Posted in संस्कृत साहित्य

संस्कृत भाषा का कोई सानी नहीं है।

अंग्रेजी में
A QUICK BROWN FOX JUMPS OVER THE LAZY DOG
एक प्रसिद्ध वाक्य है।
अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर उसमें समाहित हैं। किन्तु कुछ कमियाँ भी हैं, या यों कहिए,
कुछ कलकारियाँ किसी अंग्रेजी वाक्य से हो नहीं सकतीं।

1) अंग्रेजी अक्षर 26 हैं और यहां जबरन 33 का उपयोग करना पड़ा है।
चार O हैं और A,E,U,R दो-दो हैं।

2) अक्षरों का ABCD.. यह स्थापित क्रम नहीं दिख रहा। सब अस्तव्यस्त है।

अब संस्कृत में चमत्कार देखिये!

क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोटौठीडढण:।
तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।

अर्थात्-
पक्षियों का प्रेम,
शुद्ध बुद्धि का ,
दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत,
शत्रु-संहारकों में अग्रणी,
मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन?
राजा मय कि जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।

आप देख सकते हैं कि संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन इस पद्य में आ जाते हैं। इतना ही नहीं, उनका क्रम भी यथायोग्य है।

एक ही अक्षर का अद्भुत अर्थ विस्तार

माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल “भ” और “र”, दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है-

भूरिभिर्भारिभिर्भीभीराभूभारैरभिरेभिरे।
भेरीरेभिभिरभ्राभैरूभीरूभिरिभैरिभा:।।

अर्थात् धरा को भी वजन लगे ऐसे वजनदार,
वाद्य यंत्र जैसी आवाज निकालने वाले और मेघ जैसे काले निडर हाथी ने अपने दुश्मन हाथी पर हमला किया।

किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल “न” व्यंजन से अद्भुत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने कहा है।

न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नाना नना ननु।
नुन्नोSनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नन्नुनन्नुनुत्।।

अर्थ-
जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है।घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है।

संस्कृत भाषा सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक भाषा यूँ ही नहीं कही जाती !!!

आपके हमारे मन की गहराईयों में बचपन से
जो संस्कृत के लिए
तिरस्कार हास्य भर दिया गया है, यह उसी का परिणाम है कि हम संस्कृत पर गर्व ही नही कर पाते हैं

PART -2
↓↓↓

अब हम एक ऐसा उदहारण देखेंगे जिसमे महायमक अलंकार का प्रयोग किया गया है।

इस श्लोक में चार पद हैं,
बिलकुल एक जैसे, किन्तु सबके अर्थ अलग-अलग।

विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणाः ।
विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणाः ॥

अर्थात्
अर्जुन के असंख्य बाण सर्वत्र व्याप्त हो गए जिससे शंकर के बाण खण्डित कर दिए गए। इस प्रकार अर्जुन के रण कौशल को देखकर दानवों को मरने वाले शंकर के गैन आश्चर्य में पड़ गए। शंकर और तपस्वी अर्जुन के युद्ध को देखने के लिए शंकर के भक्त आकाश में आ पहुँचे।

संस्कृत की विशेषता है कि संधि की सहायता से
इसमें कितने भी लम्बे शब्द बनाये जा सकते हैं।

ऐसा ही एक शब्द इस👇🏻 चित्र में है,
जिसमे योजक की सहायता से
अलग अलग शब्दों को जोड़कर 431 अक्षरों का एक ही शब्द बनाया गया है।

यह न केवल संस्कृत अपितु किसी भी साहित्य का सबसे लम्बा शब्द है।

संस्कृत में यह श्लोक पाई (π) का मान दशमलव के 31 स्थानों तक शुद्ध कर देता है।

गोपीभाग्यमधुव्रात-श्रुग्ङिशोदधिसन्धिग।
खलजीवितखाताव गलहालारसंधर।।

π pi = 3.1415926535897932384626433832792

श्रृंखला समाप्त करने से पहले भगवन श्री कृष्णा की महिमा का गान करने वाला एक श्लोक जिसकी रचना भी एक ही अक्षर से की गयी है।

दाददो दुद्ददुद्दादी दाददो दूददीददोः।
दुद्दादं दददे दुद्दे दादाददददोऽददः॥

यहाँ पर बहुत ही कम उदाहरण लिए हैं,
किन्तु ऐसे और इनसे भी कहीं प्रभावशाली उल्लेख संस्कृत साहित्य में असंख्य बार आते हैं।

कभी इस बहस में न पड़ें कि संस्कृत अमुक भाषा जैसा कर सकती है कि नहीं,

बस यह जान लें,

जो संस्कृत कर सकती है, वह कहीं और नहीं हो सकता।

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एकलव्य और बर्बरीक


महाभारत को काल्पनिक कहने वाले कभी एकलव्य को काल्पनिक नहीं कहते हैं। वैसे सनातनी आस्था वाले लोग तो महाभारत को भी वास्तविक ही मानते हैं और महाभारत की घटनाओं को भी, जो कि सर्वथा उचित भी है। महर्षि वेदव्यास प्रणीत सर्वलोकोपकारी, इस विशाल महाग्रंथ में सभी कर्तव्य, धर्म और तत्वों का सार निहित है। हम आज इस बात पर चर्चा करेंगे कि क्या एकलव्य और बर्बरीक पर कोई अत्याचार हुआ था ? क्या एकलव्य का अंगूठा कटवाना अथवा महाभारत युद्ध से पूर्व ही बर्बरीक का मस्तक काटना, अत्याचार या शोषण नहीं था ? महाभारत स्वयं तो एकलव्य एवं बर्बरीक का कोई विस्तृत वर्णन नहीं करता, अपितु सांकेतिक वर्णन करता है, किन्तु उसके खिलभाग हरिवंशम् में अथवा वेदव्यास कृत अन्य ग्रंथों में इनका व्यापक वर्णन मिलता है।

सर्वप्रथम हम बर्बरीक पर चर्चा करेंगे। बर्बरीक अत्यंत पराक्रमी राक्षस थे। ये भीम और हिडिम्बा के संयोग से उत्पन्न राक्षसराज घटोत्कच, जो कामाख्या के निकट में मायांग (मायोंग) के राजा थे, के पुत्र थे। इनके भाई का नाम अञ्जनपर्वा एवं माता का नाम कामकटंकटा था। मतांतर से कामकटंकटा का नाम मौर्वी भी था क्योंकि यह मुर दैत्य की पुत्री थी। मुर दैत्य प्राग्ज्योतिषपुर (लगभग आज का पूरा असम) के राजा नरकासुर का दुर्गप्रहरी था। घटोत्कच का नाम उनसे केशहीन होने के कारण पड़ा तो बर्बरीक का नाम उनके विशाल एवं कठोर केशों के ही कारण था, जैसा कि स्कन्दपुराण के कौमारिकाखण्ड का वचन है

बर्बराकारकेशत्वाद्बर्बरीकाभिधो भवान्॥

बर्बरीक राक्षसकुल में जन्म लेने के बाद भी अत्यंत संस्कारी एवं धर्मपरायण थे। ये कभी अपने सामर्थ्य का प्रयोग संसार को पीड़ा देने के लिये नहीं करते थे। भगवान् श्रीकृष्ण ने इन्हें धर्मशास्त्रों के तत्व की विशेष शिक्षा दी थी एवं चारों वर्णों के कर्तव्य का बोध कराकर देवी की तपस्या करने के लिए गुह्यतीर्थ (कामाख्या) में भेज दिया। वैसे भी बर्बरीक के पिता का राज्य वहां से दो योजन (लगभग 25 किमी) की दूरी पर ही था।

उस गुह्यतीर्थ में विजय नाम के एक तपस्वी ब्राह्मण अपनी साधना कर रहे थे। उनकी तपस्या में विघ्न उत्पन्न करने के लिए अनेकों हिंस्र जंतु, पिशाच एवं राक्षसों के झुंड आते थे। बर्बरीक ने उन सबका संहार करके विजय मुनि की रक्षा की। अपनी तपस्या पूर्ण होने पर विजय ने हवन का भस्म एवं देवी का सिन्दूर दिया। उसमें त्रिलोक का संहार करने की क्षमता थी। बाद में बर्बरीक ने भी देवी की आराधना करके उनसे दिव्य बाण आदि की प्राप्ति की।

एक बार वनवास के मध्य भीमसेन ने किसी जलस्रोत को प्रदूषित कर दिया था तो बर्बरीक ने उन्हें ऐसा करने से रोका। उस समय तक बर्बरीक ने पांडवों को देखा नहीं था। अपने बल के अभिमान में भीमसेन ने बर्बरीक का अपमान किया तो बर्बरीक उन्हें उठाकर समुद्र में फेंकने के लिए चल पड़े। बाद में आकाशवाणी हुई कि ये तुम्हारे पितामह भीमसेन हैं, तब बर्बरीक ने उन्हें छोड़ा। भीमसेन ने भी प्रकृति को प्रमादवश प्रदूषित करने के लिए क्षमा मांगी थी। यह सब कथाएं स्कन्दपुराण आदि में विस्तार से वर्णित हैं। अब हम उस प्रसङ्ग पर आते हैं जहां महाभारत के युद्ध से पूर्व सभी योद्धागण अपने अपने दिव्यास्त्रों की सीमा और क्षमता का आंकलन कर रहे थे। पाण्डवों के पक्ष से युद्ध में सम्मिलित हुए बर्बरीक ने कहा कि मैं क्षणमात्र में ही उपस्थित दोनों सेनाओं के संहार कर सकता हूँ। इस बात को अविश्वसनीय मानकर सभी वीरों ने उपहास किया। भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा कि जिस सेना को जीतना देवतागण के लिए भी दुष्कर है उसे तुम अकेले ही क्षणमात्र में कैसे संहार कर सकते हो, इसका प्रमाण दो। भगवान् की बात को सुनकर बर्बरीक ने कहा कि यदि मर्म का बोध हो तो एक ही प्रहार से शत्रु को मारा जा सकता है (इसी विचारधारा का प्रयोग मार्शल आर्ट्स वाले करते हैं)

बर्बरीक ने अपने दिव्य तीन बाणों इन से एक बाण को विप्रदत्त सिन्दूर से अभिमंत्रित किया और मर्मनिरीक्षण किया। उनके द्वारा चलाए गए बाण से जो सिन्दूर निकला वह विस्तृत होकर दोनों सेनाओं में गिरा। द्रोण, द्रुपद एवं विराट के कंठ पर सिन्दूर गिरा। दुर्योधन की जंघा, भगदत्त की नासिका भाग एवं शल्य की छाती पर सिन्दूर लगा। भीष्म पितामह के सभी रोमकूपों में सिन्दूर व्याप्त हो गया और भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में भी लगा। कृपाचार्य और अश्वत्थामा को चिरंजीवी होने से सिन्दूर नहीं लगा एवं पाण्डवों को भी नहीं लगा। आप ध्यान देंगे तो उन वीरों का जिस जिस अंग में सिन्दूर लगा था, महाभारत के युद्ध में उसी अंग पर प्रहार होने से उनकी मृत्यु हुई थी। कालांतर में जब श्रीकृष्ण भी धराधाम को त्याग रहे थे तो जरा नामक व्याध के द्वारा पैरों में ही बाण लगने का निमित्त बनाया था।

इस प्रकार सबों के मर्म का निरीक्षण करके बर्बरीक ने उन सबों को मारने की इच्छा से दूसरे बाण का सन्धान किया। इसी मध्य भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने चक्र से बर्बरीक का मस्तक काट दिया। इस अप्रत्याशित घटना से सभी लोग हतप्रभ रह गए। घटोत्कच तो अपने पुत्र की मृत्यु पर मूर्छित सा हो गया एवं पाण्डव भी शोकाकुल हो गए, सभी लोग श्रीकृष्ण को दोषी कहने लगे। उसी समय चण्डिका, वाराही आदि चौदह देवियां प्रकट हुईं एवं एक रहस्य बताया।

देवियों ने कहा – पूर्वकाल में यह बर्बरीक सूर्यवर्चा नामक यक्ष था जो चौरासी करोड़ यक्षों (अथवा मुद्राओं) का स्वामी था। जब स्वर्गलोक में देवताओं की सभा हो रही थी कि पृथ्वी के भारहरण के लिए भगवान् विष्णु का अवतार होना चाहिए एवं उनके साथ ही अन्य देवताओं को भी जाना चाहिए, उस समय एक घटना घटी।

