Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

“श्रीमद्भगवद्गीता” के कहने, सुनने और पढ़ने का महात्म्य !!!

संजय गुप्ता

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥

जो मनुष्य, परम कल्याण जिसका फल है ऐसे इस कृष्णार्जुन – संवाद रूप अत्यंत गोप्य गीता ग्रन्थ को मुझमें भक्ति रखने वाले भक्तों में सुनाएगा – ग्रन्थरूप से या अर्थरूप से स्थापित करेगा। कैसे सुनाएगा ? मुझमें पराभक्ति करके, अर्थात परमगुरु भगवान् की मैं सेवा करता हूँ ऐसा समझ कर जो इसे सुनाएगा उसका यह फल है कि वह मुझे ही प्राप्त हो जाएगा – इसमें संशय नहीं करना चाहिए।

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥

इस गीता शास्त्र की परम्परा चलाने वाले भक्त से बढ़ कर, मेरा अधिक प्रिय कार्य करने वाला, मनुष्यों में कोई नहीं है। अर्थात वह मेरा अतिशय प्रिय करने वाला है, वर्तमान मनुष्यों में उससे बढ़ कर प्रियतम कार्य करने वाला और कोई नहीं है, तथा भविष्य में भी इस भूलोक में उससे बढ़ कर प्रियतर कोई दूसरा नहीं होगा।

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥

जो मनुष्य हम दोनों के संवादरूप इस धर्मयुक्त गीता ग्रंथ को पढ़ेगा, उसके द्वारा यह होगा कि मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा। यह फल विधि है यानी इसका फल देवता विषयक ज्ञानयज्ञ के समान होता है। उस अध्ययन से मैं ज्ञानयज्ञ द्वारा पूजित होता हूँ, ऐसा मेरा निश्चय है।

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्‌ ॥

जो मनुष्य, इस ग्रन्थ को श्रद्धायुक्त और दोष दृष्टि रहित होकर केवल सुनता ही है, वह भी पापों से मुक्त होकर, पुण्यकारियों के अर्थात अग्निहोत्रादि श्रेष्ठ कर्म करने वालों के, शुभ लोकों को प्राप्त हो जाता है। ‘अपि’ शब्द से यह पाया जाता है कि अर्थ समझने वालों की तो बात ही क्या है !

(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय – १८, श्लोक – ६८ से ७१)

ज्ञानयज्ञ का क्या अर्थ है ?? मन और बुद्धि को केंद्रित करके गीता पढ़ना यानी अध्ययन करना यज्ञ है। इस प्रकार अध्ययन करने से विषय का समझ में आना ज्ञान है। भगवान् स्पष्ट कह रहे हैं कि इस प्रक्रिया से मैं पूजित होता हूँ। अर्थात इस प्रकार से गीता के अध्ययन मात्र से पाठक द्वारा मेरी पूजा हो जाती है।

आज कल ‘अष्टावक्र गीता’ काफी चर्चा में है। इसके पठन – पाठन का प्रचार और प्रसार जोर – शोर से किया जा रहा है। प्रचार माध्यमों में टी वी चैनल भी शामिल है। इसका बाजारीकरण आरम्भ हो गया है। इसे श्रीमद्भगवद्गीता से किसी भी प्रकार कम नहीं बताया जा रहा है।

‘श्रीमद्भगवद्गीता’ भगवान् द्वारा गाया गीत है जबकि ‘अष्टावक्र गीता’ एक मनुष्य द्वारा गाया गीत है।जिस प्रकार विश्व के सर्वश्रेष्ठ बाँसुरी वादक की तुलना क्या कल्पना भी भगवान् के बाँसुरी वादन से नहीं की जा सकती है। ठीक उसी प्रकार सर्वश्रेष्ठ मनुष्य के द्वारा भी गाए गीत से भगवान् के द्वारा गाए गीत की तुलना / कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

अष्टावक्र गीता के प्रचारकों की ओर से एक प्रश्न आया है – ज्ञान/विद्या कहीं से भी प्राप्त हो, इसमें बुरा क्या है? उत्तर है – श्रीमद्भगवद्गीता प्रमाण है जबकि अष्टावक्र गीता प्रमाण “नहीं” है। और जो प्रमाण है वही ज्ञान/विद्या है शेष सभी अज्ञान/अविद्या है!

समान परिश्रम और समय लगा कर श्रीमद्भगवद्गीता के अध्ययन से भगवान् की पूजा सम्पन्न होती है ; जबकि अष्टावक्र गीता के अध्ययन से देव भी पूजित नहीं होते हैं। स्वयं विचार करें !

