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जय श्री कृष्ण ।

हम लोग हवेली में या मंदिर में दर्शन करने जाते हैं,। दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पैड़ी पर या ओटले पर थोड़ी देर बैठते हैं। इस परंपरा का कारण क्या है ?
अभी तो लोग वहां बैठकर अपने घर की, व्यापार की, राजनीति की चर्चा करते हैं। परंतु यह परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई है।

वास्तव में वहां मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर के और एक श्लोक बोलना चाहिए ।यह श्लोक हम भूल गए हैं। इस श्लोक को सुने और याद करें ।और आने वाली पीढ़ी को भी इसे बता कर जाएं ।
श्लोक इस प्रकार है

अनायासेन मरणम ,बिना दैन्येन जीवनम ।
देहान्ते तव सानिध्यम ,देहिमे परमेश्वरम।।

जब हम मंदिर में दर्शन करने जाएं तो खुली आंखों से ठाकुर जी का दर्शन करें । कुछ लोग वहां नेत्र बंद करके खड़े रहते हैं ।आंखें बंद क्यों करना ।हम तो दर्शन करने आए हैं ।ठाकुर जी के स्वरूप का ,श्री चरणों, का मुखारविंद का ,श्रंगार का संपूर्ण आनंद लें । आंखों में भर लें इस स्वरूप को । दर्शन करें और दर्शन करने के बाद जब बाहर आकर बैठें तब नेत्र बंद करके ,जो दर्शन किए हैं, उस स्वरूप का ध्यान करें ।मंदिर में नैत्र नहीं बंद करना, बाहर आने के बाद पैड़ी पर बैठकर जब ठाकुर जी का ध्यान करें तब नेत्र बंद करें, और अगर ठाकुर जी का स्वरूप ध्यान में नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं ।

यह प्रार्थना है याचना नहीं है। याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है, घर ,व्यापार ,नौकरी ,पुत्र पुत्री, दुकान ,सांसारिक सुख या अन्य बातों के लिए जो मांग की जाती है, वह याचना है ।वह भीख है ।

हम प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना का विशेष अर्थ है ।
प्र अर्थात विशिष्ट, श्रेष्ठ ।अर्थना अर्थात निवेदन ।ठाकुर जी से प्रार्थना करें ,और प्रार्थना क्या करना है ,यह श्लोक बोलना है ।

श्लोक का अर्थ है

“अनायासेना मरणम” अर्थात बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो, बीमार होकर बिस्तर पर पड़े पड़े ,कष्ट उठाकर मृत्यु नहीं चाहिए ।चलते चलते ही श्री जी शरण हो जाएं।

” बिना दैन्येन जीवनम ” अर्थात परवशता का जीवन न हो। किसी के सहारे न रहना पड़े ,।जैसे लकवा हो जाता है ,और व्यक्ति पर आश्रित हो जाता है ।वैसे परवश, बेबस न हों। ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख मांगे जीवन बसर हो सके।

” देहान्ते तव सानिध्यम ” अर्थात जब मृत्यु हो तब ठाकुर जी सन्मुख खड़े हो। जब प्राण तन से निकले , आप सामने खड़े हों। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर जी उनके सम्मुख जाकर खड़े हो गए । उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले।

यह प्रार्थना करें । गाड़ी ,लाड़ी ,लड़का, लड़की पति, पत्नी ,घर ,धन यह मांगना नहीं ।यह तो ठाकुर जी आपकी पात्रता के हिसाब से खुद आपको दे देते हैं ।तो दर्शन करने के बाद बाहर बैठकर यह प्रार्थना अवश्य पढ़ें ।

जय श्री कृष्ण

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🙏🏽जय श्री कृष्ण

हम लोग हवेली में या मंदिर में दर्शन करने जाते हैं,। दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पैड़ी पर या चोकी पर थोड़ी देर बैठते हैं। इस परंपरा का कारण क्या है ?