एतस्मिन्नन्तरे बाहुमुद्धृत्योच्चैरभाषत।
सूर्यवर्चेति यक्षेन्द्रश्चतुराशीतिकोटिपः।
किमर्थं मानुषे लोके भवद्भिर्जन्म कार्यते॥
मयि तिष्ठति दोषाणामनेकानां महास्पदे।
सर्वे भवन्तो मोदन्तु स्वर्गेषु सह विष्णुना॥
(स्कन्दपुराण, माहेश्वरखण्ड-कौमारिकाखण्ड, अध्याय – ६६, श्लोक – ५८-६०)

इसी बीच चौरासी करोड़ के स्वामी सूर्यवर्चा नामक यक्ष ने अपनी भुजाएं उठाकर उच्चस्वर से यह उद्घोष-लोग व्यर्थ में ही मनुष्य योनि में जन्म लेना चाहते हैं। पृथ्वी के भार हरण के लिए तो मैं ही पर्याप्त हूँ, मेरे रहते हुए आपलोग क्यों कष्ट करेंगे। युद्ध में बहुत अधिक दोष होते हैं (अतएव बिना सामूहिक युद्ध के अकेले ही सबको मार दूंगा) आप सभी देवगण स्वर्गादि दिव्यलोकों में विष्णु के साथ आनन्दित रहें।

सूर्यवर्चा यक्ष के ऐसा कहने से सभी देवताओं को अपमान का अनुभव हुआ। भगवान् के अवतार का उद्देश्य मात्र संसार के अधर्मियों के नाश करना नहीं होता है, वे लोकमर्यादा की शिक्षा एवं धर्म की स्थापना के लिए भी आते हैं। नानाविध प्रकार से उनके लीलाभाव में सम्मिलित होने की इच्छा वाले भक्तों की कामनापूर्ति भी करते हैं, यद्यपि भगवान् भृकुटिविलासमात्र से सृष्टि संहार में समर्थ हैं फिर भी अवतार लेते हैं। अवतारभेद के उद्देश्य का ज्ञान न रखने वाले उस बलाभिमानी यक्ष को उस सभा में ब्रह्मदेव ने श्राप दिया – तुम पृथ्वी पर राक्षसकुल में जाओगे, अत्यन्त पराक्रमी भी बनोगे किन्तु जब मुख्य युद्ध का अवसर आएगा तब तुम्हारा मस्तक श्रीकृष्ण के द्वारा काट लिया जाएगा।

देवी के द्वारा इस रहस्य का उद्घाटन होने से वहां उपस्थित सभी लोगों ने इस घटना को पूर्वनिर्धारित जानकर भगवान् श्रीकृष्ण को निर्दोष माना। इसके बाद देवी ने बर्बरीक के मस्तक भाग को पुनर्जीवित कर दिया।

इत्युक्ते चण्डिका देवी तदा भक्तशिरस्त्विदम्।
अभ्युक्ष्य सुधया शीघ्रमजरं चामरं व्यधात्॥
यथा राहुशिरस्तद्वत्तच्छिरः प्रणनाम तान्।
उवाच च दिदृक्षामि युद्धं तदनुमन्यताम्॥
ततः कृष्णो वचः प्राह मेघगंभीरवाक्प्रभुः।
यावन्मही सनक्षत्रा यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
तावत्त्वं सर्वलोकानां वत्स पूज्यो भविष्यसि।
देवीलोकेषु सर्वेषु देवीवद्विचरिष्यसि॥
(स्कन्दपुराण, माहेश्वरखण्ड-कौमारिकाखण्ड, अध्याय ६६, श्लोक – ७३-७६)

चण्डिका देवी ने अपने भक्त के मस्तक को अमृत के द्वारा पुनर्जीवित करके उसे अजर अमर बना दिया। जैसे राहु का शिरमात्र ही है वैसे ही बर्बरीक भी हो गया और उसने सबको प्रणाम दिया और कहा कि आपसबों की सम्मति से मैं अब इस युद्ध का मात्र दर्शन करूँगा। उस समय मेघ के समान गंभीर वाणी में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा – जबतक यह पृथ्वी सभी नक्षत्रों के साथ विद्यमान है, जब तक सूर्य एवं चन्द्र हैं, तब तक हे वत्स ! तुम पूरे संसार के लिए पूजनीय रहोगे। जैसे इस संसार में, तथा अपने लोकों में देवी (इच्छानुसार) विहार करती हैं, वैसे ही तुम भी करोगे। इस प्रकार भगवान् ने बर्बरीक को देवतुल्य बनाकर लोकपूज्य स्थान में वास दे दिया तभी से बर्बरीक ने श्रीकृष्णतुल्यता के साथ संसार में भक्तों का, विशेषकर रोगनाश, बालारिष्ट शमन आदि के माध्यम से कल्याण करना प्रारम्भ किया।

अब हम एकलव्य की चर्चा करते हैं। लोक में प्रसिद्ध है कि एकलव्य हिरण्यधनु नामक निषादराज का पुत्र था किन्तु ग्रंथों के विशेषज्ञ जानते हैं कि वह हिरण्यधनु का औरस नहीं, पालित पुत्र था। वास्तव में एकलव्य का नाम शत्रुघ्न था एवं वह यदुवंशी देवश्रवा (श्रुतदेव) का पुत्र था। उसे लोकसंहारक गतिविधियों के कारण राज्य से निकाल दिया गया था, क्योंकि वह कंस का पक्षधर था। बाद में उसे निषादराज हिरण्यधनु ने पाला और एकलव्य कंस के श्वसुर जरासन्ध आदि के दल में सम्मिलित हो गया।

निवृत्तशत्रुं शत्रुघ्नं श्रुतदेव त्वजायत।
श्रुतदेवात्मजास्ते तु नैषादिर्यः परिश्रुतः॥
एकलव्यो मुनिश्रेष्ठा निषादैः परिवर्द्धितः।
ब्रह्मपुराण, अध्याय – १४, श्लोक – २७)

निवृत्तशत्रुं शत्रुघ्नं देवश्रवा व्यजायत।
देवश्रवाः प्रजातस्तु नैषादिर्यः प्रतिश्रुतः।
एकलव्यो महाराज निषादैः परिवर्धितः॥

(हरिवंशपुराण, हरिवंशपर्व, अध्याय – ३४, श्लोक – ३३)

इसी का समर्थन वायुपुराण आदि भी करते हैं। इधर द्रोणाचार्य कौन थे ? वे हस्तिनापुर के राजगुरु थे। हस्तिनापुर के राजकुमारों को शिक्षित करने के लिए ही उन्हें विशेष नियुक्ति मिली थी, जबकि एकलव्य जरासन्ध के पक्ष का था। हस्तिनापुर उस समय ऐसा राज्य था जो भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य आदि से सुरक्षित होने के कारण किसी की अधीनता स्वीकार नहीं करता था। इसके अतिरिक्त पूरा संसार दो ही राजाओं के सामने झुका हुआ था, एक तो मगधनरेश जरासन्ध एवं दूसरे प्राग्ज्योतिषपुर के राजा नरकासुर। नरकासुर ने हजारों राजाओं की पुत्रियों को विवाह हेतु बन्दी बना रखा था तो उन हज़ारों राजाओं को तामसी यज्ञ में नरबलि देने हेतु जरासन्ध ने बन्दी बना रखा था। नरकासुर की बाणासुर एवं कंस से मित्रता थी और जरासन्ध का दामाद कंस था। साथ ही कंस बाणासुर का मित्र भी था। तो इस प्रकार जरासन्ध एवं नरकासुर में भी मित्रता थी। जरासन्ध के साथ पांचालनरेश द्रुपद एवं मत्स्यनरेश विराट भी थे। अब एकलव्य जरासन्ध का सहयोगी था तो हस्तिनापुर का शत्रु हुआ। साथ ही जरासन्ध के मित्र द्रुपद की द्रोणाचार्य से शत्रुता भी थी तो इस प्रकार एकलव्य, हस्तिनापुर राज्य का परम शत्रु हुआ।

एकलव्य अपनी प्रतिभा का प्रयोग संसार को कष्ट देने के लिए करता था, साथ ही आसुरी शक्तियों के साथ उसकी मित्रता थी, अतएव द्रोणाचार्य ने उसे शस्त्र की अतिरिक्त शिक्षा नहीं दी थी। द्रोणाचार्य के मन में एकलव्य के प्रति कोई निजी दुर्भावना नहीं थी। द्रोणाचार्य अत्यन्त उदार थे, उन्होंने इस घटना के बाद, स्वयं को मारने के लिए उत्पन्न द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न को स्वयं ही शस्त्र की शिक्षा दी थी, क्योंकि उससे शेष संसार को कोई कष्ट नहीं था। तो यदि एकलव्य निजी शत्रु होता, साथ ही संसार को उससे कोई कष्ट नहीं होता तो भी द्रोणाचार्य उसे सिखा देते किन्तु वह राज्यशत्रु भी था और लोकसंहार की प्रवृत्ति से युक्त भी था। यदि चीन या पाकिस्तान का कोई ऐसा व्यक्ति, जिसका अतीत संसार के प्रति आतंकवाद का हो, यहां आए तो भारत का कोई सैन्य प्रशिक्षक उसे प्रशिक्षण दे सकता है क्या ?

एकलव्यं हि साङ्गुष्ठमशक्ता देवदानवाः।
सराक्षसोरगाः पार्थ विजेतुं युधि कर्हिचित्॥

(महाभारत, द्रोणपर्व, अध्याय – १८२, श्लोक – १९)

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन ! यदि एकलव्य अंगूठे से युक्त होता तो देवता, दानव, राक्षस, नाग आदि भी उसे शायद ही युद्ध में जीत पाते।

अतः द्रोणाचार्य ने लोक को उसके प्रकोप से बचाने के लिए उसके अंगूठे को मांग लिया और उसकी प्रतिभा पूर्णतया समाप्त न हो जाए, इसके लिए उसे बिना अंगूठे के ही तर्जनी एवं मध्यमा के सहयोग से तीर चलाने की विधि बता दी थी, जिसका प्रयोग आजतक ओलम्पिक आदि में भी होता है। यहां महाभारत का प्रसङ्ग देखें –

ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुषः सुतः।
एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह॥
न स तं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तयन्।
शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षया॥
(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय – १४२, श्लोक – ४०-४१)

निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र एकलव्य द्रोण के पास गया किन्तु धर्मज्ञ द्रोणाचार्य ने उसे निषादपुत्र समझकर धनुर्विद्या नहीं दी।

यहां द्रोणाचार्य के लिए धर्मज्ञ शब्द आया है, और साथ ही समझकर, ऐसा संकेत है। क्या समझकर ? निषादपुत्र समझकर। द्रोणाचार्य जानते थे कि यह निषादपुत्र तो है नहीं, यह तो मथुरा के राजवंश का क्षत्रिय है, जिसे असामाजिक गतिविधियों के कारण निकाल दिया गया तब निषादों ने इसे अपना लिया, ऐसा समझकर, ऐसा उसके पूर्व चरित्र को जानकर, धर्म का विचार करके द्रोणाचार्य ने उसे मना कर दिया।

द्रोणाचार्य जैसे त्रिलोकविजेता ज्ञानी इतने सरल थे कि उनके यहां उनके शिवावतार चिरंजीवी पुत्र को पीने के लिए दूध तक नहीं होता था। क्या उनकी इस दरिद्रता पर सामाजिक न्याय वाले कभी चर्चा करेंगे ? जब द्रोणाचार्य अपने पूर्व सहपाठी राजा द्रुपद के पास गए तो द्रुपद ने उनका अपमान करते हुए कहा –

न दरिद्रो वसुमतो नाविद्वान्विदुषः सखा।
न शूरस्य सखा क्लीबः सखिपूर्वं किमिष्यते॥
ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं श्रुतम्।
तयोर्विवाहः सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयोः॥
नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा।
नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते॥
(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय – १४१, श्लोक – ०९-११)

द्रुपद ने कहा – जो निर्धन है, वह भूमिपति का मित्र नहीं होता। मूर्ख व्यक्ति विद्वान् का, नपुंसक व्यक्ति वीर का सखा नहीं होता, फिर हम दोनों में पूर्वकाल में कैसे मित्रता सम्भव हो सकती है ? जिनका आर्थिक स्तर एवं प्रसिद्धि समान होती है, उनके मध्य ही वैवाहिक सम्बन्ध अथवा मित्रता होती है, असमानों में नहीं। जो वेदज्ञ नहीं है, उसका वेदज्ञ से, जो रथी नहीं है, उसका रथी से, जो राजा नहीं है, उसका राजा से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध नहीं होता है। फिर हम दोनों में कैसी मित्रता ?