श्रीमद्भगवद्गीता का एक भी पृष्ठ खोलते ही आप सीधे भगवान् से जुड़ जाते हैं। आप होते हैं और भगवान् होते हैं, उनकी वाणी होती है।भगवान् स्पष्ट कह रहे हैं – श्रीमद्भगवद्गीता के अध्ययन, वाचन, श्रवण अर्थात इस गीता शास्त्र की परम्परा चलाने वाले भक्त से बढ़ कर, मेरा अधिक प्रिय कार्य करने वाला, मनुष्यों में कोई नहीं है। ऐसे गीता शास्त्र – परम्परा को चलाने वाले भक्त भगवान् को अवश्य प्राप्त होते हैं – यह भगवान् का वचन है।

जय श्री कृष्ण !!

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भगवान कृष्ण की बाल लीला,,,,,,


भगवान कृष्ण की बाल लीला,,,,,,

Sanjay Gupta

ऐसा कोन होगा जिसने भगवान श्री कृष्ण की बाल लीला को नहीं सुना होगा और बाल लीला में विशेषकर माखन चोरी लीला। माखन चोरी लीला भगवान ने इसलिए की क्योकि गोपियाँ भगवान से प्रेम करती थी। और भगवान अपनी लीला के माध्यम से उन्हें प्रेम देना चाहते थे।

और वास्तव में भगवान माखन चोर नहीं है वो तो चित-चोर है। एक बार जो उनकी लीला को सुन लेगा- देख लेगा फिर उसे संसार से क्या मतलब? भगवान ब्रज में नित्य ऐसी लीला करते रहते थे। एक बड़ी सुन्दर लीला आप पढ़िए और सिर्फ पढ़िए नहीं मन की आँखों से थोड़ा दर्शन कीजिये, मेरे गुरुदेव कहते है की चिंतन कीजिये-

एक बार की बात है भगवान अपनी टोली के साथ तैयार हुए। भगवान के मित्र बने है सुबल, मंगल, सुमंगल, श्रीदामा, तोसन, आदि। भगवान सोच रहे है की आज किसके घर माखन चोरी की जाये। याद आया की “चिकसोले वाली” गोपी के घर चलते है। भगवान पहुंच गए सुबह सुबह और जोर से दरवाजा खटखटाने लगे। गोपी ने दरवाजा खोला। तो श्रीकृष्ण को खड़े देखा। बाल बिखेर रखे थे, मुह पर उबासी थी। गोपी बोली – ‘अरे लाला! आज सुबह-सुबह यहाँ कैसे?

कन्हैया बोले – ‘गोपी क्या बताऊँ! आज सुबह उठते ही, मैया ने कहा लाला तू चिकसोले वाली गोपी के घर चले जाओ और उससे कहना आज हमारे घर में संत आ गए है मैंने तो ताजा माखन निकला नहीं, चिकसोले वाली गोपी तो भोर में उठ जावे है।ताजो माखन निकल लेवे है। तू उनसे जाकर माखन ले आ। और कहना कि एक मटकी माखन दे दो, बदले में दो मटकी माखन लौटा दूँगी।

गोपी बोली – लाला! मै अभी माखन की मटकी लाती हूँ और मैया से कह देना कि लौटने की जरुरत नहीं है संतो की सेवा मेरी तरफ से हो जायेगी ।झट गोपी अंदर गयी और माखन की मटकी लाई और बोली – लाला ये माखन लो और ये मिश्री भी ले जाओ। कन्हैया माखन लेकर बाहर आ गए और गोपी ने दरवाजा बंद कर लिया।

अब भगवान ने अपने सभी दोस्तों को बुलाया है और कहते है आओ आओ श्रीदामा, मंगल, सुबल, जल्दी आओ, सब-के-सब झट से बाहर आ गए भगवान बोले,” जिसके यहाँ चोरी की हो उसके दरवाजे पर बैठकर खाने में ही आनंद आता है, और वो चोरी भी नहीं कहलाती है।” झट सभी गोपी के दरवाजे के बाहर बैठ गए, भगवान ने सबकी पत्तल पर माखन और मिश्री रख दी। और बीच में स्वयं बैठ गए। सभी सखा माखन और मिश्री खाने लगे।

माखन के खाने से होंठो की पट पट और मिश्री के खाने से दाँतो के कट-कट की आवाज जब गोपी ने सुनी तो सोचा ये आवाज कहाँ से आ रही है , कोई बंदर तो घर में नही आ गयो है।

जैसे ही उसने दरवाजा खोला तो सारे मित्रों के साथ श्रीकृष्ण बैठे माखन खा रहे थे। गोपी बोली – ‘क्यों रे कन्हैया! माखन संतो को चाहिए था या इन संड-भुसंडान को।

भगवान बोले देख गोपी गाली मत दीजो। ये भी संत है, साधु है। और तो और नागा साधु है किसी के तन पर कोई वस्त्र तक नहीं है।
तुझे तो इनको प्रणाम करना चाहिए और वो भी दंडवत(लेट कर)। गोपी बोली अच्छा अभी दण्डोत करती हूँ। एक डंडा ले आउ फिर अच्छे से डंडे से दण्डोत करुँगी।