अभी तो हमलोग वहां बैठकर अपने घर की, व्यापार की, राजनीति की चर्चा करते हैं। परंतु यह परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई है।

वास्तव में वहां मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर के और एक श्लोक बोलना चाहिए ।यह श्लोक हम भूल गए हैं। इस श्लोक को सुने और याद करें ।और आने वाली पीढ़ी को भी इसे बता कर जाएं।

श्लोक इस प्रकार है

अनायासेन मरणम ,बिना दैन्येन जीवनम ।
देहान्ते तव सानिध्यम ,देहिमे परमेश्वरम।।
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

जब हम मंदिर में दर्शन करने जाएं तो खुली आंखों से ठाकुर जी का दर्शन करें । कुछ लोग वहां नेत्र बंद करके खड़े रहते हैं ।आंखें बंद क्यों करना ।हम तो दर्शन करने आए हैं ।ठाकुर जी के स्वरूप का ,श्री चरणों, का मुखारविंद का ,श्रंगार का संपूर्ण आनंद लें । आंखों में भर लें इस स्वरूप को । दर्शन करें और दर्शन करने के बाद जब बाहर आकर बैठें तब नेत्र बंद करके ,जो दर्शन किए हैं,उस स्वरूप का ध्यान करें!मंदिर में नैत्र बन्द नही करना, बाहर आने के बाद पैड़ी पर बैठकर जब ठाकुर जी का ध्यान करें तब नेत्र बंद करें, और अगर ठाकुर जी का स्वरूप ध्यान में नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और दुबारा श्री ठाकुर जी
के दर्शन करे🙏🏽

हम प्रार्थना करते हैं।
प्रार्थना का विशेष अर्थ है ।
प्र अर्थात विशिष्ट, श्रेष्ठ!
अर्थना अर्थात निवेदन।
ठाकुर जी से प्रार्थना करें!
और प्रार्थना क्या करनी है|

उपरोक्त श्लोक बोलना है।

श्लोक का अर्थ है

“अनायासेना मरणम” अर्थात बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो, बीमार होकर बिस्तर पर पड़े पड़े ,कष्ट उठाकर मृत्यु नहीं चाहिए ।चलते चलते ही श्री जी शरण हो जाएं।

” बिना दैन्येन जीवनम “ अर्थात परवशता का जीवन न हो। किसी के सहारे न रहना पड़े ,।जैसे लकवा हो जाता है ,और दूसरे व्यक्ति पर आश्रित हो जाता है ।वैसे परवश, बेबस न हों। ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख मांगे जीवन बसर हो सके।

” देहान्ते तव सानिध्यम “ अर्थात जब मृत्यु हो तब ठाकुर जी सन्मुख खड़े हो। जब प्राण तन से निकले , आप सामने खड़े हों। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर जी उनके सम्मुख जाकर खड़े हो गए । उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले।

यह प्रार्थना करें । गाड़ी ,लाड़ी ,लड़का, लड़की पति, पत्नी ,घर ,धन यह मांगना नहीं ।यह तो ठाकुर जी आपकी पात्रता के हिसाब से खुद आपको दे देते हैं ।
तो दर्शन करने के बाद बाहर बैठकर यह प्रार्थना अवश्य पढ़ें ।

🙏🏽जय श्री कृष्ण

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व्रत का सही अर्थ

व्रत का अर्थ यजुर्वेद में बहुत स्पष्ट रुप में बताया गया है। देखिए―

अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्।
इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि।।
―(यजु० 1/5)
भावार्थ―हे ज्ञानस्वरुप प्रभो! आप व्रतों के पालक और रक्षक हैं। मैं भी व्रत का अनुष्ठान करुँगा। मुझे ऐसी शक्ति और सामर्थ्य प्रदान कीजिए कि मैं अपने व्रत का पालन कर सकूँ। मेरा व्रत यह है कि मैं असत्य-भाषण को छोड़कर सत्य को जीवन में धारण करता हूँ।

इस मन्त्र के अनुसार व्रत का अर्थ हुआ किसी एक दुर्गुण, बुराई को छोड़कर किसी उत्तम गुण को जीवन में धारण करना।

