदिर में पर्दा अति आवश्यक है अपने पूज्य माता –पिता तथा पित्रों का फोटो मंदिर में कदापि न रखें, उन्हें घर के नैऋत्य कोण में स्थापित करें।

30👉 विष्णु की चार, गणेश की तीन,सूर्य की सात, दुर्गा की एक एवं शिव की आधी परिक्रमा कर सकते हैं।
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KANADA SOOTRAM AND NEWTON’S LAWS OF MOTION.

Acharya Prashastapada (आचार्यः प्रशस्तपादः) says in कर्मनिरूपण प्रकरणम् of पदार्थधर्मसंग्रहः, a commentary on Kanada Sootram (कणादसूत्रम्): “वेगो मूर्तिमत्सु पञ्चसु द्रव्येषु निमित्तविशेषापेक्षात् कर्मणो जायते नियतदिक्क्रियाप्रबन्धहेतुः स्पर्शवद्द्रव्यसंयोगविशेषविरोधी क्वचित् कारणगुणपूर्वक्रमेणोत्पद्यते”।
If we break this sentence, we get the three Newton’s Laws of Motion and more.

1) वेगः निमित्तविशेषात् कर्मणो जायते।
Meaning: Change of motion is due to impressed force.
This is same as Newton’s first law of motion.

2) वेगः निमित्तापेक्षात् कर्मणो जायते नियतदिक क्रियाप्रबन्धहेतुः।
Meaning: Change of motion is proportional to the impressed force and is in the direction of the force.
This is same as Newton’s second law of motion.

3) वेगः संयोगविशेषविरोधी।
Meaning: Action and reaction are equal and opposite.
This is same as Newton’s third law of motion.

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महाभारतान्तर्गत चक्रवर्ती आर्य राजाओं का परिचय

प्रियांशु सेठ

आर्यजगत् के पुनरुद्धारक स्वामी दयानन्दजी सरस्वती अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के एकादश समुल्लास में चक्रवर्ती राजाओं के विषय में मैत्र्युपनिषद् का प्रमाण उद्धृत करते हुए लिखते हैं- “सृष्टि से लेकर महाभारतपर्यन्त चक्रवर्ती सार्वभौम राजा आर्यकुल में ही हुए थे। अब इनके सन्त्तानों का अभाग्योदय होने से राजभ्रष्ट होकर विदेशियों के पादाक्रान्त हो रहे हैं। जैसे यहां सुद्युम्न, भूरिद्युम्न, इन्द्रद्युम्न, कुवलयाश्व, यौवनाश्व, वद्ध्र्यश्व, अश्वपति, शशविन्दु, हरिश्चन्द्र, अम्बरीष, ननक्तु, शर्याति, ययाति, अनरण्य, अक्षसेन, मरुत्त और भरत सार्वभौम सब भूमि में प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजाओं के नाम लिखे हैं वैसे स्वायम्भुवादि चक्रवर्ती राजाओं के नाम स्पष्ट मनुस्मृति, महाभारतादि ग्रन्थों में लिखे हैं। इस को मिथ्या करना अज्ञानी और पक्षपातियों का काम है।” इन राजाओं का राज्य आर्यावर्त्त देश से लेकर समस्त भूमण्डल पर था। आर्यावर्त्त देश विद्या का आदिस्त्रोत होने हेतु आदिसभ्यता का प्रकाशक भी है। पश्चिमी विद्वानों में अत्यन्त प्रतिष्ठित मातृलिंग (Maeterlinck) अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘Secret Heart’ में लिखते हैं-

“It is now hardly to be contested that the source (of knowledge) is to be found in India. Thence in all probability the sacred teaching spread in to Egypt, found its way to ancient Persia and Chaldia, permitted the Hebrew race and crept in Greece and the south of Europe, finally reaching China and even America.” -Pg. 5
अर्थात्- अब इसपर विवाद की कोई गुंजायश नहीं कि (विद्या का) मूल स्थान भारतवर्ष में पाया जाता है। सम्भवतः वहां से यह शिक्षा मिश्र में फैली, मिश्र से प्राचीन ईरान तथा कालडिया (अरब देश) का मार्ग पकड़ा, यहूदी जाति को प्रभावित किया, फिर यूनान तथा यूरोप के दक्षिण भाग में प्रविष्ट हुई, अन्त में चीन और अमरीका में पहुंची।

फ्रांस के महान् सन्त एवं विचारक क्रूज़े (Cruiser) ने बलपूर्वक लिखा है-

“Is there is a country which can rightly claim the honour of being the cradle of human race or at least the scene of primitive civilisation, the successive developments of which carried in all parts of the ancient world, and even beyond, the blessings of knowledge which is the second life of man, that country assuredly is India.” -J. beatie : Civilisation and Progress
अर्थात्- यदि कोई देश वास्तव में मनुष्य-जाति का पालक होने अथवा उस आदिसभ्यता का, जिसने विकसित होकर संसार के कोने-कोने में ज्ञान का प्रसार किया, स्त्रोत होने का दावा कर सकता है, तो निश्चय ही वह देश भारत है।

इसी आर्यावर्त्त का नाम ही ब्रह्मावर्त्त, ब्रह्मर्षि देश से भी प्रसिद्ध है (देखो- मनु० २/१७-२२ एवं पातंजल-व्याकरण-महाभाष्य २/४/१० व ६/३/१०९)। वैदिक शिक्षा के प्रभाव से इस देश के राजाओं में किसी प्रकार का कोई दुराचार विद्यमान नहीं था इसलिए इनकी प्रजा इनसे अत्यन्त प्रसन्न व सन्तुष्ट रहती थी। हम अपने पक्ष में पाठकों के समक्ष महाभारत (अनुशासन पर्व, अध्याय १६५) में आए चक्रवर्ती राजाओं के कुछ नामों व उनकी राज्य-व्यवस्था का उल्लेख करेंगे-

१. महाराजा मरुत्त- राजा मरुत्त जब इस पृथिवि का शासन करते थे उस समय यह पृथिवी बिना जोते-बोए ही अन्न पैदा करती थी और समस्त भूमण्डल में देवालयों की माला-सी दृष्टिगोचर होती थी जिससे इस पृथिवी की बड़ी शोभा बनी हुई थी। (द्रोणपर्व ५५/४४)

२. महाराजा सुहोत्र- राजा सुहोत्र को पाकर पृथिवी का वसुमती नाम सार्थक हो गया था। जिस समय वे जनपद के स्वामी थे उन दिनों वहां की नदियां अपने जल के साथ सुवर्ण बहाया करती थीं। (द्रोणपर्व ५६/६)

३. महाराजा शिवि- औशीनर के सुपुत्र शिवि ने इस सम्पूर्ण पृथिवी को चमड़े की भांति लपेट लिया था, अर्थात् सर्वथा अपने आधीन कर लिया था। वह अपने रथ की ध्वनि से पृथिवी को प्रतिध्वनित करते हए एकमात्र विजयशील रथ के द्वारा इस भूमण्डल को एकछत्र शासन करते थे। आज संसार में जंगली पशुओं सहित जितने गाय, बैल, और घोड़े हैं उतनी संख्या में उशीनर-पुत्र शिवि ने अपने यज्ञ में केवल गौओं का दान किया था। प्रजापति ब्रह्मा ने इन्द्र के तुल्य पराक्रमी उशीनर-पुत्र राजा शिवि के सिवाय सम्पूर्ण राजाओं में भूत या भविष्यकाल के किसी राजा को ऐसा सम्मान नहीं दिया जो शिवि का कार्यभार वहन कर सकता हो। (द्रोणपर्व ५८/१,२,६,७,८)

४. सम्राट् भरत- दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र महाधनी, महामनस्वी, महातेजस्वी भरत ने पूर्व-काल में देवताओं की प्रसन्नता के लिए यमुना के तट पर तीन सौ, सरस्वती के तट पर बीस और गंगा के तट पर चौदह अश्वमेध यज्ञ किए थे। जैसे मनुष्य दोनों भुजाओं से आकाश को तैर नहीं सकते, उसी प्रकार सम्पूर्ण राजाओं में भरत का जो महान् कर्म है उसका दूसरे राजा अनुकरण न कर सके। (द्रोणपर्व ६८/८,९)

