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पीपल में भूत बसते हैं । यह किस सभ्यता का विरोध है ? बौद्ध सभ्यता का ही तो है ।

मृतकों की आत्मा पीपल में बसती है । कौन टँगवाता है पीपल में घंट ? यह किस सभ्यता का विरोध है ?

वेदों का इंद्र पिपरु की हत्या करते हैं । पिपरु कौन था ? पीपल – पूजक ही तो था ।

बुद्ध को पीपल के नीचे क्यों मिला ज्ञान ? बुद्ध के गाँव का नाम आज पिपरहवा क्यों है ?

हिंदी क्षेत्र के पीपरा , पीपरी , पिपरियाँ जैसे गाँव किस सभ्यता के प्रतीक हैं ?

पीपल की उपाधि आज भी भारत के कौन से लोग धारण करते हैं ? वही शूद्र – अतिशूद्र ।

सिंधु घाटी की सभ्यता का सर्वाधिक पवित्र वृक्ष कौन है ? पीपल ही तो है ।

मोहनजोदड़ो – हड़प्पा नगरों की मुहरें , मिट्टी के बर्तनों पर किसके चित्र सर्वाधिक हैं ? वही पीपल की शाखाओं एवं पत्तों के ।

सिंधु सभ्यता के देवता सिर पर क्या लगाए हैं ? पीपल ही तो ।

मिथक इतिहास नहीं है , मगर संकेत तो देता ही है ।

-राजेंद्र प्रसाद सिंघ

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परमाणु बम का जनक – सनातनी भारत

आधुनिक परमाणु बम का सफल परीक्षण 16 जुलाई 1945 को New Mexico के एक दूर दराज स्थान में किया गया था|

इस बम का निर्माण अमेरिका के एक वैज्ञानिक Julius Robert Oppenheimer के नेतृत्व में किया गया था

Oppenheimer को आधुनिक परमाणु बम के निर्माणकर्ता के रूप में जाना जाता है, आपको ये जानकर आश्चर्य हो सकता है की इस परमाणु परीक्षण का कोड नाम Oppenheimer ने त्रिदेव (Trinity) रखा था,

परमाणु विखण्डन की श्रृंखला अभिक्रिया में २३५ भार वला यूरेनियम परमाणु,बेरियम और क्रिप्टन तत्वों में विघटित होता है। प्रति परमाणु ३ न्यूट्रान मुक्त होकर अन्य तीन परमाणुओं का विखण्डन करते है। कुछ द्रव्यमान ऊर्जा में परिणित हो जाता है। ऊर्जा = द्रव्यमान * (प्रकाश का वेग)२ {E=MC^2} के अनुसार अपरिमित ऊर्जा अर्थात उष्मा व प्रकाश उत्पन्न होते है।

Oppenheimer ने महाभारत और गीता का काफी समय तक अध्ययन किया था और हिन्दू धर्मं शास्त्रों से वे बेहद प्रभावित थे १८९३ में जब स्वामी विवेकानन्द अमेरिका में थे, उन्होने वेद और गीता के कतिपय श्लोकों का अंग्रेजी अनुवाद किया।

यद्यपि परमाणु बम विस्फोटट कमेटी के अध्यक्ष ओपेन हाइमर का जन्म स्वामी जी की मृत्यु के बाद हुआ था किन्तु राबर्ट ने श्लोकों का अध्ययन किया था। वे वेद और गीता से बहुत प्रभावित हुए थे। वेदों के बारे में उनका कहना था कि पाश्चात्य संस्कृति में वेदों की पंहुच इस सदी की विशेष कल्याणकारी घटना है।

उन्होने जिन तीन श्लोकों को महत्व दिया वे निम्र प्रकार है।

१. राबर्ट औपेन हाइमर का अनुमान था कि परमाणु बम विस्फोट से अत्यधिक तीव्र प्रकाश और उच्च ऊष्मा होगी, जैसा कि भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को विराट स्वरुप के दर्शन देते समय उत्पन्न हुआ होगा।

गीता के ग्यारहवें अध्याय के बारहवें श्लोक में लिखा है-

दिविसूर्य सहस्य भवेयुग पदुत्थिता यदि
मा सदृशीसा स्यादा सस्तस्य महात्मन: {११:१२ गीता}

अर्थात – आकाश में हजारों सूर्यों के एक साथ उदय होने से जो प्रकाश उत्पन्न होगा वह भी वह विश्वरुप परमात्मा के प्रकाश के सदृश्य शायद ही हो।

२. औपेन हाइमर के अनुसार इस बम विस्फोट से बहुत अधिक लोगों की मृत्यु होगी, दुनिया में विनाश ही विनाश होगा।

उस समय उन्होंने गीता के गीता के ग्यारहवें अध्याय के ३२ वें श्लोक में वर्णित बातों का सन्दर्भ दिया –

कालोस्स्मि लोकक्षयकृत्प्रवृध्दो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत:।
ऋ तेह्यपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येह्यवस्थिता: प्रत्यनीकेषु योधा:।। {११:३२ गीता}

अर्थात – मैं लोको का नाश करने वाला बढा हुआ महाकाल हूं। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूं,अत: जो प्रतिपक्षी सेना के योध्दा लोग हैं वे तेरे युध्द न करने पर भी नहीं रहेंगे अर्थात इनका नाश हो जाएगा।

३. औपेन हाइमर के अनुसार बम विस्फोट से जहां कुछ लोग प्रसन्न होंगे तो जिनका विनाश हुआ है वे दु:खी होंगे विलाप करेंगे,जबकि अधिकांश तटस्थ रहेंगे। इस विनाश का जिम्मेदार खुद को मानते हुए वे दुखी हुए, परन्तु उन्होंने गीता में वर्णित कर्म के सिद्धांत का प्रतिपालन किया

उन्होंने गीता के सबसे प्रसिद्ध द्वितीय अध्याय के सैंतालिसवें श्लोक का सन्दर्भ दिया।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संङ्गोह्यस्त्वकर्माणि।। {२:४७ गीता}

अर्थात – तू कर्म कर फल की चिंता मत कर। तू कर्मो के फल हेतु मत हो, तेरी अकर्म में (कर्म न करने में) आसक्ति नहीं होनी चाहिए!