उपवास का भी ऐसा ही अर्थ है―
उप समीपे यो वासो जीवात्मपरमात्मयोः।
उपवासः स विज्ञेयो न तु कायस्य शोषणम्।।
―(वराहोपनिषद् 2/39)
भावार्थ―जीवात्मा का परमात्मा के समीप होना, परमात्मा की उपासना करना, परमात्मा के गुणों को जीवन में धारण करना, इसी का नाम उपवास है। शरीर को सुखाने का नाम उपवास नहीं है।

प्राचीन साहित्य में विद्वानों, सन्तों और ऋषि-महर्षियों ने भूखे–मरनेरुपी व्रत का खण्डन किया है। प्राचीन ग्रन्थों में न तो ‘सन्तोषी’ के व्रत का वर्णन है और न एकादशी आदि व्रतों का विधान है।

महर्षि मनु ने लिखा है―
पत्यौ जीवति या तु स्त्री उपवासव्रतं चरेत्।
आयुष्यं हरते भर्तुर्नरकं चैव गच्छति।।
भावार्थ―जो स्त्री पति के जीवित रहते हुए भूखे-मरनारुप व्रत या उपवास करती है, वह पति की आयु को कम करती है और मरने पर स्वयं नरक को जाती है।
[मनुस्मृति में से अनेक श्लोकों को निकाला गया है। अनेक श्लोक पीछे से मिलाये गये हैं। यह श्लोक पाँचवें अध्याय में १५५ श्लोक के पश्चात् था। अब भी अनेक संस्करणों में यह श्लोक है। कुछ संस्करणों में से निकाल दिया गया है।]

इस प्रकार भूखा-मरनेवाले व्रत का भी सन्तों, ऋषि-मुनियों ने खण्डन किया है, आयुर्वेद की दृष्टि से भी आज जिस रुप में इन व्रतों को किया जाता है, उस रुप में ये व्रत शरीर को हानि पहुँचाते हैं। क्योंकि आजकल के व्रत ऐसे हैं कि दिन भर अन्न को छोड़कर कुछ न कुछ खाते रहो। इस प्रकार आयुर्वेद की दृष्टि से जो उपवास का लाभ पूरे दिन निराहार रहकर या अल्पाहार करके मिलना चाहिये था, वह नहीं मिल पाता (साप्ताहिक या पाक्षिक उपवास)।
व्रत के बहाने हर समय मुँह में कुछ-न-कुछ ठूँसते जाने का नाम व्रत नहीं है।

मैं व्रतों का खण्डन नहीं करता, आर्यसमाज भी व्रतों का खण्डन नहीं करता। आप एकादशी का व्रत लीजिए और खूब कीजिए, परन्तु एकादशी क्या है, इसे समझ लीजिए। पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय तथा एक मन―ये ग्यारह हैं। इन सबको अपने वश में रखना, आँखों से शुभ देखना, कानों से शुभ सुनना, नासिका से ओ३म् का जप करना, वाणी से मधुर बोलना, जिह्वा से शरीर को बल और शक्ति देने वाले पदार्थों का ही सेवन करना, हाथों से उत्तम कर्म करना, पाँवों से उत्तम सत्सङ्ग में जाना, जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन करना―यह है सच्चा एकादशी-व्रत। इस व्रत के करने से आपके जीवन का कल्याण हो जाएगा। शरीर को गलाने और सुखाने से तो यह लोक भी बर्बाद हो जाएगा, मुक्ति मिलना तो दूर की बात है।

सत्यनारायणव्रत का अर्थ है कि मनुष्य अपने हृदय में विद्यमान सत्यस्वरुप परमात्मा के गुणों को अपने जीवन में धारण करे। जीवन में सत्यवादी बने। मन, वचन और कर्म से सत्य का पालन करें ।

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धर्म एव हतो हन्ति
धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो
मा नो धर्मो हतोऽवधीत्।