५. पुरुषोत्तम राम- श्रीराम अपनी प्रजा पर वैसी ही कृपा रखते थे जैसे पिता अपने औरस पुत्रों पर रखता है। उनके राज्य में कोई भी स्त्री अनाथ, विधवा नहीं हुई। श्रीराम ने जब तक राज्य का शासन किया तब तक वे अपनी प्रजा के लिए सदा ही कृपालु बने रहे। मेघ समय पर वर्षा करके खेती को अच्छे ढंग से सम्पन्न करता था; उसे बढ़ने-फलने-फूलने का अवसर देता था। राम के राज्य-शासनकाल में सदा सुकाल ही रहता था, कभी अकाल नहीं पड़ता था। राम के राज्य-शासन करते समय कभी कोई प्राणी जल में नहीं डूबता था, आग अनुचितरूप से कभी किसी को नहीं जलाती थी तथा किसी को रोग का भय नहीं होता था। स्त्रियों में भी परस्पर विवाद नहीं होता था, फिर पुरुषों की तो कथा ही क्या! श्रीराम के राज्य-शासनकाल में समस्त प्रजाएँ सम-धर्म में तत्पर रहती थीं। श्री रामचन्द्र जी जब राज्य करते थे उस समय सभी मनुष्य सन्तुष्ट, पूर्णकाम, निर्भय, स्वाधीन और सत्यव्रती थे। सभी वृक्ष बिना किसी विघ्न-बाधा के सदा फले-फूले रहते थे और समस्त गौएँ एक-एक द्रोण दूध देती थीं। महातपस्वी श्रीराम ने चौदह वर्षों तक वन में निवास करके राज्य पाने के उपरान्त दस ऐसे अश्वमेध यज्ञ किये जो सर्वथा स्तुति के योग्य थे तथा जहां किसी भी याचक के लिए दरवाजा बन्द नहीं होता था। श्री राम नवयुवक और श्याम-वर्णवाले थे। उनकी आंखों में कुछ-कुछ लालिमा शोभा देती थी। वे यूथपति गजराज के समान शक्तिशाली थे। उनकी बड़ी-बड़ी भुजाएं घुटनों तक लम्बी थीं। उनका मुख सुन्दर और कन्धे सिंह के समान थे। (द्रोणपर्व, अध्याय ५९)

६. महाराजा भगीरथ- महाराजा भगीरथ जिनके नाम पर गंगा को भागीरथी कहते हैं, तट के समीप निवास करते समय गंगाजी राजा भगीरथ के प्रताप से भारतवर्ष की ओर बहने लगी। विप्रपथगामिनी गंगा ने पुत्री-भाव को प्राप्त होकर पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले इक्ष्वाकु-वंशी यजमान भगीरथ को अपना पिता माना। (द्रोणपर्व ६०/१,६,८)

७. महाराजा दिलीप- एकाग्रचित हुए महाराजा दिलीप ने एक महायज्ञ में रत्न और धन से परिपूर्ण पृथिवी के बहुत बड़े भाग को ब्राह्मणों को दान कर दिया था। उनके यज्ञ में सोने का बना हुआ यूप शोभा पाता था। यज्ञ करते हुए इन्द्र आदि देवता सदा उसी यूप का आश्रय लेकर रहते थे। उनके यज्ञ में साक्षात् विश्वावसु बीच में बैठकर सात-स्वरों के अनुसार वीणा बजाया करते थे। उस समय सभी प्राणी यही समझते थे कि ये मेरे ही आगे बाजा बजा रहे हैं। (द्रोणपर्व ६१/२,३,५,७)

८. महाराजा मान्धाता- इसी प्रसङ्ग में महाराजा मान्धाता का वर्णन इस प्रकार है कि वे बड़े धर्मात्मा और मनस्वी थे। युद्ध में इन्द्र के समान शौर्य प्रकट करते थे। यह सारी पृथिवी एक ही दिन में उनके अधिकार में आ गई थी। मान्धाता ने समराङ्गण में राजा अङ्गार, मरुत्त, असित, गय तथा अङ्गराज बृहद्रथ को भी पराजित कर दिया था। मान्धाता ने रणभूमि में जिस समय राजा अङ्गार के साथ युद्ध किया था, उस समय देवताओं ने ऐसा समझा था कि उनके धनुष की टंकार से सारा आकाश ही फट गया है। (द्रोणपर्व ६२/९,१०) उनके राज्य के विस्तार में कहा गया-

यत्र सूर्य उदेति स्म यत्र च प्रतितिष्ठति।
सर्वं तद् यौवनाश्वस्य मान्धातु: क्षेत्रमुच्यते।। (द्रोणपर्व ६२/११)
जहां से सूर्य उदय होते हैं वहां से लेकर जहां अस्त होते हैं वहां तक का सारा क्षेत्र युवनाश्व-पुत्र मान्धाता का ही राज्य कहलाता था।

९. महाराजा ययाति- नहुष-पुत्र राजा ययाति ने समुद्रों-सहित सारी पृथिवी को जीतकर शम्यापात के द्वारा पृथिवी को नाप-नापकर यज्ञ की वेदियां बनाई, जिनसे भूतल की विचित्र शोभा होने लगी। उन वेदियों पर मुख्य-मुख्य यज्ञों का अनुष्ठान करते हुए सारी भारत-भूमि का परिक्रमण कर डाला। नहुष-पुत्र ययाति ने व्यूह-रचनायुक्त आसुर-युद्ध के द्वारा दैत्यों एवं असुरों का संहार करके यह सारी पृथिवी अपने पुत्रों को बांट दी थी। (द्रोणपर्व, अध्याय६३)

१०. महाराजा अम्बरीष- नृपश्रेष्ठ महाराज अम्बरीष को सारी प्रजा ने अपना पुण्यमय रक्षक माना था। ब्राह्मणों के प्रति अनुराग रखनेवाले राजा अम्बरीष ने यज्ञ करते समय अपने विशाल यज्ञ-मण्डप में शतशः राजाओं को उन ब्राह्मणों की सेवा में नियुक्त किया था, जो स्वयं भी हजारों यज्ञ कर चुके थे। उन यज्ञ-कुशल ब्राह्मणों ने नाभाग-पुत्र अम्बरीष की सराहना करते हुए कहा था कि ऐसा यज्ञ न तो पहले के राजाओं ने किया और न ही भविष्य में होनेवाले करेंगे। (द्रोणपर्व ६४/१२,१५,१६)

११. महाराजा शशबिन्दु- इसी प्रकार चित्ररथ के पुत्र शशबिन्दु, अमूर्त्तरथा के पुत्र राजा गय और संकृति के पुत्र राजा रन्तिदेव थे। शशबिन्दु के राज्यकाल में यह पृथ्वी हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों से भरी थी। यहां कोई विघ्न बाधा और रोग-व्याधि नहीं थी (द्रोणपर्व ६५/११)। राजा गय ने अश्वमेध नामक महायज्ञ में मणिमय रेत वाली सोने की पृथ्वी बनवाकर ब्राह्मणों को दान की थी (द्रोणपर्व ६६/११)। राजा रन्तिदेव ब्राह्मणों को ‘तुम्हारे लिए, तुम्हारे लिए’ कहकर हजारों सोने के चमकीले निष्क दान किया करते थे (द्रोणपर्व ६७/४,५)।