राजा द्रुपद के इस प्रकार कहने पर द्रोणाचार्य अपमान का घूंट पीकर रह गए और समर्थ होने पर भी द्रुपद को उस समय दण्डित नहीं किया। बाद में भीष्म पितामह ने उन्हें ससम्मान अपने राज्य में गुरुपद प्रदान किया।

एकलव्य वाली इस घटना के कुछ वर्षों के बाद कंस मारा गया और भगवान् मथुरा में वास करने लगे। अपने जामाता के मरने पर जरासन्ध ने सत्रह बार तेईस अक्षौहिणी सेना के साथ मथुरा पर आक्रमण किया किन्तु प्रत्येक बार उसे पराजित होना पड़ा। अठारहवीं बार कालयवन के एक करोड़ सैनिकों के साथ तथा अपनी भी विशाल सेना को सम्मिलित करने के बाद जरासन्ध ने विशाल आक्रमण किया जिससे प्रजा को बचाने के लिए भगवान् ने रातोंरात विश्वकर्मा के सहयोग से द्वारिका का निर्माण करवाकर वहां प्रजा को स्थानांतरित कराया था।

अब चूंकि जरासन्ध इतना पराक्रमी सम्राट था कि कोई भी उसके विरुद्ध खड़ा नहीं होता था इसीलिए जब उसने अठारहवीं बार मथुरा पर आक्रमण किया तो उसके साथ अनेकों प्रसिद्ध राजा भी आये, किन्तु मथुरा के पक्ष से कोई नहीं आया। जब भगवान् श्रीकृष्ण ने नीति का पालन करते हुए समय को टालने की इच्छा से एवं प्रजा को कालयवन तथा जरासन्ध के दोतरफा आक्रमण से बचाने के लिये, शत्रुओं को भ्रमित करते हुए युद्धभूमि से भागने की लीला की और बाद में बलरामजी के साथ प्रवर्षण पर्वत पर छिप गए तो जरासन्ध ने चिढ़ कर उस पूरे पर्वत को आग लगाने की आज्ञा दे दी थी। उस समय जरासन्ध की सेना में निम्न वीर सम्मिलित थे –

मद्रः कलिङ्गाधिपतिश्चेकितानश्च बाह्लिकः।
काश्मीरराजो गोनर्दः करूषाधिपतिस्तथा॥
द्रुमः किंपुरुषश्चैव पर्वतीयाश्च मानवाः।
पर्वतस्यापरं पार्श्वं क्षिप्रमारोहयन्त्वमी॥
पौरवो वेणुदारिश्च वैदर्भः सोमकस्तथा।
रुक्मी च भोजाधिपतिः सूर्याक्षश्चैव मालवः॥
पाञ्चालाधिपतिश्चैव द्रुपदश्च नराधिपः।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ दन्तवक्त्रश्च वीर्यवान्॥
छागलिः पुरमित्रश्च विराटश्च महीपतिः।
कौशाम्ब्यो मालवश्चैव शतधन्वा विदूरथः॥
भूरिश्रवास्त्रिगर्तश्च बाणः पञ्चनदस्तथा।
उत्तरं पर्वतोद्देशमेते दुर्गसहा नृपाः॥
आरोहन्तु विमर्दन्तो वज्रप्रतिमगौरवाः।
उलूकः कैतवेयश्च वीरश्चांशुमतः सुतः॥
एकलव्यो दृढाश्वश्च क्षत्रधर्मा जयद्रथः॥
उत्तमौजास्तथा शाल्वः कैरलेयश्च कैशिकः।
वैदिशो वामदेवश्च सुकेतुश्चापि वीर्यवान्॥
पूर्वपर्वतनिर्व्युहमेतेष्वायतमस्तु नः ।
विदारयन्तो धावन्तो वाता इत बलाहकान्॥
हरिवंशपुराण, विष्णुपर्व, अध्याय – ४२, श्लोक – २८-३६)

जरासन्ध ने आदेश दिया – मद्र के राजा (शल्य), कलिंग के राजा, चेकितान, बाह्लीक (भीष्म पितामह के चाचा), काश्मीर के राजा गोनर्द (इन्हीं के नामपर कश्मीर का उत्तरी भाग, जो चीन से लगता है, बसाया गया था), करूष देश के राजा (पौंड्रक) महाराज द्रुम, किम्पुरुष (सुग्रीव के मन्त्री द्विविद आदि) पर्वतों पर रहने वाले मनुष्य, ये सब इस पर्वत के दूसरी ओर से शीघ्र चढ़ें। पुरुवंश का वेणुदारि, विदर्भ के राजा सोमक, भोजकट के स्वामी रुक्मी, मालवा के स्वामी सूर्याक्ष, पाञ्चाल के राजा द्रुपद, अवन्ती के राजा विन्द एवं उनके भाई अनुविन्द, प्रतापी दन्तवक्त्र, पुरमित्र, मत्स्यदेश के राजा विराट, कौशाम्बी के शतधन्वा और मालव के विदूरथ, भूरिश्रवा, त्रिगर्तनरेश (सुशर्मा), पञ्चनद के स्वामी बाण, ये सब इस पर्वत के उत्तरी भाग से शत्रु को रौंदते हुए चढ़ाई करें। छल करने में कुशल शकुनि का पुत्र उलूक, अंशुमान् का वीर पुत्र, दृढ़ाश्व, एकलव्य, क्षत्रधर्मा, जयद्रथ, उत्तमौजा, शाल्व, केरल के राजा कैशिक, विदिशा के स्वामी वामदेव, प्रतापी सुकेतु, ये सब पूर्वदिशा से पर्वत को वैसे ही विदीर्ण करते हुए आक्रमण करें जैसे वायु के प्रहार से बादलों के समूह बिखर जाते हैं।

इस समूह में जरासन्ध की ओर से जो राजा मित्रभाव से प्रसन्न होकर लड़ने आये थे उनमें उलूक, एकलव्य, शाल्व, रुक्मी, पौंड्रक, सुशर्मा, बाण, शतधन्वा, आदि सम्मिलित हैं। जो राजा एवं वीर जरासन्ध के भय से उसके साथ आ गए थे उनमें शल्य, विराट, द्रुपद, चेकितान, आदि थे।

बाद में चेकितान ने भगवान् श्रीकृष्ण की नारायणी सेना में नियुक्ति पा ली थी। जब महाभारत के युद्ध में नारायणी सेना दुर्योधन के पक्ष में चली गयी तो चेकितान ने सात्यकि के साथ पांडवों का पक्ष लिया था। ऐसे भी जरासन्ध के मरने के बाद उत्तमौजा, द्रुपद, विराट, आदि ने श्रीकृष्ण एवं पाण्डवों का पक्ष ही लिया था। जब युधिष्ठिर इस भूमण्डल का सम्राट बनने की इच्छा से राजसूय यज्ञ करना चाहते थे तो भगवान् श्रीकृष्ण ने निम्न बात कही –

क्षत्रे सम्राजमात्मानं कर्तुमर्हसि भारत।
दुर्योधनं शान्तनवं द्रोणं द्रौणायनिं कृपम्॥
कर्णं च शिशुपालं च रुक्मिणं च धनुर्धरम्।
एकलव्यं द्रुमं श्वेतं शैब्यं शकुनिमेव च॥
एतानजित्वा सङ्ग्रामे कथं शक्नोषि तं क्रतुम्।
तथैते गौरवेणैव न योत्स्यन्ति नराधिपाः॥
एकस्तत्र बलोन्मत्तः कर्णो वैकर्तनो वृषा।
योत्स्यते स परामर्षी दिव्यास्त्रबलगर्वितः॥
न तु शक्यं जरासन्धे जीवमाने महाबल।
राजसूयस्त्वयाऽवाप्तुमेषा राजन्मतिर्मम॥
(महाभारत, सभापर्व, अध्याय – १४ श्लोक – ६८-७२)

श्रीकृष्ण ने कहा – हे भरतवंशी युधिष्ठिर ! यदि आप पृथ्वी पर सम्राट बनना चाहते हैं तो दुर्योधन, शान्तनुपुत्र भीष्म, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कर्ण, शिशुपाल, धनुर्धर रुक्मी, एकलव्य, द्रुम, विराटपुत्र श्वेत, शैब्य, शकुनि आदि को बिना जीते ही राजसूय यज्ञ कैसे कर सकते हैं ? हम मानते हैं कि (भीष्म, द्रोण, कृप आदि) आपके प्रति स्नेह और सम्मान का भाव रखने से आपसे युद्ध नहीं करेंगे किन्तु आपसे ईर्ष्या करने वाला कर्ण तो अपने दिव्यास्त्र के बल पर अभिमान करने के कारण आपसे युद्ध करेगा ही। यदि वह भी युद्ध न करे तो भी जरासन्ध के जीवित रहते आप यह राजसूय यज्ञ नहीं कर सकते, ऐसा मैं समझता हूँ।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण ने एकलव्य को वीरों की श्रेणी में अति सम्माननीय बताया है। इतना ही नहीं, जब राजसूय यज्ञ के समय किसकी अग्रपूजा हो, इस संशय में माद्रीतनय सहदेव ने कहा कि निश्चय ही, अग्रपूजा के अधिकारी भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं, तो शिशुपाल ने वहां सभा में उपस्थित अन्य गणमान्य लोगों के नाम भी गिनाए थे।

भीष्मकं च महावीर्यं दन्तवक्त्रं च भूमिपम्।
भगदत्तं यूपकेतुं जयत्सेनं च मागधम्॥
विराटद्रुपदौ चोभौ शकुनिं च बहद्बलम्।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पाण्ड्यं श्वेतमथोत्तमम्॥
शङ्खं च सुमहाभागं वृषसेनं च मानिनम्।
एकलव्यं च विक्रान्तं कालिङ्गं च महारथम्॥
अतिक्रम्य महावीर्यं किं प्रशंसति केशवम्।
(महाभारत, सभापर्व, अध्याय – ६७, श्लोक – १९-२२)

शिशुपाल ने कहा – (रुक्मिणी के पिता) अत्यंत पराक्रमी भीष्मक, राजा दन्तवक्त्र, कामरूप के स्वामी भगदत्त, यूपकेतु, मगध के वीर जयत्सेन, विराट एवं द्रुपद ये दोनों, गान्धारनरेश शकुनि, बृहद्बल/ बहद्वल, अवन्ती के विन्द एवं अनुविन्द, पाण्ड्य के राजा, उत्तम आचरण वाले श्वेत, महाभाग शङ्ख, स्वाभिमानी वृषसेन, पराक्रमी एकलव्य, महारथी कलिंगनरेश, इन सभी महाबलशालियों को छोड़कर तुम केशव की प्रशंसा क्यों करते हो ?

भले ही यह बात शिशुपाल ने श्रीकृष्ण के प्रति द्वेषभाव से कही थी किन्तु उपर्युक्त वीरों का समाज में अत्यंत श्रेष्ठ स्थान था, इसमें सन्देह नहीं है। एकलव्य ने बाद में भी कोई समाजसेवा का कार्य नहीं किया। अपने दल के अधर्मियों के साथ उसने द्वारिका पर आक्रमण कर दिया था। उस आक्रमण में दन्तवक्त्र का पुत्र सुवक्त्र भी था जो इन्द्र के समान पराक्रमी एवं सैकड़ों प्रकार के मायायुद्ध में निपुण था। उसमें स्वयं को भगवान् वासुदेव कहने वाले पौंड्रक का पुत्र सुदेव, पाण्ड्य एवं कलिंग के राजकुमार, तथा एकलव्य के पुत्र आदि निम्न वीर सम्मिलित थे –

दन्तवक्त्रस्य तनयं सुवक्त्रममितौजसम्।
सहस्राक्षसमं युद्धे मायाशतविशारदम्॥
पौण्ड्रस्य वासुदेवस्य तथा पुत्रं महाबलम्।
सुदेवं वीर्यसम्पन्नं पृथगक्षौहिणीपतिम्॥
एकलव्यस्य पुत्रं च वीर्यवन्तं महाबलम्।
पुत्रं च पाण्ड्यराजस्य कलिङ्गाधिपतिं तथा॥
(हरिवंशपुराण, विष्णुपर्व, अध्याय, ५९, श्लोक – ०३-०५)

आप सबों को करूष देश के मूर्ख राजा पौंड्रक का स्मरण तो होगा ही, जिसने स्वयं को ही विष्णु का अवतार वासुदेव घोषित कर दिया था एवं भगवान् श्रीकृष्ण को निम्न सन्देश भिजवाया था –