उन्होंने अपनी डायरी में स्वयं की मनोस्तिथि लिखी , और इस परीक्षण का कोड नेम इन्ही ३ श्लोको के आधार तथा भगवान ब्रम्हा विष्णु महेश के नाम पर ट्रिनिटी रखा…

तत्कालीन अमेरिकी सरकार नहीं चाहती थी की कोई और सभ्यता तथा संस्कृति आधुनिक परमाणु बम की अवधारणा का का श्रेय ले जाए…. इसीलिए इस परीक्षण के नामकरण की सच्चाई को उन्होंने Oppenheimer को छुपाने के लिए कहा…. परन्तु जापान में परमाणु बम गिरने के बाद Oppenheimer ने एक इंटरव्यू में ये बात स्वीकार की थी……. विकिपीडिया भी दबी जुबान में ये बात बोलता है…
इसके अतिरिक्त 1933 में उन्होंने अपने एक मित्र Arthur William Ryder, जोकि University of California, Berkeley में संस्कृत के प्रोफेसर थे, के साथ मिल कर भगवद गीता का पूरा अध्यन किया और परमाणु बम बनाया 1945 में | परमाणु बम जैसी किसी चीज़ के होने का पता भी इनको भगवद गीता, रामायण तथा महाभारत से ही मिला, इसमें कोई संदेह नहीं | Oppenheimer ने इस प्रयोग के बाद प्राप्त निष्कर्षों पर अध्यन किया और कहा की विस्फोट के बाद उत्पन विकट परिस्तियाँ तथा दुष्परिणाम जो हमें प्राप्त हुए है ठीक इस प्रकार का वर्णन भगवद गीता तथा महाभारत आदि में मिलता है |

बाद में Oppenheimer के खुलासे के बाद भारी पैमाने पर महाभारत और गीता आदि पर शोध किया गया उन्हें इस बात पर बेहद आश्चर्य हुआ की इन ग्रंथो में “ब्रह्माश्त्र” नामक अस्त्र का वर्णन मिलता है जो इतना संहारक था की उस के प्रयोग से कई हजारो लोग व अन्य वस्तुएं न केवल जल गई अपितु पिघल भी गई| ब्रह्माश्त्र के बारे में हमसे बेहतर कौन जान सकता है इसका वर्णन प्रत्येक पुराण आदि में मिलता है… जगत पिता भगवान ब्रह्मा द्वारा असुरो के नाश हेतु ब्रह्माश्त्र का निर्माण किया गया था…
रामायण में भी मेघनाद से युद्ध हेतु श्रीलक्ष्मण ने जब ब्रह्माश्त्र का प्रयोग करना चाहा तब श्रीराम ने उन्हें यह कह कर रोक दिया की अभी इसका प्रयोग उचित नही अन्यथा पूरी लंका साफ़ हो जाएगी |

इसके अतिरिक्त प्राचीन भारत में परमाण्विक बमों के प्रयोग होने के प्रमाणों की कोई कमी नही है । सिन्धु घाटी सभ्यता (मोहन जोदड़ो, हड़प्पा आदि) में अनुसन्धान से ऐसी कई नगरियाँ प्राप्त हुई है जो लगभग 5000 से 7000 ईसापूर्व तक अस्तित्व में थी| वहां ऐसे कई नर कंकाल इस स्थिति में प्राप्त हुए है मानो वो सभी किसी अकस्मात प्रहार में मारे गये हों… इनमें रेडिएशन का असर भी था | वह कई ऐसे प्रमाण भी है जो यह सिद्ध करते है की किसी समय यहाँ भयंकर ऊष्मा उत्पन्न हुई जो केवल परमाण्विक बम या फिर उसी तरह के अस्त्र से ही उत्पन्न हो सकती है

उत्तर पश्चिम भारत में थार मरुस्थल के एक स्थान में दस मील के घेरे में तीन वर्गमील का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ पर रेडियोएक्टिव्ह राख की मोटी सतह पाई जाती है। वैज्ञानिकों ने उसके पास एक प्राचीन नगर को खोद निकाला है जिसके समस्त भवन और लगभग पाँच लाख निवासी आज से लगभग 8,000 से 12,000 साल पूर्व किसी परमाणु विस्फोट के कारण नष्ट हो गए थे। एक शोधकर्ता के आकलन के अनुसार प्राचीनकाल में उस नगर पर गिराया गया परमाणु बम जापान में सन् 1945 में गिराए गए परमाणु बम की क्षमता से ज्यादा का था।

मुंबई से उत्तर दिशा में लगभग 400 कि.मी. दूरी पर स्थित लगभग 2,154 मीटर की परिधि वाला एक अद्भुत विशाल गड्ढा (crater), जिसकी आयु 50,000 से कम आँकी गई है, भी यही इंगित करती है कि प्राचीन काल में भारत में परमाणु युद्ध हुआ था। शोध से ज्ञात हुआ है कि यह गड्ढा crater) पृथ्वी पर किसी 600.000 वायुमंडल के दबाव वाले किसी विशाल के प्रहार के कारण बना है किन्तु इस गड्ढे (Crater) तथा इसके आसपास के क्षेत्र में उल्कापात से सम्बन्धित कुछ भी सामग्री नहीं पाई जाती। फिर यह विलक्षण गड्ढा आखिर बना कैसे? सम्पूर्ण विश्व में यह अपने प्रकार का एक अकेला गड्ढा (Crater) है।

महाभारत में सौप्तिक पर्व अध्याय १३ से १५ तक ब्रह्मास्त्र के परिणाम दिये गए है|

महाभारत युद्ध का आरंभ 16 नवंबर 5561 ईसा पूर्व हुआ और 18 दिन चलाने के बाद 2 दिसम्बर 5561 ईसा पूर्व को समाप्त हुआ उसी रात दुर्योधन ने अश्वथामा को सेनापति नियुक्त किया । 3 नवंबर 5561 ईसा पूर्व के दिन भीम ने अश्वथामा को पकड़ने का प्रयत्न किया ।

{ तब अश्वथामा ने जो ब्रह्मास्त्र छोड़ा उस अस्त्र के कारण जो अग्नि उत्पन्न हुई वह प्रलंकारी थी । वह अस्त्र प्रज्वलित हुआ तब एक भयानक ज्वाला उत्पन्न हुई जो तेजोमंडल को घिर जाने मे समर्थ थी ।