१२. महाराजा पृथु- वेन के पुत्र महाराज पृथु का भी महर्षियों ने महान् वन में एकत्र होकर उनका राज्याभिषेक किया था। ऋषियों ने यह सोचकर कि सब लोकों में धर्म की मर्यादा प्रथित करेंगे, स्थापित करेंगे, उनका नाम पृथु रखा था। क्षत अर्थात् दुःख से सबका त्राण करते थे इसलिए क्षत्रिय कहलाए। वेन-नन्दन पृथु को देखकर समस्त प्रजाओं ने एक-साथ कहा कि हम इनमें अनुरक्त हैं। इस प्रकार प्रजा का रञ्जन करने के कारण ही उनका नाम राजा हुआ। पृथु के शासनकाल में पृथिवी बिना जोते ही धान्य उत्पन्न करती थी। वृक्षों के पुट-पुट में मधु भरा था और सारी गौएँ एक-एक द्रोण दूध देती थीं। मनुष्य नीरोग थे, उनकी सारी कामनाएं सर्वथा परिपूर्ण थीं, उन्हें कभी किसी से कोई भय न था। सब लोग इच्छानुसार घरों में या खेतों में रह लेते थे। जब वे समुद्र की ओर यात्रा करते थे उस समय उसका जल स्थिर हो जाता था, नदियों की बाढ़ समाप्त हो जाती थी, उनके रथ की ध्वजा कभी भग्न नहीं होती थी। (द्रोणपर्व ६९/२,३,४,६,७,८,९)

सन्दर्भ ग्रन्थ-सत्यार्थ भास्कर-स्वामी विद्यानन्द एवं महाभारत

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^ राजा युधिष्ठिर की 30 पीढ़ियां

महाभारत के बाद से आधुनिक काल तक के सभी राजाओं का विवरण क्रमवार तरीके से नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है…!

आपको यह जानकर एक बहुत ही आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी होगी कि महाभारत युद्ध के पश्चात् राजा युधिष्ठिर की 30 पीढ़ियों ने 1770 वर्ष 11 माह 10 दिन तक राज्य किया था….. जिसका पूरा विवरण इस प्रकार है :
… क्र………………. शासक का नाम………. वर्ष….माह.. दिन

  1. राजा युधिष्ठिर (Raja Yudhisthir)….. 36…. 08…. 25
    2 राजा परीक्षित (Raja Parikshit)…….. 60…. 00….. 00
    3 राजा जनमेजय (Raja Janmejay)…. 84…. 07…… 23
    4 अश्वमेध (Ashwamedh )…………….. 82…..08….. 22
    5 द्वैतीयरम (Dwateeyram )…………… 88…. 02……08
    6 क्षत्रमाल (Kshatramal)………………. 81…. 11….. 27
    7 चित्ररथ (Chitrarath)…………………. 75……03…..18
    8 दुष्टशैल्य (Dushtashailya)…………… 75…..10…….24
    9 राजा उग्रसेन (Raja Ugrasain)……… 78…..07…….21
    10 राजा शूरसेन (Raja Shoorsain)…….78….07……..21
    11 भुवनपति (Bhuwanpati)…………….69….05…….05
    12 रणजीत (Ranjeet)…………………….65….10……04
    13 श्रक्षक (Shrakshak)…………………..64…..07……04
    14 सुखदेव (Sukhdev)……………………62….00…….24
    15 नरहरिदेव (Narharidev)……………..51…..10…….02
    16 शुचिरथ (Suchirath)…………………42……11…….02
    17 शूरसेन द्वितीय (Shoorsain II)……..58…..10…….08
    18 पर्वतसेन (Parvatsain )………………55…..08…….10
    19 मेधावी (Medhawi)……………………52…..10……10
    20 सोनचीर (Soncheer)…………………50…..08…….21
    21 भीमदेव (Bheemdev)………………..47……09…….20
    22 नरहिरदेव द्वितीय (Nraharidev II)…45…..11…….23
    23 पूरनमाल (Pooranmal)………………44…..08…….07
    24 कर्दवी (Kardavi)………………………44…..10……..08
    25 अलामामिक (Alamamik)……………50….11……..08
    26 उदयपाल (Udaipal)…………………..38….09……..00
    27 दुवानमल (Duwanmal)………………40….10…….26
    28 दामात (Damaat)……………………..32….00…….00
    29 भीमपाल (Bheempal)……………….58….05……..08
    30 क्षेमक (Kshemak)……………………48….11……..21

इसके बाद ….क्षेमक के प्रधानमन्त्री विश्व ने क्षेमक का वध करके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 14 पीढ़ियों ने 500 वर्ष 3 माह 17 दिन तक राज्य किया जिसका विरवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 विश्व (Vishwa)……………………. 17 3 29
2 पुरसेनी (Purseni)………………… 42 8 21
3 वीरसेनी (Veerseni)……………… 52 10 07
4 अंगशायी (Anangshayi)……….. 47 08 23
5 हरिजित (Harijit)……………….. 35 09 17
6 परमसेनी (Paramseni)…………. 44 02 23
7 सुखपाताल (Sukhpatal)……… 30 02 21
8 काद्रुत (Kadrut)………………. 42 09 24
9 सज्ज (Sajj)…………………… 32 02 14
10 आम्रचूड़ (Amarchud)……… 27 03 16
11 अमिपाल (Amipal) ………….22 11 25
12 दशरथ (Dashrath)…………… 25 04 12
13 वीरसाल (Veersaal)……………31 08 11
14 वीरसालसेन (Veersaalsen)…….47 0 14

इसके उपरांत…राजा वीरसालसेन के प्रधानमन्त्री वीरमाह ने वीरसालसेन का वध करके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 16 पीढ़ियों ने 445 वर्ष 5 माह 3 दिन तक राज्य किया जिसका विरवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 राजा वीरमाह (Raja Veermaha)……… 35 10 8
2 अजितसिंह (Ajitsingh)…………………. 27 7 19
3 सर्वदत्त (Sarvadatta)……………………..28 3 10
4 भुवनपति (Bhuwanpati)……………….15 4 10
5 वीरसेन (Veersen)……………………….21 2 13
6 महिपाल (Mahipal)……………………….40 8 7
7 शत्रुशाल (Shatrushaal)…………………26 4 3
8 संघराज (Sanghraj)……………………17 2 10
9 तेजपाल (Tejpal)…………………….28 11 10
10 मानिकचंद (Manikchand)…………37 7 21
11 कामसेनी (Kamseni)………………42 5 10
12 शत्रुमर्दन (Shatrumardan)……….8 11 13
13 जीवनलोक (Jeevanlok)………….28 9 17
14 हरिराव (Harirao)………………….26 10 29
15 वीरसेन द्वितीय (Veersen II)……..35 2 20
16 आदित्यकेतु (Adityaketu)……….23 11 13

ततपश्चात् प्रयाग के राजा धनधर ने आदित्यकेतु का वध करके उसके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 9 पीढ़ी ने 374 वर्ष 11 माह 26 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण इस प्रकार है ..

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 राजा धनधर (Raja Dhandhar)………..23 11 13
2 महर्षि (Maharshi)………………………….41 2 29
3 संरछि (Sanrachhi)……………………….50 10 19
4 महायुध (Mahayudha)…………………….30 3 8
5 दुर्नाथ (Durnath)………………………….28 5 25
6 जीवनराज (Jeevanraj)…………………..45 2 5
7 रुद्रसेन (Rudrasen)……………………..47 4 28
8 आरिलक (Aarilak)……………………..52 10 8
9 राजपाल (Rajpal)…………………………36 0 0

उसके बाद …सामन्त महानपाल ने राजपाल का वध करके 14 वर्ष तक राज्य किया। अवन्तिका (वर्तमान उज्जैन) के विक्रमादित्य ने महानपाल का वध करके 93 वर्ष तक राज्य किया। विक्रमादित्य का वध समुद्रपाल ने किया और उसकी 16 पीढ़ियों ने 372 वर्ष 4 माह 27 दिन तक राज्य किया !
जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 समुद्रपाल (Samudrapal)………….54 2 20
2 चन्द्रपाल (Chandrapal)…………….36 5 4
3 सहपाल (Sahaypal)……………….11 4 11
4 देवपाल (Devpal)…………………27 1 28
5 नरसिंहपाल (Narsighpal)………18 0 20
6 सामपाल (Sampal)……………27 1 17
7 रघुपाल (Raghupal)………..22 3 25
8 गोविन्दपाल (Govindpal)……..27 1 17
9 अमृतपाल (Amratpal)………36 10 13
10 बालिपाल (Balipal)………12 5 27
11 महिपाल (Mahipal)………..13 8 4
12 हरिपाल (Haripal)……….14 8 4
13 सीसपाल (Seespal)…….11 10 13
14 मदनपाल (Madanpal)……17 10 19
15 कर्मपाल (Karmpal)……..16 2 2
16 विक्रमपाल (Vikrampal)…..24 11 13