भगवान बोले सबको बेटा माखन बहुत खा लिए है अब पीटने का नंबर है। भागो सभी अपने-अपने घर को। इस प्रकार भगवान ब्रज में सुन्दर लीला कर रहे है और सबको अपने रूप मधुर से सराबोर कर रहे है।

भगवान पूरी मण्डली के साथ माखन चुराने जाते थे। एक बार गोपियों ने आपस में कहा की कुछ ऐसा इंतजाम करते है की इसे माखन चुराते हुए पकड़ ले। सबने मीटिंग की है।

एक गोपी ने एक तरकीब लगायी गोपी ने माखन निकला और छीके पर टांग दिया और साथ में एक घंटी बांध दी कि जैसे ही बाल कृष्ण माखन चुराने आयेगे तो घंटी बज पड़ेगी और मैं रंगे हाथों कान्हा को पकड़ लूँगी।

कुछ देर बाद बाल कृष्ण अपने सखाओ के साथ गोपी के घर माखन चुराने आये, तभी श्रीदामा जी ने कहा – कान्हा देखो, गोपी ने तो मटकी में घंटी बांध दी है अगर माखन कि मटकी को हाथ लगायेगे तो घंटी बज जायगी और गोपी हमे पकड़ लेगी।

बाल कृष्ण ने कहा – गोपी हमें नहीं पकडेगी। फिर बाल कृष्ण ने घंटी से कहा – देखो घंटी! हम सब माखन चुरायेगे पर तुम बजना मत।

घंटी बोली – ठीक है प्रभु! नहीं बजुगी।

अब भगवान ने झट से श्री दामा जी के कंधे पर चढ गए और माखन कि मटकी में से माखन निकाला, और एक-एक करके सभी सखाओं को खिलाने लगे अंत में बाल कृष्ण ने जैसे ही स्वयं माखन खाया, त्यों ही घंटी बजने लगी।

घंटी कि आवाज सुनते ही गोपी आ गई। सारे सखा तो भाग गए पर झट गोपी ने कान्हा को पकड़ लिया और बोली – आज तो रंगे हाथ पकडे गए।

कान्हा ने कहा – रुको गोपी! पहले मुझे इस घंटी से बात करने दो तुमसे बात में बात करूँगा फिर तुमसे बात करूँगा।

भगवान ने कहा – क्यों री घंटी ! तूने मेरी बात क्यों नहीं मानी? मैंने कहा था कि बजना मत।

घंटी बोली – प्रभु ! इसमें मेरा दोष नहीं है देखो जब तक आपके सखाओं ने माखन खाया तब तक में नहीं बजी लेकिन जैसे ही आपने माखन खाया तो में बज उठी। क्योकि मंदिर में जब पुजारी जी आपको भोग लगाते है तो घंटी बजाते है। इसलिए इसलिए मुझे बजना पड़ा ।

गोपी ने कहा – कान्हा आज बड़े दिनों के बाद हाथ लगे हो, झट गोपी ने एक रस्सी उठाई और बाल कृष्ण को बाँधने लगी। जैसे ही कलाई में रस्सी लपेटती तुरंत फिसल जाती क्योकि बड़े कोमल बाल कृष्ण है और हाथो में माखन भी लगा हुआ है। गोपी फिर लपेटती फिर रस्सी फिसल जाती।

बाल कृष्ण बोले – अरे गोपी तुझे तो बांधना भी नही आता। मै बताता हूँ। झट बाल कृष्ण ने रस्सी गोपी के हाथ से ली और गोपी के ही हाथ में लपेटने लगे देख गोपी ऐसे एक लपेटा फिर कस के गाँठ लगा।

गोपी – हाँ ठीक है लाला! मै समझ गई।
कान्हा – अरे! अभी कैसे समझ गई, एक गाँठ से क्या होगा एक गाँठ तो मै खोलकर भाग जाऊँगा , देखो गोपी फिर दूसरी गाँठ इस तरह से कस के लगाना।

गोपी – हाँ हाँ लाला ! में समझ गई अब खोल दो।

कान्हा – क्या कहा गोपी खोल दो ! मै काय खोलू, खोलेगो तेरो खसम! और ठेंगा दिखाकर भाग जाते है।

बहुत प्यारी बाल लीला कर रहे है भगवान। और गोपियों को, ब्रजवासियों को आनंद ही आनंद प्रदान कर रहे है।

बोलिए माखन चोर भगवान की जय।

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56 (छप्पन) भोग क्यों लगाते है…


56 (छप्पन) भोग क्यों लगाते है…

Dev Sharma
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भगवान को लगाए जाने वाले भोग की बड़ी महिमा है |
इनके लिए 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं, जिसे
छप्पन भोग कहा जाता है |