वासुदेवोऽवतीर्णोहमेक एव न चापरः।
भूतानामनुकम्पार्थं त्वं तु मिथ्याभिधां त्यज॥

(श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध – १०, अध्याय – ६६, श्लोक – ०५)

हे कृष्ण ! मैं ही वास्तविक वासुदेव हूँ, मेरे अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है। मैंने ही प्राणियों पर कृपा करने के लिए अवतार लिया है इसीलिए तुम अपना यह झूठ का आवरण छोड़ दो।

यह पौंड्रक बाद में सात्यकि के हाथों पराजित होता हुआ, अन्त में श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया था, किन्तु यहां ध्यातव्य है कि इसके पक्ष से लड़ने के लिए एकलव्य भी आया हुआ था एवं बलराम जी मे उस युद्ध में एकलव्य को मानो रौंद ही डाला था। उस विशाल युद्ध की एक झलक देखें –

ततः शक्तिं समादाय घण्टामालाकुलां नृपः।
निषादो बलदेवाय प्रेषयित्वा महाबलः॥
सिंहनादं महाघोरमकरोत् स निषादपः।
सा शक्तिः सर्वकल्याणी बलदेवमुपागमत्॥
उत्पतन्तीं महाघोरां बलभद्रः प्रतापवान्।
आदायाथ निषादेशं सर्वान् विस्मापयन्निव॥
तयैव तं जघानाशु वक्षोदेशे च माधवः।
स तया ताडितो वीरः स्वशक्त्याथ निषादपः॥
विह्वलः सर्वगात्रेषु निपपात महीतले।
प्राणसंशयमापन्नो निषादो रामताडितः॥

(हरिवंशपुराण, भविष्यपर्व, अध्याय -९८, श्लोक – ११-१५)

तब महाबली निषादराज एकलव्य ने घण्टियों से सुशोभित, एक शक्ति (विशेष प्रक्षेपास्त्र) बलराम जी की ओर चलाकर घोर अट्टहास किया। वह शक्ति ज बलरामजी के पास आयी तो अपने ऊपर गिरती हुई उस महाघोर शक्ति को प्रतापी बलभद्र जी ने पकड़ लिया और उसे वापस निषादराज की ओर ही चला दिया, इस बात से सभी आश्चर्यचकित हो गए। उस शक्ति से माधव बलराम जी ने एकलव्य की छाती पर प्रहार किया। अपनी ही चलाई हुई उस शक्ति के प्रहार से निषादराज के सभी अंग व्याकुल हो गए और बलराम जी के द्वारा मारे जाने पर वह मरणासन्न होकर भूमि पर गिर पड़ा।

युद्धकला को सीखने के लिए मात्र प्रतिभाशाली ही होना आवश्यक नहीं है अपितु पवित्र उद्देश्य, धैर्य, लोकोपकार की भावना, आदि भी आवश्यक है। यह सभी गुण अर्जुन में थे, इसीलिए उन्हें स्वर्ग से भी निमंत्रण मिला। साथ ही शिवजी की कृपा से अनेकों दुर्लभ दिव्यास्त्र मिले। एकलव्य में प्रतिभा तो थी किन्तु सद्भावना नहीं थी। आज भी बहुत से कुशाग्र बुद्धि वाले डॉक्टर, इंजीनियर, वकील एवं वैज्ञानिक अपनी दुर्भावना के कारण आतंकवादी बन जा रहे हैं तो क्या उनकी प्रतिभा के कारण उनका सम्मान किया जाएगा ? द्रोणाचार्य तो इतने अधिक संवेदनशील गुरु थे कि धैर्य आदि गुणों से रहित होने के कारण उन्होंने अपने सगे पुत्र अश्वत्थामा को भी बारम्बार मांगने पर भी ब्रह्मशिर जैसा दिव्य अस्त्र नहीं दिया, ब्रह्मास्त्र को केवल चलाने की विधि बताई, उसे लौटाने की नहीं, किन्तु अर्जुन को उन्होंने ब्रह्मशिर भी दिया और ब्रह्मास्त्र लौटाने की विधि भी बताई, क्योंकि अर्जुन उचित पात्र थे। इस प्रकार हम देखते हैं कि द्रोणाचार्य ने जब अपने पुत्र के साथ भी योग्यता की इतनी गम्भीर विवेचना करते हुए निर्णय लिया तो जिसका पूर्व का आचरण ही संदिग्ध रहा हो उस एकलव्य को कैसे अपनी विद्या दे देते, अतएव हम समझते हैं कि एकलव्य पर कोई अत्याचार नहीं हुआ था।

श्रीमन्महामहिम विद्यामार्तण्ड श्रीभागवतानंद गुरु
His Holiness Shri Bhagavatananda Guru

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प्राचीन भारतीय सृष्टि विज्ञान एवं दर्शन को रुपायित करती यह घड़ी बहुत अच्छी लगी।
हम सभी को यह स्मरण दिलाती है कि

जब 1 बजे तो स्मरण हो कि ब्रम्ह एक है…!

2 बजने पर सृष्टि विकास में युगल देवों अर्थात अश्विनी और कुमार (रात दिन,पृथ्वी स्वर्ग,विद्युत चुम्बक,इडा पिंगला,दोनों नासापुट,सूर्य चंद्र, दान पुण्य,वैद्य यौवन प्रदाता,आदि) का स्मरण।

3 अर्थात तीन गुण – सत्व, रज और तम।

4 अर्थात चारों वेद – ऋ क, यजु:,साम,और अथर्व।

5 अर्थात पांच प्राण – प्राण,अपान, उदान, व्यान और समान।

6 अर्थात छ रस – अम्ल,नमकीन,कटु, तिक्त,कषाय और मधुर।

7 अर्थात सात ऋषि प्राण – अत्रि,कश्यप,वशिष्ठ,विश्वामित्र,भारद्वाज,गौतम और जमदग्नि।

8 अर्थात आठ सिद्धियां – अनिमा,लघिमा,गरिमा,महिमा,प्राप्ति,प्राकाम्य,इशित्व और वशीकरण।

9 अर्थात नौ द्रव्य – पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु,आकाश,दिक – काल, मन और आत्मा।

10 अर्थात दस दिशाएं – पूर्व,आग्नेय,दक्षिण, नैरित्य,पश्चिम,वायव्य,उत्तर,ईशान,ऊपर और नीचे।

11 अर्थात ग्यारह रुद्र – कपाली,पिंगल,भीम,विरूपाक्ष,विलोहित,शास्ता,अजपाद, अहिर्बुधन्य,शंभू,चंड,और भव।

12 बजने पर स्मरण हो कि बारह आदित्य (जो कि 12 मास के रूप में सृष्टि चक्र को संचालित करते हैं ) – अंशुमान, भग, पूषा,धाता,मित्र,अर्यमा,वरुण, विवस्वान,सविता,शुक्र,त्वष्टा और विष्णु।

सभी भारतीय इस अद्भुत सृष्टि विज्ञान का चिंतन स्मरण इस घड़ी के माध्यम से करने का आनंद लें।

साभार
-डॉ रामेश्वर आमेटा

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सुनील त्रिवेदी

यज्ञादि कर्मों में अग्नि के नाम एवं वेदों में अग्नि की महत्ता :-


अग्नि की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पौराणिक गाथा इस प्रकार है-सर्वप्रथम धर्म की वसु नामक पत्नी से अग्नि उत्पन्न हुआ। उसकी पत्नी स्वाहा से उसके तीन पुत्र हुए-

पावक
पवमान
शुचि

छठे मन्वन्तर में वसु की वसुधारा नामक पत्नी से द्रविणक आदि पुत्र हुए, जिनमें 45 अग्नि-संतान उत्पन्न हुए। इस प्रकार सब मिलाकर 49 अग्नि हैं। विभिन्न कर्मों में अग्नि के भिन्न-भिन्न नाम हैं। लौकिक कर्म में अग्नि का प्रथम नाम पावक है। गृहप्रवेश आदि में निम्नांकित अन्य नाम प्रसिद्ध हैं-

अग्नेस्तु मारुतो नाम गर्भाधाने विधीयते।
पुंसवने चन्द्रनामा शुगांकर्मणि शोभन:।।
सीमन्ते मंगलो नाम प्रगल्भो जातकर्मणि।
नाग्नि स्यात्पार्थिवी ह्यग्नि: प्राशने च शुचिस्तथा।।
सत्यनामाथ चूडायां व्रतादेशे समुद्भव:।
गोदाने सूर्यनामा च केशान्ते ह्यग्निरुच्यते।।
वैश्वानरो विसर्गे तु विवाहे योजक: स्मृत:।
चतुर्थ्यान्तु शिखी नाम धृतिरग्निस्तथा परे।।
प्रायश्चित्ते विधुश्चैव पाकयज्ञे तु साहस:।
लक्षहोमे तु वह्नि:स्यात कोटिहोमे हुताश्न:।।
पूर्णाहुत्यां मृडो नाम शान्तिके वरदस्तथा।
पौष्टिके बलदश्चैव क्रोधाग्निश्चाभिचारिके।।
वश्यर्थे शमनी नाम वरदानेऽभिदूषक:।
कोष्ठे तु जठरी नाम क्रव्यादो मृतभक्षणे।।

अर्थात

गर्भाधान में अग्नि को “मारुत” कहते हैं।
पुंसवन में “चन्द्रमा
शुगांकर्म में “शोभन
सीमान्त में “मंगल
जातकर्म में ‘प्रगल्भ
नामकरण में “पार्थिव
अन्नप्राशन में ‘शुचि
चूड़ाकर्म में “सत्य
व्रतबन्ध (उपनयन) में “समुद्भव
गोदान में “सूर्य
केशान्त (समावर्तन) में “अग्नि
विसर्ग (अर्थात् अग्निहोत्रादिक्रियाकलाप) में “वैश्वानर
विवाह में “योजक
चतुर्थी में “शिखी
धृति में “अग्नि
प्रायश्चित (अर्थात् प्रायश्चित्तात्मक महाव्याहृतिहोम) में “विधु
पाकयज्ञ (अर्थात् पाकांग होम, वृषोत्सर्ग, गृहप्रतिष्ठा आदि में) ‘साहस
लक्षहोम में “वह्नि
कोटि होम में “हुताशन
पूर्णाहुति में “मृड
शान्ति में “वरद
पौष्टिक में “बलद
आभिचारिक में “क्रोधाग्नि
वशीकरण में “शमन
वरदान में “अभिदूषक
कोष्ठ में “जठर
और मृत भक्षण में “क्रव्याद” कहा गया है।

ऋग्वेद के अनुसार:-


हिन्दू देवमण्डल का प्राचीनतम सदस्य, वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। अग्नि के तीन स्थान और तीन मुख्य रूप हैं-

व्योम से सूर्य
अन्तरिक्ष (मध्याकाश) में विद्युत
पृथ्वी पर साधारण अग्नि

अग्नि की तुलना बृहस्पति और ब्रह्मणस्पति से भी की गई है। वह मंत्र, धी (बुद्धि) और ब्रह्म का उत्पादक है। इस प्रकार का अभेद सूक्ष्मतम तत्त्व से दर्शाया गया है। वैदिक साहित्य में अग्नि के जिस रूप का वर्णन है, उससे विश्व के वैज्ञानिक और दार्शनिक तत्त्वों पर काफ़ी प्रकाश पड़ता है। जैमिनी ने मीमांसासूत्र के “हवि:प्रक्षेपणाधिकरण” में अग्नि के छ: प्रकार बताये हैं-

गार्हपत्य
आहवनीय
दक्षिणाग्नि
सभ्य
आवसथ्य
औपासन

‘अग्नि शब्द का व्युत्पत्त्यर्थ इस प्रकार है : जो ऊपर की ओर जाता है'(अगि गतौ, अंगेनलोपश्च, अंग्+नि और नकार का लोप)।