टिप : कुछ ग्रंथों में सीसपाल के स्थान पर भीमपाल का उल्लेख मिलता है, सम्भव है कि उसके दो नाम रहे हों।

इसके उपरांत …..विक्रमपाल ने पश्चिम में स्थित राजा मालकचन्द बोहरा के राज्य पर आक्रमण कर दिया जिसमे मालकचन्द बोहरा की विजय हुई और विक्रमपाल मारा गया। मालकचन्द बोहरा की 10 पीढ़ियों ने 191 वर्ष 1 माह 16 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 मालकचन्द (Malukhchand) 54 2 10
2 विक्रमचन्द (Vikramchand) 12 7 12
3 मानकचन्द (Manakchand) 10 0 5
4 रामचन्द (Ramchand) 13 11 8
5 हरिचंद (Harichand) 14 9 24
6 कल्याणचन्द (Kalyanchand) 10 5 4
7 भीमचन्द (Bhimchand) 16 2 9
8 लोवचन्द (Lovchand) 26 3 22
9 गोविन्दचन्द (Govindchand) 31 7 12
10 रानी पद्मावती (Rani Padmavati) 1 0 0

रानी पद्मावती गोविन्दचन्द की पत्नी थीं। कोई सन्तान न होने के कारण पद्मावती ने हरिप्रेम वैरागी को सिंहासनारूढ़ किया जिसकी पीढ़ियों ने 50 वर्ष 0 माह 12 दिन तक राज्य किया !
जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 हरिप्रेम (Hariprem) 7 5 16
2 गोविन्दप्रेम (Govindprem) 20 2 8
3 गोपालप्रेम (Gopalprem) 15 7 28
4 महाबाहु (Mahabahu) 6 8 29

इसके बाद…….राजा महाबाहु ने सन्यास ले लिया । इस पर बंगाल के अधिसेन ने उसके राज्य पर आक्रमण कर अधिकार जमा लिया। अधिसेन की 12 पीढ़ियों ने 152 वर्ष 11 माह 2 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 अधिसेन (Adhisen) 18 5 21
2 विल्वसेन (Vilavalsen) 12 4 2
3 केशवसेन (Keshavsen) 15 7 12
4 माधवसेन (Madhavsen) 12 4 2
5 मयूरसेन (Mayursen) 20 11 27
6 भीमसेन (Bhimsen) 5 10 9
7 कल्याणसेन (Kalyansen) 4 8 21
8 हरिसेन (Harisen) 12 0 25
9 क्षेमसेन (Kshemsen) 8 11 15
10 नारायणसेन (Narayansen) 2 2 29
11 लक्ष्मीसेन (Lakshmisen) 26 10 0
12 दामोदरसेन (Damodarsen) 11 5 19

लेकिन जब ….दामोदरसेन ने उमराव दीपसिंह को प्रताड़ित किया तो दीपसिंह ने सेना की सहायता से दामोदरसेन का वध करके राज्य पर अधिकार कर लिया तथा उसकी 6 पीढ़ियों ने 107 वर्ष 6 माह 22 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 दीपसिंह (Deepsingh) 17 1 26
2 राजसिंह (Rajsingh) 14 5 0
3 रणसिंह (Ransingh) 9 8 11
4 नरसिंह (Narsingh) 45 0 15
5 हरिसिंह (Harisingh) 13 2 29
6 जीवनसिंह (Jeevansingh) 8 0 1

पृथ्वीराज चौहान ने जीवनसिंह पर आक्रमण करके तथा उसका वध करके राज्य पर अधिकार प्राप्त कर लिया। पृथ्वीराज चौहान की 5 पीढ़ियों ने 86 वर्ष 0 माह 20 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।
क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 पृथ्वीराज (Prathviraj) 12 2 19
2 अभयपाल (Abhayapal) 14 5 17
3 दुर्जनपाल (Durjanpal) 11 4 14
4 उदयपाल (Udayapal) 11 7 3
5 यशपाल (Yashpal) 36 4 27

विक्रम संवत 1249 (1193 AD) में मोहम्मद गोरी ने यशपाल पर आक्रमण कर उसे प्रयाग के कारागार में डाल दिया और उसके राज्य को अधिकार में ले लिया।

इस जानकारी का स्रोत स्वामी दयानन्द सरस्वती के सत्यार्थ प्रकाश ग्रंथ, चित्तौड़गढ़ राजस्थान से प्रकाशित पत्रिका हरिशचन्द्रिका और मोहनचन्द्रिका के विक्रम संवत1939 के अंक और कुछ अन्य संस्कृत ग्रंथ है।
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जिज्ञासा और समाधान ग्रुप
की सादर प्रस्तुति
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हंस जैन रामनगर खंडवा
9827214427

🔱🔱स्वस्तिक का रहस्य जानिए🔱🔱

किसने किया स्वस्तिक का आविष्कार : ☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️
स्वस्तिक को ‘साथिया’ या ‘सातिया’ भी कहा जाता है। वैदिक ऋषियों ने अपने आध्यात्मिक अनुभवों के आधार पर कुछ विशेष चिह्नों की रचना की। मंगल भावों को प्रकट करने वाले और जीवन में खुशियां भरने वाले इन चिह्नों में से एक है स्वस्तिक। उह्नोंने स्वस्तिक के रहस्य को सविस्तार उजागर किया और इसके धार्मिक, ज्योतिष और वास्तु के महत्व को भी बताया। आज स्वस्तिक का प्रत्येक धर्म और संस्कृति में अलग-अलग रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

सिन्धु घाटी सभ्यता की खुदाई में ऐसे चिह्न व अवशेष प्राप्त हुए हैं जिससे यह प्रमाणित होता है कि कई हजार वर्ष पूर्व मानव सभ्यता अपने भवनों में इस मंगलकारी चिह्न का प्रयोग करती थी। सिन्धु घाटी से प्राप्त मुद्रा और बर्तनों में स्वस्तिक का चिह्न खुदा हुआ मिला है। उदयगिरि और खंडगिरि की गुफा में भी स्वस्तिक के चिह्न मिले हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों में स्वस्तिक का महत्व भरा पड़ा है। मोहन जोदड़ो, हड़प्पा संस्कृति, अशोक के शिलालेखों, रामायण, हरिवंश पुराण, महाभारत आदि में इसका अनेक बार उल्लेख मिलता है।

अन्य देशों में स्वस्तिक : स्वस्तिक को भारत में ही नहीं, अपितु विश्व के अन्य कई देशों में विभिन्न स्वरूपों में मान्यता प्राप्त है। जर्मनी, यूनान, फ्रांस, रोम, मिस्र, ब्रिटेन, अमेरिका, स्कैण्डिनेविया, सिसली, स्पेन, सीरिया, तिब्बत, चीन, साइप्रस और जापान आदि देशों में भी स्वस्तिक का प्रचलन किसी न किसी रूप में मिलता है। नेपाल में ‘हेरंब’ के नाम से पूजित होते हैं। बर्मा में इसे ‘प्रियेन्ने’ के नाम से जाना जाता है। मिस्र में ‘एक्टन’ के नाम से स्वस्तिक की पूजा होती है।

प्राचीन यूरोप में सेल्ट नामक एक सभ्यता थी, जो जर्मनी से इंग्लैंड तक फैली थी। वह स्वस्तिक को सूर्यदेव का प्रतीक मानती थी। उसके अनुसार स्वस्तिक यूरोप के चारों मौसमों का भी प्रतीक था।