तदस्त्रं प्रजज्वाल महाज्वालं तेजोमंडल संवृतम ।। ८ ।। }

{ इसके बाद भयंकर वायु चलने लगी । सहस्त्रावधि उल्का आकाश से गिरने लगे ।
आकाश में बड़ा शब्द (ध्वनि ) हुआ । पर्वत, अरण्य, वृक्षो के साथ पृथ्वी हिल गई|

सशब्द्म्भवम व्योम ज्वालामालाकुलं भृशम । चचाल च मही कृत्स्ना सपर्वतवनद्रुमा ।। १० ।। अध्याय १४ }

यहाँ वेदव्यास जी लिखते हैं कि –

“जहां ब्रह्मास्त्र छोड़ा जाता है वहीं १२ वषों तक पर्जन्यवृष्ठी (जीव-जंतु , पेड़-पोधे आदि की उत्पति ) नहीं हो पाती

सनातनी भारत के विलक्षण विज्ञानं को नमन है…।

अरुण शुक्ला

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मंदिर


मन्दिर महत्त्व
एक भ्रम फैलाया गया है कि मन्दिर केवल आस्था का केन्द्र है। आस्था का क्या अर्थ या महत्व है, उन लोगों को पता नहीं है। इसका एक अन्य रूप श्रद्धा है, जिसके विषय में गीता में लिखा है-श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्। देश या समाज के प्रति आस्था होने से उसकी स्वस्थ परम्परा तथा सौहार्द की रक्षा होती है। साम्प्रदायिक द्वेष के कारण उसे तोड़ने से संघर्ष तथा हिंसा होती है।
मन्दिर के कई अन्य महत्व थे जो हजारों की संख्या में आतंकियों द्वारा तोड़ने से नष्ट हो गए-
(१) यह सभी उत्सवों का केन्द्र था। मन्दिर नष्ट कर जो क्लब या केन्द्र बने हैं वे शराब, जुआ या दुर्व्यसनों के केन्द्र हैं तथा केवल धनी व्यक्ति जा सकते हैं।
(२) सभी सामाजिक पर्वों में मिलन केन्द्र।
(३) व्यक्ति के सभी संस्कार नामकरण से विवाह तक का सहज तथा सस्ता साधन मन्दिर है। आज भी विवाह के लिए सबसे सस्ता स्थान वही है।
(४) पुरानी कथाओं के अनुसार यात्री लोग मन्दिर में ही ठहरते थे जिनके रहने तथा भोजन का प्रबन्ध रहता था। बाद में आतंकियों द्वारा तोड़ने के भय से इनको धर्मशाला कहने लगे।
(५) पाठशाला तथा महाशाला या विश्वविद्यालय के अतिरिक्त ये सार्वजनिक पुस्तकालय का काम करते थे जिनका प्रयोग शिक्षा संस्थान छोड़ने के बाद करते थे। भोपाल की भोजशाला या सरस्वती मन्दिर जैसे कई सार्वजनिक पुस्तकालय द्वेष तथा लूट के लिए नष्ट किये गये जो उसके बाद हिंसा का केन्द्र बन गए।

अरुण उपाध्याय

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रामायण के किष्किन्धा कांड में राम हनुमान के बारे में लक्ष्मण से कहते हैं न तीन स्थानों से यह बंधा हुआ आबाज कर रहा

नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम् ।
बहु व्याहरतानेन न किंचिदपशब्दितम् ।।
किष्किन्धा काण्ड, तृतीय सर्ग, श्लोक 29

निश्चित रुप से इसने सम्पूर्ण व्याकरण को भी सुना है, क्योंकि इसने बहुत बोला परन्तु कहीं भी व्याकरण की दृष्टि से एक भी अशुद्धि नहीं हुई। महाभाष्य में पतञ्जलि ने भी व्याकरणशास्त्र परम्परा का उल्लेख करते हुए कहा है कि प्राचीन काल में संस्कार के बाद ब्राह्मण व्याकरण पढ़ते थे।

“पुराकल्प एतदासीत्, संस्कारोत्तरकालं ब्राह्मणा व्याकरणं स्मधीयते ।” (महाभाष्य—1.1.1)

प्रश्न यह उठता है कि जब यह व्याकरण इतना प्राचीन है तो इसे सर्वप्रथम किसको किसने पढ़ाया? इसका उत्तर ऋक्तन्त्र 1.4 में मिलता है। व्याकरण के सर्व प्रथम प्रवक्ता ब्रह्मा थे। ब्रह्मा वृहस्पतये प्रोवाच, वृहस्पतिरिन्द्राय, इन्द्रो भरद्वाजाय, भारद्वाजो ऋषिभ्यः । महाभाष्य के पस्पशाह्निक में शब्दों के बारे में प्रतिपादन करते हुए पतञ्जलि ने पुनः व्याकरणशास्त्र परम्परा का उल्लेख किया- वृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दपारायणं प्रोवाच नान्तं जगाम, वृहस्पतिश्च प्रवक्ता, इन्द्रचाध्येता दिव्यं वर्षसहस्रमध्ययनकालो न चान्तं जगाम इति । इस परम्परा में अनेक आचार्यों का उल्लेख हुआ है। यह लगभग 10 हजार वर्ष की परम्परा है।

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વૈદિક ઘડિયાળ
નામના અર્થ સાથે

🕉️1:00 વાગ્યાના સ્થાન પર ब्रह्म લખેલું છે જેનો અર્થ થાય છે;
બ્રહ્મ એક જ છે બે નથી

🕉️2:00 વાગ્યાના સ્થાને अश्विनौ લખેલું છે તેનો અર્થ થાય કે;
અશ્વિની કુમારો બે છે

🕉️3:00 વાગ્યાના સ્થાને त्रिगुणाः લખેલું છે તેનો અર્થ થાય ત્રણ પ્રકારના ગુણો
સત્વ રજસ્ અને તમસ્

🕉️4:00 વાગ્યાના સ્થાને चतुर्वेदाः લખેલું છે તેનો અર્થ થાય વેદો ચાર છે
ઋગ્વેદ યજુર્વેદ સામવેદ અને અથર્વવેદ