यह भोग रसगुल्ले से शुरू होकर दही, चावल, पूरी,पापड़ आदि से होते हुए
इलायची पर जाकर खत्म होता है |
अष्ट पहर भोजन करने
वाले बालकृष्ण भगवान को अर्पित किए जाने वाले
छप्पन भोग के पीछे कई रोचक कथाएं हैं |
ऐसा भी कहा जाता है कि यशोदाजी बालकृष्ण
को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी |
अर्थात्…बालकृष्ण आठ बार भोजन करते थे |
जब इंद्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए
भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत
को उठाया था, तब लगातार सात दिन तक
भगवान ने अन्न जल ग्रहण नहीं किया |
आठवे दिन जब भगवान ने देखा कि अब इंद्र
की वर्षा बंद हो गई है, सभी व्रजवासियो को
गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा,
तब दिन में आठ प्रहर भोजन करने वाले व्रज के
नंदलाल कन्हैया का लगातार सात दिन तक भूखा रहना उनके व्रज वासियों और मया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ. भगवान के प्रति अपनी अन्न्य श्रद्धा
भक्ति दिखाते हुए सभी व्रजवासियो सहित यशोदा जी ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 7X8= 56
व्यंजनो का भोग बालकृष्ण को लगाया |
गोपिकाओं ने भेंट किए छप्पन भोग…
श्रीमद्भागवत के अनुसार, गोपिकाओं ने एक माह
तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया,
अपितु कुलदेवी जगदम्बा कात्यायनी मां की अर्चना भी इस
मनोकामना से की, कि उन्हें नंदकुमार ही पति रूप
में प्राप्त हों | श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी | व्रत समाप्ति और मनोकामना पूर्ण होने के
उपलक्ष्य में ही उद्यापन स्वरूप गोपिकाओं ने छप्पन
भोग का आयोजन किया |छप्पन भोग हैं छप्पन सखियां…ऐसा भी कहा जाता है कि गौलोक में भगवान
श्रीकृष्ण राधिका जी के साथ एक दिव्य कमल पर
विराजते हैं |उस कमल की तीन परतें होती हैं…
प्रथम परत में “आठ”,दूसरी में “सोलह”और
तीसरी में “बत्तीस पंखुड़िया” होती हैं |
प्रत्येक पंखुड़ी पर एक प्रमुख सखी और मध्य में
भगवान विराजते हैं |इस तरह कुल पंखुड़ियों
संख्या छप्पन होती है | 56 संख्या का यही अर्थ है |

छप्पन भोग इस प्रकार है
1. भक्त (भात),
2. सूप्पिका (दाल),
3. प्रलेह (चटनी),
4. सदिका (कढ़ी),
5. दधिशाकजा (दही
शाक की कढ़ी),
6. सिखरिणी (श्रीखंड),
7. अवलेह (चटनिया ),
8. बालका (बाटी),
9. इक्षु खेरिणी (मुरब्बा),
10. त्रिकोण (शरक्करपारा),
11. बटक (बड़ा),
12. मधु शीर्षक (मख्खन बडा),
13. फेणिका (फेनी),
14. परिष्टïश्च (पूरी),
15. शतपत्र (खाजा),
16. सधिद्रक (घेवर),
17. चक्राम (मालपुआ),
18. चिल्डिका (चिलडे ),
19. सुधाकुंडलिका (जलेबी),
20. धृतपूर (मेसूर पाक ),
21. वायुपूर (रसगुल्ला),
22. चन्द्रकला (चांदी की बरक वाली मिठाई ),
23. दधि (महारायता),
24. स्थूली (थूली),
25. कर्पूरनाड़ी (लौंगपूरी),
26. खंड मंडल (खुरमा),
27. गोधूम (दलिया),
28. परिखा, ( रोट )
29. सुफलाढय़ा (सौंफ युक्त),
30. दधिरूप (फलो से बना रायता ),
31. मोदक (लड्डू),
32. शाक (साग),
33. सौधान (अधानौ अचार),
34. मंडका (मोठ),
35. पायस (खीर)
36. दधि (दही),
37. गोघृत,
38. हैयंगपीनम (मक्खन),
39. मंडूरी (मलाई),
40. कूपिका (रबड़ी)
41. पर्पट (पापड़),
42. शक्तिका (बादाम का सीरा),

  1. लसिका (लस्सी),
  2. सुवत,( शरबत)
  3. संघाय (मोहन),
  4. सुफला (सुपारी),
  5. सिता (इलायची),
  6. फल,
  7. तांबूल, (पान)
  8. मोहन भोग, (मूंग दाल की चक्कि)
  9. लवण, (नमकीन व्यंजन)

🌼मुखवास🌼
52. कषाय, (आंवला )
53. मधुर, ( गुलुकंद)
54. तिक्त, (अदरक )
55. कटु, (मैथी दाना )
56. अम्ल ( निम्बू )

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अपने बच्चों को आज गीता पढ़ाइये, ताकि कल को किसी कोर्ट में गीता पर हाथ ना रखना पड़े…
अच्छे संस्कार ही अपराध रोक सकते हैं…🙏

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

अद्धैतामृतवर्षिणीम्     भगवतीमष्टादशाध्यायिनीम्
                     अम्ब  त्वामनुसंदधामि  भगवद्गीते    भवद्वेषनीम्   l
अद्धैत का अमृत बरसाने वाली, हे भगवती आप अठ्ठारह (१८) अध्यायों वाली  हैं,
हे  अम्ब  (माता) श्रीमद्भगवद्गीता आपका  अनुसंधान  करने से आप  भवद्वेष
से मुक्त करानेवाली हैं .
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क्या आप जानते है ?
दुनिया के लगभग सभी भाषाओं का प्रथम अक्षर ( अ )है !!