वैदिक धर्म के अनुसार:-
••••••••••••••••••••••••

अवेस्ता में अग्नि को पाँच प्रकार का माना गया है। परन्तु अग्नि की जितनी उदात्त तथा विशद कल्पना वैदिक धर्म में है, उतनी अन्यंत्र कहीं पर भी नहीं है। वैदिक कर्मकाण्ड का श्रौत भाग और गृह्य का मुख्य केन्द्र अग्निपूजन ही है। वैदिक देवमण्डल में इन्द्र के अनन्तर अग्नि का ही दूसरा स्थान है। जिसकी स्तुति लगभग दो सौ सूक्तों में वर्णित है। अग्नि के वर्णन में उसका पार्थिव रूप ज्वाला, प्रकाश आदि वैदिक ऋषियों के सामने सदा विद्यमान रहता है। अग्नि की तुलना अनेक पशुओं से की गई है। प्रज्वलित अग्नि गर्जनशील वृषभ के समान है। उसकी ज्वाला सौर किरणों के तुल्य, उषा की प्रभा तथा विद्युत की चमक के समान है। उसकी आवाज़ आकाश की गर्जन जैसी गम्भीर है। अग्नि के लिए विशेष गुणों को लक्ष्य कर अनेक अभिधान प्रयुक्त करके किए जाते हैं। अग्नि शब्द का सम्बन्ध लातोनी ‘इग्निस्’ और लिथुएनियाई ‘उग्निस्’ के साथ कुछ अनिश्चित सा है, यद्यपि प्रेरणार्थक अज् धातु के साथ भाषा शास्त्रीय दृष्टि से असम्भव नहीं है। प्रज्वलित होने पर धूमशिखा के निकलने के कारण धूमकेतु इस विशिष्टिता का द्योतक एक प्रख्यात अभिधान है। अग्नि का ज्ञान सर्वव्यापी है और वह उत्पन्न होने वाले समस्त प्राणियों को जानता है। इसलिए वह ‘जातवेदा:’ के नाम से विख्यात है। अग्नि कभी द्यावापृथिवी का पुत्र और कभी द्यौ: का सूनु (पुत्र) कहा गया है। उसके तीन जन्मों का वर्णन वेदों में मिलता है। जिनके स्थान हैं-स्वर्ग, पृथ्वी तथा जल। स्वर्ग, वायु तथा पृथ्वी अग्नि के तीन सिर, तीन जीभ तथा तीन स्थानों का बहुत निर्देश वेद में उपलब्ध होता है। अग्नि के दो जन्मों का भी उल्लेख मिलता है-भूमि तथा स्वर्ग। अग्नि के आनयन की एक प्रख्यात वैदिक कथा ग्रीक कहानी से साम्य रखती है। अग्नि का जन्म स्वर्ग में ही मुख्यत: हुआ, जहाँ से मातरिश्वा ने मनुष्यों के कल्याणार्थ उसका इस भूतल पर आनयन किया। अग्नि प्रसंगत: अन्य समस्त वैदिक देवों में प्रमुख माना गया है। अग्नि का पूजन भारतीय संस्कृति का प्रमुख चिह्न है और वह गृहदेवता के रूप में उपासना और पूजा का एक प्रधान विषय है। इसलिए अग्नि ‘गृहा’, ‘गृहपति’ (घर का स्वामी) तथा ‘विश्वपति’ (जन का रक्षक) कहलाता है।