धर्म उसका नाश करता है जो
धर्म का नाश करता है।
धर्म उसका रक्षण करता है जो
उसके रक्षणार्थ प्रयास करता है।
अतः धर्म का नाश नहीं करना
चाहिए। ध्यान रहे धर्म का नाश करने वाले का नाश,अवश्यंभावी है। मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित किया हुआ धर्म रक्षक की रक्षा करता है इसलिए धर्म का हनन कभी न करना,इस डर से कि मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले। जो पुरूष धर्म का नाश करता है, उसी का नाश धर्म कर देता है, और जो धर्म की रक्षा करता है,उसकी धर्म भी रक्षा करता है। इसलिए मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले,इस भय से धर्म का हनन अर्थात् त्याग कभी नही करना चाहिए।
……………………………….
स्वयम्भू मनु ने धर्म के दस
लक्षण बताये हैं:

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं
शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो
दशकं धर्म लक्षणम्॥

धृति (धैर्य),क्षमा(दूसरों के द्वारा
किये गये अपराध को क्षमा कर
देना,क्षमाशील होना),दम(अपनी
वासनाओं पर नियन्त्रण करना),
अस्तेय (चोरी न करना),शौच
(अन्तरङ्ग और बाह्य शुचिता),
इन्द्रिय निग्रहः(इन्द्रियों को वश
मे रखना),धी(बुद्धिमत्ता का
प्रयोग),विद्या(अधिक से अधिक
ज्ञान की पिपासा),सत्य (मन
वचन कर्म से सत्य का पालन)
और अक्रोध (क्रोध न करना);
ये दस धर्म के लक्षण हैं। जो अपने अनुकूल न हो वैसा व्यवहार दूसरे के साथ न करना चाहिये – यह धर्म की कसौटी है।
……………………………….
श्रूयतां धर्म सर्वस्वं
श्रुत्वा चैव अनुवर्त्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि,
परेषां न समाचरेत्॥

धर्म का सर्वस्व क्या है,सुनो
और सुनकर उस पर चलो !
अपने को जो अच्छा न लगे,
वैसा आचरण दूसरे के साथ
नही करना चाहिये।
…………………………………
धर्म एव हतो हन्ति
धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यः
मानो धर्मो हतोवाधीत् ॥

धर्म उसका नाश करता है जो
उसका(धर्म का)नाश करता है।
धर्म उसका रक्षण करता है जो
उसके रक्षणार्थ प्रयास करता है।
अतः धर्मका नाश नहीं करना
चाहिए। ध्यान रहे धर्मका नाश करने वाले का नाश,अवश्यंभावी है।
……………………………….
यत्र धर्मो ह्यधर्मेण
सत्यं यत्रानृतेन च।
हन्यते प्रेक्षमाणानां
हतास्तत्र सभासदः।

जिस सभा में बैठे हुए
सभासदों के सामने अधर्म
से धर्म और झूठ से सत्य का
हनन होता है उस सभा में सब
सभासद् मरे से ही हैं।
‘‘जिस सभा में अधर्म से धर्म,
असत्य से सत्य,सब सभासदों
के देखते हुए मारा जाता है,उस
सभा में सब मृतक के समान
हैं,जानों उनमें कोई भी नहीं
जीता।’’
…………………………………..
धर्मो विद्धस्त्वधर्मेण
सभां यत्रोपतिष्ठते।
शल्यं चास्य न कृन्तन्ति
विद्धास्तत्र सभासदः।।

जिस सभा में अधर्म से घायल
होकर धर्म उपस्थित होता है जो
उसका शल्य अर्थात् तीरवत् धर्म
के कलंक को निकालना और
अधर्म का छेदन नहीं करते
अर्थात् धर्मों का मान,अधर्मी
को दण्ड नहीं मिलता उस सभा
में जितने सभासद् हैं वे सब
घायल के समान समझे जाते हैं।
‘‘अधर्म से धर्म घायल होकर
जिस सभा में प्राप्त होवे उसके
घाव को यदि सभासद् न पूर देवें
तो निश्चय जानो कि उस सभा में
सब सभासद् ही घायल पड़े हैं।’’
………………………………
ऋग्वेदविद्यजुर्विच्च
सामवेदविदेव च।
त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया
धर्मसंशयनिर्णये।।