🕉️5:00 વાગ્યાના સ્થાને पंचप्राणा લખેલું છે જેનો અર્થ થાય પાંચ પ્રકારના પ્રાણ છે
પ્રાણ, અપાન, સમાન, વ્યાન અને ઉદાન

🕉️6:00 વાગ્યાના સ્થાને લખેલું છે षड्रसाः એનો અર્થ થાય કે રસ છ પ્રકારના છે
મધુર, ખાટો, ખારો, કડવો, તીખો, તૂરો

🕉️7:00 વાગ્યાના સ્થાને લખેલું છે सप्तर्षियः તેનો અર્થ થાય સાત ઋષિ છે
કશ્યપ, અત્રી, ભારદ્વાજ, વિશ્વામિત્ર, ગૌતમ, જમદગ્નિ અને વસિષ્ઠ

🕉️8:00 વાગ્યાના સ્થાને લખેલું છે अष्टसिद्धि જેનો અર્થ થાય આઠ પ્રકારની સિદ્ધિ છે
અણીમા, મહિમા, દધીમા, ગરીમા, પ્રાપ્તિ, પ્રાકામ્ય, ઈશિત્વ અને વશિત્વ

🕉️9:00 વાગ્યાના સ્થાને લખેલું છે नव द्रव्याणी જેનો અર્થ થાય નવ પ્રકારની નિધિઓ હોય છે
પદ્મા, મહાપદ્મ, નીલ, શંખ, મુકુંદ, નંદ, મકર, કશ્યપ અને ખર્વ

🕉️10:00 વાગ્યના સ્થાને લખેલું છે दशदिशः, જેનો અર્થ થાય દશ દિશાઓ
પૂર્વ, પશ્ચિમ, ઉત્તર, દક્ષિણ, ઈશાન, અગ્નિ, નૈઋત્ય, વાયવ્ય, આકાશ અને પાતાળ

🕉️11:00 ના સ્થાને લખેલું છે रुद्राः જેનો અર્થ થાય રુદ્રા અગિયાર છે
કપાલી, પિંગલ, ભીમ, વિરુપાક્ષ, વલોહિત, શાસ્તા, અજપાદ, અહિર્બુધ્ન્ય, ચંડ, ભવ

🕉️12:00 વાગ્યાના સ્થાને લખેલું છે आदित्याः જેનો અર્થ થાય છે આદિત્યો બાર છે
અંસુમાન, અર્યમાન, ઈંદ્ર, ત્વષ્ટા, ધાતુ, પર્જન્ય, પૂષા, ભગ્,મિત્ર, વરુણ, વિવસ્વાન, વિષ્ણુ

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14 प्रकार की तुल्य मृत्यु


*14 प्रकार की तुल्य मृत्यु*_

*राम और रावण का युद्ध चल रहा था । तब अंगद रावण को बोला, तू तो मरा हुआ है । तुझे मारने से क्या फायदा ?*

रावण बोला– मैं जीवित हूँ, मरा हुआ कैसे ?

अंगद बोले सिर्फ साँस लेने वालों को जीवित नहीं कहते – साँस तो लुहार का भाता भी लेता है ।
तब अंगद ने 14 प्रकार की मृत्यु बतलाई l

अंगद द्वारा रावण को बतलाई गई, ये बातें आज के दौर में भी लागू होती हैं ।

यदि किसी व्यक्ति में इन 14 दुर्गुणों में से एक दुर्गुण भी आ जाता है तो वह मृतक समान हो जाता है ।

विचार करें कहीं यह दुर्गुण हमारे पास तो नहीं हैं….कि हमें मृतक समान माना जाय ।

_*1.कामवश-*_ जो व्यक्ति अत्यंत भोगी हो, कामवासना में लिप्त रहता हो, जो संसार के भोगों में उलझा हुआ हो, वह मृत समान है । जिसके मन की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती और जो प्राणी सिर्फ अपनी इच्छाओं के अधीन होकर ही जीता है, वह मृत समान है । वह अध्यात्म का सेवन नही करता है । सदैव वासना में लीन रहता है ।

_*2.वाम मार्गी-*_ जो व्यक्ति पूरी दुनिया से उल्टा चले । जो संसार की हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजता हो । नियमों, परंपराओं और लोक व्यवहार के खिलाफ चलता हो, वह वाम मार्गी कहलाता है । ऐसे काम करने वाले लोग मृत समान माने गए हैं ।

_*3.कंजूस-*_ अति कंजूस व्यक्ति भी मरा हुआ होता है । जो व्यक्ति धर्म के कार्य करने में, आर्थिक रूप से किसी कल्याण कार्य में हिस्सा लेने में हिचकता हो । दान करने से बचता हो । ऐसा आदमी भी मृत समान ही है ।

_*4.अति दरिद्र-*_ गरीबी सबसे बड़ा श्राप है । जो व्यक्ति धन, आत्म-विश्वास, सम्मान और साहस से हीन हो, वो भी मृत ही है । अत्यन्त दरिद्र भी मरा हुआ है । दरिद्र व्यक्ति को दुत्कारना नहीं चाहिए, क्योंकि वह पहले ही मरा हुआ होता है । गरीब लोगों की मदद करनी चाहिए ।

_*5.विमूढ़-*_ अत्यन्त मूढ़ यानी मूर्ख व्यक्ति भी मरा हुआ होता है । जिसके पास विवेक, बुद्धि नहीं हो । जो खुद निर्णय ना ले सके यानि हर काम को समझने या निर्णय को लेने में किसी अन्य पर आश्रित हो, ऐसा व्यक्ति भी जीवित होते हुए मृत के समान ही है । मूढ़ अध्यात्म को समझता नहीं है ।

_*6.अजसि-*_ जिस व्यक्ति को संसार में बदनामी मिली हुई है, वह भी मरा हुआ है । जो घर, परिवार, कुटुंब, समाज, नगर या राष्ट्र, किसी भी ईकाई में सम्मान नहीं पाता है, वह व्यक्ति मृत समान ही होता है ।

_*7.सदा रोगवश-*_ जो व्यक्ति निरंतर रोगी रहता है, वह भी मरा हुआ है । स्वस्थ शरीर के अभाव में मन विचलित रहता है । नकारात्मकता हावी हो जाती है । व्यक्ति मृत्यु की कामना में लग जाता है । जीवित होते हुए भी रोगी व्यक्ति जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है ।