मिस्र और अमेरिका में स्वस्तिक का काफी प्रचलन रहा है। इन दोनों जगहों के लोग पिरामिड को पुनर्जन्म से जोड़कर देखा करते थे। प्राचीन मिस्र में ओसिरिस को पुनर्जन्म का देवता माना जाता था और हमेशा उसे 4 हाथ वाले तारे के रूप में बताने के साथ ही पिरामिड को सूली लिखकर दर्शाते थे। इस तरह हम देखते हैं कि स्वस्तिक का प्रचलन प्राचीनकाल से ही हर देश की सभ्यताओं में प्रचलित रहा है।

मध्य एशिया के देशों में स्वस्तिक का निशान मांगलिक एवं सौभाग्य का सूचक माना जाता है। प्राचीन इराक (मेसोपोटेमिया) में अस्त्र-शस्त्र पर विजय प्राप्त करने हेतु स्वस्तिक चिह्न का प्रयोग किया जाता था।

बुल्गारिया में स्वस्तिक : उत्तर-पश्‍चिमी बुल्गारिया के व्रात्स (vratsa) नगर के संग्रहालय में चल रही एक प्रदर्शनी में 7,000 वर्ष प्राचीन कुछ मिट्टी की कलाकृतियां रखी हुई हैं जिस पर स्वस्तिक का चिह्न बना हुआ है। व्रास्ता शहर के निकट अल्तीमीर (altimir) नामक गांव के एक धार्मिक यज्ञ कुंड के खुदाई के समय ये कलाकृतियां मिली थीं।

स्वस्तिक है पिरामिड का प्रतीक : स्वस्तिक का आविष्कार आर्यों ने किया और पूरे विश्‍व में यह फैल गया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्वस्तिक अपने आप में एक पिरामिड है? एक कागज का स्वस्तिक बनाइए और फिर उसकी चारों भुजाओं को नीचे की ओर मोड़कर बीच में से पकड़िए। ऐसा करने पर यह पिरामिड के आकार का दिखाई देगा।

अन्य धर्मों में स्वस्तिक का प्रचलन : जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों और उनके चिह्न में स्वस्तिक को शामिल किया गया है। तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ का शुभ चिह्न है। जैन लेखों से संबंधित प्राचीन गुफाओं और मंदिरों की दीवारों पर भी यह स्वस्तिक प्रतीक अंकित मिलता है।

बौद्ध मान्यता के अनुसार स्वस्तिक वनस्पति संपदा की उत्पत्ति का कारण है। बौद्ध धर्म में स्वस्तिक को अच्छे भाग्य का प्रतीक भी माना गया है। यह भगवान बुद्ध के पग चिह्नों को दिखाता है। यही नहीं, स्वस्तिक भगवान बुद्ध के हृदय, हथेली और पैरों में भी अंकित है।

यहूदी और ईसाई धर्म में भी स्वस्तिक का महत्व है। ईसाई धर्म में स्वस्तिक क्रॉस के रूप में चिह्नित है। एक ओर जहां ईसा मसीह को सूली यानी स्वस्तिक के साथ दिखाया जाता है तो दूसरी ओर यह ईसाई कब्रों पर लगाया जाता है। स्वस्तिक को ईसाई धर्म में कुछ लोग पुनर्जन्म का प्रतीक मानते हैं।

स्वस्तिक का अर्थ : स्वस्तिक शब्द को ‘सु’ एवं ‘अस्ति’ का मिश्रण योग माना जाता है। ‘सु’ का अर्थ है शुभ और ‘अस्ति’ का अर्थ है- होना अर्थात ‘शुभ हो’, ‘कल्याण हो’। स्वस्तिक अर्थात कुशल एवं कल्याण।

क्या है स्वस्तिक : स्वस्तिक में एक-दूसरे को काटती हुई 2 सीधी रेखाएं होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएं अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ होती हैं। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती हैं। प्रथम स्वस्तिक जिसमें रेखाएं आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दाईं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘दक्षिणावर्त स्वस्तिक’ कहते हैं। दूसरी आकृति पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बाईं ओर मुड़ती है इसे ‘वामावर्त स्वस्तिक’ कहते हैं।

स्वस्तिक को 7 अंगुल, 9 अंगुल या 9 इंच के प्रमाण में बनाए जाने का विधान है। मंगल कार्यों के अवसर पर पूजा स्थान और दरवाजे की चौखट पर स्वस्तिक बनाने की परंपरा है।

मांगलिक प्रतीक : हिन्दू धर्म में स्वस्तिक को शक्ति, सौभाग्य, समृद्धि और मंगल का प्रतीक माना जाता है। घर के वास्तु को ठीक करने के लिए स्वस्तिक का प्रयोग किया जाता है। स्वस्तिक के चिह्न को भाग्यवर्धक वस्तुओं में गिना जाता है। स्वस्तिक के प्रयोग से घर की नकारात्मक ऊर्जा बाहर चली जाती है।

स्वस्तिक की खड़ी रेखा सृष्‍टि की उत्पत्ति का प्रतीक है और आड़ी रेखा सृष्‍टि के विस्तार का प्रतीक है। स्वस्तिक का मध्य बिंदु विष्णु का नाभि कमल है तो 4 बिंदु चारों दिशाओं का। ऋग्वेद में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है।

दिशाओं का प्रतीक : स्वस्तिक सभी दिशाओं के महत्व को इंगित करता है। इसका चारों दिशाओं के अधिपति देवताओं- अग्नि, इन्द्र, वरुण एवं सोम की पूजा हेतु एवं सप्तऋषियों के आशीर्वाद को प्राप्त करने में प्रयोग किया जाता है।

चार वेद, पुरुषार्थ और मार्ग का प्रतीक : हिन्दू धर्म के महत्वपूर्ण 4 सिद्धांत धर्म, अर्थ काम और मोक्ष का प्रतीक भी माना जाता है। चार वेद का प्रतीक- ऋग्, यजु, साम और अथर्व। चार मार्ग ज्ञान, कर्म, योग और भक्ति का भी यह प्रतीक है।

जीवन चक्र और आश्रमों का प्रतीक : यह मानव जीवन चक्र और समय का प्रतीक भी है। जीवन चक्र में जन्म, जवानी, बुढ़ापा और मृत्य यथाक्रम में बालपन, किशोरावस्था, जवानी और बुढ़ापा शामिल है। यही 4 आश्रमों का क्रम भी है- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास।

स्वस्तिक और वास्तु : वास्तुशास्त्र में स्वस्तिक को वास्तु का प्रतीक मान गया है। इसकी बनावट ऐसी होती है कि यह हर दिशा से एक समान दिखाए देता है। घर के वास्तु को ठीक करने के लिए स्वस्तिक का प्रयोग किया जाता है।

  • घर के मुख्य द्वार के दोनों और अष्‍ट धातु और उपर मध्य में तांबे का स्वस्तिक लगाने से सभी तरह का वस्तुदोष दूर होता है।

*पंच धातु का स्वस्तिक बनवा के प्राण प्रतिष्ठा करने के बाद चौखट पर लगवाने से अच्छे परिणाम मिलते हैं। चांदी में नवरत्न लगवाकर पूर्व दिशा में लगाने पर वास्तु दोष दूर होकर लक्ष्मी प्रप्ति होती है।

*वास्तुदोष दूर करने के लिए 9 अंगुल लंबा और चौड़ा स्वस्तिक सिंदूर से बनाने से नकारात्मक ऊर्जा सकारात्मकता में बदल जाती है।
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मांगलिक, धार्मिक कार्यों में बनाएं स्वस्तिक : धार्मिक कार्यों में रोली, हल्दी या सिंदूर से बना स्वस्तिक आत्मसंतुष्‍टी देता है। त्योहारों पर द्वार के बाहर रंगोली के साथ कुमकुम, सिंदूर या रंगोली से बनाया गया स्वस्तिक मंगलकारी होता है। इसे बनाने से देवी और देवता घर में प्रवेश करते हैं। गुरु पुष्य या रवि पुष्य में बनाया गया स्वस्तिक शांति प्रदान करता है।