अक्षराणामकारोऽस्मि 【श्रीमद्भागवत गीता】

कृष्णम वंदे जगत गुरु।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

“उद्धव-गीता”

उद्धव बचपन से ही सारथी के रूप में श्रीकृष्ण की सेवा में रहे, किन्तु उन्होंने श्री कृष्ण से कभी न तो कोई इच्छा जताई और न ही कोई वरदान माँगा।
जब कृष्ण अपने अवतार काल को पूर्ण कर गौलोक जाने को तत्पर हुए, तब उन्होंने उद्धव को अपने पास बुलाया और कहा-
“प्रिय उद्धव मेरे इस ‘अवतार काल’ में अनेक लोगों ने मुझसे वरदान प्राप्त किए, किन्तु तुमने कभी कुछ नहीं माँगा! अब कुछ माँगो, मैं तुम्हें देना चाहता हूँ।
तुम्हारा भला करके, मुझे भी संतुष्टि होगी।
उद्धव ने इसके बाद भी स्वयं के लिए कुछ नहीं माँगा। वे तो केवल उन शंकाओं का समाधान चाहते थे जो उनके मन में कृष्ण की शिक्षाओं, और उनके कृतित्व को, देखकर उठ रही थीं।
उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा-
“भगवन महाभारत के घटनाक्रम में अनेक बातें मैं नहीं समझ पाया!
आपके ‘उपदेश’ अलग रहे, जबकि ‘व्यक्तिगत जीवन’ कुछ अलग तरह का दिखता रहा!
क्या आप मुझे इसका कारण समझाकर मेरी ज्ञान पिपासा को शांत करेंगे?”

श्री कृष्ण बोले-
“उद्धव मैंने कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन से जो कुछ कहा, वह “भगवद्गीता” थी।
आज जो कुछ तुम जानना चाहते हो और उसका मैं जो तुम्हें उत्तर दूँगा, वह “उद्धव-गीता” के रूप में जानी जाएगी।
इसी कारण मैंने तुम्हें यह अवसर दिया है।
तुम बेझिझक पूछो।
उद्धव ने पूछना शुरू किया-

“हे कृष्ण, सबसे पहले मुझे यह बताओ कि सच्चा मित्र कौन होता है?”
कृष्ण ने कहा- “सच्चा मित्र वह है जो जरूरत पड़ने पर मित्र की बिना माँगे, मदद करे।”
उद्धव-
“कृष्ण, आप पांडवों के आत्मीय प्रिय मित्र थे। आपाद बांधव के रूप में उन्होंने सदा आप पर पूरा भरोसा किया।
कृष्ण, आप महान ज्ञानी हैं। आप भूत, वर्तमान व भविष्य के ज्ञाता हैं।
किन्तु आपने सच्चे मित्र की जो परिभाषा दी है, क्या आपको नहीं लगता कि आपने उस परिभाषा के अनुसार कार्य नहीं किया?
आपने धर्मराज युधिष्ठिर को द्यूत (जुआ) खेलने से रोका क्यों नहीं?
चलो ठीक है कि आपने उन्हें नहीं रोका, लेकिन आपने भाग्य को भी धर्मराज के पक्ष में भी नहीं मोड़ा!
आप चाहते तो युधिष्ठिर जीत सकते थे!
आप कम से कम उन्हें धन, राज्य और यहाँ तक कि खुद को हारने के बाद तो रोक सकते थे!
उसके बाद जब उन्होंने अपने भाईयों को दाँव पर लगाना शुरू किया, तब तो आप सभाकक्ष में पहुँच सकते थे! आपने वह भी नहीं किया? उसके बाद जब दुर्योधन ने पांडवों को सदैव अच्छी किस्मत वाला बताते हुए द्रौपदी को दाँव पर लगाने को प्रेरित किया, और जीतने पर हारा हुआ सब कुछ वापस कर देने का लालच दिया, कम से कम तब तो आप हस्तक्षेप कर ही सकते थे!
अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा आप पांसे धर्मराज के अनुकूल कर सकते थे!
इसके स्थान पर आपने तब हस्तक्षेप किया, जब द्रौपदी लगभग अपना शील खो रही थी, तब आपने उसे वस्त्र देकर द्रौपदी के शील को बचाने का दावा किया!
लेकिन आप यह यह दावा भी कैसे कर सकते हैं?
उसे एक आदमी घसीटकर हॉल में लाता है, और इतने सारे लोगों के सामने निर्वस्त्र करने के लिए छोड़ देता है!
एक महिला का शील क्या बचा? आपने क्या बचाया?
अगर आपने संकट के समय में अपनों की मदद नहीं की तो आपको आपाद-बांधव कैसे कहा जा सकता है?
बताईए, आपने संकट के समय में मदद नहीं की तो क्या फायदा?
क्या यही धर्म है?”
इन प्रश्नों को पूछते-पूछते उद्धव का गला रुँध गया और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
ये अकेले उद्धव के प्रश्न नहीं हैं। महाभारत पढ़ते समय हर एक के मनोमस्तिष्क में ये सवाल उठते हैं!
उद्धव ने हम लोगों की ओर से ही श्रीकृष्ण से उक्त प्रश्न किए।
भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले-
“प्रिय उद्धव, यह सृष्टि का नियम है कि विवेकवान ही जीतता है।
उस समय दुर्योधन के पास विवेक था, धर्मराज के पास नहीं।
यही कारण रहा कि धर्मराज पराजित हुए।”