रूप का वर्णन:-
~~~~

अग्नि के रूप का वर्णन इस प्रकार है-

पिंगभ्रूश्मश्रुकेशाक्ष: पीनांगजठरोऽरुण:।
छागस्थ: साक्षसूत्रोऽग्नि: सप्तार्चि: शक्तिधारक:।।

भौहें, दाढ़ी, केश और आँखें पीली हैं। अंग स्थूल हैं और उदर लाल है। बकरे पर आरूढ़ हैं, अक्षमाला लिये है। इसकी सात ज्वालाएँ हैं और शक्ति को धारण करता है।

शुभ लक्षण:-


होम योग्य अग्नि के शुभ लक्षण निम्नांकित हैं-
अर्चिष्मान् पिण्डितशिख: सर्पि:काञ्चनसन्निभ:।
स्निग्ध: प्रदक्षिणश्चैव वह्नि: स्यात् कार्यसिद्धये।।

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मृत्यु भय


देवी सिंग तोमर

।।श्रीगणेशाय नमः।।

शरीर को वस्त्र मानने से मृत्यु के भय का विनाश ?

मैनें अपने क्षेत्र
में वृद्ध लोगों के मुँह से नाग और नागिन के कामदेव के वश में होने की एक किवदन्ती सुनी है।
बुजुर्गों का कहना है कि जब नाग और नागिन काम वश होकर आपस में एक दूसरे से प्रेम करते हैं उस अवस्था में उन्हें यदि कोई देख ले तो सर्प उस व्यक्ति के पीछे उसे डसने के लिए भागता है सर्प को 84 लाख योनियों में सबसे ज्यादा क्रोधी स्वभाव का माना गया है।ऐसी अवस्था में तो और भी उसका क्रोध बढ़ जाता है उस समय उससे बचने का केवल एक ही उपाय है भागता हुआ व्यक्ति अपने उत्तरीय वस्त्र अर्थात् शरीर से कोई कपड़ा उतार कर फेंक दे तो सर्प उस वस्त्र को व्यक्ति समझकर उससे लिपटकर बार-बार काटता है, तबतक मनुष्य भाग जाता है। ये बात उन लोगों ने मुझे बताई जिनके साथ ऐसा हुआ। अब ये भले ही मिथ्या क्यों न हो परन्तु इस दृष्टांत से वेदान्त-दर्शन का सिद्धान्त बहुत ज्यादा सिद्ध होता है क्योंकि काल की हमारे ग्रन्थों ने सर्प से तुलना की है।
रामचरितमानस में–

काल व्याल कर भक्षक जोई

श्रीमद्भागवत महापुराण में–

काल व्याल मुख ग्रास त्रास निर्णास हेतवे

इस प्रकार अन्य शास्त्रों में भी काल को भयंकर ब्याल बताया है। अब असली सिद्धान्त पर विचार करें। काल रूपी सर्प हर प्राणी के पीछे भाग रहा है। उससे बचने का क्या उपाय किया जाये बस यही उपाय सर्वश्रेष्ठ है जैसे भागते हुए व्यक्ति ने वस्त्र उतार के पीछे फेंक दिया उसी प्रकार आप भी अपने शरीर रूपी वस्त्र को अनित्य, असत्य, मरणधर्मा समझकर काल को समर्पित कर दो तो आपका आत्मा जो कभी मरता नहीं बेदाग बच जायेगा। जो हमें मरने का भय लगा है वह सदा के लिए समाप्त हो जाएगा।
यही वेदान्त का अटल सिद्धान्त है।

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क्या आपको पता है..? महिलाएं आटा गूंथने के बाद उस पर उंगलियों से निशान क्यों बनाती हैं


क्या आपको पता है..? महिलाएं आटा गूंथने के बाद उस पर उंगलियों से निशान क्यों बनाती हैं, मेरी दादीजी ने बचपन में बताई थी ये बात..

आपने अक्सर देखा होगा खासकर महिलाएं रोटी पकाने से पहले जब आटा गूंथतीं हैं तो अंत में उस पर उंगलियों से कुछ निशान बना देती हैं. और फिर कई महिलाएं अपने हाथ में लगा हुआ आटा, गूथे हुए आटे पर चिपकाती हैं.

दरअसल इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण नहीं है बल्कि हमारी एक प्राचीन मान्यता है. हिंदुओं में पूर्वजों एवं मृत आत्माओं को संतुष्ट करने के लिए पिंड दान की विधि बताई गई है. पिंडदान के लिए जब आटे की लोई (जिसे पिंड कहते हैं) बनाई जाती है तो वह बिल्कुल गोल होती है. इसका आशय होता है कि यह गूंथा हुआ आटा पूर्वजों के लिए है. मान्यता है कि इस तरह का आटा देखकर पूर्वज किसी भी रूप में आते हैं और उसे ग्रहण करते हैं.

यही कारण है कि जब मनुष्यों के ग्रहण करने के लिए आटा गूंथा जाता है तो उसमें उंगलियों के निशान बना दिए जाते हैं. यह निशान इस बात का प्रतीक होते हैं कि रखा हुआ आटा, लोई या पिंड पूर्वजों के लिए नहीं बल्कि इंसानों के लिए है.

प्राचीन काल में महिलाएं प्रतिदिन एक लोई पूर्वजों के लिए, दूसरी गाय के लिए, तीसरी कुत्ते के लिए निकालती थी. घर में अनेक महिलाएं होती थी उंगलियों का निशान लगाने से पता चल जाता था कि इन्सानों के लिए गूँधा हुआ आटा कौनसा है.

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श्राद्ध क्या है संपूर्ण जानकारी ।


श्राद्ध क्या है संपूर्ण जानकारी ।
**†
श्राद्ध दो प्रकार के होते है ,
1)पिंड क्रिया
2) ब्राह्मणभोज

1)पिण्डक्रिया*
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि श्राद्ध में दी गई अन्न सामग्री पितरों को कैसे मिलती है…?

नाम गौत्रं च मन्त्रश्च दत्तमन्नम नयन्ति तम।
अपि योनिशतम प्राप्तान्सतृप्तिस्ताननुगच्छन्ति ।।
(वायुपुराण)

श्राद्ध में दिये गये अन्न को नाम , गौत्र , ह्रदय की श्रद्धा , संकल्पपूर्वक दिये हुय पदार्थ भक्तिपूर्वक उच्चारित मन्त्र उनके पास भोजन रूप में उपलब्ध
होते है ,

2)ब्राह्मणभोजन
निमन्त्रितान हि पितर उपतिष्ठन्ति तान द्विजान ।
वायुवच्चानुगच्छन्ति तथासिनानुपासते ।।
(मनुस्मृति 3,189)

अर्थात श्राद्ध में निमंत्रित ब्राह्मण में पितर गुप्तरूप से प्राणवायु की भांति उनके साथ भोजन करते है , म्रत्यु के पश्चात पितर सूक्ष्म शरीरधारी होते है , इसिलिय वह दिखाई नही देते ,
तिर इव वै 1पितरो मनुष्येभ्यः
( शतपथ ब्राह्मण )
अर्थात सूक्ष्म शरीरधारी पितर मनुष्यों से छिपे होते है ।

धनाभाव में श्राद्ध

धनाभाव एवम समयाभाव में श्राद्ध तिथि पर पितर का स्मरण कर गाय को घांस खिलाने से भी पूर्ति होती है , यह व्यवस्था पद्मपुराण ने दी है ,
यह भी सम्भव न हो तो इसके अलावा भी , श्राद्ध कर्ता एकांत में जाकर पितरों का स्मरण कर दोनों हाथ जोड़कर पितरों से प्रार्थना करे

न मेस्ति वित्तं न धनम च नान्यच्छ्श्राद्धोपयोग्यम स्वपितृन्नतोस्मि ।
तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयोतौ कृतौ भुजौ वर्तमनि मारुतस्य ।।
(विष्णुपुराण)

अर्थात ‘ है पितृगण मेरे पास श्राद्ध हेतु न उपयुक्त धन है न धान्य है मेरे पास आपके लिये ह्रदय में श्रद्धाभक्ति है मै इन्ही के द्वारा आपको तृप्त करना चाहता हूं आप तृप्त होइये

श्राद्ध सामान्यतः 3 प्रकार के होते है

नित्य नैमितकम काम्यम त्रिविधम श्राद्धम उच्यते
यम स्मृति में 5 प्रकार तथा , विश्वामित्र स्मृति में 12 प्रकार के श्राद्ध का वर्णन है ,किंतु 5 श्राद्ध में ही सबका अंतर्भाव हो जाता है ,

1)नित्य श्राद्ध*
प्रतिदिन किया जाने बाला श्राद्ध , जलप्रदान क्रिया से भी इसकी पूर्ति हो जाती है

2)नैमितकम श्राद्ध*
वार्षिक तिथि पर किया जाने बाला श्राद्ध ,

3)काम्यश्राद्ध*
किसी कामना की पूर्ति हेतु किया जाने वाला श्राद्घ

4)वृद्धिश्राद्ध (नान्दीश्राद्ध)*
मांगलिक कार्यों , विवाहादि में किया जाने बाला श्राद्ध

5)पावर्ण श्राद्ध*
पितृपक्ष ,अमावस्या आदि पर्व पर किया जाने बाला श्राद्ध

श्राद्ध कर्म से मनुष्य को पितृदोष-ऋण से मुक्त के साथ जीवन मे सुखशांति तो प्राप्त होती है , अपितु परलोक भी सुधरता है

पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिताहि परमम् तपः।
पितरी प्रितिमापन्ने प्रियन्ते सर्व देवता।।

सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमय: पिता।मातरं पितरं तस्मात सर्वयत्नेन पूजयेत

इस सृष्टि में हर चीज का अथवा प्राणी का जोड़ा है, जैसे: रात और दिन, अँधेरा और उजाला, सफ़ेद और काला, अमीर और गरीब अथवा नर और नारी इत्यादि बहुत गिनवाये जा सकते हैं।

सभी चीजें अपने जोड़े से सार्थक है अथवा एक-दूसरे के पूरक है, दोनों एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं, इसी तरह दृश्य और अदृश्य जगत का भी जोड़ा है, दृश्य जगत वो है जो हमें दिखता है और अदृश्य जगत वो है जो हमें नहीं दिखता, ये भी एक-दूसरे पर निर्भर है और एक-दूसरे के पूरक हैं।
मित्रों, पितृ-लोक भी अदृश्य-जगत का हिस्सा है और अपनी सक्रियता के लिये दृश्य जगत के श्राद्ध पर निर्भर है।

सनातन धर्मग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं, ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है, वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है।

पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है, इसी दिन से महालय (श्राद्ध) का प्रारंभ भी माना जाता है, श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए।

पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्ष भर तक प्रसन्न रहते हैं, धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।

श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्ड दान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे, इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं, यही कारण है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रत्येक हिंदू गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य रूप से करने के लिए कहा गया है।

श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं, मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है क्योंकि कई बार विधिपूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं,

आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं:

1- श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए, यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं, दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।
2- श्राद्ध में चांदी के बर्तनों का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है, पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिए जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है, पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।
3- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।
4- ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर एवं व्यंजनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं जब तक ब्राह्मण मौन रह कर भोजन करें।
5- जो पितृ शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए, इससे वे प्रसन्न होते हैं, श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए, पिंड दान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पडने से वह पितरों को नहीं पहुंचता।
6- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं, ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य महापापी होता है।
7- श्राद्ध में जौ, कांगनी, मटरसरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है, तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है, वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं, कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाते हैं।
8- दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए, वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मंदिर दूसरे की भूमि नहीं माने जाते क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है, अत: इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है।
9- चाहे मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण का चयन करते समय न सोचे, लेकिन पितृ कार्य में योग्य ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।
10- जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहने वाली अपनी बहिन, जमाई और भानजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहां पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।
11- श्राद्ध करते समय यदि कोई भिखारी आ जाए तो उसे आदर-पूर्वक भोजन करवाना चाहिए, जो व्यक्ति ऐसे समय में घर आए याचक को भगा देता है उसका श्राद्ध कर्म पूर्ण नहीं माना जाता और उसका फल भी नष्ट हो जाता है।
12- शुक्लपक्ष में, रात्रि में, युग्म दिनों (एक ही दिन दो तिथियों का योग) में तथा अपने जन्मदिन पर कभी श्राद्ध नहीं करना चाहिए, धर्म ग्रंथों के अनुसार सायंकाल का समय राक्षसों के लिए होता है, यह समय सभी कार्यों के लिए निंदित है, अत: शाम के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।
13- श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करते हैं, श्राद्ध के लिए शुक्लपक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया है।
14- रात्रि को राक्षसी समय माना गया है, अत: रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए, दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए, दिन के आठवें मुहूर्त (कुतपकाल) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है।
15- श्राद्ध में ये चीजें होना महत्वपूर्ण हैं: गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल, केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है।
सोने, चांदी, कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं, इनके अभाव में पत्तल उपयोग की जा सकती है।
16- तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं, ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को चले जाते हैं, तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।
17- रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं, आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।
18- चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।
19- सनातन धर्म के भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं-