ऋग्वेदवित्,यजुर्वेदवित् और
सामवेदवित् इन तीनों विद्वानों
की भी सभा धर्मसंशय अर्थात्
सब व्यवहारों के निर्णय के लिए
होनी चाहिए। ’और जिस सभा में ऋग्वेद,यजुर्वेद और सामवेद के
जानने वाले तीन सभासद
होके व्यवस्था करें,उस सभा
की,की हुई व्यवस्था का भी
कोई उल्लंघन न करे ।’
…………………………………

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नवदुर्गा*- एक स्त्री के पूरे जीवनचक्र का बिम्ब है नवदुर्गा के नौ स्वरूप !

  1. जन्म ग्रहण करती हुई कन्या “शैलपुत्री” स्वरूप है !
  2. कौमार्य अवस्था तक “ब्रह्मचारिणी” का रूप है !

  3. विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल होने से वह “चंद्रघंटा” समान है !

  4. नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने पर वह “कूष्मांडा” स्वरूप है !

  5. संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री “स्कन्दमाता” हो जाती है !

  6. संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री “कात्यायनी” रूप है !

  7. अपने संकल्प से पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से वह “कालरात्रि” जैसी है !

  8. संसार (कुटुंब ही उसके लिए संसार है) का उपकार करने से “महागौरी” हो जाती है !

9 धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले संसार मे अपनी संतान को सिद्धि (समस्त सुख-संपदा) का आशीर्वाद देने वाली “सिद्धिदात्री” हो जाती है !
🙏🍁🙏🍁🙏🍁🙏

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एस एन व्यास

जानिए मां दुर्गा के दिव्यास्त्र किस बात का हैं प्रतीक

शक्ति की अधिष्ठात्री देवी की संरचना तमाम देवीदेवताओं की संचित शक्ति के द्वारा हुई है. जिस तरह तमाम नदियों के संचित जल से समुद्र बनता है, उसी तरह भगवती दुर्गा विभिन्न देवी देवताओं के शक्ति समर्थन से महान बनी हैं. देवताओं ने मां दुर्गा को दिव्यास्त्र प्रदान किये.
इस आद्याशक्ति को शिव ने त्रिशूल, विष्णु ने चक्र, वरुण ने शंख, अग्नि ने शक्ति, वायु ने धनुष बाण, इन्द्र ने वज्र और यमराज ने गदा देकर अजेय बनाया. दूसरे देवताओं ने मां दुर्गा को उपहार स्वरूप हार चूड़ामणि, कुंडल, कंगन, नुपूर, कण्ठहार आदि तमाम आभूषण दिए. हिमालय ने विभिन्न रत्न और वाहन के रूप में सिंह भेंट किया.

1.शंख
दुर्गा मां के हाथ में शंख प्रणव का या रहस्यवादी शब्द ‘ओम’ का प्रतीक है जो स्वयं भगवान को उनके हाथों में ध्वनि के रूप में होने का संकेत करता है.

2.धनुषबाण
धनुष बाण ऊर्जा का प्रतिनिधित्त्व करते हैं दुर्गा मां के एक ही हाथ में इन दोनों का होना इस बात का संकेत है कि मां ने ऊर्जा के सभी पहलुओं एवं गतिज क्षमता पर नियंत्रण प्राप्त किया हुआ है.