_*8.अति बूढ़ा-*_ अत्यन्त वृद्ध व्यक्ति भी मृत समान होता है, क्योंकि वह अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है । शरीर और बुद्धि, दोनों असक्षम हो जाते हैं । ऐसे में कई बार स्वयं वह और उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं, ताकि उसे इन कष्टों से मुक्ति मिल सके ।

_*9.सतत क्रोधी-*_ 24 घंटे क्रोध में रहने वाला व्यक्ति भी मृत समान ही है । हर छोटी-बड़ी बात पर क्रोध करना, ऐसे लोगों का काम होता है । क्रोध के कारण मन और बुद्धि, दोनों ही उसके नियंत्रण से बाहर होते हैं । जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता है । पूर्व जन्म के संस्कार लेकर यह जीव क्रोधी होता है । क्रोधी अनेक जीवों का घात करता है और नरक गामी होता है ।

_*10.अघ खानी-*_ जो व्यक्ति पाप कर्मों से अर्जित धन से अपना और परिवार का पालन-पोषण करता है, वह व्यक्ति भी मृत समान ही है । उसके साथ रहने वाले लोग भी उसी के समान हो जाते हैं । हमेशा मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके ही धन प्राप्त करना चाहिए । पाप की कमाई पाप में ही जाती है । और पाप की कमाई से नीच गोत्र, निगोद की प्राप्ति होती है ।

_*11.तनु पोषक-*_ ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से आत्म संतुष्टि और खुद के स्वार्थों के लिए ही जीता है, संसार के किसी अन्य प्राणी के लिए उसके मन में कोई संवेदना ना हो, तो ऐसा व्यक्ति भी मृतक समान ही है । जो लोग खाने-पीने में, वाहनों में स्थान के लिए, हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले हमें ही मिल जाएं, बाकि किसी अन्य को मिले ना मिले, वे मृत समान होते हैं । ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिए अनुपयोगी होते हैं । शरीर को अपना मानकर उसमें रत रहना मूर्खता है । क्योंकि यह शरीर विनाशी है । नष्ट होने वाला है ।

_*12.निंदक-*_ अकारण निंदा करने वाला व्यक्ति भी मरा हुआ होता है । जिसे दूसरों में सिर्फ कमियाँ ही नज़र आती हैं । जो व्यक्ति किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता है । ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे, तो सिर्फ किसी ना किसी की बुराई ही करे, वह इंसान मृत समान होता है ।
परनिंदा करने से नीच गोत्र का बन्ध होता है ।

_*13.परमात्म विमुख-*_ जो व्यक्ति परमात्मा का विरोधी है, वह भी मृत समान है । जो व्यक्ति ये सोच लेता है कि कोई परमतत्व है ही नहीं । हम जो करते हैं, वही होता है । संसार हम ही चला रहे हैं । जो परमशक्ति में आस्था नहीं रखता है, ऐसा व्यक्ति भी मृत माना जाता है ।

_*14. श्रुति , संत विरोधी-*_ जो संत, ग्रंथ, पुराण का विरोधी है, वह भी मृत समान होता है । श्रुत और सन्त ब्रेक का काम करते हैं । अगर गाड़ी में ब्रेक ना हो तो वह कहीं भी गिरकर एक्सीडेंट हो सकता है । वैसे ही समाज को सन्त के जैसे ब्रेक की जरूरत है । नहीं तो समाज में अनाचार फैलेगा ।

लंका काण्ड
कौल कामबस कृपिन विमूढ़ा ।
अतिदरिद्र अजसि अतिबूढ़ा ।।
सदारोगबस संतत क्रोधी।
विष्णु विमूख श्रुति संत विरोधी।।
तनुपोषक निंदक अघखानी।
जिवत सव सम चौदह प्रानी।।
जय श्री राम

अरुण शुक्ला

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रात्रि के अंतिम प्रहर में एक बुझी हुई चिता की भस्म पर अघोरी ने जैसे ही आसन लगाया, एक प्रेत ने उसकी गर्दन जकड़ ली और बोला- मैं जीवन भर विज्ञान का छात्र रहा और जीवन के उत्तरार्ध में तुम्हारे पुराणों की विचित्र कथाएं पढ़कर भ्रमित होता रहा. यदि तुम मुझे पौराणिक कथाओं की सार्थकता नहीं समझा सके तो मैं तुम्हे भी इसी भस्म में मिला दूंगा. अघोरी बोला- एक कथा सुनो, रैवतक राजा की पुत्री का नाम रेवती था. वह सामान्य कद के पुरुषों से बहुत लंबी थी, राजा उसके विवाह योग्य वर खोजकर थक गये और चिंतित रहने लगे. थक-हारकर वो योगबल के द्वारा पुत्री को लेकर ब्रह्मलोक गए. राजा जब वहां पहुंचे तब गन्धर्वों का गायन समारोह चल रहा था, राजा ने गायन समाप्त होने की प्रतीक्षा की. गायन समाप्ति के उपरांत ब्रह्मदेव ने राजा को देखा और पूछा- कहो, कैसे आना हुआ? राजा ने कहा- मेरी पुत्री के लिए किसी वर को आपने बनाया अथवा नहीं? ब्रह्मा जोर से हंसे और बोले- जब तुम आये तबतक तो नहीं, पर जिस कालावधि में तुमने यहाँ गन्धर्वगान सुना उतनी ही अवधि में पृथ्वी पर २७ चतुर्युग बीत चुके हैं और २८ वां द्वापर समाप्त होने वाला है, अब तुम वहां जाओ और कृष्ण के बड़े भाई बलराम से इसका विवाह कर दो, अच्छा हुआ की तुम रेवती को अपने साथ लाए जिससे इसकी आयु नहीं बढ़ी. इस कथा का वैज्ञानिक संदर्भ समझो- आर्थर सी क्लार्क ने आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी की व्याख्या में एक पुस्तक लिखी है- मैन एंड स्पेस, उसमे गणना है की यदि 10 वर्ष का बालक यदि प्रकाश की गति वाले यान में बैठकर एंड्रोमेडा गैलेक्सी का एक चक्कर लगाये तो वापस आनेपर उसकी आयु ६६ वर्ष की होगी पर धरती पर 40 लाख वर्ष बीत चुके होंगे. यह आइंस्टीन की time dilation theory ही तो है जिसके लिए जॉर्ज गैमो ने एक मजाकिया कविता लिखी थी- There was a young girl named Miss Bright, Who could travel much faster than light She departed one day in an Einstein way And came back previous night प्रेत यह सुनकर चकित था, बोला- यह कथा नहीं है, यह तो पौराणिक विज्ञान है, हमारी सभ्यता इतनी अद्भुत रही है, अविश्वसनीय है. तभी तो आइंस्टीन पुराणों को अपनी प्रेरणा कहते थे. मैं अब सभी शवों और प्रेतों को यह विज्ञानकथा बताऊंगा ताकि वो राष्ट्रीय शरीर धारण कर सकें. अनेक वामपंथी यह कहते फिरते हैं की यदि इतना ही उन्नत था हमारा प्राचीन तो प्रमाण क्या है? अब उनको देता हूँ यह प्रमाण. अघोरी मुस्कुराता रहा और प्रेत वायु में विलीन हो गया. हम विश्व की सबसे उन्नत संस्कृति हैं यह विश्वास मत खोना, आपस में जाति, मत, पूजा पद्धति को लेकर उलझने वालों को देश का शत्रु मानो.. जय भारतवर्ष