उद्धव को हैरान परेशान देखकर कृष्ण आगे बोले- “दुर्योधन के पास जुआ खेलने के लिए पैसाऔर धन तो बहुत था, लेकिन उसे पासों का खेल खेलना नहीं आता था, इसलिए उसने अपने मामा शकुनि का द्यूतक्रीड़ा के लिए उपयोग किया। यही विवेक है। धर्मराज भी इसी प्रकार सोच सकते थे और अपने चचेरे भाई से पेशकश कर सकते थे कि उनकी तरफ से मैं खेलूँगा।
जरा विचार करो कि अगर शकुनी और मैं खेलते तो कौन जीतता?
पाँसे के अंक उसके अनुसार आते या मेरे अनुसार?
चलो इस बात को जाने दो। उन्होंने मुझे खेल में शामिल नहीं किया, इस बात के लिए उन्हें माफ़ किया जा सकता है। लेकिन उन्होंने विवेक-शून्यता से एक और बड़ी गलती की!
और वह यह-
उन्होंने मुझसे प्रार्थना की कि मैं तब तक सभा-कक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए!
क्योंकि वे अपने दुर्भाग्य से खेल मुझसे छुपकर खेलना चाहते थे।
वे नहीं चाहते थे, मुझे मालूम पड़े कि वे जुआ खेल रहे हैं!
इस प्रकार उन्होंने मुझे अपनी प्रार्थना से बाँध दिया! मुझे सभा-कक्ष में आने की अनुमति नहीं थी!
इसके बाद भी मैं कक्ष के बाहर इंतज़ार कर रहा था कि कब कोई मुझे बुलाता है! भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे भूल गए! बस अपने भाग्य और दुर्योधन को कोसते रहे!
अपने भाई के आदेश पर जब दुस्साशन द्रौपदी को बाल पकड़कर घसीटता हुआ सभा-कक्ष में लाया, द्रौपदी अपनी सामर्थ्य के अनुसार जूझती रही!
तब भी उसने मुझे नहीं पुकारा!
उसकी बुद्धि तब जागृत हुई, जब दुस्साशन ने उसे निर्वस्त्र करना प्रारंभ किया!
जब उसने स्वयं पर निर्भरता छोड़कर-
‘हरि, हरि, अभयम कृष्णा, अभयम’
की गुहार लगाई, तब मुझे उसके शील की रक्षा का अवसर मिला।
जैसे ही मुझे पुकारा गया, मैं अविलम्ब पहुँच गया।
अब इस स्थिति में मेरी गलती बताओ?”
उद्धव बोले-
“कान्हा आपका स्पष्टीकरण प्रभावशाली अवश्य है, किन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई!
क्या मैं एक और प्रश्न पूछ सकता हूँ?”
कृष्ण की अनुमति से उद्धव ने पूछा-
“इसका अर्थ यह हुआ कि आप तभी आओगे, जब आपको बुलाया जाएगा? क्या संकट से घिरे अपने भक्त की मदद करने आप स्वतः नहीं आओगे?”
कृष्ण मुस्कुराए-
“उद्धव इस सृष्टि में हरेक का जीवन उसके स्वयं के कर्मफल के आधार पर संचालित होता है।
न तो मैं इसे चलाता हूँ, और न ही इसमें कोई हस्तक्षेप करता हूँ।
मैं केवल एक ‘साक्षी’ हूँ।
मैं सदैव तुम्हारे नजदीक रहकर जो हो रहा है उसे देखता हूँ।
यही ईश्वर का धर्म है।”

“वाह-वाह, बहुत अच्छा कृष्ण!
तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप हमारे नजदीक खड़े रहकर हमारे सभी दुष्कर्मों का निरीक्षण करते रहेंगे?
हम पाप पर पाप करते रहेंगे, और आप हमें साक्षी बनकर देखते रहेंगे?
आप क्या चाहते हैं कि हम भूल करते रहें? पाप की गठरी बाँधते रहें और उसका फल भुगतते रहें?”
उलाहना देते हुए उद्धव ने पूछा!