3.बिजली और वज्र
ये दोनों दृढ़ता के प्रतीक हैं. और दुर्गा मां के भक्तों को भी वज्र की भांति दृढ़ होना चाहिए जैसे बिजली और वज्र जिस भी वस्तु को छुती है उसे ही नष्ट एवं ध्वस्त कर देती है अपने को बिना क्षति पहुंचाए. इसी तरह माता के भक्तों को भी अपने पर विश्वास करके किसी भी कठिन से कठिन कार्य पर खुद को क्षति पहुंचाए बिना करना चाहिए

4.कमल के फूल
माता के हाथ में जो कमल का फूल है वह पूर्ण रूप से खिला हुआ नहीं है इससे तात्पर्य है कि कमल सफलता का प्रतीक तो है परन्तु सफलता निश्चित नहीं है. कमल का एक पर्यायवाची पंकज भी है अर्थात् संसार में कीचड़ के बीच भक्तों की आध्यात्मिक गुणवत्ता के सतत् विकास के लिए खड़ा है कमल.

5.सुदर्शन चक्र
सुदर्शन चक्र जो दुर्गा मां की तर्जनी के चारों ओर घूम रहा है. बिना उनकी अंगुली को छुए हुए यह प्रतीक है इस बात का कि पूरा संसार मां दुर्गा की इच्छा के अधीन है और उन्हीं के आदेश पर चल रहा है. माता इस तरह के अमोघ अस्त्रशस्त्र इसलिए प्रयोग करती हैं ताकि दुनिया से अधर्म, बुराई और दुष्टों का नाश हो सके और सभी समान रूप से खुशहाली से जी सकें.

6.तलवार
तलवार जो दुर्गा मां ने अपने हाथों में पकड़ी हुई है वह ज्ञान की प्रतीक है वह ज्ञान जो तलवार की धार की तरह तेज एवं पूर्ण हो. वह ज्ञान जो सभी शंकाओं से मुक्त हो तलवार की चमक का प्रतीक माना जाता है.

  1. त्रिशूल
    मां दुर्गा का त्रिशूल अपने आप में तीन गुण समाए हुए हैं. यह सत्व, रजस एवं तमस गुणों का प्रतीक है. और वह अपने त्रिशुल से तीनों दुखों का निवारण करती हैं चाहे वह शारीरिक हो, चाहे मानसिक हो या फिर चाहे आध्यात्मिक हो.

8.सिंह सवारी
मां दुर्गा शेर पर एक निडर मुद्रा में बैठी हैं जिसे अभयमुद्रा कहा जाता है जो संकेत है डर से स्वतंत्रता का, जगत की मां दुर्गा अपने सभी भक्तों को बस इतना ही कहती हैं, अपने सभी अच्छे बुरे कार्यों एवं कत्र्तव्यों को मुझ पर छोड़ दो और मुक्त हो जाओ अपने डर से अपने भय से.।

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कन्या पूजन क्यों जरूरी है? कन्या पूजन की विधि
नवरात्रि पूजन से जुड़ी कई परंपराएं हैं, जैसे कन्या पूजन. शिवपुराण में एक प्रसंग है कि माता पार्वती जब आठ वर्ष की थीं तो एक बार उनके पिता और पर्वतराज हिमवान साथ लेकर शिवजी की सेवा में प्रस्तुत हुए.

हिमवान को नारदजी ने बता दिया था कि भगवती ने आपके घर में अवतार लिया है और इनका विवाह शिवजी से ही होना है. जब शिवजी ने हिमवान के साथ बालिका गौरी को देखा तो कौतुक किया.

उन्होंने हिमवान से कहा कि आप प्रतिदिन मेरे दर्शन को आ सकते हैं परंतु यह बालिका नहीं आए सकती. माता ने बड़े मृदु स्वरों में शिवजी के साथ तर्कपूर्ण रूप से प्रकृति और पुरूष का संबंध बताया जिससे शिवजी प्रसन्न हुए और माता को सेवा का अवसर प्रदान किया.

कुंआरी कन्याएं माता के समान ही पवित्र और पूजनीय मानी जाती हैं. इसलिए नवरात्रि में जब माता की विशेष आराधना की जाती है उस दौरान कन्या पूजन की विशेष रूप से मान्यता दी गई हैं.