1- नित्य, 2- नैमित्तिक, 3- काम्य, 4- वृद्धि, 5- सपिण्डन, 6- पार्वण, 7- गोष्ठी, 8- शुद्धर्थ, 9- कर्मांग, 10- दैविक, 11- यात्रार्थ, 12- पुष्टयर्थ
20- श्राद्ध के प्रमुख अंग इस प्रकार :
तर्पण- इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है, श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।
भोजन व पिण्ड दान– पितरों

के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है, श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।
वस्त्रदान– वस्त्र दान देना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।
दक्षिणा दान– यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता।
21 – श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें, श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में बैठाएं।
22- पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है, इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।
23- तैयार भोजन में से गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें, इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।
24- कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं।
इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं, पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं।
25- ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आएं, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी चलते हैं, ब्राह्मणों के भोजन के बाद ही अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।
26- पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए, पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है, पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में सपिंडो (परिवार के) को श्राद्ध करना चाहिए, एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राध्दकर्म करें या सबसे छोटा ।

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क्या कागज चीन ने बनाये?


देवी सिंग तोमर

*क्या कागज चीन ने बनाये?*

हम सब जानते है ऋग्वेद को विश्व मे प्रथम ग्रंथ का सम्मान मिल चुका। ऋग्वेद पत्ते पर लिखा गया था ऐसा पत्र जो युगो तक नष्ट नही होता।
और स्याही भी अद्भुत।

कुछ हमारे इतिहास भी जानने की आवश्यकता होगी।

हमारे यहाँ भी विज्ञान था, परंतु हम उसे समझ नहीं पाए। आज का विज्ञान यह है कि वह कागज बनाता है और बच्चों से कहता है कि इस कागज पर लिखो कि पर्यावरण को कैसे बचाया जाए। बच्चा लिखता है। जो जितना अधिक लिखेगा, वह उतना अधिक अंक पाएगा और उसे अच्छी डिग्री मिलेगी। प्रश्न उठता है कि इससे पर्यावरण बचा या नष्ट हुआ। आखिर ये कागज भी तो पेड़ों को काट कर ही बनते हैं। तो फिर आप जितना अधिक कागज का प्रयोग करेंगे, उतना ही पर्यावरण को नष्ट करेंगे। परंतु आज हम इसी विरोधाभासी विज्ञान को पढऩे के प्रयास में जुटे हैं। डिग्री लेकर विज्ञानी बन रहे हैं। पेड़ों को काट कर आत्महंता बन रहे हैं।

हमारा पारंपरिक ज्ञान क्या कहता है? आज जो कागज बनता है वह पेड़ों को काट कर, रसायनों के प्रयोग से और बड़ी-बड़ी मशीनों के प्रयोग से। पर्यावरण को इतना नुकसान पहुँचाने के बाद जो कागज बनता है, उसकी आयु कितनी होती है? बहुत सुरक्षा के साथ रखा जाए तो भी कठिनाई से सौ वर्ष। कागज हम भी बनाते थे। परंतु हम जो कागज बनाते थे, वह कम से कम सात सौ वर्ष तक सुरक्षित रहता था और उस कागज को बनाने के लिए किसी पेड़ को नहीं काटना पड़ता था। एक दिया घास होती है। उस घास से बिना भारी मशीनों के और बिना रसायनों के प्रयोग के एक सामान्य पद्धति से उससे कागज बनता है, जिसकी आयु होती है सात सौ वर्ष। आप हमारे गुरुकुल में आकर देख सकते हैं। हम आज भी उस पद्धति से कागज वहाँ बना रहे हैं।
आज कागज पर चमक लाने के लिए उस पर प्लास्टिक की परत चढ़ाई जाती है जिसे लेमिनेशन कहते हैं। हम भी अपने कागज पर लेमिनेशन करते हैं, परंतु वह प्लास्टिक जैसे किसी पर्यावरणनाशक का नहीं होता। हम उस कागज की एक हकीक नामक पत्थर से घिसाई करते हैं और वह कागज एकदम चमकने लगता है। यह हमारे विज्ञान की एक अहिंसक पद्धति है। कागज बनाने की यह विधि अब किसी पांडुलिपि में लिखी नहीं मिलती क्योंकि छापाखानों के आने के बाद से ही ऐसी वैज्ञानिक बातों को नष्ट किया गया। वर्तमान में एक परिवार इस पद्धति को जीवित रखे हुए है। वैसे भी हमारे यहाँ ज्ञान-विज्ञान व्यावहारिक अधिक होता था, पुस्तकीय कम। इस प्रकार भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकृति के साथ मिल कर चलती थी, उसका विनाश नहीं करती थी। आज का विज्ञान पर्यावरण, व्यक्ति और समाज तीनों का नाश करने वाला है।

इसलिए यह प्रश्न उठता है कि आखिर हमें कैसा ज्ञान-विज्ञान चाहिए। आज जो विज्ञान प्रचलित है, उसमें सत्य-असत्य, अच्छे-बुरे का ज्ञान ही नहीं होता। हम उलटी दिशा की ओर बढ़ते चले जा रहे हैं। इसने जो भी व्यवस्था बनाई है, उसका अंतिम परिणाम यही हो रहा है कि मानव जीवन खतरे में आ जा रहा है। इस विज्ञान की अंतिम परिणति मानव जीवन के विनाश में ही हो रही है। भारतीय विज्ञान का वह पक्ष जो हमारे भौतिक जीवन के लिए उपयोगी है, वह भी आज नष्ट हो रहा है। ऐसे में आध्यात्मिक पक्ष की तो बात ही करना व्यर्थ है। जब हम भौतिक और व्यवहारिक विज्ञान को ही नहीं बचा रहे हैं तो परोक्ष की बात करने वाले अध्यात्म की रक्षा कैसे करेंगे।

इसी प्रकार हमारे यहाँ स्याही बनाने की कला थी। आज स्याही भी रसायनों से बनाई जा रही है। परंतु प्राचीन भारत में स्याही भी प्राकृतिक पदार्थों से बनाई जाती थी। यदि आप अजंता और एलोरा के भित्ति चित्रों को देखें तो उन चित्रों की आयु कई हजार वर्षों की है। उन चित्रों को बनाने में कैसी स्याही का प्रयोग हुआ होगा, यह विचार करने की बात है। भारतीय परंपरा से बनने वाली स्याही की आयु दो हजार वर्ष है। इसकी एक विधि में 15 लीटर तिल के तेल को जलाया जाता है, उससे 200 ग्राम राख मिलती है। उस राख को गौमूत्र से संस्कारित किया जाता है। फिर विभिन्न जड़ी-बूटियों के साथ उसकी 21 दिनों तक घुटाई की जाती है। इससे जो स्याही तैयार होती है, उसकी आयु दो हजार वर्ष है। इस प्रक्रिया में तिल को जैविक पद्धति से बिना किसी रसायनों तथा यंत्रों के पैदा किया जाता है और फिर उसका तेल निकालने के लिए भी पशु ऊर्जा यानी कि बैलचालित घानी यंत्र का उपयोग करते हैं, आधुनिक मशीनों का नहीं। इसी प्रकार हिंगलो नामक पत्थर से लाल स्याही बनती है और हरताल पत्थर से काली स्याही। हम सोने से भी स्याही बनाते हैं।
इस प्रकार हमारे यहाँ इतनी उत्कृष्ट रसायन विद्या रही है। यह रसायन विद्या न केवल मनुष्यों के लिए निरापद थी, बल्कि पर्यावरण संरक्षक और दीर्घकालिक हुआ करती थी। ये पद्धतियां आज भी व्यवहार में हैं और इसे आप हेमचंद्राचार्य गुरुकुल, साबरमती, गुजरात में देख सकते हैं। प्राचीन भारत में ऋषि-मुनियों को जैसा अदभुत ज्ञान था, उसके बारे में जब हम जानते हैं, पढ़ते हैं तो अचंभित रह जाते हैं। रसायन और रंग विज्ञान ने भले ही आजकल इतनी उन्नति कर ली हो, परन्तु आज से 2000 वर्ष पहले भूर्ज-पत्रों पर लिखे गए “अग्र-भागवत” का रहस्य आज भी अनसुलझा ही है।

जानिये इसके बारे में कि आखिर यह “अग्र-भागवत इतना विशिष्ट क्यों है? अदृश्य स्याही से सम्बन्धित क्या है वह पहेली, जो वैज्ञानिक आज भी नहीं सुलझा पाए हैं। आमगांव महाराष्ट्र के गोंदिया जिले की छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सीमा से जुड़ी हुई एक छोटी सी तहसील है। इस गाँव के रामगोपाल अग्रवाल सराफा व्यापारी हैं। घर से ही सोना, चाँदी का व्यापार करते हैं और रामगोपाल ‘बेदिल’ के नाम से जाने जाते हैं। एक दिन अचानक उनके मन में आया कि असम के दक्षिण में स्थित ब्रह्मकुंड में स्नान करने जाना है। यह ब्रह्मकुंड या ब्रह्मा सरोवर परशुराम कुंड के नाम से भी जाना जाता है। असम सीमा पर स्थित यह कुंड प्रशासनिक दृष्टि से अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में आता हैं। मकर संक्रांति के दिन यहाँ भव्य मेला लगता है।
ब्रह्मकुंड अग्रवाल समाज के आदि पुरुष/प्रथम पुरुष भगवान अग्रसेन महाराज की ससुराल भी माना जाता है। भगवान अग्रसेन महाराज की पत्नी माधवी देवी इस नागलोक की राजकन्या थी। उनका विवाह अग्रसेन महाराज जी के साथ इसी ब्रह्मकुंड के तट पर हुआ था, ऐसा बताया जाता है। हो सकता हैं, इसी कारण से रामगोपाल जी अग्रवाल ‘बेदिलÓ को इच्छा हुई होगी ब्रह्मकुंड दर्शन की। वे अपने कुछ मित्र-सहयोगियों के साथ ब्रह्मकुंड पहुँच गए। दूसरे दिन कुंड पर स्नान करने जाना निश्चित हुआ।

रात को अग्रवाल जी को सपने में दिखा कि, ब्रह्मसरोवर के तट पर एक वटवृक्ष है, उसकी छाया में एक साधू बैठे हैं। इन साधू के पास अग्रवाल जी को जो चाहिये वह मिल जायेगा। दूसरे दिन सुबह-सुबह रामगोपाल जी ब्रह्मसरोवर के तट पर गये। तो उनको एक बड़ा सा वटवृक्ष दिखाई दिया और साथ ही दिखाई दिए, लंबी दाढ़ी और जटाओं वाले वो साधू महाराज भी। रामगोपाल जी ने उन्हें प्रणाम किया तो साधू महाराज जी ने अच्छे से कपड़े में लिपटी हुई एक चीज उन्हें दी और कहा, “जाओं, इसे ले जाओं, कल्याण होगा तुम्हारा।” वह दिन था, नौ अगस्त, 1991।
आप सोच रहे होंगे कि ये कौन सी कहानी और चमत्कारों वाली बात सुनाई जा रही है, लेकिन दो मिनट और आगे पढि़ए तो सही। असल में दिखने में बहुत बड़ी पर वजन में हलकी वह पोटली जैसी वस्तु लेकर रामगोपाल जी अपने स्थान पर आए, जहाँ वे रुके थे। उन्होंने वो पोटली खोलकर देखी, तो अंदर साफ़-सुथरे भूर्जपत्र अच्छे सलीके से बाँधकर रखे थे। इन पर कुछ भी नहीं लिखा था। एकदम कोरे।
इन लंबे-लंबे पत्तों को भूर्जपत्र कहते हैं, इसकी रामगोपाल जी को जानकारी भी नहीं थी। अब इसका क्या करें? उनको कुछ समझ नहीं आ रहा था। लेकिन साधू महाराज का प्रसाद मानकर वह उसे अपने गाँव, लेकर आये। लगभग 30 ग्राम वजन की उस पोटली में 431 खाली, कोरे भूर्जपत्र थे। बालाघाट के पास गुलालपुरा गाँव में रामगोपाल जी के गुरु रहते थे। रामगोपाल जी ने अपने गुरु को वह पोटली दिखायी और पूछा, “अब मैं इसका क्या करू?”

गुरु ने जवाब दिया, “तुम्हे ये पोटली और उसके अंदर के ये भूर्जपत्र काम के नहीं लगते हों, तो उन्हें पानी में विसर्जित कर दो।”
अब रामगोपाल जी पेशोपेश में पड गए। रख भी नहीं सकते और फेंक भी नहीं सकते। उन्होंने उन भुर्जपत्रों को अपने पूजाघर में रख दिया। कुछ दिन बीत गए। एक दिन पूजा करते समय सबसे ऊपर रखे भूर्जपत्र पर पानी के कुछ छींटे गिरे, और क्या आश्चर्य। जहाँ पर पानी गिरा था, वहाँ पर कुछ अक्षर उभरकर आये। रामगोपाल जी ने उत्सुकतावश एक भूर्जपत्र पूरा पानी में डुबोकर कुछ देर तक रखा और वह आश्चर्य से देखते ही रह गये। उस भूर्जपत्र पर लिखा हुआ साफ़ दिखने लगा।
अष्टगंध जैसे केसरिया रंग में, स्वच्छ अक्षरों से कुछ लिखा था। कुछ समय बाद जैसे ही पानी सूख गया, अक्षर भी गायब हो गए। अब रामगोपाल जी ने सभी 431 भूर्जपत्रों को पानी में भिगोकर, सुखने से पहले उन पर दिख रहे अक्षरों को लिखने का प्रयास किया। यह लेख देवनागरी लिपि में और संस्कृत भाषा में लिखा था। यह काम कुछ वर्षों तक चला। जब इस साहित्य को संस्कृत के विशेषज्ञों को दिखाया गया, तब समझ में आया कि भूर्जपत्र पर अदृश्य स्याही से लिखा हुआ यह ग्रंथ, अग्रसेन महाराज जी का अग्र भागवत नाम का चरित्र हैं।
लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व जैमिनी ऋषि ने जय भारत नाम का एक बड़ा ग्रंथ लिखा था। उसका एक हिस्सा था, यह अग्र भागवत ग्रंथ। पांडव वंश में परीक्षित राजा का बेटा था, जनमेजय। इस जनमेजय को लोक साधना, धर्म आदि विषयों में जानकारी देने हेतु जैमिनी ऋषि ने इस ग्रंथ का लेखन किया था, ऐसा माना जाता हैं। रामगोपाल जी को मिले हुए इस अग्र भागवत ग्रंथ की अग्रवाल समाज में बहुत चर्चा हुई। इस ग्रंथ का अच्छा स्वागत हुआ।

ग्रंथ के भूर्जपत्र अनेकों बार पानी में डुबोकर उस पर लिखे गए श्लोक लोगों को दिखाए गए। इस ग्रंथ की जानकारी इतनी फैली कि इंग्लैंड के प्रख्यात उद्योगपति लक्ष्मी मित्तल जी ने कुछ करोड़ रुपयों में यह ग्रंथ खरीदने की बात की। यह सुन/देखकर अग्रवाल समाज के कुछ लोग साथ आये और उन्होंने नागपुर के जाने माने संस्कृत पंडित रामभाऊ पुजारी जी के सहयोग से एक ट्रस्ट स्थापित किया। इससे ग्रंथ की सुरक्षा तो हो गयी।
आज यह ग्रंथ नागपुर में अग्रविश्व ट्रस्ट में सुरक्षित रखा गया हैं। लगभग 18 भारतीय भाषाओं में इसका अनुवाद भी प्रकाशित हुआ हैं। रामभाऊ पुजारी जी की सलाह से जब उन भुर्जपत्रों की कार्बन डेटिंग की गयी, तो वे भूर्जपत्र लगभग दो हजार वर्ष पुराने निकले। यदि हम इसे काल्पनिक कहानी मानें, बेदिल जी को आया स्वप्न, वो साधू महाराज, यह सब श्रद्धा के विषय अगर ना भी मानें, तो भी कुछ प्रश्न तो मन को कुरेदते ही हैं। जैसे कि हजारों वर्ष पूर्व भुर्जपत्रों पर अदृश्य स्याही से लिखने की तकनीक किसकी थी? इसका उपयोग कैसे किया जाता था? कहाँ उपयोग होता था, इस तकनीक का?