व्यापार वृद्धि हेतु : यदि आपके व्यापार या दुकान में बिक्री नहीं बढ़ रही है तो 7 गुरुवार को ईशान कोण को गंगाजल से धोकर वहां सूखी हल्दी से स्वस्तिक बनाएं और उसकी पंचोपचार पूजा करें। इसके बाद वहां आधा तोला गुड़ का भोग लगाएं। इस उपाय से लाभ मिलेगा। कार्य स्थल पर उत्तर दिशा में हल्दी का स्वस्तिक बनाने से बहुत लाभ प्राप्त होता है।

देवता होंगे प्रसन्न : स्वस्तिक बनाकर उसके ऊपर जिस भी देवता की मूर्ति रखी जाती है वह तुरंत प्रसन्न होता है।

संजा में स्वस्तिक : पितृ पक्ष में बालिकाएं संजा बनाते समय गोबर से स्वस्तिक बनाती है। इससे घर में शुभता, शां‍ति और समृद्धि आती है और पितरों की कृपा भी प्राप्त होती है।

धनलाभ हेतु : प्रतिदिन सुबह उठकर विश्वासपूर्वक यह विचार करें कि लक्ष्मी आने वाली हैं। इसके लिए घर को साफ-सुथरा करने और स्नान आदि से निवृत्त होने के बाद सुगंधित वातावरण कर दें। फिर भगवान का पूजन करने के बाद अंत में देहली की पूजा करें।

देहली (देहलीज) के दोनों ओर (बाहर) की ओर स्वस्तिक बनाकर उसकी पूजा करनी चाहिए, इससे घर में बरकत होती है

बेहद शुभ है लाल और पीले रंग का स्वस्तिक : अधिकतर लोग स्वस्तिक को हल्दी से बनाते हैं। ईशान या उत्तर दिशा की दीवार पर पीले रंग का स्वस्तिक बनाने से घर में सुख और शांति बनी रहती है। यदि कोई मांगलिक कार्य करने जा रहे हैं तो लाल रंग का स्वस्तिक बनाएं। इसके लिए केसर, सिंदूर, रोली और कुंकुम का इस्मेमाल करें।

हंस जैन रामनगर खंडवा
9857214427

जिज्ञासा और समाधान ग्रुप की सादर भेंट

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जनेऊ —

जनेऊ का नाम सुनते ही सबसे पहले जो चीज़ मन मे आती है वो है धागा दूसरी चीज है ब्राम्हण ।। जनेऊ का संबंध क्या सिर्फ ब्राम्हण से है , ये जनेऊ पहनाए क्यों है , क्या इसका कोई लाभ है, जनेऊ क्या ,क्यों ,कैसे आज आपका परिचय इससे ही करवाते है —-

जनेऊकोउपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र के नाम से भी जाना जाता है ।।

हिन्दू धर्म के 24 संस्कारों (आप सभी को 16 संस्कार पता होंगे लेकिन वो प्रधान संस्कार है 8 उप संस्कार है जिनके विषय मे आगे आपको जानकारी दूँगा ) में से एक ‘उपनयन संस्कार’ के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे ‘यज्ञोपवीतधारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। उपनयन का शाब्दिक अर्थ है “सन्निकट ले जाना” और उपनयन संस्कार का अर्थ है —
“ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना”

हिन्दूधर्ममें प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। हर हिन्दू जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।ब्राह्मण ही नहीं समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म। मतलब सीधा है जनेऊ संस्कार के बाद ही शिक्षा का अधिकार मिलता था और जो शिक्षा नही ग्रहण करता था उसे शूद्र की श्रेणी में रखा जाता था(वर्ण व्यवस्था)।।

लड़कीजिसेआजीवन_ब्रह्मचर्य का पालन करना हो, वह जनेऊ धारण कर सकती है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं।

जनेऊकाआध्यात्मिक_महत्व —

जनेऊमेंतीन-सूत्र – त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक – देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक – सत्व, रज और तम के प्रतीक होते है। साथ ही ये तीन सूत्र गायत्री मंत्र के तीन चरणों के प्रतीक है तो तीन आश्रमों के प्रतीक भी। जनेऊ के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। अत: कुल तारों की संख्‍या नौ होती है। इनमे एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं। इनका मतलब है – हम मुख से अच्छा बोले और खाएं, आंखों से अच्छा देंखे और कानों से अच्छा सुने। जनेऊ में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है। ये पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों के भी प्रतीक है।

जनेऊकीलंबाई : जनेऊ की लंबाई 96 अंगुल होती है क्यूंकि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। 32 विद्याएं चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर होती है। 64 कलाओं में वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि आती हैं।

जनेऊकेलाभ —

प्रत्यक्ष_लाभ जो आज के लोग समझते है –

“”जनेऊ बाएं कंधे से दाये कमर पर पहनना चाहिये””।।

जनेऊमेंनियमहैकि –

मल-मूत्र विसर्जन के दौरान जनेऊ को दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका मूल भाव यह है कि जनेऊ कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। यह बेहद जरूरी होता है।

मतलब साफ है कि जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति ये ध्यान रखता है कि मलमूत्र करने के बाद खुद को साफ करना है इससे उसको इंफेक्शन का खतरा कम से कम हो जाता है

वोलाभजोअप्रत्यक्षहै जिसे कम लोग जानते है –

शरीर में कुल 365 एनर्जी पॉइंट होते हैं। अलग-अलग बीमारी में अलग-अलग पॉइंट असर करते हैं। कुछ पॉइंट कॉमन भी होते हैं। एक्युप्रेशर में हर पॉइंट को दो-तीन मिनट दबाना होता है। और जनेऊ से हम यही काम करते है उस point को हम एक्युप्रेश करते है ।।
कैसे आइये समझते है

कानकेनीचेवालेहिस्से (इयर लोब) की रोजाना पांच मिनट मसाज करने से याददाश्त बेहतर होती है। यह टिप पढ़नेवाले बच्चों के लिए बहुत उपयोगी है।अगर भूख कम करनी है तो खाने से आधा घंटा पहले कान के बाहर छोटेवाले हिस्से (ट्राइगस) को दो मिनट उंगली से दबाएं। भूख कम लगेगी। यहीं पर प्यास का भी पॉइंट होता है। निर्जला व्रत में लोग इसे दबाएं तो प्यास कम लगेगी।

एक्युप्रेशर की शब्दवली में इसे point जीवी 20 या डीयू 20 –
इसका लाभ आप देखे –

जीबी 20 –

कहां : कान के पीछे के झुकाव में।
उपयोग: डिप्रेशन, सिरदर्द, चक्कर और सेंस ऑर्गन यानी नाक, कान और आंख से जुड़ी बीमारियों में राहत। दिमागी असंतुलन, लकवा, और यूटरस की बीमारियों में असरदार।(दिए गए पिक में समझे)

इसके अलावा इसके कुछ अन्य लाभ जो क्लीनिकली प्रोव है –

  1. #बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से ऐसे स्वप्न नहीं आते।
  2. #जनेऊ_के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।
  3. #जनेऊ_पहनने वाला व्यक्ति सफाई नियमों में बंधा होता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है।
  4. #जनेऊकोदायें कान पर धारण करने से कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है।
  5. #दाएंकानकी नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।
  6. #कानमेंजनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।
  7. #कानपरजनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।
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🏵 नौकाशास्त्र ~ आर्यवर्त की देन 🏵