तब कृष्ण बोले-
“उद्धव, तुम शब्दों के गहरे अर्थ को समझो।
जब तुम समझकर अनुभव कर लोगे कि मैं तुम्हारे नजदीक साक्षी के रूप में हर पल हूँ, तो क्या तुम कुछ भी गलत या बुरा कर सकोगे?
तुम निश्चित रूप से कुछ भी बुरा नहीं कर सकोगे।
जब तुम यह भूल जाते हो और यह समझने लगते हो कि मुझसे छुपकर कुछ भी कर सकते हो, तब ही तुम मुसीबत में फँसते हो! धर्मराज का अज्ञान यह था कि उसने माना कि वह मेरी जानकारी के बिना जुआ खेल सकता है!
अगर उसने यह समझ लिया होता कि मैं प्रत्येक के साथ हर समय साक्षी रूप में उपस्थित हूँ तो क्या खेल का रूप कुछ और नहीं होता?”

भक्ति से अभिभूत उद्धव मंत्रमुग्ध हो गये और बोले-
प्रभु कितना गहरा दर्शन है। कितना महान सत्य। ‘प्रार्थना’ और ‘पूजा-पाठ’ से, ईश्वर को अपनी मदद के लिए बुलाना तो महज हमारी ‘पर-भावना’ है। मग़र जैसे ही हम यह विश्वास करना शुरू करते हैं कि ‘ईश्वर’ के बिना पत्ता भी नहीं हिलता! तब हमें साक्षी के रूप में उनकी उपस्थिति महसूस होने लगती है।
गड़बड़ तब होती है, जब हम इसे भूलकर दुनियादारी में डूब जाते हैं।
सम्पूर्ण श्रीमद् भागवद् गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इसी जीवन-दर्शन का ज्ञान दिया है।
सारथी का अर्थ है- मार्गदर्शक।
अर्जुन के लिए सारथी बने श्रीकृष्ण वस्तुतः उसके मार्गदर्शक थे।
वह स्वयं की सामर्थ्य से युद्ध नहीं कर पा रहा था, लेकिन जैसे ही अर्जुन को परम साक्षी के रूप में भगवान कृष्ण का एहसास हुआ, वह ईश्वर की चेतना में विलय हो गया!
यह अनुभूति थी, शुद्ध, पवित्र, प्रेममय, आनंदित सुप्रीम चेतना की!
तत-त्वम-असि!
अर्थात…
वह तुम ही हो।।
🙏🔔🙏
इसे ज़रूर पढ़ें।। धर्म की मानसिकता से अलग करके पढें।। जिंदगी की बहुत बड़ी सीख है इसमें।।-
🔅वंदेश्रीकृष्णम् 🔅

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Ⓜ कर्म भोग Ⓜ

Ⓜ  पूर्व जन्मों के कर्मों से ही हमें इस जन्म में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नि, प्रेमी-प्रेमिका, मित्र-शत्रु, सगे-सम्बन्धी इत्यादि संसार के जितने भी रिश्ते नाते हैं, सब मिलते हैं । क्योंकि इन सबको हमें या तो कुछ देना होता है या इनसे कुछ लेना होता है ।

Ⓜ    सन्तान के रुप में कौन आता है ?

Ⓜ  वेसे ही सन्तान के रुप में हमारा कोई पूर्वजन्म का ‘सम्बन्धी’ ही आकर जन्म लेता है । जिसे शास्त्रों में चार प्रकार से बताया गया है —

Ⓜ  ऋणानुबन्ध  : पूर्व जन्म का कोई ऐसा जीव जिससे आपने ऋण लिया हो या उसका किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो, वह आपके घर में सन्तान बनकर जन्म लेगा और आपका धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा, जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो जाये ।

Ⓜ  शत्रु पुत्र  : पूर्व जन्म का कोई दुश्मन आपसे बदला लेने के लिये आपके घर में सन्तान बनकर आयेगा और बड़ा होने पर माता-पिता से मारपीट, झगड़ा या उन्हें सारी जिन्दगी किसी भी प्रकार से सताता ही रहेगा । हमेशा कड़वा बोलकर उनकी बेइज्जती करेगा व उन्हें दुःखी रखकर खुश होगा ।

Ⓜ  उदासीन पुत्र  : इस प्रकार की सन्तान ना तो माता-पिता की सेवा करती है और ना ही कोई सुख देती है । बस, उनको उनके हाल पर मरने के लिए छोड़ देती है । विवाह होने पर यह माता-पिता से अलग हो जाते हैं ।