ये है ज्योतिष की दृष्टि से काल गणना ।
6 श्वास = 1 विनाड़ी..
10 विनाड़ी = 1 नाड़ी..
60 नाड़ी = 1 मानव दिवस = 1 सौर दिवस..
360 सौर दिवस = 1 सौर वर्ष = 1 दिव्य अहोरात्र..
360 दिव्य अहोरात्र = 1 दिव्य वर्ष..
12 हजार दिव्य वर्ष = 1 चतुर्युगी..
जिसमें 4 लाख बत्तीस हज़ार, सौर वर्ष का कलि युग, इसका दुगुना द्वापर युग, तिगुना त्रेता युग, चार गुना सतयुग होते हैं..
इसमें कुछ सन्धि काल भी सम्मिलित है..
72 चतुर्युगी = 1 मन्वन्तर..
14 मन्वन्तर = 1 कल्प..
1 कल्प = ब्रह्मा जी का 1 दिवस..
यही, ब्रह्माजी का एक दिवस है ।
इतनी ही ब्रह्माजी की एक रात्रि है ।
ऐसे, 360 अहोरात्र बीतने पर ब्रह्माजी की आयु का एक वर्ष बीतता है ।
वर्तमान में ब्रह्माजी के 50 वर्ष पूरे हो चुके हैं ।
उनकी आयु के 51 वें वर्ष का पहला दिन आरम्भ हो चुका है ।
14 में से 6 मन्वन्तर बीत चुके हैं ।
सातवां मन्वन्तर चल रहा है ।
सातवें मन्वन्तर की 72 चतुर्युगी में से 27 बीत चुकी है ।
28 वीं चल रही है ।
28 वीं चतुर्युगी के 3 युग, सतयुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग बीत चुके हैं ।
कलियुग चल रहा है ।
यह 432000 वां वर्ष है, जिनमें से 5118 वर्ष बीतने वाले हैं ।

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यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् ।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ।।
त्रयोवेदस्य कर्तारौ भण्डधूर्तनिशाचराः ।

मनुष्य जब तक जीवित रहे तब तक सुखपूर्वक जिये । ऋण करके भी घी पिये । अर्थात् सुख-भोग के लिए जो भी उपाय करने पड़ें उन्हें करे । दूसरों से भी उधार लेकर भौतिक सुख-साधन जुटाने में हिचके नहीं । परलोक, पुनर्जन्म और आत्मा-परमात्मा जैसी बातों की परवाह न करे । भला जो शरीर मृत्यु पश्चात् भष्मीभूत हो जाए, यानी जो देह दाहसंस्कार में राख हो चुके, उसके पुनर्जन्म का सवाल ही कहां उठता है । जो भी है इस शरीर की सलामती तक ही है और उसके बाद कुछ भी नहीं बचता इस तथ्य को समझकर सुखभोग करे, उधार लेकर ही सही । तीनों वेदों के रचयिता धूर्त प्रवृत्ति के मसखरे निशाचर रहे हैं, जिन्होंने लोगों को मूर्ख बनाने के लिए आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य जैसी बातों का भ्रम फैलाया है ।

चार्वाक सिद्धांत का कोई ग्रंथ नहीं है, किंतु उसका जिक्र अन्य विविध दर्शनों के प्रतिपादन में मनीषियों ने किया है । उपरिलिखित कथन का मूल स्रोत क्या है इसकी जानकारी अभी मुझे नहीं हैं । मुझे यह ‘ज्ञानगंगोत्री’ नामक ग्रंथ में पढ़ने को मिला ।

माना जाता है कि ‘लोकायत’ विचार का कोई प्रणेता नहीं है, लेकिन इसे दर्शन रूप में स्थापित करने का श्रेय आचार्य बृहस्पति को दिया जाता है, जो कदाचित् देवगुरु बृहस्पति से भिन्न थे । चार्वाक को उनका शिष्य बताया जाता है, जिसने इस विशुद्ध भौतिकवादी विचारधारा को प्रचारित-प्रसारित किया । शायद इसीलिए उसका नाम इस दर्शन से जुड़ गया । यह भी माना जाता है कि चार्वाक नाम भी उसका मौलिक नाम नहीं था । मेरे पास उपलब्ध शब्दकोश में इस नाम की व्याख्या इस प्रकार दी गयी है:

चारुः लोकसम्मतो वाको वाक्यं यस्य (सः चारुवाकः)
(संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, वामन शिवराम आप्टे, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, 2006)
अर्थात् लोकलुभावन और आम जन को प्रिय लगने वाले वचन कहता हो, प्रचारित करता हो, वह चारुवाक । कालांतर में यही बदलकर चार्वाक हो गया । जो सीधे तौर में समझ आये और सुविधाजनक लगे जीवन का वैसा रास्ता जो दिखाये वह चार्वाक ।