एक वामपंथी थे जिनका नाम राहुल सांकृत्यायन उर्फ केदारनाथ पांडेय ‘घुमक्कड़’ अपनी यात्रा वृतांत में लिखते है हिन्दू शास्त्र कहते है कि समुद्र को पार मत करना लिखा है। जबकि मित्रो मैंने कहीं भी ऐसा नही पढ़ा कि कहीं ऐसा लिखा।
खैर हम आते है अपने मुद्दे पर, समुद्र यात्रा भारतवर्ष में प्राचीन काल से प्रचलित रही है। महर्षि अगस्त समुद्री द्वीप-द्वीपान्तरों की यात्रा करने वाले महापुरुष थे। इसी कारण अगस्त्य ने समुद्र को पी डाला, यह कथा प्रचलित हुई होगी। संस्कृति के प्रचार के निमित्त या नए स्थानों पर व्यापार के निमित्त दुनिया के देशों में भारतीयों का आना-जाना था। “कौण्डिन्य” समुद्र पार कर दक्षिण पूर्व एशिया पहुंचे। मैक्सिको के यूकाटान प्रांत में जवातुको नामक स्थान पर प्राप्त सूर्य मंदिर के शिलालेख में महानाविक वुसुलिन के शक संवत् 885 में पहुंचने का उल्लेख मिलता है। गुजरात के लोथल में हुई खुदाई में ध्यान में आता है कि ई. पूर्व 2450 के आस-पास बने बंदरगाह द्वारा इजिप्त के साथ सीधा सामुद्रिक व्यापार होता था। 2450 ई.पू. से 2350 ई.पू. तक छोटी नावें इस बंदरगाह पर आती थीं। बाद में बड़े जहाजों के लिए आवश्यक रचनाएं खड़ी की गर्इं तथा नगर रचना भी हुई।
प्राचीन काल से अर्वाचीन काल तक के नौ निर्माण कला का उल्लेख प्रख्यात बौद्ध संशोधक भिक्षु चमनलाल ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दू अमेरिका’ में किया है। इसी प्रकार सन् 1950 में कल्याण के हिन्दू संस्कृति अंक में गंगा शंकर मिश्र ने भी विस्तार से इस इतिहास को लिखा है। *
भारतवर्ष के प्राचीन वाङ्गमय वेद, रामायण, महाभारत, पुराण आदि में जहाजों का उल्लेख आता है। *_जैसे बाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में ऐसी बड़ी नावों का उल्लेख आता है जिसमें सैकड़ों योद्धा सवार रहते थे।_

“नावां शतानां पञ्चानां”
“कैवर्तानां शतं शतम।”
“सन्नद्धानां तथा यूनान्तिष्ठक्त्वत्यभ्यचोदयत्।।”

अर्थात् – सैकड़ों सन्नद्ध जवानों से भरी पांच सौ नावों को सैकड़ों धीवर प्रेरित करते हैं।

इसी प्रकार महाभारत में यंत्र-चालित नाव का वर्णन मिलता है।

_सर्ववातसहां नावं यंत्रयुक्तां पताकिनीम्।

अर्थात् – यंत्र पताका युक्त नाव, जो सभी प्रकार की हवाओं को सहने वाली है।

कौटिलीय अर्थशास्त्र में राज्य की ओर से नावों के पूरे प्रबंध के संदर्भ में जानकारी मिलती है। 5वीं सदी में हुए वारहमिहिर कृत ‘बृहत् संहिता’ तथा 11वीं सदी के राजा भोज कृत ‘युक्ति कल्पतरु’ में जहाज निर्माण पर प्रकाश डाला गया है। नौका विशेषज्ञ भोज चेतावनी देते हैं कि नौका में लोहे का प्रयोग न किया जाए, क्योंकि संभव है समुद्री चट्टानों में कहीं चुम्बकीय शक्ति हो। तब वह उसे अपनी ओर खींचेगी, जिससे जहाज को खतरा हो सकता है।

नौकाओं के प्रकार- ‘हिन्दू अमेरिका’ (पृ.357) के अनुसार ‘युक्ति कल्पतरु’ ग्रंथ में नौका शास्त्र का विस्तार से वर्णन है। नौकाओं के प्रकार, उनका आकार, नाम आदि का विश्लेषण किया गया है।

(1) सामान्य-वे नौकाएं, जो साधारण नदियों में चल सकें।

(2) विशेष-जिनके द्वारा समुद्र यात्रा की जा सके।

उत्कृष्ट निर्माण * कल्याण (हिन्दू संस्कृति अंक-1950) में नौका की सजावट का सुंदर वर्णन आता है। *_चार श्रंग (मस्तूल) वाली नौका सफेद, तीन श्रीग वाली लाल, दो श्रृंग वाली पीली तथा एक श्रंग वाली को नीला रंगना चाहिए।_

नौका मुख – नौका की आगे की आकृति यानी नौका का मुख सिंह, महिष, सर्प, हाथी, व्याघ्र, पक्षी, मेढक़ आदि विविध आकृतियों के आधार पर बनाने का वर्णन है।

भारत पर मुस्लिम आक्रमण 7वीं सदी में प्रारंभ हुआ। उस काल में भी भारत में बड़े-बड़े जहाज बनते थे। माकर्पोलो तेरहवीं सदी में भारत में आया। वह लिखता है ‘जहाजों में दोहरे तख्तों की जुड़ाई होती थी, लोहे की कीलों से उनको मजबूत बनाया जाता था और उनके सुराखों को एक प्रकार की गोंद में भरा जाता था। इतने बड़े जहाज होते थे कि उनमें तीन-तीन सौ मल्लाह लगते थे। एक-एक जहाज पर 3 से 4 हजार तक बोरे माल लादा जा सकता था। इनमें रहने के लिए ऊपर कई कोठरियां बनी रहती थीं, जिनमें सब तरह के आराम का प्रबंध रहता था। जब पेंदा खराब होने लगता तब उस पर लकड़ी की एक नयी तह को जड़ लिया जाता था। इस तरह कभी-कभी एक के ऊपर एक 6 तह तक लगायी जाती थी।’

15 वीं सदी में निकोली कांटी नामक यात्री भारत आया। उसने लिखा कि ‘भारतीय जहाज हमारे जहाजों से बहुत बड़े होते हैं। इनका पेंदा तिहरे तख्तों का इस प्रकार बना होता है कि वह भयानक तूफानों का सामना कर सकता है। कुछ जहाज ऐसे बने होते हैं कि उनका एक भाग बेकार हो जाने पर बाकी से काम चल जाता है।’

बर्थमा नामक यात्री लिखता है ‘लकड़ी के तख्तों की जुड़ाई ऐसी होती है कि उनमें जरा सा भी पानी नहीं आता। जहाजों में कभी दो पाल सूती कपड़े के लगाए जाते हैं, जिनमें हवा खूब भर सके। लंगर कभी-कभी पत्थर के होते थे। ईरान से कन्याकुमारी तक आने में आठ दिन का समय लग जाता था।’ समुद्र के तटवर्ती राजाओं के पास जहाजों के बड़े-बड़े बेड़े रहते थे। डा. राधा कुमुद मुकर्जी ने अपनी ‘इंडियन शिपिंग’ नामक पुस्तक में भारतीय जहाजों का बड़ा रोचक एवं सप्रमाण इतिहास दिया है।

क्या वास्कोडिगामा ने भारत आने का मार्ग खोजा: ?
अंग्रेजों ने एक भ्रम और व्याप्त किया कि वास्कोडिगामा ने समुद्र मार्ग से भारत आने का मार्ग खोजा। यह सत्य है कि वास्कोडिगामा भारत आया था, पर वह कैसे आया इसके यथार्थ को हम जानेंगे तो स्पष्ट होगा कि वास्तविकता क्या है? प्रसिद्ध पुरातत्ववेता पद्मश्री डा. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने बताया कि मैं अभ्यास के लिए इंग्लैण्ड गया था। वहां एक संग्रहालय में मुझे वास्कोडिगामा की डायरी के संदर्भ में बताया गया। इस डायरी में वास्कोडिगामा ने वह भारत कैसे आया, इसका वर्णन किया है। वह लिखता है, जब उसका जहाज अफ्रीका में जंजीबार के निकट आया तो मेरे से तीन गुना बड़ा जहाज मैंने देखा। तब एक अफ्रीकन दुभाषिया लेकर वह उस जहाज के मालिक से मिलने गया। जहाज का मालिक चंदन नाम का एक गुजराती व्यापारी था, जो भारतवर्ष से चीड़ व सागवान की लकड़ी तथा मसाले लेकर वहां गया था और उसके बदले में हीरे लेकर वह कोचीन के बंदरगाह आकार व्यापार करता था। वास्कोडिगामा जब उससे मिलने पहुंचा तब वह चंदन नाम का व्यापारी सामान्य वेष में एक खटिया पर बैठा था। उस व्यापारी ने वास्कोडिगामा से पूछा, कहां जा रहे हो? वास्कोडिगामा ने कहा- हिन्दुस्थान घूमने जा रहा हूं। तो व्यापारी ने कहा मैं कल जा रहा हूं, मेरे पीछे-पीछे आ जाओ।’ इस प्रकार उस व्यापारी के जहाज का अनुगमन करते हुए वास्कोडिगामा भारत पहुंचा।
स्वतंत्र देश में यह यथार्थ नयी पीढ़ी को बताया जाना चाहिए था परन्तु दुर्भाग्य से यह नहीं हुआ। (उदयन इंदुरकर-दृष्टकला साधक- पृ. 32)