कन्या पूजन की मंत्र सहित संक्षिप्त विधिः

दो वर्ष से लेकर दस वर्ष की कन्याएं साक्षात माता का स्वरूप मानी जाती हैं. यही कारण है कि इसी उम्र की कन्याओं के पैरों का विधिवत पूजन कर भोजन कराया जाता है. माना जाता है कि होम जप और दान से देवी जितनी प्रसन्न होतीं हैं उतनी ही प्रसन्नता माता को कन्या पूजन से होती है.

कन्याओं के विधिवत, सम्मानपूर्वक माता की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति के हृदय से भय दूर हो जाता है. उसके मार्ग में आने वाली सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं. उस पर मां की कृपा से कोई संकट नहीं आता.

नवरात्र में कन्या पूजन के लिए जिन कन्याओं का चयन करें उनकी आयु दो वर्ष से कम न हो और दस वर्ष से ज्यादा भी न हो. एक वर्ष या उससे छोटी कन्याओं की पूजा नहीं करनी चाहिए क्योंकि एक वर्ष से छोटी कन्याएं प्रसाद नहीं खा सकतीं.

उन्हें प्रसाद-पूजन आदि का ज्ञान नहीं होता. इसलिए शास्त्रों में दो से दस वर्ष की आयु की कन्याओं का पूजन करना ही श्रेष्ठ माना गया है. कन्याओँ के साथ एक बालक भी रखना चाहिए. वह भैरव स्वरूप होता है.

नवरात्रि की सभी तिथियों को एक-एक कन्या और नवमी को नौ कन्याओं के विधिवत पूजन का विधान है. यदि नौ नहीं कर पाते तो सात पांच या तीन कन्याओं की पूजा करें. संख्या विषम ही होनी चाहिए.

कन्याओं पर जल छिड़कर रोली-अक्षत का तिलक लगाएं. फिर आरती उतारें. आरती के बाद भोजन कराना चाहिए फिर पैर छूकर उन्हें यथाशक्ति दान देकर विदा करना चाहिए. पूजन के समय निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करना चाहिए.

मंत्रः
ऊँ मंत्राक्षरमयीं लक्ष्मीं मातृणां रूपधारिणीम्।
नवदुर्गा आत्मिकां साक्षात् कन्याम् आवाह्यम्।।

किस आयु की कन्या में माता का कौन सा रूपः

दो वर्ष की कन्या (कुमारी) के पूजन से प्रसन्न होकर माता दुख और दरिद्रता दूर करती हैं.

तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति का रूप माना जाता है. त्रिमूर्ति कन्या के पूजन से धन-धान्या आता है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है.

चार वर्ष की कन्या को कल्याणी स्वरूप माना जाता है. इसकी पूजा से परिवार में मंगलकार्य निर्विघ्न संपन्न होते हैं और सबका कल्याण होता है.

पांच वर्ष की कन्या को रोहिणी स्वरूप कहा जाता है. रोहिणी को पूजने वाला मनुष्य स्वयं रोगमुक्त रहता है और उसका परिवार भी प्रसन्न रहता है.

छह वर्ष की कन्या को कालिका रूप माना गया है. कालिका रूप से विद्या, विजय, राजयोग की प्राप्ति होती है.

सात वर्ष की कन्या का रूप चंडिका का कहा गया है. चंडिका रूप का पूजन करने से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है.

आठ वर्ष की कन्या शाम्भवी कहलाती हैं. इसका पूजन करने से व्यक्ति में वाक-पटुता आती है और वाद-विवाद में विजय प्राप्त होती है.

नौ वर्ष की कन्या साक्षात दुर्गा कहलाती हैं. इसका पूजन करने से शत्रुओं का नाश होता है तथा उसके असाध्य कार्य पूर्ण होते हैं.

दस वर्ष की कन्या सुभद्रा कहलाती है. सुभद्रा अपने भक्तों के सारे मनोरथ पूर्ण करती हैं. सुभद्रा अपने भक्तों के सारे मनोरथ पूर्ण करती है.

जय माँ दुर्गा …..
जय माता दी ….
हर हर महादेव ….
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