चार्वाक दर्शन नास्तिकवादी एवं अनीश्वरवादी है । इस दर्शन के अनुसार जो भी इंद्रियगम्य है, जिसके अस्तित्व का ज्ञान देख-सुनकर अथवा अन्य प्रकार से किया जा सकता है, वही वास्तविक है । जिस ज्ञान को चिंतन-मनन से मिलने की बात कही जाती है, वह भ्रामक है, मिथ्या है, महज अनुमान पर टिका है । आत्मा-परमात्मा जैसी कोई चीज होती ही नहीं है, अतः पाप-पुण्य नर्क-स्वर्ग का कोई अर्थ ही नहीं है ।

चार्वाक सिद्धांत चार तत्वों, ‘पृथ्वी’, ‘जल’, ‘अग्नि’, एवं ‘वायु’ को मान्यता देता है । समस्त जीव-निर्जीव तंत्र/पदार्थ इन्हीं के संयोग से बने हैं । स्थूल वस्तुओं/जीवों की रचना में ‘आकाश’ का भी कोई योगदान नहीं रहता है, अतः उसे यह पांचवें तत्व के रूप में नहीं स्वीकारता है । (ध्यान रहे कि कई दर्शन पांच महाभूतों को भौतिक सृष्टि का आधार मानते हैं: ‘क्षितिजलपावकगगनसमीरा’) । चार्वाक के अनुसार मनुष्यों एवं अन्य जीवों की चेतना इन्हीं मौलिक तत्वों के परस्पर मेल से उत्पन्न होती है । जब शरीर अपने अवयवों में बिखर जाता है तो उसके साथ यह चेतना भी लुप्त हो जाती है । इस विचार को स्पष्ट करने के लिए चार्वाक का अधोलिखित कथन विचारणीय है:

जडभूतविकारेषु चैतन्यं यत्तु दृश्यते ।
ताम्बूलपूगचूर्णानां योगाद् राग इवोत्थितम् ।।
(स्रोत: भारतीय दर्शनशास्त्र का इतिहास, लेखक: हरिदत्त शास्त्री, साहित्य भंडार, मेरठ, 1966, पृष्ठ 63)

अर्थात् जिस प्रकार पान के पत्ते तथा सुपाड़ी के चूर्ण के संयोग से लाल रंग होंठों पर छा जाता है, उसी प्रकार इन चेतनाशून्य घटक तत्वों के परस्पर संयोग से चेतना की उत्पत्ति होती है । यानी चेतना आत्मा या तत्तुल्य किसी अन्य अभौतिक सत्ता की विद्यमानता से नहीं आती है । विभिन्न पदार्थों के सेवन से चेतना की तीव्रता कम-ज्यादा हो जाती है, जिससे स्पष्ट है कि ये ही पदार्थ चेतना के कारण हैं ।
चार्वाक दर्शन वस्तुतः आज का विज्ञानपोषित भौतिकवाद है, जिसकी मान्यता है कि समस्त सृष्टि भौतिक पदार्थ और उससे अनन्य रूप से संबद्ध ऊर्जा का ही कमाल है । पदार्थ से ही जीवधारियों की रचना होती है । उसमें किसी अभौतिक सत्ता की कोई भूमिका नहीं है । विशुद्ध चेतनाहीन पदार्थ से ही जटिल एवं जटिलतर जीवों की रचना हुई है । जीव-रचना की जटिलता के ही साथ चेतना का भी उदय हुआ है । ऐसी संरचना के निरंतर विकास के फलस्वरूप मानव जैसा चेतन और बुद्धियुक्त जीव का जन्म हुआ है । वैज्ञानिकों का एक वर्ग इस विचारधारा का पक्षधर है कि चेतना का मूल कारण भौतिकी के ही प्राकृतिक नियमों में छिपा है । चेतना का उदय कब और कैसे होता है यह अवश्य इन विज्ञानियों के लिए अभी अबूझ पहेली है ।

आधुनिक विज्ञान पदार्थमूलक है । अध्यात्म से उसका कोई संबंध नहीं है । आज के विज्ञानमूलक भौतिक दर्शन, जिसमें सब कुछ पदार्थगत है, को चार्वाक दर्शन का परिष्कृत दर्शन कह सकते हैं, क्योंकि यह भौतिक तंत्रों/घटनाओं की तर्कसम्मत व्याख्या कर सकता है । अवश्य ही यह चार्वाक के चार तत्वों पर नहीं टिका है । सभी वैज्ञानिक चार्वाक सिद्धांत को यथावत् नहीं मानते हैं । उनमें कई ईश्वर तथा जीवात्मा जैसी चीजों को मानते हैं ।

‘लोकायत’ के मतावलंबियों को अक्सर ‘चार्वाक’ भी कहते हैं । चार्वाकों को दो श्रेणियों में बांटा जाता है: (1) धूर्त, एवं (2) सुशिक्षित । ‘यह शरीर जब तक है, तभी तक सब कुछ है, उसके बाद कुछ नहीं रहता’ के सिद्धांत के कारण लोकायत में पाप-पुण्य, नैतिकता आदि जैसी बातों का कोई ठोस आधार न होते हुए भी ‘सुशिक्षित’ चार्वाक सुव्यवस्थित मानव समाज की रचना के पक्षधर होते हैं । दूसरी तरफ ‘धूर्त’ चार्वाकों के लिए ‘खाओ-पिओ मौज करो, और उसके लिए सब कुछ जायज है’ की नीति पर चलते हैं । उनके लिए सुखप्राप्ति एकमेव जीवनोद्येश्य रहता है । कोई भी कर्म उनके लिए गर्हित, त्याज्य या अवांछित नहीं होता है । और ऐसे जनों की इस धरती पर कोई कमी नहीं होती है ।