भारत में लिखित साहित्य की परंपरा अति प्राचीन हैं। ताम्रपत्र, चर्मपत्र, ताडपत्र, भूर्जपत्र, आदि लेखन में उपयोगी साधन थे। मराठी विश्वकोष में भूर्जपत्र की जानकारी दी गयी हैं, जो इस प्रकार है – भूर्जपत्र यह भूर्ज नाम के पेड़ की छाल से बनाया जाता था। यह वुक्ष बेट्युला प्रजाति के हैं और हिमालय में, विशेषत: काश्मीर के हिमालय में पाए जाते हैं। इस वृक्ष के छाल का गुदा निकालकर, उसे सुखाकर, फिर उसे तेल लगा कर उसे चिकना बनाया जाता था। उसके लंबे रोल बनाकर, उनको समान आकार का बनाया जाता था। उस पर विशेष स्याही से लिखा जाता था। फिर उसको छेद कर के, एक मजबूत धागे से बाँधकर, उसका ग्रंथ बनाया जाता था।
यह भूर्जपत्र उनकी गुणवत्ता के आधार पर दो-ढाई हजार वर्षों तक अच्छे रहते थे। भूर्जपत्र पर लिखने के लिये प्राचीन काल से स्याही का उपयोग किया जाता था। भारत में, ईसा के पूर्व, लगभग ढाई हजार वर्षों से स्याही का प्रयोग किया जाता था, इसके अनेक प्रमाण मिले हैं। लेकिन यह कब से प्रयोग में आयी, यह अज्ञात ही है। भारत पर हुए अनेक आक्रमणों के चलते यहाँ का ज्ञान बड़े पैमाने पर नष्ट हुआ है। परन्तु स्याही तैयार करने के प्राचीन तरीके थे, कुछ पद्धतियाँ थी, जिनकी जानकारी मिली हैं।

आम तौर पर काली स्याही का ही प्रयोग सब दूर होता था। चीन में मिले प्रमाण भी काली स्याही की ओर ही इंगित करते हैं। केवल कुछ ग्रंथों में गेरू से बनायी गयी केसरिया रंग की स्याही का उल्लेख आता हैं। मराठी विश्वकोष में स्याही की जानकारी देते हुए लिखा हैं -भारत में दो प्रकार के स्याही का उपयोग किया जाता था। कच्ची स्याही से व्यापार का आय-व्यय, हिसाब लिखा जाता था तो पक्की स्याही से ग्रंथ लिखे जाते थे।

स्याही बनाने की एक विधि इस प्रकार दी गई है। पीपल के पेड़ से निकाले हुए गोंद को पीसकर, उबालकर रखा जाता था। फिर तिल के तेल का काजल तैयार कर उस काजल को कपड़े में लपेटकर, इस गोंद के पानी में उस कपड़े को बहुत देर तक घुमाते थे। और वह गोंद स्याही बन जाता था, काले रंग की। भूर्जपत्र पर लिखने वाली स्याही अलग प्रकार की रहती थी। इसकी स्याही बनाने के लिए बादाम के छिलके और जलाये हुए चावल को इकठ्ठा कर के गोमूत्र में उबालते थे। काले स्याही से लिखा हुआ, सबसे पुराना उपलब्ध साहित्य तीसरे शताब्दी का है।
आश्चर्य इस बात का हैं, कि जो भी स्याही बनाने की विधि उपलब्ध हैं, उन सभी से पानी में घुलने वाली स्याही बनती हैं। जब की इस अग्र भागवत की स्याही भूर्जपत्र पर पानी डालने से दिखती हैं। पानी से मिटती नहीं। उलटे, पानी सूखने पर स्याही भी अदृश्य हो जाती हैं। इसका अर्थ यह हुआ, की कम से कम दो- ढाई हजार वर्ष पूर्व हमारे देश में अदृश्य स्याही से लिखने का तंत्र विकसित था। यह तंत्र विकसित करते समय अनेक अनुसंधान हुए होंगे। अनेक प्रकार के रसायनों का इसमें उपयोग किया गया होगा। इसके लिए अनेक प्रकार के परीक्षण करने पड़े होंगे। लेकिन दुर्भाग्य से इसकी कोई भी जानकारी आज उपलब्ध नहीं हैं। उपलब्ध हैं, तो अदृश्य स्याही से लिखा हुआ अग्र भागवत यह ग्रंथ। लिखावट के उन्नत आविष्कार का जीता जागता प्रमाण।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि विज्ञान या यूँ कहें कि आजकल का शास्त्रशुद्ध विज्ञान, पाश्चिमात्य देशों में ही निर्माण हुआ, इस मिथक को मानने वालों के लिए अग्र भागवत ग्रंथ अत्यंत आश्चर्य का विषय है। यदि भारत में समुचित शोध किया जाए एवं पश्चिमी तथा चीन के पुस्तकालयों की खाक छानी जाए, तो निश्चित ही कुछ न कुछ ऐसा मिल सकता है जिससे ऐसे कई रहस्यों से पर्दा उठ सके

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दस पवित्र पक्षी और उनका रहस्य!


देवी सिंग तोमर

दस पवित्र पक्षी और उनका रहस्य!!!!!!!!
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आइये जाने उन दस दिव्य और पवित्र पक्षीयों के बारे मैं जिनका हिंदू धर्म में बहुत ही महत्व माना गया है…

हंस:- जब कोई व्यक्ति सिद्ध हो जाता है तो उसे कहते हैं कि इसने हंस पद प्राप्त कर लिया और जब कोई समाधिस्थ हो जाता है, तो कहते हैं कि वह परमहंस हो गया। परमहंस सबसे बड़ा पद माना गया है।

हंस पक्षी प्यार और पवित्रता का प्रतीक है। यह बहुत ही विवेकी पक्षी माना गया है। आध्यात्मिक दृष्टि मनुष्य के नि:श्वास में ‘हं’ और श्वास में ‘स’ ध्वनि सुनाई पड़ती है। मनुष्य का जीवन क्रम ही ‘हंस’ है क्योंकि उसमें ज्ञान का अर्जन संभव है। अत: हंस ‘ज्ञान’ विवेक, कला की देवी सरस्वती का वाहन है। यह पक्षी अपना ज्यादातर समय मानसरोवर में रहकर ही बिताते हैं या फिर किसी एकांत झील और समुद्र के किनारे।

हंस दांप‍त्य जीवन के लिए आदर्श है। यह जीवन भर एक ही साथी के साथ रहते हैं। यदि दोनों में से किसी भी एक साथी की मौत हो जाए तो दूसरा अपना पूरा जीवन अकेले ही गुजार या गुजार देती है। जंगल के कानून की तरह इनमें मादा पक्षियों के लिए लड़ाई नहीं होती। आपसी समझबूझ के बल पर ये अपने साथी का चयन करते हैं। इनमें पारिवारिक और सामाजिक भावनाएं पाई जाती है।

हिंदू धर्म में हंस को मारना अर्थात पिता, देवता और गुरु को मारने के समान है। ऐसे व्यक्ति को तीन जन्म तक नर्क में रहना होता है।

मोर :- मोर को पक्षियों का राजा माना जाता है। यह शिव पुत्र कार्तिकेय का वाहन है। भगवान कृष्ण के मुकुट में लगा मोर का पंख इस पक्षी के महत्व को दर्शाता है। यह भारत का राष्ट्रीय पक्षी है।

अनेक धार्मिक कथाओं में मोर को बहुत ऊंचा दर्जा दिया गया है। हिन्दू धर्म में मोर को मार कर खाना महापाप समझा जाता है।

कौआ :- कौए को अतिथि-आगमन का सूचक और पितरों का आश्रम स्थल माना जाता है। इसकी उम्र लगभग 240 वर्ष होती है। श्राद्ध पक्ष में कौओं का बहुत महत्व माना गया है। इस पक्ष में कौओं को भोजना कराना अर्थात अपने पितरों को भोजन कराना माना गया है। कौए को भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पहले से ही आभास हो जाता है।

उल्लू : – उल्लू को लोग अच्छा नहीं मानते और उससे डरते हैं, लेकिन यह गलत धारणा है। उल्लू लक्ष्मी का वाहन है। उल्लू का अपमान करने से लक्ष्मी का अपमान माना जाता है। हिन्दू संस्कृति में माना जाता है कि उल्लू समृद्धि और धन लाता है।

भारत वर्ष में प्रचलित लोक विश्वासों के अनुसार भी उल्लू का घर के ऊपर छत पर स्थि‍त होना तथा शब्दोच्चारण निकट संबंधी की अथवा परिवार के सदस्य की मृत्यु का सूचक समझा जाता है। सचमुच उल्लू को भूत-भविष्य और वर्तमान में घट रही घटनाओं का पहले से ही ज्ञान हो जाता है।

वाल्मीकि रामायण में उल्लू को मूर्ख के स्थान पर अत्यन्त चतुर कहा गया। रामचंद्र जी जब रावण को मारने में असफल होते हैं और जब विभीषण उनके पास जाते हैं, तब सुग्रीव राम से कहते हैं कि उन्हें शत्रु की उलूक-चतुराई से बचकर रहना चाहिए। ऋषियों ने गहरे अवलोकन तथा समझ के बाद ही उलूक को श्रीलक्ष्मी का वाहन बनाया था।

गरूड़ : – इसे गिद्ध भी कहा जाता है। पक्षियों में गरूढ़ को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। यह समझदार और बुद्धिमान होने के साथ-साथ तेज गति से उड़ने की क्षमता रखता है। गरूड़ के नाम पर एक पुराण भी है गरूड़ पुराण। यह भारत का धार्मिक और अमेरिका का राष्ट्रीय पक्षी है।

गरूड़ के बारे में पुराणों में अनेक कथाएं मिलती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु की सवारी और भगवान राम को मेघनाथ के नागपाश से मुक्ति दिलाने वाले गरूड़ के बारे में कहा जाता है कि यह सौ वर्ष तक जीने की क्षमता रखता है।

नीलकंठ :- नीलकंड को देखने मात्र से भाग्य का दरवाजा खुल जाता है। यह पवित्र पक्षी माना जाता है। दशहरा पर लोग इसका दर्शन करने के लिए बहुत ललायित रहते हैं।

तोता :- तोते का हरा रंग बुध ग्रह के साथ जोड़कर देखा जाता है। अतः घर में तोता पालने से बुध की कुदृष्टि का प्रभाव दूर होता है। घर में तोते का चित्र लगाने से बच्चों का पढ़ाई में मन लगता है।

आपने बहुत से तोता पंडित देखें होंगे जो भविष्यवाणी करते हैं। तोते के बारे में बहुत सारी कथाएं पुराणों में मिलती है। इसके अलवा, जातक कथाओं, पंचतंत्र की कथाओं में भी तोते को किसी न किसी कथा में शामिल किया गया है।

कबूतर :- इसे कपोत कहते हैं। यह शांति का प्रतीक माना गया है। भगवान शिव ने जब अमरनाथ में पार्वती को अजर अमर होने के वचन सुनाए थे तो कबतरों के एक जोड़े ने यह वचन सुन लिए थे तभी से वे अजर-अमर हो गए। आज भी अमरनाथ की गुफा के पास ये कबूतर के जोड़े आपको दिखाई दे जाएंगे। कहते हैं कि सावन की पूर्णिमा को ये कबूतर गुफा में दिखाई पड़ते हैं। इसलिए कबूतर को महत्व दिया जाता है।

बगुला :- आपने कहावत सुनी होगी बगुला भगत। अर्थात ढोंगी साधु। धार्मिक ग्रंथों में बगुले से जुड़ी अनेक कथाओं का उल्लेख मिलता है। पंत्रतंत्र में एक कहानी है बगुला भगत। बगुला भगत पंचतंत्र की प्रसिद्ध कहानियों में से एक है जिसके रचयिता आचार्य विष्णु शर्मा हैं।

बगुला के नाम पर एक देवी का नाम भी है जिसे बगुलामुखी कहते हैं। बगुला ध्यान भी होता है अर्थात बगुले की तरह एकटक ध्यान लगाना। बगुले के संबंध में कहा जाता है कि ये जिस भी घर के पास ‍के किसी वृक्ष आदि पर रहते हैं वहां शांति रहती है और किसी प्रकार की अकाल मृत्यु नहीं होती।

गोरैया:- भारतीय पौराणिक मान्यताओं अनुसार यह चिड़ियां जिस भी घर में या उसके आंगन में रहती है वहां सुख और शांति बनी रहती है। खुशियां उनके द्वार पर हमेशा खड़ी रहती है और वह घर दिनोदिन तरक्की करता रहता है।

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उपभोगवाद की हकीकत दर्शाती पोस्ट


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उपभोगवाद की हकीकत दर्शाती पोस्ट

सर में भयंकर दर्द था सो अपने परिचित केमिस्ट की दुकान से सर दर्द की गोली लेने रुका।
दुकान पर नौकर था, उसने मुझे गोली का पत्ता दिया ,
तो उससे मैंने पूछा गोयल साहब कहाँ गए हैं ,
तो उसने कहा साहब के सर में दर्द था ,
सो सामने वाली दुकान में कॉफी पीने गये हैं।
अभी आते होंगे!

मैं अपने हाथ मे लिए उस दवाई के पत्ते को देख रहा था.?
🤔🤔

माँ का ब्लड प्रेशर और शुगर बढ़ा हुआ था ,
सो सवेरे सवेरे उन्हें लेकर उनके पुराने डॉक्टर के पास गया।
क्लिनिक से बाहर उनके गार्डन का नज़ारा दिख रहा था ,
जहां डॉक्टर साहब योग और व्यायाम कर रहे थे।
मुझे करीब 45 मिनिट इंतज़ार करना पड़ा।
कुछ देर में डॉक्टर साहब अपना नींबू पानी लेकर क्लिनिक आये ,
और माँ का चेक-अप करने लगे।
उन्होंने मम्मी से कहा आपकी दवाइयां बढ़ानी पड़ेंगी ,
और एक पर्चे पर करीब 5 या 6 दवाइयों के नाम लिखे।
उन्होंने माँ को दवाइयां रेगुलर रूप से खाने की हिदायत दी।
बाद में मैंने उत्सुकता वश उनसे पूछा कि…
क्या आप बहुत समय से योग कर रहे हैं.?

तो उन्होंने कहा कि…
पिछले 15 साल से वो योग कर रहे हैं ,
और ब्लड प्रेशर व अन्य बहुत सी बीमारियों से बचे हुए हैं!

मैं अपने हाथ मे लिए हुए माँ के उस पर्चे को देख रहा था ,
जिसमे उन्होंने BP और शुगर कम करने की कई दवाइयां लिख रखी थी.?
🤔🤔

अपनी बीवी के साथ एक ब्यूटी पार्लर गया।
मेरी बीवी को हेयर ट्रीटमेंट कराना था ,
क्योंकी उनके बाल काफी खराब हो रहे थे।
रिसेप्शन में बैठी लड़की ने उन्हें कई पैकेज बताये और उनके फायदे भी।
पैकेज 1200 से लेकर 3000 तक थे।
कुछ डिस्काउंट के बाद मेरी बीवी को उन्होंने 3000 रु वाला पैकेज 2400रु में कर दिया।
हेयर ट्रीटमेंट के समय उनका ट्रीटमेंट करने वाली लड़की के बालों से अजीब सी खुशबू आ रही थी।
मैंने उससे पूछा कि आपने क्या लगा रखा है ,
कुछ अजीब सी खुशबू आ रही है।

तो उसने कहा —
उसने तेल में मेथी और कपूर मिला कर लगा रखा है ,
इससे बाल सॉफ्ट हो जाते हैं और जल्दी बढ़ते हैं।

मैं अपनी बीवी की शक्ल देख रहा था ,
जो 2400 रु में अपने बाल अच्छे कराने आई थी।
🤔🤔

मेरा एक परिचित हैं जिनका बड़ा डेयरी फार्म है, उनके फार्म पर गया।
फार्म में करीब 150 विदेशी गाय थी ,
जिनका दूध मशीनों द्वारा निकाल कर प्रोसेस किया जा रहा था।
एक अलग हिस्से में 2 देसी गैया हरा चारा खा रही थी।
पूछने पर बताया.. .
उनके घर उन गायों का दूध नही आता ,
जिनका दूध उनके डेयरी फार्म से सप्लाई होता है।
बल्कि परिवार के इस्तेमाल के लिए …
इन 2 देसी गायों का दूध, दही व घी इस्लेमाल होता है।

मै उन लोगों के बारे में सोच रहा था ,
जो ब्रांडेड दूध को बेस्ट मानकर खरीदते हैं।
🤔🤔

एक प्रसिद्ध रेस्टुरेंट जो कि अपनी विशिष्ट थाली और शुद्ध खाने के लिए प्रसिद्ध है ,
हम खाना खाने गये।
निकलते वक्त वहां के मैनेजर ने बडी विनम्रता से पूछा-
सर खाना कैसा लगा, हम बिल्कुल शुद्ध घी तेल और मसाले यूज़ करते हैं ,
हम कोशिश करते हैं बिल्कुल घर जैसा खाना लगे।
मैंने खाने की तारीफ़ की तो उन्होंने अपना विजिटिंग कार्ड देने को अपने केबिन में गये।
काउंटर पर एक 3 डब्बों का स्टील का टिफिन रखा था।
एक वेटर ने दूसरे से कहा–
“सुनील सर का खाना अंदर केबिन में रख दे ,
बाद में खाएंगे”।
मैंने वेटर से पूछा क्या सुनील जी यहां नही खाते?
तो उसने जवाब दिया–
“सुनील सर कभी बाहर नही खाते ,
हमेशा घर से आया हुआ खाना ही खाते हैं”

मैं अपने हाथ मे 1670 रु के बिल को देख रहा था।
🤔🤔

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ये कुछ वाकये हैं जिनसे मुझे समझ आया कि ..
हम जिसे सही जीवन शैली समझते हैं ..
वो हमें भृमित करने का जरिया मात्र है।
हम कंपनियों ATM मात्र हैं।
जिसमें से कुशल मार्केटिंग वाले लोग मोटा पैसा निकाल लेते हैं।

अक्सर जिन चीजों को हमे बेचा जाता है ,
उन्हें बेचने वाले खुद इस्तेमाल नही करते।
~~
देवी सिंह तोमर