उपर्युक्त वर्णन पढक़र मन में विचार आ सकता है कि नौका निर्माण में भारत इतना प्रगत देश था तो फिर आगे चलकर यह विद्या लुप्त क्यों हुई? इस दृष्टि से अंग्रेजों के भारत में आने और उनके राज्य काल में योजनापूर्वक भारतीय नौका उद्योग को नष्ट करने के इतिहास के बारे में जानना जरूरी है। उस इतिहास का वर्णन करते हुए श्री गंगा शंकर मिश्र कल्याण के हिन्दू संस्कृति अंक (1950) में लिखते हैं-

पाश्चात्यों का जब भारत से सम्पर्क हुआ तब वे यहां के जहाजों को देखकर चकित रह गए। सत्रहवीं शताब्दी तक यूरोपीय जहाज अधिक से अधिक 6 सौ टन के थे, परन्तु भारत में उन्होंने ‘गोघा’ नामक ऐसे बड़े-बड़े जहाज देखे जो 15 सौ टन से भी अधिक के होते थे। यूरोपीय कम्पनियां इन जहाजों को काम में लाने लगीं और हिन्दुस्थानी कारीगरों द्वारा जहाज बनवाने के लिए उन्होंने कई कारखाने खोल लिए। सन् 1811 में लेफ्टिनेंट वाकर लिखता है कि ‘ब्रिटिश जहाजी बेड़े के जहाजों की हर बारहवें वर्ष मरम्मत करानी पड़ती थी। परन्तु सागौन के बने हुए भारतीय जहाज पचास वर्षों से अधिक समय तक बिना किसी मरम्मत के काम देते थे।’ ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी’ के पास ‘दरिया दौलत’ नामक एक जहाज था, जो 87 वर्षों तक बिना किसी मरम्मत के काम देता रहा। जहाजों को बनाने में शीशम, साल और सागौन-तीनों लकडिय़ां काम में लायी जाती थीं।

सन् 1811 में एक फ्रांसीसी यात्री वाल्टजर सालविन्स अपनी ‘ले हिन्द’ नामक पुस्तक में लिखता है कि ‘प्राचीन समय में नौ-निर्माण कला में हिन्दू सबसे आगे थे और आज भी वे इसमें यूरोप को पाठ पढ़ा सकते हैं। अंग्रेजों ने, जो कलाओं के सीखने में बड़े चतुर होते हैं, हिन्दुओं से जहाज बनाने की कई बातें सीखीं। भारतीय जहाजों में सुन्दरता तथा उपयोगिता का बड़ा अच्छा योग है और वे हिन्दुस्थानियों की कारीगरी और उनके धैर्य के नमूने हैं।’ बम्बई के कारखाने में 1736 से 1863 तक 300 जहाज तैयार हुए, जिनमें बहुत से इंग्लैण्ड के ‘शाही बेड’ में शामिल कर लिए गए। इनमें ‘एशिया’ नामक जहाज 2289 टन का था और उसमें 84 तोपें लगी थीं। बंगाल में हुगली, सिल्हट, चटगांव और ढाका आदि स्थानों पर जहाज बनाने के कारखाने थे। सन् 1781 से 1821 तक 1,22,693 टन के 272 जहाज केवल हुगली में तैयार हुए थे।

अंग्रेजों की कुटिलता-ब्रिटेन के जहाजी व्यापारी भारतीय नौ-निर्माण कला का यह उत्कर्ष सहन न कर सके और वे ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी पर भारतीय जहाजों का उपयोग न करने के लिए दबाने बनाने लगे। सन् 1811 में कर्नल वाकर ने आंकड़े देकर यह सिद्ध किया कि ‘भारतीय जहाजों’ में बहुत कम खर्च पड़ता है और वे बड़े मजबूत होते हैं। यदि ब्रिटिश बेड़े में केवल भारतीय जहाज ही रखे जाएं तो बहुत बचत हो सकती है।
जहाज बनाने वाले अंग्रेज कारीगरों तथा व्यापारियों को यह बात बहुत खटकी। डाक्टर टेलर लिखता है कि जब हिन्दुस्थानी माल से लदा हुआ हिन्दुस्थानी जहाज लंदन के बंदरगाह पर पहुंचा, तब जहाजों के अंग्रेज व्यापारियों में ऐसी घबराहट मची जैसा कि आक्रमण करने के लिए टेम्स नदी में शत्रुपक्ष के जहाजी बेड़े को देखकर भी न मचती।

लंदन बंदरगाह के कारीगरों ने सबसे पहले हो-हल्ला मचाया और कहा कि ‘हमारा सब काम चौपट हो जाएगा और हमारे कुटुम्ब भूखों मर जाएंगे।’ ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी’ के ‘बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स’ (निदेशक-मण्डल ने लिखा कि हिन्दुस्थानी खलासियों ने यहां आने पर जो हमारा सामाजिक जीवन देखा, उससे भारत में यूरोपीय आचरण के प्रति जो आदर और भय था, नष्ट हो गया। अपने देश लौटने पर हमारे सम्बंध में वे जो बुरी बातें फैलाएंगे, उसमें एशिया निवासियों में हमारे आचरण के प्रति जो आदर है तथा जिसके बल पर ही हम अपना प्रभुत्व जमाए बैठे हैं, नष्ट हो जाएगा और उसका प्रभाव बड़ा हानिकर होगा।’ इस पर ब्रिटिश संसद ने सर राबर्ट पील की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की।

काला कानून- समिति के सदस्यों में परस्पर मतभेद होने पर भी इस रपट के आधार पर सन् 1814 में एक कानून पास किया, जिसके अनुसार भारतीय खलासियों को ब्रिटिश नाविक बनने का अधिकार नहीं रहा। ब्रिटिश जहाजों पर भी कम-से कम तीन चौथाई अंग्रेज खलासी रखना अनिवार्य कर दिया गया। लंदन के बंदरगाह में किसी ऐसे जहाज को घुसने का अधिकार नहीं रहा, जिसका स्वामी कोई ब्रिटिश न हो और यह नियम बना दिया गया कि इंग्लैण्ड में अंग्रेजों द्वारा बनाए हुए जहाजों में ही बाहर से माल इंग्लैण्ड आ सकेगा।’ कई कारणों से इस कानून को कार्यान्वित करने में ढिलाई हुई, पर सन् 1863 से इसकी पूरी पाबंदी होने लगी। भारत में भी ऐसे कायदे-कानून बनाए गए जिससे यहां की प्राचीन नौ-निर्माण कला का अन्त हो जाए। भारतीय जहाजों पर लदे हुए माल की चुंगी बढ़ा दी गई और इस तरह उनको व्यापार से अलग करने का प्रयत्न किया गया। सर विलियम डिग्वी ने ठीक ही लिखा है कि ‘पाश्चात्य संसार की रानी ने इस तरह प्राप्च सागर की रानी का वध कर डाला।’ संक्षेप में भारतीय नौ-निर्माण कला को नष्ट करने की यही कहानी है।