मेरा अपना आकलन है कि इस दुनिया में 90 प्रतिशत से अधिक लोग चार्वाक सिद्धांत के अनुरूप ही जीवन जीते हैं । यद्यपि वे किसी न किसी आध्यात्मिक मत में आस्था की बात करते हैं, किंतु उनकी धारणा गंभीरता से विचारी हुई नहीं होती, महज सतही होती है, एक प्रकार का ‘तोतारटंत’, एक प्रकार की भेड़चाल में अपनाई गयी नीति । चूंकि दुनिया में लोग ऐसा या वैसा मानते हैं, अतः हम भी मानते हैं वाली बात उन पर लागू होती है । अन्यथा तथ्य यह है कि प्रायः हर व्यक्ति इसी धरती के सुखों को बटोरने में लगा हुआ है । अनाप-शनाप धन-संपदा अर्जित करना, और भौतिक सुखों का आनंद पाना यही लगभग सभी का लक्ष्य रह गया है । मानव समाज में जो भी छोटे-बड़े अपराध देखने को मिलते हैं वे अपने लिए सब कुछ बटोरने की नियत से किये जाते हैं । हमारे कृत्य से किसी और को क्या कष्ट होगा इसका कोई अर्थ नहीं है । मेरा काम जैसे भी निकले वही तरीका जायज है की नीति सर्वत्र है । इस जीवन से परे भी क्या कुछ है इस प्रश्न को हर कोई टाल देना पसंद करता है । और कर्मकांडों के तौर पर कहीं कुछ होता है तो वह भी अपने, अपने परिवार, अपने लोगों के सुखमय जीवन एवं सुरक्षा की कामना से किया जाता है । यहां तक कि आधुनिक धर्मगुरु भी अपने सुख के लिए चेलों का संगठन तैयार करते हैं; वे अपने परलोक के लिए उतना चिंतित नहीं रहते जितना दूसरों के परलोक के लिए (धोखा देना) । वस्तुतः इस समय सर्वत्र चार्वाक सिद्धांत की ही मान्यता है; आप मानें या न मानें ।

शशांक शेखर सल्ब

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” બાપુ “

બાપુ એટલે બાપ , પિતાજી
શા માટે દરબારો ને બાપુ કહેવાય છે
એવી તે કઈ ઘટના ઓ બની કે રાજપુતો ને લોકો માનવાચક બાપુ ના હુલામણા નામ થી પોકારવા માંડ્યા.
ઇતિહાસ ના પાના ખોલી એ ને ત્યારે ખબર પડે કે સાહેબ દરબારો એ લોકો ની રક્ષા માટે
લીલામાથા ઓના બલિદાન કરી નાખ્યા છે
કોઈએ પોતાના અપરણીત જુવાન દિકરા ના બલિદાન આપ્યા તો તો કોઈ એ પોતાના પતિ અને બાપ ના બલિદાનો આપ્યા
જેદી ધીંગાણાનો ઢોલ વાઞે ને તેદી મરદ ના પાણી મપાય બાકી
આખા જગત માં ઘણાંય મુછ ના આંકડા ચડાવતા હોય છે અેનાથી કાય નો થાય
જ્યારે જ્યારે ધીંગાણા નો ઢોલ વાગ્યો ને ત્યારે ધરતી ના નરબંકા રાજપુતો એ
પોતાના હાથ હબધા કરી હથિયાર લઈ
લોકો અને આ ધરા માતા નુ રક્ષણ કર્યુ છે

સાહેબ આઝાદી વખતે ની જ વાત કરો ને જ્યારે દેશ આઝાદ થયો ત્યારે 562 દેશી રજવાડા ઓ હતા 222 કે 225 જેટલા ગુજરાત ના રજવાડા અમલ મા આવ્યા
દેશ મા લોકતંત્ર જાહેર કરવામા આવેલ પણ દેશ ના ત્રણ ભાગલા પડી ગયા
અને હજુ અમુક મુસ્લિમ નવાબો પાકિસ્તાન અને બાંગ્લાદેશ ની સાથે ભળી જવા તૈયાર થઈ ગયેલા
પરંતુ દેશ વિભાજીત થાય એ પહેલા અમુક રાજપુતો એ દેશ વિભાજીત ના થાય એ માટે ગાંધીજી અને સરદાર પટેલ ને આ બાબતે વાત કરી પણ કોઈ ઊપાય કામ ના લાગ્યો
છેવટે સરદાર પટેલ ગોહિલવાડ ના રાજવી કૃષ્ણકુમારસિંહજી ને મળી ને દેશ મા ચાલતી બધી જ વાત કરી કે બાપુ તમે કંઈ કરો નહિ તો આપણો દેશ અનેક નાના મોટા દેશોમા વિભાજીત થઈ જશે આ સાંભળી ને ગોહિલવાડ ના ધણી હુકમ કર્યો કે દસ્તાવેજો તૈયાર કરો પહેલુ રજવાડુ હુ દેશ ને શરણે કરુ છુ અને અખંડ ભારતનુ સ્વપ્ન સાકાર થવા માડ્યુ
પછી ગુજરાત ના તમામ રજવાડાઓએ
કૃષ્ણકુમારસિંહજી નો પંથ અપનાવ્યો
અને પડી ભાંગેલા ભારત ને રાજપુતો એ ફરી થી ઊભો કર્યો
અને આ કામ ના નાયક સરદાર પટેલ ને બનાવ્યા રાજપુતો ના આવા અનેક કામો ને કારણે ગુજરાત ના લોકો એ રાજપુતો ને "બાપુ " નો સરતાજ આપ્યો "બાપુ " શબ્દ તો અનેક વર્ષો પહેલા નો હતો ગુજરાત ની તમામ જનતા આજેપણ રક્ષણ કરતા રાજપુતો ને બાપુ કહીને જ બોલાવે છે

નોધ : અમુક લોકો પોતાને બાપુ માની રહ્યા છે તો મારી અપીલ છે કે તમે જે કંઈ શો એ જ રહો

સમજાય એને વટ થી

જય માતાજી
જય સોમનાથ
જય રાજપુતાના

અનિલ પઢિયાર

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ભારતમાં મફત અને ફરજિયાત પ્રાથમિક શિક્ષણ સૌપ્રથમ 1906 માં બરોડા રાજ્ય દ્વારા રજૂ કરવામાં આવ્યું હતું. આના લગભગ 100 વર્ષ પછી, સ્વતંત્ર ભારતમાં આ પગલું લેવામાં આવ્યું અને દરેકને મફત શિક્ષણનો અધિકાર મળ્યો.
એક સમયે જ્યારે મોટરવાળા વાહનો ખૂબ જ દુર્લભ હતા, ત્યારે બરોડાના મહારાજા સયાજીરાવ ગાયકવાડ-III એ 500 મોબાઈલ લાઈબ્રેરીઓ શરૂ કરી!
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