Ⓜ  सेवक पुत्र  : पूर्व जन्म में यदि आपने किसी की खूब सेवा की है तो वह अपनी की हुई सेवा का ऋण उतारने के लिए आपका पुत्र या पुत्री बनकर आता है और आपकी सेवा करता है । जो  बोया है, वही तो काटोगे । अपने माँ-बाप की सेवा की है तो ही आपकी औलाद बुढ़ापे में आपकी सेवा करेगी, वर्ना कोई पानी पिलाने वाला भी पास नहीं होगा ।

Ⓜ  आप यह ना समझें कि यह सब बातें केवल मनुष्य पर ही लागू होती हैं । इन चार प्रकार में कोई सा भी जीव आ सकता है । जैसे आपने किसी गाय कि निःस्वार्थ भाव से सेवा की है तो वह भी पुत्र या पुत्री बनकर आ सकती है । यदि आपने गाय को स्वार्थ वश पालकर उसको दूध देना बन्द करने के पश्चात घर से निकाल दिया तो वह ऋणानुबन्ध पुत्र या पुत्री बनकर जन्म लेगी । यदि आपने किसी निरपराध जीव को सताया है तो वह आपके जीवन में शत्रु बनकर आयेगा और आपसे बदला लेगा ।

Ⓜ  इसलिये जीवन में कभी किसी का बुरा ना करें । क्योंकि प्रकृति का नियम है कि आप जो भी करोगे, उसे वह आपको इस जन्म में या अगले जन्म में सौ गुना वापिस करके देगी । यदि आपने किसी को एक रुपया दिया है तो समझो आपके खाते में सौ रुपये जमा हो गये हैं । यदि आपने किसी का एक रुपया छीना है तो समझो आपकी जमा राशि से सौ रुपये निकल गये ।

Ⓜ  ज़रा सोचिये, “आप कौन सा धन साथ लेकर आये थे और कितना साथ लेकर जाओगे ? जो चले गये, वो कितना सोना-चाँदी साथ ले गये ? मरने पर जो सोना-चाँदी, धन-दौलत बैंक में पड़ा रह गया, समझो वो व्यर्थ ही कमाया । औलाद अगर अच्छी और लायक है तो उसके लिए कुछ भी छोड़कर जाने की जरुरत नहीं है, खुद ही खा-कमा लेगी और औलाद अगर बिगड़ी या नालायक है तो उसके लिए जितना मर्ज़ी धन छोड़कर जाओ, वह चंद दिनों में सब बरबाद करके ही चैन लेगी ।”

Ⓜ  मैं, मेरा, तेरा और सारा धन यहीं का यहीं धरा रह जायेगा, कुछ भी साथ नहीं जायेगा । साथ यदि कुछ जायेगा भी तो सिर्फ नेकियाँ ही साथ जायेंगी । इसलिए जितना हो सके नेकी कर, सतकर्म कर ।

           श्रीमद्भभगवतगीता।

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BHAGWAD GITA


BHAGWAD GITA

in one sentence

per chapter…

 

 

Chapter 1

 

Wrong thinking is the only problem in life

 

Chapter 2

 

Right knowledge is the ultimate solution to all our problems

 

Chapter 3

 

Selflessness is the only way to progress & prosperity

 

Chapter 4

 

Every act can be an act of prayer

 

Chapter 5

 

Renounce the ego of individuality & rejoice in the bliss of infinity

 

Chapter 6

 

Connect to the Higher consciousness daily

 

Chapter 7

 

Live what you learn

 

Chapter 8

 

Never give up on yourself

 

Chapter 9

 

Value your blessings

 

Chapter 10

 

See divinity all around

 

Chapter 11

 

Have enough surrender to see the Truth as it is

 

Chapter 12

 

Absorb your mind in the Higher

 

Chapter 13

 

Detach from Maya & attach to Divine

 

Chapter 14

 

Live a lifestyle that matches your vision

 

Chapter 15

 

Give priority to Divinity

 

Chapter 16

 

Being good is a reward in itself

 

Chapter 17

 

Choosing the right over the pleasant is a sign of power

 

Chapter 18

 

Let Go, Lets move to union with God.

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मजारों पर जाकर माथा रगड़ने वाले सनातनी ध्यान दें.


मजारों पर जाकर माथा रगड़ने वाले सनातनी ध्यान दें.
‘यान्ति देवव्रता देवान् पितृन्यान्ति पितृव्रताः भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपिमाम्”
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भूत प्रेत, मूर्दा (खुला या दफ़नाया हुआ अर्थात् कब्र) को सकामभाव से पूजने वाले स्वयं मरने के बाद भूत-प्रेत ही बनते हैं.
इस लिए मजारों पर कब्रों पर जाकर माथा रगड़ने से पहले यह सोच लें.